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Chattisgarh High Court

Satya Prakash Bhagat vs State Of Chhattisgarh on 16 March, 2026

                                                                1/8
                                                     (Cr. R. No.-323 of 2022)




                                                                                        2026:CGHC:12511

                                                                                                       प्रतिवेद्य


                                                 छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर


                                            दाण्डिक पुनरीक्षण क्रमांक-323/2022

                       सत्य प्रकाश भगत पिता-दयाराम भगत, उम्र-लगभग 35 वर्ष, निवासी-जमरगीड़ी,

                         पुलिस थाना-बागबहार, जिला-जशपुर, छत्तीसगढ़

                                                                                 -----पुनरीक्षणकर्ता/अभियुक्त

                                                                विरूद्घ

                       छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा जिला दण्डाधिकारी, अंबिकापुर, जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़

                                                                                         -----अनावेदक/राज्य



                पुनरीक्षणकर्ता/अभियुक्त द्वारा           : श्री डी०एन० प्रजापति, अधिवक्ता ।

                अनावेदक/राज्य द्वारा                     : श्री सुमित सिंह, उपमहाधिवक्ता ।



                                                 न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल


                                                     !! आदेश पीठ पर पारित !!


                16/03/2026


                1.

धारा 397/401 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रस्तुत इस पुनरीक्षण याचिका में, अपीलीय न्यायालय--पंचम अपर सत्र न्यायाधीश, अंबिकापुर, जिला सरगुजा (छत्तीसगढ़) Digitally signed by POMAN POMAN DEWANGAN DEWANGAN Date:

2026.03.17 17:10:19 +0530 2/8 (Cr. R. No.-323 of 2022) द्वारा आपराधिक अपील क्रमांक 72/2020, "छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध सत्य प्रकाश भगत" में पारित निर्णय दिनांक 22/02/2022 को चुनौती दी गई है । आगे जिसे "प्रश्नाधीन निर्णय" से संबोधित किया जा रहा है ।

2. प्रकरण के तथ्य, संक्षेप में, इस प्रकार हैं कि याचिकाकर्ता/अभियुक्त सत्य प्रकाश भगत पुलिस विभाग में वर्ष 2008 में आरक्षक के पद पर भर्ती हुआ । वर्ष 2010 से वह कार्यालय पुलिस अधीक्षक, सरगुजा की वेतन शाखा में वेतन क्लर्क के सहायक के रूप में कार्यरत था तथा कम्प्यूटर के माध्यम से समस्त अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन देयक तैयार कर कोषालय से ई-पेमेंट के माध्यम से उनके बैंक खातों में राशि अंतरित करता था । अभियुक्त सत्य प्रकाश भगत द्वारा माह जून 2011 में अपने नक्सली भत्ते की राशि 1,610/- रुपये के स्थान पर 16,100/- रुपये, तथा माह जून 2012 में भी 1,610/- रुपये के स्थान पर 16,100/- रुपये अपने बैंक खाते में अंतरित कराई गई । इसी प्रकार माह फरवरी 2013 में स्पेशल राशनमनी 650/- रुपये के स्थान पर 6,50,000/- रुपये, माह जनवरी 2013 में 650/- रुपये के स्थान पर 6,50,000/- रुपये तथा माह जनवरी 2014 में स्पेशल राशनमनी 650/- रुपये के स्थान पर 6,50,000/- रुपये अंतरित करवाया गया । इसी प्रकार माह दिसम्बर 2013 में आरक्षक सुनील कु मार के बैंक खाते, जो मूलतः अभियुक्त सत्य प्रकाश भगत के पिता दयाराम भगत का खाता क्रमांक था, उसमें 6,64,192/- रुपये अंतरित कराए गए । इस प्रकार अभियुक्त द्वारा कु ल 26,40,870/- रुपये की शासकीय राशि गबन कर प्राप्त किया गया । उक्त शिकायत पर थाना अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 91/2014 पंजीबद्ध किया गया तथा विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।

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(Cr. R. No.-323 of 2022)

3. विचारण न्यायालय--न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, अंबिकापुर, जिला सरगुजा (छत्तीसगढ़) में अभियोगपत्र प्रस्तुत होने के पश्चात प्रकरण लंबे समय तक आरोप-पूर्व तर्क हेतु नियत रहा । दिनांक 09/03/2016 को अभियुक्त के विरुद्ध धारा 420 एवं 409 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आरोप विरचित किए गए तथा प्रकरण अभियोजन साक्ष्य हेतु लंबित रहा । साक्षियों के नाम आदेशिकाएँ जारी की जाती रहीं, किं तु एक भी साक्षी का परीक्षण नहीं हो सका । अधिकांश स्थितियों में साक्षियों के नाम जारी आदेशिकाएँ अदम- तामील रहीं । इस मध्य साक्षियों को समन के अतिरिक्त जमानतीय वारंट तथा कु छ अवसरों पर गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए गए, किं तु अंततः एक भी साक्षी का परीक्षण नहीं हो सका । परिणामस्वरूप विचारण न्यायालय ने अभियोजन की रुचि न पाते हुए साक्ष्य का अवसर समाप्त कर दिया । अभियोजन साक्ष्य के अभाव में अंतिम तर्क सुनने के पश्चात दिनांक 17/01/2020 को निर्णय पारित करते हुए अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया ।

4. उक्त दोषमुक्ति आदेश को राज्य द्वारा अपील में चुनौती दी गई । अपीलीय न्यायालय--

पंचम अपर सत्र न्यायाधीश, अंबिकापुर, सरगुजा ने "प्रश्नाधीन निर्णय" के माध्यम से यह पाया कि अभियुक्त द्वारा शासकीय सेवक के रूप में शासन के साथ छल एवं आपराधिक न्यास-भंग किया गया है, जो गंभीर प्रकृ ति का अपराध है जो क्रमशः 07 एवं 10 वर्ष के कारावास से दण्डनीय है । प्रकरण के सभी साक्षी पुलिस विभाग, बैंक एवं कोषालय से संबंधित शासकीय सेवक हैं तथा अभियुक्त भी पुलिस विभाग में कार्यरत रहा है । इसके बावजूद अभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया । अतः अभियोजन को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना उचित पाते हुए प्रकरण, विचारण न्यायालय को इस निर्देश के साथ पुनः प्रेषित किया गया कि अभियोजन को साक्ष्य का पर्याप्त अवसर प्रदान करते हुए 4/8 (Cr. R. No.-323 of 2022) तथा साक्षियों की उपस्थिति सुनिश्चित कर प्रकरण का विधिवत निराकरण किया जाए । जिस आदेश को इस पुनरीक्षण में चुनौती दी गई है ।

5. पुनरीक्षणकर्ता/अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि विचारण न्यायालय में अभियोजन को साक्ष्य प्रस्तुत करने हेतु लगभग 28 अवसर प्रदान किए गए, जिस दौरान साक्षियों को समन, जमानतीय वारंट एवं गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए गए, फिर भी अभियोजन एक भी साक्षी प्रस्तुत करने में असफल रहा । विचारण की अवधि अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकती । विचारण न्यायालय द्वारा अभियोजन को पर्याप्त अवसर प्रदान किया जा चुका था, अतः अपीलीय न्यायालय द्वारा पुनः अवसर प्रदान किया जाना विधिसम्मत नहीं है । इसलिए पुनरीक्षण स्वीकार कर "प्रश्नाधीन निर्णय" को अपास्त किया जाए ।

6. राज्य पक्ष के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि यह मामला एक शासकीय सेवक द्वारा शासन के साथ छल एवं आपराधिक न्यास-भंग करने से संबंधित है, जिसमें साक्षी भी शासकीय कर्मचारी हैं । विवेचना भी पुलिस द्वारा की गई है तथा साक्षियों को तलब करने की जिम्मेदारी भी अभियोजन पक्ष पर ही होती है । इस मामले में बार-बार समन, जमानतीय वारंट एवं गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए, फिर भी उनकी उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो सकी । ऐसी स्थिति में अपीलीय न्यायालय द्वारा प्रकरण विचारण न्यायालय को पुनः प्रेषित कर अभियोजन को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाना पूर्णतः उचित है। विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में न्यायदृष्टांत Bablu Kumar and others v. State of Bihar and another, (2015) 8 SCC 787 का हवाला दिया है । 5/8

(Cr. R. No.-323 of 2022)

7. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया तथा अभिलेख का परिशीलन किया गया ।

8. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बबलू कु मार (पूर्वोक्त) में प्रतिपादित किया गया है कि न्यायालय विचारण के दौरान के वल एक मौन दर्शक अथवा निष्क्रिय पर्यवेक्षक नहीं रह सकता, अपितु उसका यह विधिक दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि न तो अभियोजन पक्ष और न ही अभियुक्त आपराधिक विचारण के साथ कोई टालमटोल, छल अथवा अनुचित आचरण करें तथा न्यायिक कार्यवाही की पवित्रता एवं गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे । न्यायालय को सक्रिय भूमिका निभाते हुए निष्पक्ष, प्रभावी एवं विधिसम्मत विचारण सुनिश्चित करना होता है, जो कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के सिद्धांतों के अनुरूप उसका दायित्व है । उक्त निर्णय की कण्डिका-22 निम्नानुसार हैः--

"22. Keeping in view the concept of fair trial, the obligation of the prosecution, the interest of the community and the duty of the court, it can irrefragably be stated that the court cannot be a silent spectator or a mute observer when it presides over a trial. It is the duty of the court to see that neither the prosecution nor the accused play truancy with the criminal trial or corrode the sanctity of the proceeding. They cannot expropriate or hijack the community interest by conducting themselves in such a manner as a consequence of which the trial becomes a farcical one. The law does not countenance a "mock trial". It is a serious concern of society. Every member of the collective has an inherent interest in such a trial. No one can be allowed to create a dent in the same. The court is duty-bound to see that neither the prosecution nor the defence takes unnecessary adjournments and take the trial under their control. The court is under the 6/8 (Cr. R. No.-323 of 2022) legal obligation to see that the witnesses who have been cited by the prosecution are produced by it or if summons are issued, they are actually served on the witnesses. If the court is of the opinion that the material witnesses have not been examined, it should not allow the prosecution to close the evidence. There can be no doubt that the prosecution may not examine all the material witnesses but that does not necessarily mean that the prosecution can choose not to examine any witness and convey to the court that it does not intend to cite the witnesses. The Public Prosecutor who conducts the trial has a statutory duty to perform. He cannot afford to take things in a light manner. The court also is not expected to accept the version of the prosecution as if it is sacred. It has to apply its mind on every occasion. Non-application of mind by the trial court has the potentiality to lead to the paralysis of the conception of fair trial."

9. उपरोक्त न्यायदृष्टांत के प्रकाश में विचाराधीन मामले पर विचार करें तो यह स्पष्ट है कि इस मामले में अभियुक्त पुलिस कर्मी है, विवेचना भी पुलिस द्वारा की जाती है, कथित छल, गबन एवं आपराधिक न्यास-भंग की घटना भी पुलिस कार्यालय से संबंधित है, साक्षी भी पुलिस, बैंक एवं कोषालय के कर्मचारी हैं । विचारण न्यायालय के समक्ष साक्षियों को उपस्थित कराने की जिम्मेदारी अभियोजन अर्थात पुलिस पर होती है तथा समन, जमानतीय वारंट एवं गिरफ्तारी वारंट की तामील भी पुलिस द्वारा ही सुनिश्चित की जाती है । ऐसी स्थिति में 28 अवसर दिए जाने के पश्चात एक भी साक्षी का न्यायालय में परीक्षण ना करा पाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाला है । उपर्युक्त परिस्थितियों में अपीलीय न्यायालय द्वारा प्रकरण को पुनः विचारण न्यायालय को प्रेषित कर 7/8 (Cr. R. No.-323 of 2022) अभियोजन को साक्ष्य का अवसर प्रदान करने का निर्देश देना विधिसम्मत है । "प्रश्नाधीन निर्णय" में किसी प्रकार की अवैधता या अशुद्धता परिलक्षित नहीं होती । अतः उसमें हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है ।

10. उल्लेखनीय है कि विचारणीय घटना वर्ष 2011-12 की है । अभियोजन के अधिकांश साक्षी शासकीय अधिकारी/कर्मचारी हैं । इतना लंबा समय व्यतीत हो जाने के कारण उन शासकीय कर्मियों की पदस्थापनाएँ परिवर्तित हो चुकी होंगी तथा उन्हें न्यायालय में साक्ष्य हेतु उपस्थित होने से पूर्व अपने वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति प्राप्त करनी होती है । ऐसी स्थिति में, विचारणीय अपराध की प्रकृ ति को दृष्टिगत रखते हुए अभियोजन साक्षियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने हेतु यह दायित्व किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपा जाना न्यायसंगत एवं आवश्यक प्रतीत होता है, जिससे पूर्व की तरह अभियोजन एवं पुलिस प्रशासन की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत करने में कोई अरुचि या लापरवाही न बरती जा सके । अतः प्रकरण के शीघ्र एवं प्रभावी विचारण की दृष्टि से निम्नानुसार निर्देश दिए जाते हैं-- i. विचारण न्यायालय द्वारा प्रत्येक माह कम से कम दो तिथियाँ अभियोजन साक्ष्य हेतु नियत की जाएँगी । साक्षियों के नाम प्रारंभ में ही समंस की बजाए जमानती वारंट जारी किये जाएं । आदेशिकाएं पुलिस महानिरीक्षक, सरगुजा रेंज, अंबिकापुर के माध्यम से ही जारी किये जाएं ।

ii. विचारण न्यायालय से साक्षियों के नाम जारी आदेशिकाओं की तामीली तथा साक्षियों के उपस्थिति की ज़िम्मेदारी पुलिस महानिरीक्षक, सरगुजा रेंज, अंबिकापुर की होगी । iii. बचाव पक्ष द्वारा शीघ्र विचारण में पूर्ण सहयोग किया जाये । iv. विचारण न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि प्रकरण का विचारण यथासंभव 05 माह की अवधि के भीतर पूर्ण किया जाए ।

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(Cr. R. No.-323 of 2022)

11. आदेश की प्रतिलिपि पालनार्थ पुलिस महानिरीक्षक, सरगुजा रेंज, अंबिकापुर को प्रेषित हो ।

12. आदेश की प्रतिलिपि पुलिस महानिदेशक, रायपुर, छत्तीसगढ़ को इस अपेक्षा के साथ प्रेषित हो कि विचार पश्चात, आवश्यकता अनुसार उचित कार्यवाही की जावें ।

13. विचारण के स्थगन बाबत पूर्व में जारी आदेश समाप्त किया जाता है ।

14. उपरोक्तानुसार निर्देश के साथ, इस पुनरीक्षण याचिका का निराकरण किया जाता है ।

15. रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि इस आदेश की प्रति यथाशीघ्र विचारण न्यायालय एवं अपीलीय न्यायालय को पालनार्थ एवं सूचनार्थ प्रेषित किया जाए ।

सही/-

(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश पोमन