Lok Sabha Debates
Regarding Floods And Drought In Various Parts Of Country. on 25 July, 2002
12.22 hrs. Title: Regarding floods and drought in various parts of country.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Hon. Members, I have to inform the House that Dr. Sushil Kumar Indora, in whose name item No. 12 regarding discussion under Rule 193 is listed, has requested me to allow Shri Ajay Singh Chautala to initiate the discussion on his behalf. I have allowed Shri Ajay Singh Chautala to raise the discussion. Now, Shri Ajay Singh Chautala.
श्री अजय सिंह चौटाला (भिवानी): उपाध्यक्ष महोदय, आज हम देश में बाढ़ और सूखे से प्रभावित क्षेत्रों को लेकर सदन में चर्चा कर रहे हैं। कैसी विडम्बना है कि जहां एक तरफ भयंकर सूखे की स्थिति है, वहीं दूसरी तरफ भयंकर बाढ़ से जन-जीवन अस्त-व्यस्त है। ११ राज्यों में जहां सूखे की स्थिति है, वहीं बिहार, असम, गुजरात, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में बाढ़ से लोग मर रहे हैं। जन-जीवन अस्त-व्यस्त है और बहुत बुरी स्थिति लोगों की है। जहां कई लोग अपने घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं वहीं बहुत सारे लोग इसमें फंसे हुए हैं। गुजरात में अनेक लोग इस बाढ़ से मरे हैं। बिहार की भी इसी तरह की स्थिति है। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, मधुबनी और अनेक जिलों में दर्जनों लोग जान दे चुके हैं। रास्ते बंद हैं, आवागमन के साधन बंद हो गए हैं। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान में भयंकर सूखे की स्थिति है। …( व्यवधान)मैं सभी प्रदेशों की बात कर रहा हूँ। ऐसी स्थिति में लोगों का बहुत बुरा हाल है। देश के कुल ५२३ जिलों में से ३२० जिले जहां एक तरफ जल के अभाव में जी रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई जिले बाढ़ की मार झेल रहे हैं। ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र राज्य के जल व्यवस्था विशेषज्ञ, श्रीमन देशरधा, जिन्होंने १२ राज्यों का अध्ययन करके रिपोर्ट तैयार की थी, उनका कहना है कि जल परियोजनाओं पर व्यापक व्यय के बावजूद जो देश के ५० प्रतिशत से भी अधिक गांव और शहर जल के अभाव में हैं, वहीं ८० प्रतिशत कृषि भूमि जल समस्या से ग्रस्त है।
MR. DEPUTY-SPEAKER: The hon. Agriculture Minister is very much here.
Shri Singh, you please address the Chair.
१२.३० hrs.( MR. SPEAKER in the Chair) डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली) : अध्यक्ष महोदय, इस इश्यू से संबंधित सभी मंत्री हाउस में रहें क्योंकि यह विषय बहुत गंभीर है। आपने इस इश्यू को मंजूर किया …( व्यवधान)यहां सभी सांसद मौजूद हैं लेकिन मंत्री गायब हैं। अब सिंचाई का सवाल है लेकिन सिंचाई मंत्री यहां नहीं हैं। हमारा कहना है कि इस इश्यू से संबंधित मंत्रियों को यहां पर मौजूद रहना चाहिए।…( व्यवधान) ऐसा निर्देश दिया जाये।…( व्यवधान)
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): अध्यक्ष महोदय, बाढ़ और सूखे की समस्या पर यहां चर्चा हो रही है। इसका संबंध सिंचाई मंत्री से भी है लेकिन सिंचाई मंत्री जी यहां नहीं हैं। इसके अलावा आप सत्तारूढ़ दल के लोगों की हाजिरी देख लीजिए। इसका सीधा मतलब यह है कि उनकी इस विषय पर कोई दिलचस्पी नहीं है। ये किसानों के दुश्मन हैं। …( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :अध्यक्ष महोदय, आप उनको यहां उपस्थित रहने का निर्देश दें। …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आप जो सवाल उठा रहे हैं, उस पर कृषि मंत्री जी जवाब देने वाले हैं। वे इस हाउस में मौजूद हैं। इसके अलावा आपने दूसरे मंत्रियों को भी यहां उपस्थित रहना चाहिए, ऐसी मांग की है। मैं जरूर इस विषय में गवर्नमैंट से इंक्वायरी करूंगा। मैं आपको थोड़ी देर में इसके बारे में बता दूंगा।
...( व्यवधान)
श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज): अध्यक्ष महोदय, बाढ़ की जो समस्या है, वह नेपाल की नदियों से है। …( व्यवधान)सारा पानी नेपाल से आता है। सिंचाई विभाग उसको देखता है लेकिन सिंचाई मंत्री यहां बैठते ही नहीं हैं। इससे बहुत नुकसान होता है। …( व्यवधान)उनको यहां रहने में क्या आपत्ति है ? हमारा कहना है कि उनको भी यहां रहना चाहिए। …( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :अध्यक्ष महोदय, इससे संबंधित मंत्रियों को यहां रहना चाहिए और सरकार इस विषय को गंभीरता से ले, ऐसा हमारा कहना है। सरकार इसे हल्के ढंग से ले रही है। …( व्यवधान)
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : अध्यक्ष महोदय, अभी जो बाढ़ आई है, उसके लिए सरकार क्या कदम उठा रही है? सरकार इस विषय को गंभीरता से नहीं ले रही है और न ही कोई उत्तर दे रही है। …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : सिंचाई मंत्री अभी थोड़ी देर में आ रहे हैं।
...( व्यवधान)
श्री रामजीलाल सुमन : अध्यक्ष महोदय, पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर आज तक सिंचाई की तमाम ऐसी परियोजनाएं अब तक लंबित पड़ी हुई हैं। यह बहुत गंभीर मामला है। कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं लेकिन सिंचाई मंत्री जी को भी यहां रहना चाहिए क्योंकि यह दोनों विभागों से संबंधित मामला है।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : सिंचाई मंत्री अभी थोड़ी देर में यहां आ रहे हैं।
...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मैंने उनको बुलाया है। वह अभी थोड़ी देर में यहां आ रहे हैं। आप लोग सदन का समय बर्बाद मत कीजिए क्योंकि बहुत महत्वपूर्ण विषय पर आज चर्चा हो रही है।
...( व्यवधान)
श्री अजय सिंह चौटाला: अध्यक्ष महोदय, मैं इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहूंगा कि पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक…( व्यवधान)
श्री रामानन्द सिंह (सतना): अध्यक्ष महोदय, बाढ़ और सूखे से संबंधित सभी विभागों के मंत्रियों को यहां उपस्थित रहना चाहिए। …( व्यवधान)इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए। इस संबंध में ग्रामीण विकास मंत्री की भी यहां जरूरत है। …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : सभी सांसद गंभीरता से इस विषय में रुचि लें।
...( व्यवधान)
श्री रामानन्द सिंह : देखिये, हमें भी कहने दीजिए। यह ठीक बात नहीं है।…( व्यवधान)
सभी मनिस्टर्स यहां रहने चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण चर्चा है। …( व्यवधान)
श्री अजय सिंह चौटाला: अध्यक्ष महोदय, पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक ४६ ऐसी परियोजनाएं हैं, जो आज तक अधूरी पड़ी हुई हैं। यह देखकर और भी अचंभा होता है कि पहली पंचवर्षीय योजना की योजनाओं को सरकार दसवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल कर रही है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस मामले में पीछे की सरकारें और आज की सरकार कितनी सचेत और सजग है और कितना लोगों का ध्यान रखती है। आज इस तरीके से देश में जहां लोग बाढ़ और सूखे की चपेट में हैं, लोग मर रहे हैं वहीं लोग सूखे के कारण अपने घर बार छोड़कर दूसरे प्रदेशों में जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए।
माननीय मंत्री जी ने इस संबंध में मीटिंग भी बुलाई है। उन्होंने सूखे से प्रभावित प्रदेशों के लोगों को भी बुलवाया है परन्तु आज जिस तरह की स्थिति है, उससे कुछ नहीं होने वाला है। जब तक आप मीटिंग करके उन्हें राहत देने का काम शुरू करेंगे तब तक सूखा प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति बहुत बुरी हो जायेगी।
मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि वे इस पर तुरंत कार्यवाही करें और सूखा प्रभावित क्षेत्रों को राहत देकर उन्हें मदद पहुंचाने का काम करें। देश के किसान ने जून में हुई बरसात को देखकर अपनी फसल बो दी लेकिन अब मानसून की बरसात नहीं हो रही।
ऐसी स्थिति में वह फसल सूख रही है। फसल सूखना और यह चीजें दूसरी बात है लेकिन आज बहुत सारे प्रदेशों में पशुओं के लिए भी पीने का पानी नहीं है। ऐसी स्थिति में उसकी तुरन्त व्यवस्था की जाए।
देश के मौसम विभाग का कहना है कि देश में वर्षा १९८८ से लेकर अब तक सामान्य होती आ रही है। पन्द्रह साल बीत गए, इस वर्ष वर्षा आने में विलंब हो गया। देश में पानी के लिए हाहाकार मच गया, यज्ञ होने लगे, लोग अपने लैवल पर हर प्रकार के प्रयास करने लगे। ऐसे में हमारी योजनाओं का असली रूप सामने आ गया। देश की समस्याओं के हल के लिए काफी धन व्यय किया जाता है किन्तु उससे उन समस्याओं का हल नहीं किया जाता बल्कि उस धन को इधर-उधर व्यय करके उन समस्याओं को अधर में लटका दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर मैं बताना चाहूंगा कि दिल्ली जल बोर्ड ने अनधिकृत कालोनियों में पीने के पानी के लिए २०० करोड़ रुपये की योजना बनाई। उनकी सहायता के लिए पाइप लाइन बिछाने और दूसरी व्यवस्था के लिए उस २०० करोड़ रुपये को व्यय करना था परन्तु ज्यादातर पैसा दूसरे कामों में लगा कर अब से पहले ही उस पर पल्ला झाड़ दिया गया। दिल्ली में भी बहुत बुरी स्थिति है। अगर देश में इस समस्या का ठीक प्रकार से प्रबंध कर दिया जाए, राष्ट्रीय बाढ़ आयोग और सूखाग्रस्त इलाकों को इस प्रकार की योजना बना कर ठीक से लागू किया जाए तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।
मैं हरियाणा प्रान्त के भिवानी क्षेत्र से चुन कर आता हूं। वहां भी इस समय सूखे की स्थिति है। जाड़ों में पशुओं के लिए पीने के पानी की किल्लत है परन्तु वहां की सरकार सचेत और सजग है। सरकार वहां हर तरह की व्यवस्था कर रही है। जब हरियाणा प्रदेश में स्थिति ठीक थी तो हरियाणा ने प्राकृतिक आपदा में साथ लगे हुए प्रदेशों की हर तरह से मदद करने का काम किया। साथ लगे राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के उन इलाकों में पशुओं का चारा भेज कर हरियाणा प्रदेश के मुख्य मंत्री चौधरी ओम प्रकाश चौटाला जी ने उनकी मदद करने का काम किया। परन्तु आज हरियाणा स्वयं सूखे की मार झेल रहा है। मैं आपके माध्यम से सरकार से निवेदन करूंगा कि वह इस समस्या के समाधान हेतु तुरन्त प्रभावी कदम उठाए ताकि लोगों को इस समस्या से निजात मिल सके ।
श्री मणि शंकर अय्यर (मइलादुतुरई): आदरणीय अध्यक्ष महोदय, चौदह साल निरंतर बारिश पड़ने के पश्चात् आज हमारे सामने एक बहुत ही भयंकर स्थिति पैदा हो रही है। न केवल सूखा बल्कि अकाल का भी खतरा है। इसलिए सवाल उठता है कि क्या इस गंभीर समस्या का सामना करने के लिए सरकार तैयार है, हम तैयार हैं, देश तैयार है। पिछली मर्तबा जब हमारे सामने ऐसी गंभीर स्थिति आई थी, वह १९८७ का वर्ष था जब आदरणीय राजीव गांधी जी हमारे देश के प्रधान मंत्री थे। उस समय राजीव जी ने इस चुनौती को एक मौके में परिवर्तित किया। मेरे सामने १९८७-८८ का इकोनोमिक सर्वे मौजूद है, उसमें से मैं केवल दो पंक्तियां आपके सामने पेश करना चाहता हूं। उस साल के इकोनोमिक सर्वे में १९८७ के सिलसिले में कहा गया था:
"The country, this year, experienced poor rainfall for the fourth year in succession. The South West monsoon rainfall in 1987 has been the poorest as compared to the last few years and even as compared to severe drought years in the past. As many as 21 of 35 meteorological zones suffered deficient and scanty rains."
इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी ने देश भर का दौरा किया। जहां-जहां सूखा प्रभावित इलाके थे, चाहे वे राजस्थान या गुजरात में हों, चाहे तमिलनाडू में हों, चाहे जम्मू-कश्मीर में हों या नागालैंड में हों, खुद और ज्यादातर गाड़ी में बैठकर बहुत ही खराब सड़कों पर वे देश के कोने-कोने में गये और वहां जो सूखा पीड़ित जनता थी, उनसे उन्होंने बातचीत की, पता करवाया कि देश में हो क्या रहा है। वे सदन में भी उतना नहीं आते थे, जितना कि देश में घूम रहे थे। बहुत बड़े-बड़े विशेषज्ञों से बात करने के बजाय जो पीड़ित लोग थे, उनसे आमने-सामने बात करके अपनी आंखों की गवाही के आधार पर उन्होंने तय किया कि क्या करना चाहिए।
मैं स्वयं यह कहना चाहता हूं कि आज के प्रधानमंत्री महोदय ऐसा काम कर सकते हैं या नहीं? मैं मानता हूं कि हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री महोदय की उम्र उस जमानेे के राजीव जी की उम्र से दोगुनी है और इसलिए हो सकता है कि वे इतना इस देश में नहीं घूम पाएंगे, जितना कि राजीव जी इधर-उधर घूमे थे। लेकिन हमारे नौजवान कृषि मंत्री महोदय से क्या हम अपेक्षा रख सकते हैं कि जो राजीव जी ने उस जमाने में किया, माननीय अजित सिंह जी उनके जैसा करेंगे? जहां तक सदन के इल्म में है, हमारे अजित सिंह महोदय मोर जैसे यमुना के तट पर तो नाचते रहते हैं, अपने हरित प्रदेश में तो घूमते रहते हैं, लेकिन इस सूखा प्रभावित देश में कहां गये हैं, किसको क्या पता।
राजीव जी इन सूखा प्रभावित इलाकों में इसलिए नहीं गये कि उनको कुछ पर्यटन करना था, वहां जाकर उन्होंने कार्यक्रम तैयार किये ताकि हम सूखे का मुकाबला कर सकें। उस साल में उन्होंने इतने नये-नये कार्यक्रम बनाये, सूखा नियंत्रण के कार्यक्रम बनाये कि उनका उल्लेख करना आज बहुत आवश्यक है। मैं अपने स्मरण से नहीं कहना चाहता, क्योंकि आप जानते हैं कि उस जमाने में मैं उनके साथ था, बल्कि इस कारण से कि जो इकोनोमिक सर्वे में कहा गया था, उसका उल्लेख यहां करना चाहता हूं। मैं उसे पढ़ नहीं रहा हूं, मैं केवल उसमें उल्लेख हुए कार्यक्रमों का जिक्र कर रहा हूं।
"Detailed strategies were worked out for individual crops, regions and watersheds. Appropriate technological practices were devised for each region, and adequate quantity of quality seeds was made available to ensure that in the rabi season, there would be no seed shortage. Cultivation of short duration cash crops was undertaken wherever possible. "
Various employment generation programmes were supplemented by scarcity relief measures and additional foodgrains were released every month to support these programmes.
In Rajasthan alone about 11 lakh persons were covered by these special employment programmes and an attempt was made to rotate this employment between families to ensure that all affected families were covered.
For irrigation, the Central Government made an extra allocation of Rs.236 crore to accelerate the execution of selected irrigation projects in drought areas alone."आज के बजट में, इस साल के बजट में सिंचाई के लिए कुल मिलाकर जो आपका मीडियम, माइनर और कमांड एरिया डैवलपमेंट कार्यक्रम हैं, इन सब योजनाओं के लिए केवल ३७० करोड़ रुपये रखे गये हैं और उस जमाने में एडीशनल बजट से ज्यादा २३६ करोड़ रुपये सिंचाई के लिए दिये गये थे। फिर जहां पांच वर्षीय योजना में २.२७ लाख पम्प-सैट्स को एनर्जाइज करने का था, उसी एक साल के अंदर ६.३५ लाख पम्प-सैट्स एनर्जाइज किये गये। चारा के मामले में क्योंकि गुजरात, राजस्थान जैसे राज्यों में काफी चारा नहीं था, देश भर में एक संदेश भेजा गया कि जहां भी चारा हो, वहां से उसे इकट्ठा करके भेजा जाये। उसके लिए खास रेलवे से कहकर खास इंतजाम किये गये कि वह चारा कश्मीर से लेकर, तमिलनाडु से लेकर राजस्थान, गुजरात तक भेजा जाये और चूंकि राज्य सरकारों के पास काफी साधन नहीं थे तो इतने साधन एडवांस में दिये गये कि सारे कार्यक्रमों को लागू करने के लिए कोई दिक्कत न रहे। इसके साथ-साथ जो बहुत सी आवश्यक सामग्री है, जैसे धान, पकाने का तेल, दूध, मिल्क पाउडर, बटर ऑयल इत्यादि लोगों तक पहुंचाने के लिए पूरा प्रबन्ध किया गया। ५६०० नये पी.डी.एस. आउटलेट्स उस एक साल में वहां खोले गये जहां लोग सूखा पीड़ित थे और उसके साथ-साथ बिल्कुल नये कार्यक्रम मोबाइल पी.डी.एस. यूनिट्स सूखा प्रभावित इलाकों में घूमे ताकि जहां लोग सूखा पीड़ित हैं, वहां उनके दरवाजे तक यह सामग्री पहुंचाई जाये। उस साल में १७९८ करोड़ रुपये एडीशनल रिलीफ मैजर्स के लिए दिये गये और उसमें से केन्द्र का हिस्सा १०५६ करोड़ रुपये का था। तकरीबन १८०० करोड़ रुपये जो राहत के लिए दिये गये, उसमें से १५०० करोड़ केन्द्रीय सरकार ने अपने कंधे पर इस बोझ को उठाया। राजस्थान को चार साल में १९८३ से १९८७ तक उन चार साल में इतनी राहत मिली जितनी कि राजस्थान को पहले चालीस साल में मिली थी। ऐसे कार्यक्रम शुरु किये गये।
श्री किरीट सोमैया (मुम्बई उत्तर पूर्व) : उस समयसरकार किसकी थी?…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : अच्छी चर्चा चल रही है। आप बैठिए।
SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Will the hon. Member yield for a minute?… (Interruptions)
MR. SPEAKER: I will not allow you to speak. Please sit down SHRI BIKRAM KESHARI DEO : He is misleading the House.… (Interruptions)
MR. SPEAKER: You can speak when your turn comes.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Are you yielding to him?
… (Interruptions)
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, the hon. Member has misled the House when he mentioned that the present Prime Minister had not toured any of the drought-affected areas. In his capacity as the Leader of the Opposition earlier, he toured the drought-affected areas of Orissa and other States.
Sir, any Government, which is ruling the country will have to go as per the advice of the Relief Board… (Interruptions)
MR. SPEAKER: I do not want a discussion to take place like this. How can you do this?
श्री मणि शंकर अय्यर: उस जमाने में एक नया कार्यक्रम, मिसाल के तौर पर, शुरु किया गया, जिसका नाम था - नेशनल वाटरशैड फॉर डवेलपमेंट प्रोग्राम फॉर रेनफैड एरियाज़ और सूखे क्षेत्रों के लिए कोर्स-ग्रेन-पालिसी तथा टैकनोलोजी मिशन में डीपीएपी व डीपीपीपी आदि कार्यक्रम चलाए गए। इस प्रकार एक और कार्यक्रम चलाया गया था, जिसका नाम था Separate strategies for each distinct agro-climatic region to suit the requirements of agricultural development specific to that region. मैं एक बात का और उल्लेख करना चाहूंगा, क्योंकि उससे जाहिर होगा कि राष्ट्रीय समस्या का सामना करने के लिए राजनीति करना उचित नहीं है और रचनात्मक तरीके से देश के प्रधान मंत्री ने, एक आम मंत्री ने नहीं, पूरे रूप से व्यक्तिगत ध्यान देकर समस्या का सामना किया। इसका नतीजा क्या निकला, वह मैं आपके सामने रखना चाहता हूं। मैं १९८८-८९ का उल्लेख कर रहा था, इस एक साल में कृषि के उत्पादन में १५ प्रतिशत की वृद्धि हुई। इकलौती मर्तबा उसी साल १९८८-८९ में जीडीपी में राष्ट्रीय आमदनी में १०.८७ की वृद्धि हुई। मैं कृषि मंत्री महोदय से जानना चाहता हूं कि इस सूखे का सामना करने के लिए वे कौन से कदम उठाना चाहते हैं? बहुत अफसोस की बात है और यह कड़वा सत्य है कि पिछले दस सालों में, १९९१ से लेकर आजतक, बारिश का औसत, दूरलक्षित औसत, हर वर्ष ९० प्रतिशत से ज्यादा रहा है। तब भी हमारे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई, लेकिन आज हम वहीं के वहीं बैठे हुए हैं। एग्रीकल्चरल ग्रोथ रेट मोटे अनाज में, दलहन में, तिहलन में, कपास में, रेशम में देखें, तो हर साल हम वहीं के वहीं थे, जहां बारिश होने से पहले थे । अच्छी वारिश नहीं होती है और यह सरकार कुछ नहीं कर सकती है। जब खुदा ने तय कर लिया है कि बारिश नहीं पड़ेगी, तब ये सरकार क्या कर सकती है, क्या कर पाएगी, इसे जानने के लिए हम यहां पर मौजूद हैं। हम जानना चाहते हैं कि सरकार इस समस्या का सामना करने के लिए क्या करेगी?यह एक बहुत बड़ी चुनौती है । आप निश्चित तौर पर कृषि की उपेक्षा कर रहे हैं। यह मैं आप पर इल्जाम लगा रहा हूं कि आप कृषि की उपेक्षा कर रहे हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यदि आप २००२-०३ का बजट देंखें तो तिलहन, दलहन, मक्का और पॉम ऑयल का जो इंटीग्रेटिड प्रोग्राम बना है, मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसे चार वभिन्न चीजों के आप कैसे एक कार्यक्रम बना सकते हैं लेकिन जो कार्यक्रम बनाया है, आप इन सब पर कुल मिला कर बजट के अनुसार केवल १५० करोड़ रुपए खर्च करने वाले हैं और इस साल माननीय मंत्री महोदय के मंत्रालय का जो खर्चा होने वाला है उसका ७ परसैंट बनता है और वे उन्हीं चीजों का जिन का सूखे प्रभावित इलाकों में उत्पादन होता है। जितने स्पैशल प्रोडक्शन प्रोग्राम थे जैसे स्पैशल फूड प्रोडक्शन प्रोग्राम, फूड ग्रेन प्रोडक्शन प्रोग्राम फॉर प्लसिज, मेज, ऑयल सीड्स अलग-अलग किस्म के कार्यक्रम जो राजीव जी के समय में शुरु हुए थे, आपने उन्हें छोड़ दिया और उसके बजाय कुछ नहीं लगाया है जबकि इतनी बड़ी समस्या और चुनौती देश के सामने है। ऐसे समय में आप क्या करने वाले हैं, यह कृपया हमें बताएं। हो सकता है कि आप या आपके साथी सेठी साहब जिन्होंने इस काम में बहुत देरी कर दी है, वह हमें बताएंगे कि राष्ट्रीय जल नीति जो अभी अप्रैल २००२ में शुरु हुई है, उसमें लिखा है कि One of the most crucial elements in development planning is water. ऐसा केवल शुरु में कह दिया कि देश के विकास के लिए पानी की बहुत आवश््यकता है लेकिन मीडियम, माइनर एवं कमांड एरियाज के विकास के लिए कितनी राशि सेठी साहब को मिली है, वह खुद जानते हैं। इनको कुल मिला कर ३७० करोड़ रुपए मिले हैं जबकि हमारा बजट तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक है। इसकी तुलना कीजिए। माइनर, मीडियम एवं कमांड एरिया डेवलपमैंट के लिए ३७० करोड़ रुपए मिले हैं और बजट में तीन लाख करोड़ रुपए बनते हैं। जनाबेआली, इसका मतलब वह ०.१ परसैंट है। देश में कम से कम १५ करोड़ लोग ऐसे होंगे जो सूखे का सामना कर रहे हैं और उनके लिए आप ०.१ परसैंट पैसा देते हैं। बाकी ९९.९ परसैंट किसी और चीज में खा लेते हैं। यह कैसी नीति है? आपकी क्या प्राथमिकताएं हैं? हम ऐसी सरकार पर कैसे भरोसा करें जबकि इतनी कठोर समस्या हमारे सामने है जो एक राष्ट्रीय समस्या है। क्या आप इस दिशा में कोई ऐसा कदम उठा पाएंगे जिसे उठाना चाहिए।
वाटर रिसोर्सिज मनिस्टर यह बताएं कि क्या यह सत्य नहीं है कि विश्व बैंक ने अभी हाल में एक रिपोर्ट में कहा है कि जल व्यवस्था की कमी होने से देश को ७५ हजार करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। जब ऐसी सरकार हो तो हम उसके ऊपर कैसे भरोसा करें?
इसके साथ-साथ और आखिर में मैं यह कहना चाहता हूं कि जब वह दौरे में गए तो उन्होंने देखा कि किसानों की हालत बहुत बुरी है लेकिन उससे भी बुरी हालत खेत मजदूर की थी। उसी खेत मजदूर की हालत देख कर राजीव जी ने नेशनल कमीशन फॉर रूरल लेबर बनाया। उसकी रिपोर्ट कहां है? आपने एक और कमीशन बनाया जिस में कहा है कि मजदूरों को काम से हटाएंगे ताकि आपके वे मित्र जो पूंजीपति हैं, उनको बहुत बड़ा फायदा मिले।
13.00 hrs. लेकिन अजित सिंह जी, आप कम से कम श्री यशवंत सिन्हा या श्री जसवंत सिंह जैसे न बनें। गनीमत है कि आप कृषक परिवार से हैं। कृपया खेत-मजदूरों का ख्याल रखें और हमें बतायें कि आप आने वाले समय में खेत-मजदूरों के लिये क्या करने के लिये निकल रहे हैं।
अध्यक्ष जी, मेरी आखिरी मांग यह है कि कृषि मंत्री जी, आप माननीय उप प्रधान मंत्री जी जैसा जवाब यहां न दें लेकिन हमें तफसील से और स्पष्ट बताइये कि आप जनता के लिये, जो खेती पर निर्भर है और आज आकाश की तरफ देख रही है, क्या कदम उठाने वाले हैं और आप कृषि मंत्री हैं तो क्या आप खुद भी हमारी तरफ देखेंगे? हालांकि हमें आपसे ज्यादा अपेक्षा नहीं है तब भी कहते हैं और हम यहां सुनने के लिये बैठे हुये हैं। आप वह तंत्र न करें जो माननीय आडवाणी जी ने किया था।
श्री शिवराज सिंह चौहान (वदिशा): माननीय अध्यक्ष जी, मेरे विद्वान मित्र श्री मणि शंकर अय्यर यह कह रहे थे कि जब १९८७ में देश में सूखा पड़ा, तब स्व. राजीव जी, तत्कालीन प्रधान मंत्री ने देश का व्यापक दौरा किया था लेकिन मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि माननीय अटल जी ने बचपन से इस देश के गांव देखे हैं, गावों की गलियां देखी हैं, खेत और खेत की पगडंडियां देखी हैं, कीचड़ व धूल देखी है कि भारत क्या है। यह वे अच्छी तरह से जानते हैं। भारत की आत्मा को जानते हैं। श्री अजित सिंह जी किसान परिवार से हैं और खेतों में बैठे हैं, इसलिये उन्हें अलग से दौरे की जरूरत नहीं है। वे दौरा करते रहते हैं। मैं यह जरूर चाहता हूं कि यह बहस केवल आरोप-प्रत्यारोप में न हो जाये। आज देश त्रासदी का सामना कर रहा है। सावन का महीना है रिमझिम की फुहार गायब है। लगता है इन्द्र देवता रूठ गये हैं और किसानों के खेत सूख गये हैं। जब किसानों के खेत सूखते हैं तो केवल किसानों के खेत ही नहीं सूखते बल्कि उसका जीवन सूखता है, बच्चों का भविष्य भी सूखता है। भारत के कई राज्यों में सूखा है। केवल सूखा ही नहीं, देश के तीन राज्य बाढ़ से पीड़ित हैं।
अध्यक्ष जी, मैं किसान परिवार से आता हूं। मैं जानता हूं कि यदि एक बार किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो पांच साल तक उसकी हालत सुधरती नहीं है। वह फसल बोने के लिये कर्जा लेता है। जब फसल नहीं आती तो वह कर्जा कहां से चुकायेगा? फिर जब वह रोजी-रोटी चलाने के लिये कर्जा लेता है या खाद व बीज लेकर आता है तो इसी प्रकार कुचक्र चलता रहता है। आने वाला किसान कर्जे में पैदा होता है ,कर्ज में जीता है और कर्जे में ही मर जाता है। आज किसानों के सामने यह परिस्थिति है। मैं माननीय कृषि मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने कल ११ राज्यों के कृषि मंत्रियों की एक बैठक बुलाई। उस बैठक में उन्होंने कर्जा वसूली तत्काल स्थगित करने के लिये भी कहा। कर्जा वसूली स्थगित किये जाने के आदेश हो चुके हैं लेकिन केवल कर्जा वसूली स्थगित करने से काम नबहीं चलेगा। जब भी ऐसी परिस्थिति आती है तो राज्य सरकार न केवल कर्ज की राशि बल्कि अगले साल उसमें ब्याज की राशि जोड़कर वसूल करती है। कर्जे पर ब्याज इतना हो जाता है कि अंतत:किसान आत्महत्या करने के लिये विवश हो जाता है। इसलिये केवल कर्जा वसूली से काम नहीं चलेगा। अगर पूरा कर्जा माफ नहीं हो सकता तो कम से कम ब्याज माफ किये जाने की घोषणा करनी चाहिये। मैं आशा करता हू कि इससे किसान को राहत मिलेगी नही तो राहत का सवाल ही नहीं उठता।
अध्यक्ष महोदय, चौटाला जी बता रहे थे कि आज देश के ५२४ जिलो में से ३२० जिले सूखे से पीड़ित हैं। इनमें ३४ उप-मंडल हैं जिनमें से २५ में व्यापक पैमाने पर सूखा है। कल ११ राज्यों के कृषि मंत्रियों की बैठक के आंकड़े बताते हैं कि मोटा अनाज गत वर्ष १२६ लाख हैक्टेयर भूमि में हुआ था लेकिन इस साल केवल ७५ लाख हैक्टेयर में हुआ है। पिछले साल तिलहन ९० लाख हैक्टेयर भूमि में बोया गया था और इस साल आधा रह गया है। मैं मध्य प्रदेश से आता हूं जहां सोयाबीन का सब से अधिक उत्पादन होता है। श्री लक्ष्मण सिंह जी भी जानते हैं कि मध्य प्रदेश में सोयाबीन की जो बोनी होती थी, वह ५१ लाख हैक्टेअर होती थी। लेकिन इस बार केवल १८ लाख हैक्टेअर हुई है। यह मैं जो बोनी हुई है उसके आंकड़े दे रहा हूं। लेकिन बोनी होने के बाद …( व्यवधान)
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़): कृषि मंत्री जी से कहिये कि वह मध्य प्रदेश की यात्रा करें।
अध्यक्ष महोदय : प्लीज आप बैठिये। इतनी अच्छी बहस चल रही है, आप उन्हें बोलने दीजिए।
श्री शिवराज सिंह चौहान: यही तो शिकायत है, मंत्री जी इसका जवाब देंगे। मैं बोनी के बारे में कह रहा था। मौसम विभाग ने घोषणा की थी कि मानसून अच्छा आयेगा, वर्षा सामान्य होगी। टी.वी. पर अखबारों में किसानों ने मौसम विभाग की भविष्यवाणी को पढ़ा और देखा और उस पर विश्वास कर लिया कि बरसात अच्छी होगी, सामान्य मानसून आयेगा, लगभग समय पर मानसून आयेगा। यदि कही प्री-मानसून बरसात हो गई तो उसने अपने खेत बो दिये। लेकिन बोये हुए खेतों में आधे बीज अंकुरित नहीं हुए और जो बीज उगे हैं, वे थोड़े बहुत पौधे बने थे, जो अब सूख रहे हैं, तबाह हो गई है। अब यदि पानी गिर भी जाए तो भी खरीफ की फसल बरबाद हो गई है और मुझे आशंका है कि अगर बरसात नहीं हुईतो रवी की फसल का भविष्य भी अच्छा नहीं है। इसलिए मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि आपने तात्कालिक उपाय किये हैं, उनके लिए मैं आपको बधाई देना चाहता हूं। आपने खाद और बीज उपलब्ध कराने की पूरी कोशिश की है। आपने गन्ना किसानों के एक हजार करोड़ रुपये के बकाये के भुगतान की पूरी कोशिश की, आपने सुदूर इलाकों में पेयजल की व्यवस्था करने की कोशिश की। आपने पशुचारे और भूसे की बात भी कही है। लेकिन इसके लिए कुछ दीर्घकालीन उपाय करने की आवश्यकता है।
अध्यक्ष महोदय, कर्ज माफी की बात चल रही थी। मैं माननीय प्रधान मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि आजादी के बाद वह पहले प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने किसानों के दर्द को समझा था और एक व्यापक कृषि फसल बीमा योजना तैयार की थी। लेकिन उस फसल बीमा योजना में आज व्यापक सुधार करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। यह योजना ऐच्छिक है। जिसके कारण अनेक राज्यों ने फसल बीमा योजना को लागू नहीं किया। जहां-जहां लागू किया हैं वहां भी अनेकों प्रकार विसंगतियां हैं। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि कृषि फसल बीमा योजना ऐच्छिक न हो। इसे हर राज्य के लिए अनिवार्य कर दिया जाए। लक्ष्मण सिंह जी यहां बैठे हैं। मध्य प्रदेश में जो फसल बीमा योजना लागू है। मेरे क्षेत्र में अनेकों प्रकार की प्राकृतिक विपत्तियां आती हैं। कभी ओले गिरते हैं, कभी बाढ़ से फसलें तबाह होती हैं। जब किसान कोआपरेटिव बैंक और अन्य बैंकों से कर्ज लेता है तो बीमे की प्रीमियम की राशि तो काट ली जाती है, लेकिन आज तक एक नया पैसा उन किसों को मुआवजे के रूप में कभी नहीं दिया गया। जब-जब यह सवाल उठाया जाता है तो मैं बड़ी तकलीफ के साथ कह रहा हूं कि ऐसी योजनाएं बनाने से क्या लाभ है।
श्री लक्ष्मण सिंह : आपने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने सहायता नहीं की। पिछले साल मध्य प्रदेश सरकार ने २५३ करोड़ रुपये केन्द्र सरकार से मांगे थे, आपने २५३ रुपये भी नहीं दिये।…( व्यवधान)
आपने कितने पैसे दिये हैं, यह बतायें।
श्री शिवराज सिंह चौहान: मैंने प्रारंभ में ही कहा था कि केवल आरोपो-प्रत्यारोपों में इस बहस को हमें समाप्त नहीं करना है। मैं निवेदन कर रहा था कि फसल बीमा योजना अधूरी है। जब हमने इस बारे में संबंधित अधिकारियों से चर्चा की कि एक किसान की पूरी फसल चौपट हो गई तो उसे मुआवजा क्यों नहीं मिलना चाहिए तो हमें बताया गया कि इस फसल बीमा योजना में हम किसान को इकाई नहीं मानते, हम गांव को भी इकाई नहीं मानते, हम तहसील को इकाई मानते हैं। अगर एक किसान की पूरी फसल चौपट हो गई तो उसे मुआवजा नहीं मिलेगा। एक गांव में पूरी फसल तबाह हो गई तो मुआवजा नहीं मिलेगा, पूरी तहसील की ६० परसेन्ट से ज्यादा फसल नष्ट हो गई तब मुआवजा मिलेगा। अगर एक किसान की पूरी फसल बरबाद हो जाए तो वह भगवान से प्रार्थना करे, यज्ञ और हवन करे कि हे भगवान, पूरी तहसील की फसल नष्ट कर दे, क्योंकि जब तक पूरी तहसील की फसल नष्ट नहीं होगा, तब तक मुझे मुआवजा नहीं मिलेगा। नौकरशाह यहां बैठकर कैसी योजनाएं बनाते हैं, मुझे समझ में नहीं आता । मैं दलगत राजनीति से ऊपर उठकर किसानों के दर्द को यहां अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रहा हूं। आज केवल इंद्र भगवान नहीं रूठे है, हमें मौसम विभाग ने भी छला है। बार-बार घोषणाएं की गईं कि सामान्य वर्षा होगी। पहले कहा गया कि मानसून २० जून को आ रहा है। फिर कहा गया कि ३० जून को आ रहा है। फिर कहा गया कि नहीं, मानसून दस जुलाई को पक्का आ रहा है। फिर कहा गया २० जुलाई को आ रहा है। भरोसा करके किसान बीज डालता गया, खाद डालता गया और वर्षा नहीं हुई। माननीय कृषि मंत्री जी मैं कहना चाहता हूं कि मौसम विभाग के पास तकनीकी अमला है, अनेकों वैज्ञानिक हैं, उनके पास एक बड़ा अमला है, कृपया आप उनकी कार्य-प्रणाली पर विचार कीजिए। इससे अच्छी भविष्यवाणी तो कभी गांवों में घाघ और भंडरी करते थे, संकेतों के आधार पर वे अनुमान लगाया करते थे और उन कहावतों के आधार पर किसान अपनी आगामी योजनाएं तैयार किया करते थे। भंडरी कहते थे -
शुक्रवार की बादरी रहे शनिश्चर छाय, तो यों बोले भंडरी बिन बरसे न जाए।
ऐसी अनेक कहावतें सौ प्रतिशत सत्य निकलती थीं और फिर मौसम विभाग की कार्य-प्रणाली पर भी विचार करने की आवश्यकता है।
आज केवल किसान ही परेशान नहीं है। अगर खेती खराब होती है, फसल बरबाद होती है तो किसान तो बरबाद होता ही है लेकिन खेती में काम करने वाले मज़दूर क्या करेंगे? धान की रोपाई के काम में मजदूर लगता है, सोयाबीन की बुआई के काम में मज़दूर लगता है और मज़दूर इस समय काम करके बाकी बरसात के लिए अपनी दाल-रोटी का इंतज़ाम करता है लेकिन जब किसान के खेत सूख रहे हैं तो मज़दूरों को मज़दूरी कहाँ से मिलेगी? आज सबसे बड़ा सवाल पैदा हो गया कि जब मज़दूरों को मज़दूरी नहीं मिलती तो फिर वहां से पलायन प्रारंभ होता है और पलायन करके वे शहरों की तरफ दौड़ते हैं। गाँव खाली होते हैं, शहरों पर दबाव पड़ता है। फिर प्रदूषण जैसी कई चीज़ें फैलती हैं और नई बीमारियां आती हैं, भुखमरी बढ़ती है, बेरोज़गारी बढ़ती है और इसलिए मज़दूर परेशान होता है और अब तो केवल मज़दूरों का सवाल नहीं है। अखबारों में मैंने पढ़ा और यह वास्तव में सच्चाई है कि पशुओं के लिए चारा नहीं है, भूसा नहीं है। अजय जी कह रहे थे कि जब अन्य प्रांतों में ऐसी त्रासदी होती थी तो हरियाणा से चारा और भूसा भेजा जाता था। अब तो हरियाणा सहित १२ राज्य जहां चारा और भूसा होता था, वे सब सूखे से प्रभावित हैं। परिणामस्वरूप पशुपालक किसान अपने गाय, भैंस और बैल आदि बेचने को विवश हैं। जब एक बार खेती का चक्र बिगड़ता है तो पूरी अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव पड़ता है। हमारे आर्थिक विकास की दर पिछले साल ५.४ प्रतिशत रही। प्रधान मंत्री कह रहे थे कि हम इसको छ: प्रतिशत तक ले जाना चाहते हैं। खेती अगर ठीक नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था में भी मंदी आएगी क्योंकि हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा उपभोक्ता किसान है। खेती पर काम करने वाला खेतिहर मज़दूर भी उपभोक्ता है। जब उसके पास पैसा होता है तो वह व्यापारी की दुकान पर जाता है। व्यापारी की दुकान का माल बिकता है तो वह कारखाने से और ज्यादा माल उठाता है। इससे कारखाने के चक्के चलते हैं। जब कारखाने के चक्के चलते हैं तो पूँजी का निर्माण होता है और जब पूंजी का निर्माण होता है नए कारखाने खुलते हैं फिर रोज़गार के अवसर बढ़ते हैं। अगर किसान के हाथ में पैसा नहीं होगा तो व्यापारी का माल नहीं बिकेगा, माल नहीं बिकेगा तो कारखानों के चक्के नहीं चलेंगे और इसलिए अर्थव्यवस्था में मंदी आएगी और धीरे-धीरे सारी अर्थव्यवस्था रुग्ण हो जाएगी। इसलिए मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि सवाल किसान का नहीं है, सवाल पूरे हिन्दुस्तान का है। यह पूरे देश का सवाल है।
मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि कुछ तात्कालिक प्रयास तो माननीय मंत्री जी ने किये हैं। और व्यापक प्रयास करने की आवश्यकता है। उसमें सबके सहयोग की जरूरत है लेकिन हमें आज विचार करना पड़ेगा कि वास्तव में सूखे के मूल में क्या है, सूखा पड़ता क्यों है। जब तक हम सूखे के मूल में क्या है या बाढ़ के मूल में क्या है, इस तरफ नहीं जाएंगे, तब तक मैं समझता हूँ कि सूखे से निपटने की कोई दीर्घकालीन योजना हम नहीं बना पाएंगे। आपने देखा होगा कि पिछले ५५ सालों में हमारे देश की कोई स्पष्ट जल नीति नहीं रही, जल के संग्रहण और संरक्षण की नीति नहीं रही। अथर्ववेद में लिखा है कि सूखे को रोका जा सकता है उपलब्ध जल के संग्रहण और संरक्षण द्वारा, लेकिन इन ५४ सालों में हमने न तो जल के संग्रहण की ठीक व्यवस्था की और न ही जल के संरक्षण की व्यवस्था की। मणि शंकर अय्यर जी से मैं कहना चाहता हूँ कि इन ५४ सालों में कोई ठोस जल नीति भारत की सरकारों ने नहीं बनाई।
महोदय, हमारे जो पुरखे थे वे बड़े बुद्धिमान थे, इतने बड़े वैज्ञानिक भले ही न हों, लेकिन उस समय आपने देखा होगा प्राचीन समय में गांवों में तालाबों की व्यवस्था थी, कुंओं की व्यवस्था थी, बावड़ियां थीं और हर गांव में तालाब होता था। कई गांव तो ऐसे थे जहां एक नहीं, दो-दो तालाब होते थे और तालाब भी बड़े-बड़े तालाब होते थे। आप में से कई सदस्यों ने भोपाल देखा होगा। भोपाल में बड़ा तालाब और छोटा तालाब है। भोपाल का जो बड़ा तालाब जो है वह तो छोटा है, उससे भी बड़ा तालाब वास्तव में राजा भोज ने बनवाया था जो बहुत बड़े इलाके में फैला हुआ था और बांध जैसा था। उन तालाबों से नहाने-धोने की पानी की आवश्यकताएं लोग पूरी करते थे। बाकी उपयोग का जो पानी था, उसकी आवश्यकता भी तालाबों से पूरी होती थी। जब तालाबों में पानी भरा रहता था तो गांवों के कुंए भी जिन्दा रहते थे और जब गांवों के कुंए जिन्दा रहते थे तो कुंओं से पीने का पानी और तालाबों से जल संग्रहण का काम होता था लेकिन आज क्या हालत है? तालाबों की ज़मीनों पर कब्जे हो गए हैं, मकान बन गए हैं या कई लोग खेती कर रहे हैं। हमारे प्रशासनिक अधिकारियों में इतनी द्ृढ़ता नहीं थी और कहीं न कहीं हम भी वोट बैंक की राजनीति में आ जाते हैं कि कौन इनसे झगड़ा मोल ले, कौन इनको अपने खिलाफ़ करे, इस प्रकार तालाबों की जमीन देकर हमने तालाब समाप्त कर दिये। कुएं और बावड़ियां भी धीरे-धीरे समाप्त हो गईं। जल के संग्रहण की कोई व्यवस्था नहीं रही, लेकिन पानी निकालने की व्यवस्थाएं हमने ज़रूर कीं। हमने हैन्डपंप लगाने, टयूबवैल खुदवाने शुरू कर दिये। धरती के पेट में जो पानी था, उसको तो हमने खूब निकाला लेकिन जल के संग्रहण की व्यवस्था, धरती में फिर से वह पानी वापस करने की व्यवस्था हमने नहीं की। इसलिए पुराने समय में जहां १०-२० फीट पर पानी निकल आता था कुओं में, वहां आज जब हैन्डपंप खोदते हैं तो हर प्रदेश के लोग जानते हैं कि ३००-४०० फीट हैन्जपंप खोदते हैं, तब कुओं में पानी निकलता है। हम जल निकालते गए धरती का पेट फाड़कर लेकिन हमने जल संग्रहण की कोई व्यवस्था नहीं की। इसलिए धीरे-धीरे यह स्थिति पैदा हो रही है कि भूजल का जो स्तर है वह लगातार नीचे गिरता जा रहा है। केवल हमारे देश के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया और अन्य देशों के लिए यह गंभीर चिन्ता का विषय है। माननीय कृषि मंत्री जी और संपूर्ण सदन से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि भूमिगत जल के स्तर को एक निश्चित ऊंचाई तक बनाए रखने के लिए यदि किसी केन्द्रीय कानून की आवश्यकता हो, तो वह जरूर बनाया जाना चाहिए।
अभी हमारे चौटाला जी बता रहे थे कि हमारी प्रथम पंचवर्षीय योजना में बनाई गई सिंचाई परियोजनाएं अभी तक पूरी नहीं हुई हैं। हमारे देश में नदियों का जाल बिछा है। हमारे देश में गंगा, सिंधु, कावेरी, यमुना, सरस्वती, रेवा महानदी, गोदावरी, ब्रहमपुत्र ये बड़ी नदियां हैं। इनकी कई सहायक नदियां हैं और उन सहायक नदियों में मिलने वाली कई छोटी नदियां हैं, छोटी नदियों से मिलने वाले कई नाले हैं। अब मणि शंकर जी तो विद्वान हैं, वे आंकड़े बता सकते हैं, लेकिन मैं तो इतना ही बता सकता हूं कि इन नदियों से होकर जो पानी जाता है वह समुद्र में व्यर्थ चला जाता है। उस जल को रोकने की हमने कोई व्यवस्था नहीं की है। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि पहली, दूसरी और तीसरी पंचवर्षीय योजनाओं में जिन बांधों का निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया या जिन सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण कार्य को प्रारंभ किया गया, उन्हें आज ५४ वर्ष के बाद भी पूरा क्यों नहीं किया जा सका, यह शर्म की बात है। मैं किसी पार्टी के लिए इसे शर्म की बात नहीं कह रहा हूं बल्कि पूरे सदन के लिए यह शर्म की बात है।
बड़े बांधों की योजनाएं बनती हैं, वे योजनाएं क्रियान्वित कैसे होती हैं, उसके बारे में मैं बताना चाहता हूं। मैं वदिशा से आता हूं। हमारे वदिशा जिले में दो सिंचाई परियोजनाएं हैं एक वाह और दूसरी सगड़। उनके निर्माण पर कई वर्षों में लाखों रुपए खर्च करने के बाद अब वन एवं पर्यावरण विभाग ने आपत्ति लगा दी। विभागों में आपस में कोई तालमेल नहीं है। मैं चौथी बार लोक सभा का सांसद चुन कर आया हूं।१९९१ से मैं लगातार कभी केन्द्र सरकार के मंत्रियों और कभी प्रदेश सरकार के सिंचाई एवं वन मंत्री के पास और कभी कलैक्टर के पास बराबर दौड़ रहा हूं, लेकिन अभी तक उसकी औपचारिकताएं पूर्ण नहीं हो पाई हैं।
मुझे वहां से बताते हैं कि ये-ये औपचारिकताएं हैं जो पूर्ण करनी हैं। मैं वहां से दिल्ली दौड़ता हूं। यहां से एक चिट्ठी जारी होती है। वह प्रदेश सरकार के सचिव को जाती है। सचिव चीफ इंजीनियर को भेजता है। चीफ इंजीनियर सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर को भेजता है। सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर एक्जीक्यूटिव इंजीनियर को भेजता है। एक्जीक्यूटिव इंजीनियर एस.डी.ओ. को भेजता है। एस.डी.ओ. और सब-इंजीनियर मिलकर कुछ बनाते हैं और फिर एक चिटठी भेज देते हैं और उसे यहां वापस आते-आते साल भर निकल जाता है। मैंने पूरा प्रयत्न किया, लेकिन मैं अभी तक भी उन योजनाओं को स्वीकृत नहीं करा पाया हूं। अगर ये दोनों परियोजनाएं पूरी हो जाती हैं, तो वदिशा जिले में सूखे का सवाल ही पैदा नहीं होता। यह अकेले वदिशा की त्रासदी नहीं है यह पूरे हिन्दुस्तान की त्रासदी है।
अध्यक्ष महोदय, चुनावों का जब समय आता है तो नई-नई सिंचाई परियोजनाएं तैयार हो जाती हैं और हमारे नेता लोग भूमि पूजन कर आते हैं, पत्थर लगा आते हैं और गांव के लोगों को झूठी दिलासा देते हैं कि अब तुम्हारे यहां सिंचाई परियोजना का शिलान्यास कर दिया है, अब तुम्हारे खेतों की सिंचाई होगी। बाद में उन पत्थरों का इस्तेमाल कहां होता है, महोदय, आप अच्छी तरह जानते हैं। कब तक हम लोग ऐसा करेंगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि गांव का पानी गांव में रोका जाए, तालाब बनाए जाएं, छोटे-छोटे चैक डैम बनाए जाएं। बड़े-बड़े बांधों की जरूरत नहीं है और जहां कहीं बिजली उत्पादन के लिए बहुत आवश्यक हैं, वहा उतने ही बड़े बांध बनाए जाएं जितने बिजली उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। बड़े बांधों की त्रासदी भी बड़ी होती है। बड़े बांधों का काम पूरा होने में समय बहुत लगता है, पूंजी बहुत लगती है, जमीन ज्यादा डूबती है, विस्थापित बहुत लोग होते हैं और पर्यावरण का बहुत नुकसान होता है और राहत कम मिलती है। इसलिए हमें चाहिए कि हम छोटे-छोटे बांधों को ज्यादा तरजीह दें जिससे गांव का पानी गांव में ही रोका जा सके। इसके लिए हम चैक डैम बनाएं, स्टाप डैम बनाएं।
माननीय अध्यक्ष जी, इस बार मैंने वदिशा में बेतवा नदी को एक स्थान पर रोकने का एस्टीमेट बनवाया और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नदी को एक स्थान पर रोकने का प्राक्कलन केवल २५ लाख रुपए का बना और मैंने वह धन सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के अन्तर्गत स्वीकृत किया और इससे ९ किलोमीटर क्षेत्र में पानी के स्तर को ऊंचा किया जा सकेगा और १३ गांवों की सिंचाई इससे होगी और उस क्षेत्र में जो कुएं, तालाब, टयूबवैल और हैंडपम्प होंगे वे पुनर्जीवित हो जाएंगे और उनके पानी से भी लोग सिंचाई कर सकेंगे तथा आठ महीने में यह योजना पूरी हो जाएगी। इस प्रकार से यदि हम एक गांव, दो गांव या पांच-दस गांव कर के उनकी सिंचाई की छोटी-छोटी योजनाएं बनाएं, तो कम समय में, कम पूंजी से पूरी हो जाएंगी और कम लोग विस्थापित होंगे और इस प्रकार से हम जल संग्रहण कर उसका ठीक प्रकार से उपयोग कर सकते हैं और गांव की पानी की आवश्यकता को गांव में ही पूरा कर सकते हैं।
अध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से यह निवेदन भी करना चाहता हूं कि यहां माननीय कृषि मंत्री जी ने काम के बदले अनाज की बात कही है। सम्पूर्ण ग्रामीण विकास रोजगार योजना, जवाहर ग्राम समृद्धि योजना आदि अन्य योजनाओं के तहत वह पैसा देंगे, यह उन्होंने कहा है। लेकिन उसमें हम यह निश्चित करें कि वह पैसा किस काम में दिया जायेगा। अगर वह पैसा तालाबों की खुदाई में लग जाये, चैक डैम, स्टॉप डैम बनाने में लग जाये तो जल संग्रहण की ठीक व्यवस्था होगी और इससे मजदूरों को काम भी मिलेगा। इसके साथ-साथ जो दूसरा उद्देश्य है, वह भी निश्चित रूप से पूरा होगा।
हमें दीर्घकालीन योजना बनाने की आवश्यकता है। अभी श्री मणि शंकर अय्यर जी कह रहे थे कि देश में अनेकों योजनाएं बनी हैं। आज की सरकार भी कई योजनाएं चला रही है। सूखा क्षेत्र के विकास के लिए कार्यक्रम है, मरू भूमि के विकास के लिए योजना है, समेकित बंजर विकास कार्यक्रम है। मुझे तो लगता है कि हम दुकानें तो बहुत खोल लेते हैं। एक ही उद्देश्य के लिए कई विभाग बन जाते हैं। क्या हम सबको इकट्ठा नहीं कर सकते, एक नहीं कर सकते, एक सम्पूर्ण समेकित योजना, दीर्घकालीन योजना नहीं बना सकते। आज आवश्यकता लंबे समय की, दीर्घकालीन योजनाएं बनाने की है। जिन योजनाओं के तहत माननीय कृषि मंत्री जी पैसा दे रहे हैं, मैं उनसे निवेदन करना चाहूंगा कि कहीं न कहीं तालमेल करें, कहीं न कहीं कोई समन्वय करें और एक सब लोगों से विचार-विमर्श करक ठोस योजना बनाये और उस पर विशेषज्ञों से चर्चा करें।
पहले भी सूखे के सवाल पर, जल संग्रहण के सवाल पर सरकार द्वारा कई प्रयास हुए हैं। यह मेरा मानना नहीं है। पहले भी कमेटी बनी है। डा. के.एल. राव कमेटी बनी थी, हासिम कमेटी बनी थी जिसमे १९९९ में उसने अपनी रिपोर्ट दे दी। हम कमेटी बनाने में तो खूब माहिर हैं। कमेटी बन जाती है, कमीशन बन जाते हैं और उनकी रिपोर्ट भी आ जाती है लेकिन उस रिपोर्ट की कितनी सिफारिशों पर कार्यवाही होती है और वह कितनी देर में होती है, यह आप सब अच्छी तरह से जानते हैं। अगर ऐसी कोई रिपोर्ट बनी है तो निश्चित रूप से हमें उस पर कार्यवाही करनी चाहिए। सम्पूर्ण व्यवस्था करने के लिए हमें प्रयास करना पड़ेगा।
मध्य प्रदेश की हालत बहुत खराब है। मध्य प्रदेश में ३५ जिले सूखे से बुरी तरह से प्रभावित हैं जिनमें वदिशा, रायसेन, सीहोर, रायगढ़, बेतूल, होशंगाबाद, रतलाम, मंदसौर इत्यादि पूरे के पूरे ३५ जिले बुरी तरह से सूखे से प्रभावित हैं। मेरा अपना संसदीय क्षेत्र में पिछले वर्ष ओले पड़े थे। उन ओलों में किसानों की फसलें चौपट हो गईं, बर्बाद हो गईं। श्री लक्ष्मण सिंह जी कह रहे हैं कि मध्य प्रदेश की सरकार ने सहायता की है। लेकिन वह सहायता कितनी थी--ऊंट में जीरा भी नहीं और वह सहायता भी ऐसी कि अंधा बांटे रेवड़ियां, चुन-चुन अपनों को दे। चुन-चुन कर भी कई जगह पूरी नहीं मिली यानी आधी खुद ही धर ली वाला किस्सा हुआ। इस तरह व्यापक तौर पर, प्रशासनिक तौर पर इस मामले में भ्रष्टाचार हुआ। उन ओलों में किसान तबाह हो गये, बर्बाद हो गये। जैसे तैसे उन किसानों ने खाद और बीज की व्यवस्था की तो वे फिर सूखे की चपेट में आ गये। मेरा कहना है कि आज सूखाग्रस्त क्षेत्रों की सहायता करने की आवश्यकता है।
जब-जब किसान के कर्ज माफ करने या ऐसे ही कोई और सवाल हम यहां उठाते हैं तो देश में बड़ा हल्ला मच जाता है। विशेषकर नौकरशाह कहते हैं, यहां के बुद्धिजीवी और विद्वान लोग कहते हैं कि बैंकिंग का सिस्टम गड़बड़ा जायेगा। किसान में मुफ्तखोरी की आदत पड़ जायेगी, गलत परम्परा बनेगी लेकिन परसों राज्य सभा में हमारे देश के वित्त मंत्री ने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि बड़े उद्योग समूहों पर ८३ हजार करोड़ रुपये का बकाया है। लेकिन जब हम किसान के लिए कर्जे की माफी की बात करते हैं या कर्जे के ब्याज की माफी की बात करते हैं तो नाबार्ड से लेकर रिजर्व बैंक तक पता नहीं कितने रोड़े अटकाते हैं।
मुझे याद है १९९० में जब मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री सुन्दर लाल पटवा जी थे तब उन्होंने किसानों के कर्ज को माफ करने के लिए एक योजना बनाई थी, उसमें बहुत बाधाएं और रोड़े अटकाये गये थे। बड़ी मुश्किल से वह योजना क्लीयर हुई थी और किसान के १० हजार रुपये तक के कर्जे माफ हुए थे। उसमें कुल मिलाकर खर्चा ७१० करोड़ रुपये आया था। मेरा कहना है कि ७१० करोड़ रुपये में लाखों किसानों के कर्जे माफ किये जा सकते हैं और अकेले उद्योग समूह पर ८३ हजार करोड़ रुपया बकाया है। हम किसकी बात करते हैं।
मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि आज वास्तव में किसानों को सहायता की आवश्यकता है। आज किसानों को मदद देने की जरूरत है। आज हमारे देश के किसान मारे-मारे फिर रहे हैं। उस बैंच पर बैठे हुए हमारे जो मित्र हैं, वरिष्ठ नेता हैं, उनसे मैं निवेदन करना चाहता हूं कि आप वाद-विवाद में मत जाइये। आइये हम सब इसे दूर करने का प्रयास करें क्योंकि अकेले सरकार के बस का यह रोग नहीं है। अकेले हमारे बस का रोग नहीं है। इस सूखे का मुकाबला करने के लिए जनता को खड़ा करना पड़ेगा। जब तक जन-भागीदारी नहीं होगी, जनता का पार्टीसिपेशन नहीं होगा, तब तक ऐसी योजनाएं बेमानी बनकर रह जायेंगी। इसका हल कौन कर सकता है ?हम जन प्रतनधि हैं और हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम जनता के बीच में जायें, जनता के संरक्षण का काम करें, जन जागरण का काम करें। बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए जनता की ताकत को खड़ा करें। जब वह जन आंदोलन का रूप ले लेगा तब मामला बनेगा। सब कुछ आपने सरकार पर छोड़ दिया कि सरकार ही योजना बनायेगी।
मैं अपना अपराध भी मानता हूं, राजनेताओं का अपराध मानता हूं कि वोट की राजनीति के चलते हमने जनता को यह जरूर शक्षित किया है कि जो कुछ करेगी, सरकार करेगी, आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
मैं जब १९९० में पहली बार विधायक बना तो गांव का दौरा करने गया। मेरे स्वागत में उन्होंने १५-२० हजार रुपये खर्च कर दिए, उन्होंने मेरा जोरदार स्वागत किया। बाद में उन्होंने जब मांग पत्र पेश किया तो उसमें लिखा था कि हमारे गांव में पीने के पानी का एक ही रुाोत यह कुंआ है जिसका पानी तीन सालों से सूख गया है। इसलिए आप इस कुंए की सफाई करवा दीजिए। मैंने कहा कि आपने मेरे स्वागत में कितने रुपये खर्च किए तो उन्होंने कहा कि १५-२० हजार रुपये। मैंने पूछा कि कुंए की सफाई में कितने रुपये लगेंगे तो वे कहने लगे कि केवल ५ हजार रुपये लगेंगे। मैंने कहा कि जब एक नेता के स्वागत में २० हजार रुपये खर्च कर सकते हैं तो कुंए की सफाई में ५ हजार रुपये खर्च नहीं कर सकते। वे कहने लगे कि कुंए की सफाई हमारा काम थोड़ी है, नेता का स्वागत करना हमारा काम है लेकिन कुंए की सफाई का काम हमारा नहीं है, यह काम सरकार का है। हमें इस मानसिकता को समाप्त करना पड़ेगा। जनता की भागीदारी, जनता का पार्टीसिपेशन, जब तक जनता में जागृति नहीं आएगी तब तक हम किसी भी त्रासदी का पूरी सक्षमता के साथ मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इसलिए जन भागीदारी बढ़े, इस बात का प्रयास हम सब जनप्रतनधियों को करना पड़ेगा। मैं निश्चित तौर पर यह बात कहना चाहता हूं कि अकेले सरकार सब नहीं कर सकती, सरकार के साथ-साथ सांसद जुड़ें, देश की जनता जुड़े। जब हम सब संकल्पबद्ध होंगे, सुखे या बाकी प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए खड़े होंगे तो बात बनेगी।
एक बात और कहना चाहूंगा कि जनता जन-प्रतनधियों की ओर देखती है और हम थोड़े से प्रारंभ कर सकते हैं। हम सब सांसद तय कर सकते हैं कि ज्यादा नहीं, सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक दिन की तनख्वाह अपनी जेब से देंगे। अगर हम पहल करेंगे तो बाकी हिस्सों से भी ऐसी सहायता आनी प्रारंभ होगी और जिन हिस्सों में वास्तव में ऐसी त्रासदी नहीं है, वे हिस्से भी देश की सहायता के लिए दौड़ेंगे। अगर हम इसे प्रारंभ करेंगे तो मुझे लगता है कि जनता मानेगी कि भाषण देने के अलावा वास्तव में भी हमारे मन में अपने देश की जनता की सेवा करने की तड़प, ललक है।
अंत में कहना चाहूंगा कि पैसा जाएगा, सरकार पैसा भेजेगी, सरकार कदम उठाएगी लेकिन उस पैसे की मौनीटरिंग होना बहुत आवश्यक है। जब ऐसी त्रासदी होती है तो देश की लाखों-करोड़ों जनता तो भुगतती है लेकिन कुछ लोग प्रसन्न भी होते हैं। देश में सूखा होता है लेकिन उन लोगों की जेब गीली हो जाती है। भ्रष्टाचार के कारण पैसा, चाहे वह काम के बदले अनाज वाला मामला हो, अनाज मजदूर तक नहीं पहुंचा, पता चला कि अनाज बाजार में ब्लैक मार्किट में बिक गया और पैसा कुछ लोगों की जेबों में चला गया। वभिन्न योजनाओं के तहत पैसा बड़ी मात्रा में आएगा लेकिन वास्तव में वह पैसा जिस आम आदमी के लिए दिया जाता है, उस आम आदमी तक पहुंचता है या नहीं, गरीब व्यक्ति को उसका लाभ हो रहा है या नहीं, बिचौलिए पैसा हड़प तो नहीं, इस पर आपको जरूर ध्यान रखना पड़ेगा, केवल राज्य सरकारों के रहम-ओ-करम पर हम अपनी जनता को नहीं छोड़ सकते। कई बार कहा जाता है कि यह राज्य का विषय है। राज्य का विषय होगा लेकिन राज्य की हालत यह है कि उनके पास तनख्वाह बांटने के लिए पैसा नहीं है। कई राज्यों की प्राथमिकता जनता की सेवा नहीं है। जैसे मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री कहते हैं कि क्या केवल सड़क और बिजली से चुनाव जीते जाते हैं, चुनाव जीतना तो एक कला है, एक विज्ञान है। इसलिए जब लालू प्रसाद जी सड़क और बिजली के बिना चुनाव जीत सकते हैं…( व्यवधान)
श्री रामानन्द सिंह श्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ सुनने की आदत डालिए।…( व्यवधान)
श्री लक्ष्मण सिंह : कहां-कहां हुआ, मुझे भी तो पता चले।…( व्यवधान)
श्री शिवराज सिंह चौहान: पूरा प्रदेश जानता है, सब अखबारों में है। उन्होंने कहा कि जब लालू प्रसाद जी बिहार में बिना सड़क और बिजली के चुनाव जीत सकते हैं तो मध्य प्रदेश में मैं क्यों नहीं जीत सकता। जब मुख्य मंत्री इतने संवेदनहीन होंगे कि सब चीजों को चुनाव से जोड़ कर देखें, केवल उनके रहम-ओ-करम पर मध्य प्रदेश की साढ़े छ: करोड़ जनता को नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से प्रार्थना करूंगा कि मध्य प्रदेश की इस संकट की घड़ी में केन्द्र सरकार पूरी सहायता करे और वह सहायता आम आदमी तक पहुंचे, इसकी पुख्ता व्यवस्था करे।
आपने मुझे बोलने का समय दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): इन्होंने बहुत अच्छा बोला था लेकिन बाद में सब खराब कर दिया।
अध्यक्ष महोदय : मुलायम सिंह जी की बात सही है। अच्छा भाषण किया लेकिन अंत में आरोप क्यों लगाया।
SHRI H.D. DEVE GOWDA (KANAKPURA): Hon. Speaker, Sir, we are discussing about drought and flood. This is a normal feature. There is no need of mixing any politics, particularly on this issue.
In the past 50 years, several programmes have been implemented. Nobody can deny that. I am not going to say that this Government is not concerned about the drought situation or the flood situation that is prevailing in this country. That is why I said that there is no need for mixing politics.
As we have discussed in this very same House, particularly on this issue, every year, in one part of the country there would be droughts and in another part of the country there would be heavy rains, causing a lot of damage to the people who come within those areas. This type of an erratic rainfall has caused both droughts and floods. We have thought over how to have a permanent solution for these issues.
I do not want to say that the previous Government has not made any attempt. When Shrimati Indira Gandhi was the Prime Minister, I was the Irrigation Minister in my State. She tried her best to evolve a National Water Policy but no State – I do not want to mix politics here – was prepared to accept some of the issues raised by the Central Government at that time. It was only on the issue of drinking water that all States unanimously accepted the policy. That is the only policy document we were able to produce, having had discussions for three days when Shrimati Indira Gandhi was the Prime Minister.
Subsequently, when Shri Rajiv Gandhi became the Prime Minister, I was Irrigation Minister of my State during that period also. He tried his best to make all the States where people were suffering with heavy floods understand how we should tackle the problem. I am talking only about the flood damages. Again, as a result of short-sighted politics, parochial outlook and concern for their own States, nobody was prepared to accept it. There is no water policy. I do know what Shri Mani Shankar Aiyar has quoted. What is that policy? Have we accepted it? … (Interruptions) Please hear me. I know a little about that. … (Interruptions)
SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): There was a New Irrigation Policy made by Shri Rajiv Gandhi. I attended that meeting. It was attended by many Chief Ministers. That Policy was objected to by some Chief Ministers and yet that Policy was adopted and was tried to be implemented.
SHRI H.D. DEVE GOWDA : I was a witness to the Policy adopted. Every State agreed only to the policy on drinking water. I am sorry, the policy on transfer of surplus water from the surplus basin to the deficient basin was not at all agreed to. Let me be very plain. Nobody was prepared to accept that. Everybody started fighting that if there was water in the surplus basins it was required for their own States. They did not want to allow the surplus water to be carried to the deficient basin. This was the stand taken by almost all the Chief Ministers. You know that the cauvery basin is a deficient basin. I am mentioning this because from among the Chief Ministers who were at that time present at the meeting called by Shri Rajiv Gandhi – you were also there – nobody was prepared to accept that Policy so far as this issue is concerned.
Today, during the Question Hour itself, our Bihar friends tried to obstruct the Question Hour and bring up the issue of how floods were affecting them, with the Himalayan rivers bringing a lot of floods. They are also suffering because of floods from the rivers along Nepal border. When Shri K.L. Rao was the Irrigation Minister during the period of Shrimati Indira Gandhi, he proposed a scheme to carry the flood waters from River Mahanadi to River Cauvery. Those schemes were submitted during 1992 and they were updated during 1996. I have a copy of all those schemes. I must say that the hon. Prime Minister has taken some decisions so far as the construction of the National Highways is concerned. He has announced a programme to spend about Rs. 60,000 crore, to have a road network connecting all the major cities. Infrastructural facilities are one of the major components so far as National Highways are concerned. I welcome it.
So far as this particular issue is concerned, I think, during my period, I have alsoappointed a Technical Committee to update what was prepared by Shri K.L. Rao. Subsequently during late Shri Rajiv Gandhi’s time also in 1992, it was updated. I had also appointed a Committee and that Committee had given a Report in 1996. I have then got a copy of the Report. The cost of the project may come to about Rs. 50,000 to Rs. 60,000 crore. A number of technicians have given their opnion particularly on how to use the Himalayan water.
Sir, we have a natural wealth in the form of water. But, unfortunately, because of the political conflict and because there is no unanimity among States, the country has to suffer. Water is a natural wealth. This Wealth has to be properly utilised for the welfare of the people. It is not the question of Karnataka, Bihar or Madhya Pradesh. We are not at all concerned particjularly about using this natural wealth. It is a God given gift. Can we not come to a conscious decision particularly on this issue? I do not want to quote the figures. How much water we are yet to use? How much irrigation potential we have exploited and how much we have not exploited even after 53 years of Independence? The Report itself says all these things. I do not want to quote all these things.
Sir, all the major rivers have got inter-State water dispute. Madam Shrimati Sonia Gandhi also knows what is Narmada, what isCauvery and what is between Punjab and Haryana. On all major issues we are unable to tackle the problems. The courts are there; the tribunals are there. I think, with all right earnest, the Union Government might have tried in the past. Even during my period on Narmada, I have called all the four Chief Ministers. I worked out an agreeable formula, which ultimately went to the Supreme Court. The Supreme Court gave the same decision based on what we have agreed among the four State Chief Ministers. I do not want to elaborate particularly on these issues.
Sir, what is the natural wealth? I think, it is water. I would like to know whether we should think in terms of nation or in terms of our own State. If water can be treated as a national wealth, then we have to adopt a National Water Policy. Then, the water should be utilised from the surplus basin to the deficit basin. If that could be done, then most of the problems could be sorted out. This is my sincere opinion.
Sir, even now I urge the hon. Prime Minister about it. The hon. Minister of Agriculture cannot take this decision. It is a major decision. If all the Chief Ministers are prepared to agree, if all the States are prepared to agree and if all the political parties are prepared to agree, then we can find a permanent solution in respect of 60 per cent to 70 per cent people who are suffering because of drought.
The Reports are there. The Ministry of Agriculture has given these reports, I do not want to read all these things for the purpose of convincing this august House.
More than 60 to 65 per cent of the people are suffering today on account of drought. If they want to find a solution, these reports are now with the Government, with the Ministry of Water Resources. If the Prime Minister can take serious interest in the case of construction of highways by providing about Rs.60,000 crore, why not here also? I know the resource crunch. Every State which is going to be benefited, can contribute, if you evolve a conscientious decision by calling all the Chief Ministers for linking Mahanadi with Cauvery. So, this is one issue which I would like to stress. Even though there are fractured verdicts on various issues, we have arrived at conscientious decisions on those issues. So, why not on this particular issue also? On this particular issue, there should not be any politics. That is all I want to impress upon this august House.
I can elaborate the temporary measures like water management and all these things. Today, the problem of drinking water is acute because we have made excessive use of the ground water for irrigation purpose, for agricultural purpose and for drinking purpose. Even though we have done enough to provide either the bore-wells or other facilities to provide drinking water, but in most of the villages today, there is no water. The water table has come down. Through bore-wells or pumps, we are not getting adequate water unless the water table is increased. For that, several measures were taken. To recharge the water table, we have formulated the watershed programme and so many other programmes, but unfortunately, the money that we have spent as an immediate measure, has not been spent properly. The late Rajiv Gandhi had said in this very House that in some schemes for which we give money for their implementation, only sixteen paise reach the beneficiaries at the end point. The very same words were told by the late Rajiv Gandhi in this very House. I am not saying that we are not spending money. We are spending money, but the money is being used improperly and there is no accountability. I know that with my little experience.
Today, what immediate steps we have to take is a major issue on which I would like to express my views. Yesterday, the hon. Agriculture Minister had called a meeting of the Revenue Ministers and Agriculture Ministers of all the four States concerned. They have drawn up certain programme. But my honest and sincere feeling is that there are discriminations from state to State. ‘X’ State may get more patronage, ‘Y’ State may not get as much patronage because of political considerations. I am not going to find fault with you, friends, because in a situation like this, you have to satisfy your allies. There are certain patronages only to save the Government. I can understand that and for that, I am not going to blame them. What can they do if the country is facing such a situation? Karnataka had submitted a report last time for Rs.900 crore financial assistance. Has the Centre given even one rupee? My Congress friends should not mistake me if I say that we are facing a lot of financial problem. I am not blaming the ruling party. They have to spend money on various other problems.
Giving money from the Calamity Relief Fund is not any special favour. Based on the report of the Finance Commission it has already been fixed as to how much each State should get. It is not any special favour if the Government of India is going to provide about Rs. 75 crore to Karnataka. It is not a special favour. Even that amount is not fully released. I do not want to make a charge. But why is this so? Various types of financial support is given to some of your Allies and others who are in office and the same situation is not prevailing in other States.
Sir, when you were the Chief Minister, did I discriminate? I was there as Prime Minister for only ten months. Your goodself had telephoned to me saying you wanted to bring a delegation so far as the cotton growers are concerned as the problem was so acute. Sir, I do not want to take credit for myself. But, then I said to you not to bring any delegation but to fax the message to me as to what was the problem and I would solve it within 24 hours. You sent the fax message and the next day we allowed about three lakh tonnes of cotton to be exported. It is not on party lines that we took any decision.
Why am I mentioning all this? Shri George Fernandes, you are here. Why has Karnataka been given a step-motherly treatment? I am unable to understand it because if the Congress Party has got 18 Members with them on this side, you do not require their support. But in the election you fight the battle. I will fight the battle with both you and the Congress. That is not an issue. I want to ask as to why Karnataka State is being allowed so less. Last year, about 30 lakh tonnes of foodgrains were given to Andhra Pradesh. How much was given to Karnataka and why? The figures are here. … (Interruptions)
PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU (TENALI): Sir, it is a question of utilisation of the thing. … (Interruptions)
SHRI H.D. DEVE GOWDA : Please, your Chief Minister is capable enough. My Chief Minister is also equally worthy. I am not going to comment on this on political lines. I am not jealous. The farmers of Andhra Pradesh are dying and the farmers of Karnataka are also dying. At least the farmers who are committing suicide are competing with each other. Am I correct? Let us not have this type of partial attitude by the Government.
13.47 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) You have the Annapoorna Antyodaya Yojana. Did you release at least one kilogram of rice or foodgrain to Karnataka under this scheme? Can I make it as a political decision and if not why? Under this scheme not a single grain is released to Karnataka. There is this ‘Food for Work’ scheme which has now been converted to Swarna Jayanti Rojgar Yojana. The earlier programmes were converted into different names. It is all right; you take credit. It is not a new programme. I have no grouse about using a new classification at least by altering the name. I am not bothered on that. How much have you released to Karnataka under this scheme? Here it is said that Government of India gives 75 per cent of it free to the States. At the same time, they have fixed certain conditions and guidelines. They said 25 per cent is to be given as wages and 75 per cent as foodgrains and this 75 per cent is to be given on the BPL rate. Am I correct? If I am wrong, please do correct me.
You said 75 per cent of the foodgrains are to be given to the workers who are engaged for this relief work; but that 75 per cent food component should be charged at BPL rate and the other 25 per cent as cash payment.
Sixty million tonnes of foodgrains are rotting. I read in a newspaper that foodgrains worth more than Rs. 800 crore were destroyed because they were not fit for human consumption. We are unable to store foodgrains in a proper way. The Food Corporation of India has so much of stock, but we are unable to preserve it and foodgrains worth Rs. 850 crore were destroyed. The Government is not prepared to give at least 50 per cent free. Why? How much subsidy are they giving to the exporters to clear the stocks? On one side, people are dying in Orissa which the report I read in the newspaper said. In the beginning, I have said that I do not want to mix politics. When the people are starving and ultimately dying, what for have they got the stocks? When we introduced the PDS, our calculation was that about 23 million tonnes of foodgrains were necessary to meet the requirement. They have got 60 million tonnes to export, and to export it, they are giving so much of subsidy to exporters. Why not they consider giving it free when the people are suffering?
My friend from Haryana who initiated the discussion said that about 380 talukas or something like that are suffering and that yesterday, the Agriculture Minister has tried to get full information from the concerned States. Why do they not allow 50 per cent free? Why should we not give it to those workers who are going to toil for their survival? These are some of the issues which I am unable to understand. They allow the foodgrains to rot and ultimately destroy them because they are not fit for human consumption. They cannot think in terms of people who are suffering today.
Yesterday, in the Rajya Sabha, there was some question about corporate houses. I am not going to deal with it. It is not the time for me to deal with it. I have gone through a number of items and under various sectors, the total amount of NPA is Rs. 88,000 crore. These sectors were classified as small-scale industrial sector, the monopoly houses, corporate sector and so on. So far as agriculture sector is concerned, hardly Rs. 7,800 crore are there as NPA. The country is going to think in terms of those suffering masses. There are 65 crore agriculturists and more than 80 per cent are small-holders. After land reforms were implemented with all seriousness in some States, only one or two States may be still lagging behind. I do not want to name those States. Several States like Maharashtra, Karnataka, Kerala and Andhra Pradesh have introduced land reforms so vigorously. There are several such States. Now, the holding is of half hectare, one hectare, one and a half hectare, two hectares and so on, barring a few big farms around Delhi and Bangalore where people own farms measuring 100 acres to 800 acres. They are fruit farms. That is a different issue. I do not want to deal with this subject now. Out of the total NPA of Rs. 88,000 crore, about Rs. 7,800 crore is the amount due from the farmers. Can the Government not give one time concession to them? Can the House, which is going to vote for Rs. 4,50,000 crore Budget annually, not give one time concession to the farmers? It may be given in terms of converting short-term loan into medium-term loan and medium term loan into long-term loan. We are not prepared even to waive off at least the interest component of it. This is the type of a raw deal. During the days of Pandit Jawaharlal Nehru, Shri S.K. Dey first started some of these programmes. In the last 53 years, we have drawn up several programmes in this country. With agony, late Shri Rajiv Gandhi said that only 16 paise reach the beneficiary. He said this knowing full well about the leakages that are there at various levels.
My appeal to the hon. Prime Minister and the hon. Finance Minister is, without mixing politics, to give a one-time concession to the farmers. How much is the interest component? It may be Rs. 1,000 crore or Rs. 2,000 crore. Fourteen States are suffering, and some of them are suffering due to heavy floods. People are living under the trees like birds. I have seen it all with my own eyes in your home State. Can we not think on these lines? Let us forget about politics and not think in terms of who gets the credit. I am not bothered whether Shri Vajpayee gets the credit for this.
I want a major policy decision in respect of the farming sector. There are two ways to it. One is a long-term policy, and the other is to provide immediate relief measures. What are the relief measures that are being provided? The Britishers have fixed something and we are following the same thing. When Shri Balram Jakhar was there, I fought the battle here and there was a marginal increase. Please apply your mind to this.
I know that the Prime Minister has got a number of advisors, but I do not think that there is any farmer to advise the Prime Minister. I have seen in the past 50 years of my public life that people who can speak eloquently in English or Hindi matter the most, but that would not be of any help here. People are struggling in the villages.
Sir, I come from a village with a population of 150. Today, the population figure has gone up to 1,200, but the conditions remain the same, barring one high school, one middle-level school and electricity. If you take electricity, there will be no power for three months or four months in a year. In the power sector, my friend, Shri Prabhu is here, has attempted to make certain major changes. He went to the extent of bailing out the State Electricity Boards. But the question is this. Have we been able to move forward an inch? Delhi is suffering because of power shortage. Today, the situation is very bad in the country, especially in the farming sector. Some of the people have got their own power generating units, but what about the villagers? On this particular issue, I can deal with for hours together.
I demand that the States should not be discriminated, so far as funding under various heads is concerned. Secondly, I demand a one-time concession to the farmers. It has been indicated yesterday in the Rajya Sabha that there are about Rs. 8,000 crore non-performing assets relating to the farming sector, and my demand is that it should be waived. If you are not prepared to do that, at least, the interest component should be waived and the recovery of loans should be deferred. Under the Annapoorna Yojana, you are giving foodgrains to the poor people. However, if a person is getting old-age pension, he is not given these foodgrains. If a woman is getting widow pension, she is not getting these foodgrains. What is all this? A person who is getting Rs. 75 or Rs. 100 per month as pension should avail of the benefit of Annapoorna Yojana or whateverYojana it is, instead of allowing the foodgrains to rot. Can you think on those lines?
14.00 hrs. Sir, unless this whole House pledges to implement the scheme, that had been initiated by the late Indira Gandhi, of connecting all the major rivers of the country – a scheme formulated by Shri K.L.Rao and updated by our Government – things would not improve. If this scheme of connecting the major rivers of the country is implemented, then most of the problems would be solved. The hon. Prime Minister should evolve a policy for implementation of this scheme by taking all the States into confidence.
Sir, with these words, I conclude.
श्री सुबोध राय (भागलपुर): अध्यक्ष महोदय, भीषण सूखे के चलते देश के अनेक राज्य काफी कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और २० करोड़ किसानों, मजदूरों की आबादी त्राहिमाम कर रही है।
महोदय, जैसी रिपोर्ट है उसके अनुसार हमारे कृषि मंत्री जी ने ११ राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ बैठक की, जिसमें स्थिति की समीक्षा करने की बात की और ३२० जिलों में सूखे के प्रभाव की बात कही गई है। लेकिन स्थिति इससे भी बदतर है। दक्षिण के वे राज्य भी, जो कि भारी वर्षा में रहे हैं, केरल जैसे राज्य के बारे में भी रिपोर्ट है कि वर्षा की कमी के चलते बड़े-बड़े डैम, जहां पनबिजली का उत्पादन होता है, उनका जल स्तर काफी नीचे चला गया है, इसके चलते वहां पनबिजली पैदा करने की कठिनाई हो रही है और इसके चलते वहां के उद्योग धंधे भी प्रभावित हो रहे हैं। उत्तर भारत के जो इलाके पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, आंध्रा प्रदेश, दिल्ली, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, इन सबकी स्थिति हमने देखी है और जो रिपोर्टें आ रही हैं, उससे जाहिर होता है कि सभी जगह स्थिति काफी बदतर है , लेकिन यह स्थिति अचानक ही बदतर नहीं हुई। यह बात जरूर है कि हर साल हम लोग बाढ़ के सवाल पर बहस करते आए हैं और केन्द्रीय सरकार को बराबर इस बात के लिए हम लोगों ने चेताने का काम किया उसमें जो सावधानी, सतर्कता और संवेदनशीलता होनी चाहिए, उसमें लगातार कमी आ रही है, इसलिए समय पर लोगों को राहत प्रदान करने की समस्या पैदा होती है जिससे वहां के किसानों और प्रभावितों को जब मुसीबत से मुक्त करने का सवाल आता है, उसमें वह पूरी तरह से फेल हो जाती है। यह बात स्पष्ट है कि पिछले साल ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा वगैरह के इलाकों की काफी चर्चा हुई ,थी जहां सूखा पड़ा था लेकिन उसके बारे में गंभीरता नहीं दिखाई गई थी। आज ऐसी स्थिति है कि हमारे देश की ६० प्रतिशत से ज्यादा आबादी जो कि काफी अनाज पैदा करती है, दूसरी तरह की चीजें पैदा करती है, जो हमारे सकल घरेलू उत्पाद का २६ प्रतिशत से ज्यादा उत्पादन करती है, आज वही इस मुसीबत का शिकार है। उसके बारे में जो चर्चा हुई है, मणिशंकर जी ने जिस तरह से बातें बताई हैं या चौहान जी ने या चौटाला जी ने जिन बातों को कहा है, उससे यह ज़ाहिर नहीं होता है कि सरकार अभी भी पूरी गंभीरता से इसकी तरफ आगे बढ़ने का काम कर रही है।
महोदय, जो बात कल मंत्रिमंडल की बैठक के बाद, उससे निकल कर आनी चाहिए थी, जिसकी जरूरत थी, वह निकल कर नहीं आई और ऐसा प्रतीत होता है कि उसके ऊपर पूरी गहराई और गंभीरता के साथ विचार नहीं किया गया है। वह बात है पूरे देश के जो सूखाग्रस्त भाग हैं उन्हें पूर्ण रूप से सूखाग्रस्त इलाका घोषित किया जाए और उस क्षेत्र के गरीब और मध्यम वर्गीय किसानों के कर्जे माफ करने चाहिए, उनके ऊपर जो बिजली का भारी चार्ज है, उसे माफ करना चाहिए, उनके ऊपर बड़े-बड़े सूदखोरों का जो कर्जा है, उसे माफ करना चाहिए। इलाका घोषित किया जाए और उस क्षेत्र के गरीब और मध्यम वर्गीय किसानों के कर्जे माफ करने चाहिए, उनके ऊपर जो बिजली का भारी चार्ज है, उसे माफ करना चाहिए, उनके ऊपर बड़े-बड़े सूदखोरों का जो कर्जा है, उसे माफ करना चाहिए।
महोदय, आप जानते हैं कि कृषि मंत्री कर्जा माफ करने की घोषणा तो कर देते हैं, लेकिन वह होता नहीं है क्योंकि बैंकों के अधिकारी कृषि मंत्री की बात को नहीं मानते हैं। बैंकों के अधिकारी तो वित्त मंत्रालय के आदेश और रिजर्व बैंक के निर्देश को मानते हैं। जब तक उनको इन दोनों की तरफ से सरकुलर नहीं जाएगा तब तक बैंक के अधिकारी किसानों के कर्जों को माफ नहीं कर सकते हैं। अत: जब इतने गंभीर और संवेदनशील और राष्ट्रीय आपदा जैसे विषय पर चर्चा हो रही है तब यहां माननीय वित्त मंत्री जी को भी उपस्थित रहना चाहिए था, लेकिन माननीय वित्त मंत्री जी उपस्थित नहीं हैं। जब वित्त मंत्री जी नहीं हैं तो किसानों के बैंकों के कर्जों को कौन और कैसे माफ कराएगा।
महोदय, हम मांग करते हैं कि बैंकों का देश के उद्योगपतियों पर ८३ हजार करोड़ रुपए का कर्जा बकाया है, लेकिन उसकी वसूली के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। किसानों से बैंक अपने कर्जों की वसूली के लिए कठोर से कठोर कार्रवाई करते हैं, लेकिन बड़े-बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है। भारत सरकार क्यों उनसे बैंकों के कर्ज वसूल करने में शर्माती है औ क्यों कतराती रही है। यही कारण है कि आज तक ८३ हजार करोड़ रुपए में से ५० फीसदी भी वसूली केन्द्र सरकार नहीं कर पाई है।
महोदय, आज हमारी सरकार के पास किसानों को सूखे से निपटने के लिए राहत देने के लिए धन नहीं है, खेत मजदूरों को राहत देने के लिए धन नहीं है, गरीबों को राहत देने के लिए धन की कमी है, लेकिन यदि भारत सरकार इन उद्योगपतियों से बैंकों के बकाया कर्जे को वसूल कर ले, तो मैं समझता हूं सरकार के पास गरीबों की सहायता करने के लिए धन की कोई कमी नहीं रहेगी। इसलिए मैं केन्द्र सरकार से मांग करता हूं कि बैंकों के ८३ हजार करोड़ रुपयों को देश के उद्योगपतियों से वसूल करने हेतु कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
महोदय, राष्ट्रीय आपदा की इस घड़ी में आज सबसे ज्यादा जरूरत है फूड फार वर्क प्रोग्राम चलाने की, लेकिन जैसा कि अभी हमारे माननीय सदस्य कह रहे थे भारत सरकार के पास ६ करोड़ टन अन्न का भंडार है। …( व्यवधान)
विद्युत मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती जयवंती मेहता): अध्यक्ष महोदय, मैं व्यवस्था का प्रश्न उठाना चाहती हूं। इतनी अच्छी बातें माननीय सदस्य बता रहे हैं और इतनी गंभीर व गहन चर्चा हो रही है, लेकिन कांग्रेस पार्टी की तरफ से एक भी सांसद उपस्थित नहीं है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के माननीय सांसदों को सूखे के प्रति कोई चिन्ता नहीं है। इतनी महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है और कांग्रेस की तरफ से एक भी सांसद का सदन में उपस्थित नहीं होना अच्छा नहीं लग रहा है। हमारे नेता नहीं हैं, तो हम मंत्री लोग मौजूद हैं और यदि हमारे कोई मंत्री मौजूद नहीं होते हैं, तो विपक्ष वाले शोर करते हैं कि मंत्री मौजूद नहीं हैं। वे यहां उपस्थित नहीं हैं, इस प्रकार से यदि देखा जाए, तो सूखे के बारे में बोलने का उनको कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): Sir, she has won the day by pointing out that the main Opposition Party is not present in the House. I thank her for discharging her duty.
श्री सुबोध राय : अध्यक्ष महोदय, मैं कह रहा था कि सूखाग्रस्त राज्य की सरकारों ने जितना धन सूखे से निपटने के लिए सहायता के रूप में मांगा है, मंत्रिमंडल की कल हुई बैठक के अनुसार राज्य सरकारों को देने हेतु ३ हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। लेकिन जब तक वित्त मंत्रालय की ओर से, भारत सरकार की ओर से, सूखे के सवाल पर एक सघन कार्यक्रम प्रमुखता के साथ, प्राथमिकता के साथ नहीं बनेगा और सूखाग्रस्त क्षेत्र की जनता को हर तरह से यह विश्वास दिलाने के लिए कि उनमें किसी तरह की भूखमरी की स्थिति व्याप्त नहीं होगी, बीमारी या किसी और कारणों से उनके ऊपर कोई और मुसीबत बढ़ाने की बात नहीं होगी और इस समस्या को नम्बर वन समस्या समझकर सूखाग्रस्त इलाकों की जनता के लिए सारा कार्यक्रम अपनाया जायेगा, तब तक यह तकलीफ दूर होने वाली नहीं है।
आपको याद होगा कि १९६७ में नौ राज्यों में गैर कांग्रेस की सरकारें बनी थीं। बिहार जैसे राज्य में १९६७ में भारी सूखा और अकाल की स्थिति पैदा हुई थी लेकिन तत्कालीन सरकार ने जिस प्रतिबद्धता के साथ, जिस गंभीरता के साथ सूखे का मुकाबला किया, वह सबको याद होगा कि किस तरह से सड़कों पर, गलियों में, चौराहों पर सस्ती दर की दुकानें खोलकर एक भी आदमी को भूखा मरने नहीं दिया गया। फूड फॉर वर्क प्रोग्राम के जरिये गांव में तमाम जितने क्षतिग्रस्त बांध थे, उनकी मरम्मत का काम, तालाबों को गहरा करने का काम, सड़कों की मरम्मत करने का काम करने के लिए भूमिहीन मजदूरों को लगाया गया। बिहार राज्य का एक भी खेत मजदूर या भूमिहीन किसान को अपने राज्य से बाहर कमाने के लिए दूसरे राज्य में जाने की जरूरत नहीं पड़ी। आज फिर उसी संकल्प, उसी प्रतिबद्धता की जरूरत है।
हमारे बहुत से मित्र बैठे हैं जो उस सरकार में मंत्री पद संभाल रहे थे। मैं सिर्फ याद दिलाने के लिए यह बात कह रहा हूं कि इसमें कोई पार्टी या कोई राजनीति की बात नहीं होनी चाहिए। इसके लिए स्पष्ट तौर से सरकार को यह कदम उठाने की जरूरत होनी चाहिए। हमारे यहां आपदा प्रबंधन के बारे में एक कमेटी बनाई गई थी। सूखा प्रबंधन के बारे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी चेतावनी देने और कुछ बातें कहने का काम किया था। इसके साथ-साथ अमरीका स्थित" नैशनल ओशियेनिक एंड एटमासफेरिक एडमनिस्ट्रेशन"ने भी भारत सरकार को चेतावनी देने और सूखे की इस भयानक स्थिति से आगाह करने का काम किया था।
आप जानते हैं कि अमरीका जैसे देश में भी सरकार प्रति वर्ष ८०० करोड़ रुपये सूखे से निपटने के लिए रखती है। वह अलग कानून बनाकर चलती है लेकिन हमारे यहां सरकार की ऐसी स्थिति है कि जब सिर से पानी ऊपर जाने लगता है तब हम जागने का काम करते हैं। हर तरह की प्राकृतिक आपदा के समय इसी तरह की बातें देखी जाती हैं। यह बात दूर होनी चाहिए। यहां वैकल्पिक फसलें उगाने का सवाल है, ऐसी स्थिति लाने की जरूरत है, जिससे हमारे सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों को राहत मिल सके, गरीबों को राहत मिल सके। हम जानते हैं कि सूखे से सिर्फ किसान ही प्रभावित नहीं हैं बल्कि लाखों बुनकर हैं, खेत मजदूर हैं, दस्तकार हैं जो वभिन्न कामों को करते हैं, वे भी सूखे के चलते आज परेशान हैं।
आज बिजली की कमी है। बिजली मंत्रालय को एन.टी.पी.सी. के इलाके को सुनिश्चित करना चाहिए कि पर्याप्त ढंग से, फौरी तौर पर, प्राथमिकता के स्तर पर उन इलाकों में बिजली की आपूर्ति करने का काम किया जाएगा।
मैं भागलपुर से आता हूं। हमारे यहां २० प्रतिशत धान की रोपाई हो पाई है जबकि वर्षा के चलते अभी तक करीब-करीब ६० प्रतिशत से ज्यादा धान की रोपाई हो जाया करती थी। इसलिए मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि इस काम में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय को, जल संसाधन मंत्रालय के साथ समन्वय स्थापित करके, विद्युत मंत्रालय के साथ समन्वय स्थापित करके एक कार्यक्रम बनाना चाहिए। सूखे के मुकाबले के लिए कोई एक मंत्रालय जिम्मेदार नहीं होना चाहिए, किसी एक विभाग की यह जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। यह भारत सरकार और भारत की तमाम राजनैतिक पार्टियों की जिम्मेदारी है। हम सबको मिल कर, एक-दूसरे के सहयोग से इस राष्ट्रीय आपदा का मुकाबला करने के लिए जनता का, किसानों का विश्वास लेकर उनको पर्याप्त सहायता देनी चाहिए। यह आज की सबसे बड़ी मांग है। इसलिए इस समय देश में कोई भी ऐसी तैयारी जिससे सौहार्द खत्म होता हो, आपस में भेदभाव पैदा होता हो, वैसी खतरनाक राजनीति, वैसा खतरनाक कोई भी प्रोग्राम नहीं लिया जाना चाहिए। हम खास तौर से सत्तारूढ़ पार्टी और भाजपा के लोगों से जानना चाहेंगे कि देश के सामने आज क्या प्राथमिकता है। देश के सामने किसानों की मदद करने, सूखे का मुकाबला करने की प्राथमिकता है। वैसी स्थिति में आपको इस बारे में सबसे ज्यादा गंभीरता से, किसी भी विभाजनकारी कामों से अलग होकर पूरे देश को एक साथ ले जाने की गारंटी करनी चाहिए। आज इस मामले में जो स्थिति है, हम बताना चाहेंगे कि बड़े पैमाने पर चीनी मिल मालिकों को गन्ना किसानों के एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया देने के लिए कहा गया था लेकिन अपील करते-करते आज बरसों गुजर गए, कुछ नहीं हुआ। किसानों की हालत इससे बदतर हो रही है। गन्ना किसानों के बकाया भुगतान के लिए कठोर कदम उठाकर भारत सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए। आज वहां सबसे जबर्दस्त परिस्थिति पैदा हो गई है। हम चाहते हैं कि यह काम पूरा होना चाहिए।
सभापति महोदय : अब श्री उमारेड्डी जी की बारी है लेकिन श्री मुलायम सिंह जी को जल्दी जाना है, इसलिए पहले उनको बुलाएंगे।
श्री रामानन्द सिंह : मैं मुलायम सिंह जी के भाषण में बाधा नहीं डालूंगा लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि नियमानुसार जिन सदस्यों ने नोटिस दिया है, क्या आप उन सबको बोलने के लिए बुलाएंगे।…( व्यवधान)हमने परेशानी के बावजूद अपनी यात्रा कैंसिल की है। इसलिए हमारी अपील है कि जिन सदस्यों ने नियम १९३ के अन्तर्गत बोलने के लिए नोटिस दिया है, उनको बुलाया जाए।
सभापति महोदय : पार्टी का समय निर्धारित है और पार्टी की तरफ से नाम दिए गए हैं।
श्री रामानन्द सिंह : पार्टियां पक्षपात और अन्याय करती हैं लेकिन आप न्याय कीजिए।
श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): ये समाजवादी थे , लेकिन किसी तरह से भाजपा में चले गये हैं। ये ठीक कह रहे हैं कि पार्टियां तानाशाह हो गई हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी नहीं है।…( व्यवधान)
सभापति जी, दुखद संयोग है कि मानसून सत्र में संसद में हमेशा बाढ़ और वर्षा पर चर्चा हुआ करती थी, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है, मेरी जानकारी है कि मानसून सत्र में संसद की बैठक चल रही हैं, उसमें सूखे पर चर्चा करनी पड़ रही है। लगभग पूरा देश भयंकर सूखे की चपेट में है, इतना भयंकर सूखा है कि अफसोस होता है कि इसे दैवी आपदा कहकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं हट सकती। लोक कल्याणकारी राज्य की संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी। लोक कल्याणकारी राज्य वह होता है, सरकार वह होती है, जो चाहे सूखा हो, बाढ़ हो, भूकम्प हो, साइक्लोन हो, चाहे उड़ीसा जैसा सुपर साइक्लोन हो, हर तरह की सुविधाएं जनता को देना सरकार की जिम्मेदारी होती है। लोक कल्याणकारी सरकार ऐसी जिम्मेदारी पूरी करती है । लेकिन आज लगभग पूरा देश भयंकर सूखे की चपेट में है। सिंचाई तो दूर देश के कई भागों में पीने के पानी के लिए, नहाने के लिए और कपड़े धोने के लिए भी पानी नहीं है। माननीय शिवराज सिंह जी ने बहुत अच्छी बातें रखी हैं और इसलिए रखी हैं कि गांव से अभी तक इनका रिश्ता जुड़ा हुआ है, अगर कृषि मंत्री, आपका गांव से रिश्ता जुड़ा होता तो आप जिस तरह से बयान दे रहे हैं, नहीं देते।
कमीशन और समति बनाने के पक्ष में मैं नहीं हूं । अगर कोई काम न करना हो तो समति बना दो, कमीशन बैठा दो, सूखा से निबटने के लिए सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो गई। २-३ साल में कमीशन व समति रिपोर्ट देगी, सुविधाएं तत्काल प्राप्त होनी चाहिये। मैं इसका भुक्तभोगी हूं। मैंने देखा है कमीशन व समति समय मांगते रहते हैं जिससे बंगला, सारी सरकारी सुविधाएं, लालबत्ती, भत्ता, तनख्वाह मिलें, और कुछ कमीशन भी इसी तरह के होते हैं। इसीलिये मैंने कहा कि काम न करना हो तो उसकी कमेटी बना दो, कमीशन बैठा दो।
आज देश में भुखमरी है, आज पूरी वर्षा भी हो जाये, तब भी खरीफ की फसल लगभग पूरी खत्म है। आज उसकी पूर्ति नहीं हो सकती है, आज हालत यह है। हम आपके सामने यह हालात बता रहे हैं, जो सारे देश के हालात हैं। राजस्थान में लोगों ने अपने जानवरों को छोड़ दिया है, क्योंकि पानी के आभाव में जानवर मर रहे हैं, फसलें पूरी तरह चौपट हो चुकी हैं, चारा नहीं है। भूख के कारण जानवरों को किसान अपने दरवाजे पर मरना पसन्द नहीं कर रहा है। यह हालत है कि वहां पीने का पानी नहीं है। राजस्थान की यह हालत है और यही हालत मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की भी है, जिसका मैं जिक्र कर रहा हूं। औरंगाबाद और मराठवाड़ा में पीने के पानी के लिए विवाद और आपस में झगडे हो रहे हैं। म. प्र. की राजधानी भोपाल में जो हमने अखबारों में पढ़ा है, उसके अनुसार हर दूसरे दिन पीने के लिए और नहाने के लिए पानी की आपूर्ति की जाती है, और तो छोड़ दीजिए, यह आपूर्ति भी हर दूसरे दिन कभी-कभी नहीं हो पाती है। दुखी होकर कांग्रेस के दोनों मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री विलासराव देशमुख और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह जी, पंढरपुर के मंदिर में भगवान से प्रार्थना करने साथ गये थे, भगवान खुश हो जाएंगे, बरसात कराएंगे, दोनों मुख्यमंत्रियों ने स्वीकार किया कि हम सूखे का मुकाबला नहीं कर पाएंगें। इससे ज्यादा निराशानजक कोई दूसरी बात नहीं हो सकती। माननीय कांग्रेस के साथियो अपने मुख्यमंत्री को निर्देश दीजिए कि भगवान पर भरोसा कहकर जनता को सुविधायें देने की जिम्मेदारी से न हटें। हम लोग सरकार में थे, तो हम लोगों ने बाढ़ और सूखा की समस्या को झेला है। ये मुख्य मंत्री भी ध्यान बंटाने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे कांग्रेस के हों या भाजपा के हों।
बिहार में स्थिति और भी खराब है। लगभग ३५ जिले सूखे से प्रभावित हैं और २२ जिलों में नेपाल से जो पानी आता है, उसके कारण बाढ़ आ गई है। बिहार के मंत्रीगण यहां बैठे हुए हैं, सरकार में सबसे ज्यादा मंत्री बिहार से हैं और इसी इलाके से आते हैं। वहां नेपाल की नदियों का पानी हर साल आता है। हर साल बाढ़ की चपेट में बिहार आता है, लेकिन कोई स्थाई समाधान नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण प्रति वर्ष गरीब किसान और मजदूर बर्बाद हो रहे हैं।
उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री (श्री शरद यादव) पूवार्ंचल में भी वहां का पानी आता है।
श्री मुलायम सिंह यादव :आप ठीक कह रहे हैं, उत्तर प्रदेश में कुशी नगर में बाढ़ आ गई है। हमारे पास खबर आई है कि वहां आठ गांव पूरी तरह से बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। आज हालत यह है कि उत्तर प्रदेश में ९० प्रतिशत फसल दस दिन पहले ही सूखे और बाढ़ की वजह से खत्म हो गई है। आपने आज का अखबार पढ़ा होगा। उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री ने स्पष्ट कह दिया है कि मैं प्रधान मंत्री जी से मिली थी, उन्होंने जो बताया उन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। प्रधानमंत्रीजी ने कहा कि नियमानुसार काम करें।
श्री राशिद अलवी (अमरोहा): उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री ने यह नहीं कहा।
श्री मुलायम सिंह यादव : अभी मैंने अपना भाषण खत्म नहीं किया है। आपकी जब बारी आएगी तब आप सफाई दे देना। कोई अंधा होगा, वह यह कह सकता है। अखबार में आया है, आप पढ़ लेना। उ. प्र. मुख्यमंत्री ने पत्रकार सम्मेलन में कहा है कि प्रधान मंत्री जी ने हमें जो कहा, उतने जिले हमने सूखाग्रस्त घोषित कर दिए हैं और हमसे प्रधानमंत्रीजी ने कहा कि नियमानुसार काम कीजिए, और हम नियमानुसार ही कार्य कर रहे हैं। राजनाथ सिंह जी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बन गए, उ. प्र. से श्री विनय कटियार जी वहां के प्रदेश अध्यक्ष बन गए, लेकिन ये भी कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। नियमानुसार काम करने की बातें करते हैं कि जिस ५० प्रतिशत से ज्यादा नुकसान होगा तो सूखाग्रस्त घोषित होगा। यह उ. प्र. की हालत है। उ. प्र. का मुख्यमंत्री कितना संवेदनहीन है। ऐसी सरकारों से जनता को राहत की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती । जिस राज्य से प्रधान मंत्री चुनकर आते हों, यह कहें कि इतने जिलों को घोषित किया है, तब हम उनसे बात करेंगे, इससे ज्यादा और दुखद बात हमारे देश के अंदर नहीं हो सकती। आपको स्वयं पता होगा,बिहार में भी यही स्थिति है और उत्तर प्रदेश में कई जिले, अलीगढ,देवरिया, गाजीपुर, बुन्देलखंड में रात में स्त्रियां निर्वस्त्र होकर हल चला रही हैं, जिससे इन्द्र देवता प्रसन्न हो जाएं और बारिश हो जाए। इतना ही नहीं तपती हुई जमीन पर और गर्म मिट्टी पर लड़के लोट रहे हैं, अपना शरीर जला रहे हैं, कि किसी तरह से इन्द्र देवता खुश हो जाएं और वर्षा हो जाए। इससे ज्यादा और क्या शर्मनाक तथा दुखद बात हो सकती है। इसको क्या कहें, क्या कृषि मंत्री जी यह आपके दिमाग में है। मैं दोहराना नहीं चाहता, हमारे दल के नेता श्री जनेश्वर मिश्र जी राज्यसभा में बोल चुके हैं कि इस तरह का अकाल जब आया था, बारिश नहीं हुई थी तो राजा जनक ने खुद हल चलाया था। तब इस तरह से महिलाओं को निर्वस्त्र होने और बच्चों को गर्म मिट्टी में लोटने की जरूरत नहीं पड़ी थी। इससे पता चलता है कि आज की सरकार कितनी गम्भीर है। पिछले दिनों हमने दो बयान कृषि मंत्री जी के पढ़े हैं।
श्री सईदुज्जमा (मुजफ्फ़रनगर): इनसे भी कहें कि हल चलाएं।
श्री मुलायम सिंह यादव : यह हम नहीं कहेंगे। प्रधान मंत्री काफी उम्र के हैं, उनको नहीं कह सकतेn माननीय सभापति जी, कृषि मंत्री जी के पिछले दिनों सूखा पर दो बयान समाचार पत्रों में पढने को मिले । एक बयान है कि भगवान पर भरोसा करो और इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिये पूजा करो जिससे इंद्र देव खुश हो जाएं और बरसात हो जाये। यह कृषि मंत्री का पहला बयान है औऱ दूसरा बयान था कि किसानों चिंता मत करो। हमारे देश के सरकारी गोदाम अनाज से भरे पडे हैं। गल्ले की कोई कमी नहीं है। क्या कृषि मंत्री को ज्ञान है कि इसी देश के अंदर ऐसे भी अवसर आये हैं जब खत्तियों गल्ला भरा पडा था, भंडार अनाज से भरे पड़े रहे और लोग सड़कों पर तड़प-तड़प कर, भूख के कारण मरते रहे? क्या देश के अंदर ऐसे अवसर नहीं आये?क्या कृषि मंत्री को यह पता है कि जितना सरकारी गोदामों में अनाज है, उनके पास भंडारण है, उसमें चालीस फीसदी ऐसा अनाज है जिसको जानवर भी नहीं खाएंगे और एफसीआई के गेहूं को कोई भी राज्य खरीदने के लिए तैयार नहीं है? इतना संवेदनहीन और लचर सरकार की तरफ से बयान दिया जाये? शरद यादव जी, हमें और आपको अच्छी तरह से पता है कि चौधरी साहब ने कई बार कहा कि मैं किसान का बेटा हूं, किसान नहीं हूं। मैं वकील हूं। उसके बाद मंत्री हूं और मेरा बेटा वकील का बेटा है, मनिस्टर का बेटा है, यह किसान का बेटा नहीं है। ऐसे लोगों के हाथों में कभी सत्ता चली गयी तो याद रखना कि जो आज कांग्रेस के राज में हो रहा है, वही मेरा बेटा करेगा। याद करो। हम लोगों के सामने कहा है। सब समाजवादी पार्टी के लोगों के सामने कहा, आम सभा में पूरी जनता के समक्ष सार्वजनिक रूप में कहा। मुझे फख्र है कि मैं अब भी खेती कराता हूं। हमें गांव जाने का जब भी मौका मिलता है खेतों पर जाता हूं। किस खेत में क्या बोया जाए राय भी देता हूं। हम जानते हैं कि खेती क्या है और खेती कैसे की जाती है?आज खेतिहर मजदूर और किसान पूरी तरह से बर्बाद हैं और ये कहते हैं कि हमारे देश के पास गोदाम अनाज से भरे पड़े हैं। अनाज भरा पड़ा है, तो मैं कृषि मंत्री से पूछना चाहता हूं फिर किसान गरीब क्यों हैं? किसानभूखे क्यों मर रहे हैं? किसान पर कर्जे का बोझ क्यों है? आपके गोदाम अनाज से भरे पड़े हैं तो उसकी माली हालत अच्छी क्यों नहीं हो रही है? क्योंकि उसको समय पर उसकी फसल की कीमत नहीं मिलती। गन्ने, आलू और गेहूं का किसान को भुगतान क्यों नहीं हो रहा है? कहीं कहीं एक भी किसान को भुगतान नहीं हुआ। यह कह देना कि सरकार के पास पैसा नहीं है, याद रखना कि सभापति जी, मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि संसाधन न होने की जिम्मेदारी लेकर जनता की और जनता की सुविधाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती। सरकार का काम है कि संसाधन जुटाए और जनता का हर स्तर पर विकास करे और जो सरकार यह काम नहीं कर सकती है, संसाधन नहीं जुटा सकती है, वह सरकार निकम्मी है और नालायक है। हमने सरकार में रहकर काम किया है, इसीलिए मैं कहता हूं। आज ये कहते हैं कि अगला साल आएगा तो वसूली हो जाएगी। अगले साल आएगा तो वसूली हो जाएगी तो फिर क्या फायदा, इकट्ठी वसूली की जाएगी। ब्याज और बढ़ जाएगा। सबसे पहले हमारा कहना है कि यह सूखाग्रस्त देश नहीं है, हमारी मांग है इसे अकालग्रस्त देश घोषित किया जाये। खरीफ की फसल बर्बाद हो चुकी है। आप भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं। हम जानते हैं कि फसल खत्म हो गई। कर्जा माफ किया जा सकता है और माफ किया है। शरद यादव जी केन्द्र सरकार में जब मंत्री थे , वादा किया था कि केन्द्र सरकार उसका आधा हिस्सा वहन करेगी । हमने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश में १४०० करोड़ रुपए का कर्जा माफ किया था, प्रति किसान १० हजार रुपए का कर्जा माफ किया था लेकिन केन्द्र सरकार ने आज तक एक रुपया नहीं दिया जबकि आधा देने का वायदा था। हमारे समय में उ.प्र. सरकार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। आपका योजना आयोग है। आप उनसे पूछ सकते हैं? उन्होंने कहा था कि सबसे अच्छी प्रफॉरेमेंस आर्थिक द्ृष्टि से १९८९-९० में थी जो १९९१ तक रही। १९९३-९४ में उ. प्र. में पुन मुख्यमंत्री जब में बना तब योजना आयोग के सामने जब इस मामले को लेकर आए तो जितना हमने पैसा मांगा उतना उन्होंने स्वीकृत कर दिया। उस समय श्री प्रणव मुखर्जी योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे। यह रिजर्व बैंक की रिपोर्ट है। आपका यह कहना कि संसाधनों का अभाव है, यह बहाना कर जनता की उपेक्षा करना, मदद न करना और उनकी तरफ ध्यान न देना जिम्मेदारी से हटना है। आपकी जिम्मेदारी संसाधन जुटाने की है। हम इसमें सहयोग करेंगे। आप इसके लिए सब को उत्साहित करिए। इसमें स्वयं सेवी संगठन आपकी मदद करेंगे। हम इसके लिए एक-दो दिन की तनख्वाह देने के लिए तैयार हैं। भूखे और मरते हुए लोगों को बचाने के लिए हम अपनी एक या दो दिन दिन की तनख्वाह देने के लिए तैयार हैं और वह सबको देनी चाहिये । यह प्रस्ताव यहां पास हो जाएगा तो हम यह देने के लिए तैयार हैं। यह मुसीबत का दौर है। हम सरकार को हर तरह से सहयोग देने के लिए तैयार हैं और जनता को हर तरह की सुविधा देने के पक्षधर हैं।
आज देश की क्या हालत है? देश में भुखमरी फैल गई है। छोटा किसान घर में केवल दो-तीन महीने का खाने के लिए अन्न रखता है। छोटा किसान जानता है कि भादो के माह में मक्का, बाजरा आ जाएगा इसी आशा से शादी और कपड़ों आदि के लिए कर्जा लेता है लेकिन आज वह उसे चुकाने की स्थिति में नहीं है। मजदूर महीने-दो महीने का ही अन्न रखता है। आज वह भी भूख के कगार पर है। सभी जगह भुखमरी फैली है। इसलिए मेरा कहना है कि देश को अकालग्रस्त घोषित किया जाए। २० प्रतिशत या ५० प्रतिशत से फसल की हानि कम की बात कह कर बहाना बनाया जाता है लेकिन आज गांव के गांव की फसल खत्म हो गई हैं। क्या लोग यह दुआ करें कि ५० फीसदी से ज्यादा बरबाद हो जाए तब सूखाग्रस्त धोषित करके सुविधा मिलेगी। क्या यह व्यावहारिक बात है? क्या वह यही दुआ और प्रार्थना करें कि सब तरफ अकाल पड़े और पूरा गांव बरबाद हो तब सुविधा मिलेगी, नहीं तो सुविधा नहीं मिलेगी। गांववार, क्षेत्रवार क्या-क्या हो रहा है, इन सब की सूचना रहती है। जिला परिषद के अध्यक्ष इस बारे में सही सब कुछ बता देंगे। गांव का प्रधान सही बता देगा। लेखपाल, तहसीलदार क्या कर रहे हैं और ब्लाक में कितने लोग भूखे हैं, इन सब की सूचना आपको मिल जाएगी। दारोगा जानता है कि कितने डकैत, कितने कातिल और कितने शरारती तत्व हैं? उन्हें एक-एक बात पता रहती है। कृषि मंत्रीजी आप अपनी जिम्मेदारी से हट रहे हैं। हम लोग आपस में लड़ते हैं और एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं, सब को बेईमान बताते हैं लेकिन नौकरशाह मौज करते हैं। क्या हम सब बेईमान हैं? कुछ संस्थाओं की नजरों में वे ईमानदार हैं। आपके देश की सीबीआई ईमानदार, नौकरशाही ईमानदार लेकिन राजनीतिज्ञ सब बेईमान। अब जो बिल आ रहा है उसमें शरारती तत्व और अपराधी यदि चाहेंगे तो हम इलैक्शन लड़ नहीं पाएंगे। वे बलात्कार के आरोप लगा कर और दो रिपोट्र्स लिखवा देंगे। आप ऐसा ही कानून बनाने जा रहे हैं। इससे अपराधी बढ़ेंगे और वे राजनीति में आ जाएंगे। इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि इस लोक सभा में कितने अपराधी हैं? शायद दो-चार कहीं निकल आएं। बता दिया कि सारे के सारे राजनीतिक अपराधी है जो ठीक बात नहीं है। हमने पिछले उ. प्र. विधान के चुनाव में एक भी अपराधी को टिकट नहीं दिया और हमें इस बात का फख्र है। शायद दो-चार सीटें हार गए लेकिन हमने ऐसे किसी को भी टिकट नहीं दिया। गिल साहब यहां नहीं है। उन्होंने तारीफ की कि मुलायम सिंह जी ने इसका पालन किया और एक भी अपराधी को टिकट नहीं दिया। दिल्ली के बगल में ऐसे किसी व्यक्ति को टिकट दिया गया और मैं जानता था कि वह जीत जाएगा लेकिन टिकट नहीं। हमें कैसे लोगों से लगातार लड़ना पड़ता है मैं इस बात को नहीं दोहराऊंगा।
न जाने कैसे-कैसे लोगों को टिकट देकर हमारे खिलाफ लड़ाते हैं। कभी किसी भले आदमी को लड़ाकर देखें, तो मेरा सौभाग्य होगा। क्या हमारे खिलाफ कोई भारतीय जनता पार्टी को कोई भला आदमी नहीं मिला? सोमनाथ बाबू, क्या आप भी उनमें शामिल हैं? हम तो आन्दोलन करने वाले हैं।
श्री सोमनाथ चटर्जी (बोलपुर): आप हमें क्यों पकड़ते हो?
श्री मुलायम सिंह यादव : आपको सुधार रहे हैं, आप सुधर जाइये। सभापति महोदय, हम ऐरा-गैरा बातों मे फंसे हुये हैं। कुछ संस्थाओं की द्ृष्टि में हम सब बेईमान और अपराधी हैं, सरकार द्वारा हम राजनैतिक दलों के खिलाफ इस प्रकार का माहौल बनाया जा रहा है। इस वजह से हम लोग जनता में बदनाम हो रहे हैं। आप इस बात की व्यावहारिकता सोचिये। कोई अपराधी लोक सभा में नहीं आ सकता। जनता किसी अपराधी को जिताकर नहीं भेज सकती। मुझे विश्वास है कि कभी कोई अपराधी मेरे खिलाफ जीत नहीं पायेगा।
सभापति महोदय, बाढ़ और सूखे का बहुत गंभीर संकट है। जल स्तर नीचे जा रहा है। मैं दो बातें उत्तर प्रदेश के बारे में बताना चाहता हूं। माननीय प्रधान मंत्री के गृह क्षेत्र लखनऊ और हमारे गृह जनपद इटावा में जल स्तर २० से २१ प्रतिशत नीचे चला गया है। ये दोनों जिले सूखाग्रस्त घोषित होने से वंचित रह गये जबकि श्री अजित सिंह जी ने अपने लोकसभा क्षेत्र बागपत को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया। क्या उनकी इस जिम्मेदारी से इतिश्री हो गई? मेरी मांग है कि न केवल इन जिलों को बल्कि पूरे देश को अकालग्रस्त घोषित किया जाये।
श्री सोमनाथ चटर्जी : सरकार खुद अकालग्रस्त है।
श्री मुलायम सिंह यादव : सरकार अंदर ही अंदर षडयंत्रग्रस्त है। सभापति जी, माननीय प्रधान मंत्री जी ने वभिन्न नेताओं की दो साल पहले महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान में सूखे के गंभीर जल संकट पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। उस बैठक में सभी नेताओं ने एक स्वर में राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में ‘काम के बदले अनाज’ योजना को लागू करने के लिये राय दी थी और दूसरा सुझाव यह था कि इस योजना के अंतर्गत तालाबों की खुदाई की जाये । जब हम उत्तर प्रदेश में मुख्य मंत्री थे, उस समय हमने भी ऐसी योजना बनाई थी। मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि दो साल उस निर्णय को लिये हुये हो गये, उन सुझावों का क्या हुआ ? सरकार जवाब नहीं दे सकती कि उन दो योजनाओं का क्या हुआ। उन योजनाओं में बाधा क्यों पड़ी, क्या मजबूरी थी? श्री अजित सिंह जी, आप प्रधान मंत्री जी से पूछ लीजियेगा कि उन दो सुझावों पर किस कारण से पालन नहीं किया गया। लखनऊ और इटावा जिलों में जल स्तर २०-२१ प्रतिशत नीचे चला जाने के बावजूद सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया लेकिन अपने क्षेत्र बागपत को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया। क्या आप प्रधानमंत्री जी से पूछेंगे कि सूची में कौन-कौन से जिले आयेंगे? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा, जिन जिलों को प्रधानमंत्री जी ने सूखाग्रस्त करने को कहा वही जिले हमने घोषित कर दिये । पूरे के पूरे उत्तर प्रदेश में ९० प्रतिशत फसल नष्ट हो चुकी है। स्वयं कृषि मंत्री जी ने ६५ जिले स्वीकार किये हैं। यह कितना गलत है या कितना सही है, लेकिन मैंने अखबारो में उनका बयान पढ़ा है कि ६५ जिले भयानक सूखे में है।…( व्यवधान)प्रधान मंत्री जी से पूछिये।
श्री सोमनाथ चटर्जी : अभी उप-प्रधान मंत्री जी से पूछना होगा।
श्री मुलायम सिंह यादव : प्रधान मंत्री जी का एक बयान समाचार पत्रों में छपा है कि इस देश में नकलची बहुत होते हैं। बुरा मत मानिये। पंडित नेहरू ने कहा था कि छतों के ऊपर मिट्टी ले जाकर उस पर खेती करो। प्रधान मंत्री जी कहते हैं कि छतों पर पानी इकट्ठा करो। छतों पर बरसात का पानी इकट्ठा होता है…( व्यवधान)प्रधान मंत्री जी कहते हैं कि पानी इकट्ठा कीजिए। गंभीर मामला है, आप पानी इकट्ठा करेंगे। आप कृपा करेंगे, मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा, वैसे मैं बोलना तो बहुत चाहता था।
सभापति महोदय, केन्द्रीय सरकार ने देश में राष्ट्रीय स्तर पर कृषि फसल बीमा योजना लागू कर रखी है। आपने ठीक कहा, लेकिन यह केवल दिखावा भर है, सब प्रदेशों में लागू है, लेकिन पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के पास बीमे की प्रीमियम का भुगतान करने के लिए भी पैसा नहीं है। जितने प्रदेशों को मैनें बताया है, जो हमारी जानकारी में आये हैं, लेकिन उनके पास पैसा ही नहीं है। ये बातें आपने रखी हैं। यही हालत बिहार की है। कृषि मंत्री जी आपको यदि पता है तो उत्तर देते समय इस संबंध में बतायें। जल संकट के बारे में हम ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव श्री कोफी अन्नान ने कहा है कि अगला युद्ध पानी के लिए हो सकता है, इसकी आशंका अब बलवती हो चुकी है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भयानक सूखा है, पीने के पानी के लिये औरंगाबाद, मराठवाड़ा में इस बात का विवाद खड़ा हो रहा है। रोजाना कभी कावेरी के पानी का विवाद खड़ा होता है, मध्य प्रदेश व गुजरात में नर्मदा के पानी का विवाद खड़ा होता है। हम खुद भी यमुना के पानी को लेकर भुक्तभोगी है। यमुना के पानी को लेकर दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश यमुना जल बंटवारे के लिये लडते हैं। वहां के मुख्य मंत्री लड़ा करते थे और तब श्री विद्या चरण शुक्ल जी इसी यमुना के पानी को लेकर पंचायत करते थे। आज ये विवाद फिर खड़े हो रहे हैं। आप सावधान हो जाइये, जो संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने कहा था, उसकी आशाएं बलवती हो चुकी हैं। आज यह हालत है। जल प्रबंधन का इतना अभाव है।
हिमालय से निकलने वाली पांच ऩदियां जिस में सिन्धू नदी प्रमुख है इसके जल के बंटवारे के बारे में हम आपसे एक बात कहना चाहेंगे कि सिंधु नदी के जल के बंटवारे का एक समझौता १९५३ में पाकिस्तान के साथ हुआ है। वह हमारे हिंदुस्तान के हितों के खिलाफ हुआ है। मेरी मांग है कि भारत सरकार उस पर पुर्नविचार करें। कृषि मंत्री जी आप प्रधान मंत्री जी से बात करके उस पर पुनर्विचार कीजिए और पुनर्विचार करके हिंदुस्तान के हितों के खिलाफ जो समझौता हुआ है, उस पर पाकिस्तान के साथ बातचीत करके अपने हिस्से का पूरा पानी लीजिए जिससे पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में पानी और बिजली का संकट दूर हो सकता है। वह पानी पाकिस्तान हमारे हितों के खिलाफ ले रहा है। आपसे गलत समझौता हो गया था, हमने तब भी इसका विरोध किया था और आज भी कह रहे हैं कि बातचीत करके उस पर पुनर्विचार किया जाए। इससे चार राज्यों में बिजली और पानी की समस्या हल हो सकती है।
सभापति महोदय, जल पुरुष राजेन्द्र सिंह, जिसने राजस्थान के एक हिस्से को सूखे से बचाने और उसे हरा-भरा बनाने का काम किया है, उसे एक सफल प्रयोग के तौर पर सरकार को एक सबक लेना चाहिये…( व्यवधान)
श्रम मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अशोक प्रधान) : मैंने इंटरवीन किया है कि मेरे जिले में बुलंदशहर और गौतम बुद्धनगर भी सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : लेकिन श्री राजेन्द्र सिंह जब अलीगढ़ के एक सेमिनार भाषण देते समय वहां के जिला पंचायत अध्यक्ष ने उन्हें अपमानित किया, उन्हें रासुका के अंतर्गत जेल भेजा गया। कृषि मंत्री जी का बयान आपके थप्पड़ मारने से कौन सा देश का अहित हो गया, कौन सा देश विरोधी काम हो गया।…( व्यवधान)
कृषि मंत्री (श्री अजित सिंह) :पाकिस्तान और हिंदुस्तान में समझौता हो रहा है, कहां रासुका लग रहा है। आप सूखे पर बोलिये।....( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :सूखे पर ही बता रहा हूँ। राजेन्द्र सिंह ने सूखे का मुकाबला किया और आपने जाकर बयान दे दिया कि मारना क्या गलत है और थप्पड़ का पक्ष किया।
श्री अजित सिंह : नहीं किया।
श्री मुलायम सिंह यादव : क्या किसी जातिवाद से जल संकट दूर हो जाएगा?
श्री अजित सिंह : आप बेबुनियाद आरोप मत लगाइए मुलायम सिंह जी।
श्री मुलायम सिंह यादव : आरोप बिल्कुल सही है। आप क्या धमकी देते हैं मंत्री जी? यह पद का घमंड है क्या?
श्री अजित सिंह : आप धमकी दे रहे हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : हम धमकी नहीं दे रहे हैं। हम अपनी बात रख रहे हैं। हमने कहा कि कृषि मंत्री जी आपको इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए। अगर आप चुप रहते तो हम इतने में ही निकल जाते। इतना कहकर निकल जाते, हम बयान का भी ज़िक्र नहीं करते कि आपने क्या बयान दिया। अखबार उठाकर देखो कि आपने क्या बयान दिया है। …( व्यवधान)
श्री अजित सिंह : आप अपने अपराधियों की लिस्ट देखिए, हमें कोई बयान देखने की जरूरत नहीं है। ( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :गुस्सा है, घमंड है सत्ता का। इनको गुस्सा आता है तो ये मेरा नुकसान कर देंगे। मेरा गुस्सा इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता इतना अंतर है। आप सत्ता में हैं आप कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए हम कह रहे हैं कि थप्पड़ मारने से कहां से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो गया? राजेन्द्र सिंह जैसे बिजली जल पुरुष …( व्यवधान)जल पुरुष कह देना ही काफी है। कम से कम इतना ध्यान आपको रखना चाहिए।
महोदय, अनावृष्टि और जल पर्यावरण असंतुलन भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। बेरोक-टोक पेड़ कट रहे हैं और सरकार ने भी वृक्षारोपण की कई योजनाएं बनाई हैं। वृक्षारोपण के बाद केन्द्र सरकार सामाजिक वानिकी के लिए राज्यों को बहुत बडी धनराशि उपलब्ध कराती रही है लेकिन कहीं वृक्षारोपण नहीं हुआ और सारा का सारा पैसा बर्बाद गया। अगर उस पैसा का सदुपयोग हो गया होता तो आज हरा-भरा हिन्दुस्तान होता और आज जो संकट है, उससे हम बच सकते थे। इसको कृषि मंत्री जी देखें और उत्तर में बताएँ। गुस्से में तो आप उत्तर दे नहीं पाएंगे। मेरी मांग है किसानों से वसूली खत्म कर दी जाये। उनका ब्याज खत्म करो, चाहे किश्तों में खत्म करो। कर्ज़ा माफ करो। मैंने अपने उ. प्र. मुख्यमंत्रित्व काल में किसानों का कर्जा माफ किया था। १९९३ में उ. प्र. में जब मैं मुख्यमंत्री बना तो उस वक्त के कांग्रेस के प्रधान मंत्री ने बुनकरों के लिये घोषणा की थी कि २४ करोड़ रुपये हम केन्द्र सरकार से दे देंगे। हमने उत्तर प्रदेश सरकार से २४ करोड़ रुपये बुनकरों को दे दिये लेकिन दिल्ली की सरकार ने उ.प्र. का आज तक वह रुपया वापस नहीं किया और न उसका ब्याज अदा किया लेकिन आर्थिक विकास में या जनताके विकास में कोई बाधा नहीं आई। विकास पूरा हुआ और मुझे खुशी है कि उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति हमारे मुख्यमंत्रित्व काल में सबसे मज़बूत थी। यह मुश्किल काम नहीं है। कृषि मंत्रीजी आप गरीब किसान का कर्जा माफ क्यों नहीं कर रहे हैं? हम कहते हैं कि ये सारे सूबे जिनमें बार-बार संकट आता है तो आप उनको मार्क कीजिए और उनको अकालग्रस्त घोषित किया जाए और किसानों की ऋण वसूली बंद की जाए, बल्कि ऋण माफ किया जाए। पूरा माफ नहीं कर सकते तो आधा माफ कर दीजिए। ब्याज ही माफ कर दीजिए। एक कानून हमने बनाया था १९७७-७८ में जब मैं उ. प्र. में सहकारिता मंत्री था कि सहकारिता में मूलधन से दुगने से ज्यादा ब्याज नहीं वसूल किया जाएगा चाहे दस साल का कर्ज़ा हो या २० साल का कर्ज़ा हो। यह १९७७-७८ में किया था और तब चौधरी साहब खुश हो गए और जब मैं किसान के पक्ष में बोल रहा हूं तो चौधरी साहब के बेटे को गुस्सा आता है? बड़ा मुश्किल है। मैं कई बार बोल चुका हूँ कि कृषि मंत्री हमारे नेता का बेटा है इसलिए हम गुस्सा नहीं करते। …( व्यवधान)
श्री अजित सिंह : अभी पहले भी जाकर कह आए थे …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव :हमने कुछ नहीं किया था। आप मुझे जितनी गाली देते जाओ, उतने ही भाजपा के पिछलग्गू बने रहोगे। आज पिछलग्गू नहीं होते, वहां बैठे होते, हो सकता है वहाँ बैठे होते, उधर देखो। यह हो सकता था लेकिन आप तो कांग्रेसी संस्कृति पर जल्दी से जल्दी राजीव गांधी बन गए तुरंत। मुश्किल तो यह हो गई। …( व्यवधान)मेरे खिलाफ चुनाव लड गये इसलिए बैठ गए भाजपा के पिछलग्गू बनकर कृषि मंत्री बनकर,…( व्यवधान)
श्री अजित सिंह : अपने सूखे की बात मत करिए, देश के सूखे की बात करिए। आप सूखे में हैं उसकी बात मत करिए।
श्री मुलायम सिंह यादव: आप बोलें तब बता दीजिए। आपको बोलना है। आपसे उम्मीद ही नहीं है कि कुछ कर सकते हैं। इनको हैन्डपंप, नहर का पता नहीं रहता है इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि तात्कालिक उपाय करते हुए देश को अकालग्रस्त घोषित किया जाए, किसानों के ऋण माफ किए जाएं, उनके बच्चों के स्कूलों की फीस माफ की जाए। नहरों में, नालों में, बांधों में, तालाबों में पानी नहीं है। ये सब इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कितना भयंकर सूखा है।
महोदय, किसानों को आलू और गन्ने का भुगतान तत्काल कराएं। बैंकों द्वारा किसानों को दिए गए कर्जों की भी सरकार बाकायदा क्षतिपूर्ति करे और ब्याज भी माफ किया जाए। रिजर्व बैंक आफ इंडिया नहीं मानती, हम क्या करें, यह बहाना मत बनाईए। पशुओं के चारे व दवा और किसानों की दवा की व्यवस्था आपको करनी चाहिए। पानी के टैंकरों को रेलवे के माध्यम से जल्दी से जल्दी पहुंचाने के लिए रेल मंत्री से बैठक कर के कार्यक्रम तय कर के पानी पहुंचाइए। आप कह रहे हैं कि अनाज गोदामों में भरा पड़ा है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आपका अनाज जो गोदामों में भरा पड़ा बता रहे हैं, वह ४० प्रतिशत सड़ा हुआ है, उसे राज्य सरकारें खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं, उसे आदमी तो क्या जानवर भी सूंघकर चले जाते हैं, खाने की बात तो दूर रही।
श्री शरद यादव : सभापति जी, माननीय सदस्य जो कह रहे हैं वह आंशिक तौर पर सही हो सकता है। मैं मानता हूं कि एफ.सी.आई. की जो सप्लाई हो रही है उसमें इस प्रकार की थोड़ी बहुत शिकायत जरूर है, लेकिन यह जनरल नहीं है। मैं आपके माध्यम से यह निवेदन करना चाहता हूं कि अनाज के मामले में एक हिस्सा खराब है और जहां से उसकी शिकायत आती है, उसे तुरन्त दूर किया जाता है, लेकिन अधिकांश जगह ठीक अनाज जा रहा है। इसलिए माननीय सदस्य इसे जनरलाइज नहीं कर सकते हैं। जहां कहीं खराबी है, निश्चित रूप से उसको दूर किया जाएगा।
श्री मुलायम सिंह यादव : मंत्री जी से मैं प्रार्थना करूंगा कि वे भंडारणों में जाएं और वहां देखें यदि ४० फीसदी गेहूं सड़ा हुआ है कम हो, तो मुझे बताएं। फतेहाबाद, प्रतापगढ, इलाहाबाद आदि में जाकर आप देखिए।
राजीव गांधी, हालांकि अंग्रेजी में बोले, हो सकता है, वह लोगों की समझ में नहीं आया हो, लेकिन उन्होंने स्वयं इस बात को कहा कि एक रुपए में १६ पैसे ही जनता के पास पहुंचते हैं और ८४ पैसे बीच में ही खा लिए जाते हैं। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि जो आप यहां सदन में कह रहे हैं, वह आपने कह दिया, लेकिन आप मौके पर जाइए और वहां जाकर देखिए कि वास्तविकता क्या है और जैसा मैंने कहा है वैसा नहीं होगा, तो मैं अपने शब्दों को वापस ले लूंगा।
मैं आपसे निवेदन करूंगा कि हमारे देश में अंतरिक्ष विज्ञान के मामले में बहुत तरक्की हुई। इसके बावजूद हम मौसम विज्ञान के क्षेत्र में बहुत पीछे रह गए। मौसम विभाग की सारी भविष्यवाणियां गलत सिद्ध हो रही हैं, लेकिन इसमें मौसम विभाग के वैज्ञानिक दोषी नहीं है। हकीकत यह है कि उन्हें भविष्यवाणी करने के लिए जिस प्रकार के उन्नत और परिष्कृत यंत्रों की जरूरत है, जिन सुविधाओं की उन्हें जरूरत है, वे सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा रही हैं और दोष वैज्ञानिकों को दिया जा रहा है, यह ठीक नहीं है। सूखाग्रस्त राज्यों विशेषरूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा, दिल्ली,गुजरात, महाराष्ट्र, उडीसा को अकालग्रस्त घोषित किया जाये ।
सभापति महोदय, जल संसाधन विभाग, कृषि विभाग और बिजली विभाग, इन तीनों का संबंध सूखे से है और जब तक इन तीनों विभागों को अधिकार नहीं दिए जाएंगे, संसाधन नहीं दिए जाएंगे, तब तक कुछ नहीं हो सकता है। आज तीनों विभागों के पास कोई संसाधन नहीं हैं, कोई अधिकार नहीं हैं। हर कार्य के लिए वित्त मंत्रालय के पास जाना पड़ता है। भाषण देने की बात है, तो मंत्री लोग भाषण दे देते हैं। भाषणों से देश के गरीब किसानों को राहत नहीं पहुंचाई जा सकती और देश के सूखे से मुकाबला नहीं किया जा सकता है। जब तक इन तीनों के पास अधिकार नहीं होगा, जब तक इनके पास संसाधन नहीं होंगे, तब तक देश के गरीब किसानों का भला नहीं होगा।
इन्हीं शब्दों के साथ, मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
15.00 hrs. PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU (TENALI): Thank you, Mr. Chairman Sir, for having given me the opportunity to speak on this very important issue being debated in the House not once in a year but on two or three occasions. Almost every year it has become more or less a custom and ritual that is being performed at the misery of the nation and at the sufferings of the poor farmers.
These sad seasonal conditions, which have been prevailing across the country in several States and also leading to drought and flood situations, have been making the people miserable taking the lives of several people and also cattle, damaging the property, rendering several people homeless and reducing the people without having any employment opportunities. There are several cascading effects, not only on the agricultural side, not only on the employment generation side, including fodder, including drinking water and also on several issues.
It is with great concern and anguish that I speak on behalf of my party TDP to project some of the views as to whether we have been really concerned about this particular grave issue. I do not say that no effort has been put up by any Government; successive Governments have been trying to do their best. It is the concern of everybody. But still whether the steps that are being taken by Government are adequate or not, whether the Governments have been pulling out their strength in further augmenting the steps; and whether these are the long-term measures or short-term measures, is the real question.
For fourteen consecutive years, it has been said that there was a normal rainfall, though in several parts of the country there were several aberrations. The damage due to flood was there, the damage due to drought was there in several districts but by and large for about 14 years, we had a normal rainfall in this country. Meteorologists and Climatologists have predicted that the fifteenth year also will be a normal year and they have given the information to this nation and the people thought that normal rainfall will be there during this year i.e. the fifteenth year.
Now, what has happened? Quite contrary to the expectations and predictions, there is an unprecedented and unusual drought situation that is prevailing in the country. What had happened to the predictions in the meteorological stations? Are we to blame the scientists who have predicted this or are we to blame whether the country is inadequately equipped with the sophisticated machinery and equipment for doing these predictions? Now, it is a question of soul-searching proposition for the Government.
It is a heartrending problem for the people. So, we will have to make a thorough analysis. I can speak about how my State is suffering. I can also speak about how the people in different States are suffering due to drought. But a little amount of analysis into the past is required. It is only the experience out of the past century or two centuries which gives us the scope for future planning and future formulation of the policies.
Sir, it has been predicted that in 20 out of 36 meteorological sub-divisions, the rainfall recorded was deficient. Even among the remaining 16, in 10 meteorological sub-divisions, it has been recorded that rainfall is deficient when compared to the long-term average of the rainfall. It amounts that in 30 out of 36 meteorological sub-divisions, the rainfall was deficient.
Yesterday, the hon. Minister for Agriculture has taken stock of the situation and had a meeting of the Agriculture Ministers and Revenue Ministers of 14 States. He said that about 320 districts out of 524 districts are reeling under drought. It is the most unprecedented situation.
Sir, with everyday passes without rain, 10 more districts will be added to the drought situation. It looks as if that there will be no rain in the near future. Even semblance of raining is not there. If this type of dry spell continues for another 10 to 15 days, more than 90 per cent of the districts in the country will be drought stricken and the situation will be very alarming. So, drought is prevailing in 14 States in the country and several States are suffering with shortfall in rainfall. I have just collected some data. The deficiency is not to a small extent. West and East Rajasthan are suffering a lot now. The deficiency is – 63 per cent as on today. In Western UP it is – 68 per cent. In Haryana and Delhi, it is – 63 per cent. In Chhattisgarh it is –60 per cent. In Orissa, it is – 30 per cent. In Andhra Pradesh, it is – 39 per cent. In Pondicherry it is – 34 per cent. In Karnataka it is between –24 and – 42 per cent. In Kerala, it is – 32 per cent. So, this is the level of deficiency with regard to rainfall as on today when compared to same day of last year. This is the severity of the problem. As a result of which, almost several districts in each State are reeling under drought.
15.07 hrs. (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) In Madhya Pradesh, 21 districts out of 45 districts are under drought. In Haryana, normally, paddy to the extent of 6.67 lakh hectares is transplanted every year by this time but now the transplantation has not even gone beyond four lakh hectares. In Chhattisgarh, drought is prevailing in 16 districts. In Karantaka about five districts, in Himachal Pradesh, six out of 12 districts are under drought. In Tamil Nadu, eight delta districts are under drought.
Rajasthan is heavily reeling under drought and it is the worst sufferer. In Andhra Pradesh, out of 23 districts, 14 districts are reeling under severe drought. So this is the gravity of the situation. That is how, the drought is prevailing in various States. So, at this point of time, I would only like the Government to consider one particular thing. No Government can be blamed for this drought situation. It is a natural calamity. But when you just consider the various problems, there is a need for a scientific analysis of the past. In the absence of this type of analysis, no future can be planned.
What are the causes for the growing calamities? Have we ever checked with the earlier position? So you just analyse the drought situations and the natural calamities in the past 200 years. In the 19th century, how many natural calamities have taken place? In the 20th century, what was the position? If you just look into the data, it is really a very surprising.
During the 19th century, that is, between 1801 and 1900, there were 20 natural calamities of severe nature. It amounts to one in five years. During the 20th century, this number has increased to 26. So as the century passes on, as the decade passes on, severe calamities have also been increasing. So, when it was one in five years during the 19th century, it is one in four years in the 20th century.
Take for instance the past 25 years, the quarter century from 1975 to 2000, there were nine disasters, calamities in this country. It works out that there is a calamity of one in three years. So if you just analyse the data, the natural calamities have been increasing. The frequency is increasing in this country. There must have been some substantial reason why this drought situation is increasing from time to time. There are several scientists who have warned the global network about the causes. Several observations are there.
I quote from The Hindustan Times of 18th May, 2002:
" None of the findings suggest—as some climatologists would have us believed—that the unseasonal rain and shine the planet has been experiencing lately has anything to do with normal fluctuations in the atmospheric systems. On the contrary, they turn out to be only a precursor to the kind of climate changes that can be expected from the global warming fuelled by the build up of CO2 and other greenhouse gases in the atmosphere. The world was warmer in the first three months of this year than at any time in the past 1,000 years…"
When compared to the past 1,000 years, the warmth in the globe during the past three months was very high.
There must have been some substantial reason for that. That is why, besides going into the short-term measures that any Government would take, why should we not have a thorough scientific analysis as to what exactly are the reasons why droughts are increasing from time to time and why the temperature is increasing from time to time?
In my own State, this year, the highest temperature recorded was 51 degrees Celsius. Never in the past has the temperature gone up to 51 degree Celsius. Here is a warning that at this rate global temperatures would be increasing by as much as four degree Celsius by 2080. By 2080, in our country too, there would be an increase of four degree Celsius. So, in my State, if it were 51 degree Celsius this year, after some seventy to eighty years, if, it would increase by four degrees to 55 degree Celsius, no living creature would be able to survive. That is the gravity of the situation. It depends on how much carbon dioxide is released in the atmosphere.
The urgency of the situation is easier to gauge than the consequences, which would be much more than mere mega-storms and droughts. One shudders to recall how in 1994, a long monsoon in north India, followed by scorching temperatures drove all the rats into the cities. This caused an outbreak of pneumonic plague in Surat, killing scores and costing dearly to this country; 90 long days of dry spell costed so much. These are some of the issues here. So, why should we not have a thorough scientific analysis of the past and build plans for the future?
It has been warned that it is time for a planetary health check up, which would examine the impact of the changes in environment like loss of bio-diversity, indiscriminate use of fertilisers and pesticides, consistent pollution of water bodies, etc. and imbalance in ecological systems. All the major environmental concerns have got a contribution to the present state of affairs. That is where we would have to make a thorough analysis of these issues. Between 23rd of October and 1st of November this year, India is going to host a major international conference called, "The Conference of Parties to the United Nations’ Framework Convention on Climatic Change". We are told that we are going to host an international conference on climatic changes and about 5,000 delegates are expected to attend this conference.
Before we host the conference, what is the thorough analysis that we are going to make? Being the host country, what is the type of scientific analysis that we are going to have to make a presentation in such a high level conference on climatological issues. If there were any analysis, we would be happy if this House could be taken into confidence. If they share with us the issues, we would be happy. We would get educated as to how this planet is behaving and as to how this country is going to suffer. We would be happy if the hon. Minister of Agriculture would get the information from the hon. Minister of Environment and Forests, who would be normally doing this job, and disseminate this information among all those concerned, whether it is the farming community or any other community.
As such, natural calamities play a very vital role. Instead of just discussing every year on this issue and just asking for some short-term measures, which are inevitable to mitigate the situation at that point of time, a long-term policy on this issue is much more useful and meaningful, particularly during this age of 21st century where globally we talk about the technological revolution. If we express our inability to predict and educate the masses it will be really disastrous.
I remember to have seen one item in the media recently that Governments cannot come to the rescue of these victims and it is only the God who can come to the rescue of these victims. If this type of helplessness is expressed by the Governments, we will be shattering the very confidence of the people, leave aside the succour that you are going to provide. The very confidence is now being shattered when we say that the Governments cannot come to the rescue of the people, but it is only God who can come to the rescue of the people.
Somehow, very alarming situations are prevailing. I will come to the recommendations of the Eleventh Finance Commission. I am not going into the details of the Ninth Finance Commission and Tenth Finance Commission. Every Finance Commission is adding one type of relief fund. When the Ninth Finance Commission came, it gave the Calamity Relief Fund; the Tenth Finance Commission has provided for National Fund for Calamity Relief; and the Eleventh Finance Commission has abolished it and then said let there be a National Calamity-cum-Contingency Fund. Whatever the fund might be, the people are not bothered. You may call it with whatever name you want. But it is the relief that the Governments are providing which matters whether it is at 3:1 ratio between Central Government and the State Government or any other thing. It is ultimately that at a right time right size of relief is being expected by the people.
The Eleventh Finance Commission has recommended for creation of a National Centre for Disaster Management on a permanent basis to monitor the natural calamities. I do not know whether it has been created or not. I have to get the information on it. I do not know whether it has started functioning or not. If it has started functioning, what are the findings of this Committee which has been created on a permanent basis? I want to know whether any analysis is being made or being attempted by this Committee or not, as I said, to go into the past and to see how it is to be analysed. What is the analysis that this particular Committee has made?
Several teams have been sent when there is a drought, on the invitation of the State Government. Drought relief assessment team is sent and ministerial team is sent when there is a demand. The Ministers will be going. There is an inter-ministerial group constituted under the chairmanship of the hon. Minister of Agriculture. But why should we wait till such time that there is an invitation from the State Government? When we are convinced that in about 14 States severe drought situation is prevailing, that too at a very alarming rate, why should we not constitute teams right now and send them to different States? Why should we not get the information periodically? Why should we always say that it is only the prerogative of the State Governments as far as the relief measures are concerned and that the relief and rehabilitation are the headaches of the State Governments?
MR. CHAIRMAN : Shri Venkateswarlu, please be brief.
PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU : Sir, I will take just five more minutes. I am only trying to convince as to how we should have a scientific analysis of these issues. I am not wasting any time nor it is my intention to waste the time of this House.
Here, several teams are being constituted. By the time, the relief is actually handed over, how much time is being taken on an average? When there is a drought, it takes a minimum of three to four months by the time all this process is over and then, relief is provided to them. When there is a flood, the same thing happens. By the time the flood assessment team goes to different States, drought will be prevailing there. What is that anybody can see. This is the situation and on several occasions, scientists and study groups nationwide have also suggested that this is one of the very important issues.
Earlier, in the same House when Shri Nitish Kumar was the Minister of Agriculture, he made a commitment on this particular issue that "flood-prone zoning programme" would be undertaken by the Union Government. The entire country is to be covered with this flood-prone zoning programme. What is the progress of it? Has any attempt been made?
THE MINISTER OF WATER RESOURCES (SHRI ARJUN SETHI): Have all the States agreed?
PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU : Why not? Is there any discussion with different State Governments, he may kindly put it up to this House. Let us also know if the States are not agreeable. Let us know which States have rejected this proposal. There should be some attempt. This flood-prone zoning programme has not been taken up so far. This is the reason why flood situation is getting from bad to worst.
Secondly, the NCCF, National Calamity and Contingency Fund has been started on the recommendations of the Eleventh Finance Commission, with Rs. 500 crore, which is really a meagre amount looking at the size of this country and also the size of natural calamities which we have been facing. It has been said that it will be further improved by collecting cess from difference sources. What is the surcharge that has been levied on the cess to enhance this Fund? When there were natural calamities in Orissa and Gujarat and when there was an appeal from the Government, the hon. Prime Minister and Members of Parliament also have contributed from their funds under MPLADS at the rate of Rs. 10 lakh on each occasion. We did not mind.
SHRI ARJUN SETHI: Not all have contributed.
PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU : At least, many Members have contributed. If he wants to give the figures, he may kindly provide the figures and once again make an appeal. … (Interruptions) If there is an appeal, kindly come forward.
Sir, my suggestion in this regard is that instead of giving Rs. 10 lakh on certain occasions, since the natural calamities have become a regular feature every year in almost all the States, why not on a permanent basis, that every year Rs. 10 lakh is contributed by all the Members? After all, out of Rs. 2 crore, Rs. 10 lakh contribution to the people, who are living under misery, is not a big amount. The Chairman of Committee on MPLADS, Shri B.B. Ramaiah is here with me. Why should not every year, on a permanent basis, Rs. 10 lakh be contributed? … (Interruptions) I think, the Prime Minister is already considering increasing this amount. So, every year, there will be Rs. 80 crore contributed by the Members.
On an earlier occasion, the Government had expressed the desire to bring about a model "Disaster Management Act". I would like to know whether they have brought out that Act and what happened to the recommendations of Pant Committee. These are some of the issues that are to be looked into.
Coming to my own State, I would say that Andhra Pradesh is reeling under drought situation consecutively for the past 5 years.
Sir, when Shri Devegowda was speaking, he mentioned that there is a discrimination being shown by the Government of India; certain States have been given more foodgrains under the ‘Food for Work’ Programme, and certain States have not been given the foodgrains to the same extent. Last year, 22 districts out of 23 districts were reeling under severe drought in Andhra Pradesh. We requested for a relief of Rs. 1,150 crore. That relief was not given, but the Government of India came forward and said that instead of cash relief, they would give foodgrains. We have taken that. Instead of cash relief, the Government of Andhra Pradesh had taken 31.5 lakh tonnes of rice. It is a record quantity, but these foodgrains were utilised for creation of assets, for generating employment -- about 35 crore mandays were created for those who were denied of their employment opportunities -- and nearly 5.8 lakh assets were created. It was mainly utilised for desilting of the tanks, for improving the water holding capacity. The disiltation process has been taken up State-wide.
This year, the present situation is such that from the third week of June till today, there is no rain, and a severe drought spell is going on. This has resulted in the reduction of the cropped area. There is a large-scale unemployment, particularly in the agriculture sector, coupled with scarcity of drinking water and fodder to the cattle. Out of 1126 mandals, 929 mandals in my State of Andhra Pradesh are affected by drought. In most of the reservoirs, the water-level has gone down and there is a shortfall. The water level in Singur has gone down from 1717.85 feet to 1706 feet. In Nizamsagar, the normal water-level in the reservoir is 1405 feet, and it has gone down to 1370 feet. In Sriramsagar, from 1091 feet, it has gone down to 1069 feet. In Tungabadra, from 1633 feet, it has gone down to 1602 feet. In Jurala, from 1045 feet, it has gone down to 1034 feet. In Srisailam, from 855 feet, it has gone down to 783 feet. In Nagarjunasagar, from 590 feet, it has gone down to 503 feet. In Somasila, from 330 feet, it has gone down to 275 feet. In Kandaleru, from 278 feet, it has gone down to 205 feet. We have got nine reservoirs in the State. In all the nine reservoirs, there is a shortfall in the total holding capacity.
Sir, the total cropped area is 81.80 lakh hectares. Out of this, only in 22.07 lakh hectares, the plantation has taken place. That means, only 26 per cent of the total area has been sown or planted. Even in this, in 50 per cent of the area, the crops have dried up. It is a very alarming situation. In a State like Andhra Pradesh, which is said to be the granary of the country, like Punjab and Haryana, a miserable state of affairs is prevailing. So far as coarse grains are concerned, 9.25 lakh hectares are the normal cropped area, but today only 5.21 lakh hectares are being sown. The total cropped area for pulses is 8.66 lakh hectares, but today only 4.43 lakh hectares is being sown. In case of oilseeds, the production has gone down tremendously. Out of 21.55 lakh hectares, only 4.25 lakh hectares are being sown for oilseed production. The total dry crop area is normally 52.54 lakh hectares, but now only 30 per cent or 17.89 lakh hectares are sown. As such, the cropped area itself has gone down and this is a very sad situation.
Lastly, the drinking water supply is also in a very precarious condition.
Now, we are in a situation where we are transporting drinking water on vehicles to most of the villages in our State. How long could a State Government or any individual be in a position to supply drinking water to villages on trucks?
Sir, fodder and seeds are in scarce and there is also need of employment generation. This year, our Government has requested for a relief worth Rs. 960 crore to meet the present situation. Out of this amount, the agricultural sector would require Rs. 550 crore; for drinking water supply, both rural and urban, a sum of Rs. 350 crore would be required; for fodder and seeds etc., a sum of Rs. 60.9 crore would be required and there would also be a requirement of ten million tonnes of rice.
Sir, in conclusion what I would like to impress upon this august House is that the situation, as prevailing, is very bad. The crop insurance scheme in most States is not in operation. Since there has to be a matching share of both the Centre and the States, this scheme is in a very bad shape. It has been proposed by Shri Deve Gowda and Shri Mulayam Singh that loans to farmers should be waived. If most of the States are in the grip of a drought consecutively for four to five years, then how could the farmers be in a position to pay off their loans? The percentage of NPA in the agriculture sector is negligible in comparison to the total NPA of all the sectors taken together. Therefore, several factors need to be taken into consideration for providing relief. What is being provided now by the Union Government is not even five per cent of the total demand made.
Sir, in the year 1996-97 demand was made by AP State for a sum of Rs. 896 crore but only a sum of Rs. 142 crore was given. In the year 1997-98 demand was made for a sum of Rs. 1159 crore, but only a sum of Rs. 42 crore was given. In the year 1998-99, a demand was made for a sum of Rs. 600 crore but only a sum of Rs. 265 crore was given by the Union Government. So, in all these three years not even five per cent of the total demand made by A.P. Government was given by the Union Government. The Government has to think about providing long-term relief to the States in order to relieve the people of their miseries arising out of such a situation.
श्री सुबोध मोहिते (रामटेक): माननीय सभापति महोदय, आज हम इस सदन में पूरे देश में आए गंभीर संकट पर चर्चा कर रहे हैं।
महोदय, भारत देश की जो परंपरा है, इस देश का जो इतिहास है, इस देश के इतिहास में किसानों को ऐसा स्थान दिया गया है और किसानों को केन्द्रबिन्दु मानकर, जैसे किसान हमारे लिए सब कुछ है, ऐसा सोचकर हमने कई कहावतें इस देश में बनाई हैं। मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि मेरा भारत महान। लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था - जय जवान, जय किसान। उसके बाद एक नारा आया कि किसान बचेगा तो देश बचेगा। मुझे लगता है कि यह नारा हम गलत दे गए। देश बच गया लेकिन किसान मर गया। जो भी किसानों का नेता होता है, वह बड़ा भाषण देता है और एक वाक्य जरूर बोलता है, वहां का मुख्य मंत्री भी बोलता है कि हमारा भारत देश के किसानों का देश है। यह वाक्य जरूर भाषण में आएगा। मैं समझता था कि यह देश किसानों का देश है, यह जो हमारा वाक्य है, यह वाक्य गलत है। यह देश किसानों का देश था।
महोदय, यदि आज की सूचना का एनैलेसिस कर के देखिए, तो मुझे ऐसा लगता है कि यह वाकई असत्य है। यह देश किसानों का देश इसलिए नहीं है क्योंकि डेढ़ सौ साल पहले जब अंग्रेज आए थे, तब यह देश किसानों का देश था। उस समय देश को सोने की चड़िया कहा जाता था। विश्व में भारत की मिट्टी सबसे उपजाऊ थी। इस देश का पानी नियमित बारिश होने से दुनियां का सबसे अच्छा पानी था। इस देश में यूरोपियन कंट्रीज के मुकाबले सबसे अच्छे चारों मौसम होते थे और उनमें नियमितता थी। जैसे यूरेपियन कंट्रीज में यदि आज सूरज निकला है, तो कल निकलेगा, यह निश्चित नहीं था, लेकिन भारत में यदि आज सूरज निकला है, तो कल भी निकलेगा और परसों भी निकलेगा, यह लगभग निश्चित होता था क्योंकि जब से पृथ्वी का जन्म हुआ है तब से निरन्तर सूरज निकल रहा है। इसलिए इस देश का किसान उस समय सुखी और समृद्ध था।
अध्यक्ष महोदय, हमारे देश के किसान की दुर्दशा कब से हुई और कौन कर रहा है, यदि इसको देखें तो आपको पुराना इतिहास पढ़ना होगा। मैंने पिछले डेढ़ सौ साल के इतिहास को धीरे-धीरे पढ़ने की कोशिश की है, एक-एक कानून का अध्ययन करने की कोशिश की है। जब इस देश में अंग्रेज अए, तो उन्होंने देखा कि यहां का किसान बहुत मजबूत है। उसने सोचा कि यहां के किसान को कमजोर कैसे किया जाए। इसके लिए उसने लगान का कानून बनाया। लगान नाम से एक पिक्चर भी आ चुकी है। १७६० में अंग्रेजों ने लगान का कानून बनाया और उसके अनुसार यह लागू किया गया कि इस देश के किसान अपने खेतों में जो भी उगाएंगे उसका ५० प्रतिशत हिस्सा लगान के रूप में सरकार को देना पड़ेगा। अगर को किसान ५० प्रतिशत लगान नहीं देता है, तो उस गुलाम किसान का मकान जब्त कर लिया जाता था, पशु एवं अन्य संपत्ति जब्त कर ली जाती थी। इतना ही नहीं यदि कोई आन्दोलन करता था तो उसे गोली भी मार दी जाती थी।
अध्यक्ष महोदय, इसके बाद लैंड एक्वीजीशन एक्ट १०३ साल पहले अंग्रेजों ने किसानों को बर्बाद करने की द्ृष्टि से लागू किया। यह सत्य है कि लैंड एक्वीजीशन एक्ट उस समय इसलिए लाया गया था क्योंकि इस देश के हजारों किसान अपनी जमीन को अपनी मां समझते थे और उसे बेचना अपनी मां को बेचना समझते थे। इसलिए जमीन को नहीं बेचते थे। देश की मिट्टी और किसानों के बीच प्यार का गहरा रिश्ता था। कोई भी किसान अपनी लैंड को बेचना नहीं चाहता था। इसलिए अंग्रेजों ने लैंड एक्वीजनशन एक्ट लाया कि जब-जब गवर्नमेंट को जरूरत पड़ेगी तब-तब इस एक्ट के तहत किसानों की जमीन सरकार ले लेगी। इस प्रकार से पहले लगान का और फिर लैंड एक्वीजीशन एक्ट लाए गए। इनके बाद इंडियन फारेस्ट एक्ट आया। आज सबेरे ही एक माननीय सदस्य कह रहे थे कि इंडियन फारेस्ट एक्ट के कारण उनके यहां की एक परियोजना २० सालों से पूरी नहीं हो पाई। इस प्रकार से १७६० और १८७० के वे कायदे कानून आज भी हमारे संविधान के अनुसार हम इम्पलीमेंट कर रहे हैं। फिर भी हम बोलते हैं कि यह देश कृषि प्रधान देश है।
महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि यह देश अब कृषि प्रधान देश नहीं रहा। यह देश कृषि प्रधान देश तब था जब अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी यहां आई। उस समय केवल एक ईस्ट इंडिया कम्पनी थी, लेकिन आज कम से कम ४००० मल्टी नैशनल कंपनियां इस देश में काम कर रही हैं। तब हम कैसे मानें कि यह देश कृषि प्रधान देश है। गुलामी के समय एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी और आजादी के बाद अब देश में ४००० कंपनियां हैं। किसान कहां जाएगा और हम कैसे कहेंगे कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है।
महोदय, हमारे देश में ऐसे-ऐसे स्कैम हुए जो दुनिया के किसी देश में नहीं हुए। यदि मैं उन स्कैमों के बारे में बोलना शुरू करूं, तो यह मूल विषय से हटने वाली बात हो जाएगी, लेकिन यह बात सही है कि रिश्वत लेकर देश बेचा जा रहा है। विश्व का सबसे बड़ा शेयर घोटाला यदि कहीं हुआ है, तो वह भारत है। विश्व में टैलीकाम का अगर सबसे बड़ा घोटाला कहीं हुआ है, तो वह हिन्दुस्तान है। किसानों का यूरिया घोटाला यदि विश्व में सबसे पड़ा कहीं हुआ है, तो वह हिन्दुस्तान है। इतना ही नहीं विश्व का चारा घोटाला भी यदि कहीं हुआ है तो वह हिन्दुस्तान में ही हुआ है। किसानों का क्या हमने तो जानवरों का भी हक छीन लिया है ।किसानों की बात करना तो दूर रहा, जब हम जानवरों का चारा भी छीन सकते हैं तो फिर किसानों का हक रखने और किसानों की बात करने का हमारा मोरल राइट क्या है ?इसलिए मैं समझता हूं कि इस चर्चा से कोई हल नहीं निकलने वाला है।
अब डब्ल्यू.टी.ओ. का एग्रीमौंट है। वल्र्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन का हमारा कमिटमैंट है और उससे हम दबे हुए हैं। मैं बताना चाहता हूं कि इस ब्रॉड कंडीशन में, मंत्री जी डब्ल्यू.टी.ओ. को रिव्यू करके यह कम्प्लशन निकालें। अगर कंडीशन में एग्रीक्लचर प्रोडेक्शन में कम्पलशन आ गया तो मुझे लगता है कि हमारे लिए बहुत कठिन हो जायेगा। किसान की हालत बहुत बुरी हो गई है। वह सरकार से पूछ रहे हैं कि मैं इस देश का किसान हूं। आप मुझे महत्व देते हैं लेकिन मैं जीऊं या मरूं, यह सवाल हमसे किसान कर रहा है। उसका जवाब देने का उत्तरदायित्व माननीय सदस्यों पर है जो यहां बैठे हैं। देश का किसान उनसे एक ही सवाल कर रहा है कि आप हमारे पब्लिक रिप्रैजेंटेटिव हैं, मैं जीऊं या मरूं, इसका फैसला तुम रिप्रैजेंटेटिव को ही करना है। मुझे लगता है कि इस बात का जवाब देने के लिए ही यह बैठक बुलाई गई है।
मैं आपका ध्यान २१ जुलाई की " इकानोमिक टाइम्स" की ओर दिलाना चाहता हूं। उसमें सीधा-सीधा बताया गया है कि हिन्दुस्तान के मौसम विभाग के हिसाब से ३६ डिवीजन्स हैं जिनमें से २० डिवीजन में डेफीशियेंट रेनफॉल हुआ है। इसका मतलब यह है कि जितना होना चाहिए था, उससे कम हुआ है। १० जगह नार्मल हुआ है यानी वह भी सरप्लस से कम हुआ है। और छ: जगह एक्सेस हुआ है। इसका मतलब यह है कि ३६ में से २६ जगह रेनफॉल एवरेज नहीं हुआ। इसका मतलब इस देश में ६० परसेंट सूखा है, ५० परसेंट से ज्यादा सूखा है। मैं समझ सकता हूं कि ६० परसेंट सूखा इस देश में हो, जो कि सरकारी फिगर बता रही है, उस देश के किसान की हालत क्या होगी ? कितनी भयावह स्थिति इस देश के किसान पर आई होगी?
यह बड़े मजे की बात है कि अक्टूबर महीना जब आता है तब दूसरे बुधवार को हम " इंटरनैशनल डे फॉर डिजास्टर रिडक्शन " मनाते हैं। …( व्यवधान)अभी तीन मिनट ही हुए हैं।
सभापति महोदय : आपको बोलते हुए आठ मिनट हो गये हैं।
...( व्यवधान)
सभापति महोदय : लिस्ट में जो टाइम ऐलाटिड है, माननीय सदस्य को उसी के हिसाब से बुलाया जा रहा है। इसमें किसी माननीय सदस्य को संशय नहीं होना चाहिए। सभी पार्टियों का टाइम एलाटिड है, उसी के अनुसार सबको टाइम मिल रहा है।
...( व्यवधान)
श्री सुबोध मोहिते : इंटरनैशनल डे फॉर डिजास्टर रिडक्शन पर हम प्रतीज्ञा करते हैं कि दो अक्टूबर को, सरकार चाहे कोई भी हो, आने वाली नेचुरल कैलामिटी को हम पूरी तरह से रोक पायेंगे। यह प्रतीज्ञा हर साल अक्टूबर महीने में हम करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि यह प्रतीज्ञा पेपर पर रही है क्योंकि आज हम सिचुएशन देख रहे हैं कि ड्राउट डिकलाइंड सिचुएशन में है, प्रैक्टिकल में नहीं है। सूखे की समस्या जानी मानी समस्या है। ऐसा नहीं कि यह समस्या अभी आ गयी। यह तो हर साल आने वाली है। इसकी भयानकता क्या है, यह सबको मालूम है। इसमें कौन बर्बाद होता है? इससे सबसे ज्यादा परेशान किसान होता है, यह सबको मालूम है। यह मालूम होते हुए भी हमें हर साल पार्लियामैंट में ड्राउट पर डिसक्शन करने के लिए आना पड़ता है।
मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जब हमें मालूम है कि सूखे की समस्या आने वाली है, तो उस समस्या पर हम कैसे काबू पा सकेंगे, जो ड्राउट अफैक्टिड किसान हैं जिन्होंने आत्महत्या की है, उनके लिए श्रद्धांजलि दे सकेंगे, ऐसा मैं समझता हूं। मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा। मैं केवल एक वैलिड प्वाइंट बताना चाहूंगा जिसके बारे में श्री वेंकेटश्वरुलू जी ने कहा है ग्लोबल वार्मिंग का डाटा उन्होंने कोट किया है। मैं माननीय मंत्री जी से विनती करूंगा कि वह प्वाइंट सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होने बताया है कि २०१८ में ग्लोबल वार्मिंग के हिसाब से इस देश के तापमान ४ डिग्री सेन्टीग्रेट तक जायेगा। मतलब ५४ डिग्री सैंटीग्रेड हो जाएगा। आप जानते हैं कि एक डिग्री सैंटीग्रेड कितना होता है। मैं सूखे को नैचुरल कैलेमिटी नहीं मानता क्योंकि मैं बहुत ऐनालटिकल आदमी हूं। यह नैचुरल आपदा नहीं है, यह हमारे द्वारा बनाई हुई आपदा है क्योंकि मेरे ख्याल से सूखा एक रीज़न से आता है और वह ग्लोबल वार्मिंग है। तीनों रीज़न्स हमारे हाथ में हैं जिसमें से ठीक है, ग्लोबल वार्मिंग हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन मौसम विभाग का जो इनऐडीक्वेट प्रैडिक्शन है, जैसे एक माननीय सदस्य ने बताया, जब मौसम विभाग बताता है कि अभी बारिश आने वाली है तब दस दिन बाद बारिश आती है, जब वह बताता है कि सनशाइन होने वाला है तो बारिश आ जाती है। केन्द्र सरकार हजार-करोड़ो रुपये हर साल वाटर हारवैस्िंटग पर खर्च करती है लेकिन किसानों को किसी प्रकार का रिलीफ नहीं दे पा रही है। आज भी मुम्बई में देखिए, समुद्र में पूरा पानी है लेकिन किसानों को पीने और खेती के लिए पानी नहीं दे सकते।
मंत्री जी ने कल एक मीटिंग ली। मैं उनको ऐमबैरेस नहीं करना चाहता, मेरी हैसियत नहीं है कि मैं उनको कुछ बोलूं। मैंने अखबारों में पढ़ा कि मंत्री जी ने १०-११ राज्यों की मीटिंग ली जिसमें उन्होंने तीन ऐश्योरैंसेज़ दिए - पहला ऐश्योरैंस है कि इंश्योरैंस की डेट बढ़ाई जाएगी, दूसरा, कर्जे की डेट बढ़ाई जाएगी और तीसरा, कुछ सबसिडी दी है। मैं समझता हूं कि यह कोई रिलीफ नहीं है। किसानों के लिए कर्जे की जो डेट बढ़ाई गई, उसे रिलीफ नहीं कह सकते क्योंकि कर्जा तो उन्हें देना ही है। मुझे ऐसा लगता है कि आधा ड्राउट खत्म हो गया, पूरी जुलाई खत्म होने वाली है, २४ जुलाई को मीटिंग करना, मुझे लगता है कि हम बहुत लेट हो गए हैं। आधी बारिश होने के बाद हम मीटिंग ले रहे हैं, मुझे लगता है कि प्रौब्लम बॉटम में है और हम इलाज टॉप में कर रहे हैं। सूखे की स्थिति गांव में है और हम मीटिंग दिल्ली में कर रहे हैं, चीफ सैक्रेटरी और मुख्य मंत्री यहां आ रहे हैं। मंत्री महोदय से मेरी प्रार्थना है कि टॉप से बॉटम जाने की बजाए बॉटम से टॉप में जाइए। मुझे लगता है कि मीटिंग की कोई जरूरत नहीं है। मैंने पहले कहा, जब आपको पता है कि ड्राउट आने वाला है तब स्टैंडर्ड पैकेज क्यों नहीं बनाते। ठीक है, आज हम ड्राउट के बारे में यहां डिस्कशन कर रहे हैं लेकिन अगले साल आने वाले ड्राउट की डिग्री क्या होगी, टाइप क्या होगा।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : अब आप कनक्लूड कीजिए।
श्री सुबोध मोहिते : मैं कनक्लूड कर रहा हूं।
मीटिंग करने के बजाए ड्राउट के ज़ीरो डेट से इम्प्लीमैंटेशन का स्टैंडर््ड पैकेज बनाया जाए ताकि आने वाले सालों में मीटिंग लेने की जरूरत नहीं पड़े। यह मेरे आज के भाषण की थीम है।
मैं रामटेक संसदीय क्षेत्र से आता हूं। मैं बताना चाहूंगा कि मेरा सबसे बैकवर्ड क्षेत्र है। मैं राज्य की बात नहीं कर रहा हूं लेकिन मेरे एक ही क्षेत्र में ९०० करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। संतरे की क्रॉप जिसे कैश क्रॉप कहते हैं, ९० लाख पेड़ों का नुकसान हुआ है। श्री मुत्तेमवार मेरे पड़ोसी हैं, ये जानते हैं कि एक कौन्सटीटूऐंसी में ९०० करोड़ का नुकसान, पेपर बता रहा है। वहां कोई भी ई.जी.एस. का काम नहीं चल रहा है। पीने के लिए पानी नहीं है लेकिन पीने के लिए शराब जरूर मिल रही है। विदर्भ को बैकवर्ड एरिया बोलते हैं, वहां का पैसा तक डायवर्ट किया गया है। सरकार के पास समय नहीं है। मुझे माफ कीजिए, मैं आपके सामने सच्चाई रख रहा हूं। जब सूखा पड़ रहा था तब हमारी सरकार मनिस्ट्री के एक्सपैंशन में लगी हुई थी। जहां ड्राउट की चर्चा होनी चाहिए थी वहां इंदौर और बंगलौर में एम.एल.एज. की मीटिंग चल रही थी। अगर यह सिचुएशन रही तो मुझे लगता है कि किसान किसकी तरफ देखे। जो मंत्री कैबिनेट में हैं, मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहता, वही बोल रहे हैं कि पैसा मिलना चाहिए।Why? You are the decision-maker and you have to take the decision.पब्लिक को बोल रहे हैं कि पैसा मिलना चाहिए।You are the decision-maker and you are the supreme authority. यह बोलने के बाद पब्लिक को जो गुमराह किया जा रहा है, मेरे ख्याल से इसका पर्दाफाश होना चाहिए। मैं मंत्री महोदय को सूचना देना चाहता हूं, मेरी और मुत्तेमवार जी की कौन्सटीटूऐंसी में आज तक ड्राउट के लिए किसी प्रकार का सर्वे नहीं किया गया। मैंने आज ही कलैक्टर से बात की है।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : अभी ५५ माननीय सदस्य बोलने वाले हैं। सब अपने-अपने दलों के आवंटित समय में बोलें।…( व्यवधान)
श्री सुबोध मोहिते :पश्चिम महाराष्ट्र के कुछ लोगों ने बताया है कि संतरे की झाड़ को मुआवजा नहीं देंगे।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : मोहिते जी, बोलने वालों की लम्बी सूची है, सभी माननीय सदस्यों को अवसर मिलना चाहिए। यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है।
श्री सुबोध मोहिते : इसलिए माननीय मंत्री जी को वहां जाना चाहिए और मेरी लास्ट रिक्वैस्ट है कि सैण्ट्रल गवर्नमेंट को इण्टरवीन करके डायरैक्ट रिलीफ किसानों को दी जाये, इस विनती के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं।
श्री राम सजीवन (बांदा): अधिष्ठाता महोदय, हमारे देश में भयंकर सूखा पड़ा हुआ है। देश के अधिकांश भाग सूखे की चपेट में हैं और सूखे की समस्या पर आज हमारी यह चर्चा चल रही है। मुझे तो विगत ३५ वर्षों तक इस तरह विधान सभा से लेकर लोक सभा तक में सूखे की समस्या पर कई-कई बार चर्चा सुनने का अवसर मिला है।
यह चर्चा होती है, बड़ी गम्भीरता से होती है, सारे लोग एकमत होकर सूखे का मुकाबला करने के लिए राय व्यक्त करते हैं। इस पर कुछ निर्णय होते हैं और वे निर्णय कुछ ही दिनों बाद पानी के बुलबुले की तरह गायब हो जाते हैं, यह एक बड़ी भारी विडम्बना है। इसका मुख्य कारण यह है कि खेती किसानी, गांव, गरीब की ओर से जब कभी भी एक हल्की आवाज उठती है तो वह कुछ दिन रहती है, फिर वह भी गायब हो जाती है। एक बार नारा उठा था-चलो गांव की ओर, आज उस नारे का क्या हुआ? गांव की ओर चलने का तात्पर्य ही यह था कि खेती, किसानी, गांव और गरीब की समस्याओं पर गम्भीरता से ध्यान दिया जाये, लेकिन ध्यान नहीं दिया गया। इसका नतीजा यह है कि समस्याएं लगातार यदा-कदा इसी तरह गम्भीर होती रहती हैं और गांव, गरीब, किसान, मजदूर तबाह होते रहते हैं।
बहुत सी बड़ी-बड़ी योजनाएं बनी हैं, लेकिन यह स्थिति न होती, यदि पूर्ववर्ती सरकारें, चाहे जिस पार्टी की रही हों, यदि उन्होंने गम्भीरता से इन समस्याओं की ओर ध्यान दिया होता तो जल सिंचाई की योजनाएं १०, १५ और २० साल से लम्बित हैं, वे पूरी हो गई होतीं। लेकिन विडम्बना यह है कि उनका खर्च बढ़ता जाता है लेकिन योजनाएं पूरी नहीं होतीं तो सूखे का मुकाबला कैसे किया जा सकता है। सूखे का मुकाबला करने के लिए द्ृढ़प्रतिज्ञ होकर हमें सभी दलों को, खासकर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।
ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग, दाल और मक्का आदि की खरीफ की सारी फसल बर्बाद हो गई। धान की भी खेती काफी बर्बाद हुई है। अन्य जगहों में अन्य किस्म की फसलें बर्बाद हो गई हैं। किसानों की भरपाई कोई भी सरकार करेगी, ऐसा मुझे विश्वास नहीं होता, लेकिन तत्काल रिलीफ मैजर्स उठाये जाने चाहिए, रिलीफ मैजर्स में राहत कार्य तत्काल शुरू करने चाहिए। अभी भी हम लोग आशा लगाये हैं कि २-४ या १० दिन में शायद वर्षा हो जाये तो रबी की फसल में हो सकता है कि हम लोगों को राहत मिले। लेकिन जिस प्रकार से मौसम का रुख दिखाई पड़ता है, २-४ रोज तो नजर नहीं आता कि वर्षा होगी, इसलिए यह आशंका बनती है कि भयंकर अकाल की स्थिति पैदा होने वाली है और इसीलिए जब माननीय सदस्यगण मांग करते हैं कि जितने जिले सूखे से अत्यधिक प्रभावित हैं, उनको अकालग्रस्त घोषित किया जाये।
16.00 hrs. अकालग्रस्त घोषित होने के बाद ही आप राजस्व माफ कर सकते हैं। कानून भी ऐसे बने हुए हैं कि अगर ५० प्रतिशत नुकसान होता है तो कुछ नहीं होगा, लेकिन ७५ प्रतिशत से अधिक नुकसान होने की खबर जब तक नहीं आती, तब तक आप लगान और राजस्व माफ नहीं करते। किसी भी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
श्री रामानन्द सिंह (सतना): सूखा नहीं भयंकर अकाल है देश में और इसके लिए केन्द्र सरकार को भी प्रयास करना पड़ेगा, राज्य सरकार को भी करना पड़ेगा।
सभापति महोदय : बीच में न बोलें। राम सजीवन जी आप अपना भाषण जारी रखिए।
श्री राम सजीवन : आपका क्षेत्र और मेरा क्षेत्र जो बुंदेलखंड है, वह सर्वाधिक पीड़ित है इसलिए हमें और आपको सबसे ज्यादा पीड़ा हो रही है।
श्री रामानन्द सिंह : आपके जिले से ही मेरी जिला लगा हुआ है। आपकी सरकार ने तो सूखाग्रस्त घोषित कर दिया, लेकिन हमारी सरकार ने नहीं किया। हमारी सरकार को भी कहें कि वह भी करे।
श्री राम सजीवन : आपकी मदद आपकी सरकार कर रही है, वह यहां बैठी हुई है और आप हमसे मदद मांग रहे हैं। …( व्यवधान)
सभापति महोदय : रामानन्द जी आपको जब समय मिलेगा, तब आप अपनी बात कहना।
श्री राम सजीवन : उत्तर प्रदेश की सरकार ने सर्वप्रथम राज्य के २६ जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया। अन्य सरकारें तो बाद में ऐसा कर रही हैं। उसके बाद हमारी प्रदेश सरकार ने अन्य जिलों से जो रिपोर्ट मिल रही है, उस पर भी विचार कर रही हैं। सूखाग्रस्त जिलों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसलिए जो कानून बना है, उसकी खामियों की ओर देखें। चाहे कोई भी सरकार हो, यह व्यवस्था होनी चाहिए कि जिस जिले से ५० प्रतिशत सूखा होने की रिपोर्ट आए वहां का राजस्व और लगान माफ हो। लेकिन ऐसा होता नहीं है, अगले साल ब्याज की वसूली होती है। इसलिए ७५ प्रतिशत नुकसान होने के बजाय ५० प्रतिशत का प्रावधान होना चाहिए और किसानों का ब्याज, कर्जा और लगान माफ होना चाहिए। इस तरह का कानून बनना चाहिए।
श्री सुरेश रामराव जाधव: यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
श्री राम सजीवन : मैंने ३५ सालों में वभिन्न सरकारों को देखा है, किसी भी सरकार ने इसमें परिवर्तन नहीं किया। मुझे विश्वास है कि आज भी कोई सरकार इस कानून में परिवर्तन नहीं करेगी। यदि आपमें और हममें हिम्मत है तो हमें यह व्यवस्था सरकार से करानी चाहिए कि ५० प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर किसानों का ब्याज और कर्जा माफ कर दिया जाए। अगर हिम्मत है तो सब लोग यह बात सरकार को कहें। यहां से एक प्रस्ताव पास हो, फिर देखिए सरकार कैसे नहीं झुकती है। लेकिन हम सब डरते हैं कि अगर ऐसा किया तो पता नहीं पार्टी टिकट देगी या नहीं और देगी तो कहीं चुनाव न हार जाएं।
श्री रामानन्द सिंह : हम नहीं डरते हैं, हमें टिकट कटने का कोई भय नहीं है। हम तो खरी-खरी बात कहने वालों में से हैं और किसानों के हित की बात करते हैं।
श्री राम सजीवन : मैंने यह प्रस्ताव यहां रखा है, पूरा सदन अगर सहमत है तो पास करे और अभी कहे।
सभापति महोदय : सरकार आपके बिंदुओं को नोट कर रही है।
श्री राम सजीवन : फूड फार वर्क दिया जाता है। इससे मजदूरों को और गरीबों को काम मिलता है। लेकिन इस बारे में हमारा अनुभव है कि यह फूड फार वर्क सूखे पीड़ित इलाकों में तालाबों को गहरा करने के लिए दिया जाता है। फूड फार वर्क में यह शर्त है कि वह अन्य काम होगा, यह सही है, लेकिन तालाब गहरा करने में यह शर्त कि केवल मजदूरों से काम होगा, यदि १५-२० बीघे का तालाब है तो कितने भी मजदूर लगा दिए जाएं, उसमें भरने लायक गहराई पैदा नहीं हो सकती इसलिए इसमें छूट होनी चाहिए।
सूखा राहत कार्यों में जो भी खंड की व्यवस्था की जाये और तालाबों की खुदाई की व्यवस्था की जाये, उसमें ट्रकों के इस्तेमाल की भी इजाजत दी जानी चाहिए जिससे जल्दी-जल्दी उनको गहरा किया जा सके। आप सड़कें बनाइए, मजदूरी दीजिए। श्रम दिवस कराइए, उसमें हमारा कोई विरोध नहीं है लेकिन तालाब गहरा करना है, सूखे से निपटना है, उसके लिए कानून में परिवर्तन करना पड़ेगा। अजीत सिंह जी से निवेदन करना पड़ेगा। आप कृषि मंत्री जी हैं लेकिन सूखे का संबंध अजीत सिंह जी से नहीं है, इसमें बिजली की समस्या आती है, किसानों को डीजल चाहिए, इसमें ग्रामीण विकास की समस्या आती है।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : अब आपका समय समाप्त हुआ। आप बैठिए। मेरे पास बहुत लम्बी सूची है।
…( व्यवधान)
श्री राम सजीवन : मेरा निवेदन है कि वभिन्न संबंधित विभाग के मंत्रियों को इस बारे में ध्यान देना चाहिए। उसके अलावा बुंदेलखंड क्षेत्र में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यह इलाका हर वर्ष सूखा से पीड़ित रहता है और इस लोक सभा में जब भी इस विषय पर बहस होती है, मैं इस मुद्दे को उठाता हूं। बुंदेलखंड का दक्षिणी हिस्सा और छतरपुर भी इसमें शामिल है। बुंदेलखंड के बहुत से इलाके इसमें शामिल हैं। इस क्षेत्र की सारी फसलें सूख गईं। उन फसलों को जिवाया तो नहीं जा सकता लेकिन विशेष अभियान चलाकर उनको राहत दी जा सकती है। एक योजना बुंदेलखंड के लिए बनी है। यू.पी. सरकार ने बनाई या एम.पी.सरकार ने बनाई, मुझे नहीं मालूम लेकिन किसानों को एक लाख रुपये की सब्सिडी देकर यू.पी. सरकार ने फ्री बोरिंग योजना बनाई है। किसान के खेत में एक लाख रुपया लगाकर फ्री बोरिंग योजना सरकार चलाती है लेकिन यू.पी. सरकार के पास साधनों की कमी है। मैंने कई बार इस मुद्दे को उठाया और नियम ३७७ में भी उठाया कि फ्री बोरिंग योजना में भारत सरकार मदद करे और सिंचाई मंत्री कहते हैं कि यह योजना हमारे पास नहीं है।
इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि जो सरकारें बनती हैं, चाहे किसी भी पार्टी की हों, उन सरकारो में महानगरों से चुने हुए लोगों का वर्चस्व होता है। इसलिए व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिए क्योंकि शहरों, महानगरों से चुनकर आये हुए लोगों को किसान का, गरीब का, खेत-खलिहान का इतना सच्चा ज्ञान नहीं होता जितना गांवों से चुनकर आये हुए लोगों को होता है। इसलिए मेरा निवेदन है कि हम लोग जो गांवों से चुनकर आये हुए लोग हैं, मिल-जुलकर सभी सरकारों पर दवाब डालें कि गावों की ओर चलो, यह नारा फिर से बुलंद किया जाये।
श्री चिन्तामन वनगा (दहानू): सभापति जी, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। मैं सब से पहले माननीय कृषि मंत्री का आभार मानना चाहता हूं कि उन्हेंने ११ राज्यों के कृषि मंत्रियों की मींटिग लेने के बाद किसानों को मदद देने की घोषणा की है। इस सूखे की परिस्थिति में दो हैक्टेयर से नीचे की जमीन वाले किसानों को भी वह मदद दे रहे हैं। मेरे क्षेत्र में जो स्थिति पैदा हुई ही, मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि उसे सूखाग्रस्त कहूं या बाढ़ग्रस्त। मेरा ठाणे जिला है जहां गत २५, २६, २७ जून को लगातार बारिश हुई। २६ तारीख को २९ इंच वर्षा हुई, लगातार १०-१२ घंटे पानी गिरा, जिससे भारी हानि हुई। लेकिन २७ तारीख के बाद से आज तक उस क्षेत्र में बारिश नहीं हुई। हमारे यहां चावल के पौधे तैयार करके प्रत्यारोपण किया जाता है. अब स्थिति यह पैदा हो गई है कि बारिश न होने के कारण वे पौधे लगाये नहीं जा सके हैं और सूख गये हैं। बारिश से बाढ़ के कारण पूरा आदिवासी इलाका बह गया है। करीब ६६ लोग बाढ़ में बह गये, १८ लोग लापता हो गये और २५ हजार घर गिर गये हैं। इसके अलावा स्कूल, अस्पताल और सड़कें बह गईं। पश्चिमी रेलवे का ५० किलोमीटर का रेल मार्ग बह गया। इसके कारण मुम्बई शहर से आने वाला रेल मार्ग १० दिन तक ठप्प हो गया। हमारे यहां इस बाढ़ से भारी नुकसान हुआ। केन्द्रीय सरकार की तरफ से एक सैंट्रल टीम भेजी गई जिसने स्थिति का जायजा लिया। तत्पश्चात् केन्द्र सरकार से महाराष्ट्र सरकार ने सहायता मांगी है ।
सभापति जी, सरकार की तरफ से घर बह जाने की स्थिति में प्रति व्यक्ति ६०० रुपया मदद दी जाती है। यह मुआवजा बिलो पावर्टी लाइन के आधार पर दिया जाता है। इतना बड़ा नुकसान होने पर केवल ६०० रुपया प्रति व्यक्ति सहायता दी जा रही है। उन लोगों को मकान भी बनाने हैं। यह कहा गया है कि जो बी.पी.एल के नीचे हैं, उन्हें ही सहायता दी जायगी। कई छोटे-छोटे व्यापारियों का नुकसान हुआ है। मेरे क्षेत्र में दहानू आदिवासी इलाका है और भिवंडी शहर में टैक्सटाइल इंडस्ट्री है। वहां दस लाख के लगभग जनसंख्या है। हमारा भिवंडी शहर आधा पानी में डूब गया था। दूसरे बड़े शहर दहानू की आबादी लगभग एक लाख है, वह भी आधा पानी में डूब गया था। वहां छोटे व्यापारी तथा इंडस्टि्रयलिस्ट्स हैं, जिनका बहुत नुकसान हुआ है। लेकिन उन्हें मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है। जिन्होंने बैंकों से लोन लेकर अपना धंधा शुरू किया था, उनका भी २५-२५, ३०-३० लाख रुपये का नुकसान हुआ है। इन लोगों को फिर से धंधा शुरू करके ऊपर उभरने में पांच-दस साल लग सकते हैं। मेरी सरकार से विनती है कि जिन्होंने बैंकों से लोन लेकर धंधा शुरू किया था, क्या सरकार उन्हें फिर से लोन दिला सकती है या उन्हें इंटरेस्ट में कोई रिलीफ दे सकती है या उन्हें इंकम टैक्स में कोई रिलीफ दे सकती है।
सभापति महोदय, मेरे क्षेत्र में सूखे की परिस्थिति का भी निर्माण हुआ है। वहां जिन किसानों ने पौधे तैयार किये थे, उनका ट्रान्सप्लान्टेशऩ नहीं हो रहा है। इतनी वर्षा होने के बाद भी मेरे क्षेत्र में सूखाग्रस्त परिस्थिति का निर्माण हुआ है। यहां वाटर लैवल और पानी के मैनेजमैन्ट की चर्चा हो रही है। मैं आपके माध्यम से सरकार को सुझाव देना चाहता हूं कि जहां सरकार स्वयं कुछ करेगी, लेकिन संसद सदस्यों को जो एम.पी.लैड का पैसा दिया जाता है, उसमें हम चैक डैम बना सकते हैं। इस पैसे में से लगभग १० से ३० प्रतिशत तक पैसा चैक डैम पर खर्च करना चाहिए, इस बारे में गाइडलाइंस में संशोधन होना चाहिए।
सभापति महोदय, हमारे यहां एक जाने-माने व्यक्ति अन्ना हजारे हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में चैक डैम का उदाहरण पेश किया है। वहां चैक डैम बनाकर पानी का संरक्षण किया है। मराठी में एक कहावत है - पानी अड़वा चिड़वा। पानी का संरक्षण होना चाहिए, इसके लिए इन्होंने बहुत बड़ा काम किया है। सूखे की परिस्थिति पर काबू पाने के लिए पानी का कन्सरवेशन होना बहुत जरूरी है। इसमें पूरे देश के लैवल पर अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति की मदद लेनी चाहिए। यह नैसर्गिक आपदा है, इससे पूरी तरह से निपटा नहीं जा सकता है, लेकिन आज पानी के संरक्षण की बहुत जरूरत है।
सभापति महोदय, बोरवैल का लैवल कितना रखना चाहिए, इसके बारे में यहां चर्चा हुई है। आज पूरी दुनिया और हमारे देश में पानी का लैवल कम हो रहा है। । बोरवैल की कितनी गहराई होनी चाहिए, इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसमें भी आज कम्पिटीशन हो रहा है। समझो मैंने स्वयं १०० मीटर का एक बोरवैल बनाया तो मेरा पड़ोसी ३०० मीटर का बनाता है। उसके आगे वाला ६०० मीटर का बनाता है। मेरा कहने मतलब यह है कि वाटर लैवल पर भी कोई मैनेजमैन्ट होना चाहिए। मेरा क्षेत्र में समुद्र का किनारा है। वह बागायती क्षेत्र है। वहां भी लोग बागायती क्षेत्र के लिए बोरवैल से पानी लेते हैं। इसमें भी कम्पिटीशन है। वहां ६००, ७०० और ८०० मीटर तक बोरवैल की गहराई रहती है। अभी एक रिपोर्ट आई है कि वाटर लैवल कम होने के कारण समुद्र का पानी जमीन से जमीन में घुस जाता है और वहां भी एक दिन अकाल की परिस्थिति का निर्माण हो सकता है। इसके लिए भी सरकार को सोचना चाहिए।
चारे का मैनेजमेंट भी होना चाहिए। मैं जिस क्षेत्र से आता हूँ, उस क्षेत्र में सूखी घास की बहुत ज्यादा पैदावार होती है। गुजरात को हम सूखी घास देते हैं, महाराष्ट्र के बाकी एरिया में भी सूखी घास देते हैं। आज पूरे देश में सूखी घास की जरूरत है। मेरे क्षेत्र में सूखी घास अभी भी गोदामों में पड़ी है। सरकार को उसको अक्वायर करना चाहिए यह मेरा सुझाव है। मुम्बई में जो पानी जाता है मेरे क्षेत्र से जाता है। मुम्बई में पानी के लिए तीन तालाब बने हैं - लानसा, वैतरणा और मानसा । ये मेरे क्षेत्र में हैं और यहां भी सूखे की स्थिति है। अगर आगे वर्षा नहीं हुई तो मुम्बई में पानी की सप्लाई करने वाले डैम में भी पानी नहीं भरेगा और मुम्बई के लिए भी पानी की बहुत कमी हो जाएगी। मुम्बई के पानी के लिए दादरा नगर हवेली में दमनगंगा नाम का एक डैम है। वहां पानी की क्षमता बहुत अधिक है और मुम्बई में हमारे क्षेत्र में सूर्यनगर में एक डैम बना है और वह आदिवासी उपयोजना से बना है। लेकिन मुम्बई में जब पानी कम पड़ जाता है, सूखे की परिस्थिति का निर्माण होता है तो सिर्फ उस डैम से पानी लेने के लिए सरकार सोचती है। इसके लिए मेरा सुझाव है कि मुम्बई में पानी की सप्लाई ज्यादा हो और उसके लिए दमनगंगा से जो मुम्बई से करीब १५० किलोमीटर दूर है, वहां से पानी लिया जाए। अभी जो डैम बना है मेरे क्षेत्र में वह भी ७०-८० किलोमीटर पर है। वहां से भी मुम्बई के लिए पानी दिया जा सकता है। इससे मुम्बई को काफी पानी मिलेगा।
अंत में मैं आपको फिर एक बार धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।
डॉ.गरिजा व्यास (उदयपुर): माननीय सभापति महोदय, जहां भारत के लिए कहा जाता है कि स्वर्ग भी यहां के भूभाग को देखकर शर्माता है, जहां छ: ऋतुएँ हैं लेकिन फिर भी यह आइरॉनिकल है, पैराडॉक्सिकल है कि इस देश की २८ से ३० प्रतिशत कृषि योग्य भूमि हमेशा ड्राउट प्रोन रहती है। इसी के साथ १६ लाख हैक्टेयर भूमि प्रत्येक वर्ष बाढ़ से बर्बाद हो जाती है और करीब डेढ़ हजार से दो हजार लोगों को मौत के घाट यह बाढ़ और अकाल ले डूबता है।
महोदय, गरीब इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होता है और विशेषकर देखें तो फ्लड प्रोन जो एरियाज़ हैं, जिनमें पूर्वी उत्तर प्रदेश, वैस्ट बंगाल, मेघालय, बिहार और इसी प्रकार के हिस्से हैं और उसी प्रकार ड्राउट प्रोन इलाकों में देखें तो राजस्थान, उड़ीसा, आंध्रा प्रदेश, मराठवाड़ा, कर्नाटक, गुजरात और इस साल पंजाब और हरियाणा भी सम्मिलित हैं। यह बढ़ता चला जाता है और इसलिए मेरे पूर्ववक्ता जो बोल रहे थे कि सौ सालों के इतिहास को देखा जाए तो यह बढ़ा है और हर साल हम अकाल की मार से ग्रसित होते चले जा रहे हैं। आने वाले हर तीसरे साल में अकाल की घोषणा लोगों ने कर रखी है। ऐसी स्थिति में हमें इसके कारणों पर विचार करना है और किस प्रकार से प्रबंधन किया जाए इस पर भी सदन को सोचना है।
जहां तक कारणों का प्रश्न है, चाहे पर्वतीय इकोलॉजी का प्रश्न हो या ग्राउंड वाटर का बहुत ज्यादा दोहन हो गया हो या कृषि में करने वाले परिवर्तन हों या वनों का नाश हो या विकास के काम हों, जैसे सड़कों आदि का निर्माण, लेकिन उनसे प्रभावित होकर भी रेनफॉल कम हुआ है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। महोदय, यह बात भी सामने आई है कि कुछ इस प्रकार के एरियाज हैं जहां अकाल बार-बार पड़ता है और हर तीसरे वर्ष अकाल की विभीषिका से जूझना पड़ता है। इस समय राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्रा प्रदेश और उड़ीसा आदि प्रदेशों में अकाल पड़ा हुआ है। यदि देश में १९८७ में पड़े अकाल की तरफ ध्यान आकर्षित किया जाए, तो उस समय देश का ५८ से ६० प्रतिशत भाग सूखे से प्रभावित हुआ, २८७ जिले अकाल से ग्रस्त थे और १६६ मलियन लोग उससे प्रभावित हुए, लेकिन उस समय जिस प्रकार से राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में मैनेजमेंट हुआ, उसकी प्रशंसा न केवल पक्ष, बल्कि विपक्ष के बहुत से माननीय सदस्यों और अन्य अनेक पार्टियों ने भी की थी। उसका कारण यही था कि उस समय अकाल से लड़ने का पूरा मैनेजमेंट किया गया था। अकाल को द्ृष्टि में रखकर उससे राहत देने की व्यवस्था की गई थी।
महोदय, आज हमारी विपक्ष की नेता माननीय सोनिया जी के स्वर्गीय पति श्री राजीव गांधी जी उस समय हमारे राजस्थान में, गुजरात के माननीय सदस्य के संसदीय क्षेत्र के साथ लगते हुए हिस्से में स्वयं गए, वहां घर-घर जाकर देखा कि लोग सूखे से किस प्रकार से पीड़ित हैं। उन्होंने घरों में उनके बर्तनों, उनकी हांडी को उघाड़ कर भी देखा कि किस के घर में कितना अनाज है, लेकिन हांडियां खाली थीं। उस समय भूख से त्रस्त और सूखे के मारे किसानों को राहत देने के लिए उन्होंने देखा कि किस को कितना अनाज दिया जा सकता है और किस को नौकरी दी जा सकती है और उसके अनुसार उसका प्रबन्ध किया। उस समय की व्यवस्था को आज भी याद किया जाता है। उस समय के बाद पड़ने वाले अकाल और सूखे में उतनी सावधानी कभी नहीं बरती गई और न ही प्रशासनिक दक्षता नजर आई।
महोदय, आज संपूर्ण भारत के लगभग १४ राज्यों में तो सूखे और अकाल की स्थिति है ही और आने वाले सप्ताह में जो रिपोर्ट आने वाली है, उसके आधार पर मैं कह सकती हूं कि आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान अकाल की चपेट में होगा। कर्नाटक की स्थिति बहुत खराब है। हर जिले में पेयजल का संकट जिस प्रकार से छाया हुआ है उसको देखते हुए राज्य सरकार ने भारत सरकार से और ज्यादा पैसे की मांग की है। मध्य प्रदेश में सोयाबीन और बाजरे की फसल पूरी तरह नष्ट हो गई है। तमिलनाडु में रेनवाटर को हारवैस्ट करने से स्थिति कुछ ठीक हुई है, लेकिन वहां भी कोकोनट ग्रोअर्स को जिस प्रकार से कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है, वह वर्णन करने लायक नहीं है। गुजरात में सौराष्ट्र और कच्छ का एरिया भयंकर रूप से सूखे की चपेट में है। उड़ीसा में कालाहींडी, बोलांगीर और कोरापुट (के.बी.के.) आज अकाल की भीषण विभीषिका से जूझ रहा है। पंजाब और हरियाणा जो हम लोगों का रक्षक हुआ करता था, उनकी स्थिति भी आज दयनीय है।
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Mr. Chairman, Sir, the hon. Member has just mentioned about KBK Region of Orissa and that during the Congress regime they had initiated a programme for that region. It is true that when Shri Narasimha Rao was the Prime Minister he had come to Kalahandi and announced a long-term action plan worth Rs. 4,500 crore to be implemented in KBK Region. But to our utter dismay, only Rs. One lakh was sanctioned then and that also for soil testing and purchase of an ambulance. … (Interruptions) Today, this Government has come up with a genuine long-term action plan for KBK Region of Orissa. … (Interruptions)
डॉ.गरिजा व्यास : माननीय सभापति जी, यदि माननीय सदस्य इस प्रकार से राजनीतिक सवाल उठाएंगे, तो काम कैसे चलेगा। मेरा उड़ीसा को मेंशन करने का अर्थ केवल इतना ही था कि वहां भी स्थिति बहुत खराब है और उड़ीसा का के.बी.के. इलाका बहुत पिछड़ा इलाका है और राजीव गांधी जी के समय में इस के लिए अलग से बजट दिया गया था। यदि इस प्रकार से वे मुझे बीच में रोक कर टोकेंगे, तो क्या मैं उनसे पूछ सकती हूं कि पिछली साल उड़ीसा में जब भयंकर चक्रवात आया और उस समय केन्द्र में आपकी सरकार थी, तब जो घोषणा की गई, उसमें से कितना धन उड़ीसा में गया और कितना उपयोग हुआ? यह एक लम्बी बहस का विषय है।
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, the Planning Commission has brought out a book. उस किताब को पढि़ए तब आपको मालूम होगा कि कितनी मदद की गई है।
डॉ.गरिजा व्यास : महोदय, मैं माननीय सदस्य को बताना चाहती हूं कि वह पुस्तक मैंने पढ़ी है। मैं आपके माध्यम से सदन का ध्यान राजस्थान की तरफ आकर्षित करना चाहती हूं। आज हिन्दुस्तान के ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के पेपर्स में राजस्थान का नाम भरा है। राजस्थान के गांव में एक किवदन्ती है, जहां से कर्नल सोना राम जी आते हैं। एक बार अकाल की मां ने अकाल से पूछा कि बेटा मुझे कुछ हो गया तो मैं तुम्हें कहां ढूंढूगी। तब अकाल ने अपनी मां से कहा कि राजस्थान में तो मेरा डेरा है ही, कभी-कभी मैं आंध्रा प्रदेश में चला जाता हूं, कभी उड़ीसा चला जाता हूं, कभी उत्तर प्रदेश चला जाता हूं, कभी मध्य प्रदेश चला जाता हूं, लेकिन मुझे ढूंढ़ना है तो मुझे राजस्थान में ही ढूंढ़ना। यही वजह है कि राजस्थान को हमेशा इस अकाल का सामना करना पड़ता है। वहां चौथा न होकर पांचवा वर्ष है जब राजस्थान अकाल की विभीषिका से गुजर रहा है।
१६.३१ hrs. ( Dr. Laxminarayan Pandeya त्द ण्ड्ढ ण्ठ्ठत्द्ध) केवल पिछले वर्ष के कुछ आंकड़े लें, तो हमने कुछ राहत पाई थी लेकिन १८ डिस्टि्रक्ट्स उससे प्रभावित हुए थे। आज स्थिति यह है कि ३२ में से ३१ डिस्टि्रक्ट्स इससे प्रभावित हैं। अगर हम ३२ के ३२ डिस्टि्रक्ट्स कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ३३० लाख जनता और ४०० लाख पशु इससे प्रभावित हैं। राजस्थान की क्राप ९० प्रतिशत प्रभावित हुई है। दक्षिण उत्तर मानसून के पूर्व आने से, वह चाहे पूर्व की वर्षा हो, १७-१८ जून या २१-२२ जून की बरसात हो, मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमैंट का जो एनाउंसमैंट था, उसके अनुसार लोगों ने बुआई कर दी थी। दो जुलाई तक कुछ बरसात हो चुकी थी इसलिए किसानों ने ४० प्रतिशत बुआई कर दी, जिसमें दलहन ४१ प्रतिशत, तिलहन ४२ प्रतिशत और दूसरे अनाज जिसमें बाजरा आदि है, उसकी ४१ प्रतिशत बुआई हो चुकी थी लेकिन आज स्थिति यह है कि १०० की १०० प्रतिशत क्राप चौपट है।
मैं राजस्थान की भौगोलिक स्थिति की ओर आपका ध्यान ले जाना चाहूंगी। राजस्थान का जो पश्चिमी प्रांत है, उसमें पशु धन सबसे अधिक है और यह इलाका गंगा नगर से बाड़मेर होते हुए जोधपुर तक जाता है। वहां स्थिति और भी गंभीर है। एक तरफ अकाल की मार है, तो दूसरी तरफ हमारा क्षेत्र पाकिस्तान की सीमा पर लगा है। वहां अच्छी बरसात हो या न हो, वहां पर सिंचाई की व्यवस्था हो या न हो, वहां पिछले वर्ष सारी की सारी क्राप युद्ध की आशंका के कारण नहीं हुई। आज स्थिति और भी गंभीर है। पशु धन के चारे की व्यवस्था का सवाल है। उसके साथ-साथ सामाजिक व्यवस्थाएं हैं, जैसा मैंने कहा कि एक रीज़न पशु पालन में विश्वास करता है, तो दूसरे रीजन मे पहाड़ी इलाका है, जहां पर पेय जल का स्तर ५०० मीटर से भी नीचे जा चुका है और तीसरा वह इलाका है जहां बरसात होती है लेकिन पांच वर्ष तक नहीं हुई। वहां सींचित क्षेत्र है लेकिन पाकिस्तान और हमारी सेना का पड़ाव वहां है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण राजस्थान की स्थिति आज बहुत दयनीय और कठिन हो गयी है।
हम केन्द्र सरकार से बार-बार मांग करते हैं कि वह राजस्थान की मदद करें। मेरा कोई आरोप केन्द्र सरकार पर नहीं है, सदन को जानना चाहिए। जब आंध्रा के सदस्य बोल रहे थे तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैं कोई अपनी बात सरकारी आंकड़ों के अनुसार नहीं कह रही। लेकिन केन्द्र सरकार उन्हीं को मदद देती है जो एन.डी.ए. में घटक दल हैं और जिनके एम.पीज. उनको सहारा दे सकें, सहायता दे सकें। जैसा मैंने अभी अभी आप लोगों को बताया कि पिछले वर्ष १८ डिस्टि्रक्ट्स में अकाल की विभीषिका थी। …( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव (अलवर): सभापति जी. कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं। उनसे मेरी चर्चा हुई। उन्होंने कहा है कि राजस्थान सरकार ने अभी तक राजस्थान को सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित नहीं किया।…( व्यवधान)
वहां आपकी सरकार होते हुए भी इतना डिले क्यों हो रहा है ? आपके मंत्री किस नींद में हैं …( व्यवधान)
डॉ.गरिजा व्यास : आप जब बोलेंगे तब यह सब बोलियेगा। अभी मैं अपनी बात रख रही हूं।
मैं यह कह रही थी कि हमारे १८ डिस्टि्रक्ट्स में अकाल था, और आंध्रा प्रदेश में केवल ६ प्रतिशत डेफीसिट था लेकिन उनको १४८ करोड़ रुपये और तीन लाख टन अनाज मिला जबकि राजस्थान में १८ डिस्टि्रक्ट्स में अकाल पड़ने के बावजूद भी एक पैसा नहीं मिला। इसी तरह दूसरे राज्यों में भी जो कांग्रेस शासित है या जहां बी.जे.पी. या उनके घटक दलों की सरकार नहीं है, उनको पैसा नहीं मिला। जहां ४० प्रतिशत बुआई और खरीफ की पूरी फसल खराब हो गई हो और रबी की फसल खराब होने की आशंका हो, ऐसे इलाकों की तरफ मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी।
पशु संरक्षण हमारे राजस्थान का एक महत्वपूर्ण बिन्दु रहा है। २७.८ क्िंवटल अनाज की हमें व्यवस्था करनी है। हमने केन्द्र सरकार से मांग की है, हमें विश्वास है कि जैसा अभी हमारे साथी बोल रहे थे, वह राजस्थान के भेजे हुए पशु संरक्षण की व्यवस्था में से १६५ करोड़ रुपये की राशि केन्द्र सरकार से दिलाने में मदद करें।
कृषि मंत्री जी, आप हमेशा राजस्थान के प्रति संवेदनशील रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि कृषि मंत्री ड्राउट को देख रहे हैं और डिज़ास्टर मैनेजमैंट को होम मनिस्टर देख रहे हैं। उन दोनों के बीच किस तरह तालमेल होगा और किस प्रकार राजस्थान जैसे अनेक राज्यों को सुविधा मिल सकेगी, यह अपने आपमें बहुत बड़ा प्रश्न है और इस प्रश्न पर निश्चित तौर पर ध्यान देना आवश्यक है।
मैं केन्द्र को एक बात के लिए धन्यवाद देना चाहूंगी कि उन्होंने लगभग तीन वर्षों से लगातार रेल द्वारा मुफ्त पानी भेजने की व्यवस्था की है और उसमें सबसे ज्यादा इलाका मेरे संसदीय क्षेत्र का आता है। लेकिन अभी-अभी मालूम पड़ा है और मैं आपके माध्यम से केन्द्र सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी क्योंकि उन्होंने कहा है यदि किसी भी राज्य सरकार, विशेषकर राजस्थान में, यदि रेल से जल की आपूर्ति होगी तो उसका पैसा लिया जाएगा। मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहती हूं, क्योंकि अभी तक बरसात नहीं हुई है, केवल २५ मिली मीटर बरसात जो १७ जून से शुरू होकर अब तक हुई है, ऐसी स्थिति में उन स्थानों पर अभी भी टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है, उसे बंद न करने दिया जाए। मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहूंगी कि केन्द्र सरकार इस पर नियमित रूप से और अभी से हमें उसका पैसा दे ताकि वहां टैंकरों से पानी पहुंचाया जा सके और रेल की व्यवस्था हो सके।
अभी पेयजल से संबंधित मंत्री महोदय बैठे थे। मैं निवेदन करना चाहूंगी कि सैक्टोरल रिफॉम्र्स के संबंध में बहुत सारे डिस्टि्रक्ट्स को पैसा मिला है जिसमें मेरा डिस्टि्रक्ट भी सम्मिलित है, जिसे ७४ करोड़ रुपया मिला है। उसमें पहले २० प्रतिशत की भागीदारी थी, अब १० प्रतिशत की भागीदारी की है। अकाल की ऐसी विभीषिका के समय अलवर में भी इसकी व्यवस्था की गई है। मैं आपसे भी चाहूंगी कि इस बात को उठाएं कि अकाल की विभीषिका को देखते हुए सैक्टोरल रिफाम्र्स का १० प्रतिशत हिस्सा माफ किया जाए।
जैसा मैंने कहा, यह स्थिति जो बनी है, उसमें सबसे बड़ी कठिनाई विगत पांच वर्षों से ड्रौट मैनेजमैंट को सटीक ढंग से न करने के कारण पैदा हुई है। यह स्थिति इसलिए बनती है जब ड्रौट में केवल राज्य अपनी रिलीफ की बात करते हैं लेकिन चाहे राज्य के स्तर पर हो चाहे केन्द्र सरकार के स्तर पर हो, उसका मैनेजमैंट नहीं हो पाता। मैं आपके माध्यम से सदन में बिन्दु रखना चाहूंगी कि सबसे बड़ी बात यह है कि डैज़र्ट मैनेजमैंट के लिए प्लान जरूरी है। लेकिन जब बरसात नहीं होती तब प्लान का निर्माण होता है। कम से कम कृषि मंत्री जी ने जिन बातों की घोषणा कल की, उन बातों पर अटल रहें और जो ऋण वसूली आपने रोकने की बात कही है, राज्य सरकारों को भी आपके यहां से आदेश होना चाहिए कि ऋण की वसूली न केवल रोकी जाए, बल्कि ड्रौट को देखते हुए पूरी तरह माफ की जाए और ऋण को लगाते हुए ब्याज को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए।
मैं एक बात का और धन्यवाद देना चाहूंगी कि आपने दो हैक्टेयर की जमीन के ऊपर भी जो सी.आर.एफ. का पैसा देने की बात की, उससे बहुत सारे किसान लाभान्वित होंगे लेकिन कहीं वह कागज में न रह जाए, उसे जनता तक पहुंचाना आवश्यक है। यूनियन और स्टेट गवर्नमैंट के बीच सबसे पहले प्लान, मशीनरी, फंड्स और कोआर्डीनेशन की जरूरत है ताकि यहां हम वाद-विवाद में न पड़ जाएं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस लैवल पर जो कार्य किया जाए, उसकी इन्फार्मेशन किसी सिस्टम द्वारा लोगों तक पहुंचाई जाए और जो कुछ निर्णय लिए जाएं, उसको कम्युनीकेशन द्वारा लोगों तक पहुंचाया जाए। जब इतने बड़े भारत का इलाका अकाल से ग्रस्त है तो गरीब, विशेषकर महिलाओं की स्थिति किसी से छिपी हुई नहीं है। उनको दूरदराज से पानी लाना पड़ता है। उसके बच्चों को अनाज के लिए मोहताज होना पड़ता है। मैं ध्यान दिलाना चाहूंगी, हालांकि मंत्री महोदय इस विभाग के नहीं हैं लेकिन राजीव जी ने १९८७ में वूमेन और चाइल्ड डिपार्टमैंट को अलग से पैसा देने की बात की थी। उस समय मेरे पास वह मनिस्ट्री थी। उन्होंने कहा था कि पोषाहार आम महिलाओं को भी दिए जाएं। फूडग्रेन्स जो ऐवेलेबल हैं, खासकर ६० मलियन टन अनाज की बात कल भी बड़े जोर-शोर से हमें टी.वी. द्वारा दिखाई गई, उसका सही तरह वितरण हो और न केवल बी.पी.एल. बल्कि ए.पी.एल. परिवारों को भी मिले, यह हमारी राज्य सरकारों से मांग है। राजस्थान में करीब-करीब ३१ लाख परिवार बी.पी.एल. रहते हैं लेकिन लोगों की स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है। उनको भी सही फूडग्रेन मिले।
इम्प्लॉयमैंट बहुत आवश्यक है और ‘काम के बदले अनाज’ की योजना को तुरंत प्रभावी रूप से लागू करना चाहिए। उसमें राज्य सरकारों को, जो राज्य विशेष तौर से अकाल से ग्रस्त हैं और जिन्हें पांच-पांच वर्ष हो गए, उन्हें मुफ्त में अनाज दिया जाना चाहिए। इसी के साथ-साथ प्रोडक्टिव वर्क होने चाहिए, जो २५ प्रतिशत तक कच्चे कामों की यहां से व्यवस्था है, उस नोर्म को बदलना चाहिए, चाहे वह मध्य प्रदेश हो, जहां से आप आते हैं और चाहे वह राजस्थान हो। यदि पक्के काम नहीं होंगे तो विकास के साथ हम अकाल को नहीं जोड़ सकेंगे। एफोरेस्टेशन के काम को अकाल में लिया जाना चाहिए और कैनाल्स की डीसिल्िंटग के काम भी अनाज वितरण के काम में लिया जाना आवश्यक है।
इसी के साथ-साथ डिं्रकिंग वाटर के लिए परमानेंट स्कीम, सेमी परमानेंट स्कीम्स और कंटिन्जेंसी प्लान को हमें साथ में लेना आवश्यक है। आज राष्ट्रपति जी का पहला अभिभाषण था, मैं अधिक समय सदन का नहीं लेना चाहती, क्योंकि सारे सदस्यों को अपने इलाके की बातें रखनी हैं और सम्पूर्ण देश की बात भी रखनी है, लेकिन मैं इस बात की ओर आपका ध्यान जरूर आकर्षित करना चाहूंगी कि योजना प्रबन्धन आवश्यक है, चाहे वह डी.पी.ए.पी. हो, चाहे डी.डी.पी. हो और चाहे नेशनल वाटर शेड डवलपमेंट प्रोग्राम हो, लेकिन यदि हमने सही ढंग से पानी का उपयोग किया तो हम अकाल पर काबू पा सकेंगे। मैं यह भी कहना चाहूंगी कि वाटर मैनेजमेंट के सम्बन्ध में न केवल इसे त्वरित गति से अपने हाथ में लें, लेकिन एक कमेटी परमानेंट रूप से बने, जिसमें कुछ टैक्नीकल लोग हों और कुछ संसद सदस्य हों, क्योंकि लोगों को मालूम है कि प्रत्येक आदमी को २४६४ क्यूबिक पानी चाहिए, उसमें से ९०० क्यूबिक पानी ही उसे मिल पाता है। यदि व्यवस्था ठीक हो और पानी वेस्ट न हो जाये, चाहे सरफेस वाटर हो या ग्राउण्ड वाटर हो तो उससे मदद मिल सकती है।
इसी के साथ-साथ जो इन्होंने कहा कि आज राष्ट्रपति जी ने भी आशा व्यक्त की और जिस प्रकार से आने वाली बच्चों की पीढ़ी के सम्बन्ध में अपने विचार रखे, वह बहुत अच्छी बात है, लेकिन जो पीढ़ी आज ७० प्रतिशत तक अकाल से ग्रस्त हो, जिन गांवों के बच्चों ने स्कूल तो दूर पानी की बूंद भी पांच वर्ष के बच्चों ने नहीं देखी हो, उनके सम्बन्ध में क्या कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों का दायित्व होता है कि वे समय पर गिरदावरी करें और वे समय पर अपनी ऋण वसूली को रोकें, ऋण को रोकें। साथ ही साथ केन्द्र और राज्यों में अच्छे सम्बन्ध हों, क्योंकि बॉल को एक दूसरे के पाले में डालने से काम नहीं चलेगा। चिन्ता इस बात की है कि २१वीं सदी और आने वाली २२वीं सदी के बच्चों को हम पूरी तरह से कुपोषण से बचा सकें और उनसे एक अच्छे संसार का निर्माण करें।
महिलाओं को पानी लाने के लिए १०-१० किलोमीटर तक नहीं जाना पड़े, हमें शुद्ध पानी मिले, हम लोगों को अनाज मिले और इस सब के लिए जरूरी है कि सुव्यवस्थित मैनेजमेंट हो। इसीलिए किसी शायर ने कहा है:
"जब पेट में रोटी होती है, जब जेब में पैसा होता है, उस वक्त यह जर्रा हीरा है, उस वक्त यह शबनम मोती है।"
तभी प्रकृति की छहों ऋतुएं और हमारा देश भारत निश्चित तौर पर अपनी इस असीम संस्कृति के कारण माना जायेगा, समृद्ध होगा, लेकिन पहले पेट में रोटी तो पहुंचे, गले में, हलक में पानी तो पहुंचे और उन मूक पशुओं तक चारा तो पहुंचे, जिसकी व्यवस्था हमें करनी पड़ेगी।
श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज): माननीय सभापति महोदय, आज इस देश के अन्दर सुखाड़ और बाढ़ की स्थिति पर यह सदन चर्चा कर रहा है। जहां देश के बड़े भूभाग में सुखाड़ है, वहीं इस देश के एक बड़े हिस्से बिहार में और असम में बाढ़ का भयंकर प्रकोप है।
माननीय सदस्यों ने सुबह १२ बजे से लेकर अभी तक इस पर चर्चा हो रही है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज ५४-५५ वर्षों की आजादी के बाद हम आज भी आकाश की ओर देख रहे हैं। हमनें सिंचाई का प्रबन्धन नहीं किया, हमने बाढ़ को मुकम्मल तौर पर रोकने में असफल रहे और हम एक दूसरे पर दोषारोपण करके प्राय: हर साल इस सदन में एक चर्चा करके अपनी बात को और अपनी जवाबदेही को समाप्त करते हैं। कल माननीय कृषि मंत्री जी ने देश के कुछ कृषि मंत्रियों को/राजस्व मंत्रियों को बुलाया था और सूखे की स्थिति के बारे में चर्चा की थी। कुछ फैसले भी किये हैं, ऋण माफी का फैसला किया, कृषि बीमा योजना लागू करने की बात कही है, अकाल क्षेत्र घोषित हो, यह बात भी कही है। हम मांग करना चाहते हैं कि जो सुखाड़ की स्थिति है, लेकिन आज सुबह जैसे ही प्रश्नकाल आरम्भ हुआ, उस समय ही हम लोगों ने बिहार में बाढ़ का जो भयंकर तांडव नृत्य हो रहा है, उससे वहां २२ जिले बाढ़ से प्रभावित हैं । यह कोई आज की बात नहीं है। नेपाल से प्रति वर्ष आने वाला नदियों का पानी उत्तर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बंगाल के कुछ हिस्सों में बाढ़ का प्रकोप लाता है। हमारे यहां ६१ प्रतिशत जल ग्रहण क्षेत्र नेपाल का है। दस लाख एकड़ से ज्यादा जमीन बाढ़ से प्रभावित होती है। नौ लाख एकड़ जमीन हमारे इलाके की पानी से भरी रहती है। बक्सर से लेकर फरका तक दोनों तरफ गंगा नदी में भयंकर कटाव होने से गांव के गांव विलीन हो जाते हैं। इस सदन में और बाहर हम लोग बार-बार इसकी चर्चा करते हैं कि इस बाढ़ से कैसे मुकाबला किया जाए, कैसे निजात दिलाई जाए। बिहार के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि अपने बलबूते पर मुकाबला कर सके और इसको रोक सके। अगर वह करे, तो भी कैसे, क्योंकि नदियों का पानी तो नेपाल से आता है और नेपाल से बात करने का अधिकार बिहार को नहीं, केन्द्र सरकार को है। यहां पर जल संसाधन मंत्री जी नहीं हैं, सुबह गृह राज्य मंत्री जी ने कहा था कि गृह मंत्रालय बाढ़ को देख रहा है। यह खुशी की बात है। हमारे यहां २२ जिलों में घर-घर में पानी घुसा हुआ है। आधा बिहार देश के दूसरे हिस्सों से कटा हुआ है। दर्जनों स्थानों पर रेल लाइन टूटी हुई है। लाखों लोग तटबंधों और ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं। सड़कें और पुल ध्वस्त हो गए हैं। नेशनल हाईवे और उसमें आने वाले पुल बह गए हैं। दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं, इस बात की रिपोर्ट है। लेकिन अभी तक राज्य सरकार ने और केन्द्र सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है। हमें खुशी है कि गृह राज्य मंत्री जी ने कहा कि सेंट्रल टीम भेजेंगे। आपके पास स्टेंडबाई हैलीकाप्टर भी है। लोग पीने के पानी बिना तरस रहे हैं, कुछ नहीं मिल रहा है। हमारे यहां गोपालगंज, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण, शिवहर, सीतामढ़ी, दरभंगा, मधुबनी, खगड़िया, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, अररिया और सहरसा, इस बड़े भूभाग में पानी बढ़ता चला जा रहा है और नुकसान करता चला जा रहा है। पिपरासी का बांध टूट गया है, बागमती का बांध टूट गया हैा शिवहर और सीतामढ़ी के बीच बागमती नदी का पुल उड़ गया। नदियों के बहाव के कारण और भी पुल ढह गए। सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर का रास्ता बंद है। शिवहर प्रखंड में, पिपरासी में घर-घर में पानी घुसा हुआ है। जो भी फसल थी, वह सारी बर्बाद हो गई है। सरकार किसी तरह की कोई मदद अभी तक करने में असमर्थ है।
मैं एक बात अपने दिल की गहराई से कहना चाहता हूं। बिहार में जननायक कर्पूरी ठाकुर जी नेता हुए थे। वे विपक्ष के नेता भी रहे और बिहार के मुख्य मंत्री भी रहे। वे विधान सभा में बोलते थे और बराबर इस बात को कहते थे कि उत्तर बिहार में तब तक गरीबी, बेबसी और भुखमरी समाप्त नहीं होगी, जब तक नेपाल से आने वाली नदियों को बांधने की कारगर व्यवस्था केन्द्र सरकार नहीं करेगी। अगर ऐसा किया जाए तो इससे इतनी बिजली पैदा हो सकती है कि हिन्दुस्तान ही नहीं, हम बाहर भी सस्ती दर पर बिजली दे सकते हैं। हमारी खेती बर्बाद हो रही है। गोपालगंज में शहर में पानी घुसा हुआ है। कलेक्टर एवं एस. पी. के घर में पानी घुसा हुआ है। पूर्व में अंग्रेजों के जमाने में जो सिंचाई सिस्टम था, त्रिवेणी कैनाल सिस्टम था एवं सोम कैनाल सिस्टम था वह भी नष्ट हो गया है। बिहार सरकार के पास साधन नहीं है। कई योजनाएं वहां से आकर भारत सरकार के यहां पड़ी हुई हैं। हम लोग बराबर मांग करते रहे हैं कि भारत सरकार संसाधन दे, सहायता करे, ताकि बिहार अपने पैरौं पर खड़ा हो सके, उन योजनाओं को पूरा कर सके, उन चीजों की मरम्मत कर सके। अंग्रेजों के जमाने में हमारे यहां सारशा तटबंध में नौ रिंग बांध बनाए गए और जो गांव बसे हुए थे, उनको नहीं उजाड़ा गया। उसको उधर की भाषा में धडकी बांध कहते हैं। रिंग बांध बनाये जाये लेकिन उनकी मरम्मत के लिए पैसा नहीं है। जब तटबंध एवं धडकी टूटती है तो बांध टूटने के कारण लोगों पर बाढ़ का असर पड़ता है। गोपालगंज से लेकर छपरा तक भारी क्षति होने वाली है। अधिक बातें न कहकर मैं भारत सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि अभी तत्काल उस इलाके में, बिहार के इलाके में जो बाढ़ से प्रभावित लोग हैं, उनको राहत पहुंचाने की आवश्यकता है। जिनके घर बह गये हैं, उनको फिर से बसाने की आवश्यकता है। उनको रेडीमेड फूड तथी पीने के पानी की सहायता पहुंचाने की आवश्यकता है तथा उनके कर्जे माफ किये जाएं, यह मैं मांग करता हूं। मेरी यह भी मांग है कि बिहार को अकाल ग्रस्त क्षेत्र घोषित किया जाये, बिहार की जितनी सिंचाई योजनाएं लम्बित हैं, उनको पूरा किया जाये और भविष्य में फिर से बाढ़ न आए, इसके लिए कारगर ढंग से नेपाल से बात करके इस बाढ़ से निजात दिलाने का काम करें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI K. MALAISAMY (RAMANATHAPURAM): Thank you Mr. Chairman, Sir. At the outset, I hasten to appreciate the whole House and the Members concerned for having brought this subject as one of the subjects to be discussed, which is particularly a core subject and it is felt need of the hour. It has been rightly taken for detailed discussion.
For long, Sir, drought has been the usual feature in India. It has been in existence for years and years from time immemorial, but this discussion on drought this time has got a special significance because its gravity and magnitude has been more than the expectation.
Secondly, it has been said that it is wide-spread and thirdly, pretty large-scale areas have been affected. Quoting the figures, they have said that out of 424 districts, more than 320 districts, that is more than two-third districts in the country, have been affected. That is why, it has been rightly taken up for discussion. As far as we could see, India by virtue of its location, its peculiar physical feature and its size, India has been considered to be the most drought-prone country in the world. This is how they have assessed. Drought comes very often because as far as our country is concerned, nearly 68 per cent of the total area are rain-fed and when monsoon fails, drought occurs.
As such, we could see that our Indian economy depends on agriculture and our agricultural economy depends upon the vagaries of monsoon. We are told that of all the monsoons, this South-West monsoon is vital. It plays a very important role in the economy of the whole country. I am told that 75 per cent of the total rainfall is concentrated on South-West monsoon alone. Then, South-West monsoon is responsible for 25 per cent growth of the GDP. Seventy per cent of the total population of one billion people are employed only during South-West monsoon. That is why, we are more concerned about South-West monsoon. When South-West monsoon behaves well, everything goes well. When it behaves bad, and when it fails, everything fails.
As far as South-West monsoon is concerned, I am told, it started very early in Kerala rightly, but unfortunately, during its progress and growth, it has been very erratic. The rainfall happens to be either scanty, or deficient not only in a few States, but as many as 14 States, including Tamil Nadu, have been affected.
According to today’s newspapers, this is what our hon. Minister of Agriculture has said. The whole country has been affected; a majority of the States has been affected. What could be its effect? The effect has been well expressed by many of the speakers. They referred to the shortage of drinking water and fodder. They have also said that people are migrating from one place to another highlighting how things are pretty bad and wrong and how the people are suffering at different stages. It has been listed out by many of the speakers and I do not want to repeat them.
As far as drought is concerned, I would like to tell you Sir, that Tamil Nadu is no way in a better position. We are as bad as the other States affected. The rainfall is much low. Out of the 27 districts in Tamil Nadu, nearly two-thirds of the districts, that is, 18 districts including my Ramanathapuram Constituency are affected by drought, which is due to deficient and scanty rainfall. This year, the percentage of rainfall has very badly come down.
I will take a minute to tell you how the storage position in the reservoirs in Tamil Nadu has declined. My colleague from Andhra Pradesh has stated that there was a decline in the normal storage of water in their reservoirs that was marginal. As far as water storage in reservoirs in Tamil Nadu is concerned, we have reached a precarious situation. In Mettur, as against the normal level of 140 feet, the storage now is 41.40 feet. As far as Bhavanisagar is concerned, the storage is only 35.10 feet as against 105 feet. In Amaravathi, it is 56.17 feet as against 110 feet. In Periyar, it is 111.40 feet as against 152 feet. In Vaigai, it is 25.40 feet as against 71 feet. In Krishnagiri, it is 41.75 feet as against 52 feet. In Sathanur, it is 72.7 feet as against 119 feet. In Papanasam, it is 50.55 feet as against 148 feet. In Manimuthar, it is 58.5 feet as against 118 feet. In Petchiparai, it is 2.70 feet as against 48 feet. In Perunchani, it is 9 feet as against 77 feet. In Parambikulam, it is 9.13 feet as against 72 feet. In Aliyar, it is 60.80 feet as against 120 feet. In Tirumoorthy, it is 33.88 feet as against 60 feet.
What I am trying to highlight here is that there is not even one-third or not even 20 per cent storage. This is what I am trying to say. The total storage at present is only 25,024 million cubic feet as against the normal storage level of 78,666 million cubic feet. Not only the monsoon has failed, but the storage position in the reservoirs also is found to be very bad. That is why, our dynamic Chief Minister has studied the situation very carefully and she visited Thanjavur and other places and took the initiative to launch a special relief programme with an amount of Rs. 164 crore and odd. For Madurai and Coimbatore, she has given a relief amount of Rs. 36.08 crore. In addition, she has initiated change of cultivation practices.
One more important factor that affected the sowing of paddy has been the non-release of water from Mettur Dam and other sources. Due to this, nearly one lakh hectares have not been brought under cultivation. With the result, the shortfall in the foodgrain production was 5.04 lakh metric tonnes; nearly 132 lakh mandays have been lost, and the loss in terms of value was nearly Rs. 260 crore. I am citing this example to highlight the magnitude of the problem in Tamil Nadu.
The condition could be grave in other States also but the submission I want to make is that the condition is equally bad in our State. As far as the remedies are concerned, many of our friends mentioned a number of points. As a student of management, I have been taught that a single problem will have more than one solution. Now, the problem is that the rainfall is minimal and, therefore, the storage position is low.
17.00 hrs. Sir, many States have come under the grip of drought. What is the remedy? We can think of dividing the remedy into two parts – long-term remedy and short-term remedy. Many speakers have said that this is a recurring affair and why is the Administration so silent on that? Why are they not taking a permanent measure? What could be the long-term measure that would enable us to get rid of this problem? One problem leads to the other. Many speakers have suggested many things and I am inclined to suggest that we should have an effective water policy. Shri Mani Shankar Aiyar has mentioned as to how the Government has been lacking in its efforts for having an effective water policy. I endorse his views and would like to say that this country needs a proper water policy that could be useful for every one of us.
Sir, secondly, inter-linking of the rivers is a must and is also a long felt need. But unfortunately that aspect has not been given enough thrust. As far as the tanks and wells are concerned, I would like to mention that the sub-soil water table is going down everyday and there is scarcity of water. What should be done? I would suggest that more and more percolation ponds should be constructed.
Sir, next I would like to mention about water conservation. As a short-term measure, generation of sub-soil water table and rain harvesting should be made one of the important principles for water conservation.
Coming to management of drought, it is to be analysed whether something is wrong at the organisation level or at the manpower level or at the operational level? Many times crisis management is resorted. It warrants all out effort.
MR. CHAIRMAN: : Please conclude now.
SHRI K. MALAISAMY: Sir, you have given so much time to so many other Members but you are not willing to give me even two to three minutes more.
MR. CHAIRMAN: I have given you much more time than allotted for you.
SHRI K. MALAISAMY : Sir, I would take another three to four minutes to conclude my speech. Till that time please allow me to speak.
Sir, during drought management three things are to be kept in mind. They are, planning, preparation and performance. It has to be seen whether they have assessed the situation correctly or not; whether there has been proper planning and preparation; and finally whether they are performing efficiently . The top officer goes to the spot and he cuts across hierarchical disciplines in taking decisions and at the same time he deploys all the resources available so that the crisis is handled effectively.
Sir, what is the basis for providing central assistance to States? There should be some scientific and objective basis for arriving at the requirement of assistance for undertaking relief measures.
MR. CHAIRMAN: Please conclude now. I have given you much more time than allotted.
SHRI K. MALAISAMY : Sir, while doing this kind of gigantic physical operation, cases of misuse and corruption also come into play and on many occasions the intermediaries take away the major chunk of the assistance provided. So, a foolproof system should be devised so that the assistance provided reaches the beneficiaries.
SHRI PRASANNA ACHARYA (SAMBALPUR): Sir, I must begin my speech by offering my warm greetings to the Meteorological Department… (Interruptions)
सभापति महोदय : आचार्य जी, आपकी पार्टी से दो नाम है और आपका समय निर्धारित है जो बहुत थोड़ा है। यदि आप दोनों बोलना चाहते हैं तो आपको जल्दी समाप्त करना पड़ेगा।
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Sir, I am withdrawing my name in favour of him. So, he will be the only one speaker from our side.
SHRI PRASANNA ACHARYA : Sir, so far nobody has spoken from my Party and this is a serious matter and our State is also very much affected by this calamity.
Sir, I would like to begin my speech with a warm greetings to the Meteorological Department for their correct forecast of the monsoon this year! I fail to understand as to how they did forecast a very good and normal monsoon this year! By doing so, I should say, they misled the whole farming community, the entire Government and everybody. Therefore, my warm thanks to that Department! In future at least they should not give such ‘correct forecasts’.
I need not go into detail on the national scenario of drought and flood situation, as all the hon. Members who have spoken so far have vividly described it. A major part of the country is now affected by drought situation and two-three States are reeling under serious floods.
As you know, out of 142 million hectares of cultivable land in the country, around 100 million hectares of land is rain-fed. The remaining 42 million hectares are dependent on irrigation. The 100 million hectares of rain-fed area contributes to about 30 per cent to 35 per cent of the total foodgrain production in the country. Therefore, the Government may not have any problem so far as foodgrain production is concerned. We heard from different Members, hon. Member and ex-Prime Minister Shri Deve Gowda also mentioned it, that there are enough stocks of foodgrains with the Government and most of them are stinking in the warehouses. Therefore, there will be no problem for the Public Distribution System so far as foodgrain stocks are concerned. The people who would be suffering most due to this unprecedented drought situation in the country are the small and marginal farmers.
In the morning I was listening to the speeches of Shri Deve Gowda and a few other hon. Members. They were talking about discrimination that is sometimes shown by the Union Government against some States. Sir, I want to draw your attention, and through you the attention of the hon. Minister of Agriculture who has just left, to an important issue. The hon. Minister of Agriculture convened a meeting yesterday of representatives of some of the drought-affected States. We were surprised to know from the newspapers of the day before yesterday that Orissa, which is one of the worst affected States, was not invited for the meeting. I have no way out but to agree with Shri Deve Gowda and other Members who made those remarks about discrimination. It was only after our Chief Minister Shri Navin Patnaik contacted the Union Minister of Agriculture and requested that Orissa should also be invited to the meeting, at the eleventh hour, that an invitation was extended to Orissa.
I do not understand how the Central Government or the Ministry of Agriculture decides these things. The Agriculture Secretary was sent by the Union Government to Orissa on 19th and 20th, to take stock of the situation in the State. Very surprisingly, he made a statement in Bhubaneswar itself that the situation in Orissa was not alarming and that everything was all right there. He could, perhaps, make such an observation because there was a very good shower for an hour or two in the temple city of Bhubaneswar when he arrived there. Perhaps that made him give such a statement that the situation in Orissa was not alarming. I do not understand how the officials of the Union Government make assessment of the situation. If this is the situation, you can imagine what would be the fate of the millions of farmers now suffering due to flood and drought situations! As I have already said, I would not go into the details of national scenario. I will just mention certain points about my own State. The whole world knows that for four consecutive years, the State of Orissa has been suffering from different types of natural calamities. Everybody knows about the super cyclone of 1999 in which thousands and thousands of lives were lost and many properties were destroyed. Orissa is still reeling under the after-effects of that super cyclone. Subsequently, in 2000, there was a drought in more than 50 per cent of the Districts of Orissa. The State had again faced unprecedented floods last year, and this year there is this drought situation.
This year again, there is a drought situation.
As you know, the economy of our State has totally crumbled due to these consecutive natural calamities year after year. And, under this situation if the Union Government officials make the observation that everything is all right in Orissa, nothing is more unfortunate than that.
Here, I would just like to draw the attention of the hon. Minister. I am sure, he must be having the correct report. The rainfall position in my State in June, 2002 is like this. The normal rainfall should have been 219.0 mm whereas the actual rainfall was 108.9 mm. Similarly, in July -- I am having the report up to 19th July, 2002 -- the normal rainfall should have been 351.60 mm whereas the actual rainfall was 84.45 mm, which is (-) 62.08 per cent of the normal rainfall.
There is an alarming position due to this scanty and erratic rainfall in our State as well as in other parts of the country. As regards my State, there are three-four major irrigation and river dam projects. The biggest one is Hirakud Dam which falls in my Constituency. In Hirakud, the dead storage level is 590 feet, and you will be surprised to know that the actual water level is only 594 feet. So, it is only four feet, and this four feet is also due to rain on 19th and 20th July. So, this is a precarious position.
Likewise in Rengali River Dam Project, 109.72 mm is the dead storage level whereas now, the actual level is 110.12 mm. This is the report up to 15th July.
Similarly, in Upper Kolab, 844 mm is the dead storage level, and now the actual level is only 845 mm. It is just one foot extra.
So, Sir, the State irrigation potential cannot be made use of at this crucial juncture to save the Kharif crop. It has already been destroyed.
Now, Sir, I would like to draw the attention of the hon. Minister to the paddy position. Around 60 per cent cultivation is through sowing of seeds and 40 per cent is through transplantation. Though direct sowing has been completed in many districts of the State but the rice crop, in general, has only survived with poor growth, and Beushaning has been held up. The germination of seeds sown in uplands has been affected due to moisture stress. Rice seedlings in nursery beds have turned sick and stunted. Further transplantation could not be started due to want of adequate water in the field.
Sir, due to high temperature, evaporative loss of water from the crop fields has increased significantly. I give you one example. The daily evaporation at Bhubaneswar since 10th June has increased by about 40 per cent. This has accelerated the water loss from the soil. Low soil moisture supply to the plants on one hand and high transpiration loss from the crops on the other, have adversely affected the crop condition, particularly, the paddy crop which is the major crop in the State, whose water requirement is generally high.
As has already been said by other hon. Members, there are manifold repercussions of the situation. Though there is thermal power production, we mostly depend on hydel power. As I said, the water level is very discouraging, it will affect the hydel power production as well. Ultimately, it will also affect the Rabi crop.
Sir, another thing where I would like to draw the attention of the hon. Minister is this. We have experienced severe drought situation in 2000 after the Super Cyclone. At that time, everybody thought about human beings and nobody thought about the animals. We all know that thousands and thousands of animals in the rural areas died because there was no fodder for them. So, I think, it is the prime duty of the Government of India to look into this problem of animal by giving them enough fodder.
Sir, due to this situation, the ground water level is depleting everyday. I would not say that all the tube-wells are defunct but most of the tube-wells are getting defunct because of the depletion in the ground water level. The hon. Minister of Water Resources, who hails from my State, is also present here. So, the Central Ground Water Survey Board should be put to use immediately. The State Governments should be extended all the help. In order to have more drinking water facilities, more tube-wells should be dug in all the States. I do not say that it should be done only in Orissa, but it should be done in the entire drought affected areas.
Sir, please give me 2-3 minutes, and I will conclude my speech. I want to draw the attention of the Government to another aspect. You may say that it is not directly linked with the flood and drought situations, but I would say that this problem is linked with the farmers. Wherever there are no irrigation facilities, there is drought; but wherever there are irrigation facilities and wherever there is proper production – in some pockets – the farmers have no market to sell their products. This distress sale of paddy particularly in Orissa, in Chhattisgarh and in some such States, almost killed the farmers. When there is no rain, the farmers are starving and the common men are starving; and when there is irrigation system and when there is sufficient production, there is no market for the farmers to sell their products.
Some hon. Members have made this point and as I said, this is my feeling also. Sometimes, I feel that the Union Government is not giving equal treatment to all the States, to tackle this problem. When there was distress sale in Orissa, we broke our heads before the Food Corporation of India, before the Agriculture Ministry, before the Food Ministry, etc., but there was nobody to look into the problem.
My suggestion is this. The drought situation is prevailing now and I know of yesterday’s meeting taken by the Agriculture Minister, where some decision had been taken and some assistance had been declared. My Government has also asked for three million metric tonnes of foodgrains, particularly of rice. My suggestion to the Government of India and particularly to the Food Ministry is this. Please do not dispatch paddy for storage purpose only to other States like Orissa, which will be just to facilitate some other States which have some political clout here or whose leaders have some political clout in the Government, who can blackmail the Government.
MR. CHAIRMAN : Please conclude. The time allotted to your party is only eight minutes, but you have already taken 13 minutes.
SHRI PRASANNA ACHARYA : Poor States like ours or the parties like ours are the sufferers of this. No doubt, we are in the NDA and we will continue to be with the NDA. We are sincere supporters and we do not believe in the politics of blackmail and we do not believe in pressurising the Government on every matter. Due to this, there is nobody to listen to us. Therefore, my humble submission is that whatever foodgrains that are available in the godowns of Orissa or Chhattisgarh or any other small States should be consumed first during the drought situation and then only, we should dispatch foodgrains from other States. Just to facilitate some kind of storage or stocking in other States, they are dispatching foodgrains, particularly rice to those States. This is not a good system and they are not doing justice to such States, by means of this. This is my submission.
As some hon. Members have mentioned, I feel that it is a welcome step that an amount of Rs.60,000 crore has been earmarked for constructing road from Himalayas to Kanyakumari and from Atak to Cuttack, that is, from North to South and from West to East. It is a very welcome step. But from the First Five Year Plan onwards, there are so many irrigation projects which are pending.
MR. CHAIRMAN: Please conclude. There are other hon. Members to participate in the discussion.
SHRI PRASANNA ACHARYA : I will conclude within a minute. My humble submission is that whatever projects are pending should be cleared first. I will give you only one example of Orissa. There are a few projects in my State. In my own constituency, there is a project called Aung Dam Project which is pending since the last 40 years. Dr. Ayodhyanath Khosla was a great engineer of this country and who was, once upon a time, the Governor of Orissa and this project was his brainchild. That took about 40 years to get the sanction of the Technical Advisory Committee alone. Thanks to my Minister, we got the sanction.
MR. CHAIRMAN: Please conclude. Kindly cooperate with the Chair and conclude.
SHRI PRASANNA ACHARYA : I am concluding. Therefore, my humble submission to the Government is this. This is a very serious and a precarious situation that the whole country is facing. The Government of India should have proper coordination with different State Governments and should come up with a very concrete planning to face this situation.
Last but not least, let not the Union Government discriminate between different States.
SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): Sir, it has been decided not to have the ‘Zero Hour’ and Lunch Hour even tomorrow and continue with the discussion. It seems the reply will be given tomorrow.
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़): आदरणीय सभापति महोदय, पिछले वर्षों की तरह एक बार फिर हम इस सदन में सूखा और बाढ़ पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए हैं। पिछले वर्षों की चर्चा के बाद भी कोई ठोस परिणाम नहीं निकला और इस बार भी सरकार से बहुत ज्यादा आशा नहीं है। पिछली बार जब हमने बाढ़ और सूखे पर चर्चा की थी तब उसका उत्तर ग्रामीण विकास मंत्री ने दिया था। इस सरकार को यह जानने में एक साल लगा कि नहीं, इस बार चर्चा का उत्तर कृषि मंत्री और सिंचाई मंत्री द्वारा दिया जाना चाहिए, इसमें ग्रामीण विकास मंत्री का कम रोल है। हम इस सरकार से क्या उम्मीद करें। इन गलत नीतियों का कारण, इन गलत निर्णयों का कारण यह रहा कि बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए हम जन-प्रतनधियों पर कम निर्भर रहे और ब्यूरोक्रेसी पर ज्यादा निर्भर रहे। यही कारण रहा कि जितनी राशि राज्यों ने मांगी, उनको नहीं मिली जिसके कारण बाढ़ और सूखा पीड़ितों को जो राहत देनी चाहिए थी, वे नहीं दे पाए।
इसके साथ अभी हमारे बंधु ने बताया कि डिज़ास्टर मैनेजमैंट उप प्रधान मंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी देखेंगे और बाढ़ और सूखा कृषि मंत्री और सिंचाई मंत्री देखेंगे। जो व्यक्ति मानव आपदा से उत्पन्न स्थिति और आतंकवाद से नहीं निपट सका, वह प्राकृतिक आपदा से क्या निपटेगा, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा।…( व्यवधान)
इंडियन मीटीरियोलौजीकल डिपार्टमैंट की रिपोर्ट क्या कहती है। साउथ-वैस्ट मानसून जून के दूसरे हफ्ते में सक्रिय हो जाता है और सारा देश नजर लगाए बैठा था कि कब वर्षा आए और कब हम अपने खेत बोएं। लेकिन इंडियन मीटीरियोलौजीकल डिपार्टमैंट, जो कृषि विभाग के अन्तर्गत आता है, उनके सारे कथन गलत निकले। उनकी रिपोर्ट कहती है ---
"The Indian Meteorological Department has predicted a normal 2002 South-West monsoon. Quantitatively, the rainfall during the period June to September 2002 for the country as a whole is likely to be 101 per cent of the long period average rainfall. "
यह आई.एम.डी. कहता है। सबसे ज्यादा हास्यापद बात क्या है। वे यहीं तक चुप नहीं रहते। देश के १६ करोड़ किसानों को गुमराह करने के बाद जो बाढ़ और सूखे से प्रभावित हैं, वे आगे भविष्यवाणी करते हैं --
"It has also predicted 2003 monsoon to be quite close to long term average."
PROF. A.K. PREMAJAM (BADAGARA): It means next year also we will have drought.
श्री लक्ष्मण सिंह : इस साल तो आप बता सही नहीं पाए और अगले साल की भविष्यवाणी कर रहे हैं।…( व्यवधान)यह किस प्रकार का डिपार्टमैंट और सरकार है जो इस वैज्ञानिक युग में, २१वीं सदी में, इस प्रकार की गलत जानकारी किसानों को दे रही है। एक महीना बर्बाद करने के बाद, १६ जून से १६ जुलाई तक कृषि विभाग द्वारा कुछ नहीं किया गया और एक कीमती महीना बर्बाद कर दिया गया। उसके बाद १६ जुलाई को कृषि मंत्री जी की नींद खुलती है। १७.०७.२००२ के हिन्दू अखबार की खबर है।
Delayed monsoon worries Government. एक महीने की नींद के बाद सरकार जागती है और कृषि मंत्री जी कहते हैं:
"The Union Agriculture Minister, Shri Ajit Singh, reviewed the situation with senior officials of his Ministry, the Indian Council of Agricultural Research, and the IMD. "
और मीटिंग के बाद क्या निष्कर्ष निकाला:
"Later he said that a contingency plan was in place and an officer of the level of Joint Secretary would coordinate relief for farmers. "यानी फिर वही गलती कि एक जोइंट सैक्रेटरी के पद का अधिकारी, एक ब्यूरोक्रेट इस देश के समस्त सूखा प्रभावित किसानों को, इस देश के समस्त बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाएगा, यह कृषि मंत्रालय के लिए शर्म की बात है। यही कारण रहा कि इन गलत निर्णयों के कारण आज हम देखते हैं कि जो गरीब प्रदेश हैं, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़, आज इन प्रदेशों में दलहन और तिलहन का क्षेत्र बहुत कम हो गया है, क्योंकि हम लोगों ने सही निर्णय सही समय पर नहीं लिए। अगर हम यह देखें कि देश में बाढ़ और सूखा पिछले २०० वर्षों में कितने पड़े हैं…( व्यवधान) मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा।
मोटे तौर पर यह है कि पिछले दो सौ वर्षों में ४५ बार हमारे देश में सूखे पड़े हैं और सबसे ज्यादा सूखे हमारे देश में १९७० और २००० के बीच में पड़े हैं। सूखा प्रभावित क्षेत्रों को केन्द्र सरकार द्वारा जो मदद दी गई है, उसके कुछ आंकड़े मैं प्रस्तुत करना चाहूंगा। बिहार ने १९९८-९९ में १००३ करोड़ रुपये मांगे और ११ करोड़ रुपये दिये। १९९९-२००० में बिहार ने ७०१ करोड़ रुपये मांगे और आपने ३८ करोड़ रुपये दिये। २००१-२००२ में बिहार ने ७३५ करोड़ रुपये मांगे और आपने एक पैसा नहीं दिया। मध्य प्रदेश ने आपने १९९८ में २५१ करोड़ रुपये मांगे और आपने एक पैसा नहीं दिया। उसका कारण यह रहा कि मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में आप और हम सब ने मिलकर यहां प्रदर्शन किया, यहां सैंकड़ों-हजारों किसान आये। हमने ५५६ करोड़ रुपये मांगे और हमें ३८ करोड़ रुपये मिले। पिछले वर्ष हमने २५३ करोड़ रुपये मांगे और जवाब यह मिला कि आपका मामला विचाराधीन है, लेकिन अभी तक एक पैसा नहीं मिला। इस साल ६०० करोड़ रुपये की मांग है, भारी सूखा पड़ा है, लेकिन कितना पैसा मिलेगा, पता नहीं। महाराष्ट्र, पंजाब का भी यही हाल है और राजस्थान ने पिछले वर्ष ११३ करोड़ रुपये मांगे, लेकिन एक पैसा नहीं मिला। Karnataka asked for Rs.903 crore but not a penny was given. गलत नीतियों का परिणाम यह है कि आज हमें गलत आंकड़े दिये जाते हैं, गलत जानकारी सदन को और देश को दी जाती है। सरकार के आंकड़े कहते हैं कि १९७३-७४ में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या ५५ प्रतिशत थी और १९९९-२००० में इस सरकार के चलते २६ प्रतिशत हो गई है, यह सरकार का दावा है। उसके ठीक विपरीत डॉ. एस. स्वामीनाथन, जो माने हुए कृषि वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने इस देश में हरित क्रान्ति लाकर बताई, वे जो कहते हैं, वह इस सरकार के आंकड़ों से सही होगा। वे कहते हैं कि २६० मलियन लोग इस देश में गरीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। यह २६ प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। इसलिए सरकार का यह दावा भी कि २६ प्रतिशत ही गरीब इस देश में हैं, पूरी तरह से असत्य है। मैं कुछ आंकड़े देकर अपनी बात समाप्त करूंगा, कोई सामान्य भाषण नहीं दूंगा। देश में १३० मलियन हेक्टेयर जमीन में मिट्टी का कटाव प्रति वर्ष होता है। १९७४ में देश में सूखे का क्षेत्र ५५.३ मलियन हेक्टेयर था, वह १९९६ में बढ़कर ७४.६ मलियन हेक्टेयर हो गया। जब सूखे का क्षेत्र बढ़ा है तो कौन कह सकता है कि गरीबी हटी है। जब अकाल या सूखा बढ़ा है तो गरीबी भी उसके बढ़ेगी, घटेगी नहीं।
एक अंग्रेजी पत्रिका "डाउन टू अर्थ" के १५ मई के एडीशन में बहुत अच्छा सर्वे प्रकाशित हुआ है। उन्होंने देश के सबसे ज्यादा सूखा प्रभावित जिलों का आंकलन किया है। आप ताज्जुब करेंगे, एक जिला आंध्रा प्रदेश में है अनंतपुर, यहां हमारे टी.डी.पी. के सांसद नहीं हैं, उसकी कहानी क्या है, "Water was never so scarce as it is now with an average rainfall of 520 m.m. Its history is replete with one of finest India’s water harvesting traditions. Some five thousand tanks harvested enough water till the sixties."
पांच हजार तालाब इस एक जिले में थे और वाटर हार्वेस्िंटग होती थी।
"This sustained traditional agriculture. Till the seventies, these tanks ensured prosperity. Legend has it that in the 15th, till the 18th century, its local markets used to sell pearls and diamonds along with groundnuts."
यह जिला लैंड आफ ज्वैल्स कहलाता था, लेकिन सरकार की गलत नीतियों के चलते आज यह जिला लैंड आफ रॉक्स हो गया है।
MR. CHAIRMAN : You have taken fifteen minutes whereas your Party allotted only ten minutes for you.
श्री लक्ष्मण सिंह : मैं आखिरी बात कहना चाहूंगा। मैं मानता हूं कि लम्बे भाषण से इसका समाधान नहीं होगा। देवेगौड़ा जी ने जैसा बताया, वह सही बताया कि गंगा-कावेरी लिंक प्रोजेक्ट एक आवश्यकता है। उन्होंने बहुत अच्छी बात कही कि जब ६०,००० करोड़ रुपया सड़क बनाने पर हम खर्च कर सकते हैं तो इतना पैसा उन योजनाओं पर खर्च करें, जहां बाढ़ का पानी सूखाग्रस्त क्षेत्रों में आ सके। मैं इससे अपने को सम्बद्ध करता हूं और सदन से निवेदन करता हूं कि आइए हम सब खड़े हों और इस योजना को मूर्त रूप दें।
सभापति महोदय, मैं आपका आभारी हूं और इस बात को मानता हूं कि जनप्रतनधि जब तक सूखे से प्रभावित या बाढ़ से प्रभावित इलाके के लोगों के बीच में नहीं जाएंगे, काम नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा और सरकार भी सचेत नहीं होगी।
श्री छत्रपाल सिंह (बुलंदशहर): सभापति महोदय, आज हम देश के वभिन्न हिस्सों में आई बाढ़ और सुखाड़ पर चर्चा कर रहे हैं। इस देश के लगभग १४ राज्य सूखे से प्रभावित हैं। एक तरह से यह देश का कुल दो तिहाई भाग है। दुखद स्थिति यह है कि जो राज्य ज्यादा अन्न उत्पादित करते हैं, वे सूखे की चपेट में आ गए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य अनाज पैदा करके बाहर भेजते थे, लेकिन आने वाले दिनों में उनके यहां भी खाने की स्थिति खराब हो जाएगी। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गंगा और यमुना का बेसिन, जो दुनिया में सबसे उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है, आज सूखे की चपेट में है। वहां ६० प्रतिशत से ७० प्रतिशत तक फसल नष्ट हो चुकी है। आने दिनों में अगर बारिश हो जाए और हम फसल लगा भी लें और बारिश लगातार न हो, तो भी फसल नहीं होगी। अगर यहां की क्लाईमेट कंडीशन नहीं बदलेंगी, तो आने वाले दिनों में फसल नहीं होगी, बीज नहीं लगेगा। मोटे अनाज की बिजाई विशेष तौर से सूखे से प्रभावित हुई है। जहां पहले यह ९० लाख हेक्टेयर में होती थी, इस बार केवल ४० लाख हेक्टेयर में हुई है। बाजरे की फसल जहां पहले ३० लाख हेक्टेयर में होती थी, इस बार केवल १६ लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है ।यही हालत सोयाबीन की है जिसको हम एक्सपोर्ट करके विदेशी मुद्रा भी कमाते हैं। ५१ लाख हेक्टेअर पिछले साल बिजाई हुई थी। इस बार केवल १८ लाख बिजाई हो पाई है। मौसम विभाग के बारे में काफी लोगों ने चर्चा की है। मौसम विभाग जिसमें लम्बा-चौड़ा इंजीनियर्स का सैट-अप बिठा रखा है और उनकी एक भी बात सच नहीं निकलती। उनसे तो अच्छा है कि चार पंडितों को बिठा दिया जाये तो उनकी बात फिर भी सच निकल सकती है। २६ उपमंडल हैं और उनमें बहुत कम बारिश हुई है या बिल्कुल बारिश नहीं हुई है और मौसम विभाग वाले कहीं भी नहीं बता पाए कि समय से बारिश होगी और इस तरह देश को गुमराह करते रहे कि मानसून आने वाला है। किसानों ने अपने खेतों में बीज डाल दिये और खेत सूख गये। पूरे देश में ७० जल भंडार हैं। उनकी क्षमता इस वक्त १७ प्रतिशत रह गई है। अगर बारिश नहीं हुई तो १७ प्रतिशत पानी भी समाप्त हो जाएगा और पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाएगी। यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह अखबार के आंकड़े बताते हैं। जल संचय के पुराने साधन भी समाप्त हो गये हैं। गांवों के लोगों ने आबादी बढ़ा ली, उथले तालाबों को भी खेत बना लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पुराने तालाबों को खाली करके उनकी खुदाई की जानी चाहिए परंतु मेरी जानकारी के अनुसार किसी भी प्रदेश सरकार ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया और अब आने वाले दिनों में पीने के पानी की समस्या भी उत्पन्न होगी। मवेशी भी पीने के पानी की कमी से मर रहे हैं।
देश में बारिश का औसत धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। प्रतिवर्ष डेढ़ लाख हेक्टेअर वन क्षेत्र में कमी हो रही है और जहां इस देश में कभी साठ के दशक से पहले ६० प्रतिशत वन क्षेत्र था, आज वह ३२ प्रतिशत वन क्षेत्र रह गया है और हम सूखे की तरफ अग्रसर होते जा रहे हैं। किसी वैज्ञानिक ने भविष्यवाणी की थी कि वन्य क्षेत्रों का यदि कटाव जारी रहा और मानसून की यही स्थिति रही तो गंगा और जमुना के बेसिन की हालत वही हो जाएगी जो आज भरतपुर में है। वहां पीने के पानी की और सिंचाई के साधनों की कोई स्थिति नहीं है। अगर गंगा और यमुना के बेसिन की स्थिति भी ऐसी हो जाएगी तो देश अनाज के लिए तरस जाएगा। मैं उत्तर प्रदेश का जिक्र करना चाहता हूं। अभी कुछ जिले सूखा घोषित किये गये हैं। मैं प्रदेश सरकार के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। सही मायनों में पूरा उत्तर प्रदेश सूखे की चपेट में है। जिला प्रशासन ने समय के हिसाब से सिफारिश नहीं भेजी, जिले के आंकड़े नहीं भेजे कि कितनी प्रतिशत फसल नष्ट हो गई है और यही कारण है कि प्रदेश सरकार समय से सूखा घोषित नहीं कर पाई। ब्यूरोक्रेट्स को चिंता ही नहीं है चाहे इंसान मर जाये, मवेशी मर जाएं पर उन्हें देहात जाकर देखने की फुर्सत नहीं है।
बुलंदशहर एक अच्छा जिला है लेकिन वहां ६०-७० प्रतिशत फसल समाप्त हो गई है। अगर बारिश हो भी गई तो भी इसे रिवाइव नहीं किया जा सकता। १४ जिलों को अभी सूखा ग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया और लोगों में बैचेनी हुई कि यह क्या हो रहा है। बुलंदशहर, आगरा और कानपुर मंडल के कई जिलों को पहले सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि लोगों में इससे बैचेनी होती है कि यदि सरकार स्थिति में दुराव की नीति अपनाएगी तो सूखे से कैसे निपटा जाएगा?
महोदय, आज कांग्रेस के लोग कह रहे हैं कि सरकार कुछ नहीं कर रही है। सरकार पूरी सहायता नहीं कर रही है। हालांकि यह प्रकृति का प्रकोप है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण ही देश सूखे की स्थिति से नहीं लड़ पा रहा है। देश को आजाद हुए आज ५५ साल हो गए हैं और इन ५५ सालों में कांग्रेस ने देश में ४८ साल राज किया है। इन ४८ सालों में इन्होंने हनुमतैया रिपोर्ट को भी कार्यान्वित नहीं किया । माननीय देवगौडा जी ने जो बात कही है, वह सही है । माननीय प्रधान मंत्री जी ने सड़क निर्माण के लिए बृहद् योजना बनाई है कि हर गांव को सड़क से जोड़ा जाएगा। पूरे देश के महानगरों को सड़क से जोड़ा जाएगा । इसी तरह की योजना जल संसाधन के क्षेत्र में बनायी जानी चाहिए। इसके साथ ही १०-२० सालों से जो जल योजनायें लम्बित पड़ी है, उनके बारे में प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि इन योजनाओं को पहले पूरा करेंगे और दूसरी योजनाओं को बाद में देखेंगे। पहले इस देश के किसानों के बचाया जाएगा। किसान बचेगा, तो देश बचेगा । अगर किसान नहीं बचेगा, तो देश भी नहीं बचेगा।
महोदय, गंगा का पानी बहता जा रहा है और गंगा नदीं पर केवल दो ही नहरें निकाली गई हैं। हरिद्वार में एक अपर-कैनाल और दूसरी कैनाल नरौरा में निकाली गई है। इसके बाद एक हजार किलोमीटर तक गंगा नदी पर एक भी कैनाल नहीं निकाली गई है। पूरे बिहार में तो एक भी कैनाल नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक भी नहर नहीं है। …( व्यवधान)लिफ्ट कैनाल से कितनी सिंचाई होती है। जब तक बड़ी योजनायें नहीं होगीं, तब तक कुछ नहीं हो सकता है। जल बेकार जा रहा है । बिहार में बाढ़ आ रही है और असम में भी ब्रहमपुत्र नदी में बाढ़ आ रही है। नार्थ-ईस्ट में भी बाढ़ आ रही है। यह देश का दुर्भाग्य है कि एक ही समय में देश में बाढ़ से भी लोग मर रहे हैं, सूखाड़ से भी लोग मर रहे हैं। यहां आदमी गरमी से भी मरता है, लू से भी मरता है और ठंड से भी मरता है तथा बरसात से भी मरता है । दुनिया में शायद यह एक देश है, जहां हर मौसम में लोग मारे जाते हैं। …( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :दंगों से भी मारे जाते हैं । …( व्यवधान)
श्री छत्रपाल सिंह : यह तो आपकी मेहरबानी है।
महोदय, मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता हूं। लेकिन वास्तविकता यह है कि सन् २०००-२००१ में बाढ़ और सूखाड़ से लगभग २,६९४ लोग मारे गए हैं। यदि हम गुजरात के भूकम्प में मारे गए लोगों को जोड़ लें, उनकी संख्या २२,६३३ है। यह बड़ी दुखद स्थिति है कि देश में लोग न लू से बच पाते हैं और न पानी से बच पाते हैं। इसके साथ ही जल स्तर भी नीचे जा रहा है। सरकार द्वारा जितने टयुबवैल लगाए गए थे, वे सब सूखे पड़े हुए हैं। जहां थोड़ा बहुत पानी है, वहां पचास प्रतिशत फसलें खत्म हो गई हैं। जिस तरह से टैम्प्रेचर बढ़ रहा है, उसको देखते हुए लगी हुई फसलें भी बरबाद हो जायेंगी। मान लीजिए, अगर मक्का की फसल में बाली निकल आई है और तापमान अधिक है, बाली जल कर खत्म हो जाएगी और कोई दाना पैदा नहीं होगा। यही हाल दूसरी फसलों का भी होगा। क्लाइमेटिक कंडीशन पर फसलें पैदा होती है। सदन में जल संसाधन मंत्री जी उपस्थित है और मैं कृषि मंत्री जी से कहना चाहता हूं, जो २०-२५ योजनायें लम्बित पड़ी हुई हैं, उनको पूरा करने की ओर ध्यान देना चाहिए। नहरें बनाकर उनमें पानी छोड़ा जाना चाहिए। टयुबवैल को बिजली उपलब्ध कराकर सिंचाई की व्यवस्था की जानी चाहिए, नहीं तो सूखाड़ की स्थिति से नहीं लड़ा जा सकेगा। फूड फॉर वर्क योजना के बारे में जो सुझाव दिए गए हैं, वही सुझाव मैं भी दे रहा हूं। माननीय मंत्री जी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते हैं, यह गन्ना उत्पादन क्षेत्र है। किसानों के गन्ना उत्पादन का बकाया मिलों के पास है। अगर यह बकाया राशि किसानों को मिल जाए, तो वह खेती को सुधारने के लिए पैसा लगा देगा। एक तरफ किसानों से वसूली हो रही है दूसरी तरफ उसे पैसा नहीं दिया जा रहा है। उसके ऊपर ब्याज बढ़ रहा है। उसकी वसूली न होने पर उसे बंद किया जा रहा है। इस तरह किसानों के साथ दोहरा व्यवहार हो रहा है जो अत्याचारजनक है। यह देख कर हमें बहुत बुरा लगता है। सरकारी धन पर उसका भी हक है लेकिन इसके बावजूद उसे बंद किया जा रहा है। इस बारे में प्रदेश सरकार से बात करके इसे रोकना चाहिए। आने वाले दिनों में जो स्थिति सूखे की है, उसमें केवल आपका विभाग सम्मिलित नहीं होगा स्वास्थ्य मंत्रालय को भी अभी से तैयारी करनी होगी। कहीं सूखे से बीमारी न फैल जाए यह देखना होगा। अगर बीमारी फैलेगी तो भयंकर रूप सामने आएगा। आपको पीने के पानी की व्यवस्था करनी होगी। इंडिया मार्क के पंप लगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा साधन जुटाने होंगे। आप आने वाले दिनों में कृषि का बजट बढ़ाइए। इसके बाद ही आपातकालीन स्थिति में आप किसानों के लिए बेहतर काम कर पाएंगे।
आज दूसरे देश डबल्यूटीओ के चक्कर में चिल्ला रहे हैं कि कृषि पर सबसिडी कम कीजिए लेकिन अमेरिका किसानों को दी जाने वाली सबसिडी को बढ़ा रहा है। वह हमें सबक दे रहा है कि इसे कम करिए। आप दूसरे देशों के दबाव में न आकर किसानों की चिन्ता करें। कृषि क्षेत्र में सबसिडी बढ़नी चाहिए, यही मेरा सुझाव है।
SARDAR SIMRANJIT SINGH MANN (SANGRUR): Mr. Chairman, Sir, somebody from Punjab also should speak. It is an important agricultural State. We have been totally ignored. Will you please give us some time?
MR. CHAIRMAN : You will get a chance.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदय, यह अजीब विडम्बना है कि मानसून सत्र में हम सूखे पर बहस कर रहे हैं। लोग कहते हैं कि हिन्दुस्तान की खेती जुए के समान है और हिन्दुस्तान का असली कृषि मंत्री मानसून होता है लेकिन अजीत सिंह नहीं हैं। इस साल मानसून ने धोखा दिया है और सरकार का भंडा फूट गया। यह कैसा मैनजमैंट है? प्रधान मंत्री डिजास्टर मैनेजमैंट के अध्यक्ष हैं। उस कमीशन का क्या हुआ? सभी जगह डिजास्टर हो रहा है। आपका मैनेजमैंट कहां चल गया? बांध टूट गए। बाढ़ और सूखे से लोग मर रहे हैं। उड़ीसा के माननीय प्रसन्न आचार्य जी चले गए। वह कह रहे थे कि उड़ीसा को मीटिंग में नहीं बुलाया गया। आपने बिहार वालों को तो छोड़ दिया लेकिन बिहार के साथ-साथ उड़ीसा को भी छोड़ दिया। धनराशि देने की बात अलग, बुलाने में भी कोताही बरती गई, भेदभाव किया गया। यह कैसा इन्साफ है? उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया? देश के पहले से १६ राज्य, १८३ जिले और ९७१ ब्लॉक ड्राउट प्रोन एरियाज घोषित किए गए हैं। यहां मानसून में वर्षा होती थी लेकिन इस साल वर्षा नहीं हुई। इसलिए आज हम सूखे पर बहस कर रहे हैं। इसके अलावा सरकार ने ५२४ जिलों की फीगर्स इस किताब में दी हैं लेकिन इनमें से ३२० जिले सूखे से प्रभावित हैं। इसमें १८३ जिले हैं या नहीं, यह मैं सरकार से जानना चाहता हूं। इनका क्या हिसाब है? भारत सरकार अखबार भी नहीं पढ़ती।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानां सृजाम्यहम्।
जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब भगवान अवतार लेते हैं। हमें आशंका होने लगी है कि शायद भगवान अखबार नहीं पढ़ते होगे कि यहां जोर-जुल्म हो रहा है और यहां अवतार नहीं लेते हैं। इसलिये लग रहा है कि सरकार अखबार नहीं पढ़ती है। बिहार में हिन्दी का दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान, तारीख २२ जुलाई, २००२ के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है‘ कुदरत के रंग, कहीं झमाझम बारिश, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा।’ बिहार में कहीं बाढ़ है तो कहीं सूखा है। जो रिपोर्ट लिखी है - " सीवान जिले में गरीब किसान अपने धान के लहलहाते खड़े खेत अपने पशुओं को खिलाने लगा है। लगातार डीजल पम्प सैट चलाते उसकी पाकिट खाली हो गई है। तमाम स्थिति किस तरफ इंगित कर रही है कि सीवान जिले में सारे लोग हाहाकार कर रहे हैं, सभी चिल्लाकर‘ अकाल है, अकाल है’कह रहे है। ऐसी बात नहीं कि बादल नहीं आते हों, हवा भी तेज चलती है लेकिन वर्षा नहीं हो रही है। मैंने एक उदाहरण दिया है। मुझे आश्चर्य है कि सरकार के पास क्या रिपोर्ट है, कितने जिले और कितने राज्य इस रिपोर्ट में छूट गये हैं। बिहार और उड़ीसा तक छूट गये हैं। वहां बरसात कहीं कहीं देर से हुई। रामचरित मानस में भी कहा गया है कि जब कृषि सूख जाये तो फिर वर्षा होने का कोई मतलब नहीं।
सभापति महोदय, सरकार से आग्रह है कि वह रिपोर्ट मंगाकर देखे कि कितने जिलों में रोपणी हुई है। वहां ६ जिले पहले से ही सूखे की लपेट में थे। पाकिट से डीजल खर्च करके किसान तबाह हो गया है, मर रहा है। श्री लक्षमण सिंह जी रिपोर्ट पढ़ रहे थे कि अन्य राज्यों को जो अनाज मिला और बिहार को ‘ काम के बदले अनाज योजना ’ में एक लाख टन सड़ा हुआ अनाज मिला जिसे लोगो ने नहीं उठाया। नेशनल कैलेमिटी कंटनजैंसी फंड में बिहार को पैसा नहीं मिला, अन्य राज्यों को मिला। मैं सरकार पर भेदभाद अपनाये जाने का आरोप लगाता हूं। बिहार सरकार से मैमोरेंडम आया। वहां स्पेशल टीम गई, जांच-पड़ताल की गई जिसमें पाया गया कि ९७६ करोड़ रुपये की फसल बरबाद हुई। हम लोगों ने प्रधान मंत्री जी को ज्ञापन दिया लेकिन उस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। देश के कुछ राज्य बाढ़ से और कुछ राज्य सुखाड़ से प्रभावित हैं लेकिन बिहार बाढ़ और सुखाड़ के अतरिक्त सरकार से भी तबाह है। इस प्रकार बिहार बाढ़,सुखाड़ और सरकार से तबाह है। एक विपत्ति से मुकाबला किया जा सकता है लेकिन वहां तीन ओर से तबाही है। भारत सरकार ने एक पैसा भी नहीं दिया है। बिहार गरीब राज्य है जिसके साथ भेदभाव किया गया। इसके बारे में मैं संक्षेप में बताऊंगा। बिहार को नेशनल कैलेमिटीज फंड से एक पैसा नहीं दिया गया। ११वें वित्त आयोग ने अनुशंसा की लेकिन भारत सरकार ने बिहार का बटवारा करने के बाद भी भेदभाव किया। बिहार को जमीन के आधार पर बांट दिया और नेशनल कैलेमेटीज फंड का पैसा भी ११वें वित्त आयोग ने जमीन के आधार पर बांट दिया ।आयोग का कहना है कि दस वर्षों तक जहां जितनी बरबादी हुई है उसका एवरेज लेकर होना चाहिए। झारखंड में प्राकृतिक आपदा कम हैं, वहां बाढ़ नहीं है। एकाध जिले में कभी-कभी बाढ़ होती है। लेकिन सभी लोग जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नदियों के कारण अभी बाढ़ जिला तबाह हुआ है। गोपालगंज से लेकर नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में पश्चिम चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, शिवहर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, छपरा, सीवान, मधुबनी और दरभंगा आदि जिले तबाह हुए हैं। वहां बांध टूट गये, घरों में पानी चला गया। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर के रास्ते बंद हो गये। १२ से १५ लोगों के मरने की कल तक की रिपोर्ट है। इसके अलावा भी रिपोट्र्स आ रही हैं।…( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव :आप केवल बिहार पर बोल रहे हैं, राजस्थान के बारे में भी बोलिये।
सभापति महोदय : यादव जी, जब आपका नम्बर आये, तब आप बोलिये। बोलने वालों में आपका नाम भी है, आप तभी बोलिये।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम राजस्थान पर भी बोलेंगे। लेकिन बिहार के साथ बड़ा अन्याय हुआ है। बिहार के साथ प्रकृति का अन्याय, सरकार का अन्याय हुआ है। बाढ़, सुखाड़ और सरकार तीनों से बिहार की तबाही हुई है। गंडक, बागमती आदि नदियों से वहां तबाही होती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नदियों से तबाही होती है। अभी रघुनाथ झा जी ने सवाल उठाया, उन्होंने एक बार नहीं कई बार सवाल उठाया। लेकिन यहां विदेश मंत्री तथा वित्त मंत्री के रहते सारी जिम्मेदारी सिंचाई मंत्री पर चली गई। भारत सरकार और नेपाल सरकार के बीच कब समझौता होगा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से कंवरसेन कमेटी गई थी। उसने कहा कि बिहार में बाढ़, जल जमाव और सुखाड़ से इतनी तबाही होती है, उसका इंतजाम करना राज्य सरकार के बस की बात नहीं है। इसलिए केन्द्र सरकार को जिम्मेदारी लेकर उसका इंतजाम करना चाहिए। कंवरसेन कमेटी की रिपोर्ट है, उस पर सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती है। मैं मांग करता हूं कि उस पर कार्रवाई हो और और कैलोमिटी रिलीफ फंड के बंटवारे पर बिहार के साथ नाइंसाफी हुई है, जमीन के आधार पर ५६ प्रतिशत बिहार को और ४४ प्रतिशत झारखंड को दिया गया है। झारखंड जहां प्राकृतिक आपदा नहीं है या बहुत कम है। लेकिन जहां आपदा हैं, वहां दस वर्षों को हिसाब जोड़ा जाना चाहिए। इसमें सरकार सुधार करे। भारत सरकार ने बिहार के साथ नाइंसाफी की है।
सभापति महोदय, कृषि फसल बीमा योजना लागू होनी चाहिए। मैं उसकी मांग कर रहा हूं। जल जमाव, बाढ़ और सुखाड़ के लिए भारत सरकार जिम्मा ले। भारत और नेपाल समझौता हो और गंडक फेस-२, कोसी फेस-२, बागमती परियोजना को माननीय मंत्री जी देखें। दस लाख हैक्टेअर में जल जमाव है, अभी माननीय रघुनाथ झा जी ने कहा है, उसके लिए पैकेज देना है। लेकिन कुछ नहीं होता है। किसानों पर मुफ्त में मालगुजारी लगती है। इसलिए उसे विशेष प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
सभापति महोदय, एक मलियन स्वैलो टयूबवैल की योजना भारत सरकार के जिम्मे है और सरकार ने उस पर अपनी सहमति भी दी है। इसमें हजारों किसानों की पिटीशन पड़ी हुई है। लेकिन इसमें बैंक वाले असहयोग कर रहे हैं। बैंक वालों पर कौन जवाब देगा। इसके लिए कौन मंत्री जी हैं। हम किनको बतायें, किससे पूछें। ६४ हजार किसान इनडविजुअल के लिए भारत सरकार से मदद की बात है, इसमें राज्य सरकार भी है और किसान अपनी तरफ से भी कुछ लगा देंगे। बैंक से उन्हें ऋण मिलना चाहिए। इस योजना का नाम ६४००० मलियन स्वैलो टयूबवैल है। यह बहुत मशहूर और किसानों के लिए लाभदायक योजना है। लेकिन बैंक वाले ऋण नहीं दे रहे हैं। इसलिए किसान परेशान हैं, तबाह हैं। लेकिन कुछ नहीं हो रहा है।
इसके अलावा ऊसर भूमि विकास परियोजना कृषि विभाग में पड़ी हुई है। उसकी मंजूरी हो जाए और ट्रांसमीशन लाइन प्रोजेक्ट बिजली के बिना किसान की कोई मदद नहीं कर सकती है। बिजली होने से वह पम्पसैट लगायेगा, चूंकि बिजली सस्ती होती है। डीजल से पम्पसैट चलाते-चलाते किसान मारे गये, तबाह हो गये। जो ३३५ करोड़ की योजना आई है, वह प्लानिंग कमीशऩ में हैं, उसे तुरंत मंजूर किया जाए। जिससे वहां कि ट्रांसमीशऩ लाइन दुरुस्त हो जाएं। इसे पावर ग्रिड कारपोरेशन के द्वारा कर दें।
18.00 hrs. सीतामढ़ी जिले में एफ.सी.आई. का अनाज नहीं पहुँच रहा है। हमने टेलीफोन से बात की तो कहा गया कि एफ.सी.आई. वाले मंत्री चले गए हैं, यही देख लेंगे। सीतामढ़ी में एफ.सी.आई. वाला अनाज नहीं पहुँचा। सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर का संबंध विच्छेद हो गया। वहां अनाज नहीं है। बागमती और अदवाड़ा समूह की नदियों से तबाही हो रही है। …( व्यवधान)पूरे देश में सूखा पड़ा हुआ है और ये ३२० जिले कह रहे हैं। देश भर में ५७० जिले इसकी चपेट में आ गए हैं और ये ५२४ जिले ही कह रहे हैं। इसीलिए देश भर में सुखाड़ और बाढ़ को अकालग्रस्त घोषित किया जाए और किसानों का कर्ज़ा माफ किया जाए। किसान पर कर्ज़ा बढ़ता जाता है, सूद बढ़ता जाता है इसलिए उसे माफ किया जाए। इसके लिए ऐसी कार्य योजना चलाई जाए जिससे सुखाड़ का मुकाबला किसान कर सके। सिंचाई को प्राथमिकता दी जाए और किसानों की मदद की जाए नहीं तो किसान तो तबाह ही होगा। …( व्यवधान)इस सरकार में सब कुछ तबाह हो रहा है, लेकिन किसान सब आपदाओं के बाद भी तरक्की कर रहा है। इसलिए किसान को तरजीह देनी चाहिए। खेती पर ही आधारित हमारी इकोनॉमी है, इसलिए बाढ़, सुखाड़, जल-जमाव सबका मुकाबला करने के लिए सरकार को किसानों की मदद करनी चाहिए।
SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): Hon. Chairman Sir, this august House is discussing the drought situation in the country. I thank the Chair for giving me an opportunity to speak on this haunting problem.
The Indian sub-continent is so vast that natural calamities in various forms affect the country one and at the same time. Droughts and floods have become recurrent features. If one part of the country is hit by floods, another part of the country is hit by droughts. It is 55 years since we have attained freedom. The successive Governments have failed over the years. National disasters cause a great threat to national resources. But we have not evolved a viable mechanism all these years.
It is true that vagaries of weather and fury of nature are unpredictable, but mother nature will definitely help those who have effective disaster management system. Drought has seriously affected our people. More than the drought, it is our systemic failure that has hit us hard.
Sir, India assumes the top position in foodgrains production. That is our mainstay. In a thickly populated country like ours, food production must be given top most priority. Even when we rank first in foodgrains production, people below poverty line (BPL) are on the increase. People who are left with just one meal a day are more than 37 per cent of the total population.
Our efforts must be on to overcome this situation. There must not be any let up. At the same time, care must be taken to ensure that neither droughts nor floods affect our target for food production. This can be achieved only with a vision, dedication and political will. Overall growth of the country must be ensured by the Centre. National Democratic Alliance or for that reason any future Government would depend on the coming together of regional parties. So, it is the bounden duty of the Union Government to ensure National Disaster Management effectively in all the regions.
Short-term relief measures like doling out two to five kilograms of rice or ‘Food for Work’ schemes cannot be a lasting solution. That is why, we have a cycle of bad monsoon and badly affected food production as recurring events.
Shri K.L. Rao, the then Irrigation Minister in the Government of India chalked out a plan to link river Ganga with river Cauvery. Had it been put through, we would have wiped out drought in many parts of the Central India and Southern India.
Cholamandalam comprises of Thajavur, Thiruvarur and Nagapattinam used to remain the rice granary of Tamil Nadu. Now, people with parched throat look for the trickling water in Cauvery. Even drinking water is a problem there now, leave alone water for irrigation. Agricultural labourers are in a pathetic condition. Some of them are forced to eat rats and die.
The fertile land of Thanjavur Cauvery Delta region used to go for elephants than bulls to thrash the harvest crops. But there is no water in that region now to feed even the bulls.
Linking of rivers and canals for irrigation system and their scientific management are the need of the hour. That will help us to withstand the onslaught of both drought and floods. We should not have rulers who are like King Nero who was fiddling with violin when Rome was burning. Our rulers must understand the ground realities especially when our ground water level is also falling below and failing us.
Agricultural production and livestock situation are the worst hit due to monsoon failure and drought conditions.
So, I urge upon the Government to come with immediate relief measures both short-term schemes and long-term plans.
Agricultural loans must be waived. The interest burden must be curtailed. Subsidies must be ensured when the nature fails. Effective water management policies must be evolved to link the North-South rivers. Diverting of the West flowing rivers must be ensured.
The Garland Canal Scheme can still be thought of. Only with a vision and commitment we can overcome drought.
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI :Mr. Chairman, Sir, we have conveyed to hon. Speaker and also to you that several Members from various Parties want to take part in this debate. They should be allowed to speak. My submission is that you can accommodate as many Members as possible and even the remaining Members can be allowed to speak tomorrow if time permits or they can be allowed to lay their speeches so that everyone will be satisfied. By this way, we can accommodate all the Members who gave their names. … (Interruptions)
श्री किरीट सोमैया: माननीय सभापति जी, जैसा प्रियरंजन दासमुंशी जी ने कहा है, जैसे रेलवे बिल पर बहस के समय जो भी माननीय सदस्य अपना भाषण लखित में सदन के पटल पर रखना चाहते हैं वे वैसा कर सकते हैं। उसी प्रकार से अब भी वे ऐसा कर सकें, उसकी अनुमति देनी चाहिए। कल शुक्रवार है इसलिए समय कम होने की वजह से माननीय मंत्री का उत्तर ही हो पाएगा। जो माननीय सदस्य इस विषय पर बोलना चाहते हैं, उन सभी को बोलने की अनुमति देनी चाहिए, भले ही पांच-पांच मिनट का समय दें, लेकिन सभी को जो भी बोलना चाहते हैं, उन्हें बोलने का अवसर मिलना चाहिए।
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, we do not agree because we are discussing the matter of a grave situation. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: The hon. Minister of Parliamentary Affairs is here. You please sit down.
… (Interruptions)
डॉ. जसवन्तसिंह यादव : सर, जब ये बोल रहे थे, तब ऐसा कोई सजैश्चन किसी माननीय सदस्य की तरफ से नहीं आया।
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Sir, they do not understand what I was saying. … (Interruptions) Sir, I plead from our side that those Members who would like to speak on this should be accommodated. And if anyone is left out tonight, please allow them to speak tomorrow if time permits or to lay their speeches. Sir, we want to co-operate with the Treasury Bench and we do not want to deprive any Member from making his speech. … (Interruptions)
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, let me clarify. What the hon. Member said is that anybody who wants to lay his speech can lay his speech. Today, the matter which we are discussing is of a rare consequence. It is the question of drought. We are having the discussion on the Railway Budget every year. It goes up to early morning. … (Interruptions)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Let it be throughout the night. We do not mind. … (Interruptions)
THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF COMMUNICATIONS AND INFORMATION TECHNOLOGY (SHRI PRAMOD MAHAJAN): Mr. Chairman, Sir, the first thing which I understood from the Chief Whip of the Congress Party is that it is not mandatory or compulsory for anybody to write his speech and give. Nobody is compelling. If some of the Members think, with no compulsion, ‘I would write it for record’, they can do so. That is only a request.
Secondly, I appreciate that this is a very serious situation.
All the hon. Members would like to speak. We have no problem. They can speak. Tomorrow is Friday. We will have a little of Zero Hour. So, we will be left with only hour and a half. Naturally, after so many speeches, you will expect the Minister of Agriculture to give a detailed reply.
So, my only request would be that let us try to finish the discussion today and keep the reply tomorrow. That is only my request. Whatever time is needed, we can sit today. … (Interruptions)
SHRI AJOY CHAKRABORTY (BASIRHAT): Sir, we agree. After the Question Hour, the hon. Minister of Agriculture can reply. … (Interruptions)
SHRI PRAMOD MAHAJAN: We can finish the discussion today and the reply will be tomorrow. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : As suggested by the Minister of Parliamentary Affairs, we will sit today till the completion of this subject and the reply will be tomorrow. अगर सदन सहमत हो तो इस पर चर्चा जारी रहे और माननीय मंत्री जी का उत्तर कल हो जाये।
श्री प्रियरंजन दासमुंशी: मैं इसलिए कह रहा था क्योंकि हम लोगों के पास सूचना आई थी कि इस इश्यू पर आज और कल दोनों दिन बहस होगी। इसलिए हमने अपने स्पीकर्स को दो लिस्ट्स में बांट दिया था ताकि कुछ सदस्य आज बोलें और कुछ सदस्य कल बोलें। जब फैसला हो रहा है तो मेरा आपसे आग्रह है कि अगर कुछ सदस्य बोलने के लिए रह जायें और वे अपनी बात लखित में दे दें तो उनको स्वीकार किया जाये।
सभापति महोदय : यदि कोई माननीय सदस्य अपना भाषण लखित में देना चाहे तो वह उसे सभा पटल पर रख सकता है। जिनको बोलने का अवसर मिलेगा, वे तो बोलेंगे ही। वैसे किसी को बोलने से रोका नहीं जा रहा है। अब सदन सहमत है कि इस पर चर्चा जारी रखी जाये।
श्री प्रमोद महाजन : मेरा कहना है कि जो माननीय सदस्य १० मिनट तक बोलेगा, वह १० स्पीकर्स का भाषण भी सुनेगा।
सभापति महोदय : मेरा सबसे अनुरोध होगा कि संक्षेप में अपनी बात कहें तो ज्यादा अच्छा होगा ताकि ज्यादा से ज्यादा मैम्बर्स बोल सकें।
SHRIMATI PRENEET KAUR (PATIALA): Mr. Chairman Sir, I would like to thank you for giving me this opportunity to speak on this very grave and important matter which is touching the life of every Indian today.
It is ironical to be speaking about drought in this monsoon season and in Monsoon Session of Parliament. The situation is very critical especially in the crucial North-West agricultural States of Punjab, Haryana, Rajasthan, Chattisgarh, Western Uttar Pradesh and parts of Himachal Pradesh and Madhya Pradesh where the kharif crop was partially or totally failed due to lack of rains.
The Indian Meteorological Department’s predictions, as very rightly quoted by many hon. Members today, have been a failure for the month of June and the first week of July. This is a very serious matter. They either do not have the capability to give us the correct information or something is wrong. If this is the case, then there is no point in wasting the taxpayers’ money on this.
Sir, I also have information that there is a facility in the Ministry of Science and Technology, known as the medium range weather forecasting system which had acquired a super computer, which developed this system a couple of years ago, costing hundreds of crore of rupees.
Sir, during the last two or three years, it is said that they have acquired another such super computer spending additional hundreds of crore of rupees. It has facilitated and helped them and they have developed that capacity to give a fairly accurate forecast for five to seven days in advance in a reasonably good manner. So, why is it that all these forecasts have not been published properly? Is there a conscious decision not to give this information out? Is there an internal problem with the Ministry of Science and Technology, which is hampering these publications? If these publications had been given on time, I am sure, the farmers could have saved precious money and time in not sowing some seeds for which they had to pay heavy loss.
It was in the Paper today that one farmer had sowed seeds worth Rs.15,000 which has gone at a loss, and this must be happening all over the country. In Punjab, in the Bhatinda area, they have ploughed their paddy back into the soil.
With the advancement of science, what we need now is good planning. This should be done in advance and we should not have to wait until the crisis is upon us. I believe that there is a report of the Planning Commission which has given Rs.75,000 crore to be spent over 25 years. Can it not be that it could be done over the next ten to fifteen years so that we get some reasonable insulation against drought?
After having a look at the last three years’ budget, I notice that approximately Rs.60,000 crore have been spent on communications and Plan outlay, and Rs.42,000 crore on fertiliser subsidies, out of which I do not think more than 50 per cent has reached the farmers. I would like to suggest, through you, Mr. Chairman, Sir, that Rs.1,00,000 crore should be spent in the Tenth Plan and the Tenth Plan should be declared as the Water Plan for India.
Rainfall is said to be between 25 to 50 per cent deficient this season and the water level in the reservoirs is 48 per cent that of last year. What is worrying is that the low moisture content of the soil and the inadequate water reservoirs will stretch this present drought crisis into the next Rabi crop in which the wheat is sown in the month of October.
A drought-like situation exists in most parts of Punjab as well. This is partly due to the sequence of the paddy growing.
The underground water resources are depleting at an alarming rate. In my parliamentary constituency of Patiala alone, it has dropped by 30 to 40 per cent. Punjab has always made it known since the reorganisation of the States in 1966, that we are short of surface water irrigation.
18.16 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) We made it clear that a time would come when over-usage of ground water would be uneconomical to pump. That time has come now. If our waters had not been planned to be given away, Punjab would not have reached this crisis.
Rain water harvesting, crop insurance, saving of forests and trees are our main protections against drought. States like Himachal Pradesh, which have large forest reserves, should be compensated so that they can keep their forests and not slowly give them up to the timber industry and to farming. There should be widespread publicity for the preservation of forests and also we should think of adding in the school curricula this environment subject to teach the children how to preserve the environment and the water, which will go a long way towards water preservation.
Water management and water harvesting in every house should be made a must. The National Calamity Fund should be enhanced and besides planning, water collection holes, fodder banks should also be created so that we can use them in emergencies. The States alone cannot solve the disaster problem. Besides the loss of foodgrains, many things like rural unemployment, poverty, drinking water problems, diseases and deaths by starvation of human beings and animals, take place.
Sir, 70 to 75 per cent of the population is engaged in agriculture and without water there is no production and there will be no life. The problem of drinking water is not only concerned to the rural areas but it is part of our urban society and urban living. The urban people are mainly dependent upon tube wells to get their water. If there is no water, we have a power crisis. So, power and water are very much inter-linked. Until we can solve this problem, we are going to continue to having a very miserable existence with no power, no water and our overloaded grids will be more and more difficult to maintain and the problem is just going to escalate.
The power for the domestic sector has gone up by two to four per cent. The industrial sector is also not left out of this. The small-scale industry has been badly hit. They cannot afford large power generation through diesel engines etc. and at the moment even though we are diverting most of our power to the rural sector it is neither the rural sector that is getting enough nor is the urban sector getting enough of it; and hence we have come to this very sad situation today of this drought-like situation.
It is with this dismal and dry note that I end my speech and I thank you for giving me this opportunity.
SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Thank you Mr. Chairman. After a long wait you have given me a chance to speak. I come from the area which is one of the most drought-prone areas of the country known as Kalahandi which is part of the KBK region of Orissa. Sir, before I start my speech I want to say that drought has been recurring since time immemorial and it has been seen that the post-Independence Governments have done nothing to tackle the problem of drought in the country. Every year there is a precipitation of about 4,000 billion cubic metres of water including snowfall. Out of that, the monsoon rains contribute about 3,000 billion cubic metres of water. For the last 55 years we have been able to tap only 609 billion cubic metres which is hardly 22 to 23 per cent of the total precipitation which we got in the country. We have enough of water which could have saved us from the drought of today.
I would say today that the drought in the country is more man-made than natural. It is because billions of cubic metres of water is running away into the sea. There is a run-up of 1,819 billion cubic metres of water. With this situation, when the meteorological Department made a forecast throughout the country, the Department of Agriculture became active and they planned cropping pattern and how much land is to be brought under paddy cultivation, how much land is to be brought under groundnut cultivation and much land is to be brought for lesser millet cultivation. But, today it has become the opposite. The normal rainfall predicted this year in the monsoon has completely vanished.
It is nice of the hon. Minister of Agriculture to have done his duty by calling all the Chief Ministers for a meeting. I was sorry to hear that apart from the Chief Minister of Orissa, no official from Orissa was invited for that particular meeting. But later on it was realised and the concerned officer was called. So, this clearly indicates the seriousness of the Department in mitigating the drought in Orissa which has been prone to it; since the past two-three years it is prone to cyclone to floods and to recurring drought in parts of western Orissa and parts of KBK region of the State.
Sir, the debate which we are having today is of very serious consequence. What does drought mean? Drought means starvation; drought means malnutrition in the rural areas; drought means over-crowding of the urban areas; drought means migration; drought means evacuation of villages; and drought means shortage of drinking water. I would not like to elaborate on this because after hearing the sense of the House, it is evident that most of the country is suffering from drought. In the country, 35 meteorological stations are located in different areas and in most of them, there is a condition of drought.
Sir, there are anomalies in the Relief Codes of the States because drought is usually dealt with by the Agriculture Department of the States. These anomalies which are there in the Relief Codes of the States should be rectified. How do we come to a conclusion that there is a drought until the crop cutting is done, until the Revenue Department gives its report, until the records of Agriculture Department and Revenue Department coincide, until the crop cutting report comes? By that time, it becomes very late. It becomes October by the time first crop cutting takes place in the villages and by that time, most of the cattle, most of the poor people in the rural areas, the agricultural labour who depend totally on agriculture, are completely devastated. So, considering these anomalies in the Relief Codes, the Central Government should come up with some type of legislation or some type of disaster management programme by which immediate and emergent measures should be taken to mitigate drought in the areas. Therefore, immediate steps should be taken .
Then, I would say that there has been a fall in the level of reservoirs throughout the country, which will affect electricity production and growth of industries. Sir, we should see what the water resources of this world were, say 2000 years ago, when the population was very, very less and the rate at which they are depleting. In this regard, I would like to quote from The Statesman dated 25th July, 2002. It reads:
"The situation is worse in developing countries, birthplace of about 95 per cent of the 80 million people added to the world each year", says a John Hopkins Institute study – Solution for a Water-Short World – conducted by Don Hinrichsen, a United Nations consultant. The study believes competition between industrial, urban and agriculture use for water is increasing. "
So, where will the rural masses go today? There is a competition for water. The per capita consumption of water has gone down drastically. We have not been able to take any steps to mitigate that hardship also, to solve that acute problem of fresh drinking water and water for the farmers. How do we intend to feed our millions of people?
Since you have rung the bell, I would like to tell about my district Kalahandi. I would just quote facts which I have received from my Collector and which he has sent to the Relief Commissioner. Sir, up to 18th in the month of July last year, there was a rainfall of 8,84.3 mm and till the 18th of this month, there has been a rainfall of 74.7 mm only. So, you can very well imagine the condition of the crops. In respect of all the crops which were sown in KBK and Western Orissa, there is a loss of 70 per cent, and with recurrence of drought in our areas, farmers have become very poor. I would mention not only small farmers but also the farmers having 15 acres or 20 acres of land. They have been completely devastated. They have migrated.
I would like to recollect one incident. When Shri A.B. Vajpayee was the Leader of the Opposition, he had visited Kharial, Koraput and Kalahandi areas. People came to meet him. What was the property that a poor lady had? The lady had only one sari, but there were three other ladies in the house. The eldest lady was given the sari to wear so that she could go and meet the Prime Minister. She narrated a tale of woe. This is the condition of rural areas today; the backward places of India have been neglected for the last 50 years.
I was hearing the speeches made from the other side, the speeches made by Shri Mani Shankar Aiyar and many other eminent parliamentarians from the Congress Party. They were saying that they had done a lot of things during Rajiv Gandhi’s time. When he visited Kalahandi, I had the opportunity to meet him. Shrimati Sonia Gandhi had also visited Kalahandi at that time. We received them at the airport. Then, I was the MLA from Junagarh. They visited the areas and some schemes were announced. However, they never took off. The programmes or schemes for making water conservation structures never took off because the Congress Party, under the leadership of Shri Patnaik, was ruling the Orissa State at that time.
Now, the KBK programme has started. The pamphlets on KBK programme are now being distributed. Our Government has announced a long-term action plan for the KBKs, which is worth Rs. 9,000 crore. It is slowly taking off and, I am sure, it will mitigate the sufferings of the poor people and the poor farmers of those areas.
We have got a lot of ground water in the country and that will deplete as a result of failure of the monsoon. Therefore, programmes should be initiated for recharging the ground water. The hon. lady Member from Punjab talked about recharging of ground water. We have to save the forests, ecology, which are slowly dwindling. They have to be restored back to the normal position.
This year, the Earth Summit or the World Summit for Sustainable Development will shortly be held in Johannesburg. About 20 years back, in 1980, when the Earth Summit was held in Rio, Agenda-21 was drawn out. I am sorry to state that not a single clause or not a single article of Agenda-21 was implemented by the then Governments that ruled this country. From 1980 till 2000, for 20 years, Agenda-21 was not implemented.
Before I conclude, I would at least pray and lament to the Meteorological Department and the Agriculture Department that they should make proper forecasts in future because 80 per cent of our nation is bound in agriculture and in rural activities. It is a question of the poor man because the man below the poverty line is going to suffer. The PDS has to be controlled. Today, in certain backward pockets, the PDS has not taken off. Those important things have to be done.
Looking at the calamity that we are facing today, I demand that the drought problem should be declared as a national calamity. As a Member of this august House, I demand that it should be declared as a national calamity. Otherwise, we cannot imagine the horrendous problems which we are going to face in future.
*SHRIMATI MINATI SEN (JALPAIGURI): Hon. Mr Chairman Sir, drought and flood has been discussed umpteen times in the House. All of you are aware that severe drought is prevailing in many parts of our country. But if there is drought in many regions, States like Maharashtra, Gujarat, UP, Bihar and North Bengal in West Bengal have been facing severe flood. We are a free country. But it is a matter of regret that even after 55 years of independence, the Government has not been able to come out with a comprehensive plan to tackle this natural calamity. The farmers face immense difficulty due to drought. The whole cultivated field parches the peasants cannot irrigate the land resulting in loss of crop and immense hardships for the poor farmer. There is no drinking water, no power and everything is in bad shape. But the Government instead of taking any positive step unfortunately plays a negative role. Erosion of riverbank is intimately connected with flood. Of course erosion of riverbank does not happen only during flood. It goes on the whole year. Ganga and Padma in West Bengal faces erosion severely. The problem of erosion in Ganga has been raised many times in the House. The State Government has tried to draw the attention of the Centre on so many occasions. The State Government has asked for necessary fund so as to tackle the problem of erosion. But I am sorry to state that the Centre has not paid any attention to their plea.
Sir, I represent Jalpaiguri District in North Bengal. The nature and character of rivers and the flood in North Bengal is totally different.
Sir, the situation in flood hit areas of North Bengal is very grim and serious now. In the last 72 hours water level of Sankosh, Raydak, Kaljani of Jalpaiguri and Mansai and Raydak No. 1 in Coochbihar, alongwith their tributaries have crossed the danger mark due to excessive rain.
Sir, I want to state with utmost importance that the flood in the Ghis river in Odlabari of Jalpaiguri has caused severe damage on 200 mtr of national highway No. 31 and 300 mtr of railway line has been severely affected due to incessant rain. The overall loss in Kumargram Block and Block NO. 1 of Alipurduar is not known till now. But the loss and damage in Kalchin and cultivated land and ten gardens in Kumarganj block has been immense. The information I have gathered from the administration is that 3 people have died due to flood and 12 people have been missing. 100 acre cultivated land has been submerged due to flood in the two rivers Paro and Garom. Houses of 400 families have been washed away. The Guidebund of Shiltorsha river, which is under construction has been damaged. The slums in Jaigaon have been washed away. The 12 municipality wards in Alipurduar have been submerged under water. 12 hundred families have been affected. 1.2 No. Block of Toofangunj in Coochbihar and Falakata block of Jalpaiguri have been damaged. The rainfall recorded in Jalpaiguri is 2543 mm and 1825 mm in Coochbihar.
I want to draw the attention of the House to a very important issue. The source of most of the rivers in North Bengal except a few is in Bhutan. Recently there has been illegally and unscientifically dolomite and felling of trees have been continuously undertaken in Bhutan. As a result, there is large scale siltation and debris are accumulated in the riverbed causing heavy damage to the flow of the river. The rivers are forced to change direction and so many habitation roads tea garden, forests, sanctuary are being severely affected since last 2 decades. This is causing serious ecological problem. If measures are not initiated right now then the tea industry and tea garden of this region will be totally ruined. The forestry and sanctuary of this area will also be wiped off. Moreover due to annual flood the connection link between North Bengal and the rest of India will also be affected resulting in widespread danger of defence.
I want to emphasise one more important point. The militant activities in North Bengal have taken a serious turn. These militants are being trained in Bhutan by the ISI. They are intruding into North Bengal after training and creating terror. The innocent people are being targeted and killed. These problems cannot be tackled singly by State Government alone. The Government of India must form the joint river forum after consulting the Government of Bhutan. We have raised this important issue umpteen times in the House and we the members from North Bengal had a meeting with the Minister of Water Resources Shri Arjun Sethi and discussed the matter with him. He assured us and said that since the matter concerns a foreign country, he has to discuss it with the External Ministry. After that a decision by the Cabinet will be taken. The Hon. Minister Smt. Vijaya Chakravarthy wrote a letter to me last November informing that a joint team of experts will be formed after consulting the Government of Bhutan.
I would like to know through the hon. Chairman whether the joint team of expert has been constituted after consulting the Government of Bhutan. If it has been formed I shall be obliged to know their opinion, their suggestion and recommendation.
Sir I want to mention another important issue. As per the road development programme of the Government of India East West corridor from Gujarat to Assam has been planned and will be undertaken. This will go via Dalkhola, Chalsa, Balarhat, Telipara, Veerpara, Hashiwara, Sankosh of Jalpaiguri and then reach Assam. The whole programme is totally unscientific, unplanned because this region is flood prone. There are protected forest, tea garden, hilly rivers which will create serious problem of erosion and siltation. There won’t be any industrial region and it won’t be of any benefit for large section of the people. We have submitted an alternative plan after consulting the State Government and we hope the Government will reconsider its decision and examine our plan favourably. Drought and flood are the two staggering problems of our country. Respective State Government cannot tackle this serious problem due to paucity of fund. The Government of India must evolve a comprehensive plan and assist the State Government so as to tide over the crisis of both drought and flood.
I urge upon the Government to take some appropriate measures so that we don’t have to face the problem every year. With this request I conclude my speech and thank you for giving me an opportunity to participate in this important discussion.
*English translation of the speech originally delivered in Bengali.
* SHRI Y.S. VIVEKANANDA REDDY (CUDDAPAH) : Speaker, Sir, it is very unfortunate to discuss the drought situation in monsoon season. Through you Sir, drought situation is very severe in our Constituency and my State of Andhra Pradesh. We need to come to the rescue in this harsh situation.
As temporary measures, I would suggest Contingent action plan, waver of loans, food for work programme, pensions for old and widows, fees waivers for students, fodder and concentrated feeds for cattle, sufficient grant provisions for drinking water and water harvesting structures for augmenting ground water, crop loss compensation to farmers.
As permanent measures, I would suggest National project of Garland canal connecting all river basins in the country should be sanctioned and taken up on par with national highway network. Creating a national watergrid. Farming should be given industrial status. Insurance for failure of crops due to any reason should be made available to farmers like any motor vehicle insurance or life insurance. Cuddapah District of Andhra Pradesh be given a Special Development Package along with considering the proposed Gandikota Reservoir, a national project. Power subsidies or free power to farmers be provided as this subsidy is production related subsidy.
Afforestation should be given top priority. Thank you, Sir, for the opportunity given.
* Speech was Laid on the Table of the House.
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर) :सभापति महोदय, आज इस सर्वोच्च सदन में बाढ़ और सुखाड़ से पैदा हुई तात्कालिक समस्या पर महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है। इस विषय का सामयिक रूप से बहुत महत्व है। हम इस विषय पर हर साल चर्चा करते हैं लेकिन उसका नतीजा नहीं निकलता।
१८.४४ hrs. (Shri Basu Deb Acharia in the Chair) सभापति महोदय, आपने देखा होगा और बिहार के बारे में आपको जानकारी भी है कि वहां बाढ़ के कारण स्थिति साफ हो गई है। वहां प्रतिवर्ष बाढ़ से करोड़ों रुपए की फसल नष्ट होती है, लाखों लोग बेघर होते हैं और सैंकड़ों लोग बरसात के दिनों में बाढ़ से मरणासन्न की स्थिति में आते हैं। अभी खास तौर पर मधुबनी जिले से छ: लोगों की जिन्दगी का अंत होने की सूचना मिली है जिस में एक छात्र भी है। बलिराजगढ़ में हरिजन छात्रावास है। यह भारत सरकार का पुरातात्विक ऐतिहासिक स्थल है। यह छात्रावास दो मंजिल का बना है ।परसों से उस छात्र की तबीयत लगातार खराब थी। वह ऊपर ही रहा, कोई रोटी देने नहीं गया। और छात्र निकलकर ऊंचे टीले पर चले गये, वह वहीं रहा। कल उसकी लाश मिली है। मैंने जिलाधिकारी से सम्पर्क करके पूछा, उन्होंने इस समाचार की सम्पुष्टि की कि वह छात्र दूसरे जिला का था। इतनी दर्दनाक स्थिति है कि मैं बयान नहीं कर सकता। मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि बाढ़ रोकने के लिये क्या कोई दीर्घकालीन योजना बना रही है या नहीं?
सभापति महोदय, अभी उत्तर बिहार में मेरे लोक सभा क्षेत्र झंझारपुर में नेपाल से निकलने वाली नदी कमला बालान चार जगह तटबंध तोडकर चली गई। भूतही बालान लौकहा से फुलपरास तक जाती है, वहां तटबंध पर कटाव लगा हुआ है। एक और जगह राजपुर में तटबंध टूट जाने का खतरा बना हुआ है। हजारों लोग वृक्षों पर चढ़ रहे हैं या ऊंचे टीलों पर जा रहे हैं। सब जगह जल-प्लावित हो गई है। इस स्थिति में सुपौल, मधुबनी, सीतामढ़ी, शिवहर, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, खगड़िया, सहरसा आदि जिलों की हालत बयान नहीं कर सकता। यहां १९८७ में अभूतपूर्व बाढ़ आयी थी। इस बार उस समय के रिकार्ड को पार गई हैं। तटबंध टूटने के कारण हजारों एकड़ में फसल लगी हुई थी, वह नष्ट हो गई है। अचानक बाढ़ आने के कारण न जाने कितने लोगों की सम्पत्ति और घर नष्ट हो गये हैं। लोग बेघर हो गये हैं। २५ लाख लोग मधुबनी जिले में बाढ़ से प्रभावित हुये हैं जबकि १९८७ में १० लाख लोग प्रभावित हुये थे।
सभापति महोदय, माननीय मंत्री जी ने जवाब दिया है कि as a standby Helicopter दिया गया है लेकिन यहां आने से पहले मैंने फोन से जानकारी ली है कि उस हैलीकाप्टर से मात्र २ टन चूडा या गुड़ जायेगा। क्या १००० लोगों के लिये यह काम पूरा कर पायेगा? जो भी राहत सामग्री गई है, वह राज्य सरकार की तरफ से गई है। विशेष राहत नहीं गयी है। यहां जल संसाधन मंत्री बैठे हुये हैं। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि लोगो में हाहाकार मचा हुआ है, बाढ़ पीड़ित लोगों में त्राहि-त्राहि हो रही है। चूंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है, इसलिये मैंने अपनी चिन्ता जाहिर की है।
सभापति महोदय, नेपाल की सीमा से निकलने वाली कमला बालान, कोसी, भूती बालान, गंडक, बागमती और अधवारा समूह की नदियों के पानी से क्षेत्र में डिवास्टेशन हो गया है। नेपाल के बाल्मीकि नगर से बीरपुर तक काफी पानी छोड़ा गया है और नदियो में बहुत ही तूफान आ गया है। मुझे याद है १९९३, १९९४,१९९५ में ऐसा हुआ था। बाढ़ पूर्वानुमान नेटवर्क नेपाल में जिस जगह लगा हुआ था, उससे उत्तर बिहार के लोगों को मालूम हो जाता था और वे ऊंचे टीले पर चढ़कर अपनी जान बचा लेते थे लेकिन इस बार इस प्रकार की कोई सूचना नहीं मिली। मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि क्या बाढ़ पूर्वानुमान नेटवर्क काम कर रहा है या नहीं, क्या इसकी जांच सरकार करायेगी? दो १६ जगह भारत और नेपाल समझौते से नैटवर्क लग जाए। चूंकि हम लोगों की जान भी बचायें, आप उन्हें राहत तो देंगे। दीर्घकालीन प्लान आप नहीं कर पायेंगे। हर बार बहस होगी, बहस के बाद चर्चा समाप्त हो जायेगी और हम सांसद की हैसियत से अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देंगे। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि भारत-नेपाल सीमावर्ती इलाके में बाढ़ के पूर्वानुमान का जो नैटवर्क है, चाहे मधुबनी, सीतामढ़ी हो या शिवहर का इलाका हो, अभी माननीय रघुनाथ झा जी बोल रहे थे कि इन सीमावर्ती इलाकों को सूचना नहीं मिलती है और वहां के लोग बाढ़ में डूब जाते हैं।
सभापति महोदय, बहुत ही गंभीर और व्यथा की बात है। इसलिए मैं आपसे निवेदन करूंगा कि न केवल वहां लोग बाढ़ से प्लावित हैं, बल्कि वहां सारे सड़क सम्पर्क भी टूट गये हैं। चाहे लदनिया हो, जयनगर हो, खाजेडीह हो या धर्मवन हो, समूचे नॉर्थ बिहार में नेपाल सीमा पर जितनी भी पी.डब्ल्यू.डी. की मुख्य सड़कें हैं, सब टूट गई है। आज लोग जिला हैडक्वार्टर से बाबूबरही नहीं जा सकते हैं। पूरा का पूरा झंझारपुर मुख्य सड़क से टूट गया है और तटबंध के पानी से मुख्य सड़कें कटी हैं। वहां जो लोग पड़े हुए हैं, वे प्याज, नमक या कोई अन्य सामान बाहर से नहीं ला सकते हैं। जो उनके पास सामान है, उसी में उन्हें जिंदा रहना है। उनका जीवन कितना अस्त-व्यस्त हो गया है, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। वे मवेशियों को ऊंचे स्थानों पर कहां ले जायेंगे, जब आदमी के रहने की जगह नहीं है। तटबंधों पर मवेशियों के लिए चारे का अभाव है। लोग मवेशियों को ले जाकर तटबंध पर खड़े हैं। जो बचे हुए तटबंध हैं, उन पर भी पानी का हमला हो रहा है, उन पर भी पानी का दबाव बना हुआ है। नेपाल में थोड़ी सी भी वर्षा होती है तो पानी यहां चला आता है। मैंने चिंता जाहिर की थी, मैंने कहा था कि २४ घंटे के अंदर एक उच्चस्तरीय केन्द्रीय टीम वहां भेजी जाए और जो तबाही हुई है उसके सर्वे करके बाढ़ पीड़ितों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज दिया जाए। हमने भारत सरकार से तत्काल कहा था कि एक हैलीकॉप्टर पर्याप्त नहीं है। वहां जो आर्मी के बोट्स हैं, वहां जो लोग पेड़ों, छतों या किन्हीं जगहों पर अटके हुए हैं, जिनका जीवन नारकीय हो गया है, उन्हें बचाया जा सके। इसलिए सेना के बोटों की वहां काफी संख्या में जरूरत है, ताकि फंसे हुए लोगों को बचाया जा सके। यह दुर्भाग्य है कि छ: महीने बाढ़ और छ: महीने सुखाड़ से वहां लोग पीड़ित होते हैं।
सभापति महोदय,मैं आपके माध्यम से निवेदन करता हूं कि वहां राहत का क्या हाल है। अब मैं आपदा राहत कोष के विषय में कुछ कहना चाहता हूं। कैलामिटी रिलीफ फंड की जो राशि दी जाती है, उसे केवल बाढ़ के समय में खर्च करने का प्रावधान है। महोदय, जो सड़कें टूट गई हैं, जो मुख्य मार्ग सम्पर्क भंग हो चुके हैं, उनके सुधार के लिए एफ.डी.आर. में जो फ्लड डैमेज रिपेयर वर्क है, उसके लिए सी.आर.एफ. फंड़ में खर्च करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें सुधार होना चाहिए और उसमें यह प्रावधान होना चाहिए। दूसरी बात मैं बताना चाहता हूं कि कैलामिटी रिलीफ फंड में जमींदारी बांध की मरम्मत नहीं हो सकती है। मधुबनी के पश्चिमी इलाके में जमींदारी बांध टूट गया है, वह बांध टूटा रहेगा, आप कैलामिटी रिलीफ फंड से उसकी रिपेयर नहीं कर सकते हैं। लोगों को वहां पानी में डूबने के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन उसमें आप खर्च नहीं कर सकते हैं।
तीसरी बात यह है कि जो लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं, जिनके घर वाश-आउट हो गये हैं, उनके घर बनाने के लिए कोई विशेष राशि खर्च नहीं हो सकती है। चौथी बात यह है कि बिहार के विभाजन के बाद संसाधनों का अभाव हो गया है। संसाधनों के अभाव में आप नई योजनाएं शुरू नहीं कर सकते हैं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि बिहार के लिए बाढ़ एक अभिशाप है और बिहार स्थाई रूप से बाढ़ग्रस्त राज्य बना हुआ है। इसलिए जलग्रहण क्षेत्र में जहां होने वाली वर्षा के कारण यह आपदा आती हैं…( व्यवधान)मैं बहुत महत्वपूर्ण अंतिम सुझाव देना चाहता हूं और मैं बाढ़ का स्थाई समाधान सुझाना चाहता हूं। सरकार संवेदनशील होनी चाहिए। इसके स्थाई समाधान का यही रास्ता है कि जो नेपाल से निकलने वाली नदियां हैं, पहले १९९१ और १९९३ में सर्व हुआ था, जापान से भी एक टीम आई थी। वहां आकलन किया गया था कि १२०० करोड़ रुपये खर्च होने पर कोसी पर बराह क्षेत्र में डैम बन जायेगा।
उन सभी जगहों को चिहनित किया गया था। कोसी को रोकने के लिए बाढ़ के पानी का नियंत्रण और उसके प्रबंधन के लिए यह योजना बनी थी कि वहां हाइ लैवल डैम बनाया जाए। उससे ३३०० मैगावाट बिजली का उत्पादन होगा जिससे असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग हो, बिहार, उड़ीसा सबको सस्ते दामों पर पनबिजली दी जा सकती है। वह मल्टी परपज़ हाइ लैवल डैम बनाया जाए तो बाढ़ का स्थायी समाधान हो सकता है। नेपाल में नुंथर में, सीसापानी में और वराह क्षेत्र की प्रस्तावित जगहों में हाइ लैवल डैम बनाया जाए तो स्थायी समाधान हो सकता है। यही एकमात्र रास्ता है बाढ़ प्रभावित इलाको को बचाने का।
अंत में मैं सूखे के विषय में कहना चाहता हूँ। जहां तक सूखे का सवाल है, सरकार ने डिक्लेयर कर दिया है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश १२ राज्यों को माना गया है कि इनमें सुखाड़ है। उसका सर्वेक्षण कराया गया है और माननीय कृषि मंत्री जी अच्छी तरह से किसानों की हालत जानते हैं। उन्होंने मीटिंग भी ली है राज्यों के कृषि मंत्रियों से। मैं कहना चाहता हूँ कि बिहार में शेखपुरा, मुंगेर, लक्खीसराय, रोहतास, आरा और जहानाबाद सभी में सुखाड़ की स्थिति है। दक्षिण बिहार सूखा है और उत्तर बिहार में बाढ़ है। ये दोनों प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे हैं। पानी का स्तर नीचे चला गया है। पाताल का पानी गायब है। आसमान से पानी बरस नहीं रहा है और खेतों का पानी सूख गया है। गांवों में जो तालाब हैं, उनमें पानी नहीं है। बड़ी भयानक स्थिति होने वाली है। रोटी का संकट आने वाला है। गरीबी और भुखमरी की स्थिति आने वाली है। इसलिए अकाल से इन इलाकों को मुक्त करना चाहिए।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देता हूँ और एक ही बात निवेदन करना चाहता हूँ। जो सोना चांदी है, ये सजावट की चीजें हैं मगर रोटी जीवन के लिए आवश्यक है। इसलिए रोटी की दीर्घकालीन व्यवस्था की जाए और पानी का मैनेजमेंट हो, बाढ़ का स्थायी समाधान निकाला जाए और सुखाड़ के इलाकों के लिए भी दीर्घकालीन योजना बने।
SHRI JOACHIM BAXLA (ALIPURDUARS): Respected Chairman, Sir, I am thankful to you for having given me an opportunity to speak on this important issue. A number of Members have taken part in this discussion and most of them have concentrated on drought. Although I am very much concerned about the drought-affected areas, as more than 14 States have been affected, since a number of Members have already talked about drought, I will confine myself to floods particularly to the area to which I belong.
I belong to Jalpaiguri district of West Bengal. This area is being affected by flood almost every year. Flood has become a regular phenomenon there. A number of rivers like Sankosh, Teesta, Torsa, Kaljani, Paro, Raidak, originate from Bhutan and flow through this region. Since these rivers pass through the tea gardens, the tea industry is also badly affected due to the flood in these rivers. This time even the Cooch Behar district, particularly Balabhut which is on the border of India and Bangladesh has been badly affected. It has almost become an island. Hundreds of people have been rendered homeless. We had taken up this matter time and again with the Water Resource Minister and requested him to take it up with the External Affairs Minister so that he in turn could take it up with the Bhutan Government. We had requested the Government to take the initiative to set up a joint Indo-Bhutan River Commission.
19.00 hrs. This is the only solution. Unless and until, this Commission is set up, the problem of flood in Cooch Behar and Jalpaiguri Districts cannot be solved. Therefore, once again, I demand that this issue must be taken up with the Government of Bhutan as early as possible so that the difficulties of the people of tea gardens in North Bengal and other areas can be mitigated.
Sir, I am equally concerned about wild life. There is a rhinoceros reserve at Jaldapara in Jalpaiguri District. There is also elephant reserve, and it is a tourist place also. There are a number of forests. I demand that in order to protect all those reserves, forests, wild life, an appropriate and comprehensive planning should be made so that the reserves for animals like elephant, rhinoceros, etc. can be protected. If these things are done, I am sure it will also help in promoting tourism.
Sir, I would like to request that in Mal Bazar Sub Division, the National Highway has been affected very badly due to flood water. The rail connection has also been affected. I have already told that it has become a regular phenomena. Therefore, I would request you to accept the proposal for a new railway line from New Mainguri to Jogi Ghopa. It would work as an alternative line. So, once again, I would like to impress upon the concerned Minister that this railway line should be taken up as early as possible. This will serve not only the people of West Bengal, North Bengal but also the people of North Eastern region. It is because people of North-East are always affected due to disruption of rail services whenever any railway line or rail bridge is damaged due to flood.
Sir, I have already mentioned that these rivers are coming from Bhutan. Therefore, this is a very important issue. I demand that appropriate action should be taken. Sir, I know that for the maintenance of river banks of Brahmaputra, some money is being allotted by the Central Government. I would like to mention that all the rivers, namely, Sankos, Tiesta, Torsa, Kaljani, Ramsai, Garam, Paro, Raidak, and Jaldhaka are ultimately meeting with the Brahmaputra river. Therefore this is my demand that West Bengal should also be sanctioned some money for the maintenance of these rivers. Otherwise, it will be very difficult to control these rivers. We know that every year people of these areas and particularly the tea gardens are suffering. It is because the tea bushes are washed away because of flood water.
Sir, a few days back I visited Lankapara which is near Bhutan. I also visited Jaigaon. There is one river called Hansimara Jhora. I found that all the river beds are rising like anything. If there is torrential rain, we can imagine the fate of the people residing there. The entire area, including tea garden belt will be washed away. Therefore, I demand that the Central Government should take appropriate steps so that some protection work can be taken up and these people can be safeguarded. Some precautionary measures have to be taken in advance. We know that whenever some natural calamity takes place, only then we think of sending the relief material to the affected areas. That is why I would request the Minister to take precautionary measures in advance instead of waiting till the last moment. I know that natural calamities cannot be stopped totally, but we can save the lives of the people by taking precautionary action.
In Cooch Behar two persons have died. The West Bengal Government has already taken steps. They are providing relief materials within their capacity. I know that their resources are very limited. However, they are trying their level best to stand by the side of the affected people. Therefore, I demand that the Central Government should think over this matter and take appropriate action, so that in future we can mitigate the sufferings of the people.
डॉ.(श्रीमती) सुधा यादव (महेन्द्रगढ़) : सभापति महोदय, आज सुबह से देश में सूखे और बाढ़ की स्थिति पर चर्चा चल रही है। मैं कृषि मंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूंगी जिन्होंने सूखे की स्थिति को देखते हुए वभिन्न राज्यों के कृषि मंत्रियों की एक बैठक बुलाई और उस बैठक में इस तरह के निर्णय लिये जिससे किसानों को कुछ राहत मिल सके। वास्तविकता यह है कि आज पूरे देश में सूखे की स्थिति बहुत ही भयानक है। इसी तरह कुछ भागों में बाढ़ की स्थिति उतनी ही भयावह हो गई है।
मैं हरियाणा प्रदेश से आती हूं और जब हरियाणा का नाम आता है तो मन में कल्पना उभर कर आती है कि यह हरा-भरा प्रदेश है। लेकिन वास्तविकता यह है कि दक्षिणी हरियाणा में एक ऐसा क्षेत्र है जो लम्बे समय से सूखे की चपेट से ग्रस्त है। मैं उदाहरण देना चाहूंगी कि सन् २००० में हरियाणा प्रदेश में विधान सभा के चुनाव हुए। जिला महेन्द्रगढ़ जो मेरे संसदीय क्षेत्र में आता है, वहां जो विधान सभा सीट लगती है, उसके २५ गांवों ने चुनाव का बहिष्कार किया। उसका कारण यह था कि वहां पीने के पानी की समस्या थी। जिस क्षेत्र में पीने का पानी नहीं मिल रहा, वहां पर सिंचाई और पशुओं के लिए पानी की कल्पना कर पाना बहुत दूर की बात है। जब हरियाणा प्रदेश में सामान्य वर्षा होती थी तब भी एक जिला ऐसा रहा, जहां पर सामान्य से भी कम वर्षा होती चली गयी।
आज स्थिति इतनी भयावह है कि यदि गांवों में हम जाकर देखें तो एक-एक बूंद पानी के लिए महिलाएं कोसों दूर जा रही हैं। हमारे यहां होली के पावन पर्व पर गेहूं की बाल जलाते हैं, क्योंकि उसे शुभ माना जाता है। हमारे क्षेत्र में ऐसे भी गांव हैं जहां गेहूं को बोया ही नहीं गया, गेहूं की बाल की कल्पना करना तो बहुत दूर की बात हो गई। किसान ने सोचा कि शायद इस वर्ष मानसून अच्छा आयेगा जैसी चर्चा चल रही थी कि मानसून इस बार अच्छा होने वाला है लेकिन मानसून अच्छा नहीं हुआ। हमारे यहां एक ऐसा क्षेत्र है जहां एक बूंद भी वर्षा नहीं हुई। इसी मानसून की इंतजार में किसान बहुत चिंतित है। वह आकाश की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है।
सभापति जी, मेरा क्षेत्र एक ऐसा है जहां पर नदियां नहीं हैं, नहरें नहीं हैं और वर्षा हो नहीं रही है। इसके अलावा भूमिगत जल का स्तर नीचे गिरता जा रहा है। ऐसी स्थिति में लोग गांव से पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। मैं आपको आंकड़े बताना चाहूंगी कि रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़ और गुड़गांव जिले, जिसे दक्षिणी हरियाणा का क्षेत्र कहते हैं, पिछले दो दशक के आंकड़ें देखें तो वहां १९९३ से लेकर १९९७ तक ६८० एम.एम. वर्षा हुई थी, वर्ष २००० में ३०० एम.एम. वर्षा हुई है औैर इस वर्ष तो बिल्कुल भी वर्षा नहीं हुई।
यदि हम ग्राउंड लैवल वाटर को देखें, ग्राउंड वाटर सैल का जो संरक्षण किया गया था, यदि उसे देखें तो १९७४ से लेकर १९९४ तक १६.७७ मीटर से लेकर २३.२ मीटर तक पानी आ गया है। आज स्थिति यह है कि जिला महेन्द्रगढ़ में ३३ मीटर के ऊपर पानी है और जिला रिवाड़ी में २८ मीटर पर भूमिगत जलस्तर चला गया है। मेरे जिले में एक ऐसा ब्लॉक भी है जहां आज भूमिगत जलस्तर १६०० फीट की गहराई पर है। वहां बोर करके पानी के पानी की कल्पना करना बहुत अधिक मुश्किल हो रहा है। ३२ वर्षों से नहरें बनी हुई हैं। मुझे सदन को बताने में तनिक भी संकोच नहीं होता कि आज तक उन नहरों में एक बूंद पानी नहीं आया, वे नहरें मिट्टी से भर चुकी हैं और ऐसी स्थिति हो गई है कि वे आज टूट भी चुकी हैं। हमारे यहां खेती सिर्फ टयूबवेल के आधार पर की जा रही है। बारिश नहीं हो, नहरें नहीं हों, नदियां नहीं हों, वहां बरसाती नदियां थीं, पीछे बांध बना दिए गए, उसका प्रभाव जो स्वाभाविक था वह पीछे रुक गया है। यदि हम टयूबवैल के माध्यम से खेती करते रहेंगे तो स्वाभाविक है कि भूमिगत जलस्तर इतना नीचे चला जाएगा कि खेती की कल्पना करना दूर हो जाएगा और यही कारण रहा कि उस क्षेत्र में रबी की फसल नहीं बोई गई, आज खरीफ की फसल के बारे में हम सोच भी नहीं पा रहे हैं। जिन क्षेत्रों में बोई गई, वहां ९० प्रतिशत फसल खराब हो गई है। बहुत प्रयासों के बावजूद भी नहरों का जो अपेक्षित विकास होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। हरियाणा और पंजाब के बीच सतलुज-यमुना लिंक नहर का मामला वर्षों से चला आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश भी दिए हैं कि सम्पर्क नहर को पूरा किया जाए ताकि हरियाणा की प्यासी धरती को कुछ पानी मिल सके। अभी तक उसमें किसी प्रकार का कोई कार्य आरंभ नहीं हो पाया है, यह भी एक दुर्भाग्य की बात है। देश में इस प्रकार की स्थिति बनी हुई है कि कहीं पर पानी बहुत अधिक है और कहीं पर बिल्कुल नहीं है। लेकिन उस पानी को हम पूरे देश में सही तरीके से पहुंचा सकें, ऐसी व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। कहीं राजनैतिक परेशानियां आ रही हैं, कहीं प्रशासनिक परेशानियां आ रही हैं। मेरा मंत्री महोदय से निवेदन है कि इस तरह की परेशानियों को दूर करने का भी प्रयास करें, इस तरह के नियम और कानून बनाने का प्रयास करें ताकि जहां जल की अधिकता है, वहां से उसे उस जगह पहुंचानेकी व्यवस्था की जा सके जहां कम जल है। आज किसान सिंचाई के लिए, खेती के लिए पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। वह आकाश की तरफ टकटकी लगा कर देख रहा है। जब बारिश बिल्कुल नहीं हुई तो आज किसान के चेहरे बिल्कुल मुरझा गए हैं। मेरे क्षेत्र में मुख्य रूप से बाजरे, ज्वार और गवार की फसल होती है। हम ऐसी फसल की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें अधिक पानी की आवश्यकता होती है। यह वह फसल है जो कम पानी से भी हो सकती थी और आज यह फसल भी ९० प्रतिशत बर्बाद हो गई है। आप इस स्थिति का आकलन स्वयं कर सकते हैं। इन आंकड़ों को देने के बाद मैं मंत्री महोदय से कहना चाहूंगी कि आपने एक अच्छा निर्णय लिया है, जिसके लिए मैं आपका धन्यवाद करती हूं कि नाबार्ड के माध्यम से कर वसूली को स्थगित किया है। लेकिन मेरा यह कहना है कि जब आसाम के ऑयल पाइप्स बिछा कर रिवाड़ी में डिपो बनाया जा सकता है और तेल पहुंचाया जा सकता है तो पानी की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती। हमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि जहां अधिक पानी है, वहां से पाइपलाइन के माध्यम से जैसे ऑयल की पाइपलाइन बिछी हुई हैं, आसाम के क्षेत्रों से रेगिस्तान के क्षेत्रों मे पाइप लाइन आई हुई है और वहां ऑयल आने लगा रहा है तो पानी, जो हमारे किसान और हर व्यक्ति के जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है, उसे लाने में क्या तकलीफ है। आज लोगों ने अपने पशु छोड़ दिए हैं। चारे की व्यवस्था करने की आवश्वयकता है। पानी की वजह से बीमारियां बहुत तेजी से फैल रही हैं। इस विषय में सोचने की आवश्यकता है। उचित जल संरक्षण नीति बनाने की आवश्यकता है। मेरा यह भी कहना है कि वाटरशैड स्कीम और रेन वाटर हारवैस्िंटग के कार्यक्रम प्रभावी तरीके से चलाने की जरूरत है। हम रेन वाटर हारवैस्िंटग की बात कर रहे हैं, रेन हो नहीं रही है तो कौन से वाटर की हारवैस्िंटग करेंगे। इस विषय पर गंभीरता से सोच कर जो नीतियां बनाई गई हैं, जो स्कीम्स बनाई गई हैं, उनको अच्छी तरह से लागू किया जा सके, ऐसा मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहती हूं ।आज बीज की व्यवस्था करने की आवश्यकता है, खाद्यान्न की व्यवस्था करने की आवश्यकता है…( व्यवधान)
सभापति महोदय : मैंने तो यहां ५-५ मिनट दिये हैं, नहीं तो सुबह हो जायेगी।
डॉ.(श्रीमती) सुधा यादव: मैं कृषि मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहूंगी कि आप दक्षिणी हरियाणा की स्थिति से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ हैं। ये दोनों मंत्री ऐसे बैठे हैं, जो दक्षिणी हरियाणा की स्थिति से व्यक्तिगत तौर पर वाकिफ हैं। मैं इनसे निवेदन करना चाहूंगी कि विशेष पैकेज आप वहां पर दें, क्योंकि यह ऐसा क्षेत्र है, जो वास्तविक रूप से सूखे से पीड़ित है। आज वहां यह स्थिति हो गई है कि यदि गांव में जोहड़ भी भरवाना है तो हमें नदी के माध्यम से भरवाने पड़ेंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात खत्म करती हूं।
श्री चन्द्रनाथ सिंह (मछलीशहर): सभापति महोदय, सूखे पर बहस हो रही है और वे बोल नहीं रहे हैं। सत्ता पक्ष के सदस्य सूखे के ऊपर इतने सीरियस हैं कि मात्र १३ लोगों की संख्या है।…( व्यवधान)
श्री शंकर प्रसाद जायसवाल (वाराणसी): ये दिन भर से गायब हैं, अभी आये हैं और हमें कह रहे हैं।
सभापति महोदय : आप बैठिये। Shri G. Putta Swamy Gowda.
श्री चन्द्रनाथ सिंह : ये सब लोग गायब हैं, देश की सत्ता में बैठे हुए सदस्यों को सूखे और बाढ़ की जरा सी भी चिन्ता नहीं है। इनकी संख्या अब १३ है, ऐसा लगता है कि इस सरकार की तेरहवीं होने वाली है।…( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record except Shri Puttaswamy Gowda’s speech.
(Interruptions)* सभापति महोदय : आप बैठिये, आप क्यों डिस्टर्ब कर रहे हैं। वे बोल रहे हैं, उनकी बात सुनिये।
*Not Recorded.
SHRI G. PUTTA SWAMY GOWDA (HASSAN): Mr. Chairman, Sir, I am very grateful for having given me an opportunity to speak on this important subject. Permit me to speak in Kannada.
* Hon. Mr Chairman Sir, hon. Members from all sections of this august House have sincerely expressed their anguish about the havoc created by the severe drought in the country. I join them to express my concern regarding this serious situation and I thank you Sir for giving an opportunity to speak on this important issue.
Many States in the country are reeling under severe drought situation. Karnataka is one of the States which has been severely affected by the drought. In fact, unfortunately this is the third consecutive drought year for Karnataka. I would like to mention that the Centre has completely failed in its duty to protect the people particularly the farmers who are affected by drought.
154 taluks in 25 districts of Karnataka State are in the grip of drought and even drinking water is not available in these places. There is no fodder for the cattle and many people who do not have anything for their living have already migrated to the neighbouring States. Our Chief Minister led an all party delegation to the hon. Agriculture Minister and the hon. Prime Minister. He has requested the Centre in his memorandum to release 958 crore of rupees for the flood relief in the State. So far, unfortunately not a single rupee has been released for Karnataka to tackle this problem. The State till today has not received any reply from the Centre in this regard. The Centre is bringing in politics in this matter and that is my complaint against this NDA Government.
11th Finance Commission has recommended an amount of 78 crores of rupees for Karnataka from the calamity fund. The Centre has cleared only 58 crore of rupees and this amount is being paid in two equal instalments. In fact this has become an important national news and the BJP leaders are indulging in an unnecessary propaganda about the release of this calamity fund.
The Chief minister of Karnataka has done a commendable job in releasing a substantial amount for providing drinking water in the drought affected areas.
When Karnataka has received nothing how some States have got relief funds. Let him sanction any amount to any State but I want that Karnataka State should also get the relief fund. About 238 crore of rupees and more than 10 lakh tonnes of foodgrains have been released to tackle the drought situation. My State also should get its share. There is no need to bring politics in this matter. All the States should be treated equally on the basis of the losses suffered by them due to drought. It is not good for the nation to allow such a disparity to continue in the future. You cannot rule the country in this fashion. Step motherly attitude and negligence of some States by the Centre cannot be tolerated. The farmers will revolt if this kind of attitude continues.
Sir, now I would like to give some suggestions for the consideration of the hon. Minister. During rainy season, huge quantity of water goes to the sea. This loss of water should not be allowed to continue like this. Water should be conserved and stored and this decides the future of our farmers. Unless we develop the capacity to store the flood water we can’t find solutions to the multifarious problems of the farmers.
There was a proposal to link Ganga and Cauvery. The Centre has not given its thought to this proposal. The Centre has to take up such innovative and scientific plans and programmes and implement them for the prosperity of our nation. Similarly they have to take up desilting of tanks particularly on the river basins. There are a number of tanks on the Cauvery river basin. We can provide jobs to thousands of poor people. It will enable us to revive the employment guarantee scheme and food-for-work scheme in drought hit States and for employment generation under the Sampooran Grameen Rozgar Yojana project of the Rural Development Ministry. On the other hand you put hurdles to States like Karnataka which is very keen to take up such programmes. Karnataka had approached the world bank for its assistance to take such a programme. Unfortunately you have not given clearance for this programme till today.
It is high time to take up immediate desilting of tanks on the river basins throughout the country.
While sanctioning the amount the Centre should be very careful about monitoring the schemes. They should ensure that the amount reaches the needy persons. Many times major chunk of this amount do not reach the people to whom the fund is meant.
Sir, recently Central team which had gone to Karnataka could not conduct any survey of the affected areas. I urge the Government of India to send an expert team to Karnataka to assess the situation accurately. In the meanwhile I request the hon. Prime Minister and the hon. Agriculture Minister Shri Ajit Singh Ji, to release at least 100 crores of rupees as an ad hoc drought relief fund to save the people of Karnataka from the severe drought situation prevailing in Karnataka.
Once again I thank you Sir and I conclude my speech.
*English translation of the speech originally delivered in Kannada.
श्री शीशराम सिंह रवि (बिजनौर): माननीय सभापति जी, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बाढ़ और सूखे की स्थिति पर बोलने का मौका दिया। मैं कृषि मंत्री जी और संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन जी का भी ह्ृदय से आभारी हूं कि उन्होंने इस समय देश में आई बाढ़ और सूखे की विकट स्थिति पर चर्चा कराने की चिंता की है। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। इस देश की ८० प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर है। इसलिए हमें किसानों के बारे में सोचना चाहिए। हमारे देश के करीब ११ प्रदेशों में सूखा पड़ा हुआ है।
उसके लिए कृषि मंत्री जी ने पहले से ११ प्रदेशों की धोषणा भी की है परंतु उसके लिए क्या-क्या राहत दी जानी चाहिए, यह स्पष्ट होना चाहिए। पिछली बार मेरे जनपद बिजनौर में ९ जून,२००० को अचानक बाढ़ आई थी और मैंने मांग की थी और बाढ़ और राहत पर बोला भी था और उसके लिए मैंने ५० करोड़ रुपये की मांग की थी। पांच पुल टूट गये थे और दो सड़कें टूट गई थी लेकिन इन सबके लिये भारत सरकार द्वारा सिर्फ दो करोड़ रुपये दिये गये थे। कहीं ऐसा न हो जाये कि फिर से बाढ़ की तरह से सूखे पर पैसा न दिया जाये, किसान का लगान, ब्याज और कर्ज भी माफ न किया जाये और किसान के बारे में चिंता न की जाये। उसके लिए हमें विचार करना होगा। खासकर कृषि मंत्री जी इस पर विचार करें। यह देश कृषि प्रधान देश था और यहां चर्चा थी कि " उत्तम खेती, मध्यम बान, नशित चाकरी भीख निदान। " आज ठीक उल्टा होता जा रहा है और यह बात दिखाई देने लगी है कि उत्तम नौकरी को मान लिया गया है। मध्यम व्यापार को और तृतीय भिखारी हो गया है और चौथे नम्बर पर किसान जाकर खड़ा हो गया है। किसान के प्रति कोई चिंता नहीं है और इससे पहले कांग्रेस की सरकार ने भी किसानों की कोई चिंता नहीं की थी। आज शुगर मिलें बंद होती जा रही हैं। किसान के गन्ने की पिराई नहीं हो रही है और गन्ने का मूल्य किसानों को नहीं दिया जा रहा है और किसान सूखे की चपेट में है। चालीस वर्षों से यह योजना ठप्प पड़ी थी। उसके लिए प्रधान मंत्री जी अटल बिहारी वाजपेयी जी ने गैसोल और इथोनॉल की यह योजना किसानों के फायदे में दी हैं। मैं यह चाहूंगा कि सूखे के साथ-साथ इथोनॉल और गैसोल को ठीक उसी प्रकार से लागू किया जाना चाहिए। जितनी शुगर मिलों ने इस बार इथोनॉल बनाया है, उस पर अभी तक पूरी कार्रवाई नहीं हुई है और कागजों में इसे न रखा जाये। सरकार ने घोषणा की है कि पैट्रोल के साथ-साथ डीजल में भी हम इथोनॉल और गैसोल बनाने की बात करेंगे और इस पर चिंता करनी चाहिए। आज इस बात की आवश्यकता है कि वास्तव में हमें किसान के प्रति चिंता करनी पड़ेगी। इस देश में किसान सर्वोपरि है। मैं बिजनौर जिले से आया हूं औऱ वहां ६०-६५ प्रतिशत किसान की फसल सूख चुकी है और पशु चारे के बगैर भूखे मरने लगे हैं।
१९.२९ hrs. ( MR. SPEAKER in the Chair) मेरा मंत्री जी से निवेदन है कि जहां पर उत्तर प्रदेश में खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का अरबों रुपया शुगर मिलों पर बकाया है, उसके लिए सरकार योजना बनाये और जो किसानों का गन्ना और फसल सूख गई है, धान नहीं बोया गया है, उसके हिसाब से २०,००० रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से किसानों को राहत दी जानी चाहिए जिससे वे अपना जीवन-यापन कर सकें। यह सूखे की स्थिति देश के सामने बहुत भयंकर है। कम से कम किसान के मन में यह आना चाहिए कि केन्द्र की सरकार इस बारे में विचार कर रही है और वह सूखे की चिंता कर रही है। कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं। मेरा निवेदन है कि पूरे उत्तर प्रदेश में लगान माफ किया जाना चाहिए, किसान का कर्जा माफ किया जाना चाहिए औऱ किसानों को २०,००० रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से उत्पादन लागत का जो नुकसान हुआ है, वह दिया जाना चाहिए। देश में जो कृषि बीमा योजना है, उसको भलीभांति लागू किया जाना चाहिए। प्रदेश की सरकारों को इसे लागू करने के लिए निर्देश दिये जाने चाहिए । सदन में सूखे पर बहस हो रही है। जो सुझाव माननीय सदस्यों द्वारा दिए जा रहे हैं, उन पर अमल किया जाना चाहिए। प्रभावित जनता को राहत देने के बारे में योजना बनानी चाहिए। बिजली का संकट भी उत्तर प्रदेश में भंयकर है। उत्तर प्रदेश में एक बीघा जमीन भी ऐसी नहीं है, जहां पर खेती नहीं हो सकती है, इसलिए सरकार को विशेष रूप से बिजली की व्यवस्था करनी चाहिए। नहरों में पानी की भी व्यवस्था करनी चाहिए। उत्तर प्रदेश के लिए इस विषय में चिन्ता नहीं की गई, तो न केवल जानवर भुखमरी के शिकार होने वाले हैं बल्कि मनुष्य भी भुखमरी के शिकार होने वाले हैं और देश में हाहाकार की स्थिति पैदा हो जाएगी ।
महोदय, मैं सदन का ज्यादा समय न लेते हुए, आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया। अंत में, मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि देश में ११ प्रदेश इस समय सूखे की चपेट में है। सूखे की स्थिति को देखते हुए, किसानों का लगान माफ किया जाना चाहिए, कर्ज माफ किया जाना चाहिए। इसके साथ ही २० हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से किसानों को अनुदान के रूप में राशि दी जानी चाहिए।
श्रीमती कैलाशो देवी (कुरूक्षेत्र): अध्यक्ष महोदय, देश के सर्वोच्च सदन में आज सूखे और बाढ़ जैसे तात्कालिक और गम्भीर विषय पर चर्चा की जा रही है। सूखे जैसी भयंकर प्राकृतिक आपदा के कारण प्रतिवर्ष अनेक प्रदेश प्रभावित होते हैं। लगभग १५ वर्षों के बाद अब की बार हरियाणा प्रदेश भी भयंकर सूखे की चपेट में आ गया है, जिसके कारण तालाब, नदिया और नाले आदि सूख गए हैं। सिंचाई के लिए पानी तो बहुत दूर की बात, पशुओं तक पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। हजारों एकड़ फसल बरबाद हो गई है। किसान हजारों एकड़ फसल में हल चला चुका है और बरबादी के कगार पर ख़ड़ा किसान केन्द्र सरकार और राज्य सरकार की तरफ आशा भरी द्ृष्टि से आर्थिक मदद के लिए देख रहा है।
महोदय, हरियाणा प्रदेश में मोटे अनाज की पैदावार पहले १२६ लाख हैक्टेयर से घटकर ७५ लाख हैक्टेयर भूमि तक रह गई है। जल-भण्डारण को भी बख्शा नहीं गया है। हरियाणा और राजस्थान में बाजरे और धान की फसल को भंयकर नुकसान हुआ है। देश में खरीफ की फसल २३२ लाख हैक्टेयर जमीन पर लगाई जाती थी, जो अब घटकर ७४ लाख हैक्टेयर रह गई है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को प्रभावित लोगों के लिए आपतकालीन योजनायें लागू करने के लिए निर्देश दे दिए हैं, जिनके अन्तर्गत किसानों को बीज और अनाज उपलब्ध करवाया जाएगा। साथ ही पेयजल भी उपलब्ध करवाया जाएगा। काम के बदले अनाज योजना को भी लागू करने की योजना है। माननीय कृषि मंत्री, श्री अजीत सिंह जी ने कहा था कि राज्य सरकारों को दिशा निर्देश दे दिए गए हैं कि वे आपतकालनीन योजनाओं को लागू करें। लेकिन मैं एक बात पुरजोर शब्दों में कहना चाहती हूं कि इन योजनाओं का लाभ सरकारी मशीनरी की विफलता और भ्रष्ट अफसरशाही के कारण जरुरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाता है। आम गरीब जनता इन लाभों से वंचित रह जाती है और नौकरशाह लोग इन योजनाओं से लाभान्वित होते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम केवल ४० प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई करने के काबिल हो पाए हैं। सिंचाई के लिए हमें टयुबवैल पर निर्भर रहना पड़ता है और इसके लिए भी बिजली उपलब्ध नहीं हो पाती है। नहरों का भी हम अपेक्षित विकास नहीं कर पाए हैं। ऐसी दशा में न केवल किसान बल्कि प्रशासनिक अधिकारी भी आकाश की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं। मैं पूछना चाहती हूं कि क्या हम सरकारी पदों पर बैठे लोग, केवल फाइलों पर घुन लगाकर निश्चिन्त होकर बैठ जायेंगे। आज का दिन तो आराम से कट गया, कल आप अपनी सुधि लेंगे । ऐसा नहीं होना चाहिए। आजादी के ५५ वर्ष बाद भी हम ऐसे हालात में देश में पैदा नहीं कर पाए कि जिन क्षेत्रों में सूखा पड़ता है वहां सूखे से निपटने के लिए जल को रुाोतों द्वारा इकट्ठा करें ताकि सूखे के समय उस भूमि की प्यास बुझायी जा सके। जहां बाढ़ से फसलें तबाह और बरबाद होती हैं वहां भी कोई प्रबन्ध नहीं कर पाए जिससे बाढ़ से इन फसलों की रक्षा हो सके। एक तरफ जहां हम २१वीं सदी में भारत को विकसित देशों की श्रेणी में देखना चाहते हैं वहां दूसरी तरफ राष्ट्र की रीढ़ कहे जाने वाले किसान की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी कर रहे हैं। सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम १९७३ में चलाया गया था लेकिन यह उसके अनुकूल प्रभाव दिखा नहीं पाया। इसके जो उद्देश्य थे जैसे फसलों का उत्पादन, भूमि की उत्पादकता बढ़ाना, पशुधन, जल संसाधनों का पता लगाना, सूखे से निपटना और कार्यक्रम क्षेत्रों में रहने वाले संसाधनहीन लोगों को रोजगार देकर उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति ऊपर उठाना, इन पर एक प्रश्न चिन्ह लगा है। इन उद्देश्यों की सार्थकता को सिद्ध करने के लिए हमें इस योजना का पुनर्विवेचन, पुनरावलोकन, पुनर्मूल्यांकन करना होगा ताकि इस योजना के उद्देश्यों के अन्तर्गत कार्यों को सिद्ध किया जा सके। बाढ़ के पानी को व्यर्थ बहने से रोकने के लिए बांध बनाने होंगे ताकि सूखे की स्थिति में बखूबी निपटा जा सके। अकेले हिमाचल, हरियाणा,पंजाब में जो बरसाती पानी बह कर चला जाता है यदि वहां बांध बना कर रोका जाएगा तो अकेले पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, गुजरात सहित कई राज्यों की प्यासी भूमि की प्यास बुझायी जा सकती है। अकेले हिमाचल प्रदेश में प्रति वर्ष बरसाती पानी से २५ हजार मेगावाट पन बिजली पैदा की जी सकती है। ऐसी योजनाओं को जैसे शाहपुर कंडी योजना, टिहरी गढ़वाल बांध, एसवाईएल लिंक नहर जिस का पिछले दिनों कोर्ट ने भी फैसला दिया जो हजारों बरसों से लम्बित पड़ी है और फाइलों की धूल चाट रही है, उन परियोजनाओं को ब्यूरोक्रेसी के मकड जाल से निकाल कर त्वरित प्रभाव से पूरा किया जाना चाहिए। पूंजी लेकर भी योजनाएं पूरी करने से लाभ सहित पूरा का पूरा रिस्क कवर किया जा सकता है।
मैं जोर देकर कहना चाहूंगी कि हमारे सामने जो विकल्प वाटर रिचार्जिंग का है, उस पर विचार करना चाहिए। बरसात के दिनों में डीप बोरिंग करके वाटर लैवल ऊपर उठाया जा सकता है ताकि सूखे के दिनों में उस पानी का प्रयोग हो सके। तालाबों में बरसाती पानी को नदियों और नालों में बेकार जाने से रोकना आवश्यक है। इसके लिए पुख्ता प्रबन्ध करने पड़ेंगे। सरदार सरोवर डैम और भाखड़ा डैम के बाद कृषि सैक्टर को कोई ऐसी कारगर परियोजना आज तक किसी सरकार ने नहीं दी है। किसी समय कहा गया था कि भाखड़ा बांध भारत के विकास का मंदिर साबित होगा। उसने अपने नाम के अनुरूप साबित भी किया। आज भारतवर्ष को ऐसे विकास के मंदिरों की आवश्यकता है। ऐसे विकास के मंदिरों को बना कर उन मंदिरों को लुटेरे पुजारियों से बचाने की आवश्यकता है।
प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए किसानों के लिए फसल बीमा योजना लागू करके सरकार ने राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं। वे अत्यधिक प्रभावशाली तरीके से लागू की जानी चाहिए। कृषि को उद्योग का दर्जा मिले और किसानों की फसल प्राकृतिक आपदा के कारण तबाह होने पर उसका लाभकारी मूल्य मिले, लागत और बिक्री मूल्य लाभकारी मिलें यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। काम के बदल अनाज योजना फाइलों में धूल चाट रही हैं। उसे पूरी तरह लागू किया जाए ताकि देश की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले किसान को मजबूती प्रदान की जा सके।
वाटर कमीशन बुला कर एक एमर्जेंसी मीटिंग माननीय मंत्री जी को कॉल करनी चाहिए क्योंकि आज सबसे ज्वलंत समस्या बाढ़ और सूखे की है ताकि इस समस्या से त्वरित प्रभाव से निपटा जा सके और पीड़ित लोगों को राहत दिलायी जा सके।
श्री भान सिंह भौरा (भटिंडा) : अध्यक्ष जी, आज हम बाढ़ और सुखाड़ का कितना प्रकोप है, इस पर चर्चा कर रहे हैं। हम देख रहे हैं कि उत्तर बिहार, उत्तर बंगाल और असम में कितनी बाढ़ आई है। असम में १५ लोग, बंगाल में ५ लोग मारे गये हैं। हमें दुख होता है कि देश को आजाद हुये ५५ साल हो गये हैं लेकिन बाढ़ पर रोक नहीं लग पायी। यह हमारी विफलता है। इसका कारण हमारी योजनाओं में त्रुटियां होना है।
अध्यक्ष जी, मैं पटियाला जिले का एक उदाहरण देना चाहूंगा। जब वहां हर तीसरे या चौथे साल बाढ़ आती थी तो लोग उठ खड़े होते थे और वे लोग राजा के पास जाते और कहते कि आप हाथी पर चढ़कर सोने का चूड़ा पेश करो, तभी हम लोगों को बाढ़ से निज़ात मिल पायेगी। उसके बाद राजा ने नदी पर बांध बनाया और आज किसी को हाथी पर चढ़ने की जरूरत नहीं है। आज पटियाला में बाढ़ का कोई खतरा नहीं है। इसलिये सरकार से निवेदन है कि ऐसा बांध बनाया जाये ताकि बाढ़ को रोका जा सके। बाढ़ के कारणों का पता लगाया जाये तभी हिन्दुस्तान में लोगों का भला हो सकता है। इस सैशन को मौनसून सत्र दिया गया है, ऐसी हालत देखकर इसका नाम बदल देना चाहिये।
अध्यक्ष जी, यहां के लोग अंधविश्वासी हैं और कई तरह के लंगर लगा रखे हैं। हमारे इलाके में नथाणा नाम की एक जगह है जहां लोग शराब का लंगर लगा रहे हैं। अपने देवता को खुश रखने के लिये हो रहा है और उसका फोटो अखबार में भी छपा है। इन बातों को देखकर सरकार से विनती है कि इसे प्रोपेगंडा करना चाहिये और लोगों को बताना चाहिये कि ऐसी कोई बात नहीं है। हमारे भटिंडा जिले में पानी की बहुत कमी है। वहां राजीव वाटर योजना चलाई है। यह दो जिलों में है। मोगा, मुक्तसर और आधा जिला मानसा का काट दिया गया है। मैंने मंत्री जी को लिखा लेकिन कोई जवाब नहीं दिया है कि क्यों काटा गया है। लोग बहुत दूर-दूर से पानी लेने जाते हैं। वहां का पानी भी ठीक नहीं है। पंजाब भी उन १२ राज्यों में से एक है जहां बरसात नहीं हुई है। जहां जून में २२१ मिलीमीटर बरसात होती थी, इस बार केवल ३६ मिलीमीटर बरसात हुई है। पंजाब की हालत चिन्ताजनक है। इसका भी ध्यान रखना चाहिये।
अध्यक्ष जी, यहां पर पंजाब-हरियाणा के पानी की बात की गई। जब पंजाब बांटा गया, उसमें से ८० लाख हैक्टेयर जमीन हरियाणा को मिली और पंजाब को १ करोड़ ५ लाख हैक्टेयर मिली। जब पानी का बटवारा किया गया तो हरियाणा को १६ मलियन एकड़ फीट और पंजाब को १२ मलियन एक़ड़ फीट दिया गया। हरियाणा को जमीन कम लेकिन पानी ज्यादा दिया गया। हरियाणा का पानी इस्तेमाल करने में नुकसान है, इसलिये कोई बात नहीं। एस.वाई.एल. नहर का जो मामला है। पंजाब में पिछली बार भी आपकी सरकार थी, जब आपकी सरकार थी तो आपने उन्हें बैठाकर उनका फैसला क्यों नहीं करवाया, आप क्यों देखते रहे कि दोनों राज्य लड़ते रहें और आप फायदा उठाते रहें। अगर दोनों राज्यों को बैठाकर फैसला कराया जाए तो फैसला हो जायेगा। परंतु आप जो केन्द्र में आये हैं, आप लड़ाई चाहते हैं। ताकि दोनों राज्य लड़ते रहें और आप फायदा उठाते रहें।…( व्यवधान)अब मैं सूखे की बात पर आता हूं। सूखे की बात पर कर्जा माफ करने के लिए कहा है। किसानों का कर्ज आपको माफ करना चाहिए। इसमें जो सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं वे खेत मजदूर होते हैं। जब फसल नहीं होती है तो खेत मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं। इसलिए उनके लिए भी कोई मुआवजा होना चाहिए, तभी लोगों को फायदा होगा। काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत जो अनाज देते हैं। पंजाब में इतना गेहूं खराब हो गया। अगर गेहूं खराब होता है तो उसे गरीबों में बांट दों तो क्या वे लोग इसे नहीं खायेंगे। इतना गेहूं खराब हो जायेगा, लेकिन हम गरीबों को नहीं देंगे। इसलिए मैं आपसे विनती करता हूं कि आप इस पर सोचिये कि जो गेहूं खराब हो रहा है, उसे आप गरीब लोगों को एक रुपये किलो के हिसाब से सस्ते दामों पर दे दीजिए, ताकि उन लोगों को पेट भर सके और बेराजगारी का प्रकोप भी कम हो सके। मैं समझता हूं कि कृषि मंत्री जी इस पर ध्यान देंगे और जो बातें मैंने कही हैं उसमें कर्जा माफ होना चाहिए।
अध्यक्ष महोदय, जो फसल बीमा योजना है, उसकी इतनी इंस्टॉलमैन्ट है कि उसे लोग चुका नहीं सकते हैं। इसलिए पंजाब के लोग फसल बीमा कराने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए आप लोग कोई और स्कीम बनायें, ताकि लोगों और आम किसानों को इसका फायदा हो सके। मैं समझता हूं सरकार इस पर ध्यान देगी।
श्री रामानन्द सिंह (सतना): अध्यक्ष महोदय, यह चर्चा कब तक चलेगी और जिन्होंने नियम १९३ के तहत नोटिस दिये हैं, चाहे वे किसी भी दल के हों, आप उन्हें बोलने का मौका देंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। मेरा नाम भी आपके पास है।…( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Chowdhary Talib Hussain wants to lay down his speech.
CHOWDHARY TALIB HUSSAIN (JAMMU): I would like to speak.
MR. SPEAKER: If you want to speak, then you will have to wait for some time.
CHOWDHARY TALIB HUSSAIN : Sir, I would like to speak.
MR. SPEAKER: If you want to give a written speech, then you can do it. But if you want to speak, then you have to wait for some time.
चाैधरी तालिब हुसैन :सर अगर आप इजाजत देंगे तो बहुत अच्छा रहेगा।
urdu अध्यक्ष महोदय :अभी आप बैठिये मैं आपका नाम बाद में लूंगा।
श्री पी.आर. खूंटे।
श्री पी.आर.खूंटे (सारंगढ़) : माननीय अध्यक्ष जी, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।…( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव :अध्यक्ष महोदय, आपके पास लाइन में नाम पहुंच गये हैं, यह कहते हैं कि उसमें चेंज नहीं होता है। मेरा नाम सातवें नम्बर पर था, मैंने पूछा था।…( व्यवधान)मैं इंतजार कर रहा हूं।
अध्यक्ष महोदय : मैं चैक कर रहा हूं, क्या हुआ है, मैं आपको बाद में बताऊंगा।
श्री रामानन्द सिंह : अध्यक्ष जी, अगर पार्टी समय न दे तो आप भी दे सकते हैं। पार्टियों में पक्षपात होता है। मेरा अनुरोध है कि जिन्होंने नोटिस दिया है, उन्हें कृषि मंत्री जी के भाषण के पहले बोलने का मौका दें। हमारी प्रार्थना है कि आप हमें बोलने की अनुमति दें।
अध्यक्ष महोदय : मैं आपको अनुमति देने वाला हूं, मैंने आपको यह पहले भी कहा था।
डॉ.जसवन्त सिंह यादव : उनका नम्बर नहीं था, आपने कर दिया, उन्हें कैसे बाद में बुलायेंगे। मेरा नम्बर आपकी लिस्ट में सातवें नम्बर पर था, वह किस आधार पर चेंज हो गया। मैंने खुद लिस्ट देखी थी।
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): आज श्री विजय कुमार मल्होत्रा जी यहां नहीं हैं, उनकी जगह श्री किरीट सोमैया जी काम देख रहे हैं। भाजपा के हमारे मित्र चिल्ला रहे हैं। उन्हें श्री किरीट सोमैया से शिकायत होनी चाहिए, क्योंकि सूची में गड़बड़ श्री सोमैया ने की है।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मैं इसका खुलासा करता हूँ। कभी कभी माननीय सदस्यों को भी बराबर बात समझ नहीं आती है।
श्री रामजीलाल सुमन : अध्यक्ष महोदय, इन लोगों की शिकायत अपनी जगह पर जायज़ है। श्री विजय कुमार मल्होत्रा आज नहीं हैं तो काम चलाने के लिए जिम्मेदारी किरीट सोमैया को दी है। आज सूची में जो गड़बड़ की है, सब किरीट सोमैया ने की है। लिहाज़ा किरीट सोमैया से माननीय सदस्य को शिकायत करनी चाहिए।
अध्यक्ष महोदय : यादव जी, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि आपका नाम लिस्ट में पहला है लेकिन आपकी यह दूसरी लिस्ट है। अभी तक मेरी पहली लिस्ट पूरी नहीं हुई है। पहली लिस्ट में अंतिम नाम खूंटे जी का है। इसलिए चेयर की तरफ से कोई अन्याय आप पर नहीं हुआ है और न कभी होगा। आपको चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। जब दूसरी लिस्ट शुरू करेंगे तो आपका नाम पहला होगा। आपको मैंने चैम्बर में भी बताया है कि आपको इजाज़त दूंगा। रामदास आठवले का नाम आज मैं आखिर में नहीं रख रहा हूँ।
खूंटे जी आप बोलना शुरू करें।
श्री पी.आर.खूंटे: माननीय अध्यक्ष जी, आज इस सदन में १२ बजे से देश में सूखे और बाढ़ की स्थिति से उत्पन्न समस्या पर चर्चा हो रही है। …( व्यवधान)अखिलेश जी, मैं कभी आपके मामले में हस्तक्षेप नहीं करता। मैं बोल रहा हूँ तो कृपया मुझे अवसर दें।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : आप जानदार ढंग से बोलें।
श्री पी.आर.खूंटे: माननीय अध्यक्ष जी, हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। ८० फीसदी जनता कृषि पर निर्भर करती है। अर्थव्यवस्था भी कृषि पर निर्भर करती है लेकिन क्या कारण है कि आये दिन इस देश के किसानों को कभी सूखे का, कभी बाढ़ का तो कभी कीट प्रकोप का, कभी ओला का या प्राकृतिक विपदा का सामना करना पड़ता है। दुर्भाग्यवश आज देश के लगभग १२ प्रदेशों में भयंकर सूखा है। इन १२ प्रदेशों के किसान इस सूखे के संकट से जूझ रहे हैं जिस पर आज हम चर्चा कर रहे हैं। इनमें खासकर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु हैं। कुछ राज्य बाढ़ की चपेट में हैं। हमारा छत्तीसगढ़ प्रदेश इस सदी के सबसे भयानक सूखे की चपेट में है। मैं कुल मिलाकर यह कहूँगा कि वहां कन्द-मूल खाने की स्थिति निर्मित हो गई है। महा अकाल की स्थिति है। हमारे बुज़ुर्ग लोग बताते हैं कि सन् १९६३-६४ में इस अकाल जैसा अकाल पड़ा था और उस अकाल की ऐसी भयानक स्थिति थी कि उससे पीड़ित किसान, गरीब मजदूर, गाय और भैंस के गोबर में अन्न का दाना ढूंढकर खाने के लिए मजबूर थे। आज वही स्थिति छत्तीसगढ़ राज्य की निर्मित हो रही है। किसान ने तो मौसम को देखते हुए समय पर धान बोया लेकिन मौसम ने साथ नहीं दिया जिसके कारण आज वहां रोपाई और व्यासी का काम ठप्प हो गया। जो फसल उग गई वह सूखकर मर रही है और राज्य सरकार सूखे की स्थिति से निपटने के लिए या इस सूखे का सामना करने के लिए कुल मिलाकर असमर्थ है।
आज से एक साल पहले भी छत्तीसगढ़ में भयंकर अकाल पड़ा था। उस अकाल का सामना करने के लिए छत्तीसगढ़ में हमारे प्रतिपक्ष के नेता श्री नंद कुमार साय और हमारे भाजपा के विधायकों ने छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री से एक प्रश्न पूछा था कि छत्तीसगढ़ में इतना भयंकर अकाल पड़ा है, लाखों लोग पलायन कर रहे हैं, पेयजल की समस्या ख़ड़ी हो गई है, चारे की समस्या खड़ी हो गई है, राज्य सरकार के पास इससे निपटने के लिए कितने धन का प्रावधान है।
महोदय, छत्तीसगढ विधान सभा में, छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री ने जवाब दिया कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार के पास केवल ३,००,०००/- रुपए हैं। मैं आपके माध्यम से सदन को याद दिलाना चाहता हूं कि हमारे छत्तीसगढ की कुल जनसंख्या २ करोड़ ७ लाख है। यदि राज्य सरकार के ३ लाख रुपए से प्रसाद बनाकर भी उस समय बांटती, तो छत्तीसगढ़ की २ करोड़ ७ लाख जनता को प्रसाद भी नसीब नहीं होता।
अध्यक्ष महोदय, मैं प्रधान मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं कि छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि उस समय चार प्रदेश जो सूखे से पीड़ित थे और सूखे के कारण भुखमरी की मार झेल रहे थे, उन चारों प्रदेशों में काम के बदले अनाज एवं गांव-गंगाजल योजनाओं के माध्यम से राहत कार्य चलाए। वही स्थिति आज फिर छत्तीसगढ़ में बन गई है और किसानों, गरीबों एवं मजदूरों में हा-हाकार मचा हुआ है, लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री को इस बात की जरा भी चिन्ता नहीं है। वहां के किसान, वहां की गरीब जनता जहां भगवान से प्रार्थना कर रही है कि इन्द्र देव भगवान पानी बरसाओ और हमारी फसल की रक्षा करो, वहीं हमारे छत्तीसगढ के मुख्य मंत्री महोदय पानी न बरसे ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं ताकि केन्द्र सरकार से सूखा राहत राशि मिल सके और जेब गरम हो सके।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल (कानपुर) : अध्यक्ष महोदय, मेरा आपके माध्यम से माननीय सदस्य से निवेदन है कि उन्हें इस प्रकार की बात नहीं करनी चाहिए कि किसी प्रदेश का मुख्य मंत्री भगवान से यह प्रार्थना करे कि पानी न बरसे। ऐसा कहना ठीक नहीं है। विरोध करना चाहिए, लेकिन इस स्तर तक विरोध न करें।
अध्यक्ष महोदय : मैं आपकी बात से सहमत हूं। श्री खुंटे जी, आप ऐसा आरोप मत लगाइए। आप अपनी बात कहिए।
श्री पी.आर.खूंटे: अध्यक्ष महोदय, वहां के किसानों ने मेंढक और मेंढ़की की शादी की। २० जुलाई के अखबार में यह समाचार छपा है। तेल भी चढ़ा, हल्दी भी लगी, पूजा हुई, मंत्रोच्चार भी किया गया, बारात निकाली गई, टीका भी हुआ एवं खाना भी हुआ तथा अन्य सभी औपचारिकताएं पूर्ण हुईं और मेंढ़क - मेंढ़की को तालाब में विसर्जित कर दिया गया। आप कहें तो मैं पूरा समाचार पढ़ सकता हूं, लेकिन इसमें और ज्यादा समय लगेगा। इस प्रकार से वहां के लोगों ने पानी न गिरने से परेशान होकर मंत्रोच्चार का सहारा लिया। वहां सूखे की भयंकर समस्या है। इसलिए मेरा निवेदन है कि जो स्थिति निर्मित हुई है वह बहुत भयंकर है।
अध्यक्ष महोदय, मैं केवल छत्तीसगढ़ की ही बात नहीं कर रहा हूं। आज किसानों की जो हालत खराब है, आज किसान कंगाली की हालत में पहुंच गए हैं, वह केवल एक प्रदेश का हाल नहीं है बल्कि सारे देश में किसानों की यही हालत है। किसानों की इस दुर्दशा का दोषी कौन है। आज देश को आजाद हुए ५५ साल हो गए हैं और कुछ सालों को यदि छोड़ दिया जाए, तो देश में कांग्रेस पार्टी ने एकछत्र राज्य किया। दुर्भाग्यवश मध्य प्रदेश में साढ़े आठ साल से कांग्रेस का राज्य है, जहां भयंकर सूखा पड़ा है। जहां-जहां और जिन-जिन प्रदेशों में कांग्रेस का राज्य है वहां-वहां भयंकर सूखा पड़ रहा है और लोगों को अकाल का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस की किसान-विरोधी नीतियों के कारण आज हिन्दुस्तान के किसान की यह दुर्गति हुई है। आज हालत यह है कि किसान कर्जे में डूबा हुआ है। किसान का बेटा पैदा होता है, तो वह भी अपने ऊपर कर्जा लेकर पैदा होता है। किसान भूखा है, कर्जे में डूबा हुआ है, लेकिन कांग्रेस के लोग मलाई खा रहे हैं। अगर कांग्रेस ने अपने शासन काल में किसान को सिंचाई के लिए पानी पहुंचा दिया होता, तो आज हमारा किसान खुशहाल होता, लेकिन कांग्रेस ने किसान के फायदे की नीति नहीं बनाई और किसान को खेती की सिंचाई हेतु पानी पहुंचाने की नीति पर अमल नहीं किया। कांग्रेस की किसान-विरोधी नीतियों के कारण किसान की यह हालत हुई है।
अध्यक्ष महोदय, मैं भारत के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि प्रथम बार देश में कृषि नीति इनके समय में आई, किसानों की फसलों के बीमा की योजना इनके समय में लागू हुई। इस योजना के तहत भी कांग्रेस शासित राज्यों में किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है और उनके बीमे की राशि नहीं मिल रही है। इस योजना के तहत छत्तीसगढ़ में भी अभी तक सूखा-पीड़ितों को लाभ नहीं दिया गया है।
20.00 hrs. आज भी मध्य प्रदेश में फसल बीमा योजना का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है। यह हमारे लिए बहुत दुर्भाग्य की बात है। हम यहां लम्बे चौड़े भाषण बोलते हैं, किसानों के हितों की बात करते हैं लेकिन जहां किसानों के हित और भलाई की बात आती है वहां हम पीठ दिखाते हैं, मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं। यह कतई शोभा नहीं देता।
मुझे आश्चर्य हो रहा है कि जहां सदन सूखे की समस्या पर गंभीरता पूर्वक विचार कर रहा है वहां आप सदन की उपस्थिति देखिये। देश के १२ प्रदेशों के किसानों…( व्यवधान)मैं एक प्रदेश की बात नहीं कर रहा हूं। देश के १२ प्रदेशों के किसान इतने भयंकर सूखे का सामना कर रहे हैं। आज उनके सामन कोई विकल्प नहीं है कि वह करें तो क्या करें। एक तो मौसम उनका साथ नहीं देर रहा और दूसरी तरफ राज्य सरकार उनका साथ नहीं दे रही। किसान की ऐसी स्थिति हो गयी है कि वह क्या करे और क्या न करे। उनके सामने बिजली, बीज, सिंचाई और पानी की समस्या है। आप छत्तीसगढ़ में देखिये। जिन किसानों के पास टयूबवैल्स हैं, उनकी भी हालत बहुत खराब है। हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में बिजली बहुत सरप्लस है। आप छत्तीसगढ़ में जाकर देखिये। आज भी हजार गांव ऐसे हैं जहां बिजली पहुंची नहीं है। वहां लोग अंधेरे में जीने के लिए मजबूर हैं। वहां ज्यादातर लोग बोलते हैं कि बिजली की आंख मिचौनी के कारण टयूबवैल खराब हो गये हैं या बंद पड़े हुए हैं। इसके अलावा जो फसल खेत में लगी हुई है, वह मर रही है। इसके लिए दोषी कौन है ? मेरा यह भी कहना है कि हजारों पम्पों के लिए अभी तक स्थायी कनैक्शन तो दूर आर्डिनेरी कनेक्शन भी नहीं दिया गया है। वहां के किसान परेशान हैं। वे अपने आप में दुखी हैं।
मैं इस सदन से निवेदन करना चाहता हूं कि किसानों के नाम पर बहुत राजनीति हो चुकी है। ऐसे १२ राज्यों में सूखे की स्थिति है। जिस प्रकार की स्थिति मौसम की तरफ से निर्मित हुई है, उससे कोई भरोसा नहीं है। अगर इस बात को गंभीरता से नहीं लिया गया तो पूरे देश में हाहाकार मच जायेगा। किसान कहीं का नहीं रहेगा। आज छत्तीसगढ़ से बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया है।
मैं यह भी कहना चाहता हूं कि सरकारी नियमानुसार पूरे प्रदेशों में १५ जून से, बारिश के बाद राहत कार्य बंद कर दिया जाता है। मेरा निवेदन है कि जिन प्रदेशों में सूखा राहत कार्य १५ जून से बंद कर दिया गया है, वहां फिर से सूखा राहत कार्य चलाने का आदेश दिया जाये जिससे खेतिहर मजदूर और गरीब मजदूरों को रोजी-रोटी मिल सके।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय, मैं पहली बार आपकी उपस्थिति में बोल रहा हूं। मैं बहुत गंभीर विषय पर बोल रहा हूं। मुझे आप एक मिनट और बोलने का समय दीजिए। मैं सदन का समय बर्बाद नहीं करना चाहता। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ में…( व्यवधान)वभिन्न विकास निमार्ंण के कार्यों में मजदूरों से काम लिया गया है जिनकी मजदूरी का भुगतान अभी तक छत्तीसगढ़ शासन ने नहीं किया है। एक तो खेत में काम बंद हो गया और दूसरा खेत में मजदूरों का भी जाना बंद हो गया। उनके सामने रोजी रोटी की समस्या खड़ी हो गयी है। जिन लोगों ने काम किया है, उनको कपून दिया गया है लेकिन उनका अभी तक भुगतान नहीं हुआ है। मेरा सरकार से निवेदन है कि वे उनके ऊपर दबाव बनायें और तत्काल उनकी मजदूरी का भुगतान कया जाये।
मैं एक और निवेदन करना चाहूंगा कि छत्तीसगढ़ में सिंचाई योजना खासकर सारंगढ मेरा संसदीय क्षेत्र है जहां से मैं चुनकर आता हूं, छत्तीसगढ़ की सभी प्रमुख नदियां बहती हैं। महानदी, हसदो नदी, केलो नदी, मांड नदी, जोक नदी, सोन नदी, अरपा नदी, पेरी नदी इत्यादि नदियां मेरे संसदीय क्षेत्र सारंगढ़ से होकर गुजरती हैं लेकिन वहां सर्वाधिक सूखा पड़ता है। अनेक ऐसी सिंचाई योजनाएं हैं जो २२ साल, २८ साल और ३२ साल से लंबित पड़ी हैं। उऩ सारी योजनाओं को समय सीमा के भीतर पूरा किया जाये और किसानों के खेत में पानी पहुंचाया जाये। हसदो सिंचाई योजना में केन्द्र सरकार ने २७२ करोड़ रुपये दिये हैं जिसे २००३ तक पूरा करने का आदेश हुआ है लेकिन छत्तीसगढ़ शासन के मुखिया ने उसमें बहुत भ्रष्टाचार किया है। मेरी जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ में जो …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आप समाप्त कीजिए।
श्री पी.आर.खूंटे: उसमें १०० करोड़ रुपये के घोटाले की बात आई है जिससे किसान का बहुत बड़ा हक मारा जा रहा है। मेरी आपसे प्रार्थना है कि इसकी उच्चस्तरीय जांच हो।
आपने मुझे इस अवसर पर बोलने का मौका दिया, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री रामजीलाल सुमन : अध्यक्ष महोदय, मैं एक आध मिनट में आपकी व्यवस्था चाहता हूं। हम आपको धन्यवाद देना चाहेंगे कि आपने इस बाढ़ और सूखे के सवाल पर सांसदों को बोलने का अवसर दिया।
जो लोग भाषण से वंचित रह जाएंगे, हमारी आपसे प्रार्थना है कि क्या कल दोपहर तक वे अपना लखित भाषण जमा कर सकते हैं।
अध्यक्ष महोदय : मैंआज यह चर्चा पूरी करना चाहता हूं और कल केवल मंत्री का भाषण होगा।
श्री रामजीलाल सुमन : संसदीय कार्य मंत्री ने कहा था। मैं समझता हूं कि आज जो लोग वंचित रह जाएंगे, कल उनका लखित भाषण स्वीकार करेंगे तो आपकी बहुत कृपा होगी।
अध्यक्ष महोदय : यदि एक-दो सदस्य कल भाषण करें तो मैं समझ सकता हूं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं ज्यादा लोगों को समय दे सकूंगा।
श्री किरीट सोमैया: लखित भाषण कल सबमिट करने की अनुमति दें, ऐसी उनकी सूचना है।
अध्यक्ष महोदय : जो सदस्य लखित भाषण देना चाहते हैं, वे कल दे सकते हैं।
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : अध्यक्ष महोदय, मैं कल भाषण दूंगा।
अध्यक्ष महोदय : कल नहीं, इनके बाद मैं आपका नाम बुलाऊंगा। इनका भाषण होने के बाद आपका ही नाम है।
श्री रामदास आठवले : हम कल बोलेंगे।
अध्यक्ष महोदय : कल तो लखित भाषण देना पड़ेगा।
श्री रामदास आठवले : सिर्फ पांच मिनट दे दीजिएगा।
अध्यक्ष महोदय : नहीं, आज बोलिए। सब लोग चाहते हैं कि आपका भाषण सुनें।Shri Bijoy Handique to speak now.
SHRI BIJOY HANDIQUE (JORHAT): Mr. Speaker, Sir, I think that within the strictly rationed time, it is not possible to make a coherent speech. Yet, I make a few points drawing the attention of the government so that they can take pointed action. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: Please keep silence in the House.
SHRI BIJOY HANDIQUE : Sir, in Assam the first wave of flood hit the State in late June and has gone well into July. As a matter of fact, the State still reels under flood. The toll of the first wave is staggering – 13 districts are affected. They are Dhemaji, Lakhimpur, Tinsukia, Jorhat, Sibsagar, Morigaon, Darrang, Sonitpur, Nalbari, Bhorpeta, Dhubri, Goalpara and Kamrup. The number of villages affected is 457 submerging 57,162 hectares of land with 50 per cent of the land under crop; and the number of people affected is about 4,59,079. The biggest blow is the washing away of a strategic railway bridge in Dhemaji district cutting off the district from the rest of the country. Road communications including National Highway No. 52 in the district are also disrupted. This district is again hit during the last three days causing more depredations and washing away of long stretches of embankment.
Sir, a few other districts have been affected recently, in the last three to four days. The National Highways Nos. 31 and 37, the lifeline linking Assam to the rest of the country, are under water at a few points in Nalbari, Dhubri and Goalpara districts. The indications are very clear that the second wave of flood has already arrived.
This is the damage tally in the first wave of flood. What worries us is the pattern and intensity of the flood and going by the past experience this is going to stay and will further deteriorate with more waves coming. A State like Assam, weighed down by resource crunch over the years, is hardly in a position to afford to handle the overall situation all on its own. Besides relief and rehabilitation in all flood situations, it is vitally essential to take up some emergency protective work to minimise the devastation before the next waves of flood hit the State.
It is even necessary to repair the damaged infrastructure between two waves. It is really an intriguing situation. For on-going protective projects funds released by the Ministry of Water Resources are only in trickle. As a result, the projects remain incomplete when the flood season arrives and the State faces fresh attack. Unless these damages are repaired and embankments strengthened, they fail to bear the brunt of more on-rushes in between the waves.
Sir, the only source of fund available at this juncture is the one sanctioned by the Ministry of Agriculture from Calamity Relief Fund. This was the convention till 2000-2001. Due to inadequacy of funds for repair works, Departments like Public Works, Public Health Engineering, which used to get funds from the Revenue Department of CRF for repairing flood damaged infrastructure, are not able to carry out repairs.
The Central Government, in the mean time, in the Ministry of Agriculture by a Circular issued in September, 2001, taking cue from the recommendations of Eleventh Finance Commission, have rejected the proposal to meet expenditure on restoration and reconstruction from Calamity Relief Fund. This is a major departure from the earlier system of utilising CRF for restoration of damaged infrastructure and public assets to pre-calamity level. There is however, a point which I want to place before the hon. Minister – of course, the Agriculture Minister is not here – a point on which the decision can be revised. The Central Government has reportedly emphasised that the scope of utilising Calamity Relief Fund is confined to repair and restoration of immediate nature. If so, this expression `of immediate nature’ can cover emergency protective measures that particularly need to be taken in the time between waves of flood from funds sanctioned for relief and rehabilitation work. Even recent Conference of the Relief Commissioners held in New Delhi two months ago reiterated that the money for relief and rehabilitation cannot be utilised for other than relief work. This is an unrealistic approach, interpreting the recommendations of Eleventh Finance Commission in a perfunctory and casual manner. To earmark some amount for most urgent protective work out of Centrally sanctioned fund for relief and rehabilitation in no way violates recommendations of the Eleventh Finance Commission. It should be rather borne in mind that more devastation means more and more expenditure on relief and rehabilitation. So, instead if some allocations are directed to some essential protective measures, there will be less devastation and to that extent, the expenditure will be minimised. I am not pleading for dodging the recommendations of the Eleventh Finance Commission, but what I emphasise is a meaningful and more pragmatic interpretation of the recommendations of Eleventh Finance Commission.
I conclude by referring to an important point. Sir, the traditional drought area of a State does not remain the same. It has been expanding with the years. Though Assam is not a drought-prone area, we must not lose sight of the fact that over the years, some areas have been growing and expanding significantly as drought prone. Sir, at this rate, it will not be long before a drought zone emerges in Assam too. I urge the Ministry of Agriculture to identify these areas in different States and advise the State Governments to take measures right now to arrest the advance of drought conditions. Sir, it is a sort of slow desertification. One of the causes is that sand-casting occurs particularly when river banks are breached and flows into immediate neighbouring paddy fields around it.
Sir, it is, however, mostly the weather factor and failure of vegetation that causes the drought condition. In this sense I do appreciate that the debate on flood and drought - the twin challenges to the farmers – is taken up together. All said and done, it is also true that unless the Government of India provides adequate funds for all the ongoing projects, it is not possible to contain and control floods in States like Assam. These proposed projects only can give long term solution.
Some of the projects that we have been hearing now soon will pass into legends. People of North-Eastern Region will talk about them as stories. They have already started telling them as stories. I hope, the Government will take immediate measures for releasing adequate funds for the on-going projects. So far as the Eleventh Finance Commission recommendations are concerned, I am not pleading for dodging the recommendations, but my emphasis is on one particular point that there should be more meaningful and more pragmatic interpretation of these recommendations.
SHRI AMAR ROY PRADHAN (COOCHBEHAR): Mr. Speaker, Sir, thank you for giving me the opportunity to speak.
India is a vast country, and 14 States are suffering from drought. At the same time, three States -- West Bengal, Bihar and Assam -- are also suffering from floods. Floods have caused so much havoc that many people died. I would like to confine myself to the flood situation in the North Bengal area. As you know, North Bengal comprises of Darjeeling, Jalpaiguri, Coochbehar and other districts. In the last 15 days, incessant rains were there and, naturally, they resulted in heavy floods. The river was in a spate, and you will be astonished to learn that three people lost their lives in my constituency, Coochbehar. One rescue motor-boat with 12 people lost its control in the midst of heavy currents of the riverKalyani and must have been carried away to Bangladesh. We do not know the whereabouts of them and we do not know whether they are alive or not. Let us all hope that they will be alive when the boat reaches Bangladesh. That is the position. You will be astonished to learn that in that area, nearly two lakh people have become homeless and people have lost hundreds of cattle. As has already been mentioned by Comrades Minati Sen and Joachim Baxla, the national highway and the bridges on the river have been damaged. It is still raining in the morning today. I had a telephonic talk and I was told that there was a heavy rainfall this morning. I do not know what will be happening tomorrow.
Sir, at this juncture, the estimated loss may be more than three hundred crore rupees, I do not know. Where is the Agriculture Minister, Shri Ajit Singh? He has called a meeting of the representatives of 11 States and not 12 because just now, the Members from Orissa said that they have not been called. The representatives of 11 States have been called and I thank you for that. However, there are also those States where the floods are devastating and they are causing havoc. People have lost their lives and also their cattle. Many houses, including double-storied and multi-storied houses, have been washed away. This being the position, I would like to know from the hon. Minister of Agriculture whether he has called a meeting of the representatives of these three States. Has he sent any Central team to that part of the country?
It has not been done. Have the Central Government provided any funds to that region? The Government of West Bengal with their limited resources is trying their best to carry on with the relief and rehabilitation programmes. We expected much more from the Central Government but it is a matter of regret that they did not respond to our request.
Sir, it has been our long-standing demand, the hon. Minister for Water Resources is here, that if the Government is serious about controlling floods in North Bengal and in North Bihar, then an Indo-Bhutan Joint River Commission, for controlling floods in North Bengal, and an Indo-Nepal Joint River Commission, for controlling floods in North Bihar, are a must. We had approached not only the present Minister for Water Resources but also his predecessor about this. I would like to recall on this occasion that even in the year 1969 when North Bengal was reeling under severe flood conditions and around five thousand people were killed, I led a delegation to the then Prime Minister, the late Indira Gandhi and the then Irrigation Minister, Shri K.L.Rao. They assured me that having a River Commission with Bhutan was the only way for controlling floods in the region. If that be so, then could the Government take up the issue with Bhutan? Bhutan is a separate country and it has its own geographical location. They are extracting dolomite for their cement factories and also are collecting stone chips and exporting them to Bangladesh. De-forestation is going on unabated.
Sir, I would like to invite your goodself to visit this region. If you come there, then you would find that most of the houses in and around the rivers there have sunk into the riverbeds. The North Eastern is the connecting link and one cannot afford to avoid this region. My friends from the State of Assam are here. Can they afford to avoid this link? Geographical location of the region would suggest that this part could be used as a corridor. If this is the position, then I would like to request the hon. Minister, we have good relations with Bhutan, to take up the issue of having a Joint River Commission with the Government of Bhutan for controlling floods in North Bengal. Similarly, he should take up the issue with the Government of Nepal for controlling floods in North Bihar.
Sir, in conclusion I would like to make a few suggestions for control of both floods and drought. The first thing that should be done is that the agricultural loans should be waived. Secondly, food for work programmes should be started immediately to save the poor workers. Thirdly, for the flood prone areas, seedlings should be made available. It is because seedlings would be required for sowing after the water levels recedes. With these few words, I conclude my speech.
SHRIMATI RANEE NARAH (LAKHIMPUR): Sir, I wish to lay my speech on the Table of the House.
अध्यक्ष महोदय : डा. जसवंतसिंह यादव, आपके भाषण शुरू करने से पहले श्रीमती रानी नरह अपनी स्पीच ले करेंगी।
* SHRIMATI RANEE NARAH (LAKHIMPUR) : Honourable Speaker, Sir, I would like to draw kind attention of concerned Minister through you over the situation of flood in my Parliamentary constituency, Lakhimpur, Assam. The two Districts, Lakhimpur , Dhemaji and Majuli Sub-Division (district Jorhat) of my constituency are affected very badly by flood.
Around four lakh people of these two Districts have been affected. Four hundred and thirty six (436) villages of Dhemaji District is completely submerged in flood and three lakh people have been affected in this District. 24,046.00 hectares crop of the District is completely damaged. National Highway-52, the only connection to Dhemaji is also washed away in flood and Samarjan wooden bridge No. 400 A(1) and Samarjan Railway bridge has also been completely washed away. There is no connection by road or train to Dhemaji District by rest of the country, the people of this district is in very horrible condition. The Kareng Chapari Dyke of Dhemaji is also completely washed away in flood.
In Lakhimpur, there is around one lakh people who have been affected by flood. 140 villages of Lakhimpur is completely submerged in flood and 29,034.00 hectares crop has been damaged. Two neighbouring LACs, i.e. Nowbaicha, Dakuakhana are also affected by in this flood. In Dakuakhana and Nowbaicha around 80 village have submerged in flood and the boat is the only way of communication in these two LACs. The Matmara Dyke near Bakulguri Tekelifuta in Dakuakhana Sub-Division is also washed away in flood.
If the Lilabari Airport of Lakhimpur District, where all technical facilities are available is started shortly, it can be of great help for the people of Lakhimpur, Dhemaji and Arunachal Pradesh also, for delivery of relief materials to these Districts.
The world famous river island Majuli sub-division of Jorhat District is completely submerged in flood and there is no way of communication. The only way of boat / ferry is also stopped due to heavy flood. No option is there to help the flood affected people.
I would like to request the concerned Minister to take necessary and immediate action to provide help by coins and care to these two Districts Dhemaji and Lakhimpur and Majuli Sub-Division of my Parliamentary constituency.
*Speech was Laid on the Table of the House.
डॉ.जसवन्त सिंह यादव (अलवर): अध्यक्ष महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया। सदन में खाली बोलने का शौक नहीं है कि मैं बोलना चाहता हूं और मेरी बात रिकार्ड में दर्ज हो जाए। मैं जिस प्रदेश से आता हूं, उस प्रदेश में लोगों की हालत को देखकर, जिस हाल में वे जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उसको देखकर अच्छे-अच्छे लोगों की आंख में आंसू आ जायें। हर व्यक्ति को देश में जीने का हक है, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में जीए और राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह प्रदेश की जनता का ध्यान रखे और उसकी आवश्यकताओं को पूरा करे। इसी तरह की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की भी है।
महोदय, राजस्थान में पिछले चार साल से अकाल पड़ रहा है। चार साल से लगातार अकाल पड़ने के कारण वहां यह स्थिति है कि वहां लोगों ने अपनी गायों के तिलक लगाकर छोड़ दिया है, वे जिस हाल में भी रहें, मरें या जीयें। हो सकता है, घर से निकलने के बाद उनको कहीं पर चारा मिल जाए। इसी तरह से बुजुर्ग माता-पिता हैं, उनका जो वहां पर हाल है, उनकी जो तड़फन है, उनकी आंखों के अन्दर आंसू है, इस स्थिति को देखकर हमको खुद रोना आ जाता है। आज बुजुर्ग माता-पिता खाने के लिए तरस रहे हैं। उनके पास दवाई के लिए पैसा नहीं है। सदन में स्थिति से निपटने के लिए चर्चा हो चुकी हैं, माननीय सदस्यों ने आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। सदन मैं सूखाड़ के साथ-साथ बाढ़ की भी चर्चा हो रही है। हर व्यक्ति ने अपने प्रदेश की बात कही है, हिन्दुस्तान की बात कही है और केवल चर्चा मात्र से समस्या हल नहीं हो सकती है। वास्तव में देखा जाए, हम केवल राजनीति करने के लिए खड़े हुए है कि राज्य सरकार ने या किया या केन्द्रीय सरकार ने किया । प्रधान मंत्री जी ने पहली बार देश में गांवों को सड़कों से जोड़ने की योजना चालू की है। हर आदमी चाहता है कि गांवों का विकास हो और उसने कल्पना भी नहीं की थी कि उसके गांव को सड़क से जोड़ दिया जाएगा। इसके अलावा किसानों को क्रैडिट कार्ड की सुविधा भी प्रदान की गई। वह सम्मान के साथ चीजें खरीद सकता है। फसल बीमा योजना की भी चर्चा होती है। इस बारे में माननीय मंत्रीजी भी बहुत चर्चा करते हैं, लेकिन राजस्थान के लोगों ने क्या बिगाड़ा है, वे लोग इन सुविधायों से वंचित है। राजस्थान सरकार ५० प्रतिशत मैचिंग ग्रान्ट भी नहीं देती है और किसान मर रहा है। पूरे देश में फसल बीमा योजना लागू है, गुजरात में यह योजना लागू है, लेकिन राजस्थान में फसल बीमा योजना लागू नहीं है। राजस्थान के सदस्य विपक्ष में भी उपस्थित हैं, वे भी इस विषय पर बोलेंगे। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि राजस्थान सरकार ने अपना पचास प्रतिशत पैसा बचाने के लिए किसानों को मरने के लिए छोड़ दिया है। मैं पिछले चार सालों के आंकड़े निकलवाए हैं । इन आंकड़ों के अनुसार १९०० करोड़ रुपया भारत सरकार से राजस्थान सरकार को मिला, लेकिन राजस्थान के लोग एक-एक पैसे के लिए मोहताज है । माता-पिता के सामने यह दिक्कत आ रही है कि वे अपने बाल-बच्चों का पालन-पोषण कैसे करें, कैसे अपना गुजारा करें। राजस्थान सरकार अभी तक १९०० करोड़ रुपया खर्च नहीं कर पाई है।
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी (बाड़मेर): ये आंकड़े गलत हैं। …( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव :सही आंकड़े आप बता दें। मैं आपकी बात मान लूंगा।…( व्यवधान)
मैं राजनीति नहीं कर रहा हूं।…( व्यवधान)
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : अभी तो मेरे पास आंकड़े नहीं है, मैं कल दे दूंगा । …( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव :क्या राजस्थान में फसल बीमा योजना लागू है? मैं पूछना चाहता हूं कि क्या फसल बीमा योजना को लागू करने के लिए केन्द्रीय सरकार मना कर रही है?…( व्यवधान)
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : कई राज्यों में लागू हैं और कई राज्यों में लागू नहीं है। …( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव :राजस्थान पर हम चर्चा कर रहे हैं। राजस्थान के किसानों को इस योजना का लाभ नहीं मिला, क्या आपको तकलीफ नहीं है? किसान क्या कर सकता है। किसान ने यह गलती की कि ६० प्रतिशत लोगों को लोकसभा में चुनकर भेज दिया। किसानों के नाम पर वोट लेकर सब लोग आए और राजनीति कर रहे हैं। इसमें कांग्रेस या बीजेपी की बात नहीं है। इस बारे में मेरी कृषि मंत्री जी से चर्चा हुई है। कृषि मंत्री यहां बैठे हैं। मैंने उनसे कहा कि आपने यूपी और उड़ीसा में घोषणाएं की, राजस्थान में क्यों नहीं की। उन्होंने अपनी लाचारी बतायी। उन्होंने कहा कि मैं क्या कर सकता हूं? जब तक राजस्थान सरकार हमारे पास सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित करके कागज नहीं भेजेगी तब तक हम कैसे इसे करेंगे। दुर्भाग्य की बात है कि राजस्थान के किसान और दूसरे लोग मर रहे हैं और हम राजनीति कर रहे हैं। वहां अभी तक इसकी शुरुआत नहीं हुई है। वह कैसे रिपोर्ट भेज देंगे? कब किसानों और गरीब मजदूरों को इसका लाभ होगा? जब मानसून खत्म हो जाएगा, राजस्थान खत्म हो जाएगा क्या तब उसे भेजेंगे। वहां के लोग पलायन करने लगे हैं। दुर्भाग्य की बात है कि वहां भयंकर सूखा पड़ा है, फसल चौपट हो चुकी है और राजस्थान सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं है। वहां के बूढ़े माता-पिता को देखें तो आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे। लोगों की जेब में एक भी पैसा नहीं है। जब उनके बच्चे बीमार होते हैं तो वे गहने बेच कर बच्चों का इलाज करते हैं लेकिन माता-पिता जिस हालात में जी रहे हैं उस हालात में वे सोचते हैं कि ये बुजुर्ग हो गए हैं, इनको छोड़ दिया जाए, इनके लिए पैसे कहां से लाएं, रोजी करने जाऊं या इनका इलाज करूं, वे अपने माता-पिता को तड़पते छोड़ देते हैं। राजनीति से दूर हट कर इसका निदान सोचना होगा। आप राजस्थान सरकार की बात कर रहे हैं। मैं गलत आंकड़े पेश नहीं कर रहा हूं। वहां अकाल जैसे हालात हैं। चारों तरफ हाहाकार मचा है। किसानों ने आपका क्या बिगाड़ा है उन्हें बिजली नहीं मिलती। मैं कृषि मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि आपने जो घोषणाएं कीं उसके लिए धन्यवाद। आपने इसमें पहल की और १२ राज्यों की बैठक बुला कर शुरुआत की लेकिन जैसी घोषणाएं कीं, वे काफी नहीं हैं। आप किसानों के कर्जे माफ करने की बात कह रहे हैं। धन्ना सेठ जो एनपीए के ५५ हजार करोड़ रुपए लेकर बैठे हैं उनके ऊपर कोई आपदा नहीं आती, आप उनके ऋण माफ करते हैं। गरीब लोगों पर आपदा आने पर आप उनकी उचित सहायता नहीं कर रहे हैं। प्लेन क्रैश में मौत होने पर आप पांच लाख रुपए देते हैं। जिन के ऊपर प्राकृतिक आपदा आई है उन्हें बचाने के लिए एक हैक्टेयर भूमि पर ढ़ाई हजार रुपए अनुदान देने की बात कर रहे हैं। आज मेरी आत्मा रो रही है। ढाई हजार रुपए में क्या उनका गुजारा होगा? गरीब आदमी को आप अनाज दे देंगे लेकिन मध्यम वर्ग के किसान जिन के ऊपर देश के विकास के लिए ऋण का बोझ है, ट्रैक्टर, टयूबवैल पहुंचाने की आवश्यकता है उन्हें इतनी कम राशि देना ठीक नहीं है। उसे मौत के अलावा कुछ मिलने वाला नहीं है। उसे सबसिडी मिलनी चाहिए, मुफ्त बिजली मिलनी चाहिए और एक ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे उसे लाभ हो। सारी दुनिया के एक्सपर्ट कह रहे हैं कि आने वाले समय में पानी की बहुत अधिक किल्लत होगी। अत्याचार की एक हद होती है। मेरा अलवर जिला डार्क जोन घोषित हो चुका है। किसानों को वहां टयूबवैल के लिए ऋण नहीं मिलता, बिजली का कनैक्शन नहीं मिलता। अगर कोई उद्योगपति उद्योग लगाता है और उसके लिए टयूबवैल लगाता है चाहे वह शराब या बिसलरी का कारखाना लगाए उसे लगाने की सब सुविधाएं मिल जाती हैं, कनैक्शन मिल जाता है, अनुदान भी मिलता है। ऐसा अत्याचार किसान के साथ क्यों होता है? आपने हमारे जिले को डार्क जोन घोषित किया है तो सब सुविधाएं मिलनी चाहिए। हमारे यहां छोटे किसानों के पास एक-दो बीघा जमीन रहती है। उनके पास कोई साधन नहीं हैं। उनके बच्चे बेरोजगार हैं, उनके पास कमाने के साधन नहीं है। आप उन्हें बिजली नहीं दे सकते क्योंकि वह एरिया डार्क जोन घोषित हुआ है। वे सिंचाई नहीं कर सकते, टयूबवैल लगा नहीं सकते। ऐसे इलाके में उद्योगपति बोरिंग करते हैं और उन्हें बिजली का कनैक्शन भी मिलता है। ऐसे में गरीब आदमी की आत्मा रोती है और वह कहता है कि मैंने जिन लोगों को केन्द्र और राज्य में चुन कर भेजा उन्होंने हमारे लिए कुछ काम नहीं किया। वोट देने वाले ये वही लोग हैं जिन के ७० परसैंट वोट पड़ते हैं। लोक सभा और विधान सभा में जिन लोगों को यह भेजते हैं, उनके साथ अत्याचार होता है। जब हम उनको सुविधाएं देने की बात करते हैं तो आपस की राजनीति में उलझ कर रह जाते हैं।
अध्यक्ष महोदय, मेरा आपसे निवेदन है कि भारत सरकार को जो भी निर्णय लेना हो, वह सामूहिक रूप से ले। राज्य सरकारें अपना एक ही राग अलापती हैं कि भारत सरकार उन्हें मदद नहीं दे रही है जबकि तथ्य यह है कि राज्य सरकारें उस पैसे का उपयोग ही नहीं करती हैं। यह राजनीति का खेल चल रहा है। किसान मर रहा है। एक बार स्टेट ने गलती कर दी, अब आगे नहीं करने वाले हैं, कम से राजनीति से दूर हटकर काम करें। माननीय कृषि मंत्री जी ने किसानों को २५०० रुपये प्रति हैक्टेयर देने की बात कैसे की? क्या उसका इस राशि से गुजारा हो रहा है? जब सरकार ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों के करोड़ों रुपये के ब्याज माफ कर दिये हैं, तब छोटे-छोटे किसानों के ऋण माफ करने में क्या परेशानी है? आज राजस्थान में चार साल हो गये हैं जब से सूखा पड़ रहा है। आगे आने वाले समय में इतने कम पैसे में वे कैसे बच्चों का पेट पालेंगे? इसलिये मेरी विनती है कि उन किसानों के ब्याज माफी की बात न करें बल्कि उनके ऋण माफ करने की बात करें। आज जिस तरह से सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है, सूचना प्राद्यौगिकी आगे बढ़ रही है। एक समय ऐसा आयेगा जब इन किसानों के बच्चे उग्रवाद की ओर बढ़ेंगे और उनके पास कोई रास्ता नहीं बचेगा। आपको पता है कि आने वाले समय में पीने के पानी की बहुत बड़ी किल्लत हो जायेगी। इसलिये मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि वह लम्बी योजना बनाये, हर इलाके में नहर की योजना भी बनाये ताकि आने वाले भारत का विकास हो सके।
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी (बाड़मेर): अध्यक्ष महोदय, सूखे और बाढ़ पर जो बहस आपने रखी है, उसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
आज सम्पूर्ण भारत और विशेषकर उत्तर भारत अकाल की चपेट में है। इससे किसानों की स्थिति बहुत ही खराब है। अगर आप पिछले ३-४ सालों के आंकड़े देखें तो मालूम होगा कि भारत की आर्थिक स्थिति को सुधारने में जितना योगदान किसानों ने दिया है, उतना किसी सैक्टर ने नहीं दिया है। पिछले ३-४ सालों से आयात-निर्यात नीति से किसानों को उसकी उपज का मूल्य नहीं मिल रहा है। आज लगातार अकाल पड़ रहा है, किसानों की हालत बहुत ही दयनीय हो गई है। इसमें हम लोगों को सोचने-विचारने की जरूरत है।
अध्यक्ष महोदय, आज राजस्थान में सूखे के कारण खरीफ की फसल बरबाद हो गई है। राजस्थान में बाजरा ज्यादा होता है। अब अगर बारिश हो भी जाये तब भी बाजरा नहीं हो सकता। इसके अलावा ग्वार, मूंग वगैरा हो सकते हैं। मेरा कहना है कि किसान बहुत ही दयनीय हालत में से गुजर रहा है। जिन राज्यों में सूखे का नाम लिया गया है, उसमें राजस्थान भी है। राजस्थान के अंदर पिछले पांच साल से लगातार सूखा पड़ रहा है। २००१ में राज्य के ३२ जिलों में से ३१ जिलों में अकाल था। राजस्थान के ३५ हजार गांवों में से ३० हजार गांवों के अंदर अकाल था। मेरे संसदीय क्षेत्र के ३ हजार गांवों में से २९०० गांवों में अकाल था। पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि ३२ जिलो में से १८ जिलों की ५० प्रतिशत से ज्यादा फसल नष्ट हो गई है। पिछली बार बाजरे की फसल ठीक हुई थी लेकिन सरकार द्वारा उसके समर्थन मूल्य की घोषणा देर से की गई। इस कारण विचौलियों ने थ्रोअवे प्राइसेज पर खरीद ली इससे किसानों को बहुत नुकसान हुआ।
डॉ.जसवन्त सिंह यादव : उसकी खऱीद राज्य सरकार कर सकती थी। केन्द्र से आग्रह कर सकती थी। यह आपकी सरकार को करना चाहिए था…( व्यवधान)
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : समर्थन मूल्य फिक्स करने के बाद ले सकती है, उन्होंने देर की। मई, जून में बाजरा आता है। आपने सितम्बर, २००१ में किया था। आपको इस बारे में सब पता है। उसकी वजह से राजस्थान में किसानों का करीब चार सौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। मैं अभी २०, २१ जुलाई को अपने संसदीय क्षेत्र में गया था। वहां की हालत बहुत दयनीय है। अगर हम पानी का बात करते हैं तो वहां पानी और चारे की स्थिति बहुत खराब है। वहां पर कुछ परियोजनाएं बनानी चाहिए। वहां के सब रुाोत सूख गये हैं और भूमिगत जल स्तर १० से ३० फीट तक नीचे चला गया है। स्थिति यह है कि वहां पानी की सारी स्कीमें फेल हो गई हैं। वहां लोग ३० से ३५ किलोमीटर दूर से पानी ला रहे हैं। ऐसी स्थिति में कई गांव खाली हो गये हैं। वहां मजदूर नहीं है, वहां से मजदूर पलायन कर रहे हैं। माफ करना मेरा बाढ़मेर जिला गुजरात से लगता हुआ है …( व्यवधान)
डॉ.जसवन्त सिंह यादव :राजस्थान सरकार को केन्द्र सरकार से गेहूं मिल रहा था, वह गेहूं तक नहीं उठा पाई। उसे फ्री का गेहूं मिल सकता था। गेहूं मिल रहा था, वह भी सरकार नहीं उठा पाई। आठ लाख टन गेहूं मिल सकता था…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी जवाब देंगे।
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : सर, ये मुझे डिस्टर्ब कर रहे हैं, मैं आपसे अलग से टाइम मांगूंगा।…( व्यवधान)
श्री सुन्दर लाल तिवारी (रीवा) : अध्यक्ष महोदय, यह कोई तरीका नहीं है, ये बिना बात बीच में बोल रहे हैं।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आपका भाषण हो गया है, आप दूसरों को भाषण करने दीजिए।
श्री सुन्दर लाल तिवारी: हिंदुस्तान में ऐसी कोई स्टेट नहीं है,जिसने पहले गेहूं उठा लिया हो। ये दूसरों का समय बर्बाद कर रहे हैं।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : जसवंत सिंह जी, मेरा आपसे निवेदन है कि अभी बहुत देर हो गई है।
श्री सुन्दर लाल तिवारी: महोदय, क्या आपने उन्हें ऑब्जैक्ट करने की अनुमति दी है।
अध्यक्ष महोदय : मैंने ऑब्जैक्ट करने की अनुमति नहीं दी है।
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : कृषि मंत्री जी अभी नये हैं…( व्यवधान)मैं आपसे कह रहा था कि वहां से मजदूर पलायन कर रहे हैं और …( व्यवधान)
श्री सुकदेव पासवान (अररिया): कई प्रदेश गेहूं नहीं लेना चाह रहे हैं, सभी प्रदेशों को रुपया चाहिए।…( व्यवधान)
कर्नल (सेवानिवृत्त) सोना राम चौधरी : गेहूं लेना चाहते हैं, लेकिन खराब गेहूं क्यों देते हैं, जिसे जानवर भी नहीं खा सकता है। अगर ऐसा गेहूं देंगे तो आप क्यों लेंगे। मैं कह रहा था कि हमारे यहां के बहुत लोग गुजरात जाते थे, परंतु गुजरात में नरेन्द्र मोदी की मेहरबानी से सारे उद्योग खत्म हो गये हैं। पंजाब और हरियाणा से आते थे, लेकिन वहां भी स्थिति बहुत खराब है। चूंकि वहां पशुधन बहुत प्रभावित हुआ है। हमारे यहां तीस लाख आदमियों में से २८ लाख लोग प्रभावित हुए हैं। मेरे यहां ५० लाख पशुधन है। मेरा जिला पशुधन का जिला है। वहां पशुधन का बहुत नुकसान हुआ है। राजस्थान में कहीं ५.४ करोड़ की आबादी में से ३.४ करोड़ की आबादी प्रभावित हुई है। ऐसी स्थिति में मेरा यह कहना है कि पानी के लिए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी नहर १९५२ में शुरू की थी। वह जैसलमेर और बाड़मेर में पहुंची है। पिछले दो साल से नेशनल प्रोजेक्ट के लिए केन्द्र सरकार पैसा देती थी, लेकिन वह पैसा भी बंद कर दिया गया। मैंने इस बारे में सवाल उठाय था तो सेठी साहब ने बताया कि हमारे पास पैसा नहीं है, इसलिए हमने उसे बंद कर दिया है। इसी तरह से सरदार सरोवर परियोजना का काम बहुत धीरे चल रहा है। मेरा कहने का मतलब है कि लाँग टर्म प्लान के लिए जो प्रोजेक्ट हैं और पानी की जो समस्या है, उसके लिए आपको ज्यादा फंड देना चाहिए।
अध्यक्ष महोदय, मेरी केंद्र सरकार से कुछ मांगे हैं। मेरी पहली मांग यह है कि आप जल्दी से जल्दी अकाल घोषित कर दें। जहां तक हमारे मुख्य मंत्री जी से हमारे कहने की बात है, मैं उनसे कहूंगा, मैं उन पर दबाव डालूंगा। वह आज आये हुए हैं। इसके साथ ही आप बड़े-बड़े घरानों का ऋण माफ करते हैं, आप किसानों का ऋण भी माफ करिये या ब्याज में कमी करिये। अभी हमारे साथी कह रहे थे कि आप संसदीय दल या अधिकारियों की कुछ टीमें बनायें, ताकि वे मौके पर जाकर असैसमैन्ट कर सकें। केवल मेरे कहने से कुछ नहीं होता कि राजस्थान, कर्नाटक या मध्य प्रदेश को इतना पैसा मिलना चाहिए।
अगर कल वे आपको कहते हैं कि ७००० करोड़ रुपये दे रहे हैं तो आपके पास फीडबैक आएगा कि किसको कितना मिलना चाहिए।
इसके साथ साथ जिस तरह से आपने मदद दी है - १९९८-९९ में हमने ४६० करोड़ रुपये मांगे थे, आपने ३३ करोड़ रुपये दिये। १९९९-२००० में हमने ९६० करोड़ रुपये मांगे थे, आपने १३० करोड़ रुपये दिये। पिछले साल हमने ११४० करोड़ रुपये मांगे, आपने सिर्फ १५२ करोड़ रुपये दिये। मेरा कहना है कि इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए। जो स्थिति है उस हिसाब से आप देंगे तो अच्छा रहेगा।
काम के बदले अनाज योजना के बारे में बहुत बातें कही गई हैं। उसमें सड़ा हुआ अनाज मिलता है फिर भी लोग काम कर रहे हैं क्योंकि वहां रोटी नहीं मिल रही है। इसके साथ ही मैं कहना चाहता हूँ कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रेल से पानी मिलना चाहिए। दो साल लगातार मिला है, इसलिए इस साल भी मिलना चाहिए। मेरे क्षेत्र में जैसलमेर और बाड़मेर में लाखों फौजें तैनात हैं । हमारा ८५० किलोमीटर का बॉर्डर लगता है। वहां लोग अपने पशुओं को पानी कम पिलाते हैं और ज्यादा पानी फौजों को देते हैं। पिछले साल हमें रेल से पानी दिया था और प्रार्थना है कि इस साल भी दें।
महोदय, आज जल स्तर गिर रहा है, कुएं सूख गए हैं। इसलिए नलकूप खोदने के लिए सेन्ट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की मशीनरी और रिग्ज़ भेजें ताकि जो पौधे सूख गए हैं, उनको भी पानी मिल सके।
रेगिस्तान की कई स्कीम्स हैं - डैजर्ट डैवलपमेंट प्रोग्राम है और डैजर्ट प्रोन एरियाज़ प्रोग्राम है। उनके लिए आप फंड करते हैं। उसमें आप कुछ वहां की स्थिति को देखते हुए ठीक से फंडिंग करें यह मैं निवेदन करना चाहता हूँ। कुछ स्कीम्स में आप यहां से सहायता देते हैं और कुछ राजस्थान सरकार देती है। उनकी हालत बहुत खराब है। आप राजस्थान सरकार को ज्यादा सहयोग दें।
महोदय, मेरा निवेदन है कि राजस्थान द्वारा एक स्पेशल पैकेज राजस्थान के लिए मिलना चाहिए। पहाड़ी एरियाज में आपने दिया है वैसे ही यहां के लिए भी दें क्योंकि यहां की स्थिति बहुत खराब है। मुझे याद है ३० जून १९९८ को मैंने एक प्रश्न लोक सभा में पूछा था जिसका जवाब प्रधान मंत्री जी ने दिया था। उन्होंने आश्वासन दिया था और उसको मैं पढ़कर सुना रहा हूँ:-
" अध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य ने राजस्थान के उस क्षेत्र से संबंधित सवाल उठाया है जो सबसे अधिक उपेक्षित है और जहां रेगिस्तान का साम्राज्य है। मैं उनसे सहमत हूँ कि ऐसे कुछ क्षेत्रों के लिए हमें विशेष योजनाएं बनानी हैं। ऐसी योजनाएं मरुस्थल प्रदेशों के लिए नहीं हैं। उनका सुझाव बहुत अच्छा है। उस पर अवश्य विचार किया जाएगा और कार्रवाई की जाएगी। "
मेरा कहना है कि वित्त मंत्री भी हमारे क्षेत्र के हैं। मैंने उनको भी पत्र लिखा है। मैंने कहा कि आप हमें पैकेज दे दो हम आपके खाते में डाल देंगे। कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं, आप उनके सहयोगी हैं। आप उनको कह दें कि प्रधान मंत्री जी ने भी आश्वासन दिया था। आप उनको कृपा कर बता दें तो बड़ी मेहरबानी होगी।
अंत में मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।
श्री रामानन्द सिंह (सतना): अध्यक्ष महोदय, मानसून की विफलता के परिणामस्वरूप देश के सामने बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। यह संकट देशव्यापी है। स्वयं कृषि मंत्री जी की जानकारी के अनुसार देश के १२ प्रदेश इस सूखे से प्रभावित हैं।
मध्य प्रदेश में तो सूखा नहीं अकाल की स्थिति है क्योंकि मध्य प्रदेश पिछले तीन सालों से सूखे की मार झेल रहा है। इस वर्ष ४५ जिलों में केवल पांच जिलों में वर्षा हुई, शेष ४० जिलों में वर्षा नहीं हुई। जून के महीने में जो थोड़ी बहुत वर्षा हो गई तो किसानों ने धान और सोयाबीन की फसलें बो दीं। उनमें जो अंकुरण हुआ वह भी गर्मी के कारण नष्ट हो गया।
अब अगर आज वर्षा भी हो जाए, तो धान और सोयाबीन बाहुल्य वाले उस प्रदेश में इस खेती को बोने का सीजन निकल गया क्योंकि १५ जून से १५ जुलाई के बीच धान बोने का समय होता है और ५ जुलाई से पहले सोयाबीन की बुवाई होती है। मध्य प्रदेश की स्थिति अलग है। उसमें मध्य भारत, महाकौशल और विंध्य का इलाका अलग-अलग प्रकृति का है। पूरे देश में सिंचाई ३६ प्रतिशत है। मध्य प्रदेश में १८ प्रतिशत है यानी पूरे राष्ट्रीय औसत का आधा और उसमें भी विध्य क्षेत्र जिसमें सतना, रीवा,सीधी, शहडोल, पन्ना और छतरपुर आते हैं, वहां मात्र ढाई प्रतिशत सिंचाई होती है। वहां के बाण सागर बांध जिसका श्री मोरारजीभाई देसाई ने १९७८ में शिलान्यास किया, २४ वर्ष बाद भी आज वह अधूरा पड़ा है। नहरें नहीं बन रही हैं, पैसा नहीं है। वह तीन राज्यों की संयुक्त सिंचाई योजना है। नर्मदा पर जो बरगी बांध बना था उसकी दाईं नहर जो विंध्य प्रदेश में आनी थी, वह २२ साल बाद भी नहीं बनी है, पैसे के अभाव में योजना बन्द पड़ी है।
अध्यक्ष महोदय, भारत सरकार ने केन्द्रीय वन अधनियम, १९८० में बनाया और लागू किया। उसके कारण मेरे सतना जिले की १४ सिंचाई परियोजनाएं बन्द पड़ी हैं जिन पर करोड़ों रुपए मध्य प्रदेश सरकार के लग चुके हैं। केवल हैड वक्र्स बनने हैं। वह काम रुका हुआ है। आज यहां केन्द्रीय वन और पर्यावरण मंत्री नहीं हैं। इसीलिए मैंने आज सुबह ही जब इस पर बहस प्रारंभ हुई थी तब कहा था कि केवल कृषि मंत्री ही नहीं, बल्कि यहां सिंचाई मंत्री, वन एवं पर्यावरण मंत्री, बिजली मंत्री, फूड एवं सविल सप्लाईज मंत्री आदि सभी को उपस्थित रहना .चाहिए।
महोदय, आज मध्य प्रदेश में ३०० से अधिक सिंचाई योजनाएं वन एवं पर्यावरण विभाग के पास पेंडिंग पड़ी हैं। जो ये बालू साहब हैं, ये बालू ही हैं। ये हमारी बात सुन ही नहीं रहे हैं, चाहे हम कितना ही कहें। आज मध्य प्रदेश में बहुत भयावह स्थिति है। मध्य प्रदेश सरकार ने जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें यह कहा है कि वर्षा से पूर्व बनाई गई सभी आकस्मिक कार्य योजनाएं अपर्याप्त साबित हुई हैं। यह रिपोर्ट श्री दिग्विजय सिंह, मुख्य मंत्री ने भेजी है। इससे स्पष्ट होता है कि पुरानी बनाई गई सभी योजनाएं विफल हो चुकी हैं।
महोदय, यह सही है कि ग्रामीण विकास की कई योजनाएं केन्द्र सरकार द्वारा बनाई जाती हैं, वे लागू भी हो जाती हैं, लेकिन उनका जिस प्रकार से क्रियान्वनयन होना चाहिए उस प्रकार से उन्हें क्रियान्वित नहीं किया जाता है। यदि सही प्रकार से उन्हें क्रियान्वित कर दिया जाए, तो गरीब लोगों को बहुत राहत मिल सकती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि केन्द्र की इन सभी योजनाओं का पैसा राज्य सरकारें खैरात समझती हैं और दुर्भाग्य यह है कि बेसहारा, वृद्ध और अपंगों को मिलने वाली पेंशन भी मध्य प्रदेश में छ:-छ: महीने तक नहीं मिलती है जिसके कारण भुखमरी फैलती है और कई मौतें हो जाती हैं, ऐसे समाचार भी मिलते हैं। बहुत भयावह स्थिति है।
अध्यक्ष महोदय, हजारों लोग जंगल से जलावन लकड़ी बीन कर सतना में आकर बेचते हैं और फिर आटा खरीदते हैं और रोटी बनाते हैं। सीमान्त किसान और खेतिहर मजदूरों पर सबसे ज्यादा सूखे का प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन खेद का विषय है कि सदन में किसी भी सदस्य ने खेतिहर मजदूरों की चर्चा नहीं की। जिनके पास जमीन नहीं है, जो खेत पर मजदूरी करते हैं, उनकी बहुत बड़ी संख्या है। आज भारत में ६० प्रतिशत लोग खेती से आजीविका कमाते हैं। किसानों के खेतों में निराई करते हैं, गुड़ाई करते हैं, मढ़ाई करते हैं। आज उनको काम नहीं मिल रहा है। वर्षा न होने से खेत मजदूरों के सामने अंधेरा है, भयावह संकट है। इस कारण हम दुखी हैं।
महोदय, राज्य सरकारों में कहीं राजा बैठे हैं, कहीं सामन्त बैठे हैं। उन्हें गरीबों से क्या लेना-देना। मध्य प्रदेश में एक सामन्त मुख्य मंत्री के रूप में बैठे हैं। वे हमेशा यही देखते और प्रयास करते रहते हैं कि केन्द्र सरकार से ज्यादा से ज्यादा पैसा आए और उस पैसे को कैसे हड़प लिया जाए। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में करीब ८०० करोड़ रुपए मध्य प्रदेश को दिए गए हैं जिनमें से ६०० करोड़ रुपए मुख्य मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी की जेब में जा रहे हैं और केवल २०० करोड़ से लीपा-पोती हो रही है। मुझे इस बात पर बहुत दुख है। मैं इसकी चर्चा आज नहीं करना चाहता था।…( व्यवधान)
श्री सुन्दर लाल तिवारी: अध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य ने मुख्य मंत्री जी पर आरोप लगाया है। यह ठीक नहीं है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या कभी उन्होंने कभी किसी चीज की जांच की मांग मुख्य मंत्री महोदय से की ? उन्होंने जांच की मांग क्यों नहीं की?
श्री रामानन्द सिंह : अध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से सुन्दर लाल तिवारी जी से कहना चाहता हूं कि वे बैठें। वे रिश्ते में मेरे भतीजे लगते हैं। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि मुख्य मंत्री महोदय को मैंने कई पत्र लिखे, लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि वे सांसदों के पत्रों के उत्तर भी नहीं देते हैं। आज यह मेरा विषय नहीं है। इसलिए मैं इस पर बहस नहीं करना चाहता हूं।
अध्यक्ष महोदय, भारत सरकार ने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष बनाया है जिसमें ११००७.५९ करोड़ रुपए हैं। राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक नधि स्कीम में आपके पास नधि है। सौभाग्य है कि माननीय श्री अजित सिंह जी इस देश के कृषि मंत्री हैं। उन्होंने सूखा पड़ने पर तुरंत पहल की और कृषि वैज्ञानिकों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के लोगों और मौसम विभाग की बैठक बुलाई। अब हम मौसम विभाग, कृषि मंत्री को दोष नहीं देते। भोपाल में वर्षा हो सकती है, चंडीगढ़ में बादल छाये हैं, वहां वर्षा हो सकती है, केरल में हो सकती है। इस साल टी वी में वर्षा होती रही। हमारे यहां घाघ और भडडूरी थे उनकी वर्षा की भविष्यवाणी वैज्ञानिक थी। वे कहते थे कि -
"कलसा पानी गर्म है, चङिया नहावे धूल, चींटी ले अंडा चली, हो वर्षा भरपूर।"
यह साइंटफिक था कि जब चींटी अंडा लेकर चलेगी, तब वर्षा होगी। वह मानते थे कि घड़े का पानी जब गर्म होगा तब वर्षा होगी और जब चडिया धूल में नहायेगी तब वर्षा होगी। आज मौसम विभाग के पास सुपर कम्प्यूटर है जो यह बताता है कि वर्षा हो सकती है लेकिन वर्षा हो नहीं रही है। माननीय अजित सिंह जी का मैं सम्मान करता हूं। आप किसान के बेटे हैं। आपने किसान नेता के रूप में पहल की। मैं आपकी सराहना करता हूं। मैंने आपको एक बधाई पत्र भी भेजा था कि कृषि मंत्री के रूप में आपने सूखे पर चिंता प्रकट की है। आपने कृषि मंत्रियों, मौसम विभाग और कृषि वैज्ञानिकों की बैठक बुलाई। मुझे आशा है कि इससे कुछ न कुछ जरूर होगा। मुझे याद नहीं आता कि श्री अजित सिंह जी से पहले भी भारत में कोई कृषि मंत्री ऐसा था जिसने डंके की चोट पर ऐलान किया हो कि पहले राज्य सूखे की घोषणा करें और फिर केन्द्र के पास आए। दुर्भाग्य है कि पूरा मध्य प्रदेश अकाल से पीड़ित है। श्री सुन्दर लाल तिवारी जी, आप मुख्यमंत्री का बचाव कर रहे हैं। उन्होंने केवल पांच जिलों की ही सूखे की सूची में घोषणा की है। क्या रीवा में सूखा नहीं पड़ा, सतना में नहीं है ? आज प्रदेश की क्या हालत है, आप बतायें। आप मेरे भतीजे लगते हैं इसलिए बैठ जाइये।
पेय जल का अभूतपूर्व संकट मध्य प्रदेश में है। …( व्यवधान)आपका भी नम्बर आयेगा। पेयजल का संकट जितना वहां है, देश में कहीं नहीं है। वहां पानी नीचे सरक कर दूसरे राज्यों में आ जाता है। वाटर लैवल नीचे जा रहा है। जब हम जनता शासन के समय में मनिस्टर थे, तब हमने प्रदेश के गांवों में जल प्रदाय योजनाएं चलाई थी। ३५० गांवों में हमने नल दिये थे। आज उन योजनाओं की मैनटेनैंस नहीं हुई। सारी योजनाएं मिट्टी में मिल गईं। सारे हैंडपम्प फेल हो रहे हैं। जितनी भी उल्टी सीधी योजनाएं चल रही हैं, उनको समेकित करें और इस आपदा का मुकाबला करने के लिए राष्ट्रीय आपदा के रूप में भारत सरकार इसे चुनौती के रूप में लें। अगर हम चाहें तो इस अवसर को एक स्वर्णिम अवसर में बदल सकते हैं। हम चाहें तो बहुत सारी योजनाओं का पैसा अपने पुरुषार्थ से, पौरुष से और मेहनत करके जलाशय बनाने, नहरें और नदियों को एक दूसरे से जोडकर ग्रिड बनाने में खर्च कर सकते हैं। अगर हम गंगा और कावेरी नदी का ग्रिड आज से ५० साल पहले बना लेते, मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा, तो यह विपत्ति हमारे सामने नहीं आती। हमें दो तरह की योजनाएं बनानी पड़ेगी। एक तात्कालिक योजना यानी तुरंत लोगों को राहत देना जैसे "काम के बदले" अनाज देना, सस्ता गल्ला, अन्नपूर्णा योजना और जे,आर.वाई आदि जितनी ग्रामीण योजनाएं हैं, उनका कार्यान्वयन समेकित करके तुरंत लोगों को काम देना चाहिए। इस स्केयरसिटी मैनुअल से काम चलने वाला नहीं है। माननीय मंत्री जी, आप केवल राज्यों की सलाह लेकर बैठे न रहें। आप अकाल की घोषणा करिये। जब मानसून फेल हो गया, अब आप किससे पूछने जायेंगे? भारत सरकार एनाउंस करे और जिस जिस प्रदेश में अकाल पड़ा है, सूखा पड़ा है, वहां पहल करके राहत कार्य शुरू करे। राज्यों के मंत्रियों को बुलाकर उनको जवाबदारी दीजिए। माननीय शिवराज सिंह चौहान जी ने शुरू में कहा था कि यह सारी व्यवस्था पानी में न चली जाये और लोग इसे खैरात न समझे, इसके लिए हम निर्माण में सहयोग करे और नदियों को जोड़ने की योजना बनाये। कोशिश करें कि हर ग्राम में एक जलाशय हो, हर ग्राम में पीने का पानी का रुाोत हो।
21.00 hrs. हर बेरोजगार को काम, हर मजदूर को काम के बदले अनाज और हम कहेंगे कि बीमार को खाने के लिए अनाज मिले। मैं कहना चाहता हूं कि स्केयरसिटी मैनुअल का प्रावधान १९३६ में अंग्रेजों ने बनाया था और फैमिन कोड भी अंग्रेजों ने बनाया था। यह देश का दुर्भाग्य है कि पचास सालों में सूखा संहिता और अकाल संहिता में कोई संशोधन नहीं हुआ। कृपा करके इसमें संशोधन करें। अजित सिंह जी, क्या आप कृषि मंत्री रहते स्वतंत्र भारत, लोकतांत्रिक भारत में लोक भावनाओं का आदर करते हुए अकाल संहिता और सूखा संहिता के मैनुअल को सुधारेंगे। बीमार, लाचार लोगों को काम देंगे, खाना देंगे। आज भारत के पास अनाज के काफी भंडार हैं। अगर श्री अटल बिहारी वाजपेयी मुफ्त में अनाज देना शुरू करें तो कोई भूखा नहीं मरेगा। बंगाल में जब अकाल पड़ा था तो श्री केदारनाथ अग्रवाल ने एक कविता लिखी थी ---
बाप बेटा बेचता है भूख से बेहाल होकर धर्म, धीरज, प्राण खोकर हो रही अनरीत बर्बर राष्ट्र सारा देखता है।
बाप बेटा बेचता है।
बंगाल के अकाल में जब लाखों लोग भूख से मरे थे तब जवाहरलाल जी वहां गए और उन्होंने कहा कि बंगाल के भाइयो और बहनो, तुम भूख से क्यों मरे, तुमने सरकारी गोदामों को लूट क्यों नहीं लिया। इसलिए आज मैं कह रहा हूं कि मैं भाजपा में आया हूं लेकिन पुराना समाजवादी हूं। मैं कई बार गोदाम लुटवा चुका हूं और जेल जा चुका हूं। केन्द्र में भाजपा की सरकार है। यदि गोदामों का मुहाना गरीबों के लिए न खुला तो रामानंद सिंह भाजपा का सांसद होते हुए भी सरकारी गोदामों को लूटने के लिए जनता का आहवान करेगा। इसलिए कृपा करके आप गांवों में गरीबों को सस्ता अनाज देने का ऐलान कीजिए ताकि एक भी आदमी भूख से न मरे।
अजित सिंह जी, प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी जैसे वरिष्ठ नेता के नेतृत्व में आप कृषि मंत्री हैं, किसान के बेटे हैं। आपके कृषि मंत्री रहते अकाल संहिता, आपदा राहत कोष और राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक नधि जैसी योजनाओं का लाभ देश के करोड़ों किसानों, गरीबों को मिलेगा और यह चुनौती भारत सरकार मंजूर करे कि इस प्राकृतिक आपदा का हम नए भारत के निर्माण में उपयोग करेंगे, हम भ्रष्टाचार के सभी रास्ते बंद करेंगे, प्रॉपर मौनीटरिंग करवाएंगे और इस चुनौती को हम स्वीकार करते हैं।
वैसे प्रकृति से लड़ना बहुत कठिन है लेकिन उसके बाद सरकार भी कोई चीज होती है। सौ करोड़ लोगों का यह देश जिसके पास प्रकृतिक संसाधन, नदियां, जंगल हैं, वहां कोई भूख से मरे, यह ठीक नहीं है।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : रामानंद जी, मैंने आपको बहुत ज्यादा समय दे दिया है। आप कृपा करके बैठ जाएं।
श्री रामानन्द सिंह : मैं कहना चाहता हूं कि हम इन सबका उपयोग करके भविष्य की भावी योजना बनाएं ताकि हमारे देश की जनता को राहत मिले और अकाल हमारे लिए अभिशाप नहीं एक वरदान बन जाए।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको बहुत धन्यवाद देता हूं।
चौधरी तालिब हुसैन (जम्मू) : आनरेबल स्पीकर साहब, हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
पहले जब आपने मेरा नाम पुकारा तो मैं समझा कि मुझे बोलने की इजाजत मिल गई है, हालांकि ऐसा नहीं था जिसके लिए मैं खेद प्रकट करता। यहां बहुत तफसील से बहस हो चुकी है। खुशकसाली के बारे में बादे हज़रात ने कहतसाली का नाम भी इसे दे दिया, जो मैं संमझता हूं कि शायद कुछ ज्यादा वज़नी और ज्यादा हट कर एक बात थी। खुशकसाली और कहतसाली में बहुत बड़ा फर्क है। खुशकसाली ड्राउट को तो माना जा सकता है कि इस वक्त हमारा देश ड्राउट का शिकार है। लेकिन खुदा बचाए कि हम अभी फेमिन का शिकार नहीं हुए, कहत का शिकार नहीं हुए। खुशकसाली के बहुत सारे काज़िज हो सकते हैं, उनसे निपटा भी जा सकता है लेकिन खुदा न करे, अगर कहतसाली का समां बरपा हो जाए तो उसके लिए सिवाए इमरजैंसी डिक्लेयर करने के और सिवाए हमारी मुशतरका कोशिशों के, ऐसे मसले को हल नहीं किया जा सकता। ड्राउट एक ऐसा मसला है, इसकी काज़िज भी बहुत सारी हैं और बहुत सारी तफसील में मुकरिन हज़रात गए, जिनके बारे में मैं इस वक्त कुछ जिक्र नहीं करना चाहता या दोहराना नहीं चाहता।
मैं उन्हें दोहराना नहीं चाहता, लेकिन इख्तसार से मैं जनाबे जौधरी अजित सिंह साहब की नोटिस में यह चीज लाना चाहता हूंकि ड्राउट के काजेज एक तो ग्लोबल लेवल पर हैं, ग्लोबल वार्निंग है, लेकिन देश के अन्दर भी बहुत सारे कॉमन काजेज हैं, जिनकी वजह से खुश्कसाली या ड्राउट बताया जाता है या फ्लड आ जाता है। इन दोनों का एक कॉमन कॉज डीफोरेस्टेशन है। अगर हमारे मुल्क के अन्दर डीफोरेस्टेशन तेजी से हो गया है या हो रहा है तो उसकी वजह से या तो फ्लड आती है या उसकी शक्ल खुश्कसाली की शक्ल में निकलती है।
जहां एग्रीकल्चर का यह मंत्रालय बहुत महत्वपूर्ण है और काम कर रहा है, वहां यह वजारत जब तक इन टैण्डम काम नहीं करेगी, एनवायर्नमेंट एण्ड फोरैस्ट के साथ, पावर डवलपमेंट के साथ, इर्रीगेशन के साथ और पब्लिक हैल्थ एण्ड इंजीनियरिंग की मनिस्ट्री से कोआपरेशन से, कोआर्डीनेशन से काम नहीं करेगी तो खुश्कसाली के मसले को हल नहीं किया जा सकता। अंडर वन अम्ब्रैला एग्रीकल्चर, जो सबसे इम्पोर्टेंट डिपार्टमेंट है, उसमें एक टास्क फोर्स बननी चाहिए और इस टास्क फोर्स के तहत केन्द्र में, मरकजी सरकार के तहत एक ऐसी टास्क फोर्स हो, जिसमें इर्रीगेशन, फ्लड कंट्रोल, एनवार्यनमेंट एण्ड फोरैस्ट, पावर डवलपमेंट और डिं्रकिंग वाटर सप्लाई स्कीम्स इसके मातहत आनी चाहिए और एक अम्ब्रेला के तहत ऐसी सूरते हाल में काम करना चाहि प्रति ए, जो कि मुदैया सूरते हाल पैदा हो गई है। अगर अलग-अलग सारे डिपार्टमेंट इस मसले को हल करने की कोशिश करेंगे तो हमारी कोशिश फिजूल और रायगां चली जाएगी। मैं चौधरी अजित सिंह साहब, जो एक अजीम रहनुमा हैं, किसान लीडर भी हैं और अजीम लीडर के सपूत भी हैं, उनसे मैं तवक्को रखता हूं कि इसमें शक नहीं है कि अभी हम खुदा-न-खास्ता कहकसाली के उस दौर में दाखिल नहीं हुए हैं, लेकिन खुश्कसाली का एक चेलैंज हमारे मुल्क के सामने, हमारे देश के सामने आ पहुंचा है। अगर हम इसको एक सिस्टम के जरिये हल नहीं करेंगे तो यह हल नहीं होगा।
आज विदेशी मुमालिक में जो डवलप्ड कंट्रीज हैं, वहां एक सिस्टम होता है, जब भी कोई इमरजेंसी एराइज होती है, जब भी कोई कंटिंजेंसी पैदा होती है तो उसके लिए ऑटोमेटिक सिस्टम होताहै, लेकिन हमारे देश के अन्दर बदकिस्मती से ऐसा है कि जब कोई इमरजेंसी रूनुमा होती है तो उस वक्त हम उपाय ढूंढते हैं, जिसे दूसरे लफ्जों में हम आग लगने पर कुंआ खोदना कहते हैं। हमारे सामने एक लाँग टर्म पॉलिसी होनी चाहिए, हमारे एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के सामने और उनको काजेज वराहत करने चाहिए कि हमारे देश के अन्दर लगातार जो खुश्कसाली फैल रही है, इसकी क्या वजह है, जिसकी कुछ बातें मेरे जैसे लेमैन की समझ में आती हैं, उनमें डीफोरैस्टेशन की वजह से फ्लो ऑफ वाटर चैक हो रहा है या इस तरीके से पोल्यूशन फैल रहा है या इस तरीके के दूसरे काजेज हो सकते हैं, जिनके बारे में आप अपनी तकरीर में फरमाएंगे। लेकिन जब तक काजेज और उपाय आईडेंटीफाई नहीं होते, तब तक कोई रेमेडी नहीं ढूंढ पायेंगे। मेरी जनाबे आली से दरख्वास्त है कि जब आप ऐसे उपाय तलाश करने के बारे में कहेंगे और हमें कॉन्फीडेंस में लेंगे तो आपके सारे ब्यूरोक्रेट्स और आपके महकमे के सारे हिन्दुस्तान के अन्दर जो लोग काम कर रहे हैं, सारी रियासतोंके वजीरे आला हों या वहां के एग्रीकल्चर मनिस्टर हों या वहां के एडमनिस्ट्रेशन के लोग हों, उनके साथ आपने सलाह-मशविरा किया होगा, लेकिन एक बात मैं जनाब के नोटिस में लाना चाहता हूं कि यह सिचुएशन खुदा करे कि टैम्परेरी साबित हो, इसे मुश्तकिल सूरत अख्तियार नहीं करनी चाहिए और आपको इसे चैक करने के लिए हर मुमकिन एकदामात करने चाहिए जो कि इस वक्त जरूरी हैं। अगर खुदा-न-खास्ता खुश्कसाली का जो मसला है, यह बढ़ गया तो हो सकता है कि कहकसाली भी हो। ऐसा भी हो सकता है कि कहीं-कहीं मुल्क के अन्दर किसी कोने में या किसी हिस्से में या किसी छोटे इलाके में कहकसाली भी हो, वह भी आपको देखना है। लेकिन वहां आपको यह मसला डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को ठीक बनाकर हल करना होगा।
इसलिए मैं आपसे अर्ज करना चाहता हूं कि आपका मंत्रालय जहां महत्वपूर्ण है, वहां आप अगर इनटैंडम हैं, बहुत सारे जितने विभाग हैं, आपके साथ तालमेल नहीं करेंगे, अंडर वन अम्ब्रेला काम नहीं करेंगे, एक ऐसी टास्क फोर्स तैयार नहीं कर सकेंगे, तो मसले का हल नहीं होगा। हमारी रियासत जम्मू-कश्मीर एक ऐसे माहौल से गुजर रही है, जो सब जानते हैं। मैं जनाबे आला को यकीन दिलाना चाहता हूं कि वहां के लोग देशभक्त हैं। वे देश की यूनिटी और इंटग्रिटी के लिए काम करना चाहते हैं, काम कर भी रहे हैं और ऐसे लोगों की कमी नहीं है। लेकिन यह वजह भी नहीं हो सकती, मुमकिन है और कारण हों। आप रियासते जम्मू-कश्मीर के बहुत सारे सेक्टरों को नजरअंदाज कर रहे हैं। हमने बहुत सारे पैकेज मांगे, जिसमें हम यह भी मांग करना चाहते हैं कि वहां के हार्टिकल्चर और एग्रीकल्चर सेक्टर को प्रायरटी दें। जो वहां खुश्कहाली मुतासिरा हालत के इलाके हैं, खासकर जम्मू डिवीजन के अंदर डोडा जिला है, उधमपुर के कंडी इलाके हैं या वैली के अंदर अपर रिजेज है, वह ऐसे इलाके हैं, जो मुतासिरा हैं, खुश्कहाल हैं। अगर ज्यादा फंड मुहैया नहीं कराएंगे तो वे तबाहेहाली का शिकार हो जाएंगे।
जहां तक खुश्कहाली को रोकने का ताल्लुक है, उससे निपटने का सवाल है, इरीगेशन का बहुत बड़ा रोल होता है। जब मानसून फेल हो तो जो वहां की नदियां हैं, इकबाल के इस देश के अंदर जो नदियां हैं, अगर वे खुश्क हो जाती हैं तो मुल्क का क्या होगा। अगर मानसून फेल हो जाए, रेन फेल हो जाती है तो हमारे इरीगेशन सिस्टम को यह मामला सम्भाल लेना चाहिए। लेकिन मैं समझता हूं इरीगेशन सिस्टम सही ढंग से काम नहीं कर रहा है। इरीगेशन सेक्टर में जितना फंड देना चाहिए, वह नहीं दिया जा रहा है। खासकर हमारी रियासत जम्मू-कश्मीर में फ्लड कंट्रोल और इरीगेशन के सेक्टर में बहुत कम रकम मुहैया कराई गई है। ऐसे हालात में जब बारिश न हो, मानसून फेल हो जाए, कानूनो कुदरत हमारा साथ न दे, जब हम कानूनो कुदरत के खिलाफ जाते हैं तो वह हमें सजा देती है। हम अगर उसके साथ नहीं चलना चाहते हैं तो हमें इस किस्म की खुश्कहाली मिल रही है। हम जंगल काट रहे हैं, पोल्यूशन फैला रहे हैं, फ्लो आफ रिवर्स चेंज कर रहे हैं, बिला वजह कर रहे हैं, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम खराब हो रहा है, गोदाम सड़ रहे हैं, यह सूरतेहाल देखते हैं तो हम एक ही बात के नतीजे पर पहुंचते हैं कि आप मेहरबानी करके ऐसी टास्क फोर्स बनाएं, जो इससे मुतल्लिक मंत्रालय हैं, खासकर इरीगेशन का, पावर का, डिस्ट्रीब्यूशन का, उन सबके साथ बैठें, तो हम इस खुश्केहाली के मसले का सब्देबाग कर सकते हैं।
अध्यक्ष महोदय : श्री राम सिंह कस्वां अपना भाषण सदन के पटल पर रखते हैं।
* श्री राम सिंह कस्वां( चूरू ):माननीय अध्यक्ष जी पिछले १५ वर्षो में पहली बार देश को भीषण सूखे का सामना करना पड़ रहा है। आज हम भीषण सूखे की स्थिति पर विचार कर रहे हैं। देश के अधिकांश स्थानों पर सूखे की वजह से फसलें चौपट हो गयी हैं। मानसून की वर्षा नही होने के कारण किसानों को बहुत भारी नुकसान हुआ है, पशुओं के लिए चारे की कमी एंव पीने के पानी की समस्या हो गयी है। अधिकांश जल रुाोत या तो सूख गये हैं या उनमें पानी नहीं है। राजस्थान में तो और भी विकट समस्या है, अधिकांश जिलों में मानसून की वर्षा नाममात्र की भी नहीं है। राजस्थान के अधिकांश जिलों में बुवाई तो दूर की बात है, किसान हल लेकर खेत में भी नहीं गया और कुछ क्षेत्रों में एक माह पहले मानसून से पूर्व वर्षा हुई थी। किसान ने महंगा बीज खरीद कर बोया था लेकिन बाद में वर्षा नहीं होने के कारण वह फसल भी पूरी तरह से सूख कर नष्ट हो गयी। राजस्थान पिछले तीन वर्षो से भयंकर सूखे का सामना करता आया है। पानी की विकट समस्या रही है। किसान का अधिकांश पशुधन पिछले तीन सालों से लगातार पड़ने वाले अकाल में खत्म हो गया। अगर यही स्थिति रही तो रहा-सहा पशुधन इस साल खत्म हो जायेगा।
राजस्थान सरकार इन तीन सालों में अकाल का सामना करने में पूरी तरह विफल रही है। न मजदूर को मजदूरी मिली, न पशुधन को चारा और न ही जनता को पीने का पानी मिला है। तीनों ही मोर्चों पर सरकार ने अपनी अक्षमता का ही परिचय दिया है। केन्द्र सरकार ने धन व अनाज से काफी सहायता की है लेकिन राजस्थान सरकार इस लाभ किसान व मजदूर को देने में असमर्थ रही। पिछले साल मात्र बाजरे की फसल हुयी थी, जिसे किसान को ३०० रूपये क्िंवटल के भाव से बेचना पड़ा। केन्द्र सरकार द्वारा धन मुहैया कराने के बाद भी किसान से बाजरा नहीं खरीदा जा सका और आज वही बाजरा किसान ६०० रूपये प्रति क्िंवटल के भाव खरीदने के लिए मजबूर है व दोहरी मार झेल रहा है। केन्द्र सरकार ने रेलगाड़ी द्वारा पानी का प्रबंध किया था लेकिन राजस्थान सरकार उस व्यवस्था का भी लाभ नहीं उठा सकी, जिससे पानी का समुचित उपयोग नहीं हो सका। बिजली के मामले में तो किसान की और भी दयनीय स्थिति है। बिजली के बिल की दर इतनी बढ़ा दी गयी कि किसान द्वारा बढ़ी रेट से जारी किए गये बिलों को भुगतान असंभव हो रहा है।
मेरे संसदीय क्षेत्र चूरू की तो और भी भयंकर स्थिति है। अधिकांश पशुधन खत्म हो गया है। मजदूर को मजदूरी नहीं है, लोगों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। मेरे जिले की राजगढ़ तहसील के गांवों को सिंचाई के लिए सिधमुख नहर परियोजना द्वारा पानी उपलब्ध कराया जाना था लेकिन इस योजना से जुड़े अधिकांश गांवों को इससे काट दिया गया है। जिस गांव के नाम से इस योजना का नाम सिधमुख नहर परियोजना रखा गया था, उस क्षेत्र को इस योजना से कोई लाभ नहीं मिल रहा है।
इसके अतरिक्त राजगढ़ व तारानगर क्षेत्र के काफी गांवों को इन्दिरा गांधी नहर परियोजना से सिंचाई हेतु जोड़ा जाना था। तारानगर क्षेत्र में कुछ गांवों में नहर निर्माण कार्य भी हुआ, जो अब बंद है। अकाल की मार झेलती चुरू जिले की राजगढ़ व तारानगर तहसील के गांवों को तुरंत इन दोनों परियोजनाओं से जोडकर सिंचाई की व्यवस्था की जावे ताकि बार-बार पड़ने वाले अकाल से कुछ तो राहत मिल सके। पीने के पानी की व्यवस्था के लिए आपणी योजना के द्वितीय चरण का कार्य तुरंत चालू किया जावे ताकि पीने के पानी की समस्या हल हो सके। किसानों को प्रतदिन १२ घंटे बिजली उपलब्ध करायी जावे ताकि किसानों को राहत मिले, सिंचाई के लिए अधिक समय मिल सके। गिरदावरी करवा कर तुरंत पूरे क्षेत्र को सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित किया जावे ताकि केन्द्र सरकार राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मदद कर सके। सहकारी व सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए समस्त कर्जों की वसूलियों पर तुरंत रोक लगायी जावे व इन पर देय सूद माफ किया जावे। राजस्थान सरकार को इस संबंध में तुरंत आपात योजना बनाने के लिए निर्देशित किया जावे। केन्द्र से एक सर्वेक्षण दल भेजकर हालात का आकलन कर हर संभव सहायता प्रदान की जावे। यदि तुरंत उपरोक्त उपाय नहीं किए गए तो हालात काबू से बाहर हो सकते हैं। राजस्थान की स्थिति अत्यंत विकट है।
*Speech was Laid on the Table of the House.
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल (कानपुर) : अध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं कि आपने मुझे इस अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर प्रदान किया। करीब आठ घंटे से चल रही इस बहस में हमारे बहुत से माननीय सदस्यों ने देश के वभिन्न राज्यों में अकाल और बाढ़ की सम्भावनाओं के ऊपर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मैं केवल कुछ बिंदुओं पर ही आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। हमारे उत्तर प्रदेश की हालत यह है कि किसान एक बाढ़ और सूखा तो हर फसल में झेलता है। खरीफ की फसल आती है, धान अगर ज्यादा पैदा हुआ है तो उसको कोई खरीदने वाला नहीं है। तीन खरीब की फसलें उत्तर प्रदेश में बीत गई हैं। सरकारी मूल्य निर्धारित होते हैं, खरीफ के मूल्य निर्धारित होते हैं, लेकिन ९० प्रतिशत धान की फसल को किसानों को बिचौलियों और आढ़तियों को बेचना पड़ा, सरकारी एजेंसीज को धान नहीं दे पाए। उसका कारण यह है कि अगर सरकार धान का पांच रुपए प्रति किलो मूल्य निर्धारित करती है, तो किसान को मजबूरी में साढ़े तीन रुपये, चार रुपए में उसे बिचौलियों और आढ़तियों को बेचना पड़ता है और वही बिचौलिए तथा आढ़तिए सरकारी एजेंसीज को धान की पूर्ति कर रहे हैं। रबी की फसल आती है तो गेहूं की उपज के साथ भी वही होता है। सरकारी दर पर, सरकारी भाव पर कोई भी सरकारी एजेंसी सीधे किसानों से गल्ला नहीं खरीदती। किसानों को मजबूर होकर आड़तियों और बिचौलियों के माध्यम से बेचना पड़ता है और लगभग पच्चीस फीसदी उनकी उपज का मूल्य उनकी जेबों में चला जाता है। कृषि मंत्री जी, यह हंसने की बात नहीं है। उत्तर प्रदेश में खरीफ और रबी की फसल में यह देखा है कि ८०-९० फीसदी गेहूं और धान सरकारी एजेंसियों को थ्रू बिचौलियों और आड़तियों के बेचना पड़ता है। यह हमारा दुर्भाग्य है। देश के कई प्रांतों का दुर्भाग्य है कि इस बार सूखा पड़ रहा है। पानी की जो आशंका पिछले एक महीने से टी.वी. और रेडियो पर व्यक्त की जा रही थी कि दो-चार दिन में मानसून आ जाएगा और हमें लगता है कि हवाओं का जो रुख है, वह संकेत देती है कि मानसून आएगा तो भी उसका कोई उपयोग खेती के लिए नहीं रहेगा। देर से मानसून आने के बाद जो जमीन है, जल का स्तर नीचे चला गया है, वह थोड़ा-बहुत उपर आ जायेगा और पेयजल की आपूर्ति में कुछ सुविधा हो जाएगी लेकिन जहां तक खरीफ की फसल की बात है, वह पूरी तरह से नष्ट हो गई है। दलहनों के दो-एक जींस जो इस महीने में बोये जाते हैं, अरहर दलहन के बीज जो बोये जाते हैं, उसकी भी आशा नहीं रह गई है कि बोये जाएंगे और जब बोया ही नहीं जाएगा तो कहां से उत्पादन होगा?
सूखा और बाढ़ हमारे देश की बहुत लम्बे समय से नियति बन गई है। बाढ़ तो हर साल आती है। कभी देश का २५ फीसदी हिस्सा तो कभी ३५ फीसदी हिस्सा इसकी चपेट में आ जाता है और सूखा तो पिछले कई सालों से कई प्रांतों में पड़ता है। दुर्भाग्य की बात है कि इस बार देश के १३ प्रांतों में सूखा पड़ा। लेकिन मैं अपनी बात यू.पी. तक ही केन्द्रित रखता हूं। सूखा और बाढ़ प्राकृतिक कारणों से आता है। उसमें किसी राजनैतिक दल का कोई योगदान नहीं हो सकता, किसी राजनेता का भी योगदान नहीं होता। अगर किसी के ऊपर दोष कोई देता है कि आपके कारण सूखा और बाढ़ आयी है तो यह राजनैतिक बात होगी, इसका कोई महत्व नहीं है। मैं यू.पी. की ओर ध्यान आकृष्ट करता हूं। मैं पूछना चाहता हूं कि पिछले दस सालों में सरकारी नलकूप कितनी तादाद में लगाये गये? कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं। यू.पी. की सरकार से यह भी पूछें कि पिछले दस वर्षों में नहरों का कितना जाल बिछाया गया है? साथ ही यह भी पूछना चाहता हूं कि पिछले दस वर्षों में क्या एक भी यूनिट बिजली के उत्पादन का लगाया गया है? क्या बिजली का उत्पादन बढ़ाया गया? आपकी जानकारी में यह बात लाना चाहता हूं कि आज़ादी के बाद जितने भी नलकूप यू.पी. में लगाये गये, उनमें से आधे से ज्यादा नलकूप बंद पड़े हैं। कई सालों से विधायकों और जन-प्रतनधियों की आवाजें इस मामले में उठती रही हैं कि आधे से ज्यादा नलकूप बंद पड़े हैं।उनकी रि-बोरिंग कराई जाए और अगर वे इस काबिल न हों, तो उनकी जगह पर नए नकलूप खोदे जायें। लेकिन आज तक उत्तर प्रदेश में पिछले दस वर्षों में न कोई नया नलकूप लगाया गया है और न बिजली के उत्पादन की व्यवस्था की गई है तथा न बिजली के वितरण की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही न नहरों का जाल बिछाने की ओर हमारी सरकारों ने कोई ध्यान दिया है।
आज हम ग्लोबलाइजेशन की बात कहते हैं, कम्प्यूटर की बात कहते हैं। समाज के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान का काफी उपयोग कर रहे हैं। संचार के क्षेत्र में तो क्रान्ति ही आ गई है। लेकिन क्या हमने अपने देश में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए और बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए कोई दीर्घकालीन योजना बनाने की व्यवस्था की है। अगर की होती, तो शायद आज यह दुव्र्यवस्था हमारे देश की नहीं होती। हमारे प्रदेश में ४० फीसदी ही भूमि ऐसी है, जो सिंचित भूमि है। सिंचित का मतलब है, जिसमें नलकूप या नहरों के द्वारा सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं। शेष ६० प्रतिशत भूमि पर वर्षा के सहारे लोग जीवन-यापन कर रहे हैं। अगर बारिश समय से हुई, बारिश औसत हुई, तब तो खेती का उत्पादन प्राप्त हो गया और अगर बारिश समय पर नही हुई या ज्यादा हुई, तो उनका उत्पादन घटता रहता है। मैं आपके माध्यम से केन्द्रीय सरकार से अनुरोध करना चाहता हूं कि इतने बड़े देश में जहां इतनी तरह की जलवायु हैं, इतने बड़े देश में जहां हर महीने ऋतुयें अलग-अलग होती हैं, ऐसी स्थिति में जब तक सूखे और बाढ़ पर नियन्त्रण के लिए कोई दीर्घकालीन योजना नहीं बनाई जाएगी, तब तक हर वर्ष हम इसी तरह सूखे और बाढ़ की चपेट में आते रहेंगे तथा इसकी वजह से आम किसानों और मजदूरों को नुकसान उठाना पड़ता रहेगा ।
महोदय, मै एक बात और कहना चाहता हूं। मेरी जानकारी में आया है कि भारतीय खाद्य निगम के पास लगभग ६० लाख टन सड़ा हुआ गेहूं गोदामों में उपलब्ध है। इसका कारण यह है कि भारतीय खाद्य निगम के पास अनाज खुले में पड़ा हुआ है। इसका परिणाम यह होता है कि एक-दो साल के अन्दर जो अनाज खुले में रखा हुआ है, वह दागी हो जाता है यानि सड़ जाता है। इस सारे सड़े हुए गेहूं को सूखा राहत कार्यक्रमों में निकालने की योजना भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियों की है। खुदा न करे सूखा पड़ा और युद्ध स्तर पर राज्यों में गेहू का वितरण किया गया, वभिन्न योजनाओं के माध्यम से गेहू किसानों को बांटा गया, तो भारतीय खाद्य निगम को सड़े हुए गेहूं वितरित करने का अवसर प्राप्त हो जाएगा। खाद्य और आपूर्ति मंत्री सदन में उपस्थित है, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि अगर भारतीय खाद्य निगम द्वारा युद्ध स्तर पर अनाज बंटवाने की आवश्यकता पड़ी, तो सड़ा हुआ गेहू किसानों को न बंटे, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने का कष्ट करें।
अंत में, मैं एक बात कह कर अपनी बात समाप्त करूंगा। उत्तर प्रदेश में आज बिजली का उत्पादन नहीं है और जो उपलब्ध उत्पादन है, उसके वितरण की व्यवस्था नहीं है। उत्तर प्रदेश में नहरों की सफाई नहीं की गई है। ऐसी स्थिति में उत्तर प्रदेश सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है और इसमें कोई आश्चर्य की बात नही है, जब तक इन समस्याओं से निपटने के लिए दीर्घकालीन योजनायें बनाकर कार्यान्वयन नही किया जाएगा, किसानों को लाभ नहीं मिल पाएगा। गरीबों को लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए इन योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए युद्धस्तर पर कदम उठायें।
इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : अध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने बाढ़ और सूखे पर हो रही चर्चा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। ५५ वर्ष की आजादी के बाद भी हमारी विडम्बना है कि देश के बहुसंख्यक किसान और बहुसंख्यक आबादी प्रकृति के भरोसे अपना जीवन यापन करने के लिए मजबूर है। आजादी के बाद प्रगति की लम्बी-चौड़ी बातें की गईं लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि ५५ साल की आजादी के बाद भी यह सदन प्रत्येक वर्ष बाढ़ और सूखे पर चर्चा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री करता चला आ रहा है। जब हम इस पर चर्चा करते हैं और इसका सकारात्मक परिणाम जनता के सामने नहीं जाते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति कहीं न कही आम जनता के मन में आक्रोश उभरता है जो हम सब के लिए चिन्ता का विषय है।
यहां कृषि मंत्री और जल संसाधन मंत्री बैठे हैं। बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए मात्र दो मंत्रालय ही सक्षम नहीं हैं। वभिन्न मंत्रालयों के बीच में एक सामंजस्य होना चाहिए। एक छतरी के नीचे बैठ कर हमें इन समस्याओं से निपटने के लिए सार्थक पहल करनी चाहिए। आज प्रकृति के असंतुलन के कारण हमें बाढ़ और सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। कृषि मंत्री जी उस महान किसान नेता के सुपुत्र हैं जिन्होंने देश की आजादी के बाद पहली बार किसानों के मन में एक नई आशा और विश्वास पैदा करने का काम किया था और जब कांग्रेस का एक छत्र सामाज्य होता था तब भी उन्होंने आशा और विश्वास के बल पर देश की राजनीति में एक बड़ी ताकत पैदा करने का कार्य किया था। हम आपसे अपेक्षा करेंगे कि उसी आशा और विश्वास को पैदा करने के लिए आपको आगे आना चाहिए। आज जो परिस्थति पैदा हुई है उसमें ईमानदारीपूर्वक विचार करना चाहिए। ५५ साल की आजादी के बाद क्या हमने इन बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए ईमानदारी से पहल की? एक छोटा सा मुल्क इरुााइल ने विशेष परिस्थितियों में खाद्यान्नों की आपूर्ति के लिए पहल की। यह बात हमारे और आपके लिए अनुकरणीय बन सकती है। हम खुशकिस्मत हैं कि हमें एक अच्छा प्राकृतिक वातावरण प्राप्त हुआ है। दुनिया के अन्य मुल्कों को इतनी अच्छी जलवायु नहीं है। आज बदलते हुए मौसम के मिजाज पर बड़ी लम्बी-चौड़ी बहस होगी। यदि हम उस पर जाएंगे तो मेरा खुद का मानना है कि जब हम पर्यावरण के प्रदूषित होने की बात कहेंगे और विकास की तरफ उत्तरोत्तर बढ़ेंगे तो निश्चित तौर पर विकास पर्यावरण को प्रभावित करने का काम करेगी। बढ़ती हुई जनसंख्या भी पर्यावरण को आज प्रभावित करने में अपनी अहम भूमिका निभाने का काम कर रही है।
२१.२८ hrs.( Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) बहुत से व्यावहारिक बिन्दुओं की तरफ हमारे भाई शिवराज जी ने सत्ता में रहते बड़ी ईमानदारी और साफगोही से अपनी बात रखी। अगर हम ईमानदारी से किसानों को इन समस्याओं से निजात दिलाना चाहते हैं तो अपने कार्यक्रमों का कार्यान्वयन ईमानदारीपूर्वक करना होगा। हम जो नीति बना रहे हैं, उनका प्रभाव आम जन मानस पर क्या पड़ रहा है इसके ऊपर द्ृष्टि डालनी होगी। फसल बीमा योजना की बात भाई शिवराज जी ने कही। फसल बीमा योजना का प्रीमियम बढ़ा दो लेकिन उसकी यूनिट प्रति किसान कर दीजिए जिससे किसानों को लाभ मिले। हम आज के परिवेश में गन्ना मूल्य बढ़ाने की बात नहीं करते, धान और गेहूं का दाम बढ़ाने की बात नहीं करते। जो मूल्य निर्धारित कर रहे हैं, वह दिला दें तो किसान के लिए बहुत बड़ी कृपा होगी।
सभापति महोदय, मैं अब सूखे के बारे में कहना चाहता हूं। आज की बदलती हुई प्रकृति के मिजाज से सूखे और बाढ़ की स्थिति पैदा हुई है। सूखे पर लम्बी-चौड़ी चर्चा हो चुकी है जिसे मैं दोहराना नहीं चाहता। मैं आपके माध्यम से जल संसाधन मंत्री का ध्यान इस ओर आकर्षित कराना चाहता हूं कि आज जिस तरह से हिमनद पिघल रहे हैं और हिमालय जिस तरह से अपना चरित्र बदलता चला जा रहा है, हमारे देश में एक बहुत बड़े भू-भाग का बाढ़ से प्रभावित होना एक कारण है। इसी सदन में हमने पिछले साल इस बात की चर्चा की थी कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और बिहार दूसरे नम्बर पर है। नेपाल से भारत में प्रवेश करने वाली नदियो के कारण हर साल यह क्षेत्र बरबाद और तबाह हो रहा है। यदि राज्य सरकारों को उनके भरोसे छोड़ दिया जायेगा तो मैं समझता हूं कि राज्य सरकार के साथ आप न्याय नहीं करेंगे।
सभापति महोदय, पिछले दिनों इसी सदन के अंदर कहा था कि सरकार ने नेपाल और भारत के लिये एक संयुक्त दल गठित किया है जो नेपाल और भारत का दौरा करके अपनी रिपोर्ट देगा। मैं बड़े ही अदब के साथ कहना चाहता हूं कि जब मैं उत्तर प्रदेश विधान सभा का सदस्य था, हमारे आदरणीय नेता श्री जनेश्वर मिश्रा केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री थे। उन्होंने व्यक्तिगत वार्ता के दौरान जो जवाब दिया था, वही जवाब मंत्री जी मुझे देने का काम कर रहे हैं। इस संदर्भ में मेरा जो अनुभव है, उसे मैं बताना चाहूंगा। मेरा संसदीय क्षेत्र नेपाल-भारत सीमा पर स्थित है। पिछलें शनिवार और रविवार को मैं वहां गया। वहां अच्छी वर्षा हुई। वर्षा देखने के बाद दिल्ली आने के लिये मेरा मन नहीं कर रहा था। खेतों पर पानी बह रहा था। तभी मेरे मन में यह शंका आयी कि कहीं मेरे क्षेत्र में बाढ़ तो नहीं आ जायेगी क्योंकि जो नीचे के इलाके हैं, उसके अनुसार बगल के जिले कुशीनगर और पडरौना का इलाका बाढ़ से प्रभावित हो चुका है। नेपाल के अंदर कई छोटे-छोटे नाले हैं। यदि उनका सर्वेक्षण करायेंगे तो आपको उनका अस्तित्व नजर नहीं आयेगा लेकिन नेपाल की सरकार उन छोटे-छोटे नालों के मिलाकर नदियो की प्रकृति बदलने का काम कर रही है यदि सरकार अन्यथा न लें तो एक केन्द्रीय सर्वेक्षण दल वहां जाये या एक संयुक्त संसदीय समति का गठन किया जाये। नेपाल के अंदर वहां के एम.पीज. इस रोग से पीड़ित हैं। उनसे व्यक्तिगत रूप से हम लोगो ने बात करने का प्रयास किया है। इसलिये एक संयुक्त कार्य दल का गठन कर दिया जाये जो व्यावहारिक रूप से अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट दे। तत्पश्चात् बाढ़ की विभीषिका को रोकने का सार्थक प्रयास किया जा सकता है।
सभापति महोदय, हमारे कई साथियो ने इस बात का उल्लेख किया कि ईस्ट, वैस्ट और नार्थ-ईस्ट कोरिडोर के लिये ५६ हजार करोड़ रुपये का सड़क निर्माण के लिये खर्चा हो रहा है। हम सड़क निर्माण के विरोधी नहीं लेकिन अगर आपके पास संसाधन हैं तो उनकी प्राथमिकता क्या होनी चाहिये। हमें यह तय करना होगा कि कृषि क्षेत्र की हमारी क्या प्राथमिकतायें हैं। यदि ५६ हजार करोड़ रुपये देश मे पीने के पानी और सिंचाई के लिये पानी की व्यवस्था के लिये खर्च कर सकें तो देश के लिये बहुत बड़ा उपकार होगा। न केवल देश के किसानों के साथ बल्कि सम्पूर्ण मानवता के साथ उपकार का कार्य होगा। हम सरकार से यह मांग करते हैं कि आज हमारे लिये ही नहीं बल्कि दुनियाभर के लिये पानी एक चुनौती बनने जा रहा है। उस पानी की समस्या का निराकरण करने के लिये सब से पहले धन देने का कार्य करें। मुझे यह पता नहीं कि जल समवर्ती सूची में है या नहीं। यदि शामिल नहीं किया गया है तो मैं आपके माध्यम से सम्पूर्ण सदन से आग्रह करूंगा कि जल को समवर्त्ती सूची में शामिल किया जाये।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं चाहता हूं कि बाढ़ और सूखे का निराकरण करने के लिये सरकार सार्थक पहल का प्रारम्भ करे।
श्री सुकदेव पासवान (अररिया): माननीय सभापति महोदय, देश के कई प्रदेशों में भयंकर सुखाड़ है और देश के कई प्रदेशों में बाढ़ की विभीषिक इस कदर आई है कि सही मायनों में लोगों का कहना है इस कदर भयानक बाढ़ पिछले कई वर्षों में बिहार, बंगाल और आसाम में नहीं आई थी। मुझे जानकारी मिली है, कई क्षेत्रों से टेलीफोन आया कि जो भारत-नेपाल सीमा पर जो मुख्य नहर भीमनगर से निकली है, वह गई जगहों से टूटट गई है। पी.डब्ल्यू.डी. की मुख्य सड़कें बह गई, रेल लाइनें बह गई, नेशनल हाईवे बह गये और सविल अस्पतालों और स्कूलों के बारे में क्या कहें। वहां इतनी बुरी हालत है कि लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जा पा रहे हैं। लोगों के पास खाने और केरोसीन तेल का अभाव है तथा लोगों में इतना आतंक का वातावरण पैदा हो गया है कि रात में क्या होगा और दिन में क्या होगा। ऊपर से वर्षा हो रही है और नीचे से नेपाल की नदियों से जो बाढ़ आई है, उस सबसे बचाव के लिए सरकार को कोई न कोई उपाय ढूंढना चाहिए। बिहार के २२ जिलों में भयंकर बाढ़ से लाखों लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।
सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि धान की फसल का हमारे इलाके में ९० प्रतिशत रोपने का काम हो गया था, ९० प्रतिशत फसल लगी हुई थी। कुछ इलाके में जूट और मूंग की फसल लगी हुई थी। जो फसल लगी हुई थी, वह बुरी तरह से डूब गई है। मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि वह अविलम्ब एक उच्चस्तरीय कमेटी बनायें जो बिहार, बंगाल और आसाम का दौरा करे और बाढ़ पीड़ित इलाकों में केन्द्र सरकार अधिक से अधिक सहयोग करे। मुझे टेलीफोन आया कि हमारी लोक सभा के एक माननीय सदस्य श्री अनवारुल हक बाढ़ के कारण शिवहर और सीतामढ़ी में फंसे हुए हैं। वह यहां आना चाह रहे थे, लेकिन आठ-दस किलोमीटर पानी में पैदल चलने के बाद उन्होंने देखा कि बांध टूटा हुआ है, सड़कें टूटी हुई हैं। इस तरह से सीतामढ़ी में फंसे हुए हैं। वह लोक सभा में नहीं आ पा रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि हमारे देश में ८० प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। लेकिन जब फसल के रोपने का समय आया तो देश के १२-१३ प्रदेशों में सुखाड़ और चार-पांच प्रदेशों में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है।
सभापति महोदय, आप किसान परिवार से आते हैं, हमारे कृषि मंत्री जी किसान परिवार से आते हैं। वह देश के पूर्व प्रधान मंत्री के सुपुत्र हैं। इसलिए वह किसानों के प्रति सोचते हैं। मैं कहना चाहूंगा कि किसान जो फसल लगाता है, उस समय खाद की कीमत क्या होती है और फसल काटने के बाद फसल की कीमत क्या होती है। किसान खेत में जो खाद डालता है, पानी लगाता है, मेहनत करता है, लेकिन सही मायनों में उसी उसकी उचित कीमत नहीं मिल पाती है। आजादी के ५५ वर्षों के बाद भी आज देश में किसानों की दुर्दशा है। लोक सभा के अधिकांश माननीय सदस्य किसान परिवार से आते हैं और आजादी के ५५ वर्षों के बाद किसानों के हित में जो होना चाहिए, वह हम नहीं कर पाते हैं। चाहे किसी की भी सरकार हो, लेकिन किसान की क्या हालत है। किसान पूरे देश को अन्न देने का काम करता है। हम लोगों को किसानों के बारे में जिस रूप में सोचना चाहिए, उस रूप में हम नहीं सोच पाते हैं। एक तरफ बाढ़ और सुखाड़ की स्थिति है, दूसरी तरफ किसानों से ऋण वसूली का काम शुरू हो जायेगा। किसी किसान के घर पुलिस जाती है और कहती है कि ऋण वापस करो। हिन्दुस्तान के कई प्रदेशों में फसल बीमा योजना लागू है। लेकिन बिहार में फसल बीमा योजना लागू नहीं है। आज बिहार को बाढ़ और सूखे की भयानक स्थिति अस्त-व्यस्त किये हुए हैं। इसलिए मैं आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से कहना चाहूँगा कि फसल बीमा के लिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकार और किसान तीनों की जो सम्मिलित राशि होती है, बिहार सरकार उस राशि को देने में सक्षम नहीं है। इसलिए हम चाहेंगे कि केन्द्र सरकार निश्चित रूप से फसल बीमा योजना के लिए राज्य सरकार की जो राशि होती है, वह केन्द्र सरकार को देकर किसानों के हित की बात करे और किसानों के लिए फसल बीमा योजना बिहार में लागू करे। कई प्रदेशों में अभी फसल बीमा योजना लागू है।
महोदय, नेपाल से जो नदियाँ आती हैं वे अपने साथ बाढ़ लाती हैं। जब बिहार का बंटवारा हुआ और झारखंड अलग हुआ और शेष बिहार बच गया तो एक कोर कमेटी बनी थी। उसमें आप भी थे और नीतीश जी भी थे। उस सर्वदलीय समति में माननीय नीतीश जी माननीय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से मिले थे और उसमें उनकी पहली मांग थी कि नेपाल से जो नदियां आती हैं और बिहार की तबाही करती हैं, उसको रोकने के लिए चतरा में एक डैम बने जिससे उस पानी का जमाव हो सके और पनबिजली का उत्पादन करके देश के उस हिस्से को बिजली दी जा सके। बाढ़ के कारण लाखों हैक्टेयर फसल और जमीन बरबाद हो जाती है तथा हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति प्रति वर्ष बरबाद हो जाती है। इसके लिए केन्द्र सरकार ऐसी योजना बनाए कि बाढ़ का नियंत्रण करके वहां पनबिजली पैदा करें और डैम बनने के बाद हम लोगों को निश्चित रूप से बाढ़ से राहत मिलेगी।
महोदय, कृषि मंत्री जी ने १२ प्रदेशों के कृषि मंत्रियों की बैठक की थी। उसमें किसानों के हित की बात उन्होंने की और एक स्थायी समाधान बाढ़ और सुखाड़ के लिए निकालना चाहिए इस पर बल दिया गया। इसके लिए हमें एक लंबी योजना बनानी चाहिए।
जो छोटी योजनाएँ जो हम प्रदेशों के विकास के लिए बनाते हैं उसके स्थान पर एक लंबी योजना बने और बाढ़ और सुखाड़ का परमानेन्ट सॉल्यूशन निकले जिससे भारत खुशहाली की ओर जा सके।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।
श्री सुन्दर लाल तिवारी (रीवा) : माननीय सभापति जी, मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान मध्य प्रदेश की ओर खींचना चाहता हूँ। वैसे स्थिति तो समूचे देश में वर्षा न होने के कारण खराब है और ज्यादा भाग देश का ऐसा है जहां वर्षा नहीं हुई है और जहां कहीं वर्षा हुई है, वहां अत्यधिक वर्षा हो गई है। इसलिए यह विभीषिका के बादल मंडरा रहे हैं और यह चिन्ता का विषय है।
महोदय, कराह इधर से भी निकल रही है और उधर से भी निकल रही है। दोनों तरफ से स्थिति यही है। इसलिए सरकार को इस बात को स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं है कि कई राज्यों में जल की भीषण समस्या उत्पन्न हो गई है और सूखे की स्थिति है। यहां पर सवाल इतना ही है कि जो किसानों के घाव हैं, उन पर मरहम लगाने की आवश्यकता है। वहां पर बहुत सारे वक्ताओं ने भारत सरकार की अत्यधिक प्रशंसा की है। अभी भारत सरकार ने एक पैसा किसी प्रदेश को सूखे की मार से मुक्ति पाने के लिए नहीं दिया है लेकिन उधर के वक्ता प्रशंसा इतनी कर रहे हैं जैसे लगता है कि किसानों के घावों पर नकम छिड़क रहे हों।
महोदय, मेरे पड़ोसी संसदीय क्षेत्र के माननीय सांसद आदरणीय रामानन्द सिंह जी ने यहां सूखे की बात कही।
सभापति महोदय, मैं उनकी आधी बात की ताईद करता हूं। सही भी है सूखे की भयावह स्थिति रीवा, सीधी, सतना, शहडोल, पन्ना और छतरपुर में है। श्री चौहान ने भी वही बात कही है। मैं उनकी बात का भी समर्थन करता हूं। अब सवाल इस बात का है कि जो टीका-टिप्पणी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री के ऊपर की गई है, उसे सुनकर मुझे ऐसा लगता है कि श्री रामानन्द सिंह जी की स्मरण शक्ति शायद धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। भारत के प्रधान मंत्री आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने स्वयं उनके कार्यों की सराहना की है। …( व्यवधान)
श्री रामानन्द सिंह : यदि कोई प्रधान मंत्री जी के पैर छुए, तो वे आशीर्वाद तो देंगे ही। वे तो सबको आशीर्वाद दे देते हैं।…( व्यवधान)
श्री सुन्दर लाल तिवारी: आशीर्वाद नहीं, कामों की प्रशंसा की थी। यही नहीं आपकी पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष श्री वेंकैया नायडू, जब ग्रामीण विकास मंत्री थे और भोपाल गए, तो मुख्य मंत्री के कार्यों को देखकर वे भी चुप नहीं रह सके और उन्होंने भी उनके कार्यों की प्रशंसा की। इसलिए जो मैं कह रहा हूं कि आदरणीय रामानन्द सिंह जी की स्मरण शक्ति ग़ड़बड़ा रही है, वे इसकी जांच कराएं।
कुंवर अखिलेश सिंह: सभापति महोदय, इस स्मरण शक्ति को वापस लाने के लिए कृषि मंत्री जी कौन से डाक्टर की नियुक्ति करेगे ?
सभापति महोदय : स्मरण शक्ति को वापस लाने और बढ़ाने के लिए तो ब्राहमी बूटी का प्रयोग होता है।
श्री सुन्दर लाल तिवारी: सभापति महोदय, सवाल यह है कि जो सूखा है उसकी मध्य प्रदेश में क्या स्थिति है। मध्य प्रदेश के लगभग सभी जिलों में सूखा है और बहुत सारे जिले ऐसे हैं जहां बोनी हो चुकी है जैसे सीधी, सतना, शहडोल, पन्ना और छतरपुर, लेकिन रीवा और सागर दो संभाग ऐसे हैं जहां अभी तक बोनी शुरू नहीं हुई है और अगर कहीं हुई भी है, तो एक या दो प्रतिशत हुई है जो नगण्य है, लेकिन अवर्षा के कारण जो भी हुई है वह समाप्त हो गई है और उससे फायदा नहीं हुआ है और कृषकों का नुकसान ही हुआ है। मेरा कहना यह है कि किसान की फसल का नुकसान तो उसको हुआ ही है, लेकिन उसके साथ-साथ हमारे प्रदेश में जल संकट भी उत्पन्न हो रहा है और पिछले तीन वर्षों से वहां निरन्तर सूखे की स्थिति है। मध्य प्रदेश सरकार ने केन्द्र सरकार से कई बार मांग की और पिछले वर्ष सूखे की स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने केन्द्र सरकार से २५६ करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन केन्द्र सरकार ने प्रदेश सरकार को एक पैसा भी नहीं दिया, लेकिन हमारे प्रदेश के आदरणीय मुख्य मंत्री श्री दिग्विजय सिंह जी ने पूरी ताकत के साथ उन विषम परिस्थितियों में किसान के साथ खड़े रहे और अधिक से अधिक राहत पहुंचाई। इसलिए मैं आदरणीय रामानन्द सिंह जी और चौहान साहब से यह कहना चाहता हूं कि यह हमारा हक है। इसलिए हम केन्द्र सरकार से पैसा मांग रहे हैं, लेकिन अगर केन्द्र सरकार पैसा नहीं देगी, तो हमारे मुख्य मंत्री श्री दिग्विजय सिंह जी, तमाम विषम परिस्थितियों से लड़ने में सक्षम हैं।
श्री रामानन्द सिंह : सुन्दर लाल जी, मध्य प्रदेश के बजट का ९४.९६ प्रतिशत हिस्सा केवल वेतन पर खर्च होता है। यदि केन्द्र सरकार सहायता नहीं करे, तो मध्य प्रदेश सरकार चल नहीं सकती है। यह बड़े शर्म की बात है कि मध्य प्रदेश में बेसहारा, अपंग एवं वृद्धों को छ: महीने तक पेंशन नहीं मिलती है। सारा बजट कर्मचारी और अधिकारियों के वेतन में जा रहा है। इसलिए आपको उस सरकार की बढ़ाई करने पर शर्म आनी चाहिए।
श्री सुन्दर लाल तिवारी: सभापति महोदय, यह चर्चा तो जब दोनों पक्ष आमने-सामने बैठेंगे, तब होगी। जो वर्तमान में वास्तविक स्थिति है उसके लिए हमें मिल जुल कर काम करना चाहिए। आज यहां केन्द्रीय कृषि मंत्री उपस्थित हैं, सिंचाई मंत्री उपस्थित हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि इस विषय पर सदन में चर्चा विलम्ब से हो रही है। जब इस सत्र की शुरूआत हुई थी, उसी दिन यानी पहले ही दिन चर्चा होनी चाहिए थी। अब कब निर्णय लेंगे और कब आप प्रदेशों को राहत पहुंचाएंगे?
श्री रामानन्द सिंह : आपकी प्रदेश सरकार की ओर से सूखा प्रभावित जिलों की सूची ही अभी तक नहीं आई है।
श्री सुन्दर लाल तिवारी: सभापति महोदय, अब और आगे स्थिति खराब न हो और जो स्थिति है उससे तत्काल राहत दिलाने के लिए केन्द्र सरकार राज्य सरकार को कम से कम ५० करोड़ रुपए तत्काल भेजे।
तब तो दुबारा बोनी हो जायेगी वर्ना प्रदेश में बोनी भी हो पाने की स्थिति नहीं है। वहां जो अनाज की स्थिति है, उसकी जानकारी सबको है। हमारे प्रदेश में बहुत सारा इलाका ऐसा है जो असींचित है। वहां बीज भी नहीं है। अगली जो फसल रबी की आने वाली है, उसकी स्थिति भी खराब हो जायेगी। अगर केन्द्र सरकार हमें मदद नहीं करती तो किसानों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब हो जायेगी। कम से कम एक वर्ष तक तो फसल पूरी तरह से खराब रहेगी। सवाल इस बात का है कि हर वर्ष यह समस्या सामने आ रही है। तीन वर्ष से मध्य प्रदेश में वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ा है। आज केन्द्र सरकार अगर उन्हें राहत देने की कोशिश भी करती है …( व्यवधान)
सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये।
श्री सुन्दर लाल तिवारी : क्या वह राशि किसानों तक पहुंच पायेगी, यह सोचने का विषय है। मेरा कहना है कि इसके लिए एक योजना बनानी चाहिए। पंचायती राज की व्यवस्था मध्य प्रदेश में बहुत सुद्ृढ़ है। पंचायती राज के माध्यम से हमें यह व्यवस्था करनी चाहिए कि किसी प्रदेश में सूखा है और आपने निर्देश दिये हैं तो वहां पंचायतें सूखे से निपटने का काम शुरू कर देंगी। आप पैसा प्रदेश सरकार के पास भेजेंगे तो प्रदेश वह पैसा जिले में भेजेगा और जिले में योजना बनाकर वभिन्न जगह पैसा भेजा जायेगा। वह पैसा किसानों तक पहुंचने वाला नहीं है।
स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने यह कल्पना की थी कि सबसे गरीब आदमी और दूरस्थ रहने वाले आदमी को राहत पहुंच सके, इसी लिए पंचायती राज की व्यवस्था हुई। मेरा कहना है कि पंचायती राज की व्यवस्था का भरपूर उपयोग करना चाहिए और भविष्य में सूखा मुक्त भारत बनाने के लिए उन पंचायतों को उपयोग में लाना चाहिए।
जहां तक पीने के पानी की समस्या है। …( व्यवधान)मैं अंतिम बात कह रहा हूं। पानी उपलब्ध कराने की हमारी जो नीति है, माननीय सिंचाई मंत्री जी, इसके बहुत सारे विपरीत असर भी पड़े हैं। हमने गांव में पांच- छ: हैंडपम्प लगाये हैं लेकिन कुंए के पानी सूख गये हैं। इससे जो गरीब किसान हैं, वह मारे जा रहे हैं क्योंकि वे चालीस हजार रुपये का हैंडपम्प नहीं ले सकते।
मैं उस इलाके की बात नहीं कर रहा, जहां पानी ऊपर है। जो हमारे पुराने रुाोत हैं, जो हमारे पानी इकट्ठा करने के पुराने तौर-तरीके हैं, उनको इस तरीके से कुछ न कुछ चोट लगी है। वे कुंए आज सूख पड़े हैं। किसान रो रहे हैं क्योंकि उनके पास हैंडपम्प लगाने की व्यवस्था नहीं है, उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है। हैंडपम्प संबंधी कोई नीति नहीं है, जो चाहे जहां मर्जी हैंडपम्प लगा ले। एक तरफ हम नये रुाोत तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं और दूसरी तरफ पुराने रुाोत खराब होते जा रहे हैं। मैं पार्टी की बात नहीं कर रहा कि यह नीति इस पार्टी की है या उस पार्टी की है। सवाल इस बात का है कि अभी समय है और हम इस पर विचार करें और एक ऐसी नीति बनाई जाये जिससे हमारे पुराने पानी के रुाोत रहें।
मेरी भारत सरकार से मांग है कि इस विषम परिस्थितियों में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जो भी हक मांगा जाये, वह पूरा का पूरा हक दें । यहां से मध्य प्रदेश सरकार को पैसा दें। इसके साथ-साथ जो गत वर्ष का पैसा नहीं दिया गया है, वह पैसा भी देने का आप कष्ट करें।
अंत में, मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि कृषि मंत्री जी चाहें या हमारे सिंचाई मंत्री जी चाहें, दोनों नजदीक भी बैठ जायें और वे चाहें जैसी भी योजना बनायें, वे न तो पानी दे सकते हैं और न ही अनाज दे सकते हैं, केवल पैसा दे सकते हैं। लेकिन उस पैसे से सारी की सारी व्यवस्था हो जायेगी, यह संभव नहीं है। इसलिए एक दीर्घकालीन योजना बनाई जाए कि जब दोनों नज़दीक बैठ सकें तो आप अनाज भी दे सकें और पानी भी दे सकें।
श्री हरिभाई चौधरी (बनासकांठा): सभापति महोदय, आपने बाढ़ और सूखे की महत्वपूर्ण चर्चा में मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। आज पूरे देश में बाढ़ और सूखे से सब माननीय सदस्य चिंतित हैं। अभी माननीय कृषि मंत्री जी ने १२ राज्यों के कृषि मंत्रियों को बुलाया था। लेकिन अफसोस है कि हमारे गुजरात के कृषि मंत्री को नहीं बुलाया। मुझे पूरी चर्चा में ऐसा सुनने को मिला जैसे गुजरात में सूखा ही नहीं है। गुजरात में सिर्फ सौराष्ट्र में बारिश हुई।…( व्यवधान)श्री नरेन्द्र मोदी को इतना याद किया तो इस समय भी याद करना चाहिए था। सौराष्ट्र में पहली बारिश हुई लेकिन उत्तर गुजरात और कच्छ, दोनों ऐसे इलाके हैं जिनमें पिछले तीस सालों में, जितने भी डैम हैं, दो बार बाढ़ आई, पूरा सूखा पड़ा है। मेरी कौन्सटीटूऐंसी बनासकांठा, जो राजस्थान के सीमावर्ती इलाके में है, बिल्कुल जुड़ी हुई है, जैसे सुंदरलाल जी बोलते हैं, उनके बाजू में मेरी कौन्सटीटूऐंसी है, बाजू में पाकिस्तान का बार्डर है और कच्छ जमीन के हिसाब से भी खारिश वाली है, वहां पहले से साल में एक ही फसल होती है और वह भी बारिश के हिसाब से होती है। उत्तर गुजरात की पोजीशन यह है कि आज वहां एक हजार फीट नीचे पानी का तल चला गया है। बारिश एक बार हुई, उससे सबने फसल बोई लेकिन वह नष्ट होने को आई है। पूरे गुजरात में, जब से गुजरात की स्थापना हुई है, तब से आज तक, चालीस सालों में २२ बार अकाल और सूखा पड़ा है।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : आपके क्या सुझाव हैं, वह बताइए।
श्री हरिभाई चौधरी : मैं पहली बार खड़ा हुआ हूं। आप मुझे बोलने देंगे तो पांच मिनट में अपनी बात समाप्त कर दूंगा। …( व्यवधान)आप मेरी बात तो सुनें। आप इधर से भी बोलते हैं और उधर से भी बोलते हैं।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : यह बताइए कि क्या करना चाहते हैं।
श्री हरिभाई चौधरी : जो करना चाहते हैं, वह बताते हैं। हमारे पास सुझाव हैं, हम अपनी समस्या को हल कर सकते हैं। नार्थ गुजरात और कच्छ की समस्या के बारे में यदि सब सदस्य सहायता दें तो वह हल हो सकती है। हमारे पास ३० डैम हैं जो खाली पड़े हुए हैं। सरदार सरोवर योजना पिछले ४० सालों से लंबित है। हमको फायदा नहीं है, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान को फायदा है। सभी संसद सदस्य एक साथ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार को समझाएं कि हमको इसमें सहयोग दें और जो बकाया राशि है, उसका भुगतान हमको कर दें। अगर सरदार सरोवर योजना पूरी हो जाए तो उसमें से लिंक कनाल करके जो पानी आएगा, वह ३० डैम्स में जाएगा तो नार्थ गुजरात और कच्छ की धरती में पूरा पानी होगा और सूखा और अकाल कम पड़ेगा।
फसल बीमा योजना की बात बहुत अच्छी है लेकिन उसकी नीति में त्रुटियां हैं, वे ऐवरेज निकालते हैं। पिछली बार मुझको दो प्रतिशत बीमा दिया गया। किसानों ने दस हजार के ऊपर ३०० रुपये भरे थे, हमको २०० रुपये मिले। इसमें सुधार किया जाना चाहिए।
नाबार्ड कोआपरेटिव बैंक को ७ प्रतिशत ब्याज पर पैसा देता है। स्टेट कोआपरेटिव बैंक सैंटर कोआपरेटिव बैंक को ८ प्रतिशत पर देता है और डिस्टि्रक्ट कोआपरेटिव किसानों को १६ प्रतिशत ब्याज पर देता है। किसानों को ७ प्रतिशत से १६ प्रतिशत तक मिलता है। यदि कृषि मंत्री नाबार्ड को आदेश दें तो ७ प्रतिशत वाला कम से कम ४-५ प्रतिशत लेकर १२ प्रतिशत तक भी किसानों को मिले तो उसका अच्छा फायदा होगा।
22.00 hrs. मेरी दूसरी बात यह है कि जो चैक डैम बनाने का गुजरात सरकार ने निर्णय लिया है और अभी-अभी २४ हजार चैक डैम बनाये हैं, हमारे भावनगर सौराष्ट्र में उससे फायदा हुआ है। अभी जो राहत कार्य चलते हैं, उन कामों में सिंचाई के कामों को लेना चाहिए, रोड्स बनाने का कोई फायदा नहीं है। कैनाल बनाने का बहुत राहत कार्य करना चाहिए। चैक डैम बनाने का राहत कार्य करना चाहिए, विकास का काम करना चाहिए, मैं ऐसा समझता हूं।
हमारी दूसरी डिमांड यह है कि सिन्धु का भारत सरकार का एग्रीमेंट खत्म हो गया है, अभी हमारी सरकार ने लिखकर भेजा है कि जब इण्डस करार हुआ था तो उस समय ऐसा कहा गया था कि उत्तरी गुजरात को, कच्छ को पानी देंगे, लेकिन वह आज तक नहीं मिला है। अभी गुजरात सरकार ने एक आवेदन पत्र भेजा है, उसके ऊपर आपको विचार करना चाहिए, ऐसा मैं सोचता हूं। नाबार्ड के पैसे का रेट कम करना चाहिए। हम जो चैक डैम बनाते हैं, हमारे यहां जो पहाड़ी इलाका है, चैक डैम बनाने में एक फीट भी फोरैस्ट की जमीन बढ़ाने का कोई आश्वासन नहीं देते हैं तो फोरैस्ट डिपार्टमेंट को भी बोलना चाहिए कि चैक डैम बनाने से पानी बढ़ेगा तो उससे फोरैस्ट अच्छा रहेगा। फिर भी फोरैस्ट वाले लोग नहीं समझते हैं, इसके लिए फोरैस्ट वालों को भी बताना चाहिए।
इसके साथ रिलीफ वर्क का जैसा मैंने बताया कि सिंचाई की जो योजनाएं हैं, उसमें रिलीफ वर्क करवाये जायें। कैनाल का काम अभी चलता है, उसमें भी परमीशन देने की जरूरत है। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
सभापति महोदय : पांच मिनट के अन्दर सुझाव देकर खत्म करिये।
श्री राम प्रसाद सिंह (आरा): माननीय सभापति जी, आज सदन में हम देश में सूखे और बाढ़ की समस्या पर चर्चा कर रहे हैं। सूखा और बाढ़ इस देश की स्थाई समस्या हो गई है। पिछले दस वर्षों से हर साल सूखे और बाढ़ पर चर्चा की गई, लेकिन निदान कुछ नहीं निकलता। हम जहां के हैं, वहीं हैं। यह स्थाई समस्या बन गई है। इसका निदान पूछिये तो यह सदन नहीं कर पाएगा। परिस्थितियां क्या बात कर रहीहैं, वह हमसे ज्यादा मंत्री लोग जानते होंगे कि उनकी क्या मजबूरियां हैं।
आपने खासकर देश के १२ राज्यों के मंत्रियों को बुलाया, मैं इसके लिए कृषि मंत्री जी को बधाई देता हूं। जो सिंचाई मंत्री बैठे हुए हैं, उनको भी मैं बधाई देता हूं। लेकिन बिहार ऐसे दुर्भाग्य का प्रान्त बना हुआ है, जो बाढ़ और सूखा दोनों तरह से ग्रसित है। एक तरफ २२ जिले बाढ़ से ग्रसित हैं, जहां जल प्लावन हो गया है, लोग डूब रहे हैं, सड़कें कटकर छिन्न-भिन्न हो रही हैं।
सभापति महोदय : आपका क्या सुझाव है, वह बताइये। बाढ़ और सूखा तो साबित हो गया।
श्री राम प्रसाद सिंह :हम सुझाव दे रहे हैं। आप जब बोलते हैं तो सुझाव से पहले भूमिका बांधते हैं, हम लोगों को बोलने तो दीजिए।
मैं निवेदन करूं तो वह स्थिति हो गई है कि २२ जिले बाढ़ से और १६ जिले सूखाग्रस्त क्षेत्र के हैं। मैं नाम कहूं तो छपरा, सिवान, गोपालगंज, आरा, भोजपुर, बक्सर, कैमूर, औरंगाबाद, गया, पटना का पार्ट, जमुई, लखीसराय, शेखपुरा, ये सब वैस्ट के १६ जिले हैं, ये सूखे से ग्रसित हैं। पूरा बिहार बाढ़ और सूखे से ग्रसित है, इसकी चपेट में है। आपने कहा कि एक तरफ प्राकृतिक आपदा, एक तरफ बाढ़ और सूखा और दूसरी तरफ केन्द्र सरकार, न जाने इस सरकार को क्या हो गया है। बिहार से ज्यादा एम.पी. आपके जीतकर आये हैं, यह सर्ववदित है। बिहार की जनता ने आपको काफी वोट दिये हैं और आप उनको उसके बदले में क्या दे रहे हैं, आप उनका खुला शोषण कर रहे हैं, उनका उचित हक नहींदे रहे हैं। जो पैकेज की बात हो रही है, वह नहीं दे रहे हैं। बिहार को सब मिलकर तबाह करने जा रहे हैं, लेकिन एक बात जान जाइये कि बाहिर के लोग इस इश्यू पर, इस विषय पर सभी एक हैं, चाहे वह रेल जोन का मामला हो, हम लोग लड़ेंगे और मजबूत मन से लड़ेंगे, लेकिन मैं आपसे निवेदन करूंगा कि आप जरा बिहार के प्रति दयावान होइये, क्षमावान होइये। आप विकास के लिए जो कुछ दे रहे हैं, उसमें हमारा हिस्सा दीजिए, मैं नहीं चाहता कि आप हमको ज्यादा दें। जो हम राजस्व देते हैं, उसका जो हिस्सा बनता है, वह हमें दें। बाढ़ का कोई स्थाई समाधान निकालना चाहिए। हमारे नेता कर्पूरी ठाकुर जी ने कहा था कि जो नेपाल से नदियां यहां आती हैं, इन नदियों को इरीगेशन फैसलिटी देकर, खुदाई करके, उनके सिल्ट को निकाला जाए तो समस्या का निदान हो सकता है। लेकिन एसा नहीं हुआ। इसलिए भारत और नेपाल इस बारे में समझौता करें और हल निकालें। हमारे यहां सोन कैनाल सिस्टम १८७५ में बना था। उस समय उसकी अवधि १०० साल आंकी गई थी, लेकिन अब उसको करीब १३० साल हो गए हैं। उसकी जो नहरें हैं, वह छिन्न-भिन्न हो गई हैं। बिहार सरकार ने कई बार कहा कि अगर सूखे का निदान चाहते हैं तो इस नहर से जो १२ लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित होती है, यह देश की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में से एक है, इसका सुधार किया जाए। इसका सुधार करने से जो मैंने पूर्व में जिले बताए भोजपुर, गया, पटना, जहानाबाद आदि में सिंचाई हो सकती है। हमारे यहां खाद्यान्न का भंडार हो सकता है, अगर बाढ़ पर कंट्रोल करके वहां का पानी सूखाग्रस्त इलाकों में पहुंचा दिया जाए, तो हम पूरे प्रदेश को और पूर्वी उत्तर प्रदेश को भी खाद्यान्न दे सकते हैं। झारखंड में अगर हम खाद्यान्न न दें, तो वहां के लोग भूखे मरने की कगार पर आ सकते हैं। हमारे यहां उचित व्यवस्था न होने के कारण लाखों की संख्या में खेतीहर मजदूर और किसान प्रभावित हो रहे हैं। अगर आप इसका स्थाई निदान चाहते हैं तो कैनाल सिस्टम को, जिसका प्लान बनाकर प्रदेश सरकार ने १९९२ में केन्द्र को भेजा था, उस समय यह योजना १६०० करोड़ रुपए की थी, जो अब २२०० करोड़ रुपए की हो गई है, उसको तुरंत मंजूरी दी जाए। अच्छी-अच्छी योजनाएं बिहार से झारखंड में चली गई हैं। हमारे यहां अब कोई उद्योग नहीं रहा, बाढ़ और सुखाड़ से लोग प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए मेरा केन्द्र सरकार से निवेदन है कि बिहार के साथ सौतेलेपन का व्यवहार न किया जाए।
कृषि मंत्री जी, इस महान देश के महान सपूत चौधरी चरण सिंह के सपूत हैं। आप पुराने सोशलिस्ट हैं और लोहिया जी से भी प्रभावित रहे हैं। इसलिए आप किसानों के बारे में सोचें, क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। जब गांव का किसान खुशहाल होगा, तो देश खुशहाल बनेगा। भारत की भूमि बहुत उपजाऊ है। इस जैसी जमीन दुनिया में कहीं नहीं है। इस मुल्क में कोई ऐसा दिन नहीं है जब कोई नई फसल न बोई जाती हो। बिहार में बिजली की कमी है, वहां उद्योग नहीं हैं। मुश्किल से बिहार में ४००-५०० मेगावाट बिजली पैदा होती है। झारखंड के अलग राज्य बनने से बिजली का इलाका भी झारखंड में चला गया। हमारा जो सोन कैनाल सिस्टम है, उसका आधुनिकीकरण किया जाए, उसके लिए पर्याप्त रुपया दें। किसानों के लिए समुचित बिजली का प्रबंध करें। हमारे यहां खेतीहर मजदूरों को रोजगार देने के लिए काम के बदले अनाज योजना को लागू करें। तकावी लोन किसानों को दें। जिन नहरों में कभी भरपूर पानी हुआ करता था, अब केवल २० से ३० प्रतिशत ही रह गया है। १५ अगस्त तक खेती का उपयुक्त मौसम बिहार में माना जाता है। लेकिन वहां पानी नहीं है। किसान सोचता था कि इस मौसम में रबी की फसल की बुवाई होगी, लेकिन उसकी जमीन सूख गई है, जो बीज उसने लगाया था, वह खत्म हो गया है। इसलिए इस पर ध्यान दें। ऋण को माफ करें, बिजली की व्यवस्था करें, तकावी लोन दें। बाढ़ के बचाव के लिए जितना हमारा हक बनता राजस्व में, उस अनुपात में वह हमें दिया जाए। हमारा पंचायतों का ६०० करोड़ रुपया बकाया है, उसको तुरंत अदा करें, जिससे हम पंचायतों के माध्यम से हार्ड मैनुअल स्कीम, लाइट मैनुअल स्कीम चलाकर भूखे लोगों को रोजी-रोटी दे सकें। इसलिए मैं कृषि मंत्री जी और सिंचाई मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि आप इस ओर ध्यान दें और बिहार को भी सूखाग्रस्त और बाढ़ग्रस्त स्टेट मानकर वहां के मंत्रियों को बुलाकर सलाह करें और पर्याप्त साधन मुहैया कराएं।
DR. C. KRISHNAN (POLLACHI): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to bring out the actual picture of my constituency, Pollachi. Coimbatore and Erode districts fall in this constituency. The monsoon has failed and there is no rain for the past two years. Due to this, my area is drought-hit and the people are very much worried.
The farmers are facing a lot of problems due to failure of monsoon for the last two years, particularly in Coimbatore and Erode districts in Tamil Nadu. Due to failure of rains, the ground water has gone down to the level of 1000 feet. Many bore-wells have become dry and water is not available when new bore-wells are attempted even at a depth of 1000 feet. There are about ten lakh coconut trees in these districts. Coconut trees are long standing crops. It takes, at least, seven years to get yield from a coconut tree. In my Pollachi parliamentary constituency alone, about four lakh yielding trees have become dry and dead once for all. The small and marginal farmers are unable even to remove the dried up trees and to plant new saplings for want of funds. Further, the coconut farmers were suffering due to poor yield caused by Ereophyte mite attack for about three years. Even for the poor yield, the farmers could not get reasonable price. The benefits of purchasing dry coconut or copra by Government have not reached the farmers. All these difficulties and the present severe drought conditions due to failure of monsoon have created great financial loss to the farmers. Hence, I would request the Central Government to provide Rs. 1000 per dried up and dead tree as compensation to the affected farmers to enable them to plant new saplings.
Further, the failure of monsoon has caused scarcity of drinking water in many places in Coimbatore and Erode districts. Hence, I would request that Coimbatore and Erode districts may be announced as drought affected districts and all remedial measures should be extended to these districts on war footing treating this drought as a natural calamity on par with other natural calamities like flood, storm, earthquake etc. The only permanent solution is to take initiative by the Central Government to link the southern rivers like Krishna, Mahanadi, Godavari, Cauvery, Vaigai and Periyar so that the entire South India may have sufficient water facility for drinking and irrigation purposes at all times for the future generation.
On 28th June, 2002, about a month ago, we conducted a massive rally of farmers in Pollachi, my constituency. Hon. Shri Vaiko, Member of Parliament and the leader of MDMK. Party led the rally with a great success. It is unfortunate that he is now in prison by the dare misuse of Prevention of Terrorism Act by the Tamil Nadu Government.
I have brought in the actual picture of drought position in my constituency. I would request the Central and State Governments to take proper action to safeguard the interests of the farmers.
Sir, farmers have lost about four lakh coconut trees in my constituency. I would like to request that compensation for this should be paid by the Central Government and the State Government should declare Coimbatore and Erode districts as drought hit areas.
प्रो. आई.जी.सनदी (धारवाड़ दक्षिण): सभापति महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बाढ़ और सूखाड़ की स्थिति पर सदन में हो रही चर्चा में बोलने का मौका दिया । मैं एक बात कहना चाहता हूं -
" अशोक वृक्ष की छाया में, सशोक सीता को पाया था।
आज अशोकचक्र के ध्वज के नीचे, सशोक किसानों को देख रहा हूं।"
आकाश की ओर नजरें लगाए, सूखे खेत, बरबादी के कगार पर आज किसान खड़ा हुआ है। आकाश की ओर उसकी आशा भरी नजरें लगी हुई हैं। किसान के द्वारा बोए हुए बीज, मेहनत और खून-पसीना आज बरबाद हो गया है। किसान देश का अन्नदाता है और उस अन्नदाता के ऋण को हम सात जन्म तक भी अदा नहीं कर पायेंगे। देश के प्रथम प्रधान मंत्री, श्री नेहरु जी के शब्दों में -
" किसान अन्नदाता है।
मैं उसका ऋण चुका नहीं पाता हूं।
जब मैं दुनिया से चल बसुंगा, जब मुझे चिता पर जलाया जाएगा, तब मेरे शरीर से जो राख बनेंगी, उस राख को देश के किसानों के खेत में जोत देना, ताकि मैं उनके ऋण से मुक्त हो जाऊंगा। "
इतने महान उनके विचार थे। लेकिन किसान की हालत आज नाजुक है। इस समस्या पर पूरा सदन गम्भीरता से चर्चा कर रहा है। मैं पूरे देश की स्थिति के बारे में नहीं कहना चाहता हूं, लेकिन कृषि मंत्री जी का ध्यान कर्नाटक राज्य की ओर ले जाना चाहता हूं। सन् २०००-२००१ में भी २७ जिलों में से २०-२५ जिले सूखे से ग्रस्त थे और १४०-१५० ताल्लुका इसकी चपेट में आ गए थे। इस स्थिति को देखते हुए एक सर्वदलीय दल प्रधान मत्री जी से मिलने गया था और उनको ९०० करोड़ रुपए की एक योजना भी बना कर दी थी। मिलने के बाद एक टीम वहा गई थी । मैं ऐसा तो नहीं कहूंगा कि हमारे भाग्य में लिखा हुआ नहीं था, इसलिए वह राशि नहीं मिली। मैं समझता हूं कि इस बार हालत पिछले साल से ज्यादा खराब है। कृष्णा जी प्रदेश के मुख्यमन्त्री हैं। वे हिम्मत करके कहीं न कहीं से राशि इकट्ठी करेंगे, लेकिन इसके साथ अगर आपकी मदद मिल जाए, तो मै समझता हूं कि हमारी ताकत में और बल आ जाएगा। उन्होंने बहुत कुछ नहीं मांगा है। उन्होंने कृषि के क्षेत्र में १३२ करोड़ रुपए की मांग की है। हार्टिकल्चर में ५० करोड़ रुपए की मांग की है। पीने के पानी के लिए २१ करोड़ रुपए, शहरों में पीने के पानी क ेलिए १७ करोड़ रुपए, स्पेशल न्युट्रीशन के लिए २५ करोड़ रुपए और स्वास्थ्य रक्षा के लिए २२ करोड़ रुपए और खेती से मिलने वाले रोजगार के लिए २८३ करोड़ रुपए - इस प्रकार उन्होंने ५५३ करोड़ रुपए की मांग की है। मैं आपका आभारी हूं कि आपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुलाकर इस पर रोशनी डाली है। वह जो कुछ आस लगाए बैठे थे, उसका समर्थन किया है। यह बात सचमुच सराहनीय है। हमें जितना धन नैचुरल कैलेमिटी फंड से मिलता है, क्या इससे अधिक धन कभी खर्च किया है? हमें एनसीएफ का फंड नहीं मिला है। उसे दिलाने की कृपा करें। वहां तालाब सूखे हैं और किसानों के पास काम नहीं है। हमने फूड फॉर वर्क के लिए बहुत कुछ नहीं मांगा है। आन्ध्रा प्रदेश वाले तो ३० लाख टन अनाज लेकर चले जाते हैं। हम आपसे उतना नहीं मांगते हैं। हमारी मांग ८ लाख मीटि्रक टन है। ५५३ करोड़ रुपए की धनराशि कर्नाटक को देंगे तो वह आपका आभारी रहेगा।
श्री महेश्वर सिंह (मंडी): सदन के माननीय सदस्य चौटाला जी ने देश के अधिकांश भागों में बाढ़ और सूखे से उत्पन्न स्थिति की ओर सदन और मंत्री महोदय का आपके माध्यम से ध्यान आकर्षित किया। मैं इसमें भाग लेने के लिए खड़ा हुआ हूं। आपको वदित है कि मैं १९९० से लगातार इस सदन या उस सदन का सदस्य रहा हूं। इससे पूर्व १९७७ से लेकर दो बार विधान सभा का सदस्य रहा। २७ वर्ष के इस राजनीतिक जीवन में शायद ही कोई वर्ष ऐसा गया होगा जब बाढ़ और सूखे या इस प्रकार की प्राकृतिक आपदा पर चर्चा न हुई हो।
यह बात सत्य है कि हम चर्चा करते हैं लेकिन आज तक कोई भी दीर्घकालीन योजना नहीं बना पाए। किस प्रकार स्थिति से निपटा जाए इसकी तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। यह भी सत्य है कि जहां इस देश में हम पहले दो फसलों पर निर्भर थे - रबी और खरीफ, लेकिन अब किसान इतने निराश हो चुके हैं कि वे रबी और खरीफ की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते बल्कि तीसरी फसल रिलीफ, उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। इस बात की समीक्षा करने की आवश्यकता है कि भारत सरकार जो करोड़ों रुपए रिलीफ के रूप में देती है क्या वह सचमुच पात्र व्यक्ति तक पहुंचता है या नहीं? जब प्राकृतिक आपदा आती है तो कई निजी और समाज सेवी संस्थाएं सेवा करने के लिए आगे आती हैं। उनके द्वारा दिया धन और दूसरी सामग्री इस प्रकार के पीड़ित लोगों तक सही मायने में पहुंचती है या नहीं, इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सारी चर्चा से एक बात स्पष्ट हुई है कि सारे देश में एक एनवायरनमैंटल चेंजिस आ गई हैं। मैं हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देना चाहूंगा। आपको वदित है कि मैं ऐसे क्षेत्र से आता हूं जिस का क्षेत्रफल ३२ हजार स्कवेयर किलोमीटर में फैला है। हिमाचल में आधे से ज्यादा भाग जिस में रोहतांग पास आता है, मुझे बचपन के दिन याद आते हैं जब सारे पर्वत बर्फ से ढक जाते थे और रोहतांग पास ८-९ महीने हिमपात के कारण बाकी देश से कट जाता था। वह ३-४ महीने खुला रहता था। अब स्थिति उल्टी हो गई हैं। अब वह ३-४ महीने बंद रहता है और बाकी समय खुला रहता है। जब रास्ता खुला रहता है तो कभी बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन यह श्रेय लेना चाहती है कि हमने जल्दी सड़क निकाल दी। इसमें दो राय नहीं कि बॉर्डर रोड आर्गेनाइजेशन बहुत अच्छा काम कर रही है। लेकिन अगर किसी को रास्ता जल्दी खुलने का श्रेय जाता है तो मौसम को जाता है क्योंकि उसमें तबदीली आ गई हैं और बर्फ नहीं पड़ती। हिमाचल, जहां अनेकों नदियों के रुाोत हैं वह भी सूखे की लपेट में आता है। वहां कभी बादल फटते हैं, कभी बाढ़ आती है। जब मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ आती है तो कई बार वरदान समझा जाता है क्योंकि वह सिल्ट साथ लाती है और उपज बढ़ती है लेकिन हमारे क्षेत्रों में जब बाढ़ आती है तो तांडव नृत्य होता है। दो वर्ष पहले किन्नौर में सतलुज नदी में बाढ़ आई तो मेरे क्षेत्र में न केवल किन्नौर जिला बल्कि मंडी, कुल्लू, शिमला के अनेकों भाग प्रभावित हुए। केन्द्र सरकार की मदद से हिमाचल प्रदेश सरकार राहत कार्यों में सफल हुई।
सभापति महोदय, जहां तक हिमाचल प्रदेश का संबंध है, कई माननीय सदस्यों ने इसका उल्लेख किया है। मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। इस वर्ष हिमाचल प्रदेश सूखे की चपेट में है। खरीफ फसल की बुवाई मई के दूसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के दूसरे सप्ताह तक होती है। इस वर्ष जो वर्षा हुई है, वह केवल पिछले वर्ष की तुलना में ४० प्रतिशत हुई है। आंकड़ों के अनुसार २२ जुलाई तक पिछले साल की तुलना में ३२४ मि.मी. के स्थान पर केवल १९८ मि.मी. हुई है। फसल की बुवाई का काम कहीं शुरु नहीं हुआ। यदि कहीं हुआ भी है तो फसल नष्ट हो गई है। हमारा प्रदेश फलों का प्रदेश है जहां सेब का उत्पादन तो होता ही है, अन्य फल भी पैदा होते हैं। फल तो लगे हैं लेकिन सूखे के कारण उनका साइज छोटा हो गया है। आज चारे की इतनी समस्या हो गई है कि फलदार वृक्षों की डालियां काटकर, जिनमें फल नहीं लगे हैं, वे पशुओं को चारे के रूप में दे रहे हैं। कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सर्दियों में चारा नहीं होता है और सावन या भादों में जो घास तैयार होती है, उसे काटकर सर्दियो के लिये इक्ट्ठा करते हैं क्योंकि सर्दियो में चारा नहीं होता है। अब की फसल तो गई लेकिन सर्दियों में पशुओं के लिए चारा कहां से लायेंगे? अगली सर्दियो में पशुओं को क्या खिलायेंगे? यह बहुत बड़ी समस्या है। यही कारण है कि जब कल मंत्री महोदय ने कृषि मंत्रियों का सम्मेलन बुलाया था तो हमारे राज्य के कृषि मंत्री जी ने मजबूर होकर कहा था कि एफ.सी.आई. के गोदामों में जो अनाज भरा पड़ा है, जो शायद इन्सानों के खाने के लिये उपयोगी नहीं है, उसमें से १० लाख टन हिमाचल प्रदेश को देंगे तो कम से कम हम पशुओं के लिये चारे के रूप में दे सकेंगे। मेरे ख्याल से शायद किसी और प्रान्त ने यह मांग नहीं की होगी। उन्होंने यह मांग भी की थी कि बीज और दूसरे अन्य उपकरणों पर हमें सबसिडी किसानों को देनी है। यहां बात की गई कि ११३ हैंड पम्प्स लगेंगे…( व्यवधान)सभापति महोदय, मैं आपका संरक्षण चाहता हूं।
सभापति महोदय : क्या संरक्षण चाहते हैं।
श्री महेश्वर सिंह : सभापति महोदय, २७ वर्ष की राजनीति के बाद अपना नाम आप तक पहुंचाने के लिये कईयों का कृपा पात्र बनना पडता है और कोशिश करनी पड़ती है। कृपया मुझे २ मिनट का समय और दीजिये। हिमाचल प्रदेश में ५ लाख टन फल का उत्पादन होता है लेकिन इस वर्ष ३ लाख ३७हजार टन रह जायेगा। फल उत्पादन करने में कितना पैसा खर्च होता है, उसके विस्तार में नहीं जाना चाहूंगा लेकिन आप भली-भांति जानते हैं कि सावन के महीने में यह हालत है कि ट्रक पानी ढो कर लोगों तक पहुंचाने जा रहे हैं। पानी के रुाोत सूख गये हैं। पानी की विभाषिका पहले कभी देखने को नहीं मिली है। इसलिये मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि हिमाचल की ओर विशेष ध्यान दिया जाये। आज तो विज्ञान का युग है। एनवायर्नमेंटल चेंजेज क्यों आ रहे हैं, इसका उल्लेख कुछ माननीय सदस्यों ने यहां किया। इसका कारण वनों की कमी है। इसलिये जब पहाडों में बाढ़ आती है तो वहां तबाही मचती है। जब बादल फटते हैं तब भी तबाही होती है। इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिये। यह बात भी सही है कि वन महोत्सव मनाया जाता है लेकिन कागजों पर बताया जाता है कि इस वर्ष इतने पौधे लगाये गये लेकिन उन में से कितने पौधे सरवाइव कर गये, ये आंकड़े नहीं आते। रोपे गये पौधों में से कितने टिक पाये और उन से कितने वन तैयार हुये, इसका पता नहीं चलता है। इसलिये मेरा निवेदन है कि जहां वन महोत्सव पर करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं, वहां इस बात की भी समीक्षा होनी चाहिये कि रोपे गये पौधो में से कितने पौधे सरवाइव करते हैं। जो व्यक्ति वन विभाग में अच्छा काम करते हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिये और जो खराब काम करते हैं, उनके लिये दंड की व्यवस्था की जानी चाहिये।
सभापति महोदय, यह सत्य है कि सॉयल कंजर्वेशन एक्ट, १९८० में आया जिसका मूल उद्देश्य यह था कि यदि विकास कार्यों के लिये कहीं वन काटना आवश्यक हो जाय़े तो वन विभाग संबंधित विभाग को इतना पैसा दे दे कि उसके बदले में वह वन तैयार कर सके। यही नहीं, जितनी विद्युत परियोजनायें तैयार हो रही हैं, निजी क्षेत्र की कम्पनियां करोड़ों रुपया देती हैं ताकि जितने वन नष्ट होते हैं, उतने वन और लगाये जायें । लेकिन यह भी सत्यता है कि १९८० का एक्ट आज विकासात्मक कार्यों में हमारे लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है। चाहे वह प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना हो, चाहे कोई अन्य योजना हो, लेकिन जितना पैसा वन विभाग को दूसरे विभाग देते हैं, वह पैसा उसी डिवीजन में वन रोपण पर खर्च होना चाहिए। लेकिन वह पैसा उसमें खर्च न होकर कंसोलीडेटिड फंड में चला जाता है। फलस्वरूप वनों का जो कटान होता है, उसके बदले वन नहीं लग रहे हैं। इसलिए मैं मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहूंगा कि इस बात को सुनिश्चित किया जाए कि जहां भी किसी वन मंडल में कोई जंगल विकासात्मक कार्यों के लिए कटता है, उसके बदले में जो धन विभाग को मिलता है, वह धन उसी मंडल में वन रोपण पर लगाया जाए।
सभापति महोदय, यहां एक बात बार-बार राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा रिलीफ फंड के बारे में कही गई, उस पर मेरा कहना है कि उसमें भी समानता लाने की जरूरत है। जब कहीं पर राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा घोषित की जाती है, अगर वहां किसी व्यक्ति की जान चली गई तो उसे एक लाख रूपये मिलते हैं। लेकिन प्रदेश सरकारों के पास धनाभाव के कारण कहीं २५ हजार और कहीं ५० हजार रुपये मिलते हैं। यहीं नहीं आज अगर किसी की जान बच जाए और उसका सर्वस्व चला जाए तो उसे कुछ नहीं मिलता है। लेकिन अगर जान चली जाए तो ५० हजार रुपये मिलते हैं। इसलिए उस व्यक्ति को यह रिलीफ भी मिलना चाहिए।
अंत में, एक बात कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा कि यहां पर इस सदन के माननीय सदस्य श्री उमारेड्डी जी ने एक बात कही कि सरकार ने कहा है ऐसी प्रकार की आपदाओं से निपटने के लिए नेशनल कैलामिटी डिसास्टर मैनेजमैन्ट समति बनाई जायेगी, जितनी जल्दी इसका गठन हो, उतना अच्छा रहेगा। इस पर मेरा सुझाव है कि इस समति को इस प्रकार से अधिकार होने चाहिए जिस प्रकार से इलैक्शन कमीशन को होते हैं। सारे कर्मचारी राज्य सरकार के होते हैं, लेकिन इलैक्शन के दौरान एक पटवारी की, एक छोटे से छोटे कर्मचारी की जवाबदारी सीधे कमीशन की तरफ होती है और प्रान्तीय सरकारों के माध्यम से अगर कोई गलती करता है तो उसके खिलाफ कार्यवाही करने के इस प्रकार के अधिकार होने चाहिए, ताकि कोई भेदभाव न कर सके और यह कमेटी उन अधिकारों का उपयोग करते हुए इस बात को सुनिश्चित करे कि जो पात्र व्यक्ति है, उस तक ही रिलीफ पहुंचे।
अंत में, एक बात कहते हुए अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा कि जहां तक यह कहा जा रहा है कर्जा माफ किया जाए। आपको इस बात का अनुभव है कि पहले भी एक बार दस हजार रुपये तक के किसानों के कर्जे माफ किये गये थे। लेकिन कुछ लोगों ने क्या शरारत की कि सरकार ने घोषणा कर दी, सरकार ने यह कहा कि जो व्यक्ति किस्त दे गये, वे देने में सक्षम है, उनसे पूरा पैसा वसूल लिया गया। लेकिन जो चालाक लोग थे, जिन्होंने एक भी किस्त नहीं दी, उनके कर्ज माफ कर दिये। इसलिए यदि आप माफ करने की स्थिति में हैं तो या तो आप उन लोगों के भी कर्जे माफ करिये, जिन्होंने किस्त दी हैं। अन्यथा यही होगा कि जो चालाक और चुस्त लोग हैं, वे सारा का सारा कर्ज माफ कराकर बैठ जायेंगे और जो ईमानदारी से सरकार को ऋण वापिस देना चाहते हैं, वे भुगतेंगे। यदि आप ऐसा कर दें तो उचित रहेगा। या तो सबके माफ करने हैं तो ठीक है, अगर ये माफ नहीं हो सकते हैं तो कम से कम उसके ऊपर ब्याज को समाप्त किया जाए, ताकि वे लोग मूलधन लौटा सकें। इसके साथ ही मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं।
सभापति महोदय : श्री रमेश चंद तोमर, माननीय सदस्य के भाषण को प्रोसीडिंग का पार्ट बनाया जाए।
* डॉ० रमेश चंद तोमर (हापुड़ ): माननीय सभापति जी, मुझे सूखे के संबंध में अपने विचार व्यक्त करने का आपने मौका दिया। मैं आपका आभारी हूं। यह संसद का मानसून सत्र है, पर देश से मानसून गायब है। वर्षा न होने के कारण पूरे देश में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गयी है।
सभापति जी, हम सभी जानते हैं कि भारतवर्ष एक कृषि प्रधान देश है। देश की ७० फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। आज हमारे देश का किसान परम्परागत श्रोतों पर निर्भर है, जिसमें वर्षा का जल सबसे प्रमुख है। नियमित वर्षा न होने के कारण पूरे देश में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। मानसून की देरी से समूचा उत्तर भारत सूखे की चपेट में आ गया है। उत्तर प्रदेश, म०प्र०, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली और पंजाब में वर्षा न होने के कारण न केवल वहां का किसान बल्कि बढ़ते तापमान से आम आदमी भी परेशान है। आम जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। धान की बुवाई रूक गयी है।
सभापति जी, आषाढ़ का महीना खत्म हो गया है लेकिन वर्षा के नाम पर अभी तक कुछ हासिल नही हुआ है। खेत सूखे हैं, किसान हाथ पर हाथ रखकर बैठा है। वर्षा न होने के कारण धान की फसल पिछड़ रही है। कृषि मंत्रालय के राष्ट्रीय फसल भविष्यवाणी केन्द्र के मुताबिक देश में ४०६ लाख हैक्टेयर क्षेत्र में धान की की बुवाई की जाती है, किंतु इस साल आ तक सिर्फ २० लाख हैक्टेयर क्षेत्र में धान की बुवाई हो पायी है।
माननीय सभापति जी, मानसून की देरी से सबसे बड़ा झटका मोटे अनाज के उत्पादन को लगता नजर आ रहा है। देश में इस साल जून के अंत तक ४.१८ लाख हैक्टेयर क्षेत्र में मोटे अनाज की बुवाई हुयी है जबकि पिछले साल इसी समय में १०.१२ लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुयी थी। यह इस बात को प्रकट करता है कि पानी की कमी के कारण, वर्षा न होने के कारण हय जबरदस्त अंतर आया है। यह इस बात का भी संकेत देता हे कि अगर यही स्थिति बनी रही तो तो भविष्य में इसके भयंकर परिणाम दिखायी देंगे। इस बात की कल्पना करके डर लगता है कि क्या होने वाला है।
माननीय सभापति जी, जब हम मौसम विज्ञान के संदर्भ में विचार करते हैं और मौसम के बारे में सामान्य रूप से जानकारी प्रदान करते रहते हैं। उनकी यह जानकारी देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। मौसम विभाग ने अब तक जो भविष्यवाणी की है, उनमें से ज्यादातर गलत साबित हुयी है। ऐसे में हमें ध्यान आता है घाघ का। घाघ बहुत बड़े मौसम विज्ञानी थे। पर्यावरण के संबंध में उनकी कवितायें बड़ी प्रचलित हैं और उनमें से ९० प्रतिशत से ज्यादा सही साबित होती हैं। उनकी एक कहावत है, जिसको हमने देखा है और आप भी अगर आंकलन करें तो सही साबित होगी। उनका कहना है कि:-
दिन को बद्दर, रात निबद्दर, बहे पुरवइया झब्बर-झब्बर, घाघ कहें हम होय वियोगी, कुआं खोदकर धोयें धोबी।
अर्थात दिन में बदली हो, रात में मौसम साफ हो तथा पुरवाइया चलती है तो आम किसान बड़ा चिंतित हो जाता है कि आगे आने वाले समय में अकाल पड़ने वाला है तथा सूखा होने वाला है। इसी के आधार पर किसान अपनी फसल बोता था तथा अपनी फसल के बारे में सुनिश्चित दिशा निर्धारित करता था। इसी में घाघ ने यह भी कहा है कि बरसात कब होती है। घाघ की सोच पर्यावरण संबंधी जयादा थी इसलिए उन्होंने यह कहते हुए संकेत दिया है क घेले ऊपर चील जो बोले, गली-गली में पानी डोले।
अर्थात जो चील पक्षी है वो किसान के खेत की मिट्टी के धुहे पर बैठकर जब बोलती है तो यह समझना चाहिए कि जबरदस्त वर्षा होने वाली है। इसी प्रकार जब वृक्ष पर गिरगिट चलता है तो उसके बारे में कहा जाता है क उल्टे गिरगिट ऊंचे चढ़े, वर्षा होय भूमिजल बुढै।
अर्थात अगर वृक्ष पर गिरगिट पीछे से ऊपर चढ़ता है तो समझना चाहिए कि जबरदस्त वर्षा होगी और यह हमेशा सच होता है। आज भी गांव के लोग इस बात का आकलन करते हुए कहते हैं कि यह होने वाला है। पर्यावरण विज्ञानी घाघ लोक भाषा के माध्यम से गांववासियों को मौसम के बारे में योग्य जानकारी देते रहे। अगर उसका समुचित तौर पर सदुपयोग किया गया होता तो आज ऐसी हालत न होती। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि मौसम विज्ञान के लोग यह घोषणा करते रहे कि मानसून आने वाला है - मानसून आने वाला है लेकिन मानसून नहीं आया और कम वर्षा होने के कारण पूरा उत्तरी भारत सूखे का शिकार हुआ।
म०प्र० में सूखे की स्थिति और भी बद्तर है। बारिश न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट उत्पन्न हो गया है। भोपाल में जल संकट की गंभीरता का अंदाजा बड़ी झील के पास पहुंचने से हर किसी को हो जाता है। जिस मजार पर पहुंचने के लिए नाव पर जाना पड़ता था वह सूख कर पर्यटन स्थल का रूप ले चुकी है। भोपाल में इस बार जून में ११४ मि०मी० बारिश हुयी है जबकि पिछले साल इसी जून में २७६ मि०मी० बारिश हुयी थी। भोपाल के जल रुाोत, बड़े तालाब और गोलाब बांध का जलस्तर नीचे पहुंचने के कारण पेयजल संकट उत्पन्न हो गया है।
माननीय सभापति जी, मैं उ०प्र० से सांसद हूं१ उ०प्र० के पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड समेत ४८ जिले सूखे की चपेट में हैं, जिसमें ४० जिलों में सामान्य से कम बारिश हुयी हे और ८ जिलों में सामान्य वर्षा हुयी है। कम वर्षा होने के कारण जानवरों के चारे और पानी की समस्या उत्पन्न हो गयी है। उ०प्र० में न केवल धान बल्कि ७५ फीसदी खरीफ की फसल नष्ट हो गयी है और ७० फीसदी खेती का कार्य ठप्प हो गया है।
सभापति महोदय, उ०प्र० की स्थिति बड़ी भयावह है। जालौन में १०० फीसदी फसल नष्ट हो गयी है। आगरा में ९६ फीसदी फसल की बुवाई नहीं हुयी है। बुंदेलखंड सर्वाधिक संकट में है। हमीरपुर में ९० तथा महोबा में ८४ फीसदी फसल नष्ट हो गयी है। पूवार्ंचल की स्थिति भयावह है। पूरे उ०प्र० में हाहाकार मचा हुआ है। स्वयं कृषि मंत्री जी ने २० जुलाई को लखनऊ में यह स्वीकार किया है कि पूरा उ०प्र० सूखे की चपेट में है और सूखाग्रस्त घोषित होना चाहिए। लेकिन उ०प्र० सरकार ने केवल १५ जिलों को ही सूखाग्रस्त घोषित किया है। पूरे पश्चिमी उ०प्र० में बारिश नहीं हुयी है लेकिन पश्चिमी उ०प्र० के सिर्फ तीन जिले सूखाग्रस्त घोषित किये हैं, जिससे लगता है कि सूखाग्रस्त करने में भी राजनीति हो रही है।
माननीय सभापति जी, बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि पूरा उ०प्र० सूखे की चपेट में है तथा हाहाकार मचा हुआ है पर वहां के अधिकारी सूखे से निपटने में लापरवाही बरत रहे हैं। अभी तक जिलों से प्रदेश सरकार को सूखे की रिपोर्ट नहीं भेजी गयी है, जिससे प्रदेश सरकार कोई कार्यवाही नहीं कर सकी है। मेरा मानना है कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए। मैं माननीय कृषि मंत्री जी से यह अनुरोध करूंगा कि अपने प्रभाव का उपयोग करके पूरे उ०प्र० को सूखाग्रस्त घोषित करायें और किसानों से सभी वसूलियां स्थगित करायें।
सभापति जी, उ०प्र० में सूखे से हाहाकार मचा हुआ है। बुंदेलखंड में ६५ फीसदी कम वर्षा हुयी है। पश्चिमी उ०प्र० में ५५ फीसदी और मध्य उत्तर प्रदेश में ५१ प्रतिशत कम वर्षा हुयी है। केन्द्रीय भू-जल बोर्ड और उ०प्र० के भूमिगत जल विभाग के एक सर्वेक्षण के अनुसार उ०प्र० के ७० जिलों में से २९ जिलों के भूमिगत जलस्तर में काफी कमी आयी है तथा यह काफी नीचे चला गया है। इन २९ जिलों में से १३ जिलों की हालत अत्यंत गंभीर है, उनमें गाजियाबाद व मेरठ शामिल है। हैंडपम्प खराब पड़े हैं तथा नलकूप सूख गये हैं। इन जिलों में पेयजल संकट पैदा हो गया है तथा जानवर पानी व चारे के लिए तड़प रहे हैं। सरकार को स्थिति से निपटने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
सभापति महोदय, उत्तरी भारत के ५ राज्यों में मवेशी सूखे से तड़प रहे हैं। जंगलों में पशु व जानवरों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सूखे के कारण अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ेगा। उ०प्र०, राजस्थान और पंजाब, जिसमें कृषि उत्पादन ज्यादा होता है, उस पर भी असर पड़ेगा। पिछले वित्त वर्ष में काफी नाजुक स्थिति होने के बावजूद अर्थव्यवस्था में ५.४ प्रतिशत की वृद्धि हुयी थी। इसका मुख्य कारण बेहतर कृषि उत्पादन था। मानसून की देरी के कारण न केवल कृषि पर बल्कि कृषि आधारित उद्योगों पर भी असर पड़ेगा।
माननीय सभापति जी, पिछले साल इसी मानसून सत्र में सदन में बाढ़ की विभीषिका पर चर्चा हुयी थी। इस बार सूखे की स्थिति पर चर्चा हो रही है। सूखे पर चर्चा हो, या बाढ़ पर चर्चा हो, माननीय सदस्य कुछ सुझाव देकर सरकार की आलोचना करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और तसल्ली कर लेते हैं। मेरा मानना है कि इससे काम चलने वाला नहीं है। सूखे और बाढ़ की स्थिति जैसी समस्याओं से निबटने के लिए स्थायी रणनीति बनायी जानी चाहिए।
सभापति महोदय, मेरा सरकार से आग्रह है कि सूखे से निबटने के लिए दो तरह की रणनीति बनायी जाये। एक दीर्घकालिक और दूसरी अल्पकालिक। दीर्घकालिक रणनीति के तहत सरकार को देश की सभी बड़ी नदियों को जोड़ने के लिए प्रसिद्ध दस्तूर योजना पर पुनर्विचार करना चाहिए। लेकिन सरकार ने इसे बहुत खर्चीली कहकर खारिज कर दिया था। मेरा विचार है कि आज हजारों करोड़ रूपये खर्च करके सूखे और बाढ़ के प्रकोप से मुक्ति पायी जा सके, तो यह मंहगा सौदा नहीं है क्योंकि हर साल सरकार सूखे और बाढ़ के निदान के लिए हजारों करोड़ों रूपये खर्च कर देती है। शुरूआत में हम कुछ गिनीचुनी नदियों को जोड़कर प्रयोग करें।
महोदय, मेरा दूसरा सुझाव है कि सूखे से निपटने के लिए केन्द्र में एक स्थायी मशीनरी स्थापित की जाये। केन्द्रीय सूखा आयोग या प्रधिकरण जैसा स्थायी संगठन बनाया जाये, जो सूखे और बाढ़ की स्थिति पर बराबर नजर रखे और उससे निपटने के लिए कारगर कदम उठाये।
माननीय सभापति जी, जब सूखे की स्थिति पैदा होती है। तो किसान की फसल भी नष्ट हो जाती है और खेती का कार्य भी ठप्प हो जाता है। खेतों में कार्य करने वाले करोड़ों मजदूर बेकार हो जाते हैं तथा उन्हें भुख्मरी का सामना करना पड़ता है। अत: उनकी परेशानी तुरंत दूर करने के लिए अल्पकालिक उपाय किये जायें। उनमें सरकार द्वारा चलाये जा रहे वभिन्न कार्यक्रम जैसे सूखा राहत योजना, काम के बदले अनाज योजना के जरिये उनको लाभ दिया जाये।
सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद।
। च्द्रड्ढड्ढहण् ध्रठ्ठ ठ्ठत्ड्ड द्ृद ण्ड्ढ ठ्ठडथ्ड्ढ द्ृढ ण्ड्ढ द्ृद्वड्ढ.
श्री तिलकधारी प्रसाद सिंह (कोडरमा): सभापति महोदय, ड्राउट और फ्लड के बारे में जब भी सदन में चर्चा प्रारंभ होती है, निश्चित रूप से किसानों की समस्याओं पर चर्चा होती है और सरकार भी जवाब दे देती है। लेकिन इतनी बार जवाब देने के बाद अभी तक इस समस्या का निदान नहीं हो पाया है। मैं अधिक न बोलते हुए इतना कहना चाहता हूं।…( व्यवधान)
श्री किरीट सोमैया: सभापति महोदय, श्री जितेन्द्र रेड्डी अपना लखित भाषण सबमिट करना चाहते हैं।
श्री ए.पी.जितेन्द्र रेड्डी (महबूबनगर): सर, मैं अपनी स्पीच ले नहीं करूंगा, मैं इसे पढूंगा।
सभापति महोदय : आप सदन का समय नष्ट मत कीजिए।
श्री तिलकधारी प्रसाद सिंह :सभापति महोदय, जो पहले निर्णय लिये गये थे, मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि यहां सदन में किसानों के लिए बड़ी-बड़ी करोड़ों रुपये की योजनाएं लाई गईं, लेकिन वे योजनाएं पूरी नहीं हो पाई। सारे देश में बाढ़ और सुखाड़ की समस्या पैदा हो गई है। मैं झारखंड के बारे में कहना चाहता हूं कि उसके बारे में सरकारी सूचना नहीं दी गई है जबकि झारखंड राज्य के २२ जिलों में वर्षा के अभाव के कारण धान की रोपनी नहीं हो पाई है। वहां आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। वहां दलहन और तिलहन की भी बुआई नहीं हो पाई है। निश्चित रूप से सरकार को उसकी रिपोर्ट राज्य सरकार से मंगाकर देखना चाहिए।
मैं किसानों के बारे में कह रहा था कि सरकार की कई योजनाएँ पहले से चल रही हैं, जैसे किसान को ऋण देने की व्यवस्था बैंकों से की गई है लेकिन आप देखें तो कोई भी बैंक किसानों को ऋण नहीं देता है और किसान उस ऋण से वंचित रह जाते हैं। पिछली सरकारों ने १०००० रुपये किसानों के ऋण माफी की घोषणा की। किसान समझा कि ऋण माफ हो गया पर ऋण क्या माफ हुआ? अभी सूद सहित ५०००० रुपये का वारंट उस पर आ गया है। मंत्री जी इसकी समीक्षा करें और जो घोषणा सरकार ने की उसको पूरा करे क्योंकि किसान इससे प्रभावित हो रहे हैं। जो उन पर सूद की रकम है कम से कम उसको ही माफ करने की कोशिश करें।
ग्रामीण क्षेत्रों में जलापूर्ति की अनेक योजनाएँ हैं। गांवों में पेयजल की समस्या के लिए जितनी योजनाएं सरकार द्वारा चलाई गई हैं, अभी तक कहीं कारगर ढंग से काम नहीं हो रहा है। मेरा सुझाव है कि कम से कम उस पैसे का थोड़ा अंश हैन्डपंप पर लगाने के लिए दे दें ताकि कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की व्यवस्था हो सके। एक बात मैं और सिंचाई से संबंधित कहना चाहता हूँ। जो बड़ी बड़ी योजनाएँ पेन्िंडग हैं, मेरे झारखंड क्षेत्र में भी कोइलकारो, केसो, पेचखेरो योजनाएँ हैं। इसके अलावा कोनार डैम की स्कीम पेन्िंडग है। उससे भी किसानों को लाभ नहीं हो रहा है। मैं कहना चाहता हूँ कि छोटे-छोटे चैक डैम और कुएं बनाएँ। अगर ऐसा करेंगे तो तत्काल लाभ होगा। बांध बनेगा १०-२० सालों में। अभी पुराने नहीं बन पाए, नए कहां बनेंगे? बीच में जंगल डिपार्टमेंट से और कई तरह की समस्याएँ आती हैं। छोटी स्कीमों में समस्याएँ कम उत्पन्न होती हैं।
मैं आपके माध्यम से एक बात और कहना चाहता हूं जिससे किसानों की समस्या का निदान हो सकता है। आपने किसानो के लिए क्रैडिट कार्ड बनाए हैं और ऋण देने की व्यवस्था कर दी। आप उसको देखने की कोशिश करें कि जो घोषणा की गई क्या वह इंप्लीमेंट हो रही है? कागजों पर ही सब रिपोर्ट सही होती हैं पर हम लोग जब जिले में जाकर समीक्षा करते हैं तो कहीं कोई बात नहीं होती। इस देश को मंत्री जी से बहुत उम्मीद है। आप सांसदों और अधिकारियों को उनके क्षेत्र में भेजें कि इसको चैक करें। अगर लाभ नहीं हो रहा है तो ऐसी स्कीम्स का क्या फायदा है? क्रैडिट कार्ड और फसल बीमा योजनाएँ कारगर नहीं हो पा रही हैं। आप इसकी जांच कराएं कि कहां व्यवस्था में कमी है।
अंत में मैं कहना चाहता हूँ कि जो मौसम विभाग है, उसके चलते सारा देश भ्रमित हो गया कि आज वर्षा होगी कल वर्षा होगी। किसानों ने बीज लगा दिये। वर्षा नहीं हुई और सब बीज सूख गए, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति हुई। इसकी भी आप जांच कराएँ कि किस तरह से मौसम विभाग के लोग गलत रिपोर्टिंग करते हैं।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
SHRI A.P. JITHENDER REDDY (MAHABUBNAGAR): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity. I thought that you will never give me the opportunity to speak because everybody was telling me to lay my papers on the Table but I did not do that. I am sitting since 12 o’clock to talk about drought situation. My wife is waiting for me to go to a party.
Sir, today we are discussing the drought situation. We come from the Telangana region of Andhra Pradesh. We can never get floods there.
As you know, the Irrigation Commission in 1972 had adopted the following criteria for identifying drought-affected areas in the country. The annual rainfall is less than normal in twenty years, out of the total number of years examined, and less than 20 per cent of the cultivated area is irrigated. So, unfortunately in the Telangana region since 1901 till now we have never met this criterion. Every time it is less than what has been laid down by the Government. The rainfall has come down from 650 m.m. to 530 m.m. and there is always a drought situation in the Telangana region.
Even though the water level under the ground has come down from three metres to 30 metres, as you know, in Andhra Pradesh 80 per cent people still live on agriculture. They are poor farmers; they have no other way to go. Every year they anticipate that there would be a very good rainfall. They go to the banks, take loans, plough their fields, sow the seeds and wait for the rains. But every year there is a failure and these people accumulate even the interest payment year after year. All the agriculturists are having a bad time there. But this is the only profession that they can engage themselves in. Since ages from the times of their forefathers they have been living with agriculture as their profession and they cannot leave it.
Some people tried to divert their profession after our Chief Minister, Shri Chandrababu Naidu took the State in the hi-tech way. We have also started exporting a lot of software from Andhra Pradesh. Unfortunately, after the 11th September, bad times set in as the exporting of software got stopped. Farmers who struggled to educate their children in order to take them out of agricultural profession as they were not getting anything from it and made them software engineers met with failure here also because their children have again become a burden on them.
Therefore, some measures will have to be taken to see that this drought situation is really eliminated forever. Many relief measures have been taken. Each and every time the Government comes out with some relief measures. The latest one is ‘food for work’. The Central Government comes up with a scheme; we, the Members of Parliament, sitting so late in the Parliament, try to make some policies to give something to the States. Andhra Pradesh is number-one State in taking any scheme from the Centre. But the question is whether they are implementing it also. As you are aware, under the ‘food for work’ programme, Andhra Pradesh lifted 30 lakh tonnes of foodgrains and claimed that they are number-one in lifting so much quantity of foodgrain. But it has never reached the poor agriculturists. I demand that there should be a Central Committee. We have been telling that the Central Committee should come down to the States and assess the situation. The earlier Rural Development Minister Shri M. Venkaiah Naidu was in the process of getting an accountability test done. He was saying that in each and every village there should be a board kept at a public place wherein the scheme currently being undertaken should be specified, the amount received by the village should be mentioned on the board; and how much money has been distributed under the scheme should also be written on the board. But this kind of accountability test has not been there till date.
Coming back to the problems being faced in my own constituency, Mehboobnagar, it is the largest district in the Telangana region with a total of 18.4 lakh hectares.
Sir, I have two rivers, one is Tungabhadra and the other is Krishna, going through my constituency. These two rivers cross my constituency for 275 kilometres. But unfortunately we cannot even use 17 TMC of water. Sir, 811 TMC of water go through my constituency. It goes up to Srisailam and Prakasam. But we cannot even use 17 TMC of water because we do not have storage tank. The National Water Policy says that first Krishna basin should be utilised. But unfortunately there are no reservoirs in my district. All the irrigation projects are pending. We have given so many representations. All the farmers came here and met even the Prime Minister, but nothing has happened. I would request the Water Resources Minister to please go through the Mahboobnagar irrigation projects because that is the entry from where Krishna enters into Mahboobnagar district from Karnataka. Then it goes up to Vijayawada. There we do not have any projects done.
There is no drinking water. Whenever we go into the constituencies, driving our cars, we can see the colourful vessels made by companies. They are all kept in a line near the tap. They expect that they will get some water from the tap. Whenever we go to the villages we feel shy to ask for a glass of water because we ourselves see a line which is a kilometre long near the tap.
I would request the Water Resources Ministry to come to the rescue of irrigation projects. It should come out with the relief measures. Whatever allocation is made to the States should be monitored properly. It has to be ensured that the end user gets it. It is not enough if the papers say that such and such State has picked up so much. We should see where it has gone; into whose pocket it has gone into.
We have modern technology. We are going in for so many things. As Shrimati Sudha Yadav said, we are trying to lay a pipeline from Oman to India for crude oil. We are trying to lay a pipeline between Iraq and India. Why can we not go in for latest technology in this matter also? I do understand the difficulties. When I was abroad for 25 years, when there was no rain, they used silver oxide in the clouds to get artificial rains. They used to get artificial rains so that it could be used for at least drinking purposes. The ground water level also could come up. I would request the Agriculture Minister to please see how latest technology could be used in order to rescue this drought-hit country. Thank you very much for this opportunity given to me.
I also would like to lay my speech on the Table, Sir, as Shri Kirit Somaiya wanted to do.
सभापति महोदय : जब इन्होंने अपना भाषण दे दिया है तो फिर अपने भाषण को दुबारा ले करने की क्या जरूरत है।
SARDAR SIMRANJIT SINGH MANN (SANGRUR): Mr. Chairman, Sir, thank you very much for giving me this opportunity to speak on the drought and flood situation in the country. The monsoon very frequently has played truant with the country. It has devastated the Punjab State which is the food bowl and granary of India. The situation in Punjab is so bad that horticulture has failed and milch cattle are dying. Farmers, seeing that they cannot feed the cattle, are selling their cattle to slaughter houses and butchers of Saharanpur. The forest land is also drying up. Wildlife without the water holes in the forest is dying. Basmati rice has not been sown, which is the main cash earner and foreign exchange earner.
Dairy farming has also been finished. Citrus fruit is falling off the trees. The Punjab farmer feels so ruined that he is committing suicide. What solutions can we offer him? Punjab cannot do anything to ameliorate the conditions of the farmers. Let the Central Government cooperate in this matter with us. From 1947, the country has followed an impractical and unproductive foreign policy with the Islamic States with the result that our borders to the Islamic countries at Wagah and Hussainiwala in Punjab are consistently closed. We cannot trade our agricultural goods for the natural gas of Pakistan and its electricity that we can import. If the borders are open, we can sell our agricultural products to the Islamic countries and the Central Asian Republics.
The Defence Policy also has some deficiencies because of lack of coherence in the foreign policy. Our farmers have been facing a drought-like situation for the last eight months since the Indian Army was deployed on the borders of Punjab. Our three border districts Amritsar, Gurdaspur and Ferozpur have agricultural lands and they have been occupied by the Indian Army. It does not allow them to grow crops. Paddy cultivation has been stopped. The land mines that have been laid on the border hinder farming operations in Punjab. The BSF does not allow the farmers to till the land at the Zero Line. We need compensation for this. The Indus Water Treaty that was signed years ago gave unfettered powers to Pakistan to take the waters of the three rivers – the Indus, the Jhelum and the Chenab. But the river waters of Ravi, Beas and Sutlej which form a part of the India’s Punjab seep into Pakistan. We need Central Assistance to build dams and reservoirs on these rivers so that we can preserve the flood waters and not allow them to go into Pakistan. They can be used within Punjab and the surplus waters can be given. At present, waters going into Rajasthan and Haryana from Punjab are not in accordance with the Constitution of India.
Under the guise of drought conditions, there have been suggestions made in this House that the Constitutional arrangement that waters are a State subject should be put on the Concurrent List. We do not want any tampering with the Constitution. We are against the changing of the riparian principle in favour of other States. We do not have enough water for our own State. So, we cannot give it to any other neighbouring State. Therefore, we do not stand for a change in the Constitution. Waters are a State subject. We want the waters to remain a State subject.
The farmer needs loans for boring of his wells because the water table has shrunk. Moreover, we want the Central Government to waive off all the loans of the farmers just as it has waived off the loan of the industrialists. Till the time the loans cannot be waived, repayment of loans should be suspended.
The question before Punjab is about having more power. We do not have hydro-electricity. We do not have coal reserves. So, we need atomic power, atomic power stations to power the Power Grids. Just in the Europe, we need more atomic power for the survival of Punjab’s agricultural economy.
Sir, we have a river called Ghaggar, which forms the boundary between Haryana and Punjab. Every year it floods thousands of acres of Haryana and Punjab. We want Central assistance to tame and harness this river, which is called the sorrow of not only Punjab but also that of Haryana.
Sir, in my short speech I would like to say that I represent the entire strength of the Akali Dal. We find that the Agriculture Minister is working hard. He should try and get the Army out of the border from Punjab so that our economy does not suffer because we want open borders with Pakistan and trade with the Islamic and Central Asian countries.
श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव): सभापति महोदय, सदन में नियम १९३ के अन्तर्गत सूखे और बाढ़ के बारे में बहस हो रही है। इस पर मुझे आपने बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
जुलाई महीने में महाराष्ट्र में ठाणे जिले में दहानू में एक दर्द भरी घटना हो गई। वहां एक दिन में ७५ मिलीमीटर वर्षा हो गई, जिससे जीवन अस्त-व्यस्त हो गया, करोड़ों रुपये की आर्थिक हानि हो गई और मनुष्य हानि भी हो गई। वर्षा और समुद्र ने विकराल रुप धारण किया, जिससे खेती को और मकानों को नुकसान हो गया। आदिम जाति के लोगों का ज्यादा नुकसान हो गया। महाराष्ट्र सरकार ने नुकसान की जो भरपाई दी है, जो मदद मिली है, मेरी आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी और अर्थ मंत्री जी को विनती है कि यहां से केन्द्रीय कमेटी भेजकर वहां ज्यादा से ज्यादा मदद दी जाये।
बाढ़ और सूखा निसर्ग आपदा तो हैं, लेकिन सरकार निर्मित और मानव निर्मित भी हैं। जो वर्षा भूमि पर गिरती है, उसका पानी बहकर समुद्र में चला जाता है। इस पानी को बांधकर खेती के लिए और बिजली के लिए उपयोगी बनाने के लिए सोचना जरूरी है। सदन में सम्माननीय बालासाहेब विखे पाटिल जी बैठे हैं, उनकी अध्यक्षता में सिंचाई की एक कमेटी बनी थी तो उन्होंने मुझे उसका एक सभासद बनाया था। उन्होंने उसमें बहुत अच्छे सुझाव दिये थे कि नासिक जिले में जो पश्चिमवाहिनी नदी है, उसे पूर्ववाहिनी करना जरूरी है, जिसका सारा पानी समुद्र में चला जाता है। उससे कुछ नहीं होता, इसलिए उन्होंने बहुत अच्छे तरह से सुझाव दिये थे। इन सुझावों के बारे में महाराष्ट्र सरकार ने कुछ योजना बनाई है, लेकिन पैसे की कमी के चलते यह सुझाव वैसे ही पड़ा है। मेरी मंत्री महोदय से और भारत सरकार से विनती है कि इस योजना के बारे में ज्यादा से ज्यादा पैसा देने के बारे में सोचना चाहिए। मैं आपको याद दिलाता हूं, सम्माननीय हुक्मदेव नारायण यादव जी यहां बैठे हैं, मोरारजी भाई ने एक-एक खासदार को बुलाया था और पूछा था कि आपको क्या चाहिए, आपकी क्या मांग है। मैंने मांग की थी कि सिंचाई के पानी के बारे में एक मांग थी, आदिम जाति के आई.ए.एस. अधिकारी और महाराष्ट्र के अधिकारी कम होते हैं, इसके लिए नासिक में एक कोर्स खोलना चाहिए। सब बोलते हैं कि जंगल कटते जा रहे हैं, इसलिए वन विकास महामंडल सरकार ने तय किया था। सारे जंगल काटने के लिए बारे में हमने कहा था। हमारी ये तीन ही मांगें थीं। उन्होंने जल्दी से जल्दी यह पता करने के लिए सुरजीत सिंह बरनाला जी को नासिक जिले में भेज दिया कि वहां क्या है, क्या नहीं है और सिंचाई के लिए मेरे निर्वाचन क्षेत्र में ५५ छोटे-मोटे बांध बांध दिये।
23.00 hrs. आज भी महाराष्ट्र से जो सब्जी बाहर जाती है, उसमें मेरे क्षेत्र का पहला नम्बर है। मोरारजी भाई हमेशा कहते थे कि काम नहीं रुकना चाहिए। पैसा जल्द देना चाहिए और योजना पर तुरंत काम होना चाहिए। इसी सोच के चलते हमारे यहां पीने का पानी मिला, खेती के लिए पानी मिला। यहीं पर मोरारजी भाई बैठा करते थे। एक दिन उन्होंने कहा कि उत्तर भारत की गंगा और दक्षिण की नदियों का पानी मैं सूखाग्रस्त इलाकों में पहुंचाने की व्यवस्था कराऊंगा, जिससे वहां पानी की समस्या न रहे। तब एक सदस्य ने कहा था कि पैसा कहां से आएगा। इस पर उन्होंने जवाब दिया था कि मोरारजी भाई हैं तो पैसे की कमी नहीं है। वह सरकार चली गई और योजनाएं भी चली गईं। मेरी प्रार्थना है कि इस बारे में हमें सोचने की जरूरत है।
महाराष्ट्र में ३६ जिले हैं। २००० में ३३ जिले सूखे की चपेट में थे, लेकिन चालू वर्ष में सब जिले सूखे की चपेट में हैं। मेरा क्षेत्र नासिक जिला है, वहां १५ तहसीलें हैं। वहां एक दिन भी बारिश नहीं हुई है। पहले जो हो गई, सो हो गई। वहां के किसानों ने फसल बो दी, लेकिन वह उगी नहीं और सारी फसल सूखे की चपेट में आ गई। वहां पीने का पानी नहीं है, जानवरों को चारा नहीं है। किसान बहुत परेशान है। मेरी विनती है कि यहां से जल्द ही एक टीम वहां भेजी जाए। वह टीम महाराष्ट्र में और नासिक में जाकर हालात का जायजा ले।
समुद्र में हमारा बहुत सा पानी चला जाता है। वह न पीने के काम आता है और न सिंचाई के काम आता है। हमें कुछ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि यह पानी पीने के लिए लोगों को मिले और खेती के भी काम आ सके।
SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Sir, I thank you for giving me this opportunity. I would not take more than five minutes. There are only four or five points that I want to mention before this august House. Our hon. Minister belongs to the farming community. He has to take some drastic steps to protect the interests of the farmers in this country. We are all with him on this particular issue. Irrespective of party affiliations, the entire Parliament and the country are with him. He has to do some reformation to protect the farmers of this country.
How would it be done? I would like to suggest something. The global weather is increasing the heat by two to three degrees Celsius because of pollution from factories, petrol and diesel. What is the remedy for this problem? The solution lies in growing more trees. In Kannada, there is a saying:
If there is a tree, there is rain. If there is rain, there is a crop. If there is a crop, we have food.
How are we to grow more trees? I would like to inform the hon. Minister that in my State, Karnataka, more than 50 priests belonging to different religions – Fathers from various Churches and Maulvis from Masjids – would be meeting together under the Chairmanship of Sri Sri Bal Gangadhar Swamiji of the Adi Chunchana Giri Math.
They have formed a Committee - the total population of Karnataka is 5.5 crore – and have decided to plant 5.5 crore trees. They have chalked out a programme in this regard. They have also asked some money from the MPLAD Fund Scheme. Now, they have decided and already started the work in this regard. They have to complete this programme in Karnataka and then they will coordinate with other States also.
So, my submission to the hon. Minister is, why not find a way out to have such programmes in the whole country. We have a population of 100 crore. We can take the help of educational institutions and various departments to achieve our targets. The hon. Minister can chalk out a five-year programme and within this period we can have around 100 crore trees planted in the country. If he makes up his mind, it will be easy and that will save the country from drought. But we have to find a way out.
The next important issue is how to control the floods. Floods cans be controlled by linking all the major rivers, like Ganga with Cauvery or Mahanadi with Cauvery. This way you can give water to the whole country and we can see the dream of Mahatma Gandhi fulfilled that food and shelter be given to the last person of the country.
We cannot give jobs to all the hundred crore people of this country at present. The NDA Government has announced creation of one crore jobs every year, but I do not think they will achieve this target. If you can achieve, we will welcome the efforts taken by the Government, but we have to solve the other acute problems, like food, unemployment, that the country is facing. We have to ensure that everybody gets shelter, everybody gets employment, everybody gets food in this country. Of course, it involves a huge expenditure but we have to ensure that for every citizen of the country. I think, under the hon. Minister’s leadership we can achieve some of the targets.
The hon. Minister of Agriculture belongs to a family which belongs to farming community. His father has done remarkable work for theKisans of this country. We can never forget his achievements and his contribution to this country. What to talk of our generation, nobody can forget what Ch. Charan Singh has done for this country. The hon. Minister has to do the same thing for the farming community. It may involve huge funds but we have no other way out and before spending so much of money, we need to have a comprehensive plan. Linking of various rivers should also be considered in that plan. That will solve most of the problems of the country. I think, the hon. Minister has taken a note of it.
Crop insurance is another important thing that needs our consideration. We have to involve the farming community and have to see that compulsory crop insurance must be there. There should be uniform electricity price in all the States. For that you have to give encouragement to hydroelectric projects and there should be equal power distribution to all the States and every farmer should have a price limitation, otherwise it will be difficult for his survival.
I must congratulate the Government for giving a minimum support price to the farmers. With the help of the support price for so many crops in Karnataka announced last year, lakhs of people belonging to farming community survived. We can never forget that. Otherwise, they could not have sold their produce in the market. The price as well has also stabilised in the market. I would request the hon. Minister to double the amount to be allocated in the Budget for support price in the interest of the farming community.
These are some of the important points which I have placed before the hon. Minister and this august House and I think the hon. Minister have made a note of them. I have also prepared a note on some of the problems being faced by the farming community and some issues relating to droughts and floods. With the permission of the hon. Chairman, I would like to lay it on the Table of the House.
* Sir, the country is moving through a phase of serious drought situation. Seventy per cent of the area has not received any rainfall so far. Monsoon is coming to an end, so far farmers are unable to complete the sowing process. Failure of Monsoon may lead to a serious set back for the nation. We have to be equipped to face the situation.
I would request the Minister of Agriculture to inform the House about the steps taken by the Government of India to face the serious drought situation. People are going miles together to fetch drinking water. Reservoirs are drying away in most parts of the country.
The lethargic attitude of the Central Government is causing serious concern *…………* Speech was Laid on the Table of the House.
for State Governments. Karnataka has been neglected by the Central Government. An all Party delegation from Government of Karnataka under the Chairmanship of Shri S.M. Krishna, Chief Minister of Karnataka met Hon’ble Prime Minister, Hon’ble Agriculture Minister and other Ministers last year and submitted a memorandum and requested for the release of approximately Rs.900 crore to tackle the drought situation, but the Union Government is least bothered even to reply to the request.
Due to hailstrom, Karnataka farmers have lost approximately Rs.200 crore in the last year. The Government of Karnataka has submitted a memorandum to the Government of India but this proposal has also met the same fate.
An amount of Rs.78 crore which is the amount earmarked for the Government of Karnataka was released for the year 2000-2001 as calamity relief fund; it is surprising to know that the BJP leaders have repeatedly addressed the Press to inform this release, which is purely the entitlement of the Government of Karnataka.
This year, Monsoon is not courteous on Karnataka. On 23.07.2002, 81 Taluks have been declared as drought affected taluks by the Government of Karanataka.
On 24.07.2002, Hon. Revenue and Agriculture Ministers of the Government of Karnataka have described the seriousness of the drought situation in Karnataka in Agriculture Ministers’ Conference.
Since three years, we have been facing drought in many Districts of the State, simultaneously we are submitting proposals every year to the Union Government.
It is unfortunate to say that it has become a mere formality; Karnataka all party delegations have been neglected by the Union Government. I am sure, this is because the Congress Government is in power in Karnataka. This kind of step-motherly attitude will disturb the Centre-State relation in future.
Most surprisingly, you are announcing packages to Andhra Pradesh. One phone call from Hyderabad has been more effective than the Karnataka Government delegation! You have allotted approximately 30 lakh tonnes of foodgrains to Andhra Pradesh but three lakh tonnes of foodgrains to Karnataka for Food for Work Programme, what is the yardsticks applied for the allotment of foodgrains. Many schemes have been hijacked by Andhra Pradesh. This is not my allegation but the Government records supplied to MPs are showing the figures.
This year so far, Government of Karnataka has spent approximately Rs.45 crores for providing drinking water facilities and other immediate requirements; approximately Rs.6 cores has been earmarked to give subsidy on seeds to farmers.
District Collectors have been given power to take decision immediately to tackle the situation such as attempt to suicides and other extreme steps by farmers.
You are aware that due to very low rainfall in Cauvery delta, water levels in Krishna Raja Sagar dam are alarmingly low. This has caused a serious concern for the farmers of Karnataka as well as Tamil Nadu. We have lot of sympathy for the farmers of Tamil Nadu also, because of myself being a farmer, I can understand the problem of a farmer of any State in India.
Added to the woes of Karnataka farmers, the prices of silk, arcanut, Coconut, vegetables have come down drastically. Farmers of south Karnataka are seriously affected by falling silk prices. Last week Hon. Textile Minister has announced to farmers to extend all kind of help, but so far there is no Government order in this regard. Last week, Hon. Chief Minister has met Hon. Prime Minister and other Ministers concerned to request for a financial package in this regard. Therefore, I want an assurance by the Minister to what is the actual help the Union Government will extend to the farmers of Karnataka.
Every year we have been facing either drought or floods in most of the States. This is high time that Government should apply its mind for long term projects. I hope the following points would be helpful for Government. Linking of Ganaga-Cauvery rivers though this project needs huge investment, it will be a dream project of the country and this project will lesson the floods in north India and increase the area of irrigation down south. Renovation of Tanks : Lakhs of Tanks have dried away due to poor maintenance and improper supporting canals. The speciality of these tanks in Karnataka is that they have been connected to each other through canals by excess water and even they will form a river after flowing some distance.Government of Karnataka has already started an initiative to renovate these tanks with the help of World Bank financial assistance. I would like to mention that in this matter also, the Union Government has intervened and ordered a ban on the work citing that these tanks fall in Cauvery area. This is really a meaningless decision and it will retard the growth of the State.
I belong to Kolar District in Karnataka which is my Constituency which has got approximately 4000 tanks. All of them have been constructed in such a planned manner that even today if properly renovated and maintained, these will be able to feed the fields for all 365 days.
My district has been a dry district, time and again, we have requested for all round development of the District :
I would request the Rural Development Minister to plan for a comprehensive project to renovate the tanks. If an amount of Rs.200 crore is allotted to Kolar, major tanks can be renovated. I am sure the District can be a model district.
Drought monitoring cell : There should be a drought monitoring cell under a separate Ministry. This Ministry should look after drought and floods and its management. Every year during floods and drought, these issues are discussed, but no permanent system has been evolved so far. The existing calamity relief fund is not sufficient to tackle any situation; men and machinery are also required to help the flood or drought victims. We can utilise the services of para security forces such as Home Guards, Civil Defence Personnel, Anganwadi workers Teachers and we can also create a cadre to tackle immediate serious situation.
In view of the above few points, I demand the Government to take maximum possible steps immediately and to set up a permanent disaster management group so that the country can tackle any serious situation. I would request the Hon. Prime Minister to intervene and an amount of Rs.100 crore as a special case be released to Karnataka as interim relief.
I also request the Hon. Minister to intervene to clear the pending proposal of Rs. 900 crore submitted to the Union Government in the last year. * SHRI P.S. GADHAVI (KUTCH): Mr. Chairman, Sir, thank you very much for allowing me to take part in the discussion on drought and floods in various parts of the country.
A general impression is carried that as if Gujarat does not have drought. My constituency, from where I come, that is, Kutch district is so unfortunate and is a victim of almost all the natural calamities – drought, cyclone and earthquake. Since last three years, we are facing drought. In the period of the last 52 years, after Independence, my constituency had faced drought for about 33 times. In 1998, disastrous cyclone hit Kandla, in which we had lost about 3,000 precious human lives and poor farmers from Anjar, Mundre and Mandvi Talukas had lost more than 3 lakh fruit bearing trees. Thereafter, in 1999 cyclone, western parts of Kutch district – Abadasa and Lakhpat Talukas were also hit. At that time, we lost more than 50,000 valuable cattle heads. In both these cyclones, movable and immovable properties worth crores of rupees were lost. On 26 January, 2001, when the earthquake hit, Kutch was affected. Five big towns and more than 181 villages were totally ruined. Sir, 581 villages were affected in that earthquake and our farmers had lost everything.
In this earthquake, we lost more than 18,000 precious human lives and property worth thousands of crores of rupees. Till now, we have not been able to rehabilitate and restore the loss suffered because of this earthquake.
Sir, we are facing threat of severe drought this year. This is the third year of drought situation in Kutch. I have obtained the figures of rainfall from the Collector. I have been given the figures up till 20th July. There are 10 Talukas in Kutch. The figures of the rainfall in these 10 talukas are: Bhuj – 53 mm; Mandvi – 18 mm; Mundra – 12 mm; Anjar – 51 mm; Bhachau – 82 mm; Raper – 137 mm; Gandhidham – 55 mm; Makhtrana – 31 mm; Abadadas – 40 mm; and Lakhpat – 40 mm. So, the average rainfall in Kutch district comes to only 38 mm, that is about 1.5 inches. If we consider the average rainfall figures of two Talukas Bhachau and Raper, then it comes to 51.9 mm, that is about 2 inches.
A general impression is carried that Gujarat has got rain. Unfortunately, Kutch district, from where I come, and certain Northern Gujarat areas have not had any rain. In ten districts of Gujarat, the average rainfall is less than 30 per cent. They are: Anand, Banas Kantha, Gandhinagar, Kutch, Mehsana, Narmada, Panch Mahal, Patan, Porbander and Sabar Kantha. They have not had any rain and the average rainfall is less than 30 per cent.
Sir, my request to the hon. Minister of Agriculture is to depute a high-level team to Gujarat to conduct on-the-spot survey to assess the situation faced by the farmers because of drought, particularly in Kutch. I do not know whether the Agriculture Minister from our State was called or not but he was not present in the meeting. So, our Agriculture Minister should be called or a team may be deputed from here. As the other Members have said, please direct NABARD and other scheduled and co-operative banks to forego or postpone the recovery of dues and interest from stressed farmers.
Another request to the hon. Minister is that necessary amendments be made in the Central Relief Fund because Central relief generally gives relief to small and marginal farmers, who have got land less than two hectares.
In my constituency, we have got barren land. Even those farmers who have got more than 10 acres or 20 acres of land are not in a position to sustain their families. So, some relaxation may kindly be given. Otherwise, those farmers who have more than two hectares of land will not get any yield. Even the farmers who are having 40 acres or 50 acres of land are not in a position to sustain themselves.
My constituency is, in area, the third largest constituency in the country. The area of my constituency is about 45,000 square kilometres. We have got very good grassland. We have got a large number of original breed of cattle, namely, cows, buffaloes, goats, sheep, camels, etc. Previously also, the Railways had given subsidy for transportation of the fodder. Transportation of the fodder was made free. We can get fodder only from South Gujarat which is about 700 kilometres away. My only request to the hon. Minister is that this type of free transport facility for fodder by Railways be made.
There is no drinking water for two crore people. The only permanent solution is Narmada. If Narmada dam is constructed or completed as early as possible, then only the North Gujarat and Saurashtra parts can survive. Our ground water level has gone down from 300 feet to 500 feet. We are not having any ground water.
Lastly I would like to submit that whenever any relief works are done, the re-charging works should be given priority. In that, people’s participation should be there. Whenever you give any work, it does not yield any result. Many times, crores and crores of rupees are being spent. Even then the position remains the same. So there should be people’s participation in the recharging scheme.
In Gujarat we have started Sardar Sarovar Sahbhagi Yojana. So people will participate; and re-charging facility may kindly be taken up.
I am submitting a written note so that it can go on record.
Thank you very much for giving me this opportunity.
* At times of drought, many farmers have even lost their labour and seed when they received first little rainfall. To compensate them, subsidised power, certified seeds fertilizers and loan facilities be given to them.
Comprehensive package be declared to help the poor farmers who have suffered heavily due to drought situation.* __________________________________________________________________*………*Speech was laid on the Table of the House.
श्री पुन्नू लाल मोहले (बिलासपुर): सभापति महोदय, छत्तीसगढ़ राज्य सहित पूरे १२ प्रदेशों बाढ़ एवं सूखे की चपेट में हैं। ऐसी परिस्थिति में आज जो चर्चा हो रही है मैं उसमें सुझाव ही देना चाहूंगा क्योंकि समय बहुत ज्यादा हो रहा है। छत्तीसगढ़ में पिछली बार जब अकाल पड़ा था तो उसे एक हजार करोड़ रुपए तथा चावल दिए गए थे। वहां गंगा जल योजना के नाम पर धन दिया गया। वहां इन्दिरा गांधी योजना और गंगा योजना लागू की गई। राजीव गांधी रोड निर्माण कार्य शुरु किया गया और जवाहर लाल रोड के नाम से इसे जाना गया। जवाहर लाल और राजीव गांधी बांध बन गया। सरकार इस बात पर ध्यान दे कि जो केन्द्र सरकार की मद से धनराशि दी जाती है, वह पूरी खर्च हो। पिछली बार सौ प्रतिशत राशि दी गई थी। वैसे २५ परसैंट राशि राज्य सरकार देती है लेकिन सौ प्रतिशत राशि केन्द्र सरकार ही दे क्योंकि १२ राज्यों में भीषण बाढ़ और अकाल पड़ा है। मेरा यही कहना है कि केन्द्र सरकार शत प्रतिशत राशि दे। राज्य सरकार अगर पैसा खर्च करना चाहती है तो राज्य सरकार अलग कार्य करके दिखा दे। आप केन्द्र सरकार का कार्य अलग से देखें।
हमारे यहां पीने के पानी की भीषण समस्या है। वहां का जल स्तर गिर रहा है उनको ऊपर उठाने के लिए कदम उठाने चाहिए। नलकूपों पर आप ३० हजार रुपए खर्च करते हैं। गांवों में हैंड पंप लगवा देते हैं लेकिन गांवों में अधिकतर तालाब हैं और वहां खेत रहते हैं। आप नदी-नालों को पक्का करा दें जिससे जल स्तर ऊंचा उठे। इससे पीने के पानी की समस्या हल होगी और लोगों को नहाने के लिए भी पानी मिल जाएगा। तालाब में टयूबवैल खनन किया जाए। राहत कार्यों की तरफ विशेष रूप से ध्यान दें। तालाबों के किनारे खेत रहते हैं। टयूबवैल के पानी से सिंचाई की जा सकती है। हमारे यहां सारी फसल नष्ट हो चुकी है।
किसानों की समस्याओं से निपटने के लिए क्रेडिट कार्ड योजना लागू की गई। जिन १२ राज्यों में अकाल पड़ा है वहां सभी किसानों को क्रेडिट कार्ड बांटे जाएं ताकि किसान अपने जीवकोपार्जन के कार्य कर सकें और खेती करने के लिए उपकरण ले सकें। फसल बीमा योजना के अन्तर्गत प्रीमियम की राशि न बांटने से किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाएगा। इन परिस्थितियों में मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि जहां लोग बाढ़ से पीड़ित हैं, वहीं प्रीमियम की राशि जमा की जाए। फसल बीमा योजना के अन्तर्गत उचित राशि मुआवजे के तौर पर किसानों को मिले। ऐसे में किसान सरकार को आशीर्वाद देगा। कई बार किसान को अनदेखा किया जाता है। यदि कहीं कांग्रेस की सरकार है तो वहां बीजेपी के जन प्रतनधियों को अनदेखा किया जाता है। इससे जन प्रतनधियों की कोई भूमिका नहीं रहती है। हम यहां रात भर बैठ कर चिल्ला रहे हैं और पैसे की बात कर रहे हैं लेकिन अपने क्षेत्र में कुत्ते, बिल्ली जैसे सांसद रहते हैं।
इस परिस्थिति की ओर ध्यान दिया जाये। वहां कोई कार्य हो तो अनुशंसा से हो। ऐसा नहीं कि केन्द्र सरकार से पैसा जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कहीं किसी प्रकार कोई बैठक की मानिटरिंग नहीं करते। प्रत्येक महीने संसद् सदस्यों और विधायकों की बैठक बुलाई जाये जहा कार्य नहीं हो रहा है, वहां सांसदों की अनुशंसा से कार्य किया जाये। सौतेला व्यवहार न हो। यह पैसा आम आदमी के विकास के लिये दिया जाता है न कि किसी राजनैतिक दल को बढ़ाने के लिये दिया जाता है। यह सही है कि गेहूं दो रुपये किलो और चावल ३ रुपये किलो मिल रहा है। यह सही है कि बीपीएल वाले लोगों को मिल रहा है लेकिन आज की विषम परिस्थिति में गांव के जितने गरीब लोग हैं, उन सब को मिलना चाहिये। जो अपाहिज और पीड़ित हैं, कार्य नहीं कर सकते, अकाल की विभीषिका से वशीभूत हैं, वे कहां से पैसा लायेंगे, इसलिये उन लोगों को सहायता मिलनी चाहिये। भारत के गोदामों में इतना अनाज सड़ रहा है। हमारी पार्टी के लोगों ने इस बात का उल्लेख किया। अगर नहीं दिया जाता है तो गोदाम लूट लिये जायेंगे। मेरा केन्द्रीय सरकार से आग्रह है कि गोदाम लुटने के बजाय सरकार खुद बांटे। माननीय कृषि मंत्री जी इस ओर ध्यान दे रहे हैं। उन्होंने कई राज्यों के कृषि मंत्रियों का सम्मेलन बुलाया। जो राज्य पहले प्रस्ताव देते हैं, उसे ४०० से ६०० करोड़ रुपये अनुदान के रूप में तत्काल दिये जायें जिससे लोगों को जीवन जीने का साधन मिल सके।
श्री श्रीराम चौहान (बस्ती): सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया।
सूखा इस देश की ज्वलंत समस्या बन चुका है। पूरे उत्तर भारत के अधिकांश प्रदेश सूखे की चपेट में हैं। भारत सरकार इसके लिये संवेदनशील है। माननीय कृषि मंत्री जी ने सूखा प्रभावित प्रदेशों के कृषि मंत्रियों की बैठक बुलाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। मैं जहां से चुनकर आता हूं, बस्ती, गोंडा, महाराजगंज और सिद्धार्थ नगर में गन्ना किसानों की समस्या है। उनका गन्ना सूख रहा है। अन्य फसलें भी सूख रही हैं। हालांकि तराई क्षेत्र में धान की रोपाई हो गई है लेकिन पानी के अभाव में सूख रहा है। नलकूप चालू कराये जायें और नहरों के माध्यम से पानी टेल तक पहुंचाये जाने की व्यवस्था की जाये। गन्ना किसानों का भारी बकाया भुगतान के लिये पड़ा हुआ है। कुछ किसान नकदी फसलें उगाते हैं और उन्हें जल्दी दाम मिल जाता है लेकिन गन्ना किसान अपनी उधार १५ दिन के लिये देते हैं। वर्षानुवर्ष वह भुगतान से वंचित रह जाते हैं। उनका भारी पैसा मिलों पर बकाया है यहां तक कि सरकारी मिलों पर भी बकाया है। मेरा सरकार से आग्रह है कि गन्ना किसानों का बकाया भुगतान करने के लिये राज्य सरकार को निर्देशित करे। राज्य सरकारें‘ काम के बदले अनाज योजना’ चालू करें ताकि केन्द्र सरकार की योजना पर राज्य सरकारें ठोस कदम उठा सकें। साथ ही सरकार किसानों के ऋण माफ करे। ऋण वसूली स्थगित की जाये। सिंचाई पर जितने टैक्स लगे हुये हैं, उन्हें माफ किया जाये। पशुओं के लिये चारे की व्यवस्था की जाये।
इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे समय दिया।
सभापति महोदय : वाद-विवाद समाप्त हुआ। कल श्री राम दास आठवले बोलेंगे तथा माननीय कृषि मंत्री का उत्तर होगा। सदन की कार्यवाही कल ११ बजे २६ जुलाई तक के लिये स्थगित की जाती है।
२३.२५ hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock On Friday, July 26, 2002/Sravana 4, 1924( Saka) _________