Lok Sabha Debates
Discussion On The Salary Allowances And Pension Of Members Of Parliament ... on 27 August, 2001
14.17 hrs. Title: Discussion on the Salary Allowances and Pension of Members of Parliament (Amendment) Bill, 2001. (Bill Passed).
MR. SPEAKER: Now, let us take up legislative business. Item no. 11: Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Amendment Bill, 2001.
Hon. Minister of Parliamentary Affairs.
संसदीय कार्य मंत्री तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री (श्री प्रमोद महाजन):अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं:
"कि संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधनियम, १९५४ में और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए। "अध्यक्ष महोदय, मैं आपकी अनुमति से संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन (संशोधन) विधेयक, २००१ बहस और पारित करने के लिए सदन के सामने रख रहा हूं। प्रारंभ में मैं संक्षेप में कुछ कहना चाहूंगा। सबसे पहली बात यह है कि सदस्यों के वेतन, भत्ता तथा पैंशन बढ़ाने का यह प्रस्ताव मैं किसी अपराध बोध के साथ नहीं कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि यह आवश्यक है और आवश्यक होने के कारण पूर्ण विश्वास के साथ इस प्रस्ताव को मैं सदन के सामने रख रहा हूं, इसके पीछे किसी प्रकार का अपराध बोध हमें नहीं है कि हम कोई गलत बात कर रहे हैं। दूसरी बात मैं कहना चाहूंगा कि हमेशा जब यह विधेयक पिछले कुछ समय में सदन में आता था, तो सबसे पहली शिकायत होती थी कि यह अंतिम दिन आता है, देर रात को आता है, बिना बहस चुपके से पास किया जाता है। मैं समझता हूं कि इस विधेयक के द्वारा हम ऐसी कोई चीज नहीं कर रहे हैं जो हमें नहीं करनी चाहिए और इसलिए हम सदन में इसे इस सप्ताह के पहले दिन लाए हैं। आज जबकि अधिक महत्वपूर्ण काम सप्लीमैंट्री डिमांड का होने के बाद भी, हमने इसे जान-बूझ कर प्रथम क्रमांक पर रखा है ताकि जो बहस करना चाहें, समर्थन करना चाहें, विरोध करना चाहें, उसकी बहस हो और सोच-समझ कर पास हो। बिना बहस, जल्दबाजी में फैसला करने की आवश्यकता नहीं है, कोई गलत फैसला करना हो तब करना चाहिए, अगर सही फैसला कर रहे हैं तो इस प्रकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कर्तव्य है जबकि सब जानते हैं कि विधेयक में क्या है फिर भी पद्धति के अनुसार मुझे यह बताना आवश्यक है कि विधेयक में क्या है। सबसे पहले कानून का परिवर्तन केवल तीन मुद्दों पर हो रहा है और एक संशोधन आ रहा है। एक, वेतन को ४,००० रुपये से १२,००० रुपये कर रहे हैं। प्रतदिन भत्ता जो ४०० रुपये मिलता है, उसे ५०० रुपये कर रहे हैं और जो ६.०० रुपये प्रति किलोमीटर माइलेज मिलता है, उसकी जगह ८.०० रुपये प्रति किलोमीटर कर रहे हैं। वैसे कानून के अन्तर्गत इतना ही संशोधन कर रहे हैं। मैं एक संशोधन बाद में सदन की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं जिसमें ढाई हजार रुपये जो मूल पेंशन है, उसे ३,००० रुपये तक बढ़ा रहे हैं और प्रति वर्ष जो ५०० रुपये बढ़ती है, उसकी जगह ६०० रुपये कर रहे हैं। लेकिन उसके साथ जिन चीजों में, जैसे मैंने कहा, संशोधन आवश्यक नहीं है लेकिन जानकारी आवश्यक है कि निर्वाचन क्षेत्र का भत्ता ८००० रुपये से १०,००० रुपये, कार्यालय भत्ता ९,५०० रुपये से १४,००० रुपये, मुफ्त बिजली यूनिट २५००० से ५००००।
उनको जो जल मिलता है, उसे दो हजार किलोलीटर से चार हजार किलोलीटर कर रहे हैं। टेलीफोन के लिए हम एक छोटी सी सुविधा दे रहे हैं कि जिनके चुनाव क्षेत्र एक हजार किलोमीटर से अधिक दूर हैं, उनको हम २० हजार अतरिक्त मुफ्त स्थानीय टेलीफोन कॉल्स दे रहे हैं। हालांकि इसका मेरे आई.टी. मनिस्टर होने से कोई सम्बन्ध नहीं है लेकिन इसके साथ-साथ हम सदस्यों को मोबाइल फोन उपलब्ध करा रहे हैं। बहुत सारे अखबारों में चर्चा में यह लिखा गया है कि इस मोबाइल फोन पर हम एक लाख कॉल्स ज्यादा दे रहे हैं, इसको सब ने ग्राहय मानकर चर्चा शुरू की। हमने कोई कॉल नहीं बढ़ाई, जो हमें एक लाख कॉल मिलते हैं, जो संसद भवन से एक हजार किलोमीटर के अन्दर रहते हैं, उनको एक लाख कॉल ही मिलेंगी। वे एक लाख कॉल जो आज हमारे घर के और यहां के टेलीफोन पर विभाजित हैं, उसमें एक और विभाजन हो जायेगा। उसमें मोबाइल फोन और आ जायेगा। इसलिए २५-३० हजार रुपये खर्च किया गया, तो वह एक्स्ट्रा नहीं कर रहे हैं। लेकिन बहुत सारे समाचार-पत्रों ने बिना पढ़े ही लिख दिया और उसकी आलोचना भी की कि एक लाख नई क़ॉल्स दे रहे हैं तो मुझे लगा कि सबसे पहले मैं बताऊं कि एक लाख नई कॉल्स हम नहीं कर रहे हैं।
सबसे पहली बात जो मुझे लगती है और शायद समाचार पत्रों की आलोचना में छूट गई है कि पहली बार इस बार संसद अपने आपको बांध रही है कि अगली बढ़ोतरी पांच साल के अन्दर नहीं होगी और इसलिए पहली बार हमने ऐसा किया है। इसके पहले कभी भी जब संशोधन इस विधेयक में हुए तो यह नहीं कहा गया कि हम कभी नहीं करेंगे या कोई तथि तय नहीं की और जैसे जब मन में आता था, होता था। हमने यह कहा है कि लोक सभा में केवल एक बार होना चाहिए और एक बार का अर्थ यह है कि पांच साल में एक बार ऐसा होनी चाहिए और इसलिए पहली बार हम इसमें अपने आपको पांच साल के लिए बांधे दे रहे हैं। वैसे यह टर्म पांच साल चलेगी, इसलिए हमने उसको १९९९ से २००४ तक बांध लिया है। वैसे लिखा तो इसमें पांच वर्ष है।
इसकी सबसे बड़ी जो आलोचना होती है और मुझे लगता है कि शायद उसमें थोड़ा सा वजन आता है कि लोगों को यह शिकायत होती है कि यह कौन सा तरीका है कि संसद सदस्य अपना वेतन भत्ता खुद ही बढ़ाते हैं। अब आलोचना ठीक है कि किसी आदमी को खुद ही तनख्वाह बढ़ाने का अधिकार हो, लेकिन बहुत से विद्वान लोग भी इस बात को नहीं जानते हैं कि यह संविधान में व्यवस्था है। यह व्यवस्था कोई इस सरकार ने या उस सरकार ने नहीं की है। संविधान निर्माताओं ने संविधान लिखते समय अनुच्छेद १०६ बनाया और जिसके अन्तर्गत संविधान निर्माताओं ने यह कहा कि संसद सदस्यों को समय समय पर जो वेतन या भत्ता देना पड़ेगा, उसका फैसला संसद करेगी और हो सकता है कि संविधान के निर्माताओं को लगा कि संसद सार्वभौम होने के कारण और संसद सदस्य उस सार्वभौमत्व के प्रतीक होने के कारण उनका फैसला कोई और बाहर से करे, यह कम से कम उस समय संविधान निर्माताओं को उचित नहीं लगा। उसके कारण यदि किसी को यह पद्धति बदलनी है तो पहले तो हमें संविधान के अनुच्छेद १०६ को हटाना पड़ेगा। संविधान से पूरी की पूरी धारा हटाने का, संविधान संशोधन का यह शायद पहला अवसर होगा, क्योंकि संविधान में संशोधन तो होते रहे हैं, मैं उसका विशेषज्ञ तो नहीं हूं, लेकिन पूरा का पूरा अनुच्छेद ही हट जाये, यह करने की जरूरत नहीं है। इसको किसी और प्रक्रिया से किया जाये, यह पहला अवसर होगा। लेकिन मैं उसके साथ-साथ यह कहना चाहता हूं कि यदि कोई और पद्धति बनानी है तो सरकार को इस पद्धति पर कोई आपत्ति नहीं है। क्योंकि अभी तो पांच साल का समय अपने पास है, यदि कोई पद्धति आम सहमति से बने तो उस पद्धति पर हमें कोई आपत्ति नहीं है, उसके द्वारा हम सदस्यों के वेतन और भत्ते को तय कर सकते हैं, लेकिन आज हमको इस बात का अपराधबोध होने की आवश्यकता नहीं है, इस बात के लिए शर्मिन्दगी महसूस करने की आवश्यकता नहीं है कि हम अपना वेतन खुद ही क्यों बढ़ा रहे हैं, क्योंकि संविधान निर्माताओ ने यही व्यवस्था की है। संसद में २४ बार से यही हो रहा है और अब २५वीं बार होगा। अगर आगे चलकर यह व्यवस्था बने, जिसमें आम सहमति बने, क्योंकि संविधान संशोधन तो दो तिहाई बहुमत से होगा और अगर सभी राजनैतिक दल मिलकर कोई एक और पद्धति बताते हैं, जो सब को मंजूर हो तो पद्धति बदलने में हमें कोई गलती नहीं लगती, हम उसके लिए तैयार हैं।
लेकिन जब तक हम कर रहे हैं, मुझे लगता है कि इसमें गलत कुछ भी नहीं है। यह सब कानून के अंतर्गत जो पद्धति है, उसकी मदद करने के लिए संसद की एक सर्वदलीय समति होती है। इस बार उसके अध्यक्ष मेरे मित्र श्री के.पी. सिंह देव हैं। उनकी अध्यक्षता में इस समति ने यह रिपोर्ट बनाई थी। उन्होंने भी श्री प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में एक छोटी सी उपसमति बनाकर इस पर चर्चा की। उसने जो सिफारिशें दी हैं, मुझे राजनीति नहीं करनी है, लेकिन यह एकमत से दी हैं। इसलिए सदन में आकर किसी का मत परिवर्तन हो सकता है। लेकिन इस समति में सभी दलों के सदस्य थे। जहां तक मुझे जानकारी है, गलती करूं तो मैं क्षमा चाहूंगा, किसी भी दल के किसी भी सदस्य ने वहां कम से कम किसी प्रकार का यह विरोध नहीं जताया कि यह नहीं करना चाहिए। इसलिए .यह एकमत से रिपोर्ट आई है।
अध्यक्ष जी, दो-तीन छोटे-छोटे मुद्दे और हैं, जिनकी यहां मैं चर्चा करना चाहूंगा। कई बार समाचार पत्रों ने लिखा है कि १२ हजार रुपए तनख्वाह कर दी। जैसा मैंने कहा कि हम पहली बार अपने आप को पांच साल के लिए बांध भी रहे हैं। इसके अलावा पहली बार संसद सदस्य अपने वेतन पर आयकर देंगे। अगर हम चाहते या के.पी. सिंह देव जी चाहते तो हम पुराना रास्ता अपना सकते थे कि अपने भत्ते बढ़ा लेते और तनख्वाह वही चार हजार रुपए ही रहती और उस पर आयकर भी नहीं लगता। लेकिन हमने कहा कि यह जरूरी नहीं है। अगर तनख्वाह बढ़ानी है, सारी दुनिया आयकर देती है, संसद सदस्य भी दें, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अगर दोनों सदनों में यह विधेयक मंजूर हो जाता है तो पहली बार ऐसा होगा कि हर संसद सदस्य अपने वेतन पर आयकर देगा। पहले हो सकता है कुछ सांसद देते हों या न देते हैं। हमें लगेगा कि चार हजार रुपए से १२ हजार रुपए एकदम कैसे हो गए। मैं कहना चाहता हूं कि १२ हजार रुपए अपने आप में कोई ज्यादा रकम नहीं है। हम लोगों से एक और शिकायत होती है कि हम तनख्वाह तो बढ़ा लेते हैं, लेकिन काम नहीं करते हैं। अभी संसद का वर्षाकालीन सत्र चल रहा है। अध्यक्ष जी, आपने अभी निर्णय लिया है लक्ष्मण रेखा का, कि कोई भी सांसद वैल में नहीं आएगा। लेकिन कभी-कभी लक्ष्मण रेखा उसको भी कहते हैं, जिसके अंदर जाने से रामायण होती है। इसलिए यह बालयोगी रेखा है या लक्ष्मण रेखा है, यह तो बाद में तय करना पड़ेगा। लेकिन यहां आपने जो निर्णय लिया है, वह सही और अच्छा निर्णय है। सदन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाए, मैं इस मत का हूं, लेकिन काफी समय एडजोर्नमेंट में गया है। मैं उन लोगों को बताना चाहता हूं कि इस सत्र में २७-२८ घंटे एडजोर्नमेंट में गए, इसका हमें दुख है। इसके कारण अगर हम वेतन वृद्धि करते हैं तो जनता को शिकायत होती है। लेकिन जनता को या पत्रकारों को इस बात का पता नहीं है कि जैसे २८ घंटे एडजोर्नमेंट में गए, वैसे ही हमने कल तक छ: बजे के बाद बैठकर करीब साढ़े २७ घंटे अधिक काम भी किया है, लेकिन यह किसी के ध्यान में नहीं है। मैं किसी एडजोर्नमेंट का समर्थन नहीं करूंगा, वह नहीं होना चाहिए। हमें ज्यादा देर तक बैठना चाहिए। अगर हिसाब की बात करें तो जहां २७ घंटे एडजोर्नमेंट में गए, वहीं हम छ: बजे के बाद रात को दस-दस बजे तक बैठे हैं और काम किया है।
दूसरी बात मैं यह कहना चाहूंगा कि आज किस तरह से मीडिया के बंधु संसद सदस्यों के काम की व्याख्या कर रहे हैं। मेरी राय में यह सही नहीं है। सासंद का काम दिन भर यहां बैठकर दूसरों के भाषण सुनना ही नहीं है। यह नहीं है कि हम स्कूल के बच्चे की तरह ११ बजे आएं और छ: बजे चले जाएं। हम इसके अलावा भी काम करते हैं। आप देखें हमेशा हमारे अखिलेश सिंह जी सुबह दस बजे आकर यहां सबसे पहले नोटिस देते हैं। इसका मतलब है कि वे सबसे पहले उठते होंगे और सबसे पहले अखबार पढ़ते होंगे, कागज तैयार करते होंगे। उनकी डयूटी तो सुबह ११ बजे से कहीं पहले शुरू हो जाती है।
श्री सोमनाथ चटर्जी (बोलपुर): सबसे पहले गले की भी तैयारी करते होंगे।
श्री प्रमोद महाजन : सही है कि गले की भी तैयारी सबसे पहले करते होंगे। संसद सदस्य ११ बजे के पहले भी काम करता है और छ: बजे के बाद भी करता है। सिर्फ यहां आकर बैठना और भाषण सुनना ही काम नहीं है। वह यहां लोगों से मिलवाता है। अपने चुनाव क्षेत्र में जाता है तो लोगों से मिलता है। ये भी ऐसे काम हैं जिनकी हमें तनख्वाह मिलती है। ऐसा नहीं सोचें तो मैं समझता हूं यह संसद सदस्यों के साथ अन्याय होगा। मैं बहुत ज्यादा समय नहीं लूंगा। हर मिनट का यहां खर्चा होता है।
इसलिए मैं पैसा देते समय खर्चा नहीं करूंगा लेकिन यह ४००० रुपये से १२००० कैसे हुआ, इस पर मैं थोड़ा सा विश्लेषण करना चाहूंगा। जैसा मैंने कहा कि तनख्वाह हमारी कितनी बार बढ़ी?मैं जब यह बिल कर रहा था तो मैंने पढ़ा कि १ जून १९५४ को जब पहली बार संसद सदस्यों की तनख्वाह तय हुई तो उस समय ४०० रुपये महीना तनख्वाह थी और भत्ता २१ रुपये था। उस समय २१ रुपये भत्ता था। मैंने पूछा उस समय रुपये की कीमत क्या थी तो हमारे अधिकारी ने बताया कि उस समय ४०० रुपये तनख्वाह थी और तब ८० रुपये सोवरन सोना था। मैंने कहा कि यह सोवरन सोना क्या होता है तो उन्होंने बताया कि जो ८ ग्राम सोना होता है, उसे सोवरन सोना कहते हैं और आज ३६०० रुपये सोना है। जो लोग १९५४ में लोक सभा के सदस्य थे, उन पर हम जैसा आरोप भी नहीं लगाया जा सकता कि वे सुविधा भोगी थे। हम पर पत्रकार आरोप लगा सकते हैं कि हम सुविधा भोगी हैं लेकिन १९५४ में जब ४०० रुपये की तनख्वाह तय हुई होगी तो वे सारे स्वतंत्रता के आंदोलन से निकलकर आये हुए लोग थे। अब यह १२००० रुपये कैसे हुई और मैं के,पी,सिंह देव जी की कमेटी को बधाई देना चाहूंगा कि १२००० का आंकड़ा कैसे रहा क्योंकि आज तक जो तनख्वाह बढ़ी है, उसका कोई नियम नहीं है। दस साल के बाद ५०० रुपये तनख्वाह कर दी, फिर ७-८ साल के बाद ७५० रुपये कर दी, उसके चार साल के बाद १००० हो गई, फिर १५०० हो गई और १५०० रुपये के ४००० कैसे हो रहे हैं, कुछ नियम नहीं है। जिसको जो लगा और जितना हो सके, इनकम टैक्स के अन्तर्गत रख दिया। पहली बार के.पी.सिंह देव जी और प्रणव मुखर्जी की समति ने इनको इंडेक्स के साथ जोड़ने का काम किया। उन्होंने कहा कि ४०० रुपये मूल तनख्वाह मानी जाये तो इस तनख्वाह को उस समय जो इंडेक्स था, वह आज के इंडेक्स से अगर हम तुलना करें तो नयी तनख्वाह ११९०० रुपये बैठती है। अगर ४०० रुपये को १९५४ के निर्णय को मूल निर्णय माना जाये तो वह ११९०० रुपये बनती है। फैसले में भी देर हुई औऱ ९०० रुपये अटपटा लगा तो इसलिए हमने १२००० तनख्वाह की है। इसलिए तीन गुना तनख्वाह हुई है, यह कहना भी एक तरह से पूर्ण सत्य नहीं है। पहली बार इंडेक्स के आधार पर तनख्वाह बढ़ाने की कोशिश हुई है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि पाचं वर्ष के बाद फिर से बढायी जाएगी। इस १२००० को मूल तनख्वाह मानकर आज से पांच साल में जितना भी फर्क बढ़ेगा, इंडेक्स के अनुसार तनख्वाह बढ़ाई जाएगी। पहले यह शिकायत आने लगी कि तनख्वाह इस प्रकार क्यों बढ़ी और इसलिए तनख्वाह १२००० बढ़ाने का यही मूल कारण है। जहां तक भत्ता और कांस्टीटयूएंसी एलॉउंस का संबंध है, १९९८ में तब ४०० रुपये भत्ता मिलता था और २००१ में तीन साल के बाद हम पुनर्विचार कर रहे हैं तो १०० रुपये बढ़ाना मेरी द्ृष्टि से कोई बहुत बड़ा आंकड़ा हुआ है, ऐसा नहीं है।
अंत में छोटी सी बात मैं सदन के सामने रखता हूं। तनख्वाह के साथ जो सुविधाएं मिलती हैं, तो वे सुविधाएं हैं, वे एमनिटीज हैं। अब किसी पत्रकार ने लिखा कि प्रमोद महाजन जिस घर में रहता है, उसको अगर किराये पर लिया जाये तो दो लाख रुपया महीना देना पड़ेगा। अरे भई, अगर मैं सांसद चुनकर नहीं आता तो इस घर में रहने के लिए क्यों आता? मुझे क्या कोई काम बन पड़ा है कि मैं नॉर्थ एवेन्यू में भाड़े से घर लेकर रहूं?२००० कि.मी. से दिल्ली में रहने के लिए कोई आता है, हम कोई खुशी से रहने के लिए नहीं आते हैं। कोई कह सकता है कि आप जनता के सेवक हैं, आप फुटपाथ पर रहिए, आप किसी रिश्तेदार के यहां रहिए लेकिन घर मत रहिये। घर का कॉमर्शियल कितना बनता है, अगर कोई कंपनी किराये से लेती है तो कितना देती? उतना उसको मिलता है। नहीं मिलता है। किसी ने कहा कि बिजली का बढ़ गया। बिजली का पैसा क्या कोई हमारे हाथ में मिलता है? कि.मी. करने से पैसा हाथ में मिलता है क्या? जैसे टेलीफोन की बात होती है, किसी ने यह भी कह दिया कि उसमें एक टेलीफोन एक्सचेंज चलेगा। एक लाख टेलीफोन। मैंने हिसाब करने की कोशिश की, अध्यक्ष जी, मैं थोड़ा समय लेकर बात कह दूं ताकि इसके बारे में अगर कोई भ्रम हो तो दूर हो जाये। मैं मुम्बई से आता हूं।
मुम्बई से मैंने इसकी गणना की। एक लाख टेलीफोन का अर्थ क्या होता है। यदि मैं मुम्बई टेलीफोन करता हूं, तो दो सैकेंड की एक काल होती है। दो सैकेंड की काल के हिसाब से यदि मुम्ब्ई बातचीत करूं, एक लाख टेलीफोन सुविधा से मुम्बई नान-स्टाप बात करूं,, तो ६७ घन्टे बात कर सकता हूं। पूरे साल में ८,७५६ घन्टे होते हैं, तो उसकी एक परसेंट भी टेलीफोन सुविधा नहीं मिल रही है। टेलीफोन काल कोई पैसा नहीं है कि ७५ हजार कर दिया, तो पैसा दे रहे हैं। टेलीफोन काल एक सुविधा है। टेलीफोन काल तब की सुविधा है, जब एसटीडी नहीं थी। आज एसटीडी और आईएसटी की सुविधा है, कोई इस बात को मानें या न माने, यह जरूरी नहीं है कि टेलीफोन का उपयोग सिर्फ हम ही करते हैं। प्रियरंजन दासजी टेलिफोन का बिल लेकर आते हैं, कोई विवाद हो, तो अलग बात है। सब को मालूम है, आधे से ज्यादा टेलिफोन हम नहीं करते हैं। जो वोट देता है, उसको फोन न करने दे, तो क्या होगा, सबको मालूम है। रघुनाथ जी ने इसलिए वोट मांगा था कि एक काल भी करने नहीं देता है. फिर वह एक बार बात करना शुरु करता है, तो १०-१५ मिनट बोलता है। दो-चार हजार काल तो उसी में ही चली जाती है और इस प्रकार २०-२५ लोग सांसद के घर पर आ जायें और पांच-सात मिनट बात करें, तो एक लाख कब पूरा हो गया, पता नहीं लगता है। मुझे नहीं मालूम, कोई एक लाख में से सेविंग भी करता है। कोई सेविंग करने वाला हो, तो अलग बात है कि एक लाख काल के बजाये ७५ हजार काल हुई हैं।
अंत में, अध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही कह रहा हूं कि मैं कोई हमारी आत्मस्तुति नहीं करना चाहता हूं। वह मूर्खों का लक्षण है, लेकिन आत्म-निन्दा भी इतनी मत करिए कि बात आत्म-हत्या तक चली जाए कि हम कोई बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं। मैंने एक बात शुरु से कही है, मैं यह विधेयक इस सदन के सामने विनम्रतापूर्वक लाया हूं, किसी अपराध बोध से नहीं लाया हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इतनी जरूरत सासंदों को है और इसी द्ृष्टि से यह विधेयक आपके समक्ष रखता हूं। आशा है, यह विधेयक सर्वसम्मति से पास हो जाएगा।
MR. SPEAKER: Motion moved:
"That the Bill further to amend the Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Act, 1954, be taken into consideration."
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): Sir, on my behalf and on behalf of my party, we have gone through this Bill. We have gone through the recommendations of the Joint Committee and the time has now come to express our views regarding the Bill.
We are not opposing the Bill but I would like to tell as to why the media criticises us. For the last few years, or I should say over the years, the general perception among the people, not by a particular party, is that politicians are not honest, whether they are in power or whether we are in power. Till we cannot get rid of this stigma, whether we are sitting on this side or that side of the House, whether we increase our salary or not, we cannot be free from the overall observation of the media and the people. Therefore, Sir, while supporting the initiative of the hon. Minister, I should only request through you to the Government and, of course, to the entire House that the time has come in this new millennium to justify our commitment to the nation and our day-to-day performance. It is because the people, who are our watchdogs, are watching what we are doing for our country and constituency. I, therefore, feel that if you can raise the standard of our own living not in terms of luxury but in terms of our commitment to the people, who elect us and send us here, I think this kind of a criticism will not go long for years to come.
One fact remains to be discussed which nobody has discussed and I have not seen any editorial in any newspaper about the difference between the Members of Parliament in India and the Members of Parliament in the rest of the world. Is there any country where Members of Parliament represent an electorate of more than one million? Whether it is right or wrong, the other day, we have freezed the increase of seats in Lok Sabha because of population and many other issues. I can give you my example. I cannot interfere with other constituencies. The radius of my constituency is 310 kilometres.
The distance from one point to another is 310 kilometres and it takes three and a half days to travel, and not one day. In the earlier days, there were not many telephone connections. Thanks to our late Prime Minister, Shri Rajiv Gandhi, his C-DoT Mission and the work of DoT, now telephone is available in almost every village. These days -- whether it is Chamber of Commerce or sabzi mandi or teaching community – they negotiate with us over the phone and they expect us to return the call, when they call us at home and we are not at home at that time. When I go back to my house, I find that thirty people rang me up to convey some problem or the other. As a responsible M.P. of the constituency, the minimum that I should do is that I should talk to them and tell them what I have done for them. If I calculate that, I find that these one lakh calls are just nothing. Yet, if we increase it, people will question us. I will give you a few other examples. We people come from places which are one thousand kilometres away from Delhi. This is true for Members coming from Bihar, Kerala, etc. People from our constituencies come to Delhi even without intimating us. They send the patients without intimating us. They tell us, `We have sent the patient, please make necessary arrangements’. They come with the patients in the midnight or in the early morning. They want us to provide them train fare also. Which clause is allowing you to do that? The M.Ps, in their own capacity and through their contacts, somehow manage these situations. In Indian democracy, you cannot wish away these problems and say, `No, no. Nobody should come so long as I am in Parliament. Do not come to Delhi’. We cannot say that. While touring my constituency, I found that before the jeep, people start crying, saying `Day before yesterday our village was burned down and please make some arrangements’. I request the nearby shops to give them rice, wheat, atta etc. and tell them that within two days I will give them the money. Can anybody deny that these problems do not occur for those who are representing the people in their constituencies? These hazards are never noticed. Suppose, in a particular constituency somebody is burned, whether it is dalit or upper caste people, the M.P. of that area cannot move, if he cannot take care of their problems for a month or so or till they are rehabilitated. If he does not do that, he cannot go to his constituency. It happens to almost all the M.Ps. An impression is created that M.Ps do not have any problems and that they are the top people of this country. This impression is gaining ground and it is a wrong one. This impression is not correct at all. The more you encourage such an impression, the more difficult it would be for us. It is not a fact.
If you desire to have a competent Personal Secretary who knows stenography and computer, even after giving advertisement in the newspaper, can you get him for less than Rs. 12,000 or Rs. 15,000 or Rs. 10,000? You cannot get it, whereas people want us to deliver goods, properly communicate and address the issue. When M.Ps go to their constituencies during the inter-Session period, to see the development in the M.P. Area Development Work, hardly any Collector provides him any vehicle to move freely. He has to go in his own vehicle or hire a vehicle and he has to spend for the fuel also to complete the work.
श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज):हम लोगों को कभी नहीं देते हैं।…( व्यवधान )
श्री प्रियरंजन दासमुंशी:वही मैं कह रहा हूं।
To supervise the work, we have to request our friends to give their vehicle. They will give us for a day or two, but not everyday. These problems are not noted by anybody. I will give you two more examples and conclude. There are at least 200 M.Ps whose constituencies are either drought-prone or flood-prone. There are chronically flood-prone areas and chronically drought-prone areas. The M.P of that area cannot take his food, unless he takes care of the people of the constituency.
I have seen the situation in many areas. During the flood season, it comes to my area at least occasionally. I have seen that. The people watch us minutely what we eat in our house during the flood situation. They publish it in the newspapers. If you do not share food with them in the kitchen where gruel is prepared, it is published. It is a fact. In public life, whether we like it or not, it happens. It is the media which conveys our feelings to the people. What we speak here, the media will write about it.
Shri Pramod Mahajan said that the House should not be adjourned. I agree with him that the House should not be adjourned for uncalled for reasons. But it is also a fact that on any issue which we do not like to agitate in the House in that manner, it will become the headlines in the media. The people in our constituency will feel like this.कुछ नहीं होता है, आप लोग सोते रहते हैं, कभी आवाज़ नहीं है, इसका क्या तरीका है? Whether it is the Akilesh model or the Pappu model or any other model, it is different. It may be a matter of dispute also. मीडिया के लोग कहते हैं कि आप लोग आवाज़ नहीं करते हैं। Then, where do you go? We are prisoners in the constituency where people say that we do not talk and shout. We are prisoners in the hands of the media. They say that all of us have become saints and we do not speak. आप लोग बोलते नहीं हैं। You are deep and down. At the same time, if we shout, they will write that decorum is not maintained. So, all these things are there. We work in a difficult situation in the Indian democracy. Therefore, let us not be fussy about it. We must serve the people with good intention and integrity. But, at the same time, if we tell them that we get Rs.4,000/- and take care of everything, that is all right. There are professionals like the former Law Minister, Shri Ashok Sen or like one of the leading legal luminaries, Shri Somnath Chatterjee. His one day’s appearance in the Supreme Court will take care of his six months cost in the constituency. … (Interruptions)
THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF INFORMATION TECHNOLOGY (SHRI PRAMOD MAHAJAN): If he gives up his seat and appears in the court, he will take care of 150 MPs!… (Interruptions)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : If I say that I can manage with Rs.4,000 or Rs.6,000, then there is no problem. … (Interruptions) I think he is deceiving himself. I do not know how he manages himself. The Government has brought forward this Bill after due consideration in the Joint Committee. The Committee has gone through the process in detail. There should not be any such impression that we are taking extra advantage of being Members of Parliament. It is not that. We are justified in what we are doing. If we are doing something wrong, people will not elect us again. I know about it. But to tell the people of our constituency that we can carry on with Rs.2,000 is very difficult. मैं किसी को बताकर आपका काम कर दूंगा, डैमोक्रेसी में ठीक नहीं है, ऑनैस्ट नहीं है।
We feel very sincerely that the Bill which has been brought forward is correct. The Government has considered something for the pensioners also. I thank the Government for that. I think more of the ex-Members of Parliament than the sitting Members. I say this because that is our permanent seat and this is our temporary seat.
With these words, I support the Bill.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): Mr. Speaker, Sir, I know that I shall not be popular to my very hon. distinguished friends here. But I am not taking a holier than thou attitude.
We have certain views which I wish to place before my distinguished friend here for their consideration. What the hon. Minister as well as my distinguished friend said here is that it is a very minimal thing and it is not even sufficient for the purpose of discharging our duties and functions to the people as their chosen representatives. Unfortunately, it is not shared by the people. We find a situation that we have to justify ourselves in raising our salaries. What we are doing, we are deciding for ourselves. We are trying to justify that this is right. This is precisely what I have been trying to say in my humble way for quite some time. But it has not met with anybody’s approval so far. I am not really trying to cross swords with him.
He has taken some credit that he is having a full debate on this Bill here and that he has no guilty feeling, but his speech showed that he has some guilty feeling, because he said that he was putting a lid on this for five years and he referred to article 106 of the Constitution, his compulsions, etc. Then he is taking refuge under all party deliberations and decisions. He has again taken credit that we have become income tax payers now and there is a gentleman to grab it, and he has said that the salary of MPs is now based on some indexing. How many people’s income is based on indexing in this country?
Sir, I remember – I have said it in this House also – the pathetic statement of a housewife in this country who wrote a letter to me in which she said: "My husband works in a Government company, he is still in his job, but he has not got salary for eight months. Tell me, how do I feed my children?" I did not know how to reply to her. I took that letter to the hon. Prime Minister and asked him what should I reply to her. Of course, he felt anguished, no doubt about it, knowing Shri Atal Bihari Vajpayee, as I hope I do, and he said that he would certainly look into it and see what can be done.
Therefore, I have two submissions here. As I said already, I am not saying that we are infallible and better people. Both the hon. Minister and Shri Priya Ranjan Dasmunsi have referred to media comments. I have not seen one newspaper – based either in Delhi or Kolkata or Mumbai or in other places – which has not criticised us extremely harshly. Secondly, thanks to the development of Information Technology, we are having Opinion Polls daily, conducted by every newspaper in this country. In all those Opinion Polls that I have tried to notice, 85 to 90 per cent of the people have strongly criticised us. If the hon. Minister is impervious to public opinion, then it is all right. Should he be impervious to it, then why should he be referring to newspaper comments and why should he be trying to answer the media? He has very ably defended this Bill. But why should he take note of the media comments? If he does not have any response to what is appearing in the Press, then why should he read the newspapers in the morning?
Sir, how do we judge public opinion? We judge public opinion by our personal interactions, by seeing what is appearing in the Press and by seeing the Opinion Polls that are coming up through the Internet. That is how we judge public opinion and then we try to respond to that. I will be happy if I am corrected, but there is not a single newspaper or a single Opinion Poll, which has said that this raise is justified. Coupled with that, it has come at a time that the hon. Speaker had to take the initiative and put a Lakshman Rekha. The hon. Minister is very happy that we have almost made up the lost time, but I find from his figures that still half-an-hour is left. This Bill has come at a time when the people of this country are discussing our conduct everyday. We are also feeling anguished. I am sure most of us are showing concern about whether we are able to utilise the time which is available to us for the purpose of nation-building activity or for solving our national problems.
We have two aspects here. One is the procedure and the other is the merit of the Bill. I will very briefly deal with both of them. I believe that it is only the Ministers and Members of Parliament who fix their own salaries; no other person in any category - subject to correction, if the Minister knows anything in this regard, I would like to know – fixes his own salary.
Therefore, is it or is not proper, I am appealing to everybody… (Interruptions) यही होने वाला है।
श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) : हाउस सुप्रीम नहीं है क्या? कौन तय करेगा?
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : बोलने दीजिए। बोलने के लिए ही बोलते हैं।
अध्यक्ष महोदय : यह ठीक नहीं है।...( व्यवधान)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Sir, if this is the way they treat their fellow Members in the House, it is all right. This is what and that is why we are coming down.
If that is so, should we not try to find out a mechanism by which we can have it done in a proper and in an objective manner? When you decide something for yourself, there is bound to be subjectivity and this is precisely what has happened. Why is it 25,000 extra calls, etc.? Why not it is 30,000 or why not 10,000 calls?
The hon. Minister has referred to the salary on the basis of 1954 index and by counting this, it shows an amazing problem that Rs.400 has almost come to about Rs.12,000, therefore, it is justified. But what about the people"s cost of living? Is it less? Are we compensating everybody in this country adequately? Therefore, the procedure I am saying, to avoid subjectivity and embarrassment for the Members, we have been requesting all sections, and I am sure on principle nobody is against it, is this. Could we not have a machinery which will take objective factors into consideration and come to certain decisions?
The hon. Minister has referred to article 106 as if we are bound by this. Article 106 postulates a law. The Parliament can tomorrow make a law saying it will be decided in this manner and the decision of that Committee will be final. In my humble way, I have been suggesting that it may be the Presiding Officer or if he is not willing, I do not mind even Cabinet Secretary or Finance Secretary or C&AG and officers like them. Let them apply objective standards. What is the cost of living? Although ordinarily I would not like to be judged or our matters to be decided by the bureaucracy, if the Presiding Officer is not willing, some other machinery can be found out. That can be done easily upon discussion, as to what sort of body can be taken. It might be that on their objective assessment, they may come to Rs.14,000 why only Rs.12,000.
What I have been respectfully submitting is that if such an institutional arrangement is made, then at least nobody will say and we will not have the embarrassment of fixing our own salary.
SHRI ADHIR CHOWDHARY (BERHAMPORE, WEST BENGAL): What about the perks that Shri Jyoti Basu is enjoying?
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I know some people have allergy, but I think any country, considering his contribution in the Indian politics would have done it much more. However, but all these matters… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Nothing should go on record except Shri Somnath Chatterjee"s submission....(Interruptions) …* SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Sir, I am respectfully and with all humility submitting before you that this is not the first time that we are facing this situation. I really appreciate the efforts of the hon. Minister, but because it has almost happened let us do it just before the rising of the House so that nobody takes notice of it and we go stealthily back home and do it quietly. Why have we been doing it quietly? Why have been doing it at the last hour, at the last minute? We are doing it to avoid public attention. Therefore, some sort of guilty conscience is there, Mr. Minister. I have not yet said that it is not justified at all.
* Not Recorded 15.00 hrs. But even if it is justified, do it in a manner which would be totally transparent and do it on a totally objective basis so that nobody can point a finger at us. This is permissible under article 106.
Next is the question of whether it is appropriate time to do this. Sir, we have problems. The hon. Finance Minister himself has been saying that he is optimistic that we will get over this recession. The problem is there. Today, the country is passing through a critical time. Let us share his optimism. I hope, we shall get over this industrial recession. Even today, the country is in a situation where our godowns are full but the people do not have the purchasing power to purchase food. This is the position in this country. There is a huge number of unemployed. Everybody knows about it. I do not have to educate anybody. I do not have the presumptuousness to do that also. Is this the time when we should invite for ourselves such criticism, as is uniformly being levelled at us, that when the country is in a very difficult economic situation where people are facing tremendous hardships – there is loss of jobs; there is a crisis in agriculture; there is a crisis in industry and everywhere else – we are thinking of ourselves. Is this the time when we should think of ourselves first?
Therefore, because of these reasons, I am appealing to my friends. As I said earlier at the beginning, I am not taking a holier than thou attitude; I am not saying that I am a better person or I am a superior Member. I am not saying that. I hope, I shall never even dream of it. But I am saying that these are the matters which are agitating the people. We are representing the people; it is not that people are representing us. If we do not articulate their views, their points of view, their problems, the hardship they are going through, who would do that? They say that we are talking of it, we are discussing about this and that, and so many things, and quietly, we are raising our own salary. Maybe, I am not saying. … (Interruptions)
He has rightly said. When I first came in 1971, I had a good stenographer for Rs. 300 per month. … (Interruptions) He is right. I am not paying. Fortunately, the Chairmen are provided with stenographers. Otherwise, I would have been in problem because the Minister keeps watch over everybody, but he does not keep watch over me. I am sorry that I do not go to practise any longer for the last four or five years. Therefore, he is not. The Finance Minister is losing some money, not much. That is different.
Sir, this is the issue. We want to place it. As a political party, they do not agree with us. I know that, but please, they should not ridicule us for our holding a particular view. I know that there is always a dig `well, you oppose but you take it.’ I know that this is a very obvious comment. Out of 795 Members, if 45 Members do not take it, the Finance Minister will not be any better off. It will be symbolism and everybody knows that the largest part of it goes to my party. That will be benefited. There is no doubt. … (Interruptions)
SHRI PRAMOD MAHAJAN : This should not be taken as an anti-party activity because the money goes to the party and you are not allowing it to be passed.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : Sir, that is our system. They cannot think of it, but we are doing it. That is our commitment to the party. Everybody know it. This is no secret anywhere.
I know that it will be passed today by a thumping majority. I am only saying that even now, instead of the hon. Minister patting himself on the back thinking that he has put a lid for five years - he need not wait for five years - let the hon. Speaker apply his mind. I am sure that the Chairman of Rajya Sabha can apply his mind. We have got very distinguished Ministers here. Some are, of course, sleeping. … (Interruptions) They are prone to sleep more than others. … (Interruptions) Therefore, Sir, I am requesting that let us conduct in a manner that nobody can point out a finger at us.
At the same time, the needs of the Memebrs could be looked into objectively so that what is necessary could be given to them. This is our view and we wish to express that view.
SHRI SUNIL KHAN (DURGAPUR): Sir, the employees of a few public sector units have not been receiving their salaries for 25 months… (Interruptions) I would like to request the hon. Finance Minister that he should see to it that they get their salaries immediately… (Interruptions)
कुमारी ममता बनर्जी (कलकत्ता दक्षिण):अध्यक्ष महोदय, मैं इस बिल पर कुछ सुझाव देने के लिए खड़ी हुई हूं। श्री प्रमोद महाजन एम.पीज़ सैलरी, ऐलाउंसेस और पेंशन बिल लाए हैं। बहुत सारे एम.पीज. ऐसे हैं जिनका इस सैलरी से गुजारा नहीं होता, यह बात ठीक है। मैंने श्री दासमुंशी को सुना है। उन्होंने प्रैक्टिकल बात कही है। श्री प्रमोद महाजन जो बिल लाए हैं, यह उनकी मर्जी का बिल नहीं है, श्री के.पी. सिंहदेव की कमेटी की रिकमैंडेशन जब सरकार के पास आई, उसके बाद सरकार इसे कंसीडर करने के बाद पार्लियामैंट में लाई है। श्री सोमनाथ चटर्जी ने इस बिल को एप्रीशिएट किया है, यह जस्टिफाइड नहीं है - यह बात भी नहीं कही गई है। उन्होंने यह भी कहा है कि प्रोसीजर को थोड़ा चेंज करना चाहिए, प्रोसीजर के साथ उनकी पार्टी का कुछ फर्क है। मैं कुछ सुझाव देना चाहती हूं। हमारे पार्लियामैंट में दो तरह के एम.पीज़. हैं - एक वे हैं जो होल टाइमर हैं, सिर्फ पौलीटिक्स करते हैं, जिनकी और कोई सोर्स ऑफ इनकम नहीं है और दूसरे वे हैं जो प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं, उनको उधर से तनख्वाह मिलती है और इधर से भी मिलती है। कालेज में प्रोफैसर हैं, उधर से भी तनख्वाह लेते हैं और इधर से भी लेते हैं, जो लीगल प्रोफैशन में हैं जैसे सोमनाथ दादा, इनको महीने में कम से कम दस लाख रुपये तो मिलते ही हैं।…( व्यवधान)
SHRI SOMNATH CHATTERJEE : I shall donate it to the Trinamool Congress… (Interruptions)
कुमारी ममता बनर्जी:कुछ बड़े लोग हैं। एम.पी.लैड में पार्लियामैंट दो करोड़ रुपये देती है लेकिन उनकी तनख्वाह ही दो करोड़ रुपये होती है। हमारे देश में ऐसे बहुत से एम.पीज़ हैं जो क्वालीज, टाटा सूमो में आते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो पैदल चलते हैं, जिनके पास गाड़ी नहीं है। इसमें फर्क है। इसलिए मैं सुझाव देना चाहती हूं कि जिनको डबल सैलरी मिलती है, उनकी एक सैलरी काट दीजिए, एक सैलरी मिलेगी। इससे सरकार का फंड सेव हो सकता है। जो बिजनैस करते हैं, उनकी कितनी कमाई है, यह कहना मुश्किल है।…( व्यवधान)
श्री सुनील खां (दुर्गापुर):तब तो एन.डी.ए. खत्म हो जाएगी।…( व्यवधान)
कुमारी ममता बनर्जी:चुपचाप रहिए। ज्यादा बात मत कीजिए। मेरा मुंह मत खुलवाइए।…( व्यवधान)हमारे पार्लियामैंट ने जो तरीका निकाला है, यह परम्परा है कि पार्लियामैंट में किसी मैम्बर के अंडर कोई स्टैंडिंग कमेटी होती है, एक्सपर्ट कमेटी होती है, जे.पी.सी. होती है, कोई सरकार की कमेटी होती है। यदि तरीकों के बारे में कोई डिफरैंस ऑफ ओपीनियन है तो उसके लिए जरूर कोई तरीका निकाल सकते हैं। यह बात ठीक है कि सी.पी.एम. की सैलरी पार्टी फंड में चली जाती है, वे लोग चाहते हैं कि टी.ए., डी.ए. बढ़े लेकिन सैलरी नहीं बढ़े क्योंकि सैलरी पार्टी फंड में चली जाती है। जो बात श्री चटर्जी ने यहां रेज़ की है, सैलरी एम,.पीज़ ने फिक्स की है। वैस्ट बंगाल असैम्बली में सैलरी किसने फिक्स की है? मैं चैलेंज करना चाहती हूं कि वहां भी सरकार सैलरी फिक्स करती है, एम.एल.एज़. फिक्स नहीं करते। अगर वैस्ट बंगाल में एक तरीका है तो इधर दूसरा तरीका कैसे होगा। वैस्ट बंगाल असैम्बली में भी सैलरी बढ़ी है, इसके लिए कोई बाहर की कमेटी नहीं है, एम.एल.एज ने ही किया है। वहां कर सकते हैं लेकिन इधर नहीं कर सकते, यह क्या फर्क है, मुझे नहीं पता।
मैं एक सुझाव और देना चाहती हूं कि जब हम एम.पी. लोग किसी कमेटी की मीटिंग में बाहर जाते हैं तो हम गवर्नमेंट का मनी सेव कर सकते हैं। Where do we stay? We stay in five-star hotels. Instead of staying in the five-star hotels, ये स्टेट गैस्ट हाउस में रुक सकते हैं, इसमें गवर्नमेंट का बहुत रुपया बच सकता है। हम जे क्लास में ट्रेवल करते हैं, Since 1992 I have not travelled in J Class in the flight. I always traveled in economy class. I have saved at least Rs.10 lakh for the Parliament. जे क्लास में अगर हम टिकट खरीदते हैं तो हमें टी.ए. डी.ए. भी ज्यादा मिलता है और अगर हम इकोनोमी क्लास में चढ़ते हैं तो हमारा टी.ए. डी.ए. कम होता है, लेकिन तब भी हमने गवर्नमेंट की मदद की है। अगर हम जे क्लास में ट्रेवल नहीं करें तो एक ट्रेवल में हमारा तीन-तीन हजार रुपया करके छ: हजार रुपया बच सकता है। हम लोग ऐसा कुछ तरीका निकालें कि हम भी गवर्नमेंट का रुपया सेव कर सकते हैं। हमारा यह सुझाव है, इसके लिए किWe should not be hypocrites. We should not have double standards.यह बात है कि हम लोग भी कभी-कभी जनता के ऊपर ऐसा असर पड़ता है कि एक तरफ सी.पी.एम. पार्टी लेती है, लेकिन हर दफा अपोज करके पब्लिक को समझाते हैं कि हमने बहुत अपोज किया, लेकिन सैलरी के लिए बहुत सारे लोग एंक्ससली वेट करते हैं। लेकिन यह बात भी सच है कि ये कुछ नहीं करते हैं। हर टाइम आम जनता के लिए काम करते हैं। आज कोई गवर्नमेंट हॉस्पीटल में इंजैक्शन भी नहीं देते, कोई हार्ट पेशेंट आता है तो एक इंजैक्शन के लिए छ: हजार रुपये देना पड़ता है, इसके लिए कोई स्टेट गवर्नमेंट नहीं देती, स्टेट हॉस्पीटल्स मदद नहीं करते, वह एम.पी. के पास आता है, किसी को बुक परचेज करनी है तो उसको करा दीजिए, किसी को लड़की की शादी करानी है तो करा दीजिए, किसी को मेडीकल ट्रीटमेंट कराना है तो करा दीजिए। कोई कहता है कि हमारा घर जल गया है, कुछ नहीं है, वह करा दीजिए। यह बात नहीं है कि एम.पीज. को ज्यादा रुपया मांगने के लिए रखा है, आज अगर बिल पास हो जायेगा तो सी.पी.एम. वाले पहले रुपया लेंगे, लेकिन आप भी बाद में यह कहेंगे कि हमने अपोज किया है। मैं एक सुझाव देना चाहती हूं, आप सी.पी.एम. वालों को बोलिये कि वे लोग एक स्पीकर वैलफेयर फंड फ्लोट करें और कहें कि वे यह रुपया नहीं लेना चाहते हैं, इसे स्पीकर वाले फंड में दे दीजिए और हमारा जो रुपया है, हम अपनी गरीब जनता के लिए काम करेंगे, हम अपने लिए काम नहीं करेंगे। इसलिए महाजन जी जो यह बिल लाये हैं, सब के साथ लाये हैं और इसमें हमारा पूरा साथ चाहते हैं, एम.पी. को खुद अपने पांव पर खड़े होने देना चाहते हैं। मेरा एक सुझाव और है कि जिस दिन काम नहीं होगा, हम लोग डेली एलाउंस नहीं लेंगे, यह आप एश्योर कीजिए, इसमें आपको हम लोगों की पूरी मदद मिलेगी।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस बिल को सपोर्ट करती हूं।
कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : अध्यक्ष महोदय, आज सरकार पेंशन और सैलरी संशोधन विधेयक लाई है। आज जो वक्त की नजाकत है, उसे सरकार को और सम्पूर्ण सदन को पहचानना चाहिए। निश्चित तौर पर जो यह पेंशन और सैलरी बिल आया है, इस पेंशन और सैलरी बिल के आने के बाद पूरे देश के अन्दर जो समाचार-पत्रों में समाचार प्रकाशित किये हैं, उससे आम जनता के बीच में संसद सदस्य उपहास के पात्र बने हैं । जो सैलरी और पेंशन बढ़ाने का प्रक्रिया है, इस प्रक्रिया पर हमें नये सिरे से पुनर्विचार करना चाहिए। प्रमोद महाजन जी, आपने कहा कि संविधान की फलां धारा को हटाना पड़ेगा तो मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर आप चाहते है कि आगे भी संसद उपहास की पात्र न बने तो निश्चित तौर पर इस सदन के अन्दर आम राय बनाकर इस धारा को हटाना चाहिए और जिस तरह से नौकरशाहों या अन्य वर्ग के लोगों की तनख्वाहें बढ़ती रहती हैं, उस तरह की व्यवस्था ही हमको करनी चाहिए। आज संसद में जो विधेयक आप लाये हैं, इस संशोधन विधेयक में १२ हजार रुपयों से, जो लोग हमारे घरों पर मिलने के लिए आते हैं, उनको हम चाय नहीं पिला सकते हैं। मैं आपसे स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूं कि वारेंट ऑफ प्रेसीडेंसी की जिस श्रेणी में, प्रोटोकोल की जिस श्रेणी में आपने हमें रखा है, उसके नीचे के लोगों को क्या प्राप्त हो रहा है और इस संशोधन के बाद भी आप हमें क्या देने जा रहे हैं, यदि दोनों का आप तुलनात्मक अध्ययन करें तो उनके आधे के बराबर भी आप हमें नदीं देने जा रहे हैं, इसलिए जो एक नकली आवरण को ओढ़े हुए हैं, इस नकली आवरण को हटाकर यथार्थ के धरातल पर हमें आना चाहिए। समाजवादी पार्टी और समाजवादी पार्टी के जितने भी संसद सदस्य हैं, ये कृषक वर्ग और मध्यम वर्ग से चुनकर आते हैं। बहुत से लोगों को लिए सैलरी का कोई मतलब नहीं होगा, लेकिन हमारे लिए सैलरी का मतलब है। इसलिए हम सीथे-सीधे यह कहना चाहते हैं कि वास्तविकता को देखते हुए आपको निर्णय लेना चाहिए औंर इसमें परिवर्तन करना चाहिए।
अभी आदरणीय दासमुंशी जी ने अखिलेश मॉडल और पप्पू मॉडल की चर्चा की है तो मैं बड़ी ही विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि केवल हमने नहीं, इस देश ने बोफोर्स मॉडल को देखा है, इस देश ने यूरिया मॉडल को देखा है, इस देश ने सुखराम मॉडल को देखा है, इस देश ने हवाला मॉडल को देखा है, इस देश ने तहलका मॉडल को भी देखने का काम किया है। १९९१ में मैं उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य के रूप में चुना गया था।
फिर १९९३ में दूसरी बार विधान सभा का सदस्य चुना गया। जब मैं पहली बार विधायक चुना गया था, तब से लेकर बराबर लोक सभा की कार्यवाही को देखा करता था। अभी जिस तरफ हमारे माननीय सदस्य दासमुंशी जी ने इंगित किया, मैं कहना चाहता हूं कि सरकार में जो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे थे, वे लोग भी कभी वैल में गए हैं। जो लोग सरकार में नम्बर दो पर रहे हैं, पिछले दिनों वे भी वैल में गए हैं। १३वीं लोक सभा की कार्यवाही का सारा रिकार्ड उठाकर देख लें। नेता प्रति पक्ष भी वैल में गई हैं। इसलिए जिनके अपने घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घर पत्थर नहीं मारते। सूप बोले सो बोले, छलनी भी बोले, जिसमें ७२ छेद। हम साफ शब्दों में कहना चाहते हूं कि इस तरह की आलोचनाएं बंद होनी चाहिए। आपको अपने को बहुत बड़ा विद्वान नहीं समझना चाहिए। मैं साफ शब्दों में कहना चाहता हूं कि अभी परसों जो इस सदन के अंदर चर्चा हुई और जो विवादित दस्तावेज प्रस्तुत किया गया, उस पर सरकार ने एक निर्णय लिया तो जिस तरह से लोक सभा के अंदर आप गिड़गिड़ा रहे थे, उससे मेरे जैसे संसद सदस्य का सिर शर्म से झुक जाता था। हम लोग तो पहली बार यहां आए हैं। लेकिन हम कहना चाहते हैं अगर कोई लक्ष्मण रेखा खींचनी है तो उसका पालन पहले वरिष्ठ लोगों को करना चाहिए। आदरणीय मुलायम सिंह यादव जी और बेनी प्रसाद वर्मा जी ने जब से तय हो गया वे कभी वैल में नहीं गए हैं। अगर अखिलेश माडल और पप्पू माडल गलत है तो जिन्होंने उसका अनुसरण किया है, उनको संसद के अंदर जवाबदेही देनी चाहिए कि ऐसा क्यों किया गया।
श्री प्रियरंजन दासमुंशी: अखिलेश जी मैं माफी मांगता हूं आपसे, लेकिन मैंने ऐसा नहीं कहा।
कुंवर अखिलेश सिंह: आदरणीय नारायण दत्त तिवारी का जो आचरण है, वह १०० गुना बढि़या है। वे हमारी पी.ए.सी. के चेयरमैन हैं। एक वरिष्ठ के रूप में वे हमारा मार्गनिर्देशन करते रहे हैं। एक वरिष्ठ संसद सदस्य के रूप में उनका मार्ग निर्देशन हमें देखने को मिलता है, निश्चित रूप से वह हमारे लिए अनुकरणीय है। जो लोग इस तरह की बात कर रहे हैं, उनसे मेरा विनम्रतापूर्वक आग्रह है कि इस तरह के आक्षेप लगाना बंद करें।
हम प्रमोद महाजन जी को इस बिल के लिए बधाई देते हैं। उन्होंने कई बातें बातें हमारे सम्बन्ध में सभा पटल पर रखने का काम किया है। हम इस लोक सभा के अंदर नौ बजे आते हैं और नियमानुसार नोटिस देने का काम करते हैं। नोटिस के अंतर्गत हम अपनी बात रखने का यहां प्रयास करते हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि आज जो भी राजनीतिज्ञों की दुर्दशा हो रही है, यह मात्र इसलिए हो रही है कि हम सभी लोग मिलकर एक दूसरे पर दोषारोपण करने का कार्य कर रहे हैं। आज राजनीतिज्ञ जो हंसी और उपहास का पात्र बन रहे हैं, वह आपसी वैमनस्यता के कारण बन रहे हैं। अभी २७ करोड़ रुपए की कही गई कि यह अतरिक्त भार पड़ेगा। यह हमें अखबारों से मालूम हुआ है। मैं कहना चाहता हूं कि अगर निर्माण कार्यों में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, जो लूट हो रही है, यहां तक कि संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास नधि योजना के अंतर्गत नौकरशाहों और ठेकेदारों द्वारा जो लूट की जा रही है, उसको रोक दिया जाए तो प्रति वर्ष २०० करोड़ रुपए से अधिक की हम बचत कर सकते हैं। अन्य तमाम निर्माण कार्य जो रहे हैं, उनमें भ्रष्टाचार रोक दिया जाए तो हजारों करोड़ रुपए की प्रति वर्ष बचत हम कर सकते हैं।
मैं आपसे साफ शब्दों में कहना चाहता हूं कि जब हम अपनी सैलरी को बढ़ा रहे हैं, अपनी सुविधाएं बढ़ा रहे हैं, तो हमें यह भी व्रत लेना चाहिए कि जो लूट हो रही है, उसको बंद करके इस घाटे को पूरा करने का काम करेंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ इस बिल का समर्थन करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI: Sir, I did not mean to say so to hurt the feelings of any distinguished Member. What I only tried to say was that ओपोजिशन की तरफ से जो इश्यू आते हैं, सबसे ज्यादा अखिलेश जी एजीटेट करते हैं। इसको मैंने माडल के आधार पर कहा है। अगर मेरे कहने से उनको चोट पहुंची है तो मैं अपने शब्द वापस लेता हूं।
MR. SPEAKER: Shri Priya Ranjan Dasmunsi, please take it sportingly.
श्री प्रमोद महाजन : अखिलेश जी ने आज तय किया है कि वे मुलायम सिंह यादव जी वाले माडल का पालन करेंगे और वैल में नहीं जाएंगे। वे कांग्रेस के माडल को फालो नहीं करेंगे।
कुंवर अखिलेश सिंह: हम लोग नारायण दत्त तिवारी जी वाले माडल को एडाप्ट करेंगे। दासमुंशी जी ने जो बात कही है, अगर मेरी बात से उनको कोई कष्ट पहुंचा हो तो मैं उसके लिए क्षमा चाहता हूं। मैं इनके माडल का समर्थन करूंगा।
श्री राशिद अलवी (अमरोहा):अध्यक्ष महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इस बिल पर बोलने की इजाजत दी। यह इन्तहाई सेंसटिव बिल है। इस बिल की सारे देश के अंदर बड़े पैमाने पर चर्चा है। हिन्दुस्तान के सारे अखबारात इस बात को लिख रहे हैं कि पार्लियामेंट के मेम्बर अपनी तनख्वाहों को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। अखबारात पढ़कर ऐसा एहसास होता है जैसे हम लोग किसी गुनाह के हिस्सेदार हो रहे हैं। लेकिन यह काम और इसकी जिम्मेदारी केवल दूसरों पर नहीं है।
१५२० hrs. (उपाध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए) इसकी जिम्मेदारी हमारे अपने ऊपर है।
हम लोगों ने इस देश के अंदर पोलटिकल आदमी की इज्जत को इतना खराब कर दिया है कि आज आम आदमी ने पोलटिकल आदमी पर भरोसा करना छोड़ दिया है। यह दुख और तकलीफ की बात है। यह देश दुनिया का अकेला देश है जहां एक बहिन अपने भाई की कलाई में एक कच्चा धागा बांधती है और उससे एक अटूट विश्वास पैदा होता है और उससे वह अपना विश्वास प्रगट करती है लेकिन इस देश की बदकिस्मती है कि लोगों ने राजनैतिक नेताओं पर विश्वास करना छोड़ दिया है। यहां जब मैम्बर्स की सैलरी बढ़ाने की बात आ रही है तो देश के अंदर आम तौर से इस बात को क्रटिसाइज ही किया जा रहा है। जो सैलरी बढ़ाने का काम कर रहे हैं, वह सैलरी भी इस काबिल नहीं है कि एक गरीब आदमी जो गरीब पार्लियामेंट का मैम्बर है, वह अपने आप को इस सैलरी के अंदर एफोर्ड नहीं कर सकता है।
आज स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक चपरासी की तनख्वाह भी १२००० रुपये से ज्यादा है। जो फॉरेन बैंक्स हैं, उनके मामूली क्लर्क की तनख्वाह भी इससे ज्यादा है। अभी ज़ी टी.वी. ने एक सर्वे किया था जिसके अंदर पूछा गया था कि एमपीज को दिल्ली में रहने के लिए मकान मिलना चाहिए या नहीं मिलना चाहिए। इस पर अस्सी प्रतिशत लोगों की राय थी कि नहीं मिलना चाहिए और अगर यह पूछा जाये कि किसी चपरासी को मकान मिलना चाहिए या नहीं मिलना चाहिए तो अस्सी प्रतिशत लोग कहेंगे कि मिलना चाहिए। हमने अपनी इज्जत खुद खराब करने का काम किया है। अभी परसों क्रिकेट बोर्ड ने तय किया है कि ए ग्रेड के क्रिकेटर्स जो होंगे, उनको दो करोड़ रुपया सालाना दिया जाएगा। बी ग्रेड के क्रिकेटर्स को एक करोड़ पच्चीस लाख रुपये सालाना और सी ग्रेड के क्रिकेटर्स को ७५ लाख रुपेय सालाना दिया जाएगा। यह बोर्ड ने फैसला किया है। इतनी बड़ी रकम क्रिकेटर्स को दी जाये और पार्लियामेंट के मैम्बर्स को १२००० रुपये सैलरी पर भी लोगों के माथे पर शिकन पैदा हो रही है? मैं यहां न केवल इस बिल को सपोर्ट करने के लिए खड़ा हुआ हूं बल्कि मैं यह कहना चाहता हूं कि इसे रिव्यू करना चाहिए और इस हद तक करना चाहिए कि आम पार्लियामेंट का मेम्बर अपनी जिंदगी आराम से गुजार सके। दुनिया के किसी भी एमपी से हिन्दुस्तान के एमपी की सैलरी कम है। जो फैसलिटीज यहां एमपीज को दी जाती हैं, वे कम हैं। इंग्लैंड के पार्लियामेंट के मैम्बर को देखिए कि उसकी कितनी सैलरी है, उसको कितनी फैसलिटीज दी जाती हैं। उसको पूरा सैक्रेटरिएट दिया जाता है। यूनाईटेड स्टेट्स के सीनेट को देखिए। हिन्दुस्तान सौ करोड़ लोगों की आबादी का देश है जिसके अंदर करीब-करीब एक कांस्टीटयूएंसी में एक एमपी १२-१३ लाख लोगों को रिप्रेजेंट करता है। यू.पी. में पार्लियामेंट की एक कांस्टीटयूएंसी में १२-१३ लाख से कम लोग नहीं हैं। आबादी २५ लाख के करीब है, उनको हम रिप्रेजेंट करते हैं।
अखिलेश सिंह जी ने बिल्कुल ठीक कहा कि जो सैलरी १२००० की मिलने वाली है, उससे हम आने वालों को एक कप चाय भी नहीं पिला सकते। टेलीफोन जो बाहर रखा हुआ है, हम किसी भी अपने वोटर को दुनिया के किसी कोने में अगर वह टेलीफोन करना चाहता है तो कोई एमपी अपने वोटर को न नहीं कह सकता। एमपी जो भी टेलीफोन करता है, वह अपने लोगों के लिए करता है, अपने लिए नहीं करता है। अपने वोटर्स के लिए और लोगों को सहूलियतें पहुंचाने के लिए करता है। इसलिए मैं प्रमोद महाजन जी से दरख्वास्त करना चाहता हूं कि इस पर एक बार रिव्यू करें और एमपीज को इतना दें कि वह अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा सके और इसके साथ ही महत्वपूर्ण बात यह कहना चाहता हूं कि एक्स-एमपीज के बारे में हमें सोचना चाहिए। जो एक्स एमपीज हैं, हमारा कोई प्रधान मंत्री ऐसा नहीं है जो एक्स एम.पी. नहीं रहा हो। हम सबको एक दिन एक्स एमपी बनना है।
एक्स-एमपीजी की कोई बात नही करता है। मुझे बिहार में एक कैबिनेट मनिस्टर थे, इन्ताह ईमानदारी आदमी, एक बार कैबिनेट मनिस्टर बन गए । मैं पटना जा रहा था, उनकी यह दुर्दशा थी कि फुटपाथ पर पांच-पांच रुपए में किताबें बेचने का काम कर रहे थे। यह मैंने अपनी आंखों से देखा है। बिहार सरकार के कैबिनेट मंत्री और फुटपाथ पर पांच-पांच रुपए में किताबें बेचने का काम कर रहे थे।
श्री राजो सिंह (बेगूसराय): १९७७ में रहे होंगे।
श्री राशिद अलवी : महोदय, मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। राजनीति में हम लोग इसलिए नहीं आते हैं, जब राजनीति से बाहर हो जायें, रिटायर हो जाएं, तो हमारी दुर्दशा हो। हम दूसरों को इज्जत देना चाहते हैं। इस सरकार से निवेदन करेंगे कि एक्स-एमपीज के बारे में जो समति ने सिफारिशें की है, उन पर विचार किया जाए और उनको फैसलिटीज देने के बारे में विचार किया जाए।
इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं सबसे पहले प्रमोद महाजन जी को बधाई देता हूं । इस विधेयक पर बहस शुरु होने से पहले अपनी भूमिका में सांसदों की कठिनाई के बहुत संक्षेप में रखा है। इसके बाद कई माननीय सदस्यों इस चर्चा में भाग ले रहे हैं। इस चर्चा में कई बातें सामने आई हैं। बहुत से माननीय सदस्यों का मानना है, जो भी पैसे बढ़े हैं, शायद इन पैसों से हमारा काम नहीं चल पाएगा। अखबारों में चर्चा है और जनता द्वारा जनप्रतनधियों की आवाज, इसकी भी चर्चा आई है। एक अखबार "सहारा"ने तो यहां तक लिखा है - " सांसद मालामाल"। मैं इस विधेयक पर दो-तीन बातें सदन में रखना चाहता हूं।
महोदय, अखबारों में बड़े जोरशोर से चर्चा हैकि सांसदों के पैसे बढ़ गए, उनका वेतन तीन गुना हो गया। इनकी सुख-सुविधायें बढ़ायी जा रही हैं। समति ने सिफारिश की है कि तनख्वाह ४००० रुपए से १२००० रुपए होनी चाहिए। ४००० रुपए से १२००० रुपए बढ़ाने के बाद शायद ३० परसेंट इनकम टैक्स की व्यवस्था इसमें की गई है। अगर १२,००० रुपए में से ३० परसेंट निकाल लें, तो लगभग ४००० रुपए इसमें निकल जायेंगे। इसके बाद जो फर्नीचर भाड़े पर दिया जाता है, कुछ उसमें निकल जाएगा। यानि, १२,००० रुपए जो हमें मिलेंगे, उसमें से लगभग ६०००-७००० रुपए काट कर मिलेंगे और सिर्फ ५,००० रुपए खर्च के लिए मिलेंगे। इसके ऊपर अखबार लोगों को बता रहे हैं कि सांसद मालामाल हो रहे हैं।
अब मैं अन्य सुविधाओं पर आना चाहता हूं। प्रतदिन का भत्ता ४०० रुपए से ५०० रुपए किया गया है। मैं मुम्बई या मद्रास की बात नहीं जानता हूं, लेकिन उत्तर भारत बिहार और उत्तर प्रदेश में विषय में मैं जानता हूं। जब संसद का सत्र शुरु होता है, तो क्षेत्र से लोग ट्रेन पर चढ़कर दिल्ली आ जाते हैं और सांसद के घर पहुंच जाते हैं। ऐसे में सांसद के आवास का खर्च भी बढ़ जाता है। इसके साथ ही चाय की व्यवस्था के साथ-साथ रहने की व्यवस्था और भोजन-पानी की व्यवस्था भी करनी पड़ती है। हमारे जैसे लोग तो एक हजार किलोमीटर दूर गांव से गेहूं-चावल ट्रेन पर लदवाकर यहां लाने का काम करते हैं। इतने पैसे से उन लोगों का काम चलता होगा, जो व्यवसाय में काम करते हैं, रोजगार का काम करते हैं या दूसरे पेशे में काम करते हैं, उनका काम चलता होगा। मैं इस बात को मानने को तैयार नहीं हूं, जो केवल राजनीति करते हैं, उनका इस राशि से काम चलता होगा। इतनी राशि से सासंद की भूमिका ईमानदारी से नहीं होती है। …( व्यवधान)उपाध्यक्ष महोदय, ४०० रुपए से ५०० रुपए प्रतदिन भत्ता बढ़ाया गया है। मैं उत्तर प्रदेश और बिहार की बात कहता हूं, शायद ही कोई ऐसा सासंद होगा, जिसका प्रतदिन का खर्चा एक हजार रुपए से कम होता होगा, ५०० रुपए से काम चलने वाला नहीं है।
इसलिए रोज-रोज बढ़ाने की जरूरत नहीं है। आप घोषणा कर दीजिए, ५०० रुपए के बदले में एक हजार रुपए प्रतदिन की घोषणा कीजिए। आप कहते हैं कि साढ़े नौ हजार रुपए आपके आफिस खर्च के लिए दे रहे हैं, इसे बढ़ा कर १४,५०० कर रहे हैं। साढ़े नौ हजार रुपए में से छ: हजार रुपए जो हम स्टाफ रखते थे, उसे आप वेतन के रूप में देते थे। उसे चैक मिलता है, जो उसके खाते में जाते हैं। २५०० रुपए पैड और अन्य खर्चों के लिए देते हैं। १००० रुपए डाक टिकट के लिए देते थे। आप जो पी.ए. का वेतन देते थे, उसके अलावा आप साढ़े १४ हजार रुपए कर रहे हैं। अगर आप उसी में से कर रहे हैं तो हम कहते हैं कि साढ़े १४ हजार रुपए वापस ले लीजिए और आप हमें सरकारी कर्मचारी दे दीजिए, जो हमारे पी.ए. का काम करे। हमें पैसे की जरूरत नहीं है। आप जितने पैड की हमें जरूरत हे, उसे पूरा कीजिए।
महोदय, दिल्ली में जो सांसद की जिन्दगी है, उसे जितना परिश्रम करना पड़ता है, कागज और कलम का उपयोग करना पड़ता है, स्टाफ रखने के लिए उसे पैसे की कहीं न कहीं से व्यवस्था करनी पड़ती है - कोई मुफ्त में नौकरी नहीं कर सकता, उसे पैसे देने पड़त हैं - इसलिए साढ़े १४ हजार रुपए बहुत कम हैं। आप इस पैसे को वापस ले लीजिए, यह हमें नहीं चाहिए। आप हमें सरकारी कर्मचारी दीजिए और जितना पैड वगैरह लगता है वह मुफ्त दीजिए। डाक टिकट दीजिए। आप हमें पैसे मत दीजिए। अगर आप इसे पैसे के रुप में देना चाहते हैं तो आप जितना खर्च हो सके वह करिए, हम संसदीय भूमिका का निर्वाह कर सकें उस हिसाब से आप पैसे दीजिए।…( व्यवधान )
महोदय, भ्रमण के नाम पर दो हजार रुपए की बढ़ोत्तरी की गई है, किसी भी संसदीय क्षेत्र का बनावट और खास कर वैसा क्षेत्र, जो किसी न किसी प्राकृतिक कारणों से टुकड़ों में बंटा हुआ है, नदियों और दरियाओं के बीच में बंटा हुआ हो, जो एक-दो-तीन जिलों के बीच में बंटा हुआ हो, उसका अगर नक्शा देखा जाता है तो भारत के नक्शे में जैसे सांप की तरह घूमता हुआ है। उस क्षेत्र का भ्रमण करने में अगर महीने में २० दिन का भी समय निकल जाता है तो कोई भी सांसद पैदल उस क्षेत्र में नहीं घूम सकता है। अगर वह गाड़ी पर घूमेगा तो गाड़ी, पेट्रोल और ड्राइवर का प्रतदिन का १५००-२००० रुपए देना पड़ता है। आप दो हजार बढ़ाते हैं तो वाहवाही लूटते हैं और अखबार वाले भी छापते हैं। हम अखबार वालों को आपके माध्यम से निमंत्रण देते हैं कि वे आएं और हम से मिलें। वे सारे पैसे ले लें और और पूरे महीने का खर्चा और भ्रमण क्षेत्र का काम चलाएं। ये लोग नौकरी करते हैं तो ५०,००० रुपए से एक लाख रुपए तक लेते हैं। हम अपने २४ घंटे के समय में से १८ घंटे का समय जनता की सेवा में देते हैं। सुबह उठ कर संसदीय कार्य करते हैं और रात को उनसे बात करते हैं। अस्पताल में मरीज़ का इलाज कराना और अन्य कई तरह के काम कराते हैं तो हम पर इस तरह के कमेंट किए जाते हैं। अगर इस तरह की पत्रकारिता हुई तो क्या यह एक खोजी पत्रकारिता का ही उदाहरण होगा। जो सच्चाई को जनता के सामने न लाएं और इस प्रकार गलत तरीके से कमेंट किए जाएं।
प्रमोद महाजन जी ने दो बातें बड़ी ईमानदारी पूर्वक स्वीकार की हैं कि सब टेलीफोन अपने लिए ही नहीं किए जाते और पानी भी सिर्फ अपने ही सांसद नहीं पीते। पत्रकार भी कभी-कभी चले जाते हैं तो उन्हें भी बोतल से पानी पिलाना पड़ता है और उसके भी पैसे देने पड़ते हैं। यदि सरकार महसूस करती है कि टेलीफोन सिर्फ अपने काम के लिए नहीं, यह जनता की सेवा में प्रयोग किया जाता है तो यह जो आपने २००० रुपए से ४००० रुपए और २५००० रुपए से ५०००० रुपए बढ़ाए हैं, इसे आप बिल्कुल समाप्त कर दीजिए। आपने मंत्रियों के टेलीफोन फ्री किए हुए हैं। उनके यहां पानी के पैसे भी नहीं लगते हैं, सांसद क्या लोअर ग्रेड के हो गए - ऐसा नहीं होना चाहिए। आप टेलीफोन और पानी की जितनी आवश्यकता है उसके अनुसार मुफ्त मुहैया कराइए। उस पर आप किसी तरह का प्रतिबंध न लगाएं। बिजली की भी आप व्यवस्था कराएं।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं दो और बिन्दुओ पर बोलकर अपनी बात समाप्त कर दूंगा । आजकल सासंदों की कार्यशैली पर टीका-टिप्पणी होती है, उनके वैल में जाने पर टीका-टिप्पणी होती है, हालांकि हम इसके भुक्तभोगी भी हैं और वैल में जाने पर एक घंटे की सजा भी पा चुके हैं, लेकिन वैल में जाना और प्रोटैस्ट करना किसी नियम के विपरीत नहीं है । हम कहना चाहते हैं कि जब अपनी बात रखवानी होती है तो उसे मजबूती से रखने के लिए वैल में जाकर प्रोटैस्ट किया जाता है। उससे सदन का कोई अपमान नहीं होता। इसलिए आप इन सब बातों को गम्भीरता से लें । आये दिन इन कारणों से संसद बंद हो, यह कोई सदस्य नहीं चाहेगा । लेकिन प्रोटैस्ट का एक तरीका होता है, जनता के सवाल पर अगर प्रोटैस्ट नहीं किया जाए तो हम यहां किराने की नौकरी करने या मेजें थपथपाने के लिए नहीं आये हैं । जनता की आवाज बुलन्दी के साथ उठानें के लिए वैल में आना पड़ता है।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं कि जहां तक सांसदों की ईमानदारी पर अविश्वास का सवाल उठता है, आप कमेटी बनाकर पूरे देश में इस बात की जांच करवा लें कि कितने लोगों ने दिल्ली जैसे शहर में मकान बनाया हुआ है और कितने ऐसे लोग हैं जो छोटी नौकरी करके दिल्ली में मकान बनाये हुए हैं । जब से आजादी मिली है, तब से संसद का जीवन शुरू हुआ है, तब से अब तक कितने लोग सासंद बनकर आये और कितने चले गये। आप उन मकानों का आकलन करा लीजिए कि कितने लोग सासंद होने पर धनी बने हैं । आज हम सांसद कहीं जाते हैं तो किसी से गाड़ी मांगते हैं, किसी से तेल भरवाने के लिए कहते हैं। लेकिन सासंद के पद से हटने के बाद सांसद की क्या स्थिति होती है।
प्रमोद जी आप मुम्बई के रहने वाले हैं, आप गांव की स्थिति नहीं जानते होंगें । गांव की स्थिति आपने नहीं देखी होगी। हम गांव में पैदा हुए हैं, हम गांवों की स्थिति जानते हैं । आज भी हम गांवों में देखते हैं कि जो लोग सांसद या विधायक रह चुके हैं, उनके बदन पर पहनने के लिए कपड़े तक नहीं होते हैं। उनके पास खाना नहीं होता है, उनके परिवार के भरण-पोषण में बहुत कठिनाई होती है । इसलिए मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि बहुत से सांसद जो अब इस सदन के सदस्य नहीं हैं, उनकी पेन्शन के बारे में आप गम्भीरता से विचार करें । कोई भी सांसदों की ईमानदारी पर प्रश्नचिहन नहीं लगा सकता है । जो कोई सासंदों की ईमानदारी पर प्रश्नचिहन लगाता है वह दुनिया का सबसे बेईमान व्यक्ति होता है । इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस बिल का समर्थन करता हूं और निवेदन करता हूं कि आप इसकी समीक्षा करके पैसा बढ़ाने का काम कीजिए, केवल इससे काम चलने वाला नहीं है ।
श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल):उपाध्यक्ष महोदय, संसदीय कार्य मंत्री जी सदन की नियमावली बदल रहे हैं कि जो भी सांसद वैल में जायेगा वह पांच दिन के लिए सदन से अपने आप निष्कासित हो जायेगा । मेरा उनसे अनुरोध है कि आप ऐसा मत कीजिए। नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने-अपने सदस्यों को वैल में न जाने दें । लेकिन अपवादस्वरूप अगर कोई वैल में चला जाए तो यह कोई खास बात नहीं है । नियमावली बदलकर जिस दिन लागू होगी तो उसे सबसे पहले मैं हो तोड़ूंगा । …( व्यवधान)
श्री विजय गोयल (चांदनी चौक) : इस तरह से सदन कैसे चलेगा ।
श्री मुलायम सिंह यादव : मैं यह नियम तोड़ने का ऐलान करता हूं।
SHRI M.V.V.S. MURTHI (VISAKHAPATNAM): Sir, it is embarrassing to defend oneself. This is a Bill concerning ourselves. But this is the supreme body. We are taking decisions collectively and not individually. Once we take the decisions collectively, they are not biased or influenced. Certain research has been done by Shri K.P. Singh Deo and his team of Members. He has made certain observations which have been clarified by hon. Minister of Parliamentary Affairs. I do agree that moralities have been questioned by Shri Somnath Chatterjee. Since we are taking decisions collectively, I do not think that it should be entrusted to any other body. By way of cash, the member would be e getting the salary plus daily allowance of Rs. 500/-. Apart from this, Members of Parliament are not getting any other allowance for themselves by way of cash payment. Maybe hon. Deputy-Speaker and others get more amenities. We will get Rs. 12,000 and Rs. 500/- if we attend the Session and sign the register. These payments are subjected to income tax also. That is known to everybody. Then, what is the net take home pay? Is it really substantial for a Member who wants to survive solely on this salary? Some Members may have other sources of income, but many Members do not have any other source of income apart from their salary. For a Member of Parliament, to live on this salary, it would be difficult. We should not be hypocrites. We should be transparent. While participating on other issues, the Members say that we should be transparent. Are we transparent in this? Please keep your hands on the chest and tell us, is this salary enough to lead an honest life? If it is so, then please do not increase it. Otherwise, see that Members lead a comfortable life. Let them not make any money out of it. We should allow them to lead a responsible and honest life. The Members should lead their life with dignity so that they need not collect money from people who are coming from their constituencies. Otherwise, Members have to ask them to bring food and tea. That should not happen. This is not the end of the story. We accept this for the time being. Let there be a periodical review. He said that let there be a review after three years. Why after three years? It should be kept opened. It should be reviewed if there is any material change in-between. Taking into consideration the market conditions, the living conditions and inflationary pressures, this should be reviewed periodically so that hon. Members can lead an honourable living. Then only they can discharge their duties honestly and effectively. Many of us do not have any other business. I am watching in this House. I am spending every day 12 to 15 hours to attend, to prepare myself and to come. So, where is the question of my earning money from somewhere else? Kindly accept this Bill unanimously.
Dr. B.B. Ramaiah garu is telling that there would be income tax on allowances. Please ensure that allowances are not taxed.
When the salary was Rs. 4,000/-, the car loan was Rs. 1 lakh. So, that also should be automatically increased. If an Indian car should be bought, then at least the cost of Indica should be given as loan so that Members will have a diesel Indica. The Members should also live within their means. There should be austerity. We should appear to others that we are leading an austere life so that they do not criticise us.
The other things provided are by way of amenities. This is all justified. On behalf of my Party, I support this Bill.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):उपाध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री जी ने सैलरी से संबंधित विधेयक लाते हुए दावा किया है कि इससे संबंधित कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक हम यह विधेयक लाए हैं। उन्होंने बार-बार सफाई देने का काम किया कि अपराध-बोध हमें नहीं है। उनके कहने से लगता है कि कुछ अपराध बोध है और उसकी काट में ऐसा बोल रहे हैं कि नहीं है और भी विधेयक और कांस्टीटयूशन अमेन्डमेन्ट बिल यहां आते हैं, उनके भी पक्ष और विपक्ष में बहस होती है, लेकिन ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि संविधान निर्माताओं ने सही कहा है कि संसद के लोग खुद ही अपना वेतन बढ़ायेंगे या वेतन तय करेंगे। उसमें इतना जरूर मैं महसूस करता हूं कि चूंकि अपना ही वेतन तय करना है और संविधान में प्रावधान है इसलिए वाजिब होते हुए भी हमने बार बार सहम सहम करके बढ़ाया है।
उपाघ्यक्ष महोदय, जितनी बार भी वेतन बढ़ाया गया है उतनी ही बार अखबार में छप जाता है। २०० रुपए भी यदि वेतन बढ़ा होगा, भले ही उससे ज्यादा महंगाई बढ़ गई हो, तो भी अखबार में छप जाता है और आलोचना जरूर होती है। इसलिए मैं इस सरकार पर आरोप लगाता हूं कि कैसे पिछली बार से अब तक तीन बार अखबारों में छप चुका है कि सांसदों का वेतन दोगुना हो गया, तीन गुना बढ़ गया, लेकिन वह बिल अभी तक पास नहीं हुआ है। आज इस पर चर्चा प्रारंभ हुई है।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं चाहता हूं कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के सभापति, लोक सभा के अध्यक्ष बैठकर कुछ ऐसा रास्ता निकालें जिससे हमारा वेतन भी बढ़ जाए और समाचारपत्रों में बेकार के समाचार न छपें। जो भी वेतन बढ़े वह वाजिब हो अथवा कोई ऐसी इंडिपेंडेंट बाडी हो, जो हमारे वेतन और भत्तों के बारे में डिसाइड करे। सब सांसद लोग तो रोना रो रहे हैं कि उनका वेतन कम है। इतने में गुजारा नहीं होता।
उपाध्यक्ष महोदय, जो वेतन सांसदों को अभी मिल रहा है, उससे कोई मतलब नहीं है, ऐसे बहुत से सांसद होंगे, लेकिन आपको उनका ख्याल नहीं रखना है बल्कि उनका ख्याल रखना चाहिए जो आम सांसद हैं और जिनका गुजारा इसी वेतन पर होता है। पहले स्टेशनरी का पैड आपके यहां से ८ रुपए में ५० पन्नों का मिलता था। वह बढ़ाकर अब १३ रुपए का कर दिया गया है। केवल यही नहीं, हर चीज के दाम इसी प्रकार से बढ़े हैं। इसी प्रकार से लिफाफे के दाम भी बढ़े हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, यदि क्षेत्र में किसी के यहां शादी है, उसमें जाना है, तो ३००-४०० किलोमीटर गाड़ी चलाकर जाना पड़ता है। पहले १९७८ में ११ रुपए यदि लड़की की शादी में दे दिए, तो बहुत अच्छा माना जाता था, लेकिन अब कम से कम १०१ रुपए देने पड़ते हैं। इतनी दूर जाने में हुए पेट्रोल और ड्राइवर का खर्च वह अलग है। यदि शादी में नहीं जाएं, तो वे बुरा मानते हैं। सांसदों की पीड़ा अनन्त है। मैं उनकी पीड़ा और तकलीफ का बयान नहीं कर सकता। यदि कोई मेहमान आ जाए, तो चलते वक्त ही पूछना पड़ता है कि चाय पिओ, जिससे व मना कर दे। इस प्रकार से हम उसका स्वागत भी करना चाहते हैं और कुछ खर्च भी नहीं करना चाहते। इस पीड़ा को माननीय मंत्री जी समझते हैं। इसलिए जो सांसद साधारण हालात के हैं, उनकी पीड़ा को जरूर देखना चाहिए और जरूर विचार करना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से एक और बात की ओर माननीय मंत्री जी का ध्यान दिलाना चाहता हूं। जो सांसद ११ वीं लोक सभा के सदस्य बने और लोक सभा भंग होने के बाद १२वीं और १३वीं लोक सभा में चुनकर नहीं आ सके, उन्हें पेंशन नहीं मिली। क्या वे संसद के सदस्य नहीं थे?आपके माध्यम से मेरी मांग है कि ऐसे सांसदों को जिन्होंने शपथ ले ली हो, चाहे लोक सभा अपना पूरा कार्यकाल पूर्ण किए बिना ही भंग हो गई हो, उन्हें भी पेंशन मिलनी चाहिए। जब मंत्री जी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सांसदों का वेतन बढ़ाने की बात कर रहे हैं, तो मैं कहना चाहता हूं कि उसी कमेटी ने उन सांसदों को पेंशन देने की भी सिफारिश की है। फिर उस विधेयक को क्यों पेश नहीं कर रहे हैं। हम अपने वेतन बढ़ाने की बात करेंगे, तो हमें अपराध-बोध हो सकता है, लेकिन जब हम भूतपूर्व सांसदों को पेंशन देने अथवा उनकी पेंशन बढ़ाने की बात करेंगे, तो फिर उसमें अपराधबोध किस बात का। इसलिए उनके संरक्षण के लिए मेरा आपसे आग्रह है कि उनको पेंशन मिलनी चाहिए। इस पर आपको विचार करना चाहिए और उन्हें पेंशन देने का बिल लाना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, राशिद अलवी जी ने कहा कि दुनियाभर में, कहीं भी, किसी भी देश में देख लीजिए सांसदों को इतना कम वेतन कहीं नहीं मिलता, जितना हिन्दुस्तान में मिलता है। वे दूसरे देशों के उदाहरण दे रहे थे। मैं हिन्दुस्तान की ही बात कह रहा हूं। आप हिन्दुस्तान की विधान सभाओं को देख लीजिए जिनके सदस्यों को सांसदों से ज्यादा वेतन और भत्ते मिलते हैं। यहां सांसदों को विधान सभा के सदस्यों से कम सुविधाएं हैं। मैं एक सवाल उठाना चाहता हूं जब मैं १९९६ में आया था तब ५० हजार रुपए कार के लिए लोन मिलता था।
उस पर १५ प्रतिशत इंटरस्ट क्यों है जबकि बैंक में १२ प्रतिशत इंटरैस्ट है। ५०,००० रुपये में कौन सी गाड़ी आती है? जब कुछ हल्ला हुआ तो ५०,००० रुपये का एक लाख रुपये हुआ लेकिन एक लाख रुपये में कौन सी गाड़ी आती है? आपको एक लाख रुपये का लोन करने में अपराध बोध हो रहा था। लोन अनिवार्य रूप से वापिस करना है, वह डूबने वाला नहीं है, वह एन.पी.ए. में भी नहीं जाना है, वह वसूल होना ही है, फिर इसमें कंजूसी क्यों करते हैं। बैंक से भी ज्यादा इंटरस्ट क्यों रखा है। यह मुनाफाखोरी है। इस देश में बैंक का कानून अलग है, बैंक से कम ब्याज पर ऋण लेंगे, उसका कुछ न्याय, विधान होना चाहिए, कुछ उपाय होना चाहिए। हम पांच रुपये में पार्लियामैंट की गाड़ी में जाते हैं। पांच रुपये का क्या मतलब है? कभी-कभी हम पैदल चले जाते हैं कि पांच रुपये बच जाएंगे, कभी-कभी कोई अपने साथ गाड़ी में बिठा कर ले जाते हैं। ऐसे ही श्रीमती फूलन देवी की जान चली गई। इसमें कठिनाई है। गांव का व्यक्ति चार हजार रुपये में बी.पी.एल. से भी कम में रहेगा तब जीएगा। यह ठीक है कि वाजिब बात होने पर भी कई लोग करना नहीं चाहते। सोमनाथ दादा कहते हैं कि बहुत आलोचना होती है।
मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक आदमी ने एक घोड़ा खरीदा। उसने घोड़े पर अपने लड़के को बिठा दिया और खुद साथ पैदल चलने लगा। गांव के लोगों ने जब यह देखा तो कहने लगे कि कैसा लड़का है, खुद घोड़े में बैठा है और बाप पैदल चल रहा है। फिर उसने बाप को घोड़े पर बिठा दिया और खुद पैदल चलने लगा। लोग फिर कहने लगे कि कैसा आदमी है, लड़के को पैदल चला रहा है और खुद घोड़े में बैठा है। उसके बाद दोनों घोड़े में बैठ गए। जब वे दोनों घोड़े पर बैठ कर जाने लगे तो फिर लोगों ने कहना शुरू किया कि कैसे बेवकूफ हैं, दोनों घोड़े पर बैठे हैं। उसके बाद वे दोनों घोड़े से उतर गए और घोड़े को कंधे पर लाद कर चलने लगे। रास्ते में एक पुल में घोड़ा बिदक गया और सब गिर गए। इससे क्या निष्कर्ष निकलता है।
एक कहानी और सुनाता हूं। एक कलाकार ने मूर्ति का निर्माण किया और ऊपर टांग दिया और यह कहा कि जहां-जहां से यह खराब है, वहां चिन्ह लगाएं। थोड़ी देर बाद कोई जगह नहीं बची थी जहां खराब का चिन्ह नहीं लगा। उसके बाद उसने दूसरी मूर्ति टांग दी और कहा कि जहां-जहां अच्छा है, उस पर चिन्ह लगाएं। सम्पूर्ण मूर्ति में चिन्ह लग गया कि सम्पूर्ण मूर्ति अच्छी है। इन दोनों द्ृष्टांतों को देखने से पता लगता है कि कुछ भी करने से आलोचना अवश्य होती है। लोगों को कुछ कहने के लिए मसाला चाहिए। सलिए असलियत और ट्रांसपेरैंसी पर विचार करना चाहिए।
इसमें कुछ लोगों ने आचरण पर भी विचार किया। महात्मा गांधी ने सविल नाफर्मानी का नियम बनाया था कि अंग्रेजी सल्तनत से लड़ना था। धारा १४४ के अन्तर्गत अगर पांच की जगह छ: लोग चलेंगे को जेल में जाएंगे। सत्ता पक्ष के लोग निरंकुश हो जाते हैं तो लड़ना पङता है। आदमी जान-बूझ कर कानून तोड़ता है। यह सही है कि वह खिलाफ में लड़ता है तो उसे पता होता है कि इसके लिए हमें सजा मिलेगी। हमने कई बार गाड़ी के शीशे तोड़ कर कह दिया कि एफ.आई.आर. दर्ज कीजिए, जेल भेजिए। ऐडमनिस्ट्रेशन छटपट करने लगा।…( व्यवधान)यहीं हमारे कहने का कुछ असर हुआ।
अपनी सीट से बोलने का कानून है, वह किसी ने पढ़ा है, मैं उसका १०० परसेंट पालन कर रहा हूं। अपनी सीट से ही बोलने का नियम में लिखा हुआ है, भाषण देकर तुरन्त चले जाने का नियम नहीं लिखा हुआ है, कितने आदमी उसका पालन करते हैं? उसमें पहले से भी कानून बना हुआ है कि आसन की इजाजत नहीं मानने से उन पर कार्रवाई होगी। सबसे बड़ा कानून तो यहां यह है कि आसन की इजाजत से हम लोग चलते हैं, लेकिन कभी-कभी जनता के सवाल पर हम लोग लड़ने लगते हैं। हिन्दुस्तान की महिला सीता लक्ष्मण रेखा की परवाह नहीं करती तो लड़ने वाले हम इस कानून कायदे की परवाह करेंगे?जनता की हिफाजत और जनता के सवाल उठाने के लिए चाहे जहां तक जाना होगा, वहां तक हम लोग जाने वाले हैं, ‘मुझे न कछु बांधे कर लाजा, कीन्िंह कहों मैं प्रभु कर काजा’ जिस जनता के भेजने से हम आते हैं, उसके लिए हम लोगों को कोई मान-अपमान का ख्याल नहीं है। जनता का सवाल उठाने के लिए हम लोग हैं, उसे उठाएंगे और उनकी समस्या का समाधान करेंगे। संसद में क्यों इस तरह की कठिनाई होती है, सरकार समझती है कि केवल किसी बात को टाक्ड आउट करा दिया जाये, उससे मामला खत्म नहीं होगा। सरकार की जिम्मेदारी केवल भाषण की नहीं है, भाषण की जिम्मेदारी केवल विपक्ष की है, सरकार की जिम्मेदारी एक्शन करने की है। तहलका में दो आदमी पकड़े गये और उस पर एफ.आई.आर. भी दर्ज नहीं हुई और तहलका के अखबार में अभी छपा है तो अखबार की रिपोर्ट पर पर गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो हो रहा है। इस तरह से अन्याय का आचरण जब होता है तो केवल बात से नहीं, उससे लड़कर हम लोग सरकार को बताना चाहते हैं और एक्सपोज करना चाहते हैं कि असलियत क्या है। सरकार भूल जाती है कि केवल बात से काम नहीं चलेगा, यह केवल डिबेटिंग हाल नहीं है, यह संसद् है, वह सरकार है, मैं विपक्ष हूं, दोनों से सदन चलना है, हमें केवल बोलना है, उनको बोलना भी है और काम भी करना है और गड़बड़ काम भी करना है तो गड़बड़ काम जब होगा तो हम बोलने से थोड़ा आगे करने तक बढ़ जाते हैं, इसलिए परस्पर चलते हैं। उधर पक्ष है तो इधर विपक्ष है, लेकिन मजबूत विपक्ष है और ये दोनों समाज का आईना हैं, जनता का रूप हैं, इसमें बुझाना चाहिए कि जनता तबाही में रहेगी और यहां कहेंगे कि अनुशासन है। जनता को कठिनाई होगी तो यहां अनुशासन, कानून कायदा हम लोग नहीं मानने वाले हैं और जो कार्रवाई हो, उसके लिए हम मान लेते हैं कि कार्रवाई होगी, फिर भी उसको हम लोग भुगतेंगे और फिर भी लड़ाई नहीं छोड़ेंगे और जनता की हिफाजत, जनता का सवाल, जनता की समस्याओं, कठिनाई और सरकार के द्वारा जो नाजायज काम होता है, उसको रोकने और ठीक करने के लिए हम हर स्तर तक जाएंगे, लेकिन यह सदन है…( व्यवधान )
उपाध्यक्ष महोदय : आप बिल पर कब बोलेंगे?
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :उपाध्यक्ष महोदय, इस बिल पर तो जब एक्स एम.पी. का जोड़ देंगे, क्योंकि इसमें अभी एक्स एम.पी. का नहीं है, तब हम समर्थन करेंगे। एम.पीज. को, हम लोगों को प्रसन्न करने के लिए, समर्थन करने के लिए यह कर दिया, लेकिन तहलका के लिए भी तो कुछ करिये। एक्स एम.पी. वाली जो सहूलियत है, उसको ये जोड़ दें, तब हम इसका समर्थन करेंगे, ऐसे नहीं करेंगे।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, Shri Ajoy Chakraborty will speak. Please be brief. We have already taken two hours on this Bill.
SHRI AJOY CHAKRABORTY (BASIRHAT): Thank you, hon. Deputy-speaker Sir.
I rise to oppose this Bill. Our honourable and jubilant Minister for Parliamentary Affairs has advanced lengthy arguments in favour of this Bill with a `do not care’ attitude towards the media as well as the people. Due to constraint of time, I am not going to contradict him. But Sir, I humbly appeal to the Members of this House to think about this Bill. We are creating a bad precedent before the nation. The Members of Parliament, who are the law-makers, are increasing their own salary, allowances, pension and other facilities. This decision is unjust, unreasonable and unethical also.
16.00 hrs. Sir, the poor people of our country is becoming poorer by the day. More than 70 per cent of the people of our country are living below the poverty line. Industries are closing down. Thousands and thousands of workers are losing their jobs. In this backdrop we are talking of increasing the salaries, allowances and other facilities of the Members of Parliament. It tantamounts not only to a mockery of our democracy but is also unjust, unreasonable and unethical. I, therefore, suggest that let an independent Committee be formed by the hon. Speaker and let him in his wisdom decide about the Terms of Reference of that Committee as well as the composition of that Committee.
Sir, Ms. Mamata Banerjee had cast some personal aspersions on our distinguished colleague, Shri Somnath Chatterjee. I have my sympathies for Ms. Mamata Banerjee. The people of West Bengal have given a fitting reply to her in the recently held State elections. Perhaps, in her zeal to enter the NDA Government, she has made these allegations about him. I would not like to go into the details and contradict her. I would like to remind her as well as other Members of this august House that before becoming a Member of Parliament I was a practising lawyer in the court. But after becoming an MP I have not attended courts for a single day.
Sir, the very fact that the Members of Parliament are increasing their salaries and other allowances at this juncture is not acceptable to the people of this nation. It is unjust and unethical. I would like to request that let an independent Committee be formed for this purpose and let them review the recommendations and then submit a report to the hon. Speaker. Thereafter, things could take its own course. However, at this present juncture, I strongly oppose this Bill.
MR.DEPUTY SPEAKER: Shri Radhakrishnan, are you moving your amendment?
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): Sir, I am moving my amendment.
"That the Bill be circulated for the purpose of eliciting opinion thereon by the 3rd December, 2001." (3)SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Sir, I rise to submit that politics is not a profession but professionals have come into politics. Criminals also have entered politics. Criminals and professionals are dominating the scene now. That is why I am making this comparison. Politics is nothing but a service and so we would have to approach this issue from that angle.
Sir, we should remember that a man in the street is our master. He is not in favour of a hike in the salaries and allowances of a Member of Parliament and it is evident from the newspaper reports that we are coming across. The people, at large, are not in favour of raising the salaries of the Members of Parliament. We are one amongst them. The Members of Parliament are a part of the people only and the people are suffering now. There is unemployment. There is a situation where people are even being thrown out of their jobs. They are in starvation. What are we, as Members of Parliament, doing? We are obstructing the proceedings of the House. We are sometimes not even allowing the House to function properly. The people do not get what they expect from us. This House has a dignity and that dignity is at its lowest ebb now. This is the most unsuitable time for enhancement of salaries and allowances of the Members of Parliament.
We may be justified in enhancing the salary but the people at large are not with us. They feel otherwise. It is all because of our conduct. The way we behave inside the House everyday acts as an eye-opener to the common man outside. He is very much disturbed. He is very much worried about our conduct. He is very much aggrieved by our conduct. The people at large are not in favour of this enhancement. That is why I say that the matter must be circulated to elicit public opinion. We should get the opinion of the people at large. We should get to know as to where they stand on this issue of enhancement of our salaries.
I do not stand in the way of some facilities being given. There is no difficulty in that. But, when we talk of enhancement of salary, there are other things which have to be taken into consideration and those things are quite unfavourable to us. We should not forget the man in the street. He is our master. He is not very much satisfied with our working. So, we should work hard to raise the status of the House. I would request the Parliamentary Affairs Minister to see the writing on the wall that we are facing a very difficult situation. I would request him not to take up this issue of enhancement of our salary. I would request him to withdraw the Bill without any further discussion.
श्री रामानन्द सिंह (सतना):जो सदस्य इसका विरोध कर रहे हैं, वे लोग आश्वासन दें कि वे बढ़ा हुआ वेतन नहीं लेंगे।…( व्यवधान )
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except Shri Malaisamy.(Interruptions) … * MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Ramanand Singh, please resume your seat. You cannot speak like this.
* Not Recorded SHRI K. MALAISAMY (RAMANATHAPURAM): To give a sigh of relief to the hon. Deputy-Speaker, I will hardly take two-three minutes to make my submission.
Sir, I have listened to the hon. Members from both the sides who spoke before me, right from Shri Somnath Chatterjee to Shri Varkala Radhakrishnan. I could see that most of the colleagues spoke in support of the Bill. I would like to support the Bill for various reasons.
Shri Somnath Chatterjee said that it was legally and procedurally wrong. I would like to say that it is both legally as well as procedurally right. This measure has the authority of the Constitution and the Rules framed under the Constitution. Enhancement or fixation of salary for Members of Parliament has been done by this Parliament on earlier occasions also based on that authority. Depending on the situation, a Committee had been set up and the Committee had gone into the issue in-depth. After receiving several views in support of this measure the Committee submitted its report. I studied that report with utmost attention. I saw nothing wrong in the recommendations made by the Committee.
Those who are opposing the Bill are saying that the Press is criticising and the public are criticising. When I was discussing this with the people in my Constituency, after being given the whole background they feel that there is nothing wrong for Members of Parliament being paid adequate salaries so that they can sustain and discharge the task well. One need not be too comfortable in living, but one must need some basic things for decent sustenance. Following the implementation of the Fifth Pay Commission Recommendations, even an ordinary Dafedar or a Driver in a Government office is drawing a salary of about Rs.7,000 to Rs.8,000 per month. Our salary is only Rs.4,000 a month. It is being sought to be increased to Rs.12,000. One can say that it is three-times higher. But in quantum it is only Rs.12,000. In the present economic scenario, this salary is like a peanut for a hungry elephant.
Our hon. colleague Shri Prabhunath Singh has rightly mentioned that ‘you leave apart all the salary but give us all secretarial and infrastructure facilities.’ If that be the case, it will come to about several times than what they are suggesting. What I am trying to say is that when we are fighting for others, we have to fight legitimately for ourselves also. We need not feel sorry for that because when there is nobody to fight for us, we have to take up our case, and in that way this case has been rightly taken up.
Some of our colleagues have said that it is not the appropriate time. But according to me, it is high time that we should take it up. It is already delayed. It is better delayed rather than never.
I do not like to go into the merit of the case because the merit is very much obvious. To make a trip in a single day in a part of my constituency, I have to spend about Rs. 1,000 for fuel alone leave apart other constraints and compulsions. This is the way that we have to work. As such the salary and other facilities now suggested are not at all adequate but to be enhanced further.
श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) : उपाध्यक्ष महोदय, संसदीय कार्यमंत्री ने संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पैंशन संशोधन विधेयक जो सदन में प्रस्तुत किया है, मैं इसका समर्थन अपनी ओर से और अपनी पार्टी की ओर से करता हूं।
इस विधेयक पर काफी चर्चा हो चुकी है। केवल कम्युनिस्ट सदस्यों और हमारे एक साथी, श्री राधाकृष्ण जी ने विरोध किया है। मैं अपने कम्युनिस्ट सांसदों से उम्मीद करूंगा कि यह विधेयक तो पास हो जाएगा, जैसा उन्होंने कहा है, वैसे वे करेंगे भी। आप लिख कर दीजिए कि वेतन भत्ता जो बढ़ेगा, उसको नहीं लेंगे।…( व्यवधान)दो तरह की बात करना, ठीक नहीं है। …( व्यवधान)महोदय, मैं पश्चिम बंगाल गया था।
उपाध्यक्ष महोदय : आप इस विधेयक पर अपनी बात कहिए।
श्री सुरेश रामराव जाधव: महोदय, मैं इस विधेयक पर ही अपनी बात कह रहा हूं। मैंने पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले का दौरा किया। गरीबी से सभी को दु:ख होता है। सासंदों को भी दु:ख होता है, हिन्दुस्तान की गरीबी से सरकार को भी दु:ख होता है, अकेले कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को दु:ख नहीं होता है। मैंने मिदनापुर जिले का दौरा किया, पूरे हिन्दुस्तान में जो गरीबी है, उतनी मिदनापुर जिले में हैं और वहां ३५-४० साल सरकार चलाते हुए हो गए हैं। हमारी बहन ममता जी ने कहा कि विधायकों का वेतन भत्ता विधान सभायें तय करती हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि वेतनभत्ता बढ़ाने का काम हम लोगों को ही करना है। इसको किसी के हाथ में देने की जरूरत नहीं है। मैं अपना एक उदाहरण देता हूं। मैं एक किसान का बेटा हूं, किसी फाइनेंसर या धीरुभाई अम्बानी का बेटा नहीं हूं या दलाल नहीं हूं । लोगों का नेतृत्व करना है, तो इसमे पारदर्शिता लानी चाहिए। राजनीति में रहकर लोगों का काम करना है, तो वेतन भत्ता बढ़ाने की जरूरत है।…( व्यवधान)मैं १३ लाख वोटर्स का का प्रतनधित्व करता हूं, लेकिन ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां २०-२० लाख वोटर्स हैं। महोदय, मैंने आपका क्षेत्र भी देखा है।
आपका इतना ज्यादा खर्च नहीं है, मैं स्वयं गया था। हमारा क्षेत्र बहुत बड़ा है। हमारे महाराष्ट्र में थाणे क्षेत्र में ३० लाख वोटर्स हैं। हम इतने बड़े क्षेत्र का प्रतनधित्व कैसे कर सकते हैं?…( व्यवधान )
उपाध्यक्ष महोदय : आपने एक आईलैंड देखा होगा। कितने आईलैंड है, क्या आपको मालूम है?
श्री सुरेश रामराव जाधव:मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि मुंह में राम, बगल में छुरी जैसी राजनीति नहीं करनी चाहिए।…( व्यवधान )आप जो वेतन भत्ते बढ़ा रहे हैं, यह ज्यादा नहीं हैं, इसे औ७र भी बढ़ाने की कोशिश करें। इतना ही कह कर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री अमर राय प्रधान (कूचबिहार):माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मैंने संसदीय कार्य मंत्री, श्री प्रमोद महाजन का भाषण बहुत ध्यान से सुना। आपने जो ४००० रुपए से बढ़ा कर १२,००० रुपए किए हैं, उसकी मैं इज्जत करता हूं।…( व्यवधान )यहां मंत्री जी बैठे हुए हैं उन्होंने कहा है कि करीब २८ प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, लेकिन मेरा कहना है कि करीब ३४ प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।…( व्यवधान )हम अपना महंगाई भत्ता सब कुछ बढ़ा लेते हैं, यह अच्छा नहीं लगता, शोभा नहीं देता।…( व्यवधान )
महोदय, मैं एक स्वतंत्रता सेनानी रहा हूं। मैं जेल में भी रह चुका हूं। महाजन जी, पहले जब महंगाई भत्ता बढ़ाने का सवाल लोकसभा में आया तो उस समय कुछ लोगों ने कहा कि इसे मान्यता देनी पड़ेगी। …( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह : आप भी स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन लेते होंगे।…( व्यवधान )
श्री अमर राय प्रधान :हम पेंशन नहीं लेते हैं।…( व्यवधान )हमें आपके सर्टफिकेट की जरूरत नहीं है।
महोदय, आप जानते हैं कि कई बार यह सवाल पैदा हुआ कि मेम्बर लोग क्या हैं। क्या उनकी पब्लिक सर्विस है या वह पब्लिक सर्वेंट है।…( व्यवधान )वे लोग समाजसेवी हैं। यह प्रश्न पहले उठा था। महंगाई भत्ता बढ़ाने के लिए महाजन जी आपने अपने भाषण में कहा है, आर्टीकल १०६ को आप बदल दीजिए, हम उससे सहमत हैं, लेकिन उसे बदलने के बाद आप बताइए कि उसमें कितना बढ़ाना चाहते हैं। आप जानते हैं कि कल हम सभी को एक्स एमपीज़ बनना होगा, जो जिन्दा रहेगा।…( व्यवधान )यहां पर ज्यादा से ज्यादा माननीय सदस्य ऐसे हैं जिन्हें तीन साल हो गए हैं। कल अगर लोकसभा भंग हो जाए तो हमें पेंशन नहीं मिलेगी। इसलिए हम चाहते हं कि एक कानून ले आइए, जिसमें अगर एक दिन भी कोई एमपी रहे,…( व्यवधान )
महाजन जी, पेंशन, भत्ता हम बढ़ा सकते हैं, अगर एक रोज के लिए कोई एमपी बने तो उसके लिए भी पेंशन, भत्ता होना जरूरी है।
इसलिए यह प्रोविजन लाना चाहिए। मैं बहुत दुख से कहता हूं कि मैं इस बिल का समर्थन नहीं कर रहा हूँ।
SHRI SANAT KUMAR MANDAL (JOYNAGAR): I oppose this Bill.… (Interruptions)
१६२० बजे संसदीय कार्य मंत्री तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री (श्री प्रमोद महाजन):उपाध्यक्ष महोदय, मैं सभी सम्मानित सदस्यों को धन्यवाद देता हूं कि लगभग दो घंटे चली इस चर्चा में सबने भाग लिया।
उपाध्यक्ष महोदय : ढाई घंटे।
श्री प्रमोद महाजन : वैसे तो इसके लिए इतना समय जा रहा है इसका मुझे एक तरफ दुख भी हो रहा था और खुशी भी इसलिए हो रही थी कि शायद १९६४ के बाद पहली बार वेतन भत्ता बिल जो हमेशा बिना बहस के पास करने की हमारी परंपरा रही है, उस परंपरा को तोड़कर हमने अच्छा है या बुरा है, सबको जो कहना है कहकर पास कर रहे हैं, एक द्ृष्टि से यह अच्छी बात हुई है। वैसे संसदीय कार्य मंत्री के नाते मुझे एजेन्डा की अगली आइटम देखते हुए छोटा लग रहा है, इसलिए मैं संक्षेप में उत्तर देने वाला हूं।
मुझे इस बात का व्यक्तिगत दुख है कि जबकि सभी लोग…( व्यवधान)
कुंवर अखिलेश सिंह:जो सदस्य एक्स-एम.पी. रह चुके हैं, उनके लिए भी आप संशोधन ले आइए। एक टर्म अगर वह रह चुके हैं तो उनके लिए चार साल की सीमा मत बांधिये, उनके लिए भी पेन्शन का प्रावधान रखिये।
श्री प्रमोद महाजन : उपाध्यक्ष जी, चित्र ऐसा है कि वामपंथी दलों को छोड़कर बाकी सभी दलों ने इस बिल का तो समर्थन किया है लेकिन इस बिल से खुश कोई नहीं है।
SHRI SANAT KUMAR MANDAL : We oppose this Bill.… (Interruptions)
SHRI PRAMOD MAHAJAN: I said it in Hindi.… (Interruptions)
उपाध्यक्ष जी, मैं इसलिए कह रहा था कि कोई खुश नहीं है क्योंकि जो मेरे वामपंथी मित्र हैं भिन्न-भिन्न दलों को मिलाकर, वे इसलिए खुश नहीं हैं कि यह ज्यादा बढ़ा है और बाकी जो मुझे समर्थन कर रहे हैं, वे इसलिए खुश नहीं हैं कि उनको लगता है कि यह उतना बढ़ा नहीं है जितनी उनकी अपेक्षा है।
कुंवर अखिलेश सिंह: अपेक्षा नहीं आवश्यकता है।
श्री प्रमोद महाजन : माफ कीजिए, आवश्यकता की जो इनकी अपेक्षा है, उसके अनुसार यह नहीं है और इसके कारण शत-प्रतिशत बिल को समर्थन किसी का नहीं है।
मैं केवल दो बातों का उत्तर फिर एक बार स्पष्ट करना चाहता हूं कि आलोचना हुई कि समय ठीक नही है, दुनिया में मंदी चली है, देश में आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, यह एक मुद्दा आया और दूसरी तरफ आया कि इसी सदन में १०-१२ बार एजडर्नमेंट हुआ है, ऐसे समय में अपना वेतन भत्ता बढ़ाएं तो क्या ठीक है। इस पर मैंने बहुत सोचा है। दिसंबर से हर सत्र में सोच रहा हूं कि जिस सत्र में एडजर्नमेंट नहीं होगा, उस सत्र में इस बिल को पास करेंगे, लेकिन पांचवां सत्र देखने के बाद लगा कि मेरा यह सपना पूरा होने वाला नहीं है और इसलिए मैंने इसको एडजर्नमेंट से छोड़ने का निर्णय किया। दूसरा मैं कहूं कि वैसे यह दिसंबर में ही हमने समति से आने के बाद जनवरी में ही इस बिल को लाना तय किया था लेकिन दुर्भाग्य से उस समय गुजरात में भीषण त्रासदी आई तो ऐसा लगा कि उसके बाद हम यह करें तो ठीक नहीं है और इसलिए स्वाभाविक रूप से लगभग एक साल के इंतज़ार के बाद ये आया है। अब इसका आइडियल समय कैसे ढूंढें, मेरे लिए उसको ग्रोथ रेट से जोड़ना और कैसे जोड़ें, यह मुझे समझ में नहीं आता और इसलिए मुझे लगा कि कभी न कभी यह करना जरूरी है और इसलिए इस वक्त हमने इसको लाने का फैसला किया, इसका बाहय कारण कोई नहीं है।
जनप्रतनधियों के बारे में जो पब्लिक इमेज है, इस समय उसकी चर्चा करने का अवसर नहीं है, हमारे पास समय नहीं है। यह जरूर है कि जनप्रतनधियों के बारे में पब्लिक इमेज उतनी अच्छी नहीं है जितनी हम चाहते हों।
उपाध्यक्ष महोदय, मुझे कभी-कभी जरूर लगता है कि यह ठीक नहीं है क्योंकि बाकी देशों के मुझे उदाहरण मालूम है और मैंने एक बार कहा था। मैं फिर एक उदाहरण देना चाहता हूं और आप मेरी इस बात को मजाक में लें, गंभीरता से न लें। There seems to be a love and hate relationship between the people and their elected representatives. They start hating them the moment they elect them. जिसको ५ लाख लोग वोट देते हैं जब वह जीतकर आ जाता है, तो अगले क्षण से ही कहने लगते हैं वह ठीक काम नहीं कर रहा है। उसके बारे में शिकायत होती है। इसके कारण हमारी इमेज अच्छी हो, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए, मुझे लगता है इस पर भी कुछ बहस हमें करनी चाहिए। हम सब लोगों के लिए आचार संहिता की बात करते हैं कि पत्रकारों के लिए आचार संहिता हो, दूसरे लोगों के लिए आचार संहिता हो, वैसे ही हमारे लिए भी आचार संहिता हो और वह किस प्रकार की आचार संहिता हो, जिसका हम पालन कर सकें, इस बारे में हम सब सांसद मिलकर सोच सकते हैं और हमें ऐसी एक आचार संहिता मिलकर बनानी चाहिए क्योंकि यह कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। जो हम अपने बारे में राय रखते हैं, वैसी राय हमारे बारे में समाज नहीं रखेगा, तो भले ही गलती समाज की हो, भले ही गलती मीडिया की हो, हमारी हो, लेकिन इस स्थिति के बारे में हम सबको सोचना चाहिए कि आखिर जनप्रतनधि की जो इमेज है उसमें किन कारणों से ह्रस हो रहा है। मैं नहीं मानता कि तनख्वाह उसका कारण है। किन-किन कारणों से है, यदि हम उन कारणों को दूर कर दें, तो यह तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं मानी जाएगी।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल एक उदाहरण देता हूं। मुझे सिंगापुर के प्रधान मंत्री से मिलने का अवसर मिला। जब मैंने उनसे उनके मंत्रियों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं अपने देश के मंत्रियों की तनख्वाह देश के जो टाप १० सी.ई.ओ. हैं, उनके एवरेज के अनुसार तय करता हूं। मैंने कहा ऐसा क्यों?तो उन्होंने कहा कि यहां मंत्री बनने के लिए कोई तैयार ही नहीं है क्योंकि वहां इतना व्यवसाय और साधन हैं कि किसी को मंत्री बनने में रुचि ही नहीं है। यहां भी मंत्रियों की सैलरी इसके कारण बढ़ती नहीं है। यहां भी कहा गया कि यदि मंत्रियों की सैलरी नहीं बढ़ाएंगे, तो हम वी.आर.एस. लेकर फिर सांसद बनने के लिए तैयार हैं। इसलिए मेरा कहना है कि जो हमारे बारे में समाज की सोच है, उसको बदलने के लिए हमें कोशिश करनी चाहिए और वह कोशिश हम मिलकर करें और मिलकर कोई ऐसी आचार संहिता बनाएं जिसका पालन करें। यह अलग बात है।
उपाध्यक्ष महोदय, प्रामाणिक तौर पर सांसदों को काम करने के लिए जो आवश्यकताएं हैं उनके अनुसार व्यवस्था करें, इस बारे में मेरे मन में कोई अपराध बोध नहीं है, वह हम लोगों ने किया है। रघुवंश बाबू ने सही कहा कि कुछ लोगों के मन में अपराध बोध होता ही नहीं, चाहे वे कितने ही अपराध करते जाएं, यह अपना-अपना स्वभाव है। इसलिए इसमें मेरे अपराध बोध की बात नहीं है। मैं सरकार की ओर से सांसदों की बात कह रहा था।
उपाध्यक्ष महोदय, अन्त में मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि सब लोगों को यह अच्छा इसलिए नहीं लगता है कि हम अपने आप अपना वेतन-भत्ता तय करते हैं। इसके कारण बहुत सारी गलतफहमियां पैदा होती हैं। इसलिए इसके लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए। मैं केवल कानूनी उत्तर में नहीं जाऊंगा। संविधान की धारा १०६ के अन्तर्गत यह बड़े स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पार्लियामेंट के सदस्य अपने वेतन-भत्ते एक कानून बनाकर स्वयं तय करेंगे और उसके अनुसार हम ५० साल से व्यवहार करते आ रहे हैं। इसलिए मैंने अब यह निर्णय किया है कि मैं सत्र की समाप्ति के बाद सभी सांसदों को पत्र लिखूंगा जिसमें उनसे सुझाव मांगूंगा कि आखिर आप क्या चाहते हैं, क्या व्यवस्था करनी चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, किसी ने यहां सुझाव दिया कि वेतन भत्तों का मामला अध्यक्ष पर छोड़ दिया जाए। अध्यक्ष पर छोड़े जाने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन शायद मैं यदि स्पीकर बनूं, तो मैं यह जिम्मेदारी नहीं लूंगा क्योंकि अध्यक्ष पर सांसदों का एक दबाव आएगा, भले ही हम यह कहें कि इसे स्पीकर के ऊपर छोड़ दो, भले ही वे कम करें या ज्यादा, लेकिन मैं समझता हूं कि उनका स्थान तो इतना ऊंचा और सर्वोच्च होना चाहिए कि उसके ऊपर कोई विवाद नहीं हो, वरना आगे जाकर यह विवाद खड़ा होगा कि वेतन भत्ते भलां प्रिजाइडिंग एथौरिटी ने डिसाइड किए थे। यह कोई नहीं चाहेगा कि स्पीकर के ऊपर एसी बात आए और स्पीकर का पद विवाद का विषय बने। यह कोई अच्छी बात नहीं हो सकती है। इसलिए मैंने कहा कि मुझे बताया जाए। कुछ सुझाव आए, लेकिन कंक्रीट सुझाव नहीं आता। इसलिए मैं सभी सांसदों को पत्र लिखने वाला हूं।
श्री शिवराज वी.पाटील (लातूर) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं माननीय मंत्री जी के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूं और सुझाव देना चाहता हूं कि आपका जो प्रोटोकौल है, उसमें एम.पी. जहां आते हैं, उस प्रोटोकौल के मुताबिक, जब दूसरों की तनख्वाहें बढ़ें, तो एम.पी. की तनख्वाह भी उसी के अनुसार अपने आप बढ़ जाए, ऐसी व्यवस्था करें।
श्री प्रमोद महाजन : उपाध्यक्ष महोदय, यदि मैं प्रोटोकौल में जाऊंगा, तो जिस ब्यूरोक्रेट के ऊपर आप आते हैं, उस ब्यूरोक्रेट के अनुसार यदि आपको तनख्वाह देनी शुरू करें तो आज जितना खर्च हो रहा है, उससे १० गुना ज्यादा खर्च आएगा।
जो आएगा उसे आने दीजिए। २३ करोड़ रुपये पर ही आपत्ति हो रही है और आप मुझे २३० करोड़ रुपये का प्रपोज़ल बता रहे हैं। इसलिए मैंने कहा कि इसे भी ऐग्ज़ामिन करते हैं।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपने अच्छा सुझाव दिया। आप सब मैम्बरान को लैटर लखिए। उनके सुझाव आने के बाद तय कीजिए।
श्री प्रमोद महाजन : उनके सुझाव आने के बाद हम स्पीकर साहब, चेयरमैन साहब से बात करेंगे और जो निचोड़ निकलेगा, वह अगर सबका मिल कर होगा तो उसे सदन के सामने लाएंगे। फिर आवश्यकता पड़ी तो धारा १०६ को बदलना हो, रद्द करना हो, सैलरीज़ एक्ट को रिपील करना हो, कोई नया सिस्टम बनाना हो, हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है। हमें इस बात की कोई खुशी नहीं है कि हम अपनी तनख्वाह तय करें। रघुवंश बाबू ने ठीक कहा कि एक बार कमेटी की रिपोर्ट आई तब गाली पड़ी, एक बार हम जनवरी में बिल लाने वाले थे, तब गाली पड़ी और अब ऐक्चुअल बिल आ रहा है तो तीसरी बार गाली पड़ी। कुछ अखबारों ने एक ही ऐडीटोरियल लगभग शब्द बदल कर तीन बार लिखा, तनख्वाह एक ही बार बढ़ी। इसलिए हम भी इस स्थिति को नहीं चाहते कि अपनी तनख्वाह बढ़ाएं और उस पर लोग आपत्ति करें। इसलिए जैसे शिवराज जी ने सुझाव दिया, उसे भी ऐग्जामिन करते हैं लेकिन निश्चित रूप से हमें यह देखना पड़ेगा कि आज जो सैलरी मिल रही है, उससे बहुत कम हो जाए, यह सुझाव भी कोई मंजूर नहीं करेगा, उससे दस-बीस गुना बढ़ जाए, इस प्रकार का सुझाव भी मंजूर होने में मुश्किल होगी।…( व्यवधान)रघुनाथ जी, आप अकेले हों तो हम दोनों कर सकते हैं। मुझे लगता है कि आप सुझाव दीजिए, हम सरकार की ओर से सुझाव का अध्ययन करेंगें, दोनों प्रिज़ाइडिंग अथॉरिटीज से चर्चा करेंगे। इस सारे मंथन के बाद कोई अमृत निकल आए तो कम से कम संसद पर अपने वेतन बढ़ाने का जो आरोप है, उससे भी अगली बार मुक्त हो जाएंगे और अच्छे वातावरण में, हो सकता है हम इससे अच्छी तनख्वाह पा सकेंगे। लेकिन अभी के लिए मुझे लगता है कि जितना संभव था, हमने करने की कोशिश की है और मैं सदन से प्रार्थना करता हूं कि इसे सर्वसहमति से पारित करें।
MR. DEPUTY-SPEAKER: I shall now put the amendment moved by Shri Varkala Radhakrishnan to the vote of the House.
The amendment was put and negatived.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That the Bill further to amend the Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Act, 1954, be taken into consideration. " The motion was adopted.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the House will take up clause by clause consideration of the Bill.
Clause 2 श्री प्रभुनाथ सिंह : इसमें क्या करना है, क्या नहीं करना है, हम सरकार के सहयोगी हैं। प्रमोद जी, बताइए।
श्री प्रमोद महाजन : खड़े-खड़े हजारों रुपये का व्यवहार नहीं कर सकते। इस पर राष्ट्रपति जी की सहमति लेनी पड़ती है, कैबिनेट की एप्रूवल से अमैंडमैंट लानी पड़ती है।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप अमैंडमेंट मूव करेंगे या नहीं - यह बताइए।
श्री प्रभुनाथ सिंह : भूतपूर्व सांसदों को कम से कम ५,००० रुपये पेंशन और चार साल की जो समय सीमा निश्चित की है. उसे करते हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : आप यह बताइए कि मूव कर रहे हैं या नहीं?
कुंवर अखिलेश सिंह: मैं मूव कर रहा हूं।
मैं प्रस्ताव करता हूं:
पृष्ठ १, पंक्ति ११, ---
" बारह हजार रुपये " के स्थान पर " पंद्रह हजार रुपये " प्रतिस्थापित किया जाए। (४)जिन पूर्व संसद सदस्यों को पेंशन प्राप्त नहीं हो रही है, अगर ये ३,००० रुपये की पेंशन दे दें तो हम इस प्रस्ताव को वापिस लेते हैं, अन्यथा मूव करते हैं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: I shall now put amendment No.4, moved by Kunwar Akhilesh Singh, to the vote of the House.
The amendment was put and negatived.MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That clause 2 stand part of the Bill."
The motion was adopted Clause 2 was added to the Bill.
Clause 3 was added to the Bill Suspension of Rule 80 (i) SHRI PRAMOD MAHAJAN: Sir, I beg to move:
"That this House do suspend clause (i) of rule 80 of the Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha insofar as it requires that an amendment shall be within the scope of the Bill and relevant to the subject matter of the clause to which it relates, in its application to the Government amendment No.1 to the Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament (Amendment) Bill, 2001 and that this amendment may be allowed to be moved. "MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That this House do suspend clause (i) of rule 80 of the Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha insofar as it requires that an amendment shall be within the scope of the Bill and relevant to the subject matter of the clause to which it relates, in its application to the Government amendment No.1 to the Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament (Amendment) Bill, 2001 and that this amendment may be allowed to be moved. " The motion was adopted.
New Clause 4 – Amendment of Sesion 8A Amendment made:
"Page 1,--
after line 20, insert— "4. In section 8A of the principal Act, in sub-section (1),--
for the words "two thousand and five hundred rupees", the words "three thousand rupees" shall be substituted;"(b) in the first proviso, for the words "five hundred rupees", the words "six hundred rupees shall be substituted." (1) (Shri Pramod Mahajan) MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That the new clause 4 be added to the Bill."
The motion was adopted.
New Clause 4 was added to the Bill.
Clause 1, the Enacting Formula and theLong Title were added to the Bill.SHRI PRAMOD MAHAJAN: I beg to move:
"That the Bill, as amended, be passed."
MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That the Bill, as amended be passed."
The motion was adopted . ------------------