Lok Sabha Debates
The Speaker Made Reference To The Passing Away Of Shri Jasubhai Dhanabhai, ... on 8 March, 2016
Sixteenth Loksabha an> Title: The Speaker made reference to the passing away of Shri Jasubhai Dhanabhai, Member, 14th Lok Sabha.; Shri Basori Singh Masram, Member, 15th Lok Sabha and Shri Pawan Diwan, Member, 10th and 11th Lok Sabha.
माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्यगण, मुझे सभा को हमारे तीन पूर्व साथियों श्री जसुभाई धानाभाई बारड, श्री बसोरी सिंह मसराम और श्री पवन दीवान के दुःखद निधन के बारे में सूचित करना है।
श्री जसुभाई धानाभाईगुजरात के जूनागढ़ संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए 14वीं लोक सभा के सदस्य थे। वे खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति तथा सभा की बैठकों से सदस्यों की अनुपस्थिति संबंधी समिति के सदस्य थे। इससे पूर्व, वे 1990 से 2003 तक तीन बार गुजरात विधान सभा के सदस्य थे और गुजरात सरकार में मंत्री थे। अपने निधन के समय श्री बारड गुजरात विधान सभा के सदस्य थे। श्री जसुभाई धानाभाई बारड का निधन 60 वर्ष की आयु में 25 जनवरी, 2016 को अहमदाबाद में हुआ।
श्री बसोरी सिंह मसराम मध्य प्रदेश के मण्डला संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए 15वीं लोक सभा के सदस्य थे। वे सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी समिति तथा सभा पटल पर रखे गए पत्रों संबंधी समिति के सदस्य थे। इससे पूर्व, श्री मसराम वर्ष 1993 से 1998 तक मघ्य प्रदेश विधान सभा के सदस्य थे और वर्ष 1998 के दौरान मध्य प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री थे। श्री बसोरी सिंह मसराम का निधन 70 वर्ष की आयु में 26 जनवरी, 2016 को मध्य प्रदेश में हुआ।
श्री पवन दीवान मध्य प्रदेश के महासमुंद संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए 10वीं और 11वीं लोक सभा के सदस्य थे। वे 10वीं लोक सभा के दौरान खाद्य, नागरिक आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति के सदस्य थे। इससे पूर्व, श्री दीवान 1977 से 1979 तक मध्य प्रदेश विधान सभा के सदस्य थे और मध्य प्रदेश सरकार में सामाजिक कल्याण और जेल मंत्री थे। श्री पवन दीवान का निधन 71 वर्ष की आयु में 2 मार्च, 2016 को नई दिल्ली में हुआ। हम अपने पूर्व साथियों के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं और अपनी ओर से तथा सभा की ओर से शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करती हूं।
अब सभा दिवगंत आत्मा के सम्मान में कुछ देर के लिए मौन खड़ी रहेगी।
11.04 ½ hours (The Members then stood in silence for short while) 11.05 hours ORAL ANSWERS TO QUESTIONS HON. SPEAKER : Q. No.141, Shri M. Murli Mohan.
(Q. 141) SHRI M. MURLI MOHAN: Respected Madam, thank you for giving me a chance to put supplementary questions.
The Department of Agriculture, Cooperation and Farmers Welfare is implementing Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) for development of horticulture and for holistic growth of the horticulture sector in the country. Although, the Union Government has taken a lot of steps to implement this scheme, much has to be done by providing adequate funds, upgradation of technological support, etc. What are the specific steps being taken by the Government to promote horticulture in Andhra Pradesh and Telangana States? Is the Government promoting development of cold chains through the Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) in the States of Andhra Pradesh and Telangana? If so, the funds allocated for the Government of Andhra Pradesh and Telangana under the MIDH Scheme in terms of logistic and technical support to improve production of Mango, Coconut, seasonal fruits and other horticulture products.
कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री (डॉ. संजीव बालियान) : माननीय अध्यक्ष महोदया, आंध्र प्रदेश को इस वर्ष एमआईडीएच के तहत 71 करोड़ रुपये एलॉट हुए थे, जिनमें से 55 करोड़ रुपये रिलीज हो चुके थे और बाकी जो पैसा है, वह जल्द ही रिलीज कर दिया जायेगा। इसके अलावा एनएचबी, यानी नैशनल हार्टिकल्चर बोर्ड नाम की एक स्कीम है, जो डिमांड ड्रिवन स्कीम है। अगर आंध्र प्रदेश से कोई भी प्रोजैक्ट सबमिट होता है, तो उसमें अलग से स्टेटवाइज एलोकेशन नहीं किया जाता। जिस भी स्टेट में प्राइवेट या गवर्नमैंट पब्लिक अंडरटेकिंग्स कम्पनी उसमें प्रोजैक्ट सबमिट करती है, तो उसे फंडिंग दी जाती है।
SHRI M. MURLI MOHAN : Has any time-line been fixed to make the Floriculture Institute at Kadiyam, Rajahmundry functional along with the funds earmarked? Is the Government planning to setup a Mega Food Park at Rajahmundry? What are the number of districts / development blocks covered under the Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) in reference to Andhra Pradesh and Telangana?
डॉ. संजीव बालियान : माननीय अध्यक्ष महोदया, आंध्र प्रदेश के 11 जिले इसके अंडर कवर्ड हैं। माननीय सदस्य ने जिस सैंटर ऑफ एक्सीलैंस की बात की है, उस बारे में अभी मेरे पास कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। मैं यह नहीं बता सकता कि अभी तक प्रपोजल आया है या नहीं, जबकि फूड पार्क फूड प्रौसैसिंग इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के अंडर आता है।
श्रीमती अंजू बाला: माननीय अध्यक्ष महोदया, आपने मुझे आज प्रश्न का मौका दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
माननीय अध्यक्ष : यदि आज महिलाएं प्रश्न पूछना चाहती हैं, तो मेरी कोशिश है कि मैं उन्हें ज्यादा प्रश्न पूछने का मौका दूं।
श्रीमती अंजू बाला : मैडम, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं कृषि मंत्री जी से जानना चाहती हूं कि बागवानी के संबंध में विकास मिशन की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं और इस योजना के अंतर्गत क्या सुविधाएं प्रदान की गयी हैं? इसके साथ-साथ इस योजना के लिए पिछले दो सालों में कितना पैसा खर्च हुआ है?
डॉ. संजीव बालियान : अध्यक्ष महोदया, इस योजना में, यानी एमआईडीएच में हर स्टेट को अलग-अलग पैसा एलॉट आता है। अगर माननीय सदस्या उत्तर प्रदेश के संबंध में पूछना चाहती हैं, तो उत्तर प्रदेश को इस वर्ष 40 करोड़ रुपये का आबंटन हुआ था, जिसमें से 20 करोड़ रुपये रिलीज कर दिये गये हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश के करीब पिछले वर्ष के 17 करोड़ रुपये अनयूटिलाइज्ड बैलेंस के तौर पर हैं, जिसकी वजह से उत्तर प्रदेश को इस बार का एलॉटमैंट थोड़ा कम हुआ है।
SHRI R. DHRUVANARAYANA : Thank you, Madam. In his reply, the Minister has given the objective of this Scheme. The Economic Survey points out that the post-harvest wastages and losses are very key concerns for the horticulture sector as the cumulative waste is very high, which ranges between 5 per cent and 20 per cent.
Another concern for the horticulture farmer is that they are regularly affected by price dips, especially, during harvest season of onion and potatoes. What measures are being taken by the Government under the MIDH to address these two major concerns?
डॉ. संजीव बालियान: माननीय अध्यक्ष जी, कोल्ड चेन डेवलपमेंट स्कीम एमआईडीएच के अधीन आती है। अगर कोई प्रोजेक्ट सब्मिट किया जाता है तो नेशनल हॉटीकल्चर बोर्ड भी लगातार मदद करते हैं। पोस्ट हार्वेस्ट लॉसिस में ज्यादातर प्रोग्राम फूड प्रोसेसिंग मिनिस्ट्री में आते हैं। फंड की समस्या है, नेशनल हार्टीक्लचर बोर्ड का करीब 350 करोड़ का बजट है, यह नहीं है कि हर जगह एस्टाबलिशमेंट किया जा सकता है। जहां तक प्रयास की बात है, कोल्ड चेन डेवलपमेंट का लगातार काम चल रहा है। सीफेट की स्टडी है, माननीय सदस्य ने ठीक कहा है कि पांच से बीस परसेंट के करीब लगातार लॉस है। अगर ओनियन और पटेटो की कीमत में समस्या है, मार्किट इन्टरवेंशन स्कीम है, जिसके तहत स्टेट गवर्नमेंट केंद्र सरकार से पैसा मांग सकती है। अगर ऐसा लगे कि रेट कम हो रहा है तो सरकार इन्टरफेयर करते हुए एमआईएस स्कीम के तहत किसान की मदद कर सकती है।
श्री दुष्यंत चौटाला : माननीय अध्यक्ष जी, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि जवाब दिया गया है कि देश में 384 जिले हॉर्टीकल्चर संबंधित हैं जिसमें 18 जिले हरियाणा प्रदेश में हैं। पिछले सालों में गन्नौर के पास हॉर्टीकल्चर संबंधित मंडी बनाई गई थी लेकिन अब तक उस मंडी की शुरुआत नहीं हो पाई जिसके कारण बहुत से किसान हॉर्टीकल्चर संबंधित उत्पाद को विदेशों में एक्सपोर्ट नहीं कर पा रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले दिनों जब किसान गोभी की फसल लेकर मंडी में आए तो एक रुपए किलो से भी कम दाम पर फसल बेचनी पड़ी, यही नहीं बल्कि उनको ट्रैक्टर चलाने पड़े।
मेरा आपके माध्यम से माननीय मंत्री से प्रश्न है कि क्या केंद्र सरकार कोई योजना बना रही है जिसके तहत एमएसपी किसान को हॉटीकल्चर प्रोडय़ूज पर दिया जा सके जिससे ईयरली प्रोडय़ूज में मदद हो सके।
श्री राधा मोहन सिंह: माननीय अध्यक्ष जी, मंडी कानून राज्यों के तहत है। सरकार ने राष्ट्रीय मंडी बनाने की नई शुरुआत की है। इसके तहत सभी राज्यों को मंडी कानून बदलने के लिए कहा गया था। 14 राज्यों ने अपने कानून में परिवर्तन कर लिया है। पंजाब को छोड़कर बाकी सभी राज्यों ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है और उसके तहत हम ई-ट्रेडिंग प्लेटफार्म मुहैया कराने जा रहे हैं ताकि किसानों को अच्छा मूल्य मिल सके।
श्रीमती रीती पाठक: माननीय अध्यक्ष जी, मैं आपकी बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे पूरक प्रश्न पूछने का मौका दिया। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से पूछना चाहती हूं कि देश में और प्रदेश में ऐसे कितने जिले हैं जहां किसान बागवानी में नई टेक्नोलाजी का प्रयोग कर रहे हैं?
मैं आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र से आती हूं। मैं पूछना चाहती हूं कि मध्य प्रदेश में ऐसे कौन से जिले हैं जहां बागवानी को बढ़ावा देने के लिए नई टेक्नालाजी और नई योजनाओं का प्रयोग किया गया है? क्या इसमें सीधी जिला आता है जिससे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा सके।
डॉ. संजीव बालियान: माननीय अध्यक्ष जी, मध्य प्रदेश के करीब 39 डिस्ट्रिक्ट एमआईडीएच में कवर हैं। सीधी जिला इसके अंदर आता है। अगर कोई डिस्ट्रिक्ट नहीं भी आता है तो प्रदेश सरकार आरकेवाई योजना के तहत काम कर सकती है।
(Q. 142) SHRI C. MAHENDRAN: Madam Speaker, in Tiruppur District, there is one Amaravathi Dam. The total capacity of this Dam is four TMC. During the rainy season, around four TMC of water is wasted. To save water, our Amma has proposed to construct a Dam called Upper Amaravathi Dam which can save up to three TMC of water, through which agriculture in three districts Tiruppur, Karur and Erode will improve further. This will also improve the life of farmers. To construct the proposed Dam, around 250 acres of forest land is to be acquired. In this context, Tamil Nadu Government has sent a proposal to the Union Government for environmental clearance.
My first supplementary question to the hon. Minister is, has the Union Government received the above proposal from the Tamil Nadu Government to grant environmental clearance to acquire 250 acres of forest land to construct the Upper Amaravathi Dam? If so, what is the action taken by the Government in this regard and by when will clearance be given to the above project?
श्री प्रकाश जावड़ेकर: माननीय अध्यक्ष जी, माननीय सदस्य ने जो यह सवाल पूछा है, वह देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और मैं इसके लिए माननीय सदस्य को बधाई देना चाहता हूं। पर्यावरण की मान्यताएं कैसे मिलती हैं, उसमें क्या सुधार किये हैं और अब क्या स्थिति है? Before coming to specific issue of Amaravathi Dam, इसमें पहले हमने इतने सुधार किये कि पर्यावरण की मंजूरी के लिए हमने एक अध्ययन किया। पहले किसी भी उद्योग की स्थापना करनी होती थी तो उसमें 600 दिन लगते थे। हमने पर्यावरण शर्तों के साथ कोई भी समझौता किये बगैर उल्टा उनका थोड़ा मानक स्ट्रिन्जेंट किया है लेकिन उसमें प्रक्रियाएं सरल की है। प्रक्रिया में जहां पर डिले होता था, वह कम किया और पारदर्शी प्रक्रिया बनाई, ऑनलाइन प्रक्रिया शुरु की और इसका परिणाम यह हुआ कि जहां एवरेज 600 दिन एक मंजूरी के लिए लगते थे, अब 190 दिन लगते हैं। हम जल्दी ही पर्यावरण के साथ समझौता किये बगैर 100 दिन में एप्रूवल करने का निर्णय करेंगे। यही एक नया प्रयास है। उसके कारण क्या हुआ है कि पिछले 22 महीने में हमने 943 एनवॉयरनमेंटल एप्रूवल्स दिये हैं। पर्यावरण एप्रूवल्स दिये हैं। शर्तों के साथ दिये हैं लेकिन उससे 6,72,422 करोड़ रुपये का इनवेस्टमेंट जो देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, वह अनलॉक हुआ है। यह एक बहुत बड़ा सुधार हुआ है।
As far as the very specific project of Amaravathi Dam about which the Member has asked, I will invite him tomorrow itself to the Ministry, or even today afternoon, and will give him full information. I will even keep it on the Table. I can assure you that on any public irrigation project, once the full information is ready, we go to the spot and via satellite we see the site. In the Forest Appraisal Committee we conduct the inspection. There are experts also and State people are also there. And with the consent of all we lay the conditions. Therefore, Amaravathi Dam also will get due approval within the shortest possible time. That I can say for Tamil Nadu people.
HON. SPEAKER: Hon. Minister, you are working very enthusiastically. लेकिन अगर हम थोड़ा संक्षेप में उत्तर दे सकें तो अच्छा होगा।The Minister is doing well. Some thing is necessary also, I can understand. And the question also should be very short.
SHRI C. MAHENDRAN: Madam Speaker, our Amma is taking various steps and implementing various schemes for overall development in Tamil Nadu. In this context, Amma has recently conducted a Global Investors Meet in Chennai which was attended by many investors from abroad and proposal for investment worth Rs.2.42 lakh crore have been received. During this meet, our Amma has announced a single-window system for speedy disposal and clearance of all projects at a single place.
My second supplementary question to the hon. Minister is, will the same kind of a single-window system be introduced and implemented?
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: This is a suggestion and we have already started working on a single-window system. This is an online system which we have already implemented. We are taking a review of the system from time to time with the aim that that the delays should cut to the minimum.
We have taken 12 big policy decisions under which we have simplified the processes and therefore all those projects which require environmental clearance will be given as soon as possible.
श्रीमती दर्शना विक्रम जरदोश : महोदया, परसों हम एक नई ऊर्जा लेकर इसी सभागृह से निकले हैं।
टेक्सटाइल और डायमंड, ये दोनों इंडस्ट्रीज मेरे एरिया में हैं। टेक्सटाइल मिल से जो धुआं निकलता था, उसके दुप्रभाव को रोकने के लिए एक नई टेक्नोलोजी आई है। इसके लिए अपग्रेडेशन फंड भी अलाट किया गया है और टेक्सटाइल पार्क भी बने हैं। जिस एरिया में पुरानी मिल है और वहां जो लोग रहते हैं, उसके लिए कुछ मापदंड बनाए गए हैं। इसके अलावा डायमंड को धोने के लिए एसिड का प्रयोग किया जाता है और छोटे-छोटे घरों में भी यह काम किया जाता है। इस काम में भी धुआं निकलता है। इसके लिए भी कुछ मापदंड तय किए जाने चाहिए।
मैं माननीय मंत्री जी से पूछना चाहती हूं कि क्या नई लिस्ट के अंदर टेक्सटाइल और डायमंड इंडस्ट्रीज के लिए किसी तरह के मापदंड बनाए गए हैं?
श्री प्रकाश जावड़ेकर : महोदया,माननीय सदस्या ने बहुत अच्छा सवाल किया है। टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए हमने मानक बनाए हैं और मैं कहना चाहूंगा कि सभी उद्योगों में जैसे-जैसे तकनीक की प्रगति होती है, हम हर छह महीने में रिव्यू करते हैं कि उन मानकों को थोड़ा और कड़ा किया जाए जिससे कि लोगों को नुकसान न हो। इन दोनों इंडस्ट्रीज से लोगों को तकलीफ न हो, इसके लिए हमने 24x7 मोनिटरिंग डिवाइसिस लगाने के लिए सभी टेक्सटाइल यूनिट्स को कहा है और मुझे खुशी है कि 80 फीसदी मिलों ने 24 घंटे निगरानी के संयत्र लगा लिए हैं। अगर कोई पन्द्रह मिनट पोल्यूशन एक्सीड करता है तो तुरंत मुझे भी एसएमएस आता है, उद्योग को भी जाता है और स्क्रीन पर भी दिखाई देता है। इस पर तुरंत कार्यवाही शुरू की जाती है।
SHRIMATI PRATIMA MONDAL: Hon. Speaker Madam, thank you for giving me the opportunity to speak. Obtaining of environmental clearance certificate is a lengthy and critical procedure. Companies are facing a lot of difficulty to get this environmental clearance certificate. I would like to ask the hon. Minister whether the Government has conducted any survey to know how many companies run without having any environmental clearance certificate and what steps have been taken thereof and whether the Government has any target to simplify the process as a whole in this regard.
माननीय अध्यक्ष : मंत्री जी ने इस बारे में बता दिया है।
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: We have already simplified the process. I will give just one example. The Terms of Reference which is given after the environment impact assessment is presented to the Expert Appraisal Committee. This process used to take 13 months. We have standardized the Terms of Reference of all 38 sectors of industries which require environmental approvals and clearance. Now the time taken is only one month instead of 13 month. That is the major reform we have done. As far as many new industries are concerned, we have re-categorized the industries based on scientific study of pollution load and there are now 36 industries under ‘White’ category which will require no permission because their pollution load is less than 10 per cent. Therefore, they can start immediately without consent to operate or consent to establish from the Pollution Control Board.
माननीय अध्यक्ष : आप लोग देखें कि पर्यावरण और इंडस्ट्री, दोनों की चिंता महिलाएं कर रही हैं।
SHRIMATI R. VANAROJA : Hon. Speaker Madam, presently any project having a total area of 20,000 square metres is exempted from environmental clearance. There are demands to enhance this limit to 50,000 square metres so that there can be much more Foreign Direct Investment in projects. So, I would like to know from the hon. Minister whether the Government has taken any decision to enhance the exemption limit to 50,000 square metres for environmental clearance and whether any notification has been issued in this regard.
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: That is a very good question again.
Many building and construction projects used to wait for three to four years for environmental approvals. We studied each and every case and found out that there were same conditions which were applied to all the projects. So, we have already standardized the conditions for environmental safeguards and we have taken a policy decision. The decision will be shortly announced but we are giving relief to the real estate sector for affordable housing projects to come up in a nice way because the Government under the leadership of Shri Narendra Modi is committed to provide ease of doing responsible business. We have worked out the architecture of responsible business. We will announce the decision soon.
She has asked about only 50,000 metres; we may announce even more.
KUMARI SUSHMITA DEV: Sir, I am elated to see in your answer that many steps have been taken to streamline permissions and ensure transparency.
You have spoken about linear projects between two States. As you are aware, I come from Silchar and till today we are waiting for environmental clearances for the linear project Maha Sadak from Silchar to Saurashtra. I have met you also. I will be highly obliged if you can enlighten me and the House about the progress because there was a meeting of the National Wildlife Board on the 26th February.
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: We have already decided; we have already fast tracked the proposal. There were some deficiencies for which clarification has come. Now, in the next meeting, we will definitely take it up. We will also inform you if there is any problem in between but we will take immediate decisions. We are not keeping it pending. Linear projects are now decided by the regional committees. Where wildlife sanctuary issue comes, we have no pendency in the National Wildlife Board. So, in the next meeting the proposal will be taken up.
श्रीमती भावना पुंडलिकराव गवली : महोदया, हमारे विदर्भ क्षेत्र में हजारों एकड़ बंजर जमीन पड़ी है। उस जमीन पर कोई पेड़ नहीं है लेकिन वह जमीन फारेस्ट मिनिस्ट्री के अधीन आती है। मैं माननीय मंत्री जी से पूछना चाहती हूं कि क्या उस जमीन का उपयोग पेड़ लगाने के लिए किया जाएगा? इसके साथ यह भी पूछना चाहती हूं कि क्या मंत्री जी का मंत्रालय और पॉवर मिनिस्ट्री मिलकर इस जमीन का उपयोग सोलर प्लांट लगाने के लिए करेंगे? यह जमीन सालों से ऐसे ही पड़ी है और राज्य सरकार ने भी प्रपोजल भेजा है कि इस जगह के लिए कुछ खास किया जाए।
श्री प्रकाश जावड़ेकर महोदया, डिग्रेडिड फारेस्ट में अफारेस्ट्रेशन करना चाहिए। इसके लिए हम CAMPA बिल लाए हैं, जो सदन के सामने आएगा। मुझे खुशी है कि स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी अनुशंसाएं दी हैं और हमने बहुत-सी रिक्मेंडेशंस स्वीकार भी की हैं। मुझे लगता है कि इससे सभी पार्टियां सहमत होंगी। इस तरह की जमीन पर वनीकरण के लिए चालीस हजार करोड़ रुपया हम सभी राज्यों को उपलब्ध करा देंगे, यही निर्णय है।
(Q.143) श्री अनुराग सिंह ठाकुर : महोदया, महिला दिवस के मौके पर सभी महिला सांसदों को बधाई देता हूं और आपने शानदार आयोजन सांसदों और विधायकों के लिए किया, इसके लिए आपका आभार व्यक्त करता हूं।
अध्यक्ष जी, मुझे विभाग की तरफ से प्रश्न के उत्तर में मिला है कि फीडस्टॉक और प्राकृतिक गैस की अनुपलब्धता के कारण इंडस्ट्री को यहां प्राब्लम आती है क्योंकि विदेशों से सब कुछ इम्पोर्ट होता है। सरकार ने एक योजना बनाई है कि ईरान में एसईजेड में वहां निवेश करेंगे। क्या इसके माध्यम से मेक इन इंडिया को बल मिलेगा? वहां से फीडस्टॉक लाने की जो बात कही जा रही है, उसका क्या लाभ होगा और जो योजना रखी गई है, इस पर अब तक क्या-क्या हो चुका है क्योंकि उत्तर में विस्तार से जानकारी नहीं दी गई है? मंत्री जी कृपया बताने की कृपा करें कि यह मुद्दा कहां तक पहुंचा है?
श्री हंसराज गंगाराम अहीर :माननीय अध्यक्ष महोदया, यह सही है कि फीडस्टॉक हमारे देश में बहुत कम उपलब्ध है और विदेशों से इसे गैस के रूप में आयात किया जाता है। सदस्य महोदय ने प्रश्न पूछा है कि क्या ईरान में हम फीडस्टॉक के लिए कोई प्लांट लगाने जा रहे हैं? उस संबंध में सरकार ने चर्चा प्रारंभ की है और भविष्य में ईरान सरकार से हमारी बात होती है और यदि हमारी शर्तें मान ली जाती हैं तो इससे बहुत ज्यादा लाभ यह होगा कि देश में फीडस्टॉक कम है और देश की डाऊन स्ट्रीम इंडस्ट्री के लिए हमें रॉ मैटिरियल मिलता नहीं है। यदि वहीं पर हम इसका इंडस्ट्री लगाकर और मीडियम प्रोसेसिंग करें, तो उससे यह लाभ होगा कि हम देश में प्लास्टिक, केमिकल इंडस्ट्री और फर्टिलाइज़र इंडस्ट्री, जिसमें हम यूरिया का उपयोग भी कर सकते हैं। इसलिए सरकार ईरान में चाबहार पोर्ट के पास इस प्लांट को लगाने के बारे में चर्चा कर रही है। "मेक इन इंडिया " के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री जी के जो विचार हैं और सरकार की जो नीति है, उसमें हम निश्चित ही यहाँ पर इंडस्ट्री को रॉ मैटिरियल के रूप में अपने ही इंडस्ट्री से मिडिल स्टॉक बनाकर उपलब्ध करा सकेंगे। इससे रोजगार भी मिलेगा और उत्पादकता भी बढ़ेगी, जिसमें प्लास्टिक इंडस्ट्री भी है, केमिकल इंडस्ट्री भी है और फर्टिलाइज़र में भी इसका लाभ होगा।
श्री अनुराग सिंह ठाकुर : अध्यक्ष जी, यह उत्तर नहीं मिला कि यह कहाँ तक पहुंचा है, इसमें क्या-क्या हुआ है, मैंने यह पूछा था। दूसरी बात यह है कि जिस तरह से विभाग ने नीम कोटेड यूरिया का काम किया तो बहुत सारा लाभ मिला। पिछले 10 वर्षों में यह सुनने को मिलता था कि यूरिया की कमी है, लेकिन इनके विभाग ने बहुत अच्छा काम किया कि नीम कोटेड यूरिया के कारण देश में यूरिया की कोई कमी नहीं है, इसके मैं आपको बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। लेकिन इस क्षेत्र में शॉर्ट टर्म और लांग टर्म सरकार का क्या ऑब्जेक्टिव है, किस प्रकार से हम इम्पोर्ट करने पर निर्भर नहीं रहेंगे, आपकी क्या परियोजनाएँ हैं, आप क्या प्रोडक्ट्स लाने वाले हैं, किस प्रकार से आप उस विषय में आगे बढ़ रहे हैं और इससे "मेक इन इंडिया " को किस रूप में बल मिलेगा, क्या इस संबंध में आप सदन को कुछ जानकारी देने की कृपा करेंगे?
श्री हंसराज गंगाराम अहीर : माननीय अध्यक्ष महोदया, आज की स्थिति में तो हम इतना दावा नहीं कर सकते हैं कि हमें गैस और क्रूड ऑयल इम्पोर्ट नहीं करना पड़ेगा। देश में उसकी उपलब्धता ही कम है। देश में इसका 80 प्रतिशत आयात आज भी बाहर के देशों से करना पड़ता है। सदस्य महोदय को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने यूरिया के मामले में विभाग की नीति की प्रशंसा की है। यूरिया की कमी न हो, आगे भी ऐसी कोशिश की जाएगी।
अभी जो बातें हो रही थी कि ईरान में प्लांट लगाकर, वहाँ पर क्लस्टर कॉमप्लेक्स लगाकर हम वहाँ से जो रॉ मैटिरियल लाने वाले हैं, उसमें हम अमोनिया भी ले आएंगे, जिससे यूरिया में भी लाभ होगा। नीम कोटेड यूरिया का उत्पादन और भी प्रभावी तरीके से देश में बढ़ता जाएगा। बीच में इसकी प्रोसेसिंग के बारे में आप जो बता रहे थे तो हमने इसी वर्ष 20 तारीख को भारत और इरान के बीच एक ज्वाइंट कमीशन की मीटिंग हुई थी और इसमें ईरान सरकार ने हमें सकारात्मक रूप से आश्वस्त किया है कि हमारी जो शर्तें हैं, उनको मानकर वहाँ पर हमें गैस उपलब्ध करा देंगे। इसमें बहुत अच्छी बात यह होने जा रही है कि जो गैस हमें उपलब्ध होगी, वह 1.5 से 2.5 यू.एस. डालर के दाम में मिलेगी। आज सात से आठ यू.एस. डालर के मूल्य पर हम गैस लेते हैं। इसके मुकाबले हमें वहाँ पर वन-फोर्थ दाम में गैस मिलेगी। इससे देश को बहुत ज्यादा लाभ मिलने की उम्मीद मैं करता हूँ, इसके लिए आगे बातचीत चल रही है। इस पर बहुत जल्दी निर्णय होने के आसार हैं।
श्रीमती संतोष अहलावत: अध्यक्ष महोदया, मैं आपको धन्यवाद देती हूं कि आज आप महिलाओं को मौका दे रही हैं।
मैं आपके माध्यम से रसायन और उर्वरक मंत्री से पूछना चाहती हूं कि राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र में स्थित रिफाइनरी की प्रगति क्या है और क्या उसको अतिशीघ्र पूरा करने के लिए विशेष प्रयास किए गए हैं?
श्री हंसराज गंगाराम अहीर:अध्यक्ष महोदया, प्लास्टिक और केमिकल इंडस्ट्री के लिए निश्चित ही यह फायदेमंद होगा अगर वहां पर यह प्लांट खड़ा हो। लेकिन इन सभी चीजों को, रिफाइनरीज को पेट्रोलियम मिनिस्ट्री देखती है, इसलिए यह प्रश्न पेट्रोलियम मिनिस्ट्री से संबंधित है। राजस्थान में रिफाइनरी बने, यह हमारी शुभकामना है।
DR. SHASHI THAROOR: Thank you Madam Speaker.
This is an extremely interesting and unusual venture that the Government has embarked upon because it is basically like creating a reverse SEZ. You are creating an SEZ in a foreign country in order to benefit us. But the answer by the Minister has not given clear details and I think my friend, Shri Anurag Thakur has also pointed it out that it is a bit skimpy on details. Where the foreign country comes to our country and works in our SEZ, they follow the Indian laws and they employ Indian labourers. When we go to a foreign country, आपने रोजगार के बारे में बोला है, लेकिन वहां इंडियन्स को रोजगार कैसे मिलेगा? I am curious as to whether you have a list of priorities, whether rules have been established or do you have to have certain guidelines by which you create joint ventures with, for example, an Iranian company and an Indian company? Do you create investment patterns under certain rules? Are there profit sharing arrangements? It is not clear from your answer Minister Saheb. You are saying that we can get petroleum, natural gas and fertilizers cheaper. मान लिया, बहुत अच्छी बात है, लेकिन how exactly does it benefit India and Indians? What are the rules and criteria by which you are going to create these reverse SEZs? I think on this your Ministry owes us a little more clarification. There should be a policy statement outlining all this because it would not only be Iran. Tomorrow you may talk about Myanmar. You may go to a third country. Where would you like to go and what common principles and standards will you follow that would benefit Indians, that will employ Indians and that will give profits to Indians.
श्री हंसराज गंगाराम अहीर:अध्यक्ष महोदया, मैंने पहले भी स्पष्ट किया कि देश में नेचुरल गैस और क्रूड ऑयल की बहुत कमी है, हमें आगे भी कुछ वर्षों तक इम्पोर्ट पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यहां पर यह स्पष्ट कर देता हूं कि वहां जो प्लांट लगेगा, वहां हम फाइनल प्रोडक्ट तैयार नहीं करेंगे, वहां पर हम इंटरमीडिएट तैयार करेंगे और उसकी फाइनल प्रोसेसिंग अपने देश में होगी। हमने यह भी शर्त रखी है कि वहां जो भी प्लांट लगेंगे, उसमें हमारे देश के 10 प्रतिशत लोग काम करेंगे और उसके बाद यहां जो फाइनल प्रोडक्ट तैयार होगा, दोनों को मिलाकर वहां हमारे 20 प्रतिशत लोगों को इंप्लायमेंट मिलेगा और जब फाइनल प्रोडक्शन होगा तो 80 प्रतिशत इंप्लायमेंट इस देश में ही मिलेगा। देश में नेचुरल गैस और क्रूड ऑयल की कमी है, इसलिए आत्मनिर्भर होने तक हमें आयात करना ही पड़ेगा।
श्रीमती कमला पाटले : महोदया, मैं छत्तीसगढ़ प्रदेश के जांजगीर-चाम्पा जिले से आती हूं जो कृषि प्रधान जिला है और छत्तीसगढ़ राज्य को कृषि के विषय में धान का कटोरा कहा जाता है।
अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से कहना चाहती हूं कि पिछले कई वर्षों से किसानों के द्वारा, हमारे द्वारा कृषि मिशन, बागवानी मिशन के लिए मांग की जा रही है। हमारेजांजगीर-चाम्पा जिले का 70 से 80 प्रतिशत एरिया सिंचित क्षेत्र है और उस जिले की प्रमुख कृषि फसल धान ही है। इसलिए मैं बागवानी मिशन के क्षेत्र में माननीय कृषि मंत्री जी से चाहूंगी कि जांजगीर-चाम्पा जिले को उसमें जोड़ा जाए।
माननीय अध्यक्ष : आपका प्रश्न बिल्कुल ही अलग है, इस प्रश्न से सन्दर्भित नहीं है।
(Q.144) श्री विनायक भाऊराव राऊत : अध्यक्ष महोदया, मेरे प्रश्न के उत्तर में मंत्री महोदय ने विस्तृत जानकारी दी है, लेकिन बाघों से मनुष्य हानि का जो ब्यौरा दिया गया है, उसकी संख्या दुर्भाग्य से महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा है और पश्चिम बंगाल में भी ज्यादा है। मनुष्य हानि न होने के लिए सरकार ने कई योजनाएं शुरू की है, उनके बारे में भी यहां जानकारी दी है।
मैं मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि जिन योजनाओं और परियोजनाओं को बनाने के बाद भी महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में इतनी ज्यादा संख्या में बाघों का मानव जाति पर आक्रमण हो रहा है।
माननीय अध्यक्ष: मनुष्य भी तो बाघों के क्षेत्र में चले गए हैं, वे भी बेचारे क्या करें।
श्री विनायक भाऊराव राऊत : सही बात है। जंगलों में आदिवासी बस्तियां हैं। उन लोगों के पुनर्वसन के लिए सरकार के पास क्या योजना है? इसके अलावा जिस तरह से गैर कानूनी रूप से जंगलों की कटाई हो रही है, उस बारे में भी सरकार ने क्या योजना बनाई है कि अवैध रूप से जंगल न काटे जाएं?
श्री प्रकाश जावड़ेकर : अध्यक्ष जी, यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। बाघ हमारे इकोलॉजिकल सिस्टम का एक शिखर हैं, लेकिन मनुष्य भी तो शिखर है। इसलिए यह काँफ्लिक्ट नहीं होना चाहिए। इसके लिए हमने तीन उपाय किए हैं। पहला तो यह है कि जो आदिवासी समाज जंगल में रहता है और स्वेच्छा से बाहर आना चाहता है, उनके लिए प्रति परिवार दस लाख रुपए देकर उनका पुनर्वास ठीक तरह से हो, वे बाहर आएं, यह उपाय किया है। इस साल भी हमने इसके लिए बहुत पैसा खर्च किया है। अगले साल 395 करोड़ रुपए का प्रावधान टाइगर प्रोजेक्ट के लिए है। इस बार 60/40 के पैटर्न पर राज्यों को भी लगभग 250 करोड़ रुपए देने होंगे, इस प्रकार लगभग 640 करोड़ रुपए मिलेंगे। इससे ज्यादा लोगों का पुनर्वास होगा, जिससे काँफ्लिक्ट न हो। दूसरी बात यह है कि बाघ जंगल से क्यों बाहर आते हैं। वे इसलिए ऐसा करते हैं कि उन्हें पानी नहीं मिलता या चारे की जब कमी होती है तो प्रे, जिनका वे शिकार करते हैं, जो फॉडर होता है, वह कम होने से उनके लिए शिकार होने वाले जानवरों की कमी हो जाती है। इसलिए फॉडर और वाटर एग्मेंटेशन का कार्यक्रम भी बनाया गया है।
श्री विनायक भाऊराव राऊत : बाघ मानव बस्ती में आते हैं पानी और भक्षण के लिए। महाराष्ट्र में रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग और संगमनेर आदि कई ऐसे जिले हैं, खासकर संगमनेर में रहने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए मंत्री जी ने दस लाख रुपए बताएं हैं, लेकिन वहां के लोगों को आठ लाख रुपए ही मिले हैं। रतनागिरि और सिंधुदुर्ग के कई ऐसे इलाके हैं जहां बाघ के साथ-साथ नीलगाय और गेंदू भैंसे जिन्हें कहते हैं, इस तरह के जानवरों की संख्या काफी है। ये जानवर जब मानव बस्ती में आते हैं तो किसानों की खेती और बागों की भी काफी हानि होती है। मैं मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि इन जंगली प्राणियों की वजह से खेती और बागों को हो रहे नुकसान से बचाने के लिए आपने क्या योजना बनाई है?
श्री प्रकाश जावड़ेकर: अध्यक्ष जी, यह सच है कि वन्य प्राणियों से जो नुकसान होता है उसके लिए हमने कानून के आधार पर राज्यों से प्रस्ताव मंगाए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने, ब्लू बुल, जिसे रेडरोज़ कहते हैं, उसके कारण जो संकट आता है उससे निपटने के लिए प्रस्ताव भेजा है। हमने उसे मंजूरी दी है।
श्री राहुल शेवाले : अध्यक्ष महोदया, टाइगर संसार में एक प्रतिष्ठित जानवर है। परंतु यह जानवर अब लुप्त होने के कगार पर है। पिछले 100 वर्षों में एशिया में टाइगर्स की संख्या करीब एक लाख आंकी गई थी। लेकिन आज यह संख्या घटकर लगभग 3,200 ही रह गई है। मनुष्य का वाइल्ड लाइफ ट्रेड के लालच का सबसे अधिक असर टाइगर्स पर हुआ है। मेरी जानकारी के अनुसार कान्हा नेशनल पार्क में तुली टाइगर कॉरिडोर बनाया है। इस तरह के कॉरिडोर में टाइगर को स्वतंत्र जीवन जीने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान की गई हैं। देश के अन्य स्थानों पर भी टाइगर कॉरिडोर बनाया गया है या बनाने का विचार है। इस टाइगर कॉरिडोर से किस प्रकार से टाइगर का संरक्षण होता है? मानव और जंगली जानवरों के संघर्ष को रोकने के लिए क्या प्रभावी कदम सरकार ने उठाए हैं? इसके साथ ही 1 जून, 2015 को मंत्रालय द्वारा जारी नोटिफिकेशन में सुझाए गए ह्यूमन वाइल्ड लाइफ मेनेजमेंट स्ट्रेटजी पर राज्य सरकारों ने मानव-वन्य जीवों के संघर्ष को समाप्त करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? मेरी जानकारी के अनुसार पिछले सप्ताह अखबारों में एक खबर छपी थी।
माननीय अध्यक्ष: कृपया प्रश्न पूछें।
श्री राहुल शेवाले: संजय गांधी नेशनल पार्क में, जो दिल्ली-मुम्बई कॉरिडोर है, उस बारे में जगह मांगी थी। जो संजय गांधी नेशनल पार्क से जाने वाला था। माननीय मंत्री जी से मैं जानना चाहता हूं कि क्या संजय गांधी नेशनल पार्क से दिल्ली-मुम्बई कॉरिडोर का रूट जाने वाला है या नहीं? अगर ऐसा है तो मैं कहना चाहता हूं कि सभी मुम्बईवासियों का इसे लेकर विरोध है। इसके साथ ही जो ह्यूमन वाइल्ड लाइफ मेनेजमेंट स्ट्रेटजी है, उसके भी खिलाफ है।
श्री प्रकाश जावड़ेकर: ऐसा प्रस्ताव सरकार के पास नहीं आया है।
SHRIMATI SUPRIYA SULE: Madam, I would like to ask the hon. Minister on one point. ‘Save the Tiger’ has been a flagship programme of several Governments and it has been a success story in India. The only question is, in Maharashtra, we have maximum attacks, the reason being the way we do love human beings, we do love our animals as well. What can we do in Maharashtra? The maximum leopard attacks are around Sanjay Gandhi National Park where urbanization seems to be the biggest challenge. Actually, we are intruding on their area than their intruding on our area. There are a lot of NGOs in Tadoba which are making many suggestions for addressing the animal conflict. They have managed to move several villages out of Tadoba but the compensation and skills for livelihood has not been a success story. If you could intervene in this matter, I am sure, we can help all these people a lot more.
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: Madam, it is a very good question and a suggestion for action.
Let me tell you that we have 49 Tiger Sanctuaries now. Out of these 49 Sanctuaries, we have prepared and approved Working Plans for more than 34 Tiger Sanctuaries and others are in the process of approval. So, we are discussing the matter with the State Government, the State Forest Department, the officers of the Wildlife Sanctuary, NGOs and all stakeholders so that specific situational solutions in each Tiger Reserve can be worked out. We want to minimize these conflicts because every year, a loss of 20 to 30 people is not a good sign. We are trying utmost to minimize this conflict.
SHRIMATI KAVITHA KALVAKUNTLA: I would like to wish you all a very Happy Women’s Day to all of you and especially my best and special wishes for my male colleagues.… (Interruptions)
My question is related to Paris Accord. Till date, 55 countries have not signed the Accord and in an interview, you have quoted that India had made specific compromises. In the spirit of compromise, we did not want to block the Accord and so, we have signed the Accord.
Through you, Madam, I would like to ask the Minister as to what are the compromises that India had made to sign this Agreement. Secondly, all the developed nations have quoted that a funding of 62 billion dollars is given to the developing nations. How much climate financing did India receive from 2014?
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: Though it is not directly related to the main Question, I would like to reply in two sentences. Firstly, no country has signed it because the signing process will start on 22nd April in UN Headquarters. All countries have declared that they will sign and ratify the Agreement. So, that is a process which will be valid for one year.
As far as international finance is concerned, we are emphasizing the developed countries that they must follow their commitment of 100 billion dollars and we have also led with an example that we can charge coal at 6 dollars per tonne. If the developed world can do the same, it can generate 100 billion dollars.
डॉ. भारतीबेन डी. श्याल: अध्यक्ष जी, हम सब जानते हैं कि गिर फॉरेस्ट गुजरात में है और एशियन लॉयन केवल गिर फॉरेस्ट में ही पाया जाता है। गिर फॉरेस्ट में एशियन लॉयन के साथ-साथ बहुत सारे अन्य हिंसक प्राणी भी पाए जाते हैं। मैंने देखा है कि कई बार आस-पास के गांव में वे घुसकर मानव हानि तो करते हैं, साथ ही साथ पालतु पशु जैसे- गाय, भैंस, बकरी और भेड़ इत्यादि जो उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है, उनको भी मार देते हैं या कई बार इंजर्ड कर देते हैं। माननीय मंत्री जी से मैं आपके माध्यम से यह जानना चाहती हूं कि पालतु पशुओं की हानि के लिए क्या सरकार कोई मुआवजा देती है या नहीं?
श्री प्रकाश जावड़ेकर : महोदया, पालतु जानवर अगर इस कनफलिक्ट में मारे जाते हैं तो उसके लिए एक प्रोसैस है, जिसके तहत मुआवजा दिया जाता है। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं, Gir Forest is one of the best examples of how human and wild life can happily stay together and when there are accidents, they are taken care of adequately.
श्रीमती अनुप्रिया पटेल : अध्यक्ष महोदया, मैं उत्तर प्रदेश राज्य से आती हूं, वहां घड़रोज़ और जंगली सुअर किसानों के लिए बहुत बड़ी समस्या बन चुके हैं। दलहन और तिलहन की खेती इनकी वजह से बुरी तरह से चौपट हो रही है, लेकिन इनको मारने की अनुमति मेरे राज्य में नहीं है। माननीय मंत्री जी ने अपने उत्तर में बताया कि इनको वर्मिन की केटेगिरी में डालने के लिए आप राज्यों से प्रस्ताव मंगाते हैं। मैंने इस विषय को पहले भी सदन में उठाया था और मैं माननीय मंत्री जी से व्यक्तिगत रूप से भी मिली थी। मेरा माननीय मंत्री जी से एक छोटा सा प्रश्न है कि क्या मेरे राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार ने आपको अभी तक ऐसा प्रस्ताव भेजा है कि उन्हें वर्मिल की श्रेणी में डाल दिया जाए या नहीं। क्योंकि हमारे राज्य के किसानों के लिए यह एक बहुत बड़ी समस्या है और रोज ही इस विषय को लेकर किसान आंदोलन हो रहे हैं।
श्री प्रकाश जावड़ेकर : महोदया, राज्य सरकार का प्रस्ताव आने तक हम उस पर कानूनन काम नहीं कर सकते और इसलिए राज्य सरकार से प्रस्ताव आने की हम प्रतीक्षा में हैं।
श्रीमती रंजीत रंजन : माननीय अध्यक्ष जी, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से पूछना चाहती हूं कि वातावरण ऐसा हो रहा है कि शेर, बाघ गांवों में आ रहे हैं, इसका कारण यह है कि एक तो उन्हें भोजन नहीं मिल रहा है, जैसा अभी अनुप्रिया जी कह रही थीं कि वे भेड़, बकरियों पर भी अटैक करते हैं। क्या हम लोगों ने ही जंगल काट-काट कर उनकी जगह घेर ली है, जिसके कारण उन्हें गांवों में आना पड़ता है और क्या हम उन्हें बाहर निकालने के लिए बंदिश के लिए ही पर्याप्त सुविधाओं का क्रियान्वयन करेंगे या उनके लिए जो जंगल पर्याप्त नहीं बचे हैं, क्या उसके लिए भी कोई प्लान है। इसके साथ ही मैं कहना चाहती हूं जिन लोगों पर अटैक होता है और उन्हें जो मुआवजा दिया जाता है, वह बहुत ही कम है। मैं समझती हूं कि उसे बढ़ाकर ज्यादा किया जाए।
दूसरी बात यह है कि कल ही मैं पेपर में पढ़ रही थी कि बहुत सारे ऐसे जू हैं, जिनमें जानवरों को पर्याप्त मात्रा में भोजन ही नहीं दिया जाता है। कोई एजेन्सीज या प्राइवेट एनजीओज वगैरह उन्हें चलाते हैं, लेकिन पर्याप्त खाना नहीं होने के कारण भी कई जगहों पर जो प्राइवेट जू बने हुए हैं, उनमें बाघ या अन्य तरह के जानवर भूख के कारण मर रहे हैं, उसके लिए सरकार क्या कर रही है?
श्री प्रकाश जावड़ेकर : पहला जैसे मैंने कहा कि हमारी सक्सैज स्टोरी प्रोजैक्ट टाइगर है, अब दुनिया के 70 फीसदी बाघ भारत में हैं। अभी 13 देशों में बाघ होते हैं और 13 देशों के मंत्री आकर 13 देशों के प्रतिनिधिमंडलों के साथ एक यहां कांफ्रैंस हो रही है, जिसका उद्घाटन प्रधान मंत्री जी करेंगे। उसमें इस पर पूरा विचार होगा। लेकिन बाघों का मैंनेजमैन्ट हर एक टाइगर सैंक्चुअरी में अलग से तैयार किया जाता है, कंप्रिहैन्सिव है, इसमें अपने जो पब्लिक रिप्रजेन्टेटिव्ज हैं, उनके भी कोई सजैशंस हैं तो उन्हें भी तवज्जो दी जायेगी। जहां तक उनके फॉडर एंड वाटर की जो रिक्वायरमैन्ट है तथा उन्हें कारीडोर भी सेफ मिले, क्योंकि बाघों की संख्या बढ़ती है तो क्षेत्र भी ज्यादा लगता है। अपने देश में जमीन कम है, लेकिन लोग ज्यादा हैं, यह कंफ्लिक्ट है, लेकिन इसमें से भी रास्ता निकालकर एक बेहतरीन उदाहरण भारत ने दुनिया के समक्ष पेश किया है।
SHRIMATI K. MARAGATHAM : Today is Women’s Day. I would like to inform the august House that one woman fought with a tiger single handedly for several hours in a village in Uttar Pradesh to save her wards and finally she succeeded in it. This is women power. That is okay.
I would like to know from the hon. Minister how the Government plans to protect men from animals as men-animal conflicts have increased in a big way now due to animals coming out of forest areas in search of food. Thank you.
SHRI PRAKASH JAVADEKAR: This is what exactly I am saying that water and fodder augmentation in jungle areas are necessary. Now every sanctuary will have a separate plan for water augmentation. If water, fodder and prey are available, then tiger ecology works. That is what we are aiming at.
(Q.145) श्री विद्युत वरन महतो: माननीय अध्यक्ष महोदया, मंत्री जी को मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया है, मैं सीधे प्रश्न पर आता हूं, मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि सरकार द्वारा दवाओं की कीमत पर अंकुश लगाने और गरीबों को सस्ती एवं उचित दर पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं। इसके साथ ही साथ मूल्य नियंत्रण के दायरे में आने वाली दवाओं की कीमत सरकार द्वारा तय किये जाने के बावजूद कई दवा कंपनियां ज्यादा रेट में दवाई बेच रही है। मैं मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि सरकार द्वारा इस पर नजर रखने हेतु क्या कदम उठाये जा रहे हैं?
श्री हंसराज गंगाराम अहीर :अध्यक्ष महोदया, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि हमारे मंत्रालय, विभाग में पहले एनपीपीए सन् 1997 में बनाया गया था, जिसके तहत दवाइयों के मूल्य निर्धारण हेतु एक प्राधिकरण बनाया गया। उसके बाद औषधियों के मूल्य निर्धारण हेतु एक नीति बनाई गई, अभी प्राइस कंट्रोल के लिए डीपीसीओ में सन् 2013 में प्राइस कंट्रोल करने हेतु सूची बनाई गई है, एनएलईम हमें स्वास्थ्य मंत्रालय से मिलता है। गरीबों और मरीजों को सस्ती दवाई उचित मूल्यों पर मिलें इसका पूरा प्रयास मंत्रालय करता है। माननीय सदस्य ने जो पूछा है कि कहीं पर डीपीसीओ से अधिक, जो रेट हम तय करते हैं, उससे अधिक मूल्यों पर अगर कोई दवाई बिकती है और उसकी शिकायतें हमें आती हैं तो हम कार्यवाही करते हैं। लेकिन ऐसी कोई लिखित शिकायत हमें मिली नहीं है। केंद्र सरकार भी इस पर कार्यवाही करती है राज्य सरकार भी इस पर कार्यवाही करने की अधिकारी है। सदस्य महोदय से ऐसी कोई पर्टिक्युलर शिकायत हमें मिल जाएगी तो हम उस पर कार्यवाही करेंगे।
श्री विद्युत वरन महतो : अध्यक्ष महोदया, मेरा दूसरा पूरक प्रश्न है कि सरकार घातक बीमारियों जैसे कैंसर, हृदय रोग, हैपेटाइटिस, मधुमेह, किडनी के मरीजों तक सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए क्या उपाय कर रही है?
श्री हंसराज गंगाराम अहीर :महोदया, मैं इसका विस्तृत जवाब दे चुका हूँ। माननीय सदस्य ने विभिन्न बीमारियों का उल्लेख किया है, जिसमें हृदय रोग, मधुमेह आदि हैं, मैं बताना चाहता हूँ कि हृदय रोग के लिए 53 दवाइयां हैं और शुगर के लिए करीब 6 हैं, एचआईवी के लिए करीब 20 दवाइयां हैं, टी.बी. के लिए 24 दवाइयां हैं, कैंसर के लिए 47 दवाइयां हैं और किडनी के लिए छह दवाइयों का मूल्य निर्धारण कवर किया हुआ है। अगर हमें अन्य किसी गंभीर बीमारी की दवा की सूची एनएलईम स्वास्थ्य मंत्रालय से मिलती है, तो हम डीपीसीओ से कंट्रोल करते हैं। प्राइस कंट्रोल के संबंध में जो भी आवश्यक सूचना हमें मिलती है, उस पर हम निर्णय लेते हैं और उसके दाम कम किए जाते हैं।
श्री सुधीर गुप्ता: अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूँ कि जीवन रक्षक दवाइयों को राष्ट्रीय औषधीय मूल्य निर्धारण नीति - 2012 में परिभाषित नहीं किया गया, क्या आप भविष्य में जीवन रक्षक दवाइयों को मूल्य निर्धारण हेतु परिभाषित करने की कोई नीति बनाने की योजना पर विचार कर रहे हैं? साथ ही अनुसूची में शामिल अनुसूचित औषधियों का बाज़ार आधारित मूल्य निर्धारण के सिद्धांत पर किया गया है। बाज़ार आधरित मूल्य निर्धारण सिद्धांत क्या है? क्या यह लागत आधारित है या बाज़ार में उपलब्ध अन्य प्रोडक्ट से मूल्य की तुलना पर आधारित है?
श्री हंसराज गंगाराम अहीर :महोदया, जीवन रक्षक और गैर जीवन रक्षक दवाइयों को हमने अलग-अलग परिभाषित नहीं किया है। सभी दवाइयों को हमने जीवन रक्षक दवाइयां समझ कर ही नीति बनाई है और उसी में हमने सभी को कवर किया है। सदस्य महोदय ने जो प्रश्न पूछा है कि यहां पर मार्केट आधारित सन् 2013 में जो नीति बनी थी, जो प्राइस तय की जाती है उसका मूल्यांकन मार्केट आधारित प्राइस मूल्यांकन पर ही किया जाता है। यह सन् 2013 की नीति है, हम उसके अनुसार काम कर रहे हैं। वर्ल्ड होलसेल प्राइस इंडेक्स के आधार पर ही हम इन दवाइयों के मूल्य हर वर्ष बदलते रहते हैं। सौभाग्य से इस बार डब्ल्यूपीआई ज़रा माइनस चल रहा है। मुझे लगता है कि इस वर्ष दवाइयों के दाम नहीं बढ़ेंगे।
DR. MAMTAZ SANGHAMITA: मैडम, मैं आज सबको नारी दिवस की बधाई देती हूँ।
Part of the question has already been answered by the Minister in his reply. What is the Government policy on controlling prices regarding life-saving essential drugs, especially for Cardio Vascular Diseases, Diabetes and the Pregnancy complication?
Would the Government take up production of some pharmaceutical drugs under the Government undertakings? There are some cheaper drugs, essential life-saving drugs like Morphine, Pethidine, Maxsulf which are required for Eklampsia in pregnancy patients. Since these medicines are cheaper, it is not easily available and production is not usually done by pharmaceutical companies. Whether Government itself would take some initiatives so that we get regular supply of these cheaper drugs?
12.00 hours श्री हंसराज गंगाराम अहीर :अध्यक्ष महोदया, देश में दवाइयों के उत्पाद में हमें कहीं कमी नहीं दिखती है। मैं आपके सामने स्पष्ट कर दूँ कि भारत देश दुनिया के करीब दो सौ देशों में दवाओं का निर्यात करता है। एक अच्छी सक्षम इंडस्ट्री के रूप में भारत देश को हमने प्रस्तुत किया है। दुनिया के एक मेडिकल स्टोर के रूप में भारत देश को देखा जाता है।
सदस्य महोदया ने जो कुछ गाइनिक औषधियों के मामले में कहा है, अगर आपके द्वारा कुछ और दवाइयों के नाम हमें मिल जाते हैं तो निश्चित ही हम अपने स्वास्थ्य मंत्रालय को लिखेंगे और उसमें जो स्वास्थ्य मंत्रालय एन.एल.ई.एम. देता है, जो आवश्यक दवाइयों के मूल्यों के बारे में सूची देते हैं, उसमें इन दवाओं के नाम इंक्ल्यूड करके उनसे हम लिस्ट में सुधार करके माँग सकते हैं। जो हमारे देश की सरकारी कम्पनियाँ हैं, उनमें भी सौ से अधिक दवाइयों का निर्माण किया जाता है। देश में जो कुछ दवाएं नहीं बनती हैं, अगर उनकी हमें कोई सूची मिल जाती है तो हम अपने सरकारी पीएसयूज में भी उनका उत्पादन करने का पूरा प्रयास करेंगे।...(व्यवधान)
12.01 hours RULING BY THE SPEAKER HON. SPEAKER: Hon. Members, I have received a notice of Adjournment Motion from Shri Mallikarjun Kharge regarding tax on withdrawal from EPF. As you are all aware, hon. Minister of Finance wanted to make a statement on the issue on Friday, the 4th March, 2016 itself but as the House was adjourned for the day, the statement could not be made. Now the hon. Minister is making a statement in the House today.
I have also received notices of Adjournment Motion from Sarvashri N.K. Premachandran, M.B. Rajesh, Jay Prakash Narayan Yadav, P. Karunakaran, Bhagwant Mann and K.C. Venugopal on different issues.
The matters though important do not warrant interruption of business of the day. The matters can be raised through other opportunities.
I have, therefore, disallowed all the notices of Adjournment Motion.
12.02 hours PAPERS LAID ON THE TABLE