Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Drought Situation In Various Parts Of The Country ... on 11 December, 2015
Sixteenth Loksabha an> Title: Further discussion on the drought situation in various parts of the country raised by Shri Jyotiraditya M. Scindia on the 7th December 2015 (Discussion concluded).
HON. DEPUTY-SPEAKER: Now, we will take up further discussion under Rule 193 on drought situation in various parts of the country, Shri Nana Patole.
श्री नाना पटोले (भंडारा-गोंदिया) :उपाध्यक्ष महोदय, कृषि क्षेत्र में बीते दस-पन्द्रह सालों से किसानों के ऊपर आपत्ति आ रही है और उसी के बारे में लोक सभा में कई बार चर्चा भी हुई है और उसके उपायों की भी बात हुई। पिछले साल भी भारत का 50औ हिस्सा सूखे में था। इस साल वह 60औ पर गया है।
उपाध्यक्ष महोदय, हम लोग प्रकृति को समझ सकते थे। उसी के आधार पर हमारे देश में जितने भी वित्त आयोग बने, उसमें हमने सिंचाई योजनाओं की घोषणा की। लेकिन, आज भी हम देखते हैं कि अपने देश में सिंचाई की सिर्फ 33औ व्यवस्था की गयी है। अगर पिछले 65 वर्षों से हमारे कृषि क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था की गयी होती, तो आज हमें सूखे का सामना नहीं करना पड़ता। आज देश में इसकी वज़ह से बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्या हो रही है। उसी की वज़ह से सरकार और हम सब जनप्रतिनिधि यह सोच में पड़े हैं कि ये आत्महत्याएं कैसे रोकी जाएं। आत्महत्या का जो कारण बताया गया है, उसमें कर्ज़, फसलों की हानि, प्राकृतिक आपदा, क्षतिग्रस्त उत्पाद, वैकल्पिक आय में असमर्थता इत्यादि। एन.सी.आर.बी. की जो रिपोर्ट आती है, अगर उसके आधार पर उपाय किए गए होते, तो आज तक हम लोग किसानों को सही राह देने में सफल हुए होते। यह सब सहायता किसानों को नहीं दी गयी। इससे हमारा किसान गरीब हुआ। गरीब होने की वज़ह से वह अपना कर्ज़ चुका नहीं सका। उसके पास खेती करने के लिए पैसे न होने की वज़ह से, उसके बच्चों की पढ़ाई व उनकी शादी की व्यवस्था के लिए उसके पास पैसे न होने की वज़ह से किसानों ने आत्महत्या करना शुरू किया।
उपाध्यक्ष महोदय, अगर हम रेनफाल देखते हैं तो हर साल हमारी बारिश कम होती जा रही है। जैसे पहले के जमाने में जून के महीने में बारिश होती थी, तो अब वह अगस्त महीने में चली गई है। किसान जून महीने में खेती की तैयारी करता है, लेकिन समय पर बारिश न होने की वजह से हर बार जो वह बिजाई डालता है, उसमें उसको दो-तीन बारपेमी करना पड़ता है। मैं सरकार से विनती करना चाहूंगा कि किसान को बारिश का जो अंदाज रहता है, उसके बारे में जो भी हवामान खाते के माध्यम से बताया जाता है, वह प्रॉपर नहीं बताया जाता है। मैंने पिछली बार सूखे पर चर्चा के समय कहा था कि दुनिया में हमारा साइंस इतना आगे चला गया है कि अगर बिजली गिरती है तो कहां पर, कितने बजे गिरने वाली है, उसका अंदाजा बताया जाता है। हमारे देश में आज बिजली से मरने वालों की संख्या बड़े पैमाने में है। बारिश का अंदाज आज भी हमें नहीं है। हम लोग अंदाज बताते हैं। हवामान खाता हमें अंदाज बताता है कि आज बारिश गिरने वाली है, लेकिन बारिश आठ दिन के बाद गिरती है। इन सभी चीजों के अगर प्रॉपरली सरकार द्वारा सुनियोजित किया गया तो निश्चित रूप से किसानों को हम लोग ताकत दे सकते हैं।
मंत्री महोदय निश्चित रूप से अपने जवाब में कहेंगे कि इस सब की व्यवस्था में सरकार पहल कर रही है। कृषि का धोरण अंग्रेजों के जमाने का है। हमारी सरकार आने के बाद उसके बारे में थोड़ा बदल करने की पहल सरकार ने की है, लेकिन पिछली सरकारों के द्वारा कोई पहल न करने की वजह से किसान के लिए जो फसल का इंश्योरेंस निकाला जाता है, उसका मुआवजा भी उसे नहीं मिलता है। वर्ष 1937 मेंअंग्रेजों ने इसे बनाया था। अगर किसान की कम फसल होती है तो भी सोलह आने फसल हो गई और उसी के आधार पर किसान को इंश्योरेंस की पॉलिसी उस फसल के लिए नहीं मिलती है और किसान का नुकसान होता है।
HON. DEPUTY SPEAKER: The hon. Minister is going to reply at 2.30 p.m. The House has to take up Private Members’ Business at 3.30 p.m. The hon. Minister requires minimum one hour to reply to the debate. There are three more speakers to speak. Therefore, please cooperate and talk only about the points you wish to raise.
श्री नाना पटोले : इंश्योरेंस पॉलिसी के बारे में यहाँ पर मंत्री महोदय को क्लियर करना चाहिए। हमारे मंडल में पूरे एरिया में यदि फसल का नुकसान होता है तो ही किसान को मुआवजा दिया जाता है। जिस किसान ने फसल का बीमा कराया हो, उस किसान का अगर नुकसान होता है तो सैटेलाइट के आधार पर उस किसान को हम इंश्योरेंस का मुआवजा दे सकते हैं क्या? उसके बारे में भी सरकार को यहाँ बताना चाहिए।
महोदय, मैं विशेषकर यह कहूँगा कि हमारी 12वीं योजना हो, 13वीं योजना हो, 14वीं योजना हो, एआईबीपी के आधार पर हमने सिंचाई के लिए लक्ष्य बनाया था। मुझे जानकारी है कि 12वीं योजना में हमने 24 लाख हैक्टेअर जमीन का लक्ष्य बनाया था। हमारा जो पैसा राज्य सरकार में जाता है, उस पैसे का क्या सही इम्प्लीमेंटेशन होता है, क्या उसका कंट्रोल केन्द्र सरकार के हाथ में है? जब भी हमारे सवाल का जवाब आया है तो हमें यही मालूम पड़ता है कि राज्य सरकार ने उसमें क्या किया, उसकी हम जानकारी करेंगे और उसके आधार पर हम निर्णय लेंगे।
महोदय, केन्द्र सरकार का पैसा राज्य सरकार, क्योंकि मैं जिस महाराष्ट्र राज्य से आता हूँ, पिछली सरकार ने 70 हजार करोड़ रूपए सिंचाई योजना के लिए खर्च किया। वहां जब नए मुख्यमंत्री बने तो उन्हें रिपोर्ट दिया तो माइनस 1.70 हजार करोड़ में इरीगेशन की सुविधा हुई। इस तरह से अगर भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर सिंचाई की योजना में होगा तो किसान के नाम से पैसा जाएगा, लेकिन किसान को उसका फायदा नहीं होगा और किसान आत्महत्या करेगा। मैं कृषि मंत्री जी से इस चर्चा के माध्यम से इतना ही कहूँगा कि आप किसान को बचाने का कार्य कीजिए।...(व्यवधान)
महोदय, मैं खुद किसान हूँ। इसलिए मैं आपसे विनती करता हूँ कि आज तक तीन लाख से ऊपर किसानों ने आत्महत्या की हैं। मैं कृषि मंत्री जी से इतना ही कहूँगा कि आज की चर्चा के माध्यम से जो आपका जवाब आएगा, उसमें किसान को न्याय मिलेगा, यही जवाब मुझे मिलना चाहिए। मैं यही आपसे अनुरोध करता हूँ और अपनी बात समाप्त करता हूँ।
*श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी (अहमदनगर) ः वेदकाल के ऋषि मुनियों ने पर्यावरण संतुलन के दृष्टिगत नदियों, जंगलों पशु-पक्षियों सहित पूरे संसार की ओर देखने की सह-अस्तित्व की विशिष्ट अवधारणा को विकसित किया। इसी कारण देश में प्रकृति को समझने की व उससे व्यवहार करने की परंपरा जन्मी। लेकिन पिछले 40-50 वर्षों में अनियंत्रित विकास और औद्योगिकीरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ी। लिहाजा कई नदियां जो बारहमासी बहती थी वह गर्मी का मौसम आते-आते ही दम तोड़ देती हैं, कई सूख जाती हैं तो कई नाले का रूप धारण करती हैं, यदि उनमें जल भी रहता है तो वह पीने लायक भी नहीं रहता। मौसम में थोड़ी सी भी ज्यादा बरसात से हमारे चमक-दमक वाले शहर दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, भोपाल, चेन्नई के साथ-साथ छोटे-छोटे शहर भी डूबने लगते हैं। पानी के सड़कों पर जमा होने से हल्ला हो जाता है। हमारे इन सभी आधुनिक बन गये शहरों में 30-40 साल पहले तक सुन्दर तालाब हुआ करते थे और शहर में होने वाली वर्षा के अतिरिव्त जल को अपने में रोक कर पहले उसे बाढ़ से बचाते थे और छः महीने बाद आने वाले जल संकट को थामते थे। लेकिन जमीन के प्रति हमारी लालच और हमारी राजनीति ने इन सब पर कब्जा किया और तालाब की जगह सुंदर जगमगाते मॉल, बाज़ार हाउसिंग सोसायटी आदि बना दिये। इसलिए दो घंटे में हुई तेज बरसात भी इन इलाकों को डुबाकर हम याद दिलाती है कि हम उसके रास्ते में खड़े हो रहे हैं।
जल संकट देश ही नहीं समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देकर गिरते भूजल स्तर को रोका व उचित जल प्रबंधन से सबको शुद्ध जल मुहैया कराया जा सकता है। इसलिए तेजी से कम होते भूजल को संरक्षित करने के लिए जल-प्रबंधन पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। भूजल पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है। हमारे यहां होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्धारित है। लेकिन आज वह चाहे सरकारी मशीनरी हो, उद्योग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम जन हो सभी ने भूजल को दोहन किया है जिसके नतीजतन हमारे सामने जल संकट की भीषण समस्या आ खड़ी हुई है। यह भयावह खतरे का संकेत है कि जब-जब पानी का अत्यधिक दोहन होता है तब जमीन के अंदर पानी का उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाये। पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे तभी यह संभव है कि ग्रामीण तथा शहरी दोनों जगह दोहन नियंत्रित हो, संरक्षण भंडारण हो ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके।
अकाल का सामना करने के लिए महाराष्ट्र राज्य ने बड़े पैमाने पर इलाज किया है। सन् 1972 के अकाल में राज्य सरकार ने रोज़गार गारंटी योजना कार्यान्वित की। आगे चलकर उसे पूरे देश ने स्वीकारा और वहां रोज़गार गारंटी योजना देश में ""मनरेगा"" नाम से चलाई जा रही है। दूसरा-राज्य में वर्तमान भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार ने ""जलयुव्त शिविर"" योजना का कार्यान्वयन किया जिससे अकालग्रस्त गांव में पीने के पानी के साथ-साथ मवेशियों के चारे की भी व्यवस्था हो गयी है। यह एक पारदर्शी तथा उपयुव्त योजना हैं पहाड़ी क्षेत्र में ""टेकड़ी धरण"" संकल्पना भी महाराष्ट्र राज्य की देन है। अब मैं अकाल संबंधी वर्तमान व्यवस्था की ओर आता हॅं। जिस क्षेत्र में लंबे समय तक (कई महीनेया वर्षों तक) वर्षा कम होती या नहीं होती है उसे सरकारी भाषा में अकाल कहा जाता है। अकाल के कारण कृषि एवं पर्यावरण पर गहरा असर होता है। अकाल घोषित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा नीति नियम बनाये गये हैं। इन नियमों के तहत जिस गांव में खेती उत्पादन 50 प्रतिशत से कम होता है, वहां अकाल घोषित किया जाता है। लेकिन सरकारी बाबू अपने दफ्तर में बैठकर ही आणेवारी का फैसला करते हैं, उससे सत्य परिस्थिति का आकलन होने के बजाय सूखाग्रस्त किसानों के सामने समस्या खड़ी होती है क्योंकि 50 प्रतिशत कम उत्पादन अधिकारी दिखाते नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि अकाल घोषित किया तो उनके कामकाज बढ़ेगा और खेती में उत्पादन न होने के कारण किसान अवस्द्ध हो जाता है। इसका उदाहरण मेरा संसदीय क्षेत्र अहमनगर है जिसमें पाथर्ती नगर तहसील है, वे पूरे अकालग्रस्त हैं लेकिन ये दोनों तहसीलों में से सिर्फ 17 गांव हैं जो अकालग्रस्त घोषित किये हैं। कर्जत-जामखेड़ में भी अकाल की छाया है। आज वहां पीने के पानी की किल्लत है लेकिन कर्जत जामखेड़ में से एक भी गांव का अकालग्रस्त में समावेश नहीं किया गया। दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों की कमी के कारण मनरेगा जैसी योजना का कार्यान्वयन ठीक नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए हर साल आवंटित धनराशि में कटौती की जा रही है। मेरे संसदीय क्षेत्र में गत 3 सालों में से एक भी पैसा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना कार्यान्वयन के लिए नहीं मिला है। महाराष्ट्र राज्य ने भी प्रयास किये लेकिन राशि आवंटित नहीं हुई। इसी कारण अकाल की गंभीरता बढ़ रही है। अहमदनगर जिले में हर साल जनवरी में टैंकर से पीने का पानी शुरू होता है लेकिन इस साल नवंबर में ही 100 टैंकर से जिले में पीने के पानी की सप्लाई हो रही है। जिले के 66 गांवों में 299 बस्तियों के 65000 लोगों को टैंकर से पानी सप्लाई हो रही है। इस स्थिति का आकलन केंद्र सरकार ने ""उच्च स्तरीय टीम"" महाराष्ट्र में भेजकर किया है। अब हमें इंतजार है कि केंद्र सरकार अकाल घोषित करने के लिए नीति-नियमों में बदलाव करके शीघ्रतिशीघ्र आर्थिक सहायता प्रदान करने की व्यवस्था करे।
महाराष्ट्र राज्य कें किसानों की सूखे की वजह से हालत खस्ता हुई है, अकाल पीड़ित किसानों को राहत दिलाने हेतु राज्य सरकार ने केंद्र से 6000/- करोड़ रूपए की सहायता मांगी है। उसे प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी प्रदान करके मंजूर राशि बिना विलंब महाराष्ट्र राज्य को हस्तांतरित की जाए।
प्याज के भाव बढ़ने से इसका लाभ दलाल और व्यापारी को मिलता है और किसान सूखा ही रह जाता है। अगस्त में सरकार ने प्याज का न्यूनतम मूल्य (एमईपी) 425 डॉलर प्रति टन से 700 डॉलर कर दिया जिसके कारण निर्यात में बाधा आई थी और प्याज का अधिक उत्पादन तथा निर्यात में कमी के कारण प्याज के मूल्य में गिरावट आई थी। इस स्थिति का जायजा लेकर सरकार ने दिनांक 10.12.2015 को प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य 700 डॉलर प्रति टन से घटाकर 400 डॉलर प्रति टन कर दिया। एम.ई.पी. वह दर है, जिसके नीचे किसी भी व्यापारी को निर्यात की अनुमति नहीं है। एम.ई.पी. वृहदी से निर्यात में बाधा आती है और घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ने से प्याज की दर गिर जाती है और प्याज उत्पादक किसानों के लिए प्याज और आंसू के समीकरण बन जाते हैं। सरकार ने किसानों के आंसू पोछने के लिए एम.ई.पी. घटाकर प्याज उत्पादक किसानों को राहत दिलाई है। इसका हम तहेदिल से स्वागत करते हैं और किसानों के प्रति एक अच्छा निर्णय लिया और उनको राहत दिलाई इसलिए मैं सरकार का आभार व्यव्त करता हॅं।
*श्री राम टहल चौधरी (रांची) ः देश के कई राज्य सुखाड़ स्थिति से प्रभावित हैं और इसी में झारखण्ड राज्य के करीब-करीब सभी जिले पूरे सुखाड़ से प्रभावित हैं। पचास से सत्तर प्रतिशत खरीफ फसल को सुखाड़ से नुकसान हुआ है, जिसकी रिपोर्ट राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार को भेजी गई है एवं इस सुखाड़ से निपटने के लिए साढ़े ग्यारह हज़ार करोड़ की मांग की गयी है। पहले की सरकार में पचास प्रतिशत फसल के नुकसान पर मुआवजा देने का प्रावधान था। अभी हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने देश में जहां भी तैतीस प्रतिशत तक नुकसान हुआ है, उसको भी सूखाग्रस्त घोषित करने का निर्देश दिए हैं, जो बहुत ही सराहनीय है। इसमें आम गरीब किसानों को काफी राहत मिलेगी। पूरे झारखण्ड में सिंचाई की जो दर है,वह पांच प्रतिशत है, जिससे लोग खरीफ की फसल भी नहीं कर पाते हैं। उसके लिए जरूरत है, जिस नाले में पानी बहता हो,वहां चेक डेम बनाकर, डीप बोरिंग कर सिंचाई की सुविधा प्रदान की जाए। पेयजल के लिए चापानल लगाना और हर जगह बिजली पहॅंचाना, जानवरों के लिए चारे का इंतजाम करना, जगह-जगह पर पुराने एवं नए अधूरे पड़े तालाब को पूरा करना ताकि उसमें पानी जमा हो सके, ग्रामीण सड़कों का निर्माण करना ताकि लोगों को रोज़गार मिल सके। गेतेलसूद डेम, चांडिल डेम से सैकड़ों गांव उजड़ गए हैं। डेम के किनारे बसे सभी गांवों में लिफ्ट इरिगेशन लगवाकर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना ताकि गरीब किसानों को इससे लाभ मिल सके और झारखण्ड राज्य सरकार द्वारा मांग की गयी राशि उपलब्ध करायी जायी ताकि सुखाड़ से निपटने के लिए सरकार उपर्युव्त कार्य कर सके।
*श्री सुशील कुमार सिंह (औरंगाबाद) ः मैं बिहार के जिस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व लोक सभा में करता हूं, वह इलाका, औरंगाबाद तथा गया जिले में समय पर पर्याप्त वर्षा के अभाव में सूखे से प्रभावित तो है ही जैसे देश के बड़े हिस्से और बिहार के कई जिले सूखे से प्रभावित हैं। मेरे इलाके बिहार के औरंगाबाद और गया जिले में लगातार कई वर्षों से आंशिक या पूर्ण रूप से सूखा पड़ रहा है, लेकिन इस वर्ष खरीफ की फसल के सूखे ने किसानों की कमर ही तोड़ दी है। कारण, प्रारम्भ में धान के बिचड़ा डालने के समय और रोपनी के समय अच्छी बारिश हुई। जिससे सभी किसानों ने अपनी-अपनी पूरी जमीन में धान का पौधा लगा दिया। इसलिए कि उस समय तक मौसम अनुकूल था। बिचड़ा से रोपनी और उसके बाद सोहनी (गुड़ाई-सफाई) डी.ए.पी., यूरिया उर्वरक का छिड़काव, मजदूरी, जुताई, कुड़ाई, डीजल आदि लगभग सारा खर्च करने के बाद बीच फसल के समय में वर्षा के एकदम न होने से सारा खर्च खेतों पर कर देने के बाद किसानों की फसल मारी गई। इससे किसानें को केवल एक ही नुकसान नहीं हुआ, बल्कि उनके कई नुकसान हुए, जैसे- पिछले वर्ष भी अकाल की मार झेलना, इस वर्ष 2015 में खरीफ फसल पर होने वाले सारे खर्च हो गए, इसलिए कि शुरू में मौसम अनुकूल था। कर्ज लेकर बैंकों से या कहीं ओर से लेकर किया गया खर्च भी सारा व्यर्थ हुआ। अगस्त, सितंबर, अक्टूबर के महीने में वर्षा नहीं होने से खेतों में नमी नहीं रही, जिससे खरीफ की फसल तो मारी ही गई, रबी की बुआई भी खेतों में नमी के अभाव में नहीं हो सकी। यानि खरीफ और रबी दोनों फसलों का नुकसान हुआ और खरीफ की फसल लगाने में भारी खर्च भी बरबाद गया।
इससे जहां मनुष्य को पीने के पानी (पेयजल) का अभाव अभी से ही शुरू हो गया, वहीं पशुओं के चारे का भी घोर अभाव हो गया। राज्य सरकार द्वारा घोषित सिंचाई के लिए डीजल पर अनुदान वास्तविक किसानों को नहीं मिला, उसमें भी भारी घपला हो गया। जिन इलाकों में नहरों के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था है, वहां भी नहरों के अंतिम छोरों पर पड़ने वाले गांवों तक नहरों का पानी नहीं पहुंचा और धान की फसलें मारी गई। इस तरह से किसान बिल्कुल टूट चुके हैं और एक घोर अनिश्चितता के वातावरण में जीने को मजबूर हैं। जहां-तहां, जैसे-तैसे डीजल पम्प बगैरह चलाकर अपनी मेहनत से किसानों ने अपनी फसल बचायी भी है, वैसे किसानों के साथ समस्या यह है कि उनका धान सरकारी दर यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा नहीं जाता। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बिहार में धान खरीद में लगभग 40,000 करोड़ रूपए से भी ज्यादा के घोटाले की पुष्टि की है। इस तरह से किसान प्रकृति के साथ-साथ मानव द्वारा जनित समस्याओं से पीड़ित हैं।
लगभग प्रत्येक वर्ष सूखे की समस्या के स्थाई निदान के लिए मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि बिहार, झारखण्ड के चार जिलों पलामू, औरंगाबाद, गया, अरवल के किसानों के सवा लाख हैक्टेयर भूमि को सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने हेतु 40 वर्षों से हज़ारों करोड़ रूपए खर्च करके भी अधूरे पड़े उत्तर कोयल सिंचाई परियोजना के मंडल डेम में लोहे का गेट लगाया जाए, जिससे जल का भंडारण हो सके जो सिंचाई और पेयजल के काम आए। सोन नहर प्रणालियों में जल के अभाव को दूर करने के लिए इन्द्रपुरी जलाशय योजना को शीघ्र पूर्ण कराया जाए। प्रधानमंत्री ग्रामीण सिंचाई योजना में अधिकाधिक धनराशि आवंटित कर जनप्रतिनिधियों से उनके इलाकों से संबंधित सिंचाई की समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव लेकर उस पर कार्य कराया जाये। फसल बीमा योजना के प्रावधानों को सरल और आसान बनाया जाये।
उन किसानों को भी फसल बीमा योजना के तहत फसलों के नुकसान होने पर मुआवजा दिया जाए, जिन्होंने किसी बैंक अथवा वित्तीय संस्था से बिना ऋण लिए खेती की हो। चूंकि प्राकृतिक रूप से बिहार प्रदेश की बनावट ऐसी है कि एक ओर जहां गंगा नदी के उत्तर का भाग अर्थात् उत्तर बिहार बाढ़ की समस्या से प्रभावित रहता है, जहां पानी की आवश्यकता से अधिक है। वहीं गंगा के दक्षिण का हिस्सा दक्षिण बिहार जल के अभाव में लगभग प्रति वर्ष सूखे की मार और पेयजल की समस्या से जूझने को विवश है।
इसलिए मैं केंद्र सरकार से आग्रह करना चाहूंगा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री परम आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की देशहित में नदियों को नदियों से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना को व्यापक रूप से कार्यान्वित कराया जाए ताकि एक ओर उत्तर बिहार बाढ़ समस्या से निजात पा सके वही दक्षिण बिहार प्रतिवर्ष के सूखे की मार से बच सके। पेयजल की कमी पूरी हो और पशुओं को चारा उपलब्ध हो सके।
*SHRI OM BIRLA (KOTA) : It is a challenging time for India facing consecutive years of drought while on the path of higher growth and economic reforms.
In my speech, I will cover the drought situation in India, lessons from Rajasthan given that it is one of the worst affected states in India and suggest measures to overcome the issue.
One of the problems that needs better understanding is the swiftness in declaring drought hit areas in time. As on November 2015, as per a reply from the honourable Agriculture Minister, only 180 districts have been declared drought his spanning across just seven states. However, 302 out of 640 districts faced below normal rainfall of at least 20%. Many of the states are yet to declare the areas under drought. This underlines the need for swift actions in evaluation and announcement of districts under drought. Not to forget the need to understand the severity of the issue with varying amounts of rainfall shortage in different areas.
At the same time, I would urge the Ministry to set up a research under Ministry to work out the history of the droughts, floods and other calamities, understand the impact it has and what steps were taken in the past. A better understanding of how we dealt with these issues in the past is vital in our approach in the future too. The recent floods in Tamil Nadu has created havoc and crippled the state. However, history indicated that there has been a pattern to the rainfall Chennai received. Some of the states like Odisha have learnt from their frequent encounters with disastrous effect of cyclones and in recent years, their disaster management techniques have received praise worldwide. Hence, I reiterate that a thorough analysis of the pattern in the calamities we faced will go a long way in saving precious lives and the livelihood of people. The fact that drought continues to make severe dent in our economy and the life of a common man means that we are still a long way away from being prepared.
Here, I would draw the attention of the Minister towards the issue of drought in Rajasthan. As you are all aware, several districts in Rajasthan are already declared drought prone. In fact, the state government has already declared the recurrence as mentioned below.
Sr. No. Recurrence Period (Year) Districts 1 Once in 3 years Barmer, Jaisalmer, Jalore, Jodhpur and Sirohi 2 Once in 4 years Ajmer, Bikaner, Bundi, Dungarpur, Sriganganagar, Nagaur, Hanumangarh and Churu 3 Once in 5 years Alwar, Banswara, Bhilwara, Jaipur Jhunjhunu, Pali, Sawai Madhopur, Sikar, Dausa and Karauli 4 Once in 6 years Chittorgarh, Jhalawar, Kota, Udaipur, Tonk, Rajsamand and Baran 5 Once in 8 years Bharatpur and Dholpur I would urge the Minister that Rajasthan faces a problem of high fluoride levels in water. While certain steps have been taken to resolve, a determined approach by implementing a scheme for treatment of water with high fluoride levels will go a long way in availability of water in the dry areas.
Overall, the actions of the government on two aspects will determine how well-prepared India is to face droughts ahead. A) Improvement in irrigation facilities in India. B)Revamping the financial support for the farmers especially the crop insurance.
While nature can't be controlled, we can always be prepared for tough times with better technology at our disposal. Assessment of ground water level monitoring data for the plains by Central Ground Water Board (CGWB), for pre-monsoon 2015, compared with last five years mean of pre-monsoon (2010-14), indicates that out of total 14346 wells analyzed, around 46% of the wells are showing decline in ground water levels in various parts of the country. I would also like to highlight that the Ministry has not maintained a list of waterfalls that have dried up. I urge the Water Resources Ministry to ensure that the data for the same should be collected at the earliest.
In the states of Andhra Pradesh, Assam, Chandigarh, Dadra and Nagar Haveli, Delhi, Gujarat, Haryana, Meghalaya, Puducherry, Punjab, Telangana, and Uttrakhand, more than 50% of the monitored wells have registered decline in ground water levels. As per the Water Resources Ministry, out of 6607 assessment units (Firkas/Blocks/Mandals/Talukas/Districts) in the country, 1071 units in 16 states and 2 UTs have been categorized as 'Over-exploited'. Better irrigation facilities especially drip and micro-irrigation facilities needs to be developed. I hope the government will also focus and increase the projects of inter-linking of rivers in India, one of the long term solutions to the issue.
Now, I wish to highlight the need for a better crop insurance scheme. Crop insurance plays a critical role in how the drought is dealt with and how it will be dealt with in the future as well. Today, we have National Crop Insurance Programme (NCIP) at the national level, with other schemes falling under it. They are Modified National Agricultural Insurance Scheme (MNAIS), Weather Based Crop Insurance Scheme (WBCIS) and Coconut Palm Insurance Scheme(CPIS). However, the number of farmers aware about crop insurance scheme is very low.
Moreover, the total number of farmers who benefitted from programs under National Agricultural Insurance Scheme between 2000 and 2011-12 is 26.45%. This includes beneficiaries during both Kharif and Rabi season.
In India, crop insurance claim is not disbursed to farmers if they default on repayment on loans they have purchased for agriculture. Hence, non-payment of dues and damage of crops can lead to huge losses for farmers with no insurance amount.
Payment of timely compensation has also been an issue. In fact, claims due to prevented sowing and post-harvest losses were never paid under MNAIS. There is a high discrepancy in the crop area insured to the net area sown. The increase in premium rates of insurance under NCIP, MNAIS and WBCIS has discouraged the farmers in buying insurance scheme. The report of the Committee reviewing implementation of crop insurance scheme has recommended to have a relook at premium rates. It states that insurance cover of farmers would increase with lower premium rates. This would encourage in implementation of better farming practices.
While there are plenty of issues to deal with, I appreciate the steps taken by the government led by hon. Prime Minister Narendra Modi in implementing reform measures which includes revamping the crop insurance scheme. Some of the schemes reflect the long term vision in finding a solution to the issues surrounding agriculture. The Soil Health Card Scheme will be crucial in ensuring the farmers have adequate knowledge about maintaining fertility of the soil. Similarly, the Pradhan Mantri Krishi Sinchai Yojana will go a long way in ensuring better irrigation facilities considering the increasing demand of water for agriculture. The launch of DD Kisan Channel will also ensure better awareness among farmers.
I hope the Ministry of Water Resources, rural development and agriculture with adequate support from Finance Ministry will co-ordinate effectively in implementing robust measures to deal with droughts in future.
*SHRI D. K. SURESH (BANGALORE RURAL) : I would like to draw the attention of the Union Government towards the serious drought situation in the country. It is a matter of great concern that the entire country including Karnataka is facing one of the worst drought in the recent years. Almost all the parts of Karnataka has been affected by the serious drought problems and a number of farmers were forced to end their life due to debt owed to various nationalized banks and private financial institutions. The serious drought affected the cultivation of almost all the agricultural products including rice, wheat, sugarcane, sericulture and even commercial crops also. The farmers have no source of income to meet their minimum livelihood and to take care of their family. The financial institutions gave loan to them and they have already started the legal process to reimburse their loans. The Union Government has to intervene in the matter immediately and extend all possible assistance to the farmers in the drought affected districts of the country.
My state Karnataka has declared 27 of 30 districts as drought affected areas, which are facing serious drought since the last five years consecutively. The depletion of ground water in the above 27 districts are going down year by year. This causes serious longstanding problems to agrarian sector. Most of the areas are still depending on the rain water for irrigation process. The living conditions of the farmers of that areas are in a very bad condition and the farmers are forcing to migrate to the urban areas to find a source of income for their bread. This will cause a lot of social and economical problems and government has to face a lot of ire from various sections of the society.
The sericulture sector in Karnataka on in the verge of conversion to some other commercial crops. Cultivation of mulberry leaf and silk worm rearing in dates back to the 18th century. From the beginning, the Government of Karnataka played important role of a catalyst to keep the sericulture industry going. It established a separate department in 1913 to look after some of the needs and also the problem of sericulturists. Encouraged by the achievement of the sericulture industry, the state government undertook an ambitious plan for the expansion of sericulture covering a period of five years (1980-85) through a World Bank Loan, known as the Karnataka Sericulture Programme (KSP). This programme envisaged introducing sericulture in certain new areas of Karnataka, so that it can serve as an important source of employment and income generation in rural areas. The Government of Karnataka launched this programme in 13 districts. For the traditional mulberry growing areas, this programme envisaged a further improvement in the existing infrastructural facilities alongwith extending the area under the improved mulberry and also encouraging rearing of improved and bivoltine silkworm. In the non-traditional areas, the plan was to introduce sericulture activities on a large scale to bring about economic transformation in these areas. In addition to provide the necessary infrastructure, the plan envisaged an effective extension of facilities so as to propularise the sericulture activities.
In the field of sericulture, India stands second in the world, in terms of area and production. Karnataka is number one while considering the area of cultivation and production. The sericulture farmers of the district of Ramnagara, belongs to my constituency and are facing very serious problems due to cutting of import duty to 10% of the products from abroad. Government of Karnataka is trying its very best to protect the mulberry farmers of the State. The government is trying on a modest scale, to present an overall view of the changes which have taken place at the household level in both traditional and non-traditional regions of the state in terms of sericulture activities. There is a change in the structure of costs and labour needs for the cultivation of mulberry leaf and silkworm rearing on the one hand and on the other, the changes has taken place in the income earning capacities of the sericulturists. State government is trying to encourage sericulture and making inroads into the economic life, particularly in the new sericulture regions of the state.
Till 15 years back, the farmers were getting Rs.300 per kg. of silk cocoon. Unfortunately, due to import policies of central government presently the farmers are getting only Rs.100 per kg. Naturally, the farmers are forced to agitate against the policies of the Central government. The price has been reduced due to the reduction in the import duty of the Chinese silk. The import duty has been reduced from 35% to 5%. So, this is the main cause for the farmers not getting even the cost of production for cocoons. To save the 6 to 7 million sericulture farmers, the central government has to impose minimum 35% import duty on Chinese silks.
Besides, 136 Talukas in Karnataka have been seriously affected by drought due to shortage of rainfall. The living conditions of the farmers of the above areas is very poor and social and economical atmosphere is affected very badly. The consecutive drought has lead to depletion of ground water level, drying up of shallow bore wells, reduction in the water quality and yield. The rainfall deficiency has resulted in poor inflows into the major reservoirs. As on 12th September, out of 860 TMC of all the 13 major reservoirs, only 470 TMC was stored.
Lower water levels in the almost all reservoirs of Karnataka has affected the hydro power generation also. It results in the reduction of the areas to be cultivated. As per the reports more than 33% of agriculture crops are affected due to shortage of rainfall.
Another major setback happened in the livestock sector of Karnataka. As per available reports, 512 million livestock has been affected by the problem. Our farmers are facing great difficulties in supplying fodder to livestock. Farmers has to spent huge amount to feed their livestock due to non availability of enough green fodder. The environment department bans the entry of livestock in the forests. This doubled the problem of green fodder in the country. This is the situation prevailing in the country.
Due to the natural calamities, farmers are facing multi sectoral problems to maintain a minimum standard life. They are the verge of suicide. The agriculture allied activities are totally closing down due to government policies and the natural calamities. The Central government has to intervene urgently in the matter to end the miseries of farmers. The government should allow the farmers to use the forest areas for feeding their livestocks.
The government of Karnataka has extended all possible assistance to its farmers. Karnataka distributed Rs.5 lakh to the families of the farmers who end their lives due to debt and other reasons and waived off the interest and the compound interest on loans taken by farmers. Government started zero percent interest loans to farmers in the state. Karnataka started Rs.2000 monthly pension to the families of the farmers who ended their life due to various reasons.
Karnataka requested central government to release Rs.3830 crores immediately to the state to assist the debt ridden farmers. Unfortunately, the central government is not liberal to the state. I urge the central government to take immediate steps to protect the farmers of Karnataka by releasing enough financial assistance and impose more import duty on sericulture products. Central government must give directions to the environment department to allow the livestocks in the reserved forest areas to survive the farming community of the country.
*SHRI R. DHRUVANARAYANA (CHAMARAJNAGAR) : Recently Telangana has declared a drought in parts of the State, becoming the ninth state this year to do so. While Chennai and the neighbouring districts are suffering a disastrous crisis from too much rainfall, for the entire country, the June-September southwest monsoon recorded a deficit of 14% compared to the normal, the second straight year of sub-par rains after 2014 saw a deficit of 12%. This year, 302 of the 640 districts in India experienced deficit rains, or at least a 20% shortfall compared to the normal.
As many as 8330 lakh people, that is, 73% of the country's population live in villages, according to the latest data from the Socio-Economic and Caste Census (SECC). Out of this, 6700 lakh live below the poverty line, that is, with Rs.33 per person per day. A third of the 8330 lakh people live off farming. While such a large population of the country depend on agriculture, the farm economy of the nation reported a growth of 0.2% last year. And with the present situation of drought, our nation would be lucky if it manages a positive growth in farm economy this year.
In my State, Karnataka, 27 out of the 30 districts have been declared drought affected. These areas are facing drought consecutively for the 5th year. In the worst drought in 40 years, northern districts have registered 70 per cent deficiency in rainfall. Groundwater, which is the major source of drinking water and irrigation has depleted, resulting in drying up of shallow borewells, reduction in the yield and also deteriorating water quality. Department of Agriculture had estimated that 28.88 lakh hectares of agriculture crops have suffered more than 33% loss amounting to Rs.15,636 crore. Both rabi and kharif crops have been wiped out. Out of 74 lakh hectares of primarily kharif crops, 8 lakh hectares saw no sowing due to absence of rains in the early part of monsoon. Of the rest 66 lakh hectares, the drought has wiped out 37 lakh hectares of crops, which primarily include oilseeds, foodgrains and pulses.
Assistance sought for input subsidy for kharif 2015 is Rs.188.60 crores. An amount of Rs.202.31 crores is sought as cattle care, Rs.900 is required for managing drinking water and Rs.102.82 crores is needed for emergency supply of drinking water through tankers in drought affected areas. The Centre has approved only Rs.1,540 crore, nearly two months after we submitted a memorandum seeking Rs.3,931 crore in Central assistance.
There is an immediate need to address the drought situation across the country, not only because farmers and agricultural labourers are affected, but also because this has also led to a shortage in food stock of the nation.
The government of Karnataka has been on its toes to ease the plight of the farmers and address the issue of drought and farmer suicides. Interest free loan is being provided to farmers upto Rs.3 lakh. An interest of 3% is charged on loans between Rs.3-10 lakh.
Under a scheme called Annabhagya, upto 20kgs of rice is given free of cost to all BPL households. As a relief to families of those farmers who committed suicide, compensation has been increased from Rs.2 lakh to Rs.5 lakh. In addition, the widow of the deceased is also entitled to pension every month, which has been increased from Rs.500 to Rs.2000. The government has announced that the compensation available in the case of suicide is also applicable to landless labourers. All interest and penal interest on crop loans have been waived by the State. Cooperative banks have also been asked to reschedule loans and defer recovery of installments. The government had also ordered a crackdown on moneylenders who were fleecing the farmers and more than 1,300 cases had been booked against them with 568 arrested. The state government is also working towards getting higher Minimum Support Price, a subject that falls within the Centre's purview, for paddy, jowar and ragi.
While the State governments is waiting for the Central government's aid to compensate for the damaged crops, distressed farmers have no option but to commit suicide in the absence of relief. While the Central assistance towards relief for crop damage sounds generous on paper, in reality it barely covers farmers' cost of production. According to central norms the maximum farmers can receive as compensation is a paltry Rs.2,700 per acre in rain-fed areas, meaning compensation pays only a fraction of the crop loss. For the Rs.15,636 crores of crop loss recorded in Karnataka, we have received only about a tenth of it to distribute as compensation among farmers so far.
The Centre has decided to provide additional 50 days of work in drought-hit areas under the MGNREGA scheme to provide relief to farmers. But this would be an effective measure of relief only if the already huge backlog in wage payments is cleared for those employed under the scheme. The scheme has suffered from huge loopholes in implementation. In Karnataka, the average days of employment provided per household is only 33.18 days so far this year. More than half of this financial year is already over. How will we generate the additional 50 days of work?
In addition to the short-term measures, like compensating for crop damage and waiving interest on crop loans, the Centre also needs to come up with an effective crop insurance scheme. The existing schemes cover banks' loans and not the farmers' risk of repeated crop loss. Also, reports suggest that only 20% of farmers are covered under the Centre's crop insurance scheme that provides a safety net for farm loan dues in case of crop damage.
I urge the Government to look into the matter immediately in all the nine States and provide adequate amount of aid. If we lose the faith of our farmers any more than we already have, it will be great disservice to the entire nation. Kindly provide 2500 crores of rupees to Karnataka state for relief work.
*श्री राकेश सिंह (जबलपुर) ः हमारा देश कृषि प्रधान देश माना जाता है। देश में 65 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि क्षेत्र से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है। हमारे देश का अर्थतंत्र कृषि पर निर्भर है। कृषि के उत्पादन का देश में व्यापार व्यवसाय पर सीधा असर होता है लेकिन गर्व है कि हमारा किसान कृषि को व्यापार व्यवसाय नहीं बल्कि अपना धर्म मानकर खेत में अपना पसीना बहाता है।
आज विज्ञान ने चाहे कितनी ऊंìचाईयों को छुआ हो किंतु हमारे यहां आज भी खेती प्रकृति पर ही निर्भर है। यदि मौसम ने साथ दिया तो खेती ठीक अन्यथा किसान को नुकसान होना ही है।
आज हमारे देश में व दुनिया में भौतिक संसाधनों के असीमित उपयोगें ने ऐसी स्थिति निर्मित कर दी है कि देश में एक ओर जहां वर्षा के मौसम में भारी बाढ़ आ रही है तो दूसरी ओर देश के अनेक हिस्सों में भीषण सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ता है।
इस समय तो अत्यधिक कठिन स्थिति देश के सामने है कई राज्यों में बारिश ने जहां जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है, बड़ी संख्या में लोगों को जान गंवानी पड़ी है तो वहीं कई राज्यों में सूखे ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आने वाले दिनों में पीने के पानी के संकट का सामना भी कुछ राज्यों को करना पड़ेगा।
देश के अनेक राज्य जिनमें महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश आदि राज्य इस संकट का सामना कर रहे हैं।
मेरे प्रदेश मध्यप्रदेश में तो पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्राकृतिक आपदाओं के कारण किसानों को भारी संकट उठाना पड़ रहा है। हमारा प्रदेश देश के उन राज्यों में से एक है जो कृषि क्षेत्र में लगातार विकास कर रहे हैं और तमाम विषम स्थितियों के बाद भी मध्यप्रदेश की सरकार ने लगातार कृषि क्षेत्र में विकास दर 20 प्रतिशत से ऊपर बनाए रखी है जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि मध्यप्रदेश सरकार किसान हितैषी निर्णयों के लिए जानी जाती है। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में जहां किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया वही मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र में सिंचित रकवों को 8 लाख हैक्टेयर से बढ़ाकर 36 लाख हैक्टेयर से भी अधिक क्षेत्र तक पहुंचा दिया है।
जिस प्रदेश में किसान के लिए बिजली, जहां व्रत, त्यौहारों में होने वाले उल्लास की तरह हुआ करती थी वहां आज खेती के लिए किसान को 10 घंटे से अधिक बिजली प्रतिदिन मिल रही है।
किंतु आज की परिस्थिति अत्यधिक विषम है। प्रदेश के 45 जिलों की 268 तहसीलों में सूखे ने किसान की कमर तोड़ दी है।
जो जानकारियां मिली हैं उनके अनुसार सूखे से प्रभावित किसान की संख्या हमारे प्रदेश में लगभग 59 लाख 22 हज़ार है और इन किसानों को जो प्रभावित रकवा है वह लगभग 56 लाख 68 हज़ार हैक्टेयर है।
इसके अतिरिव्त ऐसे किसान जिनकी 25 से 33 प्रतिशत फसल सूखे व कीट इल्ली से प्रभावित हुई है उनकी संख्या 12 लाख 31 हज़ार है और ऐसा प्रभावित रकवा 9 लाख 84 हज़ार हैक्टेयर है।
मेरे संसदीय क्षेत्र जबलपुर की सातों तहसील जिनमें जबलपुर, पाटन, सिहोरा, शहपुरा, पनानगर, कुंडम व मझौली शामिल हैं, सूखे से प्रभावित हैं। लगभग 80 हज़ार किसानों के सामने गंभीर संकट है तथा 30 हज़ार हैक्टेयर से अधिक क्षेत्र की फसल प्रभावित हुई है। इस तरह सिर्फ जबलपुर जिले में ही लगभग 37 करोड़ से अधिक राशि की फसलों का नुकसान हुआ है।
इस देश में पहली बार आज़ादी के बाद किसी सरकार ने यदि किसानों के हित में निर्णय लेकर प्राकृतिक आपदा में फसलों के नुकसान को 50 प्रतिशत से घटाकर 33 प्रतिशत तक करने का काम किया है तो वह माननीय नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. की सरकार है।
किंतु मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों के सुख दुख में उनके साथ खड़े होकर नुकसान के प्रतिशत को घटाकर 25 प्रतिशत तक कर उसकी भरपाई अपने संसाधनें से की है।
मैं बताना चाहता हॅं कि एस.डी.आर.एफ. के नियमों के अनुसार फसलों के लिए 33 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर प्रति हैक्टेयर 6800/- रूपए की राशि दिए जाने का प्रावधान है किंतु मध्यप्रदेश में लघु और सीमांत किसानों को 25 से 33 प्रतिशत फसलों की क्षति होने पर प्रति हैक्टेयर 5000/- रूपए राशि देने का नियम बनाया गया। वहीं 33 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर लघु और सीमांत किसानों को 8000/- रूपए प्रति हैक्टेयर दिया जाता है।
इतना ही नहीं ऐसे किसान जो लघु और सीमांत किसान की श्रेणी के नहीं है, उन्हें 25 से 33 प्रतिशत नुकसान होने पर 4500/- रूपए प्रति हैक्टेयर और 33 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर 6800/- रूपए प्रति हैक्टेयर मध्यप्रदेश की सरकार देती है।
मैं केंद्र सरकार से कहना चाहता हॅं कि पिछले तीन वर्षों में लगातार प्राकृतिक आपदाओं के कारण मध्यप्रदेश सरकार अपने सीमित संसाधनों और सूखा प्रभावित बड़े रकवे के कारण अधिक बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। इसलिए मध्यप्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार से मांग की है कि केंद्रीय अनुदान सहायता हेतु लगभग 4800/- करोड़ रूपए की राशि दी जाये।
सूखे से व्याप्त विषम परिस्थितियों से निपटने हेतु ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल परिवहन हेतु 250.50 करोड़ रूपए तथा शहरी क्षेत्रों में पेयजल परिवहन हेतु 46.80 करोड़ रूपए की मांग मध्यप्रदेश सरकार ने अपने मांग पत्र में की है।
सूखे के कारण होने वाले पलायन को रोकने हेतु भी मध्यप्रदेश सरकार ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मनरेगा के अंतर्गत कृषि मजदूरों को अतिरिव्त 50 कार्य दिवस दिए जाने के लिए 762 करोड़ रूपए की राशि की मांग केंद्र सरकार से की है।
किसान को कर्ज की मार से बचाने की भी आवश्यकता है इसलिए मध्यप्रदेश सरकार ने सहकारिता के क्षेत्र में 33 प्रतिशत से 50 प्रतिशत फसलों के नुकसान की स्थिति में अल्पकालीन ऋण में बदलने हेतु ब्याज में छूट की राशि 330 करोड़ रूपए की मांग की है और 50 प्रतिशत से ज्यादा नुकसान की स्थिति में अल्पकालीन ऋण को मध्यमकालीन ऋण में बदलने के लिए भी ब्याज में छूट हेतु 440 करोड़ रूपए की मांग की है।
इन सभी को जोड़कर कुल 4821.63 करोड़ रूपए की मांग मध्यप्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार से की है।
किसानों के लिए अत्यंत गंभीर इस संकट को देखते हुए मध्यप्रदेश की सरकार ने प्रदेश के सभी जिलों को आवश्यकतानुसार राहत राशि का आवंटन कर दिया है, यह राशि किसानों को वितरित करने का काम भी शुरू कर दिया है।
हम आभारी है माननीय प्रधानमंत्री जी और केंद्र सरकार के मध्यप्रदेश में व्याप्त इस संकट की जानकारी मिलते ही उन्होंने केंद्र सरकार के अंतरमंत्रालयीन केंद्रीय दल को विस्तृत आकलन हेतु मध्यप्रदेश में 8-10 नवम्बर तक दौरे के लिए भेज दिया था।
मैं केंद्र सरकार से यही आग्रह करना चाहता हॅं कि मध्यप्रदेश के इस संकट पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर मध्यप्रदेश की सरकार द्वारा मांगी गई राहत राशि को शीघ्र देने का निर्णय करे।
DR. HEENA VIJAYKUMAR GAVIT (NANDURBAR): Hon. Deputy-Speaker, thank you for giving me this opportunity. My colleagues have already expressed their views on drought in different parts of the country. I come from the State of Maharashtra which has also been hit by drought. Along with Vidarbha and Marathwada, North Maharashtra is also reeling under the drought like situation. To tackle this drought like situation the State Government has already taken steps like creation of cattle camps, supply of water through tankers, availability of fodder for cattle at the doorsteps of the farmers, waiver of education fees, renovation of village wells and initiation of well recharge projects. Under the severe grip of water scarcity in several parts of the State, Maharashtra Government has sought financial assistance to the tune of Rs. 4000 crore from the Central Government. Although the Government has announced a relief package for drought affected areas, these sorts of quick fix solutions are not enough to solve the ground level problems. No temporary solutions will help overcome the drought like situation in the future and so whatever plans we make should not be restricted only to four to five years but we must focus on the next 25 years. The problem of suicide amongst farmers should be tackled in a holistic way.
Sir, response to drought is generally reactive in terms of crisis management. I would like to suggest to the hon. Minister through you that whatever plans we make or whatever strategies we make should be more of a pro-active nature rather than being of a reactive nature to the drought like situation. Whatever policies the Central Government makes in regard to tackling drought is more or less on a general basis for the whole country. We must focus more on the geographical areas and the climatic conditions in those areas.
Sir, I would like to make some suggestions to the hon. Minister through you. There should be promotion of various macro and micro level adaptation strategies amongst farmers with the help of Government officials to cope with the drought. We should also focus on developing, introducing and implementing water harvesting practices at the community level and in situ water harvesting practices to save wastage of water. Traditional flood irrigation practices should be replaced by water saving irrigation practices like drip irrigation or sprinkler irrigation. Introduction of less water consuming crops and drought resistant varieties of crops should be explored as a way of increasing resilience against drought and reducing the crop failures in the dry spells. Crop insurance should be strengthened. In the National Agricultural Insurance Scheme for field crops and weather based insurance scheme for fruit crops, the revenue circle is notified and considered for giving insurance. Instead of this, the village level should be considered and crop insurance compensation should be given to the farmers. I would like to say that when a revenue circle is concerned, there are a few farmers who are badly affected and there are many farmers whose farms may not be that much damaged, but because of considering a revenue circle what happens is that an average is taken and an overall average of damage for that area is less and so the farmers who are badly affected do not get the compensation to the extent that they should get. So, my suggestion to the hon. Minister is that instead of having a revenue circle, he should consider notifying an insurance scheme where particular focus is at a village level and try to give benefit to as many farmers as possible.
Sir, I come from the State of Maharashtra and what we have observed in our State is that after granting crop insurance to a farmer by the National Crop Insurance by Mumbai, the claim amount is not deposited to the account of the farmer in time and so I would also like to make a suggestion that the banks should be given a stipulated time and by that they should deposit the amount that is granted to the farmer. Also, it has been observed that the premium amount of crop insurance is not paid by the banks to the AIC, Mumbai in time. In such cases, the banks should be held responsible for the same.
In the case of weather based Fruit Crop Insurance Scheme, automatic weather units are installed far away from the villages. Thus, they cannot be computed properly. So, individual farmer’s computation should be made easy.
In my parliamentary constituency, Nandurbar, fruits like pomegranate, guava and papaya are cultivated on a large scale but in the Fruit Insurance Scheme, only banana and mango crops are included. I would like to request that, along with banana and mango, fruits like pomegranate, guava, papaya and watermelon should also be included in the Fruit Crop Insurance Scheme.
The worst hit during drought are the poor and marginal farmers. So, it is important that we must focus our attention on them to see how their farming can be improved. We must provide them with advanced mechanisation and this should be given at subsidized rates so that the conditions of the farmers are improved.
Seed Bank, Disease Resistant Gene Bank, Village Water Bank, Nutrient Bank, etc. should be established at the village level and subsidy should be given by the Government to the farmers for the same.
Krishi Vigyan Kendras should be strengthened. As regards Custom Hiring Centres, equipment are purchased by a group of farmers and the needy farmers can hire these equipments. These equipment can be given to the people as and when they are required.
Integrated farming system should be introduced and farmers should be given loans at low interest rates to start additional business like poultry, fishery, cattle farms, etc. I hope the hon. Minister will consider my suggestions so that they can benefit the farmers who are suffering due to the drought situation.
*श्रीमती जयश्रीबेन पटेल (मेहसाणा) ः मैं अपने कुछ विचार देश में पड़ रहे सूखे पर प्रकट करना चाहती हूं। कृषि देश की रीढ़ की हड्डी है। कृषि पर हमारे देश का अर्थतंत्र निर्भर है। देश के 55 प्रतिशत लोग किसान मजदूर क तौर पर जीवन-यापन करते हैं। भारत देश में 39 प्रतिशत जमीन और 66 करोड़ लोग भयंकर सूखे की चपेट में है। 18 राज्यों के 302 जिले सूखाग्रस्त हैं। आज़ादी के 68 वर्षों के बाद भी 50 प्रतिशत खेती भगवान भरोसे हो रही है। सभी राज्यों में किसी न किसी तौर पर केंद्र से सहायता की गुहार लगाई है। महाराष्ट्र के 16,128 गांव और मध्यप्रदेश के 19,000 गांव सूखे की चपेट में हैं। बारिश अंदाजन पिछले 100 सालों में तकरीबन 89 प्रतिशत रही है। इसी वर्ष 86 प्रतिशत बारिश पड़ी है। स्थिति बहुत गंभीर है, तकरीबन हर दूसरे साल में बारिश का अभाव है।
देश के जलाशयों में पिछले 10 सालों में सबसे कम पानी इकट्ठा हुआ है। ऐसी परिस्थिति के बीच सरकार की इच्छा 4 प्रतिशत कृषि विकास दर रखने की है, लेकिन यह संभव नहीं दिखाई देता क्योंकि उपज नहीं बढ़ेगी तो महंगाई बढ़ेगी।
आधे देश में सूखा है तब किसानों को सूखे की स्थिति से उबारना अत्यंज जरूरी है। किसान भगवान भरोसे खुले आकाश के तले किसी की परवाह किए बिना लाखों रूपयों का जुआ लगाते हैं।
1980 तक अमेरिका से आयात किए गए लाल चट्टा गेहूं खाने वाला इंडिया आज गेहूं का निर्यात कर रहा है। देश में अभी भी 22 करोड़ लोग रात को भूखे पेट सो जाते हैं। वह किसानों के प्रति उपेक्षा प्रतिपादित करता है। फसल बीमा से भी 19 प्रतिशत किसान ही लाभांवित होते हैं।
सूखे का असर देश के पूरे अर्थतंत्र पर दूरगामी असर डालेगा। खरीफ और रबी दोनों मौसम फेल हुए हैं। गेहूं की बुआई 28 प्रतिशत और तिलहन की बुआई 18 प्रतिशत और दलहन की बुआई 8 प्रतिशत कम हुई है। इसके कारण उन सभी फसलों का भाव आसमान को छुएगा। देश को दोनों और (स्टॉक एंड डिमांड) से मार पड़ेगी। सूखे के कारण ग्रामीण इलाकों में किसानों की आवक घटेगी जिसके कारण बाज़ार पर उसका भारी असर पड़ेगा। हाल ही के आंकड़े बताते हैं कि कृषि लक्षी औजार तथा द्विपहिया वाहनों को बेचने में भी घाटा हुआ है। उदाहरण के तौर पर ट्रैक्टरों की सेल 20 प्रतिशत घटी है।
कृषि क्षेत्र आर्थिक दबाव से गुजर रहा है जिसके कारण श्रमिकों के वेतन में भी घाटा हो रहा है। राज्यों द्वारा केंद्र के पास जितनी सहायता की मांग की जाती है उतनी केंद्र द्वारा उन्हें मिलनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों की आय में जो ज्यादा घाटा होगा तो देश के अर्थतंत्र पर बुरा असर पड़ेगा। बाजार की मांग में घाटा हो रहा है जिसके कारण अर्थतंत्र की हालत पतली हो गई है।
मेरी मांग है कि केंद्र सरकार द्वारा जंग के तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के हाथों में ज्यादा इन्कम आए इसका भरपूर प्रयास करना चाहिए तथा सूखाग्रस्त के तहत सहायता पैकेज का भुगतान किसानों को जल्द से जल्द किया जाए। जलवायु परविर्तन के कारण सूखा पड़ता है। इससे खेती को बचाने के तरीके ढूंढे जाए।
मौसम परिवर्तन तथा ओले-पाले की स्थिति में नुकसान के अंदाज का प्रतिशत 50 प्रतिशत से घटकर 35 प्रतिशत कर दिया है, वह सराहनीय है, लेकिन सूखे का सर्वे, मुआवजा, राहत पैकेज की प्रक्रिया में तेजी लाना अत्यंत जरूरी है।
कृषि सब्सिडी की प्रक्रिया में बदलाव किसान के हित में लाना जरूरी है। जिस तरह मनरेगा में 100 दिन का रोज़गार गारंटी दिया गया है, इसी तरह छोटे किसानों के हित में किसान इन्कम गारंटी स्कीम शुरू की जानी चाहिए। गुजरात मॉडल की तरह सभी किसानों को बिजली के बिल में सिंचाई के लिए सब्सिडी दी जानी चाहिए। किसानों को अपनी उपज की अच्छी लागत मिले, इसके लिए किसानों को खेतों में गोदाम बनाने के लिए सब्सिडाइज प्रक्रिया को प्रोत्साहन देना चाहिए। हमारी कृषि कुदरती बरसात पर आधारित है,उसकी परिपूर्ति के लिए डेमो से, तालाबों से, केनालों से कृषि का 50 प्रतिशत एरिया सिंचाई के लिए लाया जाए। बीज भुगतान की सब्सिडी और मुफ्त बिजली, पानी मुहैया करवाया जाए तथा कृषि ऋण और ब्याज माफ किया जाना चाहिए। डॉ. स्वामीनाथ आयोग की सिफारिशों को तुरंत लागू करना चाहिए। नदियों को जोड़ने की योजना साकार करनी चाहिए जैसे गुजरात में जोड़ी गई हैं।
कृषक आयोग बनाना चाहिए और इसमें ज्यादातर किसानों के प्रतिनिधियों को नियुव्त किया जाना चाहिए। वन ड्रॉप-मोर क्रोप की प्रधानमंत्री जी की नीति को आगे बढ़ाना चाहिए। सहकारी खेती और ऑर्गेनिक कृषि को ज्यादा बढ़ावा देने की नीति बनाई जानी चाहिए। श्वेत क्रांति-पशुपालन व्यवसाय को बढ़ावा देना चाहिए।
डेरी उद्योग को प्रोत्साहित करना चाहिए और हर तहसील पर घास, चारा बैंक स्थापित किया जाना चाहिए तथा सस्ते दामों पर घास मुहैया कराई जानी चाहिए। हर जिले में कैटल हॉस्टल बनाई जानी चाहिए तथा गोबर गैस प्लांट लगाने के लिए सस्ती बिजली पैदा कर किसानों को मुहैया कराई जानी चाहिए।
ए.पी.एम.सी. कानूनों में बदलाव लाकर उनको कृषकों के हित में उदारवादी बनाना चाहिए। हर तहसील पर ए.पी.एम.सी. की शाखाएं स्थापित की जानी चाहिए। गुजरात सरकार की नीति की तरह निजी ए.पी.एम.सी. को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
किसानों को सिंचाई की सुविधा के तहत डार्कजोन हटा देना चाहिए और तुरंत बिजली के कनैक्शन किसानों को दिए जाने चाहिए।
*DR. RATNA DE (NAG) (HOOGHLY) : Drought in India has almost become a regular and recurring feature year after year. There is no stopping of this hardship on the States. Centre's benevolence rarely meets the State's financial requirement or demand. This has become the hallmark of Centre-State relationship over the years. States are treated step-motherly, to say the least. In a federal structure, both Centre and States have a say but the sway of Centre is heard more and carried away with all the financial might with the result States are left to fend for themselves. West Bengal is one such States which faces drought or drought like situation every year.
It is tragic to know that as many as eight States have reported occurrence of drought this year, out of which seven have sought more than Rs.24,000 crore as financial assistance from the Centre under National Disaster Response Force (NDRF). This was the response of the Government in Rajya Sabha.
This year too, a drought like situation is prevailing in West Bengal. West Bengal Chief Minister Kumari Mamata Banerjee recently sanctioned Rs.50 crore for the people affected by a drought like situation in Purulia district.
With drought like situation prevailing in 8 States, our villages are expected to face a sharp spike in food prices in 2016. This is also due to a second straight year of drought in the country. Cost of sugar and milk too has gone up considerably, apart from other essential commodities.
Our Chief Minister, Kumari Mamata Banerjee had expressed concern over the drought situation in West Bengal. We allege that the NDA-led BJP government at the Centre has failed to make serious efforts in providing relief to farmers across the country, in general, and in West Bengal, in particular. Farmers committing suicide is continuing We could see prolonged heat wave in West Bengal for long resulting in fast receding level of water in West Bengal. The side effect of this problem is drinking water in West Bengal has become scarce. How can farmers draw enough water for farming? If this pathetic situation continues, we could find shortage of vegetables too.
It is to our West Bengal Government's and our Chief Minister's credit that we had put in place measures to tackle the situation at a time of rising deaths of distressed potato farmers. She had also convened a meeting of agriculture department officials. West Bengal at her own level is helping the farmers who are facing drought with drought-resistant paddy seeds and other inputs that will help cut costs.
It is to be noted that nearly 60 per cent of West Bengal's farm activity is rain-fed with the western districts of Bankura, Birbhum, Purulia and Paschim Medinipur being among the drought-prone districts which have received less rainfall this year too like the earlier year 2014-15 Kharif season. It is common knowledge that these districts lack irrigation facilities, and cultivation is mainly rain-fed. West Bengal Government is of firm conviction that this strategy would result in increased crop productivity.
Additionally the government of West Bengal is also emphasizing on the use of farm mechanisation and modernisation. The aim and objective of West Bengal Government is to encourage small and marginal farmers to use equipment such as harvesters and to make them available equipment to small farmers. Here, encouraging rainwater harvesting would go a long way and assumes paramount importance and renewed focus in view of the impending rainfall shortage.
Having said as to what West Bengal Government and our Chief Minister, Kumari Mamata Banerjee has been doing in the last 6 months to help the farmers to tide over the drought like situation, I would like to add that West Bengal is one of the 8 States which is facing its worst agricultural crisis in recent years with vast stretches of West Bengal being declared as drought-hit by our Government in West Bengal. The drought situation in West Bengal has reached an alarming proportion.
We demand that West Bengal be declared as "drought-hit" and the most affected areas of West Bengal region as "calamity-hit", followed by generous release of financial assistance to tide over the situation.
In the end, I would like to strongly urge the Central Government to extend generous financial assistance to States, particularly the West Bengal which is facing drought year after year.
श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला) : उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए धन्यवाद। मैं थोड़ा हटकर बोलना चाहता हूं क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र के बारे में हाउस में बहुत कम चर्चा होती है। जहां तक सूखे की बात है, यहां मंत्री जी बैठे हुए हैं और हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जी भी बैठे हुए हैं। मैं उनके ध्यान में भी यह बात लाना चाहता हूं कि पहाड़ी क्षेत्र में सूखे की दृष्टि से यहां किसी ने चर्चा नहीं की। मैं स्वयं हिमाचल प्रदेश का सांसद यहां बैठा हूं। हिमाचल प्रदेश और अन्य पहाड़ी क्षेत्र चाहे उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर या नार्थ ईस्ट के क्षेत्र हैं, उनमें भी इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं लगभग हर वर्ष आती हैं। वर्ष 2013 में उत्तराखंड में केदारनाथ वाली त्रासदी हुई। वैसे ही जम्मू कश्मीर में हुआ। हिमाचल प्रदेश में भी बादल फटने से कई बार किसानों का काफी नुकसान होता है। मैं कृषि मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि उस पर भी थोड़ा ध्यान देने की आवश्यकता है। जो लोग यहां अपनी पॉलिसीज़ फ्रेम करते हैं, उनमें पहाड़ी क्षेत्र के बारे में खास ध्यान रखेंगे तो बहुत अच्छी बात है क्योंकि 11 छोटे-छोटे राज्यों के बारे में यहां सोचा नहीं जाता। यह बात ठीक है कि जब से मोदी जी की सरकार आई है, तब से नार्थ ईस्ट के बारे में काफी काम हो रहा है। यूपीए सरकार ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी हमें पीछे धकेल दिया था। मैं आज मोदी जी और खासकर मंत्री जी का धन्यवाद करना चाहता हूं कि अब 90 प्रतिशत और 10 प्रतिशत का अनुपात रखा गया है। अब हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को दुबारा से स्पैशल स्टेट्स के रूप में दिया गया है। मैं उसके लिए विशेष तौर से आभार व्यक्त करना चाहता हूं। मैं समझता हूं कि सॉयल हैल्थ कार्ड जो क्रान्तिकारी योजना केन्द्र द्वारा लाई गई है, उसके माध्यम से हर किसान को लाभ होने वाला है। मैं कृषि मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि मोदी जी ने जो क्रान्तिकारी योजना दी है, उसमें ज्यादा काम करने की जरूरत है। जैसे अटल जी के समय प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना आई थी, वैसे ही अब प्रधान मंत्री ग्राम सिंचाई योजना आ रही है। अगर हम आने वाले बजट में उस पर ज्यादा प्रावधान करेंगे तो एक रैवोल्युशनरी स्टैप होगा। पहाड़ों में यह इसलिए जरूरी है कि पहाड़ का पानी प्लेन्स में बह जाता है। हमारे पास पानी रोकने का साधन नहीं है। इसलिए जो पानी नदी-नालों में बह रहा है, उसे लिफ्ट करने के लिए अगर हमारे पास केन्द्र से ज्यादा से ज्यादा पैसा आएगा तो पहाड़ के लोगों को वहां की खेती करने में ज्यादा लाभ होगा।
और भी बहुत सी चीजें हैं, लेकिन आपके पास समय कम है। इसलिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं कि पहाड़ी क्षेत्र के लोगों के बारे में बोलने का आपने समय दिया। धन्यवाद।
*श्री पी.पी. चौधरी (पाली) ः हमारा देश भारत कृषि प्रधान देश है। देश में 60 प्रतिशत से ज्यादा खेती मानसून पर निर्भर रहती है। यह सर्वविदित है कि मानसून 5 वर्षों में लगभग 2 बार ही ठीक रहता है, जिसका किसान पूरा-पूरा लाभ ले पाता है। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग ऐसे महत्वपूर्ण विषय है, जिन पर हमारी सरकार अन्य देशों की सरकारों के साथ मिलकर एक अंतर्राष्ट्रीय योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हमारे किसान इससे होने वाली परेशानियों से जागरूक नहीं है, लेकिन प्रतिवर्ष इससे होने वाले नुकसान को आंकॅड़ों में देखा जा सकता है।
जिस देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि और उसके संलग्न कार्यों में लगी हो और देश की जी.डी.पी. का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा देते हो तो इसी आंकड़ें से कृषि की माली हालत को समझा जा सकता है। कृषि क्षेत्र का विकास पिछले कई पंचवर्षीय योजनाओं में लगातार गिरता जा रहा है, जहां 8वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि विकास दर 4.8 थी, वहीं 12वीं पंचवर्षीय योजना में 3.5 ही रह गई। जहां एक और किसान खेती छोड़ शहरों की और पलायन कर रहे हैं और दूसरी ओर जो किसान खेती में लगे हुए भी है, उनकी आत्महत्याओं की खबरें समाचार-पत्रों में प्रकाशित हो रही है।
वर्षा का जल संचय करने में भी हमारा देश काफी पीछे है, हमारे देश में वर्षा के जल का 6 प्रतिशत ही काम में लिया जाता है बाकी 94 प्रतिशत पानी बहकर समुद्र में मिल जाता है। यदि इस 94 प्रतिशत पानी का बांधों के माध्यम से संचय किया जाता है तो इसके माध्यम से 25 मिलियन हैक्टेयर पर सिंचाई की जा सकेगी, 24000 मेगावाट विद्युत उत्पादन किया जा सकेगा तथा 10 मि.ली. हैक्टेयर क्षेत्र के ग्राउण्ड वाटर में बढ़ोत्तरी की जा सकेगी। इसके साथ-साथ देश खाद्यान्न, फल, सब्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि बड़ा निर्यातक देश भी हो सकता है और हम बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर सकते हैं। देश के किसान को खेती व युवाओं को बेहतर रोज़गार के अवसर उपलब्ध होने लगेंगे तो देश को फूड सिक्योरिटी व मनरेगा जैसी योजनाएं चलाने की आवश्यकता नहीं रहेगी, जिसके माध्यम से लाखों करोड़ों रूपए बचा कर इंफ्रांस्ट्रक्चर पर खर्च किया जा सकता है, ताकि देश में शिक्षा, चिकित्सा, सड़क आदि के क्षेत्र में भरपूर विकास किया जा सकेगा।
इस क्षेत्र में बरसाती पानी को एकत्रित करने का पिछले साठ वर्षों से कोई प्रयास नहीं किया गया है, जिसके फलस्वरूप इन्दिरा गांधी नहर एवं कुओं के पानी पर ही निर्भर रहना महंगा साबित हो रहा है। मेरा इस संबंध में सुझाव है कि राजस्थान राज्य की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक किसान के लिए एक लाख लीटर क्षमता वाला वॉटर टैंक बनाने की अनुमति किसान के स्वयं के खेत में दी जाये, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में पानी की उपलब्धता के लिए बेहतर आधारभूत ढांचा विकसित हो सके एवं किसान अपने स्वयं के खेत के साथ-साथ बागवानी के लिए भी अग्रसर हो सके एवं आय के अतिरिव्त स्रोत भी विकसित हो सके। प्रथमतः राजस्थान के सभी 11 मरूस्थली जिलों में सभी 5 लाख लघु एवं सीमांत कृषकों को इस कार्यक्रम में सम्मिलित किया जाये। इसके लिए तकनीकी दृष्टि से 15 फुट व्यास एवं 20 फुट गहरा टैंक बनाना आवश्यक है, जिसके चारों ओर प्रत्येक जिले की औसत वर्षा के आधार पर कम से कम 60 से 80 फुट व्यास का जलग्रहण क्षेत्र (आगौर) बनाया जाये। इस योजना के क्रियान्वयन में हमारा यह भी सुझाव है कि जलग्रहण क्षेत्रीय मुरड़ या अन्य सामग्री से कुटाई कर पक्का बनाया जाए जिससे एक ही अच्छी वर्षा से टैंक पूरा भर जाए। इस माप के टैंक एवं आगौर के निर्माण पर तकनीकी आंकलन के आधार पर लगभग 80,000 रूपए का खर्च आएगा। जिसमें लगभग 50 प्रतिशत श्रम पेटे एवं 50 प्रतिशत राशि सामग्री पेटे आवश्यक होगी। टैंक का निर्माण सभी की सहभागिता से कृषकों द्वारा स्वयं ही अपने-अपने खेत में किया जाएगा। जिससे उसके परिवार के सदस्य एवं गांव में उपलब्ध भूमिहीन श्रमिक एवं अन्य बेरोज़गार श्रमिकों को भारी संख्या में श्रम रोज़गार भी उपलब्ध हो सकेगा।
नदियों को जोड़ना सूखा व बाढ़ की समस्या का ही हल नहीं बल्कि इसके माध्यम से आर्थिक स्थिति में सुधार होने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार उपलब्ध करवाने के साधन भी उपलब्ध होंगे, कृषि हेतु सिंचाई के लिए भी उपयुव्त मात्रा में जल उपलब्ध करवाकर कृषि क्षेत्र का विकास किया जा सकेगा। कृषि में विकास होने पर जी.डी.पी. में कृषि का योगदान बढ़ेगा और देश तेजी से विकास मार्ग की और बढ़ेगा।
मानसून की अनिश्चितता एवं सूखे के कारण महंगाई और बढ़ने की संभावना है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के वैज्ञानिकों को निर्देशित करें कि सूखे एवं मानसून की अनिश्चितता से बचने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सुझाव दें। इनमें से कुछ सुझाव ऐसे हो सकते हैं, जैसे जैविक खाद का ज्यादा प्रयोग, ड्रिप एवं माइक्रो इरिगेशन का ज्यादा प्रयोग, ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा, चारा उत्पादन के क्षेत्र में नवीन तकनीक का प्रयोग करके हरा चारा अधिक से अधिक उगाने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिससे पशुधन को भी बचाया जा सके एवं वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए अनाज का भी उत्पादन संभव हो सके।
कृषि क्षेत्र को सिंचाई हेतु जल उपलब्धता के अलावा संरक्षण की भी आवश्यकता है। सरकार द्वारा औद्योगिक घरानों को पिछले तीन सालों में 2.5 लाख करोड़ रूपए की प्रोत्साहन राशि तथा 2.5 लाख करोड़ रूपए की विभिन्न छूटें प्रदान की गई है। कृषि क्षेत्र को भी इसी तर्ज पर प्रोत्साहन राशि व छूट देने की भी आवश्यकता है।
राजस्थान सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव के अनुसार गंभीर सूखे की स्थिति में सहायता कार्यक्रमों को 90 दिनों से अधिक तक जारी रखने के लिए एस.डी.आर.एफ. के वार्षिक आवंटन की 25 प्रतिशत व्यय की सीमा को समाप्त करने पर भी केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए। इस सम्बंध में राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। पहले 90 दिन से अधिक सूखे की स्थिति रहने पर एक कार्यकारी समिति इस संबंध में निर्णय ले सकती थी।
तेरहवें वित्त आयोग के निर्देशानुसार राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार को राज्य आपदा शमन निधि एवं जिला आपदा शमन निधि का गठन कर 75 प्रतिशत राशि अंशदान के रूप में केंद्र सरकार द्वारा देने का अनुरोध किया जा चुका है। इस पर मेरा केंद्र सरकार से जल्द से जल्द कार्यवाही करने का अनुरोध है।
इसके साथ ही मेरा सुझाव है कि किसानों को छोटी और महत्वपूर्ण राहत देने के लिए देश के प्रत्येक किसान को सोलर कृषि पम्प दिया जाए, ताकि वह आसानी से कृषि की लागत कम करते हुए खेती कर सके। मैं सरकार से अनुरोध करता हॅं कि देश के छोटे किसानों के बच्चों को उच्च माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा नःशुल्क दी जाए, ताकि किसान का बेटा-बेटी आत्मनिर्भर बन सके।
*श्री भानु प्रताप सिंह वर्मा (जालौन) ः बुंदेलखण्ड में पिछले छह वर्षों से लगातार सूखा पड़ रहा है और इसके साथ ओलावृष्टि और बेमौसम बरसात से यहां फसलें लगातार बरबाद हो रही हैं। यदि गैर सरकारी आंकड़ों की माने तो बुंदेलखण्ड में फसल बरबाद हो जाने के कारण वर्ष 2014 में 365 किसानों की मृत्यु हो चुकी है, अभी हाल ही में मेरे लोक सभा क्षेत्र के कुठौंद ब्लॉक में किसानों ने जो फसल बोयी थी, वह ओलावृष्टि के कारण बरबाद हो गई है। यह पिछली सरकार की नाकामी ही है कि आज स्थिति इतनी चिंताजनक हो गई है। मोदी सरकार ने अपने पहले दिन से किसानों की समस्याओं को लेकर जो सक्रियता दिखाई है वह निश्चित ही एक प्रशंसनीय कदम है। जब कांग्रेस सत्ता में थी बुंदेलखण्ड जाते जरूर थे मगर सिर्फ फोटो खिचाकर दिल्ली वापस आ जाते थे।
इस बार ओलावृष्टि के कारण किसानों पर प्रकृति की मार पड़ी तो मोदी सरकार ने इस मामले को गंभीरतापूर्वक लिया और स्वयं माननीय गृहमंत्री ने वहां जाकर किसानों का दर्द समझा और उनके आंसू पोछे। केंद्र सरकार ने तो अपना खजाना खोलकर किसानों के लिए आर्थिक सहायता भेजी मगर राज्य सरकार और उसके तंत्र ने गरीब किसानों की मदद के लिए भेजे पैसों से जमकर भ्रष्टाचार किया। मेरे संसदीय क्षेत्र की कोंच तहसील में मुख्यालय उरई के नायाब तहसीलदार को कोंच तहसील का प्रभारी तहसीलदार बनाकर भेजा और फिर उस प्रभारी तहसीलदार के कार्यकाल में लगभग चालीस लाख का गबन कर लिया गया जो उव्त प्रभारी तहसीलदार को प्रोन्नत करके वापस मुख्यालय उरई का प्रभारी तहसीलदार बनाकर भेज दिया। जिस अधिकारी के कार्यकाल में चालीस लाख का गबन हुआ हो, उसे जेल में भेजे जाने के बजाए प्रोन्नत कर दिया गया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार किसानों को लेकर कितनी चिंतित है और भ्रष्टाचार पर उसका रवैया क्या होगा?
जो चालीस लाख के गबन की बात मैं कर रहा हॅं, वह मात्र एक तहसील का आंकड़ा है, अगर एक तहसील में चालीस लाख का गबन किया जा रहा है तो सोचिये पूरे क्षेत्र में यह आंकड़ा क्या होगा? अतः मेरी सरकार से मांग है कि किसानों को भेजी गई राहत राशि की जांच सी.बी.आई. द्वारा कराकर किसानों को न्याय दिलाने का काम करें तथा शीघ्र ही किसानों की देनदारी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए।
*SHRI B. VINOD KUMAR (KARIMNAGAR) : The nation is reeling under the effects of severe drought. 18 states, which is more than half the total, and 302 out of the total number of 676 districts, have become drought affected due to a deficit in monsoon rainfall. The rabi crop is in grave danger and the already embattled Indian farmer is facing yet another crisis. This danger must also draw our attention to the harsh reality of climate change, a danger that becomes more ominous by the year, and the need for urgent and substantial action is reminded to us all once again.
My own state of Telangana has experienced the bitter reality of having to live without water for far too long, and in fact that was one of the key factors for us demanding a separate state where we would be in charge of our destiny. Already the government of Telangana is working in overdrive to overcome the irrigation deficit through its mammoth Mission Kakatiya and Water Grid programmes, but the neglect of the past decades cannot be overcome in a few months. 231 mandals have been declared as drought affected and this action has been taken on the District Collectors' recommendations based on drought guidelines.
The districts wise break down of affected mandals are as follows -
1. Mahabubnagar (64)
2. Medak (46)
3. Nizamabad (36)
4. Ranga Reddy (33)
5. Karimnagar (19)
6. Nalgonda (22)
7. Warangal (11) Telangana State as a whole received 634 mm rainfall against the normal of 814 mm this year, which is a 22 per cent deficit. The situation is similar to 2009-10, when the state faced a severe drought. Production of foodgrains is likely to be affected badly since cultivation of paddy, which comprises more than 50 per cent (10.59 lakh hectares) of total foodgrain (20.56 lakh hectares) cultivation of paddy, which comprises more than 50 per cent (10.59 lakh hectares) of total foodgrain (20.65 lakh hectares) cultivation in Kharif, is just about one-third (5.26 lakh hectare) of the normal extent till September first week and less than 50 per cent for the season.
The details of rainfall deficit is as follows (as of 7th September 2015) District Normal Actual Deviation Adilabad 862 840
-26% Nizamabad 737 383
-48% Karimnagar 689 467
-32% Medak 568 311
-45% Rangareddy 468 293
-37% Mahabubnagar 345 224
-35% Nalgonda 423 398
-06% Warangal 675 702 +04% Khammam 724 768 +06% The other key challenge the state is facing is declining ground water. This is also a problem in the rest of the country and most states are witnessing this phenomenon owing to indiscriminate construction of borewells. There needs to be stringent enforcement to curb this practice accompanied by adequate creation of public irrigation networks so that people are not forced to set up their own wells. In this regard, the Centre must provide assistance to the States and work on the Krishi Sinchai Yojana is welcome.
With regard to Telangana, the Groundwater Department estimated that the average groundwater level for the state in October was 11.80 meters against 9.30 meters in the same month last year. The fall in average water levels was observed in the range of 0.10 meters to 7.10 meters in all districts. The stress on groundwater has been not only due to the deficit but also the abnormal distribution of rainfall pattern which failed to recharge whatever quantity of water was available below the ground.
Thus the state is facing an overall water shortage crisis and central assistance is required to prevent the crisis from turning into a calamity.
I Demands that the Centre should allocate INR 2,514 crore to the state of Telangana to help it tide over this crisis. Relief amount should cover crop loss as well as input cost for next section. Sharecroppers and farmers taking land on lease/rent should also be protected. Crop losses less than the arbitrarily-decided minimum threshold should also be covered. Direct linkage of farmers with insurance companies is required so as to avoid the confusion which arises when the banks play the role of intermediary. Unit of insurance should shift from area-based approach to taking the individual farmer's survey number/land holding as a unit.
*श्री सुनील कुमार सिंह (चतरा) ः मैं देश के विभिन्न भागों में सूखे की स्थिति के बारे में अपनी बात रखना चाहता हॅं। देश में हर साल कहीं पर बाढ़ का खतरा है तो कहीं पर सूखे का। ये सब प्राकृतिक आपदाएंì हैं और इनका सीधा संबंध पर्यावरण से है। सूखा भी एक विनाशकारी पर्यावरण प्रकोप है। लंबे समय तक जल की कमी से सूखे की आपदा होती है। बारिश की कमी से फसल की हानि, सूखे का सबसे आम रूप है। दीर्घकालीन सूखे से भयानक अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारत में सूखे की समस्या कई कारणों से होती है जैसे मानसून का देरी से शुरू होना, मानसून में लंबी अवधि का अंतराल होना, मानसून समय से पूर्व समाप्त होना, वर्षा का असमान वितरण। इसके साथ ही मानवीय गतिविधियां भी सूखे को बढ़ावा देने का कारण बनती हैं। वन कटाई, ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन हाउस प्रभाव आदि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन के कारण भी सूखे के लिए उत्तरदायी होते हैं।
संसद में प्रतिवर्ष किसानों की समस्याओं पर चर्चा होती है। सूखे, बढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदाओं पर भी चर्चा होती है। किसानों की फसलों का उचित मूल्य प्रदान करने के लिए स्वामीनाथन आयोग बनाया गया था जिसने अपनी सिफारिशें सरकार को दी थी, लेकिन आज तक किसी सरकार ने आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की। आज चिंता का विषय है कि किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। पूर्व की सरकारों ने किसानों की दशा सुधारने की बहुत बड़ी-बड़ी बातें की है, लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं किया। जिससे आज देश के किसानों की आज़ादी के इतने साल बाद भी यह स्थिति बनी हुई है। आज कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना चाहता है। किसानों की समस्याएं प्राकृतिक एवं मानव निर्मित दोनों प्रकार की हैं। खाद, बीज, बिजली, पानी, भण्डारण, वितरण, समर्थन मूल्य पर खरीद आदि के साथ-साथ प्रकृति द्वारा बाढ़, सूखा, तूफान, ओलावृष्टि, शीतलहर से भी किसानों की फसलों का नुकसान होता रहता है। भारत में सूखा प्रभावित राज्यों में महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु आदि प्रमुख हैं।
झारखंड राज्य में बार-बार सूखा पड़ रहा है। इस वर्ष झारखण्ड के 24 जिलों में से 18 जिलों में बेहद कम बारिश हुई है। राज्य कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 64 ब्लॉक में 50 प्रतिशत फसल बर्बाद हुई है जबकि 62 ब्लॉक में 40 प्रतिशत नुकसान हुआ है। झारखण्ड सरकार द्वारा 01 सितम्बर 2015 को पूरे राज्य को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है तथा केंद्र सरकार से सहायता की मांग की गई है। राज्य सरकार द्वारा सुखाड़ राहत के लिए केंद्र से 1140 करोड़ 77 लाख रूपए का पैकेज की मांग की गई। माननीय कृषि मंत्री श्री राधामोहन सिंह जी ने हाल ही में झारखण्ड दौरे के दौरान केंद्रीय टीम भेजकर रिपोर्ट मंगवाने के बाद सहायता जारी करने का आवश्वासन दिया है। अतः मेरी कृषि मंत्री जी से मांग है कि केंद्रीय टीम से शीघ्र रिपोर्ट मंगवाकर झारखण्ड को सूखा राहत के लिए वित्तीय सहायता जारी करें। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार बड़े बांधों के राष्ट्रीय रजिस्टर में वर्तमान में देश में 4857 निर्मित बड़े बांध हैं और 314 निर्माणाधीन बड़े बांध हैं। लेकिन केंद्र एवं राज्य सरकारों में समन्वय के अभाव के कारण इन बांधों का सही रख-रखाव एवं समय पर मरम्मत नहीं होने के कारण कई बांधों का पूर्ण उपयेग नहीं हो रहा है। केंद्र सरकार का कहना है कि जल, राज्य का विषय होने के कारण, जल संसाधन परियोजनाओं की आयोजना, निष्पादन, प्रचालन एव रख-रखाव संबंधित राज्य सरकारों द्वारा उनकी आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं के अनुसार किया जाता है। मैं केंद्र सरकार से आग्रह करूंगा कि राष्ट्रीय स्तर पर देश में उपलब्ध सिंचाई सुविधाओं का आकलन किया जाये और इसकी कार्य प्रगति को सुचारू रूप से क्रियान्वयन हेतु दिशा-निर्देश जारी किए जाए। साथ ही, प्रधानमंत्री कृषि ग्राम सिंचाई योजना को शीघ्रातिशीघ्र अमली जामा पहनाया जाये।
झारखंड राज्य के लातेहर जिला के बरवाडीह प्रखंड स्थित उत्तर कोयल जलाशय परियोजना राज्य की एक महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजना है। इस परियोजना का लाभ बिहार और झारखंड राज्य के विस्तृत असिंचित क्षेत्र को मिलेगा। वर्षा जल के अभाव से ग्रसित झारखंड के पलामू, लातेहर, गढ़वा जिलों एवं बिहार के औरंगाबाद और गया जिलों को इससे लाभ मिलेगा। साथ ही, सौ साल से भी पुरानी सोन नहर सिंचाई प्रणाली को जल अभाव के संकट से जूझ रही है, को भी पुनर्जीवन प्राप्त होगा। इस परियोजना के पूरा होने पर झारखंड और बिहार दोनों राज्यों के 1,24,000 हैक्टेयर भूमि को सिंचाई हेतु जल उपलब्ध होगा। लातेहर, पलामू और गढ़वा जिलों में भू-जल स्तर के निरंतर ह्रास का भी प्रभावी निषेध होगा। जिससे पेयजल समस्या का भी समाधान संभव हो सकेगा। साथ ही 25 मेगावाट हाईडिल बिजली का उत्पादन होगा जो पर्यावरण की दृष्टि से सर्वाधिक उपयुव्त ऊर्जा का माध्यम है। उत्तर कोयल जलाशय परियोजना के पूर्ण होने से आपके द्वितीय हरित क्रांति के स्वपन को एक ठोस आकार मिल पायेगा। परंतु पिछले 40 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आज तक यह परियोजना पूर्ण नहीं हो पाई है। मेरी सरकार से मांग है कि उत्तर कोयल जलाशय, अमानत, औरंगा, कनहर, टहले, गरही, मुहाने, सोनरेखा, मलय, अजय सहित राज्य की सभी लंबित परियोजनाओं को पूरा करने की दिशा में शीघ्र सकारात्मक कदम उठाये जायें।
सुखाड़ से निपटने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक तात्कालिक एवं दीर्घकालिक योजना बनाकर स्थाई उपाय करने की आवश्यकता है। भूमि के जल स्तर को बढ़ाने तथा नदियों के जल का खेती के उपयोग के लिए लांग टर्म योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। नदियों को जोड़ने का काम गति के साथ करना होगा जिससे बाढ़ और सुखाड़ दोनों समस्याओं का समाधान हो सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के रूप में झारखंड जहां सबसे अमीर राज्य है वहीं कृषि की वृद्धि दर अत्यंत कम है। सुखाड़ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला समूह जनजातीय, अनुसूचित जाति के लोग और छोटी जोत वाले खेतीहर मजदूर हैं। झारखंड अत्याधिक कुपोषण वाले राज्यों में से एक है। इसलिए इस राज्य को तत्काल राहत की आवश्यकता है। राहत कार्य चलाते समय हमें पशुधन की सुरक्षा की भी व्यवस्था करनी होगी। सूखे से बचाव वाले उपायों जैसे कॅंआ, आहर, वाटरशेट प्रबंधन, लघु सिंचाई परियोजनाओं और लिफ्ट सिंचाई परियोजनाओं पर तत्काल ध्यान देना होगा। साथ ही फसल बीमा की राशि का वितरण तुरंत होना चाहिए। किसानों को अगले फसल चक्र हेतु अभी से सहायता देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। साथ ही कृषि ऋण की वसूली को माफ करने संबंधित कार्यवाही करनी चाहिए। चतरा, लातेहर, पलामू और गढ़वा लगातार सूखे से ग्रसित क्षेत्र रहे हैं, इनके लिए विशेष राहत और पैकेज की व्यवस्था करनी चाहिए।
*श्री केशव प्रसाद मौर्य (फूलपुर) ः देश की 75 प्रतिशत से अधिक आबादी किसान है अथवा कृषि पर निर्भर है। आज़ादी के 60 वर्ष बाद भी जो परिवार का आधार केवल खेती रहा है, उसके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है। जो गरीब था और कर्जदार हो गया और कर्ज अदा नहीं कर पाने के कारण आत्महत्या को मजबूर हुआ है। जब तक देश के किसानों को मजबूत नहीं बनाया जाता तब तक देश मजबूत नहीं होगा।
मैं माननीय प्रधानमंत्री जी को बधाई देता हॅं कि उन्होंने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना प्रारंभ की जिससे किसानों को सिंचाई की समस्या से मुव्ति मिलेगी। कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी हो या ज्योतिरादित्या सिंधिया हों भाषण देना अलग बात है, जमीन पर करके दिखाना अलग बात है। कांग्रेस और कांग्रेस के पुरखे ने किसानों के हितों के लिए कोई प्रयास नहीं किया और सदा उत्पीड़न करने का काम किया है।
""जाके पैर न फटी बेबाई, वह क्या जाने पीर पराई"" कांग्रेस किसानों का दर्द नहीं जान सकती क्योंकि इन्होंने कभी न गरीबी देखी है, न किसानी देखी है और न किसानों का दर्द देखा है। मैंने स्वयं अपने खेतों में काम किया निराई, गुड़ाई और मड़ाई की है, मैं यह भी जानता हॅं कि किसान चाहे जितना अच्छी सब्जी, फल, अनाज पैदा करे परंतु खाता वही है, जो बाज़ार में बिक नहीं सकता है। मैं उत्तर प्रदेश के किसानों की बर्बादी के लिए प्रदेश की श्री अखिलेश यादव सरकार को जिम्मेदार मानता हॅं। प्रदेश की सरकार ने किसानों को जब सिंचाई के लिए बिजली और नहरों में पानी की जरूरत थी तब बिजली, पानी नहीं दिया, जब फसल तैयार हुई, क्रय केंद्रों में खरीद नही की, इस कारण किसानों को औने-पौने दामों में अपनी फसल बेचनी पड़ी। केंद्र सरकार के द्वारा सूखा, बाढ़ एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिए सहायता के बाद भी वह काम किया कि ""का वर्षा जब कृषि सुखानी"" किसानों को मुआवजा समय से और सभी को नहीं मिला, वितरण में दल के हिसाब से भेदभाव किया गया, सपाई हो तो मुआवजा मिलेगा, भाजपाई हो तो मुआवजा नहीं मिलेगा।
मैं सरकार से मांग करता हॅं कि किसानों को मुआवजे की राशि बिना भेदभाव के तीस दिन के अंदर भुगतान की जाए और उपज का लाभकारी मूल्य दिया जाये, सरकारी खर्च पर फसलों का बीमा कराया जाये तथा किसी भी दुर्घटना में भूमिहर अथवा भूमिहीन किसान की मृत्यु होने पर 50 लाख रूपए का मुआवजा दिया जाये, नःशुल्क सिंचाई की व्यवस्था की जाये एवं जैविक कृषि और पशुपालन को बढ़ावा दिया जाये।
*प्रो. रविन्द्र विश्वनाथ गायकवाड़ (उस्मानाबाद) : मैं सूखाग्रस्त उस्मानाबाद (महाराष्ट्र) से आता हूं । मेरे क्षेत्र में 200 से अधिक ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है । मेरा अनुरोध है कि खरीफ-रबी गाँव हटाकर हर फसल पर सरकार मदद करे । बीमा योजना में किसान का और खेत में फसल का बीमा से जो बीमा प्रीमियम भरा उसे नुकसान की बीमा राशि कंपनी दे । (नेट टू नेट) बीमा निकाले (अपघटन बीमा न रहे) । आत्महत्या ग्रस्त किसानों को 5.00 लाख तक मुआवजा दे। केन्द्र कर्ज देनी नहीं उसे धान देकर कर्ज उपलबध कराया जाए ।
*श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत (जोधपुर) : मैं थार मरूस्थल के क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान का प्रतिनिधित्व करता हूँ दुर्भाग्य मेरे क्षेत्र का सहोदर है, सगा भाई है । पिछले 50 वर्षों में से 43 वर्ष पश्चिमी राजस्थान में आंशिक अथवा पूर्ण अकाल रहा है । देश की औसत वर्षा लगभग 900 एमएम होती है व जिन प्रदेशों में सूखे के विषय में चर्चा हो रही है उन सभी प्रदेशों का औसतम भी 600 एमएम से अधिक है । यदि सिंचित जमीनों के क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से देखा जाये तो देश का औसतम 45 औ हे । देश में किसी क्षेत्र में यदि 25 औ वर्षा औसत से कम हो तो उसे सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया जाता है तथा यदि 50 औ औसत से कम वर्षा हो तो उस ही अकालग्रस्त घोषित कर राहत कार्य तदनुसार प्रारंभ् किये जाते हैं । माननीय सभापति महोदया यदि उन क्षेत्रों में जहाँ का औसत 900-1000 या 600 एमएम है उनमें यदि 50 औ कम यानि 450-500 या 300 एमएम वर्षा होती है तो वहां अकाल राहत का कार्य होता हे तथा देश भर में चाहे सदन में हो अथवा सदन के बाहर सूखे की चर्चा प्रारंभ हो जाती है जबकि मेरे प्रदेश को तो औसत ही मात्र 300 एमएम है । 1000 एमएम औसत वाले क्षेत्र में यदि 500 एमएम वर्षा हो तो वहाँ क्रॉपिंग पैटर्न चेंज कर किसान को राहत प्रदान की जा सकती है, उसके पास विकल्प मौजूद रहते हैं जबकि मेरे क्षेत्र में तो यदि औसतम से आधी बरसात होती है, जो कि मेरे क्षेत्र में अनकॉमन फीनोमेना नहीं है तो किसान व ग्रामवासियों के लिये अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाता हे ।
आज किसान की बढ़ती दुदर्शा व कृषि कार्य से लगातार बढ़ते मोहभंग के कारण देश के समक्ष जहां एक ओर भविष्य में अन्न का संकट आने की संभावना बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर जहाँ देश के 60 औ से ज्यादा लोग चूंकि आज भी कृषि कार्य पर आपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं के जबरन मजदूर बनने का संकट खड़ा है ।
आज यह समयानुकल नहीं है कि जब देश का अन्नदाता संकट में है हम आपने क्या किया व क्या नहीं किया का दोषारोपण एक दूसरे पर किया जाए अपितु समय की मांग यह है कि हम सभी जिस विषय पर समवेत रूप से चिंतित हैं पर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर देश के सामने आसन्न इस संकट से निपटने व आने वाली पीढ़ी व समय रहते कृषि क्षेत्र को संबल प्रदान करने की दिशा में चिन्तन आरंभ करें ।
सूखा व वर्षा की कमी नितान्त -प्राकृतिक विषय है तथा ईश्वराधीन है, प्रकृति का ऋतुचक्र भी परिवर्तित होता जा रहा है, अन्य ऋतुओं की ही तरह वर्षा का समय भी बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है, पैतृक संपदा होने के कारण प्रति किसान का जोत क्षेत्रफल लगातार घट रहा है, जमीन के भीतर जल समाप्त प्राय है, मेरे प्रदेश में तो लगभग 70 औ क्षेत्र डार्क जोन घोषित है तथा बचे हुए क्षेत्र घोषित होने के कगार पर है, नदियों का जल प्रवाह सिकुड़ता सिमटता जा रहा है, ऐसे में गंभीर चुनौती सामने प्रतीत होती है।
व्यापक शोध व विभिन्न विभागों का इंटीग्रेशन करते हुए विषय विशेषज्ञों को व्यापक चिंतन करते हुए इस देश के अन्नदाता का भविष्य और सीधे इस देश के भविष्य से संबद्ध इस विषय के लिए काम करने का समय है, समय पर उचित बीज की उपलब्धता, जल संरक्षण, मृदा संरक्षण जलपुनर्भरण व रीवर इंटीग्रेशन पर शीघ्र व त्वरित गति से काम करने का समय अब आ गया है ।
मैं धन्यवाद करना चाहता हूँ युगदृष्टा प्रधानमंत्री जी व उनके नेतृत्व वाली सरकार का जिसने किसान के समक्ष आई आपदा के समय मुआवजे की दर व आधर में परिवर्तन कर देश भर के किसानों को न केवल संबल प्रदान किया बल्कि आत्महत्या के लिए मजबूर होने से भी बचाया है । साथ ही स्वायल हेल्थ कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना व टेक्नॉलोजी के लैब टू लैंड ट्रांसफर की दिशा में ठोस कार्य प्रारंभ करते हुए अन्नदाता के लिये आशा का सूर्य उगाने का कार्य प्रारंभ किया है । किन्तु अभी हमें मीलों लबा सफर तय करना है ।
*कुँवर पुष्पेन्द्र सिंह चन्देल (हमीरपुर): कृषि व किसानों को सूखे से अपार क्षति पहुंचती है। मेरे द्वारा कहे गये शब्दों को सदन गंभीरता से मनन व चिन्तन करके कृषि से किसान के अटूट व पवित्र प्रेमपूर्ण बंधन को खेत को पानी की सुविधा देकर सूखे से निपटने के सभी सफल उपाय करके किसान को कृषि से विमुख होने से बचाने का हर संभव प्रयास करें। किसानों का नारा जो पचास साल से आधे हिन्दुस्तान में विशेषकर मेरे बुन्देलखण्ड में आज सर्वाधिक प्रायः लगाया जाता है कि "चाहे जो मजबूरी हो, हमारी माँगे पूरी हो " , मेरा सरकार से निवेदन है कि कांग्रेस के शासन में अन्नदाता की रीढ़ तोड़ने का जो कुत्सित प्रयास किया गया उससे अन्नदाता को 5 से 10 वर्ष के अन्दर शत प्रतिशत सूखे से निपटने के लिए स्वयं किसान को समर्थ बनाना ही होगा ।
विश्वमें खाद्यान्नसंकट केइस संकटके दौरमें हमारेहिन्दुस्तानके किसानोंने सदैवअपनी सुविधाव क्षमतासे अधिककर्ज मेंनिरन्तरडूबकर एवंअपने परिवारके सदस्यको दुर्भाग्यसे आत्महत्याके कारणोंके ज्ञातहोने केउपरान्तभी साहसएवं हिम्मतसे, धैर्यसे कृषिकार्य सेसंलग्नहै ।
मेरेसंसदीयक्षेत्रहमीरपुर,महोबा एवंतिन्दवारीजो गौरवशाली,वीर बुन्देलखण्डकी ऐतिहासिकएवं पौराणिकमहत्व वालीभूमि देशकी सीमाओंकी सुरक्षाहेतु अनगिनतबलिदानदेने वालीभूमि काअंग है। आज निरन्तर 10 वर्षोंसे पड़रहे सूखेके कारणसे दुर्दिनदेखने कोमजबूर हैं,हमारे बुंदेलखण्डका अतिस्वाभिमानीकिसान जोतुलनात्मकरूप सेदेश केअन्य क्षेत्रोंके किसानोंसे अधिकक्षेत्रफलमें (प्रतिकिसान क्षेत्रफल)कृषि करताहै आजसिर्फ पानी,बिजली कीकमी केकारण सूखेकी मारझेल रहाहै। उपाध्यक्षमहोदय, हरसंभव प्रयासकरके समूचेबुंदेलखण्डको शतप्रतिशतसिंचितकरने कासफल उपायकरने सेदेश कोदोहरा लाभहोगा। एकतो किसानसम्पन्नसमर्थ होगाऔर अपनीकृषि कोसाधन सम्पन्नबनाकर स्वयंसक्षम होकरअधिक खाद्यान्नउत्पन्नकरेगा, हीसाथ हीसाथ प्रतिकिसान अधिकभूमि होनेके कारणदेश केअन्य क्षेत्रोंको खाद्यान्नदेने काकार्य करेगा। देशके अन्नकी मात्राको भरेगाऔर दूसराअपने परिवारके बच्चों और युवकोंको स्वस्थव शिक्षितबनाकर देशकी प्रगतिमें योगदानभी करेगा।
अपनीबात पूर्णकरने केपूर्व मैंपुनः निवेदनकरता हूँकि सर्वप्रथमबुन्देलखण्डके सूखाग्रस्तक्षेत्रको प्रधानमंत्रीकृषि सिंचाईयोजना केतहत संतृप्तकरें । उसके बादअन्य सूखाग्रस्तक्षेत्रएवं अन्तमें अन्यक्षेत्रोंमें योजनाको लागूकरें ।
बार-बारहर बारयही निवेदनकरते हुएअपनी बातपूर्ण करताहूं किबुन्देलखण्डकी कृषिएवं किसानको सर्वप्रथमसंरक्षितव सुरक्षितकरने काकाम करें।
*श्री शरद त्रिपाठी (संत कबीर नगर) ः सूखे की स्थिति से कारगर रूप से निपटने के लिए सरकार केंद्रीय शुष्क खेती अनुसंधान संस्थान, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद 600 जिलों में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के साथ समन्वय में कृषि आकस्मिकता योजना का प्रचार कर रहे हैं। आकस्मिकता योजना फसल/पशुधन/जल कृषि प्रणालियां/पद्धति, मृदा विशेषताएं, अवसंरचना सुविधाएंì आदि को ध्यान में रखते हुए जलवायु भिन्नता के समय वैकल्पिक रणनीतियां निर्धारित करते हुए जिला स्तर पर किसानों को विस्तृत परामर्श प्रदान कर रही हैं। विभिन्न मौसम स्थितियों जैसे सूखा, बाढ़, चक्रवात लू/शीत लहर, पाला, रोग आदि के लिए निश्चित उप्रेरक मॉडलों के आधार पर इन योजनाओं को विकसित किया जाता है। इसके अतिरिव्त हमारी सरकार ने ब्याज सहायता योजना के अंतर्गत प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों को राहत प्रदान करने के लिए पुनःसंरचित राशि पर प्रथम वर्ष के लिए बैंक को दो प्रतिशत दर पर ब्याज सहायता उपलब्ध कराये जाने को जारी रखने का निर्णय किया है, इससे किसानों का सूखे से निपटने में काफी मदद मिलेगी।
सूखे को लेकर हमारी सरकार कितनी गंभीर है, इसका इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि जैसे ही सूखे से संबंधित खबरें आई, सरकार ने पिछले खरीफ सीजन की शुरूआती अवधि में बारिश न होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए सूखा संबंधी राहत पाने के लिए प्रभावित राज्यों को तत्काल ज्ञापन पेश करने को कहा। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने तत्काल बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, झारखण्ड और आंध्र प्रदेश की राज्य सरकारों को संदेश भेज यह आग्रह किया कि वह अपने यहां प्रभावित जिलों की संख्या के बारे में तत्काल सूचित करें।
हमारी सरकार ने किसानों के कल्याण के लिए एवं सूखा राहत के लिए निम्न कार्य कियेः- चिरस्थायी बागवानी फसलों को बचाने के लिए उपायः जल की कमी वाली बागवानी फसलों को पुनर्जीवित करने के लिए समुचित उपाय करने के लिए 150 करोड़ रूपए का अतिरिव्त आवंटन किया गया है। देश के सभी सूखा प्रभावित जिले/ब्लॉकों में यह योजना लागू की जा रही है, जो समन्वित बागवानी विकास मिशन के अधीन शामिल किये गये हैं और कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। सूखा प्रभावित जिले/ब्लाँक के किसानों को प्रति लाभार्थी अधिकतम 2 हैक्टेयर क्षेत्र के लिए लागत के आधार पर 6,000 रूपये प्रति हैक्टेयर की दर से सहायता प्रदान की जाएगी। राजसहायता के माध्यम से इस प्रकार दी जाने वाली सहायता में भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रशासन 50-50 के आधार पर हिस्सेदारी करेंगे।
अतिरिव्त चारा विकास कार्यक्रम का कार्यान्वयनः पशुधन पर सूखे के प्रतिकूल प्रभाव में कमी लाने के उद्देश्य से चारा उत्पादन के लिए अतिरिव्त सहायता (50 करोड़ रूपए का आवंटन) दी जायेगी। सूखा प्रभावित जिले/ब्लॉकों के किसानों को अतिरिव्त चारा उत्पादन के लिए प्रति लाभार्थी अधिकतम 2 हैक्टेयर क्षेत्र के लिए लागत के आधार पर 3200 रूपए प्रति हैक्टेयर की दर से सहायता प्रदान की जाएगी। राजसहायता के माध्यम से इस प्रकार दी जाने वाली सहायता में भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन 50-50 के आधार पर हिस्सेदारी करेंगे।
आर.के.वी.वाई और केंद्र प्रायोजित अन्य योजनाओं के अधीन लोचशील आवंटनः राज्यों को सलाह दी गई है कि वे राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई.) के अधीन आवंटित लगभग 5 से 10 प्रतिशत धनराशि को अलग रखें, ताकि कृषि क्षेत्र पर मानसून के प्रतिकूल प्रभाव में कमी लाने के उद्देश्य से आवश्यक उपाय किये जा सके।
आकस्मिक फसल योजनाः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (सी.आर.आई.डी.ए.) हैदराबाद के माध्यम से कृषि मंत्रालय ने 600 जिलों के लिए विस्तृत आकस्मिक फसल योजनाएं तैयार की हैं। राज्यों को सी.आर.आई.डी.ए.- आई.सी.ए.आर. और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों से परामर्श करके प्रत्येक आकस्मिक फसल योजना तैयार करने/अद्यतन बनाने की सलाह दी गई है।
राज्यों के लिए चेतावनियां- राज्य सरकारों का सलाह दी गई है कि वे महात्मा गांधी नरेगा और अन्य ऐसी योजना के अधीन जल संभरण संरचनाओं के निर्माण जैसे अग्रिम निदान की दिशा में पहल करें।
खरीफ 2015 के लिए बीजों और अन्य संसाधनों की उपलब्धताः कृषि विभाग में साप्ताहिक फसल मौसम निगरानी समूह (सीड्ब्ल्यूजी) की बैठकों में बीजों और अन्य संसाधनों की उपलब्धता की निरंतर निगरानी/समीक्षा की जाती है।
एस.एम.एस. के जरिए चेतावनीः मंत्रालय की ओर से पंजीकृत किसानों को एम-किसान पोर्टल के जरिए एस.एम.एस. चेतावनी भेजी जाती है।
वर्ष 2015 में सूखे के लिए संकट प्रबंधन योजनाः कृषि मंत्रालय के कृषि और सहकारिता विभाग की वेबसाइट पर सूखे के लिए एक संकट प्रबंधन योजना (सीएमपी) उपलब्ध कराई गयी है।
एसडीआरएफ/एनडीआरएफ कोष- एसडीआरएफ की पहली किस्त जारीः प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में आवश्यक राहत प्रदान करने के लिए राज्य सरकार प्राथमिक तौर पर उत्तरदायी है। भारत सरकार वित्तीय सहायता के माध्यम से राज्य सरकारों के प्रयासों में मदद करती है। राहत संबंधी उपायों के संचालन के लिए राज्य आपदा मोचन निधि के रूप में राज्य सरकारों के पास धन उपलब्ध है। इसकी पहली किस्त राज्यों सरकारों के लिए जारी की गई है।
HON. DEPUTY-SPEAKER: Now, the hon. Minister to reply.
The other hon. Members can seek clarifications after the hon. Minister’s reply. If there is time, I will allow them to seek some kind of clarifications. They can do it at that time.
कृषि मंत्री (श्री राधा मोहन सिंह) : उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में पांच दिनों से चर्चा हो रही है। मुझे खुशी है कि लगभग 33 सदस्यों ने इस चर्चा में भाग लिया और 41 सदस्यों ने अपनी राय लिख कर दी है, लेकिन दुःख इस बात का है कि जिन लोगों ने चर्चा शुरू की, वे यहां उपस्थित नहीं हैं। आपके माध्यम से मैं चाहता हूं कि हमारा संदेश उन तक पहुंचे। कृषि विभाग सूखा, ओलावृष्टि, कीट आक्रमण और ओला के लिए जो उपाय होते हैं उसके लिए हम गृह मंत्रालय से समन्वय करते हैं। राहत दो तरीके से दी जाती है, इस बारे में मैं विस्तार से बताऊंगा। हम सब अधिकतर किसान परिवार से हैं, कृषि से नाता वर्षों पहले छूट गया है। आज जो व्यवस्था है उसका पूरा चित्र हमारे ध्यान में नहीं है, इस बारे में थोड़ा विस्तातर से बताऊंगा, राहत दो तरीके से दी जाती है, राज्य आपदा अनुसरण कोष, जिसे एसडीआरएफ कहते हैं, पहले से राज्यों के पास पैसा उपलब्ध रहता है जिसमें 75औ भारत सरकार और 25औ राशि राज्य सरकार की होती है। यह राशि दो किस्तों में दी जाती है, एनडीआरएफ से पैसा मुहैया कराया जाता है, जब कहीं आपदा आती है तो राज्य सरकार के पास जो एसडीआरएफ का पैसा होता है उसे खर्चा करते हैं। नई सरकार ने एक व्यवस्था की है, देश के अंदर 12 राष्ट्रीय आपदाएं हैं, इसके अलावे भी और आपदाएं आती हैं जैसे बिजली गिरने से कोई मर गया, कटाव होने से मर गया या किसान का नुकसान हुआ, स्थानीय आपदाओं के लिए भी इस राशि में से 10औ राशि राज्य खर्च कर सकते हैं, इसके पहले यह व्यवस्था नहीं थी। इसके अतिरिक्त सहायता हेतु मद और मानदंडों के दृष्टिगत स्थापित प्रक्रिया के अनुसरण में गंभीर किस्त की प्राकृतिक आपदाओं के लिए एनडीआरएफ से पैसा दिया जाता है। एसडीआरएफ में पैसा कम पड़ने पर राज्य केन्द्र सरकार से एनडीआरएफ से पैसा मांगती है और इसके लिए ज्ञापन सौंपेती है। एक सेन्ट्रल टीम राज्यों का दौरा करती है, जिसके पश्चात् राज्यों के लिए पैसा तय होता है।
हममें से बहुत से लोगों को दिमाग में यह बात रहती है कि एनडीआरएफ की टीम जाएगी, वह आकलन करके आएगी और उसके बाद पैसा दिया जाएगा लेकिन वास्तविकता यह है कि राज्यों के पास पहले से पैसा होता है, उदाहरण के लिए आप मध्य प्रदेश की सरकार को देख सकते हैं। कई राज्य सरकारों ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर राशि तय करके राहत का काम शुरू किया है। मैं झारखंड गया था, वहां की राज्य सरकार ने 1300 करोड़ रुपये की राशि कैबिनेट से मंजूर कर सहायता शुरू की। जब हमारे पास ज्ञापन आता है, हमारी टीम जाती है, अगर 1300 करोड़ रुपये उन्होंने खर्चा किया है, एनडीआरएफ के प्रावधान के तहत कितनी राशि देनी है, गृह मंत्री जी की अध्यक्षता में वित्त मंत्री और कृषि मंत्री उसके सदस्य होते हैं, वहां से तय होता है और फिर उतना पैसा राज्य के खजाने में जाता है। यह जो समझ है कि बिना टीम के गए सहायता का काम शुरू नही होगा, इसे समझना आवश्यक है। अभी खरीफ के सीजन में कम वर्षा हुई उसके कारण कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे राज्य सूखा से प्रभावित हुए हैं। उपरोक्त 9 राज्यों से ज्ञापन आया है। उस ज्ञापन के मुताबिक 9 राज्यों में 207 जिलों को सूखा घोषित किया गया। हमारी केन्द्रीय टीम अधिकतर राज्यों से दौरा करके वापिस आ गयी है और उसने बैठक करके राज्यों की डिमांड उच्चस्तरीय कमेटी को भेज दी है। सिर्फ आंध्र प्रदेश की टीम कल लौटेगी और झारखंड का मेमोरेंडम चूंकि विलंब से आया है, इसलिए टीम गठित हो रही है। एक-दो दिन में वहां भी टीम दौरे के लिए जायेगी। हमें 207 जिलों से ज्ञापन प्राप्त हुए हैं, लेकिन बराबर 302 जिलों की चर्चा हो रही है। मौसम विज्ञान ने बताया कि (-) 20 प्रतिशत वर्षा 302 जिलों में हुई है। इसका मतलब यह नही है कि 302 जिलों में अकाल पड़ गया। अब हम नेपाल की तराई में रहते हैं। वहां यदि (-) 25 प्रतिशत वर्षा होती है, तो सूखे का संकट नहीं होगा। लेकिन विदर्भ में (-) 15 प्रतिशत वर्षा हो जाये, तो सूखे का संकट होता है। मौसम विभाग ने जानकारी दी कि 302 जिलों में (-) 20 प्रतिशत वर्षा हुई है। लेकिन अभी तक राज्यों से जो मेमोरेंडम आये हैं, उसके मुताबिक 9 राज्यों के 207 जिले प्रभावित हैं।
महोदय, अब एक दूसरा विषय है कि पूरे देश में, खासकर मैं कुछ टेलीविजन पर देख रहा हूं कि बुआई की हालत बहुत खराब हो गयी है। पन्द्रह दिन पहले जब मैं टेलीविजन देख रहा था, तो कुछ टेलीविजन पर ऐसे लगा, जैसे गेहूं की बुआई का समय समाप्त हो गया है। इस बार आधा उत्पादन नहीं होगा और देश में भारी अकाल पड़ेगा। अब कागज में भले ही यह लिखा है कि 30 नवम्बर तक बुआई होगी, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग यहां बहुत हैं, इसलिए वहां धान की कटनी होनी है। अभी दिसम्बर का फर्स्ट वीक है। हरियाणा और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जब गन्ने की कटाई बहुत खेतों में होती है तब गेहूं की बुआई होती है। कहीं आलू निकालने के बाद उसमें गेहूं की बुआई होती है। अब संकट जरूर है और किसान संकट में है, इसमें कहीं दो राय नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से स्थिति को काफी गंभीर बना दिया जा रहा है, तो उन्हें हम स्मरण दिलाना चाहेंगे कि वर्ष 1965 में लगातार दो बार, यानी दो फसलों पर सूखा पड़ा था। उस समय देश में बहुत हाहाकार मचा था और महंगाई चरम पर थी। इस बार मोदी सरकार आने के बाद पहला सूखा खरीफ पर पड़ा, क्योंकि (-)12 प्रतिशत वर्षा हुई। फिर रबी में ओलावृष्टि और अतिवृष्टि हुई। उसके बात वर्ष 2015 में खरीफ की फसल हुई, उसमें सूखा पड़ा। अब प्राकृतिक की आपदा को हम रोक नहीं सकते, लेकिन उससे जो उत्पादन होने वाले प्रभाव हैं, उसे हम कितना कम कर सकते हैं, यह सरकार की प्रारंभिक जिम्मेदारी है। मैं समझता हूं कि वर्ष 1965 के बाद, उस समय दो फसलें सूखे से प्रभावित थीं, तो इस बार तीन फसलें सूखे और ओलावृष्टि से प्रभावित हुई हैं। आज जो स्थिति है, उसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूं कि रबी मौसम में कुल बुआई का रकबा कितना है। मैंने 9 तारीख को सभी राज्यों के अधिकारियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग से बात की कि कहां क्या स्थिति है? कल ई-मेल से हमने सभी जगह से जानकारी मंगायी है। उसके आधार पर 11 दिसम्बर, 2015 तक 442 लाख हैक्टेयर दर्ज किया गया है, जबकि पिछले वर्ष 446 लाख हैक्टेयर दर्ज था, यानी पिछले वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत कम है। सूखे का प्रभाव पड़ा है, लेकिन उतना नहीं पड़ने दिया, क्योंकि कंटीजेंसी प्लान बनाकर हमने राज्यों को दिया है। यह इसका परिणाम है। अभी 15 दिन और बुआई होने वाली है। यह पूरे रबी का आंकड़ा है और केवल 9 प्रतिशत की कमी है। जब हम गेहूं की बात करते हैं, तो इस वर्ष 202 लाख हैक्टेयर में बुआई 11 दिसम्बर, 2015 तक हुई है, जबकि पिछले वर्ष इस समय तक 241 लाख हैक्टेयर की बुआई हुई थी, जिससे 16 प्रतिशत कम है। लेकिन अभी 15 दिन गेहूं की बुआई और होनी है। मैंने पहले भी बताया कि आलू और गन्ने के बाद भी यह बुआई शुरू होगी। हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई अधिकारियों से बात हुई है। पश्चिम उत्तर प्रदेश और हरियाणा से भी-अभी बात हुई है।
दलहन की बुआई का क्षेत्र 114 लाख हेक्टेयर है जो कि पिछले 115 लाख हेक्टेयर था, मात्र .7 प्रतिशत यानी गत वर्ष की तुलना में बराबर है। इस वर्ष सूखा ज्यादा है फिर भी दलहन की बुआई लगभग बराबर है। यह ऐसे ही बराबर नहीं आया है, इसके लिए ज्यों ही सरकार आई, राष्ट्रीय सुरक्षा मिशन के तहत जो राशि राज्यों को देते थे, उसमें आधी राशि निर्देशित की कि इससे सिर्फ दलहन की खेती करने वाले किसानों को सहायता देनी है।
महोदय, कृषि का माध्यम राज्य है। राज्यों के माध्यम से हमने काम किया और कई राज्य सरकारों ने इसमें काफी रुचि दिखाई है। अगर कुछ लोग सामने होते तो मैं सवाल पूछता, क्योंकि पहली बार भारत सरकार ने देश में 300 कृषि विज्ञान केंद्रों को पैसा दिया है फ्रंट लाइन एक्सटेंशन के लिए ताकि पैदावार के बीज किसानों की फील्ड एक्सटेंशन में जा सके। यह ठीक है कि हम जो कुछ कर रहे हैं, उसका परिणाम आज दिखाई नहीं दे रहा है। मैं बार-बार अपने भाषण में कहता हूं कि हमारे पुरखे मानते थे कि सतयुग और द्वापर के युग में जो पाप करता था, उसी को प्राश्चित करना पड़ता था। यह कलयुग है, इसमें पाप कोई करता है और प्रायश्चित किसी दूसरे को करना पड़ता है।
महोदय, दलहन और तिलहन के विषय में कई सवाल खड़े किए गए हैं। क्या आज तक सरकारों को चिंता नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि दलहन और तिलहन के मामले में आज नहीं वर्षों से उत्पादन कम है? क्या पहले बफर स्टाक बनाने की चिंता नहीं करनी चाहिए थी? हम माननीय प्रधानमंत्री जी को बधाई देते हैं जिन्होंने पहली बार इसके बफर स्टाक बनाने की घोषणा की। हमने बाजार हस्तक्षेप योजना के लिए राज्यों को पत्र लिखा, मूल स्थिरीकरण फंड की माननीय प्रधानमंत्री ने व्यवस्था की। किसी राज्य सरकार को यदि लगता है प्याज, दाल और आलू की कीमत बढ़ने वाली है, वह प्रस्ताव दे, हम पैसा देने के लिए तैयार हैं, उसे खरीदकर स्टाक करे। भारत सरकार के कर्मचारी सब जिलों, ब्लाकों और राज्यों में नहीं है। मुझे खुशी है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे दो-तीन राज्यों ने प्रस्ताव दिया और उनको हमने पैसा दिया। संसद के माननीय सदस्यों को यदि किसानों की चिंता है, उपभोक्ताओं की चिंता है तो निश्चित तौर पर अपने क्षेत्र में, अपने राज्यों में सरकारों से बात करें। हम सब माननीय सदस्यों को मुहैया कराने वाले हैं कि हम किस राज्य को कितना पैसा देते हैं और कितना वह खर्च कर पाते हैं, हम कितनी योजनाओं का सुझाव देते हैं और वे कितना पालन कर पाते हैं। मूल स्थिरीकरण फंड का चार राज्यों ने उपयोग किया है जबकि कई राज्य सरकारों ने हमारे द्वारा चार बार पत्र भेजने के बाद भी इसका उपयोग नहीं किया है।
महोदय, इसी प्रकार से तिलहन में सात प्रतिशत की कमी जरूर आई है लेकिन दलहन की बुआई में कमी नहीं आई है। जहां तक उत्पादन का सवाल है, वर्षा की दृष्टि से 2013-14 बहुत अच्छा साल था। उस साल खरीफ चावल का उत्पादन 91 मिलियन टन था। रबी के 15 मिलियन टन उत्पादन को मिलाकर वर्ष 2013-14 में चावल का कुल उत्पादन 106 मिलियन टन था। यह वर्ष बहुत अनुकूल था। वर्ष 2014-15 के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों में मानसून वर्षा सामान्य से कम रही थी। पूरे देश में वर्षा में सामान्य से 12 प्रतिशत की कमी रही थी। इसके बावजूद खरीफ चावल का उत्पादन 90 मिलियन टन रहा। रबी का 13 मिलियन टन उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में कम रहा। 12 प्रतिशत कम वर्षा के बावजूद वर्ष 2014-15 में चावल का कुल उत्पादन 104 मिलियन टन रहा जो पिछले साल के रिकार्ड उत्पादन 106 मिलियन टन की तुलना में मात्र एक-डेढ़ प्रतिशत कम रहा।
मैंने पूर्व में भी कहा कि प्राकृतिक आपदा को हम नहीं रोक सकते लेकिन उससे उत्पन्न होने वाले प्रभाव को हम कितना कम कर सकते हैं, कम वर्षा होने के बाद भी चावल के उत्पादन में डेढ़ प्रतिशत की कमी आई थी। वर्ष 2015-16 में भी वर्षा की स्थिति ठीक नहीं थी तथा देश में मानसून वर्षा सामान्य से 14 प्रतिशत कम थी। वर्ष 2015-16 के प्रथम अग्रिम अनुमान के अनुसार मानसून वर्षा में 40 प्रतिशत की कमी के बावजूद खरीफ चावल का उत्पादन 90 मिलियन टन होने की संभावना है जो वर्ष 2013-14 के खरीफ चावल उत्पादन की तुलना में मात्र एक प्रतिशत कम है। वर्ष 2013-14 का अनुकूल औसत था लेकिन उसके बाद का सूखा पड़ा था तो केवल एक प्रतिशत की कमी आई और इस बार का भी जो हमारा अनुमान था, 14 प्रतिशत की कमी खरीफ में रही है तो मात्र एक प्रतिशत की कमी आने वाली है।
महोदय, गेहूं के उत्पादन के लिए वर्ष 2013-14 वर्षा की दृष्टि से अच्छा था। वर्ष 2014-15 में गेहूं की फसल अच्छी थी किंतु फरवरी-मार्च 2015 में असामयिक वर्षा और ओलावृष्टि से फसल को काफी नुकसान हुआ और पैदावार लगभग 89 मिलियन टन हुई फिर भी जो योजना आयोग का अनुमान था, कुल उत्पादन 87 मिलियन टन से एक मिलियन टन ज्यादा था। इसलिए इस साल गेहूं की आवश्यकता पूरी होने में कोई कठिनाई नहीं है और ऐसा अभी किसी के द्वारा कहा जा रहा है तो यह उसके मन की कपोल कल्पना है।
वर्ष 2015-16 भी वर्षा की दृष्टि से अच्छा वर्ष नहीं रहा है। देश में सामान्य से 14 प्रतिशत कम हुई है। अभी गेहूं की बुवाई चल रही है। मैंने उसका आंकड़ा बताया है लेकिन वर्ष 2015-16 में गेहूं के उत्पादन का हमारा अग्रिम अनुमान फरवरी 2016 में आएगा। तब इसका अंदाज लग सकेगा लेकिन मुझे लगता है कि गेहूं की बुवाई में जो इतनी भारी कमी बताई जा रही है, उतनी भारी कमी नहीं रहेगी। जो सवाल उठता है कि अब हमारी सरकार क्या कर रही है या इससे निपटने के लिए सरकार ने कौन सी योजना बनाई है?
सूखा पिछली बार भी पड़ा था। उस समय प्रधान मंत्री जी ने उससे पहले ही सूखा से निपटने के लिए कैबिनेट ने मंजूरी दी थी और इस बार भी हमारे कैबिनेट ने मंजूरी दी थी। फिर खाद और बीज पर सहायता तथा चारा पर सहायता भी दी गई है। बागबानी में नुकसान होता है तो उसके लिए कुछ लोग भाषण कर रहे थे कि जमीन पर जाना चाहिए। हमारे केन्द्र के सभी कैबिनेट मंत्री जब ओलावृष्टि हुई थी तो वे सब खेत पर खड़े हुए दिखाई दिये थे। अरुण जेटली जी राजस्थान के खेत में खड़े थे तो मैं नासिक के गांव में था और हम महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री जी को बधाई देंगे कि अभी उस समय 12000 प्रति हेक्टेअर फलों के लिए था तो 13000 प्रति हेक्टेअर वहां की सरकार ने अपने खजाने से दिया था और 25-25 हजार रुपये लोगों को दिया गया था। हमारे मित्र नड्डा जी यहां पर बैठे हैं। हम दोनों हिमाचल गये थे और हम सिर्फ पहाड़ पर ही नही घूमे थे, बल्कि गांवों में खेतों में भी हम दोनों गये थे और हम सभी राज्यों में गये थे। फिर हमने 600 जिलों के लिए कंटीजेंसी प्लान बनाकर दिया। हमारे एक मित्र चर्चा कर रहे थे कि कंटीजेंसी प्लान बनना चाहिए ।
यह देश का दुर्भाग्य है कि जो काम हुआ और जिसकी चर्चा पूरे देश में है और इस सदन में भी पिछली बार चर्चा हुई थी और काफी काम इस क्षेत्र में किया गया है। कंटीजेंसी प्लान हमने उस समय भी दिया था जिस समय हमारी सरकार आई थी। फिर इस समय जब सूखे का संकट आय़ा तो फिर राज्यों से, कृषि विश्वविद्यालयों से और फिर हैदाराबाद में हमारी एक संस्था है, उसके साथ बैठकर, उसको रिवाइज करके पहले ही राज्यों को मुहैया कराया गया कि कितने दिन बारिश में विलम्ब होता है तो कौन सी फसल लगानी चाहिए और उसी कंटीजेंसी प्लान का प्रभाव है कि आज उत्पादन पर जितना असर पड़ना चाहिए, पिछली बार भी नहीं पड़ा है और इस बार भी नहीं पड़ेगा। हम राज्य सरकार और जिले के अधिकारियों को भी बधाई देंगे कि संकट से उत्पन्न प्रभाव को कम करने में राज्यों ने बड़ी सहायता की है।
महोदय, हमने ऋण प्रवाह को भी बढ़ाने का काम किया है। वर्ष 2013-2014 में सात लाख करोड़ रुपए से बढ़ाकर वर्ष 2014-2015 में आठ लाख करोड़ रुपए हमारी सरकर ने किया था। वर्ष 2015-2016 में इस राशि को बढ़ाकर आठ हजार करोड़ रुपए कर दिया। मैं माननीय महताब जी की बात से सहमत हूं कि रिजर्व बैंक ने कुछ ऐसा परिपत्र जारी किया था, जिसके कारण विसंगतियां पैदा हुई थीं लेकिन हमने तुरंत पत्र लिखा था और बाद में रिजर्व बैंक ने अप्रैल, 2015 में जो प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में नए दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, जैसा कि आपने जिक्र किया था कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कृषि के बीच का अंतर समाप्त कर दिया है, इससे पूर्व प्रत्यक्ष कृषि के अंतर्गत 13.5 और अप्रत्यक्ष कृषि के तहत 4.5 की सीमा थी। आरबीआई ने लघु और सीमांत किसानों के लिए एएनबीसी का लक्ष्य चरणबद्ध रूप से मार्च, 2016 तक 7 प्रतिशत और 2017 तक 8 प्रतिशत प्राप्त करना है। कमजोर वर्गों के लिए एएनबीसी के दस प्रतिशत अथवा तुलना पत्र से एक्सपोजर के सम मूल्य राशि जो भी अधिक हो, के लक्ष्य में कोई परिवर्तन नहीं किया है। अक्षम्य व्यक्तियों को भी कमजोर वर्ग में शामिल किया गया है।
हमारे मंत्रालय ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कृषि के बीच के अंतर को समाप्त करने के निर्देश को पुनर्विचार करने के लिए लिखा था और उसके पश्चात् आरबीआई ने अपने नए दिशा-निर्देशों के अनुसार मार्गदर्शिता में परिवर्तन करके बैंकों को पिछले तीन वर्षों में सभी गैर निर्मित किसानों को दिए गए प्रत्यक्ष उधारी का औसत बनाए रखने को कहा है। वित्त मंत्री वित्त वर्ष 2015-2016 के लिए इस औसत की दर 11.57 निर्धारित की गई है। इस विषय को माननीय वित्त मंत्री जी के ध्यान में लाया गया था। मैं वित्त मंत्री जी के प्रति आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इस विसंगति को दूर करने के लिए स्वयं रुचि ली थी। इसी तरह से राहत के जो नार्म्स थे, बहुत लम्बे-चौड़े थे। किसानों के लिए देहात की भाषा ऐसी है जिसे सुनन और बोलने से सही नहीं लगता है लेकिन एक प्रकार से किसानों के लिए जो नौटंकी करते हैं, क्या उनके ध्यान में नहीं था कि किसान की 50 फीसदी फसल बरबाद होगी, तभी उसे मुआवजा मिलेगा। क्या 49 प्रतिशत जिसकी फसल खराब हुई है, उसे मुआवजा नहीं मिलेगा? यह तय करने वाली मशीनरी भ्रष्टाचार का केंद्र बनी हुई थी और किसानों को उचित मुआवजा भी नहीं मिलता था। पहली बार हमारे प्रधानमंत्री जी ने उसमें चेंज किया और कहा कि 33 प्रतिशत तक नुकसान होगा तो उसे भी मुआवजा मिलेगा। पहले ऐसा होता था कि एक हेक्टेयर से ज्यादा पर नुकसान नहीं दिया जाएगा। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि अगर दो हेक्टेयर तक नुकसान होगा तो भी मुआवजा दिया जाएगा।
महोदय, यह ऐतिहासिक निर्णय था कि यदि ओलावृष्टि हुई और धान की फसल तैयार हुई है लेकिन उसके दाने खराब हो गए। उस फसल को समर्थन मूल्य पर खरीदा नहीं जाता था। पहली बार प्रधानमंत्री जी ने कहा कि इसमें किसान की गलती नहीं है बल्कि प्राकृतिक आपदा से अगर कोई अनाज खराब होता है तो समर्थन मूल्य उस फसल का भी दिया जाएगा और उस फसल का अलग से रखरखाव किया जाएगा और किसान को उस फसल का पूरा पैसा दिया जाएगा। राष्ट्रीय आपदा में जो लोग मरते थे तो डेढ़ लाख रुपए उन्हें मुआवजे के तौर पर दिया जाता था। पहली बार प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की और कहा कि चार लाख रुपया दिया जाएगा। मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं कि जब भूकम्प आया और कई गांवों में जब मैं स्वयं राहत का चैक लेकर गया और चार लाख रुपया जब उस परिवार को मिलता था तो गांव के लोग इकट्ठा होते थे और कहते थे कि नरेन्द्र भाई मोदी सिर्फ देश का प्रधानमंत्री नहीं है, ये तो देश के पीड़ितों के लिए भाग्य विधाता हैं।
जो लोगगरीब कीबात तोनहीं करतेहैं, केवलनारा लगातेहैं, निष्ठासे नहींकरते हैं,उनको पतानहीं हैकि प्रधानमंत्रीजन-धन योजनामें क्याहै। गांवमें जोगरीब किसानपरिवारहै, इससेउसे मददमिलती है।नवादा मेंएक गरीबकी दुर्घटनामें मौतहो गयी।उसने प्रधानमंत्रीजन-धन योजनाके तहतअपना खाताबैंक मेंखोला था।उसका खाताचालू था।जब बैंकके अधिकारीउसके परिवारको एकलाख रुपयादेने गये,तो गांवके लोगआश्चर्यमें पड़गये औरकहने लगेकि यहकौन-सी योजनाहै। कैसाप्रधानमंत्रीहै, जोइस बातकी चिन्ताकर रहाहै कियदि एकगरीब आदमीमरता हैतो उसेएक लाखरुपया मिलेगा।इस प्रकारसे, वर्षोंसे जोविसंगतियाँथीं, उसेदूर करनेका प्रयासकिया गयाहै औरकिसानोंको अधिकसे अधिकसहायतामिले, इसेकरने काकाम हमारीसरकार नेकिया है।
मैंआपके माध्यमसे यहभी संदेशदेना चाहताहूँ किहमारे कुछमित्र भूमिहीनकिसान कीबात करतेथे। भूमिहीनकिसानोंका ग्रुपबनाकर उनकोखेती केलिए कर्जदेना चाहिए,यह ठीकहै। यहयोजना वर्ष 2006-07 सेशुरू हुईथी। वर्ष 2006-07 सेवर्ष 2013-14तक करीबसात सालहो गये,इन वर्षोंमें, किसानोंके लिएघड़ियालीआँसूँ बहानेवाली सरकारऔर उसकेनेताओंद्वाराउक्त छः-सातवर्षोंमें छःलाख ग्रुपबनाये गयेथे। अभीहमारी सरकारके मात्र 18 महीने हीहुए हैं।इस कामको सीधेतौर सेनाबार्डकरता था।जब हमारीसरकार आयी,तो हमारेवित्त मंत्रीजी नेबजट मेंही इसकाप्रावधानकिया औरउसी कापरिणामहै किमात्र 18 महीनेके अंदरही हमनेसात लाखसमूह बनायेहैं औरभूमिहीनकिसानोंको सातहजार करोड़रुपये लोनदेने काकाम कियाहै।
जलवायुपरिवर्तननिश्चितरूप सेएक बहुतबड़ा संकटहै। आजइससे पूरादेश चिन्तितहै। जलवायुपरिवर्तनपर हमारेप्रधानमंत्रीजी नेराष्ट्रीयजलवायुकार्य योजनापरिचालितकी है।जिसमेंअखिल राष्ट्रीयमिशनोंके सृजनकी परिकल्पनाकी गयीहै तथाकृषि केलिए कृषिमें जलवायुपरिवर्तनकी समस्याका समाधानकरने केलिए राष्ट्रीयसतत कृषिमिशन काअनुमोदनकिया गयाहै। इसकेअलावा राष्ट्रीयस्वाइलहेल्थ कार्डमिशन कीभी शुरुआतकी गयीहै, जिसपर हमआगे चर्चाकरेंगे,जो जलवायुपरिवर्तनके प्रशमनमें अप्रत्यक्षरूप सेमदद करेगा।खाद्य सुरक्षासुनिश्चितकरने, आजीविकाअवसरोंमें वृद्धिकरने, राष्ट्रीयस्तर परआर्थिकस्थिरतामें योगदानदेने केलिए उपयुक्तअनुकूलनको प्रशमनकार्य-नीतियाँतैयार करकेयह मिशनजलवायुपरिवर्तनसे जुड़े,जोखिमोंके संबंधमें सततकृषि सेजुड़े मसलोंका समाधानकरेगा।हमारे परिवर्तनकी जोयोजना बनीहै, उसमेंभारतीयकृषि कोजलवायुअनुकूलबनाने केलिए अंतिमउद्देश्यसे विभिन्नजलवायुक्षेत्रोंमें सौजिलों कोआईसीएआरद्वाराचयनित कियागया है।जहाँ जलवायुपरिवर्तनकी समस्यासे निपटनेके लिएविकसितटैक्नोलॉजीकी प्रारंभिकजांच केलिए भारतीयकृषि अनुसंधानसंस्थानने राष्ट्रीयजलवायुअनुकूलकृषि पहलकी शुरुआतकी हैऔर इससेपूरा देशचिन्तितहो रहाहै। सरकारइसे प्राथमिकतामें लेकरइस दृष्टिसे कामकर रहीहै।
जहाँतक आर्सेनिककी बातहै, हालांकिइसका संबंधकई मंत्रालयोंसे है,लेकिन मैंइतना हीबताना चाहूंगाकि आर्सेनिकसे प्रभावितभूजल कीसमस्याके समाधानके लिएकई कदमउठाये गयेहैं। इससंबंध मेंअध्ययन-कार्यशुरू कियेगये हैं,जिनके निष्कर्षोंको पश्चिमबंगाल मेंप्रयोगमें लायागया है।इस अनुक्रममें आर्सेनिकहटाये जानेसंबंधीतकनीकोंका इस्तेमालकरके आर्सेनिकयुक्त भूजलको साफकरके, श्रीभोला बाबूने यहविषय ज़ीरोआवर मेंउठाया था,वैकल्पिकस्वच्छजल संसाधनोंकी व्यवस्थाकरके आर्सेनिकसंक्रमितक्षेत्रोंमें रहनेवाली संपूर्णआबादी कोआर्सेनिकमुक्त पेयजलउपलब्धकराने परध्यान केन्द्रितकिया गयाहै। हमारेमंत्रालयकी इकाई,जो टय़ूवबेलसे संबंधितकाम देखतीहै, ग्रामीणविकास मंत्रालयकी ओरइस अभियानको तेजकिया जारहा है।
फसलबीमा योजनाकी चर्चाअधिकतरसदस्योंने कीहै। फसलबीमा योजनाके बारेमें, मुझेयाद है,जब श्रीअटल जीदेश केप्रधानमंत्रीथे, तोइसे वर्ष 2000 में प्रारम्भकिया गयाथा।
15.00 hours फिर वह सरकार चली गयी, उसके बाद जो दूसरी सरकार बनी, जिसने दस वर्षों तक राज किया, वह एक नई संशोधित कृषि बीमा योजना लेकर आई। पिछले 18 महीने में मैं यह नहीं समझ पाया कि वह बीमा योजना किसानों के लिए बनाई गयी थी या कंपनियों के लिए बनाई गयी थी। ...(व्यवधान) यह बात आज तक समझ में नहीं आई की वह बीमा योजना कंपनियों के लिए बनाई गयी या किसानों के लिए बनाई गयी। जब मोदी सरकार आई तो पहला फोन शिवराज सिंह चौहान जी का आया, उन्होंने बहुत तर्क दिए, लेकिन मुझे लगा कि पुरानी सरकार ने बनाया है तो ऐसा हो सकता है, लेकिन फिर दूसरा पत्र असम से आया, जहां कांग्रेस की सरकार थी और तब तक कई राज्यों में चालू हो चुका था। इसमें इतनी विसंगति थी, किसान को इतना प्रीमियम देना पड़ता है, उत्तर प्रदेश में वही मोडिफाइड नाइस ही चल रही है। ध्यान में कि बीमा योजना में कौन कंपनी काम करेगी, इसका टेंडर तय करना, यूनिट इकाई क्या होगी, यह तय करना, किन-किन फसलों को इसमें शामिल करना है, ये सब राज्य सरकार के काम हैं। हम केवल भरपाई में आधी राशि देते हैं, लेकिन मैं आश्चर्य में था कि मोडिफाइड नाइस किसके लिए बनी है। हमने तुरंत आदेश किया कि ठीक है, जो राज्य सरकार इसे नहीं चाहती है, वह पुरानी वाली स्कीम को चलाए और अगले वित्तीय वर्ष में हम एक नई कृषि बीमा योजना लेकर आएंगे। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि वर्तमान में इसमें जो खामियां हैं, प्रीमियम ज्यादा देना पड़ता है और भुगतान में भी काफी विलम्ब होता है, तो उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से देश के किसानों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि वर्तमान में लागू फसल बीमा योजना की खामियों को दूर करके, इसे किसानोन्मुखी बनाने के लिए सरकार बीमा योजनाओं की, यदि मैं यह बोलूंगा कि समीक्षा कर रही है तो लोग कहेंगे कि 18 महीने से यही बोल रहे हैं, समीक्षा हमने पूरी कर ली है। आज हम इस स्थान पर खड़े हैं कि शीघ्र ही हम प्रीमियम की दर को कम करेंगे, उचित क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करेंगे, जल्द से जल्द बीमा दावों के भुगतान के लिए उन्नत तकनीक का प्रयोग किया जाएगा, बेहतर प्रशासन एवं पारदर्शित हेतु बीमा पोर्टल का उपयोग किया जाएगा, लेकिन ये चीजें राज्य सरकार के माध्यम से ही करना है और जल्दी से जल्दी हम इस नई कृषि बीमा योजना को देश में लाने जा रहे हैं।
महोदय, बीमा से संबंधित अभी बहुत से प्रश्न आए हैं, गणेश सिंह जी का एक प्रश्न है, फसल बीमा योजना के संबंध में श्री संजय धोत्रे जी का एक प्रश्न था कि फसल बीमा योजना सभी फसलों के लिए लागू क्यों नहीं है। राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना या संशोधित कृषि बीमा योजना में सभी खाद्य फसलों एवं वार्षिक वाणिज्यिक बागवानी फसलों की कवरेज की जाती है। मैंने शुरू में ही बताया है कि राज्य को यह तय करना है कि उसमें किस फसल को वे रखते हैं। अभी करीब 70 फसलों के लिए फसल बीमा योजना उपलब्ध है।
महोदय, समर्थन मूल्य के बारे में एक प्रश्न आया, जो समर्थन मूल्य है, वर्ष 2004 में किसान आयोग बना, जब अटल बिहारी वाजपेयी जी इस देश के प्रधानमंत्री थे और उस आयोग ने जो सिफारिशें कीं, उसके बाद यूपीए सरकार ने किसान नीति बनाई और वही किसान नीति आज कृषि मंत्रालय में चल रही है। आयोग बना जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, हुक्मदेव बाबू को ध्यान में होगा, उसकी सिफारिशें आईं। आयोग की 200 से अधिक सिफारिशें थीं। उन्हीं में से निकालकर यू.पी.ए. सरकार ने 2007 में किसान नीति नीति बनाई। उस किसान नीति में 13 सिफारिशों को नहीं माना गया। कांग्रेस पार्टी के नेता जिक्र कर रहे थे कि हमने सुप्रीम कोर्ट में यह एफीडेविट दिया है कि यह सम्भव नहीं है। जो आपने किसान नीति बनाई, वही किसान नीति है, उसीको हमारा मंत्रालय अभी तक लागू कर रहा है। उन्होंने जो सिफारिश की थी कि किसान की जो उपज हो, उससे 50 प्रतिशत ज्यादा उसे लाभ हो। सवाल यह नहीं है कि समर्थन मूल्य कितना बढ़ता है, सवाल यह है कि लागत भी कितनी कम होती है। लेकिन उनकी सिफारिश थी कि जो लगता है, उससे 50 प्रतिशत ज्यादा मिलना चाहिए। उस समय क्यों इनकार किया। इन्होंने लिखा :-
“न्यूनतम समर्थन मूल्य वस्तुनिष्ठ मानदंडों पर विभिन्न सम्बद्ध घटकों पर विचार करते हुए सी.ए.सी.पी. द्वारा सिफारिश की जाती है। इस प्रकार लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत की वृद्धि निर्धारित करना बाज़ार की स्थिति को विकृत कर सकता है। एम.एस.पी. और उत्पादन लागत के बीच एक यांत्रिक पैमाना इस मामले में प्रतिरक्षात्मक हो सकता है।” मतलब यह है कि उस समय आप इसे किसान नीति में नहीं लाए और हम उसे चालू कर रहे हैं। हमने इस बीच रमेश चंद्र जी के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई, जिसमें कई किसान भी थे। उस कमेटी की रिपोर्ट इस सम्बन्ध में आई है। उसमें दिए गए सुझावों को हमने अन्य मंत्रालयों में परिचालित किया है और हम इस पर विचार कर रहे हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि आठ बरस हो गए किसान नीति बने हुए, मैंने कल भी चर्चा के दौरान कहा था कि इसका पुनरीक्षण होना चाहिए। इसके लिए मैं शीघ्र एक कमेटी बनाऊंगा और जो भी विसंगतियां होंगी, उन्हें दूर करने की पूरी कोशिश करूंगा। मैं आयोग नहीं बनाऊंगा, क्योंकि आयोग की रिपोर्ट काफी देर से आती है। कमेटी बनाएंगे, कमेटी बनाने के बाद जब कोई पूछेगा, तब हम बताएंगे।
किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का काफी उल्लेख हुआ है। हम इससे सहमत हैं, कोई भी सहमत होगा कि अगर एक भी व्यक्ति आत्महत्या करता है तो निश्चित रूप से लोकतांत्रिक देश में यह बहुत शर्म और दुख का विषय होता है। आखिर क्यों महाराष्ट्र के कई सांसद बता रहे थे कि इतने हजार करोड़ रुपए सिंचाई के लिए गए, फिर भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं। एक माननीय सदस्य ने कहा कि रुपए तो गए, लेकिन पूरा का पूरा घोटाला हो गया। मैं एक-दो जिलों के गांवों में गया था। मेरा मानना है कि अगर वे रुपए खर्च हो जाते तो वास्तव में महाराष्ट्र सबसे आगे रहता। लेकिन महाराष्ट्र सौभाग्यशाली है कि उसे एक ऐसा मुख्य मंत्री मिला है, जिसने संकल्प लिया है, उन्होंने मराठी में एक योजना ‘जल सिवार योजना’ की घोषणा की है। उन्होंने मुख्य मंत्री बनने के बाद जो केबिनेट की पहली बैठक हुई, उसमें इस योजना को शुरू किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि वहां की सरकार जब तक हर खेत में पानी नहीं पहुंचाएगी, तब तक चैन से नहीं बैठेगी। हम उनकी यथासम्भव सहायता करेंगे। हम जो प्रधान मंत्री सिंचाई योजना ला रहे हैं, उस पर चर्चा करेंगे।
महोदय, कई माननीय सदस्यों के सवाल हैं, सबका उत्तर देना सम्भव नहीं है, लेकिन मेरी कोशिश होगी की अधिकतर सवालों का जवाब दूं। सबसे पहले मैं हैदराबाद से आने वाले माननीय सदस्य के सवाल का जवाब देना चाहता हूं। अभी वह हाउस में नहीं हैं। उन्होंने कहा था कि अंत्योदय कार्ड पर रोक लगा दी है। यह सवाल सीधे कृषि मंत्रालय से जुड़ा हुआ नहीं है। लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि सरकार ने अंत्योदय योजना को समाप्त नहीं किया है। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदेश 2015 में नए अंत्योदय परिवारों की पहचान पर जो रोक लगाई गई थी, अब उसे हटा दिया गया है। इस सम्बन्ध में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली संशोधित आदेश 2015 दिनांक 29-10-2015 को राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया है, इस पर रोक नहीं है। कांग्रेस पार्टी के माननीय सदस्य सिंधिया जी अभी सदन में मौजूद नहीं हैं, उन्होंने कुछ सवाल यहां चर्चा के दौरान उठाए थे। उन्होंने जो सवाल उठाए थे और कहा था कि देश का किसान चक्रव्यूह का सामना कर रहा है। मेरी थोड़ी उनसे मत-भिन्नता है। मैं मानता हूं कि पिछले वर्षों में हम सब लोगों ने जो करतब दिखाया है, उसके कारण देश का किसान केवल चक्रव्यूह का सामना नहीं कर रहा है, अपितु चक्रव्यूह में फंस चुका है। पिछले 60-62 वर्ष में जो चक्रव्यूह हमने तैयार किए, उसी चक्रव्यूह में आज देश का किसान फंसा हुआ है।
महोदय, आजादी के 67 साल बाद भी हम देश की खेती योग्य जमीन के लिए पानी नहीं पहुंचा पाए हैं। हम कहते हैं कि 60 प्रतिशत खेती योग्य जमीन आज भी असिंचित है। यदि इस 60 प्रतिशत में पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात इत्यादि जैसे राज्यों को हटा दें तो शेष राज्यों में तो मुझे लगता है कि 80-90 प्रतिशत जमीन सिंचित नहीं है। यदि 90 प्रतिशत जमीन असिंचित है और दस प्रतिशित शेष राज्यों में सिंचित है तो बड़े-बड़े फार्म हाउसिज या बड़े किसानों की है। यानी 90 प्रतिशत जो स्मॉल और लघु-सीमांत किसान हैं, उनके खेत पर पानी नहीं पहुंचा है। मैं अपने गांव की बात बताता हूं कि मेरे गांव में जो सम्पन्न किसान है, उसके पास बोरिंग है और वह दो सौ रुपये प्रति घंटा देकर हम अपने खेत में पानी पटवाते हैं। एक एकड़ में पानी पटवाने में घंटों लगता है और दो सौ रुपये प्रति घंटा, वह बोरिंग का मालिक घड़ी देखता रहता है। उसका एक आदमी डय़ूटी पर रहता है कि कितने घंटे पानी चला है? हम खेत तक पानी नहीं पहुंचा पाए हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी ने प्रधानमंत्री सिंचाई योजना चलायी है। यह कहा जा रहा है कि पैसा कम किया गया है। 50 हजार करोड़ रुपये का आवंटन पांच वर्ष के लिए किया गया है। पैसे की कमी नहीं है। पैसा खर्च कीजिए और लीजिए।
मैं एक राज्य का उदाहरण देना चाहता हूं। मैं झारखण्ड गया था। वहां के अधिकारियों के साथ बैठक की थी। कृषि विकास योजना के लिए वर्ष 2012-13, 2013-14, 2014-15 में 66 करोड़ रुपये गए थे। लेकिन एक भी पैसा खर्च नहीं हुआ। वह पैसा ज्यों का त्यों पड़ा हुआ है। हमने वर्ष 5015-16 के लिए उनको पैसा देना है। वहां नई सरकार आयी और पिछले तीन साल से पड़ा हुआ धन अब खर्च हो रहा है। इसी प्रकार से सुक्ष्म सिंचाई योजना जो कि प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के अंतर्गत ही है, वर्ष 2014-15 में 15 करोड़ रुपये दिए गए। वह वर्ष 2014-15 में खर्च नहीं हुआ। उसको हमने पुनर्जीवन दिया है कि उसको इस वर्ष में खर्च करो। यह एक राज्य की कहानी नहीं है और इसमें राज्यों का कुसूर नहीं है। हम नारे लगाते रहे हैं लेकिन निष्ठा के साथ काम नहीं किया है। सरकार ने खर्च नहीं किया तो क्या हमारी डय़ूटी नहीं थी कि राज्य में जाएं? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि एक-दो राज्यों को छोड़कर अधिकतर राज्यों के साथ दो-दो, तीन-तीन बार स्वयं मैं और हमारे राज्य मंत्री एवं अधिकारी राज्यों में जाकर बैठक करते हैं। खर्च न होना संकट है, पैसे की कमी नहीं है।
सूक्ष्म सिंचाई की बात एक माननीय सदस्या ने की है। मैंने इस बार तय किया है, पुरानी परिपाटी है कि किसी राज्य को पैसा दिया, लेकिन उसने खर्च नहीं किया। पहला एलोकेशन गया, लेकिन खर्च नहीं किया, दूसरा एलोकेशन पड़ा हुआ है। मैंने तय किया है कि 31 दिसम्बर तक जो पहले पड़ा हुआ धन है, वह खर्च नहीं करेगा और जो राज्य तेजी से खर्च कर रहा है, उसको हम पैसा देंगे। पैसा पड़ा रहता है, इस साल का उस साल में और लगता है कि दस साल तक सरकार हेराफेरी करती रह गयी, इधर का उधर, लेकिन इसको गतिशीलता प्रदान नहीं की।
महोदय, सोइल हेल्थ कार्ड की चर्चा की गयी। हमारे तमिलनाडु के एक सदस्य ने हमें पत्र भी दिया है। हमारे देश के किसान को आज तक यह नहीं पता है कि उसके पास जो जोत की जमीन है, उसमें कौन सी बीमारी है और उसके लिए कौन सी दवा कितनी देनी है? उसको भोजन की कितनी खुराक देनी है। यूरिया कितना देना है, पोटाश कितना देना है, आज तक उनको पता नहीं है। इसमें किसका कसूर है? सन् 2007-08 में पूरी दुनिया में यह बात सामने आई कि सॉयल हैल्थ मैनेजमेंट होना चाहिए। सन् 2007-08 से 2013-14 तक किसकी सरकार थी? हम तो 2014-15 में आए और जिस दिन सरकार में आए, पहली कैबिनेट मीटिंग के बाद, हमारे प्रधान मंत्री जी ने मुझे मीटिंग के बाद में बुलाया और कहा कि ध्यान रहे कि हिंदुस्तान की मिट्टी सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है। यह हमारी माता है। हम अपनी माँ की कोख से जरूर पैदा होते हैं, लेकिन इसी मिट्टी की गोद में हम पलते हैं, बढ़ते हैं, फलते हैं, फूलते हैं और जब तक हमारी यह माता बीमार है, उसका जो पुत्र है, किसान है, गांवों में रहता है, वह संपन्न नहीं हो सकता है। हालत क्या थी?
मैंने आंकड़े देखे कि सन् 2006-07 से 2013-14 तक, मोदी सरकार आने तक सौ करोड़ रूपये सॉयल हैल्थ मैनेजमेंट के लिए राज्यों को दिया गया। सॉयल हैल्थ कार्ड बनाने के लिए एक पैसा अलग से नहीं दिया गया था। महोदय, पहले वर्ष में 88 करोड़ रूपये सॉयल हैल्थ मैनेजमेंट के लिए दिया, 100 मोबाइल लैबोरेट्री के लिए रूपयों का आवंटन किया गया। प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि देश के अंदर सभी किसानों को सॉयल हैल्थ कार्ड मिले। इसके लिए कितनी राशि खर्च होगी? उसके लिए लगभग 10-15 दिनों तक बैठक चली और देश के अंदर जो साढ़े तेरह करोड़ किसान हैं, उन सबको सॉयल हैल्थ कार्ड मिल जाए, इस पर खर्चा 568 करोड़ रूपये आया। कितने बड़े-बड़े घोटाले देश में हो चुके हैं। 568 करोड़ रूपये कोई बड़ी राशि नहीं थी। प्रधान मंत्री जी ने तुरंत इसका आवंटन किया। हमने उसी वर्ष 27 करोड़ रूपये राज्यों को दिये कि आप जागरूकता पैदा करो, आप लोगों को ट्रेनिंग कराओ और इस वित्तीय वर्ष में सौ करोड़ रूपये दिए हैं। सौ करोड़ रूपये राज्यों को सॉयल हैल्थ कार्ड बनाने के लिए दिये गए हैं। ढाई करोड़ नमूने लेने हैं और एक नमूने से पांच-छह किसानों का कार्ड बनेगा क्योंकि एरिया है दस हैक्टेयर असिंचित।
अब मैं आपको यह बताना चाहता हूँ प्रधान मंत्री की प्रतिबद्धता किसानों के प्रति कितनी है। उसका मैं एक उदाहरण दूंगा कि उनकी लगातार मॉनिट्रिंग के कारण आज हम कहां पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि विश्व सॉयल हैल्थ डे है। देश में पता ही नहीं था, कभी मनाया नहीं जाता था। उसके लिए एक लक्ष्य तय हुआ। हमने सभी सांसदों को, सभी मुख्य मंत्रियों को पत्र लिखा। इस अभियान को जब इस साल शुरू किया तो अभी तक साठ लाख नमूने इकट्ठे कर लिए गए हैं और पांच तारीख को जो सॉयल हैल्थ डे था, मैं एक सौ सांसदों को बधाई दूंगा, मेरे पास जो रिपोर्ट आई है कि एक सौ सांसद कृषि विज्ञान केंद्रों पर राज्य सरकारों के कार्यक्रम में उपस्थित थे। इसमें से जो नहीं गए थे, वे आगे ध्यान रखेंगे। भारत सरकार के आठ मंत्री, राज्यों के भी लगभग दो-ढाई सौ एमएलए, 40-50 मंत्री, केरल के माननीय मुख्य मंत्री जी, ओडिसा के मुख्य मंत्री, मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री, कुछ राज्यों के गवर्नर आए थे। देश के कोने-कोने में कार्यक्रम आयोजित किए गए और उस दिन 40 लाख कार्ड बांटे गए। उसके पहले 20 लाख बंट चुके थे। एक करोड़ नमूने एकट्ठे होंगे, लैबोरेट्री में कार्ड बन रहे हैं और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस वित्तीय वर्ष के अंत तक, मार्च-अप्रैल आते-आते देश के अंदर लगभग पांच करोड़ किसानों को सॉयल हैल्थ कार्ड मिलेगा। यह सब राज्यों के सहयोग से किया जा रहा है। कुछ राज्य ऐसे जरूर हैं, जिनकी बहुत रूचि नहीं है, लेकिन अधिकतर राज्य इसमें लगे हुए हैं। यह पहला वर्ष है। जो अगला वित्तीय वर्ष आएगा, उसमें हम डेढ़ करोड़ नमूने इकट्ठे करेंगे। वर्ष 2017 के अंत तक निश्चित रूप से हम देश के हर किसान की पॉकेट में जो उसकी जोत है, जमीन है, उसका स्वाइल हेल्थ कार्ड रखने वाले हैं।
महोदय, जैविक खेती की बात की जाती है। यह स्वाइल हेल्थ कार्ड इसलिए है कि जो किसान की जमीन है, वह बीमार न पड़े, स्वस्थ रहे और एक लंबा जीवन उसको मिले। इसकी चिंता भारत की सरकार ने नहीं की थी। लंबे-चौड़े भाषण जरूर हुए, नारे जरूर लगाए गए, थोड़ी भी निष्ठा होती तो इसकी चिन्ता होती। अपनी चिन्ता तो हो रही है। नौकर को भेजते हैं कि जरा जैविक फूड ले आओ। अपनी चिन्ता हो रही है, लेकिन दस वर्ष तक इसकी चिन्ता नहीं हुई। पहली बार प्रधानमंत्री जी के निर्देशन में हमारे वित्त मंत्री जी ने बजट में जैविक खेती के लिए एक नई योजना, पारम्परिक कृषि विकास योजना चलाई और उसके लिए तीन सौ करोड़ रूपए दिए। राज्यों ने इसमें रूचि दिखाई है। पहले राज्य सरकारें जैविक खेती करती थीं, लेकिन वे अपने संसाधनों से करती थीं। भारत सरकार की ओर से कोई पैसा उनको नहीं मिलता था। इतना ही नहीं सवा सौ करोड़ रूपया इस वर्ष पूर्वी राज्यों के लिए दिया है। जैविक खेती, मिट्टी, हमारी माँ स्वस्थ रहे, दीर्घायु हो, इसकी चिन्ता पहली बार इस देश के प्रधानमंत्री जी ने की है, इस सरकार ने की है।
किसान को लाभकारी मूल्य मिले, इस संबंध में कहना चाहूँगा कि यह जो मार्केटिंग है, यह राज्यों का विषय है, लेकिन पहली बार इस देश में किसी प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्य का विषय है तो क्या हुआ, पूरे देश के लिए एक मंडी होनी चाहिए। हिंदुस्तान के किसी भी कोने का किसान यदि अपनी मंडी में जाए तो उसे पता चल जाए कि देश के दूसरे कोने की मंडी में हमारी फसल की क्या कीमत है। चार-चार, पाँच-पाँच बार राज्यों के मंत्रियों के साथ, अधिकारियों के साथ हम लोग बैठे। देश के राज्यों के जितने कृषि मंत्री थे, जितने मार्केटिंग के आफिसर थे, उनको हमने अपने साथ घुमाना शुरू किया। उनको मार्केट में ले गए, कर्नाटक के मार्केट में ले गए और आज हम दावे के साथ कह सकते हैं कि कर्नाटक के अंदर, हर राज्य में एक मंडी का अलग कानून और दूसरी मंडी का अलग कानून है। एक मार्केट से दूसरे मार्केट के बीच में दीवार है। किसान एक मार्केट में जाता है, तो दूसरे मार्केट का पता नहीं चलता है कि उसमें क्या रेट है? कर्नाटक को हम इसके लिए बधाई देंगे। इसके बाद चार राज्यों ने गुजरात, महाराष्ट्र, वह सूची मेरे पास है, चार राज्यों ने अपने राज्य के अंदर एक मार्केट से दूसरे मार्केट के बीच की दीवार को खत्म किया है। बिहार और केरल में तो यह सिस्टम नहीं है। उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की सरकार ने भी सैद्धांतिक रूप से तय नहीं किया है, लेकिन बाकी जितने राज्य हैं, सब तैयार हो गए हैं। अभी तक लगभग दो सौ से ज्यादा मंडियों के प्रस्ताव राज्यों से आ गए हैं, जिनको हम तीस लाख रूपए और आईटी के अधिकारी भी दे रहे हैं। हमें पूरा विश्वास है कि अप्रैल आते-आते हम देश के अंदर तीन सौ मार्केट को जोड़ लेंगे। मेरा लक्ष्य है कि देश की 585 मंडियों को एक साथ जोड़ना, एक साफ्टवेयर लाँच करना, जो हम अप्रैल-मई के महीने में निश्चित रूप से करेंगे।
महोदय, मनरेगा की बात हमारे कुछ मित्र कर रहे थे। मैं यह बताना चाहता हूँ कि मनरेगा में राशि बढ़ाई गई है। वह हमारे मंत्रालय का विषय नहीं है, लेकिन मनरेगा में राशि बढ़ाई गई है। जो वर्ष 2012-13 में राशि थी, जो वर्ष 2013-14 में राशि थी, उससे ज्यादा राशि वर्ष 2014-15 में, उससे ज्यादा राशि वर्ष 2015-16 में और पहली बार, जब से मनरेगा आया है, पहली बार बजट में अलग से पाँच हजार करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है कि आप खर्चा करो, जितना खर्चा करते हो करो, हम देने के लिए तैयार हैं। मनरेगा के अन्दर पहली बार यह व्यवस्था की गई है।
महोदय, अंत में ज्यादा कुछ न कहते हुए मैं इतना ही कहूँगा कि जिस वक्ता ने इसकी शुरूआत की थी, उन्होंने कहा कि इन्दिरा जी का और राजीव जी का बड़ा योगदान है। मैं इससे सहमत हूँ, लेकिन वे भूल गए कि देश के प्रथम कृषि मंत्री डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद जी थे। वे कृषि मंत्रालय को जिस दिशा में ले जाना चाहते थे, सरदार पटेल देश की किसान नीति को जिस दिशा में ले जाना चाहते थे, हमने उसका शीर्षासन करा दिया और उसका परिणाम आज हम भोग रहे हैं। श्रीमती इन्दिरा जी के जमाने में, राजीव जी के जमाने में निश्चित रूप से हम आगे बढ़े हैं, इससे हम इनकार नहीं कर सकते हैं। जवाहर लाल नेहरू जी का भी बड़ा योगदान है। लेकिन हम भूल गए लाल बहादुर शास्त्री को जिसने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया। हम भूल गए अटल बिहारी वाजपेयी को जिसने ‘जय जवान जय किसान और जय विज्ञान’ की बात की। मुझे आश्चर्य हो रहा था, इन नेताओं ने प्रेरणादायी भूमिका निभाई है और उसका परिणाम है कि अटल जी और लाल बहादुर शास्त्री को यह देश कभी नहीं भूलेगा, क्योंकि ‘जय जवान और जय किसान’ जब नारा नहीं था तब हम भीख का कटोरा लेकर दुनिया के देशों में जाते थे। लेकिन जब शास्त्री जी ने हमारा आह्वान किया तो हम इस क्षेत्र में आगे बढ़े। अटल जी ने जय विज्ञान की बात की और जब नरेन्द्र भाई मोदी देश के प्रधान मंत्री बने, तो देश ने तरक्की की। महोदय, मैं अपनी बात समाप्त करते हुए कहना चाहूँगा कि यदि बहुत अधिक चिन्ता थी तो देश के अंदर सिर्फ और सिर्फ एक ही राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद् पूसा में क्यों रहा? उसकी संख्या क्यों नहीं बढ़ी? क्योंकि साइंस के बिना, नई टैक्नोलॉजी के बिना कृषि का विस्तार नहीं हो सकता है, किसान खुशहाल नहीं हो सकता है। इतनी यदि चिन्ता थी तो सिर्फ एक क्यों रहा? नरेन्द्र भाई मोदी जब देश के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने घोषणा की कि इस प्रकार के दो और संस्थान बनेंगे। वे खुद रांची गए जहाँ झारखंड में एक का शिलान्यास हुआ है और दूसरा असम में होने वाला है।
महोदय, मैं आपके माध्यम से देश के किसानों को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि राष्ट्र के लिए एक समर्पित जीवन देश का प्रधान मंत्री बना है, रीयल एस्टेट के लिए समर्पित जीवन आज देश का प्रधान मंत्री नहीं है। परिवार के लिए समर्पित जीवन का व्यक्ति आज देश का प्रधान मंत्री नहीं है। देश का प्रधान मंत्री राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन है। हमारे पास संसाधनों की कमी थी लेकिन जितने घोटाले हुए थे, चाहे कोयला का हो या 2 जी का हो, हमारी सरकार कोशिश कर रही है कि अधिक से अधिक जो जनता का पैसा लूटा गया, वह खजाने में आए और उन पैसों के माध्यम से हम निश्चित रूप से देश के किसानों का भविष्य बदलेंगे और संकट की घड़ी में हम किसानों के साथ हैं।
इन्हीं शब्दों के साथ बहुत बहुत धन्यवाद करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
HON. DEPUTY SPEAKER: Shrimati Krishna Raj to only ask a question from the hon. Minister.
श्रीमती कृष्णा राज (शाहजहाँपुर):उपाध्यक्ष महोदय, धन्यवाद, कि आपने मुझे प्रश्न पूछने का अवसर दिया। माननीय मंत्री जी ने बड़े विस्तृत तौर तरीके से हम लोगों के सामने अपनी बात रखी और देश क्या कर रहा है, हमारी सरकार क्या कर रही है, हम सबको बताया। लेकिन मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहती हूँ कि किसानों के मुआवज़े का जो पैसा है जो हम राज्यों में एन.डी.आर.एफ. का या एस.डी.आर.एफ. का पैसा देते हैं, इन पैसों का जो वितरण निचले स्तर पर, गाँवों के स्तर पर होता है, क्या उसमें कोई जाँच कराकर सही व्यक्ति तक पहुँचाने का प्रयास करेंगे?
दूसरी बात यह है कि यह विषय आ रहा था कि पार्टीबद्ध तरीके से राज्यों में वितरण हो रहा था। हमारे उत्तर प्रदेश में जहाँ पर घर हैं, वहाँ मुआवज़ा दे दिया गया और जहाँ पर गन्ना है, वहाँ गेहूँ का मुआवज़ा दे दिया गया। ऐसी स्थिति मे ...(व्यवधान)
श्री देवजी एम. पटेल (जालौर):उपाध्यक्ष महोदय, मेरा माननीय मंत्री महोदय से सीधा सवाल है कि आँकड़ों में मंत्री जी ने कहा कि सूखे की इतनी मार नहीं आई है लेकिन कहा कि देश में हम सूखा फेस कर रहे हैं। सूखे की मार नहीं है तो किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है यह सोचने का विषय है। अधिकारी जो आँकड़े देते हैं, इनको नहीं देखें। लेकिन अगर हम बीमा की बात करें तो बीमा का सर्वे दिसम्बर में हो रहा है जबकि फसल की कटाई सितम्बर में हो गई है, नई फसल डाल दी है। ये सारे प्रश्न अधिकारियों का मायाजाल हैं। इस मायाजाल से निकलने के लिए मंत्री जी क्या करेंगे, यह भी मैं जानना चाहता हूँ।
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Sir, the Minister made a very forceful diposition, but I would say that he forgot about one luminary from Bihar who led this Ministry and led this country to the green revolution. He was Babu Jagjivan Ram. It was during his tenure and his effort that during Shri Lal Bahadur Shastri’s Prime Ministership Babu Jagjivan Ram was Agriculture Minister and during Shrimati Gandhi’s time, HON. DEPUTY SPEAKER: Okay, please ask your question.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : But my question here is relating to expansion of ICAR activities दलहन और तिलहन के बारे में आपने कहा। एक जामनगर में नेशनल इंस्टीटय़ूट है ग्राउंडनट का and in pulses there is a national institute in Kanpur. Are you going to expand, especially, in areas where more areas are getting drought-affected like in Odisha?इसका अलग अलग इंस्टीटय़ूट एक्सपैंड करने के लिए कुछ कर रहे हैं या नहीं?
एक और बात है जो शायद आप कलैक्ट कर सकते हैं, I would have been happy if other Ministers would have participated in this deliberation. केसीसी की दिक्कत हमारे देश में आ रही है। के.सी.सी. की दिक्कत है कि अगर कोई फार्मर 30,000, 40,000 या कुछ लोन ले लेता है, जब तक वह उसे वापस नहीं करता, he is not able to get any other benefit, which one is supposed to get in KCC. इसका आप संग्रह कर लीजिए कि के.सी.सी. के हमारे देश में कितने डिफंक्ट कार्ड्स हैं, जिसकी हमारे एग्रीकल्चरिस्ट्स को सुविधा नहीं मिल रही है।
SHRI P. KARUNAKARAN (KASARGOD): The hon. Minister mentioned about the introduction of Soil Health Cards, which is a good thing. I myself have participated in one such programme in my district. At the same time, the work is being done at the primary level. How is the Government going to implement it at the grass-roots level? My suggestion is that Panchayats should also be included in this.
SHRI B. VINOD KUMAR (KARIMNAGAR): Sir, the Minister made a detailed reply, but he has forgotten to clarify two important issues. One is with regard to the drought relief sought by the States. My State of Telangana has requested for a relief of Rs. 2,000 crore in order to take care of the input subsidy for the farmers, cattle fodder and also for drinking water.
Secondly, the Government has increased the MSP of cotton by Rs. 50 only. The MSP of cotton last year was Rs. 4,050. They have increased it only by Rs. 50 this year. We requested the Government to increase the MSP of cotton price to Rs. 5,000. I would like to know whether the Government is taking any steps to increase the MSP of cotton.
श्री हुकुम सिंह (कैराना) : माननीय कृषि मंत्री जी ने बहुत प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखी है। मेरी एक जिज्ञासा है, आपने मार्केटिंग को डैवलप करने की बात कही है। मैं उत्तर प्रदेश के अनुभव के आधार पर आपसे कह रहा हूं, जितनी मार्केटिंग मंडियां डैवलप की गई थीं, उनमें से 90 प्रतिशत खाली, डैजर्टिड पड़ी हुई हैं। उनमें काम नहीं होता है, आप कैसे मार्केटिंग को डैवलप करेंगे और उसमें एक्टिविटी को डैवलप करेंगे, यह बात आनी चाहिए। खाली स्ट्रक्चर बनाने से काम नहीं चलेगा, वहां वायब्रेशन होनी चाहिए, मार्केटिंग एक्टिविटी होनी चाहिए। उसके ऊपर आप बताइये।
श्री राधा मोहन सिंह: महोदय, दो विषय बड़े महत्वपूर्ण हैं, एक मार्केटिंग का और एक बीमे का।
SHRI SATYAPAL SINGH (SAMBHAL): Sir, I wish to seek one clarification.
HON. DEPUTY-SPEAKER: We have to take up the Private Members’ Business.
श्री राधा मोहन सिंह: मैं आगे इधर आऊंगा। महोदय, मैंने बताया कि बीमे के अन्दर जो विसंगति है कि किसान को प्रीमियम ज्यादा देना पड़ता है, समय पर भुगतान नहीं होता है और एक दूसरी जो गड़बड़ी है, जिसकी मैंने उस समय चर्चा नहीं की थी, गुजरात, बिहार, महाराष्ट्र कई ऐसे इलाके हैं कि किसी पंचायत का एरिया यदि 400 एकड़ है और बीमा 500 एकड़ का हुआ है, बहुत सारी विसंगतियां हैं, हम उन सारी विसंगतियों में नहीं जाएंगे, लेकिन कुल मिलाकर किसान को प्रीमियम कम और समय पर भुगतान नहीं, इससे राहत उसको कैसे मिले, हम नई बीमा योजना में इसकी व्यवस्था जरूर कर रहे हैं और वितरण प्रणाली जो हो, वह पारदर्शी हो।...(व्यवधान)मोबाइल एप का प्रयोग करें। … (Interruptions)
बीमे में वितरण जो होता है, इसमें राज्य सरकार की मशीनरी है, वह करती है। हमने राज्यों से जानकारी ली और सबसे अन्तिम सम्मेलन हमने तीन महीने पहले भोपाल में किया। देश भर के ऐसे हितधारकों को बुलाया, जानकारों को बुलाया और खुद वहां के मुख्यमंत्री जी थे, उसके पहले हमने राज्यों के मंत्रियों को बुलाया था, सचिवों को बुलाया था, वैबसाइट से लोगों से जानकारी ली थी। हम पूरी समीक्षा कर चुके हैं और अब हम अन्तिम रूप से उसको निकट भविष्य में ही लाने वाले हैं।
मार्केटिंग के विषय में बिहार और केरल में तो यह व्यवस्था है नहीं, यू.पी., हरियाणा और पंजाब इससे सहमत नहीं हैं। माननीय सदस्य ने जो सवाल उठाया है, सारे देश के कृषि मंत्री और मार्केटिंग के ऑफिसर्स हम बैंगलौर गये थे और वहां लगभग उससे 50 मार्केट्स को जोड़ा गया था। उस समय हमने पैसा सरकार को नहीं दिया था, लेकिन अब हम अन्य राज्यों को दे रहे हैं। एक मार्केट के अन्दर ई-मार्केटिंग की व्यवस्था है, आई.टी. की व्यवस्था है, कम्प्यूटराइज्ड मार्केटिंग, इसमें उस राज्य के अन्दर के अन्य मार्केट्स में जो कीमत है, वह भी आये। एक ही प्रकार के नियम उस राज्य के सभी बाज़ारों में लागू हों। एक मार्केट में अलग नियम है और दूसरे में अलग नियम हैं। राज्य सरकारों से बात करते-करते यह एक साल के अंदर तैयार हो गया। एक राज्य ने उसे लागू कर दिया। बाकी राज्य भी उसको करने में लगे हैं। जिस दिन आठ-दस राज्यों में 200-250 मार्केट इस स्टेज में आ जाएंगे कि राज्यों के अंदर एक मार्केट से दूसरे मार्केट के बीच में उनके बॉर्डर को हटा देंगे, तो हम भी उन राज्यों के बॉर्डर को समाप्त करके उनका एक सॉफ्टवेयर विकसित करेंगे और उससे पूरे देश के मार्केट को जोड़ेंगे।
मेरा एक विषय छूट गया था। यह जो सहायता की बात है, तो हमने सहायता के नॉर्म्स बढ़ाए हैं। मैंने उस दिन कर्नाटक को जो हमने राशि दी है, उसके बारे में बताया, तो यह कहा गया कि मंत्री जी अपना सीना तान कर बोल रहे हैं कि उन्होंने कर्नाटक को 40औ सहायता दी है। जितना डिमांड किया गया, उसकी 40औ सहायता हमने दी है। सभी राज्यों ने डिमांड की थी। हमने कर्नाटक को 40औ दिया, तो मुझे यह कहा गया कि मंत्री जी सीना तान कर कह रहे हैं कि उन्होंने 40औ दिया। मैं आपको बताना चाहता हूं कि उसके पहले उसी कर्नाटक में पांच बार सूखा आया, और कर्नाटक ने जो डिमांड किया, वह था एक लाख करोड़ रुपए का, और उसे दिया गया मात्र सात हजार करोड़ रुपए। इसका मतलब उसे मात्र सात प्रतिशत दिया गया। हमने उन्हें 40औ दिया। हम विश्वास दिलाना चाहते हैं कि सभी राज्यों से जो डिमांड आए हैं, तो पहले की सरकार जिस डिमांड की सात प्रतिशत राशि देती थी, हम उससे दोगुना, चार गुणा सहायता देने की स्थिति में हैं।...(व्यवधान)
महोदय, माननीय सदस्य की बात महत्वपूर्ण है। वितरण प्रणाली, जो राज्य के अंदर है, उस पर मेरा नियंत्रण नहीं है। लेकिन, अगर आप उसके संबंध में कोई शिकायत देंगे तो मैं उसे दिखवाऊंगा।
महताब जी का बहुत अच्छा सुझाव था और मैं समझता हूं कि हम उस पर गंभीरता से विचार करेंगे। दलहन, तिलहन के विषय में इस साल हमने तय किया है कि 300 कृषि विज्ञान केन्द्रों में दलहन और 200 कृषि विज्ञान केन्द्रों में तिलहन किया जाएगा। उन्होंने जो सुझाव रखा है, उसके संबंध में मैं जनवरी महीने में आपके साथ चलूंगा और अपने अधिकारियों को भी ले चलूंगा। यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण विषय है और इस पर विचार किया जाएगा।...(व्यवधान)
HON. DEPUTY SPEAKER: That is over. You go and meet the Minister. Now we are taking Private Members’ Business. We have already exceeded the time. I cannot extend it further.