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Lok Sabha Debates

Discussion On The Motion Of Thanks On The President’S Address To Both Houses Of ... on 13 March, 2012

> Title: Discussion on the Motion of Thanks on the President’s Address to both Houses of Parliament assembled together on 12.03.2012 moved by Dr. Girija Vyas and seconded by Dr. Shashi Tharoor.

 

MADAM SPEAKER: Hon. Members, before we take up the next item of business, that is Motion of Thanks on the President’s Address, I have an announcement to make.

          You are aware that as per the established procedure, amendments to the Motion of Thanks on the President’s Address are moved after the Seconder to the motion has concluded his speech. In this regard an announcement requesting the Members to hand over at the Table slips indicating the serial numbers of the amendments to be moved by Members is made immediately after the speech of the Seconder.

          It was brought to my notice that approximately 2000 amendments were tabled by 1515 hours on 12th March, 2012. Hon. Members would appreciate that it was not possible to process such a large number of amendments, get them printed and circulated to the Members by today morning. I, therefore, discussed this issue with the Members of the Business Advisory Committee at their meeting held yesterday. It was decided in the BAC that notices of all amendments which would be tabled by 11 a.m. today would be considered.

          I may inform the House that 2667 amendments in all have been received till 11 a.m. today. All these amendments are being processed, and will be printed and circulated to the Members in due course. Members whose amendments are admitted and circulated would be permitted to move them on 14th March, 2012 when further discussion on the Motion of Thanks will be resumed.

          Now, Dr. Girija Vyas.

डॉ. गिरिजा व्यास (चित्तौड़गढ़):महोदया, धन्यवाद। मैं प्रस्ताव करती हूं-

“कि राष्ट्रपति की सेवा में निम्नलिखित शब्दों में एक समावेदन प्रस्तुत किया जाएः-

           ‘कि इस सत्र में समवेत लोक सभा के सदस्य राष्ट्रपति के उस अभिभाषण के                      लिए, जो उन्होंने 12 मार्च, 2012 को एक साथ समवेत संसद की दोनों सभाओं  के समक्ष देने की कृपा की है, उनके अत्यंत आभारी हैं’।”             महोदया, राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर अपनी पूरी चर्चा करने से पहले मैं लब्बोलहद में निश्चित तौर पर राष्ट्रपति जी के उस संक्षिप्त स्वरूप की व्याख्या करना चाहती हूं, जिसमें उन्होंने इस बात को स्वीकार किया, इस बात को दर्शाया और इस बात के लिए जिसके लिए हम सभी लोग एक-साथ उद्वेलित भी थे कि पिछला वर्ष न केवल भारत के लिए बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत के लिए भी उथल-पुथलपूर्ण और चुनौतियों भरा रहा। किन्तु इस देश को प्रधानमंत्री के रूप में एक ऐसे व्यक्ति का आशीर्वाद मिला है, जो राष्ट्र की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध है। मैं धन्यवाद देना चाहती हूं हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी जी को जिनके संवेदनशील व्यक्तित्व से हम वह कुछ कर पाये, जो अन्यथा असंभव होता। एक संवेदनशीलता के पंख के साथ हमने उन चुनौतियों का सामना किया है।  

          महोदया, मुझे यह कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस ने हमेशा वे नेता दिये, जिन नेताओं ने दूरदर्शिता के साथ इस देश की सेवा की। मैं यहां पर आदरणीय प्रणब मुखर्जी साहब का भी जिक्र करना चाहूंगी कि आर्थिक मंदी के और विशेषकर यूरो आर्थिक मंदी के बाद जो देश पर प्रभाव पड़ा, उसके बावजूद भी इंक्लूजिव ग्रोथ जारी रखी और जारी रखेंगे। मैं इतना ही कह सकती हूं कि जो हमारे पूर्ववर्ती नेताओं में गुण थे, ये गुण हमारे प्रधानमंत्री जी, आदरणीय यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी जी में विशेष रूप से हैं। मैं अल्लामा इकबाल को यहां पर उद्धृत करना चाहूंगी। निगाह बुलन्द, सुखन दिलनवाज जान पुरसोज- यही है रख्त-ए-सफर मीर-ए-कारवां के लिए।          एक ऐसी दृष्टि जो भविष्य की ओर देखती है, एक ऐसी वाणी जो लोगों के दिलों को छू जाती है, एक ऊर्जा और सहिष्णुता से पूर्ण व्यक्तित्व - ये नेता के गुण हैं, ये कारवाँ को आगे चलाने के गुण हैं और यही कारण है कि हम अनेक कठिनाइयों के बावजूद अनेक मुसीबतों को पार करते हुए अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

          महोदया,  मैं महामहिम राष्ट्रपति जी को फिर से अपना धन्यवाद अर्पित करना चाहती हूँ। राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव एक ऐसी जीवंत परंपरा है जो सदन के सभी सदस्यों और राजनीतिक दलों द्वारा पारित किया जाता है। इसमें विपक्ष द्वारा कट मोशन्स भी आते हैं, हमारे द्वारा कुछ सुझाव भी आते हैं और इसको आवश्यक रूप से पारित करने की विशेषता भी है। मैं इसमें शर्त शब्द का उपयोग नहीं करूँगी, इसीलिए इस गरिमा को बनाए रखना हमारा परम कर्तव्य है। अभिभाषण के दौरान गरिमा को बनाए रखना हमारा दायित्व है और आज मैं यह कहने को बाध्य हूँ कि कहीं न कहीं हमें सैल्फ रेगुलेशन के गुण का प्रयोग अपने आप पर करना चाहिए। कल माननीय सदस्यों ने अभिभाषण के दौरान जो विषय उठाए, मैं यह नहीं कहती वे मौज़ू नहीं थे। निश्चित तौर पर उनमें से बहुत से ऐसे विषय थे जिन पर चर्चा की जानी चाहिए थी लेकिन उस समय उन पर चर्चा का न कोई औचित्य था और न समय था। इसलिए मैं निवेदन करना चाहूँगी कि चूँकि समय सटीक नहीं था, इसलिए हम ऐसे विषयों को सदन में उठाएँ और राष्ट्रपति जी के अभिभाषण की गरिमा को नहीं तोड़ें।

          पिछला वर्ष अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है। हमें अपने संसदीय जनतंत्र पर गर्व है और इसे बनाए रखने का दायित्व भी हमारे ऊपर है। किन्तु संसदीय जनतंत्र की जो मूल भावना और उद्देश्य है, हमें उसे नहीं भूलना चाहिए। सदन का कार्य कानून बनाना है, व्यक्ति और संस्था सदन के ऊपर नहीं हैं। कुछ माननीय सदस्यों द्वारा जो बातें उठाई गईं, इस चुनौती को सभी राजनीतिक दलों ने समझा और इस गरिमा को खंडित न होने के लिए जो पहल की, मैं आपके माध्यम से संपूर्ण सदन को इसके लिए धन्यवाद देना चाहती हूँ।

          महोदया, यह संसदीय प्रजातंत्र हमें मुफ्त में नहीं मिला है। बहुत मशक्क्त और बलिदान के बाद हमें यह हासिल हुआ है। पाकिस्तान, भारत और बंग्लादेश में संसदीय व्यवस्था है, परंतु भारत में अकेले संसदीय जनतंत्र का न सिर्फ अक्षरशः, बल्कि उसकी भावना के अनुरूप भी पालन किया है। यह संस्कृति, यह भावना, यह सोच, यह परंपरा और यह व्यवहार जनतंत्र की हृदय और आत्मा हैं न कि केवल कानून और नियम।  संसद एक ऐसी संस्था है जिसकी भूमिका है कानून पारित करना, खुलकर कानून पर डिसकशन करना, आस-पास के वातावरण पर डिसकशन करना, शालीन इच्छा के अनुरूप कानून को बनाकर जनता के द्वारा जनता के लिए सबसे बड़ा जांच आयोग तक बनाना इसके कार्य हैं। परंतु पिछले कुछ वर्षों के दौरान संसदीय जनतंत्र पर अनेक खतरे उत्पन्न हुए हैं। हम लोगों का महत्वपूर्ण दायित्व है, जिसकी ओर कल महामहिम ने इशारा भी किया कि हम इसकी कमियों और खामियों का पता लगाएँ और उन्हें दूर करने का प्रयास करें।

          महोदया, संसदीय जनतंत्र पर जो स्पष्ट और बड़ा खतरा है, वह संसद की कार्रवाई को न चलने देना है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम सब अपनी गरिमा को समझते हैं और इसीलिए मैंने पहले इस मुद्दे को उठाया कि ढाई वर्ष बीत चुके हैं, ढाई वर्ष और हैं। हमारे पास बहुत मुद्दे हैं। एक तरफ आर्थिक मंदी से लड़ना है, आर्थिक इंक्लूसिव ग्रोथ देना है। हमें लोगों की भावनाओं के अनुरूप उतरकर आम जनता की सेवा करनी है। हमें अनेक ऐसे बिल लाने हैं जिनकी ओर कल संकेत किया गया और जो पाँच आयाम माननीय राष्ट्रपति जी ने दिये, ऐसे में संसद की कार्रवाई चले, मैं सबसे यह निवेदन करना चाहती हूँ।

          महोदया, हमारे आसपास के क्षेत्रों में इसी अवधि में औपनिवेशिक सत्ता से मुक्त देशों में से कोई भी जनतांत्रिक ढाँचा कायम करने में समर्थ नहीं रहा।  

यह कांग्रेस नेतृत्व का दृढ़ संकल्प तथा भारतीय लोगों के द्वारा उसके प्रति कायम आस्था का ही परिणाम है, जिससे हम आज दुनिया का सबसे बड़ा जनतांत्रिक देश बन सके हैं। हमारी सिर्फ जनतंत्र बनने के प्रति ही प्रतिबद्धता नहीं रही है, बल्कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने की प्रतिबद्धता भी रही है। इस देश को नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संविधान निर्माताओं ने एक ऐसा संविधान हमें दिया, जो हमारे जनतंत्र की सफलता का मूल मंत्र है। संविधान निर्माताओं ने प्रशासन को तीन स्वतंत्र स्तम्भों में बांटा कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका। ये स्वतंत्र हैं, फिर भी एक-दूसरे पर अंकुश बनाए हुए हैं। इनमें से कोई भी व्यक्ति उस संगठन से बड़ा नहीं है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। मैं फिर कैटगरिकली कहना चाहती हूं कि व्यक्ति को संसद के ऊपर कहना देश और संविधान के प्रति सम्मान की भावना एवं उसकी समझ की कमी को प्रदर्शित करना है, जो हम सब को प्रिय है। आएं, हम सब फिर भारत के निर्माण में अपना योगदान दें और जो आशा हमारी राष्ट्रपति जी ने व्यक्त की है, उसको पूरा करें।

          महोदया, देश के सामने बहुत चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा मिटाना और सभी को फ़ायदेमंद रोज़ग़ार मुहैया कराना, जिसे कि लिवलीहुड सिक्योरिटी के रूप में कल माननीय राष्ट्रपति जी ने रखा। दूसरा है, आर्थिक सुरक्षा, तीसरा है ऊर्जा की सुरक्षा, फिर है पर्यावरण की सुरक्षा और फिर आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाना।

          महोदया, पिछला वर्ष, मैंने जैसे कहा कि उथल-पुथल का वर्ष रहा। हमने आर्थिक मंदी भी देखी, आतंक का जोर भी देखा। हमने कुछ राष्ट्रों में राजनैतिक उथल-पुथल जो दूरदराज़ में पहुंची, वह भी देखी। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। लेकिन भारत एक परिपक्व जनतंत्र के रूप में उभरकर के और सामने आया है। प्रजातंत्र के प्रति निश्चिंतता इस बात को लेकर है कि हमारे पांच राज्यों में चुनाव हुए और जनता जनार्दन ने इस परिपक्व प्रजातंत्र का इशारा देते हुए शांतिपूर्ण ढंग से अच्छे मतदान के साथ इस चुनाव की प्रक्रिया को पूरा किया। मैं यहां पर युवा शक्ति को प्रणाम करते हुए राहुल जी की एक बात को कोट करना चाहूंगी कि परिवर्तनशील जगत है। परिवर्तन आता है। वक्त के साथ बदलना पड़ता है। हमारी दुनिया में जो कुछ हो रहा है, वह परिवर्तन है। यह हमेशा सच्चाई रहेगी। परिवर्तन यथास्थिति को चुनौती देना है और मैं सोचती हूं कि यह चुनौती दी गई। मैं जो भी सरकारें बनी हैं, उनको बधाई देना चाहती हूं और यह कहना चाहती हूं कि कांग्रेस वह पार्टी है, जिसने देश को प्रजातंत्र दिया है। जिसने आज़ादी की जंग में अनेक कुर्बानी दी है। इसलिए हम लोग चुनाव केवल जीतने या हारने के लिए नहीं लड़ते हैं। हम चुनाव लड़ते हैं आम जनता की सेवा के लिए। जब जनता हमें वोट देकर शासन के लिए बैठाती है तो प्रतिबद्धता के साथ हम जनता की सेवा में लग जाते हैं। हमारा न दिन होता है, न रात होती है और हम किस प्रकार से आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक उन्नति कर सकें, समानता पैदा कर सकें। संविधान के अनुरूप इस भारत को बना सकें। इसका प्रयास करते हैं और जब चुनाव हारते हैं, तब भी, जैसा गीता में कहा है, न कोई अधिक शोक होता है और न कोई अधिक आनंद होता है। हम इस हार को स्वीकार करते हैं। और एक प्रतिपक्ष की भूमिका के रूप में जिसकी सकारात्मक भूमिका हो, उसमें हम अपना सहयोग देते हैं। फिर खड़े होते हैं जनता जनार्दन की सेवा के लिए। इसलिए इन चुनाव के परिणाम न हमें अधिक निराश करते हैं न अधिक प्रसन्न करते हैं। लेकिन चुनाव के परिणाम ने भी दो राज्यों में हमें शासन बनाने का मौका दिया। बाकी जगह भी शासन बने हैं। मैं सब के लिए यहां शुभकामनाएं प्रेषित करना चाहती हूं।

          पिछले सत्र के दौरान मैंने कहा कि बहुत कुछ घटा है और मुझे यहां पर यह बात याद आती है। यहां यह ज़िक्र करने की मेरी कोई मंशा भी नहीं थी, लेकिन जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी पहले केवल दो मुंही बात करके रह जाती थी। लेकिन पिछले वर्ष में उन्होंने अपना मुखौटा इस देश के सामने पेश किया, मैं सोचती हूं कि उस पर थोड़ी सी चर्चा अवश्य होनी चाहिए।

आज विषय भी नहीं है, लेकिन जब मुझे मौका मिला, आप लोगों को सुनना चाहिए और जब आपका मौका आए तो आप लोगों को भी कहना चाहिए।

          मैं प्रजातंत्र की बात कर रही हूं और प्रजातंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को किसी भी राज्य में जीतने का अधिकार है। जनता जिसे वोट देती है, वह जीत कर आए, इस बात का अधिकार है। भारतीय जनता पार्टी की भी सरकारें दूसरे राज्यों में है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन आपका जो चेहरा सामने आया है, उस चेहरे पर निश्चित तौर पर आज देश उंगलियां उठा रहा है। मैं कहां-कहां की बात करूं? उत्तर प्रदेश में तो आप लोगों ने बसपा से निकाले गए भ्रष्ट नेताओं को भाजपा में शामिल करके एक उदाहरण दिया है। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER:  Nothing will go on record.

… (Interruptions)

डॉ. गिरिजा व्यास :...( व्यवधान) सुनने की कवायद रखिए। उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार का जो नंगा नाच हुआ, उसका परिणाम आपने मुख्यमंत्री बदलकर दिया। लेकिन, उसका भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोगों की जब बारी आएगी, अपनी बारी के समय बोलिएगा। बैठ जाइए। उनको बोलने दीजिए।

...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :कर्नाटक में भ्रष्टाचार की अति हो गयी। ...( व्यवधान) आप सुन लीजिए। क्या इस बात का कोई जवाब है कि जब आपके सदस्य विधानसभा में अश्लील फिल्में देखना शुरू कर दें तो उस समय इस प्रजातंत्र के पास क्या शेष रह जाता है? ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग खड़े न हों। आप बैठ जाइए।

...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :मुझे मालूम हुआ है कि जिस मीडिया ने उन अश्लील फिल्मों को देखते हुए दिखाया, उनके खिलाफ़ कार्रवाई की पहल हो रही है। मैं सोचती हूं कि यह भ्रष्टाचार की अति है ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए। जब आपकी बारी आएगी, आप भी बोलिएगा।

...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :आपका राज्य मध्य प्रदेश में है। ...( व्यवधान) माननीय राष्ट्रपति जी ने इस बात का जिक्र्ा़E किया कि हमें माइन्स के लिए जल्दी से कानून लाना पड़ेगा। इसे लाना चाहिए और ला रहे हैं। लेकिन, मध्य प्रदेश में जिस प्रकार से माइन्स माफिया डेवलप हुए हैं और जिस प्रकार से एक पुलिस ऑफीसर की हत्या कर दी गयी, मैं सोचती हूं इससे बड़ी बात और कहीं पर नहीं हो सकती। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए। जब आपकी बारी आएगी, तब बोलिएगा।

...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER:  Nothing else will go on record.

… (Interruptions)

डॉ. गिरिजा व्यास :इसी के साथ-साथ मैं आपसे निवेदन करना चाहती हूं कि हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं, लेकिन ... * तो लोकायुक्त के गठन के खिलाफ़ कोर्ट में भी चले गए। ...( व्यवधान) महोदया, मैं उनका नाम वापस लेती हूं। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : उन्होंने नाम वापस ले लिया है।

...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री लोकायुक्त का गठन नहीं करता और वहां के राज्यपाल उसका गठन कर देते हैं तो वे इसके खिलाफ़ कोर्ट में चले जाते हैं तो हम प्रजातंत्र की रक्षा कैसे कर पाएंगे? ...( व्यवधान) सच को सुनने की ताकत रखनी चाहिए। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बैठिए। बैठ जाइए।

...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :मैंने उनका नाम वापस ले लिया है। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER:  Will you sit down? 

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : ठीक है, उन्होंने जो भी नाम लिया था, उन्होंने विथड्रॉ कर लिया।

...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :महोदया, मैं सिर्फ़ इसलिए कह रही हूं कि प्रजातंत्र ने जो हमें दायित्व दिया है, प्रजातंत्र ने हमें जो शासन करने की कूवत दी है, निश्चित तौर पर सभी राजनीतिक दलों को शासन करने का अधिकार है। लेकिन, जहां-जहां पर भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, उनका चेहरा सामने आ गया। उन्हें न प्रजातंत्र की चिंता है, न उन्हें सेकुलरिज्म की चिंता है, न उन्हें और किसी बात की चिंता है और न ही उन्हें देश की चिंता है। ...( व्यवधान) ख़ैर, मैं राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर आ रही हूं।  ...( व्यवधान)

          अध्यक्ष महोदया, 1991 से ही आर्थिक सुधारों ने एक लम्बी छलांग लगाई। लिब्रलाइजेशन की आंधी इंडस्ट्री, व्यापार और आर्थिक क्षेत्रों में भरपूर रूप से आई। सुधार के इस द्वार में हमारा उद्देश्य उच्च आर्थिक दर हासिल करना है एवं इस विकास को इन्क्लुसिव ग्रोथ में तब्दील करना, सरकार का उद्देश्य आम आदमी को समुन्नत करना है, विशेषकर गरीब को।

          अघ्यक्ष महोदया, पिछले करीब आठ सालों में केन्द्र की यूपीए सरकार ने देश की मजबूती एवं प्रगति के लिए अनेक कदम उठाए हैं। हमारी आर्थिक विकास की रफ्तार तेज रही है। इसी वजह से हमें जो संसाधन हासिल हुए, उन्हें सामाजिक क्षेत्र में बड़े कार्यक्रम में लगाया है। हमने शिक्षा, चिकित्सा, लोगों को लोन देने में, कृषि को उन्नत करने में उन संसाधनों को लगाया है। आम आदमी और कमजोर वर्ग को राहत मिल सके, इस बात की कोशिश की है। 11वें प्लान का उद्देश्य तीव्र इन्क्लुसिव ग्रोथ था। प्रत्येक वर्ष का लक्ष्य नौ प्रतिशत आर्थिक दर रखा गया। पिछला वर्ष भी ठीक रहा, 8.2 विकास दर के साथ, लेकिन हम उसे बहुत अच्छा उत्साहवर्द्धक नहीं कह सकते।

          अध्यक्ष महोदया, मैं प्रधानमंत्री जी के शब्द यहां पर कोट करना चाहूंगी, जो उन्होंने कहे थे। इन दिनों विश्व की अर्थव्यवस्था में बहुत मंदी आई है। युरोप के देशों में आर्थिक हालात ठीक न होने के कारण विश्वभर में उसका असर पड़ रहा है। मध्य पूर्व, मिडल ईस्ट के कई देशों में राजनैतिक अस्थिरता बनी हुई है, लेकिन इन कठिन परिस्थितियों में केवल यूपीए सरकार ही कार्य कर सकती है और यूपीए सरकार अपने कार्य को कर रही है। नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल में 56वें सैशन के, जब 12वें प्लान का डिसकशन एप्रोच पेपर रखा जा रहा था, उस समय प्रधानमंत्री जी ने चार उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए बात कही थी। उसमें एक तो पॉलिसी एनवायरमेंट था, जिससे कि जनता को लाभ मिल सके। दूसरा, सरकार ग्रामीण और शहरी इफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एवं इन्क्लुसिव ग्रोथ बहुत कुछ करे। तीसरा, सरकार को आजीविका के स्पेशल कार्यक्रम देने होंगे। चौथा, शिक्षा, चिकित्सा, शुद्ध पानी, सेनिटेशन और स्कील डेवलपमेंट के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी होगी। ...( व्यवधान) आर्थिक स्तर पर हम मजबूत हैं। ...( व्यवधान) लेकिन भारत में आप मत भूलिए, आज इस वैश्विक आर्थिक मंदी के बावजूद भी युरोप के चार देश, जिसमें भारत है ब्रिक्स, अपनी पहचान बनाए हुए हैं। ...( व्यवधान) इसलिए मैंने कहा कि जब हमें मौका मिलता है, हम अपने पूरे कार्य को करते हैं। ...( व्यवधान)

          अध्यक्ष महोदया, माननीय प्रणब मुखर्जी जी यहां पर विराजे हुए हैं, इसी सदन में उन्होंने एक कम्पेरिज़न पेश किया था कि इन पिछले छ: सालों में और उसके पिछले छ: सालों में हमारी आर्थिक दर क्या थी। उसका सार यह था कि इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद भी हम इन छ: सालों में 8.5 पर रहे। ...( व्यवधान) इतनी मंदी के बावजूद भी आज सात प्रतिशत पर हैं।...( व्यवधान)

श्री विलास मुत्तेमवार (नागपुर):जब आपकी टर्न आएगी, तब आप बोलिए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :आपको मेरी बात सुननी पड़ेगी।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: जब आपकी बारी आएगी, तब आप बोल लीजिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing would go on record.

(Interruptions) … * डॉ. गिरिजा व्यास :विकास की बात जो माननीय राष्ट्रपति जी ने कही थी।...( व्यवधान)

          मैडम, मुझे संरक्षण चाहिए, मुझे हाउस में धमकाया जा रहा है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

डॉ. गिरिजा व्यास :अध्यक्ष महोदया, मैं यहां पर प्रणब मुखर्जी साहब को कोट करना चाहूंगी, जिन्होंने कहा था -

“To me growth is just not merely a statistical satisfaction.   To me growth means empowerment to the Government.”   फिर उन्होंने इसी बात पर कहा था कि यही कारण है कि जब विकास होता है, तो हम उसका कुछ दे पाते हैं।  65 हजार करोड़ रूपए का जो बेनीफिट किसानों को मिला, वह हमारी इस ग्रोथ का ही परिणाम था।  इसको सुनने की हिम्मत आप लोगों को रखनी पड़ेगी। ...( व्यवधान) हायर ग्रोथ का मतलब है कि ज्यादा इंप्लायमेंट ग्रो करना या उसकी व्यवस्था करना और हमारी सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है। ...( व्यवधान) इसलिए जो स्ट्रंग फंडामेंटलिज्म हमारी इकानॉमी का है, वह आधार हमारी इन्क्लूजिव ग्रोथ है।

          इंडिया ने मैन्युफैक्चर सेक्टर में अपना बहुत नाम कमाया है।  ऑटोमोबाइल में हम लोग बहुत आगे बढ़े हैं।  इसके साथ ही फार्मास्युटिकल, टेक्सटाइल, स्टील, आईटी, आदि ये सब हमारी जीडीपी के ग्रोथ के साथ-साथ आगे बढ़े हैं। ...( व्यवधान) मैं यह निवेदन करना चाहती हूं कि वर्ष 1991 के बाद जो भी सरकारें रहीं, हम उनके प्रति अपना आदर दर्शाते हैं कि उन्होंने इस ग्रोथ को और हमारे इस कांसेप्ट को कायम रखा और उसी के कारण हम लोग उस ग्रोथ को कायम रखने में और आगे बढ़ने में कामयाब हो रहे हैं।  लेकिन यूपीए की सरकार ने जो ह्यूमन फेस दिया, जो मानवीय चेहरा इन्क्लूजिव ग्रोथ के नाते दिया, मैं समझती हूं कि उतना दूसरे नहीं दे पाए।  हम राज्यों के प्रति भी आभारी हैं कि राज्यों ने इस ग्रोथ में अपना हिस्सा लिया और उनकी भी ग्रोथ बढ़ी है।  मैं सभी राज्यों को भी धन्यवाद देना चाहती हूं। ...( व्यवधान) लेकिन यूपीए की सरकार का आधार जैसा मैंने कहा कि एक तरफ हमारा इकानॉमिकल डेवलपमेंट है तो दूसरी तरफ इन्क्लूजिव ग्रोथ और फ्लैगशिप प्रोग्राम का मैं यहां जिक्र करना चाहूंगी, जो आने वाली बारहवीं योजना का आधार है, चाहे मनरेगा हो, इंदिरा आवास योजना हो, नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम हो, पीएमजी से एसएमआई हो, आईसीडीएस हो, एनआरएचएम हो, मिड-डे-मील हो, जेएनएनयूआरएम हो, सर्व शिक्षा अभियान हो, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युत योजना हो, राजीव गांधी ड्रिंकिंग वाटर मिशन हो और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, मैं इसका जिक्र स्पेशल तौर इसलिए करना चाहती हूं कि राज्यों को भी इससे काफी मदद मिलेगी।  ये सारे प्रोग्राम्स सेंट्रली स्पांसर्ड हैं, लेकिन राज्य सरकारें इस पर पूरा ध्यान नहीं दे पातीं।  

          देश में अभी भी व्यापक गरीबी है, जिसका जिक्र और चिंता कल राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में की कि देश में जो व्याप्त गरीबी है, उसका सार्थक समाधान तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के ढांचे के बल पर ही निकाला जा सकता है।  इन्क्लूजिव ग्रोथ का आवश्यक तत्व गरीबी दूर करना है, बचत व निवेश वृद्धि की दर कायम रखने में कामयाब होना है।  मैं निवेदन करना चाहती हं कि निश्चित तौर पर वर्ष 2010-11 और थोड़ा सा जो हमारा उत्तरार्द्ध है, वह ग्रोथ की दृष्टि से थोड़ा पिछड़ा है, यूरोक्राइसिस इसका मूल आधार था।  जी-20 की फाइनेंस मिनिस्टर्स की काफ्रेंस में, प्रणब मुखर्जी साहब जब कहेंगे, तब उसमें इसका जिक्र करेंगे, लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि उन्होंने घोषित किया कि किन्हीं भी राज्यों में आर्थिक मंदी से लड़ना है तो दो चीजें करनी होंगी, मार्केट में पैसा हो और दूसरी बात यह है कि इंट्रेस्ट रेट कम हों।  सरकार ने दोनों का प्रयास किया।  

          जहां तक ब्रिक्स कंट्रीज का सवाल है, इन ब्रिक्स कंट्रीज ने जो अपनी छाप छोड़ी, तो हमारी वार्षिक दर में थोड़ी कमी हुयी।  हम आज सात प्रतिशत पर हैं, आने वाले सालों में कोई बहुत बुरा समय नहीं है।  लेकिन मैं यहां पर कहना चाहूंगी कि ब्राजील 8 से 6 प्रतिशत पर पहुंचा है, चाइना 12 से 9 प्रतिशत पर पहुंचा है, साउथ अफ्रीका 7.5 से 5.5 प्रतिशत पर पहुंचा है और 8.5 से 7.1 प्रतिशत पर हम लोग पहुंचे हैं, आगे 9 प्रतिशत तक का हमारा उद्देश्य है।  अमेरिका, कनाडा, जापान की बात करें, तो वहां पर जो आर्थिक दर है, वह अपने आप से पूछ लीजिए, 1.2, 2.2 और 3 प्रतिशत से आगे वहां नहीं पहुंच पा रही है।  जहां पर सर्विस टैक्स भी नहीं हो, जहां पर हमें सब्सिडी भी देनी हो, जहां संवेदनशीलता के साथ आम जनता के साथ रहना हो, मैं कहती हूं कि उस हालत में भी आर्थिक ग्रोथ को बनाए रखते हुए इन्क्लूजिव ग्रोथ की तरफ बढ़ना इस सरकार का एक बहुत बड़ा कार्य था।

          महोदया, हम इस के लिए आपके माध्यम से प्रधानमंत्री जी और उनकी सरकार को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहती हूं। यह तो अभी एक छोटे-से घुमावदार मोड़ की बात है। हम थोड़े-से आर्थिक दबाव में जरूर है लेकिन न तो हमारी  इन्क्लूसिव ग्रोथ का सपना टूटा है और न ही आर्थिक ग्रोथ का सपना टूटा है। इसे मैं शेर के माध्यम से कहना चाहूंगी                               “एक मोड़ आएगा जब सिमतें भंवर बन जाएंगी                                 इससे आगे सफर में कई पेच-ओ-खम है।” इससे ज्यादा बुरे हालात नहीं हो सकते और इस बुरे हालात में भी उबरने की जो शक्ति है वह यूपीए सरकार के अतिरिक्त और किसी में नहीं हो सकती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।

          महोदया, इन्फ्लैशन एक बहुत बड़ी समस्या है। गरीबी मिटनी चाहिए। कल माननीय राष्ट्रपति जी ने दो-तीन बातों पर विशेष जोर दिया कि इस इन्क्लूसिव ग्रोथ से हमारे ग्रोथ के कारण जो शिक्षा और चिकित्सा में जिस प्रकार की वृद्धि हुई और हमने इस इन्फ्लैशन से लड़ने का जो संसाधन और एक मात्र वेपन चुना है, वह कृषि है। इसका जिक्र आज सुबह के प्रश्नकाल में भी हुआ है। हमारी समावेशित रणनीति में शिक्षा और स्वास्थ का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अब शिक्षा का अधिकार मूर्त रूप ले चुका है। राज्य सरकारों को भरपूर पैसा मिल रहा है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं बाकी आबादी के बीच जों अंतर रखा है उसे समाप्त किया जा रहा है। बालिकाओं का अंतर भी घट रहा है। हमारे शिक्षा का मूल उद्देश्य शिक्षितों को नियोजन लायक बनाना है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  किसी की कोई बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

...( व्यवधान)* डॉ. गिरिजा व्यास : कहीं पर भी किसी राज्य के साथ या किसी राज्य के आंकड़े मंगा कर, मैं इसको चैलेंज करती हूं बल्कि राज्य सरकार के ये आंकड़े भी मंगाए जाए कि किस राज्य ने सर्वशिक्षा  पर या हमारी दी हुई - अन्य सेन्ट्रल स्कीम पर कितना प्रतिशत पैसा खर्च किया है, उसने  कितना प्रतिशत पैसा डायवर्ट किया है या अपने नाम से रखने की कोशिश की है इस बात का पता लगाना बहुत ही आवश्यक है। शिक्षा का विषय, मुझे थोड़ा-सा चिंता का विषय जरूर लगता है जिस पर माननीय प्रधानमंत्री जी ने अपनी चिंता व्यक्त की और अनेक स्थान पर हम लोग भी इस पर चिंतित हैं। प्राइवेट स्कूल्स का जो वातावरण था वह अब प्राइवेट हायर एजुकैशन की तरफ जा रहा है। स्कूल में जो गुणवत्ता होनी चाहिए उसकी तरफ हमें ध्यान देना होगा।

          मैं आपके  माध्यम से प्रधानमंत्री जी से निवेदन करूंगी कि आज नाइन्थ क्लास के बच्चे को सही ढंग से हिन्दी या अंग्रेजी में दो वाक्य लिखने नहीं आता है। हमें गुणवत्ता की तरफ ध्यान देना होगा, सरकार ने इस ओर प्रयास किया है। मैंने इस बार की रिपोर्ट देखी है इसमें काफी कुछ प्रयास किया गया है, उसी तरह से हायर एजुकेशन, जिस तरह से रिसर्च का प्रसेन्टेज घट रहा है, संपूर्ण एशिया के लिए यह चिंता का विषय है, यह संपूर्ण विश्व के लिए तो है ही क्योंकि तुंत नौकरी ने रिसर्च के सारे आयाम समाप्त कर दिए हैं। मैं सरकार को धन्यवाद देना चाहती हूं कि मैथेमैटिक्स की घटती हुई मांग को देखते हुए इस वर्ष मैथेमैटिक्स वर्ष के रूप में निर्धारित किया। हमारी सरकार को रिसर्च को और अधिक बढ़ावा देने के लिए कार्य करना होगा।

          महोदया, मैंने कहा कि इन्फ्लैशन एक बहुत बड़ी समस्या है। पिछले वर्षों में भारत और विश्व कठिन दौर से गुजरे हैं - कहीं वामपंथी, एक्सट्रीमिस्ट, आतंकवाद तो कहीं हिंसा, सूखा, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं। महामहिम राष्ट्रपति जी ने यूपीए सरकार के लिए जो पांच महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं पिछले वर्ष गिनाई उनमें मुद्रास्फीति पहले थी। अंतर्राष्ट्रीय माहौल के कारण तेल की कीमतें बढ़ती रहीं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर विश्व खाद्य की स्थिति खराब हुई है। वनस्पति तेल आदि की वैश्विक कीमतें बढ़ रही हैं जिनका हम आयात करते हैं। इन कठिनाइयों के बावजूद भी माननीय प्रधानमंत्री जी ने महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर जो पिछले वर्ष जवाब दिया था मैं उसे अवश्य क्वोट करना चाहूगी।  

           “भारतीय खाद्य निगम तथा अन्य सार्वजनिक खरीद एजेंसियों के पास पर्याप्त मात्रा में अनाज उपलब्ध है। सरकार मुद्रास्फीति पर काबू करने के लिए कृतसंकल्प है। इस वर्ष के अंत तक मुद्रास्फीति की दर गिर कर सात तक आ जाएगी।”             प्रधानमंत्री जी ने ठीक भविष्यवाणी की थी। मुद्रास्फीति की दर निश्चित रूप से 7.47 तक गिरी है और 7 तक आ गई।   उसके बाद जहां तक खाद्यान, एडिबल ऑयल की बात है, वह 8 प्रतिशत तक भी पहुंची। जहां तक होलसेल प्राइस इंडैक्स का सवाल है, दिसम्बर में इनफ्लेशन 7.47 था जो घटकर 6.55 हो गया।...( व्यवधान)

श्री अनुराग सिंह ठाकुर (हमीरपुर, हि.प्र.): अनाज सड़ रहा है।...( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास : इसलिए हम एक तरफ इस ओर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यहां इस बात को नहीं भूलना है कि महंगाई...( व्यवधान) जब आपको बोलने का मौका मिलेगा तब आप जरूर बोलिए।...( व्यवधान) सरकार ने इसके लिए जो एकमात्र उद्देश्य ढूंढा है, वह है सप्लाई रिस्पांस, एग्रीकल्चर को बढ़ावा देना। ...( व्यवधान)

श्री अनुराग सिंह ठाकुर : अनाज को चूहे खा रहे हैं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : गिरिजा जी, आप बोलिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing else will go on record.

(Interruptions) … * डॉ. गिरिजा व्यास :इस कन्सट्रेंट के दो मुख्य कारण होते हैं। सब जानते हैं कि एक डिमांड कनस्ट्रेंट होता है, दूसरा सप्लाई कनस्ट्रेंट होता है और दोनों के दौर से हमें गुजरना पड़ा। आज वैजिटेबल्स के दाम घट और बढ़ रहे हैं। दूध और अन्य चीजों के दामों में काफी उतार-चढ़ाव, मैं कहूंगी कि बढ़ोतरी की तरफ है। सरकार चिंतित है। इसीलिए सरकार ने आम आदमी और सबके लिए तीन तरह के मार्ग प्रशस्त किए हैं - इम्पोर्ट का दरवाजा खुला है, प्रोडक्शन के लिए दाल आदि के क्षेत्र, जिसमें ऑयल भी हो सके, प्रोडक्शन ज़ोन चुने हैं। यह गरीब व्यक्ति को मिल सके, इसके लिए उन्होंने गुड्स को मॉडरेट प्राइस में देने का प्रयास किया। सरकार ने प्रयास किया है कि पल्सेज़ 10 रुपये पर किलो हों, ऑयल के दाम 15 रुपये पर लिटर हों। लेकिन हमें इसे बेबाकी के साथ स्वीकार करना पड़ेगा कि डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम उतना अच्छा नहीं है। यही वजह है कि सरकार ने इस संबंध में स्टडी करने के लिए मुख्य मंत्रियों का एक ग्रुप चुना जिनकी रिपोर्ट आ चुकी है। यह विश्व आर्थिक मंदी के एक दौर से गुजर रहा है जिसमें सबकी इनफ्लेशन रेट बढ़ी है। जनवरी में जो हुआ, मैं उसके थोड़े से उदाहरण देना चाहूंगी। अर्जेंटिना में 14.7 प्रतिशत, बंगलादेश में 9.8 प्रतिशत, ब्राजील में 9.21 प्रतिशत, चीन में 11.7 प्रतिशत, इजिप्ट में 17.3 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 15.6 प्रतिशत, ईरान में 18.9 प्रतिशत, पाकिस्तान में 20.4 प्रतिशत और यूक्रेन में 30.1 प्रतिशत, यह अलग-अलग देशों के हैं। सरकार ने इससे जूझने के लिए, सबसे बड़ा जो कल राष्ट्रपति जी ने कहा, एग्रीकल्चर ज़ोन को चुना है कि जब तक हम लोग उत्पादन में आगे नहीं बढ़ेंगे, कठिनाइयां उसमें भी हैं, लेकिन जब तक हम एग्रीकल्चर के क्षेत्र में विकास दर को आगे नहीं बढ़ाएंगे, हमें गरीबी से जूझना ही पड़ेगा। सरकार ने इसके लिए कार्य करने शुरू कर दिए हैं। 60 हजार पल्स विलेजेस चुने हैं। उनसे आने वाले पांच साल में 3 लाख टन पॉम ऑयल आने की गुंजाइश है। बहुत सारी मुश्किलें हैं।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing else will go on record.

(Interruptions) … * डॉ. गिरिजा व्यास :कृषि पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव, भू-स्रोतों का बढ़ता विखंडन,...( व्यवधान) पॉम ऑयल को भी बढ़ाने के लिए,...( व्यवधान) मैंने कहा था पल्सेज़ और ऑयल, दो दृष्टि में हम इंडीपैंडैंट बनना चाहते हैं।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Dr. Girija Vyas, please address the chair.

डॉ. गिरिजा व्यास :कृषि आधारित ग्रामीण उद्योग के क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं। हम शिक्षा के क्षेत्र में, और उसके साथ आगे के क्षेत्र में भी बढ़े हैं। भ्रष्टाचार के संबंध में भी कल जिक्र हुआ। हमारी सम्पर्क सरकार द्वारा भ्रष्टाचार संबंधी समूह की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जो एकमात्र तरीका था, लोकपाल बिल इस सदन में लाया गया, यह हमारी प्रतिबद्धता थी।   कांग्रेस के बुराड़ी अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष जी ने निश्चित कर दिया था। ...( व्यवधान) इस पर हमारी सरकार लगातार कार्य करती रही। ...( व्यवधान) मुझे याद है कि भ्रष्टाचार पर जब हमारी सरकार लड़ रही थी, उस समय हमें विपक्ष से पूरी मदद नहीं मिली और हम उसे जो संवैधानिक दर्जा देना चाह रहे थे, वह नहीं दे पाये। मुझे मालूम है, ...( व्यवधान) एक शेर जो इसी सदन में कहा गया था। ...( व्यवधान) “न इधर-इधर की तू बात कर, ये बता कि कारवां क्यों लुटा, हमें राहजनों की फिक्र नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।”  लेकिन इस रहबरी का उत्तर देते हुए माननीय प्रधान मंत्री जी ने कहा था कि मेरा जीवन एक पारदर्शिता से परिपूर्ण जीवन है और मैं हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ हूं, खिलाफ रहूंगा। हमारी सरकार प्रतिबद्धता से इसके खिलाफ कार्य करती रहेगी। मैं यहां पर कहना चाहती हूं, चाहे वह मंत्रिपरिषद् के हों, चाहे दूसरे, कोटा सिस्टम या मंत्रियों को देने वाले अधिकार और उसके अतिरिक्त कल जिसका जिक्र किया गया, उसका जिक्र मैं जरूर करूंगी कि हम प्रतिबद्धता के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ बिल लाना चाहते हैं। ...( व्यवधान) The Public Interest Disclosure and Protection of Persons Making the Disclosure Bill;  the Prevention of Bribery of Foreign Public Officials and Officials of Public International Organisations Bill, Citizens Right to Grievance Redress Bill, the Judicial Standards and Accountability Bill and the Lokpal and Lokayuktas Bill. ये सब बिल इसमें शामिल हैं और हम प्रतिबद्धता के साथ इस भ्रष्टाचार  से लड़ रहे हैं। लेकिन मै सदन से निवेदन करना चाहती हूं कि यह जो लंबा, विश्व भर का फैला हुआ रोग है, वह एक दिन में मिट नहीं सकता। इसके लिए सभी का सहयोग चाहिए। इसलिए राजनैतिक दल, राज्य और केन्द्र सरकार आदि सब मिलकर इस कुरीति से या मैं कहूं कि इस अभिशाप से हमें मुक्त होना होगा। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार जो भी बिल लेकर लाये, वे बिल संसद में पारित हों।

          महोदया, पांच तत्व होते हैं -- पहला, कानून  और कानून का कड़ा होना। कानून का इम्प्लीमैंटेशन ...( व्यवधान) कानून के लिए सिविल सोसायटी का योगदान, कानून के लिए मीडिया का समर्थन और कानून के लिए पोलिटिकल पार्टीज का प्रतिबद्ध होना। ...( व्यवधान) हम पांचों से गुजर कर इस भ्रष्टाचार से दूर हो पायेंगे। लेकिन निश्चित  तौर पर इस बात में कोई शक नहीं कि सरकार न केवल चिंतित है, बल्कि सरकार प्रतिबद्धित है। ...( व्यवधान) मैं अगर कांग्रेस पार्टी का जिक्र करूं, तो स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने वर्ष 1986 में ही भ्रष्टाचार निरोधक बिल लाकर एक रास्ता प्रशस्त किया था कि अब भ्रष्टाचार को एक नये सिरे से देखना चाहिए और उसे समाप्त करना चाहिए।

          महोदया, कल महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में आतंकवाद  की चर्चा हुई। इसी तरह से साप्रदायवाद की चर्चा है। मैं यह कहकर अपनी बात समाप्त करूंगी कि आतंकवाद समाज के लिए एक अभिशाप बन गया है और अब पहले से ज्यादा आतंकवादी वारदातें होने लगी हैं। ...( व्यवधान) ऐसा न सिर्फ भारत में ही, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। आतंक एवं ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  यह क्या हो रहा है?

…( व्यवधान)

डॉ. गिरिजा व्यास :आतंकी घटनाओं से निपटने की, बल्कि इसके लिए एकीकृत कमांड  के गठन की जरूरत है। ...( व्यवधान) आतंकवाद और वामपंथी उग्रवाद की समस्याएं, ये दो बड़ी चुनौतियां हमारे सामने हैं। बार-बार हमारे देश में आतंकी हिंसा होती रहती है। इसके लिए जो भी कानून है, उन कानूनों के साथ, चूंकि मेरे बोलने का समय पूरा हो चुका है, इसलिए बहुत ज्यादा न कहते हुए मैं यह अपील करूंगी कि इसमें राज्य और केन्द्र सरकार, दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। राज्य सरकारों का बहुत बार आरोप होता है कि हमें केन्द्र मदद ही नहीं देता। हमें न तो पुलिस की मदद मिल पाती है और न ही दूसरे सोर्स की मदद मिल पाती है। ऐसे में आर्टिकल 355 है, जो इस ओर संकेत करता है कि केन्द्र और राज्य दोनों सरकारें, यह राज्य का सब्जैक्ट है, लेकिन यह केन्द्र का कन्सर्न है, देश का कन्सर्न है, संसद का कन्सर्न है, प्रत्येक व्यक्ति का कन्सर्न है और इसमें जो बच्चा जन्म लेता है, वह जीना चाहता है। इसमें जो युवा आगे बढ़ रहा है, वह बढ़ना चाहता है। किसी की मां की गोद खाली न हो, किसी की बहन की राखी न छूटे ...( व्यवधान) किसी बहन का सिंदूर न मिटे, इसके लिए जरूरत है कि हम सम्वेत रूप में, सम्वेत स्वर में आतंकवाद का न केवल विरोध करे, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ, असाप्रदायिक ताकतों के खिलाफ हम लोग खड़े हों।

          महोदया, यह देश एक ऐसी परंपरा का देश है जिसमें हमने सेकुलरिज्म को आयात नहीं किया है, वह हमारे अपने खून में है, हम में है, हमारी अस्मिता में है और इसीलिए यहां पर आत्मासर्वभूतेशु की बात कही गयी है कि सब में एक आत्मा है, तो हम अलग-अलग क्यों ढूंढें। आज सेकुलरिज्म के और पंथनिरपेक्ष राज्य के संबंध में राष्ट्रपति जी ने जो अपने अभिभाषण में जिक्र किया है।...( व्यवधान)

श्री अनुराग सिंह ठाकुर,: आज यहां अनुच्छेद 355 की बात की जा रही है, उसकी डिटेल्स भी बता दें। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइए, उनकी बात सुनिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing else will go on record.

(Interruptions) … * डॉ. गिरिजा व्यास : हमें, इस सदन को उसके लिए ...( व्यवधान) मुझे दुख इस बात का है कि जिन युवाओं को आतंकवाद के खिलाफ ज्यादा कंसर्न होना चाहिए, वे युवा यदि इसका विरोध करते हैं, तो यह शर्म की बात है। ...( व्यवधान) हम लोगों ने कभी हिन्दू और मुस्लिम को बांटा नहीं है। ...( व्यवधान)

श्री शीश राम ओला (झुंझुनू): देखिए, आप विद्वान हैं, हम भी जानते हैं। आप माननीय अध्यक्ष हैं उसके, मैं भी जान रहा हूं, लेकिन इस तरह बोलना ठीक नहीं है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : ओला जी, आप बैठ जाइए।

श्री शीश राम ओला : आप उनको कहिए कि डिस्टर्ब न करें।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : ठीक है, आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Let her speak.

… (Interruptions)

डॉ. गिरिजा व्यास : जब एक हिन्दू किसी मंदिर के सामने से गुजरता है, तो प्रणाम करता है। किसी मस्जिद की अजान की आवाज उसको झुकने के लिए प्रेरित करती है। गुरूद्वारे के शबद की आवाज उसे नमन करने की प्रेरणा देती है और जहां से वह गुजरता है वह एक नए आयाम के साथ जाता है। हमारे कोई भी धर्म हों, सभी ने झुकने की प्रेरणा दी है। जब कोई मुसलमान अपनी दायीं तरफ, बायीं तरफ देखकर और फिर नीचे की तरफ देखकर जब नमाज और प्रार्थना करता है, तो उसमें सभी लोगों के लिए प्रार्थना का गुण छिपा होता है। चाहे वह जैन धर्म का अनेकान्तवाद हो, चाहे बौद्ध धर्म का संघवाद और धर्म के प्रति उनकी व्याख्या, सभी इस ओर संकेत करते हैं कि अंत में हम सभी लोग एक हैं। इस सेकुलरिज्म का पूरी तरह से पालन हो, इस प्रतिबद्धता के साथ संसद को एकमत से आगे बढ़ना होगा। इस संबंध में माननीय प्रधानमंत्री जी ने जो बात कही थी, मैं उनकी बात को कोट करना चाहूंगी:

“आज पूरा विश्व पूरी दिलचस्पी के साथ भारत पर अपनी नजरें टिकाए हुए है। मुझे विश्वास है कि विश्व पूरी सद्भावना के साथ हमें देख रहा है। भारत की सफलता में दुनिया का भी हित निहित है क्योंकि शांतिपूर्ण, सद्भावनापूर्ण, लोकतांत्रिक भारत विश्व को स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति है, इसलिए हमें आकांक्षा एवं संकल्पशक्ति के साथ 12वीं पंचवर्षीय योजना की यात्रा शुरू करनी है, जो नम्रता एवं विश्वास से युक्त हो। हमें दुनिया के सामने प्रदर्शित करना है कि जनतांत्रिक भारत एक समृद्धिशाली, समावेशी, धर्मनिरपेक्ष एवं बहुलवादी राष्ट्र के निर्माण में समर्थ है जो सतत विकास कर सकता है। विकास के इस भारतीय मॉडल की सफलता में दुनिया का हित भी निहित है।”           इसलिए प्रधानमंत्री जी, यूपीए की चेयरपर्सन साहिबा, सदन, सदन में विपक्ष की नेता और हम सभी को चलाने वाली स्पीकर महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगी:
“तूफानों से डरना कैसा, हवा पर चढ़कर वार करो, अरे मल्लाहों की छोड़ो बातें, तैरकर दरिया पार करो।”     12.58  hrs.   MADAM SPEAKER: The House stands adjourned to meet again at 2 p.m. The Lok Sabha then adjourned till Fourteen of the Clock.
     

DR. SHASHI THAROOR (THIRUVANANTHAPURAM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I rise to second the Motion moved by my friend, and hon. colleague, Dr. Girija Vyas that the Address be presented to the President in the following terms - that the Members of the Lok Sabha assembled in the Session are deeply grateful to the President for the Address which she has been pleased to deliver to both Houses of Parliament assembled together on March 12, 2012.

          Mr. Deputy Speaker, Sir, this month, in fact, by the end of this month, India will be determined to be, by the International Monetary Fund, the third largest economy in the world in purchasing power parity terms. This is because though our economy, in absolute terms, is indeed 1.3 trillion dollars by comparison with Japan’s figure of 4.3. Our economy, in terms of the strength of what we are able to buy with our money, has grown to the equivalent of 4.06 trillion dollars. And whereas Japan will not grow in this fiscal year thanks sadly to the tsunami, earthquake and the after effects of the nuclear disaster and so on, our economy, even in the most pessimistic projections, will grow at 6.9 per cent which means that India will formally overtake Japan when the numbers are in on the 31st of March this year. Now this is a major accomplishment for our Government and for our economy. But it is not a ground for complacency. Rather, it points to the serious and responsible stewardship of the country’s economy in the hands of the UPA Government.

          Sir, as you know, we are about to launch into the 12th Five Year Plan. We are already projecting an estimated growth rate of 9 per cent in that Five Year Plan starting on the 1st of April. It so happens that in the course of the current Five Year Plan we will, in fact, be averaging something like 8.2 per cent when the numbers are finally in. So, we are looking at a track record that we can be proud of as a Government and as a nation and we intend to be able to continue in that direction.

          But whether we are growing at 9 per cent or whether we are growing at 6 per cent or any other per cent, our real focus must be on the bottom 25 per cent of our society and that is where the strength of the UPA Government lies. We are interested in inclusive growth. You have heard this already being mentioned by my hon. colleague. The difference between the UPA Government and some of its distinguished predecessors is that while it believes in growth, it believes in an India that must shine for everyone and an India in which growth is accompanied by  redistributive justice.

          Sir, one example which the President herself highlighted in her Address was the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme. As she mentioned, this has created 1,100 crore man days of employment. The expression ‘man days’ is a bit old fashioned. But I can tell you from my visits to many of these projects in my home district that many of the workers are women and they are women whose lives have been transformed by the existence of this scheme introduced by the UPA Government. I have spoken to many of these women workers. I can tell you moving stories of, for example, one woman who said that without this opportunity to work for 100 days even at a minimum wage, she would have had to give up her handicapped child for adoption to an orphanage and she said, ‘what has enabled me to look after this child in my own home is the fact that this Government has given me the means to be able to earn a decent livelihood to support my child’.

          These are the kinds of stories one hears day after day if one talks to the men and women who are benefiting from the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme and what is more, as you know, this has transformed the countryside. We are now seeing bank accounts being opened because the Government rightly insists that the wages for this scheme should be paid directly into the bank accounts of the workers and not through a middle man or a contractor. The result is that 90 lakh new bank accounts have been opened in this country in the last two years for people who, previously, did not know the advantages of banking in our rural areas.

          These are the kinds of transformations that are taking place because the basic idea is not just to hand out money. The idea is to empower our people. By giving them, in their own hands, the right to work, the right to gain from their work, the right to support and look after their own families, the UPA Government has been able to bring about a transformation in the lives of ordinary people in our country.

Day after day, these are the stories we are hearing, Mr. Deputy-Speaker.  This is what inclusive growth is all about: the empowerment of the poor, giving them the purchasing power that has transformed in many ways our rural economy, and taking the country forward in a way that no longer leaves behind so many of our underprivileged rural residents. 

The same logic lies behind the telecom revolution that the President mentioned.  There is also a logic of empowerment.  Yes, the numbers speak for themselves.  We are already the world’s second largest telecommunications market.  We have overtaken the United States.  Today, as the President mentioned, 76 telephone connections exist per 100 people.  Just 30 years ago, before Shri Rajiv Gandhi first initiated the communication revolution in our country, we had one telephone connection for every 300 Indians. And, from there, we have gone today to 76 for every 100 Indians.  These are the kinds of changes we have brought about.  But, second largest is not even going to be enough.  This year, it is estimated, we will overtake China to become the largest telephone communications market in the world.  But, as I said, it is about empowerment; it is not about numbers alone. 

Who is carrying these mobile telephones?  Let me tell you, from my own Constituency, I know fishermen are taking mobile phones out to sea.  And what are they doing?  The Government gives them, through the GPS system, a way of finding out where the best shoals of fish lie.  So, they can catch them.  And then, when they come back, they start dialling on their mobile phones all the market towns along the coast to find out where they can get the best price for the fish they have caught.  Why only speak of Kerala?   Farmers anywhere in India; just 10 years ago, you would find that the farmer at harvest time would have to harvest his crop, then send an able-bodied male relative, maybe a 10 year old boy, walking 10-12 kilometres to the nearest market to find out if the market was open, whether he could sell the crop he had just harvested, what price he could sell it for, what the competition was.  Then that little boy would walk back again 10-12 kilometres in the hot sun and would come back to the farmer.  Then they will load their carts and head off to market. Half a day’s back breaking labour, that is today saved by one-two minute phone call.  That is what the revolution has been that has been brought about in this country by the UPA Government.

We are talking about the empowerment of the underclass.  This is the real meaning, the real content of the concepts of socialism that have been bandied about for so many years in this House. We have begun to bring about real change.  That change is in the lives of ordinary people in our country.  This is why the President mentioned that the Government is now going to create a national optical fibre network spending Rs.20,000 crore. It is again about empowerment.  It is about bringing broadband connectivity to our villages, to our panchayats. Because today it is not enough for us to give lectures about the poverty line. We also have to understand the fibre optic line.  The truth is that today’s information revolution which our Government has seized upon is very unlike the French Revolution because it has a lot of liberty, some fraternity and no equality.  We want to bring equality to our rural areas.   We want to connect the unconnected.  And that is an activity of this Government that I know the President highlighted because she wants this House to support it strongly.  This is all part of building up the unseen infrastructure of India, the rural infrastructure of our country.  If you can connect every panchayat by road, which we have not yet been able to do, but we are doing to the best of our ability through a number of very important schemes including one from the Prime Minister, the Prime Minister’s Gram Sadak Yojana; if in addition to connecting every panchayat by road, by good, all-weather motorable roads, we can also bring in connectivity by broadband, we will be able to find our villages prospering because jobs that today can only be done in the cities, because they have the internet connections, will now be able to be done in the villages.  You can actually sit and run a call centre in a village if you have enough fibre optic cable and enough broadband connectivity. 

Similarly with health, you may have noticed that the President mentioned that we will try and increase our health expenditure to 2.5 per cent of our GDP.  That would be a very significant development because it will then finally ensure an objective of the UPA Government, in its two terms, that nobody should have to walk more than 10 kilometres from their place of residence to get to a health centre that is fully staffed, that has all the medicines, that has doctors and nurses to look after people. We are getting there. We have made progress and with the increase in outlay, we will make further progress.

          Similarly, the hon. President highlighted that 15 per cent of outlays of certain identified Government schemes would be spent on specifically disadvantaged sections of our minority communities. Mahatama Gandhiji had always exhorted us to look at the most vulnerable sections of our society, to see whether our programmes were having any impact on their lives. 

          Today, Mr. Deputy Speaker, with this, we are going to be in a position to ensure that the most disadvantaged of the disadvantaged the poorest, the most vulnerable amongst the minorities, are themselves targeted beneficiaries of Government action. This attempt to reach out to the most vulnerable is the key to inclusive growth, because empowerment does not come from empowering only those who are already in a position to seize power. It comes from empowering those at the bottom of our socio-economic ladder and there the national Food Security Bill, which we are looking forward to receiving in this House and which the hon. President also mentioned, is going to bring forward an important assurance to every Indian that he or she will never need to go hungry.  With the computerisation of the public distribution system we can also ensure those who need subsidised food grain will get it. With all this you will see true empowerment, because a hungry person is going to find it very difficult to be an empowered person. A hungry person cannot take advantage of what our country has to offer as it marches on in development and this hungry person will benefit today from the efforts and the programmes of our UPA Government. 

          The needs of our national infrastructure, of course, go beyond the rural areas. There is no question that our coming Five Year Plan, the Twelfth Five Year Plan, anticipates that we will spend about a trillion dollars that is Rs. 50 lakh crores of rupees in building up our infrastructure.  This is an extraordinarily large target.  The Government is very conscious that it cannot raise all this money by itself. So, the opening to ‘public-private partnership’ is a part of this approach.  If we have the credibility by doing the kind of things that I have described to you today then outside investors will also come and will also join us as we build our nation. 

          Eighty per cent of the infrastructure of the India of 2030 is yet to be built and we must think 20 years ahead.  If we want to envisage the kind of India that our children should live in 2030, we have to start building it today.  There is a famous story about the emperor Jahangir and a gardener where he asked the gardener to plant a particular plant, which was going to give a very beautiful flower in blossom.  The gardener said: ‘Jahanpanah, this plant would only blossom in hundred years’.  Emperor Jahangir said: ‘All the more reason why you should plant it today, let us not wait till tomorrow’.   That is our approach in this Government. 

We want to see the India of 2030 not just on the paper, not just as a dream, but beginning on the ground today. 

The fact is that these opportunities to help build the infrastructure of India are opportunities that we want the private sector to seize both in India and abroad and for that I would urge this House to send a strong signal to the world that India is ready for investment.  Under the stewardship of the  UPA Government we have done the basics, we have done what is necessary and we are in a position to open up in order to attract investment and grow our country, build the structures on which our children’s future will then be built. 

Energy is another area flagged by the hon. President.  We actually need to increase by a multiple of seven times in the next 25 years.  From 2009, when we came back to power to 2034 in 25 years, we expect to see a seven times multiple increase in power generation.  The resources for that again cannot only come from the Government.  It has to be a partnership with the private sector; with investors from inside and outside. 

We in turn are able to hold our own with the world.  As the hon. President pointed out, our exports grew at 34 per cent last year in 2011, that means we are able to make goods that the rest of the world wants and needs to buy.  We are, therefore, dealing with the rest of the world on our own terms just as we seek their involvement in our growth and development on our terms. 

          The fact is that the hon. President announced yesterday a new National Manufacturing Policy. Manufacturing is important.  We need to employ our young people.  Let us face it.  For some time now we have been speaking of a possible demographic dividend, a great demographic advantage for our country. That is, 65 per cent of our population is under 35, which means that for the next 30 years we should have a youthful, dynamic, productive workforce when the rest of the world including China, is ageing.  But that workforce will only materialise and be successful and even only be possible if we are able to educate these young people before they enter the workforce.  Not everyone is going to come out of a college, we need to find vocational training skills for those who are not going to get a conventional college education, but we should do that.  It seems to me a disgrace that as a result of past policies which we are changing in this Government, that we have a situation wherein a country of 1.2 billion people we have a nationwide shortage of masons; that you only become a plumber or a carpenter if your father was a plumber or a carpenter and he taught you the skills. We do not have the skills imparted through official effective vocational training establishments, and the UPA Government is committed to setting those up so that we can make sure that our young people are equipped to take advantage of the opportunities of the new economy that we in India are building in the early 21st Century.  The truth is that the alternative is too awful to contemplate if we do not get this right. If this House does not support the Government in introducing the educational reforms that it has presented to the House, the vocational training plans it is presenting to the House, the alternative is going to be that instead of a demographic dividend, we will have a demographic disaster. Because if these young people do not have the training and the education to take work, they will do what Maoists have done in 165 districts of our country’s 602 districts. They will pick up the gun.  Because they will feel that they have no stake in the future of our society and they have nothing to lose if they are simply going to rebel in this fashion.   And, I can tell you from having lived around the world, there is nothing more dangerous to any country in the world than large numbers of unemployed young men. The policies of this Government are absolutely aiming to ensure that our young men will find employment; they will be educated and trained to be skilled to find their employment and that we will grow our economy in a way that makes it possible for them to find meaningful work. That is why the National Manufacturing Policy was mentioned.  And that is why we are trying to move forward across the board in so many areas of effective action so that our young people will have the stake in our economy that is going to give them and India the future we all deserve.

          We are also, of course, going beyond manufacturing and the kind of vocational training I have mentioned to something also more aspiration at the development of India as a knowledge economy. 

          The President mentioned, Mr. Deputy Speaker, that we would increase the amount of money that our Government is devoting to Research and Development from one per cent to two per cent of our GDP.  That is no small matter.  There are a very few countries in the world that are spending two per cent of their GDP. But I remember when our hon. Prime Minister made that announcement at the Indian Science Congress it was an extraordinarily important decision because it shows that we are going to take advantage of what is perhaps the India’s biggest asset, and that is, our brains.  We are a land perhaps of greater brain than brawn but our brains can be applied effectively to the creation of a 21st Century knowledge economy. 

          Already multinational giants like GE or Phillips employ more researchers in India than they do in their parent country headquarters.  This is also a reflection of the environment that has been created by the UPA Government. The high quality intellectual output that we are able to give through the kind of work we do in Research actually augurs extremely well for our country.  Innovation is becoming the major theme now coming out of India and it is innovation at a sensible cost. In fact, if you were to google the expression ‘frugal innovation’, you will find that the first 20 answers all relate to India because we have found a way of innovating inexpensively, of cutting out the frills because our country cannot afford them.  And that is why, we have become the country that has invented the world’s cheapest electrocardiogram machine, for example, at one-twentieth cost of foreign countries; the country which has after all produced the world’s cheapest automobile, Tata Nano. Our Human Resource Development Minister has very recently introduced a Tablet, the Akash Tablet, which, in many ways, is like the iPad and the iPad, which all of you know costs Rs.40,000 or Rs,50,000 in the market but in some ways it is better than the iPad because it has two USB ports.  It needs only a two volt battery, ion and lithium battery, which can be charged using solar power because we want this tablet to be used in places where electricity supply may not be regular. This innovation has come out of India at what price? It is less at less than 50 dollars.  In fact, the Government is going to subsidize it for students; and an Indian student in a village will be able to get this tablet for 25 dollars. So, a thousand rupees and change, will give an ordinary poor Indian village student, a piece of equipment comparable in every useful respect to the luxurious I-Pad.

          This is the kind of change that is happening!  I was not surprised, therefore, when I was  invited by the University of Toronto to inaugurate an India Innovation Centre.  The outside world is noticing our innovations.  The buzzword  now in the international community is ‘Indovation’, Indian Innovation. All this has been made possible because of the enabling environment created by the UPA Government; and it is something, which  I believe, we should applaud in this House.

          Mr. Deputy-Speaker, there is also India’s great strength in providing services, services to the rest of the world, especially during the recession. My hon. colleague Dr. Girija Vyas also mentioned how we have resisted the recession. The fact is that while our merchandise export did go down during the recession, our services export actually went up; and they went up during the global recession because of the strength we have given to the business of services in India.  There are Indian Radiologists reading MRIs from the most prestigious American hospitals.  We have medical transcription services so that a doctor in the western world can dictate medical notes at night into a machine.  They will arrive when he goes to sleep; they are transcribed in India while we are awake.  They get back to him in the next morning. That is   kind of service that India is able to provide that no one else can.  We have young Indian lawyers writing briefs now for international cases. These are changes that this House is  perhaps not sufficiently conscious of. But it is part of the services revolution that India is leading in the world today.

          Coming to Hospitality, the President mentioned tourism as an important area. People must recognise that tourism actually creates more jobs than industry does; and it creates jobs often for relatively unskilled or semi-skilled young people, who do not have perhaps the education to do other things but who can work in hotels, who can be waiters, who can assist cooks and who can  learn on the job.  Tourism, for us, therefore, is something that is a development priority.  It is not just something for the comfort and convenience of foreigners in 5-Star Hotels.  If we promote tourism, we help poor Indians; and this is something this Government is committed to doing. The President mentioned 12 per cent growth target in tourism in the next five years, and I assure you, Mr. Deputy-Speaker, that this is one more indication of the Government’s consciousness of how to move forward in meeting the demands and needs of the 21st Century.

          Sir, Foreign Direct Investment has been mentioned. We do know that there was a proposal made by the Government, which for the moment has been suspended.  But the truth is that in the global climate today, Foreign Direct Investment overall has been down in our country.  We have received only 19 billion dollars in the last fiscal year.  But let me tell you the other side of that story.  The remittances we have been getting from our own Non-Resident Indians (NRIs) have gone up every single year of the  global recession.  When the world started a recession in 2008-2009, our  NRIs, our diaspora, sent home 46.4 billion dollars.  In the next year, they sent home 55.75 billion dollars.  In the third year, that is, last year, they sent home 57.6 billion dollars.  So, Indians abroad believe in India; they believe in the work of the UPA Government; they have faith that their money will be put to good use in this country; and that is the message I would like this House to send to the world.  If our own diaspora who perhaps believe in our country; if they -- very  often, hardworking blue collar workers from places like my District working in countries in the Gulf  -- can send money back to India, certainly this House ought to show greater confidence in the economic management of the UPA Government and send a signal to the rest of the world: “Come and invest in us. We are doing well with your money.” But I also want to pay a brief tribute to these NRIs.  Years ago in a book that I wrote, I asked a question: “Should NRI stand for ‘Not Really Indian’, or ‘Never Relinquished India’ because there is a little bit of both in our NRIs.  They have left our country but they have not given up on us. In many ways, people have not relinquished India. Today, we can add, having seen these numbers of NRI remittances, they are also the ‘Now Required Indians’, the NRIs of our country.  We require them.

SHRI HARIN PATHAK (AHMEDABAD EAST): Please advise the Finance Minister to give them relief.

DR. SHASHI THAROOR : Since I am no longer an NRI, I can speak of them objectively with a great deal of admiration for their dedication and their patriotism to our country.

          My hon. colleague also mentioned the strength of our democracy which I am proud to say our Government has safeguarded with a tremendous amount of conviction. The pluralism of India is something the UPA stands for. We do not accept narrower definitions of Indian-ness, bigoted definitions of what makes India what it is. We are a land, we believe in the UPA, that is the land of everyone whosoever has contributed to our civilization, a land of people who have over millennia helped build India into the India we have today. This role of our UPA Government in sustaining through conscious Governmental policy, the diversity of our country, rests on a profound understanding that India is a land that experiences divisions but can overcome these divisions, divisions of caste, of creed, of colour, of culture, of consonant, of conviction, of costume and custom because we can still rally around a consensus, and that consensus, Mr. Deputy-Speaker, is on a very simple principle, that in a rich and diverse democracy like us, you do not really need to agree all the time so long as you can agree on the ground rules of how you will disagree.

          We have seen political disagreements in our country. We have seen them being resolved with the ballot box and we, in the UPA, have taken victory and defeat in stride because we accept that this is how democracy works. In the same spirit we should say to our friends on the other side that democracy is also about respectfully listening to arguments and making counter arguments, not about disrupting the work of this august House. Let us join hands together to make this House an effective instrument of our people. Let us make it together a House where we will actually discuss policies, including in the remarks that will follow in response to the Motion that has been moved. Let us in a constructive way look at how India can move forward because at the end of the day every Member of this House surely shares the same objective, an India that is an India we all wish to be proud of.

          It is sad to see political divisions on the issue of terrorism. Our hon. Home Minister made the point today that terrorism is an issue that transcends quarrels between the Central Government and the State Governments. We do need to overcome these problems and I do not want to pre-judge the outcome of the consultations which, the Minister said, will take place with all the State Governments. But I do want to highlight one point that the President herself made which is that 18 terrorist modules had actually been dismantled by the UPA Government in 2011.

          We always focus on the bad news. Whenever there is a bomb that goes off in a Mumbai bazaar, we will, of course, absolutely focus all our attention, our headlines, our televisions news on what happened. But we pay no attention at all to the terrorist bombings that did not happen because of our effective work. The dog that did not bark never makes the news but the fact is if the President of India can stand before the two Houses and tell you that 18 terrorist modules have been neutralized in 2011, that does go to the credit of the Government, and I appeal to this House to give credit where the credit is due.

          I am conscious of the time, Mr. Deputy-Speaker. I would like briefly to turn to the foreign policy as well since the President touched upon it. The effective stewardship of our nation’s external interest in the hands of the UPA Government led by our hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh has been widely applauded around the world. We have had, of course, to spend a fair amount of time on our immediate neighbourhood. We live, as the expression goes, in a tough neighbourhood. We had some serious challenges coming from across the borders of our country and it is extremely important that as the Prime Minister has done that we devote the kind of time necessary to ensuring that the tranquility and peace of our neighbourhood is not disturbed and does not spill over into our country.

          But in addition to that we have been serving for the last year-and-a-half in the United Nations Security Council as a Non-Permanent Member. We have been able to use that experience to demonstrate to the world how a responsible, emerging power has emerged on to the global stage. Today, we can proudly say that India is looked upon with respect in all the chancelleries of the world’s capitals and the respect particularly felt for our hon. Prime Minister is one that has been widely acknowledged.

The Time Magazine  poll on Global Leaders has said that the most single respected global leader in the world is India’s Prime Minister. When President Obama of the United States was asked to name the global leaders in the world he respected, the first name he mentioned was again our Prime Minister of India. These are all matters that go beyond political parties; these are matters that all Indians should be proud of because our Prime Minister is your Prime Minister on the other side of the House as well as ours. But, let us also stress that it is not merely respect we are seeking, we in this UPA Government are determined to safeguard the national interest of India effectively and of Indian people wherever they may be found. Which is why, as the President mentioned, we had during the Civil War in Libya, during the outbreak that jeopardised the lives of 16,000 Indians there, we were able to effectively conduct Operation Safe Homecoming, that brought home 16,000 of our fellow citizens safe from disaster. This is the kind of tangible focus on Indian interests that you are seeing day after day and week after week from the UPA Government.

          Mr. Deputy-Speaker, it is fitting that I conclude. We have to acknowledge that there are still huge problems that we need to overcome. This Government has never pretended that everything is perfect. We know there are challenges. The Prime Minister quite recently in releasing a Report on Child Malnutrition even said, ‘there are matters of which we should be ashamed and Child Malnutrition is one such matter’.

          In our country, we cannot hide our heads in the sand. There are very serious problems of poverty that we need to overcome in our country. I earned some unfair notoriety a couple of years ago when some gentlemen from the other side of the House spoke of India being a super power and I said, we cannot speak of being a super power, when we are still super poor. This is not a popular thing to say but it is true. We do have a large number of our people in whose service the UPA Government is working; the people, we are determined to pull out of poverty. We have been doing it every year. Every year of this Government’s existence, we have pulled out approximately one per cent of our population from below the poverty line. Last year, it was 0.78 per cent. But, if we look at the Planning Commission figures, we are thinking about 10 million people a year who have been no longer under the poverty line under our Government. This is a bit slow. There is lot more that needs to be done. But, we are not China. China has grown at great-neck speed. If you grow at great-neck speed, you also break a few necks. We do not do that in India. We bring our people along with us in the process of growth and development.

          I want to stress that the UPA Government is working – if I can use computer language – on both the hardware of development and on the software of development. The hardware – the roads, the airports, the railways, the infrastructural questions have not been neglected, as you note from the President’s speech, but also the software of development – the human capital on which our nation rests, the human capital of our ordinary people, the Indian men and women in the poorest parts of this country. The objective of our Government is and must remain to ensure that they get three square meals a day; that they are able to send their children to a good school, a good Government school that teachers actually come to and teach; that they are able themselves to aspire to decent jobs – decent jobs that we train and equip them for and that we try and create in our economy so that they and their children can look to a better future. That is the purpose of Government. We must be conscious that we are building this country amongst our very very youthful population – I mentioned the number  earlier as 65 per cent are below 35 years. But I can tell you that our Prime Minister when he addressed the newly elected Congress Members of Parliament, just two and half years ago, in the Central Hall, said, ‘never forget that we got a lot of support of young voters in this election’ and he said, ‘we must never stop respecting the impatience of the young’. That is what the UPA Government is conscious of – the impatience of the young. Our young have a right to be impatient. They have a right to want change. They have a right to want to see progress and it is our job to provide that.

          Mr. Deputy-Speaker, we in the UPA have a sweeping vision for the future of this country and we are on course to bring about these changes. This is a vision which we have not heard from the other side of the House and I am not sure we will hear in the debates this afternoon. It is because it is a vision that sees a great adventure in this nation of bringing 1.2 billion people out into the forefront of the world of 21st Century, of doing so by bringing 600 million poor Indians bringing them into the 21st Century, connecting 600 million Indian villagers into the global village.

These are major challenges, but these are worthwhile ambitions and worthwhile aspirations for a country like ours. We in the UPA are doing this in an open society, in a democratic society where our policies will be challenged at the ballot box and also in the streets. We are trying to do this at the helm of a rich, diverse and plural civilization; but one, in our view, should be open to the contention of ideas and interests within it that should not be afraid of the prowess or the products of the outside world; that should be determined to liberate and fulfil the creative energies of the Indian people.

Such an India is the India that the President spoke of in her Address yesterday. It is an India that has grown and will grow. It is an India that stands ready to assume its global responsibilities in the 21st century. I call upon the House to vote for this Motion.

Thank you, Mr. Deputy-Speaker.

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Motion moved:

“That an address be presented to the President in the following terms:-
 
‘That the Members of the Lok Sabha assembled in this Session are deeply grateful to the President for the Address which she has been pleased to deliver to both Houses of Parliament assembled together on March 12, 2012.”   श्री राजनाथ सिंह (ग़ाज़ियाबाद):उपाध्यक्ष महोदय, पहले तो मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि आपने मुझे धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने का अवसर प्रदान किया।
          महोदय, पूरा सदन इस बात से सहमत होगा कि हेल्दी पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी में एक स्वस्थ परंपरा है कि जब भी दोनों सदनों का सत्र नये वर्ष में प्रारंभ होता है तो उसको महामहिम राष्ट्रपति सम्बोधित करते हैं। उसके बाद संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर महामहिम राष्ट्रपति के प्रति आभार प्रकट करने के लिए एक चर्चा होती है, चाहे वह राज्य सभा हो अथवा लोक सभा हो, वह उसे सर्वसम्मति से पारित करती है और उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का काम करती है। मैं यह मानता हूं कि धन्यवाद प्रस्ताव हो अथवा कोई महत्वपूर्ण प्रस्ताव या विषय हो, जब कोई चर्चा हो तो अपेक्षा यह की जाती है कि उसमें कुछ ऐसे सुझाव आएंगे कि चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष हो, दोनों किसी न किसी राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर एक आम सहमति बनाने का काम करेंगे और जब किसी मुद्दे पर आम सहमति बन जाती है तो स्वाभाविक है कि सरकार को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से क्रियान्वित करने में सुविधा रहती है। इसके पहले भी कई चर्चाएं हुई हैं। मैं उन सारे इनस्टान्सेज़ की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगा, जब विपक्ष ने भी सुझाव दिए हैं और सत्ता पक्ष ने उसे माना है। सत्ता पक्ष को उसका लाभ मिला है और देश को भी उसका लाभ मिला है।
          विपक्ष का जहां तक प्रश्न है, विपक्ष के लोग आज भी रचनात्मक सहयोग सरकार को करना चाहते हैं, विशेष रूप से जो राष्ट्रीय हित से जुड़े हुए सवाल हैं। लेकिन मैं यह महसूस करता हूं कि पता नहीं आज इस गवर्नमेंट की कैसी मानसिकता बन गई है कि विपक्ष यदि रचनात्मक सहयोग देना चाहता है, राष्ट्रीय हित से जुड़े हुए सवालों पर, फिर भी यह सरकार वह सहयोग लेने के लिए तैयार नहीं है। विपक्षी दलों की बात छोड़ दीजिए। मैं तो यह मानता हूं कि इस सरकार के जो सहयोगी दल हैं, उनके भी जो सुझाव हैं, वे इस सरकार को रास नहीं आ रहे हैं, ऐसी स्थिति हमें देखने को मिलती है। मैं उदाहरण यहां देना चाहता हूं।
          भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। हम सब भी जानते हैं कि इसका स्वरूप फैडरल है। फैडरल स्ट्रक्चर को ही हम लोगों ने भारत के संविधान में स्वीकार किया है और हमारे भारतीय संविधान की यह एक प्रकार की शोभा है। सरकार द्वारा अपनी तरफ से यह प्रयत्न करना चाहिए ताकि केन्द्र और राज्यों के बीच परस्पर सहयोग बना रहे। केवल बना ही न रहे, बल्कि केन्द्र और राज्यों के बीच यह परस्पर सहयोग निरंतर आगे बढ़ता रहे, मजबूत होता रहे। लेकिन हालात कुछ विपरीत दिखाई देते हैं। इस सरकार का तो रवैया यह हो गया है कि केन्द्र और राज्यों के बीच सहयोग होने की बजाय एक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पैदा हो गई है, एक कन्फन्ट्रेशन की स्थिति पैदा हो गई है। हाल ही में एनसीटीसी के गठन का फैसला इस सरकार ने किया। आपको भी जानकारी है उपाध्यक्ष महोदय कि हमारे देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसका विरोध किया और कहा कि बिना राज्य सरकारों को विश्वास में लिए यह क़दम केन्द्र सरकार द्वारा उठाया गया है।
मैं मानता हूं कि जब यह विरोध मुख्यमंत्रियों द्वारा हुआ तो हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी यह आश्वस्त किया कि हम निश्चित रूप से सभी राज्यों का सहयोग लेंगे, उनसे विचार-विमर्श करेंगे। लेकिन मुझे आश्चर्य तब हुआ जब महामहिम राष्ट्रपति का अभिभाषण हो रहा था। उनके अभिभाषण में भी इस बात का उल्लेख था कि यह सरकार एन.सी.टी.सी. का गठन करेगी। इसकी क्या जरूरत थी? जब तक कि सारे राज्यों को विश्वास में न ले लिया जाता तब तक राष्ट्रपति के अभिभाषण में ही इस एन.सी.टी.सी. के गठन का उल्लेख करने का क्या औचित्य था? मैं तो यह मानता हूं कि यह सरकार आतंकवाद के संकट से इस देश को निजात दिलाने के लिए जितनी गंभीर होनी चाहिए अथवा जितना गंभीर प्रयास इस सरकार के द्वारा किया जाना चाहिए, वैसा गंभीर प्रयास इस सरकार के द्वारा नहीं किया जा रहा है।
          मैं आपको वर्ष 2004 के लोक सभा चुनाव की याद दिलाना चाहता हूं। पोटा एक एंटी टेरर लॉ था। उस पोटा को मुद्दा बनाकर इस कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ा था। उस समय जो भी अलायंस था, उन लोगों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। सरकार बनने के बाद इन्होंने पहला काम किया था कि एक जो सशक्त और प्रभावी एंटी टेरर लॉ, जिसे पोटा के नाम से जानते हैं, उसे समाप्त कर दिया। यहां तक कि इस देश के कई राज्य, जैसे महाराष्ट्र, गुजरात ने भी एक एंटी टेरर लॉ बनाया। उस एंटी टेरर लॉ को भारत सरकार के द्वारा जो मंजूरी मिलनी चाहिए थी, वह आज तक नहीं मिल पायी है। मैं कैसे मानूं कि आतंकवाद के संकट से इस देश को निजात दिलाने के लिए यह सरकार गंभीर है? इसी संसद के ऊपर वर्ष 2001 में जो हमला हुआ और उस हमले के पीछे जो सबसे बड़ा षडय़ंत्रकारी था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने सजा भी सुनाई। लेकिन, आज तक वह सजा क्रियान्वित नहीं हुई। कैसे हम इस बात को मान लें कि आतंकवाद के संकट से निजात दिलाने के प्रति यह सरकार पूरी तरह से गंभीर है?
          इतना ही नहीं, मुझे तकलीफ़ तब ज्यादा होती है जब मैं यह देखता हूं कि सत्ता पक्ष के जो प्रमुख लोग हैं, वे लोग सरेआम खड़े होकर बाटला हाउस कांड की चर्चा करते हैं और मोहन चंद शर्मा जैसे इंस्पेक्टर, जो शहीद हुए हैं, उनकी शहादत का माखौल उड़ाने की भी कोशिश करते है। कभी-कभी इस सरकार के मंत्री द्वारा कहा जाता है कि बाटला हाउस की सीडी देखने के बाद हमारी पार्टी के अध्यक्ष की आंखों में आंसू आ गए। मैं यह अपेक्षा कर रहा था कि कम से कम इस सत्ता पक्ष का जो सबसे बड़ा दल है, उसके किसी-न-किसी प्रमुख व्यक्ति अथवा प्रवक्ता द्वारा निश्चित रूप से इसका खंडन आएगा या स्पष्टीकरण आएगा और बताया जाएगा कि यदि इस दल के प्रमुख नेता की आंखों में आंसू आ गए अथवा वह बहुत ज्यादा भावुक हो गयीं तो ऐसा  किस कारण हुआ। क्या उन आतंकवादियों की लाशों को  देखकर उनकी आंखों में आंसू आए या मोहन चंद शर्मा, जो इस वारदात में आतंकवादियों का मुकाबला करते हुए शहीद हुए, उनके शव को देखकर उनकी आंखों में आंसू आए? पर, इसका भी कोई स्पष्टीकरण नहीं आया। मैं समझता हूं कि आतंकवाद का सहारा लेकर यह सरकार इसके बहाने केवल राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करने के किसी-न-किसी माध्यम अथवा किसी-न-किसी उपकरण की बराबर तलाश करती रहती है।
           उपाध्यक्ष महोदय, एन.सी.टी.सी. के मामले में मैं आपके माध्यम से यह कहना चाहूंगा कि प्रधानमंत्री जी को सभी राज्यों को विश्वास में लेकर ही यह कदम आगे बढ़ाना चाहिए। जहां तक आतंकवाद से लड़ने का प्रश्न है, विपक्ष पूरी तरह से सहयोग करने को तैयार है। हम लोग तहेदिल से चाहते हैं कि  भारत को आतंकवाद के संकट से निजात मिलनी चाहिए। लेकिन, आतंकवाद के संकट से यदि हम निजात पाना चाहते हैं तो सरकार के अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिए। हमको कहीं-न-कहीं उस दृढ़ इच्छा शक्ति में कमी दिखाई देती है और आतंकवाद से लड़ने के लिए जितना इफेक्टिव नेटवर्क होना चाहिए, उतना इफेक्टिव नेटवर्क आज तक हमारे पास नहीं है। यह मैं महसूस करता हूं।
          अभी आपने देखा कि हाल में ही एक बहुत बड़ी घटना हो गयी। नई दिल्ली का जो हाई सिक्युरिटी ज़ोन है, उसमें हमारा मित्र देश इस्रायल का दूतावास स्थित है। एक आतंकवादी वारदात में इस्रायली दूतावास के तीन या चार लोग घायल हुए। कैसे मैं यह मान लूं कि आतंकवाद से लड़ने के लिए, आतंकवाद की चुनौती को स्वीकार करने के लिए जिस प्रकार की भारत सरकार की तैयारी चाहिए, वह  तैयारी भारत सरकार की है? संसद के दोनों सदनों में और संसद के बाहर भी सरकार के लोगों के द्वारा आश्वासन तो बराबर दिए जाते हैं लेकिन, सचमुच उसका परिणाम बाहर देखने को हम सबको नहीं मिलता है।
          उपाध्यक्ष महोदय, महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण में यह कहा गया है कि वर्ष 2011 में 18 स्लीपर मॉडय़ूल्स को नष्ट किया गया। मात्र 18 स्लीपर मॉडय़ूल्स को नष्ट करने से इस देश को आतंकवाद के संकट से निजात नहीं मिलेगी।  तरह-तरह की खबरें आती हैं कि हमारे देश में इस समय 700, 900, या 1000 की संख्या में स्लीपर मॉडय़ूल्स इफेक्टिवली काम कर रहे हैं।
क्या जो 18 स्लीपर मॉडय़ूल्स हमने समाप्त कर दिया, उसके बाद हम संतोष कर सकते हैं?
          उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से प्रधानमंत्री जी से यह भी जानना चाहूंगा कि कितने स्लीपर मॉडय़ूल्स इधर हाल में बढ़े हैं, उसकी भी जानकारी देश के लोगों को होनी चाहिए। आपने एनसीटीसी का कदम उठाया, लेकिन इनके माध्यम से राज्य के अधिकारों में आप हस्तक्षेप करना चाहते हैं। केवल एनसीटीसी तक ही यह सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स है, इसमें भी राज्य सरकारों को जो विश्वास में लेना चाहिए, आपने नहीं लिया। इस प्रोटेक्शन फोर्स को आप पुलिस पावर दे रहे हैं, जबकि यह राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। साथ ही ऐसे ही पहले भी आपने प्रोटेक्शन ऑफ कम्युनल एंड टारगेटेड वॉयलेंस बिल बिना राज्य सरकारों को विश्वास में लिए ला दिया। आपने बिना राज्यों सरकारों को विश्वास में लिए एफडीआई के बारे में फैसला कर लिया। आपने देखा कि आपके एक सहयोगी दल का ही विरोध आपको किस हद तक झेलना पड़ा है। सरकार के इस रवैये और रूख को मैं कंडम करता हूं और सरकार से मैं अपेक्षा करता हूं कि सरकार की तरफ से यह पूरी तरह से आगे प्रयास किया जाएगा ताकि राज्य और केन्द्र के बीच परस्पर सहयोग निरंतर आगे बढ़ता रहे। दूसरी तरफ कुछ राज्य सरकारों ने अपनी विधान सभा में कुछ बिल पारित किए हैं, उन्हें केन्द्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा है। वर्षों से वे सारे बिल पैंडिंग पड़े हुए हैं। उस पर जो सरकार की मंजूरी मिलनी चाहिए, वह मंजूरी आज तक नहीं मिल पाई। मैं कुछ ऐसे बिल, जो राज्य सरकारों द्वारा केन्द्र के पास भेजे गए हैं, उनका मैं यहां उल्लेख करना चाहता हूं। एक, गुजरात कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम बिल 2003 से पड़ा हुआ है, लेकिन आज तक इस बिल को मंजूरी प्राप्त नहीं हुई। दूसरा, गुजरात लोकल ऑथोरिटीस अमेंडमेंट बिल 2009 से पड़ा हुआ है, आज तक इस बिल को भी मंजूरी नहीं मिल पाई। कच्छ बॉम्बे इनामी एरिया बिल 2011 को भी आज तक मंजूरी नहीं मिल पाई। जब कि इसमें वहां के जो भूमिहीन लोग हैं, उनके हितों को ध्यान में रख कर यह संशोधन बिल वहां की विधान सभा के द्वारा पारित किया गया है। 1958 में बने इस कानून को संशोधित करने का प्रस्ताव किया गया है, जिसके तहत भूमिहीन मजदूरों के नाम पर कच्छ क्षेत्र में भूमि का जो घोटाला होता है, उसे रोका जा सके। वैसे ही गुजरात विधान सभा के कई ऐसे बिल हैं जैसे गुजरात टेनेंसी एंड एग्रीकल्चर लैंड लॉ अमेंडमेंट बिल 2011, गुजरात लैंड फ्रेगमेंटेशन एंड कंसोलिडेशन बिल और गुजरात एजुकेशन इंस्टीटय़ूट सर्विसेज बिल 2006 जिन्हें आज तक भारत सरकार के द्वारा मंजूरी नहीं मिली।
          इतना ही नहीं, मैं बिहार का भी उदाहरण देना चाहता हूं, जैसे बिहार स्टेट यूनिवर्सिटी सर्विस कमीशन बिल, 2001 के प्रारम्भ में वहां की विधान सभा में पारित करके भारत सरकार को भेजा है, वर्ष 2011 गुजर गया, 2012 प्रारम्भ हो गया, लेकिन आज तक उसे मंजूरी नहीं मिली। बिहार यूनिवर्सिटी ट्रिब्युनल बिल को क्यों नहीं मंजूरी मिली? वैसे ही बिहार स्टेट स्कूल टीचर एंड एम्प्लाइज़ डिसप्यूट रिड्रेसल ट्रिब्युनल बिल भी पड़ा हुआ है, एक साल से अधिक का समय हो गया है। कई ऐसे बिल हैं। पटना यूनिवर्सिटी अमेंडमेंट बिल 2010 से पड़ा हुआ है, उसे आज तक केन्द्र सरकार की मंजूरी नहीं मिल पाई है। ऐसे ही हमारी मध्य प्रदेश की सरकार ने टेरेरिज्म एंड डिसरप्टिव एक्टीविटीज एंड कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम बिल मार्च 2010 में अपनी विधान सभा में पारित करके भेजा, लेकिन आज तक इस सरकार ने उसे अपनी मंजूरी देने का काम नहीं किया है। ऐसे ही गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और हिमाचल प्रदेश है, जितने भी बिल हैं, केन्द्र सरकार की   'keep it pending'  पालिसीअके शिकार हुए हैं। हम यह कैसे मान लें कि राज्यों की भावनाओं का सम्मान केन्द्र के द्वारा जो किया जाना चाहिए, जिस बिल को लेकर किसी भी प्रकार का कोई विवाद नहीं है, यह सरकार उनका सम्मान करती ही नहीं।  इस सरकार को क्या कठिनाई है?  यह बात हमारी समझ के परे है।  
         एक विशेष मुद्दा जो कि तेलंगाना राज्य का उठा है, मैं उसकी भी यहां चर्चा करना चाहूंगा कि कुछ रीजनल एस्पेरेशंस होती हैं, उस क्षेत्र के लोग जो होते हैं, उनकी भी कुछ अपनी भावनाएं और आकांक्षायें होती हैं।  सारा देश जानता है कि तेलंगाना राज्य का निर्माण होना चाहिए।  इस विषय को लेकर तेलंगाना का पूरा का पूरा क्षेत्र आंदोलित है।  लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ, जब महामहिम राष्ट्रपति का अभिभाषण मैंने देखा, तेलंगाना का कहीं पर कोई उल्लेख अभिभाषण में किया ही नहीं गया है।  मैं  बहुत ही विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा, उपाध्यक्ष महोदय, आपसे और प्रधानमंत्री जी से कि तेलंगाना राज्य के संबंध में आपने जो एक कमेटी बनायी थी, उस कमेटी की रिपोर्ट आ चुकी है।  कृपया तेलंगाना राज्य के गठन पर तुंत प्रभावी कदम उठाएं।  भारतीय जनता पार्टी उसमें पूरी तरह से सहयोग करेगी।
          तेलंगाना के संबंध में जानकारी यह भी मिली है कि सरकार एक ऑटोनामस काउंसिल बनाने के बारे में विचार कर रही है, मतलब स्टेट  विदइन ए स्टेट, इस मॉडल को सरकार अपनाना चाहती है।  लेकिन मैं समझता हूं कि उस क्षेत्र के रहने वाले लोगों की जो डेवलपमेंट की एक एस्पेरेशन है, उससे उनकी डेवलपमेंट की वह एस्पेरेशन पूरी नहीं हो पाएगी।
          अब मैं आता हूं नार्थ-ईस्ट स्टेट्स के कुछ जो राज्य हैं उनकी तरफ, नार्थ-ईस्ट स्टेट्स के राज्यों का कई बार दौरा करने का मुझे अवसर मिला है।  वहां के लोगों के साथ संवाद करने का भी मुझे अवसर मिला है। ...( व्यवधान) नार्थ-ईस्ट स्टेट्स में भी गंभीर समस्यायें पैदा हो रही हैं।  वहां पर भ्रष्टाचार, वहां की सरकारों के द्वारा इतना बढ़ा है कि जो बुनियादी आवश्यकतायें हैं नार्थ-ईस्ट में रहने वाले लोगों की, सड़क, पानी और बिजली, वे सब पूरी नहीं हो पा रही हैं।  मैं समझता हूं कि केवल स्पेशल पैकेज देने से ही उनकी समस्याओं का समाधान हो जाएगा, ऐसा नहीं है, बल्कि स्पेशल एफर्ट्स गवर्नमेंट द्वारा होने चाहिए, ताकि नार्थ-ईस्ट के लोग भी यह महसूस कर सकें कि वह भी भारत का हिस्सा हैं और वह गौरव के साथ अपना मस्तक ऊंचा करके चल सकें, ऐसे हालात पैदा करने की जरूरत है।
          उपाध्यक्ष महोदय, महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण में एक बात का उल्लेख है, मैं उसका स्वागत करना चाहूंगा कि एक लैप्सेबल सेंट्रल पूल जो था, उसे नॉन लैप्सेबल   central  (सेंट्रल) पूल के रूप में इस सरकार ने जो एक मान्यता दी है, ताकि जो भी सेंट्रल प्रोजेक्ट्स अथवा दूसरे प्रोजेक्ट्स जिन पर वहां काम चल रहे हैं, वे पैसे की कमी के कारण रूकने न पाएं, सरकार के इस कदम की मैं सराहना करता हूं।
          उपाध्यक्ष महोदय, जब मैं नार्थ-ईस्ट की चर्चा कर रहा हूं तो स्वाभाविक रूप से मेरा ध्यान अरूणाचल प्रदेश की ओर भी जा रहा है।  चीन की दखलंदाजी किस तरीके से बढ़ती जा रही है, उससे केवल मैं ही नहीं, सारा देश चीन की दखलंदाजी को लेकर चिंतित है।  हमारे डिफेंस मिनिस्टर अरूणाचल प्रदेश गए थे। उस पर भी चाइना ने अपनी तरफ से प्रोटेस्ट दर्ज करा दिया कि क्यों यहां भारत के डिफेंस मिनिस्टर आए?  क्या अरूणाचल भारत का हिस्सा नहीं है? क्या चीन की धमकी के आगे भारत झुक जाएगा?  मैं ऐसा मानता हूं कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जिस प्रभावी तरीके से भारत सरकार को अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए, उस प्रभावी तरीके से यह सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपना विरोध दर्ज नहीं करा पा रही है अथवा सरकार की तरफ से जो डिप्लोमेटिक एफर्ट्स होने चाहिए, वह डिप्लोमेटिक एफर्ट्स सरकार की तरफ से नहीं हो रहे हैं।  चाइना जिस तरीके से इंडो-तिब्बेतियन बार्डर पर ब्रह्मपुत्र नदी पर डैम बना रहा है, इसकी चर्चा कई बार हो चुकी है, समाचार पत्रों में भी खबरें आ चुकी हैं, चाइना के एंबेसडर भी मिलने के लिए आए थे, एक बार मेरा स्टेटमेंट आया था, जब मैंने उनसे भी बात की तो उन्होंने कहा कि नहीं, ऐसे किसी प्रकार के डैम का वहां पर कोई कांस्ट्रक्शन नहीं हो रहा है।  लेकिन आज के दस दिन पहले सारे समाचार पत्रों में, केवल नार्थ-ईस्ट नहीं सारे देश के समाचार पत्रों में यह खबर आयी कि पासीघाट में ब्रह्मपुत्र नदी लगभग सूख गयी है, पानी इतना रिसीड   (recede) किया है, इतना कम हो गया है कि लगभग सूखी हुयी नदी की तरह उसकी हालत हो गयी है।  आप यह कल्पना कीजिए कि क्या स्थिति होगी?  यदि ब्रह्मपुत्र रीवर सूख जाएगी तो नार्थ-ईस्ट पूरी तरह से तबाह हो जाएगा।  मैं समझता हूं कि सरकार को अपनी तरफ से एक डिप्लोमेटिक एफर्ट करने की आवश्यकता है, ताकि चाइना को भी या तो वह तैयार करें कि जहां के संबंध में शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि वहां पर चाइना डैम बना रहा है, तो कम से कम वहां के डेलीगेट्स हों और यहां के भी डेलीगेट्स हों और एक ज्वाइंट इंस्पेक्शन कमेटी चाइना और भारत की बन जाए जो वहां जाकर यह देखे कि सच्चाई क्या है? 
 
15.00 hrs.  हम केवल चाइना के कहने पर कैसे मान लेते हैं कि वहां पर किसी प्रकार के नए प्रोजेक्ट का निर्माण नहीं हो रहा है? मैं समझता हूं कि इसे गंभीरतापूर्वक लेने की आवश्यकता है। साथ ही, सरकार की तरफ से एक डिप्लोमैटिक एफर्ट यह भी होनी चाहिए कि चाइना, बंग्लादेश और भारत तीनों मिल कर एक इंटरनेशनल वाटर ट्रीटी ब्रह्मपुत्र नदी को लेकर करें। ट्रीपार्टाइट वाटर ट्रीटी के लिए सरकार को अपनी तरफ से प्रयाप्त प्रयत्न करने चाहिए। जैसे इंडस रीवर को लेकर हम लोगों ने एक इंटरनेशनल ट्रीटी की है वैसे ही बंग्लादेश चाइना और भारत तीनों देशों को मिला कर भी एक ट्रीपार्टाइट वाटर ट्रीटी भी हो सकती है। संकट केवल पूर्वोत्तर का ही नहीं है - आप देखिए पाक अक्यूपाइड कश्मीर है।  पाक अक्यूपाइड कश्मीर यूनाइटेड नेशन के द्वारा विवादित क्षेत्र घोषित है। चीन गिलगिट और बाल्टिस्तान में आ गया।
 
15.02 hrs. (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair) वहां पर उसके सैनिक आ गए। वहां पर चाइना की बड़ी-बड़ी कंपनियां आ गईं लेकिन हमको जो वहां पर प्रभावी विरोध दर्ज अपनी तरफ से करानी चाहिए वह नहीं करा पा रहे हैं। जबकि पाक अक्यूपाइड कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है वहां पर चाइना बंकर्स बना रहा है। वहां पर चाइनीज मिलेटरी आ गई है। चाइना यूएन सेक्यूरिटी काउंसिल का परमानेन्ट मेम्बर है तो मैं कहता हूं कि क्या सेक्यूरिटी काउंसिल में भारत प्रभावी तरीके से पाकिस्तान चाइना से मिल कर भारत के खिलाफ जो षडयंत्र कर रहा है, क्या  हम उसे एक्सपोज नहीं कर सकते हैं लेकिन इस दृष्टि से भी जो प्रयास होना चाहिए, उपाध्यक्ष महोदय ऐसा कोई भी प्रयास सरकार के द्वारा होना हो पा रहा है। चाइना के साथ हमारे रिश्ते बेहतर होना चाहिए, इसकी चर्चा अभिभाषण में हुई है इसमें कहीं कोई दो मत नहीं है। चाइना ही नहीं जितने भी हमारे पड़ोसी देश हैं, पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्ते बेहतर और मधुर होना चाहिए। इसके लिए जिस प्रकार की सहयोग की आवश्यकता होगी, हमारा दल सहयोग करने को तैयार है लेकिन चिंता मुझे इस बात पर हुई है कि व्यापारिक रिश्ते की चर्चा तो महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण में की गई  है लेकिन सामरिक दृष्टि से, स्ट्रैटजिक प्वाइंट ऑफ व्यू से जो खतरा पैदा हो रहा है उसकी महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण में चर्चा नहीं की गई है। मैं पुनः अपनी बात को दोहराना चाहता हूं और सभापति महोदय आपके माध्यम से सरकार से मांग करना चाहता हूं कि यह सरकार अपने डिप्लोमैटिक स्किल का परिचय देते हुए यह कोशिश करे कि चाइना जो कुछ भी कर रहा है उसके लिए वह एक अंतर्राष्ट्रीय जनमत वह बनाए कि किस प्रकार की हरकत चाइना और पाकिस्तान के द्वारा भारत के साथ की जा रही है। चीन की मिलेटरी पावर में कई गुना वृद्धि हुई है। अभी-अभी जानकारी प्राप्त हुई है और कल के अखबार में मैंने पढ़ा है कि चाइना ने लगभग 11.2 प्रतिशत डिफेंस बजट को एकाएक बढ़ा देने का काम किया है। हम इसको सहजता से स्वीकार कर लें कि वह उसका अपना देश का डिफेंस बजट है, वह बढ़ाता रहे लेकिन हमारी क्या तैयारी है? मैं समझता हूं कि उसकी भी चिंता करने की आवश्यकता है। मैं यहां पर आर्मी चीफ के एक लेटर का उल्लेख करना चाहूंगा जो कि आर्मी चीफ मिस्टर वी. के. सिंह ने डिफेंस मिनिस्टर को लिखा है। संभवतः यह 3 मार्च,2012 का पत्र है। मैं आपकी इजाजत से उसका उल्लेख करना चाहूंगा।  The Army Chief Shri V.K. Singh has written to the Defence Minister Shri A.K. Antony that the war-waging capability of the Army has been seriously degraded with the Government dragging its feet on critical procurements and the policy measures. गवर्न्मेन्ट की प्रोक्योरमेंट पॉलिसी मिलिट्री के मामले में इतनी पुअर हो जाएगी जिसको लेकर चीफ को अपनी चिंता व्यक्त करनी पड़ेगी। श्रीमन, इस से बड़ी चिंता की बात क्या हो सकती है?...( व्यवधान)

SHRI ADHIR CHOWDHURY (BAHARAMPUR): I would like to know whether he is going to authenticate the letter. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record.

(Interruptions) … * श्री राजनाथ सिंह : हम को मीडिया में जो खबरें देखने को मिली है उससे हमारी चिंता और बढ़ी है। मैं उसकी भी यहां चर्चा करना चाहूंगा कि डिफेंस बजट में संभवतः सरकार अपने बढ़ते फिस्कल डेफिसिट को देखते हुए कुछ कमी करने जा रही है। मैं बहुत विनम्रतापूर्वक निवेदन करूंगा कि देश इस समय संकट में है। डिफेंस का जो भी बजट है उसमें कटौती नहीं की जानी चाहिए बल्कि डिफेंस का बजट बढ़ाया जाना चाहिए। सारा का सारा देश एक समय भूखा रह कर देश को सहयोग करने के लिए तैयार है लेकिन हमारे भारत देश के मान-सम्मान और स्वाभिमान पर किसी भी सूरत में आंच नहीं आनी चाहिए। यह मैं आप के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से विनम्र अनुरोध करना चाहता हूं।

          जहां तक फिसकल डैफिसिट का सवाल है, जब बजट पेश हो रहा था, उस समय माननीय वित्त मंत्री जी ने संसद के दोनों सदनों को आश्वस्त किया था कि किसी भी सूरत में फिसकल डैफिसिट जीडीपी के 4.6 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ेगा। लेकिन मैं अभी-अभी वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट देख रहा था। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इस फिसकल ईयर के समाप्त होते-होते संभवत: फिसकल डैफिसिट 5.6 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। आर्थिक विशेषज्ञ यह भी मानने लगे हैं कि अब यह फिसकल डैफिसिट बेकाबू होता जा रहा है।  फिसकल डैफिसिट की क्राइसेज़ निरंतर गंभीर होती जा रही है। सरकार को अपने खर्चों में जो कटौती करनी चाहिए, वह कटौती भी सरकार नहीं कर पा रही है। यह भी एक आंकड़ा मिला है कि 2011-12 वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के आंकड़े जो सरकार ने जारी किए हैं, ग्रोथ रेट 6.1 प्रतिशत। एक इंटरनेशनल रेटिंग एजैंसी है जिसका नाम मूडीज़ है। उसने कहा है कि  2012-13 की पहली तिमाही में ग्रोथ रेट 6 प्रतिशत से नीचे भी चली जाएगी। इसका मतलब हमारे देश की अर्थव्यवस्था इस सरकार की गलत इकोनॉमिक पॉलिसी के कारण, इस सरकार की रॉग इकोनॉमिक प्लानिंग के कारण एक संकट के जाल में फंस जाएगी। ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं। लेकिन महामहिम राष्ट्रपति महोदया से अभिभाषण में यह कहलवा दिया गया कि अगले फाइनैंशियल ईयर में 8 फीसदी से ज्यादा जीडीपी की ग्रोथ रेट होगी। लेकिन यह हकीकत से कोसों दूर है। हम इस टारगेट को कैसे प्राप्त करेंगे। ...( व्यवधान) 8 से 9 फीसदी यानी ख्याली पुलाव पकाया जा रहा है। मैं यह भी जानना चाहूंगा कि इस टारगेट को एचीव करने के लिए सरकार द्वारा क्या-क्या एफर्ट्स हो रहे हैं। सदन उनसे इसकी भी जानकारी चाहेगा।

          एक चिन्ता और होती है। जब मैं इस देश की बढ़ती हुई जनसंख्या को देखता हूं, मुझे जो आंकड़े प्राप्त हैं कि वर्ष 2020 तक इस देश की 59 प्रतिशत आबादी लैस दैन 40 ईयर्स एज की होगी।

          अनइम्प्लॉयमैंट प्राब्लम हमारे देश की सबसे बड़ी प्राब्लम है। केवल मनरेगा से अनइम्प्लॉयमैंट प्राब्लम के चैलेंज को मीट आउट नहीं किया जा सकता। इसके लिए भी सरकार की तरफ से कोई न कोई ऐसा एफर्ट होना चाहिए, सरकार को कोई न कोई ऐसी इफैक्टिव पॉलिसी बनानी चाहिए ताकि अनइम्प्लॉयमैंट प्राब्लम का जो चैलेंज है, हम उसे भी मीट आउट कर सकें।

          जहां तक प्रधान मंत्री जी का प्रश्न है, प्रधान मंत्री जी की योग्यता पर मैं कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहता। लेकिन मैं कभी-कभी प्रधान मंत्री जी को असहाय की स्थिति में निश्चित रूप से पाता हूं। मुझे यह महसूस होता है कि  जैसे कोई इम्पावर्ड कमेटी ऑफ मिनिस्टर्स होती है, इस सरकार की ऐसी हालत हो गई है, ऐसे लगता है जैसे पावर सैंटर कहीं और है। एक गैर-संवैधानिक संस्था बनी हुई है। उसके द्वारा जो भी निर्णय हो जाते हैं, उसे मानने के लिए प्रधान मंत्री जी बाध्य हैं। मैं समझता हूं कि यह भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन हालात ऐसे हैं। एनडीए की भी हुकूमत रही है। अटल जी हमारे प्रधान मंत्री रहे हैं। उनकी लीडरशिप को भी इस देश ने देखा है कि चाहे ग्रोथ रेट भी बढ़ी, लेकिन हमने रेट ऑफ इनफ्लेशन को नहीं बढ़ने दिया। विकास दर बढ़ी लेकिन महंगाई को हमने बढ़ने नहीं दिया। एनडीए का वह समय भी इस देश ने अच्छी तरह देखा है। लेकिन मैं समझता हूं कि यूपीए सरकार की इकोनॉमिक्स का सिद्धान्त ही कुछ अजीबोगरीब है। विकास दर ऊंची हो, तेजी का दौर हो तब भी महंगाई, विकास दर कम हो तब भी महंगाई यानी महंगाई से हमें किसी प्रकार निजात नहीं मिल सकती। चाहे मंदी हो या तेजी हो। पता नहीं महंगाई के साथ इस सरकार का क्या अफेयर है, यह हमारी समझ से परे है। ...( व्यवधान) पुराना संबंध है, क्योंकि जब-जब यह सरकार आयी है तब-तब महंगाई तेजी के साथ बढ़ी है।

          महोदय, हमारा यह मानना है कि ग्रोथ और इन्फ्लेशन के बीच एक तालमेल होना चाहिए। जैसा  एनडीए के शासन काल में था, जब आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी भारत के प्रधान मंत्री थे। मुझे वह दिन याद है, जिस समय उन्होंने ग्रोथ रेट के बारे में कहा था कि हम 8 परसेंट के टारगेट को एचीव करेंगे। उस समय आपोजिशन में बैठे हुए लोगों की तरफ से कहा गया था कि यह मुंगेरी लाल के हसीन सपने हैं। ग्रोथ रेट के 8 परसेंट के टारगेट को यह गवर्नमैंट कैसे एचीव कर सकती है? लेकिन हम लोगों ने 8.4 परसेंट तक ग्रोथ रेट के टारगेट को एचीव करने में सफलता प्राप्त की। अब डबल डिजिट ग्रोथ की बात तो दूर, डबल डिजिट महंगाई के दंश को भी हमारा देश झेल चुका है। यह बात सच है कि अब रेट ऑफ इन्फ्लेशन में थोड़ी कमी आयी है। वह 7.65 तक पहुंची है। लेकिन महंगाई से देश को आज तक निजात नहीं मिली है। हमने इससे देश को कैसे छुटकारा दिलाया था? महंगाई को नियंत्रित करने के लिए, ग्रोथ रेट को बढ़ाने के लिए इफ्रास्ट्रक्चर पर भारी मात्रा में जितना हैवी इन्वेस्टमैंट हो सकता है, मैं समझता हूं कि वह हैवी इन्वेस्टमैंट हमने किया था, जिसका परिणाम यह था कि उस समय महंगाई नहीं बढ़ने पायी थी। रूरल इकोनॉमी को स्ट्रैन्देंन करने के लिए जितने हैवी इन्वेस्टमैंट की आवश्यकता थी, वे हैवी इन्वेस्टमैंट करने में भी हम पीछे नही रहे। इस सरकार की गलत नीतियों के कारण ही आज हालात इस प्रकार के पैदा हो गये हैं कि गांव में रहने वाला गरीब किसान जो आत्मनिर्भर होना चाहिए, आत्मनिर्भरता की बात तो दूर अब वह सरकार के ऊपर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं। यह जो कुछ हो रहा है, इस सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण हो रहा है।     

          अभी मनरेगा की चर्चा की गयी। गिरिजा व्यास जी ने भी अपने भाषण में इस बारे में कहा है और शशि थरूर जी ने भी उसकी बहुत प्रशंसा की है। यह ठीक है कि कुछ लोगों को इससे रोजगार मिलता है, लेकिन मनरेगा की हालत क्या है?  वह करप्शन की सीमा तक है। इस करप्शन से कैसे  निजात मिलेगी? मैं कुछ आंकड़े देना चाहूंगा। दिसम्बर 2011 तक 1452 करोड़ रुपये का खर्च हुआ, यानी एक्सपेंडीचर है। पिछले छः वर्षों में इतना खर्च हुआ है। पिछले दो वर्षों में पर हाउस होल्ड वर्क डेज में तेजी के साथ गिरावट आयी है। सरकार दावा करती है कि सौ दिनों का रोजगार मिलता है। कभी दावा करती है कि कम से कम 75 दिनों का रोजगार प्रति परिवार को मिलता है, जबकि ऐसा नहीं है। वर्ष 2009-10 में इसमें गिरावट आयी है और केवल 54 डेज ही काम मिल पाया है।  वर्ष 2010-11 में और गिरावट आयी है। केवल पर हाउस होल्ड 47 डेज का ही काम मिल पाता है।  इस फाइनेंशियल ईयर में दिसम्बर तक केवल 32 डेज पर हाउस होल्ड को ही रोजगार मिला है। फेक मास्टर रोल बन रहे हैं, यानी फर्जी मास्टर रोल बन रहे हैं। जॉब कार्ड भी बनवाने के पैसे लिये जा रहे हैं। कोई जाकर नीचे गरीबों से पूछे कि उनकी क्या हालत है? उनको लो वेजेज, यानी कम मजदूरी दी जा रही है। उन्हें पचास रुपये, साठ रुपये और सत्तर रुपये दिये जा रहे हैं। उन मजदूरों से हमने जाकर बात की है इसलिए मैं यहां पर चर्चा कर रहा हूं।  मनरेगा में इस समय जो करप्शन व्याप्त है, मैं ऐसा महसूस करता हूं कि इसे दूर किये जाने की आवश्यकता है।

          महोदय, आज भी गांवों से शहरों की ओर पलायन तेजी के साथ बढ़ा है। यही कारण है कि मनरेगा का जो लाभ गरीबों को मिलना चाहिए, उसका लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है। किसानों के संबंध में मैं यहां चर्चा करना चाहूंगा। किसानों की हालत दिनों-दिन बद से बदतर होती जा रही है। पिछली बार इसी सदन में जीरो ऑवर में मैंने क्रॉप होलीडे, आंध्र प्रदेश की चर्चा की थी। यह बहुत ही गंभीर विषय है। यहां का किसान ...( व्यवधान) क्रॉप होलीडे जैसे डिसीजन लेने के लिए मजबूर हो जाता है। इस प्रकार के हालात क्यों पैदा होते हैं? आप फूड सिक्योरिटी बिल लागू करने जा रहे हैं। यदि उत्पादन नहीं बढ़ेगा, तो फूड सिक्योरिटी बिल आप भले ही यहां पारित करा लें, वह एक्ट बन जाये, लेकिन उसका लाभ जिन लोगों को मिलना चाहिए, उन्हें वह कैसे मिल पायेगा, इस बारे में भी सरकार को विचार करने की आवश्यकता है।

          कपास के बारे में आपने एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन उस पाबंदी को समाप्त करने की अब आपने घोषणा की है। यह हमारी समझ से परे है कि क्यों इस पर पाबंदी लगाई गयी? इंटरनेशनल मार्केट में स्वाभाविक है कि कपास के किसान को अच्छी कीमत मिलती, किस सोच के आधार पर पाबंदी लगाई गयी, यह मैं कह नहीं सकता हूं। हालात तो आज ऐसे हो गए हैं कि किसानों का आलू दो रुपये किलो बिक रहा है। डिस्ट्रेस सेलिंग हो रही है, जितनी लागत लगी है आलू पैदा करने में, प्याज पैदा करने में, टमाटर पैदा करने में, किसानों का वह लागत मूल्य भी नहीं निकल पा रहा है। आपने जो कृषि ऋण बांटा है, मैं उसकी थोड़ी चर्चा यहां करना चाहूंगा। आपने कहा है कि वर्ष 2011-12 में किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए 4 लाख 75 हजार करोड़ रुपये ऋण के रूप में दिए जाएंगे। इसके पहले 4 लाख 60 हजार करोड़ रुपये का डिसबर्समेंट किसानों को हुआ था, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि चंडीगढ़ और दिल्ली, मैं समझता हूं कि चंडीगढ़ और दिल्ली में एग्रीकल्चर लैण्ड का एक्वीजिशन बहुत हुआ है, वहां पर 32 हजार 400 करोड़ का लोन डिसबर्समेंट हुआ है। लेकिन उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा राज्य है, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ - इन चार राज्यों को मिलाकर केवल  31 हजार करोड़ रुपये का कर्ज वितरित हुआ है। कैसे किसान उत्पादन बढ़ाएंगे? मैं समझता हूं कि इस ओर भी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। मुझे लगता है कि कहीं इसमें भी कोई बड़ा घोटाला तो नहीं है। इसकी तरफ भी नजर डालने की आवश्यकता है। खाद्यान्न उत्पादन इस समय पूरी तरह से रुक सा गया है। वैसे पिछले वर्ष यह बताया गया था कि 241.56 मिलियन टन उत्पादन हुआ है, लेकिन मैं समझता हूं कि इतने उत्पादन से इस देश का कल्याण नहीं होगा, उत्पादन को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है। इसलिए सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। पिछले सत्र में भी मैंने कहा था और फिर से अपनी बात को दोहराना चाहता हूं कि इस एग्रीकल्चर पॉलिसी के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए संसद का 7 या 10 दिनों का एक स्पेशल सेशन बुलाया जाना चाहिए जिससे कृषि नीति में क्या-क्या चेंजेज लाए जा सकते हैं, उस पर गंभीरतापूर्वक विचार हो सके। नेशनल फार्मर्स कमीशन, जिसे स्वामीनाथन कमीशन के नाम से भी जाना जाता है, की रिपोर्ट वर्ष 2005 में आ चुकी है, लेकिन आज तक उसे इंप्लीमेंट नहीं किया गया है। मैं चाहता हूं कि स्पेशल सेशन बुलाया जाएगा, तो हम लोग स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट पर भी विचार करेंगे, किन-किन चीजों पर तुंत अमल किया जाना चाहिए, उन्हें अमल में लाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए, संसद उसका भी सुझाव दे सकेगी।

          एग्रीकल्चरल लोन पर 7 प्रतिशत रेट ऑफ इंट्रेस्ट की बात की गयी है। राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में मैं देख रहा था कि जो समय से कर्ज की अदायगी कर देंगे, उनको 3 फीसदी की छूट दी जाएगी, यानि उनको चार प्रतिशत रेट ऑफ इंट्रेस्ट देना पड़ेगा। मैं भी फार्मर्स कम्युनिटी से आता हूं, मैं कहना चाहूंगा सरकार को दृढ इच्छाशक्ति के साथ यह फैसला करना चाहिए कि किसानों को, जो सचमुच खेती करने वाले हैं, उन्हें एक प्रतिशत रेट ऑफ इंट्रेस्ट पर एक साल के लिए लोन मुहैया कराया जाए। यदि वह एक साल तक कर्ज की अदायगी नहीं करता, तो उसके बाद उसे बढ़ाकर उन से तीन प्रतिशत रेट ऑफ इंट्रेस्ट लीजिए, लेकिन तीन प्रतिशत से ज्यादा रेट ऑफ इंट्रेस्ट एग्रीकल्चर लोन पर किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए।

          इस सरकार के इकबाल के बारे में क्या कहें, अभी जो चुनाव परिणाम आए हैं, उनसे साफ जाहिर हो गया है कि सरकार का इकबाल इस समय कैसा है। टू-जी स्पेक्ट्रम का मामला था, सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, 122 लाइसेंसेज को जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया है, मैं समझता हूं कि इसे सिर्फ लीगल एंगिल से ही नहीं देखना चाहिए, बल्कि मॉरल और एथिकल एंगिल से भी देखा जाना चाहिए। भले ही यह क्रिमिनल कल्पेबिल्टी का मामला न हो, लेकिन इस सच्चाई को कौन नकारेगा कि यह मॉरल अथवा एथिकल कल्पेबिल्टी का मामला नहीं बनता है? लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला हो गया, उसे उसने स्वीकार कर लिया। अरे, किसी सरकार की कोई नैतिक जवाबदेही भी होती है।   हुकूमत केवल नियम और कानूनों से नहीं चलती है, हुकूमत चलती है सरकार के इकबाल से, सरकार की क्रेडिबिलिटी से और नैतिक बल से, ऐसे हुकूमत नहीं चलती है। एस बैंड के एलोकेशन के बारे में जो कुछ हुआ है, उसकी चर्चा मैं नहीं करना चाहूंगा, लेकिन देवास मल्टीमीडिया के बारे में कहना चाहूंगा। उसकी डील एंट्रीक्स के साथ हुई है। उसके बारे में भी जो बातें समाचार पत्रों में आ चुकी हैं, मैं उनके विस्तार में नहीं जाना चाहूंगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि वित्त मंत्रालय द्वारा नियमों को तोड़ कर देवास को क्यों समय-समय पर मंजूरी दी जाती रही है, इसकी जांच होनी चाहिए कि क्यों ऐसा हुआ है। वित्त मंत्रालय की मेहरबानी से 18 मई, 2006 टेलीकाम वेंचर्स, एलएलसी और कोलम्बिया केपिटल ने देवास में इंवैस्टमेंट किया। ये दोनों कम्पनीज देवास की अमेरिका की सब्सिडियरी हैं और कानून के मुताबिक सब्सिडियरी के होल्डिंग कम्पनी में निवेश सम्भव नहीं है, इस सच्चाई को एक साधारण आदमी भी जानता है। फिर भी नियमों में छूट दी जाती रही और ये सारी चीजें होती रहीं। ठीक है उस डील को रद्द कर दिया, लेकिन यह देखा जाना चाहिए कि उस समय देवास मल्टीमीडिया को जो बहुत सारी नियमों में तोड़-मरोड़कर सुविधाएं दी गईं, जो छूट मुहैया कराई गई, उसके पीछे इंटैंशन क्या रहा है, इसकी जांच तो होनी चाहिए। इसलिए मैं आपके माध्यम से प्रधान मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि जब वह जवाब देने के लिख खड़े हों तो सदन यह जानना चाहेगा कि वित्त मंत्रालय द्वारा देवास मल्टीमीडिया को सुविधाएं क्यों मुहैया कराई गईं? मुझे पूरा विश्वास है कि इस बारे में बताया जाएगा।

          मैं इस अभिभाषण को देख रहा था। अभिभाषण के प्रारम्भ में ही चौथे पैराग्राफ में करप्शन और ब्लैकमनी की चर्चा की गई है। मैं समझता हूं कि संसद में लोकपाल बिल पारित किया जाना है, लेकिन लोकपाल बिल पारित कर देने से ही करप्शन को हम मिनीमाइज़ कर देंगे, ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है। मैं समझता हूं कि इसके अलावा और भी बहुत सारे इफेक्टिव मैकेनिज्म की आवश्यकता होगी। उस सम्बन्ध में सरकार को विचार करना चाहिए। लेकिन "लोकपाल बिल" पोलिटिकल सैबोटाज जिस तरीके से राज्य सभा में हुआ है, उससे सचमुच सभी देशवासियों को बहुत पीड़ा हुई है। हमारा दल यह चाहता था कि राज्य सभा 12 बजे के बाद भी रात को चले और उसी सत्र में लोकपाल बिल पारित होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

          मेरी बगल में आदरणीय आडवाणी जी बैठे हुए हैं। उन्होंने कालेधन के मुद्दे को 2009 में सदन में उठाया था। कालेधन के बारे में मुझे ज्यादा नहीं कहना है। मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि प्रधान मंत्री जी अथवा वित्त मंत्री जी, मेरे खयाल से वित्त मंत्री जी ने इस सदन में आश्वासन दिया था कि कालेधन पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाएगा। आज भी हम  लोग उस श्वेत पत्र की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि जब इस चर्चा पर प्रधान मंत्री जी जवाब देंगे तो वह बताएंगे कि कालेधन पर श्वेत पत्र कब आ रहा है। हमारी चिंता उस समय ज्यादा बढ़ गई जब इस देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के निदेशक ने भी कहा कि लगभग 500 बिलियन डालर्स की ब्लैकमनी दुनिया के दूसरे देशों में पड़ी हुई है, जो गलत तरीके से कमाई हुई है। मैं समझता हूं कि उससे बड़ी जांच एजेंसी देश में कोई और नहीं है।

          यह सारा सिलसिला चल ही रहा था कि केवल चुनावी सफलता हासिल करने के लिए मजहब के आधार पर आरक्षण देने की घोषणा कर दी गई। सभापति महोदय, मैं साफ कर देना चाहता हूं कि जहां तक हमारे दल का सवाल है, हम जाति-पंथ अथवा मजहब यानि कास्ट, क्रीड अथवा रिलीजन के आधार पर इन्सान और इन्सान के बीच नफरत करने वाले लोग हम नहीं हैं। हम इन्साफ और इन्सानियत की राजनीति करने वाले लोग हैं। लेकिन जब हमने देखा कि भारत के संविधान में मजहब के आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है और स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने भी 1961 में यह कहा था कि साप्रदायिक आधार पर आरक्षण भारत के लिए एक छोटी सी गलती नहीं होगी, बल्कि भारत के लिए विनाशकारी होगा, भारत के लिए विभाजनकारी होगा। उन्हीं पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की विरासत की राजनीति करने वाले लोग आज उनकी मंशा के विपरीत जाकर मजहब के आधार पर आरक्षण देने दे रहे हैं। भारत की संविधान सभा की बैठक में भी क्या-क्या हुआ। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे जितने भी सम्मानित सदस्य थे, सबने विरोध किया।

धर्म और मजहब के नाम पर भारत माता के दो टुकड़े हो गये हैं, इसलिए धर्म और मजहब के नाम पर आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए, आजाद भारत का पुनर्विभाजन करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। जहां तक हम लोगों का मत है हम कहते हैं कि हिंदू है, मुसलमान है, ईसाई है, सिख है, कोई भी गरीब हो उसे आरक्षण का लाभ दिया जाएगा तो भारतीय जनता पार्टी उसका साथ देगी। लेकिन अब सामाजिक और शैक्षिक आधार पर जो पिछड़े हुए हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, यह हमारे यहां संवैधानिक प्रॉविजन है। यदि प्रधान मंत्री जी को लगता है कि इस प्रॉविजन के कारण मुस्लिम भाइयों और अन्य धार्मिक लोग हैं उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है तो सामाजिक और शैक्षिक बैकवर्ड के जो मानक हैं उनमें चेंज ला सकते हैं अथवा यह सामाजिक और शैक्षिक जो पिछड़ापन है इसे संसद को विश्वास में लेकर रि-डिफाइन किया जा सकता है, यह क्यों नहीं हो सकता है? लेकिन रिलीजन के बेस पर नहीं होना चाहिए। गरीबी तो सारे देश में है, चाहे किसी जाति या धर्म का क्यों न हो, गरीबी तो दूर होनी चाहिए। हम भारतीय जनता पार्टी के लोग भी ऐसा चाहते हैं। अगर कहीं भी इसमें कोई अड़चन आती है तो अड़चन को दूर करने के लिए हम लोग पूरी तरह सहयोग करने के लिए तैयार हैं।

          सभापति महोदय, मुझे ज्यादा तो नहीं कहना है लेकिन कुल मिला-जुलाकर इतना ही कहना चाहूंगा कि इस समय सरकार की गलत नीतियों के कारण हमारा देश संकट के दौर से गुजर रहा है, प्रतिपक्ष में होते हुए भी हम लोग इस संकट से देश को उबारने के लिए सरकार को सहयोग करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। लेकिन सरकार की विश्वसनीयता, सरकार का इकबाल इस समय देश से पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। मैं समझता हूं कि उसे रेस्टोर करने की जरुरत है, यदि सरकार उसे रेस्टोर नहीं कर सकती है, तो मैं समझता हूं कि सरकार के बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। इतना ही निवेदन करते हुए यह जो धन्यवाद प्रस्ताव है इसका समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                                         

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):  माननीय सभापति महोदय, मैं महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। आपने मुझे समय दिया, इसके लिए धन्यवाद।

          मैं बड़े ध्यान से जो धन्यवाद प्रस्ताव की शुरुआत में माननीया गिरिजा व्यास जी और शशी थुरुर जी को सुना। माननीया गिरिजा व्यास जी ने बड़े विस्तार से और कुछ शेरो-शायरी के साथ भी अपनी बातें रखीं। माननीय शशी थुरुर जी का जो पूरा भाषण था, वह ज्यादातर विदेश-नीति पर ज्यादा था। विदेशी चाल-ढाल, वहां के खान-पान, वहां की व्यवस्था के बारे में ज्यादा रहा। अपने देश के बारे में कोई ऐसा सुझाव उन्होंने नहीं बताया जिससे जो हमारी विकास की दर है या रेपो-रेट को हम कैसे ऊपर ले जाएं, इसके बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया। माननीय राजनाथ सिंह जी का भी मैं भाषण सुन रहा था, बड़ा अच्छा लगा। उन्होंने देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के बारे में सदन का ध्यान आकर्षित किया और तमाम बिंदुओं पर अपनी बात को रखा। मैं उनके भाषण से अपने को संबद्ध करते हुए आगे बढ़ना चाहूंगा। कल जब महामहिम राष्ट्रपति जी  ने, सेंट्रल हॉल में, सदन के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए अपनी बातें रखीं, मैंने देखा कि शाम को विभिन्न दलों की तरफ से जो राय आई, प्रतिक्रियाएं आईं, उन्हें भी मैंने टी.वी. में विस्तार से देखा। विपक्ष के भाइयों ने कहा कि राष्ट्रपति जी का भाषण एक तरह से जो सरकार के दस्तावेज होते हैं, उसकी जो रीति-नीति होती है, उसी को महामहिम राष्ट्रपति जी व्यक्त करती हैं। विपक्ष ने कहा कि यह अभिभाषण मध्यावधि चुनाव की तरफ संकेत दे रहा है। तमाम तरीके की प्रतिक्रियाएं आईं, मैं उन पर विस्तार से नहीं जाना चाहूंगा, लेकिन इतना ही कहना चाहूंगा कि देश बहुत ही विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है।

महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में कहा कि देश की आर्थिक विकास दर 8.4 प्रतिशत वर्ष 2011-12 में थी। इस वर्ष हमारी विकास दर गिर कर 7 प्रतिशत हुई है। आने वाले समय के लिए सरकार ने कहा है कि हम 8 से 9 प्रतिशत तक विकास दर को आगे बढ़ाएंगे।

          राष्ट्रपति महोदया का कार्यकाल जुलाई महीने में समाप्त हो रहा है। इससे पहले के वर्षों में मैंने देखा कि वे आती थीं, भाषण करती थीं और फिर चली जाती थीं, लेकिन इस बार वे शिष्टाचार के नाते दोनों सदनों के सभी सम्मानित सदस्यों से मिलकर गईं। मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी, लेकिन अभिभाषण के दौरान पांच बार टीका-टिप्पणी की गई, वह अच्छी बात नहीं थी। सैंट्रल हाल की अपनी गरिमा रही है। उच्च पीठ को तथा अन्य सम्मानित सदस्यों को भी बुरा लगा होगा। जिन लोगों की पीड़ा या वेदना थी, वे दोनों सदनों में अपनी बात कह सकते थे, जैसा कि आदरणीय राजनाथ सिंह जी ने कहीं, यह एक प्लेटफार्म है, जहां हम अपनी बात कह सकते हैं। अभिभाषण में महामहिम राष्ट्रपति ने कहा है कि वर्तमान में केंद्र की सरकार ने अपना आधा कार्यकाल बड़े अच्छे तरीके से बिताया है। हम यह आश्वस्त भी करना चाहेंगे कि मध्याविधि चुनाव की तरफ न जाएं। मेरे खयाल से बीजेपी चाहती होगी कि मध्याविधि चुनाव हों, लेकिन अन्य लोग ऐसा नहीं चाहते होंगे।...( व्यवधान) हम मध्याविधि चुनाव नहीं चाहते हैं। हम किसी भी कीमत पर सरकार को गिरने नहीं देंगे। जनता ने हमें चुनकर भेजा है, जनादेश मिला है, लेकिन आप उतावले हैं। आप थोड़ा-सा इंतजार कीजिए। आपके लिए शुभ संकेत है। आदरणीय राजनाथ सिंह ने कहा कि पांच राज्यों के चुनाव संकेत दे रहे हैं, यह ठीक बात है लेकिन अभी आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। आप पांच राज्यों के परिणामों से इतना उत्साहित न हों कि हम केंद्र में सरकार बनाने जा रहे हैं।

          जहां तक पुस्तिका में उपलब्धियों के बारे में बताया गया, मैं पढ़ रहा था और बहुत विस्तार से सदन में भी चर्चा हुई। कई मुद्दों और नियमों के बारे में हमने चर्चा की है, लेकिन मैं किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान आकर्षित कराना चाहूंगा। आज भी 75 फीसदी किसान गांवों में रहते हैं। आज खेतिहर मजदूर, जिनकी किसानी में अरुचि बढ़ी है और लाभकारी मूल्य उन्हें नहीं मिल पा रहा है तथा गांवों से शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। हमारे खेतिहर मजदूर, किसान या तो दिल्ली में, मुम्बई में या देश के दूसरे बड़े-बड़े महानगरों में गुजरात में, बंगाल में कमाने के लिए जा रहे हैं, इस बारे में भी हमें गंभीरता से सोचना होगा। किसानों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। आपने कर्ज माफ किए हैं, लेकिन कर्ज माफ करना ही पर्याप्त नहीं है। कर्ज माफी से मेरे खयाल में आत्महत्याएं बढ़ी हैं, इसका भी मूल्यांकन आपको करना पड़ेगा, चाहे दक्षिण भारत की स्थिति हो या बुंदेलखंड की स्थिति हो। हमें सच बात कहने में कभी गुरेज नहीं करना चाहिए और न सच बात को छुपाना चाहिए। बुंदेलखंड की स्थिति बहुत बदतर है। आपने पैकेज दिया है, आप विभिन्न राज्यों को पैकेज दीजिए चाहे पूर्वोत्तर राज्यों को दीजिए या बुंदेलखंड को पैकेज दीजिए, लेकिन उसका मूल्यांकन भी कीजिए कि हमने जो पैसा दिया है, उसका सही मायने में सदुपयोग हुआ है या नहीं। जिसके लिए पैसे दिए हैं, उसका सदुपयोग हुआ है या नहीं? लेकिन हम मूल्यांकन नहीं करते। हम राज्यों पर छोड़ देते हैं। हमेशा यह हुआ है कि चर्चा में किसी मुद्दे पर बात हुई है तो केंद्र ने राज्य को कोसा है और राज्य ने केंद्र को कोसा है। जबकि संविधान के संघीय ढांचे में यह अधिकार है कि जो भी कार्य है, जिस विभाग का कार्य है, चाहे किसानों, मजदूरों या नौजवानों की समस्या हो या शिक्षा, स्वास्थ्य की समस्या हो, यह राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन हमें जिम्मेदारी से हटना नहीं चाहिए कि हमने बजट दे दिया और इसके बाद मूल्यांकन भी करना चाहिए। हमें रिसर्च करनी चाहिए। आज देश में सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई जनसंख्या है। मेरे ख्याल से अभिभाषण में बढ़ती हुई जनसंख्या को कैसे रोका जाए, इसके बारे में मेरे ख्याल से कोई बात नहीं कही गई है। इसमें यह बात कहनी चाहिए थी कि बढ़ती हुई जनसंख्या से आने वाले समय में हम कैसे गरीबी से लड़ सकते हैं। हम किसानों, मजदूरों की समस्या से कैसे लड़ सकते हैं। हम देशवासियों के बच्चों, कन्याओं को कैसे शिक्षा दे सकते हैं? हम कैसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था कर सकते हैं? इस पर हमें सोचना होगा। जब तक आप जनसंख्या पर रोक नहीं लगाएंगे, मेरे ख्याल से हम किसी भी बात में आगे नहीं बढ़ सकते हैं। रेपो रेट या विकास दर पर आगे नहीं बढ़ सकते।

          दूसरी बात मैं किसानों के बारे में कहना चाहता हूं। यह बात सही है कि किसानों की समस्याओं को देखकर हम चुनाव से आए हैं। हमने गांव-गांव जाकर देखा है। विजय बहादुर जी यहां बैठे हैं, बुंदेलखंड की समस्या को इन्होंने बड़ी नजदीकी से देखा है। वहां किसान बिल्कुल पलायन कर चुका है। आज किसान जो उपज करता है, उसे उसका लागत मूल्य नहीं मिल पाता है। बंसल जी, यहां तक कि स्वामीनाथन रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रति एकड़ किसान की उपज की लागत जब तक हम डेढ़ गुना नहीं देंगे तब तक किसानों की स्थिति में सुधार नहीं कर सकते। महंगाई बढ़ रही है इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि आपको लागत मूल्य डेढ़ गुना देना पड़ेगा। जहां तक समर्थन मूल्य की बात है, आपने फिक्स कर दिया है लेकिन राज्य सरकार और बिचौलिए इसकी व्यवस्था नहीं कर पाते हैं। चाहे गेहूं या धान के कांटे या समर्थन मूल्य की बात हो, औने-पौने भाव में किसान वहां तो ले जाता है लेकिन कांटो पर लिया नहीं जाता है। आप सरकारी कांटे की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। अब आप कहेंगे कि यह राज्य सरकार देखे। आपको भी देखना चाहिए। आप एफसीआई के गोदाम में ही काँटा (तौल) लगवा दीजिए। केंद्र की तमाम एजेंसियों के माध्यम से काँटा (तौल) लगवा दीजिए। कोआपरेटिव सैक्टर है, वहां काँटा (तौल) काँटा (तौल)  लगवा दीजिए। अब आप कहेंगे कि कोआपरेटिव सैक्टर राज्य सरकार देखे। लेकिन आपको कुछ न कुछ व्यवस्था तो देखनी होगी। किसानों को ब्याज मिलता है, कृषि उपकरण या बीज मिलते हैं, उसका उत्पादन करके जब वह कांटे पर ले जाता है क्योंकि मौसम की मार होती है तो उससे कहा जाता है कि इसका उत्पाद ठीक नहीं है, हम कांटे पर नहीं लेंगे। वह उसे फिर ले जाता है और बिचौलिया औने-पौने भाव देता है यानी आप समझ लीजिए कि 700-800 रुपए प्रति क्विंटल देता है। आज भी धान क्रय केंद्रों में पड़ा हुआ है लेकिन नहीं लिया जाता है। हमें जिला अधिकारी को टेलीफोन करना पड़ता है कि फलां किसान गया है, आप ले लीजिए। हम कितने टेलीफोन करेंगे? हर किसान बड़ा किसान नहीं होता है, सीमांत लघु किसान होता है। वह साल भर का अनाज रखता है और उसके बाद जो बचता है उसे अगली फसल बोने के लिए रखता है। लेकिन आज यह स्थिति है कि हम इसकी भी व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। इसे हमें बड़ी गंभीरता से इसे देखना चाहिए।

          अब ऋण की बात है आती है। बिजली, पानी, खाद उसे समय पर नहीं मिल पाता है। खाद की स्थिति की बात पिछले सत्र में उठी थी कि खाद या नेपाल के बार्डर पर चली जाती है या बांग्लादेश के बार्डर पर पकड़ी जाती है। इस पर रोक लगानी होगी। जब किसान को पानी चाहिए होता है तो समय पर नहीं मिल पाता है, खाद नहीं मिल पाती है। वह लाइन में खड़ा रहता है, उसे पुलिस की लाठी भी खानी पड़ती है और खाद ब्लैक हो जाती है। इसके लिए हमें ठीक व्यवस्था करनी होगी। जब तक इस व्यवस्था को ठीक नहीं करेंगे तब तक किसानों की स्थिति ठीक नहीं होगी और देश विकास नहीं कर सकेगा। बेरोजगारी के बारे में बड़े इत्तमिनान से बात होती है। जब भी बेरोजगारों की बात होती है, सरकार की तरफ से जवाब आता है कि हमने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी दे दी है। बेरोजगारों को मनरेगा से मत देखिए। आपने बेरोजगारी की समस्या में शिक्षित नौजवान बेरोजगारों के लिए क्या व्यवस्था की है? महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण में लाखों लोगों को रोजगार देने की व्यवस्था की बात है।  लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि हमारे जिन शिक्षित बेरोजगार नौजवानों की उम्र बीत जाती है, जो नौकरी प्राप्त नहीं कर पाते हैं। आजकल विदेशी कंपनियां आई हुई हैं, ये लोग कांट्रैक्ट बेसिस पर नौकरी करते हैं, वर्ष में पैकेज के हिसाब से नौकरी करते हैं। उस पैकेज के हिसाब से उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। समाजवादी पार्टी ने इस सदन के माध्यम से कई बार कहा है कि जो शिक्षित बेरोजगार है, जिन्हें मां-बाप पढ़ा-लिखाकर भेजते हैं कि जाइये, अब पैसा कमाकर लाइये और वे कमा नहीं पाते हैं तो कम से कम उन्हें आपको बेरोजगारी भत्ता देने की व्यवस्था करनी चाहिए। हमारी पार्टी पुरजोर तरीके से इसकी वकालत करती है और सभापति जी आपके माध्यम से सरकार को बताना चाहती है कि शिक्षित बेरोजगारों के लिए सरकार रोजगार की व्यवस्था करें अन्यथा उन्हें बेरोजगारी भत्ता देने की व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी। इस महंगाई के जमाने में प्रत्येक नौजवान को आपको कम से कम पांच हजार रुपये महंगाई भत्ता देने की व्य़वस्था करनी चाहिए। तभी हम आगे बढ़ सकते हैं और मजदूरों, किसानों और खेतिहर मजदूरों को जो पलायन हो रहा है, वह रुक सकेगा।

          अभी आदरणीय राजनाथ सिंह जी कह रहे थे कि हम मजहब और धर्म के आधार पर आरक्षण देने के विरोधी हैं और दूसरी तरफ आपने यह भी कहा कि यह संविधान में लिखा हुआ है। संविधान में इस बात का जिक्र है कि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर जिनकी स्थिति कमजोर है, चाहे आपकी सरकार हो या कोई भी सरकार हो, सरकार आयोग क्यों बनाती है, किसानों के लिए आपने स्वामीनाथन आयोग बनाया, जिस पर आपने जिक्र किया कि इस पर एक हफ्ते सदन चले। उसी प्रकार से यदि रंगनाथ और सच्चर कमेटी बनाई गई है तो उसमें शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक आधार पर जिक्र किया गया है फिर आप आरक्षण देने के सवाल पर पीछे क्यों हट रहे हैं? आपने दिया भी है तो कोटे में कोटा दिया, जिसका बहुत विरोध हुआ है और उसका खामियाजा आपने भुगता है। हम चाहेंगे कि अगर आपने आयोग बनाया है तो आयोग के निर्देश, आयोग की सिफारिश यहां सदन के पटल पर रखकर उसकी चर्चा करा लीजिए और आबादी के अनुसार आरक्षण देने की व्यवस्था कीजिए। समाजवादी पार्टी ने हमेशा इस बात को उठाया है कि आपने चार परसैन्ट दिया, जबकि आपको नौ परसैन्ट देना चाहिए। यदि आरक्षण की बात है तो आबादी के अनुसार 18 परसैन्ट दीजिए, चाहे इसके लिए आपको संविधान में संशोधन करना पड़े। समाजवादी पार्टी यह लड़ाई सदन के फ्लोर से लेकर सड़कों तक लड़ने का काम करेगी। मैं फिर से कहता हूं कि कोटे में कोटा नहीं होना चाहिए। यदि पिछड़ों को कोटा मिला है तो बड़ी कुर्बानियों के बाद मिला है। इसलिए मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि सरकार इसे गंभीरता से ले। वरना आने वाले समय में जो वर्ष 2014 का मिशन है, उसमें भी आपको मुंह की खानी पड़ेगी, इस बात के लिए आप तैयार रहें। ...( व्यवधान) यह बिल्कुल धार धरे बैठे हैं, जैसा माननीय सदस्य ने कहा है।

          महोदय, महामहिम राष्ट्रपति महोदया के अभिभाषण में मैं आजीविक सुरक्षा के बारे में पढ़ रहा था। खाद्य सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दिया है। जब हमारा उत्पादन बढ़ता है तो अनाज हम कांटों पर ले जाते हैं, उसके बाद ट्रेनों और ट्रकों के माध्यम से एक से दूसरी जगह गोदामों आदि जगहों पर ले जाते हैं। वर्तमान स्थिति में आपने देखा होगा कि बारिश के मौसम में हमारा लाखों टन अनाज सड़ गया। आप बंदरगाहों पर जो बाहर से अनाज मंगाते हैं, वह भी सड़ा मिला। अंत में सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में निर्देश देना पड़ा कि केन्द्र सरकार इस अनाज को गरीब और बीपीएल के लोगों के बीच में मुफ्त में बांटे। लेकिन आज तक एक दाना किसी को नहीं मिला। यह बात ठीक है कि आप खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आ रहे हैं। आपने कहा है कि एक बीपीएल को हम इतना अनाज देंगे, वह अलग बात है, लेकिन आज आप जो कहते हैं उसे पूरा कीजिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी आपने अनुपालन नहीं किया। आप जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनिययम लाने की बात कर रहे हैं और उसके बाद यह देने की बात कर रहे हैं। लेकिन जिस वक्त हमारा लाखों टन अनाज बर्बाद हुआ, उस वक्त आपको बांटना चाहिए था। कुछ नहीं करते तो आप काम के बदले अनाज योजना ले लेते तो आपका विकास होता, गांव का विकास होता और काम के बदले अनाज योजना के माध्यम से आप विकास कर सकते थे और जो लाखों टन अनाज बर्बाद हुआ, वह बच सकता था। लेकिन आपने विकास का काम नहीं किया। जबकि दैवीय आपदा के समय हम काम के बदले अनाज देने की योजना की बात करते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में जब सुप्रीम कोर्ट ने आपको निर्देश दिया था तो आपको वैसा करना चाहिए था।

          इसके अलावा आपने ऊर्जा सुरक्षा की बात कही है। साउथ में एर्नाकुलम की बात का इस सदन के तमाम सम्मानित सदस्यों ने विरोध किया। आज जब ऊर्जा सुरक्षा की बात उठती है तो तमाम एनजीओ कंपनियां हैं, कहा जाता है कि अमरीका के निर्देश पर ये लोग विरोध कर रहे हैं। लेकिन हमें गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि मांग और आपूर्ति में बड़ा फर्क है। आज ऊर्जा के क्षेत्र में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। यही कारण है कि जो हमारी विकास दर है, जब तक हम ऊर्जा का संचय नहीं करेंगे, ऊर्जा की क्षमता नहीं बढ़ायेंगे, ऊर्जा का उत्पादन नहीं करेंगे, चाहे आप थर्मल पावर को ले लीजिए, चाहे परमाणु ऊर्जा, कोयला ऊर्जा, पानी की ऊर्जा को ले लीजिए। मैं समझता हूं कि आपको ऊर्जा का संरक्षण करना पड़ेगा।  तब जा कर हमारा देश तरक्की कर सकता है। हमारे देश में तमाम संसाधन हैं, कल-कारखाने हैं, खेती के तमाम संसाधन हैं, जिससे बिजली से ही कटाई-मढ़ाई होती है। नहीं होता है तो बेचारे किसान पंपिंग-सेट लगा कर डीज़ल से चलाते हैं। लेकिन मंहगाई इतनी चरम-सीमा पर है कि आपने डीजल के दाम भी ढाई वर्ष में 10-15 बार बढ़ा दिए हैं। आपको इन सब परिस्थितियों को गंभीरता से देखना पड़ेगा।

          अब मैं पर्यापरण सुरक्षा की बात करता हूँ। पर्यावरण सुरक्षा और विकास, आपको दोनों का संतुलन रखना पड़ेगा। दोनों का विरोधाभास है। यही कारण है कि जयराम रमेश जी का विभाग बदल कर आपने उन्हें ग्रामीण विकास मंत्रालय दिया है। जब उन्होंने पर्यावरण पर जोर डाला तो विकास आड़े आया। जनहित में आपको कहीं न कहीं संतुलन बनाना पड़ेगा। आपको देखना पड़ेगा कि कहां किसकी उपयोगिता है, रॉ-मटिरियल है, संसाधन हैं, वहां पर आप दीजिए। जहां पर बेकार, बंजर भूमि है और जहां पर विकास नहीं हो रहा है, वहां पर आप लगाइए। राजनाथ सिंह जी अभी पूर्वोत्तर राज्य की बात कर रहे थे। पब्लिक अण्डरटेकिंग कमेटी का एक टूर पूर्वोत्तर गया था, जिसमें मैं भी था। वहां मैंने देखा कि पहाड़ों को काट कर चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाई जा रही हैं। उन पहाड़ों को जब काटा गया तो उसके अंदर की मिट्टी लाल रंग थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे पहाड़ रो रहा है और उसमें से खून गिर रहा है। यह स्थिति है। आप पर्यावरण को भी सुरक्षित रखिए। हमारा विकास भी बढ़े, इसका संतुलन बनाने के लिए आपको कोई कार्य-योजना लानी पड़ेगी।

          अभी राजनाथ सिंह जी ने बाहरी और अंतरिक सुरक्षा के बारे में बड़े विस्तार से बात कही। सभापति जी, मैं आपके माध्यम से सरकार को याद दिलाना चाहूंगा कि इसी फ्लोर पर माननीय मुलयम सिंह यादव जी ने कहा था कि पड़ोसी राष्ट्रों में से सबसे ज्यादा बाहरी और अंतरिक खतरा हमें चीन से है। अरूणाचल प्रदेश की बात उन्होंने बड़े विस्तार से कही। आप लद्दाख की बात देखिए कि आए दिन हम समाचार पत्रों में पढ़ते हैं और टी.वी. पर देखते हैं कि चीन आया, उसने कब्जा किया। मेरे ख्याल से रोज कुछ न कुछ कब्जा हो रहा है। हमारे रक्षा मंत्री जी ने हिम्मत की और जब वे वहां पहुंचे तो उसका चीन ने उसका भी विरोध किया कि दखलअंदाजी हो रही है। कम से कम आपको मुंह तोड़ जवाब देना पड़ेगा। आपकी जो विदेश-नीति है, आपको बढ़-चढ़ कर वहां पर बात करनी पड़ेगी। ब्रह्म्पुत्र नदी की बात कही गई। यह बात सही है कि नदियों से ही हमारा विकास था। नदियां ही हमारी विरासत की देन थीं जिसकी वजह से हमने विकास किया। आज उस पर भी कोई बात नहीं हो रही है और उसे आपने ठंडे बस्ते में रख दिया है। कभी-कभी विदेश मंत्री का बयान आता है कि हम बात कर रहे हैं, जा रहे हैं, देख रहे हैं। ये सब बातें ऐसी हैं जिनसे आने वाले समय में हमें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। आप इनको देखिए ताकि इन समस्याओं से आने वाली पीढ़ी को दिक्कतें न हों।

          आज सुबह प्रश्न-काल में एनसीटीसी के बारे में चर्चा हुई लेकिन वह चर्चा पर्याप्त नहीं हो पाई। एनसीटीसी पर कई राज्यों से विरोध आ रहे हैं। कल ही बैठक हुई है, जिसमें राज्यों के मुख्य सचिव और डीजीपी शामिल थे। उनमें छह राज्यों ने एनसीटी का विरोध किया है। हम चाहते हैं कि दिन भर आप सदन में इसकी चर्चा करवा दीजिए, नियम 193 के तहत चर्चा करा दीजिए। यहां तमाम राज्यों और पार्टियों के लोग बैठे हुए हैं, इनके विचार भी आ जाएं। आप वहां के मुख्य मंत्रियों, अधिकारियों और तमाम पार्टियों के नेताओं को बुला कर बात कर लीजिए। जो आम सहमति हो उसको लागू करें। पता नहीं आप क्यों उलझे रहते हैं। आपके सामने बहुत सी चुनौतियां हैं। बहुत से बिल ऐसे हैं, जो आने चाहिए थे लेकिन वे नहीं आ पाए। आप ऐसा बिल ला कर रख देते हैं जिससे असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आपको समर्थन नहीं मिल पाता है। तमाम विपक्षी दल और हम भी कहते हैं कि हम आपको जनहित के मुद्दों पर समर्थन देने के लिए तैयार हैं। लेकिन ऐसा बिल न ले कर आएं जिससे कंट्रोवर्सी हो और सदन का समय व्यर्थ हो।

          यहां पर काला-धन और भ्रष्टाचार की बात कही गई है। अभी राजनाथ सिंह जी ने कहा कि पांच सौ बिलियन डालर्स से ज्यादा काला-धन विदेशों में पड़ा हुआ है। इसी पीठ से माननीय वित्त मंत्री जी ने कहा था कि भारत का जो भी पैसा विदेशों में काले धन के रूप में है, उसे हम वापस लाएंगे। आप उस पर रिसर्च कर रहे हैं, कार्यवाही कर रहे हैं और विदेशों से वार्ता कर रहे हैं लेकिन हम चाहते हैं कि जो नाम आपके पास हैं, उन पर आप एक श्वेत पत्र जारी कर दीजिए। कम से कम विपक्ष, जो भ्रष्टाचार और काले धन की बात करता है, उस पर कुछ अंकुश तो लगे। आप कुछ तो करके दिखाइये, लेकिन कहीं से भी आस, उम्मीद दिखाई नहीं पड़ती है। आपको इसे गंभीरता से लेना पड़ेगा।

          महोदय, सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और बताना चाहिए कि ऐसे कौन से लोग हैं, कौन सी एजेंसियां हैं, कौन से एनजीओज़ हैं, कौन से अधिकारी हैं, कौन से राज नेता हैं, उनका नाम खुलकर सामने आना चाहिए तभी जाकर इस पर अंकुश लग सकता है। ऐसा करने से लोग डरेंगे अन्यथा इस प्रकार से होता रहेगा और देश कंगाली के कगार पर चला जायेगा। अब मैं महंगाई की बात पर आता हूं। जैसे ही चुनाव हो रहा था, सुब्रहमण्यम स्वामी जी का बयान आया कि चुनाव के बाद पैट्रोलियम के दाम बढ़ेंगे। उसके बाद तमाम टी.वी. चैनल्स पर आने लगा कि चार-पांच रूपये तक दाम बढ़ेंगे। आपने सीएनजी गैस के दाम बढ़ा दिये। आपकी तैयारी है, आप कहते हैं कि जो हमारी कंपनियां हैं, हमने उनके ऊपर छोड़ दिया है। आपके पास पैट्रोलियम विभाग है, आपको मानीटरिंग करनी चाहिए, जो भी कंपनी है, विदेशों में क्रूड ऑयल कितने में है, वहां से कैसे लाते हैं, यहां पर उसे कैसे रिफाइन करते हैं, आपको इसकी मानीटरिंग करनी चाहिए। आप राज्यों से बात कर लीजिये, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कहिये कि वे अपने यहां टैक्स कम करें, जो कुछ आप कर लगाते हैं, उसे कम कीजिये, कम से कम जनता को कुछ तो राहत दीजिये। जब पैट्रोलियम के दाम बढ़ते हैं, डीजल के दाम बढ़ते हैं तो ट्रंसपोर्टेशन चार्ज बढ़ता है और इसके कारण से महंगाई आती है और महंगाई से तमाम लोग परेशान होते हैं। खासकर जो गरीब आदमी है, जो रोज का कमाने, खाने वाला है उसके ऊपर सबसे बड़ी चोट पहुंचती है। इसलिए आपको इस बात को भी गंभीरता से लेना पड़ेगा। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन से आपने ग्रामीण हटा दिया है और शहर और गांव दोनों में ही आप इसकी व्यवस्था करने जा रहे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य के नाम पर तो करोड़ों रूपये का घोटाला हुआ, सीबीआई इसकी जांच कर रही है, मैं विस्तार से इसमें नहीं जाना चाहूंगा। इसी प्रकार से जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास योजना में भी बड़े पैमाने पर घोटाला है, मनरेगा में भी बड़े पैमाने पर घोटाले हैं, इन सब घोटालों की आप गंभीरता से जांच कराइये। एक एजेंसी लगाइये कि जो हम अरबों, करोड़ों रूपये दे रहे हैं, वह कहां जा रहा है, कहां विकास हो रहा है, इसकी तरफ आपको जाना चाहिए। सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा की बात मैं करना चाहता हूं। अभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय का टीचर्स का डेलीगेशन आया। जो तमाम हमारे टीचर्स हैं, प्रोफेसर्स हैं, लेक्चरर हैं, उनकी जो भर्तियां हैं, संविदा पर टीचर्स रखे जाते हैं, उनकी जगह भी खाली है और वे जगहें शैडय़ूल कास्ट, शैडय़ूल ट्राइब्स की हैं, कुछ पिछड़े वर्ग की जगह हैं, लेकिन आपने उसे बैकलॉग करके तमाम भर्तियों के बाद आपने निकाल दिया। जो एस.सी., एस.टी. की भरने की बात है, वे बेचारे पीछे हो जाते हैं, उस पर जनरल कास्ट चला जाता है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोग जो प्रोफेसर, लैक्चरर हैं, उनके अधिकारों का कुठाराघात हो रहा है। वे संविदा पर पढ़ाते-पढ़ाते वहीं पर रेगुलर हो जाते हैं। इन तमाम व्यवस्थाओं को आपको देखना पड़ेगा। जो शिक्षक हैं, उनके अंदर भी असंतोष है और शिक्षा की व्यवस्था को आपको बदलना पड़ेगा। आपको समान शिक्षा लागू करना पड़ेगा। जब तक एक रिक्शे वाले का, एक मजदूर का बच्चा और एक आई.ए.एस. का बच्चा साथ में नहीं पढ़ेगा तब तक हम एकरूपता शिक्षा की बात नहीं कर सकते। शिक्षा की बात पर थरूर जी कह रहे थे कि हमने टेबलेट आदि ईजाद कर दिया, ठीक है आप कर रहे हो। हमें कम्पटीशन करना चाहिए कम्प्यूटर इलैक्ट्रोनिक में, लेकिन हमें यह व्यवस्था देखनी चाहिए कि जैसे केरल ने अपनी शिक्षा दर बढ़ायी है, वहां पर साक्षरता 101 परसेंट है। अन्य राज्यों में भी आप मूल्यांकन करें कि वहां शिक्षा की दर क्यों नहीं बढ़ रही है, लोग साक्षर क्यों नहीं हो रहे हैं, इसका मूल्यांकन आपको करना पड़ेगा। सर्व शिक्षा अभियान को आपने लागू करने की बात कही है, लेकिन राज्य उसमें सहयोग नहीं कर रहे हैं। उनके मुख्यमंत्री को बुलाइये, उनके शिक्षा मंत्रियों का सम्मेलन बुलाइये और देखिये कि उनके सामने क्या अड़चनें हैं और उन अड़चनों को दूर करने की व्यवस्था कीजिये। उन्हें आर्थिक तौर पर पैकेज देने की व्यवस्था कीजिये। तभी जाकर पिछड़े राज्यों, चाहे पूर्वोत्तर हो या बिहार हो, झारखंड हो, छत्तीसगढ़ हो, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तमाम ऐसे पिछड़े राज्य हैं, उन्हें हम विकास के मायने में आगे ले जा सकते हैं। इन्हीं बातों के साथ मैं महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर पुरजोर बल देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

 

श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):महोदय, मैं यहां से बोलने की अनुमति चाहता हूं।

          महोदय, महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा में आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। सुबह से हो रही इस चर्चा में माननीया गिरिजा व्यास जी, माननीय शशी थरूर जी, माननीय राजनाथ सिंह जी और माननीय शैलेन्द्र कुमार जी के विचार और चर्चा को मैं बड़े ध्यानपूर्वक सुन रहा था।  

मैं कुछ बिन्दुओं पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा। यह देश गाँवों में बसता है, कृषि प्रधान देश है और विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इस देश की संस्कृति और यहाँ की व्यवस्था में विविधता में एकता झलकती है। यहेँ की जो प्राकृतिक संपदाएँ हैं, वे हमारे देश की धरोहर हैं। महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में पाँच बिन्दुओं पर ध्यान आकृष्ट करते हुए उन्हें चुनौतियों के रूप में स्वीकार किया है और इस देश के विकास की वे धुरी हैं -- आजीविका की सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा और आंतरिक तथा बाह्य सुरक्षा -- इन बिन्दुओं पर बड़े विस्तार से उनके अभिभाषण में हमने सुना, पढ़ा और अध्ययन किया। साथ ही साथ अपने अग्रजों के विचारों को भी हमने सुना।

          माननीय सभापति जी, इस देश में 75 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते हैं जिनकी मुख्य आजीविका, उनका उद्यम, व्यवसाय खेती है। आज महंगाई बढ़ रही है, विकास दर घट रही है। महामहिम राष्ट्रपति जी ने विकास दर की चर्चा करते हुए यह बात कही और उसे बढ़ाने की बात भी कही जिस पर माननीय राजनाथ सिंह जी ने बड़े विस्तार से अपनी बात रखी। जहाँ सात प्रतिशत विकास दर घटी है, उसे बढ़ाकर आठ से नौ परसेंट करने की बात उन्होंने कही है। लेकिन बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि जिस कृषि प्रधान देश में हम रहते हैं, वहाँ कृषि में बहुत समस्याएँ हैं। आज सुबह ही प्रश्न काल में कृषि उत्पादों के मूल्य, कृषकों की समस्या, वस्तुओं का भंडारण, उनका विक्रय और उनकी समस्याओं पर सदन का आक्रोश उभरा और माननीय अध्यक्ष जी ने चर्चा के लिए समय भी दिया। हम गाँवों से आते हैं, हम भी पेशे से कृषक हैं। वैसे हम पेशे से अध्यापक भी रहे हैं। हमें इस देश की वास्तविक ज़मीनी स्थिति का भी अहसास और आभास दोनों है।

          महोदय, यह देश जो कृषि प्रधान देश कहा जाता है, यहाँ किसानों को समय पर खाद नहीं मिलती। खाद की सबसिडी समाप्त की जा रही है। डाई, यूरिया, पोटाश, एनपीके के दाम तो बढ़ ही रहे हैं लेकिन ये समय पर किसानों को उपलब्ध भी नहीं होते। दो-चार बोरियों के लिए लाइनें लगती हैं। एक किसान जिसको 20 बोरी की ज़रूरत है, वह चार-पाँच बोरी में कैसे काम चलाएगा? उत्पादन घट रहा है। समय पर बिजली नहीं मिलती, समय पर खाद नहीं मिलती, समय पर सिंचाई नहीं कर सकते। उसके बाद जब उनका उत्पाद तैयार होता है तो दूसरी समस्या उनके सामने आ खड़ी होती है। कृषि मंत्री जी ने अपना उत्तर देते समय कहा कि एक समिति होती है जो उनका भाव तय करती है और किसानों के उत्पादों का मूल्य दिया जाता है। हम गांवों में रहते हैं। हमें पता है कि किसान किस तरह से अपनी गाढ़ी कमाई को कृषि उत्पाद के रूप में  जब पैदा करता है तो औने-पौने दामों पर बेचने के लिए विवश होता है। हम जो उत्पाद का मूल्य निर्धारित करते हैं, उन सहकारी समितियों पर उनके उत्पादों की बिक्री नहीं होती। जैसा कि हमारे पूर्व वक्ताओं ने कहा कि आज भी लोग लाइन लगाकर खड़े हैं लेकिन उनके धान की बिक्री नहीं हो पा रही है।

          महोदय, हमारे महामहिम जी ने अपने अभिभाषण में कहा कि कृषि विकास लक्ष्य चार परसेंट है। यह कैसे होगा? जहाँ किसानों की यह दयनीय स्थिति है, जहाँ उनको उत्पादन का मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है, अगर वे किसी तरह से अपने उत्पाद को बेचना चाहते हैं तो उसमें  भी समस्या है। बिचौलियों को औने-पौने दामों पर बेचने के लिए वे विवश हैं। उस पर भी यह ध्यान देने की ज़रूरत है। ऐसे किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए, उनका शोषण रोकने के लिए प्रबंध होने चाहिए।  जब वे ऋण लेने जाते हैं तो उन्हें तीन-चार परसेंट की बात कही जा रही है, लेकिन जैसे माननीय राजनाथ सिंह जी ने कहा कि एक परसेंट के आधार पर उनको कृषि ऋण दिया जाए, मैं इस बात का पुरज़ोर समर्थन करता हूँ और माननीय प्रधान मंत्री जी कहना चाहूँगा कि जब उत्तर देने के लिए खड़े हों तो इस पर ज़रूर कुछ कहें।

 

16.00 hrs.           महोदय, बहुत ज़ोर-शोर से बुनकरों के लिए एक प्रोजेक्ट बनाया गया। ड्रीम प्रोजैक्ट, जिसको राहुल गांधी जी ने पूर्वांचल में जाकर, जो हम लोगों का क्षेत्र है, भदौही, मऊ, जहां से दारा सिंह जी चुनकर आते हैं। वह बुनकरों का क्षेत्र है। हमें कहने में फ़Lा़ है कि कभी वह भदौही, जहां से हम लोग आते हैं। कालीन नगरी के रूप में जानी जाती थी और जहां से हजारों करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा हम लोगों को मिलती थी। कालीन व्यवसाय को विकसित करने के लिए हम सब्सिडी दिया करते थे। लेकिन हमारे ही बीच के लोगों ने चाइल्ड लेबर के नाम पर बदनाम किया। विदेशों में हमारी ख्याति को धूल धूसरित किया और वही उद्योग आज अपने विनाश के कगार पर है।  उसे विकसित करने की ज़रूरत है। हम बनारसी साड़ियों की बात करते हैं, जो कि विदेशों में विख्यात रही। हम उनके उत्पाद पर आयात शुल्क लगा रहे हैं। हमें उसके रॉ मैटिरियल्स को फ्री करना चाहिए ताकि वे फिर से विकसित हो सकें।

16.01 hrs. (Shri Inder Singh Namdhari in the Chair)             महोदय, पर्यटन की बात इस अभिभाषण में कही गई है। महामहिम जी ने कहा है कि इससे उद्योग विकसित होंगे, लोगों को रोज़ग़ार मिलेगा और ग्रामीण अंचलों का विकास होगा। मैं इसका पक्षधर हूं। हम गांवों में रहते हैं और हमने इसके पहले भी सम्मानित सदन में इस बात को रखा था कि उत्तरांचल बनने के बाद पर्यटन की दृष्टि से ग्रामीण अंचलों के विकास की ज़रूरत है। यह पूरे देश की ज़रूरत है, केवल उत्तर प्रदेश की बात नहीं है। अगर ग्रामीण अंचलों के पर्यटन का विकास किया जाएगा, क्योंकि ऐसे बहुत से सम्भावित स्थल हैं, जिन्हें जोड़ा जा सकता है, चूंकि मैं उधर से आता हूं तो मुझे पूर्वांचल की जानकारी है, अगर ऐसे स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाएगा, तभी इस अभिभाषण में जो महामहिम ने अपनी बात रखी है, उसका कहीं न कहीं वास्तविक स्वरूप दिखेगा।

          महोदय, पूरे देश में हर वर्ष प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। कहीं अतिवृष्टि होती है, कहीं अनावृष्टि होती है, कहीं भूकम्प आ जाते हैं, कहीं बाढ़ आ जाती है और कहीं-कहीं तो हर वर्ष ये विनाश लीलाएं हुआ करती हैं। मैं उत्तर भारत की बात करता हूं और उस आपदा के बाद महामारियां और बीमारियां भी आती हैं। उसके बाद हम उससे बचने का उपक्रम करते हैं, प्रयास करते हैं, प्रयत्न करते हैं। जब वह समाप्त हो जाता है, फिर हम चुप हो जाते हैं। आपके माध्यम से सरकार से मैं कहना चाहता हूं कि ऐसी प्राकृतिक आपदाएं जिनके बारे में हम कुछ कर सकते हैं, जिनकी सुरक्षा, संरक्षा के बारे में हम योजना बनाकर कुछ उपाय कर सकते हैं, उन्हें हमें ध्यान में लाना चाहिए। हर वर्ष हमें उन्हें प्रकृति की मार झेलने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। जैसा कि पूर्वांचल है, देश के बहुत सारे भू-भाग हैं, स्थान हैं, जहां इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं आया करती हैं।

          महोदय, ऊर्जा की आवश्यकता पूरे देश, पूरे समाज, पूरे समुदाय को है। सारी व्यवस्थाएं ऊर्जा पर निर्भर करती हैं। लेकिन उत्पादन की दृष्टि से जहां विकास की बात कही गई है, वह पेपर में तो है, अभिभाषण से तो झलक रहा है, लेकिन जब हम गांवों में जाते हैं तो समस्या जैसी की तैसी बनी हुई है। आज भी किसानों को ऊर्जा की जरूरत है, चाहे वह खेती के लिए, छोटे-मोटे उद्योग के लिए, कुटीर उद्योग के लिए, छोटे संसाधनों के लिए। लेकिन उन्हें बिजली नहीं मिलती है। गांव में उनको प्रोत्साहित किया जाए, ऊर्जा के स्रोत बढ़ाए जाएं, चाहे वह सौर ऊर्जा के रूप में या जल विद्युत के रूप में या कोयले से उत्पादित होने वाली बिजली के रूप में हम गांवों को जब तक ऊर्जा की दृष्टि से व्यवस्थित नहीं करेंगे, तब तक यह देश विकास की दृष्टि से पिछड़ा रहेगा।

          महोदय, आंतरिक सुरक्षा की भी बात आयी है। कहने की जरूरत नहीं है। हम और आप उसे देख भी रहे हैं कि पूरे देश में दो तरह की दुर्व्यस्थाएं हैं। एक आंतरिक सुरक्षा और दूसरा आतंकवाद है। हमारे ही लोग, हमारे ही देश में रहने वाले लोग अपने ही लोगों के खून के प्यासे बने हैं। क्यों? हम उनको अपनी मुख्य धारा से जोड़ें। उनकी समस्याओं से अपने को आत्मसात करें, इसकी आज जरूरत है। महामहिम के अभिभाषण में यह बात आयी है। लेकिन इसका वास्तविक स्वरूप भी दिखना चाहिए।

बाह्य व्यवस्था तो हमारे सामने एक संकट के रूप में है ही। चीन के बारे में हमारे पूर्व वक्ताओं ने बहुत कुछ कहा है, चाहे हमारी सीमाओं की बात हो, चाहे सामरिक व्यवस्था की बात हो, चाहे उसकी विदेश नीति हो, जिस पर हमें देखने, सोचने और सतर्क रहने की जरूरत है। उसी तरह से पाकिस्तान के बारे में हमें बहुत कुछ कहने की जरूरत नहीं है। एक कश्मीर मुद्दा बनाकर उन्होंने जिस तरह से आंतरिक दुर्व्यवस्था बनाई है,  उस पर हमें निश्चित रूप से अपने को सजग रखना है।

          महोदय, सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है काला धन। आज पूरे देश में कभी रामदेव जी का आंदोलन होता है, कभी अन्ना हज़ारे जी का आंदोलन होता है, कभी यह गांवों में चर्चा का वि­ाय बनता है। यह काला धन है क्या? यह कहां रखा जाता है, कैसे आ जाता है, कहां से आता है, यह आज सबसे बड़ी समस्या है। सरकार से भी यह बात पूछी जाती है। सदन में भी इस बात की चर्चाएं होती है। अभिभा­ाण में भी महामहिम जी ने इस पर बहुत ही गंभीरता से बात रखी है, लेकिन आपके माध्यम से मैं सरकार से कहना चाहूंगा कि जिस काले धन के संबंध में इतनी सारी चर्चाएं हुईं, जि काले धन के बारे में आंदोलन हुए, जिस काले धन के बारे में पूरे देश की दृ­िट लगी है, उस पर क्यों न ऐसे कठोर नियम बना दिए जाते, क्यों न उसे वापस लाने के लिए ऐसी व्यवस्था कर दी जाती? क्यों हम बार-बार उसी बात को कहकर जनता और जनता जनार्दन की दृ­िट में स्वयं दो­ााळ साबित हो रहे हैं। उधर ध्यान जाना चाहिए। इस पर कठोर कानून बनने चाहिए और उस कानून के तहत काले धन को वापस लाना चाहिए और जो काले धन में लिप्त हैं, वैसे लोगों को कठोर सजा देने की जरूरत है।

          महोदय, इसी से संबंधित महंगाई है। आज पूरे देश में महंगाई बढ़ रही है। मैं तीन व­ााॉ से सदन के इस तीसरे बजट सत्र को देख रहा हूं, हर बार चर्चाएं होती हैं। कृ­िा मंत्री जी कुछ बयान देते हैं, प्रधानमंत्री जी के भी बयान कभी-कभी इस तरह के आ जाते हैं कि जनता में एक आंदोलन जैसा स्वरूप उत्पन्न हो जाता है। हमारे प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि कोई जादू की छड़ी नहीं है। कृ­िा मंत्री जी कहते हैं कि त्यौहार आने वाले हैं, चीनी के दाम बढ़ सकते हैं। रातों-रात चीनी के दाम बढ़ जाते हैं। कभी जब हमारा किसान उत्पादन करता है तो उसे खरीदने के लिए हमारे पास संसाधान नहीं हैं। लेकिन जिसे वह खरीदना चाहता है, उसके दाम आसमान पर हैं। उसकी थाली सूनी हो रही है। किसान का बेटा पढ़ने के लिए ऋण लेना चाहता है। महोदय, हम बैंकों की बात करते हैं। अपने अभिभा­ाण में महामहिम जी ने 40 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में पूंजी विस्तार की बात कही है। गांव में आज भी ऐसे लोग हैं। हम लोग गांव से ही आते हैं। उनको अगर छोटे-मोटे कुटीर उद्योग, लघु उद्योग, मध्यम उद्योग के लिए ऋण लेने की जरूरत होती है तो बैंकों में जाते हैं। बिचौलिए उनसे सौदा करते हैं। बिचौलिया ऋण दिलाने में भी उनसे कुछ और व्यवस्था चाहते हैं।  गांवों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए संसाधन नहीं हैं। वे गांव में बैंकों से ऋण लेने के लिए जाते हैं, उन्हें नहीं मिलते। उसके लिए भी उन्हें बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं और निराश-हताश होकर वे घर बैठ जाते हैं।

          महोदय, जो आज इस अभिभा­ाण में बात रखी गयी है, उसे वास्तविक स्वरूप में लाने के लिए कठोर नियम बनाने की जरूरत है। महोदय, हम गांवों में रहते हैं। मनरेगा पर कई बार चर्चाएं हुई हैं। आज भी चर्चा हुई है। अभिभा­ाण में भी चर्चा हुई है। गांव में आदमी बेरोज़गार है। उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए। हमारे सपा के नेता जी ने कहा कि हम बेरोज़गारी भत्ता देंगे। आज आप टेलीविजन में देखिए कि बेरोज़गारी भत्ता लेने के लिए हजारों की लाईन लगी है। प्रतिदिन वहां कोई गिर रहा है, कोई बेहोश हो रहा है, किसी को पीटा जा रहा है। यह क्यों है? अगर हमारी ऐसी नीतियां होती और हम ऐसे बेरोज़गारों को रोज़गार देने की व्यवस्था करते तो केवल इस उम्मीद से कि हमको बेरोज़गारी भत्ता मिल जाएगा तो लाखों लाख लोग इस लाईन में नहीं लगते। उसके लिए एक मूलभूत व्यवस्था बनानी होगी। आज गांव का बेरोज़गार पढ़ा-लिखा व्यक्ति फावड़ा चलाने के लिए मजबूर है। कोई वैकेन्सी निकलती है, चाहे वह सफाईकर्मी के रूप में, चाहे किसी अन्य छोटे-मोटे पदों के लिए हों, पी.एच.डी. करने वाले लड़के अपने सर्टिफिकेट और अपनी योग्यता को छिपा कर आवेदन-पत्र भरते हैं। वे सफाईकर्मी बनना चाहते हैं क्योंकि उनके पास रोजी-रोटी का कोई साधन नहीं है।

आज देश की स्थिति यह है और हम 21वीं सदी में विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में अपने को खड़ा कर रहे हैं। हम अपनी पीठ भी ठोक रहे हैं और हम कह रहे हैं कि पूरा विश्व भारत को आशा भरी निगाहों से देख रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी अपने उद्बोधन में कहा और अभिभाषण में महामहिम जी ने भी कहा। जहां मनरेगा में काम करने के लिए ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, पीएचडी, डी-लिट लोग रोजी-रोटी के लिए लाईनें लगा रहे हैं, जहां बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए हजारों की संख्या में लोग लाठियां खा रहे हैं, उस देश की तस्वीर कैसी हो सकती है, यह कहने की जरूरत नहीं है।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से एक-दो बिन्दुओं पर और ध्यान दिलाना चाहूंगा। सबसे मूलभूत समस्या शिक्षा, चिकित्सा, शुद्ध पानी और भोजन की है। शिक्षा, सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से हम करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं, लेकिन आप गांवों में जाकर देखिए। उन गांवों में रहने वाले व्यक्ति के बच्चे आज भी शिक्षा से वंचित हैं। वे इसलिए स्कूल जाते हैं और वहां कटोरा एवं थाली लेकर जाते हैं कि उनको वहां भोजन मिलेगा। पढ़ाई के लिए किताब, कॉपी एवं पैंसिल उनके बस्ते में नहीं होती। हम उन्हें कैसी व्यवस्था देना चाहते हैं? अगर वे कहीं हाई स्कूल तक पास हो गए, फिर आगे पढ़ने के लिए उन्हें सुविधा नहीं है। उन्हें स्टेट गवर्नमेंट अनेक सुविधाएं दे रही है, लेकिन उन्हें जो शिक्षा की सुविधा मिलनी चाहिए, उससे वे वंचित रह जाते हैं। चिकित्सा है, स्वास्थ्य की सुविधाएं हैं, लेकिन आज भी अच्छे डॉक्टर गांवों में नहीं जाना चाहते। गांवों में अगर किसी को कोई कठिनाई होती है तो वे मजबूरी में उस डॉक्टर के पास जाते हैं। उन्हें वहां ठीक से दवाई नहीं मिलती है, इसलिए उनके रोग बढ़ जाते हैं। वे यहां एम्स में अपना इलाज कराने के लिए भी नहीं आ सकते, क्योंकि उसके लिए न कोई साधन हैं और न ही कोई व्यवस्था है। यहां आने के बाद वे भर्ती भी नहीं हो सकते, उनका इलाज भी नहीं हो सकता।

          सभापति महोदय, इतने दिनों आजाद होने के बाद भी आज गांवों में सबसे बड़ी समस्या शुद्ध पानी की है। हम लोग भी गांव में रहते हैं, हमारे यहां सबसे अधिक समस्या पानी की है। इसलिए हमारे पास लोग हैंड पम्प मांगने के लिए आते हैं। उनके पास पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं है, पेयजल की सुविधा नहीं है। उन्हें हम शुद्ध पानी, शुद्ध भोजन, शिक्षा और चिकित्सा नहीं दे पा रहे हैं। वे कुपोषण के शिकार हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी कुछ दिनों पहले कहा था कि यह शर्म की बात है कि हमारे देश में कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। हम कहां खड़े हैं, किस तरह से विकसित राष्ट्र की श्रेणी में अपने को ले जाना चाहेंगे।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री जी से आग्रह करूंगा कि वे जब भी राष्ट्रपति जी के अभिभाषण का उत्तर देने के लिए खड़े हों तो जो हमारी बुनियादी समस्याएं हैं, गांवों की, किसानों की एवं मजदूरों की समस्याएं हैं, जो अगली पंक्ति में खड़ा है, जिसकी थाली सूनी है, रोटी महंगी हो रही है, जिसके पास खाने के लिए दाल नहीं है, जिनका आय का स्रोत मनरेगा है। मास्टर रोल गलत बनाए जा रहे हैं। उनको मजदूरी नहीं मिल पा रही है और हम कह रहे हैं कि साल में सौ दिन, उन्हें 40 दिन भी मजदूरी नहीं मिल पा रही है। ऐसे ग्रेजुएट लोग फावड़ा न लें, वे कलम लें। उनकी जो ऊर्जा है, उसे देश की ऐसे जगहों पर लगाया जाए कि उन्हें रोजगार मिले।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करते हुए प्रधान मंत्री जी से चाहूंगा कि देश के विकास में उनकी जो छवि है, आज भी जब गांव में जाएं तो डॉ. मनमोहन सिंह जी, प्रधानमंत्री की जब बात आती है तो वहां के लोग कहते हैं कि ये एक ईमानदार प्रधान मंत्री हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ यह भी कह देते हैं कि ये बेबस और लाचार प्रधानमंत्री जी हैं। इस देश का जो विकसित देश होना चाहता है, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतात्रिक देश है, जिस देश की इतनी बड़ी आबादी है, जो विश्व में किसी भी देश के पास नहीं है। हमारे पास ऊर्जा शक्ति, अक्षय भंडार एवं प्राकृतिक संसाधन हैं। हमारे पास सब कुछ है। लेकिन देश को चलाने वाली गाड़ी चाहे कितनी भी अच्छी हो, अगर उसका ड्राइवर ठीक नहीं होगा तो गाड़ी कहां जाएगी। हम माननीय प्रधान मंत्री जी से चाहेंगे कि इनकी जो ईमानदारी की छवि है, उसका हम लोगों को फLा है। हम सब ऐसे सदन में बैठते हैं, जिसका लीडर, प्रधानमंत्री ईमानदार है।  लेकिन जब यही लोग कहते हैं कि वह बेबस हैं, मजबूर हैं, लाचार हैं, कुछ कर नहीं सकते हैं, तो उसी जगह सारा जोश ठंडा पड़ जाता है।  

          महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री जी कहना चाहूंगा कि जहां ऐसी स्थितियां इस देश के अंदर हैं, जहां ऐसे फीगर्स आएं, इस लोकतंत्र को सुव्यवस्थित और सुदृढ़ करने के लिए आपको गांव के विकास के लिए कठोर निर्णय लेने होंगे।  आपको कृषि व्यवस्था को ठीक करने के लिए कठोर निर्णय लेने होंगे।  आपको कालेधन को वापस लाने और कालेधन पर रोक लगाने के लिए कठोर निर्णय लेने होंगे।  आंतरिक और बाह्य सुरक्षा जो हमारे देश के लिए एक समस्या बनी हुयी है, चाहे वह चाइना की हो, चाहे पाकिस्तान की हो, चाहे अन्यान्य देशों की हो, उस पर भी हमें कठोर निर्णय लेने होंगे और उसी के साथ-साथ आतंकवाद को भी समाप्त करने के लिए हमें राजनैतिक व्यवस्था से ऊपर उठकर कठोर निर्णय लेने होंगे।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण को समर्थन देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं, धन्यवाद।

सभापति महोदय :  पांडेय जी, आज आप खुलकर बोले।

          श्रीमान् शरद यादव जी।

श्री शरद यादव (मधेपुरा):माननीय सभापति जी, मैं महामहिम राष्ट्रपति जी का एक बात के लिए बहुत आभार मानता हूं कि उन्होंने अपना भाषण भारतीय भाषाओं में शुरू किया।  मैं कह रहा हूं कि भारतीय भाषाओं में शुरू किया, हिंदी के लिए नहीं कह रहा हूं।  जितनी समस्यायें हैं, वे जरूर होतीं, यदि हमने अपनी भारतीय भाषाओं में इस मुल्क को चलाया होता।  ट्रंसलेशन में कोई मुल्क नहीं चलता, चीन आगे इसलिए है कि अपनी भाषा में वह काम करता है।  जापान इसलिए आगे है कि उसने अपनी भाषा में सारी चीजें चलायीं।  बर्तानिया की हुकूमत में जितने देश रहे हैं, वह सब ऐसे ही रहे।  भाषा का ज्ञान बुरी चीज नहीं होती है, लेकिन भाषा का या पूरी तरह उसकी सभ्यता का गुलाम होना, वही हालत पैदा करता है, जो इस देश में है, बांग्लादेश में है, पाकिस्तान में है, श्रीलंका में है, उसी में ऐसा होता है।  महामहिम जी के भाषण में मुझे कोई रोशनी नजर नहीं आती है।

सभापति महोदय : शरद जी, एक सूचना मैं आपको देना चाहता हूं।  अभी एक संस्था ने आंकड़े निकाले हैं और यह कहा है कि इंग्लिश का प्रचलन हिंदुस्तान में पिछले आठ सालों में कई गुना बढ़ा है। अंग्रेजी की ओर लोग ज्यादा आकर्षित हुए हैं।

श्री शरद यादव : इस बार दो करोड़ बच्चे भर्ती हो गए हैं, वह मैंने भी पढ़ा है।  दो करोड़ नहीं, एक सौ बीस करोड़ आबादी हैं।  सभापति जी, दो करोड़ इसलिए भर्ती हुए हैं क्योंकि रोजगार से यह भाषा जुड़ी हुयी है।  महामहिम जी के भाषण में यह बात नहीं आयी है।  भाषा के चलते, जो अंग्रेजी भाषा में बच्चे शिक्षित हैं, उनको तो रोजगार है, लेकिन जो भारतीय भाषाओं में बच्चे पढ़ रहे हैं, गोरखनाथ जी जो कह रहे थे कि लाइन लगी है, वे भाषायी बच्चे हैं।  उन्हें इस देश में कहीं रोजगार नहीं है।  जब से नयी इकॉनामिक पॉलिसी आयी है, उसमें उसकी कोई जगह नहीं है।  यहां उसकी जरूर जगह है, विधानसभा में उसकी जगह है।  जो लोग बाहर इस भाषा के पारंगत हैं, उनसे ज्यादा ज्ञानवान लोग यहां हैं।  महात्मा जी कहते थे कि विद्या बुद्धि की महतारी नहीं है, बुद्धि विद्या की महतारी है।  बुद्धि से सारी दुनिया निकली है।  बुद्धि से ज्ञान निकला है, बुद्धि से विज्ञान निकला है, इसलिए उन्होंने कहा है कि सबको वोट मिलना चाहिए।  उन्होंने कहा कि कैसे कहते हो कि हिंदुस्तान के किसान और मजूदर बे-पढ़े-लिखे लोग हैं? उनका किसानी का अनुभव है।  जो इस देश का दस्तकार है, इसमें चाइल्ड लेबर पर लिखा हुआ है।  महामहिम के भाषण में चाइल्ड लेबर पर लिखा हुआ है। सभापति महोदय, आप तो बहुत चीजों के मर्मज्ञ हैं। हिन्दुस्तान में कोई दूसरी चीज है ही नहीं। हिन्दुस्तान में खेती और दस्तकारी है। यानी खेती के बाद दस्तकारी दूसरे नम्बर का धंधा है। बढ़ई कोई बचपन में बन सकता है। वह किसी कॉलेज या स्कूल में नहीं बन सकता है। लोहार लोहे की भट्ठी के सामने नहीं बैठेगा तो वह लोहे को न तो मोड़ सकता है और न ही तोड़ सकता है। यदि रवि शंकर बाबा अलाउद्दीन के पास पांच वर्ष की उम्र में सितार नहीं सिखेगा तो वह सितार नहीं बजा सकता है। जो ढाका की मलमल बनाएगा वह बचपन में ढाका की मलमल नहीं बनाया तो वह कभी नहीं बना पाएगा। वह ज्ञान कैसे नहीं है? उसे ज्ञान कैसे नहीं कहते हैं, सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं है। ...( व्यवधान) मैं भाषा पर थोड़ा-सा ही बोला था। मैं आगे जो बोल रहा हूं वह ढाका और बंगाल दस्तकारी का, उत्तर प्रदेश और बंगाल सब से ज्यादा, मैं टेक्सटाइल मिनिस्टर रहा हूं। ...( व्यवधान) आपके बात करने से मुझे उत्साह बढ़ा। आपको देख कर मुझे बंगाल की दस्तकारी याद आ गई। अंग्रेजों ने डेरा वहीं डाला था। अंगूठे और अंगुलियां तो वहीं कटी थीं। हिन्दुस्तान में खेती के बाद यदि कोई सबसे बड़ा धंधा है तो वह दस्तकारी है।

सभापति महोदय : शरद जी, हमारे बिहार और झारखंड में दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा के समय जितनी मूर्तियां बनती हैं उनके लिए सब कारीगर बंगाल से आते हैं।

श्री शरद यादव : मैं कह रहा हूं कि दुर्गा जी की मूर्ति बनाने वाला है वह बचपन से मूर्ति बनाना नहीं सिखेगा ...( व्यवधान) मैं आपको पक्का कहना चाहता हूं कि वह कभी भी अचार्या जी के उम्र में उससे मूर्ति बनाने को कहा जाए तो वह मूर्ति नहीं बनाएगा। पता नहीं वह क्या चीज बना कर रख देगा? यह बच्चा जो दस्तकारी का ज्ञान लेता है जो खजुराहो की हार्ड स्टोन में, खजुराहो के पास के रहने वाले पटेल जी बांदा के हैं, आप कभी खजुराहो सुबह जाएंगे तो विदेशी गिरते पड़ते हुए दिखेंगे। इस देश के लोग तो जानते ही नहीं हैं। यह तो कहेंगे कि ताजमहल शाहजहां ने बनाया। इसमें जरूर उसका हिस्सा है लेकिन ताजमहल तो बदरूद्दीन ने बनाया है। राजस्थान के राम-लखन ने बनाया है जिनकी उंगलियों से यह कमाल निकला है और दुनिया की सब से खुबसूरत इमारत हिन्दुस्तान में खड़ी है। उन दस्ताकारों का कोई जिक्र नहीं है।...( व्यवधान) यह राष्ट्रपति भाषण है। यह महामहिम का भाषण है और 14 पार के लोगों को चाइल्ड लेबर, मैं इसका जिक्र नहीं करता। यहां बहुत-सी चाइल्ड लेबर की दुकाने खुली हुई हैं। मैं टेक्सटाइल मिनिस्टर था। इस देश का पच्चीस परसेंट विदेशी मुद्रा हिन्दुस्तान के किसी विज्ञान के सामान से नहीं आता है, हिन्दुस्तान में किसी खोज के जरिए नहीं आता है, किसी चीज के लिए नहीं आता है उसमें तो निकम्मे हैं, हिन्दुस्तान में हजार - दो हजार वर्ष से कोई अविष्कार ही नहीं हुआ है। जीरो और न्यूमरिकल को छोड़ कर के हिन्दुस्तान में दो-तीन हजार वर्ष से इस भाषा के चलते कोई अविष्कार ही नहीं हुआ है। अविष्कार यरूसलम से लेकर बंगाल की खाड़ी तक नहीं हुआ है। यहां सिर्फ भगवान ही भगवान है। यहां सिर्फ पूजा ही पूजा है। यहां सिर्फ घंटा ही घंटा बजता है।यहां सिर्फ मस्जिद में खड़े हो कर अजान बम लगाने के सिवा कोई दूसरी चीज नहीं है। यरूसलम से लेकर बंगाल की खाड़ी तक, अभी लिबिया गिर गया, इराक गिर गया, अफगानिस्तान जो इतिहास में कभी गुलाम नहीं हुआ। अंग्रेज जब यहां से गुलामी करने गया तो माथा मार कर वापस आ गया। वह अफगानिस्तान तबाही से गुजर रहा है। वहां एक जहाज पहुंचाते हैं उसमें आदमी नहीं होता है। उस जहाज का नाम ड्रोन है। ड्रोन जाता है, वह मारता है। उसे आदमी नहीं मशीन चला रही है। मुझे अभी पता चला है। अभी अमेरीका से मेरा दोस्त आया है। वह इंजीनियरिंग में मेरे साथ पढ़ता था। वह बता रहा था कि वह पांच इंज का जहाज बना रहे हैं। वह खोज में लगे हैं और यह मेले में लगे हैं।    यहां लोगों ने दुकानें खोलकर रखी हैं। अभी गोरखनाथ जी बोल रहे थे, भदोही में उन्होंने कहा कि हम गलीचे नहीं लेंगे। जब मैं टेक्सटाइल मिनिस्टर था, मुझे दुनियाभर के अधिकांश लोगों को बुलाना पड़ा। मैंने एक घंटे बोला। अपनी भाषा में बोला और कहा कि इन्हें इसकी ट्रंसलेशन करके बताइए। तब कहीं बड़ी मुश्किल से जहां हमारा धंधा था, वहां टिका। उन्होंने कह दिया कि चाइल्ड लेबर से है। अगर कोई व्यक्ति बचपन से कालीन नहीं बनाएगा तो कैसे सीख जाएगा। मान लें तबला रखा है। अगर उसे कोई बचपन से नहीं बजाएगा तो कहां से सीखेगा, कैसे सीखेगा। हम सब भारत की संतान हैं। लेकिन हमारी बुद्धि कैसी खराब हुई है। इसमें एक दिन भी ठीक से बहस नहीं होती कि चाइल्ड लेबर में डिवीजन करना पड़ेगा। हमारा दस्तकारी का मुल्क है। दस्तकारी के धंधों को चाइल्ड लेबर में नहीं कर सकते। इससे हिन्दुस्तान का संगीत मर जाएगा, हिन्दुस्तान की दस्तकारी मर जाएगी। ताजमहल जो सबसे खूबसूरत इमारत है, उसे देखने के लिए दुनिया नहीं आएगी।...( व्यवधान) मूर्तिकला नहीं ताजमहल, आपकी मूर्ति पर कौन माथा मार रहा है। मूर्ति पर आप माथा मारिए। यदि इस देश में मूर्ति से कुछ हो रहा हो तो बता दीजिए।...( व्यवधान) हमारे यहां 33 करोड़ भगवान हैं। तीन हिन्दुओं की छाती पर एक भगवान है। हमारा कल्याण क्यों नहीं हुआ, अमरीका का क्यों हो गया। मुझसे कोई पूछे कि भगवान को मेरे पास पहुंचाएं। मैं उसे एक क्विंटल मिठाई खिलाऊंगा और कहूंगा कि मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं। तू अमरीका में पैदा हो जाए। जहां भगवान पैदा नहीं हुआ वहां सुख है और जहां भगवान पैदा हुआ वहां दुख आया है। हम भगवान की पूजा इसलिए करते हैं कि अविष्कार नहीं करेंगे। हम अल्लाह की इबादत इसलिए करते हैं कि अविष्कार करना छोड़ देंगे। ...( व्यवधान) ईश्वर पर दुनिया विश्वास करती है। दुनिया में इंसान को दो चीजें चाहिए - परमात्मा और औरत। वह उनके बगैर नहीं रह सकता। मैं मानता हूं लेकिन आपकी कैसी पूजा और पाठ है, धर्म के प्रति कैसी निष्ठा है, अंधविश्वास ने आपका नाश किया है। ईश्वर में विश्वास महात्मा भी करते थे। दुनिया में उनसे बड़ा कोई इंसान आज तक नहीं हुआ। आप विश्वास कीजिए, आस्था रखिए, उसमें मुझे कोई एजराज नहीं है।...( व्यवधान) सबमें कोई फर्क नहीं है।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  श्रीमान्, आप आसन की तरफ देखकर बोलिए।

…( व्यवधान)

श्री शरद यादव : सभापति जी, फिर मजा ही नहीं आएगा। जब आप बैठ गए तो मुझे लगा था कि महफिल में मजा आ जाएगा। मुझे इसकी जरूरत नहीं है कि कितनी संख्या है। मैं इस सदन में अपनी आवाज बजाकर चला जाऊंगा। जब आप बैठे हैं तो मुझे और किसी चीज की जरूरत नहीं है। सुनने वाला चाहिए और सुनने के लिए अगर आपके जैसा व्यक्ति मिल गया तो इधर भी देखूंगा, उधर भी देखूंगा।...( व्यवधान) अभी गोरखनाथ जी ने बोला कि व्यक्ति अपनी पीएचडी की डिग्री छुपाकर सफाई मजदूर बनने के लिए लालायित है। बात ठीक है, लेकिन हिन्दुस्तान के व्यक्ति की बनावट देखिए। यह एमपी है। हमने हिन्दुस्तान में श्रम को कितनी हिकारत से देखा है। अरे, हमारी मां मां इसलिए है कि वह बच्चे को अपने पेट में नौ महीने तो रखती है, लेकिन चार-पांच वर्ष तक बच्चे की सब तरह से सफाई करती है। सफाई करने वाले इंसान को सबसे ज्यादा हिकारत से देखा जाता है। इसलिए दुनिया में लोग आपको सबसे ज्यादा हिकारत से देखते हैं। कहीं आपकी इज्जत है? कौन सा मुल्क है जिससे आपकी दोस्ती है। श्री थरूर चले गए। वे मेरे भाषण के समय यहां नहीं हैं। नहीं तो मैं उन्हें बताता कि कहां खड़े हैं। सबसे ज्यादा गरीब यहां, सबसे ज्यादा भिखारी यहां, सबसे ज्यादा नंगे यहां, इतिहास में लात खाने वाले सबसे ज्यादा यहां, कभी इतिहास में नहीं जीते।  हर बार हारते हैं। ...( व्यवधान) अरे, मैं कहां कह रहा हूं कि वे एमपी नहीं हैं। ...( व्यवधान) मैं यह कह रहा हूं कि वे जो बात कह रहे हैं, वह सतही है। उन्हें कुछ नहीं मालूम है। उनका ज्ञान बिल्कुल ऊपरी है और जमीन पर क्या हो रहा है, उसकी उन्हें जानकारी नहीं है। ...( व्यवधान) मै कह रहा हूं कि सबसे ज्यादा गरीब यहां सोते हैं। सबसे ज्यादा हम मेहनत करने वाले लोगों, श्रम करने वाले लोगों की बेइज्जती करते हैं और उन्हें छोटा समझते हैं। हमने ऐसी संस्कृति बनायी है कि कोई जबरा मिल जाये, तो सलाम है और कमजोर मिल जाये तो बोलते हैं कि हप्प। कोई मजबूत आदमी मिल जाये तो कहते हैं कि हुजूर और कोई गरीब रिक्शे वाला मिल जाये तो कहते हैं कि अरे, क्या तेरा दिमाग खराब हुआ है? यह है हमारी संस्कृति। अगर मैं अपनी संस्कृति का नाम रखूं, तो ऊपर चाटो और नीचे काटो। यही है, मैं सच बोल रहा हूं। सभापति महोदय, मैं सौ  फीसदी सच बोल रहा हूं। हम सबके लिए बैठे हैं और सब इस संस्कृति के बंधक हैं। यहां बंधक हैं, नहीं तो गोरखनाथ जी यह बात क्यों कहते? ...( व्यवधान) नहीं, उस बेचारे की कोई गलती नहीं है। आप भी इसी तरह बोलते, आप भी यही कहते। यह हमारा दिमाग बना हुआ है। यह एक वर्ष का नहीं है, इसलिए हम दुनिया में पराजित हुए, इसलिए गुलाम हुए। इसलिए हम कोई युद्ध जीत नहीं सके। कहते हैं कि हाथी ने कुचल दिया, इसलिए हार गये। जयचंद पैदा हुए। अरे, क्या दुनिया में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ? क्या यहीं पैदा हुआ है? अभी लोग चीन की बात कर रहे हैं। आपको पता है कि चीन कहां है? अरे, ट्रेन के सामने कोई पहलवान ताल ठोकेगा, तो वह मरेगा ही। चीन कहां खड़ा है, किस जगह खड़ा है? आप अपने पुरुषार्थ को बढ़ाओ।

          महोदय, महामहिम राष्ट्रपति जी का जो अभिभाषण है, उस बारे में मैं आपको कहना चाहता हूं कि वह बड़ा निर्गुण है। वे क्या करें? यह करेंगे, वह करेंगे आदि, हम 63 सालों से यह कह रहे हैं यानी आदमी बूढ़ा होकर  मरने की तरफ चला जाता है। 63 वर्षों से जैसे-जैसे इस पार्लियामैंट की उम्र बढ़ती जाती है, आजादी की उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे जुल्म और अन्याय बढ़ जाता है, बल्कि बीमारी सामने आ रही है। इस अभिभाषण में उत्तर प्रदेश, प्रैस, मीडिया के बारे में कुछ नहीं लिखा।

          सभापति जी, इस अभिभाषण में सदन है, जूडिशिरी है। उत्तर प्रदेश  के चुनाव में गजब हुआ कि एक संस्था ऐसी है जिसका इस देश और दुनिया में यश है और लोग उसे सम्मान देते हैं। एक संस्था है जिसकी इज्जत, मान और सम्मान है और जिसका यश फैला हुआ है, वह इलैक्शन कमीशन है। वहां उसका क्या बाजा बजाया है? उस बारे में मैं आपको क्या बताऊं? जो मंत्री खड़ा हुआ, आग उगली। इलैक्शन कमीशन ने हम पर भी पांच केस चलाये। आप पर भी कभी चले होंगे?

सभापति महोदय :   हम पर भी चले हुए हैं।

…( व्यवधान)

श्री शरद यादव :  इस सदन मे लोग बैठे हैं, उन सब पर चलते हैं, लेकिन हम लोग मूड़ झुकाकर, सिर झुकाकर उसे स्वीकार करके आगे बढ़ते हैं। अरे, एक संस्था तो है।

          इस समय यहां सलमान खुर्शीद साहब नहीं हैं। मैं उन्हें बड़ा सभ्य आदमी मानता हूं, लेकिन इस बार उन्होंने जो आग उगली है, उस बारे में मैं आपको क्या बताऊं? पता नहीं उन्हें क्या हो गया है? बेनी प्रसाद वर्मा जी हमारे साथ रहे। हम कभी नहीं जानते थे कि वे ऐसा बोलने वाले हैं। वे हमारे साथ रहे। हमने इधर-उधर से चंदा लाकर उन्हें दिया। लेकिन उस आदमी ने क्या किया? ...( व्यवधान) दिग्विजय जी मध्य प्रदेश में थे, तो बहुत सज्जन आदमी थे, लेकिन दिल्ली का प्रताप बहुत जबरदस्त है। यहां जो आ जाता है, हमें जय प्रकाश जी ने कहा था कि देखो, तुम दिल्ली जरूर आ जाना। हम 25 साल 24 दिन में यहां आ गये थे।

          माफ कीजिए, जयप्रकाश जी नहीं, मोरारजी भाई ने कहा था ।  बोले, देखो, तुमको टिकट नहीं देना चाहिए था, वह गलत किया। यह आजादी की लड़ाई नहीं है। बहुत-सी चीजें ऐसी थीं, हम मुश्किल से पौन घंटा कैसे बिता पाए, हम जानते हैं। अंत में बोले, देखो, दिल्ली में आ गए हो, यहां दूर रहना, दिल्ली इतनी फिसलन वाली जगह है कि फिसलने में देर नहीं लगेगी। यही कारण है कि मैं दिल्ली में बहुत कम ही इधर-उधर जाता हूं और इसीलिए थोड़े-बहुत बचे हुए हैं। इसलिए यह अभिभाषण इतना नीरस है, राष्ट्रपति का अभिभाषण भजन, कीर्तन नहीं होता है। यह करेंगे, यह होगा, यह करेंगे, यह होगा, ऐसे नहीं होता है, अरे, इसका नतीजा क्या निकला। क्या हुआ, सात वर्ष में आपके राज में क्या हुआ? गरीबी बढ़ गयी, बेकारी बढ़ गयी, भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं रही, वह अकेले यहां नहीं है, गांव तक सरक गया। कोई कहता था कि कुएं में भांग गिर गई, लेकिन यह भांग नहीं, अफीम गिर गयी है और यह अकेले केवल दिल्ली में नहीं गिर गयी है, सब जगह गिर गयी है। जिसके हाथ में आ रहा है, वह सरकार का पैसा लेकर भाग रहा है। जो भाग रहा है, उसे खूब गाली दे दो, लेकिन कहीं न कहीं सोचना पड़ेगा कि यह ऐसा है क्यों? हिन्दुस्तान के आदमी की बनावट ऐसी क्यों है? इसलिए है सभापति महोदय, कि हमने मां को गुलाम करके रखा है क्योंकि हमको जाति चलानी है। जाति चलाने के लिए गुलाम करना है, तो जाति और गुलामी की जब चक्की चलती है, तो उसमें अंतिम आटा निकलता है परिवार। हमारे यहां कहावत है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। जिसका घर चंगा रहेगा, उसी की कठौती में गंगा होगी। हर भारतीय, चाहे हिन्दू हो, मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो, परिवार के प्रति उसकी निष्ठा फर्स्ट है। अब यह बीमारी सामने खड़ी है। जाति सामने खड़ी है। हम चुनाव में जा रहे हैं, बकवास कर रहे हैं करप्शन-करप्शन, भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार। वह सिर्फ एक बहाना है प्रचार करने का। आप उत्तर प्रदेश के चुनाव में देखिए, भ्रष्टाचार पर कोई एक वोट दे रहा हो, कोई नहीं दे रहा है। 25-30 जातियों ने अपनी पार्टी बना ली है। वे कह रहे हैं कि हमारी जाति की जो लोहे की सिकड़ी है, उसे सोने की कर दो। इससे उनको कोई एतराज नहीं है और जिस जाति का आदमी मिलता है, कहता है हमारी जाति बड़ी कमीनी है, एक नहीं हो रहे हैं लोग। ऐसी दुष्टता का वातावरण बना है। सारी बीमारी आपकी दीवार पर सामने है। क्या कभी एक दिन सरकार ने या सदन ने इन सारी बीमारियों पर चर्चा करने का काम किया? यह जो राष्ट्रपति पढ़ रहा है, वह आपका राष्ट्रपति है, हमारा राष्ट्रपति आएगा, तो इसी तरह पढ़ेगा।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  भाषण तो कैबिनेट बनाती है।

श्री शरद यादव : हां, मैं वही तो कह रहा हूं। मैं यही कह रहा हूं कि राष्ट्रपति हमारा हो या इनका हो, भाषण कैबिनेट का ही होता है। अब वह भाषण पढ रहा है। इसमें यह करेंगे, यह कर दिया, इसके लिए सिवाय अंत में कुछ लिखा ही नहीं है। कितनी तरह की चीजें हैं, मैं आपको बताऊं, इसमें कहा गया हमने हेल्थ मिशन चलाकर रखा है, हमने मनरेगा चलाया है, सर्वशिक्षा अभियान चलाया है, सब चीजों में जैसे कोई टोटका करता है, यह भी कर दिया, यह भी कर दिया, वह भी कर दिया। उससे कुछ हुआ या नहीं हुआ, हम इसे देखने को तैयार नहीं हैं।...( व्यवधान)

संसदीय कार्य मंत्री तथा जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल):  अगर नहीं हुआ, तो किसने नहीं किया।

श्री शरद यादव : आपकी बात सही है। मैं पूरे, सभी लोगों के लिए कह रहा हूं। आप क्यों सोच रहे हैं कि मैं आपको कह रहा हूं। आपके लिए थोड़े कह रहा हूं।

कार्मिक, लोक  शिकायत और  पेंशन मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री (श्री वी.नारायणसामी):  प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है।...( व्यवधान)

श्री शरद यादव : हां, बताइए। मैं आपकी बात समझ नहीं पाया। आप बहुत अच्छी हिन्दी बोलने लगे हैं।

सभापति महोदय : सामी जी बोल रहे हैं कि प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी होती है।

श्री शरद यादव : वह ठीक कह रहे हैं। देश की हालत सबने की है, मिलजुलकर हुई है। जितनी बातें यहां कही गई हैं, जितनी बातें राष्ट्रपति जी से कहलाई हैं, सर्व शिक्षा अभियान, पानी, पीने का पानी आदि सब बातों का जिक्र राष्ट्रपति जी ने किया है और कोई बात छोड़ी नहीं है कि यह नहीं करेंगे। लेकिन वे सभी बातें पूरी नहीं हो सकतीं, जितनी कूवत है आपमें उतनी ही आप कर पाएंगे। एक बार एक बात हुई, जो कि अपवाद कही जा सकती है। पंजाब के मुख्य मंत्री प्रताप सिंह कैरों थे। प्रथम पंचवर्षीय योजना पर बात चल रही थी और सभी राज्यों के मुख्य मंत्री बैठे थे। मुझे खोजबीन करके, पढ़ कर महसूस हुआ कि उन्होंने सिर्फ एक चीज की मांग उस बैठक में की थी और वह थी भाखड़ा नंगल डैम की। आगे चलकर उससे देश में बिजली पैदा हुई। उसी का परिणाम है कि आज पंजाब में कोई ऐसा गांव नहीं है जहां पीने का पानी न हो, पानी की टंकी न हो और नल न हों। पंजाब में कोई ऐसा गांव नहीं है जहां स्कूल न हो, सड़क न हो। इस बात को सभापति जी आप अच्छी तरह से जानते हैं। वहां हर गांव में बिजली है, यह बात और है कि अब वहां बिजली की दिक्कत हो गई है, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। खेत का नाता पानी से बहुत गहरा है और वहां खेतों में पानी पहुंचा। जब ये हालात वहां के हुए तो लोगों के चेहरे का पानी बदल गया, रूप बदल गया। वहां गांव-गांव में अस्पताल खुले, पीने का पानी गया, वहां पर मजदूरी 200-250 रुपए तक हुई। पंजाब में बिहार का मजदूर मजदूरी के लिए जाता है, जिससे वहां के लोगों की अब मेहनत करने की आदत छूट गई है।

          सभापति जी, मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा। मैं एक बात और कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा, क्योंकि आपकी निगाहें मेरी तरफ उठ रही हैं।

सभापति महोदय : आप इतने उन्मुक्त वातावरण में बोल रहे हैं कि मैं समय की सीमा को भूल रहा हूं।

श्री शरद यादव : आपका बड़ा आभार।

शहरी विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (प्रो. सौगत राय):  इनके लिए कोई समय सीमा भी है क्या?

सभापति महोदय: वह खुद समझदार हैं, मैं इधर-उधर देख रहा हूं तो वह समझ जाएंगे कि मैं क्या कर रहा हूं।

श्री शरद यादव : आप पुराने साथी हैं। मैं अधिक समय नहीं लेते हुए केवल एक बात अंत में कहना चाहूंगा। यहां पर काफी चर्चा हुई, खासकर कांग्रेस पार्टी,  हाल ही में हुए विधान सभा चुनावों के बाद, विशेषकर उत्तर प्रदेश के, काफी हड़बड़ा गई। हड़हबड़ाहट में आदमी गड़बड़ा भी जाता है और उसका ब्लड प्रैशर भी बढ़ जाता है। इन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनावों में एक अद्भुत बात चलाई, सामाजिक न्याय की। सामाजिक न्याय को बाबा साहेब अम्बेडकर जानते थे, गांधी जी जानते थे, इंदिरा जी जानती थी और सबसे ज्यादा डॉ. लोहिया जानते थे। संविधान बनाने वाले जो लोग थे, उन्होंने बैकवर्ड क्लास का प्रयोग किया हिन्दुस्तान में, कास्ट का इसलिए नहीं किया कि हिन्दुस्तान का संविधान बनाने वाले वे लोग चाहते थे कि देश में जातियां बहुत हैं, टूट नहीं सकतीं, लेकिन यदि जातियों के बड़े-बड़े कुछ समूह बन जाएं तो ज्यादा अच्छा होगा। संविधान सभा की बहस आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि कितने अनुभवी लोगों की बहस है। उन्होंने बैकवर्ड क्लास नाम रखा, बैकवर्ड कास्ट नहीं। इस मुद्दे पर कितनी बहस हुई, बंसल जी, आपकी सरकार को और आपको खुद संविधान सभा की डिबेट को पढ़ना चाहिए। संविधान में बैकवर्ड क्लास है, बैकवर्ड कास्ट नहीं है, यह पिछड़ा वर्ग है, नारायण सामी जी आपकी बगल में बैठे हैं। ये थोड़ा बहुत इस मामले में जानते हैं क्योंकि साउथ के आदमी हैं, ये बैकवर्ड क्लासेज है और आपको यकीन के साथ बताता हूं कि किसी एक मुसलमान ने रिजर्वेशन नहीं मांगा था, किसी एक भी ईसाई ने नहीं मांगा था, किसी एक सिख ने भी इसके लिए आंदोलन नहीं किया था। कर्पूरी ठाकुर, दिल्ली के चौधरी ब्रह्मप्रकाश, राम अवधेश सिंह और साउथ के जितने भी लोग थे, चाहे अणुमणि रामदास हों या करुणानिधि हों, इन सब लोगों ने आंदोलन चलाया। सभापति जी, मैंने अपने घर में बैठकर पिछड़ी जातियों के, बैकवर्ड क्लासेज के मुसलमानों का नाम, जबलपुर के डा. अंसारी को बुलाकर नाम छांटे। मेरा एक साथी जीवन मसीह था, उसे बुलाकर मसीहों में, ईसाइयों में कौन छोटी जाति के हैं उनके नाम छांटे और उसमें हमें तीन महीने लगे। मंडल साहब जिंदा थे तो उनके पास बैठकर सभी नाम मैंने उसमें रखवाए थे। वे कहते थे कि बैकवर्ड क्लासेज में मुसलमान भी आते हैं, ईसाई भी आते हैं, उन्होंने कुछ बैकवर्ड जातियां छांटी भी थी कि ये बैकवर्ड क्लासेज हैं। लेकिन बैकवर्ड क्लासेज का आपने डिवीजन कर दिया। अभी मैं माननीय राजनाथ सिंह जी को सुन रहा था तो उन्होंने तो न जाने क्या-क्या गजब बातें कह दीं। यानी वे कह रहे थे कि इकोनोमिक रिजर्वेशन कर दो। अरे, तो इस देश की जितनी जातियां हैं उनके चार समूह कर दो और जिनकी जितनी संख्या है उन्हें उतना रिजर्वेशन दे दो। क्यों नहीं दे देते हो या फिर जाति को खत्म कर दो। मैं सभी वीकर सैक्शन की तरफ से कहता हूं कि जाति जिस दिन आप तोड़ोगे, हम रिजर्वेशन वापस लेंगे, अंतरजातीय शादी करके आप मुझे बताओ। क्यों जाति को नहीं तोड़ते हो? जाति के चलते सिनेमा में तुम, जाति के चलते ब्यूरोक्रेसी में तुम, जाति के चलते ज्यूडिशिरी में तुम, जाति के चलते पूरी इंडस्ट्री पर तुम्हारा हक। इसीलिए मैं कह रहा हूं सभापति जी कि जो रिजर्वेशन है, उस पर इनकी एजुकेशन होनी चाहिए।

          मैं बहुत विस्तार से इस पर बोलना चाहता हूं। इन्हें अभी एजुकेट करना है। इंदिरा जी तो जानती थीं लेकिन ये कांग्रेस पार्टी के लोग पूरा भूल गये और इसीलिए यूपी में हार गये क्योंकि इन्हें मालूम ही नहीं है कि समाज-नीति क्या है? समाजवादी पार्टी का डीएनए और हमारा डीएनए एक है, ये जानते हैं इसीलिए इन्होंने तिकड़म करके अपना दांव लगाकर खेल किया। लेकिन कांग्रेस पार्टी के लोग नहीं जानते हैं। इन्हें इस बारे में पता ही नहीं है और इसीलिए इनकी यूपी में हार हुई। ...( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल  :   वहां तो डीएनए ठीक है, यहां मिलता नहीं, वहां मिले पड़े हैं।

श्री शरद यादव : हमारी 63 साल से अपोजीशन तो एक है, आप तो अब छोटे पड़ गये हैं, आप पहले इतने जबर थे कि यदि हम सभी साथ न होते तो आप कभी हटते ही नहीं। यह हमारा साथ तो तकनीकी है। यह एक रणनीति है। आप 9 फीसदी की बात कह रहे हैं और रंगनाथ मिश्र को एक्सपर्ट मान रहे हैं। उसने सारे डिसीजन रिजर्वेशन के खिलाफ दिये हैं। वह आदमी कहता है कि आबादी के अनुसार भी दे दो और नहीं हो तो फिर साढ़े चार फीसदी दे दो। आप सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र कमेटी के ऊपर भी बहस करवा लो। मैं बताऊंगा कि उनमें असली चीज क्या है? सच्चर साहब डा. लोहिया के साथ रहे हुए आदमी हैं, उनकी रिपोर्ट में बहुत दूर तक अच्छाई है, लेकिन रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट तो गजब है, क्या लिखते हैं कि ये नहीं कर सकते तो यह कर दो, खेल समझ रहे हैं। इसलिए 52 फीसदी का आधा सुप्रीम कोर्ट ने दिया है, 52 करना चाहिए था लेकिन अभी तो आधा ही मिलता है हिंदुओं को, तो आधा ही मुसलमानों को मिलेगा, लेकिन ये कह रहे हैं कि 9 फीसदी कर देंगे।

          आप जान लीजिए कि मंडल लागू होने के बाद दंगा बंद हुआ है और आज यूपी, बिहार में दंगा नहीं हो रहा है। आप पता लगा लीजिए कि पहले कितने दंगे होते थे और आज कितने हो रहे हैं? जिस दिन इस पर बहस होगी, उस दिन पूरे आंकड़े लेकर मैं आऊंगा। ये दोनों पार्टियां फिर चाहती हैं और खासकर कांग्रेस पार्टी ने पहल की है बीजेपी ने पहल नहीं की है। कांग्रेस पार्टी चाहती है कि फिर दंगा हो जाए और चुपचाप हमें मुसलमानों का वोट मिल जाए। इसलिए इन्होंने ऐसा प्रयास किया है जो गलत है। माननीय राष्ट्रपति महोदया जी से जो इन्होंने भाषण करवाया है उसमें एक ही अच्छी चीज की कि वे भारतीय भाषा में बोलीं। बाकी तो इसमें ये होगा, ये करेंगे, ये होगा, इसलिए करेंगे-होगा यही भाषण का नाम होना चाहिए। आपने बोलने का समय दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                                                                           

SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Hon. Chairman, Sir, during this discussion on the Motion of Thanks on the President’s Address, our Party led by our great leader Mamata Banerjee wishes to raise some issues which merit discussion. We wish that an answer, in whichever form, must come from the hon. Prime Minister.

          Just nine months ago the new Government led by our leader Mamata Banerjee took over the charge of the State of Bengal, after 34 years of the Left Front regime in the State. When the new Government took charge, it was saddled with a total accumulated debt of more than Rs.2,03,000 crore. In other words, the people of the State carry a per capita debt of about Rs.21,000.

          During the term of UPA-I, between 2004 and 2006, the debt of the State increased by up to 497 percent. This was a debt trap created by the then Left Front Government. Today the Finance Commission has declared three States in the country as Debt Stressed States.  West Bengal is at number one in the list, and the other two are Kerala and Punjab.

          The annual payment towards debt servicing, by way of repayment of interest and principal, is to the tune of Rs.22,000 crore which is almost equal to the State’s own tax collection which is about Rs.21,000 crore. We have approached the Union Government with our request for providing relief to the State to help it reduce its annual financial outgo on account of debt servicing.

          Although the Fiscal Responsibility and Budget Management Act came into force long back in different States, the Left Front Government in West Bengal introduced it only in the year 2010. As a result of that, there was a huge accumulation of debt. The UPA-I Government allowed that debt to be accumulated to this level.

          The Government of West Bengal has already requested the hon. Prime Minister and we again request him that an interest and repayment moratorium in the form of an annual grant for a period of three consecutive years be given. Also, we request for a long-term financial debt restructuring programme for the State. Otherwise, it is impossible for the State Government to make certain improvements in the State of West Bengal.

          Out of the total amount of taxes collected by the Central Government from different States, 32 per cent goes to various States.  And a meager 7.25 per cent of the total tax collection of the Union Government goes to West Bengal. The nation wants an answer on this issue today. The State must be provided with the benefit of financial structuring.   When 100 per cent taxes are being collected from the States, why should such a meagre amount be given to the States? A lion’s share of the taxes collected from the States should be allocated to the States.

          CST is collected and appropriated by the State Governments under the Constitution, as per the Inter-State sale of goods. It was decided collectively by the Government of India and the State Governments that this tax would be gradually reduced from four per cent to zero per cent, starting from 1st April 2007, in the interest of developing India as a common market. Since the States were getting substantial revenue from CST, it was decided that the Government of India would adequately compensate the States for the revenue loss. … (Interruptions) The CST rate was reduced to two per cent from 1st April 2008 and it remained at two per cent since then. The Government of India has recently decided unilaterally not to compensate the States for 2011-12 and partially to compensate the States for the preceding years. This has resulted in loss of revenue for the years 2010-11 and 2011-12 to the tune of Rs. 1,200 crore. This loss would be much higher in the coming years. The Government of India may be requested to restore in full, the CST compensation to the States.

          The Government of India has recently allowed the private airline companies to import Aviation Turbine Fuel, ATF, on which the States had earlier communicated their objections. The Government of India had gone ahead with its decision, despite the objections from all the States. We collect sales tax to the tune of Rs.250 crore every year on the sale of ATF – I am talking this only about the State of West Bengal. We fear that the revenue from this tax would substantially reduce, on account of the import permission granted by the Government of India. The Government of India may be requested to restore the earlier position.

          Special grants for the development of border areas should be extended. In West Bengal, five districts of Cooch Behar, Uttar Chaubis Paraganas, Darjeeling, Malda and Murshidabad, should be declared as backward districts for the purpose of funding under the Backward Region Grand Fund, BRGF.

          The implementation of Right to Education Act would put an additional burden on the State, as the Government of India has decided to have the 65:35 as the sharing pattern between the States and the Centre. Similarly, many other flagship programmes of the Government of India, like JNNURM and others have a similar sharing agreement between them. In view of the critical financial position of the States, it becomes difficult to allocate sufficient share of the State for the Centrally-sponsored programmes. We therefore request the Government of India to consider our State as a special case for 80:20 funding pattern.

The Government of India has set up Rural Infrastructure Development Fund, RIDF in 1995-96, with the objective of supporting the State Governments in channeling bank credit to the priority sector areas of agriculture, rural development and infrastructure development. The RIDF funds were available to the States through NABARD, at the rate of 6.5 per cent. The rate of interest has remained 6.5 per cent since November 2003. The RBI has recently increased the bank rate to 9.5 per cent; this means, the RIDF funds would be available at the rate of 10 per cent. Such a high rate of interest would deter the States from availing the RIDF funds for critical development of rural areas. We may request the Government of India to keep the rate at 6 per cent for loans available under RIDF.

Regarding NCTC, we raised our objections on different occasions. Today also we raised our objections in the morning. Now also I may enjoy that privilege – the NCTC has been formed by the Central Government by exercising powers conferred under article 73 of the Constitution of India and all other powers enabling thereto. 

17.00 hrs. From a combined reading of the clauses 2.3, 2.4, 2.5, 3.2 and 3.5 of the said Order, it emerges that the NCTC is designed to discharge powers, which are attributes of police forces, like those of arrest, intelligence gathering, coordination with existing investigation in the field of counter terrorism.  The power, with regard to law and order, vests with the State Government.  Under the Constitution this power cannot be taken away.   By exercising power under Article 73, the Central Government cannot encroach upon the power of the State legislature. There is no denial that terrorism is a threat to our democratic texture.  The Supreme Court in its judgement, as passed in Prakash Singh vs Union of India on 22nd September, 2006, has also directed to usher in appropriate reforms in police so that police force of the States would be able to address such a menace.  Admittedly, the Union Government in discharge of its constitutional responsibility should formulate appropriate policy, strategy organisation to guide the States in dealing with such threats.  But this cannot be extended to a position where the Central Government would discharge police functions, making inroads into the functions of the State Government towards public order as assigned to it by the Constitution itself.

          Since the NCTC in the proposed version would jeopardise the sanctity of the federal structure of the governance and would be repugnant to the existing laws of the country and may be susceptible of judicial scrutiny, I would request the Government, through you Sir, that NCTC should be withdrawn immediately.  There should not be any debate on that.  It can be discussed later on. It should be withdrawn immediately. The Central Government does not enjoy any power under Article 73 to indirectly interfere with the States police function.

          I would now refer in brief to the fertiliser prices.  There are four major issues with regard to this.  Run away increase in non Urea fertiliser prices, as discussed, is resulting in a major damage to the soil.  The farmers’ propensity to use Urea instead of P&K fertilisers is resulting in abnormal NPK use ratio.

          The Government of India’s intention to decontrol the price of Urea would have an impact on the MRP, unless the Government of India indicates a neutralisation of increase in prices through appropriate indexing of subsidy.

          Recent reports indicate that the Government of India contemplates a reduction in the subsidy to the tune of 30 per cent. This shall be another reason for increase in the price of fertilisers.

          The Government of India has now indicated that the Secondary Freight Subsidy shall be done away with, ostensibly to allow for fixing up of appropriate margins for retailers.  But this shall have the immediate effect of increasing the prices of fertilizers for the farmers.

          With regard to jute, I would request that subsidy for jute should be increased.    The MSP of jute may be fixed appropriately for the crop year 2011.    The cost of production for 2012 has been estimated to be Rs.2,500 per quintal and the MSP recommended to the Government of India is Rs.3,700 per quintal.  Therefore, Sir, this should be implemented immediately.

          I would now talk about the NHAI roads.  It is really impossible to travel the way NHAI is functioning.  Roads have been constructed long back.  Toll tax is being collected but there is no maintenance of the roads.  A car will have to pay Rs.100 and a truck or a bus will have to pay Rs.500 as toll tax but the condition of the roads is very bad.  In West Bengal NHAI roads are totally out of order. The entrance to Kolkata from one side is through Nivedita Setu.  If you go there you will find at least five feet deep potholes and you cannot travel in the evening.

MR. CHAIRMAN :  Now, we can well understand that why Mamtaji said that nobody will purchase West Bengal even in auction. 

SHRI KALYAN BANERJEE : You are right, Sir.  The NH 34 is starting from NSC Bose Airport to Dalkhola, which is of around 452 kilometres.  It was transferred to NHAI from PWD of West Bengal Government for developing it into a four lane road in 2005.  However, NHAI has made plans to make it four lane road from 31 to 452 kilometres.  Accordingly, they have selected the agencies.  The Barasat bypass - 11.90 to 31 kilometres - was conceptualized and consulted by NHAI to make the project report but nothing has been done.  In NHAI, nothing has been done. It needs an immediate interference by the Government of India.  We request the hon. Prime Minister to interfere. 

          After long years, our Chief Minister has resolved the problem of the Gorkhaland of Darjeeling.  This is only because of our hon. Chief Minister that the GTA Agreement has come.  It has recently signed by the hon. President of India.  We give thanks to the hon. President of India for signing this. 

You have given me enough time to speak.  I must express my most respect and regard to you. I will earnestly request the hon. Prime Minister to look into the matter, kindly apply your mind, kindly give the financial assistance and kindly look to a State, which is having Rs. 2 lakh 3 crore debts.  It has been inherited by this new Government.  I will request the hon. Prime Minister to give answer and to say something on this.  Thank you. 

   

SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA):  Thank you, Sir.  Rashtrapatiji has referred to inclusive growth while dealing with the Eleventh Five Year Plan.  The objective of the Eleventh Five Year Plan was indeed inclusive growth.  I would like to know whether during these five years of the Eleventh Five Year Plan we have an inclusive growth or not.  That is the question.  

सभापति महोदय :  आचार्य जी, आप तो बहुत अच्छी हिंदी में भाषण देते हैं श्री बसुदेव आचार्य (बांकुरा):बीच-बीच में हिंदी बोलेंगे और आज एक शायरी बोल कर अपनी बात खत्म करेंगे और वह भी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी के साथ।

सभापति महोदय : आचार्य जी, आपने तो हमारी उत्सुकता बढ़ा दी है कि हम लोग इंतजार करते रहेंगे कि आप कब शायरी बोलें।

श्री बसुदेव आचार्य : आप मुझे बोलने का समय दीजिएगा।  The disparity has been increased between the poor and rich.  The country has now divided.  India is a divided country.   One is rich India and the other one is poor India.  You can say that IPL India and BPL India.  It is the fallout of the policy, which is being pursued by this Government. We have seen during this period that farmers are committing suicides. We have seen during this period that workers were on strikes.  We have seen during this period the growth in unemployment.  We have seen during this period the increase in the poverty, starvation, death, corruption and proliferation of black money.  These are the fallouts of the neo-liberal economic policy, which is being followed by this Government or Government of India during these two decades since 1991.    

          Rashtrapatiji has said:

“My Government has remained committed to providing honest and more efficient Government.”             This is the greatest joke of the year.  You have seen one Winter Session could not function because the Government was bent upon that there was no corruption and the entire Opposition was demanding that in order to inquire into the massive and mega-scam of  2G spectrum, a Joint Parliament Committee should be constituted.   We demanded that in 2010 Monsoon Session.  Sir, you must be remembering that.  But ultimately the Government agreed.  What was the statement of the new Minister who took over?  Just after taking over the Ministry, he held a Press Conference and said that there was no scam, no corruption and that there is zero corruption.  If that was the case, then why a Cabinet Minister is in jail for more than two years now? 
          When the Supreme Court gave verdict canceling 122 licences, what is the crux of the judgement?  We have been telling continuously on the floor of this House that the natural resources belong to the people of our country.  These natural resources are being allowed to be looted and plundered because of the liberal economic policy being pursued by this Government.  We have seen what happened in Karnataka, Goa, Odisha and Jharkhand where there is iron ore.  The natural resources are the public asset.  Spectrum is also public asset.  After the judgement, they are not accepting the judgement.  Now the Government has gone for review of the judgement of the Supreme  Court. Why can they not accept the judgement? Why can they not implement the judgement and cancel 122 licences as they were not auctioned?  The country lost Rs.1.76 crore because of that.  There has not been such a corrupt Government ever in this country.  This Government is the most corrupt Government we ever had.
          The Prime Minister, the Finance Minister and the earlier Finance Minister have said they were not aware of it.  We sent two letters to the Prime Minister informing him what was happening at that time in the month of January, 2008, when we were supporting this Government. Sixty-one Members belonging to Left Parties extended external support on the basis of Common Minimum Programme. Today, UPA—II Government has no programme at all.  The UPA-I Government had the National Minimum Programme.
 
          Sir, many things have been mentioned by the hon. Rashtrapatiji in his Address with regard to agriculture as if there is growth in agriculture, as if there are no problems in the agriculture sector. The agricultural crisis is deepening day by day. Recently, the Standing Committee on Agriculture visited Yavatmal in the State of Maharashtra. What were our findings there? Around 500 widows of farmers who have committed suicide met us. About 2,56,000 farmers from different States have committed suicide, even there are case of suicide by farmers from States where there was no incidence of farmer’s suicides before, but during these last four to five months, after the change, after the parivartan, there have been instances of farmers committing suicides. Forty-five farmers have committed suicide in the State of West Bengal … (Interruptions)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY): Sir, this is a false statement… (Interruptions)
श्री बसुदेव आचार्य : क्यों किसानों को खुदकुशी करनी पड़ रही है? ...( व्यवधान) जो किसान हमारे देश के खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता लाए हैं, आज उन किसानों को खुदकुशी करनी पड़ रही है। आज हमारे देश का किसान खुदकुशी करने के लिए क्यों मजबूर है? ...( व्यवधान)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF URBAN DEVELOPMENT (PROF. SAUGATA ROY): Sir, he is misleading the House… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, please sit down. Nothing will go on record.
(Interruptions) … * MR. CHAIRMAN: Hon. Members, you are all gentlemen. I am standing now and therefore, you should sit down. I would like to request the hon. Members that let him speak. You got your chance and they all listened peacefully.
SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY: Sir, it is a State subject. When once we wanted to raise such matters in the House they did not allow us saying that these were State subjects… (Interruptions)
SHRI BASU DEB ACHARIA :  Suicide by farmers is not a State subject… (Interruptions)
 PROF. SAUGATA ROY: Sir, he is misleading the House. Can he mislead the House?… (Interruptions)
SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY: Sir, no such incidents of farmer’s suicide has taken place in the State of West Bengal as he has mentioned. There has been one case of suicide and we accept that and admit that. The others are rich farmers… (Interruptions)
SHRI BASU DEB ACHARIA :  I can submit the list of farmers who have committed suicide in the State… (Interruptions) Why are farmers committing suicide? … (Interruptions)
          Sir, there has been an increase in the cost of inputs to the extent of 100 per cent. What was the price of one bag of DAP in January, 2011? It was Rs. 450 per bag. What is its price today? It is Rs. 950 per bag. The farmers are not even able to get a bag of DAP at the rate of Rs. 950. They have to pay Rs. 1200 or Rs. 1300 or Rs. 1400 per bag of DAP… (Interruptions) It is being sold in the black market. Fertilizers are being sold in the market Fertilizer is not available… (Interruptions) I have the figures … (Interruptions)
In 2008-09 it was Rs. 76,602 crore.  Can they challenge it? They cannot challenge it. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN :  Shri Acharia, I am waiting for your shayari.
… (Interruptions)
SHRI BASU DEB ACHARIA : In 2009-10, it was Rs. 61,274 crore.  It got reduced.  In 2010-11, it came down to Rs. 54,976 crore.  In 2011-12, it further came down to Rs. 49,998 crore. This is the situation regarding the availability of subsidy to fertilizer. Now, this subsidy regime has been changed.  Previously, what was the system? It was ‘fixed price and variable subsidy’.  But now they have changed to ‘variable price and fixed subsidy’. The Government will not increase a single paisa more than Rs. 49,998 crore.
We have to depend on import of DAP to the extent of forty per cent or rather fifty per cent.  In the case of urea, the dependence is 35 per cent because six urea manufacturing units, starting from Gorakhpur, Barauli, Sindri, Durgapur, Haldia, Talcher to Namrup have been closed. 
Mr. Chairman, Sindri is in your State. Sindri was the first public sector undertaking.
MR. CHAIRMAN: It has been closed since more than a decade.
SHRI BASU DEB ACHARIA : I know. It was closed in 2002.  I fought for that in this House but I could not stop that unit from being closed down.  Pandit Nehru, while inaugurating Fertilizer Corporation of India’s unit at Sindri had said: “I am not inaugurating a factory, but I am inaugurating a temple of modern India.” I still remember that.
          What about the MSP? They are saying that they are increasing the MSP year after year.  The increase in the input cost is by 100 per cent, but the increase in the MSP is only ten to fifteen per cent. What is the MSP for one quintal of paddy? It is Rs. 1080 for common varieties. What is the production cost? It does not even meet the production cost. The farmers are not getting even this subsidy of Rs. 1,080. They are forced to sell their produce at Rs. 500 or Rs. 600 or Rs. 700 per quintal. We have seen it in the rural India.  We have that experience in the rural India. That is the situation.  What will the farmers do? They have no other alternative but to commit suicide. I have seen their indebtedness.
I wanted to just find out what impact the Prime Minister’s special package to the farmers of Maharashtra, particularly to the farmers of Vidarbha, has made. I had been to Yavatmal. Many of the widows said that the Prime Minister’s special package has made no difference to their poor economic condition. Cattle have died and there is no water.  Only eleven per cent of the land is irrigated. Now, they have sent a proposal for Rs. 15,000 crore.  The Principal Secretary wanted my assistance to get it approved. I told him, with the help of all the Members belonging to Maharashtra, particularly with the help of Shri Geete, we will definitely get it approved. We know pretty well the condition of the farmers of Vidarbha region. 
          So, Sir, such is the crisis and the Government has failed to take any concrete measures to overcome the crisis.  As a result of this, prices are increasing. 
          Sir, yesterday, you must have seen, the Ministry of Agriculture have Tabled a Report on the status of Indian agriculture. The hon. Minister of Agriculture, Shri Sharad Pawar has already admitted about the reduction in the availability of food grains. What was the availability of food grains in 1991? It was 510 grams and what is today?  It has come down to 444 grams within a period of 15 years. The availability of food grains has been reduced to such an extent.   He has also admitted that there is a problem in reducing the rising prices of essential commodities, particularly foodgrains, if speculative future trade continues. If speculative trade continues, how can Shri Pawan Kumar Bansal, hon. Minister of Parliamentary Affairs, will be able to control and contain inflationary effect on the prices of essential commodities? How can you control if you decontrol the price of petrol?  During the last two years how much is the increase under the UPA-II?    I am not talking of UPA-I because you were depending on us.  You could not disinvestment any of the public sector undertakings. You decided to disinvest Bharat Heavy Electricals Limited, NALCO, Neyveli Lignite Corporation. Our Tamil Nadu friends are present here in the House. We opposed it and you had to reverse the decision of the Cabinet because of the opposition of 61 Left Parties Members. You had to reverse the decision. Today, you have decontrolled the price of petrol.  Now, you will be decontrolling the price of diesel.  You could not increase the price of kerosene. Shri Bansalji, you must be remembering that during the five years regime of UPA-I, you could not increase the price and now you have increased the price by Rs. 3.50 a litre. How can the Government will be able to control or moderate the inflation, if you allow speculative trade?  Sir, you will be surprised that within one year how much is the increase in the commodity trade.  In 2007-08, it was Rs. 14,67,000 crore and within one year it increased to Rs. 24 lakh crore in the commodity trade. 
Sir, farmers are getting price. What is the variation between the farm gate price and the consumer price?  I have seen it in my constituency. Sir, farmers have grown tomatoes.  Tomatoes are not being harvested as because the cost of harvesting and carrying the tomatoes to the market and the price they will get, it will not meet even the production cost. I am talking of cost of harvesting and carrying tomatoes to the market.  Tomatoes are lying without harvesting.  Similar is the case with potatoes.  In West Bengal, it is being sold for one rupee a kilo. Last year, we could export potatoes to Singapore.  From Sonamukhi in Bankura District of West Bengal, potatoes were exported to Singapore. We got one rupee transport subsidy for one kg of potato. That is the situation in agrarian sector.  Crisis is accentuating and you have allowed Monsanto.  Ninety-three per cent cotton is Bt. cotton.   Cost has been increased. Now, they are ready to allow Bt brinjal. You will be surprised to know as to what I worked out. According to my calculation, during the last nine years – in 2002 Monsanto was allowed commercialisation of Bt cotton – from 2002-211, one multinational company got Rs.25,000 crore by fleecing our farmers; exploiting the farmers. That is the situation in agricultural sector. … (Interruptions) You organize an orientation course for some Members as to how to behave inside the House. Some Members do not know as to how to behave inside the House.
          There was an historic strike on 20th February, 2011.
MR. CHAIRMAN :  I am seeing a sea change. When you were in power in West Bengal, they were more furious. Now a days, they have become so clam. I  am just finding a change.
SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY : Automatically, he has become furious.
SHRI BASU DEB ACHARIA :  I am not furious.
          There had been two strikes during these two years of UPA-II regime and this strike is historic because all the trade unions, not a single trade union is outside the strike. Why workers had to go on strike? They have to because the labour laws are being blatantly violated. Rights of the workers even to form the unions are being taken away. The constitutional right under Article 19 to form the union, association is taken away. This is the fundamental right of the workers and employee and that fundamental right is being taken away. Even some State Governments are planning to bring legislation to take away the right of the workers and employees. That is the situation. Attack is going on the workers; prices are rising; inflation is rising. Outsourcing of contractual workers is increased; the number of contract workers are increasing but they are not even getting the minimum wages. All the Labour Acts – the Minimum Wages Act, the Payment of Wages Act - are being violated.
          In the case of the State transport employees, the Payment of Wages Act is being violated in West Bengal. Within two years of global economic slowdown, they were claiming that there would not be any impact in our country.       There had not been any impact in our financial sector, in banks and LIC. That is because of the Left Parties. We did not allow the share of banks to be handed over to the private sector.
सभापति महोदय :  बंसल जी, आप सुन नहीं रहे हैं, इसलिए आचार्य जी बोलते जा रहे हैं।  आप सुनते तो उनका भाषण शार्ट हो जाता।
SHRI BASU DEB ACHARIA : We did not allow FDI in insurance being raised from 26 per cent to 49 per cent. That is why, there was no impact on our financial sector.
          But there is impact on working class. According to International Labour Organisation, almost 35 lakh workers have lost their jobs in our country? Now the Government has spent Rs. 1,87,000 crore as a bail out package. For whom have they spent? They have spent it for the industrialists, for the automobile sector and for the exporters. How much has the UPA Government spent on bail out package for the workers? Not a single paise. Bansalji, you also get the support of employees of Chandigarh. I know that because we were together in a rally of workers and employees. I think you have forgotten that. You admitted that employees have supported you. Is it not a fact?
          Sir, I am talking of a bail out package for the corporate houses. Now a new class has come and that is corporate house. This Government is of the corporates, by the corporates and for the corporates. Whenever a bail out package is provided for the corporate houses, for the industrialists, for the automobile industry and for the exporters, one condition should be incorporate in that and that is, no worker should be retrenched, no worker should lose his job. That condition should be attached. That is the demand of the entire working class. Their main demand is that this Government should change its policy. यह नीति बदलाव की लड़ाई थी।  ये केवल पांच या ग्यारह मांगें नहीं हैं, असली मांग है नीति। What is the neo liberal policy followed by this Government? Sharad Yadavji also referred to it. The problems that the country is confronted with are unemployment and poverty. You will be surprised to know that one-fourth of the population of this country go to bed with empty stomach. This is the situation in the country after 64 years of our Indpendence. You have landed this country in such a situation. Bansalji, you should realise that. The verdict of the people of at least two States in the recently held elections to Assemblies, in Uttar Pradesh and Punjab, is against your policies and it is against corruption. You should learn a lesson from that. The European countries and America who are following this neo liberal economic policy are confronted with economic crises and you are not learning a lesson from those countries.
MR. CHAIRMAN : Acharyaji, please conclude now.
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, I now come to a very important point relating to reservation for the minorities.
सभापति महोदय : एक मिनट ठहर जाइए।  आज मैं बहुत कष्ट में हूं।  सब वेटरन्स बोल रहे हैं, मैं बहुत लिहाज कर रहा हूं, लेकिन it is too much.      
 
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, we have two reports; one is Sachar Committee Report and another is Justice Ranganath Mishra Committee Report.  The Ranganath Mishra Committee Report was not submitted even after the expiry of six months of the Government received the Report.  When we raised the issue here in this House then they were compelled to lay the Report on the Table of the House, but without Action Taken Report. 
          I would like to know what action the Government has taken on these two Reports, the Sachar Committee Report and Justice Ranganath Mishra Committee Report… (Interruptions) The Central Government has not acted upon the recommendations of Justice Ranganath Mishra Committee Report.  But the Left Front Government of West Bengal have implemented ten per cent reservation for socially, educationally, economically backwards and Muslims… (Interruptions)
 सभापति महोदय :   मैं आप को बताना चाहता हूं।
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, West Bengal is the first State which implemented the recommendations of Justice Ranganath Mishra Committee Report, but the Central Government have not acted upon the recommendations of Justice Ranganath Mishra Committee Report… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Please listen to me.  I am just thinking that the House will be deprived of a good shayari before I announce the name of the next speaker.
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, the nation cannot be saved unless they change their new liberal economic policy; they will neither be able to save the country nor will they be able to save themselves. 
          Now I will conclude with a couplet from Faiz Ahemad Faiz.  Sir, you know the 2011 is the Birth Centenary of the famous Poet Faiz Ahamad Faiz.  He is called the greatest poet of the Century.
गुलों में रंग भरें, बद-ए-नवबहार चले                                         चलें भी आओ, आओ के गुलशन का कारोबार चले ...( व्यवधान)
 
          आप जरा ट्रंसलेट कर दीजिए।
सभापति महोदय :   नहीं, आपने उसको पढ़ा वह ठीक है।  
SHRI BASU DEB ACHARIA : The Urdu poets have two meanings, one is outer and the other is inner.
सभापति महोदय :  मैं इसके इक्ववैलेन्ट एक बता देता हूं।
जिन्दगी एक चमन है, चमन है मगर इस चमन की बहारों फिजां कुछ नहीं   वो न आएं तो समझो खिजां के हैं दिन वो आएं तो समझो बहार आ गई।
 
SHRI BASU DEB ACHARIA : Thank you very much, Sir.
श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़):  सभापति महोदय, महामहिम राष्ट्रपति जी के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए मैं खड़ा हूं। इसके पहले राष्ट्रपति जी के कई अभिभाषणों पर उन्हें सुनने का मुझे अवसर मिला है लेकिन पहली बार इस अभिभाषण में जो मुझे महसूस हुआ, लगभग सभी सदस्यों ने वह महसूस किया होगा, जब महामहिम राष्ट्रपति जी बारबार यह कहती थी - मेरी सरकार, मेरी सरकार और मुझे लगता है कि आज की जो यूपीए सरकार है यह पूरी तरह असफल सरकार है।   यह विफल सरकार है और सरकार की विफलता, सरकार की असफलता महामहिम राष्ट्रपति जी के भाषण में बार-बार प्रतीत हो रही थी।
          सभापति जी, महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण की शुरूआत की। मैं यहां उसका पहला पैराग्राफ उद्धृत करना चाहूंगा। महामहिम राष्ट्रपति जी ने कहा -- “यह वर्ष विश्व अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलों भरा रहा है। आर्थिक अनिश्चितताओं का पूरे विश्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में राजनीतिक अनिश्चितता व अस्थिरता बढ़ी है और जिस परिवेश में हम कार्य कर रहे हैं, वह पिछले एक वर्ष में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।” मुझे लगता है कि ये वाक्य महामहिम राष्ट्रपति जी के मुंह से कहलवाकर सरकार ने अपनी असफलता को छिपाने का प्रयास किया है। इसलिए उनके पूरे अभिभाषण में हमें कहीं भी इस वर्ष जोश दिखाई नहीं दिया, न ही उनके पूरे अभिभाषण में हमने कभी सदन को बैंच थपथपाए हुए सुना है। मैं इस बात का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि दुर्भाग्य से आज भी देश का किसान परेशान है। आज भी लगातार आत्महत्याएं हो रही हैं। किसान पूरी तरह उत्तेजित है। इस आत्महत्या को रोकने के प्रयास में सरकार ने जो भी कदम उठाए हैं, वे सारे नाकामयाब हो गए हैं। मैं आज का उदाहरण दूंगा। शहरों में गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले जो बेरोजगार लोग हैं, उनके बारे में सुबह जो प्रश्न आया था, उसमें जब अध्यक्ष महोदया ने मुझे प्रश्न पूछने का अवसर दिया, तब मैं आसन के माध्यम से सरकार के ध्यान में यह बात लाया था कि आज देश के किसान परेशान हैं। वे धीरे-धीरे खेती छोड़ने लगे हैं। आज सदन में पहला प्रश्न कृषि मंत्रालय का था, आंध्र से जुड़ा हुआ था। आंध्र के एक हलके के लोगों ने क्रॉप हॉलिडे डिक्लेयर कर दिया, पूरी एक फसल को छुट्टी। अगर कहीं यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो शायद एक दिन पूरे देश के किसान क्रॉप हॉलिडे मनाने पर मजबूर हो जाएंगे। हमारे देश की 70 प्रतिशत आबादी जो ग्रामीण क्षेत्रों में रह रही है, जो खेती पर निर्भर है, कृषि पर निर्भर है, उस 70 प्रतिशत आबादी की जो वास्तविकता है, उसका चित्रण आज के पहले प्रश्न में इस सदन में हमारे सामने आया। उसी प्रश्न को दोहराते हुए मैं सरकार के ध्यान में लाया कि इसी कारण किसान ग्रामीण क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं और शहरों की ओर जा रहे हैं। पलायन होने के कारण बेरोजगारों, गरीबी की रेखा से नीचे जीने वाले लोगों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।
आज प्रश्न काल में जब मैंने इस बात की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया, तो मेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिये जो मंत्री ख़ड़े हुए, वे अब तक सदन में थे, लेकिन इस समय नहीं हैं। उन्होंने सदन को जो जानकारी दी है, उसे मैं आपके सामने, सदन के सामने रखना चाहूंगा। मंत्री जी ने इस बात को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि मैं माननीय सदस्य की बात को स्वीकार करता हूं  और उनकी कही हुई बात सही है। उन्होंने जो आंकड़े दिये हैं, वर्ष 1993-94 में शहरों में रहने वाले गरीब लोगों की संख्या 763 लाख थी। वर्ष 2004-05 मे यह संख्या बढ़कर 808 लाख हो गयी, यानी 45 लाख गरीबों की संख्या शहरों में बढ़ी है। लेकिन जो आंकड़ा उन्होंने इस सदन के सामने दिया है, वह वर्ष 2004-05 का है। आज हम वर्ष 2012 में हैं। यदि आप सही आंकड़ा जानना चाहें, तो आज शहरों में जो गरीब लोग हैं, उनकी संख्या 16 करोड़ से भी ज्यादा बढ़ चुकी है। 16 करोड़ से ज्यादा लोग आज शहरों में गरीब हैं, यानी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। हमने गरीबी रेखा का जो मापदंड तय किया है, जिस मापदंड से हमने गरीबी रेखा को तय किया है, उस मापदंड के मुताबिक अगर शहर में रहने वाले किसी व्यक्ति की एक दिन की आय 32 रुपये से कम है, तो वह गरीब है। यदि इसी मापदंड को स्वीकार किया जाये, तो 16 करोड़ लोगों की आय प्रतिदिन 32 रुपये से कम है। आप इस बात को समझ सकते हैं कि किस प्रकार की गरीबी देश की आजादी के 64 सालों के बाद भी हमारे देश में है। मुझे लगता है कि यही विफलता, यही असफलता महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर छायी रही।
          सभापति महोदय, वास्तव मे यह सरकार पूरी तरह से हर क्षेत्र में विफल है। चाहे कोई भी क्षेत्र हो, यह सरकार हर क्षेत्र में विफल है। जब बसुदेव आचार्य जी यहां बोल रहे थे तो उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति जी का एक वाक्य यहां उद्धृत किया। महामहिम राष्ट्रपति जी ने कहा कि मेरी सरकार ईमानदार तथा अधिक कारगार शासन व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।...( व्यवधान) मैं बसुदेव आचार्य जी से पूरी तरह सहमत हूं कि आजादी के बाद आज तक जितनी भी सरकारें भारत मे हुई हैं, उनमें सबसे करप्ट, भ्रष्ट सरकार यदि कोई है, तो यूपीए की सरकार है। ...( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल :  सभापति महोदय, यह सरासर गलत बात है। ...( व्यवधान) यह पार्लियामैंट के बहुत सीनियर मैम्बर हैं। ...( व्यवधान) गीते जी पार्लियामैंट के बहुत सीनियर मैम्बर हैं। वे खुद मिनिस्टर रहे हैं। ऐसी बात ऐसे कह देना, बहुत शोभा नहीं देता। बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन ऐसा कह देना वाजिब नहीं है। आप जो बात समझते हैं, उसे कहने का आपका अधिकार है, लेकिन ऐसा जजमैंट देना जो बिल्कुल बेबुनियादी है, वह अधिकार आपका नहीं है। मैंने पहले नहीं बोला, लेकिन उसी बात को दोहराते रहेंगे, तो यह वाजिब नहीं है, मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं। ...( व्यवधान) आप किसी चीज को कुछ महसूस करते हैं, आपका अधिकार है कि आप उसे कहिए। कहीं भी आप कोई इररेगुलेरिटी देखते हैं, तो उसे कहने का आपका अधिकार है। कहीं करप्शन देखते हैं, तो उसे कहने का आपका अधिकार है। लेकिन ऐसे बात कह देना जब आप जानते हैं कि चारों तरफ क्या-क्या हो रहा है, उस वक्त यह कहना सही नहीं है। मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं।
सभापति महोदय :  बंसल जी, आप पहले बोल देते, तो ज्यादा अच्छा होता, क्योंकि मौनम् स्वीकार लक्षणम्। जब आप चुप हो गये, तो लोगों ने कहा कि  मान गये हैं।
…( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल :  सभापति जी, यह देखना जरूरी नहीं होता कि अनपार्लियामैंट्री है। लेकिन क्या कहना चाहिए, शोभा क्या देता है, कितनी बात हम कुछ सीमाओं के बीच में रहकर कहते हैं, वह देखना जरूरी है।
 श्री अनंत गंगाराम गीते :सभापति जी, मैं संसदीय कार्यमंत्री जी का आदर करता हूं। मेरी वरिष्ठता को उन्होंने स्वीकार किया है, जिसके लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूं। मैं 11वीं लोक सभा से सदन में हूं और यह 15वीं लोक सभा है। 11वीं लोक सभा से 15वीं लोक सभा तक जितने भी भ्रष्टाचार के मामले इस सदन में आए, यदि मैं सही हूं, तो आप इस बात को स्वीकार करें, अगर गलत हूं, तो निश्चित रूप में आप इसे अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन टू-जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हुआ।...( व्यवधान) आप मेरी बात तो सुन लीजिए। 1,76,000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ, जिस घोटाले में...( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल :  महोदय, वह आज का विषय नहीं है और यह कहना कि  1,76,000 करोड़ रुपये का घोटाला है, गलत है। मैं पूरी इज्जत और जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं। मामला कचहरी के आगे है, अगर आप पॉलिसी की बात करते हैं कि पॉलिसी में क्या है, तो वह अलग बात है। लेकिन अगर आप उसको करप्शन बता दें कि 1,76,000 करोड़ रुपये का करप्शन हो गया, तो यह गलत है। ऐसा आपको नहीं कहना चाहिए।  यह मसला कचहरी के सामने है। यह मसला स्टैंडिंग कमेटीज के सामने है। ...( व्यवधान) सर, इसमें बात प्वाइंट ऑफ आर्डर की भी आ जाती है।...( व्यवधान) This is a point of order also.  … (Interruptions) Sir, you know the rule.  … (Interruptions) Sir, this matter is before the JPC and also before the PAC और आप उस बात पर ऐसा एलान कर रहे हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदय :  गीते जी, माननीय मंत्री जी का कहना है कि यह मामला जेपीसी में भी लंबित है, यह मामला उच्चतम न्यायालय में भी लंबित है।
…( व्यवधान)
सभापति महोदय : गीते जी, आप आगे बोलिए।
…( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल:  आप एक स्वीपिंग स्टेटमेंट में कह देंगे कि इतना करप्शन हो गया।...( व्यवधान)
श्री अनंत गंगाराम गीते : सभापति जी, मैंने इस मुद्दे को इसलिए उठाया कि महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपनी सरकार को ईमानदार कहा।...( व्यवधान) यह बात मैंने इसलिए उठाई कि महामहिम राष्ट्रपति जी ने सरकार को ईमानदार कहा है। 1,76,000 करोड़ रुपये का जो आंकड़ा अखबारों में आया है, वही मैंने कहा है, जो पहले दिन से, जब से भ्रष्टाचार पर चर्चा शुरू हुई है, वह आया है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि उसके बाद, जब उस समय के संचार मंत्री ए.राजा, जो आज भी जेल में हैं।...( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल:  उसका ट्रायल हो रहा है कोर्ट में।...( व्यवधान)
श्री अनंत गंगाराम गीते : आप मेरी बात सुन लीजिए।...( व्यवधान) मैं उसकी मेरिट पर नहीं बोल रहा हूं।...( व्यवधान) सभापति जी, मैं इस केस के मेरिट पर कुछ नहीं बोल रहा हूं, मुझे पता है कि यह मामला न्यायालय में लंबित है। मुझे इसकी मेरिट पर कुछ नहीं कहना है, मैं सिर्फ इतना ही कह रहा हूं कि एक मंत्री, उस समय के संचार मंत्री आज भी जेल में हैं और उनके जेल में जाने के बाद जब दूसरे मंत्री ने इस विभाग के पदभार को स्वीकार किया, जो आज भी इस सदन में मंत्री हैं, उन्होंने यह पहला बयान दिया था कि इसमें किसी भी प्रकार का करप्शन नहीं हुआ है, जीरो करप्शन है। कोई करप्शन नहीं है, जीरो करप्शन कहा था उन्होंने। यह सर्टिफिकेट दिया था उन्होंने।...( व्यवधान)
SHRI PAWAN KUMAR BANSAL:  Sir, may I correct him? उन्होंने जीरो करप्शन नहीं कहा था। मैं इतना ही कहना चाहता हूं। हम गंभीरता के साथ, संजीदगी के साथ मसले को पार्लियामेंट में डिसकस कर रहे हैं, एक तरफ पॉलिसी की बात है। सभी सदस्य मानेंगे कि पॉलिसी क्या थी, कैसे फॉलो हुई थी और दूसरी बात है पॉलिसी के इंप्लीमेंटेशन की।
     

18.00 hrs. इम्प्लीमेंटेशन का भी मसला कचहरी के सामने है और फैसला होना है। आप जो खड़े होकर इस बात को कह रहे हैं, तो यह नीति आपकी सरकार के समय की ही बनाई हुई है। आपने ही बनाई है यह नीति और जो नीति आपने बनाकर दी, वह आगे चली। ...( व्यवधान) बीज आपने ही बोया था, जिस बात को आप कह रहे हैं...( व्यवधान)

सभापति महोदय : कृपया शांत हो जाएं।

...( व्यवधान)

सभापति महोदय: आप भी सीमा तोड़ रहे हैं, क्योंकि मैं खड़ा हूं। कृपया शांत हो जाएं। मैं गीते जी से कहना चाहूंगा कि वह अब अपनी बात समाप्त करें।

श्री अनंत गंगाराम गीते : सभापति जी, मुझे बोलने का अवसर ही कहां मिला है।

सभापति महोदय: अभी छः बज रहे हैं। तीन-चार माननीय सदस्य इस विषय पर और बोलेंगे, उसके बाद शून्य काल लिया जाएगा। मैं सदन की अनुमति चाहूंगा कि तब तक के लिए सदन का समय बढ़ा दिया जाए।

कई माननीय सदस्य: ठीक है।

 

18.02 hrs. (Mr. Deputy Speaker in the Chair) श्री अनंत गंगाराम गीते : सभापति जी, बाद में सीबीआई ने यह मामला दर्ज कराया। तब सीबीआई ने इस बात को स्वीकार किया कि 60,000 करोड़ रुपए का घोटाला है। मैं आकड़ों में नहीं जाना चाहता। मैं भी जानता हूं कि यह मामला न्यायालय में लम्बित है और निश्चित रूप से सच्चाई देश के सामने, जनता के सामने आएगी।

          उपाध्यक्ष जी, दूसरा घोटाला कॉमनवैल्थ गेम्स का हुआ आज इस सदन के सदस्य सुरेश कलमाड़ी जी दिन भर यहां थे, अभी नहीं है, उन्हें जेल जाना पड़ा। वह जेल से बाहर आ गए और यहां उन्होंने सत्र अटेंड किया। उन्हें तो जेल में भेज दिया गया, लेकिन जो उसके लिए जिम्मेदार थे, उन सबकी सजा अकेले सुरेश कलमाड़ी जी भुगत रहे हैं। संसदीय कार्य मंत्री जी, आप बुरा न मानें, हमें आपकी ईमानदारी पर शक नहीं है। न ही हमें प्रधान मंत्री जी की ईमानदारी पर कोई शक है। गोरखनाथ पांडेय जी जब अपनी बात यहां कह रहे थे, उन्होंने जो वाक्य कहा, मैं उसे दोहराना नहीं चाहूंगा। हमारे लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था यह संसद है, जिसमें प्रधान मंत्री जी मंत्रिमंडल के प्रमुख होते हैं।

उपाध्यक्ष महोदय: कृपया अपनी बात समाप्त करें।

श्री अनंत गंगाराम गीते : उपाध्यक्ष जी, अभी तो मैंने शुरूआत ही की है। इतनी टोका-टाकी हुई कि मुझे बोलने का अवसर ही नहीं मिला। मैं दो-तीन बातें प्रमुख रूप से कहना चाहूंगा। आज जो करप्शन के इतने मामले चल रहे हैं, उसका परिणाम पांच राज्यों के हाल ही में सम्पन्न चुनावों में आ गया है। जनता ने जिसे सजा देनी थी, दे दी। इससे सीख लेने की आवश्यकता है।

          आज देश में गरीबी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। महामहिम राष्ट्रपति जी ने एक योजना का जिक्र किया है। मैं उस योजना के ऊपर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।  महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण में जो कहा है मैं उसे यहां उद्धृत करना चाहूंगा          -“ मेरी सरकार ने देश के लाखों वंचित लोगों तक पहुंचने के लिए आधार नामक अनूठी योजना शुरु की है जो सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों की उपलब्धता, जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार लाने में सहायक सिद्ध होगी।”  यह योजना जो सरकार ने घोषित की है, आज तो वह बंद है, लेकिन मैं सरकार से जानना चाहूंगा कि इस योजना का क्या हुआ? जिस योजना का जिक्र महामहिम के अभिभाषण में है और वे कह रही हैं कि   “ जिससे लोगों की वित्तीय समावेशता बढ़ेगी।”  उपाध्यक्ष जी, इस योजना से लोगों को कोई सीधा लाभ नहीं है, ये खाली पहचान-पत्र हैं। आधार-कार्ड की शक्ल में जो पहचान-पत्र दिया जाने वाला है जिससे इस देश के जो गरीब हैं, उसकी पहचान सरकार को हो पाएगी कि सचमुच में कितने लोग गरीब हैं, कितने लोग बेरोजगार हैं, कितने लोग एक वक्त का खाना भी नहीं खा सकते हैं। यह सारी जानकारी इस आधार-कार्ड में मिलेगी और इस परिचय-पत्र के आधार पर भारत सरकार कोई योजना आगे चला सकती है। लेकिन जिस योजना का उल्लेख महामहिम राष्ट्रपति महोदया ने अपने अभिभाषण में किया है, यह योजना आज बंद पड़ी है। इसीलिए जब सरकार जवाब दे तो सरकार को यह जानकारी देने की आवश्यकता है कि इस आधार योजना की आज क्या स्थिति है?

          उपाध्यक्ष जी, मैं सरकार की असफलताएं गिना रहा हूं। यह सरकार बिल्कुल असफल रही है और इसका प्रभाव राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर भी रहा है।

          महामहिम राष्ट्रपति जी ने कुपोषण के बारे में कहा। दुर्भाग्य से आज हमारे देश में बहुत बड़ी संख्या में कुपोषण की समस्या है। आदिवासी क्षेत्रों में, बनवासी क्षेत्रों में कुपोषण से बालक मर रहे हैं, प्रसूति के समय माताएं मर रही हैं, उनकी मृत्यु हो रही है और यह संख्या इतनी बड़ी है कि महामहिम राष्ट्रपति जी को अपने अभिभाषण में इसका जिक्र करना पड़ा। उन्होंने कहा कि   “ कुपोषण बच्चों को गंभीर रूप से प्रभावित करता रहा है जिससे उनके शिक्षा प्राप्त करने की और आजीविका अर्जित करने के अवसरों पर भी असर पड़ा है। इस समस्या से प्रभावित 200 जिलों में आईसीडीएस के अलावा, मल्टी-सेक्टोरल पोषण कार्यक्रम भी शुरू किया जाएगा।”            उपाध्यक्ष जी, ऐसे 200 जिले हैं जिनमें कुपोषण की समस्या है लेकिन सरकार अपनी सफलता का ढिंढोरा पीट रही है। सरकार मानती है कि हम सफल हैं, लेकिन ऐसे 200 जिले हैं जहां कुपोषण की समस्या है। जब पैदा होते ही बच्चे मर रहे हैं और हम कुपोषण पर भी काबू नहीं पा रहे हैं, यह स्थिति हमारे देश की है।

          उपाध्यक्ष जी, जब आरक्षण का विषय आया, उस पर भी महामहिम राष्ट्रपति जी ने अल्पसंख्यकों के बारे में कहा। हम उनके खिलाफ नहीं हैं। जो अल्पसंख्यक लोग हैं वे भी इस देश के नागरिक हैं, हम इस बात को स्वीकार करते हैं। इन अल्पसंख्यकों को जो भी सहूलियतें सरकार देना चाहे दे दे, लेकिन उन्हें सहूलियतें देते समय, जो इस देश का ओबीसी वर्ग है, जो पिछड़ा वर्ग है, जो बहुत बड़ी संख्या में है जिसका आरक्षण 27 प्रतिशत रखा है, जो संविधान ने उन्हें दिया है, उसमें से साढ़े चार प्रतिशत आपने इन अल्पसंख्यकों को देकर एक से ओबीसी और पिछड़े वर्ग के लोगों पर अन्याय किया है।   यह विवाद निर्माण करने का काम किया है। इसके बुरे परिणाम आपको यूपी के चुनाव में भुगतने भी पड़े हैं। साढ़े चार प्रतिशत ओबीसी के 27 परसेंट से कम करके अल्पसंख्यकों को देने का काम किया है, इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। आज बड़ी संख्या में देश का पिछड़ा वर्ग परेशान है, उसके अधिकार का हनन आपने किया है। यह सरकार हर स्तर पर असफल रही है, चाहे देश की बाहरी सुरक्षा का मामला हो या आंतरिक सुरक्षा का मामला हो, चाहे आतंकवाद का मामला हो। दुर्भाग्य से मुझे कहना पड़ रहा है कि देश की संसद पर हमले का दोषी अफजल गुरु को फांसी देने की हिम्मत सरकार ने नहीं की है।

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री अनंत गंगाराम गीते : जिस कसाब ने हमारे देश पर हमला किया, जो पाकिस्तान का सैनिक था। भारत सरकार ने यह स्वीकार किया है कि पाकिस्तान की सेना ने हमारे देश पर हमला किया है, जिसने सैकड़ों लोगों की हत्या की है, उस कसाब को भी आज तक फांसी नहीं दे पा रहे हैं। आज भी आतंकवादी हमले लगातार होते जा रहे हैं। यूपीए सरकार पूरी तरह असफल सरकार रही है।

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

          श्री संजय सिंह चौहान।

श्री अनंत गंगाराम गीते : महोदय, मैं अपनी बात समाप्त करने जा रहा हूं। गरीबी बढ़ती जा रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है। किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं और बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही है। पिछली 28 तारीख को देश के सभी मजदूरों ने बंद किया था।  

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाएं।

श्री अनंत गंगाराम गीते : महोदय, मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। मैं राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा, लेकिन सरकार अपनी असफलता को स्वीकार करे और भविष्य में सरकार को बने रहने का अधिकार नहीं है।

          इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

         

श्री संजय सिंह चौहान (बिजनौर): उपाध्यक्ष महोदय, राष्ट्रपति महोदया के अभिभाषण पर चर्चा हो रही है। यह बात सही है कि योजनाएं बहुत अच्छी हैं और महामहिम राष्ट्रपति के मुंह से सरकार ने योजनाएं कहलवाई हैं, लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन के बारे में क्या प्रबंध है, इस बारे में पूरे भाषण में कहीं भी यह सोच जाहिर नहीं होती है। केंद्र और राज्यों के संबंधों में निरंतर खटास बढ़ती जा रही है और मैं समझता हूं कि इम्प्लीमेंटेशन एजेंसी राज्य है और केंद्र सरकार जब तक राज्यों को विश्वास में नहीं लेगी और राज्य सरकार जब तक केंद्र का आदर करते हुए योजनाओं को लागू नहीं करेगी, तब तक चाहे जितनी भी अच्छी योजनाएं बना ली जाएं, योजनाएं पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाएंगे। हमारे देश में हर दस किलोमीटर के बाद भाषा बदलती है और हर बीस किलोमीटर के बाद पानी बदलता है, वहां हर क्षेत्र के लिए एक प्रकार की ही योजना बनाने से कामयाबी नहीं मिलेगी। चाहे मनरेगा हो, चाहे मिड डे मील हो, अगर सरकार ने कोई योजना बनाई है, तो उसकी पुनर्समीक्षा करने में सरकार को कभी भी अपमान महसूस नहीं करना चाहिए।  ये योजनाएं वास्तविकता के धरातल पर कुछ इंसानों पर पूरी तरह से फेल हो रही हैं। शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है। यहां शिक्षा में इतनी असमानता है कि एक तरफ तो पांचवीं क्लास का बच्चा अपना नाम तक लिखना नहीं जानता और दूसरी तरफ स्कूल में नर्सरी क्लास में एडमिशन के लिए आठ या दस लाख देकर पढ़ाई शुरु होती है। मैं समझता हूं कि सिर्फ योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा, चाहे पक्ष हो या विपक्ष हो जब तक आपस में बैठकर क्रियान्वयन के बारे में नीति तय नहीं करेंगे तब तक कोई योजना सफल नहीं हो सकती है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम हर साल बाढ़ से बचाव का तो प्रबंध करते हैं, बाढ़ आएगी तो उससे कैसे बचेंगे लेकिन आज तक इस तरह की कोई ठोस योजना नहीं बना पाए कि हम बाढ़ से प्रभावित ही न हों। कुछ योजनाएं तो सिर्फ कागजों पर दिखाई देती हैं। पूरे देश में साढ़े आठ लाख डॉक्टरों की कमी है। मैं विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश की बात करना चाहता हूं कि सब पीएचसीज़ में घास जमे हुए हैं, कहीं कोई कम्पाउंडर तक नहीं है और वहां जो झोलाछाप डाक्टर हैं वे आम जनता के जीवन से खिलवाड़ कर हे हैं। ऐसे हालात में सबसे पहली आवश्यकता है कि केंद्र और राज्यों के आपसी संबंध सुदृढ़ हों। ईगो आड़े आ रही है, उसे दूर करें। मैंने कई राज्यों में देखा है कि कोई योजना यहां से बनकर राज्य में गई तो उसका सारा स्वरूप ही बदल गया। जैसे आज सारे देश के सामने सबसे बड़ी समस्या बीपीएल सूची की है। महामहिम रा­ट्रपति जी के अभिभा­षण में बीपीएल सूची के बारे में कोई कमिटमेंट नजर नहीं आई। हम पिछले 12 साल से लगातार इंतजार कर रहे हैं, लोग तड़प रहे हैं कि बीपीएल सूची में उनका नाम शामिल हो। मेरा सरकार से निवेदन है, जब तक हम अपना आधारभूत ढांचा ठीक नहीं करेंगे, अपने दिमाग को स्वस्थ नहीं करेंगे, आगे नहीं बढेंगे क्योंकि किसी भी आदमी की सफलता का सूत्र होता है कि वह अपने आप से पूछ ले कि जो काम कर रहा है उससे आत्मसंतुष्टि है या नहीं। मैं संसद सदस्य होने के नाते कहना चाहता हूं कि मैंने जो सपने संसद सदस्य बनने से पहले देखे थे, उनको पूरा कर पा रहा हूं। सरकार और विपक्ष को सबको अपनी भूमिका समझनी होगी। हमें इस बात का पूरा प्रयास करना होगा कि हम जो नीति बनाएं उसका क्रियान्वयन ठीक से हो सके।

 

SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Mr. Deputy-Speaker, I stand to support the Motion of Thanks on President’s Address. While going to support the Motion, I must express my views with regard to the opinion expressed by the Government of the day.

          It is revealed that the Government has failed in almost all the aspects. This Government followed the line of economic liberalization. What is the outcome of this liberalization? It is known to everybody. But the point is that the Government is not recognizing all this. Who will deny that due to the liberalization the disparity within the population, disparity within the States, disparity with the society is revealed and is widening day by day? There is nothing to deny; whatever may be the figures that have been propounded by the Planning Commission. The ground reality is that the BPL number is increasing day by day.

          As per the report of the ILO, not less than 75 lakhs of the working people have been thrown out of their jobs. Nobody can deny that around three lakh farmers have committed suicides. Almost all the media have published that even West Bengal is not out of this list. So, this is the situation. It was the aspiration and imagination of some poets that India will occupy the best seat in the world and they had said in Bangla:   

 “Bharat amar jagat shabhay shreshtha ashon lawbe” In our country, we are having the largest number of poor people in the world. Somebody is claiming that India is going to be one of the Super Powers. India is a country which can now be attributed the status of a super poor country in the world! The largest number of unemployed youths is in India. In case of corruption, nobody can beat us. So, we are occupying these seats in the international arena now-a-days.
          Sir, due to paucity of time, I am not going to touch upon other points, but I shall touch the problems with regard to the agriculture and the agrarian situation. Bapuji had remarked that ‘India lives in the villages’. The first Prime Minister of our country, Pandit Jawaharlal Nehru, had made a remark that ‘everything else can wait, but not agriculture’. Agriculture should be given priority, but what is the situation? Investment in the field of agriculture is getting reduced since 1991, the day of introduction of neo economic liberalisation.
We are talking about the Minimum Support Price.  Under MSP, minimum means minimum and minimum does not mean the actual price for support of the farmer. Even the National Commission on Farmers, NCF, had suggested that Minimum Support Price should be based on total cost of production plus 50 per cent, but it is not being followed.
Almost from every corner of our country, almost all the kisan organisations, irrespective of their colour and whether they are political or non-political, have demanded that the MSP should be at least Rs. 1,500 per quintal, but it has been ignored by the Government. On the other hand, the Government is claiming that it has been increased. 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please wind up now.
SHRI PRABODH PANDA : Sir, I have just started. Please give me at least three minutes more.
          So far as the credit is concerned, it is told that the Government announced the interest rate of four per cent in case the timely repayment of loan is made. When the Government declared the waiver of loans, it was known to everyone that the farmers were not in a position to repay those loans. It was not a small amount. Nearly Rs. 70,000 crore was the credit which was waived by the Government. Knowing this, why did the Government confine the four per cent interest on loans only to those farmers who are making timely payments? Why was it not made applicable to all the farmers?
          I support the point raised by one hon. Member here that credit should be extended to the marginal and poor farmers without any interest, as is the case in Kerala where the paddy producers are providing loans without any interest.
          Coming to MNREGA, the Government has to revisit this Scheme. This Scheme provides employment to a household, but not to all the persons in the household who are willing to work. Therefore, the Government has to revisit this Scheme.
          On the issue of federalism, the genuine demands of the States should be considered in the prevailing scenario. I do agree with the Member from the Trinamool Congress who raised pertinent questions with regard to Centre-State relations. I want to compliment them for that. We have been raising this demand for decades together, but the Union Government has no time to look at it. Now that they are raising all these things, I think the Government should consider them and honour the federal polity of our country.
          What has happened to the issue relating to reservation for women? Every year, the issue of reservation for women was mentioned in the Speech of the Respected President. But what has happened this year? The President of our country is a woman; the Speaker of our country is a woman; the Leader of Opposition is a woman; and the UPA Chairperson, for whom I have great respect, is a woman. But what has happened to that issue this time? The Government has forgotten it this time.
          What about augmentation of irrigation? In fact, in the last five years, this sector failed as no real augmentation has happened with regard to irrigation. It has been neglected. Whatever may be the scheme or whatever may be the flagship programme, this sector has been neglected.
          The last point which has already been touched by several Members is that the Government should not claim to be a very honest and efficient Government.  That is the understanding of the people. Lakhs and lakhs of people are marching on the streets accusing this Government in terms of lack of transparency, efficiency and proper governance. In terms of governance, you have failed. Please do not repeat all these things.
          This year is going to be the first year of the Twelfth Five-Year Plan, but there is nothing new in the Speech, except reiteration of some things.
          I have nothing to object the motion. Particularly, in principle, I am not objecting to this.
          With these words, I conclude my speech.
   
श्री नामा नागेश्वर राव (खम्माम):महोदय, इस गवर्नमेंट की जो पोजीशन है, कल राष्ट्रपति जी की स्पीच सुनने के बाद ऐसा लगा कि यह सरकार पूरे साल गलती करती रही और उसे कवर करने के लिए प्रेसीडेंट के मुंह से बात कहलवा दी। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और कभी भी ऐसा नहीं होना चाहिए। कम से कम एक साल में जो भी गलती होती है, उसे करेक्ट करते हुए अगले साल में उसमें सुधार होना चाहिए। उसके लिए पॉलिसी चेंज होनी चाहिए। पूरा देश, हम लोग सोच रहे थे कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में ये मेजर पॉलिसी चेंज करेंगे, एक साल में जो भी प्रॉब्लम्स हुई हैं, फॉमर्स की प्रॉब्लम हुई है, लेबर की प्रॉब्लम हुई है, एससी, एसटी की जो प्रॉब्लम हुई है, इन सबको कवर करके एक पॉलिसी, एक डायरेक्शन देंगे यह सोचकर ऐस्पेक्ट किया, मगर जिस तरह से राष्ट्रपति के अभिभाषण में रखा गया है, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। पहले तो ब्लैक मनी के बारे में बात की गयी है, यह बताने की कोशिश की गयी है कि हम लोग बहुत ईमानदार हैं। भारत देश में स्वतंत्रता आने के बाद यूपीए-वन, यूपीए-टू में जिस तरीके से करप्शन हुआ है, पूरे देश को लूट रहे हैं। इतनी बड़ी लूट होने के बाद भी करप्शन को कम करने के लिए करेक्ट मेजर्स नहीं ले पाये हैं। इसके बारे में कम से कम यह गवर्नमेंट सोचे, जिस तरह से करप्शन हो रहा है, यहीं नहीं स्टेट्स में भी, कांग्रेस रूल्ड स्टेट्स में भी बहुत करप्शन हुआ है। आंध्र प्रदेश में आप देखें तो एक आदमी का पिता जी उस समय चीफ मिनिस्टर था, उस आदमी ने एक लाख करोड़ रूपये का करप्शन किया है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया आप लोग उन्हें बोलने दीजिये। आपको जब मौका मिलेगा तब बोलियेगा।
…( व्यवधान)
श्री नामा नागेश्वर राव :माइनिंग माफिया द्वारा करप्शन हुआ है। इन सब करप्शंस को इधर यूपीए-वन में, यूपीए-टू में...( व्यवधान) इसी तरीके से गवर्नमेंट्स, मेनली कांग्रेस गवर्नमेंट्स में काफी करप्शन हुआ है।...( व्यवधान)इन करप्शंस को कम करने के बारे में किसी भी तरह का एक्शन नहीं लिया गया है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग बैठिये। खड़े होकर मत बोलिये।
…( व्यवधान)
श्री नामा नागेश्वर राव :…*...( व्यवधान) आपको इधर से बात करने में शर्म आनी चाहिए।...( व्यवधान) देश में कभी भी इस तरह से करप्शन नहीं हुआ है।...( व्यवधान) आपकी यूपीए-वन, यूपीए-टू में जिस तरह से करप्शन हुआ है...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय :  माननीय सदस्य आप इधर देखकर बात कीजिये।
…( व्यवधान)
श्री नामा नागेश्वर राव :अब भी आप हंसकर बात कर रहे हैं। आपको …* आनी चाहिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय :  माननीय सदस्य आप आसन की तरफ देखिये।
…( व्यवधान)
श्री नामा नागेश्वर राव :आप लोगों को बात करने में … * आनी चाहिए।...( व्यवधान) कभी भी देश में इस तरह से करप्शन नहीं हुआ है।...( व्यवधान) आंध्र प्रदेश को पूरा लूट लिया है।...( व्यवधान) राष्ट्रपति के अभिभाषण में पेज नम्बर 8 पर क्लॉज नम्बर 34 में जिस तरह से फर्टिलाइजर्स के बारे में बात की गयी है...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय :  आप इधर देखकर बोलिये, आप उधर मत देखिये।
…( व्यवधान)
SHRI NAMA NAGESWARA RAO : The Ministry is working on a comprehensive fertilizer monitoring system which would present information of fertilizer availability to the farmers through SMS, internet and telephone. यह कितना गलत है, किसानों को एसएमएस के द्वारा बताया जायेगा कि फर्टिलाइजर की अवलेबिलिटी है। किसान इंटरनेट से फर्टिलाइजर की अवलेबिलिटी की मानीटरिंग कर रहा है, ऐसा  बोल रहे हैं।
          महोदय, हमारे आंध्र प्रदेश में जो किसान फर्टिलाइजर्स लेने के लिए गये हैं, उन पर लाठीचार्ज हुआ है। जो किसान फर्टिलाइजर खरीदने के लिए गये हैं, उन्हें जेल में डाल दिया गया है। हमारे निर्वाचन क्षेत्र खम्माम में फर्टिलाइजर लेने के लिए जो किसान गये थे, उनके ऊपर लाठीचार्ज हुआ है और फिर उन्हें जेल में डाल दिया गया। यह शर्मनाक है।...( व्यवधान) स्पीच में बोलते हैं, एसएमएस से बताया जायेगा कि फर्टिलाइजर अवलेबल है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : किसी की भी बात रिकॉर्ड में नहीं जायेगी, सिर्फ इनकी बात रिकॉर्ड में जायेगी।
(Interruptions) … * श्री नामा नागेश्वर राव : इंटरनेट से बताया जायेगा कि फर्टिलाइजर अवलेबल है।...( व्यवधान)यह बहुत गलत तरीका इसमें रखा गया है।...( व्यवधान) इसी तरीके से नरेगा के बारे में भी कहा गया है। सरकार ने कहा है कि अभी तक हमने इस पर 1 लाख 48 हजार करोड़ रूपये खर्च किये हैं। नरेगा में इतना करप्शन हो रहा है, आंध्र प्रदेश में बहुत करप्शन हो रहा है, इसके साथ-साथ पूरे भारत देश में नरेगा स्कीम में करप्शन हो रहा है।  हम पूछना चाहते हैं कि 1,48,000 करोड़ रुपये का आपने नरेगा में जो स्पैन्ड किया है, गरीब लोगों को उसमें से कितना मिला है? उसमें से 25 प्रतिशत भी गरीबों को नहीं मिल रहा है। 75 प्रतिशत लूट रहे हैं। यह करप्शन करने का अड्डा बन गया है। इस पर कंट्रोल करने के लिए भी कुछ नहीं कहा गया है।
          महोदय, राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में ई-गवर्नैन्स की बात की गई है। 15 साल पहले हमारे नेता चन्द्रबाबू नायडू जी ने आंध्र प्रदेश में ई-गवर्नैन्स की शुरूआत की थी। ये लोग तो 15 साल के बाद आज के दिन में ई-गवर्नैन्सके बारे में बोल रहे हैं। ये सब जिस तरह से बात कर रहे हैं, उस तरह से करप्शन को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं। इसमें माइन्स एंड मिनिरल के बारे में कहा  गया है, माइनिंग के लिए बिल के बारे में कहा  गया है। जिस तरह से पूरे देश के नैचुरल रिसोर्सेज़ को लूटा जा रहा है, आठ साल के अंदर आंध्र प्रदेश में आइरन ओर, सैन्ड और हर तरह की लूट की गई है। ये लोग न सिर्फ आंध्र प्रदेश में, बल्कि भारत देश में जितने भी नैचुरल रिसोर्सेज़ थे, सबको लूट रहे हैं। ये कहते हैं कि बिल इंट्रोडय़ूस किया है। बिल इंट्रोडय़ूस करके क्या करेंगे? इस लूट को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, इस लूट को बंद नहीं कर पा रहे हैं। आज जिस तरह से देश में नैचुरल रिसोर्सेज़ की लूट हो रही है, इसके लिए यह सरकार ज़िम्मेदार है। उसी तरह से एग्रीकल्चर के बारे में मैं कहना चाहता हूँ। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया अपनी बात समाप्त करें।
श्री नामा नागेश्वर राव :मैं दो मिनट में समाप्त करूँगा। उपाध्यक्ष महोदय, आज तक कभी भी किसानों के इस प्रकार से सूसाइड नहीं हुए। भारत देश में सबसे ज्यादा सूसाइड यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकारों के दौरान हुए हैं। आंध्र प्रदेश में पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसान कह रहे हैं कि वे खेती नहीं करेंगे। यह मामूली बात नहीं है। सरकार की नीतियों की वजह से ऐसा हो रहा है। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइए। जब आपको मौका मिलेगा, तब आप अपनी बात कहियेगा।
श्री नामा नागेश्वर राव : हमारे आंध्र प्रदेश में तीन लाख एकड़ ज़मीन में किसानों ने कहा है कि वे खेती नहीं करेंगे। किसान को एम.एस.पी. नहीं मिल रही है, उसको बहुत दिक्कत हो रही है। इसी कारण वे सूसाइड कर रहे हैं। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : नामा नागेश्वर राव जी के अलावा किसी की बात रिकार्ड पर नहीं जाएगी।
(Interruptions) … * श्री नामा नागेश्वर राव :ये लोग जिस तरह से बात कर रहे हैं, इनको किसान के लिए कुछ दुख होना चाहिए। आज किसानों के सूसाइड के लिए यह सरकार पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कृपया अपनी बात समाप्त करें।
श्री नामा नागेश्वर राव :इन्हीं बातों के साथ हम एनसीडीसी के बारे में कहना चाहते हैं। ...( व्यवधान) 2जी स्कैम से लेकर बड़े-बड़े और जो स्कैम भारत में हुए हैं, वह यूपीए-1 और यूपीए-2 के दौरान हुए हैं। अब इनको कम से कम रियलाइज़ होना चाहिए कि करप्शन को कैसे कंट्रोल करें। जो आम आदमी का पैसा लूटा जा रहा है, उसको कैसे कंट्रोल करें, यह भी सरकार को सोचना चाहिए। अभी तो थरूर साहब नहीं बैठे हैं। ये आईपीएल के थरूर हैं, इनको बीपीएल के बारे में क्या मालूम है? ...( व्यवधान) क्या ये कभी भी गाँव में गए हैं? आज गाँवों में पीने का पानी नहीं है, बिजली नहीं है। आंध्र प्रदेश की सरकार ने कहा था कि किसानों को नौ घंटे बिजली देंगे, लेकिन पाँच घंटा भी बिजली नहीं दे पा रहे हैं। जो फ्री बिजली की बात सरकार ने की है, उसमें करंट की प्राबलम है, इनफ्रास्ट्रक्चर की प्राबलम है। उसी तरह से पीने का पानी नहीं है। ये लोग गाँवों में जाने वाले नहीं हैं। ये लोग फॉरैन में रहते हैं। जिस तरह से थरूर साहब ने बात की है, बहुत दुख हुआ। ऊपर-ऊपर की बात ये कर रहे हैं। ...( व्यवधान)
          हम चाहते हैं कि सरकार रियलाइज़ करे कि लोगों की क्या दिक्कत है। करप्शन को कंट्रोल करके विलेज डैवलपमैंट और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा ज़ोर देना चाहिए। इन्हीं बातों के साथ आपने जो अमैंडमैंट दिया है, उसको भी हम अपोज़ करते हैं। पिछले तीन सालों में राष्ट्रपति के तीन अभिभाषण हुए। हम 15वीं लोक सभा में पहली बार सदस्य बनकर आए। हमने सोचा कि राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में जो भी बातें होती हैं, उनको सरकार ज़रूर इंप्लीमैंट करेगी, लेकिन यह सब (Interruptions) … * निकला।
उपाध्यक्ष महोदय : यह शब्द असंसदीय है। इसे एक्सपंज कर दिया जाए।   कम से कम देश के लोगों के साथ ऐसा न करें। इसको करैक्ट करते हुए, प्रेज़ीडेन्ट के स्पीच में जो बोला गया है, उन बातों को हम लोग एपोज़ करते हैं।
SHRI KODIKKUNNIL SURESH (MAVELIKKARA): Mr. Deputy-Speaker, I am thankful to you for giving me this opportunity to speak on the Motion of Thanks on the President’s Address.      I wholeheartedly support the Motion.
          Today, India is standing on the pedestal of economic growth. With the untiring efforts of respected Prime Minister Dr. Manmohan Singh and UPA Chairperson Shrimati Sonia Gandhi, India has traveled a long way and has reached a stage where no country - developed, developing or under-developed - can ignore the significance of India. India has become one of the strongest economies in the world.
          I clearly remember the words of Mr. Barack Obama, President of the United States of America when he said in this very Parliament House that India was not emerging but had already emerged as an economic power. Given our country’s high savings rate, a dynamic entrepreneurial class, increasing young population, and highly open trade and foreign investment regime, I have no doubt that India will march forward on the path of economic growth in the coming years.
          I agree with the hon. President when she said that the long-term fundamentals of our economy are robust. Because of these fundamentals our economy did not suffer adversely during the period of economic downturn which was witnessed in other major economic powers of the world. According to Prof. Roubini of the New York University, India is placed better amongst Brazil, China and Russia. This is because our fundamentals are strong.
          The UPA Government has faced many challenges and has faced them with a resounding success. It is the UPA Government which brought the Lok Pal and the Lokayukta Bills to curb corruption, to bring transparency and accountability in the governance. Many more Bills have been introduced which are forward-looking in this direction, passing of which will bring the much needed relief to the common man who is at the core of our hearts.
          Mr. Deputy-Speaker, Sir, the UPA Government has taken tough measures against corrupt bureaucrats and has not spared the high and mighty of this land. This was unthinkable before. A number of initiatives have been taken to tackle the menace of black money. We have opened channels of communication with other countries to share information on black money. Our Government is actively negotiating with different countries to sign Double Taxation Avoidance Agreements and revisiting the Double Taxation Avoidance Agreements signed earlier with some countries. All these efforts will start showing fruitful results in the near future.
           The UPA Government, led by our esteemed Prime Minister Dr. Manmohan Singhji, has been successful in containing the communal forces and has given the much-needed political stability at the Centre. All these factors are essential for a country to move forward on the path of progress and prosperity. There is not a single incident where the country has witnessed communal violence.
          It is a matter of pride that the country is going to witness a record production of food grains this year. It is estimated that food grains production will be around 250 million tonnes and exceed the projected targets. I congratulate the Government and our farmers for producing record food grains.
          Mr. Deputy-Speaker, Sir, the Opposition has targeted the UPA Government for rising prices. I do not remember exactly how many times this House and the other House had to be adjourned on this issue.    I do not know how many times the Parliament had discussed this issue under various rules. The food inflation is now in the negative zone. So, the Member from the Opposition may not have any opportunity to disrupt the proceedings of the House on this issue.
          Education is one area where the Government has shown deep concern for all the communities. I am proud to say that under the able leadership of Dr. Manmohan Singh, we have achieved many milestones. The Government is deeply concerned about the welfare of minorities in the country. Recently, the hon. Minister had set up five sub-committees on minority education issues. He has been keenly monitoring the issues of minority education. This Government does not believe in slogans, but in actions.
          Justice Ranganath Mishra Commission Report has been pending for implementation since 2007. This Commission went into the question of various issues relating to linguistic and religious minorities in the country and made several forward looking recommendations like reserving 15 per cent of jobs in Government service and seats in educational institutions, giving 8.4 per cent reservation out of the existing OBC quota of 27 per cent. These recommendations should be implemented at the earliest.
          I would like to bring one of the major concerns to the notice of the Government. This is regarding increasing incidents of collision of fishing boats off the Kerala coast. Recently a fishing boat was hit by a ship in which some fishermen lost their lives. I strongly demand that the next of kin of these fishermen may be paid adequate compensation, and a high level inquiry must be constituted to go into this incident.
          Kuttanad is one of the most fertile regions of the world, spread over three districts of Alapuzha, Kottayam and PathanamthitTa. It is also called the rice bowl of Kerala. In the year 2008, the Central Government gave in principle approval for providing financial assistance to the tune of Rs.1840 crore for implementing various programmes for the development of Kuttanad wetland ecosystem. But the implementation of this project is very slow and needs to be put on fast track.
          Thousands of posts reversed for Scheduled Castes and Scheduled Tribes remain vacant for very long, though the Government has made it clear that these vacancies should be filled in time. Recently, the Government of India had decided to fill up 50,000 vacancies of Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the Central Government. I humbly request the Government to take immediate steps to fill up those vacancies in the Government of India as well as in the public sector undertakings.
          It is estimated that 90 per cent of landless people belong to Scheduled Castes and Scheduled Tribes. In the absence of their own land, these poor people have to work as labourers. The Government should bring in a law to provide land to these landless Scheduled Castes and Scheduled Tribes. A large number of Scheduled Castes and Scheduled Tribes, both in urban and rural areas are without houses. The financial assistance provided for new construction in the form of full grant is Rs.45,000 per unit in plain areas and Rs.48,500 for hilly and difficult areas. This amount is very meager and needs to be enhanced to Rs.3 lakh per unit. I would request the Government of India to bring a scheme to compensate them in order to address the housing problem being faced by the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. They belong to the poor sections and the cost of medical treatment has risen very sharply over the years. Because of lack of adequate medical facilities, the Scheduled Castes and Scheduled Tribes do not get proper medical treatment. I would request the Government to look into this and take suitable steps in this direction.
          The nurses working in private hospitals are being paid very meager salary. You will appreciate that nurses are doing a great job and most of them come from Kerala. The Government should bring in a law in order to ensure adequate pay and allowances, including the facilities of EPF and ESIC. 
Thousands of teachers are working in CBSE and ICSE affiliated schools. These schools charge astronomical fees from students but do not pay their teachers proper salary.  There is a need to look into this and a law should be enacted in this regard.
A large number of cases of compassionate appointment are pending with different departments and public sector undertakings.  The dependents of employees who die in harness do not get employment in the concerned departments on one pretext or the other.  The system should be corrected and departments and public sector undertakings should be directed to give employment to all eligible dependents at the earliest.
Recently, the Supreme Court has cleared interlinking of rivers in Kerala. The interlinking of Pampa-Achencovil in Kerala with Vaipar river will adversely affect the interest of Kerala. The issue has already generated a lot of heat in political circle.  I have also written a letter to the hon. Prime Minister requesting him to drop this project.  I earnestly request the Government to reconsider this Pampa-Achencovil-Vaipar interlinking project.
There is a long pending proposal before the Government of India to set up a Cashew Board.  Lakhs and lakhs of cashew workers who work in the cashew sector live below poverty line. They do not get proper attention from the Government of India.  I would request the Government of India to set up a Cashew Board for the welfare of poor cashew workers.
I would like to bring to your notice another important issue with regard to setting up of a Rubber Park in Kerala.  A Rubber Park is located in Ernakulam, Irapuram Rubber Park, near Perumbavoor.  The same rubber park has to be set up near Pathanapuram in Kollam district.
Sasthamkotta Lake is the largest fresh water lake in Kerala.  It is designated as a Ramsagar Site in November 2002.  Sir, the Sasthamkotta Lake which has been listed by the Government of India as a wetland of national importance has started shrinking at an alarming rate.  If initiatives are not taken, the State will lose this lake. I would request the Government of India, Ministry of Forest and Environment to take measures to extend financial assistance to Kerala to protect this Lake.
Sir, our State Government has started a unique scheme for extending education loan to students who are poor and wish to pursue higher education. This scheme has proved very successful and more and more students belonging to poor families have benefited. But there are instances where students, who got education loans, after completion of their higher studies could not get jobs.  Under such circumstances they have not been able to pay back education loan with interest. The banks have started legal action against such students for defaulting on payment of education loan.  I would like the Government to consider the peculiar situation in which these students and their families find themselves and waive interest on education loans.  The Government should reduce the interest on education loan and stop legal action against them.
With these words, Sir, I once again support the Motion moved by Shrimati Girija Vyas.
                                                                               
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन (भागलपुर):उपाध्यक्ष महोदय, हमारी तरफ से माननीय राजनाथ सिंह जी ने बहुत हैवी डोज़ इनको दी है, लेकिन यूपीए का मर्ज ही ऐसा है कि कितना भी डोज़ दे दें, इन पर कोई असर नहीं होता। इनका जो मर्ज है, वह लाइलाज हो चुका है। इनको डॉक्टर,, वैद्य एवं होम्योपैथ से दिखाया, लेकिन बीमारी लाइलाज है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि राष्ट्रपति जी का जब अभिभाषण होता है, देश में बहुत कम लोगों को मालूम है कि इन्हीं का लिखा हुआ, केबिनेट का एप्रुव किया हुआ अभिभाषण पढ़ा जाता है।
लेकिन राष्ट्रपति जी की जबान से अपने लिए ईमानदारी का सर्टीफिकेट इन्होंने लिया।  मेरी सरकार ईमानदार और अधिक कारागार ...( व्यवधान) कारगर है, हमें वह कारागार लगा। ...( व्यवधान) उपाध्यक्ष जी, ज्यादातर करागर नहीं है, ज्यादा कारा नजर आता है।  
उपाध्यक्ष महोदय : कल आप जारी रखेंगे, अब जीरो ऑवर लेते हैं।
...( व्यवधान)
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : उपाध्यक्ष जी, यहां पर संसद के भी कुछ सदस्य हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बाहर से भी घूमकर यहां आते हैं, इनकी तरफ बहुत से लोग बैठे हैं, इनको जब देखते हैं, तो ईमानदारी के सिंबल गावित साहब दिखते हैं।  उनके ऊपर जब आरोप लगे थे, तो विपक्ष ने भी कहा था गावित साहब की ईमानदारी पर हम लोगों को कोई शक नहीं है, लेकिन ऐसे लोग भी बैठे हैं, जो खुद सर्टीफिकेट लेने के बाद भी उनकी ईमानदारी पर शक है।  ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कल आप ही इसको जारी रखेंगे।
श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन  : उपाध्यक्ष जी, बात इतनी महत्वपूर्ण है कि इसको कल अगर मैं आपके आदेश पर कांटीन्यू करूंगा तो इनको भी बहुत मजा आएगा,   उपाध्यक्ष महोदय : अब जीरो ऑवर लेते हैं।