State Consumer Disputes Redressal Commission
Jai Narain vs M/S Future General India Life Insurance ... on 12 January, 2018
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 Complaint Case No. CC/137/2016 1. Jai Narain Maharajganj ...........Complainant(s) Versus 1. M/S Future General India Life Insurance Co. Ltd and Oth. Gorakhpur ............Opp.Party(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN PRESIDENT For the Complainant: For the Opp. Party: Dated : 12 Jan 2018 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ परिवाद सं0- 137/2016 (सुरक्षित) जय नरायन पुत्र श्री राम बुझारत, निवासी- पिपरदियूरा, गांधीनगर, वार्ड नं0- 6, (पुराना वार्ड नं0- 14) नगर पालिका परिषद, नगर व जिला महाराजगंज- 273303, उत्तर प्रदेश।
............परिवादीगण बनाम मैसर्स फ्यूचर जेनेराली इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी लि0, प्रथम तल, अवध काम्पलेक्स, पठार कोठी, बेतिया हाता, 33- कसयां रोड, नगर व जिला गोरखपुर- 273001, उ0प्र0 द्वारा शाखा प्रबंधक। मैसर्स फ्यूचर जेनेराली इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी लि0, कारपोरेट एण्ड रजिस्टर्ड आफिस, 001, डेल्टा प्लाजा, ग्राउण्ड फ्लोर 414, वीर सावरकर मार्ग, प्रभादेवी, मुम्बई- 400025, महाराष्ट्र।
............. विपक्षीगण समक्ष:-
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष।
परिवादी की ओर से उपस्थित : श्री आर0के0 गुप्ता, विद्वान अधिवक्ता। विपक्षीगण की ओर से उपस्थित : श्री प्रतीक सक्सेना। दिनांक:- 26.02.2018 माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान , अध्यक्ष द्वारा उद्घोषित निर्णय
परिवादी जय नरायन ने यह परिवाद विपक्षीगण मैसर्स फ्यूचर जेनेराली इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी लि0, प्रथम तल, अवध काम्पलेक्स, गोरखपुर व मैसर्स फ्यूचर जेनेराली इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी लि0, वीर सावरकर मार्ग, प्रभादेवी, मुम्बई के विरुद्ध धारा- 17 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया है और निम्न अनुतोष चाहा है:-
यह कि विपक्षीगण परिवादी को बीमित धनराशि रूपये 40,00,000/- (चालीस लाख रूपये केवल) तथा दुर्घटना हित लाभ मय 18 प्रतिशत ब्याज दुर्घटना की तिथि दिनांक 21.03.2014 के लगभग दो माह बाद अर्थात 01.06.2014 से भुगतान की तिथि तक अदा करे।
(ब) यह कि विपक्षीगण, परिवादी को मानसिक व शारीरिक कष्ट की क्षतिपूर्ति हेतु रूपये 50,000/- अदा करें।
(स) यह कि विपक्षीगण परिवादी को विधिक व्यय के रूप में 30,000/-
रू0 (तीस हजार रूपये) अदा करें।
(द) यह कि अन्य कोई अनुतोष जो माननीय आयोग की राय में उचित हो तथा परिवादी के हित में हो वह भी विपक्षीगण से दिलाया जाये।
परिवाद पत्र के अनुसार परिवादी का कथन है कि बीमित व्यक्ति ओम नरायन ने विपक्षीगण की फ्यूचर जेनेराली एश्योर (बेसिक पॉलिसी) योजना के अंतर्गत बीमित पॉलिसी सं0- 01170139 रू0 40,00,000/- बीमित धनराशि के लिए प्रस्ताव पत्र दि0 04.12.2013 द्वारा ली थी जिसकी अवधि दि0 30.12.2013 से 30.12.2043 थी। बीमा प्रस्ताव के अनुसार ओम नरायन की जन्मतिथि दि0 01.01.1985 थी और रेगुलर प्रीमियम 67,501/-रू0 अदा किया था जिसमें प्रीमियम धनराशि 65,478/-रू0 सर्विस टैक्स 1964/-रू0 + उच्च शिक्षा कर 59/-रू0 था। यह प्रीमियम धनराशि छमाही थी। पॉलिसी दि0 31.12.2013 को जारी हुई थी और पॉलिसी में उपरोक्त बीमित व्यक्ति का नामिनी परिवादी था।
परिवाद पत्र के अनुसार उपरोक्त बीमा पॉलिसी का दूसरा प्रीमियम दि0 30.06.2014 को ड्यू था, परन्तु उसके पहले ही दि0 31.03.2014 को जब उपरोक्त बीमित व्यक्ति ओम नरायन ट्रैक्टर नं0- यू0पी0 53/जी-4868 जिसे संतराज यादव चला रहा था और ट्रैक्टर नौतनवा से बालू लेकर वापस आ रहा था पर बैठकर आ रहा था तब रात लगभग 10:30 बजे ओम नरायन ट्रैक्टर से गिर गया और ट्रैक्टर का पहिया उसके ऊपर चढ़ गया जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई।
परिवाद पत्र के अनुसार उपरोक्त दुर्घटना की रिपोर्ट थाना नौतनवा जनपद महाराजगंज में दर्ज करायी गई है, जिस पर अपराध सं0- 265/14 अंतर्गत धारा- 279/304 भा0दं0सं0 ड्राइवर संतराज के विरुद्ध कायम किया गया है और उपरोक्त बीमित व्यक्ति के शव का पंचनामा तैयार कर पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम कराया गया है तथा वाद विवेचना उपरोक्त ट्रैक्टर चालक के विरुद्ध पुलिस ने आरोप पत्र न्यायालय प्रेषित किया है।
परिवाद पत्र के अनुसार परिवादी ने विपक्षीगण के यहां 40,00,000/-रू0 के भुगतान हेतु क्लेम प्रस्तुत किया, परन्तु उन्होंने लगभग 2 वर्ष तक क्लेम लम्बित रखा और दि0 29.03.2016 को क्लेम इस आधार पर खण्डित कर दिया कि बीमित व्यक्ति द्वारा अन्य बीमा कम्पनी से ली गई पॉलिसी के बारे में नहीं बताया गया है।
परिवाद पत्र के अनुसार परिवादी का कथन है कि विपक्षीगण ने परिवादी का दावा गलत आधार पर निरस्त किया है जो सेवा में कमी है और विपक्षीगण द्वारा दावा निरस्त किये जाने से उसे मानसिक और शारीरिक कष्ट उठाना पड़ा है।
विपक्षी/बीमा कम्पनी की ओर से लिखित कथन प्रस्तुत किया गया है जिसमें कहा गया है कि परिवादी स्वच्छ हाथों से आयोग के समक्ष नहीं आया है। लिखित कथन में विपक्षीगण की ओर से कहा गया है कि परिवादी के द्वारा सही और वास्तविक तथ्यों को छिपाया गया है। बीमाधारक ने प्रपोजल फार्म में पूछे गये प्रश्नों का सही उत्तर नहीं दिया है और महत्वपूर्ण जानकारी प्रपोजल फार्म में छिपाया है। लिखित कथन में विपक्षीगण की ओर से कहा गया है कि परिवादी का क्लेम सही और उचित आधार पर खारिज किया गया है। लिखित कथन में विपक्षीगण की ओर से कहा गया है कि बीमाधारक ने प्रपोजल फार्म के क्लाज 6.1 व 6.2 में पूर्व में अन्य कोई पॉलिसी नहीं लिया जाना प्रकट किया था और क्लाज 6.1 व 6.2 में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर सही ढंग से नहीं दिया था। अत: मैटेरियल फैक्ट छिपाने के आधार पर परिवादी का दावा उचित आधार पर अस्वीकार किया गया है।
परिवादी की ओर से परिवाद पत्र के कथन के समर्थन में शपथ पत्र प्रस्तुत किये गये हैं।
विपक्षी बीमा कम्पनी की ओर से Madan gopal jalan, Executive Vice President- Legal & Compliance and company secretary के शपथ पत्र प्रस्तुत किये गये हैं।
उभयपक्ष की ओर से लिखित तर्क भी प्रस्तुत किया गया है।
मैंने उभयपक्ष के विद्वान अधिवक्ता के तर्क को सुना है और पत्रावली का अवलोकन किया है।
विपक्षीगण ने परिवादी का बीमा क्लेम पत्र दि0 29.03.2016 के द्वारा इस आधार पर अस्वीकार किया है कि बीमाधारक ने प्रस्ताव पत्र के प्रश्न 6.1 में अपनी पूर्व बीमा पॉलिसियों का विवरण नहीं दिया है और उन्हें छिपाया है। विपक्षी/बीमा कम्पनी के अनुसार बीमाधारक व्यक्ति ओम नरायन ने विपक्षी/बीमा कम्पनी की प्रश्नगत पॉलिसी के पहले एच0डी0एफ0सी0 इंश्योरेंस कम्पनी, मैक्स लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी व बजाज अलियांज इंश्योरेंस कम्पनी की चार और बीमा पॉलिसी ली थी जिसका विवरण विपक्षी/बीमा कम्पनी की ओर से प्रस्तुत लिखित तर्क की धारा 9 में अंकित किया गया है जो निम्न है:-
Company name HDFC Max Life Bajaj Bajaj 0301143200 Policy no.
15461908 891284275 0289104762 Proposal date 30/11/2013 12/12/2012 23/05/2013 RCD 24/09/2012 11/12/2013 27/12/2012 28/05/2013 SA 2517802+250000(ADB rider inbuilt) Total 50,00,000 30,00,000 4,50,000/-
37,00,000/-
Premium/Mode of Payment Rs. 20,000;Demand Draft Semi-Annual 10419/- (half yrly) 35124/-(half yrly) Occupation Self employed Businessman Business Business Income Rs. 600000 500000 200000/-
200000/-
decision Repudiated Under process Pending Pending Repudiation reason Declined for submission of take UW document-Driving License NA NA NA परिवादी के विद्वान अधिवक्ता का कथन है कि परिवादी ने अपनी पूर्व पॉलिसियों को बीमा कम्पनी से छिपाया नहीं है। उसने बीमा प्रस्ताव के प्रस्तर 6.1 में NA अंकित किया है जिसका अर्थ है नाट एप्लीकेबुल, अर्थात यह क्लाज बीमाधारक पर लागू नहीं होता है। परिवादी जय नरायन की ओर से प्रस्तुत अतिरिक्त शपथ पत्र में यह कथन किया गया है कि बीमित व्यक्ति ओम नरायन ने अपने जीवन काल में दि0 16.01.2016 को विपक्षी बीमा कम्पनी को एक पत्र इस आशय का दिया था कि बीमा कम्पनी ने प्रस्ताव पत्र में अपनी अन्य पॉलिसियों के बारे में पूछा था अन्य बीमा कम्पनी की पॉलिसी के बारे में नहीं पूछा था, फिर भी वह स्वयं बताना चाहता है कि उसने अन्य बीमा कम्पनी से भी चार पॉलिसी ले रखी थी जो एच0डी0एफ0सी इंश्योरेंस कं0लि0, बजाल एलियांज इंश्योरेंस कं0लि0 और मैक्स इंश्योरेंस कं0लि0 की हैं। परिवादी ने अपने अतिरिक्त शपथ पत्र के साथ बीमित व्यक्ति ओम नरायन द्वारा प्रेषित पत्र दि0 16.01.2016 की प्रति भी संलग्नक एक के रूप में लगाया है। परिवादी ने अपने इस अतिरिक्त शपथ पत्र की धारा 4 में कथन किया है कि दि0 11.02.2014 व 04.03.2014 को विपक्षी/बीमा कम्पनी ने बीमित व्यक्ति ओम नरायन को पत्र भेजकर सूचित किया कि उसे उसकी पूर्व पॉलिसियों से कोई आपत्ति नहीं है। वह अपना अगला प्रीमियम दि0 30.06.2014 तक जमा करे। भविष्य में और उससे कोई कागज की मांग नहीं की जायेगी। उपरोक्त पत्रों की प्रतियां भी संलग्नक के रूप में परिवादी ने अपने अतिरिक्त शपथ पत्र में लगायी है। अत: यह तथ्य निर्विवाद है कि विपक्षी/बीमा कम्पनी की प्रश्नगत पॉलिसी के अतिरिक्त चार और बीमा पॉलिसी बीमित व्यक्ति ने अपने जीवन पर ली थी। विपक्षी की प्रश्नगत बीमा पालिसी को उपरोक्त चार बीमा पॉलिसियों में सम्मिलित किये जाने पर कुल बीमित धनराशि 1,61,50,000/-रू0 होती है।
उल्लेखनीय है कि बीमा प्रस्ताव पत्र की धारा 6.1 के द्वारा वांछित सूचना निम्न है:-
Details of applications submitted to &of existing life insurance policies with future Generali India Life Insurance Co. Ltd. and with other insurers.
इस प्रश्न के उत्तर में NA अक्षर प्रस्ताव पत्र में अंकित है। अत: यह स्पष्ट है कि परिवादी ने विपक्षी की वर्तमान पॉलिसी लेने के पूर्व जो पहले पॉलिसी लिया है उसे प्रस्ताव पत्र में छिपाया है और उनका विवरण नहीं दिया है। बीमा प्रस्ताव पत्र की धारा 6.1 में वांछित इस सूचना का उत्तर NA देने के आधार पर परिवादी अपने दायित्व से नहीं बच सकता है और यह नहीं कह सकता है कि उसने पूर्व की पॉलिसियों को छिपाया नहीं है, केवल उक्त कालम 6.1 को नाट अप्लीकेबुल लिखा है। प्रस्ताव पत्र की धारा 6.1 के द्वारा वांछित सूचना के उत्तर से यह स्पष्ट है कि बीमित व्यक्ति ने अपने जीवन हेतु ली गई पूर्व पॉलिसियों को छिपाया है और उसकी जानकारी प्रस्ताव भरते समय विपक्षी/बीमा कम्पनी को नहीं दिया है।
विपक्षी/बीमा कम्पनी की ओर से मदन गोपाल जालान पूर्व वाइस प्रेसीडेंट लीगल एण्ड कम्पनी सेक्रेटरी फ्यूचर जनरली इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड का शपथ-पत्र प्रस्तुत कर परिवादी के अतिरिक्त शपथ-पत्र के उपरोक्त कथन का खण्डन किया गया है और कहा गया है कि बीमाधारक का कथित पत्र दि0 16.01.2014 बीमा कम्पनी को प्राप्त नहीं हुआ है। अत: उसके उत्तर में बीमा कम्पनी द्वारा पत्र भेजे जाने का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता है। परिवादी द्वारा कथित बीमा कम्पनी के पत्र दि0 11.02.2014 एवं 04.03.2014 बीमा कम्पनी ने नहीं भेजा है यह पत्र कूटरचित है।
विपक्षी की ओर से प्रस्तुत उपरोक्त शपथ पत्र के आधार पर इस संदर्भ में विस्तृत जांच की आवश्यकता है कि क्या बीमित व्यक्ति ने पत्र दि0 16.01.2014 बीमा कम्पनी को भेजा है और बीमा कम्पनी ने पत्र दि0 11.02.2014 व 04.03.2014 बीमित व्यक्ति को भेजा है? परन्तु उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि बीमा प्रस्ताव फार्म में बीमित व्यक्ति के अपने जीवन पर ली गई अन्य पॉलिसियों को छुपाया है। जब कि बीमित व्यक्ति की पूर्व पॉलिसियों से स्पष्ट है कि अल्प अवधि में ही बीमित व्यक्ति द्वारा चार पॉलिसी ली गई है और उसके बाद पांचवीं वर्तमान पॉलिसी का प्रस्ताव फार्म भरा गया है। सभी पॉलिसियों की बीमित धनराशि 1,61,50,000/-रू0 होती है। अत: वर्तमान पॉलिसी के लिए बीमित व्यक्ति द्वारा ली गई पूर्व पॉलिसियों की सूचना बहुत महत्वपूर्ण थीं, परन्तु बीमित व्यक्ति द्वारा प्रस्ताव-पत्र के संगत प्रस्तर में पूर्व पॉलिसियों की सूचना नहीं दी गई है और उन्हें छुपाया गया है।
मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने Life Insurance corporation of India and ors. Vs. Asha Goel (Smt.) & anr (2001)2 SCC 160 के निर्णय में स्पष्ट रूप से निम्न मत व्यक्त किया है:-
''The contracts of insurance including the contract of life assurance are contracts uberrima fides and every fact of material (sic material fact) must be disclosed, otherwise, there is good ground for rescission of the contract. The duty to disclose material facts continues right up to the conclusion of the contract and also implies any material alteration in the character of the risk which may take place between the proposal and its acceptance. If there are any misstatements or suppression of material facts, the policy can be called into question. For determination of the question whether there has been suppression of any material facts it may be necessary to also examine whether the suppression relates to a fact which is in the exclusive knowledge of the person intending to take the policy and it could not be ascertained by reasonable enquiry by a prudent person.'' उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि बीमित व्यक्ति ओम नरायन ने विपक्षी की प्रश्नगत पॉलिसी के पूर्व चार पॉलिसी अपने जीवन पर ली थी, जिनकी कुल बीमित धनराशि 1,21,50,000/-रू0 थी। उसके बाद उसने पुन: वर्तमान पॉलिसी 40,00,000/-रू0 की बीमित धनराशि के लिए अपने जीवन हेतु लिया है। पूर्व की पॉलिसियों की बीमित धनराशि और वर्तमान पॉलिसी की प्रस्तावित बीमित धनराशि वर्तमान बीमा पॉलिसी को स्वीकार करते हुए बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है, परन्तु उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि बीमित व्यक्ति ने पूर्व पॉलिसियों को प्रस्ताव फार्म में छिपाया है और उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि बीमित व्यक्ति द्वारा दि0 16.01.2016 को विपक्षी/बीमा कम्पनी को अपनी पूर्व पॉलिसियों की सूचना देते हुए पत्र लिखा जाना और बीमा कम्पनी द्वारा दि0 11.02.2014 और दि0 04.03.2014 को बीमित व्यक्ति को उसकी वर्तमान पॉलिसी जारी रखने हेतु पत्र लिखा जाना विवादित है और इस संदर्भ में विस्तृत साक्ष्य और विवेचना की आवश्यकता है जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत वर्तमान परिवाद में सम्भव नहीं है। उपरोक्त सम्पूर्ण तथ्यों पर विचार करते हुए मैं इस मत का हूँ कि मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त नजीर में प्रतिपादित सिद्धांत के आधार पर विपक्षी/बीमा कम्पनी द्वारा परिवादी का दावा निरस्त किये जाने हेतु उचित आधार है। अत: विपक्षी/बीमा कम्पनी द्वारा परिवादी का दावा अस्वीकार किया जाना सेवा में कमी या अनुचित व्यापार पद्धति नहीं कहा जा सकता है।
परिवादी के विद्वान अधिवक्ता ने मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा Sahara India Life Insurance Company Ltd. and another Vs. Rayani Ramayanjneyulu III (2014) CPJ 582 के वाद में दिया गया निर्णय संदर्भित किया है जिसमें मा0 राष्ट्रीय आयोग ने यह माना है कि पहले की पॉलिसी को बीमा प्रस्ताव में न बताया जाना मैटेरियल फैक्ट नहीं है और इस आधार पर बीमा दावा अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। परिवादी की ओर से मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा रिवीजन पिटीशन नं0- 4204/2011 Aviva Life Insurance Co. Ltd. & Ors. Vs. Rekhaben Ramjibhai Parmar में दिया गया निर्णय दि0 12 अप्रैल 2017 भी संदर्भित किया गया है। इस निर्णय में भी मा0 राष्ट्रीय आयोग ने पूर्व की बीमा पॉलिसियों को बीमा प्रस्ताव में घोषित न किये जाने के आधार पर बीमा क्लेम निरस्त किया जाना उचित नहीं माना है।
मैंने परिवादी के विद्वान अधिवक्ता की ओर से प्रस्तुत उपरोक्त न्याय निर्णयों पर आदर पूर्वक विचार किया है।
बीमित व्यक्ति ओम प्रकाश ने प्रश्नगत पॉलिसी दि0 30.12.2013 को प्राप्त की है और दि0 31.03.2014 को रात्रि 10:00 बजे ट्रैक्टर से हुई कथित दुर्घटना में उसकी मृत्यु होना बताया गया है। इसके साथ ही उल्लेखनीय है कि वर्तमान पॉलिसी की बीमित धनराशि 40,00,000/-रू0 है और इस पॉलिसी के पूर्व अल्प अवधि में ही बीमित व्यक्ति ने चार अन्य बीमा पॉलिसी ली थी जिसकी बीमित धनराशि 1,21,50,000/-रू0 थी, परन्तु बीमित व्यक्ति ने अपनी पूर्व पॉलिसी को वर्तमान पॉलिसी के प्रस्ताव फार्म में छिपाया है और वांछित सूचना नहीं दिया है। अत: वर्तमान वाद के तथ्यों व पांचों बीमा पॉलिसी की बीमित धनराशि को दृष्टिगत रखते हुए सामान्य मानव व्यवहार के आधार पर प्रश्नगत बीमा पॉलिसी सामान्य बीमा पॉलिसी नहीं दिखती है। इतनी अल्प अवधि में एक साथ इतनी बीमा पॉलिसी लिया जाना और बीमित व्यक्ति के जीवन का मूल्य 1,61,50,000/-रू0 किया जाना बीमा पॉलिसी के उद्देश्य को संदेहास्पद बना देता है जिसकी विस्तृत विवेचना सक्षम अधिकारी द्वारा किया जाना आवश्यक है। बीमित व्यक्ति द्वारा पूर्व पॉलिसियों को छुपाकर पॉलिसी लिया जाना और उसकी पॉलिसियों की बीमित धनराशि इतनी अधिक होना तथा पॉलिसी लेने के तीन मास के अन्दर कथित दुर्घटना होना ऐसे तथ्य हैं जो वर्तमान विवाद को साधारण उपभोक्ता विवाद से भिन्न दर्शाते हैं। अत: वर्तमान प्रकरण में मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा उपरोक्त निर्णयों में प्रतिपादित सिद्धांत का लाभ परिवादी को नहीं दिया जा सकता है।
उपरोक्त विवेचना के आधार पर मैं इस मत का हूँ कि विपक्षी/बीमा कम्पनी ने परिवादी का बीमा दावा जो अस्वीकार किया है उसमें वर्तमान परिवाद में आयोग द्वारा कोई हस्तक्षेप किया जाना उचित नहीं है। परिवादी विधि के अनुसार अन्य सक्षम अधिकारी या न्यायालय के समक्ष कार्यवाही कर सकता है।
उपरोक्त निष्कर्ष के आधार पर परिवाद परिवादी को इस छूट के साथ निरस्त किया जाता है कि वह विधि के अनुसार सक्षम अधिकारी अथवा न्यायालय के समक्ष कार्यवाही करने हेतु स्वतंत्र है।
उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान) अध्यक्ष शेर सिंह आशु0, कोर्ट नं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN] PRESIDENT