Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Demands For Grants No. 1To 3 Under The Control Of ... on 25 April, 2005

Title: Further discussion on the Demands for Grants No. 1to 3 under the Control of Ministry of Agriculture. (Demands were voted in full and discussion concluded).

14.09 hrs. GENERAL BUDGET – 2005-06 - DEMANDS FOR GRANTS Ministry of Agriculture – Contd.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Anil Basu --- Not present श्री रामजीलाल सुमन (फ़िरोज़ाबाद) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभार प्रकट करता हूं कि आपने मुझे कृषि मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर बोलने का समय दिया है । महोदय, कहा जाता है कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है और हमारे देश की लगभग ७० प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर करती है । लेकिन मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि हमारे देश में कृषि की निरंतर उपेक्षा हो रही है ।

उपाध्यक्ष जी, वर्तमान में देश में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार है। उसका जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम था, उसमें भी यह प्रतिबद्धता दर्शाई गई थी कि हम कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे, लेकिन इसके बावजूद, इस साल का जो बजट आया है, उसमें कृषि के लिए जितना प्रावधान होना चाहिए था, उतना प्रावधान नहीं किया गया है। जब हम बेरोजगारी दूर करने की बात करते हैं, मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि बेरोजगारी दूर करने का अगर कोई क्षेत्र हो सकता है, तो वह कृषि के अलावा कोई दूसरा नहीं हो सकता। इसलिए कृषि के संरक्षण और संवर्धन का काम जितनी मजबूती के साथ हमारे देश में होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।

महोदय, अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन की जो रिपोर्ट है, उसमें कहा गया है कि हिन्दुस्तान के अधिकांश लोग कृषि पर निर्भर हैं, लेकिन इस क्षेत्र को जो सुविधाएं मुहैया होनी चाहिए, वे मुहैया नहीं हो रही हैं। परिणाम यह हो रहा है कि लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांव बुरी तरह बर्बाद हो रहे हैं, उजड़ रहे हैं, उत्पादन लागत निरन्तर बढ़ रही है, किसानों को उनके उत्पाद का जो भाव मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है। सबसे दुखद बात यह है कि इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद भी हम सिंचाई के नाम पर पूरी तरह इन्द्र के भरोसे, भगवान के भरोसे हैं।

महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि भारत की कृषि के लिए जहां चुनौतियां वहां ऐसा नहीं है कि हमारे पास साधन नहीं हैं। हमारे देश में कृषि के ३५ विश्वविद्यालय हैं और इऩके साथ-साथ कृषि अनुसंधान परिषद् है जिसकी तकनीकी शोध ताकतें हैं। यदि कृषि बीजों और फसलों की नई प्रजातियां हम विकसित करें और वे आम जनता तक पहुंचें, तो इस क्षेत्र में आशातीत सफलता प्राप्त की जा सकती है। कृषि के नाम पर जो शोध हो रहे हैं, दुख की बात यह है कि वे मात्र प्रयोगशालाओं तक ही सीमित हैं। जब तक वे शोध किसानों तक नहीं पहुंचेंगे तब तक किसानों का किसी भी तरह भला नहीं हो सकता है।

महोदय, मैं आपकी मार्फत यह निवेदन भी करना चाहता हूं कि इस बार का जो बजट प्रस्तुत हुआ, उसमें केवल ५० करोड़ रुपए शोध के लिए रखे गए हैं, जो विश्व के देशों की तुलना में नहीं के बराबर हैं। हम कृषि का विकास करना चाहते हैं, हम किसानों को नई जानकारी देना चाहते हैं, नई तकनीक देना चाहते हैं, नए तरीके से फसलें उगाना चाहते हैं, लेकिन कृषि के क्षेत्र में जो शोध हो रहे हैं, उनका कोई फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि १९५०-५१ में सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का ५८ प्रतिशत योगदान था, जो अब घटकर केवल २०.५ प्रतिशत रह गया है।

यदि कृषि को विकसित करना है, तो उसकी जो उपज दर है, उसे बढ़ाने की जरूरत है। उसकी क्षमता हमारे देश में है, लेकिन कुप्रबंध और कुशासन के कारण हम अपनी क्षमता का सही प्रयोग नहीं कर रहे हैं। इंडियन कौंसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च की जो खोज है, उसके मुताबिक जो तथ्य प्रकाश में आए हैं, उनमें कहा गया है कि गंगा और यमुना का जो बेसिन है, उसमें ५.७ से लेकर ६.६ टन प्रति हैक्टेयर के हिसाब से गेहूं और ८.३ से लेकर १०.४ टन प्रति हैक्टेयर के हिसाब से चावल पैदा किया जा सकता है और यह जो उत्पादन होगा, वह वर्तमान उत्पादन से १०० से ३०० प्रतिशत तक ज्यादा होगा। उसकी ओर हमारा कोई ध्यान नहीं है। पिछले सालों में हमारे यहां जो कृषि के उत्पादन की मात्रा थी, वह प्रतिवर्ष औसतन १.५ टन के हिसाब से बढ़ी है जबकि देश की जनसंख्या १.८ प्रतिशत की दर से बढ़ी है।

इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले दशक में प्रतिव्यक्ति, विशेषकर मोटे अनाज की उपलब्धता २० प्रतिशत कम हो गई है। दालों की जो उपलब्धता ३६ ग्राम प्रतिव्यक्ति थी, वह घट कर २८ ग्राम प्रति व्यक्ति हो गई है। इस देश में १९ बलियन हैक्टेयर जमीन बंजर है, जिसे कृषि योग्य बनाने हेतु एक लाख से ज्यादा मजदूर नियोजित हो सकते हैं, लेकिन इस बार जो बजट प्रस्तुत किया गया है, उसमें इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके मार्फत सरकार से कहना चाहूंगा कि हमने हिन्दुस्तान की तरक्की का जो मूलभूत ढांचा तैयार किया है, जिसमें सीमेंट, सड़क, बिजली, पैट्रोलियम प्रोडक्ट्स हैं, उनमें सिंचाई का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। पहली पंचवर्षीय योजना से लेकर दसवीं पंचवरषीय योजना तक सिंचाई की तमाम ऐसी परियोजनाएं हैं, जो स्व. पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के जमाने में शुरु हुईं, लेकिन वे आज तक पूरी नहीं हो सकी हैं। देश में वर्तमान दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं में सात खरब और २० अरब की अनुमानित लागत वाली बडी और मध्यम दर्जे की ४०० सिंचाई की परियोजनाएं लम्बित हैं। इन परियोजनाओं में विलम्ब होने के कारण उनकी लागत राशि पांच गुना से लेकर २० गुना तक बढ़ी है।

उपाध्यक्ष महोदय, सिंचाई की जिन परियोजनाओं से किसान लाभान्वित हो सकते थे, वे पूरी नहीं हुईं। हम नयी परियोजनाओं की घोषणा करते जाते हैं और पुरानी परियोजनाओं को पूरा करने का काम नहीं करते। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि जब तक देश में सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं होगी, तब तक हम किसी भी कीमत पर कृषि क्षेत्र का कल्याण नहीं कर सकते। मैं सरकार पर आरोप लगाना चाहता हूं कि यह सरकार सिंचाई के क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा कर रही है। हम कृषि और खेती की बात करते हैं तथा उसे उपजाऊ बनाने की बात करते हैं, लेकिन जब तक हम सिंचाई को प्राथमिकता नहीं देंगे तब तक देश का भला नहीं हो सकता।

हमारी उत्पादन दर बढ़ नहीं पा रही है, पिछले पांच सालों में लगभग एक जैसी है। गेहूं की पैदावार सन् १९९९-२००० में २.७८ टन प्रति हैक्टेयर थी, २००३-०४ में २.७१ टन प्रति हैक्टेयर हुई। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हम कुछ भी कहें, लेकिन पिछले पांच वर्षों में गेहूं की पैदावार में प्रति हैक्टेयर कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। सन् १९९९-२००० में दालों की पैदावार ०.७४ टन प्रति हैक्टेयर थी, २००३-०४ में ०.६२ टन प्रति हैक्टेयर हो गई। सन् १९९९-२००० में अनाज की उत्पादन दर १.७० टन थी, २००३-०४ में वह १.७१ टन प्रति हैक्टेयर हुई। इसका सीधा मतलब यह है कि हम कृषि को किसी भी कीमत पर लाभकारी नहीं बना पाए।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके मार्फत सरकार से कहना चाहूंगा कि आज हमने किसान को कहां खड़ा कर दिया है। हम अंतर्राष्ट्रीय बाजार की खुली स्पर्धा में खड़े हैं, हमें सहूलियतें नहीं मिल रही है। हमने दुनिया का बाजार खोल दिया है, लेकिन दुनिया के तमाम देश अपने किसानों को जो संरक्षण और सब्सिडी दे रहे हैं, उनकी तुलना में हम कहीं नहीं खड़े हैं और यही कारण है कि इस हाउस में वित्त मंत्री जी ने कहा कि हम किसानों को ऋण देंगे। कल-परसों अखबारों में यह छपा कि उनकी ब्याज कम होगी। मैंने पहले भी कहा और फिर मैं उसी बात को दोहराना चाहता हूं कि आप कितना रुपया, कितना ब्याज, कितना ऋण देंगे, यह कोई अहम् मुद्दा नहीं है। किसानों की खुदकशी के मामले अखबारों में आते हैं। किसानों ने वभिन्न प्रांतों में दम तोड़ा है, आत्महत्याएं की हैं, उसका भी सीधा कारण यह है कि खेती अलाभकारी हो गई है। किसान जो ऋण लेते हैं, उसे अदा करने की क्षमता किसान में नहीं है।

हम बहुत गम्भीर सवाल पर चर्चा कर रहे हैं और मैं बड़ी विनम्रता के साथ कहना चाहूंगा कि अगर इस देश को तरक्की करनी है, इस देश को बेरोजगारी से बचाना है, इस देश को आर्थिक रूप से सुद्ृढ़ करना है तो कृषि को संरक्षण देने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। कृषि के बाद जो सबसे बड़ा किसान के पास आय का जरिया है, वह पशुधन है। इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या होगा कि सात रुपये लीटर दूध बिक रहा है और १२ रुपये लीटर पानी बिक रहा है। इससे ज्यादा नाइंसाफी और किसान के साथ क्या हो सकती है?

उपाध्यक्ष महोदय, मैं समय की सीमा को जानता हूं और मैं एक ही बात कहना चाहता हूं। शरद पवार जी का काफी अनुभव है। ये कृषि मंत्री हैं, इनका किसानों से बहुत सम्बन्ध रहा है। मेरा शरद पवार जी से विनम्र आग्रह है कि जब तक सरकार सकारात्मक दिशा में नहीं सोचेगी, बुनियादी तौर पर हम कुछ भी कहें, लेकिन जब तक हिन्दुस्तान का बजट कृषि आधारित नहीं होगा और इस देश में श्रम प्रधान उद्योग नहीं लगेंगे, तब तक दुनिया की कोई ताकत इस देश का भला नहीं कर सकती। इसलिए मेरा आपके मार्फत इस सरकार से विनम्र आग्रह है कि कृषि को बचाने का काम करिये, किसान को बचाने का काम करिये। उत्पादन लागत बढ़ रही है, उत्पाद का मूल्य नहीं मिल रहा है, किसान लुट रहे हैं, खेती आज अलाभप्रद हो गई है और मेरा आपके मार्फत इस सरकार से यही विनम्र आग्रह है कि आपके चुनाव घोषणा-पत्र में क्या लिखा है, न्यूनतम साझा कार्यक्रम में क्या लिखा है, मैं नहीं जानता, लेकिन वह लिखा हुआ आम जनता को आचरण में दिखाई देना चाहिए। इसी से सरकार की दिशा तय होगी और इसी से सरकार के काम के बारे में लोग अनुमान लगाएंगे। इस दिशा में अगर यह सरकार कुछ पहल करेगी तो मैं समझता हूं कि निश्चित रूप से जिस गम्भीर विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं, उसकी सार्थकता होगी।

 

* श्री राम सेवक सिंह (ग्वालियर) : अध्यक्ष महोदय, वर्ष २००५-०६ कृषि मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर चर्चा में मुझे अपनी बात कहने का जो अवसर प्राप्त हुआ है, उसके लिए मैं माननीय अध्यक्ष तथा सम्मानीय सदन का हार्दिक आभार प्रकट करता हूं तथा उपेक्षाओं का दंश झेलने वाले किसानों की दशा को देखते हुए व्यथित मन से अपने विचार सदन के सामने रख रहा हूं।

महोदय, हमारे कृषि प्रधान देश में किसानों की दयनीय स्थिति से आप सभी परचित हैं। पिछले कुछ वर्षो में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्यायें इसका ज्वलन्त उदाहरण है। महोदय, दिना रात अपने को जोखिम में डालकर देश के लिए खाद्यान पैदा करने वाले किसान को अपनी जीविका चलाना दुर्भर हो गया है। मंहगाई की चौतरफा वृद्धि से सिंचाई, उरर्वक, उत्तम बीज, जुताई-गुडाई आदि सभी मंहगा हो जाने के कारण किसान परिवार कर्ज के बोझ से दबा जा रहा है तथा प्राकृतिक आपदाएं भी इसका एक मुख्य कारण है।

महोदय, मेरा अपनी सरकार तथा सम्माननीय सदन से आग्रह है कि एक ऐसी ठोस योजना बनायी जाने, जिसमें प्राकृतिक आपदा, सूखे से बचाव व खलिहान दुर्घटनाओं की अविलम्ब क्षतिपूर्ति हो सके तथा कृषि मंत्रालय में प्राकृतिक आपदा राहत कोष का गठन किया जाये, जिसमें पर्याप्त धन की व्यवस्था हो तथा कृषि मंत्रालय द्वारा सीधे तौर पर केन्द्र सरकार - किसान के द्वार की नीति के तहत क्रियान्वित की जाये, जिससे पीड़ित परिवार अपनी सरकार को अपना हमदर्द मान सके।

महोदय, अभी पीछे मध्य प्रदेश विशेषकर मेरे संसदीय क्षेत्र ग्वालियर में ओलावृष्टि से एक बहुत बड़े क्षेत्र में रबी की फसल पूर्णतया: नष्ट हो गयी। आगामी फसल हेतु बीज भी नहीं बचा। प्रदेश सरकार द्वारा कुछ तात्कालिक सहायता दी गयी, जो काफी नहीं है। महोदय, इस तरह की आपदाओं से सामाजिक गतवधियां भी रूक जाती हैं। जो परिवार अपनी बेटी की शादी इस फसल के आसरे पर तय करता है, वो टूट जाती है। ऐसी एक घटना से ही किसान परिवार विकास की राह से दस साल पीछे चले जाते हैं।

महोदय, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना - कृषि विकास में अपनी सरकार की बहुत बड़ी पहल है। इस योजना को अधिक से अधिक सरल बनाया जाये तथा कम से कम प्रीमियम पर फसल का बीमा किया जाये, जिससे इस योजना का प्रत्येक छोटे-मझले किसान लाभ उठा सकें। इस योजना के क्रियान्वयन में ग्राम पंचायत को भी शामिल किया जाना चाहिए, जिससे मुआवजे की वस्तुस्थिति पूर्णतया: स्पष्ट एवं निष्पक्ष रहे।

* Laid on the Table.

महोदय, सिंचाई एवं पेयजल हेतु भूजल के बढते दोहन से भूजल स्तर बहुत अधिक गिर गया है। पूर्व में स्थापित नलकूपों से पर्याप्त सिंचाई नहीं हो पा रही है। कृषि भूमि के ऊसर होने के आसार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे किसानों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। महोदय, भूजल स्तर तथा कृषि भूमि को ऊसर बनने से रोकने हेतु कृषि विभाग को जल संसाधन मंत्रालय तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय के साथ मिलकर ग्राम पंचायतों में सूखे पड़े तालाबों की पुर्नस्थापना तथा जीर्णोद्वार हेतु एक विशेष कार्य योजना बनानी चाहिए, जिससे वर्षा के पानी का सदुपयोग गिरते भूजल स्तर को रोकने में किया जा सके। महोदय, सरकार को वर्षा के सम्पूर्ण जल के सदपयोग हेतु नदियों पर बड़े-बड़े बांधों का निर्माण करना चाहिए, जिसका इस्तेमाल सिंचाई एवं पेयजल के रूप में किया जा सके।

महोदय, प्रत्येक राज्य के बड़े शहरों में कृषि विश्वविद्यालय तथा कृषि अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना की जाये, जिससे युवा वर्ग को कृषि की शिक्षा तथा किसानों को उन्नत बीज मिल सके। कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से भूमि की उर्वरता को बढ़ाया जा सके और कम लागत में पैदावार बढ़ायी जा सके। महोदय, ये दोनों कारक कृषि के विकास में सहायक होंगे, ऐसा मेरा मत है।

महोदय, कृषि के ववधिकरण की कार्य योजना से किसानों को लाभ मिलेगा। यदि सरकार किसानों को लघु-उद्योग हेतु रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध कराये तो इनके आय के अन्य स्त्रोत भी खुलेंगे और किसान समृद्ध होगा। महोदय, किसान समृद्ध होगा तो देश समृद्ध होगा।

महोदय, मैंने अपने कुछ प्रस्ताव रखे। मुझे आशा है कि सम्माननीय सदन तथा सरकार इस पर विचार करेंगे तथा किसान हित में ठोस कदम उठाये जायेंगे।

अंत में महोदय मैं आपका तथा सम्माननीय सदन का हार्दिक धन्यवाद करता हूं।

 

SHRI DUSHYANT SINGH (JHALAWAR): Mr. Deputy Speaker, Sir, I thank you for giving me the opportunity to speak on a very important Demand on Agriculture.

Sir, I would like to bring out a few observations on the Demands for the Ministry of Agriculture. The majority of the people are living in rural India. They are linked to agriculture and its allied sector.

Sir, basically, within the agriculture sector, we could just divide them into horticulture, dairy, fishery and poultry. The Indian agriculture constitutes about 25 per cent of our GDP. The workforce working within the agriculture sector is about 60 per cent. So, we are heavily dependent on the agriculture sector. At this stage, I must also put that in the UPA Government’s Common Minimum Programme, they have mentioned that they will give full emphasis to the agriculture sector. Our hon. Minister for Agriculture being a farmer and from the grass root, he himself knows the feeling of the people. We are happy to have a Minister like him. I must say that there has been a great food production for the year 2004-05. It has been a surplus production.

But, at this stage, I must say that in Rajasthan there are no MSPs for agricultural produce like guar, moth, dhania and isabgol. You need to provide that for the farmers so that they can get equal weightage for their produce. At this stage, we need to link marketing and the marketing boards so that there is a link from the marketing boards to FCI and the produce of the farmers get to the mandis on time. Once they get on time, the produce is of high quality and high standard. Our farmers work hard; they toil and they work through different conditions, specially when there is different climatic conditions.

In Rajasthan, we just have had a hail, and due to this, there has been crop destruction. As regards crop destruction, under the National Agriculture Insurance, we consider the tehsil as a whole. We should consider the village as a whole so that we can give the farmers equal weightage for the produce.

For the irrigated portion of the land, you give Rs.2,500 per hectare. For the un-irrigated land, you give Rs.1,500 per hectare. You have to consider this aspect. You have to look at this issue precisely. You have to look at the issue of farmers as such.

I must say that the NDA Government had provided the Kisan Credit Card to the farmers. Now, you are in the Treasury Benches. The Kisan Credit Card needs to be further looked into in order to improve it further so that there is no middleman. The financial institutions should make sure that the money goes direct to the kisans so that they benefit in turn.

At this stage, Rajasthan depends primarily on rain for producing agricultural crops. In Rajasthan, we produce especially Bajra. At this stage, for producing Bajra, the MSP is Rs.515 per quintal. The Government should raise it because the production cost increases for every produce. For example, we do not have as much electricity as is needed. So, the farmers are bound to use diesel. As diesel is used, the cost of production goes up. So, we have to make sure that the price is raised for producing such items.

Dhaniya and Isabgol have medicinal values. We also produce a lot of other medicinal plants. For sarson and oil seeds, the subsidy has been reduced from 50 per cent to 25 per cent. I would urge upon the Government to make it 50 per cent. Similarly, for cotton also, the subsidy has been reduced from 50 per cent to 25 per cent. Especially in our State of Rajasthan, we have a lot of mills in Bhilwara. They help the industrialists and the farmers. So, we have to help this sector further in order to have good entrepreneurs within our State.

I thank the Government for helping the people of Rajasthan during the period of drought. At the same time, I would like to say that the hon. Finance Minister has mentioned in his Budget Speech that a Horticulture Mission will be set up. I would urge him to assist us in this regard. India is the second largest producing nation in terms of fruits and vegetables. There is a great market in Europe. At the same time, the trade barriers are going to be very tough in the future. The important point is that the European Union could be a good market for selling our produce.

Apart from agriculture, we also have sheep rearing, goat rearing and we produce a good quantity of milk. Rajasthan is having milk chilling plants. It is close to Delhi. There is a perfect combination. So, I would urge upon the hon. Minister that he should help us in this regard. He is a man who has made the cooperative set up viable in Maharashtra. I would urge upon him to help us, to give us guidance and tell us the methods to improve the milk cooperatives in our State. We have to help the common man, the person who rears sheep and cattle.

I will just summarise my speech by saying that the Government of Rajasthan has put forward a few demands. We need to have a residual testing laboratory in Jaipur in particular or in the State of Rajasthan as such so that our products improve further in terms of quality. If it is done, we can supply these items to the European Union. We need sophisticated equipment. It costs about Rs. 3 crore. So, this Government should help us.

Next, the subsidy for PVC and cement pipes are not there in the Budget. We need your assistance to help the farmers. So, you have to give subsidy in this regard. Right now, you are giving subsidy only on the 75 mm DI pipes of HTPE. Hence, I would urge upon the Government to look at the issue of providing full subsidy to the PVC pipes and cement pipes so that the farmers can connect their land. Micro irrigation is also necessary for our region. We need to look at drip irrigation and sprinkler irrigation which could increase production to an optimum extent.

At this stage, we need to have a linkage between the Centre and the States. Adequate provision should be made in this regard. The Centre and the States should work together to have good output in terms of agriculture. To enhance dry-land farming, you have given a sum of Rs.130 crore.

There is a need to increase that because that caters only to 32 blocks. We have 237 blocks on dryland farming. We need to increase that so that the allocation goes up further. The farmer depends primarily on the fertilisers to increase production. There is a need to look at other methods just like organic farming by bio-fertilisers. You have created four regional centres in Hisar, Jabalpur, Bangalore and Nagpur. There is a need of one centre in Rajasthan too. The prices of steel for the machinery have gone up. You have to increase the production. We need subsidies for the farmers in the entire country so that farmers can get proper products and can use them as a tool for agriculture production. In the end, seed is a most important component to produce any good. National Seed Research Centre has been set up in Varanasi. I am very glad about that. We need one centre in every State. You have to assist us. With the new Horticulture Mission you can give us the opportunity of having one in our State and others States also.

You have helped the kisans by giving them kisan channels but we need to aid them through Call Centre which you have given them. We need proper training for local areas and we need Call Centres in each State. At this stage, I would also put it to you that we had a surplus production. You had created a new niche ‘Videsh Krishi Upaj Yojana’ to export the produce. I am glad about that. We must produce for export markets. We can sell our produce abroad better than that of our market. We have a great produce within the country of pulses, dairy products and vegetables and cane. Food processing can be linked to agriculture sector to make a new niche and add value to the product and create new awareness. In my constituency, let us assume, we produce oranges second to Nagpur. We can have an orange processing plant within the State of Rajasthan or State of Jhalawar.

In the end, I would like to say that you have been abroad. You have met a lot of foreign dignitaries during your last one year in office. There are a lot of projects in the pipeline such as watershed management programmes, salt conservation programmes which are there for the people of our nation. You have to guide us. I hope you will be able to guide us and help our State of Rajasthan to create an economy for the farmers, for the local people, for the aam aadmi and stick to the National Common Minimum Programme which will help the people. This will create a new nation called Bharat Nirman which our hon. Prime Minister mentioned about. To link our system of work employment guarantee with agriculture, you can link employment guarantee too not only to 150 districts, but also to the entire country and add value to the product.

प्रो. चन्द्र कुमार (कांगड़ा) : उपाध्यक्ष महोदय, सदन में जो कृषि की अनुदान मांगें रखी गई हैं, मैं उनके बारे में अपने विचार प्रकट करना चाहता हूं। हिन्दुस्तान के ७० प्रतिशत लोग खेती-बाड़ी से अपनी जीविका कमाते हैं। यह सबसे बड़ी इंडस्ट्री है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब भाखड़ा डैम का उद्घाटन किया था, तब कहा था कि ये हिन्दुस्तान के माडर्न टैम्पल हैं जहां की सिंचाई की बड़ी-बड़ी परियोजनाएं पंजाब, हरियाणा, राजस्थान को जाएंगी और हिन्दुस्तान में ग्रीन रैवोल्यूशन लाएंगी। आज हिन्दुस्तान में वही परियोजनाएं सबसे बड़ी ग्रीन रैवोल्यूशन लाईं। इसके साथ-साथ हिन्दुस्तान में व्हाइट रेवोल्यूशन लाईं। आज युनाइटेड प्रोग्रैसिव ऐलायंस का सबसे ज्यादा ध्यान कृषि की तरफ है।

पुरानी कहावत में कहा गया है कि उच्च खेती को हमेशा ऊंचे दर्जे का माना गया है। उसमें कहा गया है --‘उत्तम खेती मध्यम व्यापार, नीच चाकरी करे गवार’। आज हमारे नौजवान खेती की तरफ न जाकर छोटे-मोटे धंधे की तरफ जाने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे वह वक्त याद है जब पंजाब के मुख्य मंत्री श्री प्रकाश सिंह कैरो थे। उस समय बहुत सी ऐग्रीकल्चर यूनीवर्सिटीज का निर्माण हुआ। बहुत से खेती-बाड़ी करने वाली फैमिलीज के लड़कों ने उन ऐग्रीकल्चर यूनीवर्सिटीज में दाखिला लिया।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Silence please.

… (Interruptions)

प्रो. चन्द्र कुमार : जब वे पढ़-लिख गए तो कुछ लोगों ने श्री कैरो से कहा कि आपने इतनी ऐग्रीकल्चर यूनीवर्सिटीज बना दी हैं, लेकिन जब यहां का पढ़ा-लिखा नौजवान बेरोजगार होगा तो आप उन्हें रोजगार कहां से देंगे। उन्होंने एक शब्द कहा कि मैं ऐग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी सिर्फ इम्प्लायमैंट के लिए नहीं बना रहा हूं। अगर देहात का पढ़ा-लिखा नौजवान खेती-बाड़ी करके अपनी खेती के रंग-रूप को बदलेगा तो हम हिन्दुस्तान के पूरे कृषि ढांचे में परिवर्तन कर सकते हैं। आज हमें खुशी है कि उस वक्त लुधियाना की ऐग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी ने वह कीर्तिमान दिखाए जो विश्व की दूसरी यूनीवर्सिटीज जो बड़े पैमाने पर थीं, ने नहीं दिखाए। उस वक्त ऐग्रीक्लचर में बहुत बड़ा रैवोल्यूशन आया।

आज टोटल जीडीपी का २१ प्रतिशत हिस्सा ऐग्रीकल्चर सैक्टर से आता है। हमारी सरकार की प्राथमिकता ऐग्रीकल्चर सैक्टर के लिए होनी चाहिए। आज सैक्टोरल प्लानिंग में बहुत से विभाग अपने-अपने तरीके से काम कर रहे हैं। कृषि मंत्री जी उच्च कोटि के कृषक भी हैं और एक अच्छे पार्लियामैंटेरियन भी हैं। आप सैक्टोरल प्लानिंग के लिए राज्यों को जो पैसा देते हैं, जैसे ऐग्रीकल्चर, हार्टीकल्चर, इरीगेशन, सॉयल कन्जर्वेशन आदि they work in unison. मैंने देखा है कि ऐग्रीकल्चर डिपार्टमैंट कुछ और काम कर रहा है तो इरीगेशन विभाग कुछ और काम कर रहा है। इसी तरह सॉयल कन्जर्वेशन विभाग कुछ और काम कर रहा है। इसलिए हमारा जो ऐग्रीकल्चर डायवर्सीफिकेशन रोड मैप है, जिसे अब हिन्दुस्तान की सरकार बना रही है, जिसमें डायवर्सीफिकेशन हो रहा है, उसमें सबसे पहले हिन्दुस्तान की ग्रीन लैंड का यूज होता। हमारी विडंबना है कि there is no land use planning throughout the country. अभी भी लैंड यूज प्लानिंग को सारे देश में अमल में नहीं लाया गया। कोई सॉयल फर्टीलिटी और सॉयल कैपेबलिटी मैप नहीं बनाया गया। आज किसान परम्परागत तरीके से खेती करके या फर्टीलाइजर डालकर जो उत्पादन करता है, उसे साइंटफिक लाइन पर नहीं लाया गया। मेरा कृषि मंत्री जी से आग्रह है कि हमारे पास बहुत यूनीवर्सिटीज जैसे इंडियन काउंसिल ऑफ ऐग्रीकल्चरल रिसर्च है। अभी तक हिन्दुस्तान में पैडोलॉजिकल सर्वे नहीं किया गया। स्कॉल्सकी रशियन पैडोलॉजिस्ट थी, She was the first pedologist in the world. उसने सारे विश्व के सॉयल मैप तैयार किए और इंडियन काउंसिल ऑफ ऐग्रीकल्चरल रिसर्च ने भी बड़े soil के मैप तैयार किए हैं। वह माइक्रो और मिनी माइक्रो के साथ नहीं किए। इसलिए अब ऐग्रीकल्चर की डायवर्सफिकेशन तब तक नहीं हो सकती जब तक प्रापर लैंड यूज प्लानिंग नहीं होगी, प्रापर लैड फर्टीलिटी सर्वे और लैंड कैपेबलिटी सर्वे नहीं होंगे। इसलिए मेरा निवेदन है कि हमारी इंडियन काउंसिल ऑफ ऐग्रीकल्चरल रिसर्च यूनीवर्सिटी का ब्लाक स्तर पर लैंड यूज सर्वे किया जाए। ब्लाक स्तर के लैड यूज सर्वे कर उस माडल को जगह-जगह रैप्लीकेट करके देखा जाए कि कृषि के संदर्भ में कौन सी जमीन कैसे फिट हो। इसके लिए यह करना बहुत अनिवार्य है। इसी के साथ यूपीए सरकार ने यह टारगैट रखा है कि हम सन् २००९ तक एक करोड़ हैक्टेयर एरिया को सिंचाई की व्यवस्था के अधीन लाना चाहते हैं। इसके लिए भी मीडियम और लार्ज स्केल योजना के बारे में देखना होगा। मैंने देखा है कि बहुत से हाइडल प्रोजैक्ट्स भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में आ रहे हैं।

लेकिन उसका सिर्फ एक ही काम हाइडल जनरेशन करना है। होना तो यह चाहिए था कि मल्टी-पर्पज प्रोजेक्ट्स, जैसे कि भांखड़ा नांगल प्रोजेक्ट बनाया गया, दामोदर वैली प्रोजेक्ट बनाया गया, आज भी हम माइक्रो और मिनी हाइडल प्रोजेक्ट्स बना रहे हैं। वे मल्टी-पर्पज प्रोजेक्ट्स होने चाहिए जिसमें इरीगेशन के साथ हाइडल जनरेशन और दूसरी बातें होनी चाहिए।

हिन्दुस्तान में सबसे पहले लैंड-रिफॉम्र्स श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने शुरु किये। बहुत से राज्यों में भूमि सुधार शुरू हुए और बहुत से राज्यों में अभी तक नहीं हुए हैं। जब तक भूमि सुधार नहीं होगा, तब तक हम एग्रेरियन reforms नहीं कर सकते हैं। जब तक हम छोटे से छोटा जो गरीब आदमी उसको जमीन देकर एग्रीकल्चर को बढ़ावा नहीं दे सकते, तब तक हम एग्रेरियन रिफॉम्र्स की तरफ नहीं जा सकते हैं। आज यह बड़ी विडम्बना की बात है और मैं बताना चाहूंगा कि मुझे एस्टीमेट्स कमेटी में काम करने का मौका मिला और मैं आन्ध्रा प्रदेश गया। 42 per cent of the people of that State are still bonded labour. 50 per cent of the total population of that area is having less than two hectares of land. आज सभी राज्यों में जब तक भूमि सुधार नहीं होंगे तब तक एग्रीकल्चर reforms हम किसी प्रकार से पूरा नहीं कर सकते। इसलिए यदि हम डाइवर्सफिकेशन करना चाहते हैं तो इसके लिए भूमि सुधार होना जरूरी है। अगर हम हॉर्टिकल्चर, पोल्ट्री-फार्मिंग, डेयरी फॉर्मिंग की तरफ जाना चाहते हैं तो कम से कम एक गांव में रहने वाला जो गरीब आदमी है, उसके लिए हमें यह एनश्योर करना चाहिए कि उसे १०-१५ कनाल जमीन मुहैया कराएं। हमारा जो स्टेट हिमाचल प्रदेश है, उसमें Dr. Y.S. Parmar was the first Chief Minister of the State जिन्होंने काम्प्रीहेंसिव लैंड-रिफॉम्र्स किये और हरेक आदमी को जमीन मुहैया कराई। कहने के लिए मैं छोटे से राज्य से आता हूं लेकिन बात जब डाइवर्सफिकेशन ऑफ एग्रीकल्चर की होती है और आज जितने फ्लोरिकल्चरिस्ट्स और एग्रीकल्चरिस्ट्स हैं, एग्रीकल्चर में जब वे एग्रीकल्चरल रिफॉम्र्स लाए, तभी उससे एग्रीकल्चर का सारा रूट प्लान बदला है। इसलिए मेरी आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से विनती है कि जिन स्टेट्स में अभी तक एग्रीकल्चरल रिफॉम्र्स नहीं हुए हैं, वहां व्यापक स्तर पर टाइम बाउंड करके एग्रीकल्चर रिफॉम्र्स किये जाएं। उसके बाद एग्रेरियन रिफॉम्र्स किये जाएं। इसी तरह से बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां मार्केट इंटरवेंशन स्कीम के तहत चीजें दी जाती हैं। इसलिए आज सफलता का युग है और हमें बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर इन चीजों को हमें रेक्टिफाइ करना चाहिए और जो डाइवर्सफिकेशन करना चाहते हैं और अगर कोई सीरियल क्रॉप पैदा करता है और वहां पर एग्रो क्लाइमेट किसी हॉर्टिकल्चर के लिए उपयुक्त रहता है तो हमें व्यापक स्तर पर हॉर्टिकल्चर को देना चाहिए और सीरियल्स को पीछे छोड़ देना चाहिए।

डेनमार्क जैसे छोटे-छोटे देश जिन्होंने डेयरी फॉर्मिंग में विश्व में अपना नाम कमाया है और अगर हम यह कहें कि वे सीरियल उगाकर या व्हीट उगाकर अपना नाम कमा सकते थे तो यह कभी नहीं हो सकता। हिन्दुस्तान की जितनी स्टेट्स हैं, उन्हें पहले आइडेंटिफाइ किया जाए कि किस क्लाइमेट में कौन सी हॉर्टिकल्चर एक्टिविटीज किस एग्रो क्लाइमेट में सीरियल क्रॉप पैदा कर सकते हैं ताकि हरेक राज्य में सब एक ही तरफ न चले कि सीरियल उगाने की तरफ चले और एक स्टेट हॉर्टिकल्चर से वंचित रह जाए। इसलिए मैं चाहता हूं कि प्रोपर लैंड-यूज प्लानिंग करके सारे राज्यों को ऑक्यूपेशनल स्ट्रक्चर करके एग्रीकल्चर बेस दिया जाए ताकि लोग आगे से आगे काम कर सकें।

इसी तरह से मैं माननीय कृषि मंत्री जी से आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूं कि जो गरीब आदमी को लोन दिया जाता है, जो लोनिंग की प्रोसैस है, एग्रीकल्चर सैक्टर में लोनिंग दी जाती है, उसके रेट ऑफ इंटरेस्ट इतने ज्यादा हैं कि ज्यादातर कोआपरेटिव बैंक्स, लैंड-मॉर्टगेज बैंक्स उनकी लोनिंग करते हैं और रेट ऑफ इंटरेस्ट १२ से १५ प्रतिशत तक होता है और बेचारा किसान अगर किसी कैलेमिटीज या सूखे की वजह से लोनिंग नहीं दे सकता तो उसे हायर रेट्स पर जमीन को गिरवी रखना पड़ता है। इसलिए लोनिंग की प्रोसैस आसान होनी चाहिए और रेट ऑफ इंटरेस्ट कम होना चाहिए तथा एग्रीकल्चरिस्ट को जिस उद्देश्य के लिए लोन दिया जाता है, उसकी मार्केट एनश्योर करनी चाहिए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद करता हूं।

*DR RATTAN SINGH AJNALA (TARAN TARAN): Thank you Sir, for giving me the time to speak.

In India, there are two ‘Indias’. One is ‘virtual India’ and the other is ‘real India’. ‘Virtual India’ works smart, enjoys and controls economy, education, communication, services, etc., whereas ‘real India’ depends on ‘virtual India’ for all its requirements. However, we have seen how the ‘real India’ had changed Governments. More than 70 per cent population of our country lives in ‘real India’.

Deputy Speaker, Sir, 75% people of this country live in villages. And these people are dependent on agriculture. It is unfortunate that the poorest of the poor in this country are peasants and farmers. Sir, the people of Punjab constitute only 1-1/2 to 2% of the population of India. After independence, people of India faced hunger and starvation. But the farmers of Punjab rose to the occasion. And by the dint of their hard labour they produced food grains in plenty. Although our population is only 2% of the total population of India, and area-wise, we constitute only 1-1/2% of the total area of India, but more than 50% food grain is being contributed into the Central food grain pool by the farmers of Punjab. But injustice is being meted out to the people of Punjab. There has been only a megre Rs 10/- increase in the MSP of wheat. In the case of paddy also, there has been an increase of only Rs. 10/- in MSP. But in the case of cotton, no increase in MSP has been made. The hon. Agriculture Minister is here. Last year we had made a request to him. The people of Punjab wanted Bt. Cotton. And he acceded to our request. But Bt. Cotton is being sold in black market in Punjab. We provide seeds to the farmers. Unless the seeds are available at economical price in the market, how will the farmers develop? Irrigation water is needed for farming. But injustice has been done to the people of * Translation of the speech originally delivered in Punjabi.

Punjab as far as irrigation water is concerned. After the country’s independence, all river water accords were against the interests of Punjabis. Step-motherly treatment has been meted out to the people of Punjab by successive Governments. Deputy Speaker Sir, the water table is receding. Farmers are facing a lot of problems. Crop diversification is the need of the hour. This is the fourth year of Congress rule in Punjab but the Government has not been able to show any concrete results and crop diversification in Punjab has remained a pipe dream. Unless the Centre does something in this matter, nothing will be achieved. Sir, the rate of interest for agriculture loans is 14% to 16%. But the rate of interest for home loans or car loans is only 7% to 8%. Recovery of loans is ruthlessly done. The defaulters in agriculture loans are 16% to 17% whereas defaulters in loans of other categories are 20%. Crores of rupees are embezzled whereas farmers have to grease the palm of bank officials to get agricultural loans. Farmers face acute problems while taking loans and their problems are further aggravated during the time of returning of loans. The rate of interest is sky high and it is very difficult to return the loans. Sir, when the farmers take their production to the markets, the middlemen siphon off the gains. These middlemen also give loans at sky high interest rates of 25% to 30%. There is no control on these middlemen and no way of saving the poor farmers from their clutches. No proper weighing facility for food grains is there in the markets. In several markets, vegetables are purchased by these middlemen not in kgs or quintals but in heaps. But when the same vegetables are sold at small shops after a few hours they are sold at the high rate of kgs. So, the profit does not go to the poor farmers. So I appeal to the Agriculture Minister to ensure the interest of farmers by ensuring that the farmers too get a share of this profit. Between sale and purchase, some percentage of profit must go to the poor farmers. Sir, policies and programmes are made for the farmers. But, these poor farmers do not have TV. They do not read newspapers. So efforts should be made to enlighten and inform these poor farmers regarding these programmes. In every village, there should be some source whereby these poor farmers can come to know about programmes, policies, new techniques of farming etc. So, the Government must redouble its efforts to bail out the poor farmers. Deputy Speaker Sir, education of the children of these poor farmers is of utmost importance. Educational facilities have to be provided in villages so that the coming generation of the poor farmer can be educated. Only educated farmers will come to know about the programmes and policies that will benefit them. How to seek loan? From where to get loan? Only educated farmers will know about all this. The MSP should be linked with price index. Prices of all commodities are going up. But, the MSP for food grains is not increased in accordance with the price index. So, it is the need of the hour that MSP in inalienably linked to price index. Only then, the poor farmer will get his due.

   

*SHRI BRAHMANANDA PANDA (JAGATSINGHPUR): Hon. Deputy Speaker Sir, you have given me the opportunity to speak on the Demands for Grants for Agriculture and I am thankful to you. It will not be an exaggeration to say that the cultural history of India is based on the edifice of Agriculture. Indian civilization, tradition and cultural moorings are agriculture based. Agriculture is the main source of livelihood for millions of Indians. Without agriculture, India can never be a progressive nation. In India the agricultural production is solely dependent upon the monsoon. The time has come to emphasise more on irrigation facilities. It is good news that hon. Minister for Science & Technology has informed us that we will have a normal monsoon this year. Even then we should not undervalue the importance of irrigation without which farmers’ condition cannot improve.

During his visit to Himachal Pradesh on Dec 24th 2004 hon. President had spoken of a 2nd Green Revolution in India. In order to turn this dream into reality the Department of Agriculture must adopt a realistic approach, which needs to be analyzed thoroughly. It is a good thing that the UN has celebrated 2004 as the year of international rice. But the millions of farmers in India are still reeling under poverty. The election in Andhra Pradesh in 2004 has clearly proved that applied science in agriculture might impress the people but it should not neglect hapless farmers in villages whose problems were not address to. As a result Mr Chandra Babu Naidu’s Government faced electoral debacle.

In this context, hon. Deputy Speaker Sir, I want to draw your attention to an observation made by Noble Laureate Sir Amartya Sen that unless we address to some fundamental issues we cannot better the lot of agriculture or agriculturists. He says – ‘India’s agriculture needs greater * Translation of the speech originally delivered in Oriya.

priority as the quality of labour casts a shadow on agro-productivity.’ He has spoken about 4 fundamental factors. They are – (1) delivery of the health care system (2) land reforms and its compilations (3) basic education (4) availability of microscopic credit.

So far as land reform is concerned States like West Bengal, Tamil Nadu, Kerala, etc. have taken up some revolutionary steps which has benefited the farming community to some extent. We must congratulate them. But I want to remind you here that Orissa was the 1st State to initiate land reform under the leadership of the then Chief Minister Smt. Nandini Satpathy. She had highlighted the principle that whoever produces the crop the land will belong to him. It was a historic step to better the lot of farmers.

Hon. Deputy Speaker Sir, today I am representing a backward State like Orissa as a member of BJD. Our leader late Shri Biju Patnaik was a symbol of dynamism and pride. He firmly believed that unless the condition of farmers improves India’s progress is impossible. In this context Sir, I want to draw your attention to some specific points. The first is that farmers in Orissa do not get agricultural loans. He never gets agricultural implements. He has no access to subsidized fertilizer or seeds. Irrigation facility is not available to him and hence he depends upon the unpredictable monsoon. He falls victim to the furies of nature in form of super cyclones, floods or droughts. Sometimes his paddy fields get destroyed by flood water and his children starve. Hence I want to implore before the hon. Minister for Agriculture if farmers live then only will India live. Farmers must get fertilizer, seeds, agricultural loans implements at an affordable rate. Small farmers who deal with jute and cotton must not be allowed to get exploited. ...( Interruptions)… Sir, I will take only 2 minutes. Our Government is not paying attention to crop insurance scheme. In today’s India farmers unable to pay back their loans are committing suicide. In my State the properties of farmers get forfeited if they fail to pay back loans. His condition is deplorable and it is very unfortunate. Hon. Minister for Agriculture had gone to my constituency on a visit. My constituency starts from Paradeep and ends at Konark. Konark is a world heritage site and one of the wonders of the modern world. It is located on a sea beach. The adjacent areas get flooded by sea-water which renders them infertile. The farmers of these areas suffer a lot. Neither the State Government nor the Central Government has ever looked into the matter. Sir, there are many districts in my State like Bolangir, Phulbani, Kandhamal etc. which have no irrigation facility. Since agriculture is not providing livelihood, unemployment problem has cropped up. It has also aggravated the menace of naxalism. Hence I want to emphasise that agriculture is the only source of occupation which can solve a lot of problems.

MR. DEPUTY-SPEAKER: I am sorry please conclude your speech. चार बजे श्री लालू प्रसाद यादव जी को स्टेटमेंट देनी है, उससे पहले डिमांडस फॉर ग्रान्टस ऑन एग्रीकल्चर की डिस्कशन को खत्म करना है ।

SHRI BRAHMANANDA PANDA : Hon. Deputy Speaker Sir, I would like to conclude with a poem which highlights the problems of farmers.

One, who is a farmer Has been bestowed with all the sufferings.

He has no food for his belly He labours hard throughout the year Wears tattered clothes His house has no proper roof He mingles in muddy water He does not care for the hot sun or cold winter He grows rice, black grams, green gram, cereals Fruits, vegetables and flowers His profession has no extra income His head reels in worry As to how will he survive?

Sir, I hope that hon. Agriculture Minister will give special attention to Orissa. I thank you from the bottom of my heart. Jai Jagannath.

 

श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : उपाध्यक्ष महोदय, सदन में कृषि की मांगों पर चर्चा हो रही है । मैं भी आपके माध्यम से इस चर्चा में भाग लेकर माननीय कृषि मंत्री जी का आंकड़ों पर नहीं बल्कि दो चार बिंदुओं और किसान की स्वाभाविक कठिनाइयों की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूं ।

महोदय, मैं इसलिए बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं क्योंकि जिस समय यह सरकार बन रही थी उस समय हम लोग सुन रहे थे कि आप कृषि मंत्रालय लेने के इच्छुक हैं क्योंकि आपके दिल में किसानों के प्रति दर्द है और आप चाहते हैं कि आप किसानों के लिए कुछ करें । किसानों की परेशानियां कागजी आंकड़ों से समाप्त नहीं की जा सकती हैं।

15.05 hrs. (Shri Arjun Sethi in the Chair) जब भी सदन चलता है, वह देश के किसानों के प्रति चिन्ता व्यक्त करता है। जब बाढ़ या सुखाड़ होता है, उस समय किसानों की परेशानी के प्रति यह सदन और देश चिन्ता करता है। जब किसान आत्महत्या करता है, उस समय भी सदन चिन्ता व्यक्त करता है। लेकिन गांव के किसानों की व्यावहारिक कठिनाइयों के प्रति हमें गौर करना चाहिये। आज कृषि पर आधारित तीन तरह के लोग हैं - एक, जो खेती का उत्पादन करके बाजार में अपना सामान बेचते हैं और अपनी खुशहाली अपने पास रखते हैं। दो, लघु किसान जो कृषि पर अपने परिवार की परवरिश करते हैं। तीन, कृषि पर आधारित कृषि मजदूर हैं जो खेती से अपनी दो जून की रोटी नहीं कमा पाते हैं। ये सब कृषि पर अपनी आजीविका चलाते हैं। देश और सदन इस सब की चिन्ता करता है और सरकार भी चिन्ता करती है लेकिन फिर भी गांव के किसानों की परेशानियों का समाधान नहीं हो पाता है। हम यह नहीं कहते कि कृषि का उत्पादन नहीं बढ़ा है। हां, यह बढ़ा है लेकिन इसमें सरकार की कितनी उपलब्धि है, किसानों के परिश्रम की कितनी उपलब्धि है, मैं इन बिन्दुओं पर चर्चा करना चाहता हूं। अलग-लग राज्यों में किसानों की समस्यायें अलग-अलग हैं। इसका एक कारण तो अलग अलग मिट्टी का होना है, अलग-अलग फसल का होना है। ऐसी परिस्थिति में मैं बिहार के किसानों की समस्याओं की तरफ मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। बिहार एक ऐसा प्रान्त है जहां की मिट्टी में उर्वरा शक्ति ज्यादा है लेकिन किसानों को हर वर्ष बाढ़ की विभीषिका सहनी पड़ती है। मैं यह भी मानता हूं कि बाढ़ और सुखाड़ से निज़ात पाना इतना आसान नहीं है लेकिन वहां तो जल-जमाव की समस्या ज्यादा है। यदि बिहार के जल जमाव की समस्या हल हो जाये तो अकेला बिहार भारतवर्ष के लिये ६ महीने का भोजन उपलब्ध करा सकता है। लेकिन जल जमाव के कारण किसान अपनी खेती से लागत मूल्य भी वापस नहीं ले सकता है। इससे किसानों को काफी परेशानी होती है।

सभापति महोदय, मैं माननीय कृषि मंत्री जी का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित करना चाहूंगा कि किसानों की पीड़ा और दर्द को देखते हुये उत्पादित सामान- खाद, केरोसिन ऑयल, डीजल और गैस पर सब्सिडी देने का काम किया था ताकि किसानों को राहत मिल सके लेकिन इस सब्सिडी का लाभ किसानों को कितना मिलता है, वह आप जानते हैं। यह सब्सिडी सीधे किसानों को नहीं जाती है लेकिन खाद का उत्पादन करने वाले ले जाते हैं।…( व्यवधान) अभी तो मैने शुरु किया है।

सभापति महोदय : क्योंकि टाइम बहुत कम है, इसलिये आपको बताया है।

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैंने पहले ही कहा था कि मुझे १० मिनट तक बोलने दिया जाये।

सभापति महोदय : अन्य माननीय सदस्यों ने भी बोलना है, लेकिन समय बहुत कम है। इसलिये आपसे रिक्वैस्ट करता हूं कि You confine to five minutes.

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैं आपको धन्यवाद देकर अपनी बात समाप्त कर देता हूं।

सभापति महोदय : नहीं, नहीं, आप बोलिये।

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैं अपनी पार्टी की तरफ से पहला वक्ता हूं।

सभापति महोदय : आप बोलिये।

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैं समाप्त कर रहा हूं।

सभापति महोदय : आप बोलिये। मैं यह आप पर छोड़ देता हूं। I am sorry.

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैंने पहले ही कहा था कि मैं १० मिनट ही बोलूंगा लेकिन आपने पहले ही घंटी बजा दी। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : मैंने इसलिये कहा क्योंकि ३.३० बजे कृषि मंत्री जी ने बोलना है और मेरे पास लम्बी लिस्ट थी, इसलिये मैं आप से कह रहा था।

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैं महत्वपूर्ण बात कह रहा हूं। माननीय मंत्री जी कुछ कम बोल लेंगें।

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) : सभापति महोदय, इतने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही है। चाहे सत्ता पक्ष हो, विपक्ष हो या कोई भी पार्टी हो, हर सम्मानित सदस्य इस पर अपनी चिंता व्यक्त करता है। इसलिए इसका समय बढ़ाया जाए और सबको बोलने का मौका दिया जाए।

श्री प्रभुनाथ सिंह : सभापति महोदय, हम आपके माध्यम से मंत्री जी को बताना चाहते हैं कि खाद पर जो सब्सिडी होती है, वह सीधे किसानों को नहीं जाती है। जो खाद का उत्पादन करने वाले कारखाने के मालिक होते हैं, वह उनके यहां जाती है और जितनी खाद का उत्पादन वे कागजों में दिखाते हैं, उतनी खाद गांवों के किसानों को नहीं मिलती है। कभी-कभी खाद की स्केयरसिटी हो जाती है और जब खाद की स्केयरसिटी होती है तो वे खाद में नमक मिला देते हैं, जिसके कारण खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। हम एक आग्रह करना चाहते हैं कि रासायनिक खादों के उत्पादन के बाद नफा-नुकसान की समीक्षा पता नहीं इस सरकार ने कराई है या नहीं कराई है। यदि कृषि मंत्रालय ने इसके नफे-नुकसान की समीक्षा कराई हो कि रासायनिक खादों के उत्पादन के बाद, इन खादों के इस्तेमाल के बाद उत्पादित वस्तुओं का भोजन करने से देश में बीमारियों का प्रतिशत कितना बढ़ा है, कौन-कौन से नये रोगों का सृजन इन रासायनिक खादों के इस्तेमाल के बाद हुआ है। यदि देश में इसका सर्वेक्षण हुआ हो तो कृषि मंत्री जी अपने जवाब के क्रम में बतायें। यदि नहीं हुआ है तो हम आपसे निवेदन करते हैं कि रासायनिक खादों के उत्पादन के बाद देश में कितने प्रकार की बीमारियां कितने प्रतिशत बढ़ी हैं, इसकी समीक्षा करके आप सदन और देश को बतायें।

इसी के साथ हम कहना चाहते हैं कि आप जैविक खादों के उत्पादन को प्रोत्साहन दीजिए। खास तौर से गांवों के किसान कल भी बहुत ज्यादा मवेशी पालते थे और मवेशीपालन से उन्हें दो तरह का लाभ होता था। मवेशियों का जो गोबर होता है, उसके ईंधन से गांवों के लोग खाना बनाने का काम करते हैं। आप उन्हें मवेशी पालने का प्रोत्साहन देते हैं और उन्हें सब्सिडी देते हैं तो इससे भी किसानों को दो-तीन तरह से लाभ होता है। पहला लाभ यह होता है कि मवेशी के गोबर से उत्पन्न खाद से खेतों में जो अन्न उत्पादित होगा वह स्वास्थ्य की द्ृष्टि से बहुत अच्छा होगा। देश में इससे बीमारियों का प्रतिशत घटेगा। दूसरा जब आप मवेशी पालेंगे तो उनसे जो दूध-दही का उत्पादन होगा, उससे भी कृषक परिवार को कुछ आमदनी होगी और साथ ही किसानों के परिवारों में खुशहाली लौटेगी।

सभापति महोदय, सरकार गैस पर सब्सिडी देती है। लेकिन आप देखें कितने प्रतिशत किसान गैस का उपयोग करते हैं। किसानों के द्वारा गैस का उपयोग नहीं होता है। हमारे हिसाब से पूरे देश में साढ़े चार प्रतिशत लोग आज गैस का उपयोग करते हैं। साढ़े चार प्रतिशत गैस का उपयोग भी फाइव स्टार होटलों तथा बड़े-बड़े लोगों के घरों में होता है तथा देहाती इलाकों में जिन लोगों के पास साधन हैं, जो लोग नौकरियां करते हैं, रोजगार करते हैं, जिला मुख्यालयों और प्रखंड मुख्यालयों में रहते हैं, उन लोगों को गैस पर सब्सिडी का लाभ मिलता है। अगर गांव में किसी किसान ने गैस का कनेक्शन लिया हुआ है तो वह छ: महीने में एक या दो सिलेन्डर लेता है और यदि कोई अतथि या रिश्तेदार उसके घर आयेगा तो वह उसे गैस पर चाय बनाकर पिलाता है। ऐसी स्थिति में आज भी गांवों के किसान जलावन की लकड़ी पर अपने घर का खाना पकाने का काम करते हैं। हम कृषि मंत्री जी से निवेदन करते हैं कि गांवों के किसान आज भी लकड़ी पर खाना बनाने का काम करते हैं। यदि किसानों के प्रति आपके मन में भी दर्द है तो आप गैस पर सब्सिडी खत्म कर दीजिए। इसके साथ ही गांवों में जो किसान पौधे लगाते हैं, उन्हें आप प्रोत्साहित कीजिए। प्रखंड स्तर पर सर्वेक्षण कराकर पौधे लगाने वाले किसानों को सब्सिडी दी जाए। इससे किसानों के घरों में खुशहाली लौटेगी तथा देश में जो क्लाइमेट चेंज हो रहा है, इसके कारण गांवों में पौधे लगाने से जो हरियाली आयेगी, उसके कारण क्लाइमेट में बदलाव भी समाप्त हो जायेगा तथा देश में ओरजिनल क्लाइमेट बना रहेगा। केरोसिन तेल पर आपने सब्सिडी दी है, इससे गरीबों को कुछ अंश में लाभ होता है। लेकिन जितना लाभ उन्हें होना चाहिए, उतना नहीं हो पाता है। सारा तेल कालाबाजार में बिकता है। रघुवंश बाबू का राज रहा है, उसी राज में हम भी रहते हैं। आप भी कितना प्रयास करते रहे हैं। कभी-कभी रघुवंश बाबू खुद भी सरकार के खिलाफ बोलते रहे हैं। लेकिन इनके बोलने पर कोई सुनता नहीं था।

कालाबाज़ारी बढ़ती जा रही है। आज डीज़ल का दाम बढ़ने की वजह से गांवों में किसान पंपिंग सैट कैरोसीन तेल से चला रहे हैं। इससे किसान पर दोहरी मार होती है। एक नुकसान यह होता है कि उसका इंजन खराब होता है और बार-बार उसको मरम्मत के लिए गैरेज में ले जाना पड़ता है। एक अलग आर्थिक परेशानी का सामना उसको करना पड़ता है। डीज़ल का दाम दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। कृषि मंत्री जब कैबिनेट में बैठते हैं तो किसानों की तरफ से उसमें एक सवाल खड़ा कीजिए कि किसानों के खेत के अनुसार उनके कार्ड बनवाए जाएं और उनको जो डीजल देते हैं, उसमें सबसिडी दी जाए। उनको कैरोसीन तेल के रेट पर डीजल दिलवाने का काम करें, तो उससे किसानों के घर में खुशहाली लौटेगी। आप किसानों को प्रोत्साहन दीजिए, यही हमारा आपसे निवेदन है।

किसानों का तीसरा कष्ट मैं आपको बताना चाहता हूं चूंकि आर्थिक अभाव में जब किसान अपनी खेती करता है तो बैंक से ऋण लेने के चक्कर में पड़ता है और ऋण लेने की क्या व्यवस्था है? प्रखंड स्तर से उसका रिकार्ड बनता है कि यह सीमांत किसान है, यह लघु किसान है। जिस समय वह सूची बनने लगती है, सच पूछिये तो ब्लाक के चक्कर लगाते-लगाते किसान के पैर फट जाते हैं। जब तक वह कुछ नकद-नारायण खर्च नहीं करता, तब तक उसका नाम सूची में नहीं जाता। उधर नकद-नारायण खर्च करने के बाद सूची में नाम चला गया तो कृषि के समय जब ऋण लेगा तो फिर उसको बैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं। प्रखंड और बैंक के चक्कर लगाने में किसान को जितना समय खेती के लिए देना चाहिए, वह नहीं दे पाता है। बिना पैसे लिए हुए बैंक वाले ऋण नहीं देते हैं। आप धरती से जुड़े हुए व्यक्ति हैं, सब कुछ जानते हैं। आप कोई ऐसी व्यवस्था कीजिए कि किसानों को जो ऋण मिले उस पर कमीशन न लगे।

सभापति महोदय : आप समाप्त कीजिए।

श्री प्रभुनाथ सिंह : हम समाप्त कर रहे हैं। हम आपकी परेशानी समझ रहे हैं। एक अंतिम बात कहकर मैं अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं। बिहार में जो किसान सूद पर ऋण लेते हैं और किसी कारण समय पर ऋण नहीं चुका पाते हैं तो उनके नाम वारंट इश्यू होते हैं। वे गिरफ्तार होते हैं और जेल जाते हैं। जब एक अपराधी जेल में जाता है तो उसके सोने का, भोजन का, रहने का, पाखाना करने का खर्च बिहार की सरकार देती है और जब एक किसान कर्ज नहीं चुकाने के कारण जेल में जाता है तो उनके सोने का, भोजन का खर्च मूलधन और सूदधन के साथ जोड़कर बिहार की सरकार किसान से वसूल करने का काम करती है। कितना बड़ा अन्याय हो रहा है एक बार हमने इसी सदन में सवाल उठाया था। पी.चिदंबरम जी अभी बैठे नहीं हैं। वित्त मंत्री जी ने उस समय कहा था कि हम बिहार की सरकार से स्थिति की जानकारी लेकर इसमें सुधार करने का काम करेंगे लेकिन आज तक उस पर कार्रवाई नहीं की गई। लोक सभा में जब मंत्री कोई बात कहते हैं, आश्वासन देते हैं तो देश की जनता और सदन में बैठे हुए लोग यह महसूस करते हैं कि अब इस पर कोई अमल होगा लेकिन वित्त मंत्री जी के आश्वासन के बावजूद बिहार के किसानों को अभी तक राहत नहीं दी गई और बिहार के किसान जब जेल जाते हैं तो उनके रहने और खाने का पैसा भी उनसे से वसूला जाता है। हम आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से निवेदन करना चाहेंगे कि इन तीन-चार सवालों को जो हमने उठाया है, इन्हें गंभीरता से देखते हुए अपने जवाब में देश के किसानों को संतुष्ट करने का काम करें। देश के किसान आप पर भरोसा किये हुए हैं, उम्मीद लगाए हुए हैं कि आप देश के किसानों के लिए कुछ करने का काम करेंगे।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Mr. Chairman, Sir thank you very much for giving me this opportunity to participate in the discussion on the Demands for Grants under the control of the Ministry of Agriculture.

Agriculture is the backbone of our rural livelihood’s security system. Two-thirds of our population depend on agriculture. Agriculture contributes 25 per cent of the GDP, 15 per cent of the total exports and provides employment to around 65 per cent of workforce. These are the factual figures.

The hon. Minister of Finance in his Budget speech of 2005-06 has acknowledged the necessity to give priority for agriculture. Two-thirds of population constitutes of farming community.

Now, I will come to the allocations in the Ninth Plan. I am not blaming this Government but successive Governments are talking very much about agriculture but doing very less about it.

For example, Sir, in the Ninth Plan, the outlay proposed for agriculture was Rs. 18,253.81 crore but the allocation was only Rs. 9,323 crore out of which the utilisation was only Rs. 7,673 crore. For the Tenth Plan the proposed outlay is Rs. 25,000 crore but the allocation made available by the Planning Commission is Rs. 13,300 crore.

The Central Plan outlays have been increasing very steeply as it is evident from the figures. In 2002-2003 the Central Plan outlay was Rs. 1,44,037 crore;, in 2003-2004 it was Rs. 1,47,000 crore; in 2004-2005 it was Rs. 1,67,000 crore; and in this year’s Budget the outlay has been Rs. 2,11,253 crore. But what exactly happened? In the Ministry of Agriculture, the allocation for the Department of Agriculture Research and Education has been coming down from 0.61 per cent in 2004-2005 to 0.54 per cent in the present Budget. Compared to last year, it has been scaled down by 0.5 per cent. Agriculture’s contribution to GDP is 22 per cent. But the allocation for the Department of Agriculture Research and Education has been very small – between 0.29 and 0.33 per cent of the total AGDB.

 

According to the statement of the hon. Minister of Finance and as per the UPA manifesto, the allocations are very meagre. By putting together these allocations, how can we achieve our target of four per cent envisaged for the Tenth Plan? I will now come to the GDP growth rate. Last year the growth rate of agriculture and allied sector was only 1.1 per cent and the overall GDP growth rate was 6.9 per cent. In the year 2003-2004 due to the favourable rainfall and good climate, a commendable growth rate of 9.6 per cent was achieved by agriculture and that is why we achieved an overall GDP growth rate of 8.5 per cent. There is a direct link between the GDP growth rate and that of agriculture. But how can we achieve the four per cent target in the Tenth Plan by allocating money in this way?

The Ministry of Agriculture proposes to the Planning Commission for allocation of money. The Planning Commission is under the control of the Minister of Finance. The Finance Minister has envisaged and acknowledged that agriculture should be given top priority. Then, why is it that the proposals of the Ministry of Agriculture are not accepted by the Planning Commission or the Finance Ministry? This is my question. How can we achieve four per cent growth rate in agriculture?

Sir, I have two-three other issues. One is the minimum support price. This is an alarming issue. There is no ground reality for fixing the minimum support price. Every year we are increasing it at the rate of ten rupees. This is a routine job. The farmers have no faith and belief in the minimum support price being given. This year, the Government of Andhra Pradesh has recommended a minimum support price for ‘A’ grade variety of paddy at Rs. 680. Last year it was Rs. 590. But, they have increased it to Rs. 600 this year, which is an increase of Rs. 10. This routine is going on for the last five years – increase by Rs. 10 per year etc. Where is the scientific method in this? I am asking this question to the Ministry of Agriculture through you. No farmer expects help from the price fixing mechanism. There is no scientific method to evolve the minimum support price.

Even for cotton, the farmers in Andhra Pradesh are not getting the minimum support price. This year the Government has not increased the minimum support price by even one rupee. Last year the minimum support price for common variety cotton was Rs. 760 and this year also it is Rs. 760. For the premium variety of cotton, the minimum support price last year was Rs. 1,960 and this year it has been increased to Rs. 1,980 – an increase of Rs. 20. Even now, in Andhra Pradesh the farmers are not getting the minimum support price for cotton. There is an alarming situation in Andhra Pradesh. Even for chillies there is no minimum support price.

Last year, the previous Government had intervened and purchased the chilies at the rate of Rs. 2,700 per quintal. This year, they are not getting Minimum Support Price. That is why, this is a mandatory obligation of the Government of India that at any cost, they have to purchase their produce. Otherwise, there is no meaning of MSP. The Agriculture Minister should evolve a comprehensive mechanism and create a separate fund for MSP. If there is no MSP, then the Government of India should intervene immediately in the markets and purchase their produce at Minimum Support Price.

The farmer wants good seeds. Even we have been trying to amend the present Seeds Act, 1966 for three years. There are so many proposals from the State Governments. Money is not involved. So, political parties are also co-operating for the amendment of this Act. For three years, I have been fighting on the floor of the House. So far the Government is not bringing a legislation to amend the Seeds Act. Now, the traders are supplying spurious seeds, but there is no mechanism to control spurious seeds. We have not imposed any penalty. That is why, farmers are not getting good seeds.

 

The next issue is of co-operative system. We have to revamp the co-operative system. The Government of India has to intervene. They have given money to the public sector banks, Regional Rural Banks and even UTI for cleansing of their balance-sheets. Why can it not be done in the case of co-operative institutions also? Forty per cent of the farmers are getting loans from the co-operative sector, but the co-operative sector is sick. So many committees were appointed and they have given their reports also. Now, they are consulting with the Chief Ministers. What is the Government telling?

MR. CHAIRMAN : You just mention your points.

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU : But ultimately, the farmers are not getting support from the co-operative banks. The Government should attend to this issue of co-operative system.

The National Crop Insurance Scheme is there, but in its present form, we are taking into account the larger areas and the farmers are not getting the benefit. That is why, we have to reduce it to panchayat level. That is the most important thing. Otherwise, there is no meaning of National Crop Insurance Policy. Even in the case of present Crop Insurance Policy, claims are not being settled very speedily and in the meanwhile, the farmers are committing suicides. Even when he is entitled to get money under Crop Insurance Scheme, it is taking six months, one year and even two years to settle claim. If any vehicle is damaged, the Motor Vehicle Inspector will go, the Insurance Officer will go and settle the claim immediately, but if the farmer has lost his crop, it will take six months or one year to settle the claim. In the meanwhile, the farmer will commit suicide. This is an alarming situation. So, the area under Crop Insurance Scheme should be reduced and brought to the level of panchayat and their claims should also be settled immediately.

We are providing crop insurance for small and marginal farmers who are getting loans from nationalised banks, private banks and other institutions. It should be extended to all small and marginal farmers and the premium should be paid by the Government of India and the State Government on 50:50 basis. Then only the crop insurance will be applicable to all the small and marginal farmers in this country.

In Andhra Pradesh, the farmers are committing suicides. This is an alarming situation.

MR. CHAIRMAN: You have already mentioned about it.

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU : Our Agriculture Minister is a dynamic Minister. The whole country knows it, everybody knows it. That is why, even in drought-prone areas, the small and marginal farmers will not be able to pay their loans at all. What is the Government doing? They are re-scheduling the loans. Every year, they are not getting the crops. How can they pay their earlier dues? That is why, in the drought-prone areas, for small and marginal farmers, I demand from the UPA Government total waiver of their loans. Then only, the small and marginal farmers will benefit. Then only, the farmers will be happy.

The Indian farmer is providing food for 100 crore people. There is no social status. There is no growth. There is no development. That is the position of the Indian farmer. So, we have to make them happy. So, as all other sectors are benefiting, the Indian farmer should also get benefit from this UPA Government. The Budget for Agriculture should also be increased like that of Defence. National security is of paramount importance and national food security is also equally important. How are we providing budget for Defence of Rs. 80,000 crore? We have to provide budget of Rs. 40,000 crore for Indian agricultural sector so as to enable it to compete in the world market. This is my humble request to this Government. The Minister should answer all these points.

* श्री सुरेश चन्देल (हमीरपुर, हि.प्र.) : महोदय, मैं कृषि मंत्रालय के वर्ष २००५-०६ के बजट पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए खड़ा हुआ हूं। सर्वप्रथम आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर प्रदान किया, उसके लिए मैं आपको कोटिश: धन्यवाद देता हूं।

कृषि प्रधान देश महोदय, हमारा देश कृषि प्रधान देश है। देश की ७० प्रतिशत से अधिक जनसंख्या आज भी खेती से सीधी जुड़ी हुई है। हमारे देश में कृषि के क्षेत्र में विगत ५० वर्षों में जो प्रगति हुई, वह संतोषजनक नहीं कही जा सकती। देश में कृषि जिन्सों का उत्पादन बढ़ाने हेतु जिस गति से सिंचाई के साधन बढ़ने चाहिए थे, जिस गति से खेती की नई तकनीक का प्रयोग करना चाहिए था, उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग कर, खेती की पैदावार बढ़नी चाहिए थी, उसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।

भारतीय किसानों की दुर्दशा महोदय, आजादी के बाद से ही कृषि आवश्यकताओं की सुनियोजित, ठोस और ढांचागत उपेक्षा के कारण आज भारतीय किसानों की दुर्दशा है। एन.डी.ए. सरकार ने इस स्थिति को बदलने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए, जिनके कुछ परिणाम निकले। हालांकि पांच दशकों की उपेक्षा और एक के बाद एक कांग्रेस सरकारों द्वारा इसे प्राथमिकता न देने से उत्पन्न असमर्थता जनित समस्याओं को छ: वर्ष के एन.डी.ए. शासन के दौरान पूरी तरह से समाप्त करना भी संभव नहीं था। नतीजा यह हुआ कि अनेक समस्याएं अनसुलझी रह गईं।

वैश्वीकरण में भारतीय कृषकों का खड़े हो पाना असंभव महोदय, कृषि अर्थव्यवस्था के वाणिज्यीकरण, उदारीकरण, बाजारीकरण, सार्वभौमीकरण और वैश्वीकरण के कारण अनेक नई समस्याएं खड़ी हो गई हैं जिनके कारण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर असमान और असंतुलित वैश्विक बाजार व्यवस्था की प्रतियोगिता में खड़े हो पाना उसके लिए असंभव है।

भारतीय किसानों की दयनीय आर्थिक स्थित महोदय, अधिकांश भारतीय किसानों की दयनीय आर्थिक स्थिति का प्रमुख कारण अत्यधिक जनसंख्या का अभी भी कृषि पर निर्भर रहना और देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी निरन्तर घटने के बीच तारतम्य न बैठना है। हमारी जनसंख्या का ६९ प्रतिशत भाग अभी भी कृषि पर निर्भर है और ७० प्रतिशत कृषक गांवों में रहते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का ६९ प्रतिशत हिस्सा था, जो सन् २००१ में घटकर २४ प्रतिशत रह गया। आधारभूत सुविधाओं का अभाव, *Laid on the table.

साथ ही रोजगार के अवसरों और आय वृद्धि के अवसरों में वर्षों से चली आ रही कमी के चलते ग्रामीणों और कृषि पर निर्भर लोगों को गांवों से शहरी क्षेत्रों में पलायन को बाध्य होना पड़ता है। इससे शहरी भारत में जीनव स्तर की स्थिति में तेजी से गिरावट आई है इसे प्रत्येक भारतीय शहर और कस्बे में स्लम क्षेत्रों में वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है।

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना आवश्यक महोदय, भारत के त्वरित, सर्वान्गीण विकास और पर्यावरणीय टिकाऊ सामाजिक-आर्थिक विकास की नीति तभी सफल हो सकती है जब कृषि और कृषि-केन्द्रित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त, किसानों, खेतिहर मजदूरों और हमारी ग्रामीण जनसंख्या के अन्य वर्गों की क्रय शक्ति को ठोस रूप में बढ़ाने, रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण भारत में रहने योग्य स्थितियों में सुधार लाया जाए।

कृषि के संकट से प्रभावी ढंग से निपटने हेतु दीर्घकालिक उपाय करना आवश्यक महोदय, भारतीय कृषि के संकट से प्रभावी ढंग से निपटने हेतु दीर्घकालिक और अल्पकालिक कदम उठाने की जरूरत है। बिजली, सड़क, पानी के प्रावधानों के अतरिक्त ठोस आधारों पर कृषि का पुनर्जीवन मुख्य रूप से पांच जरूरतों पर टिका है-(१)सस्ता ऋण, (२) समुचित एवं सक्षम बाजार व्यवस्था, (३)विज्ञान व तकनीकी निवेश, (४)आसपास के गांवों में मूल्य प्रभावी उद्यमों का होना तथा (५)मानव संसाधन विकास।

एन.डी.ए. सरकार द्वारा किसान हित में उठाए गए कदम -

(१) देश की नदियों को जोड़ना-महोदय, देश के अनेक हिस्सों में बाढ़ और सूखे की बार-बार पैदा होने वाली समस्या से निपटने के उद्देश्य से नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना एन.डी.ए. सरकार ने शुरू करने का निश्चय किया और इस उद्देश्य से गठित टास्क फोर्स ने प्रारम्भ में कुछ योजनाओं को शुरू करने का ब्ल्यू प्रिंट भी तैयार किया था। यह अत्यन्त खेद की बात है कि लोगों को विश्वास में लिए बगैर यू.पी.ए. सरकार ने इस योजना को समाप्त-प्राय कर दिया है।

(२) प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना- ५० वर्ष के कांग्रेस के शासन के बावजूद देश के लगभग १ लाख ८६ हजार गांव जोकि देश के कुल गावों का करीब एक-तिहाई बनते हैं- बारहमासी तथा अच्छी सड़कों से वंचित थे। एक नई और क्रींतिकारी पहल करते हुए राजग सरकार ने ६० हजार करोड़ रुपए वाली प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना प्रारम्भ की जिसके तहत सन् २००७ तक सार्वजनिक ग्रामीण सड़क सम्पर्क स्थापित किया जाना है। तीन वर्ष से कम समय के भीतर ही प्रदेशों को १३ हजार करोड़ रुपए दिए गए तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ३० हजार गांवों को जोड़ा गया, लेकिन चिन्ता की बात है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार ने कमोबेश इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

(३) फसल बीमा योजना- एन.डी.ए. सरकार ने फसल बीमा योजना का दायरा और विस्तृत किया। इसके साथ ही एन.डी.ए. सरकार ने अंतिम वर्षों में एक और नई पहल शुरू की और वह थी कृषि आमदनी बीमा योजना। कृषि आमदनी बीमा योजना का उद्देश्य किसान को उसके खेत की एक निश्चित आमदनी की गारंटी सुनिश्चित करना था जो उसकी पिछले सात वर्षों की औसत आय पर आधारित होगी। छोटे और मंझोले किसानों के लिए इसे और आकर्षक बनाने के लिए केन्द्र सरकार ने इसके प्रीमियम का ७५ प्रतिशत योगदान देने का फैसला किया था। इस अभिनव योजना के लागू हो जाने के बाद ७० प्रतिशत किसानों की क्रय क्षमता बढ़ना सुनिश्चित था। राष्ट्रीय कार्यकारिणी इस योजना के शीघ्रातिशीघ्र क्रियान्वयन की मांग करती है। इस योजना के क्रियान्वयन में पहले ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधा न हो तथा प्राय़: अकाल और बाढ़ के संकट से किसानों की दुर्दशा होती हो, लेकिन दुर्भाग्यवश कांग्रेस शासन काल में यह योजना दम तोड़त नजर आ रही है।

किसानों द्वारा आत्महत्या किया जाना महोदय, कांग्रेस शासन के गत वर्ष के अंतिम छ: महीनों में किसानों द्वारा आत्महत्याएं करने के आंध्राप्रदेश में १८६०, केरल में ४१९, करन्टाक में ४६७ और महाराष्ट्र में ३५० मामले प्रकाश में अए। अन्नदाता किसान को अपनी मुसीबतों से छुटकारे के लिए सिर्फ अत्महत्या का ही रास्ता नजर आए, तो इससे बढ़कर राष्ट्रीय शर्म की बात और कुछ नहीं हो सकती। केन्द्र और राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकारों के अन्तर्गत किसानों की बदतर स्थिति से मुझे बहुत वेदना है। मैं मांग करता हूं कि मृतकों के परिवारों के लिए एक सामाजिक-आर्थिक राहत पैकेज जिसमें रोजगार और शिक्षा लाभों का प्रावधान हो तुरन्त घोषित किया जाए।

कृषि में काम आने वाला सामान की ऊंची कीमतें महोदय, डीजल, उर्वरक, कीटनाशक और अन्य सभी कृषि लागत दामों में लगातार हो रही वृद्धि से भारतीय किसानों को सीधी चोट पहुंच रही है। उधर अनेक कृषि उत्पादों के मूल्य सरकार की गलत नीतियों से या तो पहले वाले ही हैं या फिर मुद्रास्फीति में वृद्धि के चलते वास्तविक रूप से कम हो गए हैं। उदाहरण के लिए हमारे यहां पैदा होने वाले सोया के दाम आयात शुल्क में कमी से गिर गए।

दूसरी हरित क्रांति का समय महोदय, भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समग्र रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से दूसरी हरित क्रांति शुरू करने का समय आ गया है। यह किसानों की आय को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी। इसका दायरा १९६० के दशक में हुई पहली क्रांति से कहीं ज्यादा व्यापक होगा। पहला, इसका उद्देश्य प्रति एकड़ उपज बढ़ाने पर अवश्य होना चाहिए जो कि अनेक अन्य देशों की तुला में काफी कम है। यह विशेष रूप से इसलिए बी महत्वपूर्ण है कि हमारे यहां जोत की भूमि का आधार घट रहा है और अधिकांश किसानों के लिए कृषि अलाभप्रद बन रही है। कृषि सेवाओं का विस्तार और बायो-तकनीक के उपयोग के साथ-साथ प्रयोगशाला से भूमि के बीच के अन्तर को कम करना-कृषि उत्पादकता बढ़ाने के मुख्य लक्ष्य होने चाहिए। फसलों का बहु-फसलीकरण, खाद्यान्न से दालों, खाद्य तेल (जिसकी कमी के कारण भारत को दूसरे देशों से १२५०० करोड़ मूल्य का खाद्य तेल आयात करना पड़ा) हार्टीकल्चर, फ्लोरीकल्चर और औषधीय वनस्तपित को प्राथमिकता देनी चाहिए।

कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक एवं निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता महोदय, मेरा सुझाव है कि कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाते हुए कृषि अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेश को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। दूसरी हरित क्रांति का एक वृहद् उद्देश्य प्रत्येक किसान परिवार को कृषि के अलावा दूसरे रुाोत से आय की सुनिश्चितता होनी चाहिए जो कि स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी हों। यह लक्ष्य अन्य बातों के साथ-साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे उद्योगों को बढ़ावा देने से भी हासिल हो सकता है जो परम्परागत रूप से भारतीय कृषि का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। इसमें लाखों नए रोजगार के अवसर और छोटे किसानों की आय में वृद्धि के अवसरों को बढ़ावा देने की क्षमता है।

गोवध पर प्रतिबन्ध लगाना अनिवार्य महोदय, मैं मांग करता हूं कि गोवध पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए कानून अविलम्ब पारित किया जाए। एन.डी.ए. सरकार के समय कृषि मंत्रालय ने गोवध पर प्रतिबन्ध लगाने संबंधी विधेयक तैयार किया था, परन्तु कांग्रेस पार्टी, कम्युनिस्टों और कुछ अन्य दलों के विरोध के चलते वह पारित नहीं हो सका।

WTO और UPA सरकार किसानों के हितों को बेच रही है महोदय, डब्ल्यू.टी.ओ. तथा यू.पी.ए. भारतीय किसानों के हितों को बेच रही है। विश्व व्यापार संगठन के तहत कृषि में अन्तरराष्ट्रीय व्यापार एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। इसने एक साथ चुनौतियों और अवसरों के द्वारा खोल दिए हैं। भारत को अपने विकल्पों पर सावधानी पूर्वक विचार करने की जरूरत है क्योंकि विश्व व्यापारक संगठन के अन्तर्गत व्यापार उपबंधों से कृषि व्यापार उदारीकरण के असर को अनिश्चितकाल के लिए टालना अत्यन्त मुश्किल होगा। भारत के लिए प्रमुख चिन्ता राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और साढ़े १२ करोड़ किसानों की जीविका की रक्षा करना है। वाजपेयी सरकार ने विश्व व्यापार किसानों के साथ-साथ अन्य विकासशील देशों के किसानों के हितों की भी रक्षा की थी। हमारी सरकार ने यूरोपीय संघ और अमेरिका द्वारा प्रस्तावित भारी सब्सिडी से उत्पन्न वैश्विक कृषि उत्पाद व्यापार के असंतुलन के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाई। भारत ने उदार तथा पूर्णतया न्यायोचित कृषि सब्सिडी को समाप्त करने के बलात प्रयासों का मुखर विरोध किया। उपर्युक्त के ठीक उल्टे, यू.पी.ए. सरकार ने कृषि व्यापार उदारीकरण पर विश्व व्यापार में वार्ताओं में घुटने टेकने और समझौता करने का रास्ता अपनाया है। मैं गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा को किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय समझौते की एक अविभाज्य शर्त मानता हूं।

हिमाचल प्रदेश में कृषि की दुर्दशा महोदय, हिमाचल प्रदेश, पहाड़ी, पिछड़ा, सीमावर्ती एवं दूरदराज का प्रदेश है। इस प्रदेश का एक भाग (जिला ऊना) जहां मई एवं जून की गर्मी में लू एवं तेज धूप से तपता है, वहीं दूसरा भाग (जिला लाहौल-स्पीति) बर्फ से ढका रहता है। प्रदेश की भौगोलिक एवं मौसम संबंधी परिस्थितियों में विशाल अन्तर है। यहां उद्योग नहीं के बराबर हैं। प्रदेश में केवल एक रेल लाइन है जो अंग्रेजों ने बनाई। उसके बाद से रेलों का विकास नगण्य रहा है। प्रदेश में औद्योगिक एवं वाणिज्यिक गतवधियां शून्य हैं। उपभोग का जितना भी सामान है, वह मैदानी भागों से ही आता है।

महोदय, हिमाचल प्रदेश के उत्तर में जम्मू-कश्मीर है। उत्तर-पूर्व में तिब्बत है। पूर्व एवं दक्षिण पूर्व में उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा तथा दक्षिण में पंजाब की सीमाएं लगती हैं। हिमाचल प्रदेश का अधिकांश भाग पहाड़ी होने के कारण कृषि छोटी-छोटी जोतों में बंटी है तथा खेत सीढ़ीनुमा होते हैं। वहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण खाद्यान्न की आपूर्ति मैदानी भागों से मंगाकर की जाती है। यदि हिमाचल प्रदेश में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो जाए और स्वां नदी का चैनेलाइजेशन कर दिया जाए, तो हिमाचल प्रदेश अन्न के मामले में न केवल आत्म निर्भर हो सकता है, अपितु पड़ौसी राज्यों की भी अन्न की मांग को पूर्ण कर सकता है।

हि.प्र. में अपेक्षाकृत ठंडा वातावरण होने के कारण वहां उत्तम क्वालिटी के देशी और विदेशी फूलों की खेती, आयुर्वेदिक दवाओं की खेती, उच्च कोटि के फलों की खेती बड़े पैमाने पर की जा सकती है, लेकिन केन्द्र एवं प्रदेश की कांग्रेस पार्टी की सरकारें होने के कारण हि.प्र. की उपेक्षा एवं उदासीन रवैया होने के कारण फ्लोरीकल्चर, हॉर्टीकल्चर, एग्रीकल्चर एवं हर्बल उत्पादन में बहुत पीछे रह गया है।

महोदय, मैं मांग करता हूं कि हिमाचल प्रदेश में उन्नत किस्म के बीजों और नई विकसित तकनीक से खेती कराने की नितान्त आवश्यकता है। हिमाचल प्रदेश के मेरे जिले बिलासपुर में मत्स्य पालन को यदि बढ़ावा दिया जाए, तो बहुत उच्च कोटि की मछलियां का उत्पादन व्यापारिक स्तर पर किया जा सकता है, लेकिन इस दिशा में भी कोई विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में पशुपालन का बहुत स्कोप है, लेकिन पशुपालन को बढ़ावा देने के क्षेत्र में भी भारत सरकार और प्रदेश सरकार की उदासीनता के कारण कोई प्रगति नहीं हो पा रही है।

हिमाचल प्रदेश में पशुपालन को बढ़ावा देने हेतु उन्नत कोटि के सीमन के बैंक जगह-जगह खोले जाएं जहां कृत्रिम गर्भाधान की भी व्यवस्था हो, ग्राम पंचायत स्तर पर पशु औषधालय तथा खंड स्तर पर पशु चकित्सालयों का जाल बिछाया जाए। जिला बिलासपुर में कृषि विज्ञान केन्द्र की स्थापना की जाए और वहां किए जाने अनुसंधानों की जानकारी स्थानीय कृषकों को सुलभ कराई जाए।

प्रमुख मांगें महोदय, चूंकि समय कम है इसलिए मैं विस्तार में न जाते हुए भारत सरकार के कृषि मंत्री महोदय को निम्नलखित सुझाव देते हुए मांग करता हूं कि -

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा समय-समय पर विकसित नई तकनीकों और विधाओं को किसानों तक पहुंचाने के लिए एक्सटेंशन सेवाओं को प्रभावी बनाया जाए, ताकि इसका अधिकतम लाभ किसानों को मिल सके।

भारत खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) का पूरी तरह से पुनर्गठन इस ढंग से करना चाहिए कि सरकार पर सब्सिडी का बोझा कम हो, मगर खाद्य सुरक्षा पर इसका कोई असर न पड़े।

एन.डी.ए. सरकार द्वारा कृषि भूमि की लीजिंग को वैधानिकता प्रदान करने संबंधी जो मॉडल एक्ट बनाया गया था, उसे शीघ्रता से लागू किया जाए, ताकि किसान अपनी ही भूमि से बेदखल होने से बच सकें।

सरकार द्वारा संचालित संबंधित विस्तारण सेवाएं अधिकांश राज्यों में समाप्त हो गई हैं, इसलिए कुशल, आधुनिक और किसानों के अनुकूल सेवाएं प्रदान करने हेतु सरकारी और निजी क्षेत्र की कम्पनियों को प्रोत्साहित किया जाए।

जैविक खेती को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित करना चाहिए। जिला स्तर पर जैविक खाद्य के मानकीकरण और मार्केटिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

एन.डी.ए. सरकार द्वारा स्थापित नेशनल मिशन फॉर डैवलपमेंट ऑफ बैम्बू और नेशनल मैडीशनल प्लांट्स बोर्ड को मजबूत समर्थन देकर व्यापक स्तर पर निजी निवेश को आकर्षित करने पर ध्यान देना चाहिए।

समुद्र में और देश के भीतर मत्स्यपालन के विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक फिशरीज और एक्वाकल्चर संबंधी राष्ट्रीय आयोग बनाया जाना चाहिए।

देश के मछुआरों को उनकी नौकाओं के आधुनिकीकरण, प्रशीतन गृहों तथा प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना के लिए सहकारी समतियां होनी चाहिए तथा घरेलू एवं विदेशी बाजारों में सीधा सम्पर्क हो, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।

देश में एक राष्ट्रीय फिशरीज विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए।

केन्द्र सरकार की ओर से राज्य सरकारों को पर्याप्त बजटीय सहायता से एक राष्ट्रीय पशु पालन विकास बोर्ड गठित करना चाहिए।

डेयरी और मुर्गीपालन उद्योग जो खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की भांति रोजगार प्रदान करने वाला है, उन्हें भी ऋण तथा अन्य लाभों के संदर्भ में कृषि के बराबर माना जाना चाहिए।

सरकार फॉसिल ईंधन और कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता घटाए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यापक संसाधन लगाए, जिससे किसानों की आय में बढ़ोत्तरी हो सके। इस उद्देशय से एक समग्र, ठोस एवं स्थायी राष्ट्रीय बायो-एनर्जी नीति की घोषणा की जाए।

पेट्रोल में इथानॉल का अनिवार्य प्रयोग वर्तमान के पांच प्रतिशत से बढ़ाकर अगले दो-तीन वर्षों में १० प्रतिशत किया जाए क्योंकि इथानॉल के मूल्य आयातित कच्चे मूल्य के समान हैं। जट्रोफा, करंजा और बायो-डीजल उत्पादित करने वाले अन्य वानस्पतिक फसलों को, निकटवर्ती ग्रामीण केन्द्रों में बिक्री के पर्याप्त प्रबंधों और प्रोसैसिंग के साथ, व्यापक स्तर पर लोकप्रिय बनाना चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों में बीज के दामों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है जो किसानों के कर्जार बनने का एक प्रमुख कारण भी है। बीजों के दाम घटाने हेतु बीज उत्पादन के लिए सरकार के स्वामित्व वाली परती भूमि को कृषक सरकारी संस्थाओं तथा किसान उद्यमियों को दिए जाने पर विचार किया जाए और उन्हें इस पर बीज फार्म स्थापित करने हेतु अन्य प्रोत्साहन दिए जाएं। एन.डी.ए. सरकार द्वारा बनाए गए सीड्स एक्ट को तेजी से लागू किया जाना चाहिए। नकली बीज, खाद और कीटनाशक दवाएं बेचने वालों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।

देश में वभिन्न स्थानों पर खाद्यान्न बैंक, गोदाम, शीतभंडार और चारा बैंक गठित किए जाएं ताकि किसान उनमें अपने उत्पाद रखें तथा उन्हें वेयर हाउस रसीद की योजना के साथ-साथ बैंक ऋण लेने की सुविधा मुहैया कराई जाए।

कृषि उपकरण ट्रैक्टर आदि खरीदने संबंधी ऋण पर अचल सम्पत्ति को गिरवी नहीं रखना चाहिए। सरकार को कम लागत और उच्च श्रेणी के कृषि सामान के उत्पादन पर आकर्षक कर राहत घोषित करनी चाहिए।

वाणिज्यिक और सहकारी बैंकों द्वारा किसानों को ऋण देने की प्रक्रिया उतनी ही सरल और आसान बनाई जाए जितनी कि निजी बैंकों द्वारा वाहन और घर खरीदने पर ऋण देने की रहती है।

सहकारी बैंकों की बिगड़ी हुई हालत को सुधारने के लिए तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा करते समय उनकी स्वायत्तता की आश्वस्ति देना जरूरी है। इस संबंध में एन.डी.ए. सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों जैसे कि १५ हजार करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता को शीघ्र लागू किया जाए। इसके अलावा उनका शीघ्र पुनर्निवेशन करने के साथ, पुनर्वित्त के नियमों, उत्तरदायित्वों और पूंजी पर्याप्तता को वाणिज्यिक बैंकों के समान लाया जाए।

राज्य सरकारों को एग्रीकल्चरल प्रोडयूस मार्केटिंग कोआपरेटिव एक्ट में संशोधन करने और मंडी टैक्स पर एक वर्ष के भीतर प्रतिबंध लगाने हेतु न केवल तैयार किया जाए अपितु प्रोत्साहित भी किया जाए, ताकि प्रतियोगी और सक्षम कृषि बाजारों के उभार को बढ़ावा दिया जाए सके।

महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के काम में तेजी लाई जाए। राज्य सरकारों को दिए जाने वाले केन्द्रीय कोष में न तो कोई विलम्ब हो और न ही कोई भेदभाव किया जाए।

एन.डी.ए. सरकार द्वारा कृषि और ग्रामीण विकास के लिए ७५ हजार करोड़ रुपए की लागत से बनाए गए जय प्रकाश नारायण कोष को तुरन्त शुरू किया जाए।

आगामी १० वर्षों में सिंचित भूमि का प्रतिशत ५० प्रतिशत तक विस्तारित करने के लिए शीघ्र कदम उठाए जाने चाहिए।

नदियों को जोड़ने की परियोजना के क्रियान्वयन को पर्याप्त महत्व के साथ शुरू करना चाहिए।

काफी समय से लम्बित सिंचाई परियोजनाओं को एक निश्चित समय सीमा में पूरा करना चाहिए।

छोटी सिचांई योजनाओं को तेजी से फैलाने के लिए वित्तीय और अन्य प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए और कम लागत वाली माइक्रो सिंचाई प्रणाली को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

प्रत्येक बूंद से ज्यादा फसल के दर्शन से निर्देशित होकर जल के कुशल उपयोग हेतु जल उपयोगकर्ता एसोसिएशन बनाना अनिवार्य किया जाए।

कृषि ऋण पर ब्याज दर ६ प्रतिशत करनी चाहिए जो कि नाबार्ड द्वारा राज्यों के सरकारी बैंकों को दिए जाने वाले ऋण के प्राय:समान है।

कृषि में सरकारी-निजी निवेश अभी सकल घरेलू उत्पाद का १.३ प्रतिशत है जो अगले पांच वर्षों में दोगुना होना चाहिए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि, सिचांई कृषि, अनुसंधान एवं विकास और ग्रामीण संरचना विकास में निजी निवेश पर लगी सभी पाबंदियां समाप्त करनी चाहिए। सरकारी निजी भागीदारी को भरपूर प्रोत्साहित करना चाहिए।

सरकार कृषि के मामले में अपना लापरवाह रुख त्यागे और उच्चाधिकार प्राप्त राष्ट्रीय अध्ययन दल गठित करे जो किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की दुर्भाग्यपूर्ण तथा दुखद प्रवृत्ति का समग्र परीक्षण करे तथा उसकी सिफारिशों को समयबद्ध ढंग से लागू किया जाए।

आन्तरिक व्यापार में सुधार, विशेष रूप से कृषि वस्तुओं में तेजी से अवश्य लागू होना चाहिए। भारतीय किसान सभी तरह के पुरातन और अनावश्यक नियंत्रओं तथा प्रतिबंधों से मुक्त होने चाहिए। साथ ही कृषि और उद्योग के बीच की वस्तुओं की अन्तर्राज्यीय आवाजाही पर शेष बचे सभी प्रतिबन्ध दूर किए जाने चाहिए। आवश्यक वस्तु अधनियम में एक आपात्कालीन प्रावधान भी जोड़ा जाना चाहिए जिसके तहत विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए राज्य सरकार किसी वशिष्ट वस्तु के अभाव से निजात पाने के लिए सीमित समयावधि हेतु केन्द्र सरकार की अनुमति से उसका प्रयोग कर सके।

महोदय, अन्त में, मैं कृषि मंत्रालय की अनुदान मांगों और बजट का विरोध करते हुए अपना स्थान ग्रहण करता हूं।

 

MR. CHAIRMAN: Thank you. I am told that a decision was taken that the hon. Minister for Agriculture is to reply to this debate at 1530 hours, and it is 1530 hours. So, I would now call the hon. Minister for Agriculture to reply to the debate.

… (Interruptions)

SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Sir, you should also allow us to speak. … (Interruptions) I would like to ask some clarifications before the hon. Minister replies to the debate. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: If the hon. Members are willing to lay their speeches, then they can lay their speeches on the Table of the House. I am saying this because a decision was taken that the hon. Minister for Agriculture will reply to the debate at 1530 hours.

… (Interruptions)

SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, I would like to ask a few clarifications. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Hon. Members can lay their speeches on the Table of the House, and it will be treated as part of the proceedings.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I can give five minutes each to the speaker who are left provided the hon. Minister for Agriculture is willing to accept this suggestion.

… (Interruptions)

THE MINISTER OF AGRICULTURE AND MINISTER OF CONSUMER AFFAIRS, FOOD AND PUBLIC DISTRIBUTION (SHRI SHARAD PAWAR): It is fine with me.

MR. CHAIRMAN: Shri Suresh Chandel, have you laid your speech on the Table of the House?

SHRI SURESH CHANDEL: Yes, Sir. I have just laid it on the Table of the House.

MR. CHAIRMAN: All right, thank you. Shri Bir Singh Mahato.

… (Interruptions)

श्री इलियास आज़मी (शाहाबाद) : सभापति महोदय, एक-एक पार्टी से दस-दस माननीय सदस्य बोले हैं। राजाराम पाल जी का नाम लिस्ट में है, इसलिए इन्हें भी इनकी पार्टी की तरफ से बुलाइए।

सभापति महोदय : अगर इनका नाम लिस्ट में है तो जब इनकी टर्न आएगी, इन्हें जरूर टाइम मिलेगा।

…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन: सभापति महोदय, जो बोलना चाहते हैं, उनका भाषण ले लीजिए और उसे प्रोसिडिंग में शामिल कर लीजिए।

MR. CHAIRMAN: I have already announced this in the House.

… (Interruptions)

SHRI BIR SINGH MAHATO (PURULIA): Mr. Chairman Sir, the Demands for Grants for the Ministry of Agriculture is perceived to be rural oriented and farmer friendly. Therefore, I rise to support the Demands for Grants. … (Interruptions)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF DEFENCE AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI BIJOY HANDIQUE): Sir, the hon. Minister of Railways is to make a statement, but he will have to wait till the reply of the hon. Minister for Agriculture is over. … (Interruptions) The hon. Minister for Railways can make his statement after the reply of the hon. Minister for Agriculture is over.

MR. CHAIRMAN: If the House agrees, then the hon. Railway Minister may make his statement after the reply of the hon. Minister for Agriculture has concluded.

SHRI BIJOY HANDIQUE: I am suggesting this because the discussion should not be interrupted.

MR. CHAIRMAN: The hon. Railway Minister will make his statement on the floor of the House after the reply of the hon. Minister for Agriculture is over.

… (Interruptions)

SHRI BIJOY HANDIQUE: It will not take much time. He has to give the reply also.

MR. CHAIRMAN: Okay.

SHRI BIR SINGH MAHATO: Sir, the Demands for Grants for 2005-2006, which has been proposed, has a hefty hike of Rs. 1,625 crore in the Central Plan outlay for agriculture and its allied activities. The Demands for Grants focuses on increasing the flow of credit, expanding irrigation facilities including macro-irrigation, and diversification in agricultural sector.

A special financial package for tax rebate has been announced for the rehabilitation of the sugar industry. I would request the hon. Minister that such type of special packages should also be introduced in the jute industry and tea industry.

The announcement regarding the creation of the National Fund for Strategic Agricultural Research, with an initial provision of Rs. 50 crore for encouraging the research work and related activities, is a welcome step. The creation of the National Horticulture Mission, which was announced in the last year’s Budget and which has been launched from this year, that is, from April 2005, is also a welcome step in this direction.

The Budget has fixed a target of extending assured irrigation to 10 million hectares under the ‘Bharat Nirman’ scheme, and the Budget also talks about covering 3 million hectares under the micro-irrigation system like the drip and sprinkler irrigation, etc. It is also a very useful measure for the farmers.

Hundreds of Krishi Vigyan Kendras across the country are being funded by ICAR and are also supported by the World Bank for the development of agriculture. However, these Krishi Vigyan Kendras should be restructured for taking better care of the needs of the rural poor by installing modern infrastructure and communication technology (ICT) as it would be very helpful to the farmers.

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) : माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे २००५-२००६ की कृषि मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदानों की मांगों पर चर्चा में भाग लेने का मौका दिया और मात्र दो मिनट का समय दिया, उतना समय तो केवल सम्बोधन में ही लग जायेगा, उतने समय में हम क्या बोल पाएंगे?

कुछ मुख्य बातें मैं माननीय कृषि मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करते हुए कहना चाहूंगा कि भारतवर्ष कृषि प्रधान देश है और पूरे भारत में ७० प्रतिशत जनता आज भी कृषि पर निर्भर है। आज सदन में बैठे हुए सभी सम्मानित सदस्यों को यह सोचना पड़ेगा कि किसानों की हालत को हम कैसे सुधारें। जहां एक ओर हम देख रहे हैं कि देश में बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है, उससे पूरा देश और सभी पार्टी के लोग कह रहे हैं। सभी सदस्य कहीं न कहीं अपने वक्तव्य देते हैं, अपनी बातों को रखते हैं। आज मैं कहना चाहूंगा कि किसानों को अगर सुविधाएं दी जायें तो मेरे ख्याल से बेरोजगारी की समस्या भी दूर होगी और रोजगार भी बढ़ेगा। इससे रोजगार को भी हम बढ़ावा दे सकते हैं। जहां तक किसानों की समस्या है, आज किसान कभी सूखे और कभी बाढ़ की स्थिति से जूझता है। समय-समय पर आपने देखा होगा कि सूखा पड़ता है। आज जल-स्तर इतना नीचा हुआ है कि नहरों में पानी नहीं है, लिफ्ट योजनाएं बिल्कुल बन्द पड़ी हुई हैं, नदियों में भी पानी नहीं है। इस ओर भी हमें विशेष ध्यान देना होगा कि जहां अनुपलब्धता अधिक है, वहां पर किसी प्रकार से हम सिंचाई के साधन मुहैया करायें और साथ ही साथ जगह-जगह पर किस प्रकार से पानी को रोककर हम किसानों को दें।

दूसरी बात, जहां तक बिजली की बात है, बिजली का उत्पादन करके भी हमें किसानों को देना पड़ेगा। आज हमारी सरकार किसानों के हित की सरकार है। उत्तर प्रदेश में माननीय मुलायम सिंह जी यादव ने किसानों के हित की तमाम योजनाएं लागू की हैं। केन्द्र सरकार में बहुत सी योजनाएं आपके कृषि विभाग से सम्बन्धित विभाग में लम्बित पड़ी हुई हैं। मैं कृषि मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि उन योजनाओं को प्राथमिकता देकर उन योजनाओं को लागू करें ताकि उत्तर प्रदेश में जो किसान बाहुल्य क्षेत्र है, जहां आज किसान समस्याओं से जूझ रहा है, जिसे अपने उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है, वहां किसानों की माली हालत ठीक हो। अगर उत्तर प्रदेश का विकास होगा तो मेरे ख्याल से पूरे देश का विकास होगा।

इसके साथ ही साथ मैं कहना चाहूंगा, माननीय कृषि मंत्री जी मैं अपने क्षेत्र की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि मेरा क्षेत्र गंगा यमुना के बीच में बसा हुआ दोआबा क्षेत्र है, आज भी वह सिंचाई से बहुत ही महरूम है। हम वंचित हैं, चाहे पेयजल हो, चाहे सिंचाई हो। अगर वहां पर सिंचाई के साधन मुहैया हो जायें तो मेरे ख्याल से किसान की बहुत बड़ी समस्या दूर होगी और रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा।

जहां तक किसानों के ऋण की बात है, ऋण की अदायगी न कर पाने के कारण आज हम देखते हैं…( व्यवधान) संग्रह अमीन व तहसीलदार जाता है, वह किसानों का बहुत उत्पीड़न करता है। उसे कम से कम थोड़ी सी तो आपको छूट देनी चाहिए और समय भी बढ़ाना चाहिए कि अगर किसान एकमुश्त या एकबारगी ऋण की अदायगी नहीं कर रहा है तो उसे कुछ न कुछ छूट देनी चाहिए और समय भी देना चाहिए ताकि वह ऋण की अदायगी आसानी से कर सकें और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। यही कारण है कि किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है। इस ओर भी हमें बड़ी गम्भीरता से सोचना पड़ेगा। दूसरी बात, भूमि सुधार और भूमि संरक्षण का एक विभाग है, जहां पर ऊसर भूमि है या ऊबड़-खाबड़ भूमि है, उसके सुधार के लिए भूमि संरक्षण विभाग है। इस विभाग का कुछ पता नहीं है, जबकि करोड़ों रुपया इसमें जाता है। आज तमाम ऐसी ऊसर जमीन और ऊबड़-खाबड़ जमीन पड़ी है, जिसका सुधार नहीं हो पा रहा है। इस ओर भी हमें गम्भीरता से देखना पड़ेगा। मैं तो चाहूंगा कि जिले में जनप्रतनधियों की एक कमेटी बना दी जाये ताकि उस माध्यम से देखे कि कहां पर बहुत सी ऐसी जमीनें फालतू पड़ी हैं, जिसे हम कृषि योग्य बना सकते हैं । उस भूमि को हम कृषि योग्य बना कर किसानों में वितरित कर दें ताकि किसानों की समस्या हल हो सके । आज चिंता का विषय यह है कि गांव का किसान शहरों की ओर भाग रहा है । इसका कारण यह है कि किसान को सही उत्पादन मूल्य नहीं मिल रहा है, इसलिए उसका शहरों की ओर पलायन हो रहा है । इस ओर भी हमें गंभीरता से सोचना होगा कि इसे कैसे रोका जाए । कैसे किसानों को गांवों में ही रोजगार उपलब्ध कराया जाए? जिससे हमारे किसान मजबूत हो सकें । देश का बजट किसान आधारित हो तभी हमारा देश तरक्की कर सकेगा, हमारा किसान खुशहाल होगा । अगर किसान खुशहाल होगा तो देश भी खुशहाल होगा ।

इन्हीं बातों के साथ मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया । किंतु आपने मुझे कम समय दिया, लेकिन फिर भी मैंने कुछ मूलभूत बातें रखी हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।

सभापति महोदय : यदि आपकी स्पीच तैयार है तो you can lay on the table of the House. It will be treated as recorded.

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदय, यह प्वायंट-वाइज़ थी । यदि विस्तार से लिखा होता तभी इसे दे सकता था ।

श्री राजाराम पाल (बिल्हौर) : महोदय, आपने मुझे कृषि मांगों पर चर्चा करने का अवसर दिया इसके लिए मैं आपका आभारी हूं ।

मान्यवर, भारत एक कृषि प्रधान देश है । इसकी ८० फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है । आज पूरे देश के किसानों के चेहरों पर झुर्रियां पड़ रही हैं । चाहे सत्ता पक्ष के लोग हों या विपक्ष के, जब वे चुनाव के समय क्षेत्रों में जाते हैं तब गरीबों और किसानों की बातें करते हैं लेकिन उनकी बेहतरी के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते हैं, जिससे आज किसान की हालत बद से बदतर होती जा रही है । यदि उपलब्धि के नाम पर इन ५७ वर्षों का आकलन किया जाए तो हम केवल खाद्यान्न के मामले में आत्मिनर्भर हुए हैं । लेकिन यह किसी सरकार की वजह से नहीं बल्कि हमारे गरीब किसान की वजह से है । जिसने धरती का सीना चीर कर खाद्यान्न उत्पादन किया । आज उसी किसान की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है । आज देश का किसान भुखमरी की कगार पर पहुंच गया है । कभी अतिवृष्टि, कभी अनावृष्टि, कभी ओलावृष्टि और कभी आग की वजह से किसानों को वभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है ।

मान्यवर, उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रदेश है, वहां के किसानों की हालत बहुत ही दयनीय है। किसान का प्राण पानी है । आज उत्तर प्रदेश में सिंचाई के साधन पूरी तरह से सूख गए हैं । वहां का जल-स्तर निरंतर गिरता जा रहा है । आज बिजली के दामों को किसान देने में असमर्थ है । जिसके कारण किसान की हालत बद से बदतर होती जा रही है । मान्यवर, मैं आपसे एक ही बात कहना चाहता हूं कि माननीय वित्त मंत्री जी ने किसानों की बेहतरी के लिए जो घोषणाएं की थीं, उनमें उतना प्रावधान नहीं किया गया है, जितनी आवश्यकता थी । आज किसान को बीज और खाद के लिए, कृषि यंत्रों के लिए ऋण नहीं मिलता है उसको दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं । क्रेडिट कार्ड से जितना ऋण मिलना चाहिए उससे ज्यादा बिचौलिए उसको खाने का काम कर रहे हैं । आज उर्वरकों और बीज में जो सब्सीडी दी जाती है उसको बिचौलिए खा जाते हैं। उस सब्सिडी का लाभ किसान तक नहीं पहुंच पा रहा है । राष्ट्रीय साक्षरता अभियान और ऊसर सुधार योजना का ९० फीसदी पैसा अधिकारी और कर्मचारी खा जाते हैं । इन योजनाओं का भौतिक रूप से जमीन पर कार्यान्वयन नहीं हो पाता है । ऊसर सुधार योजना केन्द्र सरकार की योजना है। यह एक अचछी योजना है। इसमें कम से कम सांसदों को निगरानी के लिए लगाया जाए, ताकि बिना उनकी संस्तुति के पैसा रीलिज़ न किया जा सके। इस योजना के तहत जो पैसा केन्द्र सरकार दे रही है, उसका लाभ किसानों तक पहुंच सके।

मैं आपके संज्ञान में एक बात और लाना चाहता हूं। किसानों की सुविधा के लिए मंडी में आने-जाने के लिए जो सड़क योजना बनाई जाती है, आज वह योजना खटाई में है। हमारे अधिकारी उस पैसे का उपयोग मंडी तक पहुंचने के लिए मार्ग न बनाकर दूसरे मुद्दों पर खर्च करने का काम कर रहे हैं। किसान को उसका वास्तविक मूल्य नहीं मिल रहा है। आज कृषि उत्पादन मूल्य़ बिक्री मूल्य से बहुत कम है जिससे किसान बेहद परेशान है। वह गांव से पलायन करने के लिए मजबूर हो रहा है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप कनक्लूड कीजिए।

श्री राजाराम पाल : कहा जाता है कि किसी देश का संविधान कितना ही अच्छा क्यों न हो यदि उसे लागू करने वाले लोगों की मंशा ठीक नहीं होगी तो वह संविधान बेकार साबित होगा। बहुजन सुखाए बहुजन हिताए का नारा तो दिया जाता है लेकिन बहुजन हिताए तब होगा जब गांव में रहने वाले ८० फीसदी लोग खुशहाल होंगे, उनके चेहरों में खुशहाली होगी और उनकी बेरोजगारी दूर होगी। जब गांव का किसान, मजदूर खुशहाल होगा, तब देश खुशहाल होगा।

आज के टाइम्स ऑफ इंडिया में उत्पादन दर घटने के जो संकेत दिए गए हैं, उनके गंभीर परिणाम आने वाले हैं। आज बड़े पैमाने पर उत्पादन घट रहा है। घटते हुए उत्पादन और बढ़ती हुई जनसंख्या का जो प्रतिशत है, अगर किसान की बेहतरी के लिए सदन में बैठे हुए लोगों ने ध्यान नहीं दिया तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में किसान गांव से पलायन करेगा, खेती बर्बाद होगी जिससे पूरे देश की आत्मनिर्भरता पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के सवाइदपुर में कृषि विज्ञान केन्द्र बनाने की बात की गई थी, परन्तु राज्य सरकार के दबाव में ऊसर भूमि का प्रस्ताव भिजवाया गया जहां कोई प्रयोग नहीं हो सकता। सवाइदपुर अत्यन्त फर्टाइल है और वहां हर प्रकार के प्रयोग, अनुसंधान हो सकते हैं। मेरी कृषि मंत्री जी से मांग है कि हरदोई जिले का कृषि विज्ञान केन्द्र सवाइदपुर में बनाया जाए।

मैं कानपुर के संसदीय क्षेत्र बिल्हौर से चुनकर आता हूं। वहां ३३ प्रतिशत ऊसर भूमि है और ५० प्रतिशत असिंचित भूमि है। कृषि मंत्री जी से मांग है कि मेरे संसदीय क्षेत्र बिल्हौर के लिए ऊसर भूमि के सुधार के लिए विशेष पैकेज देने का काम करें और नहरों में खुदाई के लिए अतरिक्त व्यवस्था करवाने का काम करें ताकि गांव के किसान खुशहाल हो सकें।

SHRI PRASANNA ACHARYA (SAMBALPUR): Sir, I will just make some precise points due to paucity of time.

As you know, the Indian agriculture is not only just a profession to the vast majority of Indians but it is also a way of life in this country. Agriculture, as you know, employs almost 70 per cent of the country"s workforce and produce a quarter of the country"s Gross Domestic Produce. Most important factor in agriculture is irrigation. I am sorry to say that successive Governments have been announcing various schemes but till today, even after 55 years of Independence, around 70 per cent of the cultivated land in this country is going without irrigation facilities. Many irrigation projects and schemes in this country are hanging since decades and had not been completed.

I would like to cite one example. In my own State, in my own constituency - the hon. Minister is very well aware of it - the Aung Dam project, which would irrigate vast tracts of land in the un-irrigated area adjacent to the KBK districts, is hanging for the last 40 years. My proposal to the hon. Minister is this. Let the Government come out with a comprehensive and time-bound programme to complete all those incomplete and on-going irrigation projects within a time frame of five years. This is the most important aspect.

Many Members have discussed about the remunerative price and the minimum support price fixed by the Government. I do not know what is the parameter on the basis of which the Government decides about it. Just three or four days back, the Agriculture Prices Commission has declared the price and the Government has approved it. There is an enhancement of only Rs.10 in so far as paddy is concerned. I think, while deciding about the remunerative price, the Government should take into consideration the labour put not only by the farmer but also by the entire family of the farmer. The Government is not taking this into account while deciding about the remunerative price.

In the Budget, the Finance Minister has proposed a very meagre amount for flood control. As you know, natural calamity is a routine phenomenon in this country. Every year, due to drought or due to floods, vast crop area gets damaged. Only Rs.180 crore has been provided for flood control. This is a very meagre amount. My proposal is that this amount should be increased and bigger measures should be taken in so far as flood control is concerned.

I am happy and I congratulate this Government regarding announcement of credit loan in the farm sector. So far, we have not reduced the interest rate on the loans to the farmers. When the farmer is not in a position to repay the loan, how can you stop the scale of suicide in this country? Therefore, the Government has to seriously consider reducing the rate of interest on the loan extended to the farmers.

In my speech during the last Budget discussion also, I had mentioned about crop insurance. It is a faulty insurance scheme. If this insurance scheme is not coming to the rescue of the poor farmer, there is no meaning to go on with this scheme. I appeal to the Government to amend the crop insurance scheme and declare gram panchayat as a unit instead of a tehsil. Therefore, whatever the Government is propagating regarding giving much importance and emphasis to agriculture, it is not consistent with what the Government is doing practically in the field. My sincere request to the Government is that it should give more emphasis on agriculture and provide more Budget allocation to it.

 

श्री रघुनाथ झा (बेतिया) : सभापति महोदय, मैं कृषि विभाग की अनुदानों की मांगों का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं कृषि मंत्री जी को ह्ृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं कि जिस वक्त बजट प्रस्तुत हुआ, उस वक्त वे खरीफ के मूल्य में वृद्धि करके सदन में आये । इससे देश के लाखों किसानों को लाभ मिला है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

आप जानते हैं कि बिहार से जब झारखंड का बंटवारा हुआ तो हमारे यहां जितने भी उद्योग धंधे थे, इंडस्ट्राज थीं, कोयला खादान या दूसरी खादान थीं, वे सब झारखंड में चली गयीं। बिहार के लोग सिर्फ कृषि पर ही आधारित होकर कार्य करने लगे। बिहार की ८० प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर आधारित है। मेरा निवेदन है कि नेपाल से आने वाली नदियों से हर वर्ष बिहार का काफी नुकसान होता है। इससे बिहार का आर्थिक ढांचा चरमरा जाता है, टूट जाता है। आप सब जानते हैं कि वहां १० हजार हैक्टेयर में जल जमाव की प्रौब्लम बराबर बनी रहती है। बक्सर से लेकर फरक्का तक हर साल गंगा नदी के कटाव से कई गांव विलीन हो जाते हैं। गंगा के दोनों किनारे ऐसा कोई गांव नहीं है जहां लोगों को बर्बादी का सामना नहीं करना पड़ता है।

कृषि मंत्री जी सक्षम और देश के जाने-माने मंत्री हैं। उनके मन में किसानों के प्रति हमदर्दी है। हमारा कृषि मंत्री जी से निवेदन है कि वहां किसानों के फसल की जो बर्बाद होती है, उसकी भरपाई भारत सरकार करे या नेपाल सरकार से कोई कारगर बात करके उत्तर बिहार के जो गरीब हैं, बेरोजगार हैं, दरिद्र हैं, उनकी दरिद्रता को मिटाने का काम करें। बाढ़ से नियंत्रण दिलाने का काम करें। पूर्व में जब सदन में इस पर चर्चा हुई तब एनडीए सरकार ने वायदा किया था और कहा था कि हम इसकी भरपाई करेंगे और बिहार को विशेष पैकेज देंगे। लेकिन बिहार को वह विशेष पैकेज नहीं मिल सका। नेपाल की नदियों से होने वाले नुकसान को हम झेलते रहें और देश की सरकार हमारी कोई मदद नहीं करे तो हम कहां जायेंगे ?

सभापति महोदय, बिहार में बहुत से कृषि विज्ञान केन्द्र की स्थापना हुई है। लेकिन ५० परसेंट भी कृषि विज्ञान केन्द्र फंक्शनल नहीं हैं। मेरा मंत्री जी से निवेदन है कि वे मेरे निर्वाचन क्षेत्र में चलकर इसका उद्घाटन करें।

बहुत बड़ा इलाका हम लोगों का है जिसे इससे लाभ होता है। हमारे यहां शुगर इंडस्ट्रीज बिल्कुल बैठ गई हैं।

15.55 hrs. (Mr. Speaker in the Chair) हमारे यहां बिहार में ३२ शुगर इंडस्ट्रीज हैं लेकिन सिर्फ ७-८ ही किसी तरह से चल रही हैं। देश की आजादी के बाद से बिहार में कोई नयी इंडस्ट्री नहीं दी गई है। हमारे यहां गन्ना किसान और जूट किसान हैं लेकिन हमारे यहां जो कृषि पर आधारित उद्योग-धंधे थे, वे सब बंद हो गये हैं। ऐसी स्थिति में मैं मंत्री जी से मांग करता हूं कि बिहार की ओर विशेष ध्यान देकर बिहार को इन चीजों से निजात दिलाएं। इतना ही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।

MR. SPEAKER: Now, Shri Kharabela Swain. You are the last speaker in this debate. Please be brief.

SHRI RAMDAS ATHAWALE (PANDHARPUR): Sir, I should also be allowed to speak in this debate.

MR. SPEAKER: I cannot recognize you sitting there.

… (Interruptions)

SHRI KHARABELA SWAIN: Thank you, Sir. The only purpose of my participating in this debate is that as the Group Leader of the Fact Finding Mission to Andhra Pradesh to investigate into the causes of the farmers’ suicide, I had gone there and that is why I would make some suggestions to the hon. Agriculture Minister present here.

We met about 25 families members of the farmers who had committed suicide, and nobody told us that because of lack of credit, the farmers had committed suicide. All of them told us that they had dug wells but they failed; and there was a supply of the spurious seeds and pesticides. These were the two reasons because of which the farmers had committed suicide.

There was one Mahyco Company which was having BT cottonseeds. They were providing hybrid cottonseeds to the farmers. The brand name was Bolguard. They cheated the farmers like anything. Therefore, I would appeal to the hon. Agriculture Minister that the said company should be banned and black-listed, and if required, they should be arrested for cheating the farmers.

Another suggestion that I would like to make to the hon. Agriculture Minister is that the compensation should also be provided to the tenant farmers, which is not being provided. If they commit suicide, it should be provided to them also.

Then, as per the promise made by the ruling party in Andhra Pradesh that they would provide electricity free of cost to all the farmers, the free of cost electricity should be provided to them.

Sir, with regard to the cotton farmers, the hon. Minister would be surprised to know that 50 per cent of the cotton that is brought to the godowns of the Cotton Corporation of India is arbitrarily rejected. They say that it is not up to the grade. After the farmers wait for three days, they are unable to sell it and it is rejected. When these farmers go back home, the middlemen reach there and persuade them and buy the same cotton at the rate of just Rs. 600 to Rs. 900 per quintal. Then, the same middlemen resell it to the Cotton Corporation of India. Therefore, my appeal to the hon. Agriculture Minister is that it should be ensured that Cotton Corporation of India purchase the cotton only from the farmers, and it would not be purchased from any middlemen. This should be the rule. Every cotton farmer should be provided with a certificate when he starts sowing it. Only those farmers, who show their certificates, should be able and allowed to sell their cotton.

Last but not least, I would like to make an appeal to the hon. Minister - even though it is not connected with his Ministry - regarding the plight of the weavers. Those weavers who have committed suicide, should also be provided with compensation. Their traditional designs are being copied by the big industries, who after copying the designs, produce the sarees at much cheaper rates, with the result the sarees produced by the traditional weavers are not being sold. Therefore, my suggestion is that the State Governments should patent the traditional designs of the weavers so that nobody is able to copy it and produce it at a much cheaper rate.

Lastly, all the agricultural universities now should be involved for disseminating information with regard to diversification of crop stating where and what quantity of the crop should be raised. These universities should intimate all these information to the farmers.

With these few words, I conclude.

     

16.00 hrs. कृषि मंत्री तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री (श्री शरद पवार) : महोदय, कृषि अनुदान मांगों के बारे में हुई चर्चा में सदन के कई सम्माननीय सदस्यों ने हिस्सा लिया और देश के किसानों की जो समस्याएं हैं, उनको बड़ी गंभीरता से रखने का प्रयास किया है। जिन माननीय सदस्यों ने इस चर्चा में भाग लिया है, उन्होंने कई अच्छे सुझाव भी दिए हैं। गांवों की जो स्थिति है और देश के ७० प्रतिशत लोगों की जो स्थिति है, उसे राजनीति से ऊपर उठकर इस सदन में रखने का प्रयास किया और मुझे विश्वास है कि इस क्षेत्र में सुधार करने की आवश्यकता है और इस दिशा में जो कुछ कमियाँ रह गयी हैं, उन्हें दूर करने की आवश्यकता है। इसलिए इस सदन में हुई यह चर्चा कृषि मंत्रालय के लिए बड़ी मददगार होगी।

इस देश के किसानों ने देश को मजबूत करने में बड़ा योगदान दिया है। यहाँ कहा गया है कि आज देश में ७० प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं, देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का २४ प्रतिशत योगदान है, देश के निर्यात में १३ प्रतिशत योगदान है और लोगों को रोजगार देने के मामले में, इस क्षेत्र द्वारा ५८ प्रतिशत अर्थात ६२ करोड़ लोगों को काम दिया जा रहा है। कृषि क्षेत्र को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। अगर हम कृषि क्षेत्र को नजरअंदाज करेंगे तो हम देश की जनता को नजरअंदाज करेंगे, पूरे देश को नजरअंदाज करेंगे। इसलिए इस क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, यह बात सभी वक्ताओं द्वारा उठाई गयी है और मैं इससे पूरी तरह से सहमत हूँ।

परिस्थितियों में बड़ा बदलाव लाने में इस देश के किसान कामयाब हुए हैं। जब हम आजादी के समय इस देश की आबादी और अन्न की समस्या के बारे में सोचते हैं तो आज स्थितियों में कितना परिवर्तन हो गया है, हम इसका अंदाजा लगा सकते हैं। वर्ष १९४७ में, जब हमारी आबादी ३५ करोड़ थी, हम विदेशों से अनाज लेते थे और वह स्थिति लगभग सत्तर के दशक तक बनी रही। मुझे याद है कि १९७० के आस-पास जब मैं महाराष्ट्र राज्य में पहली बार वहाँ की सरकार में शामिल हुआ था, तब मेरे पास पोर्टफोलियो था - मनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर होम एण्ड पब्लिक डिस्ट्रीब्युशन, फूड एण्ड सीड सप्लाईज। उस वर्ष वहाँ सूखा पड़ा हुआ था। देश में अनाज की कमी हो गयी थी और मनिस्टर ऑफ फूड एण्ड सीड सप्लाईज की हैसियत से मुझे अपना ज्यादा से ज्यादा समय बम्बई पोर्ट में देना पड़ता था क्योंकि विदेश से अनाज लेकर आने वाले जहाजों का इन्तजार करना, उनको अनलोड करने का प्रबन्ध करना और अनाज को राशन की दुकानों तक भेजना होता था। यह परिस्थिति लगभग वर्ष १९७०-७२ तक बनी रही।

आज कृषि के साथ-साथ मेरे पास खाद्य मंत्रालय की भी जिम्मेदारी है और आज मेरे सामने यह एक बड़ी समस्या है कि भण्डार में पड़े हुए अनाज को हम कैसे जल्दी से जल्दी वितरित कर सकें। जब ३५ करोड़ आबादी थी, तब हम अनाज विदेश से लेते थे। मुझे याद है कि वर्ष १९५८ में पूना में आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की बैठक हुई थी और पार्टी के एक छोटे-से कार्यकर्ता की हैसियत से मैं भी उसमें शामिल हुआ था। उस समय श्री एस.के. पाटिल कृषि मंत्री थे, वे हमारे ही राज्य से आते थे। उन्होंने बैठक में एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने कहा कि अब हिन्दुस्तान की जनता को अनाज के बारे में चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मैैं अमेरिका जाकर पीएल-४८० का एग्रीमेंट करके आया हूँ।

अब जितना चाहें, उतना अनाज देश में आएगा। यह स्थिति १९५७ से १९७० तक रही। आज हिन्दुस्तान के बहादुर किसानों ने २१२ मलियन टन अनाज की पैदावार की है और देश में इतना अनाज पैदा हो गया है कि हमने इस साल १६ देशों को अनाज निर्यात करने का काम किया है। यह मेहनत हिन्दुस्तान के किसान ने की है। यह जो किसानों का उत्तरदायित्व है, इसे हम कभी नहीं भूल सकते। इतनी मेहनत करके इतनी बड़ी समस्या को हल करने में कामयाबी हासिल करने के बाद आज हम जो चर्चा कर रहे हैं, उसमें शत-प्रतिशत सच्चाई है कि देश के आम किसान की स्थिति ठीक नहीं है।

यहां पर कई बातों का जिक्र किया गया। जहां तक उत्पादन का प्रश्न है, इसमें कई क्षेत्रों में आज हिन्दुस्तान का नम्बर विश्व में पहला या दूसरा है। कुछ लोगों को यह मालूम नहीं होगा कि दुनिया में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन हिन्दुस्तान में होता है। बागवानी के क्षेत्र में हिन्दुस्तान का दुनिया में पहला नम्बर है। इसी तरह के बनाना प्रोडक्शन में भी सबसे ज्यादा उत्पादन हमारे देश में होता है। आम का उत्पादन भी हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा होता है। गेहूं और चावल के उत्पादन में हमारे देश का विश्व में दूसरा स्थान है। कम से कम २० ऐसी महत्वपूर्ण आइटम्स हैं, जिनके उत्पादन में हम विश्व में नम्बर एक या नम्बर दो पर हैं। यह उपलब्धि हिन्दुस्तान के किसान के खून-पसीने की मेहनत के कारण हासिल हुई है। इसे हम कभी भूल नहीं सकते।

एक तरफ जहां हम यह स्थिति देखते हैं तो इसके साथ-साथ दूसरी तरफ कुछ बड़ी समस्याएं भी हिन्दुस्तान के किसानों की हैं। हमारा उत्पादन काफी बढ़ा है और हम दुनिया में कई आइटम्स के उत्पादन में नम्बर एक या दो पर हैं, लेकिन जहां तक प्रत हेक्टेयर ईल्ड का सवाल है, उसमें हमें बहुत कुछ सुधार करने की आवश्यकता है। आज गेहूं और चावल के उत्पादन में हम विश्व में दूसरे स्थान पर हैं, लेकिन उसकी प्रति हेक्टेयर ईल्ड अगर दुनिया के और मुल्कों से तुलना करें तो हमारा नम्बर २८वां या २९वां है। करीब-करीब सभी क्षेत्रों में यही स्थिति है। कुछ जगहों पर चंद किसान अच्छा उत्पादन करते हैं और वहां उन्हें कामयाबी भी मिली है। लेकिन आम किसान का उत्पादन बढ़े, इसमें हमें कामयाबी नहीं मिली। इसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्यों ऐसी परिस्थिति पैदा हुई, इसमें कई समस्याएं हैं। हमारे देश में करीब ६० प्रतिशत खेती प्रकृति पर निर्भर है। अच्छा मानसून आ गया तो खती ठीक, नहीं तो वह ६० प्रतिशत खेती खत्म। कई राज्य ऐसे हैं, जहां हर साल या हर पांच साल में कम से कम दो-तीन साल सूखे की परिस्थिति होती है। अभी प्रभुनाथ सिंह जी और झा साहब ने बिहार का जिक्र किया कि वहां और दूसरे कुछ राज्यों में बाढ़ से सालों-साल इतना नुकसान होता है कि उसके बारे में कल्पना तक नहीं की जा सकती। यह स्थिति हमारे सामने है।

हमारे कृषि क्षेत्र में दूसरी समस्या ऋण की है। यह बड़ी गम्भीर समस्या है। इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। तीसरी समस्या भी काफी बड़ी है, जिसे कई माननीय सदस्यों ने यहां रखा कि हमारी जो पैदावार होती है, उसमें कीमत भी काफी बड़ी समस्या है।

भारत सरकार ने इस बारे में कई निर्णय ले लिए लेकिन कई राज्यों में स्थिति ऐसी हैं कि वहां खरीदने के लिए प्रबन्ध नहीं है और न ही कानून है इसलिए उनकी लूट होती है। कई राज्यों में आज स्थिति ऐसी है कि पूरे देश में जगह-जगह पर एग्रीकल्चर प्रोडयूस मार्किट एक्ट है। इसका अमल करने की जरूरत है। किसानों अपना प्रोडयूस बाजार में लाए, उसका ठीक तरह से उपयोग होता है या नहीं, इसकी देखभाल करने के लिए कई व्यवस्थाएं की गईं मगर कई राज्य ऐसे हैं जहां पैदावार बहुत होती है लेकिन मंडी नहीं है या एपीएमसी एक्ट नहीं है। गांवों में जाकर व्यापारी माल खरीदते हैं जिन की थोड़ी बहुत कीमत देते हैं। इतनी मेहनत करने के बाद और पैदावार करने के बाद भी उसकी ठीक कीमत नहीं मिलती है। यह समस्या कई जगहों में है।

चौथी समस्या हम देखते हैं कि इंश्योरेंस के बारे में कई योजनाएं शुरू हो गई है मगर इसमें बहुत कुछ सुधार करने की आवश्यकता है। डिस्टि्रक्ट एज ए होल यूनिट का कॉनसैप्ट स्वीकार किया। कई जिले ऐसे हैं जहां बहुत बारिश आती है और कई जगह पानी का बिल्कुल प्रबन्ध नहीं है। ऐसी परिस्थिति में जिन डिस्टि्रक्ट्स को नुकसान होता है और उनकी कोई मदद नहीं हो सकती है, वहां सुधार करने की आवश्यकता है। ऐसी कई बातें हैं।

हमारे यहां खेतों में जो उपज होती है, वह खेत से निकलने के बाद जो आखिरी कस्टमर है, कंज्यूमर है, उनके घर तक जो माल जाता है, इसमें जो टोटल लॉसिज होते हैं उन्हें पोस्ट हारवैस्िंटग लॉसेज कहते हैं। वे लॉसेज ३० परसैंट तक हैं। सदन को यह बात सुनकर ताज्जुब होगा कि पोस्ट हारवैस्िंटग लॉसेज के लिए हर साल हिन्दुस्तान के किसानों को ५० हजार करोड़ रुपए देने पड़ते हैं यानी ५० हजार करोड़ रुपए का नुकसान होता है। उन्होंने हर साल जो पैदावार की, ग्राहकों के घर तक उनका बीच में जाने का जो समय है, वहां जो नुकसान होता है उसे दुरुस्त करने की आवश्यकता है। हमें जगह-जगह पर एग्रो प्रोसैसिंग यूनिट्स का निर्माण करना पड़ेगा। कई छोटे देशों में वह तीन परसैंट से ज्यादा नहीं है। फलपिन्स जैसे छोटे देश जहां ७० परसैंट उपज होती है, वहां नुकसान बिल्कुल नहीं होता है। थाइलैंड जैसे देश में ८० परसैंट कृषि की उपज होती है। वहां एग्रो प्रोसैसिंग होता है और वह दुनिया की मंडियों में जाता है। हिन्दुस्तान जैसे बड़े देश में एग्रो प्रोसैसिंग का प्रबन्ध खाली तीन परसैंट तक है। बाकी कई हजार करोड़ रुपए का नुकसान किसानों और देश को सहन करना पड़ता है। जब किसानों का बहुत बड़ा नुकसान होता है तो वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होते हैं।

कई माननीय सदस्यों ने किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की बात यहां सदन में बड़ी गम्भीरता से कही। मैं आंकड़ों की डिटेल में नहीं जाना चाहता हूं। यहां आन्ध्रा प्रदेश और दूसरे कई राज्यों की बात कही गई। कई सदस्यों ने इस बारे में अपनी चिन्ता सदन के सामने रखी। मैं यह बात समझ सकता हूं कि सदन में बैठने वाले हर सदस्य ने देश के किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की बात कही। इससे सब को दुख पहुंचता है। इससे बड़ा दूसरा कोई दुख नहीं हो सकता है। कई सालों से खास तौर पर दो सालों से बार-बार यह मुद्दा सदन में उठा। मेरे पास इसकी जिम्मेदारी आने के बाद, मैंने इसकी थोड़ी जांच करने का प्रयास किया। इससे पहले कई रिपोर्टे आई थीं। मुझे नहीं लगता है कि इन राज्यों ने ठीक तरह से इस बारे में ध्यान दिया। रिपोर्ट आ गई कि किसानों ने शराब पी इसलिए आत्महत्या की। ऐसा हमें बतलाया गया। घर में झगड़ा हो गया, इसलिए किसानों ने आत्महत्या की, ऐसा बतलाया गया।

कई बातें यहां बतायी गई। खास तौर पर इसलिए आन्ध्रा प्रदेश में परिस्थिति बड़ी गम्भीर है। आन्ध्रा प्रदेश में पिछले ८ महीने में क्या स्थिति है यह देखने के लिए मैंने एक ऑर्गेनाइजेशन को इसकी जिम्मेदारी दे दी।

उस आर्गेनाइजेशन का नाम नेशनल इंस्टीट््यूट ऑफ एग्रीकल्चर एक्सटेंशन मैनेजमेंट है। हैदराबाद में मैनेजमेंट का यह बहुत बड़ा इंस्टीट््यूट है । उन्हें मेंडेट दे दिया गया कि पिछले सात-आठ महीने पहले आंध्रा प्रदेश के कुछ जिलों में जो परिस्थिति पैदा हुई है, आप उन जिलों का ठीक तरह से सैलेक्शन कीजिए, इसमें डिस्टि्रक्ट का हर रीजन का होना चाहिए । इसके साथ यह भी कहा गया कि हर डिस्टि्रक्ट में जिनके परिवार में आत्महत्या हुई, वहां हर घर में जाकर पूरी तरह से स्टडी कीजिए और उसकी रिपोर्ट हमारे सामने पेश कीजिए। इसमें तीन डिस्टि्रक्टस का सैलेक्शन हुआ - अनंतपुर, मेढक और प्रकाशम् । १४ मई, २००४ से १७ मई, २००४ की अवधि में जो आत्महत्याएं हुईं, यह उसकी सीमित स्टडी है। इसके अनुसार अनंतपुर डिस्टि्रक्ट में ४३ केसिस, मेढक डिस्टि्रक्ट में ४१ केसिस और प्रकाशम्् डिस्टि्रक्ट में २६ केसिस हैं । हम इन सभी जिलों की डिटेल में जितनी भी जानकारी प्राप्त कर सकते थे, उसके लिए प्रयास किया गया । इसमें सोशल इकोनॉमिक प्रोफाइल था- जिन किसानों ने आत्महत्या की उनमें ९६ प्रतिशत पुरुष थे महिलाएं नहीं थीं। इसके साथ ही यह देखा गया कि आत्महत्या करने वाले में कौन सा सैक्शन था - फारवर्ड क्लास, बैकवर्ड क्लास, ट्राइबल क्लास या दलित क्लास? इसके संबंध में देखा गया कि ५१ प्रतिशत फारवर्ड क्लास, २८ प्रतिशत बैकवर्ड क्लास, १५ प्रतिशत अनुसूचित जाति और ७ प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के किसानों ने आत्महत्या की । इसके बाद यह देखा गया कि आत्महत्या करने वाले किसानों का एज ग्रुज क्या था? आत्महत्या करने वाले किसानों में ८० प्रतिशत विक्टिम्स २१ से ५० एज ग्रुप के थे और बहुत बूढ़े लोग थे । अखबार में इस तरह की खबर थी कि सरकार मदद करती है इसलिए घर के बूढ़े को परिवार के सदस्यों ने आत्महत्या करने के लिए कहा इसलिए उसने आत्महत्या की। यह किसानों के प्रति बहुत गलत ढंग से देखने की बात है, इस तरह से नहीं होना चाहिए ।

एक और बहुत बड़ी बात सामने आई और हमें इस पर ध्यान देना होगा कि ५७ प्रतिशत विक्टिम्स अनपढ़ थे । इनमें १०० प्रतिशत लोगों का व्यवसाय कृषि था, इनमें से ५८ प्रतिशत लोग दूसरे किसानों के खेत में जाकर मजदूरी और खेती करते थे, २२ प्रतिशत लोग खेती के साथ कुछ और काम करते थे और ६ प्रतिशत किसान छोटा मोटा काम करते थे । इसके अलावा ७६ प्रतिशत विक्टिम्स की खेती पूरी तरह से मानसून पर निर्भर थी और वहां पर एश्योर्ड पानी नहीं था, ११ प्रतिशत किसान, जिन्होंने आत्महत्या की, वहां एश्योर्ड पानी था और ७८ प्रतिशत विक्टिम्स स्माल एंड मार्जिनल फार्मर्स थे । इस तरह से मेजोरिटी ऑफ विक्टिम्स खुद खेती करते थे । इसके साथ ही हमने यह देखा कि उन्होंने कितनी लागत लगाई, कितने पैसे खेती में इन्वेस्ट किए । फार्म एसेट्स में इवैल्यूएट असेसमेंट ऑफ फार्म एसेटस दो लाख ३३ हजार के आसपास था, अनंतुपर डिस्टि्रक्ट में तीन लाख छत्तीस हजार था, जो कि सबसे ज्यादा था, मेढक डिस्टि्रक्ट में एक लाख अट्ठारह हजार था और प्रकाशम् डिस्टि्रक्ट में एक लाख ७ हजार था।

खेती के लिये पानी की बहुत बड़ी समस्या है। आन्ध्रा प्रदेश में तीनों डिस्टि्रक््टस की बात सामने आई। वहां किसानों ने पानी का प्रबंध करने के लिये रेनवैल और बोरवैल की कोशिश की जिसका औसतन खर्चा ३६,५८० रुपये था लेकिन मेजर डिस्टि्रक्ट में यह औसतन खर्च ७०,१९० रुपये किया गया। इन किसानों ने कई जगहों पर २-३ बोरवैल निकालने की कोशिश की और उसमें इतना ज्यादा पैसा लगाया। जहां नीचे पानी न हो, वहां २-२,३-३ बार बोर का काम करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे जो डिस्टि्रक्ट एक्सटैंशन आफिसर गाइड करते हैं, वे बिलकुल फेल हो गये वरना किसानों को बार बार इस रास्ते पर जाने की आवश्यकता नहीं थी।

अध्यक्ष जी, मैं अब पिछले तीन सालों में उनकी इनकम की क्या स्थिति थी, वह बतलाता हूं। वहां पिछले तीन साल से लगातार सूखा था। Average household income declined by 93 per cent between 2001-02, 2002-03 and 2003-04. जब डिकलाइन होता है, उसका कारण Dis-saving was to the tune of Rs. 21, 271 per victim during the year 2003. यह कर्जे का बोझ किस कारण से आ गया, उन्होंने कहा से पैसा लिया- Majority of the victim’s household borrowed money from non-institutional agencies. २४ प्रतिशत किसानो ने यह पैसा को-आपरेटिव बैंकों से लिया और शेष ७६ प्रतिशत किसानों ने प्राइवेट मनी लैंडर्स से लिया। आज यह सिस्टम कितना डटरियोरेट हो गया है, उसका यह उदाहरण है। मैं इस बात को कबूल करता हूं और कहूंगा कि इसमें कुछ न कुछ करने की आवश्यकता है। जहां तक इन बैंकों से किसानों द्वारा लिये गये कर्रजइंटरेस्ट रेट का सवाल है, कामर्शियल बैंक और को-आपरेटिव बैंकों में यह रेट ९ से १२ परसेंट था और जिन ७६ प्रतिशत किसानों ने प्राइवेट मनी लैंडर्स से पैसा लिया, उसका रेट ऑफ इंटरेस्ट २५ से ३६ प्रतिशत था। इस कारण ऐसी परिस्थिति पैदा हुई जिससे उन्हें ठीक समय पर पैसा मिलने का प्रबंध नहीं हो सका। इस प्रकार प्रति विक्टिम प्रति हैक्टेयर यह २ लाख,५० हजार रुपया का बोझ पड़ा। इससे यह बात साबित हो गई कि जिन किसानों ने प्राइवेट मनी लैंडर्स से पैसा कर्जे के तौर पर लिया, वे ही इस रास्ते पर गये। इन परिस्थितियों को देखते हुये हमें कुछ न कुछ करना होगा।

अध्यक्ष महोदय, इन सब बातों को देखने के बाद हमें कुछ नये कदम उठाने की आवश्यकता है। केवल आन्ध्रा प्रदेश के तीन-चार जिलों की बात नहीं है, देश की दूसरी स्टेट्स की डिटेल्ज भी देखने के लिये हम लोग तैयार हैं। हमने यह जिम्मेदारी कुछ लोगों को दी है लेकिन एक बात इससे साफ हो गई है कि किसान क्यों इस हद तक चला जाता है। इसमें केवल सूखे या बाढ़ की समस्या हल न होने की बात नहीं है। हम लोग चाहते हैं कि किसानों को सरकार की योजनाओं का फायदा मिले लेकिन उन्हें यह फायदा देने के लिये परिस्थिति पैदा नहीं होती है।

आज तक हम लोगों ने जो पैसा इरीगेशन के लिए दिया, पिछले दस सालों के आंकड़े मैंने कलैक्ट किये, अपने बजट का टोटल प्लान जो हर साल का है, उसमें इरीगेशन के लिए .३५ परसेन्ट से ज्यादा प्रोविजन हम लोगों ने इससे पहले नहीं किया है। इरीगेशन के लिए हम .३५ परसेन्ट प्रोविजन करते हैं। Last year, the total provision was somewhat near to Rs. 2300 crore and the total provision for drought, the subject which I am myself handling, was something like Rs. 3500 crore. यानी ड्राउट रिलीफ के लिए ज्यादा पैसा है और जिस कारण ड्राउट का सामना करने की परिस्थिति पैदा होती है, उसके लिए कम पैसे का प्रोविजन हुआ। मुझे खुशी है कि इस साल पहली बार चार हजार करोड़ रुपया इस सरकार ने इरीगेशन के लिए देने का काम किया है, जिससे इस क्षेत्र में सुधार हो सके। इसके अलावा इस देश में जो इरीगेशन प्रोजैक्ट्स बंद पड़ी हैं, कई सालों से जहां काम चालू है, यदि उनके खुलने की बात हो या जहां पुरानी इरीगेशन प्रोजैक्ट्स की कमियों को दुरुस्त करने की आवश्यकता है, इन सब परिस्थितियों को देखने के बाद हमें इरीगेशन की ओर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। मुझे खुशी है कि डा. मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व वाली यह यू.पी.ए. सरकार इस पर ठीक तरह से ध्यान देगी और इसे अधिक महत्व देने की कोशिश करेगी।

अध्यक्ष महोदय, हमारी जो खेती की पैदावार होती है, उसकी कीमत के बारे में यहां कहा गया। कई सालों से एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन का सिस्टम देश में हमने स्वीकार किया है। इसकी गाइडलाइंस तैयार की गई हैं। इन गाइडलाइंस को कई सालों पहले इस सदन ने मान्यता दी है, अप्रूवल दिया है और उसी के मुताबिक कीमतें तय करने की बात होती है। जो बात यहां नायडू जी ने कही, मैं उससे सहमत हूं कि कई राज्यों में पर हैक्टेअर के ऊपर पर क्िंवटल कॉस्ट कम है। इसमें जो नक्शा भारत सरकार के सामने एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन ने दिया, वह बहुत ऊंचा था, बहुत बड़ा था। उसमें कई राज्यों में आपस में बहुत ज्यादा फर्क था। एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन इसमें ओवरऑल स्टडी करके, राज्य सरकारों के एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन से सलाह लेकर, कुछ एन.जी.ओज. और प्राइवेट सैक्टर के लोगों की मदद लेकर इंफोर्मेशन कलैक्ट करता है और प्राइस देश के सामने रखने की कोशिश करता है, जिसे भारत सरकार स्वीकार करती है। इस साल जहां प्राइस बढ़ाने की आवश्यकता थी, वहां बढ़ोतरी करने का काम इस सरकार ने किया है। मगर कुछ आइटम्स पर ज्यादा कीमत देने का प्रयास किया है, जिसमें ऑयलसीड्स मुख्य है। ऑयलसीड्स पर ज्यादा कीमत देने का प्रयास इसलिए किया गया है, क्योंकि आज २० हजार करोड़ रुपये का तेल हम इम्पोर्ट करते हैं। हम इस देश में इसका इम्पोर्ट रोकना चाहते हैं। यदि हम इसमें कामयाब होना चाहते हैं तो हमें किसानों को ऑयलसीड्स के उत्पादन में मदद करने की आवश्यकता है और इसलिए इसमें ज्यादा कीमत देने की कोशिश की गई है।

महोदय, जहां तक प्रोक्योरमैन्ट की बात है, एक बात सच है कि इसके पहले इस देश में जो प्रोक्योरमैन्ट होता था, वह दो-तीन राज्यों से होता था। पिछले कई सालों में पूरे देश मे अनाज की समस्या हल करने में पंजाब, हरियाणा और वैस्टर्न यू.पी. ने बहुत बड़ा काम किया है। मगर इसमें बदलाव लाने की आवश्यकता थी और इसलिए डीसैन्ट्रलाइज फोर्म में इस देश में हमने प्रोक्योरमैन्ट का काम बहुत बड़े पैमाने पर शुरू किया है। आज १६ राज्यों में प्रोक्योरमैन्ट की शुरूआत की गई है और इस प्रोक्योरमैन्ट की शुरूआत से पंजाब, हरियाणा और वैस्टर्न यू.पी. का जो टोटल प्रोक्योरमैन्ट है, उस पर कोई असर नहीं होगा। इसका टोटल प्रोक्योरमैन्ट हम करेंगे। वहां के किसान जितनी उपज सरकार को देंगे, वह पूरी तरह से लेने का हमने प्रबंध किया है। लेकिन एक बात हमारे मन में आई है कि जब एक क्िंवटल चावल पंजाब से तमिलनाडु भेजते हैं तो उस पर १२० रुपये से १५० रुपये के आसपास ट्रांसपोर्ट कॉस्ट आती है। इसलिए मैं सोच रहा हूं कि १५० रुपये ट्रांसपोर्ट में देकर इतना बोझ रेलवे पर डालने से अच्छा है कि हम तमिलनाडु के किसानों का ही थोड़ा एनकरेजमैन्ट करेंगे। उन्हें दो पैसे ज्यादा दे दो, तो शायद वे वहां पैदावार कर सकेंगे।

इससे वहां पैदावार बढ़ेगी, वहां के किसानों को दो पैसे ज्यादा मिलेंगे और लोगों की समस्या दूर होगी। इस प्रकार एक अच्छे कदम की शुरूआत हमने की है और मुझे विश्वास है कि राज्य सरकारें इसमें ठीक से सहयोग देंगी।

जहां तक क्रैडिट की बात कही गई है, इस सरकार ने हुकूमत में आने के बाद पहले १५ दिनों में देश के क्रैडिट सिस्टम में सुधार करने के लिए किसानों को पैसे की एवलेबलिटी ज्यादा देने का निर्णय लिया। Up to last year the total money which was provided for agriculture credit was something like Rs. 80,000 crore. During the year 2004-05 the target fixed was Rs. 1,04,500 crore. Till 20th February, 2005 the total amount which was already disbursed is Rs. 1,04,718 crore. १०० प्रतिशत जो टार्गैट था, उसे पूरा करने का काम इस सरकार ने किया है। आज़ादी के बाद आज तक इतने बड़े पैमाने पर एग्रीकल्चर क्रैडिट इस देश में नहीं दिया गया था। जो इस साल दिया गया है। इस साल और अगले सीज़न में इसमें ३० प्रतिशत वृद्धि करने की कोशिश हमने की है और मुझे विश्वास है कि हम इसमें भी कामयाब होंगे। आज तक टोटल एग्रीकल्चर क्रैडिट कोआपरेटिव सैक्टर के माध्यम से होता था। इस साल जब १,०८,००० करोड़ रुपये का जो टोटल क्रैडिट एवलेबल कराया गया, इसमें कोआपरेटिव सैक्टर का हिस्सा सिर्फ २७ प्रतिशत है, जो पहले ५४ प्रतिशत था, यानी कोआपरेटिव सैक्टर नीचे आ रहा है। देश में १४१ डिस्टि्रक्ट कोआपरेटिव बैंक ऐसे हैं, जिनको रिजर्व बैंक के सैक्शन ११ के तहत नोटिस मिले हैं और उनके डिस्टि्रक्ट में पैसे का बंटवारा बंद हुआ है। देश में छ: ऐसे कोआपरेटिव बैंक हैं, जिनको सैक्शन ११ का नोटिस मिला है और स्टेट में उस कोआपरेटिव बैंक के माध्यम से किसानों को क्रैडिट देने का काम बंद हुआ है। जब तक कोआपरेटिव का ढांचा हम मजबूत नहीं करेंगे और गांवों में सोसाइटीज़ को मजबूत नहीं करेंगे तब तक गांवों में पैसा नहीं मिलेगा। राष्ट्रीयकृत बैंक और कामर्शियल बैंकों के दरवाजे सभी छोटे लोगों के लिए खुले हों, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा। इसीलिए वहां आम और छोटे किसानों का ठीक तरह से सम्मान नहीं होता, उनका लोन स्वीकार नहीं होता है। इसलिए हमें किसी न किसी प्रकार से कोआपरेटिव सैक्टर का ढांचा मजबूत करना पड़ेगा। वैद्यनाथन कमेटी नाम की एक समति इस हेतु अपॉइंट की गई थी। उसकी रिपोर्ट आ गई है और मुझे विश्वास है कि अगले तीन-चार महीनों में डिस्टि्रक्ट सैन्ट्रल कोआपरेटिव बैंक और स्टेट कोआपरेटिव बैंक की हालत, जो दुबली हो गई है, उसे मजबूत करने के लिए, इस समति की रिपोर्ट के अनुसार, हम कम से कम १४ हजार करोड़ रुपये लगाएँगे और वह पैसा किसानों को कोआपरेटिव सैक्टर द्वारा देने के लिए ज्यादा खर्च होगा। यह एक बहुत बड़ा कदम इसमें लिया गया है। …( व्यवधान) नहीं तो फिर दूसरा कुछ उपाय करना पडेगा।

एक बात जैसे प्रभुनाथ जी ने बताईं और कई माननीय सदस्यों ने कही, मुझे स्वीकार करना पड़ेगा कि यह बात मुझे आज तक मालूम नहीं थी। कई राज्यों में रिकवरी के लिए ऐसे कानून हैं कि किसानों को डीफाल्टर बनने के बाद उनको गिरफ्तार करने का प्रावधान है। गिरफ्तार होने के बाद जब वे जेल जाते हैं तो जेल में छ: महीने या साल भर रहे तो जेल का टोटल एक्सपैंडीचर भी उनके पास से कलैक्ट करते हैं। यह अजीब बात है। यह कैसे हो सकता है? ऐसा हमने सुना है।

श्री रघुनाथ झा : बिहार में है। …( व्यवधान)

SHRI GURUDAS DASGUPTA (PANSKURA): Can you name the States where it is happening?.… (Interruptions)

श्री बसुदेव आचार्य (बांकुरा) : कौन कौन से राज्यों में है?

SHRI SHARAD PAWAR: According to the information I have got, it is happening in Bihar.… (Interruptions)

If there is a separate law, I have collected that information … (Interruptions)

MR. SPEAKER: He has very fairly said.

… (Interruptions)

SHRI SHARAD PAWAR: I have collected that information when I heard from here.… (Interruptions)

MR. SPEAKER: I am sure, the hon. Minister will now make investigation.

… (Interruptions)

श्री शरद पवार : यह बात कही गई है । Then, I will try to collect information. I could not collect information from all the States. But, I got a communication that, at least, there are three States, namely, Bihar, UP and Haryana, where this type of legislation is there. I got three names.

श्री फुरकान अंसारी (गोड्डा) : आप झारखंड के बारे में बताइए ।

श्री शरद पवार : इस देश में मैंने कई साल महाराष्ट्र की जिम्मेदारी संभाली है और देश में सबसे ज्यादा इंडस्ट्रीयल प्रोडक्शन देने वाला शहर मुम्बई है । मुम्बई मेहनत करने वाले लोगों की सिटी है और कई इंडस्ट्रीयल हाउसिस जिन्होंने करोड़ों रुपए राष्ट्रीय बैंकों और दूसरे बैंकों से लिए हैं, किसी को भी गिरफ्तार करके एक भी पैसा वसूल किया गया हो, यह बात अभी तक हमने नहीं देखी है । अगर यह बात आज देश में हो रही है तो यह बहुत शर्म की बात है । इसे दुरुस्त करना होगा । इस बारे में मैं खुद ध्यान दूंगा । अगर ऐसा हो रहा है तो मैं सरकार से बातचीत करूंगा और इसे दूर करने के लिए हम कोशिश करेंगे कि ऐसी स्थिति न हो ।

श्री लालू प्रसाद (छपरा) : इसके लिए कोई प्रोविजन करना चाहिए ।

श्री शरद पवार : सभी देशों में रिकवरी होती है । हम लोगों को कैसे जेल में भेज सकते हैं । देश में किसानों की क्या इज्जत रहेगी ।

प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा (दक्षिण दिल्ली) : यह बिहार के लिए बहुत शर्म की बात है ।

SHRI SHARAD PAWAR : Might be! But, I will go into details. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: This is not fair. Please sit down. The hon. Minister has assured that he will himself look into it.

… (Interruptions)

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU : It is a very shameful thing, and the Government should ask the State Governments to scrap all such laws.… (Interruptions)

MR. SPEAKER: He has been very fair. He has himself said that he will personally look into it. He has expressed his great concern and we share his concern; every section of the House shares his concern.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: Please no cross talks. It is a very important subject; it is a very important issue.

श्री शरद पवार : हमें कई क्षेत्रों में ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा । प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व वाली सरकार ने कृषि क्षेत्रों को पहले से ज्यादा प्राथमिकता दी है । कई क्षेत्रों में ज्यादा प्रोविजन किए गए हैं । यह कहा गया है कि हम रिसर्च को नजरअंदाज कर रहे हैं क्योंकि इसके लिए सिर्फ ५० करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है । ऐसा श्री सुमन जी ने कहा है । शायद उन्हें पूरी तरह से सूचना नहीं है । हमने ५० करोड़ रुपयों का अलग से रिसर्च के लिए प्रोविजन किया है । टोटल एग्रीकल्चर रिसर्च के लिए एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रोविजन किया गया है और यह तीसरे साल से बहुत ज्यादा है । इन ५० करोड़ रुपयों का नया प्रोविजन हमने इसलिए किया है क्योंकि डॉ स्वामीनाथन कमेटी इसके लिए नियुक्त की गई थी । उन्होंने इसके लिए अनुशंसा दी थी । इस देश में कई कृषि कालेजिज और यूनीवर्सिटीज हैं । बहुत से नौजवान शोध कार्य में लगे हुए हैं । उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए एक अलग से फंड की आवश्यकता है और इसके लिए ५० करोड़ रुपयों का प्रोविजन किया गया है । यह एक शुरूआत है । इसके लिए और ज्यादा पैसा देने की आवश्यकता है । अगले साल से इसके लिए और ज्यादा पैसा रखा जाएगा । मैं इसके लिए पूरी कोशिश करूंगा । कृषि रिसर्च को हम नजरअंजाज नहीं कर रहे हैं । हिंदुस्तान में आज ८० से ज्यादा इंस्टीटयूशंस काम कर रहे हैं ।

श्री प्रबोध पाण्डा (मिदनापुर) : इसके बारे में स्टैंडिंग कमेटी की क्या अनुशंसा हैं ?

श्री शरद पवार : इस देश की तरक्की में किसानों ने बहुत बड़ा योगदान दिया है । हमारे पंजाब के मान्यवर सदस्यों ने बीटी काटन को इस्तेमाल करने की इजाजत देने का सुझाव दिया है । कुछ समय पहले पंजाब के सदस्यों का एक डेलीगेशन मुझसे मिलने के लिए आया था और उन्होंने मिल कर इस बारे में सिफारिश की थी । ट्रांजिनक क्राप के लिए बीटी कॉटन के इस्तेमाल के बारे में ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इसका पर्यावरण पर प्रभाव पड़ सकता है, आदमी के ऊपर कुछ प्रभाव पड़ सकता है, जानवर के ऊपर कुछ प्रभाव पड़ सकता है और इसका सात-आठ साल ट्रायल लेकर इसको इस्तेमाल करने की इजाजत दे सकते हैं ।

अध्यक्ष महोदय, यह बात सच है कि बी.टी.कॉटन से दुनिया के कई देशों में प्रोडक्शन बढ़ा है, उत्पादन में बहुत सुधार हुआ है। अपने देश में भी बी.टी. कॉटन की खेती के लिए कई राज्यों में इजाजत दी गई है। पंजाब में इसकी खेती करने की इजाजत नहीं दी गई। इसलिए नहीं दी गई क्योंकि पंजाब के पास ही पाकिस्तान के पंजाब का जो हिस्सा लगता है, वहां बी.टी. कॉटन पर एक प्रकार की डिजीज लग गई और यदि हम पंजाब में इसकी खेती की अनुमति दें, तो कहीं वहां से यह बीमारी पंजाब में भी न फैल जाए और यदि फैल जाएगी, तो उससे पंजाब की खेती का बहुत नुकसान होगा। इसलिए इस पर बहुत गम्भीरता से जांच कर के इजाजत देने की बात थी, दूसरी कोई बात नहीं थी। मगर मैं इतना विश्वास दिलाना चाहता हूं कि सभी एक्सपट्र्स से सलाह की है और इस साल यह समस्या हल हो जाएगी। पंजाब के किसानों को एक नया बीज उपलब्ध कराने के लिए, हम कदम उठाएंगे और आपकी यह समस्या इस साल खत्म हो जाएगी।

श्री खारबेल स्वाईं : कुछ जगह हिन्दुस्तान में भी बी.टी. कॉटन का विरोध क्यों हो रहा है, इस बारे में भी कुछ देखिए ?

श्री शरद पवार : मेरे पास रिपोट्र्स आई हैं। आंध्राप्रदेश और उड़ीसा से बी.टी. कॉटन की दो वैरायटी के बारे में रिपोर्ट आई हैं कि उनसे वहां नुकसान हो रहा है। उनकी हम जांच कर रहे हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है। चार-पांच नई वैरायटी भी रिलीज की गई हैं। उनके भी रिजल्ट्स देखने हैं। मुझे लगता है कि इस रास्ते से हमें जाना होगा। जब हम पर-हैक्टेयर यील्ड बढ़ाने की बात करते हैं, तब इस तरह का बीज, जो थोड़ा महंगा भी हो सकता है, वह लेना होगा, क्योंकि इससे पर-हैक्टेयर यील्ड बढ़ाने में मदद होती है। इसलिए इस बारे में मदद करनी पड़ेगी। यह बात भी सही है कि दुनिया में कई जगह इसका विरोध हो रहा है। मगर मैंने देखा है कि चीन जैसे देश में ९० प्रतिशत खेती बी.टी. कॉटन के माध्यम से हो रही है। ब्राजील जैसे देश, मैक्सीको जैसे देश और अमरीका जैसे देश हैं, जहां उन्होंने अपना ८०-९० प्रतिशत एरिया ट्रांजनिक क्रॉप पर लिया है और कुछ देशों ने इसमें बहुत अच्छा काम किया है और उन्हें कामयाबी भी मिली है। मगर यूरोप में इसका विरोध बड़े पैमाने पर हो रहा है। हमें देखना पड़ेगा। फूड सिक्योरिटी की समस्या भारत में है। पर-हैक्टेयर यील्ड बढ़ाने की सबसे बड़ी समस्या हमारे देश में है। इसे ध्यान में रखकर हमारा फर्ज है कि हम इस बारे में मदद करें और हमने वैसा किया भी है।

अध्यक्ष महोदय, मैंने एग्रीकल्चर क्रेडिट की बात कही, मैंने को-आपरेटिव सैक्टर की बात कही। हमारे देश की ६० प्रतिशत खेती प्रकृति पर निर्भर है, मॉनसून पर निर्भर है। इस पर भी ध्यान दिया गया है और इस पर ज्यादा ध्यान देने के लिए दो-तीन प्रोग्रामों पर विशेष जो दिया गया है। जैसा मैंने कहा इर्रीगेशन के लिए इस साल ज्यादा प्रावधान किया गया है। इसके साथ-साथ ड्राईलैंड फार्मिंग एवं माइक्रो इर्रीगेशन के लिए भी पहले के मुकाबले सबसे ज्यादा धन का प्रावधान किया गया है। श्रीमती पुरन्देश्वरी देवी जी ने कहा कि केवल ४०० करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, वह बहुत कम है। यह बात सच है कि वह बहुत कम है, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि माइक्रो इर्रीगेशन के लिए लास्ट ईयर ९० करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। हमने इस वर्ष उसे ९० करोड़ से बढ़ाकर ४०० करोड़ रुपए कर दिया है। माइक्रो इर्रीगेशन के लिए प्लानिंग कमीशन और फायनेंस मनिस्टर साहब ने मुझे विश्वास दिलाया है कि इस मद में जितना पैसा हम खर्च करेंगे, उतना ज्यादा पैसा देने के लिए वे तैयार हैं। इसलिए ४०० करोड़ के प्रावधान पर आप नाराज मत होइए। इसके लिए भारत सरकार १००० या १२०० करोड़ रुपए भी राज्यों को उपलब्ध कराने को तैयार है और हर तरह से मदद करने को तैयार है। श्री चन्द्र बाबू नायडू के नेतृत्व वाली कमेटी की रिक्मेंडेशंस को हमने स्वीकार कर लिया है और उन पर अमल करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, उतनी धनराशि भारत सरकार देने को तैयार है। इस ओर राज्य सरकारों को ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। पानी कम है। इसलिए पानी का इस्तेमाल ठीक प्रकार से करने के लिए इस देश में माइक्रो सिस्टम इंट्रोडयूज करने की आवश्यकता है। इसलिए उसे मदद करने के लिए हमने यह काम किया है।

अध्यक्ष महोदय, पंजाब के हमारे साथियों ने कहा है कि कई क्षेत्रों में, कई राज्यों में फसलों में सुधार या परिवर्तन करने की आवश्यकता है। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं कि फसलों में सुधार अथवा परिवर्तन करने की आवश्यकता है। देश में चावल की जितनी खपत है, उतनी पूरी की पूरी देश में होती है, मगर कई राज्यों में जो लो क्वालिटी पैडी लेने की परिस्थिति नही हुई है। उसमें सुधार करने की आवश्यकता है। यह देखा गया है कि देश के जिन हिस्सों में पैडी होती है, धान की फसल होती है, उनमें भी धान की केवल एक फसल जहां होती है, वहां गरीबी है। वहां का किसान ठीक नहीं है, उसकी परिस्थिति ठीक नहीं है, वह गरीब है। ऐसी स्थितियों को बहुत सोच-समझ कर, हमें बदलना पड़ेगा। ऐसे सभी क्षेत्रों के किसानों को ज्यादा मदद करने के लिए हॉर्टीकल्चर मिशन की शुरूआत इस साल की है और मुझे खुशी है कि इस हेतु बहुत बड़े पैमाने पर धनराशि का प्रबन्ध किया गया है।

यहां जो एनवायरमेंट ठीक करने के लिए सुझाव आया, सॉयल इरोज़न बचाने के लिए, पौधा लगाने वाले को सब्सिडी देने की सूचना श्री प्रभुनाथ सिंह जी ने दी थी। हार्टीकल्चर मिशन में इस सुविधा हेतु ५० प्रतिशत तक अमाउंट देने की तैयारी की गई है। मगर इसका लाभ किसे मिलेगा? मान लीजिए किसी किसान ने वहां सौ पौधे लगाएं तो उसे दो साल बाद कम से कम ९० प्रतिशत वे जिन्दा हैं, यह देखना पड़ेगा, फिर उसे मदद मिलेगी। इसमें हार्टीकल्चर मिशन को बहुत बड़े पैमाने पर ताकत देने का काम किया गया है, इसमें बहुत बड़ा प्रोविजन किया गया है। इसमें जो रकम लगेगी, उसे देने की तैयारी राज्य सरकार ने की है। मुझे विश्वास है कि इससे चेहरा बदल सकता है।

महोदय, हमारा देश ऐसा है, जहां हर राज्य में कुछ न कुछ फल हर महीने पैदा होता है। आप यूरोप में देखिए, वहां किसी चीज की पैदावार नहीं होती है, मगर यहां एक भी राज्य ऐसा नहीं है। हरेक राज्य हर महीने में कुछ न कुछ पैदावार करता है। अगर हम बड़े पैमाने पर उत्पादन करेंगे तो यह ऐसा सैक्टर है जो दुनिया में भारत का नाम मजबूत करने और यहां के किसानों को वहां से पैसा लाने के लिए मदद कर सकता है, इसलिए इस पर हमने ज्यादा ध्यान दिया है। हमने जब आत्महत्या की बात पर स्टडी की, तो हमारे सामने एक बात आई कि कई राज्यों में किसानों ने परिस्थिति गंभीर होने के बावजूद, सूखा होने के बावजूद आत्महत्याएं नहीं कीं। इसे देखने के बाद यह बात सामने आई कि जिन किसानों को खेती के साथ-साथ दूसरी कोई सप्लीमेंट्री इनकम है, वहां वह उस रास्ते पर गया। वह सप्लीमेंट्री इनकम डेरी, फिशरी और एक्वाकल्चर द्वारा हो सकती है। इसलिए इस बजट पर हम लोगों ने डेरी पर ज्यादा ध्यान दिया। लेकिन इसमें कामयाबी के लिए देखना होगा, कि आज हिन्दुस्तान सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन दुनिया में करता है, मगर पर-परसन लेक्टेशन सबसे कम है। हमें जानवरों में, उसकी नस्ल में सुधार करने की आवश्यकता है। इसलिए जेनेटिकली इम्प्रूवमेंट करने की एक बहुत बड़ी स्कीम इसमें ली गई है और देश के कई राज्यों में, खास कर जिन राज्यों में बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है, वहां इसमें ज्यादा ध्यान देने का काम करने की तैयारी हम लोगों ने की है। साथ-साथ फिशरीज़ सैक्टर में, जैसे नेशनल डेरी डेवलपमेंट आथोरिटी है, जो कई साल पहले स्थापित की है तथा ऑपरेशन फ्लड की स्कीम पर जिसने अमल किया, उससे देश में श्वेत क्रांति हुई। उसी लाईन पर फिशरीज़ सैक्टर में एक नया संगठन तैयार करके, बड़ा प्रोविजन करके डेरी सैक्टर में ज्यादा मदद करने की तैयारी इस सरकार ने की है। इसकी तैयारी इस साल में हो जाएगी, क्योंकि यह एक ऐसा सैक्टर है जहां महिलाओं को ज्यादा काम करने का मौका मिलता है और समाज के गरीब लोगों को इसका फायदा हो सकता है। इस पर भी हम लोगों ने ध्यान दिया। हम कितनी भी पैदावार करें, लेकिन जब तक मार्केटिंग का प्रबंध ठीक से नहीं होता, तब तक किसानों को कोई लाभ नहीं होता। इसलिए एग्रीकल्चर प्रोडयूस मार्केट एक्ट में परिवर्तन करने की बात भी इस सरकार ने की है। सभी राज्यों के मार्केटिंग मनिस्टर्स की कांफ्रेंस हमने बुलाई थी और मुझे खुशी है कि सभी राज्यों ने एपीएमसी एक्ट में सुधार करने के लिए हमें सहमति दी है। हम क्या-क्या सुधार करना चाहते हैं- हम सबसे पहले यह सुधार करना चाहते हैं कि आज के एग्रीकल्चर प्रोडयूस मार्केट एक्ट के मुताबिक जो मंडी एपीएमसी ने बनाई, किसानों द्वारा तैयार की गई उपज को उस मंडी में ही उन्हें ले जाना पड़ेगा। इस देश में ऐसा कोई उत्पादक नहीं है, जिसे अपना माल एक ही जगह पर बेचने का अधिकार हो। अगर किसी ने ऑयल ईंजन बनाया तो वह देश में कहीं भी बेच सकता है, कपड़ा बनाया तो उसे कहीं भी बेच सकता है। किसानों के ऊपर भी यह निर्भर करता है। इसलिए हमने इसमें सुधार करने की तैयारी की है। किसी भी राज्य में, किसी भी गांव में एक से ज्यादा मंडी निकालने की तैयारी किसी ने भी रखी तो उसे इजाजत रहेगी और जहां किसानों को ज्यादा कीमत मिलेगी, उस मंडी में जाकर उसे अपना प्रडयूस बेचने का अधिकार रहेगा, यह दुरुस्ती इसमें की गई है और १६ राज्यों में दुरुस्ती करने की तैयारी हमने की है।

इसमें आन्ध्रा प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडू, …( व्यवधान) इन राज्यों में है। बिहार में नहीं है, क्योंकि बिहार में मंडी ही नहीं है। इसलिए वहां हमें मंडी बनाने का काम करना है। गांवों में जो मंडी होती है, उस मंडी के लिए पैसा दिया जाना है, वह हम देना चाहते हैं।…( व्यवधान)

MR. SPEAKER: Let him complete. Unless he yields, you cannot speak.

… (Interruptions)

SHRI VINOD KHANNA (GURDASPUR) : Sir, I want to ask a question.

MR. SPEAKER: You can ask a clarification later on.

श्री शरद पवार : बिहार में एग्रीकल्चर प्रोडयूस मार्केट एक्ट के माध्यम से यहां से जो राशि देते हैं, वह सबसे कम बिहार में दी गई है। इसमें दुरुस्ती करने की आवश्यकता है और इसलिए बिहार में मार्केट यार्ड डवलप करने की एक स्पेशल स्कीम हम लेना चाहते हैं, क्योंकि बिहार में आज ठीक तरह से किसानों को कीमत देने का प्रबन्ध नहीं है। इस तरह का मार्केट वहां नहीं है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है और इसमें जरूर मदद हो जायेगी।…( व्यवधान)

SHRI VINOD KHANNA : Sir, I want to know one thing.

MR. SPEAKER: I will give you an opportunity to seek a clarification.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: Please, not now. Unless he yields, you cannot speak.

श्री शरद पवार : इसमें एक और बात है। आपको याद होगा कि इस देश में कमोडिटी मार्केट बहुत सफल हो गया। इसमें ऑयलसीड एक्सचेंज है, कॉटन एक्सचेंज है, फूडग्रेन एक्सचेंज है। कई जगह पर मार्केट हो गये और कई नये संगठन इस देश में बनाये गये हैं, जैसे फारवर्ड मार्केट कमीशन, जिसको हिन्दी में वायदा बाजार बोलते हैं, यह बहुत पुरानी परम्परा इस देश में थी। वायदा बाजार में सिस्टम क्या होता है कि समझो, मैंने आज मूंगफली की पैदावार की और मुझे मेरे माल के समझो कि आज ५०० रुपये क्िंवटल मिलते हैं, वायदा बाजार में लिखा जाता है कि इसकी कीमत दिसम्बर में क्या होगी, जनवरी में क्या होगी, फरवरी में क्या होगी। समझो, आज मुझे ५०० रुपये कीमत मिलती है और दिसम्बर में ५०० की जगह ७०० रुपये होगी तो हम किसानों को यह अधिकार दिलाना चाहते हैं कि किसान भी अपना माल दिसम्बर में बेच सकता है। इसके लिए कानून में हम सुधार करना चाहते हैं। निगोसिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट में बदल करके गोडाउन में हम माल रखेंगे और आज वायदा बाजार का फायदा व्यापारी लेता है, वह प्रोडयूसर को देने के लिए यह दुरुस्ती करने की तैयारी हम लोगों ने की है। इसकी शुरूआत इस साल से की है। इसीलिए निगोसिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट में बदल करके वह माल वेयरहाउसिंग कारपोरेशन और बाकी कारपोरेशन के पास रखना होगा। माल रखने के बाद ८० या ९० परसेंट उसे कीमत देंगे। उसे ९० परसेंट कीमत देने के बाद जब दिसम्बर का वायदा होगा, तब दिसम्बर में माल उनको देना पड़ेगा। इससे ज्यादा राशि मिलेगी। इसमें से वेयरहाउसेज़ चार्जेज काटकर बाकी पैसे किसानों को देंगे। आज सिर्फ होर्डर्स और बिचौलियों को इसका फायदा मिलता है, यह फायदा किसानों को देने के लिए यह दुरुस्ती करने और इसकी शुरूआत इसी जून से हम कुछ राज्यों में करना चाहते हैं। जब हम इसकी शुरूआत करना चाहते हैं तो हमने शुरू में ५ या ६ स्टेट्स का सलैक्शन किया है, जिन स्टेट्स में मार्केट का बेस अच्छा है। वहां हर मार्केट में कम्प्यूटर और इण्टरनेट पर टोटल इन्फोर्मेशन हर दिन की मार्केट की हर उपज की प्राइस क्या है, वह और अगले महीने की कीमत क्या रहेगी, उसकी इन्फोर्मेशन उनको मंडी में मिलेगी। किसान अपना माल मंडी में लेकर जायेगा तो उनको देश के सभी मार्केट्स की आज की कीमत की स्थिति और कल की स्थिति की मालूमात हो जायेगी। यह एक अच्छा सुधार हम इसमें करना चाहते हैं, इसकी तैयारी की गई है। इसमें कई क्षेत्र हैं, जिनमें बहुत कुछ बदल करने की आवश्यकता है। सीड एक्ट में बदल करनी है, इसके लिए मामला स्टेंडिंग कमेटी के पास गया था, वहां से सुझाव यहां आ गये हैं। इसमें भी सरकार जल्दी से जल्दी कदम उठाएगी। कई क्षेत्रों में हमें बदलाव करना पड़ेगा।

हम ट्रेडीशनल एग्रीकल्चर से बाहर निकलकर जो-जो खेती के क्षेत्र में नये रास्ते दुनिया के सामने आये हैं, उनको हम गांवों तक कैसे ले जा सकते हैं, किसानों तक कैसे ले जा सकते हैं और सारी टेक्नोलोजी और नये सिस्टम का लाभ किसानों को कैसे हो सकता है, इस पर हम ध्यान देंगे। इसी रास्ते पर जाने की तैयारी इस सरकार की रहेगी। कॉमन मनिमम प्रोग्राम में इन सभी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा महत्व दिया है और इस पर अमल करना हम लोगों का फर्ज है। मैं सदन को और सदन के माध्यम से हिन्दुस्तान के किसानों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि पिछले कई सालों में क्या हुआ, हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं।

जो-जो कमियां रह गई हैं, उन्हें दुरुस्त करने की इस सरकार की तैयारी रहेगी। इसकी शुरूआत इस साल हो जाएगी। इसलिए इस बजट में पिछले सालों से ज्यादा प्रावधान आज की सरकार ने किया है। सदन में इसको स्वीकार किया जाना चाहिए और जो मांगें हमने रखी हैं, उन पर सदन को सम्मति देनी चाहिए। यह कह कर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं ।

SHRI VINOD KHANNA: Mr. Speaker, Sir, I am just trying to make the hon. Minister aware of something that has just recently happened in Punjab. He has taken up so many reforms on hand, he has done such a wonderful job and what he has said is really appreciated.

Sir, I have just come back from my constituency. We have fruits and vegetables markets there and they have all been privatised now. They have gone into the hands of private parties. Just as in the case of octroi, where private parties collect octroi, they have done the same thing in the case of fruits and vegetable markets also. They have privatised all the markets. So, the people who bought these markets अपनी मनमानी कर रहे हैं। जो अंदर आता है, उससे जो फीस वे चाहते हैं, ले लेते हैं। They value the goods according to their sweet will. एक सेब यदि दो रूपये का है तो उसके दस रूपये कीमत लगा देते हैं। उस वैल्यू पर टैक्स लेते हैं। जब इस तरह की चीजें हो रही हैं, तो इनका भी कुछ हल आपको निकालना चाहिए। I do not think such fruits and vegetables markets should be privatised. These people are not just taking money. They are threatening people and they are extorting money from them. अगर आप पैसा नहीं देंगे तो हम आपको मार्किट में नहीं धुस्ने देंगे। So, these kind of things are also happening.

MR. SPEAKER: Mr. Minister, please note it down. You can answer later on.

श्री शरद पवार : उस मार्किट एक्ट के मुताबिक मार्किट रहेगी। इससे किसानों को जो सुविधा और संरक्षण दिया गया है, वह जारी रहेगा और साथ ही साथ दूसरी मार्किट्स को भी हम कम्पीटिशन के लिए इजाजत देना चाहते हैं। जिस मार्किट में किसानों की लूट हो जाएगी, उसमें दोबारा वह किसान नहीं जाएगा। हम यह दोनों सिस्टम करना चाहते हैं, जिससे किसानों को फायदा हो सके।

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण-मध्य) : मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से पूछना चाहता हूँ कि महाराष्ट्र में इतनी बड़ी बरसात हुई और कोंकण एरिया में आम, कोकम और काजू की फसल बर्बाद हो गयी। मंत्री जी महाराष्ट्र से हैं तो क्या महाराष्ट्र में जो हानि हुई है, किसानों की जो हानि हुई है, क्या हमारी सरकार उनको कम्पन्शेशन देगी?

मेरा दूसरा प्रश्न है कि किसान आज आत्महत्याएं कर रहे हैं । क्या आप किसानों को जो ऋण देते हैं वह ऋण देने के बाद भी किसान सही तरीके से फसल बो पाता है ? बरसात होने के कारण या बरसात न होने के कारण उसकी फसल ठीक तरह से नहीं हो पाती है और इस वजह से ऋण वापिस नहीं कर पाता है तो उसे डिफाल्टर घोषित कर दिया जाता है । इससे किसानों में आत्महत्याएं की घटनाएं बढ़ रही हैं। मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से प्रार्थना करना चाहता हूं कि वे इस संबंध में वित्त मंत्रालय से बात करके इस ऋण को एक साल तक माफ करें ताकि इससे किसान आत्महत्या करने के लिए बाध्य न हों । इस बारे में विचार करने की आवश्यकता है ।

श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़) : महोदय, मेरा एक छोटा सा प्रश्न है ।

अध्यक्ष महोदय : जिसका नाम मिला है सिर्फ उसे ही प्रश्न पूछने का अवसर दिया जाएगा । Be assured of it. I cannot call all 544 hon. Members to seek clarifications. Please let me regulate it at least sometime. Give some freedom to the Chair.

श्री राम कृपाल यादव (पटना) : मैंने चर्चा के दौरान निवेदन किया था कि बिहार में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती हुआ करती थी परंतु दुर्भाग्य यह हुआ कि धीरे-धीरे गन्ने की खेती खत्म होती गई । जिसके कारण वहां के कल-कारखाने जो चीनी उत्पादन करते थे वे बंद पड़े हुए हैं । वे मृतप्राय: हो गए हैं ।

अध्यक्ष महोदय : भाषण मत कीजिए । आप सिर्फ प्रश्न पूछिए ।

श्री राम कृपाल यादव : गन्ना किसानों को मदद करने के लिए और वहां के कल-कारखानों को चलाने के लिए क्या माननीय मंत्री जी वित्त सहायता दे कर उनकी सहायता करने पर विचार करेंगे?

दूसरी बात मैंने कही थी कि बिहार में सौ क्रय केंद्र हैं लेकिन वह सिर्फ रिकार्ड में हैं । सिर्फ दो-चार क्रय केंद्र ही वहां पर हैं । इससे किसानों को काफी असुविधा हो रही है । यह सुनिश्चित किया जाए क पूरे सौ क्रय केंद्र खोलें और यदि जरूरत पड़े तो और अधिक क्रय केंद्र खोलने की व्यवस्था करेंगे ताकि किसानों को और ज्यादा मदद मिल सके ।

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU: Mr. Speaker Sir, the hon. Minister of Agriculture has given a good reply, particularly regarding farmers committing suicide and the reasons behind it in Andhra Pradesh.

But two things are very important. The amendment of Seeds Act is pending since many years. It needs no financial involvement. I would like to know when the Government is bringing forward this legislation to the House. Secondly, the Acquaculture Bill was introduced in the Rajya Sabha and it was referred to the Standing Committee. That Bill is also pending. A lot of agitation by the Acquaculture farmers is going on. I would like to know whether the Bill would be brought forward to the Parliament for consideration and passing.

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, today, West Bengal is producing potatoes more than its demand. There is a great demand from various countries like Singapore, Thailand, Japan and China. They want to import potatoes from West Bengal. There is a demand for export subsidy also. Today, there is no export subsidy for export of potato.

I would like to know from the hon. Minister of Agriculture, in order to assist the farmers of West Bengal, who are producing more potatoes, whether the Government would consider providing export subsidy to the farmers of West Bengal for export of potato… (Interruptions)

MR. SPEAKER: I am sorry. Please understand.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: Only those who reserved first are getting and later hand raising will not help.

श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष महोदय, हम पहले आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहते हैं कि उन्होंने किसानों के दर्द को पहचानने का काम किया है। हम मंत्री जी से एक सवाल जानना चाहते हैं। अपने भाषण के क्रम में हमने कहा था कि तीन तरह के लोग कृषि पर आधारित हैं - एक सम्पन्न किसान हैं जो खेती में उत्पादन करके बाहर भेजते हैं, दूसरे वे किसान हैं जो अपने जीने-खाने के लिए सालभर का अन्न उत्पादन करते हैं और तीसरे मजदूर क्लास के लोग होते हैं। जिस ढंग से उत्पादन मूल्य बढ़ता जा रहा है, उससे दो वर्ग के लोगों को काफी नुकसान हो रहा है। हम जानना चाहते हैं कि उत्पादन मूल्य में कैसे कमी हो, किसानों की लागत कैसे कम हो, डीजल के मूल्यों में रोज जो वृद्धि हो रही है, क्या किसानों के कार्ड बनाकर खेत के अनुसार जोतने के लिए, पटौनी के लिए सबसीडाइज़्ड रेट पर या राशन तेल के रेट पर खेती करने के लिए उनको डीजल उपलब्ध कराने की दिशा में आप कोई कार्यवाही करेंगे?

मानव जीवन को रासायनिक खादों से नुकसान हो रहा है और उनकी लाइफ घट रही है। ऐसी स्थिति में क्या रासायनिक खादों का सर्वेक्षण करवाया गया है या नहीं कि उससे कितना नुकसान हो रहा है? अगर सर्वेक्षण करवाया गया है तो बताने का कष्ट करें और यदि नहीं करवाया गया है तो सर्वेक्षण करवाएं। खेती में जैविक खाद का ज्यादा उपयोग कैसे हो, इस पर अगर सरकार कोई पहल कर रही हो तो इसका उत्तर भी देने की कृपा करें।

श्री रामजीलाल सुमन : अध्यक्ष महोदय, किसान जब फसल पैदा करता है और जब फसल बिल्कुल पकने के निकट होती है तो लम्बी लागत लगाने के बाद भी कभी बाढ़ से, कभी सूखे से उसे अत्यधिक नुकसान होता है। किसानों की मदद करने के मानक ब्रटिश पीरियड के हैं। जिन किसानों का लाखों रुपये का नुकसान होता है, उसकी भरपाई के लिए किसी को तीन सौ रुपये, किसी को पांच सौ रुपये और किसी को एक हजार रुपये दिए जाते हैं। आज के बदलते हुए संदर्भ में उस पैसे का कोई अर्थ नहीं है।

मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि किसानों की जो क्षति होती है, उस क्षति-पूर्ति के लिए जो पुराने मानक हैं, क्या सरकार उन्हें बदलने का इरादा रखती है?

SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Sir, the hon. Minister gave a very good reply and he also put the Agriculture Policy of his Government on the floor of the House. He also announced regarding the second Green Revolution in the form of Horticulture Mission.

Here, I would like to get a clarification from the hon. Minister. While the hon. Minister was speaking, he admitted that it is a fact that nearly 60 per cent of present horticulture produce is getting wasted.

As the preservation system and the preservation facilities in the country are not there, thereby, the farmers are losing it. Therefore, will the Government take immediate steps to refurbish the food preservation industry on a big scale?

Secondly, as agriculture is such a vast subject, it touches the nook and corner and every citizen of the country. Here, I would like to know whether the CII (Confederation of Indian Industries) and Federation of farmers have given a proposal to the Government to take agriculture in the Concurrent List or not.… (Interruptions) It is because agriculture is such an important subject. Today, we are a part of the WTO. It concerns our food subsidy, agriculture produce subsidy and certain other things.

MR. SPEAKER: You said that you would be very brief. This is not a substitute for speech. Only seek some clarifications please. I have already given you enough time.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: Then, I will call the hon. Minister. I will call him if you do not cooperate with the Chair. Shrimati C.S. Sujatha. Just a minute. I am trying to give chance to all the sides.

SHRIMATI C.S. SUJATHA (MAVELIKARA): In Kerala, there is an unprecedented situation due to the failure of the Government of Kerala to procure paddy. Will the Government consider procuring paddy from the farmers of Kerala?

श्री शंखलाल माझी (अकबरपुर) : अध्यक्ष महोदय, कृषि मंत्री जी ने अभी जो जवाब दिया है, उसमें किसानों के लिए बहुत बढि़या व्यवस्था की बात कही है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। मैं कृषि मंत्री जी से मांग करना चाहता हूं कि किसानों को जो कृषि ऋण दिया जाता है, उसकी ब्याज दर १३ से १४ परसेंट ली जाती है जबकि कमर्शियल रेट पर आठ से नौ परसेंट पर ब्याज लिया जाता है। किसानों को मजबूरी में १३ से १४ परसेंट ब्याज देना पड़ता है। मैं कृषि मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि किसानों के कृषि ऋण का ब्याज कमर्शियल दर की भांति कम करके लिया जाए।

MR. SPEAKER: Very well. I compliment you on your maiden intervention.

Shri Ramdas Athawale.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: I will go to the hon. Minister, if you want to pressurise me. Give him one chance. I have sent him back.

Shri Athawale, address me.

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : अध्यक्ष महोदय, महाराष्ट्र में चीनी उद्योग कई सालों से चल रहा है। आज स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में बहुत सी शुगर फैक्टरीज बंद होती जा रही हैं। मैं कृषि मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि चीनी उद्योग को एनसीडीसी के माध्यम से आर्थिक मदद देने की जरूरत है। क्या सरकार चीनी उद्योग को आर्थिक मदद देगी ?

SHRI PRABODH PANDA : I would like to raise two points.

MR. SPEAKER: Be brief.

SHRI PRABODH PANDA : Firstly, I would like to know whether the Ministry of Agriculture is interested to monitor the States to implement the Land Reforms Programme, which has been denied so far in most of the States.

Secondly, I would like to know whether the Minister of Agriculture is envisaging to set up a National Agriculture Commission for protecting the interest of the agriculture and the kisans of our country.

MR. SPEAKER: Lastly, Shri Kharabela Swain.

He cooperated with me earlier. That is why he is getting a chance. This is the certificate, this is the prize that he is getting.

*m29 SHRI KHARABELA SWAIN : My question is this. Would it be possible to reduce the rate of interest on agriculture credit disbursed through the cooperatives?

Secondly, will the Government ensure that the Cotton Corporation of India do not reject any cotton brought in by the farmers?

MR. SPEAKER: Yes, the hon. Minister.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: No more Members please. Please co-operate. I have given more than full opportunity. Time is important. If we had more time, we could have allowed more Members. No more ‘Sir’, please.

SHRI SHARAD PAWAR: The hon. Member, Shri Yerrannaidu has raised certain issues. This is regarding the Seed Bill. The Seed Bill is right now with the Standing Committee. We are waiting for the final report from the Standing Committee. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: I have allowed Shri Ram Kripal Yadav.

SHRI SHARAD PAWAR: About Aquaculture Bill, as per today’s programme, I think I will be able to present this Bill probably in the next week either in this House or in the other House. But this is absolutely ready. That is listed on the agenda.

जहां तक राम कृपाल जी ने कहा कि बिहार में सब प्रोक्योरमेंट सेंटर खुले हैं लेकिन वहां प्रोक्योरमेंट चालू नहीं है। जहां तक मेरे पास जो इंफॉर्मेशन है, उसके अनुसार कुछ जगहों में चालू हैं और जहां चालू नहीं है, वहां इस पर हम ध्यान देंगे और चालू करने का प्रबन्ध करेंगे। जहां आपको लगता है कि इस एरिया में और कोई सेंटर खोलने की आवश्यकता है, उसका यदि आप नाम लेंगे तो वहां भी हम इन्तजाम करेंगे।

MR. SPEAKER: You have got a very good answer.

श्री शरद पवार : जहां तक शुगर फैक्टरी की बात है, वहां शुगर मिल प्राइवेट सैक्टर की है। इनकी जिम्मेदारी लेना हमारे लिए मुश्किल है। लेकिन बिहार सरकार की जो शुगर मिल हैं, उनके रीहैबलिटेशन के लिए उन्होंने प्रपोजल दे दिया है तो इसके शुगर डैवलपमेंट फंड में हम मदद कर सकते हैं।…( व्यवधान)

MR. SPEAKER: Nothing will be recorded except the hon. Minister’s reply.

(Interruptions)* … *Not Recorded.

श्री शरद पवार : सभी शुगर मिल ओनर्स को भी शुगर डैवलपमेंट फंड में मदद करने का अधिकार है। ऐसे प्रस्ताव आएंगे तो इस पर हम ध्यान देंगे। जहां तक बसुदेव आचार्य जी ने जो पोटैटो एक्सपोर्ट के बारे में कहा, यह बात सच है कि मेरे दफ्तर में मीटिंग हुई थी और एक्सपोर्ट के लिए वहां डिमांड है और प्रोडक्शन जयादा हुआ है और हमने दो सुझाव रखे हैं तथा कल ही शायद इस पर हम फाइनल निर्णय कर लेंगे--एक तो ‘APEDA’ के माध्यम से आज जो सब्सिडी है, उसमें कैसे सुधार कर सकते हैं औऱ साथ-साथ मार्केट इंटर्वेंशन स्कीम का फायदा लेकर वहां के सरप्लस प्रोडक्शन को खरीदने का कोई इंतजाम ‘नैफेड’ या दूसरी ऑरगेनाइजेशन के माध्यम से किसानों को राहत देने की कोशिश करेंगे।

जहां तक प्रभुनाथ सिंह जी ने जो जैविक और रासायनिक खाद के बारे में कहा, दुनिया में सभी खेती की स्टडी करने के बाद Per hectare utilisation of chemical fertiliser is one of the lowest in India. मगर यह बात सच है कि उन्होंने जैविक खाद की सूचना दी, उसके लिए एक अलग स्कीम क्रिएट की गई है और जैविक खाद को एनकरेज करने के लिए सरकार की तैयारी होगी और इसे हम मदद करने के लिए तैयार हैं।

जहां तक रामजीलाल सुमन जी ने जो कहा, regarding the assistance for the farmers where either there is a flood or drought, all the norms are not very old. I think they were recently revised about five or seven years back. But we have prepared some proposals on that and we are going to take it in the NDC and then we will take a final view in the Chief Ministers’ meeting and then a final decision will be taken.

About procurement of paddy in Kerala, that particular subject was brought to my notice and I have sent a communication to the Government of Kerala that they should start purchasing. Whatever paddy the State Government will buy, the Food Corporation of India will purchase it from the Government of Kerala. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: It is not to be recorded.

(Interruptions)* … SHRI SHARAD PAWAR: The financial responsibility will be taken up by the Food Corporation of India. There is no problem. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: I am sorry. Mr. Suresh Kurup, it will not be recorded. You cannot compel the Minister.

*Not Recorded.

(Interruptions)* … SHRI SHARAD PAWAR: If the Government of Kerala is not procuring the paddy, I will send the FCI team there. The FCI will go there.

MR. SPEAKER: But no intervention of Mr. Suresh Kurup will be recorded. The answer will remain and not the question.

SHRI SHARAD PAWAR: Mr. Kharabela Swain and some other hon. Members have raised the issue of the rate of interest for agriculture credit. You see, the commercial banks and others have accepted the Government’s suggestion to keep it up to nine per cent. We have discussed with the co-operative banks. Their problem is that they have taken deposits at a higher rate. That is why, they are not ready to accept that suggestion.

The cooperative banks have collectively communicated to me that it will take another two to three years when their deposits will mature. Then they will be able to reduce the interest rate. So, it will take another two to three years. But the commercial banks are ready to take the responsibility at the rate of 9 per cent.… (Interruptions)

           

*Not Recorded.

MR. SPEAKER: I think, the hon. Members will appreciate a comprehensive reply and a very accommodating attitude of the hon. Minister. I appreciate.

I shall now put the Demands for Grants relating to the Ministry of Agriculture to vote.

The question is :

"That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the order paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2006, in respect of the heads of demands entered in the first column thereof against Demand Nos. 1 to 3 relating to the Ministry of Agriculture."

The motion was adopted.

---------