Allahabad High Court
Smt. Jaijulla vs Ddc And Others on 25 February, 2026
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD निर्णय सुरक्षितः- ०४.०२.२०२६ निर्णय उद्घोषितः-२५.०२.२०२६ प्रकाशन हेतु स्वीकृत HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD WRIT - B No. - ७०३६ of १९८२ Smt. Jaijulla ..Petitioner(s) Versus Ddc and others ..Respondent(s) Counsel for Petitioner(s) : Mohammed Salman, Shaikh Mohd Mujib Ur Rahman, Ajai Shankar, Brajesh Shukla, M.p. Srivastava, M.y.khan, Mohammad Rashid, Rituvendra Singh Nagvanshi, S.n. Yadav, S.v. Misra, Satish Chandra Singh, Tripathi B.g. Bhai, Triveni Shankar, V Pratap, V.c. Misra, V.p. Mishra, V.p. Misra, Zuber Ahmad Siddiqui Counsel for Respondent(s) : Gulrez Khan, Javed Husain Khan, Rakesh Bahadur, Rakesh Bhatnagar, S.C., Shamim Ahmad, Sharad Malviya, Vineet Kumar Singh Court No. - ५५ HON'BLE CHANDRA KUMAR RAI, J.
१. श्री आर. सी. सिंह विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता को सहयोगी अधिवक्तागण श्री बृजेश शुक्ला, श्री शेख मोहम्मद मुजीबुर रहमान, श्री मोहम्मद राशिद, श्री मोहम्मद सलमान के साथ याचीगण संख्या १/३ की तरफ से सुना गया तथा श्री त्रिपाठी बी. जी. भाई विद्वान अधिवक्ता को याची संख्या १/१ एवं १/२ की तरफ से सुना गया। श्री वजाहत हुसैन खां विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता को सहयोगी अधिवक्ता श्री जावेद हुसैन खां के साथ विपक्षीगण संख्या 3/१ की तरफ से सुना गया तथा श्री शरद चंद्र सिंह विद्वान अतिरिक्त मुख्य स्थाई अधिवक्ता को राज्य विपक्षीगण की तरफ से सुना गया।
२. वर्तमान वाद के मुख्य तथ्य यह है कि विवाद चक संख्या २ व ३२० स्थित ग्राम करही, तप्पा-उजियार, परगना मगहर पूर्व, तहसील खलीलाबाद, जिला बस्ती का है। चकबंदी के आधार वर्ष में हाजी लियाकत हुसैन पुत्र अशरफ का नाम विवादित चक संख्या-२ पर सहखातेदार तथा विवादित चक संख्या-३२० पर तनहा खातेदार के रूप में दर्ज था। हाजी लियाकत हुसैन की मृत्यु दिनांक ०१.०४.१९७२ को हुई। आधार वर्ष के इन्द्राज के विरुद्ध हाजी लियाकत हुसैन की मृत्यु के उपरांत याची जैजुला ने अपने को बेवा लियाकत हुसैन कहते हुए एक प्रार्थना पत्र दिनांकित ०२.०४.१९७२ को (मृत्यु के दूसरे दिन) अंतर्गत धारा १२ उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम १९५३ (जिसको आगे चकबंदी अधिनियम कहा जाएगा), दाखिल किया और यह प्रार्थना किया कि उसका नाम विवादित आराजी पर हाजी लियाकत हुसैन की बेवा के रूप में दर्ज किया जाए। सहायक चकबंदी अधिकारी ने किसी प्रतिवाद की अनुपस्थिति में आदेश दिनांक २५.०४.१९७२ द्वारा याची जैजुला का नाम मृतक हाजी लियाकत हुसैन की जगह दर्ज करने का आदेश दिया। सहायक चकबंदी अधिकारी के आदेश दिनांक २५.०४.१९७२ के विरुद्ध विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह ने अपील बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के समक्ष प्रस्तुत किया जिसको आदेश दिनांकित २४.०२.१९७३ द्वारा स्वीकार करते हुए सहायक चकबंदी अधिकारी के आदेश दिनांकित २५.०४.१९७२ को निरस्त किया गया तथा प्रकरण को चकबंदी अधिकारी के समक्ष सुनवाई हेतु भेजा गया। प्रकरण चकबंदी अधिकारी के समक्ष वाद संख्या ६२०/६६१ धारा १२ चकबंदी अधिनियम के रूप में दर्ज हुआ। चकबंदी अधिकारी के समक्ष तीन वाद बिंदु विरचित किए गए तथा पक्षकारों ने अपने केस के समर्थन में जबानी साक्ष्य प्रस्तुत किए एवं कुछ अभिलेखीय साक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए। चकबंदी अधिकारी ने अपने आदेश दिनांकित ०४.०५.१९८१ के द्वारा विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह की उजुरदारी खारिज करते हुए याची जैजुला का नाम विवादित आराजी पर लियाकत हुसैन की बेवा के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। चकबंदी अधिकारी द्वारा पारित आदेश दिनांकित ०४.०५.१९८१ के विरुद्ध विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह द्वारा अपील अंतर्गत धारा ११(१) चकबंदी अधिनियम बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के समक्ष योजित की गई, जो कि अपील संख्या २३३/१३४० के रूप में दर्ज हुई। उपरोक्त अपील बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी द्वारा आदेश दिनांक ११.१२.१९८१ द्वारा स्वीकार हुई, चकबंदी अधिकारी का आदेश दिनांक ०४.०५.१९८१ निरस्त किया गया तथा विवादित आराजी पर मृतक लियाकत हुसैन के स्थान पर विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह सगे भांजे का नाम वरासत के आधार पर दर्ज करने का आदेश दिया। बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के आदेश दिनांक ११.१२.१९८१ के विरुद्ध याची जैजुला द्वारा निगरानी अंतर्गत धारा ४८ चकबंदी अधिनियम उप संचालक चकबंदी के समक्ष योजित की गई, जो कि निगरानी संख्या ३७ के रूप में दर्ज हुई। उप संचालक चकबंदी द्वारा आदेश दिनांक २६.०४.१९८२ द्वारा याची द्वारा योजित निगरानी खारिज की गई। अतः वर्तमान याचिका निम्नलिखित अनुतोष हेतु योजित की गईः-
"१- एक रिट आदेश या निर्देश उत्प्रेषण प्रकृति का विवाद की पत्रावलियाँ मँगाने हेतु और विवादित निर्णय को निरस्त करने हेतु जो उ०स०च० एवम् ब०अ०च० के निर्णय और आदेश क्रमशः इस रिट के संलग्नक १ और २ है। २- एक रिट आदेश और निर्देश महादेश प्रकृति का प्रतिवादीगण के हेतु समादेशित करते हुए कि वे चकबन्दी अधिकारी के निर्णय को पुनः स्थापित करें, जो इस याचिका का संलग्नक ३ रूप में है और याचिनी को लियाकत हुसैन की बेवा घोषित करें। ३- एक रिट आदेश या निर्देश जो यह माननीय न्यायालय विवाद की परिस्थिति को देखते हुए न्याय की दृष्टि में उचित समझें। ४- याचिनी को खर्च विपक्षीगण से दिलावें।"
३. वर्तमान याचिका इस न्यायालय द्वारा आदेश दिनांक २१.०५.१९८२ द्वारा अंगीकृत की गई तथा उप संचालक चकबंदी के आदेश दिनांक २६.०४.१९८२ के क्रियान्वयन को स्थगित किया गया।
४. इस न्यायालय के आदेश दिनांक ३०.०७.१९८६ द्वारा पूर्व पारित अंतरिम आदेश दिनांक २१.०५.१९८२ को निरस्त किया गया। इस न्यायालय द्वारा दिनांक ०५.०५.१९८७ पूर्व पारित अंतरिम आदेश दिनांक २१.०५.१९८२ को पुनः संशोधित किया गया।
५. इस न्यायालय के आदेश के अनुपालन में पक्षकारों ने प्रति शपथ पत्र तथा प्रति उत्तर शपथ पत्र दाखिल किए।
६. याचीगण के वरिष्ठ विद्वान अधिवक्ता का कथन है कि चकबंदी अधिकारी ने साक्ष्यों का परिशीलन करने के बाद यह सही निष्कर्ष दिया कि याची जैजुला का नाम हाजी लियाकत हुसैन की जगह उनकी कानूनी वारिस/बेवा के रूप में दर्ज किया जाए। उनका यह भी कथन है कि बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी ने याची जैजुला के द्वितीय विवाह की उपधारणा मानकर स्पष्ट भूल की है। उनका यह भी कथन है कि बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी ने जबानी साक्ष्यों का सही विश्लेषण नहीं किया तथा विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह को हाजी लियाकत हुसैन का भांजा मानते हुए हाजी लियाकत हुसैन की जगह विवादित आराजी पर नाम दर्ज करने का आदेश पारित किया है, जो कि नियम विरुद्ध है। अतः अपीलीय आदेश दिनांक ११.१२.१९८१ निरस्त होने योग्य है। उनका यह भी कथन है कि किसी भी साक्ष्य से विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह हाजी लियाकत हुसैन का भांजा सिद्ध नहीं है, अतः विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह का नाम हाजी लियाकत हुसैन के स्थान पर वरासत के आधार पर दर्ज नहीं किया जा सकता है। याची के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता का यह भी कथन है कि विपक्षी संख्या ३ ने धारा १२ चकबंदी अधिनियम के अंतर्गत नियमानुसार कोई कार्यवाही नाम दर्ज कराने की नहीं किया, बल्कि याची की धारा १२ चकबंदी अधिनियम की कार्यवाही में उजुरदारी दाखिल किया था, अतः अपीलीय आदेश दिनांक ११.१२.१९८१ गैरकानूनी है। याची के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने निम्नलिखित निर्णयों को अपने बहस के समर्थन में पेश कियाः-
i. AIR 2017 SUPREME COURT 5494; (Shivaji Balaram Haibatti Vs. Avinash Maruthi Pawar) ii. AIR 1983 SUPREME COURT 114; (Madhusudan Das Vs. Smt. Narayani Bai and others) iii. AIR 2009 SUPREME COURT 1103; (Bachhaj Nahar Vs. Nilima Mandal and Ors.) iv. Shamim Ara Vs. State of U.P., 2002(7) SCC 518 v. Nazia Begum Vs. Shoaib Ahmad, 2019 (6) ADJ 626 vi. Mohammad Zirgham Vs. Shamima Begum 2019 (4) ADJ 661 vii. 2025(169) RD 388 Anarkali Vs. State of U.P. & others
७. याची संख्या १/१ व १/२ के विद्वान अधिवक्ता ने भी उपरोक्त तर्कों के आधार पर अपीलीय आदेश दिनांक ११.१२.१९८१ व निगरानी अदालत के आदेश दिनांक २६.०४.१९८२ के निरस्तीकरण की प्रार्थना की।
८. विपक्षी संख्या ३/१ के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने कथन किया कि हाजी लियाकत हुसैन की मृत्यु दिनांक ०१.०४.१९७२ को हुई तथा याची जैजुला द्वारा धारा १२ चकबंदी अधिनियम की दरख्वास्त दूसरे दिन ०२.०४.१९७२ दाखिल कर दिया गया, जो कि विश्वास करने योग्य नहीं है कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी दूसरे दिन अपना नाम चढ़वाने की कार्यवाही करेगी। उनका यह भी कथन है कि हाजी लियाकत हुसैन ने अपनी जिंदगी में ही याची जैजुला को तलाक दे दिया था तथा तलाक के बाद जैजुला ने मोहम्मद जुबैर से निकाह कर लिया था, अतः याची जैजुला का नाम हाजी लियाकत हुसैन की बेवा के रूप में दर्ज नहीं हो सकता। उनका यह भी कथन है कि विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह, हाजी लियाकत हुसैन का सगा भांजा है तथा कानूनी वारिस के रूप में दर्ज करने का उचित आदेश अपीलीय अदालत ने पारित किया है। उनका कथन है कि चकबंदी अधिकारी ने सभी साक्षीगण के साक्ष्यों का सही विश्लेषण नहीं किया परन्तु बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी ने सभी साक्षीगण के साक्ष्यों का सही विश्लेषण करके विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह का नाम सगे भांजे के आधार पर दर्ज करने का उचित आदेश पारित किया है। विपक्षी संख्या ३/१ के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता यह भी कथन है कि विपक्षी संख्या ३ ने उचित प्रार्थना पत्र देकर अपना नाम वरासत के आधार पर दर्ज करने की प्रार्थना की तथा याची जैजुला की दरख्वास्त नाम दर्ज करने हेतु को निरस्त करने की प्रार्थना की। विपक्षी संख्या ३/१ के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने निम्नलिखित निर्णयों को अपने बहस के समर्थन में पेश कियाः-
i. (2015) 1 Supreme Court Cases 553; (Krishnanand (Dead) through legal representatives and others Vs. Deputy Director of Consolidation) ii. (2006) 6 Supreme Court Cases 94; (Standard Chartered Bank Vs. Andhra Bank Financial Services Ltd. And others) iii. AIR 1966 Supreme Court 735 (V 53 C 139); (Bhagwati Vs. Chandramaul) iv. Vaikuntam Vs. Puppala AIR 1971 Orissa 49 v. Madhusudan Das Vs. Smt. Narayani Bai AIR 1983 SC 114 vi. Mundrilal Vs. Sushila Rani 2007 (8) SCC 609 vii. Narayan Prasad Vs. State of M.P. 2007 (11) SCC 738 viii. Anand Pal and others Vs. Deputy Director Consolidation, Meerut 2011 (113) R.D. 569
९. मैंने उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ताओं के तर्कों को सुना तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
१०. यह निर्विवाद तथ्य है कि चकबंदी अधिकारी ने याची जैजुला के धारा १२ चकबंदी अधिनियम के दरख्वास्त को स्वीकार करते हुए याची का नाम हाजी लियाकत हुसैन के स्थान पर उसकी बेवा के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया तथा विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह का सगे भांजे के आधार पर नाम दर्ज करने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया। यह भी निर्विवाद है कि बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी ने विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह की अपील स्वीकार करते हुए चकबंदी अधिकारी का आदेश निरस्त कर दिया तथा विपक्षी संख्या ३ हबीबुल्लाह का नाम हाजी लियाकत हुसैन के सगे भांजे होने के आधार पर दर्ज करने का आदेश दिया। यह भी निर्विवाद है कि याची जैजुला द्वारा दाखिल निगरानी अंतर्गत धारा ४८ चकबंदी अधिनियम उप संचालक चकबंदी द्वारा निरस्त कर दी गई।
११. विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह ने चकबन्दी अधिकारी के समक्ष दाखिल अपने उजुरदारी में परिवार की जो वंशावली प्रस्तुत की थी, वह निम्न हैः-
अशरफ लियाकत हुसैन सिराजुलहक श्रीमती मिसरा खातून (लड़की) हबीबुल्लाह
१२. याची जैजुला के अनुसार श्रीमती मिसरा खातून नाम की कोई लड़की अशरफ की नहीं थी तथा याची जैजुला लियाकत हुसैन की बेवा है।
१३. चकबन्दी अधिकारी के समक्ष निर्मित तीन वाद बिन्दु का परिशीलन आवश्यक होगा, जो कि निम्नलिखित हैंः-
१- उक्त उजुरदारी हबीबुल्लाह दिनांक २.४.७३ श्रीमती जैजुला की लियाकत हुसैन ने अपनी जिन्दगी में ही तलाक दे दिया था और अब अनुसार दफा ३ उजुरदारी मु० जुबेर की औरत है?
२. क्या मु० जैजुला बतौर बेवा मृतक लियाकत हुसैन की वारिस है?
३.फरीकेन श्रीमती जैजुला व हबीबुल्ला ने मृतक लियाकत हुसैन का और वारिस है किसी अन्य तनकीह में नहीं कहा गया।
१४. याची जैजुला की तरफ से मौखिक साक्ष्य में साक्षी अतीकुरर्रहमान व नजीर अहमद तथा स्वयं को पेश किया।
१५. विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह की तरफ से मौखिक साक्ष्य में निम्न छः गवाहों को पेश किया गयाः-
(i). सिराजुलहक
(ii). मो० जुबैर
(iii) हस्मतुल्ला.
(iv). शौकत अली
(v). अब्दुल वहीद
(vi). हबीबुल्लाह
१६. विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह के गवाह मो० जुबेर रिश्ते में लियाकत हुसैन के चचेरे भाई हैं, अतः उनके बयान के प्रमुख अंश का परिशीलन आवश्यक होगा जोकि निम्नवत् हैः-
जेरे कार्यवाही २०-३-७९ प्रतिलिपि ब्यान श्री मो० जुबेर ब इजलास मुजहर के नाम अपना श्री मोहम्मद जुबेर बाप का नाम मो० खलील कौम साकिन करही उम्र ५० साल पेशा खेती बहलफ बयान किया कि मेरे चचेरे भाई लियाकत हुसैन थे लियाकत हुसैन मर गये। मरने से पहले लियाकत हुसैन की बीबी का नाम जैजुला था। मरने के एक साल पहले उन्होंने जैजुला को तलाक दे दिया था। मैंने जैजुल्ला के साथ निकाह सानी किया व तलाक के चार महीने बाद। उसके बाद एक साल बाद लियाकत हुसैन मर गए। जैजुल्लाह अब हमारे साथ नहीं है हमने भी तलाक दे दिया क्योंकि उसका चाल चलन ठीक नहीं था फिर तलाक के बाद मेरे गाँव में खानदान के भतीजा से जैजुल्लाह ने तीसरा निकाह किया। लियाकत को मरे आज से ५ साल से कुछ ज्यादा हुआ। उनको मरने के वक्त उनका तनहा वारिस हबीबुल्लाह था। लियाकत हुसैन की जायदाद पर व मकान पर हबीबुल्लाह का भी वहैसियत वारिस व कब्जा है। x x x x x x लियाकत के बाप अशरफ और हमारे बाप खलील दोनों सगे चचाजात भाई थे। खलील के बाप का नाम बाबूलाह। बाबूल्लाह तीन भाई थे नाम नहीं बता सकता। बाबूल्लाह के जो हकीकी भाई थे उनके लड़के अशरफ थे। जो लियाकत के बाप थे।
१७. मो० जुबेर जोकि लियाकत हुसैन के चचेरे भाई हैं, के बयान से यह भलीभाँति सिद्ध है कि लियाकत हुसैन ने अपने जीवनकाल में याची जैजुला को तलाक दे दिया था और उसके बाद जैजुला ने मो० जुबेर ने निकाह किया, परन्तु कुछ समय बाद मो० जुबेर ने भी जैजुला को तलाक दे दिया। उनके बयान से यह भी सिद्ध है कि लियाकत हुसैन का तनहा वारिस हबीबुल्लाह है।
१८. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२ की धारा-५० का परिशीलन भी आवश्यक होगा। जोकि निम्नवत् हैः-
५०. नातेदारी के बारे में राय कब सुसंगत है- जबकि न्यायालय को एक व्यक्ति की किसी अन्य के साथ नातेदारी के बारे में राय बनानी हो, तब ऐसी नातेदारी के अस्तित्व के बारे में ऐसे किसी व्यक्ति के आचरण द्वारा अभिव्यक्त राय, जिसके पास कुटुम्ब के सदस्य के रूप में या अन्यथा उस विषय के संबंध में ज्ञान के विशेष साधन हैं, सुसंगत तथ्य हैंः परन्तु भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम, १८६९ (१८६९ का ४) के अधीन कार्यवाहियों में या भारतीय दण्ड संहिता (१८६० का ४५) की धारा ४९४, ४९५, ४९७ या ४९८ के अधीन अभियोजनों में ऐसी राय विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
१९. भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२ की धारा-५० के अनुसार मो० जुबेर का बयान विवाद के निर्णय में सुसंगत तथ्य है, जिसको नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है।
२०. चकबन्दी अधिकारी ने विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह के मौखिक साक्ष्य को बिना सही रूप से विचार किए हुए अपना निर्णय दिया है, जोकि कानूनी रूप से उचित नहीं है। बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी ने दोनों पक्षों के मौखिक साक्ष्यों का सही परीक्षण करते हुए विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह की अपील को स्वीकार किया है, जोकि अपीलीय क्षेत्राधिकार का उचित इस्तेमाल है।
२१. विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह द्वारा चकबन्दी अधिकारी के समक्ष दाखिल उजुरदारी अंतर्गत धारा-१२ चकबन्दी अधिनियम का परिशीलन भी आवश्यक होगा, जोकि निम्न हैः-
१- यह कि दसख्वास्त दाखिल खारिज सायला सरीहन खिलाफ कानून खिलाफ वाकया है और लायक खारिजी के है।
२- यह कि श्रीमती जैजूला सायला हरगिज लियाकत हुसैन मुतवल्फी बेवा नहीं है और न उनका कोई कब्जा दखल ही तरकए लियाकत हुसैन मुतवल्फी पर है।
३- यह कि श्रीमती जैजूला सायला को लियाकत हुसैन ने अपने जिन्दगी में ही तलाक दे दिया था और श्रीमती जैजुला ने उसी वक्त वाद गुजरने इद्दत मु० जुबेर साकिन करही से निकाहसानी कर लिया।
४- यह कि हम उजुरदारान लियाकत हुसैन मुतवल्फी का सगा भान्जा है और उनकी जिन्दगी से ही उनकी खिदमत व फरमाबरदारी करते रहे हैं और वाद वफात लियाकत हुसैन मुतवल्फ तरकए लियाकत हुसैन पर बहैसियत सगा भान्जा और कानूनी जायज वारिस काबिज दाखिल है।
५- यह कि सजरा खानदान लियाकत हुसैन मुतवल्फी हस्व जैल है।
६- यह कि सरपन्च हाजी अब्दुल मजीद साकिन से मरिवाहां सायला को रंजिशन लड़ा रहे हैं हालांकि श्रीमती जैजुला का न कोई हक है और न कोई हिस्सा है।
७- यह कि दरख्वास्त सायला दाखिल खारिज है और लायक खारिजी है।
अतः उजुरदारी दाखिल करके उम्मीदवार की दरख्वास्त सायला खारिज फरमायी जावे और तरकए लियाकत हुसैन मुतवल्फी पर हम उजुरदार का नाम बतौर वारिस दर्ज किया जावे।
अशरफ प्रार्थी हबीबुल्लाह उजुरदार लियाकत हुसैन सिराजुलहक श्रीमती मिसरा खातून (लड़की) बेवा जैजुलाह हबीबुल्लाह
२२. इस न्यायालय द्वारा निर्गत निर्णय आनन्दपाल (पूर्व लिखित पहले) के प्रस्तर सं०-८ का परिशीलन आवश्यक होगा, जोकि निम्न हैः-
8. The technical objection that has been taken by the Deputy Director of Consolidation appears to be on a misreading of the document dated 20.1.2006. The objection filed by the petitioners did begin with, in the shape of a written statement against the objection of Kewal, but the prayer clause clearly recites that the name of the recorded tenure holders be expunged and that their objections be allowed and the petitioners be recorded as tenure holders. The Deputy Director of Consolidation should not have gone by the literal form of the objection raised by the petitioners but by its pith and substance. The prayer and the nature of the pleadings are clearly an objection under Section 9A(2) of the U.P.C.H. Act 1953.
२३. विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह द्वारा दाखिल उजुरदारी तथा इस न्यायालय के निर्णय जो कि आनन्द पाल (पूर्व लिखित पहले) में निर्गत किया गाय है, से यह भलीभांति सिद्ध है कि विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह द्वारा दाखिल उजुरदारी अपने नाम को दर्ज करने हेतु धारा-१२ चकबन्दी अधिनियम के अन्तर्गत उचित कार्यवाही मानी जाएगी तथा याची के वरिष्ठ अधिवक्ता की बहस कि विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह की उजुरदारी को धारा-१२ चकबन्दी अधिनियम की दरख्वास्त नहीं माना जा सकता, को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
२४. यहाँ यह भी कहना प्रासंगिक होगा कि चकबन्दी अधिनियम में अभिवचन का नियम पूरी तरह से लागू नहीं होता है, अतः यह कहना कि याची की उजुरदारी को धारा-१२ चकबन्दी अधिनियम के अन्तर्गत की दरख्वास्त के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती पूर्णतया गलत है, क्योंकि विपक्षी संख्या-३ हबीबुल्लाह ने अपने उजुरदारी में हर बात को वंशावली के साथ इंगित किया है।
२५. उपसंचालक चकबन्दी के आदेश दिनांक २६-०४-१९८२ के प्रस्तर-५ का परिशीलन भी आवश्यक होगा, जोकि निम्नवत् हैः-
५- इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बयान स्वयं श्रीमती जैजुला का है, उसने अपने बयान में कहा है कि उसके दोनों हाथों में चूड़ियाँ हैं, वह सिर पर दुपट्टा ओढ़े हुए है और कुरान उठाकर वह यह नहीं कह सकती कि उसने शकील अहमद से निकाह नहीं किया है। यह बात सर्वविदित है कि मुस्लिम विधवाएँ भी हाथों में चूड़ियाँ नहीं पहनती हैं। जैजुला का पुनः शकील से निकाह करने के प्रश्न पर शपथ लेने से कतराना भी इस बात का प्रबल साक्ष्य है कि उसने शकील से पुनः निकाह कर लिया है और इसलिए वह शपथ खाकर इस बात से इनकार नहीं कर सकी। इस बात का तीसरा सबूत यह है कि माननीय उच्च न्यायालय में शकील के भतीजे इफ्तखार ने जैजुला की ओर से पैरवी की थी जो याचिका की प्रमाणित प्रतिलिपि से स्पष्ट है। इस बात का चौथा सबूत यह है कि विद्वान अतिरिक्त जिलाधिकारी के यहाँ इसी वरासत से संबंधित एक दूसरे ग्राम के पुनरीक्षण में जैजुला की ओर से श्री तारकेश्वर उपाध्याय वकील के नाम जो वकालतनामा दाखिल किया गया, उसमें जैजुला पत्नी जुबेर लिखा हुआ था। यह सही है कि बाद में इसको गलत कहकर वकालतनामे को शुद्ध करने का प्रार्थना पत्र दिया गया, किंतु वास्तव में यह गलती नहीं थी, बल्कि असावधानी से सही बात लिख दी गई थी। दिनांक १३.१२.७८ के ट्यूवेल ऑपरेटर की रसीद पर जैजुला की जौजियत शकील अहमद अंकित है, इन तथ्यों के आधार पर विद्वान बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी ने यह सही निष्कर्ष निकाला है कि जैजुला ने पुनर्विवाह कर लिया और हबीबुल्ला भांजे के रूप में मृतक का वारिस है।
२६. उपसंचालक चकबन्दी ने मौखिक साक्ष्य तथा अभिलेखीय साक्ष्य का सही विश्लेषण करते हुए याची जैजुला की निगरानी को खारिज किया तथा बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी के निर्णय को सही माना, जोकि धारा-४८ चकबन्दी अधिनियम के अन्तर्गत उचित निर्णय है।
२७. वाद के समस्त तथ्यों एवं परिस्थितियों पर विचार करने के उपरान्त उपरोक्त विवादित आदेशों को जो कि हक प्रक्रिया में पारित है, को निरस्त करने का कोई उचित आधार नहीं बनता है।
२८. तदनुसार वर्तमान याचिका निरस्त की जाती है।
२९. वाद व्यय के बारे में कोई आदेश नहीं किया जाता है।
(Chandra Kumar Rai,J.) February २५, २०२६ Pawan Kumar