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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Backward Areas Development Board Bill, 2000 Moved By ... on 24 November, 2000

Title: Further discussion on the Backward Areas Development Board Bill, 2000 moved by Shri Subodh Mohite on the 11th August, 2000. (Bill withdrawn).

१५.५४ hrs. प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं श्री सुबोध मोहिते द्वारा प्रस्तुत पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड विधेयक, २००० का पुरजोर समर्थन करता हूं। मैंने पिछले सत्र में इस विधेयक पर अपना भाषण शुरू करते हुए भी कहा था कि पिछड़े क्षेत्रों के विकास की ओर अपेक्षित ध्यान निरंतर दिए जाने की आवश्यकता है।

उपाध्यक्ष महोदय, जैसा आप जानते हैं कि यह जीवन का दौर है, कोई आगे चला जाता है और कोई पीछे रह जाता है। इसी तरह से विकास का क्षेत्र ऐसा है कि इसके अंदर भी कोई राज्य या कोई क्षेत्र बहुत आगे चला जाता है और कोई बहुत पीछे रह जाता है। जहां संसाधन ज्यादा होते हैं, जहां प्राकृतिक वातावरण अनुकूल होता है, जहां के लोग परिश्रमी होते हैं, जहां आर्थिक संसाधन बहुलता से पाये जाते हैं, वहां का तो क्षेत्र आगे बढ़ जाता है लेकिन जहां पर प्राकृतिक प्रकोप होता है या घोर अकाल या सूखा या वर्षा का सर्वथा अभाव या बाढ़ या चक्रवात निरन्तर आते रहते हैं, ऐसे क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। इसलिए सरकार को ऐसे क्षेत्रों की तरफ ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। मोहिते जी ने ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है वह चाहे महाराष्ट्र राज्य का विदर्भ क्षेत्र हो या आन्ध्रा प्रदेश का तेलंगाना हो अथवा तमिलनाडु के दक्षिणी जिले हों या उत्तरी बिहार हो या उड़ीसा हो या मध्य प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र हों या उत्तर प्रदेश राज्य का पर्वतीय क्षेत्र जो उत्तरांचल बन गया है, वह हो या हिमाचल प्रदेश हो या पूर्वोत्तर राज्य हो अथवा हमारे क्षेत्रफल की द्ृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य जो वर्तमान में राजस्थान हो गया है, उसके भी कई अंचल बहुत पिछड़े हुए हैं, ऐसे पिछड़े क्षेत्रों का विकास करने के लिए सरकार को एक बोर्ड गठित करना चाहिए। इस बोर्ड के अन्तर्गत यह निरंतर ध्यान रखना चाहिए कि वहां पर क्षेत्र आधारित कार्यक्रम विकास के चलाये जायें। वहां पर औद्योगीकरण भी तेजी से हो और साथ ही विशेष पैकेज दिये जाये ताकि उस विशेष पैकेज की सहायता से जो राज्य या क्षेत्र पिछड़ गये हैं, वहां के क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुसार विशेष योजनायें लागू करके क्रियान्वित की जा सके ताकि वहा का सवार्ंगीण विकास हो सके।

बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए जो सुविधायें चाहिए चाहे वह बिजली हो या पानी हो या यातायात के साधन हों, इन सब को भी वहां पर अपेक्षाकृत उपलब्ध कराया जाना चाहिए और सबसे बढ़कर वहां के लोगों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराये जायें ताकि जो राज्य अग्रिम श्रेणी में आ गये हैं, जो फॉरवर्ड स्टेट्स कहलाते हैं, उनके साथ पिछड़े एरियाज के लोग भी कदम से कदम मिलाकर चले तभी राष्ट्र की शान है अन्यथा एक भाई तो आगे बढ़ गया और एक भाई बिल्कुल नीचे चला गया तो उस भाई का आगे बढ़ना सार्थक नहीं होगा। हमारी पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण इसी उद्देश्य से किया गया था कि देश के किसी भी क्षेत्र में, विकास के क्षेत्र में असंतुलन नहीं रहे और इसी असंतुलन को दूर करने की आवश्यकता है।

जहां इतने सारे और दुनियाभर के आयोग बना रखे हैं, वहां एक आयोग ऐसा भी बनाया जाये जो देश के पिछड़े क्षेत्रों की पहचान कर सके। कुछ क्षेत्र मोहिते जी ने बिल के अंदर बताये है। इसके अलावा भी कई पिछड़े क्षेत्र हैं जिनको विकास की श्रेणी में, अग्रिम श्रेणी में लाना जरूरी है। उपाध्यक्ष जी, आप भी इस बात से सहमत होंगे। आप तो लक्षद्वीप में रहते हैं। वहां के लोगों का जीवनस्तर और एक मुम्बई में रहने वाले लोगों का जीवनस्तर, एक तरफ राजधानी के पौश कॉलोनी में रहने वाले लोग और दूसरी तरफ गुजरात और महाराष्ट्र के औद्योगिक विकासशील, उन्नतिशील राज्य के रहने वाले लोग, उनकी जो आर्थिक स्थिति द्ृष्टिगत होती है और जो जीवन-स्तर होता है तथा एक तरफ पिछड़े क्षेत्र के रहने वाले लोगों का जो जीवन-स्तर होता है, दोनों में काफी अंतर होता है। इसीलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से प्रार्थना करूंगा कि वहां इस बिल को सही अर्थ में अपनाकर एक नया बिल सरकार की ओर से लायें ताकि देश के पिछड़े क्षेत्रों का भी विकास हो सके।

जहां पैकेज की व्यवस्था है, वहां पिछड़ा विकास बोर्ड का गठन कैसे हो, इसके बारे में भी सुझाव दे रखे हैं। इसमें योजना आयोग का वाइस-चेयरमैन पिछड़ा विकास बोर्ड का चेयरमैन बने और केन्द्रीय सरकार के द्वारा वाइस-चेयरमैन की नियुक्ति हो। इसमें पार्लियामेंट के भी छ सदस्य हो जिसमें लोक सभा के चार तथा राज्य सभा के दो सदस्य हों। इसके साथ-साथ केन्द्रीय सरकार निम्न में से नौ सदस्य नियुक्त करे जो क्रमश: रेलवे, कम्युनिकेशन, वित्त, औद्योगिक विकास, कृषि, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और सिंचाई विभाग से संबंधित हों।

16.00 hrs. किसी भी क्षेत्र का आधारभूत ढांचे का विकास करने के लिए इन विभागों की आवश्यकता होती है। इसलिए ये विभाग इस बोर्ड में रहने चाहिए और साथ ही आर्थिक द्ृष्टि से चार ऐसे विशेषज्ञ होने चाहिए, जो विकास के लिए सुझाव दे सकें और भली प्रकार से क्या-क्या उपाय होने चाहिए, इनके बारे में वे जानकारी दे सकें।

महोदय, पहले हमारे देश में एक नीति चली थी कि औद्योगिक द्ृष्टि से जो क्षेत्र पिछड़े हुए हैं, उनका विकास किया जाएगा। इसी प्रकार आर्थिक द्ृष्टि से जो पिछड़े हुए क्षेत्र हैं,उनकी पहचान करके उनको देश के उन्नतिशील क्षेत्रों के समान लाने के लिए सरकार तरफ से प्रयास किए जाने चाहिए। मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान राजस्थान की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। राजस्थान एक थार मरुस्थल है। उस राज्य में कुछ ही क्षेत्रों में इंदिरा गांधी नहर पहुंची है, लेकिन अन्य क्षेत्रों में भंयकर सूखा पड़ा हुआ है या राजसमन्द अजमेर का जो पहाड़ी इलाका है, इन क्षेत्रों में विकास के साधन नहीं हैं। हरियाणा ने मेवात विकास बोर्ड का गठन किया है या आन्ध्रा प्रदेश में तेलंगाना विकास बोर्ड का गठन किया गया है, उसी प्रकार मगरा मेरवाड़ा विकास बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए, ताकि उस क्षेत्र का विकास भली प्रकार से हो सके। मैं आपके माध्यम से यह भी कहना चाहूंगा, जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रकोप आते रहते हैं, उन क्षेत्रों में विशेष सहायता प्रदान की जानी चाहिए। मानसून के ऊपर जो क्षेत्र निर्भर करते हैं, तो कभी अतिवृष्टि, कभी अनावृष्टि, कभी घोर काल, कभी लम्बा अकाल, कभी भंयकर सूखा और राजस्थान में त्रिकाल - लगातार तीन बार सूखा - सूखा पड़ा। ३१ में से २८ जिलों में सूखा पड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति के अन्दर वहां के लोगों को पीने का पानी नहीं है, अगर पीने का पानी है, तो फलोराइड युक्त है, जिसको पीने से नाना प्रकार की बीमारियों के लोग शिकार हो जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों की पहचान करके, जहां लगातार सूखा पड़ता हो या लगातार बाढ़ आती है या लगतार चक्रवात आते हैं या आन्ध्रा प्रदेश जो तटीय प्रदेश है या उड़ीसा राज्य के वे इलाके जहां साइक्लोन आते रहते हैं, ऐसे क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष आर्थिक द्ृष्टि से उपाय बरते जाने चाहिए, ताकि वहां के लोग जो बार-बार प्राकृतिक प्रकोप से नुकसान उठाते हैं, वे देश के अन्य विकसित क्षेत्रों की श्रेणी में आगे बढ़ सकें। इन क्षेत्रों के विकास के लिए पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड तो सारे देश में एक होगा, जिसका मुख्यालय दिल्ली में होगा, लेकिन उन-उन राज्यों में उन-उन क्षेत्रों में इस बोर्ड की शाखायें होंगी, वहां सक्षम अधिकारी नियुक्त किए जायेंगे। बोर्ड के सदस्य वहां के प्रभारी होंगे, ताकि उन क्षेत्रों का विकास भली प्रकार से हो सके।

अंत में, मैं एक बात और कहना चाहूंगा। आजादी के ५३ सालों के बाद और ९वीं पंचवर्षीय योजना चल रही है, इसके बावजूद भी देश में विकास की द्ृष्टि से देश में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हो गया है। यह विषय आर्थिक विशेषज्ञों और योजना विशारदों के लिए सोचनीय और चिन्तनीय है कि आखिर अरबों-खरबों रुपए खर्च करने के बाद भी, बड़े-बड़े बांध बनाए जाने के बाद भी और बड़े-बड़े कल-कारखाने स्थापित करने के बाद भी, देश में यह क्षेत्रीय असंतुलन क्यों पैदा हो गया है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। देश में अभी नए छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया है, लेकिन यह आर्थिक द्ृष्टि से उन्नत राज्य नहीं कहलाया जा सकता है। उत्तरांचल राज्य में वित्तीय साधनों की कमी है, सब कुछ उधार लेकर काम चलाना पड़ रहा है। झारखण्ड राज्य में आर्थिक संसाधन है, लेकिन उनका सदुपयोग होना चाहिए। बिहार राज्य आर्थिक पैकेज की मांग कर रहा है। इसके साथ ही विदर्भ क्षेत्र महाराष्ट्र से अलग होने की मांग कर रहा है। इस प्रकार की आवाजें लगातार तब ही उठती है, जब उन क्षेत्रों के प्रति उदासीनता बरती जाती है, सत्ता में उनकी भागीदारी नहीं होती है, उनका जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए सरकार द्वारा सच्चे मन से प्रयास नहीं किए जाते हैं, तब वहां के लोगों के मन में अलग हमारा विकास बोर्ड, अलग हमारा राज्य, अलग हमारी विधान सभा, अलग हमारा बजट जैसी भावनायें पैदा होती हैं। साथ ही अलगाववाद की भावना, पृथकतावादी भावना, क्षेत्रीयवाद की भावना और कभी उग्रवाद की भावना पैदा होती है। ये सारी स्थितियां आर्थिक द्ृष्टि से असंतुलन पैदा होने के कारण ही पैदा होती हैं। इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से प्रार्थना करना चाहूंगा कि इस विधेयक के अन्दर जो मूलभूत भावनायें हैं, पिछड़े क्षेत्रों का विकास करने की जो अपेक्षित भावना है, उनकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिए और पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए।

इन शब्दों के साथ, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया। आसन के प्रति आभार प्रकट करते हुए, मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

श्री सुकदेव पासवान (अररिया) : उपाध्यक्ष महोदय, सदन में माननीय सदस्य, श्री सुबोध मोहिते द्वारा प्रस्तुत विधेयक पर चर्चा हो रही है और मैं इस विधेयक पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।

आजादी के ५३ सालों के बाद भी देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की स्थिति किसी से छिपी हुई नहीं है। मुझे यह कहते हुए सही मायनों में दु:ख हो रहा है कि इतने सालों की आजादी के बाद भी गांवों में सड़कें नहीं है, प्राथमिक विद्यालय से लेकर माध्यमिक विद्यालय तक पक्के स्कूल भवन नहीं हैं, अस्पताल नहीं है, बिजली नहीं है। इस विधेयक के माध्यम से एक नई आशा का संचार होने की संभावना है और मेरे विचार से यह पिछड़ा विकास बोर्ड विधेयक बहुत पहले आना चाहिए था। इस विधेयक के माध्मय से इन क्षेत्रों के विकास की ओर सरकार का ध्यान दिलाया गया है। इसके लिए मैं माननीय सदस्य को बधाई देना चाहता हूं।

महोदय, महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र, आन्ध्रा प्रदेश में तेलंगाना, बिहार का उत्तरी क्षेत्र, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र और पूर्वोत्तर के आठ राज्य का जिस प्रकार से विकास होना चाहिए, उस प्रकार से विकास नहीं किया गया है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि बड़े-बड़े शहरों में जो विकास के काम हो रहे हैं, उनकी तुलना में ग्रामीण इलाकों का विकास नहीं हो सका है। लेकिन अब इन क्षेत्रों का विकास एमपीलैड योजना के माध्यम से भी हो रहा है। इस योजना के माध्यम से पुल-पुलिया का विकास हो रहा है, लेकिन इस बोर्ड के माध्यम से जो बड़े काम होंगे, उन पर भी ध्यान देने का आवश्यकता है। इन क्षेत्रों के विकास के लिए पहले भी लोक सभा में कई विधेयक पास हो चुके हैं, लेकिन जिस रूप में उन पर कार्यान्वयन होना चाहिए, उस रूप में कार्नायन्वयन नहीं हो रहा है। इस विधेयक में यह भी सुझाव दिया गया है कि इन क्षेत्रों के विकास के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नधि की व्यवस्था की जाएगी और इन पिछडे हुए क्षेत्रों का विकास होगा। वास्तव में देखा जाए, जिस देश में मजदूर सुखी-सम्पन्न नहीं होंगे, यातायात के साधन नहीं होंगे, बिजली नहीं होगी, सड़कें नहीं होंगी, अस्पताल की सुविधा नहीं होगी, वह देश कभी भी विकसित नहीं कहलाया जा सकता है। कहने का अर्थ यह कि जब तक देश में गावों का विकास नही होगा, तब तक देश का विकास संभव नहीं है।

महोदय, हम निश्चित रूप से कहना चाहेंगे कि देश में पिछड़े क्षेत्रों के इलाकों में किसानों की जो दुर्दशा है, वह कहने लायक नहीं है। लोगों को साधनों के अभाव में किसानों की फसल बाजार तक लाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। जो लोग ग्रामीण इलाकों से चुन कर लोक सभा या विधान सभा में जाते हैं, उन्हें निश्चित रूप से इस बात की जानकारी होगी कि पिछड़े क्षेत्र के इलाकों के किसानों की दुर्दशा क्या है। अभी स्थिति यह है कि ३०-४० किलीमीटर से लोग प्रखंड मुख्यालय में आते हैं। पूरे हिन्दुस्तान में किसानों की धान की फसल हो रही है। अभी धान की कीमत सड़क के अभाव में, केन्द्र सरकार और राज्य सरकार की जो व्यवस्था बनी हुई है उस कारण से किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।

महोदय, मैं आपके माध्यम से केन्द्र सरकार को यह निश्चित रूप से कहना चाहूंगा कि जितनी जल्दी हो सके इस विधेयक को मंजूर करें और पिछड़े क्षेत्र के विकास के लिए अधिक से अधिक नधि प्रदान करें। आपने मुझे समय दिया, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

डा. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय (मंदसौर) : महोदय, सुबोध जी द्वारा जो पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड विधेयक प्रस्तुत किया गया है, उसमें कुछ विशेष बातों की तरफ ध्यान दिलाया गया है। विधेयक में यह कहा गया है कि आजादी के ५०वर्षों के बाद भी देश में कुछ इलाके ऐसे हैं जो आज भी असमानता, गरीबी और आर्थिक विषमताओं से गुजर रहे हैं। इन सब के बारे में समानता लाने की द्ृष्टि से, बराबरी करने की द्ृष्टि से यह आवश्यक है कि कोई एक आयोग इस प्रकार से गठित किया जाए, जो इन सब बातों को देखे। आप भी जानते हैं कि बार-बार सदन में और सदन के बाहर भी इस बात की चर्चा उठती रही है कि देश के कुछ ऐसे भाग हैं, जहां आज भी लगातार सूखा होता है, बाढ़ आती है। जहां लगातार विकास के कार्यों को किए जाने के बाद भी उनका विकास उस स्तर तक संभव नहीं हो सकता। इसलिए आवश्यक है कि यह पता लगाया जाए कि कहां-कहां, किन-किन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की संभावनाएं हैं और वे किस प्रकार से की जा सकती हैं। यह बात ठीक है कि कुछ राज्य ऐसे हैं, जहां औद्योगिक विकास की संभावनाएं हैं। अभी जैसे आप नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ का ही उदाहरण लें, वहां औद्योगिक विकास की संभावनाएं प्रचुर मात्रा में हैं। वहां कोयला, लौह अयस्क, ताम्बा है, सभी प्रकार की सम्पदा है। यहां तक कि वहां हीरा भी पर्याप्त है, लेकिन उसके बाद भी वह क्षेत्र बिलकुल अविकसित रहा। इसलिए यदि औद्योगिक संभावनाओं का पूरा पता लगाया जाए और उनके लिए जो आवश्यक संसाधन है वे उपलब्ध कराए जाएं- जैसे जल, विद्युत तथा अन्य प्रकार के संसाधनों को जुटाया जाए तो निश्चित रूप से ऐसे क्षेत्रों का विकास हो सकता है।

महोदय, इसी तरह हम बिहार और उत्तर प्रदेश क्षेत्र को ले सकते हैं। गुजरात में भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जो लगातार प्रयत्न करने के बाद भी विकास की द्ृष्टि से आगे नहीं बढ़ सके। इसके अंदर कुछ तो वर्णित किए गए हं और कुछ का अभी पता लगाना शेष है। इसलिए आवश्यक है कि इन सब का विकास करने की द्ृष्टि से, आर्थिक सहूलियत देने की द्ृष्टि से हम प्रयत्न करें। उस द्ृष्टि से यदि सरकार प्रयत्न करती है और जैसा कि सुझाव है ऐसा आयोग बना कर एक सुनिश्चित प्रक्रिया के अंतर्गत सरकार ऐसा कार्य करती है तो निश्चित रूप से ऐसे क्षेत्रों का विकास संभव हो सकता है। क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र की प्राकृतिक, भौगोलिक व आर्थिक स्थिति भिन्न है । इसलिए इस विधेयक के अंदर ऐसे क्षेत्रों को बताया भी गया है, चिन्हित किया गया है। आयोग के बारे में भी दिया गया है कि किस प्रकार के आयोग का गठन किया जाना चाहिए, उसके अंदर कितने सदस्य होने चाहिए। मेरा निवेदन है कि इसके बारे में सरकार सुनिश्चित करे कि किस प्रकार का आयोग गठित किया जाए। उसमें कितने सदस्य हों, किस प्रकार से हों अथवा आयोग के अलावा भी किस प्रकार से उन क्षेत्रों के विकास के लिए और कुछ प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। उस दिशा में इस क्षेत्रीय आर्थिक विषमता और असंतुलन को ठीक किया जा सकता है ।

यद्यपि बार-बार संसद में इस बारे में चर्चा होती रही है। वनांचल और पर्वतीय क्षेत्र के बारे में चर्चा हो चुकी है। पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के बारे में भी यहां चर्चा होती रही है। इसलिए मैं समझता हूं कि यह जो विधेयक प्रस्तुत किया गया है, यह एक सामयिक विधेयक है। आज भी भारत के कई हिस्सों में बेहद गरीबी है । अशिक्षा है व पिछडापन है । कालाहांडी और बस्तर को हम सब जानते हैं ।

अब इसकी भावनाओं को द्ृष्टिगत रखते हुए सरकार इसके उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्यवाही करे तो उपयुक्त होगा। जिस तरह की शब्दावली इस बिल में दी गयी है वह विचार का विषय हो सकता है, लेकिन इसमें पिछड़े क्षेत्रों के आर्थिक और सामाजिक विकास की द्ृष्टि से जो भावना व्यक्त की गयी है, मैं उससे सहमत होते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

16.15 hrs (Dr. Laxminarayan Pandey in the Chair) SHRI KHARABELA SWAIN (BALASORE): Sir, no doubt, it is a well-intentioned Bill. Hon. Shri Mohite, while bringing forward this Bill, has mentioned about accelerated development of backward areas for reducing regional disparities. He wants to bring up the backward areas, in a short-term, to the level of the rest of the country. He wants to evolve a fully integrated development programme for identifying backward areas to ensure their all-round progress. He also wants that there should be a predominance of small and marginal farmers. He also has the intention of developing the infrastructural facilities like power, water supply, transport and the rest. In the Financial Memorandum, he has also provided for Rs. 15 lakh from the Consolidated Fund of India on account of administrative expenses, and the Development Fund shall be made available to the Board after due appropriation by the Parliament. So, I fully agree that the intention is good. Already, the hon. Members who have spoken before me, Prof. Rasa Singh Rawat, Dr. Laxminarayan Pandeya and Shri Paswan, have mentioned in detail the fact that this is a very-well intentioned Bill. So, I am not going into the details of it.

But the way the Bill has been framed, I do not think that it is practicable, and it does not conform to the provisions of the Constitution of India. Clause 3 of the Bill says:

"(1) There shall be established by the Central Government by notification in the Official Gazette, a Board to be called the Backward Areas Development Board.
(2) The head office of the Board shall be at New Delhi and Board may, with the previous approval of the Central Government, establish offices at other places in the country."

Clause 12 says, "(1) The Board shall submit every year a report, in such form as may be prescribed, of its development activities to the Prime Minister.

(2) The Prime Minister shall cause the report to be laid before both Houses of Parliament as soon as may be after each such report received by him."

Clause 13 (1) says, "The Central Government may make rules for carrying out the purposes of this Act."

The way the Bill has been framed, clearly it seems that the Backward Areas Development council is going to be a baby of the Central Government. It seems, as if it is going to be a Union Territory, it is only the Central Government which will have all sorts of control because the Chairman of this Council will be the Vice-Chairman of the Planning Commission. The Vice-Chairman will be appointed by the Central Government, besides six Members from the Parliament and the representatives from the Ministries of Agriculture, Industrial Development, Finance, Railways, Communication, Education, Health and Family Welfare.

Sir, I will just go through the Seventh Schedule of the Constitution of India, List II--State List. In the division of powers, in Entry 5, what has been written is as follows.

It says:

"...The local Government, that is to say, the constitution and powers of municipal corporations, improvement trusts, the district boards, mining settlement authorities and other local authorities for the purpose of local Self-Government or village Administration... "

That means, according to the Constitution of India any such Development Board will never come under the Central Government. It would only come under the purview of the State Government.

Sir, now we are having – it is not anything new – the Gorkhaland Development Council, the Bodoland Development Council and presently now we are also having the Western Orissa Development Council. Just like that, as has been said by Shri Mohite, we could have Development Boards for Bihar, for the Telengana region, for the Southern districts of North Bihar, for Madhya Pradesh, for the hilly regions of Uttar Pradesh and Himachal Pradesh and also for the North-Eastern States. But as of now wherever we are having these Development Boards they are under the purview of the respective State Governments. In case of the State of Orissa, the Western Development Council under which generally the backward districts of the State are covered, the Development Board does not have any Administrative or financial powers. A tug of war is now going on between the Government of Orissa and a group of people. They are not willing to demit some real administrative and financial powers to the Western Development Board of Orissa.

Sir, if we look at the present practice we would know that all the money that are allocated for developmental purposes comes from the Central Government. Money allocated under EAS; money spent under JRY, money spent under PMRY and money allocated for so many other Centrally-sponsored schemes including the MPLAD scheme comes from the Central Government only. But the executing agency for these schemes is the State Government and not the Central Government. The money goes to the respective State Governments and they spend the money. It is not the Central Government who directly spends the money in any scheme. So, it would have been better had Shri Mohite provided for some kind of a Board that was to be controlled by the State Government and the financial powers would have to be given by the Central Government only.

Sir, there is a provision under Clause 5 where something has been mentioned about the Railways. It has been said that whatever railway projects ought to have been taken up in the backward regions should be decided by the Backward Council. Is it possible? I was Member of the Standing Committee on Railways last year. I know that as of today if we want to complete all the on-going projects in the Railways, then it would cost Rs. 34,000 crore. The Railways are not able to increase the fare every year. It is because the Railway Minister feels that it would annoy the people. The Government is unable to increase the passenger fare. So, there is cross-subsidisation every year. Every year the freight charges are increased. Gradually it has so happened that sending goods by trucks have become cheaper than sending goods by trains. Freight charges are being increased every year. This Board might say that there should be railway lines in a particular place.

It may be uneconomical, it may be unremunerative, yet people say that because an are is a backward area they simply want a railway line there. From where shall the Central Government bring in funds? Merely saying that a railway line is wanted without arranging for the funds does not serve any purpose. It does not lead the country anywhere.

There should be Boards like this but they should remain under the control of the State Governments. That would be a practicable proposition. A very good provision I find in the Bill, as mentioned by the hon. Member, is that six Members of Parliament – four from Lok Sabha and two from Rajya Sabha – are to be elected from the respective Houses. This is a good suggestion. Members of Parliament are practically the representatives of the Central Government. They do not have a say in any matter. Mr. Chairman, Sir, as a Member of Lok Sabha you know very well that we do not have any say in the expenditure incurred on the EAS or any other Centrally-sponsored scheme in the States. So, it will be good if the Members of Parliament are represented on such Boards. They can look after the interest of the Central Government. They can see if the money released by the Central Government is properly spent.

In conclusion I would say that there should be a board financed by the Central Government and run by the State Government. Such a board should have the representation of Members of Parliament and a few other representatives of the Central Government. This would be very good for the backward areas.

 

श्रीमती रमा पायलट (दौसा) : सभापति महोदय, श्री मोहिते पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड विधेयक, २००० लाये हैं, मैं उसके समर्थन में बोलने के लिये खड़ी हुई हूं। मैं समझती हूं कि यदि इस तरह के बोर्ड बना दिये जायें तो केन्द्र सरकार का काम बहुत हलका हो जायेगा। अभी पिछले दिनों हमारे देश में कई उप-राज्यों की मांग की गई है। इसके लिये कई सालों से लड़ाई होती रही है। उत्तरांचल के लोग दिल्ली तक आये। कई जगह माल का नुकसान हुआ, बहुत से काम के दिनों का नुकसान हुआ और जिन लोगों ने जनान्दोलन में भाग लिया, उनके काम की हानि आखिर में देश के लिये हानि बनी। आखिरकार जनान्दोलन के कारण सरकार द्वारा तय किया गया कि देश के अंदर तीन नये राज्य बढ़ा दिये जायें। मैं श्री मोहिते जी की सराहना करूंगी और केन्द्र सरकार से अनुरोध करूंगी कि इस विधेयक पर गौर किया जाये। हमारा लम्बा-चौड़ा देश जो उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण तक फैला हुआ है, जहां अपार सम्पदा मौजूद है, और हमारे इतने एम.पीज़, एम.एल.एज़ तथा पदाधिकारी हैं कि जहां आखिरी सीमा तक पहुंचना मुश्किल है, सरकार छोटे बोर्ड बनाकर काम कर सकती है। श्री मोहिते ने महाराष्ट्र, आन्ध्रा प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्यों का उल्लेख किया है। मैं चाहती हूं कि यदि इसमें राजस्थान को शामिल किया होता तो अच्छी बात होती। राजस्थान में जहां रेत के मैदान हैं, कहीं पानी नहीं है तो कहीं बिलकुल पहाड़ हैं, ऐसे स्थान के लिये छोटा बोर्ड बना दिया जाता तो अच्छा होता।

सभापति महोदय, हमारे देश में हर तरह का मौसम होता है जहां की सम्पदा विशाल है। अगर सरकार के हाथ में उन विकास बोर्डों का अनुशासन होगा तो अपने देश की हर सीमा को हम छू सकते हैं तथा विकास कार्य करा सकते हैं। यह एक आम बात है कि यदि एक परिवार बड़ा होता है और उसमें बड़े बेटे की शादी हो जाती है तो मां-बाप चाहते है कि बेटा बहू अलग रहकर अपना जीवन सुधार करें क्योकि इतना बड़ा परिवार अच्छी तरह से गुजर-बसर नहीं कर सकता जितना अलग-अलग रहकर कर सकता है।

इसलिए यदि इस तरह के बोर्ड का गठन किया जाएगा तो हमारे देश के वह भाग जो अछूते रह गए हैं उनका विकास करने में भी सहायता मिलेगी। केन्द्र में खादी बोर्ड बहुत पहले से चला आ रहा है। मैं समझती हूं कि खादी बोर्ड की शाखाएं पूरे देश में हैं और उसका हैड ऑफिस दिल्ली में है। अगर इसी तरह से इस बोर्ड का गठन किया जाए तो उससे पिछड़े क्षेत्रों का विकास हो सकेगा और अगर हैड ऑफिस दिल्ली में बनाएं और इसकी शाखाएं हर राज्य में खोल दें और उनके तहत उप-शाखाएं खोल दें तो उससे अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप से लेकर उत्तर पूर्व में नागालैण्ड और असम तथा भूटान की सीमाओं की तलहटी तक हम लोग अपने सेन्टर की तारें बिछा सकते हैं और यहां से जो नीतियां बनती हैं, नयी चीजों का विकास होकर हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली में सबसे पहले आता है, उन जानकारियों को हम वहां तक पहुंचा सकते हैं।

आज छोटे उद्योगों के बारे में विवाद चल रहा है। जिन घरों में इतने दिनों से उद्योग चल रहे हैं, मैं उस मामले को नहीं छूना चाहती क्योंकि बहुत लंबी बहस उस पर चल रही है। कई दिनों से दिल्ली में बहुत तमाशा इस बात पर हो रहा है लेकिन इसी तरह से अगर हम अपनी ब्रांचेज सारे देश में फैला देंगे छोटे-छोटे टुकड़ों में तो यह स्थिति जो आज दिल्ली में हो गई है, दूसरे राज्यों में होने से हम बचा पाएंगे। हर व्यक्ति अपना विकास करना चाहता है और अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ना चाहता है। आज दिल्ली में जितनी जनसंख्या है उसमें दिल्ली के लोग कम हैं और दूसरे राज्यों के ज्यादा हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे दूसरे प्रदेश जहां रोज़ी-रोटी के साधन कम हैं, वहां के लोग अपनी रोज़ी-रोटी ढूंढने के लिए दिल्ली चले आते हैं और वह दिल्ली में बसकर दिल्ली के बाशिन्दे कहलाते हैं और फिर उसी बात को लेकर झगड़ा होता है। कोई इलेक्शन में कहता है कि हम झुग्गी झोंपड़ियां हटा देंगे और कोई कहता है कि हम झुग्गियां नहीं हटने देंगे। हम उसको राजनैतिक रूप दे देते हैं। मेरा कहना है कि अगर हम पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड का गठन करेंगे तो इससे हम अपने देश के पिछड़े हुए क्षेत्रों को चाहे वह बाढ़ग्रस्त रहते हों, रेतग्रस्त रहते हों या चट्टानग्रस्त हों, उनका विकास कर सकते हैं। उत्तर पूर्व के लिए एक बोर्ड का गठन करें और वहां टूरिज़्म का ज्यादा प्रचार करें तो हम समझते हैं कि हिन्दुस्तान को ज्यादा से ज्यादा टूरिज्म का पैसा उत्तर पूर्व क्षेत्र से मिलेगा।

राजस्थान में सबसे अच्छा मार्बल मिलता है। अगर हम वहां के लिए बोर्ड का गठन करें तो वहां जो पत्थर का काम करने वाले कर्मचारी होंगे और मजदूर होंगे उनको जरूर ही उस बात की ज्यादा जानकारी होगी जितनी कि किसी को दूर बैठकर होती है। उन पत्थर का काम करने वालों को या जो मछुआरे पानी में काम करने वाले हैं या पहाड़ों में काम करने वाले हैं, इस तरह के लोगों को हम ज्यादा जानकारी दे सकेंगे।

आज तीन राज्यों की मांग उठी है। मैं कहना चाहती हूं कि कुछ सालों बाद और प्रदेशों से भी मांग आएगी कि हमारे प्रदेशों के भी दो हिस्से कर दिये जाएं। इस देश को एक सूत्र में बांधने के लिए और ज्यादा खर्चे से बचाने के लिए बोर्डों का गठन किया जाना चाहिए। जितने भी प्रदेश अभी बनाए गए हैं, उन प्रदेशों में क्या बोर्ड बनाने से ज्यादा खर्चा नहीं आ रहा यह मैं सरकार से पूछना चाहती हूं। मैं समझती हूं कि इसका उत्तर हां होगा। एक नए प्रदेश को बसाने के लिए जितने दफ्तरों की आवश्यकता होती है और हर तरह के जमावड़े की जरूरत होती है, उससे कम पैसा किसी बोर्ड का गठन करने में लगेगा। इसलिए मैं इस बिल का समर्थन करती हूं और कहती हूं कि सरकार इस बिल पर गौर करे। धन्यवाद।

श्री बालकृष्ण चौहान (घोसी) : आदरणीय सभापति महोदय, आज इस पिछड़ा क्षेत्र बोर्ड विधेयक पर बोलने का अवसर आपने दिया, इसके लिए धन्यवाद देते हुए मैं कहना चाहूंगा कि आजादी के ५३ वर्ष बाद भी जो समय की सोच थी, जो राष्ट्र की चिन्ता थी कि इस देश में क्षेत्रीय असन्तुलन नहीं होना चाहिए और इसके लिए पंचवर्षीय योजनाओं को लागू किया गया, लेकिन ५३ वर्ष बाद भी आज इस देश में ऐसे क्षेत्र पड़े हुए हैं जिनका अनुकूल विकास अभी तक नहीं हो पाया है। इसके लिए हमारे माननीय सदस्य ने जो विधेयक प्रस्तुत किया है, यह बहुत ही समयानुकूल है।

सभापति महोदय, आज देश में बहुत से हिस्से ऐसे हैं जिनके प्रदेशों को इस विधेयक में प्रदर्शित किया गया है, जैसे उत्तर प्रदेश के जिस क्षेत्र को प्रस्तावित किया गया है, उसमें उत्तर प्रदेश के पर्वतीय हिस्सों को दिखाया है, वह तो अब एक राज्य बन चुका है, लेकिन उड़ीसा का जो कालाहांडी का क्षेत्र है और उत्तर प्रदेश का पूर्वान्चल का हिस्सा जो २३ जिलों से आच्छादित है, उसकी ओर दिलाना चाहूंगा कि वहां आजादी के ५३ वर्ष के बाद भी इतनी आर्थिक विषमता है कि वहां के निवासी मजबूर हो करके कोलकता, मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों में आकर मेहनत और मशक्कत करने को विवश हैं। वहां आबादी अधिक है, खेती का क्षेत्रफल बहुत कम है, लेकिन ऐसा होने के बावजूद आज तक वहां कोई आर्थिक विकास नहीं किया गया। कुछ जिले जैसे आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, देवरिया, गोंड़ा, मऊ और बहराइच आदि क्षेत्र मुख्य धारा से, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक द्ृष्टि से काफी पीछे हैं, पिछड़े हुए हैं।

सभापति महोदय, आज वहां आवश्यकता इस बात की है कि इस तरह के क्षेत्रीय विकास के लिए बोर्ड बनाया जाए जो ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित कर के विकास करे। उनके पहचान के लिए कुछ प्रयास तो भारत सरकार ने किया है, लेकिन जो सतत पहचान करने की प्रक्रिया है, वह नहीं है। उसके लिए जो मशीनरी होनी चाहिए, जो ऐसे क्षेत्रों की सतत पहचान कर सके, वह नहीं है। उसको बनाने की विकसित करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए मैं बताना चाहूंगा कि मेरा जनपद मऊ ११ वर्ष पूर्व बना, लेकिन अभी तक उसमें कोई मूलभूत संरचना नहीं बन सकी। सड़कों का जाल नहीं बिछाया जा सका। कोई भी बड़ी औद्योगिक इकाई नहीं है। वहां साडी का विश्व प्रसिद्ध केन्द्र होने के बावजूद साड़ी फनिशिंग की कोई यूनिट नहीं लगाई गई है। शैक्षिक द्ृष्टि से काफी पिछड़ापन है। आज के आधुनिक युग में, कंप्यूटर के युग में वहां बी.एससी., बी.कॉम या एल.एल.बी. की शिक्षा देने के लिए महाविद्यालय तक नहीं हैं। कोई भारी उद्योग अभी तक स्थापित नहीं किया गया है। सामाजिक द्ृष्टि से भी वह क्षेत्र बहुत पिछड़ा हुआ है।

सभापति महोदय, मैं चाहूंगा कि उस क्षेत्र के विकास के लिए जो भी प्रयास किए जा सकें वे कम हैं। मैं केवल अपने ही क्षेत्र के लिए नहीं बल्कि देश के ऐसे जितने भी क्षेत्र हैं जो अभी तक अविकसित पड़े हुए हैं, उन सभी के बारे में कहना चाहता हूं कि उनकी पहचान कर के, उनके विकास के लिए पैकेज बनाए जाएं और् उनको कार्यान्वित किया जाए। यदि ऐसा होगा, तो जो लोग रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में, महानगरों में आते हैं और झुग्गी-झोंपड़ियों में रहकर यहां की आबोहवा को खराब करते हैं, यहां प्रदूषण फैलाते हैं, वह भी दूर हो जाएगा। क्योंकि पैकेजों को कार्यान्वित करने से उनके अपने ही गांव में उन्हें पर्याप्त रोजगार मिल सकेगा और वे अपने घर-परिवार के बीच रह सकेंगे। इससे महानगरों पर असर नहीं पड़ेगा, यहां का पर्यावरण और वातावरण ठीक रहेगा। उस समस्या से निजात मिलेगी।

साथ ही साथ जो पिछड़े हुए इलाके हैं, उनका भी विकास होगा। मैं निवेदन करना चाहूंगा कि हमारे पूवार्ंचल में खासकर मऊ डिस्टि्रक्ट में आई.टी.आई, पोलीटेकनीक आदि कोई भी इस तरह के विद्यालय नहीं है। इसलिए आप उस जिले में, पूवार्ंचल के विकास के लिए कोई बड़ा उद्योग स्थापित करें ताकि वहां की मानव शक्ति का पलायन न हो। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको पुन: धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री अब्दुल रशीद शाहीन (बारामूला) : जनाबेवाला, इस ऐवान में जो बिल हमारे मुअज़्जिज साथी मोहिते जी ने पेश किया है, इसकी मंशा की मैं ताईद करता हूं। इस बिल के दो हिस्से हैं इसके पीछे जो मंशा है, वह निहायत काबिले-तारीफ है और वह इस मुल्क के पिछड़े हुए इलाकों के लोगों की दिली तरजुमानी कर रही है। हम उऩ केटेगिरी स्टेट्स का जब जिक्र करते हैं, जिसमें रियासतें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और नार्थ ईस्ट का सारा इलाका आता है, वे रियासतें माशी तौर पर बड़ी मुश्किलात में हैं लेकिन इऩ रियासतों के अंदर जो इलाके हैं जैसे हमारे रियासत में बॉर्डर का इलाका टंगधार, गुरेज और उड़ी के ऊपर का इलाका है, उस इलाके के लोग जिन परेशानियों और मजबूरियों में इस वक्त पड़े हुए हैं, अगर इस मुल्क का सियासी निज़ाम उन लोगों की तरफ तवज्जो नहीं देगा तो बदकिस्मती से जो हालात रियासतें जम्मू-कश्मीर और नार्थ ईस्ट में इस वक्त हैं, वे और ज्यादा तबाहकुन सूरत इखतियार कर लेंगे। हम चाहते हैं कि इस मुल्क के वे तमाम इलाके जो माली तौर पर पिछड़े हुए हैं और जिनकी तरफ वकतन-फवकतन तवज्जो नहीं जाती है, उनके लिए कोई ऐसा मौसर इंतजाम हो कि उनके माली मामलात और उनकी मसाईल को हल करने के लिए पहले तवज्जो दी जाये। इस मंशा की हम पुरजोर ताईद करते हैं।

जनाबेआला, इस बिल के जो कानून और आईनी अमल-आवरी का पहलू है, शायद उसमें दुबारा देखने की जरूरत है क्योंकि रियासतों के इखतियार और मरकज के इखतियार और उसके अंदर शायद कुछ पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं, शायद यह बोर्ड, जैसे हमारे उड़ीसा के दोस्त ने इस ऐवान में जाहिर किया, वह दिक्कतें हाईल हो सकती हैं। लेकिन हमारे दोस्त ने जो पिछड़े हुए इलाकों के मसाईल को उबारने के लिए और आपकी तवज्जो मबज़ूल करने के लिए यह बिल पेश किया है, उस मंशा की पूरी-पूरी ताईद होनी चाहिए बल्कि हम उस मोहतरम ऐवान के तमाम हजरात से यह दरख्वास्त करेंगे कि इस अहम, नाजुक मौके पर जबकि हमारे इस मुल्क के जो बदख्वाह हैं, हमारी सरहदों के पार ऐसी-ऐसी कोशिशें कर रहे हैं कि यहां से तालीम-याफ्ता नौजवान जो बेकारी में हैं और पिछड़े हुए इलाकों के लोग जो माली और माशी तबाहाली में हैं, उनको किस-किस तरह से इस्तेमाल करने की साजिशें हो रही हैं ताकि इस मुल्क के अमले-आमान को ज़क पहुंचे। हम मोदबाना दरख्वास्त करते हैं इस मुल्क की सरकार से और डेमोक्रेटिक सिस्टम में तमाम जो इसके दस्तो-बाजू हैं, ओपोजिशन है या दूसरे इदारें हैं, वे इस मामले पर गौर करें और देखें कि पिछड़े हुए इलाकों के माली और माशी मुश्किलात हैं, उऩको फस्र्ट प्रॉयरिटी पर किस तरह से तवज्जो दी जाये और उसके लिए क्या कानूनी तरीका इखतियार किया जा सकता है, वह हमारे दोस्त की नजर में जो इन्होंने बिल पेश किया है, उसका तरीका यह भी हो सकता है कि अगर इसकी कानूनी अमल-आवरी सेहत पर गौर किया जाये और इसका ज़ामेय बनाया जाये तो इससे हमारी मुश्किलात पिछड़े हुए इलाकों के मुश्किलात में इज़िला हो सकता है। मैं एवान से यह गुजारिश करना चाहता हूं कि इस मंशा की हम भरपूर ताईद करते हैं।

     

श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव) : सभापति महोदय, सदन के संवेदनशील सदस्य श्री सुबोध मोहिते जो बिल लाए हैं, मैं उसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं विदर्भ में गया था। जब मैं वहां पहली बार गया तो देखा कि वह काफी पहाड़ी मुल्क है। विकास के मामले में पिछड़ा हुआ था। मैं एक अन्य विधायक के साथ वहां गया था। हमने पुरुष के कपड़े लिए थे। यह मालूम नहीं था कि वह पुरुष का कपड़ा है या स्त्री का कपड़ा है। वहां लोग अर्धनग्न रहते थे। अभी भी लोग अर्धनग्न रहते हैं। महाराष्ट्र के धुले डिस्टि्रक्ट में भी ऐसा है। इसलिए इस भावना से श्री मोहिते इस सवाल को बिल के माध्यम से लाए हैं।

…( व्यवधान)

सभापति महोदय : इस विधेयक पर तीन घंटे का समय निर्धारित किया गया था। वह समय समाप्त हो रहा है और अभी काफी माननीय सदस्य बोलने वाले हैं। यदि सदन की सहमति हो तो इसके लिए एक घंटे का समय और बढ़ा दिया जाए।

कई माननीय सदस्य : ठीक है।

सभापति महोदय : ठीक है, इस पर एक घंटे का समय और बढ़ाया जाता है।

श्री हरीभाऊ शंकर महाले : यदि नीति सही हो तो निश्चित ही भारत का असन्तुलन दूर हो सकता है। रास्ते में कोई झगड़ा हो तो कहा जाता है कि आयोग बना देना चाहिए। आदिम और पिछड़ी जाति के लिए आयोग बना हुआ है। वह आयोग सिफारिश भी करता है कि यह कार्य होना चाहिए लेकिन सरकार आयोग की सब सिफारिशों को कचरे में डाल देती है। देश आर्थिक द्ृष्टि से खाली है।

बहन रमा पॉयलट ने कहा कि यह बहुत बड़ा मुल्क है। पहले लोग बहुत कम थे। यदि पहाड़ी मुल्कों में कुछ हो जाता था तो जल्दी ही तहसील, डिस्टि्रक्ट और प्रान्त में सबको मालूम हो जाता था। आजकल ग्राम सेवक हैं, सरपंच हैं लेकिन सरकार की सामान्य जनता की परेशानी दूर करने की इच्छा नहीं है। राजनैतिक काम करना है, यही इच्छा है। विदर्भ बहुत अच्छा मुल्क है। वहां जंगल, खनिज और पानी भी है लेकिन जो सुविधा होनी चाहिए, वह नहीं है। वहां सुधार करने के बारे में नहीं सोचा जाता। मेरी सरकार से विनती है कि आयोग, आयोग करना ठीक नहीं है। वहां के लिए खास ध्यान देकर विकास के कार्यों की ओर कुछ किया जाना जरूरी है।

इस वक्त सुबोध मोहिते जी जो विधेयक लाये हैं, उनके विधेयक का समर्थन करके, उनको धन्यवाद देकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री माणिकराव होडल्या गावित (नन्दुरबार) : माननीय सभापति महोदय, मैं माननीय सुबोध मोहिते जी संसद सदस्य जो पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड विधेयक, २००० लाये हैं, इस विधेयक को समर्थन देने के लिए खड़ा हुआ हूं।

लगभग आठ राज्यों में पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड बनाने के लिए उन्होंने यह विधेयक रखा है। यहां पर उन्होंने एक अच्छा काम किया है कि उसमें चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, चार संसद सदस्य लोक सभा से और दो राज्य सभा से और नौ सदस्य केन्द्र सरकार के विभागों के सचिव वगैरह प्रतनधि दिखाये गये हैं। यह जो पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड होगा, इसका हैड आफिस दिल्ली में होगा, यह अच्छी बात है। जैसा अनेक मित्रों ने यहां पर बताया कि आजादी के ५२ वर्ष पूरे होने के बाद भी पिछड़े क्षेत्रों का विकास और आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं हुआ, इसलिए हमें बहुत दुख है। अभी मेरे मित्र महाले जी बोल रहे थे कि महाराष्ट्र में विदर्भ जैसा पिछड़ा क्षेत्र है, जिसमें आदिवासी क्षेत्र भी हैं, जिसमें धुले जिला आता है, नासिक जिला आता है, ठाणे जिला आता है, नन्दुरबार जिला आता है। विदर्भ में गढ़चिरौली जिला अभी-अभी महाराष्ट्र सरकार ने आदिवासी जिला बनाया है। उसके बाद वर्ष १९९८ में नन्दुरबार जिला जो सतपुड़ा पर्वत में है, जहां सरदार सरोवर परियोजना बन रही है, वह हमारे क्षेत्र में है। वहां आज भी लोगों को २५-३० किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है, इसलिए पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड की यहां पर मोहिते जी ने जो मांग रखी है, इसके लिए मैं उनको बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

देश में जो पिछड़े इलाके हैं, आदिवासी इलाके हैं, वहां पर ट्राइबल सबप्लान भी लागू किया गया है। हमने अभी-अभी लोक सभा की शैडयूल्ड कास्ट्स शैडयूल्ड ट्राइब्स वैलफेयर कमेटी में आन्ध्रा प्रदेश और गुजरात का दौरा किया और दोनों राज्यों के अधिकारियों के साथ चर्चा की, लेकिन ट्राइबल सबप्लान में जो भारत सरकार ने पैसा दिया है या राज्य सरकार ने उसमें अपने बजट से प्रोवीजन किया है, वह भी खर्च नहीं होता है। हमें इसका बहुत दुख होता है। मेरे मित्र महाले जी ने बताया कि बहुत से आयोग बनाये गये हैं, लेकिन जहां तक कार्यक्रम क्रियान्वित करने का सम्बन्ध है, उस पर भारत सरकार के सभी वरिष्ठ अधिकारियों का जितना ध्यान पिछड़े क्षेत्रों की ओर होना चाहिए, उतना नहीं है। इसीलिए हम कितने भी आयोग बनायें, विकास बोर्ड बनाये, जब तक हमारे ही देश के वरिष्ठ अधिकारी, किसी बाहरी देश के अधिकारी अब नहीं रहे, वे तो पहले ब्रटिश अधिकारी थे, वे चले गये, अब तो हमारे देश के नागरिक ही अधिकारी बने हैं, उनके पास जो जिम्मेदारी दी है, उनको जो कार्यक्रम क्रियान्वित करने हैं, वे नहीं हो रहे हैं। इसलिए अभी पिछड़े लोगों को भी बहुत दुख है। इसमें ज्यादा से ज्यादा केन्द्र सरकार को ध्यान देना चाहिए, राज्य सरकारों को भी ध्यान देना चाहिए और केन्द्र सरकार ने जो पैसा पिछड़े इलाकों के लिए दिया है, आदिवासी क्षेत्रों के लिए दिया है, उसके क्रियान्वयन के लिए केन्द्र सरकार की मनिस्ट्री, हर विभाग और केबिनेट में चर्चा हो, तभी पिछड़े इलाकों का कुछ विकास हो सकता है।

मैं महाराष्ट्र की बात कहना चाहता हूं। केन्द्र में और महाराष्ट्र में अलग-अलग दलों की सरकारें आती रहती हैं। हर सरकार बोलती है कि हम इस गांव को उस गांव तक जोड़ने के लिए सड़क बनाएंगे, लेकिन वह कभी नहीं बनी। हमारे राज्य में, विशेषकर विदर्भ में पीने के पानी की इस साल बहुत दिक्कत है। अगर पिछड़े इलाकों में सही ढंग से पीने की पानी की योजना, सड़क और बिजली की योजनाओं पर कार्य होता तो आज जो हम पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड बनाने की मांग कर रहे हैं, वह न करते। लेकिन आजादी के बाद इतने साल बीतने के बाद भी इन इलाकों में कोई छोटा या बड़ा उद्योग नहीं लगा। भारत सरकार की तरफ से कोई छोटा या बड़ा उद्योग पिछड़े क्षेत्रों में होना चाहिए, ताकि उन इलाकों का कुछ तो विकास हो सके। देश में सिंचाई की बड़ी-बड़ी परियोजनाएं हैं, वे भी पैसे के अभाव में लम्बित पड़ी हैं। अभी सरदार सरोवर का फैसला हो गया। उसमें देखा जाए तो गुजरात का सुजलाम-सुफलाम होने वाला है। लेकिन हमारे राज्य को कुछ नहीं मिलने वाला। जबकि हमारे गांव के गांव उसमें चले गए। तब हमारे क्षेत्र के आदिवासियों को आश्वासन दिया गया था कि आपको पुनर्वासित करेंगे और सिंचाई की जमीन देंगे। लेकिन वह जमीन तो दूर की बात कुछ भी नहीं मिला। सरदार सरोवर के अवार्ड में लिखा है, केन्द्र सरकार ने और राज्य सरकार ने कबूल किया है, पैसा भी दिया है, कि हम सिंचाई की जमीन देंगे, लेकिन अभी तक नहीं दी गई। पांच लोगों को एक बावड़ी दे दी गई। कुछ गांवों को मिलाकर २५ एकड़ जमीन दे दी गई। मैं भी छोटा किसान हूं। मैं जानता हूं कि अगर हम दो सगे भाई हैं, तो एक बावड़ी से खेती नहीं कर सकते, फिर पांच लोग कैसे करेंगे। इस तरह की योजनाओं से तो पिछड़े इलाके और पिछड़े होते चले जाएंगे और उनका विकास नहीं होगा। इसलिए केन्द्र सरकार को इस पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

महाराष्ट्र में अकाल पड़ा है। करीब २२ जिले अकाल की चपेट में हैं। इन सभी जिलों में २१३१ गांव हैं, जहां पीने के पानी की विषम परिस्थिति है। बिजली का नाम ही नहीं है। हमें बताया गया था कि जब सरदार सरोवर प्रोजेक्ट बनेगा तो महाराष्ट्र को भी बिजली मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देश को आजाद हुए ५२ साल हो गए, लेकिन आदिवासियों और हमारे घरों में अंधेरा ही है। इस तरह से पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए अनेक मांगें आती रहेंगी। अगर पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड सरकार चाहेगी तो बन जाएगा, लेकिन जब तक कार्यान्वयन ठीक नहीं होगा, तब तक ये इलाके पिछड़े ही रहेंगे।

मैं केन्द्र सरकार से विनती करूंगा कि पिछड़े इलाकों, आदिवासी इलाकों की तरफ ज्यादा से ज्यादा धन देने पर विचार करे और योजनाओं को क्रियान्वित करने की कोशिश करे। इसके लिए हो सके तो मंत्रिमंडल की उप समति बनाई जाए, जो इस चीज को देखे। इसके साथ ही मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूं।

17.00 hrs. श्री राम टहल चौधरी (रांची) : सभापति जी, सुबोध मोहिते जी द्वारा पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड का विधेयक, २००० लाया गया है, मैं उसका समर्थन करता हूं। इस विधेयक से उन क्षेत्रों का विकास होगा जहां आज तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई है और यह विधेयक बहुत ही सराहनीय विधेयक है। इस विधेयक से पहाड़ी क्षेत्रों का विकास होगा। इस बोर्ड में जो लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों को रखा गया है, यह भी एक अच्छा सुझाव दिया गया है। चूंकि जनप्रतनधियों को सारी बातों की जानकारी रहती है, इसलिए बोर्ड में उनका रहना आवश्यक है। इसी द्ृष्टिकोण से उन्हें इसमें रखा गया है। इस बोर्ड द्वारा उन क्षेत्रों का विकास करने के बारे में सोचा गया है जहां आज तक सिंचाई की सुविधा नहीं दी गई, जहां आज तक बिजली नहीं पहुंची, जहां अभी तक रेल, संचार और स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं है। उन क्षेत्रों का विकास करने हेतु यह विधेयक लाया गया है। इसी संदर्भ में मैं कहना चाहता हूं कि मैं झारखंड क्षेत्र से आता हूं और वहां के बारे में आपको जानकारी देना चाहूंगा कि झारखंड क्षेत्र एक जनजातीय क्षेत्र रहा है और यह पहाड़ और जंगलों का क्षेत्र है। वहां आज तक सुदूर क्षेत्र, जहां जनजातीय और पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं, गरीब लोग रहते हैं, उनके विकास के लिए जिन बातों का यहां पर सुझाव दिया गया है कि बोर्ड के माध्यम से वे सुविधाएं सरकार वहां देनी चाहती है, वहां अभी तक कुछ भी काम नहीं हो पाया है। इसी कारण झारखंड क्षेत्र में उग्रवाद बहुत जोरों से बढ़ गया है और १८ जिलों में से १६ जिले उग्रवाद से प्रभावित हैं। यही सबसे बड़ा कारण है कि वहां कोई भी विकास का काम नहीं हुआ है। आठ प्रदेशों को इसमें रखा गया है। मेरा आपसे आग्रह होगा कि जो झारखंड क्षेत्र का विकास नहीं हो पाया और वहां जो स्थिति है तथा वहां के लोग छ महीने रोजी रोटी की तलाश में कभी पंजाब या हरियाणा या आसाम अपने घर से बाहर निकल जाते हैं, इन लोगों का विकास हो। यह खुशी की बात है कि केन्द्र सरकार ने इस कार्य को अपने आधीन लिया है और उसके माध्यम से यह काम अब हो सकेगा। माननीय सदस्यों ने जो शंका व्यक्त की है कि ऐसे बहुत से बोर्ड बनते आये हैं, मैं कहना चाहूंगा कि यह सही है लेकिन यदि मन साफ नहीं हो, ईमानदारी से काम नहीं हो तो कोई भी बोर्ड बने, कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए ईमानदारी से काम करने की जरूरत है। जो पैसा सरकार दे उस पैसे का ईमानदारी से उपयोग हो तभी विकास गांव तक पहुंच सकता है। मेरे झारखंड क्षेत्र में जहां सब कुछ ईश्वर ने दिया है, वहां जंगल हैं, पहाड़ हैं, खेती है, बहुत से पर्यटक स्थल भी हैं जिनसे विकास किया जाये तो काफी लोगों को रोजी-रोटी मिल सकती है जिससे देश और प्रदेश दोनों को लाभ होगा। इसलिए झारखंड क्षेत्र को जो छोड़ा गया है, मैं आपके माध्यम से सरकार से आग्रह करूंगा कि झारखंड को भी इसमें सम्मिलित किया जाये और उसके विकास के लिए भी सोचा जाये। जिन बातों की यहां चर्चा की गई है, चूंकि सुदूर देहातों में अभी आवागमन की सुविधा नहीं है, इसलिए जो जंगल के इलाके में गरीब, जनजातीय तथा पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं, वहां मलेरिया का प्रकोप भी बहुत ज्यादा है और पिछले एक साल में हजारों लोग उसका शिकार हुए होंगे, हजारों लोगों की जानें गई होंगी मगर चूंकि आवागमन की सुविधा नहीं है, इसीलिए कोई गांव तक नहीं पहुंच पाता है।

उनकी दवा के लिए कोई ध्यान नही दिया गया है। उन क्षेत्रों में स्कूल नहीं है, न बिजली है, न कृषि के लिए सिंचाई की सुविधा है। किसी तरह की कोई सुविधा इन क्षेत्रों को नहीं मिल पाई है। इसलिए मेरा केन्द्रीय सरकार से आग्रह है कि झारखण्ड क्षेत्र को भी इसमें शामिल किया जाए। जिस उद्देश्य से यह बिल लाया गया है, यदि इस दिशा में ईमानदारी से काम किया जाएगा, तो हम समझते हैं कि इन क्षेत्रों का विकास होगा जिन क्षेत्रों का विकास आज तक नहीं हो पाया है। झारखण्ड राज्य में भी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां विकास नहीं हो पाया है और वहां के लोग कहते हैं कि आजादी किस चड़िया का नाम है, हम लोगों ने नहीं देखी है, सिर्फ सुना है। इन क्षेत्रों में विकास की किरण आज तक नहीं पहुंची है, कोई भी विकास का काम नहीं हो पाया है, ऐसे क्षेत्रों के विकास के लिए इस तरह के बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए। मैं पुन: सरकार से आग्रह करता हूं कि झारखण्ड को भी इसमें सम्मिलित किया जाए।

इन शब्दों के साथ मैं इस विधेयक का पुन: समर्थन करता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।

SHRI RAMESH CHENNITHALA (MAVELIKARA): Mr. Chairman, Sir, India is a vast and magnificent nation. We have enough natural resources. We have forests, hills, plains, rivers, mountains and backwaters. We are maintaining the unity and integrity of the country. We maintain the unity in diversity.

The people of India are by and large peace-loving and law-abiding. We have abundant natural resources in our country. But if you look at the areas in our country, wherever natural resources are more, those areas remain under-developed. Take the case of Chhattisgarh in your State. I correct myself that it is not in your State but it was till recently a part of your State. Take the cases of Jharkhand and Uttaranchal. These areas are under-developed areas in our country. But these areas have abundant natural resources. Unfortunately, we are not able to tap the resources properly. We have no plan to tap these resources. So, these areas remain under-developed.

Next, creation of new States is not the remedy. Actually speaking, if a State is very small, the political instability will be greater. Look at Goa. Forty MLAs are there. Thirty-nine MLAs became Ministers in a very short period. All the time they are in the crucible of political instability. Except the Speaker, all of them became Ministers within a span of one year. So, creation of a small State is not the remedy. It will create more troubles in future. But that is not the point to be discussed now. The point is that development should have a clear-cut planning. We should have a clear-cut planning to avoid regional imbalances. Unfortunately, we have no proper planning. Because of that, certain areas in our remotest parts of the country remain under-developed. So, planning should be done in such a way that every area should be given its proper due. We are not able to give every area its proper due now. If we go on doing like that, all these areas will remain under-developed. Backwardness can be removed by a balanced growth. Unfortunately, the balanced growth is not there. Equitable distribution of wealth is not taking place in our country. That is the biggest problem. I am not blaming anybody.

Sir, we are now in an era of coalitions. If you look at the successive coalition Governments, you will see that powerful political partners are getting all the developmental benefits. If they bargain, the Government will succumb to the pressure and accept their demands. It is done for the existence of the Governments. This is a new phenomenon that is coming up.

The political party which commands more strength in Lok Sabha or in the Assemblies, they would get more power which they actually deserve. When we are living in an era of coalition, this is one of the most important points to be taken care of.

For example, if the Railway Minister is from a particular State, that State would get all the railway lines, and all the important projects of the Railways. Demands were raised to the effect that the office of Railway Ministry should be rotated to the States. When Shri Jaffer Sharief was the Railway Minister in the Congress regime, he only looked after Karnataka. When Kumari Mamata Banerjee became the Railway Minister, she is only looking after West Bengal. Irrespective of party politics, I am saying that this is the attitude of the day. As a result of this, the areas, which deserve more attention, is neglected. In an era of coalition Government, this phenomenon should be taken care of. We should have a national outlook on this.

Unfortunately, North-Eastern States are more backward. When Shri Manmohan Singh was the Finance Minister, he had introduced certain schemes for removing the industrial backwardness in the North-Eastern States. Unfortunately because of lack of infrastructural facilities, these schemes were not properly implemented and the North-Eastern States were not developed at all. Take Uttar Pradesh, Bihar, Madhya Pradesh, and also Maharashtra, as rightly pointed out by my hon. colleague, where certain areas still have no electricity, schools, and infrastructural facilities. People have no access to the markets. Because of non-accessibility to the market, they are not in a position to sell their goods. These are the real backward areas in our country. What is most important is that we have to have a real planning for the removal of industrial backwardness in these areas. Nobody is investing money in the backward areas and no industry is coming up. Even though the Government is giving more facilities, more subsidies and tax holidays for these projects, really speaking, nobody is going and investing the money in these areas.

We are living in the agrarian society. The fruits of scientific revolution have not reached the villages. Till now, our farmers are adopting the age-old system of farming. They are mostly dependent on the monsoon. They are not getting real scientific and technological know-how. Hence, our production is less and we can see the real backwardness in our agricultural sector. I conclude by making two or three points.

Regarding education, if we go to the most populous States, we can see that the educational facilities are very meagre. Schools are only in the books. A number of schools exist on paper. No teacher is going to the schools. Of course, students are not going to the schools. The education is totally nil in those areas. There should be a concerted effort for the economic upliftment of the poorest of the poor. We had implemented a lot of programmes. For example, the IRDP. The IRDP is one programme which was aimed at poverty alleviation. But the incidence of poverty has to be evaluated and the economic activity should be accelerated. We can remove backwardness only when we accelerate the economic activities at the village level.

Poverty, unemployment and illiteracy are the three main issues confronting the people who are living in the backward areas. Merely constituting or forming a board will not help.

Sir, I was just now discussing with Shri Sontosh Mohan Dev about the backwardness in the North Eastern States. In many of the North Eastern States like Assam, people are not getting basic facilities even today also. Then, Shri Kharabela Swain was mentioning about the KBK districts in the State of Orissa which needs to be given more and more attention to remove backwardness. Finally, I support the Bill, but I would like to say that merely constituting a Backward Areas Development Board would not help. We should have a visionary thinking and proper implementation of the programme should be there.

 

श्री ब्रहमानन्द मंडल (मुंगेर) : सभापति जी, पिछड़ा क्षेत्र विकास बोर्ड विधेयक-२००० में जो भावनाएं व्यक्त की गयी हैं, मैं उनका समर्थन करता हूं। देश के जो पिछड़े राज्य हैं और उन पिछड़े राज्यों में जो सबसे अधिक पिछड़े क्षेत्र हैं उनके लिए माननीय मोहिते साहब ने बोर्ड बनाने की बात की है। मुझे ऐसा लगता है कि यह एक तरह की एटॉनमस बॉडी होगी। इसमें चर्चा की गयी है कि यह बोर्ड किसके नियंत्रण में काम करेगा। इस विधेयक से लगता है कि यह केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में काम करेगा क्योंकि केन्द्रीय सरकार ही सारे राजस्व की व्यवस्था करेगी। मेरे दिमाग में यह बात आ रही है कि जिन राज्यों में पिछड़े क्षेत्र हैं उन राज्यों की सरकारें क्या करेंगी, इस बोर्ड का रवैया उनके प्रति कैसा होगा, इसकी चर्चा इसमें नहीं है। केन्द्रीय सरकार, बोर्ड और राज्य सरकारें इन तीनों के बीच क्या संबंध होंगे, क्योंकि इसका हैडक्वार्टर सीधे दिल्ली में होगा। इसमें जितने खर्चें होंगे, उन्हें केन्द्रीय सरकार करेगी और इसमें जितने विभागों की चर्चा योजना आयोग सहित की गयी है वे इस बोर्ड के सदस्य होंगे और ये सारे संसद द्वारा ही पारित किये जायेंगे। तो क्या यह सीधे केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में बोर्ड होगा और वहां राज्य सरकारों का भी काम होगा। इस तरह से राज्य सरकारों और केन्द्रीय सरकार दोनों का ही इसमें हस्तक्षेप होगा - ऐसी कोई चर्चा इसमें नहीं है। इसमें साफ और स्पष्ट बात होनी चाहिए कि एटॉनमस बॉडी बन जाती है तो वह किसके मातहत काम करेगी। इसलिए माननीय मोहिते साहब को थोड़ा जबाव भी देना चाहिए और इसमें थोड़ा संशोधन भी करना चाहिए।

दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूं वह यह है कि इस भावना का समर्थन मैंने इसलिए किया है कि इसमें उत्तर बिहार की चर्चा की गयी है। अब झारखंड अलग हो गया है, इसलिए अब बिहार ही कहा जाएगा। अब मध्य बिहार और उत्तर बिहार ही बिहार है। अब वह मुख्य रूप से कृषि-प्रधान रह गया है।

यद विकास बोर्ड का गठन होता है तो वह कैसे काम करेगा, मेरे दिमाग में यह बात नहीं आती है लेकिन निश्चित रूप से इन क्षेत्रों के विकास के लिए एक योजना बननी चाहिए। पिछड़े राज्यों में जो पिछड़े क्षेत्र हैं उनके लिए योजना बननी चाहिए।

हमारे देश में यातायात के दो प्रमुख साधन हैं। वैसे तो हवाई जहाज से भी हम यात्रा करते हैं लेकिन हमारे देश में बहुत कम लोग इसमें यात्रा करते हैं। इन पिछड़े क्षेत्रों के बारे में हवाई जहाज की चर्चा करना मैं उचित नहीं समझता लेकिन रोड और रेल दो यातायात के साधन हमारे गांव और नगर की जनता को मिलने चाहिए। इनफ्रास्ट्रक्चर जिसे हम साधन कहते हैं, उन्हें वहां पहुंचाने का काम करना चाहिए और रोड तथा रेल को योजना में सबसे पहले लेना चाहिए। उन्हें पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचाना चाहिए। यदि हम इन्हें पहुंचा देते हैं तो चाहे कृषि पर आधारित उद्योग हों, चाहे उस क्षेत्र की धरती पर जो मिनरल्स सम्भावित होते हैं, उनका पूरा उपयोग करने की बात हो, उससे पूंजी वहां तक पहुंच जाएगी। उन क्षेत्रों में बिजली की व्यवस्था करनी चाहिए। नेपाल से जितना पानी आता है वह गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती और कोसी नदियों में बह जाता है। इससे उत्तरी बिहार को नुकसान पहुंचता है। वह वहां के इनफ्रास्ट्रकचर, स्कूलों, कम्युनिटी हॉल्स और सड़कों को हर साल बरबाद करता है। जरूरत इस बात की है कि इसे रोकना चाहिए। इसके लिए बड़ा बांध बनाया जाए। योजना आयोग ने भी कहा है कि उस पानी को रोकना चाहिए। वहां बांध बना दिया जाए और उससे पन बिजली पैदा की जाए। हमारे देश में पन बिजली सबसे सस्ती पड़ती है। नेपाल से जो पानी आता है, उससे २० हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। यातायात और बिजली की वहां व्यवस्था हो जाए तो सब चीजें अपने आप हो जाएंगी। मैंने उत्तरी बिहार का उदाहरण दिया। देश के पिछड़े क्षेत्रों में इन तीन चीजों की व्यवस्था केन्द्र सरकार करे और उसके लिए धन का आवंटन करे। राजनीतिक इच्छा शक्ति होने से इन पिछड़े राज्यों को हम देश के नक्शे में ला सकते हैं।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं माननीय सदस्य की भावना का समर्थन करता हूं। यदि नियम, कायदे के अनुसार यह विधेयक आता तो इसका पूरी तरह समर्थन किया जाता। आपने मुझे बोलने का जो समय दिया, इसके लिए धन्यवाद देता हूं।

SHRI E.M. SUDARSANA NATCHIAPPAN (SIVAGANGA): Respected Chairman, Sir, it is a very important Bill on the aspect that the backwardness should be a very important point for consideration of the Planning Commission and also the Minister for Planning who is available here. We would like to draw on the basis of this Bill that the areas which are covered in the Bill, especially the southern districts of Tamil Nadu, which include my constituency, are Pudukkotai, Sivaganga and Ramnad. These districts are also classified as backward districts - industrially and economically.

But now, after having about 12 textile mills, these districts were taken away from the classification of backward area. Simply by taking away from the classification of backward area, these areas are not getting any economic subsidy or economic help from the Government. The Government is having certain criteria to classify an area as a backward area. If it is having some small-scale or medium scale industries, then that area is taken away from the classification of backward area. I would like to submit that simply having small-scale and medium scale industries would not make the area forward. The purchasing power of the people should be taken into consideration.

Our area was once a very rich place. When there was a development activity in the neighbouring district that is in Madurai, the surplus water that was coming from Vaigai and Periyar had stopped by the construction of dams. That is a good development activity. That is a good development activity for Madurai but not for our district. Our district has become backward because of not getting the surplus water from Vaigai and Periyar dam. Therefore, we are depending on the rainwater. About 3,400 irrigation tanks are there but these irrigation tanks have not been renovated. A plenty of money had been borrowed from the foreign countries, foreign banks and from the Central Government Departments but the money had not been properly utilised. If you take the data, you will find that so many crores of rupees had been spent on irrigation and for the improvement of these tanks but nothing is happening. That is why, we would like to submit that our area is having a rich resource. It is having a basic structure for irrigation. We are now taking it as a very fast water-harvesting scheme. It is there for thousands of years but it is not properly renovated. The supply channels were not improved properly.

Then, proper irrigation is not there. The rain water is not properly harvested. That means, there is a drought. The ground water is also going down. The sea water is also coming down. This is the thing that is happening. Therefore, the backward area is becoming the most backward area. What is the remedy for it? We have to choose it as a thrust area. I would like to request the Government that at least one Parliamentary constituency in each and every State should be taken as a nodal area, that is a sample area, where you can improve in certain areas so that the backwardness can be eradicated. For that purpose, this Bill is very useful. Different Departments should co-ordinate. For example, we are not having a broad-gauge line. Even for conversion of a line, which was announced this year, only a sum of Rs.5 crore has been allotted. That is not sufficient. It needs about Rs.250 crore. When are we going to get that broad-gauge line? How can that area become a developed area? Therefore, industrial backwardness is there. Transport facilities are not available. Infrastructure facilities have to be improved. Whether the hen is before or the egg is before, that is the question we have to answer.

The Government should concentrate on these backward areas. It is just like a human being. When a hand is not working properly due to paralytic attack, that hand should be given proper treatment, that handicap should be removed. Then only, the whole structure of the human being can be seen in the same way and the nation also can be seen in the same way. Therefore, this Bill will create an impact on the Ministry so that they will have the planning, which can be a total, comprehensive and area-wise. With proper focussing or attention, we can do it.

We can develop the backward districts. That mental attitude can be removed and development can be brought about.

 

THE MINISTER OF STATE OF THE DEPARTMENT OF DISINVESTMENT, MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING, MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF STATISTICS AND PROGRAMME IMPLEMENTATION, AND MINISTER OF STATE IN THE DEPARTMENT OF ADMINISTRATIVE REFORMS AND PUBLIC GRIEVANCES OF THE MINISTRY OF PERSONNEL, PUBLIC GRIEVANCES AND PENSIONS (SHRI ARUN SHOURIE): Sir, we are all very grateful to Shri Subodh Mohite for the Bill that he has introduced. Because of that Bill, a very important subject has been discussed. Extremely significant suggestions and points have been made and the entire debate has been completely non-partisan.

Just now we have heard a very good example of that. An Hon"ble Member mentioned the examples of Railway Ministers. He took the examples from both Parties, from both sorts of Government. So, we all share the concern, which lies behind this Bill. There is backwardness and that is the heart of the problem of development in our country. That goes without saying.

The limited question to which I will address myself is whether the solution which has been proposed in Shri Mohite"s Bill is a solution which will take us closer to the objectives which all of us want to achieve in this matter. The sympathy of all Members for the poor is such, so intense that Shri Haribhau Shankar Mahale when he was speaking उन्होंने सारी स्पीच में यह कहा कि एक और आयोग बनाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा । मगर उसी बिल का जो कि एक नहीं, बल्कि पांच-दस और ऐसे आयोग बनाना चाहता है, उसका अंत में समर्थन किया। यह संवेदना और सहानुभूति एक बात है but we have to really consider whether this particular remedy of setting up a Central Board is going to help solve the problem, a problem which, in all other debates we have been saying is better addressed by further decentralising power and functions.

This debate has been a very constructive one and I assure you that the specific suggestions which have been made, for instance, about a concerted attack on poverty, and of changing the direction of our planning, I will certainly convey to all concerned and do my little bit to ensure that those things are done. But at the moment, I will confine myself only to this particular point about the Board.

If we look at the speeches, which have been made, you will see that almost three-quarters of the country would have to be covered under that Board. That is one point. जैसे अभी आपने बिहार के बारे में कहा, मगर जब हमारे साथी झारखंड की तरफ से बोल रहे थे तो वे कह रहे थे कि वहां रिसोर्सेज होते हुए भी बैकवर्डनैस है। So you will cover again three-quarters of the country in the purview of this Board.

The second point is, as Shri Kharabela Swain pointed out, to use his words, this will be ‘a baby of the Central Government’. If you see the composition, it is to be set up by the Central Government. The Chairman is to be the Vice-Chairman of the Planning Commission; another Vice-Chairman is to be appointed by the Central Government; and nine members are to be appointed by the Central Government to represent nine Ministries of the Central Government. Now, the point is that all these persons are already trying to attend to these problems. If they are not attending to these problems, then just putting them in another Board is not going to change the character of the Board, nor their functioning, whichever the Government that is in power.

A very valid question was just raised by our friend from Bihar about what the relationship will be of the Governments which are of the States which have these backward districts or backward areas in their command. उनकी रिलेशनशिप क्या होगी? वह जो सारी सरकारें हैं, वह नेशनल डैवलपमेंट काउंसिल की मेम्बर्स हैं। वहां वे यही मुद्दा उठाते हैं। आपने बिल्कुल ठीक कहा कि एक तरफ हम चाहते हैं कि उन स्टेट गवर्नमेंट्स को, और बाकी पंचायत राज वगैरह की इंस्टीटयूशन्स को ज्यादा पावर्स दी जाएं और दूसरी तरफ हम कह रहे हैं कि एक सेन्ट्रल बोर्ड बनाया जाए और वह सेन्ट्रल बोर्ड जो कि सेन्ट्रल गवर्नमेंट बनाएगी, आज की या कल, जो भी बनाएगी, जिसमें वही सेन्ट्रल प्लानिंग कमीशन, वही सेन्ट्रल मनिस्ट्रीज़ के मेम्बर्स अधिकतम होंगे और पांच मेम्बर और अपॉइंट किये जाएंगे सेन्ट्रल गवर्नमेंट से, वह बोर्ड कहां तक सेन्ट्रल गवर्नमेंट से और ऑटोनॉमस होगा ?

सभापति महोदय, यह सोचने की बात जरूर है और वह स्टेट गवर्नमेंट्स, जो सब नैशनल डिवेलपमेंट कौंसिल में रिप्रजेंटेड हैं, वे इस नए बोर्ड के द्वारा क्या कर पाएंगी, जो आज नैशनल डवलपमेंट कौंसिल के द्वारा नहीं कर पा रही हैं ? इस प्रकार से एक तो इसके कंपोजीशन का मुद्दा है। दूसरी बात यह है कि जहां तक पावर्टी का सवाल है और स्टेट्स तथा उनमें बैकवर्ड एरियाज और उनमें भी बैकवर्ड सैक्शन्स का सवाल है, जो भी हाउस में कहा है, उसमें मैंने पाया है कि हरेक माननीय सदस्य ने एक ही बात कही है। उससे सरकार, बुद्धिजीवी और पालटिकल क्लास, सभी लोग सहमत हैं। जब लाइसेंसिंग का पीरियड था, उस समय कहा गया कि बैकवर्ड डिस्टि्रक्टस में इंडस्ट्रीज लगाई जाएं, वह इंसेंटिव आज तक कायम है, लेकिन आपको मालूम है कि पिछड़े जिलों में उद्योग नहीं लगे, बल्कि मुम्बई आदि महानगरों में ही उद्योग लगे और विकसित हुए।

सभापति महोदय, अभी हमारे माननीय सदस्य बोल रहे थे कि उन एरियाज में सरकार को उद्योग लगाने चाहिए।

श्री माणिकराव होडल्या गावित : केन्द्र सरकार को वहां उद्योग लगाने चाहिए।

श्री अरुण शौरी : इस पर भी हमें तवज्जो देनी चाहिए कि केन्द्र सरकार बोर्ड बनाए, उस पर स्टेट गवर्नमेंट का हक हो, वह स्टेट गवर्नमेंट के अंडर हो, मगर सेंट्रल गवर्नमेंट कहीं से पैसा लाए। आप मुझे बताइए सेंट्रल गवर्नमेंट कहां से पैसा लाएगी। अभी स्वैन साहब बता रहे थे कि रेल का यदि पैसेंजर फेयर ऊपर जाता है, तो हम सब चिल्लाते हैं, लेकिन रेलवे लाइन बने, यह हम सभी चाहते हैं। यदि किराए नहीं बढ़ेंगे, तो रेलवे लाइन निर्माण के लिए सरकार कहां से पैसा लाएगी ? यह भी तो सोचने की बात है।

सभापति महोदय, पिछली बार भी जब डिसइनवेस्टमेंट के ऊपर बात चली थी, तो मैंने यह एन्यूमरेट किया कि आज पब्लिक सैक्टर की क्या हालत है। वे सब पैसे लगाते हैं और बैकवर्ड डिस्टि्रक्ट में पैसे लगाए गए हैं। इससे कुछ नहीं होता, पैसे लगाने से उन्नति नहीं होती। मैं इस बात में नहीं पड़ना चाहता हूं, वह सैपरेट चीज है। इस समय हमारी प्रॉब्लम यह है कि, जैसा सब मैम्बर्स ने कहा, आज हमारी ग्रोथ ज्यादा हो गई है पहले ढाई-तीन परसेंट थी और आज छ:-साढ़े छ : परसेंट होती है, तो हम कहते हैं कि प्रगति स्लो हो गया है मगर उसके बावजूद कंट्री के कुछ एरियाज हैं जहां यह ग्रोथ ठीक प्रकार से नहीं चल रही है। इसमें खासतौर से छोटे-छोटे रीजन्स और छोटे-छोटे रीजन्स ही नहीं, बल्कि पंजाब और हरियाणा में सत्तर और अस्सी के दशक में जो ग्रोथ रेट थी, वह अब एक प्लैटू पर आ गई है और बहुत डेंजरस फिनामिना चल रहा है। पंजाब और हरियाणा के बाद वैस्टर्न यू.पी. को छोड़कर, नॉर्थ ईस्ट तक केवल एक इलाका है, जिसमें प्रगति हो रही है और वह कौनसा इलाका है ? वह है बंगलादेश, हमारे यहां नहीं। सारे एरिया में आधे से दो प्रतिशत ग्रोथ हो रही है। उसका रिजल्ट क्या है ? जैसे अभी हमारे भाई साहब बता रहे थे कि वेस्टर्न गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में ग्रोथ ७, ८ और ९ प्रतिशत तक चल रही है, और इस इलाके में, बिहार जैसे राज्य के इलाके में, पर कैपीटा ग्रोथ सिर्फ आधा परसेंट हो रही है। इस प्रकार से कंट्री का जो डिवीजन ग्रोथ के आधार पर हो रहा है, उससे आगे चलकर बहुत मुश्किल पड़ेगी। इसलिए मैं आपके इस द्ृष्टिकोण में बिलकुल शामिल हूं और हमें देखना चाहिए कि इसका कारण क्या है।

सभापति महोदय, इससे आगे जाकर भी मैं एक छोटे से राज की बात यहां और कहना चाहता हूं कि एक स्टेट के बीच में भी जो आंकड़े हैं वे बहुत ही डेंजरस पोटेंट का प्रतीक हैं। उमा जी यहां हैं। मध्य प्रदेश में १९९३-९४ में सर्वे हुआ था, जिसका जिक्र आज सुबह फायनेंस मनिस्टर साहब कर रहे थे,In Madhya Pradesh 4l per cent of the people were below the poverty line.

In South Western Madhya Pradesh, 68 per cent people were below the poverty line; in Gwalior region, only 17 per cent people were below the poverty line. एक ही रीजन इस असमानता आने से और भी ज्यादा गंभीर चीजें होंगी। In the coastal region of Maharashtra, 15 per cent people were below the poverty line; and in Inland Central, 50 per cent people were below the poverty line. So, this kind of a division between States, between regions within a State, and, within a region, between districts is a very dangerous thing. I agree with that. But the reason for this is not the absence of a Central Board. It is something completely different. It is not that allocations are not being made. It is not that Boards are not available.

We have placed a copy of the highlights from the 9th plan Mid-term Appraisal in the Library. The Appraisal has been completed and it is being printed, and we hope that we will be able to distribute copies of the Mid-term Appraisal of the Ninth Plan during this Session. It is astonishing. एंटी पावर्टी स्कीम्स पर क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि आज हम सालाना कितना आउटले कर रहे हैं ? हरेक साल ३५ हजार करोड़ रुपये …( व्यवधान)

श्री राजीव प्रताप रूडी (छपरा) : पहुंचता नहीं है।

श्री अरूण शौरी : एग्जैक्टली। हमारे प्लानिंग सैक्रेट्री श्री सक्सेना साहब ने कैलकुलेशन की है कि अगर सब पावर्टी स्कीम्स बंद कर दी जाये और जो बिलो पावर्टी लाइन फैमिलीज हैं, उनको मनीऑर्डर में रकम भेजें तो हरेक परिवार को आठ हजार रुपये प्रति साल नगद मिलेंगे। उससे वह ढाई किलो राइस हर दिन खरीदकर अबव पावर्टी लाइन पर खुद ही आ जायेंगे। Is it a question of allocation? Is it a question that a Board is not available? I will give an example to illustrate the problem रघुवंश जी यहां नहीं हैं इसलिए मैं बिहार पर बोल सकता हूं। बिहार और महाराष्ट्र में…( व्यवधान)

डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल (बेतिया) : हम दो व्यक्ति बिहार के बैठे हैं।

श्री अरूण शौरी : इसलिए मैं डरकर बोल रहा हूं। बिहार की पापुलेशन महाराष्ट्र से थोड़ी ही ज्यादा है, शायद साढ़े नौ करोड़ है और महाराष्ट्र की ८.८ करोड़ है। मगर आप देखिये कि बिहार की फाईव ईयर प्लान की सलाना आउटले २,३०० करोड़ रुपये है जबकि महाराष्ट्र की ८,४०० करोड़ रुपये है। इसका राज क्या है ? यह नहीं कि कोई बिहार के अगैनस्ट डिसक्रमिनेट कर रहा है। मगर बिहार काउंटर पार्ट फंड जो उसको कंट्रीब्यूट करना पड़ता है, वह नहीं कर पाता। आप बैकवर्ड डिस्टि्रक्ट के लिए बोर्ड बनाइये, उससे क्या बिहार काउंटर पार्ट फंड कहीं से निकाल लायेगा ? अभी दूसरे हाउस में नीतीश कुमार जी बता रहे थे। वे खुद बिहार से हैं। बिहार में फ्लड है। प्राइम मनिस्टर ने उनको कहा कि आप वैस्ट बंगाल में जाइये तो वह बिहार में भी यह देखने के लिए चले गये कि वहां क्या सिचुएशन है। वह बता रहे थे कि फाइनेंस कमीशन, सी.ए.जी. ने कहा है कि जो भी कैलेमिटी के लिए फंड बना है, उसके लिए आप सेपरेट अकाउंट खोलिये। नीतीश कुमार कह रहे थे कि मैं वहां दो बार जा चुका हूं। हम पैसा देना चाहते हैं लेकिन आप अकाउंट तो खोलिये। वहां अकाउंट तक नहीं खुला है। मेन कारण एडमनिस्ट्रेशन की हालत है। उसके कारण यह सब चीजें होती हैं। उसी के कारण इनइक्वैलिटीज हैं। उसी के कारण पावर्टी रहती है और इस मर्ज के लिए बोर्ड बनाना कोई दवाई नहीं है। पिछले ६ साल में रूरल वाटर सप्लाई स्कीम के लिए, आपने पावर्टी के बारे में कहा कि उसमें वाटर सप्लाई बहुत महत्वपूर्ण है, बिहार के लिए रूरल वाटर सप्यलाई के लिए यहां से जितना पैसा दिया गया था, उसमें से ६०० करोड़ रुपये बिहार यूटीलाइज नही कर पाया। दिल्ली में बोर्ड बनाने से बिहार की एडमनिस्ट्रेशन पर क्या असर पड़ेगा ? यह चीज बिहार ही के बारे में नहीं है। जब प्रियरंजन दासमुंशी जी इसी बिल पर बोल रहे थे तो उन्होंने बहुत जोर से बताया था कि नॉर्थ बंगाल का क्या हाल है। उन्होंने यह भी कहा कि आरसेनिक, पायजनिंग हो रही है। उसमें आप देखिये कि तथ्य क्या हैं ?

वैस्ट बंगाल पर कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट हमारी लाइब्रेरी में रखी है। आप जरूर उसे पढि़ए और पढ़ कर अनुमान लगाइए कि ऐसे बोर्ड बनाने से क्या होगा। रिपोर्ट में बताया है कि Ninety-five per cent of the total expenditure in West Bengal is just in payment of salaries.

५ प्रतिशत के ऐक्सपैंडीचर से आप क्या असैट बनाएंगे ? अगर आप एक और बोर्ड बनाते हैं तो ५ प्रतिशत का भी ३ प्रतिशत रह जाएगा क्योंकि और सैलरीज़ देनी पड़ेंगी। वैस्ट बंगाल की पब्लिक सैक्टर ऐंटरप्राइजेस में ३,५२० करोड़ रुपये का इन्वैस्टमैंट हुआ है और ५५ लाख रुपये रिटर्न आया है यानी इस समय ०.०१ प्रतिशत रिटर्न आया है जबकि वैस्ट बंगाल सरकार साढ़े बारह प्रतिशत ब्याज देकर बॉरो कर रही है। १२ प्रतिशत ब्याज देकर वैस्ट बंगाल गवर्नमैंट बॉरो करे, उसके बाद ३,५२० करोड़ रुपये पब्लिक सैक्टर ऐंटरप्राइजेस में लगाए और सिर्फ ०.०१ प्रतिशत रिटर्न मिले, यह परेशानी है। वह परेशानी बोर्ड बनाने से हल नहीं होगी।

इसी तरह अभी एक माननीय सदस्य ने विदर्भ के बारे में कहा कि ऐसे बोर्ड बनाने में काफी ऐक्सपीरिएंस है। विदर्भ, मराठवाड़ा और रैस्ट ऑफ महाराष्ट्र में १९९४ से बोर्ड बने हुए हैं। उनमें सौ करोड़ रुपये सालाना ऐक्सपैंडीचर होता है। मैंने मिनट्स देखे हैं। हमारी प्रिंसिपल ऐडवाइजर श्रीमती कृष्णा सिंह इन्हीं चीजों को डिस्कस करने के लिए महाराष्ट्र गई थीं। एक आइटम था कि बोर्ड कैसे काम कर रहे हैं। उनके मिनट्स देखिए।

"Chairmen of two Development Boards, along with officers of all the three Development Boards were present."

महाराष्ट्र में ऐसे डैवलपमैंट बोर्ड हैं जो आप इस बिल में चाहते हैं कि बनाए जाएं।

"Chairman, Marathwada Board, as also the Chairman for the rest of Maharashtra accepted the fact that these Development Boards have not had the required impact on the removal of regional imbalances which, in some cases, have further widened. "

सभापति महोदय : क्योंकि इस पर बढ़ाया गया समय भी पूरा हो रहा है इसलिए मैं सदन की सहमति चाहूंगा कि जब तक मंत्री महोदय उत्तर दें, श्री सुबोध मोहिते बोलें और इस बिल को डिस्पोज़ ऑफ कर सकें, उसके बाद श्री गीते जी इन्ट्रोडक्शन का कन्सीड्रेशन प्रस्तुत कर लें, तब तक के लिए इसका सदन का समय बढ़ाया जाए।

श्री अनंत गंगाराम गीते (रत्नागरि) : सभापति महोदय, छ: बजे तक चलाइए। उसके बाद अगर नहीं चलता है तो आप उसी पर रोकिए और मुझे अगले दिन इंट्रोडयूस करने का मौका दीजिए।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : मैंने आपके विधेयक को कन्सीड्रेशन में लेने के लिए सदन की अनुमति मांगी है। यह मंत्री महोदय के ऊपर है।

श्री अनंत गंगाराम गीते : दस मिनट बाकी हैं, तुरन्त करना चाहिए।

MR. CHAIRMAN: It is up to the hon. Minister.

SHRI ARUN SHOURIE: I will just finish in two or three minutes.

एक प्रपोज़ल थी कि कोंकण के लिए एक और बोर्ड बनाया जाए। महाराष्ट्र के अधिकारी और बोर्ड के चेयरमैन क्या कहते हैं।

"Regarding the setting up of a separate Development Board for Konkan, the Chairman of the rest of Maharashtra was of the view that though the Maharashtra Assembly had approved of this, this was, in no way, going to help Konkan, even if it had a separate Board."

जो बोर्ड चला रहे हैं, उनका यह ऐक्सपीरिएंस है। दो और छोटे प्वाइंट्स हैं । ७३वां और ७४वां अमैंडमैंट है जिनमें पंचायती राज इन्सटीट््यूशन्स के लिए पावर देने की बात है, उसे आप ऐसे प्रपोज़ल से बिल्कुल रिवर्स कर देंगे क्योंकि इस बिल से यहां और भी सैंट्रलाइजेशन हो जाएगा। इसी तरह फिफ्थ शैडयूल में आपने अदर ट्राइबल एरियाज़ के लिए कौन्सटीटयूशन में बिल्कुल डिफरैंट प्रावधान किया हुआ है। सिक्स्थ शैडयूल में नॉर्थ ईस्ट की ऑटोनोमस काउंसिल बनाई हुई हैं। उनको भी रिवर्स कीजिएगा अगर ऐसे बोर्ड बनाएंगे। मेरी मोहिते जी से गुजारिश है कि आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रौबल्म उठाई है, सारा हाउस आपके साथ है।

एक बहुत महत्वपूर्ण सजेशन दिया गया है कि प्लानिंग को रीओरिएण्ट करना चाहिए, उसमें मैं आपको वायदा देता हूं कि सरकार उसी दिशा में काम कर रही है और जब आप मिड टर्म एप्रेजल देखेंगे, जिसकी हाईलाइट की कापी लाइब्रेरी में रखी गई है, उसकी प्रिण्टेड कापी आपको मिलेगी, उसको आप देखेंगे तो पाएंगे कि सारा फोकस ही यह है कि कैसे वैकवर्ड एरियाज में, बैकवर्ड सैक्डयसनस की डेवलपमेंट कराई जाये । इसलिए सरकार की तवज्जह उस प्रश्न पर है। अगर आप चाहें कि उन एरियाज के एम.पीज. के साथ मीटिंग हो तो वह जरूर मैं प्लानिंग कमीशन के साथ मीटिंग करवाऊंगा। जैसा राशिद साहब ने पिछली बार भी जब हिल एरियाज की बात हो रही थी, तब भी आपने यह बहुत महत्वपूर्ण सुझाव दिया था, वह मैं करवाऊंगा।

मेरी गुजारिश यह है कि इस बोर्ड से आप डवलपमेंट के लिए एक और लेयर मत डालिये, इसलिए आप यह बिल वापस लें, यह मेरी आपसे प्रार्थना है।

श्री राजीव प्रताप रूडी : महोदय, लेकिन जो केन्द्र प्रवर्तित योजनाएं हैं और खासकर बिहार जैसे प्रान्त में, जहां पैसा खर्च नहीं होता है, वहां कोई तरकीब निकालनी चाहिए कि यहां से पैसा सीधे जाये और मोनेटरिंग भी यहीं से हो। बड़े कष्ट में हम अपना जीवन वहां व्यतीत कर रहे हैं।…( व्यवधान)

श्री सुबोध मोहिते (रामटेक) : महोदय, यह जो बिल लाया गया है, मुझे बड़ा आनन्द हो रहा है कि बहुत कम बिल ऐसे होते हैं, जिन पर आम सहमति जताई जाती है। करीब २०-२२ सम्माननीय सदस्यों ने इस पर बात की है और सभी ने अपनी सहमति इसलिए दिखाई कि सभी को अपने क्षेत्र के विषय में प्यार है, सभी चाहते हैं कि बैकवर्ड एरिया का डवलपमेंट हो जाये।

मैं इतना ही कहना चाहूंगा, हालांकि मेरी १०-१५ मिनट बात करने की इच्छा थी, लेकिन इससे दूसरा बिल इण्ट्रोडयूस नहीं हो पायेगा कि इस बिल का किसी ने विरोध नहीं किया है और यह बहुत ही महत्वपूर्ण बिल है। मंत्री जी ने भी अपनी स्पीच में बोला है कि यह माननीय सदस्यों की भावनाओं का सवाल है और मुझे लगता है कि एन.डी.ए. के जो माननीय मंत्री जी हैं, he is a think-tank, इसलिए उनसे अपेक्षाएं ज्यादा बढ़ गई हैं। संसद के इतिहास में आज तक कोई प्राइवेट मैम्बर्स बिल पास हुआ हो, उसकी मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन अल्टीमेटली जो होना है, वह होने वाला है, लेकिन सब की निगाहें इस तरफ हैं कि इस बिल का निष्कर्ष क्या निकलता है।

अभी हर बात में मैं मंत्री जी को क्रास नहीं करना चाहूंगा, लेकिन स्टेट गवर्नमेंट की जो बात माननीय मंत्री जी ने बोली है, उस बात में बिल्कुल सच्चाई नहीं है। मैं एक उदाहरण आपको देना चाहूंगा कि जब हमारे आफिसर महाराष्ट्र सरकार में गये होंगे, विदर्भ डवलपमेंट बोर्ड या मराठवाड़ा डवलपमेंट बोर्ड का रिव्यू लिया होगा, उसका आपने जो रिव्यू लिया है, वह सरासर गलत है या आपको जो इन्फोर्मेशन मिली है, वह गलत है।…( व्यवधान) बिहार के आफिसर्स गये होंगे तो फिर तो १०१ परसेंट इसके चांसेज हैं। जो बजट स्टेट गवर्नमेंट द्वारा बोर्डों को दिया जाता है, मैं तीन दिन पहले का रीसेंट एग्जाम्पल आपको बताना चाहूंगा कि गवर्नमेंट ऑफ महाराष्ट्र ने १०० करोड़ रुपये की नाबार्ड से डिमांड की है। Before demanding it, the Chief Minister of the Government of Maharashtra has announced that जहां-जहां रूलिंग पार्टी के एम.एल.एज. और एम.पीज. हैं, उन सब लोगों को दो-दो करोड़ रुपया दिया जायेगा और जहां अपोजीशन के मैम्बर्स हैं, उनको नहीं दिया जायेगा। हमारे शिवसेना के जो फाइनेंस मनिस्टर विखे पाटिल साहब हैं, उन्होंने कहा कि यह कोई क्राइटीरिया नहीं हो सकता, इसलिए नाबार्ड का पैसा रोककर रखा है। बिल्कुल उसी तरह बैकवर्ड एरिया डवलपमेंट बोर्डों के लिए जो पैसा दिया जाता है, उसका हाल है। लास्ट ईयर १९९९-२००० का मैं आपको उदाहरण बताऊंगा कि १०० करोड़ रुपया अगर दिया जाता है तो आगे बजट में सिर्फ २० करोड़ रुपया रिलीज किया जाता है।

प्रोविजन है २३०० करोड़ रुपए का और सप्लीमेंटरी बजट में २० करोड़ दिए जाते हैं, जब वित्त वर्ष समाप्त होने को आता है, यानी ३१ मार्च, तब उसके तीन दिन पहले ५० करोड़ रुपए दिए जाते हैं। इसका मतलब यह है कि टोटल आउटले जो है उसका उपयोग न हो पाए। इस प्रकार का षडयंत्र रचा जाता है। इसलिए जो फैक्ट्स आपके सामने हैं, that is not the ground reality. This is the first thing. अभी मैच फिक्िंसग कांड हुआ, उसकी रिपोर्ट आ गई है। उससे भी खतरनाक स्कैंडल हो रहा है। चाहे कोई भी राज्य सरकार हो। मैं महाराष्ट्र की बात करता हूं, वहां लाबिंग होती हैं। यहां शरद पवार जी नहीं हैं, होते तो मैं उनसे इंटरैक्शन करता। महाराष्ट्र के पांच रिजन्स का बजट देखें, चाहे पश्चिमी महाराष्ट्र का देखें, sixty per cent of the total budget is allotted to the lobbies which are governing the Government, for example, वहां कोआपरेटिव लाबी, वाइन लाबी है, शूगर लाबी है, मिल लाबी है। अगर इसी प्रकार की टेंडेंसी रही तो मुझे ऐसा लगता है कि हमारा मकसद पूरा नहीं हो पाएगा। हमारे पूर्वजों ने आजादी के लिए जो बलिदान दिया, खून बहाया, उसमें मैं नहीं जाना चाहता, लेकिन मंत्री जी ने यह पहला पाइंट उठाया था।

उन्होंने दूसरी बात कही कि डिसेंट्रलाइजेशन आफ पावर होना चाहिए। वाजपेयी जी की सरकार डिसेंट्रलाइजेशन आफ पावर में विश्वास रखती है, यह आपने कहा, हमने सुन लिया और हम स्वीकार करते हैं, क्योंकि हम एन.डी.ए. के एक पार्ट है। आपने यह भी कहा कि पंचायत राज को ज्यादा अधिकार देना चाहते हैं।

श्री अरुण शौरी : मैंने कहा कि कांस्टीटयूशन अमेंडमेंट हुआ है, ७३वां या ७४वां संविधान संशोधन था।

श्री सुबोध मोहिते : आप डिसेंट्रलाइजेशन आफ पावर की बात करते हैं, तो डिसेंट्रलाइजेशन आफ पावर एंड सेपरेट रिजंस विरोधाभास विषय है। That is the making of policies. आपने कहा कि ग्रोथ जीरो से आठ परसेंट पर ठहर गई है। लेकिन जो एनालाइसेज़ है, विकनेस हैं, उनका खुलासा नहीं हुआ। हम एंटी पावर्टी स्कीम के लिए ३५ हजार करोड़ रुपए का उपयोग कर रहे हैं। मेरा कहना है कि आपने जैसा कहा कि बोर्ड बनाना दवा नहीं है, तो मेरे हिसाब से सदन में सबसे बड़े डाक्टर तो आप ही हैं। अगर बोर्ड बनाना दवा नहीं है तो ५० सालर से यह बीमारी चलती रही पिछड़े क्षेत्र की, इसका इलाज क्यों नहीं किया गया, कोई तो इसकी दवा होगी। I think, he is the proper specialist to find out the diagnosis of it.

I beg to move for leave to withdraw the Bill to provide for the establishment of an autonomous Board for all sided development of all economically backward areas of the country.

MR. CHAIRMAN : The question is:

"That leave be granted to withdraw the Bill to provide for the establishment of an autonomous Board for all sided development of all economically backward areas of the country."

The motion was adopted.

SHRI SUBODH MOHITE : Sir, I withdraw the Bill.

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