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Lok Sabha Debates

Consideration Of The Slums And Jhuggi-Jhopri Areas (Basic Amenities And ... on 14 August, 2003

14.05 hrs. SLUMS AND JHUGGI-JHOPRI AREAS (BASIC AMENITIES AND CLEARANCE) BILL –Contd.

Title: Further discussion on the Slums and Jhuggi-jhopri Areas (Basic Amenitieis and clearance) Bill, 2001 moved by Shri Ramdas Athawale on 25 July, 2003 (Motion negatived) MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the House will take up further consideration of the following motion moved by Shri Ramdas Athawale on the 25th July, 2003.

Dr. Raghuvansh Prasad Singh was on his legs. He is not present. Now, Shri Pawan Kumar Bansal.

श्री पवन कुमार बंसल (चंडीगढ़) : माननीय उपाध्यक्ष जी, यह विधेयक जो श्री रामदास आठवले जी ने पेश किया है, एक बहुत ही सराहनीय कदम है और जब मैं इस पर कुछ कहना चाहता हूं तो मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि यह सरकार गरीबों का हित अपने मन में नहीं रखती है और इनकी सोच में गरीबों के लिए कोई जगह नहीं है। गरीब इस देश में कैसे रहता है, क्या उसकी दिक्कतें हैं, क्या मुश्किलातें हैं, ये लोग समझ नहीं पाते हैं। ये लोग अपनी नीतियों में बड़े-बड़े लोगों का तो ध्यान रखते हैं लेकिन देश का गरीब आदमी कहां बसता है, कैसे रहता हैं, किन परिस्थितियों में जीता है, यह इन्हें मालूम नहीं है। यह बात यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि अफसोस इस बात का है कि स्लम्स में, झुग्गी-झोंपड़ियों में लोग कैसे रहते हैं यह इन्हें मालूम नहीं है। वहां पीने का पानी नहीं है, बिजली नहीं है और जीने की बुनियादी सहूलियतें वहां नहीं हैं। वहां बीमारी और गंदगी के ढेर लगे हुए हैं।

पिछले दिनों इन्होंने दिल्ली और चंडीगढ़ में, जहां से मैं आता हूं झुग्गी-झोंपड़ियों को उजाड़ने का काम अपने जिम्मे लिया है। इन्होंने सोचा कि उन लोगों की गरीबी दूर नहीं कर सकते, उन्हें सुविधा नहीं दे सकते तो चुन-चुन कर उन लोगों की झुग्गी-झोंपड़ियों को गिरा दिया जाए। इससे उन लोगों को बहुत तकलीफों का सामना करना पड़ा है और उनकी तकलीफों और दु:ख-दर्द का हिसाब लगाया नहीं जा सकता है। हम मानते हैं कि शहरों की सुंदरता बरकरार रखना जरूरी है लेकिन उसका समाधान गरीबों के घर गिराकर नहीं किया जा सकता है। हमारे मन में आशंका यह आती है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार और इनके अफसरान जानते हैं कि वे लोग हमेशा से कांग्रेस के साथ रहे हैं और गरीबों के उत्थान के लिए, उनके दु:ख-दर्द को समझने के लिए कोई पार्टी है तो वह कांग्रेस पार्टी है और शायद यह काम उनको सबक सिखाने के लिए किया गया है।

उपाध्यक्ष जी, एक-दो घर या पचास घर नहीं बल्कि पूरी की पूरी कॉलोनियां पिछले दिनों उजाड़ दी गयी हैं। आप अतीत में जाएं तो हम इस बात को बार-बार कहते रहे हैं कि आवास योजना अच्छी बननी चाहिए और लोगों का जो हक बनता है उन्हें दिया जाना चाहिए। उन लोगों को छोटे-छोटे मकान या जमीन दी जाए, जहां वे अपने रहने की व्यवस्था कर सकें। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हम यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि यह देश एक है और सबको अधिकार है कि वह देश के किसी भी भाग में जाकर बस सकता है। मान लीजिए कि कहीं पर फैक्टरी लगनी है और वहां जाकर मजदूर निर्माण का कार्य करता है और आलीशान मकान या फैक्टरी बनाता है और देश की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान करता है तो उन मजदूरों का भी अधिकार बनता है कि उनका भी एक छोटा सा मकान हो। वे लोग ऐसे ही नहीं बस गये हैं। उनके बीच में भी दलाल पैदा हो गये हैं जो उनको जमीन बेचकर वहां बसाते रहे हैं और उनको विश्वास दिलाते रहे हैं कि वे वहीं पर स्थाई रूप से बस जाएंगे।

इंदिरा आवास योजना के तहत स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने यह बात अपने हाथ में ली थी कि कितने लोगों को मकान की जरूरत है और उनके लिए एक योजनाबद्ध तरीके से मकान बनाए जाएं और उनको रहने के लिए छत दी जाए। लेकिन आज उसके विपरीत हो रहा है। शायद यह सरकार सोच रही है कि अगर उनके मकान या झुग्गी गिरा दी जाएगी तो वे मजदूर लोग भाग जाएंगे क्योंकि ये सब कांग्रेस के वोट बैंक हैं। जहां तक वोट बैंक का सवाल है और अगर वह है भी तो गलत क्या है? जो लोग अपने बहुमत से अपने प्रतनधियों को चुनते हैं और उनको विधान सभा या लोक सभा में चुनकर भेजते हैं तो उनका भी तो कोई हक बनता है। किसने आपको वोट दिया, किसने नहीं दिया, यह देखकर कार्रवाई करना गरीबों के साथ अन्याय करना है। मुझे यह कहने के लिए इसलिए विवश होना पड़ रहा है क्योंकि उन्हीं जगहों को चुना गया है जहां गरीब लोग चुनावों को प्रभावित करते हैं और रिलीफ के नाम पर या दूसरे तरीके से उनका शोषण किया जाता है और उन्हें नीची नजरों से देखा जाता है।

आज मन की इस सोच को बदलने की जरूरत है। यह सरकार अगर दावा करती है कि वह गरीबों के लिए सोचती है, तो मैं चाहूंगा कि यहां मंत्री महोदय को खड़े होकर इस बात को कहें कि हम इस बिल के महत्व को समझते हैं और अगर ऐसा है, तो इस बिल को पास करवायें। इस बिल के माध्यम से माननीय सदस्य ने कहा है कि झुग्गी-झौंपड़ी कलस्टर्स में बुनियादी सहूलियत के नाम पर कोई चीज नहीं है। गन्दे पानी के बीच में लोग रहते हैं और उनको पीने का पानी तक नहीं मिलता है। पानी की निकासी तक का कोई इन्तजाम नहीं है। बिजली तक की व्यवस्था नहीं है और स्कूल व अस्पताल की तो बात ही अलग है। अस्पताल के बारे में मैं अपने क्षेत्र का एक उदाहरण देना चाहता हूं। हम लोगों ने बहुत कोशिश करके एक- एक डाक्टर की आठ डिसपैंसरीज बनवाई थी, जब कांग्रेस की सरकार थी। अब उनको भी गिरा दिया गया है। वहां मंदिर थे, गुरुद्वारे थे। मंदिर के नाम पर उधर के साथी भड़क उठते हैं। क्या उनका फर्ज नहीं बनता कि अगर झुग्गी-झौंपड़ी में मंदिर हैं, तो उन मंदिरों को भी इज्जत के साथ देखना चाहिए। लेकिन इसके विपरीत कार्य उन क्षेत्रों में हुआ है। मैं जानना चाहता हूं कि यह सरकार किस बात पर दावा करती है, किस बात पर कहती है कि हम गरीबों के रक्षक हैं और गरीबों के हित में सोचते हैं और उनके लिए ही कार्य करते हैं। इस सदन में इस बिल के माध्यम से, जो श्री रामदास आठवले जी ने प्रस्तुत किया है, हम लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया है। यह देश सिर्फ अमीरों का ही देश नहीं है, गरीबों का भी देश है। अकसर यहां पर बहुत बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं ‘that there is one India, and another Bharat.’वह कौन सा भारत है और उस भारत के लिए आप क्या सोचते हैं। बाहर बहुत बड़ी-बड़ी बातें कहने से क्या देश में सब कुछ हो जाता है। उस भारत में बसने वाले लोग, गरीब इंसान जिनके पास सिर छुपाने तक के लिए जगह नही है, वे मेहनत करके, मजदूरी करके एक-दो रुपए में अपना पेट पालते हैं। वे बहुत नहीं, तो कम से कम इतना इन्तजाम कर लेते हैं। ऐसी परिस्थिति में मकान एक ऐसी चीज है, अगर हम देश में सर्वे करवायें, तो पायेंगे कि जिन लोगों की अच्छी तनख्वाहें हैं, वे भी शायद अपना मकान नही खरीद सकते हैं। मैं उन लोगों की बात कह रहा हूं, जो गरीबी की रेखा से नीचे हैं, जो सड़कों पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। सर्दियों के दिनों में भी सड़कों पर सोते हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वे सारी जिन्दगी ऐसे ही जीवन व्यतीत करेंगे।Would they be just condemned to live that sort of a live for the entire years of their life on this earth? उन लोगों के लिए कुछ भी नहीं सोचा जा रहा है। Lip-service would not be enough to really meet the minimum essential needs of those people. Here, we find this Government is totally cussed, insensitive to the needs of the poor people.

मैं आपके जरिए दरख्वास्त करना चाहता हूं कि आप हम लोगों को यह विश्वास दिलायें कि उनके लिए कुछ किया जा रहा है। देश में सर्वे करवा कर बहुत-बहुत रिपोट्र्स अर्बन मंत्रालय की ओर से हमें प्राप्त होती हैं। ऐसे-ऐसे चमकीले कागज होते हैं, पता नहीं कहां से फोटो लेकर छापे जाते हैं। सरकार के चार साल पूरे हो गए हैं और इतने बड़े-बड़े इश्तिहार अखबारों में आ जाते हैं। यह भी देखने में आ रहा है कि अगर एक व्यक्ति आज एक मंत्रालय में है और कल दूसरे मंत्रालय में हैं और ३६५ दिन हो गए हैं, तो बहुत बड़ी-बड़ी किताबें छापी जाती हैं कि उन्होंने यह काम कर दिया। अगर उनका हिसाब लगाया जाए, तो पता चलेगा कि उतने पैसे से गरीब इंसानों की जरूरतों को पूरा किया जा सकता था। इस दिशा में नहीं सोचा जा रहा है। मैं चाहूंगा कि जो काम पहले शुरु हुआ था, उस पर ध्यान देने की जरूरत है और उसको आगे ले जाने की जरूरत है।

आज यह देखने की जरूरत है कि गरीबों के विकास के लिए क्या किया जाए और इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। यूनियन टैरेटरीज केन्द्र सरकार के अधीन हैं और दिल्ली को हम स्टेटहुड का दर्जा देने की बात कहते हैं, लेकिन यह अधिकार भी हम चुने हुए नुमाइंदों को नहीं देते हैं, जो वहां एसेम्बली में बैठे हैं। उस सरकार को भी नहीं देते हैं, जो यह फैसला कर सके। ऐसी स्थिति होने पर वहां की सरकार को मजबूर होकर कहना पड़ा कि हम केन्द्र की सरकार से मांग करते हैं कि उनके मकान न गिराए जायें। लेकिन उनकी बात को किसी ने नहीं सुना। यही स्थिति मेरे क्षेत्र में भी है। हम लोगों के कहने पर हमारी बात को किसी ने नहीं सुना। अगर हमने यह कह दिया कि केन्द्र की सरकार इसके लिए जिम्मेदार है, तो बहुत बड़े-बड़े बयान दिए गए कि यह नहीं होना चाहिए।

लेकिन कुछ समय के बाद आपने देखा जो आपकी राय और मंशा थी वह आपके काम नहीं आएगी क्योंकि लोग आपके खिलाफ आवाज बुलन्द करके खड़े होने लगे हैं कि आप उनके साथ यह ज्यादती कर रहे हैं। उस वक्त क्या हुआ? यहां से स्वामी साहब गए। उन्होंने ऐलान किया कि आज के बाद यह गिराना बंद कर दिया जाएगा। मैं उस बात से खुश हूं। दूसरे दिन आडवाणी साहब गए। उन्होंने जाकर ऐलान किया कि यह गिराना बंद कर दिया जाएगा। क्या यह सिद्ध नहीं हो जाता कि जो बात हम पहले कह रहे थे कि आप गिरा रहे हैं क्योंकि आपकी तरफ से हिदायत थी, आपकी तरफ से इशारा था, आप उस वक्त गरीबों के घर गिराते रहे। जब आपने देखा कि बात आपके उलट पड़ रही है, आपको विवश होना पड़ा और आपने उस बात को रोका। हमें खुशी है कि बात वहीं की वही रुक गई लेकिन रुकने से बहुत कुछ नहीं हो गया। जरूरत इस बात की है कि आप इस बात का सर्वेक्षण कीजिए कि कितने लोगों को वहां से बेघर कर दिया गया? आपको यह देखने की जरूरत थी कि गरीब मां-बाप के छोटे बच्चे, एक वर्ष के बच्चे, दो वर्ष के बच्चे, जोर की गर्मी पड़ रही है, वे ईंटों के ऊपर क्यों सो रहे हैं? एक महिला को बाहर ईंटों पर बच्चे को जन्म भी देना पड़ा क्योंकि उसके पास कोई जगह नहीं थी। आज भी मैं समझता हूं कि यदि आपके अन्दर इंसानियत है तो आप इसे देखें। मैं यहां जो एक-एक बात कह रहा हूं, वे फैक्ट्स हैं। आप वहां जाकर वैरिफाई कर सकते हैं। हम यहीं रिकवैस्ट करना चाहते हैं कि आप इस बात पर राजनीति नहीं करें। लोगों के साथ ऐसा अन्याय हुआ है। जिन को इस ढंग से गिरा दिया गया, आप उनके साथ न्याय करें। जो कानून बहुत वर्षों पहले बनाया गया था कि ये कट-आफ डेट है चंडीगढ़ में ८ दिसम्बर १९९६ तक, उस समय तक जो लोग वहां बसे हैं, उनको मकान दे दिए जाएंगे, उस पर भी अब रोक लगा दी गई है. आप उससे आगे नहीं बढ़ रहे हैं। आज हम आपसे यह मांग करते हैं कि उनकी स्कीम के तहत सहायता की जाए जो इन्दिरा गांधी जी ने बनायी थी। जैसा मैंने पहले कहा था उस वक्त सर्वेक्षण के बाद श्री राजीव गांधी ने इस बात पर जोर देकर कहा कि हाउसिंग प्रॉबलम बहुत बड़ी है। इसे देखते हुए उस समय ज्यादा अनुदान दिया गया था लेकिन आज उस पर रोक लगी है। केन्द्र सरकार के कनसॉलिडेटिड फंड ऑफ इंडिया में चंडीगढ़ से पैसा कहीं ज्यादा आता है। इसके मुकाबले उन पर कितना खर्च होता है? हम यह मांग करना चाहेंगे कि उसे देखते हुए जितना वहां के लोगों का अधिकार बनता है, उनको मकान दे दिए जाएं, अच्छे बना कर दे दिए जाएं। हर वक्त यही इल्जाम लगता है कि हम उनकी बात करते हैं।

इस बिल में यह भी कहा गया है कि लार्जर इंटरस्ट के लिए ऐसी जगहों को साफ-सुथरा रखा जाए और वहां के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि यदि कहीं ऐसी कॉलोनियां हैं तो सरकार का जिम्मा होगा। उसमें यह बात भी है कि उनका एक एनफोरसिबल राइट हो कि वह इस बात के लिए मांग कर सकें और हासिल कर सकें, उन्हें जगह-जगह जाने में परेशानी न हो, उनको अपना अधिकार कानून के तहत मिल पाए। इन शब्दों के साथ मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूं और आशा करता हूं कि सरकार इस बात को मान कर इस विधेयक को पास कराएगी।

उपाध्यक्ष महोदय: डा. रघुवंश प्रसाद सिंह जी,आपकी स्पीच पूरी नहीं हुई थी इसलिए आपको पहले बोलने का मौका मिलना चाहिए था। मैंने आपका नाम पुकारा था लेकिन आप यहां उपस्थित नहीं थे।

श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर): इनको बाद में बोलने का मौका देना चाहिए था क्योंकि इनका नाम पुकारा था और यह उपस्थित नहीं थे। आप इन्हें कुछ तो सजा दिया करो।

उपाध्यक्ष महोदय: आप ऐसा मत कहिए। जब आपकी बोलने की बारी आएगी उस समय यह भी इटरप्शन करेंगे।

   

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):आप गरीबों के सवाल को सुनिए और उस पर अमल करिए। गरीबों का सवाल आपकी समझ में नहीं आएगा लेकिन हम उसे समझाने का प्रयत्न करेंगे।

उपाध्यक्ष महोदय, श्री गोपाल सिंह नेपाली हिन्दुस्तान के मशहूर कवि हुए हैं। मैं उनकी कविता से इस विधेयक का समर्थन करते हुए अपने भाषण की शुरुआत करता हूं।

हिन्दी के मशहूर कवि श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की अध्यक्षता में दिल्ली में एक कवि सम्मेलन हो रहा था। उसमें कविवर गोपाल सिंह नेपाली ने अपनी कविता पढ़ी " चन्द्र किरणो से महलों की दीवार चमकती रहती है, चांदनी झोंपड़ी से लिपट भर रात सिसकती रहती है " उस समय एक कविवर की यह वाणी थी। तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू उस कवि सम्मेलन में उपस्थित थे। वह इस कविता की पंक्ति सुन कर वहां से चल पड़े। मतलब, कवि की वाणी में क्या पीड़ा है? श्री गोपाल सिंह नेपाली ने कहा " दिन गए, बरस गए, यातना गई नहीं, रोटियां गरीब की प्रार्थना बनी रही" फिर कहा कि " श्याम की बंसी बजी, राम का धनुष चढ़ा, बुद्ध का भी ज्ञान बढ़ा निर्धनता गई नहीं "

हिन्दुस्तान में एक से एक महामानव हुये हैं। भगवान बुद्ध ने सभी को ज्ञान का उपदेश दिया, राम के धनुष में अपार क्षमता थी, भगवान कृष्ण ने बंसी बजाई। फिर भी गरीबी हटी नहीं, घटी नहीं, रुकी नहीं और गरीबी बढ़ रही है, निर्धनता कम नहीं हुई। एक पीड़ा है और इसी पीड़ा का बखान इस विधेयक में किया गया है।
उपाध्यक्ष महोदय, पांडवों के जमाने में हस्तिनापुर, मुगल सल्तनत के समय दिल्ली राजधानी थी लेकिन अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कोलकाता में बनाई। सन् १९१२ में वे राजधानी दिल्ली ले आये। उस समय दिल्ली की आबादी ४ लाख थी जो आज बढ़कर एक करोड़ ४४ लाख हो गई है। इतनी ज्यादा आबादी में वृद्धि का कारण है? गांव के गरीब और मेहनतकश लोगों को जब रोजगार नहीं मिलता, वे महानगरों की ओर भागते हैं, शहरों की तरफ आते हैं। चाहे महानगर मुम्बई हो, चाहे कोलकाता हो, चाहे चैन्नई हो या दिल्ली हो, गरीब आदेमी रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ आते हैं। लेकिन इन गरीब लोगों के लिये मनिमम वेजेज का कोई कानून नहीं है। उसे जीने के लिये हजार-बारह सौ रुपया महीने का मिलता है और वे बेचारे रोजगार में शामिल हो जाते हैं। कोई फैक्टरी में काम करता है, कोई बड़े आदमी के घर पर काम करता है, कोई फर्श पोंछने का काम करता है लेकिन दिल्ली जैसे शहर में उसे हजार-बारह सौ रुपये मिलेगा, रहने के लिये जगह कहां से पायेगा? लोग कहते हैं - रोटी, कपड़ा और मकान। ये जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें हैं। जब उसे काम मिलता है तो ये सब चीजें हजार-बारह सौ रुपये में कहां से मिलेगी। एक कमरा किराया पर लेने से एक हजार रुपया खर्च हो जाता है। फिर वह कोई खाली जमीन देखकर झुग्गी-झोंपड़ी डाल लेता है। कहीं से प्लास्टिक टांगकर जिन्दगी गुजर-बस कर रहा होता है। मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि यदि गरीबों और मेहनतकश लोगों के प्रति जरा भी ममता है तो कितने लोग फुटपाथ पर दिनभर मजदूरी करके रात में सो रहे होते हैं। वे लोग पानी पीकर या कुछ खाकर गुजारा कर रहे हैं, सरकार क्यों नहीं ऐसे लोगों का सर्वेक्षण करती? स्वास्थय विभागे और फूड प्रोसैसिंग विभाग के अफसर बड़े बड़े वेतन खा रहे हैं जबकि एन,.जी.ओ ने पेय पदार्थ में जहरीला पदार्थ का पता लगाया है। उसी प्रकार गरीबी उन्मूलन, शहरी गरीबी उन्मूलन, झुग्गी-झोंपड़ी विभाग, डीडीए, में घोटाला पर घोटाला हो रहा है जबकि गरीब आदमी फुटपाथ पर सो रहे है। क्या भारत सरकार के पास इसका कोई हिसाब-किताब है? उसे रहने के लिये कहीं कोई आश्रय नहीं है और रात में पुलिस उन्हें लावारिस जानकर धारा १०९ में जेल में बंद करने पर आमादा होती है। उन लोगों का कोई घर-द्वार नहीं है, रहने का कोई स्थान नहीं है और पुलिस १०९ दफा लगाकर जेल भेज देती है, क्या यही सरकार का कानून है? जब दिल्ली में जहां-तहां ये गरीब और मेहनतकश लोग बस गये, सरकार द्वारा कहा गया- दिल्ली को सुन्दर बनाओ, झुग्गी-झोंपड़ी को उजाड़ो।
उपाध्यक्ष महोदय, दिल्ली में वज़ीरपुर एक जगह है। यह रेल विभाग की जमीन पर बसा हुआ है। ममता जी जब रेल मंत्री थी, रेल विभाग के अफसरों का हुक्म हुआ कि यह जगह खाली कराई जाये। वहां बुलडोज़र भेजे गये। इतनी पुलिस लगाई गई, लगता था मानो हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का युद्ध होने वाला है। गरीब लोगों के घर ढहाने के लिये बुलडोजर मौजूद थे। पूर्व प्रधान मत्री श्री वी.पी.सिंह धरने पर बैठ गये। एक अस्वस्थ व्यक्ति धरने पर बैठने जा रहा है और हम लोग मैदान में लड़ने-भिड़ने वाले घर पर बैठे रहें, यह कैसे हो सकता था। हम बुलडोजर के आगे जाकर खड़े हो गये, धरना दिया। हजारों लोग इकट्ठे हो गये, वह बुलडोजर का काम रुक गया, अभी भी रुका हुआ है। क्या फिर कानून बन जायेगा?
उसी तरह से लक्ष्मीपुर मौहल्ला है। वहां पता चला कि बुलडोजर से तोड़फोड़ कर रहे हैं। वहां वह दौड़े-दौड़े गये, लेकिन उनके वहां जाते-जाते भी पांच-सात घरों को तोड़ दिया। उनके बाल-बच्चे सड़क पर पड़े हैं, बेचारी बुढि़या कलेजा पीट रही है। उसका सारा सामान, पोथी-पिटारी बाहर फेंक दिया। किसी बड़े आदमी को भी ऐसे उसके घर से निकाल बाहर कर दिया जाए तो उसकी क्या स्थिति होगी। गरीब आदमी ने किसी तरह से रहने के लिए झुग्गी-झोंपड़ी की छांह बना ली है, लेकिन उसे बुलडोजर लगाकर, पुलिस लगाकर, फौज लगाकर ढहाया जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है, यह अमानवीय काम है। यह गरीबों के प्रति दुश्मनी वाला काम है। सरकार बिना कोई विकल्प दिये हुए ऐसा कर रही है। रोटी, कपड़ा और मकान देने की जिम्मेदारी सरकार की है या नहीं, यह हम सरकार से पूछऩा चाहते हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, हमने सुना है कि सरकार नेशनल स्लम पालिसी बनाने जा रही है। कहां है वह नेशनल स्लम पालिसी?एक राष्ट्रीय गंदी बस्ती नीति बननी चाहिए, जिससे मेहनतकश, मजदूर लोग, जिन्होंने दिल्ली को बनाया, जिनके द्वारा मेहनत करने से ईंटें बनती हैं, मेहनत, मजदूरी करने से सड़कें बनती हैं, जिनके पसीना बहाने से कारखानें चलते हैं, फैक्टरियां चलती हैं। जितना उत्पादन का काम होता है, चाहे कारखाना हो, किसानी हो, सबमें मेहनतकश लोगों के द्वारा मेहनत करने से उत्पादन होता है। मेहनत करने वाले लोग, जिन्होंने दिल्ली को बनाया, उनके लिए कहते हैं कि उनके घर को ढहाओ, दिल्ली को सुन्दर बनाओ। दिल्ली को सुन्दर बनाने के लिए उन्हीं को यहां से हटाने, विदा करने, जुल्म और अत्याचार ढहाने और उसकी झुग्गी-झोंपड़ियां तोड़ने का काम हो रहा है। ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, जो अखबारों में आते रहते हैं। लेकिन गरीब की कोई सुनने और देखने वाला नहीं है। उसी जमीन पर कई बड़े आदमी, जो मंत्रिमंडल के भी सदस्य हैं, सरकारी जमीन में उनके घर बने हुए हैं। लेकिन सरकारी अफसर उन्हें सलाम-सलाम कर रहे हैं और जो मेहनत, मजदूरी करने वाले गरीब आदमी वहां बसे हुए हैं, उन्हें निकालो, बाहर करो, उनके घर उजाड़ो, यह क्या नीति चल रही है। सरकार क्या नीति चला रही है। मेहनत करने वाले गरीब लोगों से सरकार को इतनी नफरत क्यों है। मैं जानना चाहता हूं कि जिन्होंने दिल्ली का निर्माण किया, यदि ऐसे मेहनतकश लोग दिल्ली से चले जायेंगे तो यहां सभी बड़े आदमियों का रहना और जीना दूभर हो जायेगा। उनका घर बुहारने वाला कोई नहीं मिलेगा, उनके काम करने वाला कोई नहीं मिलेगा, उनकी सेवा-सुश्रुषा करने वाला कोई नहीं मिलेगा। उनके बिना किसी का काम नहीं चल सकता। लेकिन उन लोगों से इन्हें इतनी घृणा है और उन्हें हटाकर दिल्ली को सुन्दर बनाओ, यह सरकार की दमनकारी पालिसी है। यह सरकार का कायदे का काम नहीं है, यह अमानवीय काम है। इनकी राष्ट्रीय स्लम पालिसी का क्या हुआ। आज हर शहर पर दबाव बढ़ रहा है, गांवों से लोग आ रहे हैं, वे कहां रहेंगे। उनकी कितनी आमदनी है। वे भाड़े का मकान लेकर कैसे रह पायेंगे। उनके रहन-सहन का, पीने के पानी का क्या इंतजाम होगा। एक बार सुनने में आया कि कोई ऑल्टरनेटिव उपाय हो रहा है। गरीबों को रहने के लिए जमीन दी जा रही है। जो लोग मेहनत,मजदूरी उत्तम नगर में कर रहे हैं, उन्हें नरेला में बसाया जा रहा है। नरेला में न उनके लिए स्कूल है, न पीने का पानी है और न अन्य कोई इंतजाम हैं। उन्हें जो वेतन मिलेगा उसका सारा पैसा बसों में आने-जाने में चला जायेगा। वे लोग कैसे रहेंगे और कैसे मजदूरी करेंगे। सरकार के पास कोई सुविचारित नीति नहीं है। यदि उन्हें कोई ऑल्टरनेटिव जगह दिये बिना हटाया जाता है तो यह गरीबों पर जुल्म और अत्याचार होगा। मेहनतकश लोगों पर ऐसा अन्याय पृथ्वी पर नहीं हो सकता। रोटी, कपड़ा, मकान, अस्पताल, पढ़ाई, दवाई, आवागमन, पीने का पानी आदि सब इंतजाम करना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिए झुग्गी-झोंपड़ियों को उजाड़ने की नीति बनाती है और वाहवाही लूटती है। कहते हैं हम दिल्ली को सुन्दर बना रहे हैं, बुलडोजर और फौज लगाकर उस जगह पर बड़े लोग पुरुषार्थ का परिचय देते हैं। यह कितना गलत काम हो रहा है। इस सब पर क्यों नियंत्रण नहीं होता। इन सब इंतजामों को करने के बजाय सरकार क्यों आंख मूंदकर बैठी है और क्यों इन लोगों को प्रति शत्रुता का भाव रखती है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण होंगे, जिनमें बड़े लोग सरकारी जमीन पर बसे हुए हैं, उन्होंने वहां महल खड़े किये हुए हैं। यहां कई टोलियां हैं जिनके बड़े आदमी वहां रहते हैं। उसमें कोई झाँक नहीं सकता। किसका दिल है वहां जाने का? वहां लोग जाकर सलाम करेंगे लेकिन गरीब आदमी के खिलाफ सरकार के सारे कानून और अभियान होते हैं। गरीबों के साथ दुश्मनों की तरह व्यवहार हो रहा है। सरकार की नीति झुग्गी-झोपड़ियों को तोड़ने वाली है। जैसे रावण के दस मुँह थे, उसी प्रकार से इस सरकार के भी दस मुँह हैं। गरीब सरकार के पास जाएं तो कहते हैं कि डीडीए कर रहा है। वहां जाएं तो कहते हैं कि एनडीएमसी का काम है। वहां जाएं तो कहते हैं कि एम.सी.डी. के पास जाएं। वहां जाएं तो कहते हैं कि भारत सरकार का शहरी विकास विभाग कर रहा है। वहां जाएँ तो कहेंगे कि दिल्ली सरकार या राज्य सरकार का काम है। कहा कहांं से अत्याचार और अन्याय हो रहा है - राक्षस के दस मुँह हैं। गरीब यहां से वहां भटकता रहता है, दख्र्वास्त देता रहता है। कोई सुनवाई नहीं होती है। राशन कार्ड बनाने पर भी रोक लगा दी। सरकार कहने के लिए अंत्योदय योजना और वभिन्न जाली योजनाएं चला रही है लेकिन गरीबों को अनाज नहीं मिलता है। उनका नाम ही नहीं डाल रहे हैं। ऑफिस और कचहरी में कोई सुनने वाला नहीं है। कहीं-कहीं कार्ड मिल जाता है लेकिन वह भी ५०० रुपये या एक हजार रुपये घूस देने से मिलता है। गरीबों की हिफ़ाज़त के लिए रोटी कपड़ा और मकान भी नहीं है। जो मेहनतकश लोग काम करने के लिए आते हैं, दिल्ली को सुन्दर बनाते हैं, वे कहां रहेंगे? उनके लिए सरकार की तरफ से योजना होनी चाहिए। सरकार को किसी रूप में सर्वे कराकर देखना चाहिए कि कितने लोग बसे हुए हैं, और उनके रहने के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है। जो मज़दूर फैक्टि्रयों में काम करते हैं, उऩको अगर हम ३० किलोमीटर दूर पुनर्वास दे रहे हैं तो कैसे वह काम करने आएगा, कहां से बस भाड़ा देगा? इस पर सरकार का कोई सुविचारित निर्णय नहीं होता। इस कारण गरीबों पर मार पड़ती है। इसलिए मैं मांग करता हूँ कि इस विधेयक को सरकार पारित करे। राष्ट्रीय स्लम नीति क्या है, वह सरकार बताए कि गरीब आदमी कहां जाएगा। हिन्दुस्तान के सभी लोगों की ज़ुबान पर मशहूर कवि इकबाल की कविता की ये पंक्तियां रहती हैं --
""सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा,"

मगर वहां गरीब आदमी क्या कहता है -

""सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा, रहने को घर नहीं है, हिन्दोस्तां हमारा "

इकबाल की क्या सोच थी कि रहने को घर नहीं है और हिन्दुस्तान हमारा है। गरीब आदमी की वस्तुस्थिति क्या है वह किस हालत में रह रहा है यह इसमें बताया गया है। वह कह रहा है कि रहने को घर नहीं है। इसी हिन्दुस्तान में जन्म लिया, यहां मेहनत करके पसीना बहा रहा है, लेकिन रहने के लिए जगह नहीं है, घर नहीं है, छाँह नहीं है। दूसरी तरफ एक आदमी के एक दर्जन मकान हैं, भवन पर भवन हैं, अपार्टमेंट हैं। गर्म जगह में ठंड वाला अपार्टमेंट है और ठंडी जगह में गर्म वाला अपार्टमेंट है। फिर उसमें ठंडा पानी अलग आता है और गरम पानी अलग आता है, कुल्ले वाला पानी अलग आता है। पेशाब आएगा एक पाव और उस पर पांच-दस लीटर पानी बहा देते हैं। एक तरफ पेशाब धोने के लिए पानी है और दूसरी तरफ गरीबों को पीने के लिए पानी नहीं है। उनके बच्चों के नहाने के लिए पानी नहीं है। एक तरफ पानी का प्रबंध नहीं है और दूसरी तरफ अट्टालिकाएं और महल बन रहे हैं जहां इटैलियन मार्बल लग रहा है जो बहुत चमक वाला और बढि़या होता है। झुग्गी-झोपड़ियों में प्लास्टिक के ढेर और उसमें जैसे-तैसे बाल-बच्चे और सारा परिवार रह रहा है जो कीड़े-मकौड़ों की तरह जीवन जी रहे हैं। यह चलने वाला नहीं है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था --

"होश करो दिल्ली के देवो होश करो।
अब न यह मनमानी चलने वाली है, खाली करो सिंहासन कि जनता आती है। "

इसलिए जो गरीब और मेहनतकश लोग हैं, जो पसीना बहाते हैं, जो निर्माण और उत्पादन का काम करते हैं, उनके भोजन, कपड़ा और मकान की हिफ़ाज़त करने के लिए सरकार को एक कंप्रिहेन्सिव पॉलिसी बनानी चाहिए और उसके मुताबिक काम करना चाहिए, नहीं तो यह अन्याय और जुल्म चलने वाला नहीं है। एक तरफ तो -

" स्वानों को मिलता दूध-भात, भूखे बच्चे अकुलाते हैं। "

आदमी का लड़का है, उसे दूध पीने के लिए नहीं और दूसरी ओर कुत्ते का पिल्ला दूध-भात खा रहा है। आदमी की कोई हिफाजत नहीं। यह चलने वाला नहीं है और ऐसा हम चलने नहीं देंगे।

उपाध्यक्ष महोदय, इसीलिए नैशनल स्लम पालिसी के अंतर्गत यह होना चाहिए कि तब तक गरीबों को नहीं उजाड़ेंगे जब तक कि उनके रहने की वैकल्पिक (आल्टरनेटिव) व्यवस्था निकट में ही नहीं कर देंगे। जिस मोहल्ले में वह रह रहा है, उसी के निकट जब तक उसके रहने की व्यवस्था नहीं की जाएगी, तब तक उसे उजाड़ा नहीं जाएगा, ऐसी नीति बननी चाहिए।

महोदय, एक दिन मैं नरेला में गया। वहां मैंने देखा कि एक जगह तामड़ी रखी है, उसके पास ही जेरीकैन रखी है। उसी के साथ बाल्टी रखी है और इस प्रकार से अनेक बर्तन वहां एक लाइन में लगे हैं। मैंने पूछा कि यहां क्या घी अथवा तेल बंट रहा है, जो इस प्रकार से लाइन लगाकर बर्तन रखे हुए हैं ? मुझे बताया गया कि पीने के पानी के लिए ये बर्तन लगे हुए हैं। यह कितनी खराब स्थिति है कि एक तरफ बोतल बंद पानी १० रुपए प्रति लीटर में बिक रहा है, दूध १० रुपए लीटर में बिक रहा है और दूसरी तरफ लोगों को पीने के पानी का इंतजाम नहीं किया जा रहा है। लाइन लगी हुई है, कोई हिफाजत करने वाला नहीं है, कोई देखने वाला नहीं है, कोई इंतजाम करने वाला नहीं है। कौन इंतजाम करेगा ? यदि सरकार में कर्तव्य-बोध हो, तो उसे देखना चाहिए कि हमारी देश की जनता को पीने के पानी का इंतजाम करने की कमिटमेंट है, जनता के बाल-बच्चों की शिक्षा का इंतजाम करना है, कोई बीमारी हो गई है, तो उसकी दवा-दारू का इंतजाम करना है, उसके रहने का निकट में इंतजाम करना है, उसके आवागमन की व्यवस्था करनी है। इन सबके बिना काम नहीं चलेगा। यदि इन सबका इंतजाम नहीं होगा, तो मारकट्टा पार्टी आएगी। जब लोगों में समाजवाद और पार्लियामेंट से विश्वास उठ जाएगा, तो सभी के लिए कठिनाई पैदा होगी। यह सवाल गरीबों का सवाल है और जैसे दर्पण साफ होता है, वैसे ही यह साफ नजर आ रहा है। उनकी इन समस्याओं का समाधान करना पड़ेगा।

श्री थावरचन्द गेहलोत : आपने पटना में गन्दी बस्ती सुधार का सारा पैसा शादी में लगा दिया जिसके कारण वहां बहुत दुर्दशा हो रही है। यह सब आपकी सरकार के रहते हुए हुआ। इसलिए आपको तो इस प्राकर का भाषण देने का कोई नैतिक हक नहीं है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, राम विलास पासवान बहुत दावा करते हैं कि हम दूसरे अम्बेडकर हैं। अब ये इधर आ गए हैं। पहले जब ये उधर हुआ करते थे, तो इन्हें शाह नवाज हुसैन से तोल दिया गया और इसी प्रकार शरद यादव जी को भी शाह नवाज हुसेन से तोल दिया गया। इस प्रकार से इन बड़े नेताओं का मान हुआ कि एक बड़े नेता शरद यादव जी का विभाग छीन कर शाह नवाज हुसैन को दे दिया और दूसरे बड़े नेता राम विलास पासवान का विभाग छीनकर उन्हें बैठा ही दिया गया। आज अपने को दूसरा अम्बेड़कर कहने वाले बड़े नेताओं की ऐसी दुर्दशा है कि वे मार खाकर इधर आ गए हैं। आप लोगों की क्या दुर्दशा है, अकेले में जब हम मिलते हैं, तब आप लोग अपनी दर्दनाक स्थिति हमें बताते हैं। रामजी माझी की क्या दुर्दशा है, जब इनके समर्थक एम.पी. की यह दुर्दशा है, तब आम जनता की, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की क्या दुर्दशा होगी वह अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। यह बंधुआ मजदूरी कैसे चल रही है, इस प्रकार से अगर बंधुआ मजदूरी चलेगी, तो गरीब का भला कैसे होगा। कड़िया मुंडा को ऐसा विभाग दे दिया, जो उनके मतलब का नहीं है। इसका कोई उपाय नहीं है। किस परिस्थिति में, पिछड़े वर्ग के, अनुसूचित जाति के जनजाति के कितने लोग जीते हुए हैं और कितने लोगों को मंत्री बनाया है, वह देखें।

श्री थावरचन्द गेहलोत : देश की आजादी के बाद, पहली बार सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्गों के ११ मंत्री, वर्तमान सरकार के मंत्रिमंडल में हैं। इस सरकार से पहले किसी और सरकार में इतने अधिक मंत्री बने हों, तो बताएं और हमरी पार्टी के सबसे ज्यादा सांसद २६ मंत्री हैं। कभी किसी गवर्नमेंट में इतने बड़े पैमाने पर इन वर्गों के मंत्री रहे हों, तो बताएं। मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि मैं अनुसूचित जाति का हूं, राष्ट्रीय सैक्रेट्री हूं और व्हिप भी हूं तथा पार्टी में मेरा सम्मान जनक स्थान है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : आपकी क्या स्थिति है, आपका नंबर क्यों नहीं आ रहा है, मुझे इस बात की चिन्ता है। बड़ी दुर्दशा है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : रघुवंश जी, मेरे ख्याल में अब आपका टाइम हो गया है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, यह गरीबों का विषय है। गरीबों की बात इन्हें सुनने को कहां मिलती है, ये लोग बड़े आदमी हैं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : ये बड़ी श्रद्धा से सुनते हैं। आप देखिए, यहां मनिस्टर बैठे हैं।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, ये सुनते हैं लेकिन उस पर अमल नहीं करते हैं।…( व्यवधान)

श्री थावरचन्द गेहलोत : मैं आपको बताना चाहता हूं कि १५ साल तक मैं झुग्गी-झोंपड़ी में रहा हूं, क्योंकि नागदा ग्रेसी मिल में मेरे पिता जी नौकरी करते थे। …( व्यवधान)जितना मैं इन्हें जानता हूं, उतना कोई नहीं जानता। आप महल में रहने वाले हो, केवल भाषण देते हो और ..*। आपको ये सब करने का अधिकार नहीं बचा है।…( व्यवधान)

*Expunged as ordered by the Chair उपाध्यक्ष महोदय : आप इस तरह इंटरफीयर करते रहेंगे तो आपका भाषण खत्म नहीं होगा।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, हमारे यहां एक कहावत है - जाके पैर न फटे बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई। ये ठीक कह रहे हैं, लेकिन उस पीड़ा के बाद भी आपको यहां गरीबों की पीड़ा के बारे में बोलने की इजाज़त नहीं है, क्योंकि आप अगर बोलेंगे तो उसी दिन आपका टिकट कट जाएगा। इसलिए गरीबों के बारे में इधर से बोलना पड़ता है।…( व्यवधान)आपने कितने गरीबों को दिल्ली से उजड़वाया, जब से आपकी हुकूमत आई है।…( व्यवधान)

मैं मंत्री जी को चुनौती देता हूं कि जब से आपकी हुकूमत आई तब से आपने दिल्ली में कितनी झुग्गी-झोंपड़ियों को उजड़वाया। डीडीए, एमसीडी, आपके विभाग ने, सुन्दर बनाओ के सपने ने क्या किया और कितना किया? उसका हिसाब बता दीजिए तो उनकी आंख खुल जाएगी, नहीं तो * आपका कौन सा हिसाब है? पीड़ा सहन कर रहे हैं, जहर के घूंट पी रहे हैं और उधर वाज़िब बात बोलने की इजाज़त नहीं है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : रघुवंश जी, आपके बाद रासा सिंह रावत जी को बोलना है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : रावत जी बोलेंगे, लेकिन उनकी बात सुनेगा कौन?…( व्यवधान)दिखाने के लिए बोलेंगे, लेकिन उधर सुनवाई कहां हैं। ये निश्चय कर चुके हैं कि गरीबों को खत्म होना ही है, मेहनतकश से इन्हें कोई मोह नहीं है, कोई लाभ नहीं है, इसलिए हमें सब बात कहनी पड़ती है। झुग्गी-झोपड़िंयां केवल यहां नहीं बल्कि मुंबई, चेन्नई और अन्य शहरों में भी है। कलकत्ता में जो राष्ट्रीय पालिसी सरकार की होगी, वह देश के सभी नगरों में लागू होगी कि खबरदार, गरीब कहीं बसा हुआ है तो उसे उजाड़ेंगे नहीं। यदि उस जगह स्कूल, अस्पताल, कोई ऐसी योजना सरकार की बननी हो तो आप उसे वहां से हटा सकते हैं लेकिन हटाने से पहले उसके निकट, उसका वैकल्पिक प्रबंध किए बिना वहां से नहीं हटाया जाएगा, यह पालिसी आप बनाएं और उसकी हिफाज़त करें। जिस मोहल्ले में गरीबों को बसाया जा रहा है, उनके लिए वहां पीने का पानी, पढ़ने और रहने आदि का इंतजाम भी होना चाहिए। सरकार में बहुत चालाकी है, वह अनाधिकृत कालोनियों को रेगुलराइज़ करना नहीं चाहती और वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है, उसके लिए बिजली, सड़क, पानी, पढ़ाई एवं दवा आदि का इंतजाम नहीं करना है। सब के लिए कह दिया - अनाधिकृत कालोनी। क्या होता है, जहां हमारे नागरिक बस गए वह हो गई कालोनी, अनाधिकृत की परिभाषा कहां से आई, कौन इसे बनाने वाला है, जो आदमी बस गए उनकी हिफाजत * .Expunged as ordered by the Chair.

करना सरकार की जिम्मेदारी है। अगर दो-चार दिन के लिए कहीं मेला लगता है तो उस जगह पर पीने का पानी, सफाई आदि का प्रबंध किया जाता है, लेकिन सरकार को मानवता के प्रति साधारण संस्कृति नहीं है, जो बस गए उसे कहते हैं कि अनाधिकृत है. इसलिए अनाधिकृत कालोनी को खत्म किया जाए। जहां लोग बस गए वहां यातायात, सड़क, स्वास्थ्य, पढ़ाई, दवा, बिजली आदि का इंतजाम होना चाहिए। मैं इन सवालों पर सरकार से स्पष्ट वक्तव्य और निर्णय चाहता हूं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : इस पर सरकार का निर्णय आएगा।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम वोट करा देंगे तो उसमें आप लोगों की पोल खुल जायेगी, आप लोगों का भाण्डा फूट जायेगा। आप सब लोग गरीब लोगों के खिलाफ हाथ उठा दीजिएगा, आप लोगों को ऊपर से निदेश है कि आप लोग इसे पास मत होने देना, इसलिए अपना भाण्डा मत फुटवाइये, आप हमसे अपनी बखिया मत उधड़वाइये, नहीं तो यह सरकार मान जाये और बताये कि किसी झुग्गी-झोंपड़ी को उजाड़ेंगे नहीं और उनके पुनर्वास का इन्तजाम करेंगे और उन्हें सारी सहूलियतें दी जाएंगी, तब इस विधेयक को पास किया जाये, नहीं तो ये लोग खिलाफत करेंगे और इनका भाण्डा फूट जायेगा तो गरीबों का कैसे भला होगा, कैसे इन्तजाम होगा। इसीलिए हमने इस सवाल को उठाया ताकि सरकार इसका स्पेसफिक उत्तर दे।

इन्हीं शब्दों के साथ, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने गरीब आदमी की बात सुनी। उन लोगों को छटपटाहट लगी हुई है, लेकिन उस छटपटाहट के बाद भी मैं उनको छोड़ने वाला नहीं हूं।

गरीब की आवाज गूंजेगी और यह देश होगा अंगार तले, पूंजीशाही जब जागेगी, मानवता की काली बिन्दी, तार-तार हो जायेगी।

   

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर):माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मैं श्री आठवले जी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव गंदी बस्तियां और झुग्गी-झोंपड़ी क्षेत्र (बुनियादी सुख-सुविधाएं और अपसारण) विधेयक, २००१ का समर्थन करता हूं, लेकिन जिस ढंग से हमारे विपक्ष के वक्तागण मगर के आंसू बहाकर गरीबों के प्रति असत्य हमदर्दी दिखाकर नाटक रचने का अभिनय कर रहे हैं, मैं समझता हूं कि ऐसे लोगों के ही कारण झुग्गी-झोंपड़ियों की इस प्रकार की दयनीय स्थिति हुई है।

गरीब को मत सता, गरीब रो देगा, सुनेगा उसकी खुदा तो तुझे जड़ से खो देगा। उस गरीब को सबसे ज्यादा बिहार राज्य के अन्दर सताया जा रहा है, बिहार राज्य के अन्दर उन गरीबों की जमीनें छीनी जा रही हैं, गरीबों को वहां से उजाड़ा जा रहा है और वही गरीब आकर दिल्ली के अन्दर, कलकत्ता के अन्दर झुग्गी-झोंपड़ियों के अन्दर रहने को विवश हो रहा है। आखिर उसके लिए कौन जिम्मेदार है, इस बात का आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है। मैं किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, हर सरकार का दायित्व है, आज हम सभी चाहते हैं कि हमारी राजधानी अन्य देशों की राजधानियों की तरफ साफ-सुथरी रहे, स्वच्छ रहे, सुन्दर रहे, दुनिया के लोग यहां आयें और भारत की राजधानी की और यहां के बड़े नगरों की प्रशंसा करें। पवन बंसल जी चले गये हैं, मैं क्षमा चाहता हूं, लेकिन ४५ साल तक जिस पार्टी का इस देश के अन्दर शासन रहा और झुग्गी-झोंपड़ियों की जनसंख्या दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ाने में जिनका सहयोग रहा। आज वही लोग ४-५ साल से आने वाली एन.डी.ए. की सरकार के मत्थे सारा दोष मढ़ रहे हैं। अगर ४५ सालों में जिन लोगों के हाथों में देश के हुकूमत की बागडोर थी, अगर वे गांवों के अन्दर स्वराज सही अर्थों में लाते, गांवों में आदमी को रोजगार प्रदान करने की व्यवस्था वहीं पर करते, जनसंख्या के ऊपर सही ढंग से नियंत्रण लगाने का प्रयत्न करते, गांव के आदमी को गांव के अन्दर ही रोजगार देते, सारी सुविधाएं देते तो गांव का आदमी वहां से उजड़कर पेट की आग बुझाने के लिए शहरों के नारकीय जीवन को बिताने के लिए झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने को विवश नहीं होता। लेकिन उन लोगों ने उस समय कुछ नहीं किया और आज जब वह सारा वीभत्स रूप धारण कर रहा है, शहरों के अन्दर एक तरफ गगनचुम्बी अट्टालिकाएं हैं और दूसरी तरफ उन्हीं अट्टालिकाओं को बनाने वाले लोग, गरीब आदमी उन झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने को विवश हैं। आखिर यह भेद पैदा करने वाले कौन हैं, इस भेदभाव को पैदा करने वाले, जन्म देने वाले कौन लोग हैं, कौन इसके लिए जिम्मेदार हैं? मैं समझता हूं कि सब लोगों को गम्भीरता से इस बात पर विचार करना पड़ेगा।

माननीय आठवले जी ने जो प्रस्ताव रखा है कि झुग्गी-झोंपड़ियों के अन्दर बड़ी दयनीय स्थिति है, बड़ी चिन्तनीय स्थिति है। अभी हमारे माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी बहुत सुन्दर बात अपने ढंग से कह रहे थे, लेकिन उन्होंने दोहे की एक लाइन ही पढ़ी, मैं उसे पूरा कर देता हूं:

‘श्वानों को मिलता दूध यहां, भूखे बालक अकुलाते हैं, मां की छाती से चिपक, वे सिसक-सिसक रह जाते हैं।’ एक तरफ तो अट्टालिकाओं में रहने वाले लोग हैं, उनकी कारें हैं और उनकी कारों में कुत्ते घूमते हैं और कुत्तों को दूध मिलता है।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हटो व्योम से, मेघ पथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं।
प्रो. रासा सिंह रावत : उन बेचारे बच्चों को दूध पीने को नहीं मिलता है, इसलिए वे मां की छाती से चिपक कर सिसक-सिसक कर रह जाते हैं। झुग्गी-झोंपड़ियों का जीवन बड़ा दयनीय है, हम सब लोगों के लिए चिन्तनीय है। मैं एन.डी.ए. सरकार को धन्यवाद देना चाहूंगा कि जब से यह सरकार आई है, उसने शहरी विकास एवं गरीबी उपशमन मंत्रालय के माध्यम से झुग्गी-झोंपङियों को हटाकर उन्हें अच्छी बस्तियों में बसाकर, उनका पुनर्वास किया। जो ३००-४०० अनाधिकृत झुग्गी झोपड़ियां, बस्तियां थीं, उनको नियमित करके उनमें पानी की सुविधा, बिजली की सुविधा, स्वास्थ्य की सुविधा, डिस्पेंसरियों की सुविधा, बच्चों के लिए विद्यालयों आदि की सारी सुविधायें पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसलिए मैं उनको बधाई देना चाहूंगा। लेकिन "जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूर्ति देखी तिन तैसी" - जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही नजर आता है, सावन के अंधे को हर जगह हरा ही हरा नजर आता है। …( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :जासु राज प्रिय प्रजा दुखारि, तेहि नृप होई नरक अधिकारी।
प्रो. रासा सिंह रावत : पहले राज किसका था? रघुवंश जी भूल गये कि हम लोगों के आने से पहले एक सरकार में वे भी मंत्री थे। उस सरकार ने क्या किया? एक-डेढ़ साल तक वह सरकार रही, उस सरकार में उन लोगों ने क्या किया ?
उपाघ्यक्ष महोदय : अब आप दूसरे प्वाइंट पर आइये।
...( व्यवधान)
14.51 hrs. ( Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair)     मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि वास्तव में जो गंदी बस्तियां में, झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले लोग हैं, उन लोगों के लिए भी सभी प्रकार की मानवीय सुविधायें उपलब्ध कराई जायें। सामान्य बस्तियों के अंदर जैसे नगर-निगम, नगर परिषद, नगरपालिका, नगर सुधार न्यास, विकास प्राधिकरण आदि एजेंसियां हैं, उन्हें सारी बुनियादी सुविघाएं दिलवाई जानी चाहिये । वे जिन परिस्थितियों में रह रहे हैं, जब तक वे वहां रह रहे हैं तब तक उन्हें पानी की व्यवस्था के लिए हैंडपम्प हो, बिजली पहुंचाने की समुचित व्यवस्था हो। इसके साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की भी देखभाल हो अन्यथा आज उन झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले लोगों को तपेदिक, हैजा उल्टी-दस्त तथा ऐनीमिया जैसी बीमारियां उनके अंदर घर कर रही हैं। कुपोषण के कारण उनके बच्चों का जीवन दूभर हो रहा है। पढ़ने के लिए जो विद्यालय होने चाहिए, वे विद्यालय भी वहां नहीं हैं। मैं एक दूसरे पर दोष नहीं दूंगा क्योंकि अगर मैं एक पक्ष की ओर अंगुली करूंगा तो तीन अंगुलियां मेरी तरफ आयेंगी। जो लोग विपक्ष में हैं, वे " दोष पराया देखी करि, चलिए हसन्त-हसन्त दर्शन अपन चिंत ही न होई जिनका आदि न अंत।"उनको अपने दोष ही नहीं दिखाई देते जिन दोषों का न आदि है और न अंत है। इन सारी परिस्थितियों को पैदा करने वाले जिम्मेदार समाज में बड़े-बड़े नगरों में झुग्गी झोंपड़ियों को पैदा करने वाले, कौन नहीं जानता कि दिल्ली के अंदर एक पार्टी विशेष के नेता लोग जिन्होंने इन झुग्गी झोंपड़ियों के लोगों को कहा कि तुम चिंता मत करो, बस जाओ रेलवे की जमीन के अंदर, सरकारी जमीन पर बस जाओ। हम तुम्हारा सारा ध्यान रखेंगे। उन्हें नेताओं का संरक्षण प्राप्त है क्योंकि वे उनके वोट बैंक है। इसलिए ये झुग्गी झोंपड़ियां तेजी से पनपी हैं। आज वे लोग हारे हुए हैं लेकिन उनके किए हुए कुकर्त्तव्य का फल राजधानी दिल्ली को भोगना पड़ रहा है। दिल्ली ही नहीं चाहे कोलकाता हो, मुम्बई हो, चेन्नई हो, हैदराबाद हो, अहमदाबाद हो, पटना हो या जयपुर हो, जहां-जहां पर नगर हैं वहां एक तरफ तो गगन चुंबी अट्टालिकायें हैं, बड़ी शानदार कालोनियां हैं, पॉश कालोनियां हैं और दूसरी तरफ झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वालों का जीवन वास्तव में नारकीय है। जबकि इन अट्टालिकाओं को बनाने वाले, साफ सुथरी व्यवस्था करने वाले मजदूर के रूप में जीवनयापन करने वाले लोग इन्हीं झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले होते हैं। इसलिए जहां तक इस प्रस्ताव का मानवीय पक्ष है, मैं उसका समर्थन करता हूं। लेकिन जो कांग्रेस के वक्ता भी बोले तथा बाद में विपक्ष के वक्ता बोले, उन्होंने जिस ढंग से इस सरकार को दोष देने का प्रयत्न किया, मैं समझता हूं कि यह समय दोष देने या एक दूसरे के मीन मेख निकालने का नहीं है। आज हम सबको संकल्पबद्ध होकर काम करना चाहिए। कल हम स्वाधीनता की पावन जयंती बनायेंगे, तिरंगा ध्वज फहरायेंगे। ऐसे समय में संकल्प लेने की आवश्यकता है। जब तक इन झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले व्यक्ति को खाने के लिए रोटी, पहनने के लिए कपड़े, रोशनी के लिए बिजली और पढ़ने के लिए विद्यालय आदि सारी व्यवस्थायें नहीं देंगे तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। वास्तव में तभी हम लोगों का स्वाधीनता दिवस मनाना और अपने आपको जनप्रतनधि कहना सार्थक हो सकेगा।

झुग्गी-झोंपड़ी वाले लोगों को हटाया जाता है। उन्हें हटाया जाना आवश्यक है क्योंकि हमने देखा है कि जहां से रेलगाड़ी जाती है, उसके बिल्कुल पास ही लोग बसे हुए हैं, वहीं उनके बच्चे खेलते रहते हैं, उनका जीवन हमेशा संकट में रहता है, कब वे मौत के मुंह में चले जाएं। ऐसी स्थिति में जब सरकार कहती है कि यहां से हटो, आपको दूसरी जगह जमीन दे रहे हैं, मकान बना कर दे रहे हैं तो ठेकेदार लोग उनका शोषण करते हैं, उनको कहते हैं कि आप यहीं बसे रहो। जो नए मकान बनाए जाते हैं, उनको बेच दिया जाता है जिससे गंदा वातावरण बना रहता है। हमें ऐसे ठेकेदारों से सावधान रहना होगा और निश्चय करना होगा, जो अच्छा है, उसे अच्छा कहना होगा और जो बुरा है, उसे बुरा कहना होगा। जिन लोगों ने रेलवे की जमीन का अतिक्रमण कर लिया है, खेल के मैदानों का अतिक्रमण कर लिया है, विद्यालयों का अतिक्रमण कर लिया है, उनको वहां से हटाना होगा। लेकिन उनको जहां बसाया जाए, वहां उनकी रोजी-रोटी की क्या व्यवस्था होगी, यह सब पहले देखकर उनको हटाया जाना चाहिए ताकि वे लोग सुखद और सुविधाप्रद जीवन जी सकें। आखिर वे भी इसान हैं, उनको भी जीने का अधिकार है, वे भी इस देश के नागरिक हैं।

यह बिल आंशिक रूप से सही है लेकिन यदि इसके पीछे केवल आलोचना की भावना है तो मैं समझता हूं कि इसका वह भाव नहीं है। इसलिए मैं सरकार से प्रार्थना करूगा कि आगे आने वाले समय में झुग्गी-झोंपड़ियां तमाम नगरों के लिए एक प्रकार से काला दाग हैं। उस काले दाग को दूर करने के लिए झुग्गी-झोंपड़ी के निवासियों को अच्छी कालोनियों में बसाने के लिए, अनाधिकृत कालोनियों को नियमित करने के लिए, वहां सारी मानवीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए विधेयक लाएं। उस प्रस्ताव का हम निश्चित रूप से समर्थन करेंगे। सरकार की मंशा यही है कि गरीबों का भला हो, गरीबों को रोजगार मिले, उनको हटाया नहीं जाए और यदि हटाया जाए तो कहीं और उनके रहने की व्यवस्था की जाए। आज हुडको, एलआईजी, एम. आई.जी. ग्रुप, अनेक ऐसी आवास योजनाएं बन रही हैं जिनके द्वारा काम हो रहा है। मुझे कहते हुए दुख है, चंडीगढ़ हो चाहे दिल्ली हो, आज दिल्ली का नगर निगम कांग्रेस के हाथ में है और पिछले दिनों वहां करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। पचास करोड़ रुपये का पता नहीं है कि झुंग्गी-झोंपड़ी के विकास के नाम पर, सफाई, पानी आदि के नाम पर वे कहां खर्च किए गए। आज दिल्ली में न पानी है, न बिजली है और न ही झुग्गी-झोंपड़ी में सफाई की व्यवस्था है। नगर निगम और कांग्रेस के लोग कह रहे हैं कि यह सरकार यूं कर रही है। अगर यह सरकार कर रही है तो आपका नगर निगम क्या कर रहा है, आपकी दिल्ली सरकार क्या कर रही है। एक-दूसरे के ऊपर दोष देने के स्थान पर आत्मालोचन करते हुए हमें संकल्प लेना होगा कि झुग्गी-झोंपड़ी को खत्म करना होगा, यह बड़े-बड़े नगरों के लिए समस्या पैदा करने वाली है। इसलिए उन लोगों को अन्यत्र बसाया जाए, कालोनियों को विकसित किया जाए और उनको मानवीय सुविधा प्रदान की जाए। इसके साथ-साथ उनके लिए रोजगार की व्यवस्था की जाए।

लोग शहरों में न आएं, इसके लिए गांवों को स्वावलम्बी बनाया जाए। खादी और ग्रामोद्योग व्यवस्था, लघु उद्योग व्यवस्था गांवों में हो, उनको ऐसे रोजगार प्रदान किए जाएं, वहीं पर उनको धंधा प्रदान किया जाए, वहीं उनके लिए छोटी-छोटी फैक्टि्रयां लगाई जाएं, उनको लोन की सुविधा देकर, हाथ से काम करने वाले कुटीर उद्योग प्रारंभ किए जाए ताकि वे लोग गांवों में रहते हुए सुख का जीवन जी सकें और वहां से शहरों में आने और झुग्गी-झोंपड़ी में रहने के लिए मजबूर न हों, इसके लिए सोचना पड़ेगा।

बढ़ती हुई जनसंख्या की ओर भी ध्यान देना पड़ेगा।

15.00 hrs. आज विकास के अवसर बहुत कम बढ़ रहे हैं और जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है। उन लोगों तक परिवार नियोजन के साधन नहीं पहुंच पाते। अशक्षित होने के कारण जनसंख्या कम होने के क्या-क्या लाभ हो सकते हैं, इसकी जानकारी उनको प्राप्त नहीं हो पाती। जनसंख्या कम करने के प्रचार-प्रसार के साधन उन तक नहीं पहुंच पाते। वे सोचते हैं कि भगवान का दिया हुआ है और इस प्रकार से जनसंख्या बढ़ती जा रही है। उनको भी जीने का अधिकार है। जिसने भी इस भारत की भूमि पर जन्म लिया है, उन सबको जीने का अधिकार है। हम सब का और सरकार का कर्तव्य है कि सब लोगों को रोजी-रोटी और मकान मिले और रोटी कपड़ा और मकान, मांग रहा है हिन्दुस्तान। इस प्रकार से हम रोजी-रोटी, मकान और रोजगार की समस्या का भी निदान कर सकें, ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए।

आठवले जी द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक की भावना अच्छी है लेकिन यह सांगोपाग विधेयक नहीं है। मैं सरकार से प्रार्थना करूंगा कि सरकार सांगोपाग विधेयक लाए और हमारी राजधानी साफ-सुथरी रहे। मैं अभी लंदन, पेरिस और न्यूयार्क गया था। वहां मैंने देखा कि वहां पर्यावरण कितना साफ-सुथरा, स्वच्छ और सुंदर है। वहां गंदगी का नामोनिशान नहीं है, झुग्गी-झोंपड़ियां नहीं हैं। हम चाहते हैं कि यहां पर भी ऐसे ही पर्यावरण स्वस्थ, स्वच्छ और सुंदर तथा हरे-भरे वृक्ष और बाग-बगीचे हों। हम चाहते हैं कि भारत की शान दिल्ली साफ-सुथरी रहे और चाहे कोलकाता हो या चेन्नई हो, बंगलौर जो सिटी ऑफ गार्डन्स कहलाता है, वैसे ही दिल्ली भी साफ-सुथरी रहे, झुग्गी-झोंपड़ी न हों। इसके लिए हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा।

राजनीतिज्ञों को प्रयास करना होगा कि अनधिकृत झुग्गी-झोंपड़ियों को वोट की राजनीति की खातिर प्रोत्साहित न करें अपितु खुले वातावरण के अंदर चाहे उनको छोटे मकान ही दिए जाएं, लेकिन खुले और स्वच्छ वातावरण में उनके मकान हों जिससे उनको जीने की प्रेरणा मिले, ऐसा प्रयास करना चाहए। अंत में मैं एक कविता कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा।

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की, एक-दूसरे से न मिल सकें, यही विडम्बना है जीवन की।

ज्ञान और कर्तव्य का परस्पर समन्वय किया जाना चाहिए ताकि इन समस्याओं का निराकरण राष्ट्रीय हित में हो सके।

SHRI E.M. SUDARSANA NATCHIAPPAN(SIVAGANGA) : Mr. Chairman, this Bill seeks a statutory obligation on the part of the State, especially a welfare State, to provide certain basic amenities for the citizens. No doubt, we have got the Directive Principles of State Policy in the Constitution of India. It enunciates that social as well as economic protection has to be given to the people. But our statutory obligation is very limited. When the State provides certain amenities like water or when the State provides health security or educational security, they are not covered by any social enactments. These are done by the State Governments and the Government of India by way of orders and regulations. If there is any fault on the part of the Government to fulfil its obligations, no remedy is available to citizens. They cannot seek remedy from the judiciary. They have to give a petition and wait for their chance. If they could not get it, they have to live with it. The same situation prevails now in the cities also. Many of the youths, especially the educated ones, are migrating from the rural areas to the cities. They want to lead a decent life. But when they enter the cities with high hopes, they find that they are dumped in the slums. They have to seek employment.

They are just running here and there for shelter. Even for animals, there is shelter but the human beings are not getting shelter. They are suffering. They are just withstanding natural calamities. Therefore, the State Governments and the Central Government are planning for their development in every Budget. But the Eighth and Ninth Five Year Plans could not be fully implemented and the targets were not achieved. Huge amount of money which was allocated for the purpose of social security was not properly utilised. Therefore, India is one of the countries facing one of the biggest problems of the world relating to slum areas.

Sir, this is high time when the Government should have the obligation to have the statutory right for the citizens that whenever they live in a particular place, they should have the right to have shelter and they should have the right to have water, electricity and road facilities. These things will show that the administration is running properly and the society is civilized. People should have the ambition to see that they are living in the same way as others are living. That feeling should be inculcated in the society. We see a plenty of money, whether it is black money or neatly earned money, being utilised for constructing palatial buildings in every city but at the same time, they have to live their day-to-day life with the help of the small employees, that is, the people who are coming to the cities from the slums. The slum people, when they are coming into this posh area, they want to help them. They are depending upon rich people to earn their livelihood. But at the same time, knowingly or unknowingly they are carrying the diseases and other backward things which are available in a slum area. Therefore, we should look at things in a proper way. If the slums are properly developed, have basic amenities and are free of diseases, then people who are living in the posh area can also lead a health life. But the point is, people in one area are totally living in inhuman condition but people in another area are having all the richness and even then they are spending a lot of money for their health.

Then, the people who are living in the slum areas have to take up employment as auto rickshaw drivers, lorry drivers, small vendors and street vendors. These people have to earn their livelihood only within the city as they are not able to get the facilities in their habitation area. Wherever we have the railway properties or public properties, or wherever there are private properties which are not properly protected, then these areas are now encroached by these people and they do not have basic amenities. Whenever we go for election campaign, we make some promises. We promise that we will lay a road or we will legalize that particular area. We know that the cities like Chennai, Mumbai and Delhi are facing such a situation. At this juncture, I would like to request that the Urban Development Ministry should make proper plans when they build any posh colony and see that a secluded place or an enclave for the servants who are coming or who are living on the employment opportunities provided by the people in that posh area, whether they are auto rickshaw drivers, lorry drivers or small housemaids, is built for them also. These people should have a habitation area for them within the posh area. We have to develop that type of thinking. Now, we are having shopping complexes but at the same time we are not thinking of the people who are living in the shopping complexes as servants or maids in houses, as to whether they are living with all the basic amenities.

We are not planning for them properly. These days, many multi-storeyed housing colonies are coming up in urban areas and even there also the people who do household jobs do not have proper living area for them. So, when they make plans for the development of towns and cities, the Ministry of Urban Development should see that there is a separate enclave in each housing colony for the shelter of the ordinary people who are working as housemaids in such colonies. That type of provision should be made while preparing plans for the development of towns and cities. Then only this problem can be solved.

Then, the distance covered by menial servants to their work place is too much. That is why, they try to come nearer to their work place, encroach some area and live there even without basic amenities. But if we provide basic amenities as part and parcel of urbanisation, then this type of problem will not be there.

Sir, now the entire world is looking towards our country’s development. Our cities are developing, but basic amenities are not being provided to all human beings. There are human rights violations also. These problems can be solved only through proper planning and execution.

   

SHRI ADHIR CHOWDHARY (BERHAMPORE, WEST BENGAL): Mr. Chairman, Sir, the Bill which has been introduced by Shri Ramdas Athawale is very much pertinent in view of the present circumstances prevailing in the Jhuggi-Jhopri areas. The Bill seeks to provide basic amenities to those vulnerable sections of our society. Therefore, the contents of the Bill must be appreciated by all.

Sir, it is a fact that due to continuous shrinking of employment opportunities in rural areas we are observing a steady migration of rural people to urban areas. That is why, slum areas are increasing day-by-day. However, there is no comprehensive plan formulated yet to sort out the growing problem of our country.

Sir, in the First Five-Year Plan it was stated that slums are the disgrace of our nation. But still we are not able to erase that disgrace of our country. Slums and jhuggis are expanding unabated. If we see the Tenth Five-Year Plan, it is stated that according to 2001 Census, the total urban population is 285.35 million which accounts for 27.78 per cent of the total population of the country. While the total population of the country increased by 21.34 per cent during 1991-2001, the urban population grew by 31.36 per cent. That means, there is a steady increase of urban expansion. But so far as poverty ratio is concerned, it is curious to note that in the year 1973-74, the poverty ratio in urban areas was to the tune of 49 per cent and in the year 1993-94, it has been reduced to 32.4 per cent. If we see in absolute terms, then it is surprising to note that in 1973-74, the combined population below the poverty line in urban areas was 60 per cent and in the year 1993-94, it was hovering around 76 per cent.

That means, poverty ratio in the urban areas is increasing. But in view of the combined ratio of urban areas, the poverty ratio has not been decreased. Therefore, to stem the rot that we are now experiencing in view of the growing expansion of slums and jhuggi areas, everybody must feel that some comprehensive plan must be formulated.

We know that the municipalities or urban local bodies will look after the basic amenities for the urban population. But it is also a fact that the allocation of funds in rural areas is much higher than that in the areal areas. The allocation of funds in an urban area can never be in commensurate with the allocation of funds in a rural area. However, the population in the urban area is being increased. Therefore, more funds will be allocated for amenities in the urban areas. The urbanjhuggi and jhompri areas have become the epicentres of various diseases that my friends have already adduced. Not only in the Slum Policy itself, but it was also otherwise stated that before relocation of any slum area, a resettlement exercise must be followed. But what we have observed in Delhi is this. Without having made a provision for resettlement, a razing exercise was carried out by the Delhi Development Authority. It has thrown away hundreds of people into the dark without having any amenities. They have been compelled to live under the open sky.

However, an observation by the Supreme Court has made it clear that before any relocation exercise could be done, firstly, the resettlement has to be ensured. However, this exercise was carried out with an eye on disenfranchising the voters. It is the fundamental right of the people of India. We are entitled to exercise our franchise. But due to the demolition of those slums, hundreds of people have been deprived of exercising their franchise. This is also a disgrace on our nation. It was deliberately carried out in order to influence the voting pattern in Delhi areas. Specifically those people who were supposed to be in favour of the Congress Party were picked up and deliberately thrown away from their jhuggi-jhompri areas. Therefore, a slum policy must be formulated in tune with the amenities required for the jhuggi-jhompri dwellers.

It has been observed that slum-dwellers are facing the most serious and grave problem in today’s world. When we are affording space for the NRI people, we are not able to afford such space for those poor people who have been compelled to migrate to the cities for their livelihood. These people are suffering from housing vulnerability. They are suffering from economic vulnerability, social vulnerability and personal vulnerability.

Sir, there are so many Centrally sponsored schemes such as NHDP etc. These schemes are not being implemented properly in the small cities and towns because the small urban bodies are not capable of providing the requisite funds for those amenities. Therefore, the Central Government must pursue the policy by having bodies like NHDP etc. in a right manner. In this regard, a proper monitoring body must be formulated. Without proper monitoring, there will be scope of misappropriation of the funds, which are made available for those slum dwellers.

We hail from small cities and we know the problems of the small cities. It is found that the employment opportunities in the big cities are larger than the opportunities which are available in the small cities. If you take the case of Delhi, you will find that here the opportunities of employment to the slum dwellers are more than the opportunities of employment to the people in the small cities. Therefore, the small cities should be provided adequate funds so that they can make use of those facilities, which will give them more amenities, such as, sewerage, electricity, toilets, etc. So, I would request this Government that in view of the deteriorating situation in the slum dwelling areas, the Government must come out with a holistic approach so as to provide the necessary amenities to these slum dwellers.

With these words, I conclude my speech.

श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर):माननीय सभापति महोदय, सदन के माननीय सदस्य श्री राम दास आठवले ने " गंदी-बस्तियां और झुग्गी-झोंपड़ी क्षेत्र (बुनियादी सुख-सुविधाएं और अपसारण) विधेयक, २००१" प्रस्तुत किया है। मैं भावनात्मक और आंशिक रूप से इससे सहमत हूं लेकिन इस विधेयक से कतई सहमत नहीं हूं। जिन माननीय सदस्यों ने सदन में इस विधेयक का समर्थन किया है, मेरा ऐसा मानना है कि उन माननीय सदस्यों ने इस विधेयक को पढ़ा नहीं है। वे व्यस्तता के बाद सदन में कहीं से आए होंगे क्योंकि उन्होंने यहां अपनी पार्टी का प्रतनधित्व करना था और बोलना था इसलिए बोलने लगे। एक माननीय सदस्य डा. रघुवंश प्रसाद सिंह वहां बैठे थे। मुझे विशेष रूप से उनसे यह शिकायत है कि वह सामान्यत: संबंधित विषय पर बोलते हैं लेकिन आज उन्होंने इस विधेयक का समर्थन करके यह प्रदर्शित किया कि वह विरोधी पक्ष के हैं और विरोधी पक्ष के किसी माननीय सदस्य ने कोई विधेयक प्रस्तुत किया है इसलिए उसका समर्थन किया जाए।

मैं इस विधेयक के उद्देश्य और धाराएं पढ़ कर उनसे कहना चाहूंगा कि वह जब बाद में इधर आए तो बताएं कि उनका इस बारे में क्या कहना है? यह विधेयक केवल महानगरों और केन्द्र शासित राज्यों के लिए है। यदि केवल इन क्षेत्रों में यह विधेयक लागू करने की बात सोची जाएगी तो बाकी देश के दूसरे हिस्सों में जो करोड़ों लोग झुग्गी-झोंपड़ियों में रहते हैं, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन-यापन करते हैं, उनके साथ अन्याय होगा।

मैं इस विधेयक की धारा ६ की पढ़ना चाहूंगा :

" सक्षम प्राधिकारी किसी सरकारी भूमि पर कोई झुग्गी-झोंपड़ी बस्ती बनने नहीं देगा और यदि इस अधनियम के प्रवृत्त होने से पहले उक्त भूमि पर कोई गंदी बस्ती है, तो सक्षम प्राधिकारी उस रीति से, जो वहित की जाए, उसे हटा देगा। "अब जो बन गये हैं, इस विधेयक के बाद या तो आप बनने नहीं देंगे और यदि बन गये तो उन्हें हटा देंगे। मेरा कहना है कि यदि वैकल्पिक व्यवस्था हो गई होती तो इस प्रकार से उल्लेख करना इस वर्ग के लोगों के साथ अन्याय होगा। पहली बात यह है कि आज अतिक्रमण क्यों होता है? १०-१२-१५-२० साल हो जाते हैं, तब उस अतिक्रमण की ओर सक्षम अधिकारी ध्यान देता है। यदि तुनक मिजाज होता है तो तुरंत आदेश दे देता है कि ये कब्जे हटा दो। मेरा कहने का मतलब यह है कि जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती, इस प्रकार के विधेयक समर्थन योग्य नही हैं। विधेयक की धारा-७ में लिखा है :-
" जहां सक्षम प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि किसी गन्दी बस्ती क्षेत्र की स्थिति से निपटने का सबसे संतोषप्रद तरीका क्षेत्र के सभी भवनों को गिराना है, तो वह प्राधिकारी राजपत्र में अधिसूचित किये गये एक आदेश द्वारा उक्त क्षेत्र को अपसारण क्षेत्र घोषित करेगा, अर्थात् ऐसा क्षेत्र जहां से इस अधनियम के उपबंधों और उनके अधीन बनाये गये नियमों के अनुसरण में सभी भवनों को हटा दिया जायेगा "यह धारा-६ का एकदम उलटा है। अगर उसने पहले इस प्रकार से कोई भवन अतिक्रमण करके बना लिया है और किसी सक्षम अधिकारी का समाधान हो जाता है कि यह गलत बना हुआ है, उसे हटा देना चाहिये, तो वह अवसारण के लिये अधिसूचना जारी कर देगा और राजपत्र में जारी होने तक जितने भवन कितने ही साल पहले बने हों, उन्हें हटा देगा। मैं उन माननीय सदस्यों से पूछना चाहता हूं जिन्होंने इसके संमर्थन में ये बातें कही हैं कि क्या इस प्रकार का प्रावधान होने के बाद उन लोगों को न्याय मिलेगा जिन्होंने मजबूरी में गंदी बस्तियों, नदी-नालों के किनारे अपनी झुग्गी-झोंपड़ी बना दी, क्या उन्हें हटा दिया जाये। इस सीधे-सादे आदेश से हिटलरशाही का प्रावधान हो गया। यदि किसी ने भी इसका समर्थन किया है तो वह निन्दनीय है। मैं उन माननीय सदस्यों के वक्तव्यों की निन्दा करता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि भविष्य में इस प्रकार के हित संरक्षण संबंधी में विधेयक पढ़कर उनके हितों को समझना चाहिये और तब समर्थन करना चाहिये।
सभापति महोदय, मैं धारा-८ को पढ़कर सुनाता हूं जिसमें लिखा हुआ है :-
" सक्षम प्राधिकारी, किसी गन्दी बस्ती क्षेत्र को अपसारण क्षेत्र घोषित किये जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, उस रीति से, जो वहित की जाये, गंदी बस्ती अपसारण आदेश करेगा और समुचित सरकार को स्वीकृति के लिये आदेश भेजेगा और यदि समुचित सरकार आदेश की पुष्टि कर देती है तो आदेश, ऐसी पुष्टि किये जाने की तारीख से प्रवर्तित होगा। "सभापति महोदय इन तीनों धाराओं के माध्यम से जिन लोगों ने गंदी बस्तियों में अपने टूटे-फूटे आवास बना लिये हैं, वे इस विधेयक के लागू होने के बाद, अधनियम बनने के बाद तोड़ दिये जायेंगे। मुझे यह भी कहना पड़ रहा है कि आपके और आपके समर्थन से जो सरकारें चल रही हैं, उन्होंने इसी प्रकार के काम किये हैं और आपने उनका समर्थन किया है। देश को आजाद हुये ५६ साल हो गये हैं। यहां एक बार नहीं अनेक ऐसे अवसर आये हैं। आपातकाल को हम लोगों ने भुगता है। शायद आप भी लाइन में होंगे। आपातकाल में बुलडोजरों ने गंदी बस्तियों को तोड़ा और आपने और आपके दल ने उसका समर्थन किया। माननीय बंसल जी कह रहे थे। संयोग से मैं भी उस समय चंडीगढ़ में एक बैठक के सिलसिले में गया हुआ था। उन्होंने कहा कि मकान तोड़े जा रहे थे। मैं भारतीय जनता पार्टी के एस.सी. वर्ग की बैठक में भाग लेने के लिये गया हुआ था। मैंने अपने लोगों से पूछा कि क्या मामला है। मुझे बताया गया कि नगर निगम में कांग्रेस का कब्जा है, मेयर कांग्रेस का है, कांग्रेस परिषद् के आदेशानुसार वे तोड़े गये हैं। यदि श्री बंसल यहां होते तो मैं उनसे पूछता कि क्या यह ठीक बात थी। वह वहां गंदी बस्तियों को तुड़वाने की बात करते हैं और यहां आकर भाषण करते हैं। कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।
इस प्रकार से उनकी कथनी और करनी में जो बड़ा अंतर दिखाई देता है, वह दिखाई नहीं देना चाहिए।
सभापति महोदय, मैंने आपको बताया था कि मैं अनुसूचित जाति वर्ग का हूं। मेरे पिता जी नागदा ग्रासिम फैक्टरी में नौकरी करते थे। फैक्टरी का क्वार्टर सीनियोरटी के हिसाब से मिलता है। हमें १०-१२ साल तक क्वार्टर नहीं मिला। मैं झुग्गी-झोंपड़ी में रहा हूं। हमारी झोंपड़ी नाले के किनारे बनी हुई थी। हम लालटेन में पढ़ते थे। हालांकि उस समय वहां लाइट नहीं होती थी, परंतु बिरला फैक्टरी ने अपनी कालोनी में लाइट लगा रखी थी। हमने वहां लालटेन में पढ़ाई की है। हमने वह सब देखा है। आप उच्च वर्ग के हैं, उच्चस्थ डेकोरेटिड मकान में रहे हैं। * वह उपदेश हमने सुने। परंतु जब हम देखते हैं कि आप और आपके दल के नेता क्या करते हैं और इस प्रकार के वर्गों की सुख-सुविधाओं का कितना ध्यान रखते हैं, जब हम यह अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि हिन्दुस्तान में जितने राज्य हैं, उन सब राज्यों में नीचे से तीसरे-चौथे नम्बर पर आपका बिहार आता है। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता। आप लोग समाजवादी विचारों के हैं, परंतु क्या समाजवादी विचारों के लोग और श्रद्धेय लोहिया जी ऐसा कह गये थे कि करोड़ों रुपये शादी में खर्च करो। अगर इसी प्रकार की योजनाओं को आप कार्यान्वित करते रहोगे तो थोड़े दिनों के बाद लोहिया जी का नाम लेने वाले आप लोग जनता को भ्रमित करके अपने से दूर कर दोगे। मेरा निवेदन है कि वास्तव में जो लोहिया जी की सोच थी, श्री दीनदयाल उपाध्याय की सोच थी, गांधी जी की सोच थी, बाबासाहेब अम्बेडकर जी की सोच इन वर्गो के प्रति थी। यदि उस सोच को आप लोग कार्यान्वित करने का प्रयास करेंगे, तभी ये वर्ग ठीक से अपने हितों का संरक्षण कर पायेंगे अन्यथा नहीं कर पायेंगे।
सभापति महोदय, मैं इस विधेयक का इसलिए विरोध करता हूं क्योकि इसमें जो-जो बातें कही गई हैं, उन सब कानूनों पर वभिन्न कानूनों के माध्यम से राज्य सरकारों या केन्द्र सरकार के माध्यम से अमल हो। उन कानूनों पर कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से अमल करने की आवश्यकता है। जिन संस्थाओं के हाथ में गंदी बस्ती उन्मूलन का काम है, उनके हाथ में वहां लाइट की व्यवस्था, सड़कों की व्यवस्था, पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था का अधिकार है। आज उन स्थानीय निकायों या उन संस्थाओं को आर्थिक द्ृष्टि से सक्षम करने की आवश्यकता है और यह काम आप, हम सब तथा राज्य सरकारें मिलकर कर सकती हैं। मैं इस सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस सरकार ने एक नहीं, अनेकों ऐसे कदम इन वर्गों के हितों के लिए उठाये हैं।
* Expunged as ordered by the Chair मैं आपको बताना चाहता हूं कि हुडको के माध्यम से इन्दिरा आवास योजना की बात आई। आदरणीय इन्दिरा गांधी जी ने इन्दिरा आवास के नाम से एक योजना चलाई थी। उस योजना को यह सरकार निरंतर कार्यान्वित कर रही है और जवाहर रोजगार योजना के माध्यम से हम इस योजना को कार्यान्वित कर रहे हैं। इस योजना में पिछले चार वर्षों की तुलना में आज की तारीख में और श्री नरसिंहराव जी की सरकार की तुलना में हम चार सौ गुना वृद्धि कर रहे हैं और उसके माध्यम से इन्दिरा आवास योजना चल रही है। इतना ही नहीं, हमें यह महसूस हो रहा था कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोग जो गंदी बस्तियों में रहते हैं, उन्हें आवास बनाकर देने की आवश्यकता है। हुडको के माध्यम से केन्द्र सरकार ने साठ लाख मकान बनाकर पिछले वर्ष इन वर्गों के लोगों को दिये हैं और सस्ती ब्याज पर उन्हें लांग टर्म ऋण दे रहे हैं। उन्हें सब्सिडी और अऩुदान भी दे रहे हैं। मैं पिछले इतिहास में जाना नहीं चाहता, लेकिन पिछली सरकारें भी इस प्रकार के कदम उठा सकती थीं, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
सभापति महोदय, झुग्गी-झोंपड़ियों में लाइट की व्यवस्था के लिए अभी हमारे वित्त मंत्री जी ने उसकी परिभाषा परिवर्तित करने का प्रावधान करते हुए एक विधेयक बनाया है। उसमें व्यवस्था है कि जब तक अनुसूचित जाति वर्ग या गंदी बस्ती क्षेत्र में लाइट नहीं जायेगी, तब तक वह ग्राम विद्युतीकृत हुआ नहीं माना जायेगा। इस तरह से परिभाषा में ही परिवर्तन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल यही है कि जिन गंदी बस्तियों में लाइट की व्यवस्था नहीं है, अगर वहां लाइट जायेगी, तभी हम यह मानेंगे कि वह ग्राम विद्युतीकृत हुआ है - ऐसा कदम इस सरकार ने उठाया है। मैं एक नहीं ऐसी अनेकों योजनाएं यहां बता सकता हूं। गंदी बस्ती उन्मूलन योजना अलग है और अंत्यावासी सहकारी विकास योजना अलग है। ११वें वित्त आयोग के माध्यम से केन्द्र सरकार उसमें पैसा देती है। नगरीय क्षेत्रों में गंदी बस्ती उन्मूलन योजना के अंतर्गत जहां ऐसी बस्तियां हैं, जहां डामरीकृत सड़कें नहीं हैं या सीमेंट, कंक्रीट की रोड्स नहीं है।
महोदय, स्थानीय निकाय, चाहे वह नगर पालिका है, नगर परिषद् है, वह कोई प्रस्ताव भेजे, तो केन्द्र सरकार उसको पैसा देती है और वह पैसा अनुदान के रूप में देती है। उससे पैसा वापस नहीं लेती है। इन गन्दी बस्तियों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए शहरी जल आवर्धन योजना कार्यान्वित की जा रही है। पहली बार इस प्रकार की योजना केन्द्र सरकार ने लागू की है। इस योजना के अन्तर्गत केवल ५ प्रतिशत पैसा स्थानीय निकाय, चाहे वह नगर पालिका हो या नगर निगम हो, उसे देना पड़ता है और इस योजना के अन्तर्गत नल-जल की व्यवस्था करने हेतु ९५ प्रतिशत धन केन्द्र सरकार की ओर से उपदान के रूप में दिया जाता है। इस योजना से देश के अनेक शहरों को लाभ हुआ है।
महोदय, मेरे संसदीय क्षेत्र में ही कम से कम सात-आठ नगर पंचायतें ऐसी हैं, जिनकी एक-एक सवा-सवा करोड़ रुपए की योजनाएं स्वीकृत हुई है। उन्हें केवल ढाई-तीन लाख रुपया देना पड़ा है। स्थानीय प्रशासन या स्थानीय निकाय, चाहे वह नगर पालिका है, नगर पंचायत है, कोई भी पांच प्रतिशत धन दे दे, तो केन्द्र सरकार से एक करोड़ या ९५ लाख रुपए पेयजल आवर्धन योजना के अन्तर्गत दिए गए हैं। यह मैं अपने क्षेत्र की बात कह रहा हूं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी ग्रामीण जल संवर्धन हेतु शहरी क्षेत्रों की तरह ही स्वजलधारा योजना चलाई गई है। जहां हरिजन बस्तियां हैं, जहां गन्दी बस्तियां हैं, आदिवासियों की बस्तियां हैं, जहां पेयजल उपलब्ध नहीं है, वहां यदि स्थानीय नागरिकों की समति या स्थानीय स्वायत्तशासी निकाय पेयजल उपलब्ध कराना चाहते हैं, तो उन्हें पांच प्रतिशत पैसा केन्द्र सरकार को देना पड़ेगा और ९५ प्रतिशत धन केन्द्र सरकार देगी। चाहे फिर वह पंचायत हो, नगर पालिका हो, कोई भी स्थानीय स्वायत्तशासी निकाय हो, वह पांच प्रतिशत पैसा देगा, तो केन्द्र सरकार उसे इस कार्य हेतु ९५ प्रतिशत पैसा देगी। जहां सामान्य नगर पालिका, नगर पंचायत, नगर परिषद्् या ग्राम पंचायत है, वहां उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने हेतु १० प्रतिशत धन केन्द्र सरकार को देना होगा और उन्हें स्वजलधारा योजना के अन्तर्गत पेयजल उपलब्ध कराने हेतु ९० प्रतिशत धन केन्द्र सरकार की ओर से दिया जाएगा। इस प्रकार से ऐसी बस्तियों में, झुग्गी-झोंपड़ियों में, गन्दे नालों के किनारे रहने वाले क्षेत्रों में, सड़क बनाने के लिए, नाले को पक्का करने के काम के लिए, नाले की बदबू से पास में रह रहे लोगों को बचाने हेतु, नाले की बाऊंड्री वाल बनाकर लोगों को बचाने हेतु पैसा देने का काम केन्द्र सरकार कर रही है। शहरी विकास मंत्रालय की ओर से भिन्न-भिन्न प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही हैं। इस प्रकार की योजनाएं यदि आजादी के पांच-सात वर्ष के बाद ही चलाई गई होतीं, तो आज देश में गन्दी बस्तियां दिखाई ही नहीं देतीं।
महोदय, एक समय था जब गरीबों का नाम लेकर, गरीबों को ही हटा दिया गया। आप सब लोग देखते रहे, समर्थन करते रहे। उन्नति के नाम पर अन्याय, अत्याचार और शोषण होता रहा। मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता हूं, लेकिन उसका प्रतिफल उनको मिल गया। भाषण देकर अपने काम की इतिश्री नहीं समझनी चाहिए। यदि वास्तव में नियमों और कानूनों में और संशोधन की गुंजाइश समझते हैं, ऐसा महसूस करते हैं, तो उन्हें आगे आना चाहिए। यह बात ठीक है कि नियम और कानूनों में प्रावधान हैं, परन्तु ईमानदारी से उन्हें पालन करने में कहीं न कहीं कोई दिक्कत आती है, बेईमानी, भ्रष्टाचारी, कर्मचारी और अधिकारियों के कारण, उनकी लापरवाही के कारण होती है या उनके पालन में ढिलाई आती है, यदि कहीं ऐसा दिखाई देता है, खामियां दिखाई देती हैं या यह समझा जाता है कि वर्तमान नियमों और कानूनों को और कठोर बनाने की जरूरत है, तो उन्हें आगे आना चाहिए।
महोदय, जैसे शासकीय भूमि पर यदि कोई अतिक्रमण करता है, तो उसी समय उसे रोकना चाहिए और यदि नहीं रोका जा रहा है, उसका कब्जा हो गया है, तो फिर जिस अधिकारी के कार्यकाल में वह अतिक्रमण हुआ है, उसके खिलाफ कार्रवाई करने का कड़ा प्रावधान कर दिया जाए, तो यह रुक जाएगा। कोई अतिक्रमण कर रहा है, नींव खोद रहा है, बांस-बल्ली गाढ़ रहा है, टीन-टप्पर ठोक रहा है, उसी समय उसे रोकना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता। क्या होता है कि कोई नेता मीडियेटर बन कर आ जाता है और जो अतिक्रमण कर रहा है, उससे ५ हजार रुपए ले लेता है। तीन हजार उस अधिकारी को दे देता है जिसके क्षेत्र में अतिक्रमण हो रहा है और दो हजार नेता खुद रख लेता है और सरकारी भूमि पर बड़ी आसानी से अतिक्रमण होने दिया जाता है और रातोंरात, देखते-देखते झुग्गी-झोंपड़यां खड़ी हो जाती हैं। इस प्रकार अवैध रूप से बनाई गई बस्तियां, गन्दी बस्तियों का रूप ले लेती हैं। इस प्रकार की जगह और जमीनों हेतु व्यवस्थित ढंग से मास्टरप्लान बनाकर, डिजाइन तैयार कर, एस्टामेट बनाकर, ले-आउट तैयार कर, उन्हें पट्टे पर देने की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती है। मैं भी वर्ष १९९० से १९९२ के बीच में मध्य प्रदेश में राज्य मंत्री के रूप में काम कर चुका हूं।
हमने उस समय इस प्रकार की योजना बनाई थी और गन्दी बस्तियों में रहने वाले लोगों को आश्वस्त किया था कि हम आपको यहां से अन्यत्र व्यवस्थित जमीन देकर पक्के मकान बनाकर, यहां आपने अगर १० x१२ फीट का अतिक्रमण कर रखा है, टीन-टप्पर ठोककर टैम्परेरी झोंपड़ा बना रखा है तो हम आपको व्यवस्थित मकान बनाकर देंगे और हमने इस प्रकार के एक नहीं, १००-१०० व्यवस्थित मकान एक साथ बनाकर लाइन से दिये थे, पीने के पानी की व्यवस्था पाइप लाइन के द्वारा की और वहां मार्केटिंग के लिए कुछ दुकानें बनाईं, चौपाल बनाई, सामुदायिक भवन बनाया, सांस्कृतिक सामाजिक कार्यक्रमों को करने के लिए सुविधा उपलब्ध कराई और पंचायत अगर बन सकती है तो वह बनाने की कोशिश की, स्कूल बनाये। इस प्रकार के एक नहीं, अनेक कार्ययोजना बनाकर स्थानोंका चयन करके गन्दी बस्तियों को अच्छी बस्तियों में परिवर्तित करने का काम किया है।
मैं अपेक्षा करता हूं कि जो नियम कायदे कानून बने हैं, वे इस प्रकार की व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त है, इसलिए मैं इसका समर्थन नहीं करता हूं। मैं इस सदन से प्रार्थना करता हूं कि जो वर्तमान प्रावधान हैं, उनमें सुधार करने की द्ृष्टि से सरकार कोई ऐसा कानून लाये, कानून को सख्त करे ताकि इस वर्ग के लोगों का हित संरक्षण हो सके।
   
श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव):सभापति महोदय, सम्माननीय संसद सदस्य श्री रामदास आठवले जी ने जो झुग्गी-झोंपड़ी के सम्बन्ध में एक विधेयक लाया है, इस विधेयक का समर्थन करने के लिए मैं खड़ा हूं। आपने जो मुझे बोलने का मौका दिया, उसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूं।
झुग्गी-झोंपड़ी के बारे में दर्द पुराना दर्द है, यह आज का दर्द नहीं है। यह पुरानी कहानी है, दर्द भरी कहानी है, यह आज की कहानी नहीं है। यह दर्द भी बहुत पुराना है, लेकिन अभी तक अच्छी तरह से इलाज करने के लिए डाक्टर नहीं मिला है। अभी भी जो सामने डाक्टर है, मुझे ऐसा लग रहा है कि अच्छा डाक्टर होगा, लेकिन मुझे इनसे आशा नहीं है, बिल्कुल आशा नहीं है। आपने जैसा बोला है, इनको सम्भालने के लिए ईश्वर ही एक है, दूसरा इस भूमि पर कोई भी नहीं है।
यह दर्द कैसा हो गया है, शुरू से आर्थिक नीति बिगड़ने से, ग्रामीण विभाग के लोग शहरों में पेट भरने के लिए आये हैं, ये शहरों के लोग नहीं हैं, बिल्कुल नहीं हैं। ये मेरे गांव से आये हैं, आपके गांव से आये हैं। देहात में लोग रहते हैं, उनका वहां पेट नहीं भरता तो ये लोग पेट भरने के लिए शहरों में आये हैं। अतिक्रमण करके झुग्गी-झोंपड़ी में न पानी है, न कपड़ा है, न मकान है, इस तरह से ये लोग रहते हैं। यह झुग्गी-झोंपड़ी का सवाल नहीं है, आप तो जानकार आदमी हैं, यह एक राष्ट्रीय सवाल पैदा हो गया है। इस राष्ट्रीय सवाल के बारे में सब को मिलकर देखना जरूरी है। इधर के लोगों को और उधर के लोगों को यह देखना जरूरी है, क्योंकि यह बहुत बड़ी बीमारी है। अतिक्रमण क्यों होता है, अतिक्रमण कैसे होता है, इस बारे में भी सोचना है और अतिक्रमण के बाद उनको उठाना, बाहर फेंकना भी बराबर नहीं है। यह मानुषिक आधार पर भी ठीक नहीं है, इसलिए दूसरी जगह उनको बैठाने के लिए नजदीक से नजदीक उन्हें भेजना चाहिए, क्योंकि उनके काम-धन्धे और रोजी-रोटी के लिए हर रोज का सवाल है, इसलिए इन्हें १२-१४ मील तक बैठाना भी ठीक नहीं है, उन्हें नजदीक से नजदीक जगह देखनी चाहिए। महानगरपालिक में अन्य शहरों को भी शामिल कर दिया है, मेरी आपके माध्यम से विनती है कि इस बारे में जो नगरपालिका हैं, २०-२५ हजार की बस्ती के जो शहर हैं, उन्हें भी इसमें शामिल करना जरूरी है। उनकी समस्या भी ऐसा है, इसलिए उनके मकान को जो अतिक्रमण किया है, उनको भी सुविधा कर दी जाये।
कपड़े की व्यवस्था हो, रोजी-रोटी मिल जाये, शिक्षा की व्यवस्था हो जाये, पीने के पानी की व्यवस्था हो जाये । मेरे पास कार है लेकिन उनके पास साइकिल तो होनी चाहिए। मैं खुद संसद सदस्य होते हुए भी, मेरी नगरपालिका में एक नगराते क्षेत्र है जिन्होंने मुझे झुग्गी झोंपड़ी के लिए तीन छोटे-छोटे प्लाट १५ x २० के दिये हैं। मैं आज भी वहीं रहता हूं। मेरी आपसे विनती है कि आप मेरे घर आइये और देखिये कि मैं कहां रहता हूं। मेरे रहने से वहां कुछ सुविधा हो गयी है। वहां विनती करके या झगड़ा वगैरह करके कुछ सुधार हो गया है। एक माननीय सदस्य की लड़की उधर है। ये भी वहीं से आते हैं। वहां अब कुछ अच्छी व्यवस्था हो गई है। मैं कहना चाहता हूं कि काम करने से ही सब ठीक होता है लेकिन इसके लिए ध्यान देने की आवश्यकता है। मन में काम करने की भावना होनी चाहिए। सरकार के मन में नीति बनाने की जरूरत है। मेरी प्रार्थना है कि झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले लोगों को अच्छी सुविधाएं दी जानी चाहिए। क्या कलम है, क्या धारा है, जैसे स्वामी बाल्मीकि जी राम-राम की जगह मरा-मरा बोल रहे थे लेकिन फिर भी उसमें राम नाम था। मराठी में एक कहावत है - खड़ बड़हे अंदुरि करती, कणशोधाया ते फिरती, परिअंति निराश होती, लवकरही ते सोउतली सदनाला, गणगोत जसे आपनाला, यानी चूहा खाने के लिए घर में इधर-उधर भागता है लेकिन जब उसे घर में अनाज नहीं मिलता तो वह घर छोड़कर चला जाता है, वैसे ही गरीब आदमी के सगे-संबंधी उसे छोड़कर चले जाते हैं। गरीबी के कारण गरीब लोग देहात से शहर में चले जाते हैं। उनकी हालत बहुत खराब है। इस खराब हालत को सुधारने के लिए आप इस बिल को लेकर आए हैं। मैं इस बिल का समर्थन करता हूं।
       
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, Sir, the main basis of the Bill is to provide basic minimum amenities of water, electricity, sanitation and health services. As has been told by some previous speakers, the basic defect of this Bill is that this Bill confines itself to corporations and Union Territories.
सभापति महोदय : इस बिल पर दो और माननीय सदस्य बोलने वाले हैं। उसके बाद मंत्री जी का उत्तर होगा। यदि सब माननीय सदस्य सहमत हों तो इस बिल का समय आधे घंटे के लिए बढ़ा दिया जाए।
कई माननीय सदस्य : ठीक है।
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : As has been mentioned, the Bill has been moved by the hon. Member who belongs to Mumbai and for his political activities, being a Member of this House, he stays in Delhi. Perhaps that was the concept in his mind that he thought of only corporations and Union Territories. It would have been better if all urban local bodies would have been encompassed in this Bill.
I would come to the basic human needs – food, clothing and shelter. A decade back, in the nineties, the United Nations had organised a number of summits, which started in 1991.
Subsequently, for about six years or seven years, different Summits were organised. I had the privilege of participating, as a delegate, in at least three such Summits. One Summit was a Social Summit held at Copenhagen; second was a Food Summit held at Rome; and the third was a Summit for Habitation or Housing held at Cairo. These three Summits were Summit-Level Conferences organised by the United Nations on the occassion of its Golden Jubilee.
The problem, which we are discussing today, is not confined to this country; and not confined to certain Corporations or to certain Union Territories. It is a universal phenomenon. Flight of people is there from rural areas to urban areas; from developing countries to developed countries. The flight is there of human resources; the flight is there of population; and that brings in a lot of problem in different urban sectors.
One Summit on Women was also held in Beijing, which was organised by the United Nations. Another Summit was also held on Population.
When I stand here to speak something on food, shelter and clothing, I am reminded of all that has been said by one hon. Member of this House about the Directive Principles of State Policy. This also reminds me of the date on which we are discussing on this subject, that is, today the 14th August, on the eve of the Independence Day. This also reminds me of the Resolution -- The Quit India Resolution -- that was moved on 8th August 1942, and the speech that was delivered at Gowalia Tank field. There it was asked : "What type of Independence we require and we conceive?" The Mahatma had said that : "Independence would come not only for the enlightened; not only for the rich, but it will be Independence and freedom for the toiling masses who are on the fields, in the farms; for the labourers who work in the factories; for the underprivileged, who will get a voice to speak about their own issues." This Bill in a certain way also reminds us of how much we have achieved and what more is to be done.
In the Constitution it has been very categorically stated that we have given ourselves a ‘Welfare State’. I am using the words ‘Welfare State’ because the onus now lies with the Government to provide food; to provide shelter; and to provide clothing. It is the responsibility of the Government; and it is the responsibility of a ‘Welfare State’ to provide the underprivileged all these things.
There is flight of people from rural areas to urban areas. There are many reasons behind this phenomenon, but basically, there are two reasons. The first one is for sustenance. People who live in rural areas do not get adequate employment throughout the year, and they want gainful employment throughout the year. The people there always have a tendency to migrate to urban areas, where they can earn their livelihood and get employment. The second reason is that this problem of employment is not confined only to those areas of havenots or to those who do not always struggle daily for their food, but the middle class people also move out from rural areas to urban areas for their livelihood and to have better civic amenities. These are the two main reasons why there is a flight of people from rural areas to urban areas.
What are civic amenities? We get better housing; better water supply; better health facilities; and better schooling. These are the four major things which a rural-folk always have in his mind, that is, if he migrates to an urban area, then he will get better civic amenities which are not found in the rural areas.
What has been achieved within the last 56 years? A number of proposals are being implemented. As has been said, the Indira Awas Yojana is meant for the deprived people of this country. A number ofIndira Awas Yojanas is being implemented in the rural areas for the deprived people. So also, this NDA Government has come out with a unique housing policy for the urban poor: It is Balmiki Ambedkar Awas Yojana. This is a policy which, I think, needs a little bit of improvement. Five to eight months have already passed; I think, it needs a review to find out how this Scheme is getting implemented and what are the bottlenecks in getting it implemented. The identification of urban poor is there, but the implementation of this housing policy is getting checked because the amount of money that is being provided through Balmiki Ambedkar Awas Yojana is not sufficient. For the urban poor, his share is already very high. Under the Indira Awas Yojana, it is given free of cost, and the State Government bears the limited amount of Rs. 4,000 or Rs. 5,000. However, under the Balmiki Ambedkar Awas Yojana, it is the beneficiary who has to provide, at least, Rs. 12,000 to Rs. 15,000, if not Rs. 20,000; at least, forty per cent is to be borne by the beneficiaries. That is the main hindrance or the bottleneck for the Balmiki Ambedkar Awas Yojana not getting much of support in different urban areas. I think, this needs a little bit of consideration.
Roads are also getting developed, not only under the Pradhan Mantri Grameen Sadak Yojana, but also under many other schemes. This NDA Government is providing, at least, 60 per cent of the budgetary support for the development of the rural areas. Health services, of course, relate to the State, and the State has to develop that. Regarding drinking water, adequate funding is being provided not only for Swajaldhara, but also for digging of a number of tube-wells.
When you compare the situation of today with what was the situation say 25 or 30 years back, in the early 1970s, certainly, a lot of development has taken place. Yet migration is taking place and slums are growing. However, my suggestion would be that adequate budgetary support and outside support, meaning other international financial institutions’ support, is required to provide shelter, to provide better health care and to provide food in the urban areas. DFID is one of the organisations which has come up with this type of support.
As is being discussed now, a Bill is in the pipeline. NABARD is going to provide funds directly to the district central cooperative banks bypassing the State cooperative banks thereby minimising the interest component by another two or three per cent. Similarly, my request would be that such support to urban local bodies should be provided by the Central Government or by the international financial institutions directly to the urban local bodies so that they can take up different programmes for development of housing, specially in the slums.
Flight of labour is not confined to this country alone. As I have said, it is a universal phenomenon. I had the opportunity of visiting different State Capitals of different countries. When I had been to Caracas, I had seen the slums there. It has a totally different administration altogether than the administration that is being run by that country. I have seen the slums in Atlanta; I have seen the slums in Rome; I have seen the slums in Cairo. I am mentioning these four Capitals of four different countries, which represent four different Continents. Slums are everywhere. It is not true that slums are not there in the United States of America.

16.00 hrs. Slums are there in Paris also. However, there is a difference between those slums and slums here. Migration of people from rural areas to urban areas, migration of people from developing countries to developed countries, coming up of slums, all these phenomena are there abroad also. However, the point of discussion here today is how to provide certain basic amenities in those slums which have come up over the last so many years.

But we should find out the reason for growth of slums and control it. Who is the culprit for these slums coming up at the first instance? I would put it this way. The main culprit for slums coming up in encroached areas is the Government. It is the Government which has to protect the property of its different wings, be it of public sector undertakings or of other departments. It is the responsibility of the Government to protect those properties. It is those areas where encroachment has taken place, where slums have developed.

I would say that inconsistent urban planning breeds social conflict. In a welfare state, our endeavour should be to minimise conflict. How can that be done? It is our habit in the society that we cannot survive alone. We need helping hands. We need support. We need various people for various jobs. For masonry work, and the other work too we need different hands and for that we need people. Today, people come into the urban areas from different parts of the country. Two things are required to stem this flow of people - one is to have particular areas identified where low-cost buildings can be constructed and these people can be housed, and the other is to provide transport facilities using which they can move into and out of the city in the minimum possible time. Instead of removing slums, there is a need to provide basic minimum amenities in those slums. Unless alternative arrangements are made, nobody should be displaced.

In conclusion, I would say that this Bill needs very many corrections. The manner in which this Bill has been prepared does not fulfil the intentions being aired in the House. With utmost care I would say that I cannot support this Bill.

     

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): Mr. Chairman, Sir, this is a very thought-provoking piece of legislation which has been brought forward by our distinguished colleague Shri Ramdas Athawale. I do not subscribe fully to all the provisions of the Bill. Before I initiate my debate on this, I would express strong reservations against Clauses 6, 7, and 8.

I entirely agree with Shri Thawar Chand Gehlot when he says that the whole objective of the Bill would be totally frustrated if Clauses 6, 7, and 8 remain a part of the Bill. Therefore, I do not extend my full support to the Bill and express strong reservations against those three clauses. However, I support the objective of the Bill.

This is a debate where we do not like to score political points, which has been successfully resorted to by the previous speaker, Shri Thawar Chand Gehlot. What Congress did and what BJP did is not the issue here. The issue here is as to how, after 56 years of attaining Independence, we can provide better living conditions to those people who are living in the slums and jhuggi-jhonpris.

I have an appeal to make to the Government in this regard. It is an appeal and a suggestion that I would make. The Government should appoint a Task Force, headed by no less a person than the Prime Minister, giving representation to all the States affected by this problem in the Committees and giving representation to the Chairmen of all Municipalities affected by this problem in the Sub-Committees. That Task Force should come out with a comprehensive strategy in developing a corpus, not fully dependent on the Union Government’s Budget but by collecting revenues from various sources.

The Task Force should consider a comprehensive policy-plan to; (a) modernise the existing set-up; (b) create alternate shelters; and (c) ensure that the root cause of growing slums is frustrated. Then a national opening, in this regard, could be done. Why I say so, Mr. Chairman, Sir because I had the privilege to represent the House from a Constituency called Howrah twice. It is the largest slum of India, if not India, of Asia, which is known as pilkhana slum where 90 per cent are poor Muslims, and ten per cent are poor dalits. The film and the bookThe City of Joy, written by Dominique Lapierre, was originated from slums. It is a deep study of all the slums, their conditions, their root cause, as to why they are expanding, their problems, etc. The first problem is illiteracy; the second problem is the kind of activities, which are not permitted by the society; the third problem is the poor hygienic conditions, sanitation and health; and the fourth problem is the living conditions of the working force. About 90 per cent of the unorganised sectors’ working force live in the slums. Even the other sectors of the labour force were in the organised sector. Since the management cannot provide them housing facilities, or cannot provide them such allowances, which are required for a family to live, they find no other alternative but to go to these slums. These slums, really speaking, are not only the headache of the respective State, but also the headache of those who belong to these slums, about the future of their children.

16.06 hrs. (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) Mr. Chairman, Sir, in 1967-68 the naxalite agitation started in Bengal. At that time I was a student leader of the University of Calcutta. I distinctly remember, it started not only from the rural areas, but also from the slums.

At that time, Mrs. Indira Gandhi visited Calcutta. When she came back to Delhi, she first provided a concept called Calcutta Metropolitan Development Authority (CMDA). Within five years, package by package, the process of sanitation, drinking water in and around Calcutta Metropolitan Zone was evolved.

Yet, I confess that the problem could not be solved there because of the rush to the cities, as has rightly been said by Shri Bhartruhari Mahtab, the rush to have the shelter. They do whatever they like, shoe polishing; they do whatever they like, selling the vegetables, they do whatever they like, part time work as a hawker, everything. If they find that nothing is left there for their shelter, why do not they go? There is no denying the fact that if you take the social analysis, the poorest of the poor Muslims, dalits, tribals, and OBCs are largely living in these slums. It is because they are not taken care of by the society, by any Government whatsoever excepting the lip service during the time of election.

Mr. Chairman, Sir, it is a chronic problem. I know a few children of these slums who became the stars of the schools and the colleges. I also know a few artists of these slums who became the stars of the society. I also know dreaded criminals. I also know dreaded people who indulge in drug trafficking. They are also from these slums.

Therefore, I do not agree with all the Clauses of the Bill, but I do want to express my concern. It is not an issue of a particular State; it is a national issue. I can tell you how good the people are! I remember one incident, the 6th December incident, when the mosque was demolished. Everybody told that there would be a clash.

In the city of Mumbai, while intellectuals claim otherwise, they did clash. But in G.T. Road of Howrah, not a single incident took place on communal lines, though on the left side of the road, there were slums of Muslims and on the right side, there were slums of the dalits and of a few Hindus. They are so good; they knew the problem; they did not indulge in any activity which would disturb the society and the State. I mentioned it to the then Chief Minister, Shri Jyoti Basu. How well they behaved! It is the largest slum of Asia – Pil Khana – and not a single young man took sword in his hand. Yet they were not taken care of.

I am thankful and grateful to one leader who is not in the House today. He is none other than Shri Madhu Dandavate; he was the Deputy Chairman of the Planning Commission for a short period. I approached him with the appalling condition of the slums and asked him to at least ensure drinking water. He was the one who fought and instantly arranged for the support of drinking water, to the tune of Rs.20 crore; and people got drinking water in the slums. We shall not discuss this issue on party lines. We must all understand the issue whether you sit on that side of the House and whether we sit in this side of the House.

I share the wisdom of hon. Vice-President Shri Shekhawat. I was travelling with him to Goa for a function. He told me that we should address only three things in the country, forgetting party lines; if we do that, this country will be the strongest in the world. I asked him what are they. He said that he spent his entire life in politics and that he realised that we should address three things together, be it BJP or Congress. He said that one was population, the second was corruption and the third was education. If we jointly address and find out a method, this country will be stronger, he said and I fully subscribe to that view. I conveyed this feeling of the Vice-President to my leader, Shrimati Sonia Gandhi.

On these three basic issues we must have unity and try to solve them. Population is the first one; it is compelling the society to rush to the city. Unless family planning or population control device supported by social amenities is done, the problem cannot be managed. Unless population control supported by educational opportunities is done, this problem cannot be managed. Could we stop in this country teen-age labour? No. I know, in my constituency, people say that their children need not go to school, but let them clean glasses, cups and saucers in tea stalls and bring money to their families. This is a social concept. In this social concept if you can show that the children can go to school and also one would not starve, children may go to school. If you cannot address this moot cause, the problem of slum expansion or the problem of slum dwellers cannot be handled.

I mentioned about a few cities where there are slums. We have, in the city of Howrah, Pil Khana; we also have Tikia Para, Nazir Ganj, Chara Basti, Bhod Bagan, Phool Bagan, which are the largest bastis of India. I made a survey and 90 per cent of them are poor Muslims. In the cities of Ahmadabad, Surat, Pune, Mumbai, Patna, Muzaffarpur, Chennai, and Coimbatore – except the State of Karnataka – slums are growing almost every year, and this is what the social study reveals. We also have slums in the cities of Lucknow and Allahabad, and not merely in those four Metropolitan cities.

People rush to the cities and stay on; they do not go back. Even if they stay on in the empty land of the Government, they should not be thrown out, whereas the Bill suggests this. I do not subscribe to that view because they did not come there to enjoy; they came there for food. We, as Government, are duty-bound – whether State or Union – to respond to their stomach. Till alternate shelter is not arranged, we should not throw them out.

Shri Nitish Kumar is the Railway Minister. He is expanding his railway network in our State. Hundreds of slum dwellers are occupying areas near railway stations. We had to convince them for the last six months for an alternate shelter.

Certain things have been arranged and then eviction process has started. Therefore, I do share and subscribe to some of the views expressed by Shri Thawar Chand Gehlot. I strongly feel that a task force should be constituted taking into confidence all the social scientists, community leaders, Mayors, and Chairmen of the Municipalities. If it is headed by the hon. Prime Minister, it will get paramount importance to build up a situation by which this problem can be handled. With these words, I conclude my speech.

   

श्री माणिकराव होडल्या गावीत (नन्दुरबार) : सभापति महोदय, आपने इस विषय पर बोलने का मौका दिया, मैं इसके लिए धन्यवाद देता हूं। मैं श्री रामदास आठवले द्वारा २५ जुलाई २००३ को प्रस्तुत विधेयक पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैंने यहां सभी माननीय सदस्यों के भाषण सुने। गंदी बस्तियों और झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले गरीब लोगों को सुख-सुविधाएं देने के संबंध में यह प्रस्ताव है। देश की हर राजधानी की गंदी बस्तियां में गरीब लोग आकर बसते हैं। उनमें बहुत से स्थानीय लोग भी होते हैं लेकिन वहां की नगरपालिका, महानगरपालिका और पंचायतें उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देती। उन गरीब लोगों को रहने के लिए जगह नहीं मिलती। वे लोग बिल्डर्स से प्लॉट मंहगे होने के कारण खरीद नहीं पाते। इसलिए उन्हें जहां जगह मिलती है वहां वे छोटी सी झुग्गी बना कर रहते हैं। जैसा महाराष्ट्र सरकार ने उनकी तरफ उचित ध्यान देकर सुविधाएं देने की कोशिश की वैसा ही दूसरे राज्यों में भी किया जाए। गरीब बस्तियों में स्वच्छ पीने का पानी, बिजली और सड़कें बनाने के लिए बहुत कम सहायता दी जाती है। नगरपालिका और महानगरपालिका भी इस तरफ ध्यान नहीं देती। बहुत से लोग बाहर से भी आ रहे हैं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : इस बिल पर अलॉट किया गया समय समाप्त हो रहा है। यदि सदन सहमत हो तो दस मिनट के लिए समय और बढ़ा दिया जाए। माननीय सदस्य अपनी बात समाप्त करें क्योंकि मंत्री जी का भी जवाब आना है।

बहुत से माननीय सदस्य: हम सब की इस पर सहमति है।

श्री माणिकराव होडल्या गावीत: मैं प्रार्थना करना चाहूंगा कि जैसे हुडको की योजना है, इन्दिरा आवास की योजना है. उसे ठीक ढंग से कार्यान्वित किया जाए। राज्य सरकार और महानगरपालिका की ओर से झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले लोगों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देने की व्यवस्था करनी चाहिए। देश में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना लागू हुई है। कुछ ऐसी बस्तियां भी हैं जो गांव से अलग हैं। जिन क्षेत्रों में लोग झुग्गी-झोंपड़ी बना कर रहते हैं वहां प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के कार्यक्रम लागू करने चाहिए।

मुझे इस पर बहुत कुछ बोलना था लेकिन आप मेरी तरफ इशारा कर रहे हैं इसलिए इतना ही कहना चाहता हूं कि मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूं। जिन माननीय सदस्यों ने अपने-अपने सुझाव रखे मैं उनके साथ अपने आप को जोड़ता हूं। गरीब बस्तियों में रहने वाले लोगों की तरफ सरकार ध्यान दे और उनके लिए अच्छी योजनाएं बनाए क्योंकि वे भी देश के निवासी हैं। इसे देखते हुए उनके लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए, यही मेरी प्रार्थना है।

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF URBAN DEVELOPMENT AND POVERTY ALLEVIATION (SHRI PON RADHAKRISHNAN): Hon. Chairman, Sir, and the hon. Members, Shri Ramdas Athawale has proposed this Bill. I thank him for proposing the Bill and I also thank all the Members who have participated in the discussion.

The Bill envisages to provide basic amenities to the slums and jhuggi-jhopris in the metropolitan cities. I would like to say that the Government is already providing the basic amenities to all thejhuggi-jhopri areas in the metropolitan cities. We are also trying to provide more amenities such as water, electricity, health care facilities, etc. to the slum dwellers. So, we are also putting all efforts to help the State Governments and the Union Territories to improve the living conditions of the slum dwellers.

Here I may point out that as far as metropolitan cities in the States are concerned, they come under the purview of Entry 5, 6, 17, 18, and 53 of the State List of the Seventh Schedule of the Constitution. Therefore, I think this House may not be competent to legislate in this respect.

SHRI PAWAN KUMAR BANSAL (CHANDIGARH): Could you kindly repeat your point about the competence?

SHRI PON RADHAKRISHNAN: I said that this subject comes under Entry, 5, 6, 17, 18, and 53 of the State List of the Seventh Schedule of the Constitution.

SHRI PAWAN KUMAR BANSAL : Therefore, the Government of India has nothing to do regarding slum dwellers! SHRI PON RADHAKRISHNAN: Sir, we are providing the basic amenities. But as far as the matter regarding legislation is concerned, it is not competent. I have taken note of all the suggestions given by the hon. Members.

SHRI PAWAN KUMAR BANSAL Sir, I would like to know from the hon. Minister what has he done about the Union Territories which are specifically under his charge. The Union Territories have been consistently neglected always in every aspect.

SHRI PON RADHAKRISHNAN: Sir, for all the Union Territories and the States, we are providing funds through Valmiki Ambedkar Avas Yojana and National Slum Development Fund. I have taken note of all the suggestions given by the hon. Members. Our Ministry will take necessary action in all these matters.

SHRI PAWAN KUMAR BANSAL : What is this reply to this important debate! MR. CHAIRMAN : Shri Ramdas Athawale – Not present.

The question is:

"That the Bill to provide for the basic minimum amenities of water, electricity, sanitation and health facilities in slums and Jhuggi-Jhopri clusters and for the clearance of such areas in larger public interest and for matters connected therewith or incidental thereto, be taken into consideration." The motion was negatived.
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MR. CHAIRMAN: Now, we go to Item No.29. Shri Vilas Muttemwar Not present.
Item No.30. Shri Basavanagoud Kolur not present.
Item No.31. Shri G.M. Banatwalla