Lok Sabha Debates
Motion Regarding Consideration Of Progress Of Implementation Of Parts Ix And ... on 24 July, 2003
/font> १४.२२ hrs. MOTION RE : CONSIDERATION OF PROGRESS OF IMPLEMENTATION OF PARTS IX AND IX-A OF THE CONSTITUTION DEALING WITH PANCHAYATS AND MUNICIPALITIES Title: Motion regarding consideration of progress of implementation of Parts IX and IX-A of the Constitution dealing with Panchayats and Municipalities. (Not concluded) MR. DEPUTY-SPEAKER: The House shall now take up Item No.16. Before taking up the Motion, since Shri Varkala Radhakrishnan has moved a Motion to object it, I call upon Shri Radhakrishnan to raise his objection.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): I welcome the discussion but I wanted to point out certain aspects. The Government has already appointed a Constitutional Review Committee and they are at it. In spite of long years, they have not submitted the Report. A discussion on the Constitutional provisions of the Panchayati Raj will be premature. That is the point I wanted to make. Anyhow, I stand for discussion though it is premature. I welcome the discussion. I wanted to point out that the Constitutional Review Committee is also looking into the matter. It should be very helpful in having a full-fledged discussion but our knowledge is only by experience. The legal aspect is looked into by the Constitutional Review Committee. What is their opinion with regard to Part III and Part IV of the Constitution and its application for the last 10 years? We are discussing about ten years’ experience. When we are discussing about ten years’ experience, it is only just and proper that there should be a report on that subject, especially when the Central Government has already taken a decision to appoint a Review Committee. They have not yet submitted the Report. Anyhow, I welcome the discussion. I do not stand in the way of a discussion and I do not press my objection also.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Since you have given a formal objection, I have to give a ruling.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : I am not pressing it. I wholeheartedly support the discussion. I wanted to point out this particular aspect.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: I have heard you. There is no provision in the Constitution or in the Rules of Procedure and Conduct of Business in the Lok Sabha which bars discussion on a matter which is under consideration of a Commission other than the Parliamentary Committee.
I may also mention that the Commission has already submitted its report to the Government. I therefore, allow the Minister to move the motion.
THE MINISTER OF RURAL DEVELOPMENT (SHRI KASHIRAM RANA): Sir, I beg to move:
"That this House do consider the progress of implementation of Part IX and Part IX-A of the Constitution (dealing with Panchayats and Municipalities as institutions of self-government) during the last ten years."
यह प्रस्ताव इस सदन में प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह वही सदन है, जिसमें आज से १० साल पूर्व शायद दिसम्बर, १९९२ में इस सदन ने हमारे संविधान में एक संशोधन पास करके पंचायती राज इंस्टीटयूशन को और अधिकार देने का प्रावधान किया था। हम सब जानते हैं कि यह देश गांवों में बसता है, इसलिए जब तक गांवों में पंचायतें और पंचायती राज संस्थाएं मजबूत नहीं होंगी और पंचायती राज संस्थाओं के द्वारा ग्राम विकास का काम नहीं होगा, तब तक देश की आबादी और देश का विकास करने में मुझे लगता है कि बहुत परेशानी आयेगी। इसे देखते हुए उसी समय इस सदन ने दिसम्बर, १९९२ में यह प्रस्ताव मंजूर किया। राष्ट्रपति जी ने अप्रैल, १९९३ में इसे अपनी कन्सेंट दे दी और तत्काल २४ अप्रैल, १९९३ को इसका इम्प्लीमेंटेशन किया।
इस संशोधन के साथ ही हमारी संघीय शासन व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्रों में एक त्रिस्तरीय शासन तंत्र शुरू हुआ। तीनों स्तरों पर प्रत्येक पांच वर्ष पर चुनाव कराना अनिवार्य कर दिया गया। अनुसूचित जाति, जनजातियों एवं महिलाओं के आरक्षण लागू किये गये और पंचायतों के कार्य हेतु २९ विषय भी निर्धारित किये गये। ७३वां संशोधन अधनियम पारित होने के बाद और अथक प्रयास के बाद हम नियमित रूप से चुनाव कराने, अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं महिलाओं की सीटों पर आरक्षण लागू करने, राज्य वित्त आयोगों एवं राज्य चुनाव आयोगों को गठित करने में भी सक्षम हो पाये हैं। देश के दो राज्यों को छोड़कर, पाण्डिचेरी एवं झारखण्ड, समस्त राज्यों में पंचायतों के चुनाव हो चुके हैं। हमारे यहां लगभग ढाई लाख पंचायतें हैं, जिनमें से लगभग सवा दो लाख ग्रामीण पंचायतें हैं, लगभग ३० लाख व्यक्ति इन पंचायतों के लिए चुने गये हैं, जिनमें से १० लाख से भी अधिक महिलाएं हैं और यह विश्व भर में सबसे बड़ा प्रतनधियों का आधार है।
७३वां संशोधन अधनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन हेतु अपने-अपने राज्यों में अपेक्षित कानून लागू करने के हमारी राज्य सरकारों द्वारा अब तक किये गये प्रयासों की भी मैं सराहना करता हूं। साथ-साथ इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि अभी भी पंचायती राज संस्थाओं को सुद्ृढ़ करने के लिए कई विषयों को शामिल किया जाना बाकी है। पंचायतों को वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्तियां सौंपे जाने की दिशा में भी अभी काफी कुछ किया जाना शेष है। जहां कुछ राज्यों ने पंचायतों को अधिकार सौंप दिये हैं, वहीं कई राज्यों में इसे शुरू किया जाना अभी बाकी है।
कुछ राज्यों ने जिला एवं मध्यस्तरीय पंचायतों को अधिक शक्तियां दी हैं, वहीं कुछ राज्यों ने जिला पंचायतों की अनेदखी कर मात्र ग्राम पंचायतों एवं मध्यस्तरीय पंचायतों को शक्तियां दी हैं। अधिकांश राज्यों ने पंचायती राज संस्थाओं को कई जिम्मेदारियां सौंपने के बाद पंचायतों को अन्तरित विषयों से संबंधित अपेक्षित कर्मचारी एवं नधियां अन्तरित नहीं की हैं, जो उन्हें सौंपे गये दायित्वों को पूरा करने के लिए बहुत ही आवश्यक है। इसके अतरिक्त पंचायतों को स्वयं कर लगाने एवं वसूलने तथा स्वयं संसाधन जुटाने के लिए आनुपातिक शक्तियां भी दी जानी चाहिए। जब पंचायतों को प्रशासनिक शक्तियां और संसाधन उपलब्ध करा दिए जायेंगे, तभी वे स्थानीय स्तर की आवश्यकताओं को पूरा कर पाएंगे और स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य कर सकेंगे जिससे १० साल पूर्व हमने जो प्रस्ताव इस सदन में मंजूर किया है, उसका सही लाभ इस देश के लाखों गांवों को मिल जायेगा।
उपाघ्यक्ष महोदय, राज्यों को जिला योजना समतियों को गठित करने, नियमित रूप से ग्राम सभा की बैठकें कराने तथा पंचायतों की जवाबदेही कायम करने की भी आवश्यकता है। चुनाव तंत्र, लेखा-परीक्षा तंत्र तथा वित्त आयोगों को राज्यों में पुनर्गठित एवं सूत्रबद्ध किए जाने की भी आवश्यकता है जिससे कि उन्हें केन्द्र में अपनी संबद्ध संस्थाओं के अनुरूप बनाया जा सके।
पंचायती संस्थाओं को प्रभावी ढंग से कार्य करने योग्य बनाने के लिए, ग्राम सभाओं को ग्राम पंचायतों की कार्यप्रणाली के पर्यवेक्षण एवं निगरानी, योजनाओं की स्वीकृति तथा लाभार्थियों एवं परियोजनाओं का चयन, सामुदायिक कल्याण परियोजनाओं हेतु स्वैच्छिक श्रमदान के रूप में नकद या अन्य प्रकार से अंशदान जुटाने तथा समाज के समस्त वर्गों के बीच एकता एवं भाईचारा बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी जानी है। ग्राम सभाओं को अधिकांश राज्यों में प्रभावी ढंग से अधिकार सम्पन्न बनाया जाना अभी शेष है।
पंचायतों की जवाबदेही को लागू किया जाना है। सामाजिक लेखा-परीक्षा ऐसा करने का एक जरिया है। कुछ राज्यों ने सामाजिक लेखा-परीक्षा करने के लिए ग्राम सभा को कानूनन अधिकार सम्पन्न बना दिया है। ग्राम सभाओं द्वारा सामाजिक लेखा-परीक्षा उन्हें नधियों के दुरुपयोग को नियंत्रित करने में सक्षम बनाता है। ग्राम सभाओं को सुद्ृढ़ बनाने के लिए राज्यों के लिए यह आवश्यक होगा कि सामाजिक लेखा-परीक्षा में ग्राम सभाओं की भूमिका को सुस्पष्ट करते हुए ग्राम सभा के नियमित आयोजन के लिए स्पष्ट नियमों एवं प्रक्रियाओं को निर्धारित किया जाए।
हम लोगों में से कई आदिवासी क्षेत्रों में से हैं। अनुसूची पांच के क्षेत्रों तक अधनियम, १९९६ के प्रावधान ७३वां संशोधन अधनियम के प्रावधानों को अनुसूची पांच के क्षेत्रों तक लागू करते हैं जिससे कि स्थानीय स्वशासन के लाभ पूर्व से आदिवासी बहुलता वाले क्षेत्रों को दिए जा सकें। पंचायत अधनियम में प्रावधान है कि अनुसूची पांच के क्षेत्रों में पंचायतों के समस्त विधान पारंपरिक रिवाजों, सामाजिक एवं धार्मिक रीतियों तथा सामुदायिक संसाधनों के परंपरागत प्रबंध के अनुरूप होने चाहिए। इसमें प्रावधान है कि पंचायतों के प्रत्येक स्तरों पर अध्यक्षों के पदों पर अनुसूचित जनजातियों हेतु १०० प्रतिशत और आनुपातिक आरक्षण परंतु पंचायतों के प्रत्येक स्तरों पर सदस्यों की सीटों की कुल संख्या पर कम से कम ५० प्रतिशत आरक्षण अनुसूचित जनजातियों हेतु होना चाहिए। अधनियम में अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को व्यापक अधिकार सौंपे गए हैं जैसे कि भूमि अधिग्रहण से पूर्व ग्राम सभा के साथ अनिवार्य विचार-विमर्श करना, ग्राम सभा को जल निकायों की आयोजना और प्रबंध सौंपा जाना, लाइसेंस या खनन पट्टा देने या लघु खनिजों के दोहन के लिए ग्राम सभा की सिफारिशें प्राप्त करना अनिवार्य होना।
अधनियम के अंतर्गत नशीली चीजों की बिक्री और उपभोग को रोकने हेतु पाबंदी लगाने की शक्ति भी ग्राम सभा को दी गई है। इसमें लघु वन उत्पाद के स्वामित्व, ग्रामीण बाजारों के प्रबंध के अधिकारों, अनुसूचित जनजातियों को ऋण देने पर नियंत्रण और जनजातीय उप योजनाओं सहित स्थानीय योजनाओं एवं रुाोतों पर नियंत्रण को ग्राम सभा में नहित किया गया है। पेसा एक्ट को आंध्रा प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा राजस्थान नामक नौ राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों मे विस्तारित भी किया गया है। मुझे यह बताते हुए खुशी है कि १९९६ के पंचायत (अनुसूचितV के क्षेत्रों तक विस्तार) अधनियम ४० में नहित प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए समस्त राज्यों ने अब राज्य विधान को लागू कर दिया है। हालांकि, उनमें से अधिकांश में संबंधित विषयगत कानूनों में संशोधन किया जाना बाकी है जिससे कि उन्हें केन्द्रीय अधनियम के प्रावधानों के अनुरूप बनाया जा सके। कुछ केन्द्रीय अधनियमों में कुछेक विरोधाभास भी उभरे हैं और उनमें आगे संशोधन/ सुधार की मांग भी हुई है।
उपाध्यक्ष जी, हम समय-समय पर ७३वां संशोधन अधनियम के कार्यान्वयन में हुई प्रगति की समीक्षा करते रहे हैं तथा हमें अखिल भारतीय पंचायत अध्यक्ष सम्मेलन, जिसका उद्घाटन माननीय प्रधान मंत्री द्वारा किया गया था और जिसमें माननीय विपक्ष के नेता भी उपस्थित थे, में ७३वां संशोधन अधनियम के कार्यान्वयन के संग्रहित ब्यौरे का लाभ मिला। इस सम्मेलन के पश्चात् वभिन्न राज्यों के पंचायती राज मंत्रियों के साथ राष्ट्र स्तरीय समीक्षाएं हुई थीं। इन बैठकों में हमारे इस विश्वास को बल मिला कि पंचायती राज संस्थाओं को और अधिक सुद्ृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। हमारे मंत्रालय ने अपनी विकास नीति में तथा सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, स्वजलधारा तथा हरियाली जैसे हाल में शुरू किए गए कार्यक्रमों में पंचायतों को मुख्य भूमिका दी है। पंचायतों को लाभार्थियों के चयन करना, परियोजना का चुनाव करना, निगरानी, पर्यवेक्षण, रख-रखाव के साथ-साथ नधियों की रिलीज़ में भी मुख्य भूमिका सौंपी गई है। हमने पंचायती राज संस्थाओं के निर्वाचित प्रतनधियों तथा कर्मियों, जो जिला, ब्लॉक एवं ग्राम स्तर पर प्रशिक्षण की पहुंच बढ़ाने हेतु प्रशिक्षण के बहुस्तरीय मॉडल को अपनाएंगे, के लिए बड़े पैमाने पर क्षमता निर्माण में सुधार का प्रस्ताव भी किया है। साथ ही, हमने प्रशिक्षण मॉडयूलों के प्रसार के लिए सेटेलाईट आधारित और दूरस्थ शिक्षा तकनीकों का प्रयोग करने का भी प्रस्ताव किया है। माननीय प्रधान मंत्री के आदेश से पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार सम्पन्नता संबंधी राष्ट्रीय विकास परिषद की एक अधिकार सम्पन्न उप-समति बनाई गई है। इसमें कई राज्यों के मुख्य मंत्री और केन्द्रीय मंत्री सदस्यों के रूप में शामिल हैं। इस उप-समति की प्रथम बैठक २६ जून, २००३ को हुई, जिसमें हमें पंचायती राज से संबंधित कई विषयों पर राज्य सरकारों के विचारों को प्राप्त करने का लाभ मिला। हम इस उप-समति की दूसरी बैठक शीघ्र कराने जा रहे हैं।
आदरणीय उपाध्यक्ष जी, भाग-IX- ए के संबंध में मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि इस विधेयक को संविधान (७४वां संशोधन) विधेयक १९९२ द्वारा संविधान में शामिल किया गया और यह १ जून, १९९३ से लागू हुआ। शहरी विकास और गरीबी उपशमन मंत्रालय जो इस अधनियम के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए नोडल मंत्रालय है, ने यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए कि राज्य नगरपालिका अधनियम को १.६.१९९३ से एक वर्ष की अवधि के अंदर भाग-IX-ए के प्रावधानों के अनुरूप लागू किया जा सके। इस प्रयोजनार्थ, मंत्रालय ने सभी राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के सचिवों की बैठकें आयोजित की तथा इस प्रक्रिया को समय-सीमा के अंदर पूरा करने पर जोर दिया। मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदम के फलस्वरूप, राज्य सरकारों ने या तो नए और व्यापक नगरपालिका कानून बनाए हैं या मौजूदा नगरपालिका कानूनों में अपेक्षित परिवर्तन/संशोधन किए हैं।
इन्हें संविधान के भाग ९ के अनुरूप बनाएं, ऐसी भी अभी आगे कोशिश हो रही है। संशोधित नगर पालिका कानूनों में अभी नगर पालिकाओं के गठन, उनकी संरचना, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण, नगर-पालिकाओं के कार्य और वित्तीय शक्तियों, राज्य निकायों द्वारा वित्तीय स्थिति की समीक्षा और जिला योजना समतियों तथा महानगर समतियों के गठन के संबंध में प्रावधान है। झारखंड और संघ राज्य क्षेत्र पौंडिचेरी को छोड़कर सभी स्थानों पर नगर पालिकाओं के चुनाव भाग ९ (ए) के प्रावधान के अनुसार कराये गये हैं। पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के लिए राज्य सरकारों द्वारा गठित राज्य वित्तीय आयोगों ने भी नगर पालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा की है और संबंधित राज्य सरकारों ने अपनी सीटें भी दे दी हैं। कुछ राज्यों की जिला योजना समति भी गठित की गई। दसवें और ग्यारहवें वित्त आयोग ने भी शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा की है और २०००-२००५ तथा २००५-२०१० की अवधि के लिए १००० करोड़ रुपया और २००० करोड़ रुपया देने की भी सिफारिश की है।
संविधान का भाग ९ (ए) संविधान के अनुच्छेद २४४ में उल्लिखित अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों पर लागू नहीं होते हैं। शहरी विकास और गरीबी उपशमन मंत्रालय ने भी नगर पालिका विधेयक २००१ के प्रावधान नामक एक विधेयक राज्य सभा में जुलाई में पेश किया है ताकि भाग ९ (ए) के प्रावधान को अनुसूचित क्षेत्रों में भी लागू किया जा सके।
फिलहाल शहरी और ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय समति इस विधेयक की जांच कर रही है। ७३वें और ७४वें संविधान अधनियमों के पारित होने के दस वर्ष पूरा हो जाने पर हमें इन अधनियमों के प्रावधानों पर जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन की पुनर्समीक्षा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। यही कारण है कि हमने दोनों सदनों में भाग ९ और भाग ९ (ए) पर विचार करने की योजना बनाई है। हमें आशा है कि इन विचार-विमर्शों के दौरान ७३वें और ७४वें संविधान अधनियमों के प्रावधानों के कार्यान्वयन में वभिन्न दलों के सदस्यों के व्यापक और वविध अनुभवों के आधार पर उनसे मिलने वाले बहुआयामी विचारों से हमें बल मिलेगा। हमें आशा है कि इन विचारों से पंचायती राज संस्थाओं तथा नगर पालिकाओं को और सुद्ृढ़ करने, खासकर एडमनिस्ट्रेटिवली और फाइनेंशियली उनको और पॉवर देने के लिए जो अभी आवश्यकता महसूस की गई है, उसके बारे में और आगे कदम बढ़ाया जा सके। सदन के जो माननीय सदस्य गण हैं, इनके विचारों से हमें बल मिले, इसके लिए मैंने प्रस्ताव पेश किया है।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Motion moved:
"That this House do consider the progress of implementation of Part IX and Part IX-A of the Constitution (dealing with Panchayats and Municipalities as institutions of self-government) during the last ten years. "SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): This is a very important subject. This has been slotted for the whole-day discussion. The House will rise at six o’clock. I understand that Members from all the parties are keen to take part in this debate. I appeal on behalf of my Party, and if the Government has also no objection that it would be proper if the sitting is extended beyond six o’clock in order to accommodate more Members so that all of them can contribute.
SHRI ANIL BASU (ARAMBAGH): The reply to the discussion may kindly be taken up on Monday. Tomorrow is the Private Members’ day. Most of the Members will not be present tomorrow. So, the discussion can take place today and the reply may kindly be taken up on Monday.
There is another point. It is for the information of the hon. Minister. वह जो फोल्डर हम लोगों को मिला, पब्लिकेशन सेंटर में और जो लाइब्रेरी के फोल्डर में रखा था, उसमें कोई इंफॉर्मेशन है, वह करैक्ट नहीं है, उसको सुधारना चाहिए। उसमें एक है, उसमें लिखा है कि पश्चिम बंगाल में कांस्टीटयूशनल अमेंडमेंट के बाद दो पंचायती चुनाव हुए लेकिन वास्तव में तीन पंचायती चुनाव हुए। लास्ट पंचायती चुनाव २००३ में हुए, उसमें थोड़ा करैक्शन कर लीजिए।
MR. DEPUTY-SPEAKER: It seems the House is in a mood to sit beyond six o’clock. We can sit beyond six o’clock so that many Members from all parts and parties can participate in the debate. We will sit. Is that the sense of the House?
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
MR. DEPUTY-SPEAKER: We will go ahead.
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): माननीय मंत्री जी, आपका पत्र मिला। पार्ट ९ और पार्ट ९(अ) तथा यह जो आपके पास कागज हैं उनके संबंध में कहा गया कि ये पुस्तकालय में भी उपलब्ध हैं और सांसद वहां से ले सकते हैं, लेकिन इसका मसौदा सदस्यों को पहले से भेजा जाना चाहिए था जिससे वे उसे पढ़कर आते जिससे उन्हें यहां सुविधा होती क्योंकि पुस्तकालय में भी उतनी प्रतियां उपलब्ध नहीं है कि सभी माननीय सदस्य पढ़ सकें। इस बात का आप भविष्य में ख्याल रखें जिससे ऐसी गलती की पुनरावृति न हो।
श्री काशीराम राणा : गलती की कोई बात नहीं है। बात यह है कि सत्र के शुरू में दो दिन इस पर चर्चा की जानी थी और बहुत थोड़ा समय होने के कारण प्रतियां सांसदों को वितरित करना संभव न हो सका। मैं भी समझता हूं कि प्रतियां वितरित की जानी चाहिए थीं, इसीलिए २० हिंदी की और २० अंग्रेजी की प्रतियां पुस्तकालय में रखी गयीं हैं। आपके सुझाव को हम भविष्य में ध्यान में रखेंगे।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): उपाध्यक्ष जी, माननीय मंत्री जी का भाषण अभी सुना। चिंता का विषय है कि ग्रामीण विकास के पांच मंत्री तो पहले ही बर्खास्त हो चुके हैं छठा कब तक रहेगा, मालूम नहीं। सबसे ज्यादा ग्रामीण विकास के मंत्री बर्खास्त हुए हैं। सुंदर लाल पटवा जी से लेकर वेंकैया नायडु तक बर्खास्त हो चुके हैं। इस देश में ग्रामीण विकास का क्या होगा?
उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइये और सारी बातें अपने भाषण में लाइयेगा।
श्री मणि शंकर अय्यर (मइलादुतुरई): माननीय उपाध्यक्ष जी, मैं भारत सरकार और विशेष रूप से ग्रामीण विकास मंत्री जी का आभारी हूं। इस १०वीं वर्षगांठ के अवसर पर जबकि हम स्वर्गीय राजीव जी के साठवें जन्मदिन को मनाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं वे यह प्रस्ताव सदन में लाए हैं। मेरे लिए तो यह क्षण बहुत ही भावनात्मक क्षण है क्योंकि इस विषय से मैं बहुत सालों से जुड़ा रहा हूं। पहले एक अधिकारी के नाते और आज यहां विपक्ष की ओर से सबसे पहले मुझे बोलने का अवसर मिला है। इसलिए मैं चाहता हूं कि इस अवसर पर किसी प्रकार का मतभेद न रखते हुए इस बात पर गौर किया जाए कि हमारा जो लोकतंत्र है उसको और सुद्ृढ़ बनाने के लिए हमें कौन-कौन से ठोस कदम उठाने होंगे। इस विषय पर चर्चा करने के लिए हम खाली हाथ यहां नहीं पहुंचे हैं। अभी कुछ महीने पहले स्थानीय समति की ३७वीं रिपोर्ट पेश की गयी। आज की चर्चा के लिए वह हमारा आधार है। इस विषय पर गहराई से उतरने से पहले एक बिंदू पर मैं खास जोर देना चाहूंगा क्योंकि हमारे मित्र वरकला राधाकृष्णन जी ने इस विषय को उठाया था और मुझे लगता है कि उससे हमारे मित्र भी उसी गलत-फहमी में पड़ जाएंगे जिसमें हमारे मित्र राधाकृष्णन जी पड़ गये। पंचायती राज का विषय हमारे संविधान में राज्यों की लिस्ट में रखा गया है। इसकी पूरी जिम्मेदारी राज्यों की बनती है और कांस्टीटयूशन रिव्यू कमीशन हो या कोई और माध्यम हो, जब तक कि हम संविधान में इस विषय पर संशोधन नहीं लाएंगे तब तक हम किसी राज्य सरकार को मजबूर नहीं कर सकते हैं कि संविधान के द्वारा यहां जो हम सोचते हैं वे वही करें।
इस तेरहवीं लोक सभा में सरकार की तरफ से प्रस्ताव आए हैं कि संविधान में व्यवस्था करने के लिए संशोधन लाया जाए। यह विषय राज्य सरकारों से ही संबंध रखता है। यदि आप या हम या यह सदन इस विषय पर दखल देना चाहें, तो सबसे पहला काम यही हो सकता है कि हम पंचायती राज के विषय को स्टेट लिस्ट से निकालकर कन्करेंट लिस्ट में शामिल करें। अगर यह होता है, तो हम इस सदन के माध्यम से बहुत कुछ कर सकते हैं। लेकिन वह न करें, फिर ख्वाहम-ख्वाह इस बारे में दखल देने से हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। स्टेट लिस्ट से निकाल कर कन्करेंट लिस्ट में डालने का कार्य कैसे होगा, यह मैं नही जानता हूं। इस विषय पर जब हमारी सरकार थी, तब हमने बहुत गौर किया था। सन् १९८८-८९ में कानून विभाग की ओर से सुझाव दिया गया था कि हालांकि ढांचे के सिलसिले में हम राज्य सरकारों को मजबूर कर सकते हैं, लेकिन उनकी अनुमति के साथ। जहां तक संभव है, क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकारों के साथ जुड़कर ही यह कार्य करना पड़ेगा। इसीलिए इसमें बार-बार ‘may’शब्द का इस्तेमाल किया गया है, ‘shall’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। ‘may’ शब्द को ‘shall’ में बदलने के लिए, प्रयास करने के पहले, मैं माननीय ग्रामीण विकास मंत्री जी से दरख्वास्त करता हूं कि वे कानूनी मश्विरा लें और देखें कि क्या एम्पावरमेंट सब-कमेटी की बात जो आपने कही है, उसके माध्यम से कर सकते हैं या नहीं। कारण यह कि अगर हमने संविधान को बदला और फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया कि यह नहीं हो सकता है, तो उसका श्रेय हमें नहीं पहुंचेगा कि हमने इस विषय में गौर नहीं किया था। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप इस विषय पर विचार कीजिए। संविधान में क्या संशोधन करना है, उसके बारे में बात करनी है कि हम क्रियान्वयन करने के बाद ही बात करें। जो प्रस्ताव हमारे सामने लाया गया है, उसमें क्रियान्वयन की बात कही गई है, संशोधन की बात नहीं कही है। इसलिए मैं आग्रह करता हूं कि हम इस पर सोच-विचार करें।
पंचायती राज के बारे में जैसा कि हमारे मंत्री जी ने बताया है, पिछले दस सालों में हमने कामायबी हासिल की है। इस पर हमें नजर रखनी चाहिए। पंचायती राज की खामियों और कमियों के बारे में बात करने से पहले, कामयाबी के बारे में जैसा मंत्री जी ने बताया है, उनको मैं दोहराना चाहता हूं। सबसे पहले, १९९२ तक एक सौ करोड़ की आबादी का प्रतनधित्व करने के लिए मात्र ५०० सासंद थे और ४५०० विधायक थे। मतलब कुल मिलाकर ५००० लोग एक सौ करोड़ की आबादी का प्रतनधित्व करने के लिए थे। इस दिशा में राजीव गांधी जी की प्रेरणा थी और राजीव गांधी जी अग्रणी रहे, तो आज हम देखते हैं कि जहां पहले ५००० चुने हुए प्रतनधिगण थे, आज उनकी संख्या ३० लाख है। इन ३० लाख चुने हुए प्रतनधिगणों में से १० लाख महिलायें हैं।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री छत्रपाल सिंह): यह सैटअप तो पहले भी था। पुराना सैटअप था, कोई नया नही हैं। राजीव गांधी जी के समय का नहीं है। …( व्यवधान)पहले जिला पंचायत के अध्यक्ष भी थे, लेकिन अब महिला वर्ग जुड़ गया है।
MR. DEPUTY SPEAKER : There should be no disturbance at all.
श्री मणि शंकर अय्यर: मैं अपने मित्र से कहना चाहता हूं, वे अपनी बारी में स्थिति के बारे में बतायें।
महोदय, तीस लाख चुने हुए प्रतनधिगण और जिनमें से १० लाख महिलायें हैं। समस्त विश्व में और कभी इतिहास में, जहां तक, इस हद तक, आम जनता के सशक्तीकरण की बात, महिलाओं के सशक्तीकरण की बात कभी नहीं हुई है।
अमेरिका में देखिए - २०० साल से वे अपना जनतंत्र चला रहे हैं लेकिन आज तक वहां कोई अध्यक्ष महिला नहीं हुई।
श्री धर्म राज सिंह पटेल (फूलपुर) : इसलिए उनके पति उनके साथ रहते हैं।…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please resume your seat.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Mani Shankar Aiyar, the moment somebody stands up, you should not yield to him. That is creating a problem for me.
SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Sir, the problem is, when they are not allowed to speak without my yielding, they nevertheless speak. So, rather than having my chain of thought interrupted, I allow them to make a fool of themselves. That is why I sit down. … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: He is not yielding. Please take your seat.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record now except what Shri Mani Shankar Aiyar says.
(Interruptions) * श्री मणि शंकर अय्यर: उपाध्यक्ष महोदय, मैं देश की कामयाबी की बात कर रहा हूं कि यहां १० लाख महिलाएं चुन कर आई हैं। ३० लाख गरीब लोग जिन में से बहुत गरीब हैं, ३० लाख जिन में से बहुत से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और पिछड़े वर्गों से जुड़े हुए हैं, उनका सशक्तिकरण हुआ है। वे आज ऐसे पद पर बैठे हैं यदि उन्हें पूरा अधिकार दे दिया जाए, उन्हें जो अधिकारीगण की आवश्यकता है, वे सौंप दी जाए और जो आर्थिक मदद उन्हें मिलनी चाहिए, वह मुकम्मल तौर पर मिले तो देश का रुख बदल सकता है, क्रांतिकारी काम हो सकता है। हमने पिछले ४०-५० वर्ष के अनुभव के आधार पर देखा कि जो १९५१ में सोचा था, जब पहली पंचवर्षीय योजना बनायी कि अफसरान द्वारा हम विकास ग्रामीण स्तर तक नहीं पहुंचा सकते हैं क्योंकि जिस प्रणाली के अन्तर्गत हम इस प्रयास को जारी रख रहे थे, वह विफल रहा इसलिए हमने सोचा कि बजाय अफसरान पर निर्भर करने के हम चुने हुए प्रतनधिगणों को ये अधिकार दें ताकि खुद-ब-खुद गांव का निर्माण गांव में और बस्ती का निर्माण बस्ती में हो। हमारी यह सोच थी कि यद * Not Recorded.
हम सशक्तिकरण से इसे शुरु करें तब आगे जाकर स्वामित्वकरण होगा। आपने इस विषय का जिक्र किया, मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने इस पर जोर दिया है कि स्वामित्वकरण के जरिए जो हमारे पंचायती राज संस्थान हैं, उनको अपना काम करने के लिए ज्यादा वित्त की मदद मिलेगी। सशक्तिकरण द्वारा जब स्वामित्वकरण पर पहुंचते हैं, तब खुद-ब-खुद देश का समृद्धिकरण होगा। इस रास्ते से आगे बढ़ने के लिए मात्र एक ही तरीका है और वह यह है कि हम उन्हीं लोगों को अपने भविष्य का निर्माण करने में भागीदार बनाएं जिन के लिए सारे विकास के कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं। इस लक्ष्य को मद्देनजर रखते हुए संविधान में संशोधन किया गया।
मैं यहां एक और विषय का जिक्र करना चाहता हूं जो मुझे लगता है कि हम भूल गए हैं। जब ६४वें संशोधन की बात चल रही थी, तब हम ग्रामीण इलाकों के बारे में ही सोच रहे थे। जब सदन में ६४वां संशोधन लाने से पहले मुख्यमंत्रीगणों से बात हुई तब उस जमाने में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी जी ने कहा कि क्यों हम केवल ग्रामीण इलाकों में रहने वाली आबादी को ये उपलब्धियां दें?
15.00 hrs. क्यों नहीं हम शहरी इलाकों में दें? जैसा गांधी जी ने कहा था कि हमारी जनता गांवों में रहती है लेकिन आज की तारीख में दो तिहाई जनता ग्रामीण इलाकों में और एक तिहाई जनता शहरों में रहती है। आप देखेंगे कि बढ़ते-बढ़ते शहरों में यह आधी से ज्यादा हो जायेगी। जैसा अन्य देशों में हुआ है कि लोग गांवों को छोड़कर शहरों तक पहुंचेंगे। इसी बात को स्वीकार करते हुये संविधान का ६५वां संशोधन बाद में लाया गया लेकिन इस इतिहास को भूलकर पिछले १० साल में हमने भाग ९ और भाग ९क को अलग-अलग देखकर इन लोगों को जिम्मेदारी दी। जिस प्रकार साम्राज्यकाल में गांवों और शहरों को जुदा किया गया था, उसे जोड़ने के बजाय हम आज भी उसे जुदा रख रहे हैं। इसलिये यह बहुत जरूरी है। सरकार ने आज यह कदम उठाया है और ९ और ९क पर एक साथ चर्चा करवा रहे हैं लेकिन आगे जाकर देखेंगे कि पंचायतों और शहरों की इकाइयों को जोड़कर क्या काम हो सकता है।
उपाध्यक्ष जी, स्व. राजीव जी ने उदाहरण दिया था और आप देखते हैं कि गोरखपुर जिले का जो गांव है, वहां एक नौजवान लड़का सीखता है कि गाय का दूध कैसे निकाला जाये। बजाय गोरखपुर शहर पहुंचकर इस क्षमता का उपयोग करे, वह मुम्बई पहुंच जाता है जहां पर लोग नहीं जानते हैं कि गाय से दूध आता है बल्कि वे सोचते हैं कि दूध बोतल से आता है। ऐसे लोगों के विकास के लिये गोरखपुर का वह लड़का पहुंच जाता है। उन्होंने कहा था कि इसका मूल कारण यह है कि हम ग्रामीण विकास को एक नज़रिये से देखते हैं और सोचते हैं कि शहर का विकास बिलकुल मुख्तलिफ है, इसलिये दोनों को जोड़ना नहीं है। आप देखिये जहां दिल्ली से भोपाल के फासले पर कितने बड़े शहर आते हैं, बहुत कम हैं जबकि जर्मनी में देखिये कोलोन, बॉन,फ्रंकफर्ट, स्टुटगार्ड, म्युनिख बड़े-बड़े शहर आते हैं। दिल्ली से भोपाल के बीच में बहुत सा ग्रामीण इलाका है जबकि हमारे जो बिलकुल नजदीक हैं उन्हें अंग्रेजी में रूरल हिंटरलैंड कहा जाता है। अगर हम उसे शहर से जोड़ दें तब मालूम होगा कि उनका ग्रामीण विकास होगा। इससे शहरी विकास भी होगा। दोनों को जोड़ने से आप देखेंगे कि इससे देश का विकास भी होगा। मेरे ख्याल से ये बुनियादी चीजें हैं। इन बातों के मद्देनजर उन तफसीलों में आना चाहिये जिसकी चर्चा करना यहां आवश्यक है।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि हम विकेन्द्रीकरण की बात नहीं कर रहे हैं, हम सुपुर्दीकरण की बात कर रहे हैं। विकेन्द्रीकरण का मतलब यह है कि उस पर उसका अधिकार है और उसका पालन करने के लिये मैं किसी को इजाजत देता हूं। सुपुर्दीकरण का मतलब है कि मेरा अधिकार है और मैं खुद ही उसको छीनकर किसी और को सुपुर्द कर देता हूं। हमने संविधान के द्वारा ९ और ९क में जो इकाई बनाई है, वह राज्य सरकार की एजेंसी में ही बनती है, वे स्वायत्त शासन संस्थायें हैं । जब तक ये स्वायत्त संस्थायें इस लायक काम न करें, तब तक जिस लक्ष्य के साथ संविधान में संशोधन लाया गया था, वह पूरा नहीं हो सकता है। इसलिये हमें इस बात पर जोर देना चाहिये कि हमने चुनकर इन संस्थाओं को बना लिया है। हमें इस बात पर जोर लगाना है कि क्या ये चुनी हुई संस्थायें राज्य सरकार की एजेंसी बनी बैठी हैं या कोई स्वायत्त शासन की इकाइयां बन चुकी हैं या स्वायत्त स्वशासन संस्था बनाने के लिये ३अ को जोड़ना पड़ेगा लेकिन इसमें अधिकार सुपुर्दीकरण का होना चाहिये। उसके साथ-साथ, जो अधिकारीगण हैं, उनका भी सुपुर्दीकरण होना चाहिये इसका मतलब यह है कि इन संस्थाओं के चुने हुये अध्यक्षगण हैं, उनके निर्देशानुसार उन्हें काम करना चाहिये।
इनको अनुशासन के अंदर लाना है और क्योंकि मैं भी उसी बिरादरी से एक जमाने में जुड़ा हुआ था, मैं जानता हूं कि जो सी.आर. लिखता है, जो कान्फीडेंशियल रिपोर्ट लिखता है, वही तय करता है कि किसका निर्देश होगा और किसका नहीं होगा।
मध्य प्रदेश के माननीय मुख्य मंत्री जी ने एक लतीफा सुनाया - जंगल में हाथी और शेर दूसरे किसी जानवर से नहीं डरते हैं, सिवाय सियार के, सियार को देखकर शेर भी डर जाता है। अंग्रेजी में सी.आर. बनता है कान्फीडेंशियल रिपोर्ट, तो जो ये अधिकारीगण हैं, ये हमारे देश के जो * हैं, इन्हें सही अनुशासन में लाने के लिए बहुत ही…( व्यवधान)
* Expunged as ordered by the Chair.
गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री हरिन पाठक) : क्या आप अपने आपको कह रहे हैं ?
श्री मणि शंकर अय्यर: हां, मैं अपने आपको कह रहा हूं, क्योंकि मैं भी उसी बिरादरी का था।
श्री हरिन पाठक : हम मानने को तैयार नहीं है।
श्री मणि शंकर अय्यर: चलिये कोई बात नहीं। लेकिन मैं यह कहूं कि* भी न हो तो जो सम्माननीय मनुष्यगण हैं, इनको भी सही रास्ते पर लाने के लिए सी.आर. लिखने का अधिकार आप चुने हुए लोगों को दीजिए, तभी काम होगा। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं, क्योंकि इस देश में कोई भी ऐसा प्रधान मंत्री नहीं है जो यह न जानता हो कि मैं मालिक हूं और कैबिनेट सैक्रेटरी मेरा पैरोकार है। कोई भी मुख्य मंत्री ऐसा नहीं है जो यह न जानता हो कि जो मुख्य सचिव है, वह उसका पहला गुलाम है। लेकिन आप मुझे बताइये कि इस देश में कौन सा वह डिस्टि्रक्ट मजिस्ट्रेट है, कौन सा चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर है जो अपने को जिला परिषद के अध्यक्ष का पहला गुलाम समझता हो। वह कौन सा बी.डी.ओ. है, जो सोचता है कि जो पंचायत समति का अध्यक्ष है, उसके निर्देशानुसार मुझे काम करना है। आप नीचे तक पहुंचिये, कौन सा वह विलेज ऑफिसर या पटवारी है, जो अपने को नीचा समझता है, गांव के स्तर का कौन सा अफसर है, जो अपने को नीचा समझता है - ग्राम पंचायत में जो सरपंच है, अध्यक्ष है या जो भी उसका नाम है, जो उसके नीचे काम कर रहा है। जब तक आपने यह नहीं बदला तो अधिकार देने का क्या फायदा, अधिकारीगण की भी आवश्यकता है और अधिकारीगण राजधानी की तरफ देखे, मुख्य मंत्री की गणेश परिक्रमा करे, उनके द्वारा वहां पहुंचे और उनके द्वारा कहीं अपना तबादला करवाये। जो हमारे चुने हुए अध्यक्षगण हैं, चाहे गांव के स्तर का हो, पंचायत समति के स्तर का हो या जिले के स्तर का हो, काम होने वाला नहीं है। जब हम सुपुर्दगीकरण की बात करते हैं, हमें अधिकार को अधिकारीगण से जोड़ना पड़ेगा। साथ-साथ जब कि आप अधिकार और अधिकारीगण को जोड़ते हैं, लेकिन पैसा सब दिल्ली में रखते हो या राज्य की राजधानी में रखते हो तो नीचे वाला क्या काम कर सकता है। आप किसी भी चुने हुए प्रतनधिगण से पूछिये कि वह किस आधार पर चुनकर आया तो वह कहेगा कि वह ऐसा कह कर चुनकर आया है, चाहे गांव का हो, तालुका का हो या ब्लॉक का हो, वह कहेगा कि मैंने अपने मतदाताओं से कहा कि आपकी भलाई के लिए मैं काम करूंगा। लेकिन जब वह चुनकर आ जाता है, तभी जाकर उसे पता लगता है कि हमारे लक्ष्य तो हो सकते हैं, हमारे इरादे तो पक्के हो सकते हैं, लेकिन काम करने के लिए * Expunged as ordered by the Chair.
पैसा दिल्ली से वहां नहीं पहुंचता है। कभी-कभी डी.आर.डी.ए. में पहुंचता है। ज्यादातर सीधा राज्य सरकारों के पास पहुंचता है और हर राज्य सरकार, चाहे किसी की राज्य सरकार हो, सबके पास वित्तीय मुश्किलात हैं। वह उस पैसे को पकड़े हुए हैं। आगे जब वित्तीय वर्ष खत्म होने वाला होता है तब वह पैसा इन्हें पहुंचाती है और फिर कहती है कि कितने अक्षम लोग हैं, यह पैसा खर्च भी नहीं कर रहे हैं और वह पैसा वापिस ले लेती है। इसलिए हमें यह प्रावधान करने की आवश्यकता है कि अधिकार और अधिकारीगण के संग हम अर्थव्यवस्था को भी सही करें। अंग्रेजी में हम कहते हैं - Three f’s: function, functionary and finance. जब तक इन तीनों को जोड़कर आपने सुपुर्दगीकरण नहीं किया, तब तक कुछ नहीं होगा। जो सुपुर्दगीकरण आप करते हैं, कानूनी तौर पर वह फर्जी रह जाता है, वह सिर्फ कागजी रह जाता है। असलियत में कोई सुपुर्दगीकरण नहीं होता है। हम पिछले दस सालों से देख रहे हैं कि हर राज्य में हालांकि अच्छे-अच्छे कानून बने हैं, जो संविधान के संग जुड़ते हैं और कुछ खास मतभेद नहीं हैं। जो राज्य में कानून हैं और संविधान के अंदर, जब कि आप गांव में पहुंचते हो तो लोग कहते हैं कि हम चुनकर आ गये हैं लेकिन क्या करेंगे और कैसे करेगें, जबकि कोई काम वह खुद नहीं कर सकते हैं, तब बैठकर सौदा होता है बीडीओ और पंचायत समति के चेयरमैन के बीच में, सीईओ और जिला परिषद के अध्यक्ष के बीच में, गांव के सचिव और गांव के अध्यक्ष के बीच में कि चलो भई २५ हजार लेने हैं तो तुम १० रख लो मैं १५ रख लूँगा। पंचायती राज के जरिये बजाय सुपुर्दगीकरण होने के भ्रष्टाचार का विकेन्द्रीकरण हो रहा है और पंचायती राज को बुरा नाम मिल रहा है। महोदय, पंचायतों में यदि भ्रष्टाचार चलता है तो उसका कारण यह नहीं है कि भ्रष्ट लोग वहां पर चुनकर आते हैं और आप और हम जैसे नेक लोग यहां चुनकर आते हैं। भ्रष्टाचार वहां होने का एकमात्र कारण यह है कि सही मायने में सुपुर्दगीकरण नहीं हुआ है। आपको अधिकार भी देने हैं, अधिकारीगण भी देने हैं और अर्थव्यवस्था का सही इंतज़ाम करना है, तभी जाकर आप देखेंगे कि असलियत में वह जो करना चाहते हैं, वह कर पाएंगे और जबकि वह कर रहे हैं, यदि साथ-साथ आपने ग्राम सभा को जोड़ दिया, तब आप देखेंगे कि इस देश का जो लोकतंत्र है, वह लोक सभा से शुरू होकर ग्राम सभा तक जाएगा। कहीं बीच में आपने लोक सभा को छोड़कर सरकार चलाई जैसा कि पंचायतों में ग्राम सभा को छोड़कर पंचायत का शासन चल रहा है तो भ्रष्टाचार के अलावा और क्या हो सकता है? गलतियां उस मनुष्य में नहीं हैं जो कि निचले स्तर पर चुनकर आता है, गलतियां हमारी हैं कि हमने सुपुर्दगीकरण को पूरा नहीं किया और अधिकार को अधिकारीगण से नहीं जोड़ा और अधिकारीगण को अर्थव्यवस्था से नहीं जोड़ा। इन सबको कीजिएगा। आप देखेंगे कि जबकि हर प्रस्ताव के लिए ग्राम सभा की अनुमति ली जाती है, जबकि लेखा कोई एजीसीआर के जरिये नहीं, लेकिन एक सामाजिक लेखा, एक सोशल ऑडिट होता है। उस ग्राम सभा में वे जानते हैं कि बस स्टैन्ड बना है या नहीं, वे जानते हैं कि जहां बगल के गांव में बस स्टैन्ड २० हजार रुपये में बना तो यहां ४० हजार खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ती है। वे जानते होंगे कि कॉनट्रैक्टर सरपंच का भांजा है या नहीं। हमें किसी और से पूछने की जरूरत नहीं है। ग्राम सभा में ही इन सवालों का जवाब दिया जाता है और उनकी अनुमति के साथ आप तय करें कि क्या करना है। तब आप देखेंगे कि असलियत में हमारी जम्हूरियत निचले स्तर पर गांवों के स्तर पर पहुंचेगी। तभी जाकर हम कह सकते हैं कि बस्तियों में रहने वाले, गली-कूचों में रहने वाले, मोहल्लों में रहने वाले, गांवों में रहने वाले की भागीदारी हो चुकी है और अपने भविष्य का निर्माण खुद अपने हाथों और दिमाग से कर रहे हैं। यही है हमारा लक्ष्य और माफ कीजिएगा, इसको रोकने के लिए केन्द्र सरकार की बड़ी गलतियां हैं जिनको हमें बदलना चाहिए। मैं अपनी बुद्धि के ज़रिये यह नहीं कह रहा हूँ। आपके सामने ३७वीं रिपोर्ट है। इस ३७वीं रिपोर्ट में हमने बहुत सी ऐसी चीजें आपको बताई हैं जिनको आप और आपके अधिकारीगण स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इसलिए गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है।
सबसे पहले जो आप यहां से साधन भेजते हैं उन कार्यों के लिए जिनका जिक्र ११ और १२ शैडयूल में है कि हमने ही तय किया है इस सदन में कि यह सारा काम पंचायतों के द्वारा या नगरपालिकाओं के द्वारा किया जा सकता है। हमारी गणना के अनुसार ३१ हजार करोड़ रुपया बनता है जिसको खर्च करने का अधिकार संविधान के ज़रिये पंचायतों और नगरपालिकाओं का बनता है। आपके ही मंत्रालय में कोई १५ हजार करोड़ ऐसे हैं लेकिन यदि आपने सबकी पूरी समीक्षा की और देख लिया कि कुल मिलाकर कितना काम किया जाना चाहिए तो डिफैन्स के बाद, मतलब डिफैन्स पर जो हम खर्च कर रहे हैं, उसका आधा बनता है जिस पर आपका अधिकार नहीं है राज्य सरकार का नहीं है, पंचायतों और नगरपालिकाओं का है।
मैं मानता हूँ कि सब कुछ हो सकता है और एक ही कदम में हम वहां तक नहीं पहुंच सकते हैं। लेकिन कहां से शुरू हो। १०हजार से शुरू कीजिए २०हजार तक जाइए। मैं १० हजार और २० हजार करोड़ की बात कर रहा हूँ। वह पैसा इन चुने हुए लोगों के हाथ में पहुंचे।
महोदय, इस देश की सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति के लिए जो जिम्मेदार हैं, उनके हाथ में यह धन पहुंचेगा, तब आप देखेंगे कि क्षणों में ही इस देश का रुख बदलेगा, लेकिन जब तक इस पैसे पर आपके अधिकारी और राज्य सरकारों के अधिकारीगण कब्जा करते हैं तब तक गाड़ी आगे बढ़ने वाली नहीं है। इसलिए हमारी माननीया नेत्री ने बताया कि जब भी कांग्रेस की सरकार बनेगी, कौन जाने कल बनेगी या अगले साल बनेगी, वैसे हमें ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी, तब हमारी सरकार इन साधनों को पंचायतों तक पहुंचाएगी।
जब हमने यह कहा है, तो सबसे पहले हम यह नहीं चाहते हैं कि यहां के पी.एम. के जरिए या राज्यों के सी.एम. के जरिए यह धन जिलों के डी.एम. के हाथ पहुंचे, लेकिन आज यही हो रहा है। डी.आर.डी.ए. का आज अध्यक्ष कौन है, कहीं सी.ई.ओ. है कहीं डिप्टी कमिश्नर है और कहीं कलैक्टर हैं, आपका पैसा, जो आपके समान ही कोई हैं, उनके हाथ में जब पहुंचता है, तो काम नहीं बनता है।
हमारी स्थानीय समति ने बार-बार आग्रह किया है कि खुदा के वास्ते इस डी.आर.डी.ए. को बन्द कर दीजिए और इसे जिला परिषद् के साथ मर्ज कर दीजिए और जिला परिषद का जो अध्यक्ष है वही इसे चलाए। हालांकि हमारी स्थानीय समति ने सर्वसम्मति से, यानी कि बिना किसी मतभेद के, मेरी जानकारी के अनुसार पिछले तीन-चार साल से, ऐसी सिफारिश भिजवाई है, लेकिन महेन्द्र जी हमें बताएंगे और उससे पहले कितने साल से हर साल हम इस प्रकार की सिफारिश करते आ रहे हैं कि डी.आर.डी.ए. भंग किया जाए और पैसा जिला परिषद् को पहुचाया जाए, लेकिन हमारी इस सिफारिश को आज तक स्वीकृति प्रदान नहीं की गई है।
आप केन्द्र से धन सीधा जिला परिषद् को पहुंचाइए, लेकिन आज तक इसकी स्वीकृति नहीं हुई है। स्वीकृति की बात छोड़ दीजिए, आपकी जो रिपोट्र्स निकलती हैं, उनमें बार-बार यह बताया जाता है कि डी.आर.डी.ए. को आप और सुद्ृढ़ करेंगे। पहले जहां आप पांच करोड़ रुपए दे रहे थे, वहां अब डी.आर.डी.ए. को २० करोड़ रुपए दे रहे हैं। आप इस विकेन्द्रीकरण की तरफ क्यों जा रहे हैं ? हम चुने हुए लोग हैं, ग्राम पंचायत के लोग चुने हुए हैं, पंचायत समतियों के लोग चुने हुए हैं, जिला परिषदों के लोग चुने हुए हैं, हो सकता है आपके अफसर चुने हुए नहीं हों, इसलिए मेरी समझ में नहीं आया कि आप अपने पैसे को क्यों सीधे इन जनप्रतनधि संस्थाओं तक नहीं भेजते। जो जनाधार पर, जैसे आप अपने पद पर आए हैं, वैसे ही जो ग्राम का सरपंच है, पंचायत समति का प्रधान है, जिला परिषद् का अध्यक्ष है, ये सब चुने हुए लोग हैं, उनका जनाधार है, उन पर विश्वास रख कर वह पैसा सीधे वहां भेजिए, लेकिन यदि आपने सारा पैसा जिला परिषद् को भेज दिया तो फिर वहां ५०० * बैठ जाएंगे क्योंकि हकीकत यह है कि आज सारा पैसा जो राज्य सरकार को जा रहा है वह जिला परिषद् के हाथ में …( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: That word should be removed from the record.
Shri Mani Shankar Aiyar, you have to conclude now.
* Expunged as ordered by the Chair.
SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): Sir, please give me a few more minutes. तानाशाह बैठ जाएंगे। यह जो पैसा यहां से भेजा जा रहा है या राज्य सरकार की तरफ से जाना है, आप उसके लिए एक क्लीयरकट मानचित्र बनाइए, जिसे अंग्रेजी में एक्टीविटी मैपिंग कहते हैं। यह एक ऐसा शब्द है, जिससे आपका मंत्रालय अवगत है। इसका मतलब यह है कि कौन सा काम जिला परिषद् करेगी यह स्पष्ट हो जाए, कौन सा काम उसी विषय में पंचायत समति करेगी और कौन सा काम उसी विषय में ग्राम पंचायत मे होगा, यह स्पष्ट हो जाए। इसी को एक्टिविटी मैपिंग कहते हैं और मुझे बताया गया है कि इसे हिन्दी में कार्यकलाप मानचित्र कहा जाता है। यदि इसे आपने तैयार कर दिया, तो दिल्ली में बैठे-बैठे, जो इन्फर्मेशन टैक्नौलौजी की बात आप करते हैं, इसके जरिए और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो चुका है, इसलिए हर गांव में कोई न कोई बैंक गांव के बिलकुल बगल में है, उस बैंक में आप यहां से सीधा धन भेजकर जमा कराइए। जो ग्राम पंचायत से संबंध रखता है, उस पैसे को ग्राम पंचायत को, जो पंचायत समति से संबंध रखता है, उस पैसे को पंचायत समति को और जो जिला परिषद् से संबंध रखता है, उसे जिला परिषद् को भेजने का काम करें। यदि आपने ऐसा एक्टीविटी मैपिंग कराया है, तो आप देखें कि वहां आसानी से साधन पहुंच जाएंगे। आप जो कहते हैं कि दिल्ली से आपको चेन्नै, हैदराबाद या कहीं और पैसा भेजना है क्योंकि राज्य सरकार को २५ प्रतिशत पैसा उसमें जोड़कर आगे भेजना है, इसको आप रोकिए, ऐसा मत कीजिए। आप यहां से सीधे जिस योजना का जितना भी आपका शेयर है, चाहे वह ५०, ६० या ७५ प्रतिशत है, उसे सीधे वहां भेज दीजिएगा और उन पर छोड़ दीजिएगा॥ वहां के स्थानीय इकाइयों के जो अध्यक्ष हें, वे अपनी राज्य सरकार से लड़ें कि ७५ प्रतिशत भाग दिल्ली से आ चुका है, आपका जो २५ प्रतिशत है वह क्यों नहीं आया। ये पूछें तब काम बनेगा। हमें उन्हें राजनैतिक तौर पर सशक्त बनाना है। जहां कुल मिलाकर एक मुख्य मंत्री और ३० मंत्री होते हैं, ऐसी इकाइयों में लाखों चुने हुए लोग हैं और सही मुकाबला हो तो तब आप देखेंगे कि राजनैतिक तौर पर वे कामयाबियां हम हासिल कर सकते हैं, जो कि संविधान के जरिए यहां दो शब्द बदल कर नहीं हो सकेगा। उन्हें आप सशक्त बनाएं। पंचायतों से कोई मतभेद नहीं है, एमएलएज़ का काम कभी-कभी हो जाता है, लेकिन आपका तो होता ही नहीं है। आप वहां सीधे नगरपालिका और पंचायतों को पैसा भेजिए तो आप देखेंगे कि खुद-ब-खुद ये क्रांति बहुत आगे बढ़ती जाएगी।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं बहुत कुछ बोलना चाहता था लेकिन आपने पहले ही बता दिया कि मुझे संक्षेप में बोलना है। आप मुझे दो-तीन मिनट का समय और दें, उससे ज्यादा समय मैं नहीं लूंगा। आप एक बात याद रखिएगा कि जो ज्यूरिसप्रुडेंस है, इसमें हमें सही कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि वभिन्न हाई कोर्टों से वभिन्न प्रकार के निष्कर्ष हमारे सामने आए हैं और कभी-कभी ऐसा होता है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो डिसीजंस लिए जाते हैं वे कभी-कभी एक-दूसरे के साथ पूरा समन्वय नहीं रखते हैं तो लॉ कमीशन के जरिए आप इसे क्लियर कर सकते हैं। उनके जरिए कहिएगा कि जितने भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट आज तक आए हैं उन सब की समीक्षा करें और फिर इस देश को बताएं कि क्या हमारा कानून है तथा क्या वाकई हमारे संविधान में प्रावधान हैं।
हमारे संविधान में चुनाव के सिलसिले में मिसाल के तौर पर कोई प्रावधान नहीं है कि आप इसे स्थगित कर सकते हैं। पांच साल के अंदर-अंदर चुनाव होने ही चाहिए, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने बताया है कि यदि सुपरविनिंग सरकमस्टांसेस हों, उन्होंने खास कहा कि सुपरविनिंग सरकमस्टांसेस का मतलब है कि कहीं भूकम्प आ गया, बाढ़ आ गई तब आप इसे स्थगित कर सकते हैं, लेकिन राजनैतिक भूकम्प आ गया तो आप इसे स्थगित नहीं कर सकते। मगर हमने देखा है कि बहुत से राज्यों में चुनाव समय पर नहीं होते हैं, उनके बारे में आपको सोचना चाहिए। वैसे ही चुनाव को साफ-सुथरा करने के लिए राजीव जी ने बताया था कि हम इलैक्शन कमीशन को यह जिम्मेदारी दें। आप लोगों ने इसे बदल दिया और कहा कि नहीं, स्टेट इलैक्शन कमीशन बनेगा। आप भी जानते हैं कि जो स्टेट्स में इलैक्शंस हो रहे हैं, उसके बारे में किस हद तक शिकायतें आती हैं, इस बारे में भी आप सोचिएगा। राजीव जी ने कहा था कि ऑडिट के लिए कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल से सिफारिशें ली जाए कि इसे कैसे किया जाना चाहिए। आपने इसे बदल दिया, नतीजा यह है कि इसके बारे में बहुत सी शिकायतें हैं, इन तमाम चीजों पर हम पुनर्विचार कर सकते हैं और इसे सही बनाने के लिए कदम उठा सकते हैं। हमें देखना है कि कैसे, कहां तक हम आगे बढ़ चुके हैं और कहां तक हमें जाना है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की तरफ से, जो प्रतिवर्ष का हयूमन डेवलपमेंट इंडेक्स बनाया गया है, उसी के समान आप सुपुर्दगीकरण का खाता हमारे योजना आयोग के जरिए तैयार रखें तो आप प्रतिवर्ष इस सदन में एक रिपोर्ट दे सकते हैं कि फलां राज्य पहले स्थान पर है और इस इंडेक्स के आधार पर फलां राज्य बिलकुल आखिरी स्थान पर है। पिछले साल और इस साल के अंतर्गत क्या बदलाव आया है, कौन सा राज्य इस दौर में आगे पहुंच चुका है और कौन सा पीछे गिर चुका है। देश को पता हो कि कौन सा राज्य आगे बढ़ रहा है और कौन सा पीछे रह गया है, तब दौर की गति बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी, तब आप देखेंगे कि हम समयबद्ध पंचायती राज को ला सकेंगे। दस साल में हमने इस प्रणाली को तैयार किया, ३० लाख चुने हुए प्रतनधियों को लाए, चुनाव कराए गए हैं और वित्त आयोग की सिफारिशें आई हैं। यह दस साल का हमारा अनुभव है।
लेकिन सबसे बड़ा अनुभव बस यही है कि जिस लक्ष्य, जिस मंजिल को हम देख रहे हैं, वहां तक हम नहीं पहुंच पाये हैं, उस मंजिल का चित्र हमारे सामने बिल्कुल स्पष्ट है, साफ है। हमें यह तय करना है कि वह कौन सी सड़क है, जिसके जरिये हम मंजिल तक पहुंच पाएंगे, कौन से वे मुकाम हैं, जिनको हमें पार करके उस मंजिल तक पहुंचना है। कौन से वे ठोस कदम हैं, जिनको हमें उठाना पड़ेगा। एक-एक मुकाम को पार करने के लिए और कितने समय के अन्दर इस पूरे फासले को हमें तय करना है। हमारी पार्टी की तरफ से हमने एक समयबद्ध पंचायती राज की दिशा में दसवीं वर्षगांठ योजना तैयार की है। यदि उपाध्यक्ष महोदय की अनुमति हो तो इसे सभा के पटल पर मैं रखने को तैयार हूं, लेकिन यदि वह अनुमति हमें न मिले तो अनौपचारिक रूप से इस दस्तावेज को मैं माननीय मंत्री महोदय को देने को तैयार हूं। इसमें कोई पार्टी के मतभेद का सवाल नहीं उठता है। हम बस आपको बताना चाहते हैं कि हमारे नजरिये में इस मंजिल तक पहुंचने के लिए कौन सा रास्ता है। उसका जिक्र इस दस्तावेज में है। कौन से वे मुकाम हैं, जिनको हमें पार करना है। १६ ऐसे मुकामों का हमने इसमें जिक्र किया है। कौन से वे ठोस कदम हैं, तकरीबन सौ कदम ऐसे हैं, जिनका जिक्र इसमें है। कितने समय में इसे लागू करना है, इसे पांच साल के अन्दर करना है, इस पर हम सोच विचार करें।
साथ-साथ जो पैरलल बॉडीज हैं, इन पर आप रोक लगाइये। मैं किसी एक राज्य की बात नहीं कर रहा हूं। मैं यह भी बताऊं कि कांग्रेसी राज्यों में भी कुछ ऐसी पैरलल बॉडीज हैं, जिन पर हमें पुनर्विचार करना होगा। गैर कांग्रेसी राज्य सरकारें हैं, जिनके कार्यक्रमों पर भी हमें विचार करना होगा, लेकिन उस पर विचार करने की या उसका जिक्र करने की भी यह सही जगह नहीं है। बार-बार स्टेंडिंग कमेटी की रिपोर्ट में आपको बताया गया है कि हमें क्या करना चाहिए। इस पर आप कृपया गौर फरमाइये, खास तौर पर मैं यह नहीं बताने वाला हूं कि क्या-क्या सबजैक्ट्स लिखे हैं, क्योंकि मुझे पढ़ने में कुछ समय लग जायेगा, लेकिन मैं आपसे खास तौर से कहना चाहता हूं, आपसे यह अनुरोध है कि आप खुद एक निजी जिम्मेदारी उठाकर इस रिपोर्ट के २.२५, ३.११, ३.१४, ३.४९, ४.१४, ५.३, ६.१३, ६.१४, ६.१५, १०.९ और १०.१० पैराग्राफ्स कृपया गौर फरमाइये। यदि संसद के मैम्बरान को अनौपचारिक रूप से अपने मंत्रालय में आप बुलाना चाहेंगे तो हम बैठकर इस पर गौर कर सकते हैं, आपको समझा सकते हैं कि हमारे क्या इरादे थे। लेकिन जब सर्वसम्मति से हमने एक ऐसी रिपोर्ट पेश की और वह सदन के पटल पर नवम्बर महीने में रखी गई, लेकिन ८-९ महीने के बाद भी हमें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। जब भी आती है, हमारा अनुभव यह रहता है कि आप जो करना चाहते हैं, वह करते रहते हैं। आप भी यहां चुनकर आये हैं, हम भी यहां चुनकर आये हैं और ये जो ३० लाख लोग अपनी-अपनी जगह चुनकर आये हैं, उनकी बात भी हमारे कानों में गूंजनी चाहिए और हमारे जरिये ही यह हो सकता है।
अन्त में आपका आभार प्रकट करते हुए और राजीव जी के नाम से जो श्रेय आज की चर्चा में जुड़ रहा है, उसका जिक्र करते हुए मैं विदा लेता हूं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: There are some words used by him, which I will expunge.
श्री प्रदीप यादव (गोड्डा) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं। इस सदन का मुझे काफी कम अनुभव है और पहली बार इस सदन में बोलने का मुझे मौका मिला है।
साथ ही मैं अपनी पार्टी के मुख्य सचेतक को भी धन्यवाद देना चाहता हूं कि ऐसे विषय पर, जो गांवों से जुड़ा विषय है, इस देश से जुड़ा विषय है, उस विषय पर मुझे अपने विचार रखने का मौका दिया है।
उपाध्यक्ष महोदय, निश्चित रूप से १९९२-९३ का वर्ष इस देश के लिए सदी का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष रहा है। इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है। १९९२-९३ में जो संविधान संशोधन हुए, उससे गांव के लोगों के मन में एक भाव जागा कि अब हमें अधिकार मिलने वाले हैं। अब गांव का विकास गांव से होगा। अब केवल दिल्ली में बैठकर गांव के बारे में कल्पना नहीं की जायेगी। गांव के लिए योजना की कल्पना गांव में होगी और उसे साकार और मूर्त रूप भी गांव में मिलेगा। आज उसको दस साल बीत गये हैं। दस साल बाद पुन: मैं केन्द्र सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
मैं माननीय प्रधान मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने कहा है कि गांव को और अधिक अधिकार देने की बात हो, ग्राम पंचायतों को अधिकार देने की बात हो या संविधान में संशोधन करने की बात हो तो उसे हम करने को तैयार हैं। यह प्रतिबद्धता बताती है कि सरकार गांव को और अधिकार देना चाहती है, गांव के बारे में कुछ करना चाहती है, गांव को विकास से जोडना चाहती है।
15.31 hrs. ( Shrimati Margarat Alva in the Chair) मैं अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहता। निश्चित रूप से १० साल में यह जो उपलब्धि हुई, वह सही मायने में एक बड़ी उपलब्धि है। अभी अय्यर साहब ने बताया कि ३० लाख लोग प्रतनधि बनकर आये हैं जिनमें से १० लाख महिलाएं हैं। यह इस लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन उसके साथ-साथ अगर हम ईमानदारी पूर्वक विचार करें तो आज पंचायतों को जितना अधिकार राज्य सरकारों को देना चाहिए था, उसमें राज्य सरकारों ने कहीं न कहीं अपनी ईमानदारी में कमी की है। किसी राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो कहीं दूसरे दलों की सरकार है। मैं किसी सरकार पर उंगुली उठाना नहीं चाहता लेकिन जिस मायने में अधिकार देने चाहिए, उसे राज्य सरकारों ने देने में कटौती की गई है। उसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि आज बिहार में लोगों को अपने अधिकार के लिए पंचायती संस्थाओं की चुनी हुई कोर्ट की शरण लेना पड़ी है। कोर्ट में शरण लेने के बाद उन्हें अधिकार मिलने की बात कही है। आज वहां के विधायक विधान परिषद में आवाज बुलंद कर रहे हैं, धरने पर बैठे हुए हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं कि चुने हुए जन-प्रतनधियों को अधिकार मिलने चाहिए। इसलिए मैं कह रहा था कि राज्य सरकार को जितना अधिकार देना चाहिए था, निश्चित रूप से उसमें कुछ न कुछ कमी रही है। वह कमी अब दूर करने का समय है। आज हम सब मिलकर इस पर विचार कर रहे हैं।
मैं दो-तीन बातों की ओर इस सदन का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। एक बात अय्यर साहब ने बड़ी विस्तार पूर्वक कही कि निश्चित रूप से यदि आप पंचायती संस्थाओं को नौकरशाहों के हाथों से स्वतंत्र करना चाहते हैं तो उनको अधिकार देना होगा। उनकी सेवा शर्तें उन्हें सौंपनी होंगी। उनको सी.आर. लिखने के अधिकार देने होंगे। इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है। उसका एक पुख्ता प्रमाण यह है कि हाल के दिनों में हमें अखबार में पढ़ने को मिला कि राजस्थान की एक आदिवासी महिला जो सरपंच थी, उसको आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ा। …( व्यवधान)
श्री शीश राम ओला (झुंझुनू) : आप क्या बात कर रहे हैं ? …( व्यवधान)
श्री प्रदीप यादव : मध्य प्रदेश के बेतूल गांव में एक आदिवासी महिला सरपंच को आत्महत्या करने पर विवश होना पड़ा। …( व्यवधान)
श्री शीश राम ओला: आप दूसरे राज्य का उदाहरण दीजिए। राजस्थान सबसे अच्छा है। …( व्यवधान)
सभापति महोदया : यह उनकी मेडन स्पीच है इसलिए कृपया आप उन्हें डिस्टर्ब मत करिये।
...( व्यवधान)
श्री महेश्वर सिंह (मंडी): सभापति महोदया, यह उनकी मेडन स्पीच है इसलिए इनको इंटरप्ट नहीं करना चाहिए। …( व्यवधान)यह संसद की परम्परा है। …( व्यवधान)
सभापति महोदया :मैं बोल रही हूं इसलिए आपको कहने की जरूरत नहीं है।
...( व्यवधान)
श्री प्रदीप यादव : मैं कोई अपनी बात नहीं कह रहा हूं।
मैंनेअखबारों में जो पढ़ा, उस बात को रखने का प्रयास किया और मेरे पास उसके प्रमाण हैं। मैं मध्य प्रदेश सरकार पर उंगली नहीं उठाना चाहता, मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि निश्चित रूप से नौकरशाहों से पंचायत संस्थाओं को मुक्त करना होगा, उनको अधिकार देने होंगे।
अभी जिला योजना समति की बात आई। जिला योजना समति जो बननी थी, समति के विकास के लिए नगरपालिका और जिला परिषद को मिलाकर, आज जिला परिषद के अध्यक्ष कहीं-कहीं मंत्री बना दिए गए हैं। राज्य सरकार उसमें भी दखलअंदाजी करना चाहती है। ऐसे कई राज्य हैं, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता, सीधे मंत्रियों को जिला परिषद का अध्यक्ष बना दिया गया है। मैं इन बातों में नहीं जाना चाहता। मैं सदन का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि मैं झारखंड प्रदेश से आता हूं, वहां अभी पंचायत के चुनाव नहीं हुए हैं। मैं इस बात की ओर सरकार का ध्यान भी आकृष्ट करना चाहता हूं और जानना चाहता हूं कि वहां पंचायत चुनाव नहीं होने के क्या कारण हैं। संविधान के ७३वें और ७४वें संशोधन में यह स्पष्ट है कि किन-किन प्रदेशों में यह पंचायत व्यवस्था लागू नहीं होगी। वे अनुसूची ५ और ६ में आते हैं, मेरा झारखंड प्रदेश अनुसूची ५ में आता है। वहां कुल २२ जिले हैं जिनमें से १४ जिले अनुसूची ५ में आते हैं। लेकिन १४ जिलों में से ७ जिलों की आबादी में आदिवासियों की संख्या ५० प्रतिशत से कम है। जब एक्सटैंशन टू दि शैडयूल एरिया, १९९६ लागू हुआ, उसमें स्पष्ट प्रावधान है कि उसके सारे सरपंच चाहे ब्लॉक प्रमुख हों, चाहे जिला परिषद के अध्यक्ष हों, आदिवासी होंगे। सरकार ने इन दोनों प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था की है। लेकिन जब चुनाव कराने की बात आती है तो वहां के लोग आंदोलन पर उतर आते हैं कि जब हम बहुमत में हैं तो हमारा एक भी प्रतनधि क्यों नहीं चुनकर आएगा।
मैं लतिहार जिले का उदाहरण देना चाहता हूं। वह भी शैडयूल ५ में आता है। उसकी आबादी ४ लाख ४१ हजार है जिसमें एक लाख ९६ हजार आदिवासियों की संख्या है, एक लाख ५ हजार हरिजनों की संख्या है। सब आदिवासी वहां आ जाएंगे, सरपंच हो जाएंगे, प्रमुख हो जाएंगे, जिला परिषद के अध्यक्ष हो जाएंगे तो उन बेचारों का क्या होगा जो अनुसूचित जाति से आते हैं, दलित समुदाय से आते हैं। एक्सटैंशन टू दि शैडयूल १९९६ जो लागू हुआ है, उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए वहां इस तरह की बात आती है।
झारखंड नक्सल से प्रभावित क्षेत्र है। सरकार के मन में भय होता है कि अगर हम इस प्रकार का प्रयोग करें तो जो आधी से अधिक जनसंख्या विरोध में खड़ी है, कहीं वहां गृह युद्ध न छिड़ जाए। मैं जिस क्षेत्र से आता हूं, वहां दो प्रखंड आते हैं - एक सरइया हाट और दूसरा जमुर्ंडी द्वीप प्रखंड। सरइया हाट की आबादी लगभग एक लाख है। वहां लगभग बीस हजार आदिवासियों की पौपुलेशन है और दस हजार अनुसूचित जाति के लोग हैं। वहां भी सब लोग आदिवासी प्रमुख बनेंगे, आदिवासी मुखिया बनेंगे। मेरे कहने का मतलब है कि एक्सटैंशन टू दि शैडयूल एरिया, १९९६ अमैंडमैंट में यह प्रावधान है कि जहां एक भी व्यक्ति नहीं होगा, ऐसे ब्लॉक्स, पंचायतों को राज्यपाल की अनुमति से सामान्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन उसमें यह प्रावधान नहीं है कि जहां मात्र एक घर है, जिसकी आबादी एक प्रतिशत है, ऐसी जगह का क्या किया जा सकता है। इसलिए मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि आपने जिस तरह अरूणाचल प्रदेश को अपनी पंचायत से अधनियम बनाने की विशेष छूट दी है, उसी प्रकार झारखंड को भी विशेष छूट दें।
मैं बहुत अधिक विचारों को न रखते हुए यह कहना चाहता हूं कि मुझे विश्वास है कि जिस बात पर आज विचार-मंथन हो रहा है, उससे आने वाले दिन में निश्चित रूप से पंचायती व्यवस्था को, पंचायती संस्थान को मजबूती मिलेगी, निश्चित रूप से उनको अधिकार मिलेगा और आने वाले दिन में जिस ग्राम भारत और ग्राम स्वराज्य की बापू ने कल्पना की थी, वह आने वाले दिन में देखने को मिलेगा।
श्री महबूब जाहेदी (कटवा): महोदया, मैं आपको बहुत-बहुत बधाई दे रहा हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया है और मैं साथ-साथ मंत्री जी का भी आभारी हूं कि दस साल के बाद, यानि १९९३ के बाद आज कम से कम पंचायती राज को याद किया गया है। उसकी हालत क्या है, वह देखने के लिए इस सदन में चर्चा के लिए आप इसे लाए हैं। मैं बहुत दूर नहीं जाना चाहता हूं क्योंकि समय कम है और बहुत से सदस्य बोलने वाले हैं। मैं कहना चाहता हूं कि पंचायती वाली परम्परा हिन्दुस्तान के लिए कोई नयी चीज नहीं है। ब्रटिश के टाइम में भी, १८८० में भी डिस्टि्रक्ट बोर्ड या यूनियन कमेटी को लाया गया लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि भारत जब आजाद हुआ तो भारत की आजादी के बाद महात्मा गांधी ने जब पंचायती राज के बारे में शुरु किया तो उसका कोई लक्ष्य रखकर किया था। वह यही लक्ष्य था कि गांव के आदमी के पास शक्ति, पैसा, ताकत और टैक्नॉलोजी पहुंच जाए। इसीलिए जब कुछ रोज बाद देखा गया कि पंचायतें गांवों में नहीं जा सकतीं, गांव के आदमी के सिलसिले दूर होते जा रहे हैं तब बलराज मेहता की फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट की लास्ट लाइन में लिखा गया था : "Panchayat is nothing but manifestation of force of rural people." मैंने एस.के.डे के साथ कुछ दिन काम किया था। उन्हें फादर ऑफ पंचायती सिस्टम बोलते हैं। वह हमें कहा करते थे अगर आप क्लासबेस राजनीति करेगें तो पुअर पीपिल तक शक्ति नहीं पहुंच सकेगी। अभी हालत यह है कि इस बात को दस साल गुजर गये हैं। मैं कहना चाहता हूं कि गांवों की असली ताकत पंचायत है। इतने दिन के बाद पंचायत के बारे में चार चीजें कही गई हैं। ठीक है, वह नये आदमी हैं। उन्होंने कहा है कि ट्रांसफर ऑफ फंक्शन, ट्रांसफर ऑफ फंक्शनरीज, ट्रांसफर ऑफ फंड और फाइनेंशियल ऑटोनॉमी इनको दी जानी चाहिए। बहुत से राज्य हैं जहां पंचायत को अभी तक पंचायत नहीं माना जाता है। पंचायत को पूरे गांव में ताकतवर संगठन नहीं माना जाता है। दूसरे मुद्दों के कारण पंचायत के मुद्दे के महत्व को कम कर दिया जाता है। आपको इस बारे में भी सोच लेना चाहिए और आप देखें कि डीआरडीए अभी तक कुछ राज्यों में जिला परिषदों को नहीं दिया गया है।
डीपीसी जो है, अगर नीचे से गांव के आदमी को लेकर उठेगी, उसकी बुनियादी समस्या को लेकर उठेगी और गांव की पंचायत को प्लॉनिंग करके लोगों को उठाएंगी, तभी पंचायतें मजबूत होंगी। लेकिन डीपीसी के ऊपर मनिस्टर बैठा हुआ है या अधिकारी बैठे हुए हैं। इसलिए आपको देखना चाहिए कि गांव से जुड़ा हुआ आदमी इन संस्थाओं में हो। मैं बंगाल के लिए नहीं बोलूंगा। मैं बहुत जिम्मेदारी से बोल रहा हूं कि बंगाल में इस बारे में चार-चार अमेंडमेंट्स किये गये हैं। आखिरी अमेंडमेंट हमने किया और पूरे गांव को जोड़ने के लिए हमने कोशिश की। पंचायत के लिए हमने जो काम किये हैं उनके बारे में मैं बोलूंगा। आपको ख्याल रखना होगा कि पंचायत ऐसी न हो जिसमें गरीब आदमी न हो और भूमि-सुधार न हो, किसान की जिंदगी को सुधारने वाली बात न हो। मेरा कहना यह है कि जब तक इसमें बुनियादी काम करने वाले लोग नहीं आयेंगे तब तक पंचायतें सफल नहीं होंगी। हम भी सन १९५६ से पंचायत में काम करते रहे हैं। इसलिए हमें लगता है कि जब तक गांव का गरीब आदमी पूरी शक्ति के साथ, ताकत के साथ इसमें भाग नहीं लेगा, तब तक पंचायतें सफल नहीं होंगी। भूमि-सुधार से शुरू करके, ज्यादा से ज्यादा गरीब आदमियों को लेकर पंचायत का प्रबंध करना होगा। मैं आपके ध्यान में दो-तीन सर्वे रिपोट्र्स लाना चाहता हूं। पश्चिम बंगाल में तथा अन्य २५ ब्लॉक्स और १४ स्टेट्स का सर्वे किया गया था। सन् १९७७-७८ में यह सर्वे हुआ था उसमें गांव के अमीर आदमी चुने गये। सन् १९८० में सरकार ने सर्वे किया था जिसमें ७१ प्रतनधि पूरे के पूरे गरीब और किसान थे, दो एकड़ से नीचे वाले किसान थे। एक एशियन सर्वे सन् १९८३ और १९८७ में यूएस आर्गेनाइजेशन ने किया था जिसमें ६१ प्रतिशत पंचायत के लीडर किसान बने, तीन प्रतिशत लैंडलेस लेबर और सात प्रतिशत टीचर्स थे। खाली कानून बनाने से और अधिकारियों पर सब कुछ छोड़ने से कुछ होने वाला नहीं है। जब तक किसान और गांव के आदमी इसमें भाग नहीं लेंगें। अपने बारे में नहीं सोचेंगे, तब तक कुछ नहीं होगा। बड़े आदमी, अमीर आदमी तो जरूर इसमें चले आयेंगे। मैडम, हम एक बात कहते हैं कि अगर आप १०० गांवों को लें तो उनमें ७१ प्रतिशत प्रतनधि स्मॉल और मार्जिनल किसान हैं, दो एकड़ वाले लोग ४२.९ प्रतिशत हैं, ढाई एकड़ के दो प्रतिशत हैं और दस एकड़ के सात प्रतिशत हैं।
असल बात यह है कि सिर्फ पंचायत का नाम लेने से कुछ नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि गांव के लोगों को भी इस योजना के साथ जोड़ना होगा। ७५ से ७७ परसेट जो रूरल फोर्स है, उनको भी जोड़ना होगा। इन लोगों को कैसे जोड़ा जाए, इस बारे में मंत्री जी को सोचना पड़ेगा। यूएन डवेलपमेंट की रिपोर्ट में दो बातें लिखी हैं। एक उसमें विकेन्द्रीकरण की बात कही गई है और दूसरे गांव के आदमियों को जोड़ने की बात कही गई है। इसके साथ ही इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात भी कही गई है। इन कामों को करने के लिए पोलटिकल विल की भी जरूरत है। मैं सदन में जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि पोलटिकल विल अगर नहीं रहेगी, तो पंचायती राज की योजना कभी सफल नहीं होगी। इस दिशा में अगर कानून बदलने की आवश्यकता हो, तो बदल देना चाहिए।
MADAM CHAIRMAN : Shri Zahedi, please wind up.
SHRI MAHBOOB ZAHEDI : I am concluding, Madam. मुझे कुछ समय दिया जाए, मैं कुछ बातें कहना चाहता हूं। पंचायत के बारे में महात्मा गांधी जी ने विचार व्यक्त किए थे। ज्योति बसु जी ने अपने विचार रखे थे। इस बारे में अशोक मेहता कमेटी ने जो सुझाव दिए थे, उनको नहीं माना गया। श्री ज्योति बसु जी ने १९७७ में कहा था कि मैं दफतर में बैठकर कार्य नहीं करूंगा, रुपया और अधिकार गांवो में बांट दूंगा। यह बात अलग है कि कुछ राज्यों में चुनाव नहीं हुए हैं, लेकिन मैं उनका नाम नहीं लूंगा। आप जानते हैं कि चुनाव हो जाने के बाद ग्राम उन्नयन समति के संबंध में एक विधेयक पास किया गया। इस विधेयक को पास करने में अन्य दलों ने भी साथ दिया। असल चीज यही है कि गावों में ताकत रहनी चाहिए और विरोधी लोगों को बाहर निकाल कर काम नहीं कर सकते हैं। उनको साथ में लेकर चलना होगा। सबको साथ में लेकर चलना पड़ेगा। विकास हो या प्लानिंग हो या कोई अन्य क्षेत्र सब को साथ में लेकर चलने पर विचार करना होगा।
उसमें विरोधी दल के लोग भी रहें और एक साथ काम करें। एक बार राजीव जी जब कोलकाता आए थे, मैंने उनसे पूछा कि डेवलपमैंट क्या है? वह हंस कर बोले कि,"Development is nothing but a touching sensation of the people.पंचायतें होनी चाहिए और लोगों को पावर देने के साथ-साथ डेवलपमैंट भी होना चाहिए।Let there be Panchayati Raj system."
गांव के लोगों का विकास होना चाहिए, तभी पंचायती राज कामयाब होगा। मंत्री जी इस पर सोच-विचार करके और बातचीत करके यह देखें कि संगठन गांव के गरीब लोगों का हो, गांव के आदमियों का हो, शहर के गरीबों का हो और शहर के आदमियों का हो।
DR. MANDA JAGANNATH (NAGAR KURNOOL): Madam Chairperson, thank you very much for giving me this opportunity.
According to the Constitution of India, Pachayats shall be given powers: (a) to prepare plans for economic development; (b) to implement schemes for economic development and social justice in relation to 29 subjects given in the Eleventh Schedule of the Constitution; and (c) to levy and collect appropriate taxes, duties, tolls and fees.
After Independence, till the year 1993, these powers were not given to the Panchayats and local bodies. … (Interruptions)
SHRI N. JANARDHANA REDDY (NARASARAOPET): Even now you have not given.
DR. MANDA JAGANNATH : We are giving. … (Interruptions)
MADAM CHAIRMAN : Please address the Chair.
DR. MANDA JAGANNATH : Gandhiji’s dream became a reality in 1993, when this Act was passed and its implementation began. The salient features of the Act were: (a) to hold elections regularly, every five years to Panchayati Raj institutions; (b) to provide three-tier system of governance through Panchayati Raj institutions; (c) to provide reservation of seats to Scheduled Castes, Scheduled Tribes and women (to the extent of not less than one-third seats); (d) to appoint State Finance Commissions to enable recommendations regarding giving financial powers to Panchayati Raj institutions; and (e) to constitute District Planning Committees to prepare draft development plans for development of Districts.
After ten years of these institutions coming into being, when we look back at them now, we feel that there is not much to feel proud of. That is only because of lack of sustained effort, sincerity by politicians and most important of all the bureaucratic support, which is the driving force behind the implementation of these recommendations.
As far as holding of elections to Panchayati Raj institutions is concerned, many of the States are avoiding this on one pretext or the other. This has been brought out by the National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes also. Because of this, downtrodden people, for whose sake this amendment has been brought, are being deprived of their due share in governance.
As far as the State Government of Andhra Pradesh is concerned, we have been conducting elections regularly. Hon. Member Shri Janardhana Reddy knows it. We have successfully conducted elections two times so far. Whenever there is a vacancy, even if it is of an MPTC ward member, we have been conducting elections to the local bodies successfully. We have made reservations for Scheduled Castes and Scheduled Tribes and women.
Coming to the appointment of Finance Commissions and devolving of powers as per the provisions of the Constitution to Panchayati Raj institutions, the available data shows that a number States have not appointed the Finance Commissions so far.
16.00 hrs. Madam, research analysis shows that nearly 19 States have not yet constituted the State Finance Commission to devolve powers to Panchayati Raj Institutions.
As the hon. Member was asking, yes, we have appointed the State Finance Commission in Andhra Pradesh and we are transferring the funds to the local bodies also. Out of 29 subjects which have been enlisted in the Eleventh Schedule, nearly 16 to 18 subjects have already been transferred to the Panchayati Raj institutions and the rest are in the process of transfer.
Madam, as the Constitution enjoins the States to make appropriate provisions in the Panchayati Raj Act for devolving powers for the local governance, the Government of Andhra Pradesh has come out with the formation of five Functional Committees in each village. In that Committee, the Gram Panchayat Sarpanch will be the chairperson and the Mandal Parishad Territorial Constituency (MPTC) Members and the Ward Members will be its Members. In the absence of the Gram Sarpanch, the Gram Upsarpanch will be functioning as the Sarpanch of this Committee.
There is a Functional Committee on Natural Resources Management which includes agriculture, horticulture, dairy, fisheries and water conservation.
Then, there is a Functional Committee on Human Resources including education, health, women and child welfare and other related subjects.
Then, there is a Functional Committee on Employment Generation and Self-Help Groups.
Then, there is a Functional Committee on Finance and Planning.
Lastly, there is a Functional Committee on Works and Development.
All these five Functional Committees will be coalesced to form the Janma Bhoomi Abhivruddi Samakhya under which all these people will be clubbed together. It will look after the overall development of the village.
Each such Committee has been assigned specific functions and subjects which are to be approved in the Gram Sabha and theGram Samakhya will take into consideration all these subjects.
Madam, now, I come to the District Planning Committees. In Andhra Pradesh, we have the District Development Review Committees where all these elected M.Ps.& M.L.A’ will be there presided over by one Minister as District Incharge. The overall development of the district will be reviewed by them and the remedial measures will be taken.
Under the able leadership of our leader Shri Chandrababu Naidu, Andhra Pradesh is surging ahead with powers, functions and funds given to the Panchayti Raj Institutions and we are trying to implement the 73rd Constitutional Amendment in letter and spirit to see that all our villages develop. But Madam, we are facing hurdles. The three-tier system with five functionaries is really becoming a blockade for the successful implementation of this Amendment. With the experience of implementing this system after five years, we find that there is a peculiar situation with regard to MPP and ZPTC.
There is a Zila Parishad Territorial Constituency (ZPTC). The Member of ZPTC does not have the voting power in Mandal Parishad and the Mandal President does not have the voting power in the Zilla Parishad. He is just a figure without any purpose. That is why some time back we Telgu Desam Party had proposed a Constitutional Amendment that there should be a three-tier system with three functionaries so that it will be easy to function. During that time many political parties, including the Congress party, agreed that this Amendment be brought. But at the last minute, Congress party backtracked for reasons known to them, and this Amendment could not be passed.
Madam, with our experience of giving the powers to Panchayat Administration, we from the Telugu Desam Party feel that the system of three-tier with three functionaries is the best-suited system for our country. So, I request the Government of India to take measures in this direction to amend this provision.
With these few words, I conclude.
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): सभापति महोदया, मैं आपका आभार प्रकट करता हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया। ग्रामीण विकास मंत्री, श्री काशीराम राणा जी ने जो प्रस्ताव सदन के सम्मुख प्रस्तुत किया है, मैं समझता हूं उसका व्यावहारिक मतलब यह है कि दस वर्ष पूर्व जो ७३वां और ७४वां संविधान संशोधन विधेयक पास हुआ, जिसमें ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने, कमजोर वर्गों को मजबूत बनाने और महिलाओं को आरक्षण देने की बात कही गई थी, इन दस वर्षों में हमने क्या उपलब्धि हासिल की है, उसकी समीक्षा करने का यह समय है। इन दस वर्षों में हम कितना आगे चले हैं और कितना उसमें सुधार करने की आवश्यकता है, मैं समझता हूं, यही इस चर्चा की सार्थकता होगी। मुझे प्रसन्नता है कि हम लोग एक सकारात्मक दिशा में पहल कर रहे हैं। श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जो भारत के प्रधान मंत्री हैं, उन्होंने इस सिलसिले में एक पंचायती राज सम्मेलन बुलाया था जिसमें उन्होंने श्री राजीव गांधी जी की प्रशंसा की कि उन्होंने इस काम में दिलचस्पी ली। जब भी पंचायती राज व्यवस्था की बात होगी तो निश्चित रूप से उन्हें याद किया जायेगा।
सभापति महोदया, हमने संविधान में ७३वां और ७४वां संशोधन किया, लेकिन आज ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं की क्या स्थिति है, मैं समझता हूं इस पर विचार करने की आवश्यकता है। मूलत: हमने जो कुछ किया है, उसके लिए हम कह सकते हैं कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बात बार-बार चलती थी, उसे हमने पूरा किया । हम जो समाजवादी लोग हैं, जो डा. लोहिया को अपना आदर्श मानते हैं, वे इसे चौखम्बा राज कहते हैं, इसे मजबूत करने की बात थी और ऐसा नहीं कि इस पर पहले के लोगों की चिंता न रही हो। तमाम कमेटियां इस सिलसिले में पहले भी बनी हैं - श्री अशोक मेहता समति, सी.एच.हनुमंतप्पा समति, जी.वी.के. राव समति, एल.एम.सिंधवी समति आदि समतियों ने अपनी संस्तुतियां दी थी कि पंचायत राज व्यवस्था को सशक्त और सुद्ृढ़ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया था। आपसे पहले जब श्री वेंकैया नायडू ग्रामीण विकास मंत्री थे, उन्होंने एक १५ सूत्री कार्यक्रम बनाया था, उसे आप देख लें। उस कार्यक्रम में उनकी यह चिंता थी कि ग्रामीण व्यवस्था को और अधिक सशक्त और सुद्ृढ़ बनाने के लिए और संविधान संशोधनों की आवश्यकता है।
सभापति महोदया, मैं आपकी मार्फत निवेदन करना चाहता हूं कि आज जब यह कहा गया कि तीस लाख लोग ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं में निर्वाचित हुए हैं और उनमें दस लाख महिलाएं हैं, मैं समझता हूं कि निश्चित रूप से यह संतोष का विषय है कि इतने लोग निर्वाचित हुए। कितने लोग निर्वाचित हुए और उनमें महिलाओं की कितनी भागीदारी थी, यह एक अलग सवाल है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि उनके पास क्या अधिकार हैं, उनकी वित्तीय मर्यादाएं क्या हैं। हम कितने लोगों को निर्वाचित करते हैं, हमने पंचायतों को अधिकार दिये, हमने विकेन्द्रीकरण व्यवस्था के तहत पंचायतों को मजबूत किया। लेकिन मुझे माफ करना जब तक पंचायतों की माली हालत ठीक नहीं होगी, जब तक पंचायतें आत्म-निर्भर नहीं होंगी, जब तक नगरपालिकाओं और पंचायतों के पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं होंगे, ताकि वे उन आर्थिक संसाधनों से गावों का और नगरपालिकाओं का कायाकल्प कर सके, भले ही हम कानून बनाते रहें और संविधान में संशोधन करते रहें, लेकिन जब तक यह काम नहीं होगा तो हम लोग उस जमीनी हकीकत से दूर हटने का काम करेंगे। मैं समझता हूं कि आज इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि हमने अधिकार तो दिये, लेकिन क्या हमने दौलत का इंतजाम किया, क्या हमने पंचायतों को आत्म-निर्भर बनाया, क्या हमने नगरपालिकाओं को आत्म-निर्भर बनाया ? उनके लिए आर्थिक संसाधन कैसे जुटेंगे। इस पर विचार किया जाये।
उनकी आर्थिक हालत क्या है, इस दिशा में भी सोचने की आवश्यकता है।
मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि जब यह संविधान संशोधन हुआ तो संविधान समीक्षा आयोग ने कहा कि ७३वें और ७४वें संविधान संशोधन के बाद भी केन्द्र और राज्य सरकार योजनाओं के अधिकार अपने पास रखे हुए है और पंचायतों को वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार नहीं दिये गये हैं। अगर पंचायतों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार नहीं दिये जाएंगे तो आप चाहे रोज़ संविधान में संशोधन करते रहें, रोज़ संसद में बहस होती रहे, रोज़ विधान सभाओं में बहस होती रहे, मैं समझता हूँ कि हम कोई ज्यादा अच्छा काम नहीं कर सकते। हमें हर पंचायत को वित्तीय इकाई के रूप में विकसित करना होगा और इसके लिए आंतरिक संसाधनों की आवश्यकता है।
महोदया, जो ७३वां संविधान संशोधन हुआ, उसमें जो प्रावधान हैं, उसमें एक प्रावधान यह भी है कि पंचायतें जो कर लगाएंगी, उन करों का एक हिस्सा पंचायतों के पास रहेगा और शेष हिस्सा राज्य सरकारों के पास जाएगा। हम एक राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। व्यवहार में क्या है, इसे देखने की आवश्यकता है। जो कर लगते हैं मुझे माफ करेंगे, कर कोई मामूली नहीं लगते हैं। पैट्रोलियम मंत्री श्री राम नाईक जी यहां बैठे हैं। अगर मैं सही हूँ तो १३ रुपये प्रति लीटर उत्पादन लागत है पैट्रोल की, १४६ प्रतिशत कर है पैट्रोल पर और डीज़ल पर ६२ प्रतिशत कर है जो भारत सरकार और राज्य सरकारों के हैं। करों से ही तो आप लोगों को मार रहे हैं। जो कर लगते हैं पंचायतों और नगरपालिकाओं के स्तर पर, उनका सही बँटवारा नगरपालिकाओं और पंचायतों के हक में जा रहा है या नहीं यह भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। अगर वह पैसा उनके पास नहीं जा रहा है तो मैं नहीं समझता कि पंचायतें आत्मनिर्भर कैसे बन पाएंगी। और अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को कैसे पूरा करेंगीं ।
सभापति महोदया, मैं आपकी मार्फत एक और निवेदन करना चाहूंगा। हमारे संविधान का जो संघीय ढांचा है, इसमें एक निश्चित व्यवस्था है। भारत सरकार की जो योजनाएं हैं, उनको क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। हम भी राज्य सरकारों में रहे हैं, हमारी पार्टी रही है लेकिन हमें माफ करें, भारत सरकार से जो दौलत जाती है, राज्य सरकारें उसका कितना सदुपयोग करती हैं इस पर चर्चा होनी चाहिए, और विचार होना चाहिए। कभी-कभी यहां से आप जो दौलत भेजते हैं, वह दूसरी मदों में खर्च कर दी जाती है, कभी-कभी खर्च नहीं की जाती। बूटा सिंह जी यहां बैठे हैं। …( व्यवधान)जो व्यावहारिक बात देखने को मिलती है, वह यह है कि नौवीं पंचवर्षीय योजना में कमज़ोर वर्गों के लिए, दलितों के कल्याण के लिए जितने धन का आबंटन हुआ था, वह ९०० करोड़ रुपया खर्च ही नहीं हुआ। ग्रामीण विकास मंत्री जी ज़रा सभी मंत्रालयों से चर्चा करके हिसाब लगाएं, अधिकांश राज्य सरकारें तो उपयोगिता प्रमाण-पत्र ही नहीं भेजतीं। इस पर आज विचार करने की आवश्यकता है। आप जो दौलत भारत सरकार से राज्य सरकारों को भेजते हैं, भारत सरकार को जानने का पूरा हक होना चाहिए कि हमने जो पैसा आपके पास भेजा है, उसका कितना सदुपयोग हुआ। क्या वह पैसा अन्य मदों में तो खर्च नहीं कर दिया गया या खर्च ही नहीं किया गया। मैं समझता हूँ कि आज इसे देखने की और इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
जैसा अभी भाई मणि शंकर अय्यर जी ने कहा मैं उनकी बात से सहमत हूँ कि यह विषय समवर्ती सूची में होना चाहिए और यहां से जो दौलत जाती है, वह सीधे ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं को जानी चाहिए। मुझे इसका व्यावहारिक अनुभव है। हम कितनी दौलत भेजते हैं वह एक अलग सवाल है लेकिन कभी-कभी पता चलता है कि सफाई कर्मचारियों को तीन-तीन साल से तनख्वाह नहीं मिली। लोग आंदोलन करते हैं। कभी-कभी ग्राम सभाओं के पास छोटी-मोटी दौलत नहीं होती कि वे तालाब के पानी की भरपाई करा पाएं।
महोदया, आज यह हाल है कि नगरपालिका में जो कर्मचारी काम करते हैं, वे हड़ताल करते रहते हैं, चाहे वे सफाई कर्मचारी हों या और छोटे सरकारी कर्मी हों। जब हम नगरपालिका के अध्यक्ष से पूछते हैं, तो वे कहते हैं कि हमारे पास पैसे नहीं हैं, हम तनख्वाह कहां से और कैसे दें। उनके संसाधन इतने नहीं है कि वे अपने कर्मचारियों को वेतन दे सकें। उन्हें कहीं से कोई आमदनी नहीं है। इसलिए उनका काम नहीं चलता है।
महोदया, मैं अन्त में एक ही निवेदन और कर के अपनी बात समाप्त करूंगा। हमारे देश में जो पंचायतीराज व्यवस्था है, उसमें किसी प्रदेश में सरपंच है, किसी में प्रधान है और किसी में मुखिया है। जैसे राजस्थान में सरपंच है, हमारे यहां उत्तर प्रदेश में प्रधान है और बिहार में मुखिया है। जो ग्राम पंचायत इकाई पंचायतीराज व्यवस्था में है उसके प्रधान, मुखिया या सरपंच का चुनाव तो जनता सीधे करती है, लेकिन जो ब्लॉक के मुखिया का चुनाव होता है, उसे जनता नहीं चुनती, बल्कि उसका चुनाव बी.डी.सी. के चुने हुए लोग करते हैं, जो क्षेत्र पंचायत समति के सदस्य चुने जाते हैं, उनसे अध्यक्ष का चुनाव होता है और जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भी सीधे जो जिला पंचायत के सदस्य चुने जाते हैं वे करते हैं। काशी राम राणा जी, मुझे माफ करिए, इन चुनावों में धन का प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर होता है और जो दौलत खर्च कर के वहां पहुंचता है, वह ईमानदार नहीं रह सकता बल्कि उसकी ख्वाहिश यही रहती है कि जितना धन मैं कमा सकूं, कमा लूं। जब तक इन सभी पदों का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं होगा, तब तक यह भ्रष्टाचार चलता रहेगा और आपके द्वारा यहां प्रस्तुत यह संशोधन का प्रस्ताव भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा पायेगा ।
काशीराम राणा जी, इन १० वर्षों में आपने क्या खोया, क्या पाया और कितना आगे चलना है और ग्राम पंचायतों को किस हद तक सक्षम बनाना है, तो आप चाहे जितने संशोधन कर लें और चाहे जितनी चर्चा कर लें, जब तक आप ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों की इकाइयों को आत्मनिर्भर नहीं बनाते हैं या इस लायक नहीं बनाते हैं कि वे अपना काम अपनी आय से पूरा कर लें, तब तक इस व्यवस्था को आप सार्थकता प्रदान नहीं कर पाएंगे चाहे कितने भी संविधान संशोधन कर लें और चाहे कोई कार्यक्रम बना लें। जमीनी हकीकत से हम वाकिफ हैं और जब तक जमीनी हकीकत देखकर काम नहीं करेंगे, तब तक हम चाहे जितने भाषण कर ले और कितने ही कार्यक्रम बना लें, कुछ नहीं होगा। जिन लोगों के लिए हम कार्यक्रम बनाते हैं, जिनके कल्याण के कार्यों की हम घोषणा करते हैं उनको लगना चाहिये कि हमारा कल्याण हो रहा है या हम आगे बढ़ रहे हैं, तो मैं समझता हूं कि पंचायतीराज की यही सार्थकता होगी।
श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) : सभापति महोदया, इस देश के ग्रामीण विकास मंत्री काशी राम राणा जी ने जो प्रस्ताव यहां प्रस्तुत किया है, उस पंचायतीराज व्यवस्था को हमारे देश के पूर्व प्रधान मंत्री श्री राजीव गांधी जी ने लागू किया। इस देश में, भारतवर्ष में पंचायतीराज लागू करने के बाद से अब तक १० वर्ष हो गए। इन १० वर्षों में हमने क्या खोया और क्या पाया, यानी हमारे पंचायतीराज की उपलब्धि क्या रही, यह देखना होगा। आज पंचायतीराज की उपलब्धि के बारे में जो यहां चर्चा हो रही है, उसका लाभ तभी होगा जब हम पंचायतीराज संस्था को सशक्त कर पाएं। इसलिए हमें पंचायतीराज संस्थाओं को जरूर सशक्त करना चाहिए।
महोदया, हमारा देश, ग्रामीण क्षेत्रों में बसता है। मैं इस सदन का सदस्य हूं, लेकिन पहले मैं ग्राम पंचायत का सदस्य हूं। जब तक हमारे हिन्दुस्तान में ७०-८० प्रतिशत जनता जो ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, उसकी हम तरक्की नहीं करेंगे, तब तक हिन्दुस्तान के विकास का सपना कभी साकार नहीं होगा।
हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने सही कहा था कि अगर हिन्दुस्तान की तरक्की करनी है, आगे बढ़ाना है तो हमें पहले देहातों और ग्रामों की तरफ चलना होगा। हमारी आजादी को ५५ साल हो चुके हैं लेकिन अभी भी हमारे ७०-८० प्रतिशत देहातों में रहने वाले नागरिक विकास से वंचित हैं। अगर हमने सही मायनों में पंचायती राज को सशक्त किया होता तो ग्रामों का विकास जरूर हुआ होता। हमें आज इम्बैलेंस दिखाई न पड़ता। आज ग्राम पंचायतों की हालत बहुत बुरी है। इनके जो भी संसाधन एवं इंकम हैं वे बहुत सीमित हैं। चाहे सेंट्रल गवर्नमें हो या स्टेट गवर्नमेंट हो, जनसंख्या के हिसाब से इन्हें बहुत कम पैसा मिलता है।
मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं। एक छोटी सी ग्राम पंचायत को ५० हजार, एक-डेढ़ लाख रुपया मिलता है। इतने रुपए में वह कैसे विकास करेंगे। बिहार में गांव के सरपंच को मुखिया बोलते हैं, यूपी में कुछ और बोलते हैं, हर जगह अलग-अलग नाम होंगे लेकिन ग्राम पंचायत का जो सरपंच होता है उसके पास लोगों की रिकवायरमेंट ज्यादा होती है और पैसा कम होता है। मैं आपके माध्यम से ग्रामीण विकास मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि अगर हमें सही मायनों में पंचायती राज को सशक्त करना है तो उसके लिए ठीक से योजना बनानी पड़ेगी, उचित कदम उठाने होंगे। अधिकार तो हमने दे दिए हैं लेकिन पंचायतों के पास पैसा नहीं है, ५० हजार, एक-डेढ़ लाख रुपए में ग्राम का सरपंच क्या करेगा। आज भी छोटे-छोटे गांवों में रास्ता नहीं है, उसके पास खम्भों पर बल्ब लगाने के लिए, खरीदने की उसकी ताकत नहीं है। पीने का पानी ठीक से नहीं मिलता है, शिक्षा का प्रबंध नहीं है, हैल्थ की सुविधा नहीं है। अगर हमने ग्राम पंचायतों को सशक्त नहीं बनाया तो हम कुछ नहीं कर सकते। पंचायतें और छोटी-छोटी जो नगरपालिकाएं हैं, उसमें बी और सी वर्ग की नगरपालिकाओं की भी वित्तीय हालत बहुत खराब है, जब तक हम इनकी खराब वित्तीय हालत में सुधार नहीं करेंगे तब तक यहां चर्चा करने से कोई फायदा नहीं होगा। हमने पंचायतों को अधिकार दे दिए हैं लेकिन सही में वे अमल में नहीं आते। ग्राम की जो छोटी पंचायतें हैं, सही मायनों में जो ग्रामसभा में रेजोल्यूशन पास होते हैं, उसके हिसाब से जो भी ग्राम की पंचायत का रेजोल्यूशन ग्रामसभा में पास होगा, चाहे वह पंचायत समति, जिला परिषद में जाए, हमारे वहां लोकल पोलटिक्स ज्यादा है -
चाहे पंचायत समति की पोलटिक्स हो, जिला परिषद की पोलटिक्स हो या स्टेट की पोलटिक्स हो। ग्राम सभा के जो प्रस्ताव हैं, रेजोल्यूशन हैं, उन रेजोल्यूशंस को पार्टी पोलटिक्स के नजरिये से देखा जाता है, जो नहीं होना चाहिए। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी को सजेशन देनाचाहता हूं कि हमारी ग्राम सभा या पंयायत के जो ठहराव होते हैं, जो रेजोल्यूशन होते हैं, उन्हीं के हिसाब से गांव के लिए काम पर अमल करना चाहिए।
अभी हर जिले के लिए हमारे यहां एक पालक मंत्री दिया है, लेकिन वह पालक मंत्री यह करता है कि उसके पास जो ग्रामसभा के ठहराव आते हैं, अगर वह उसके अपने लोगों का होता है तो ग्रामसभा के ठहराव को अमल में लाते हैं, लेकिन अगर विरोध वाले की पंचायत है तो वहां की ग्रामसभा के ठहराव की अनदेखी होती है। मेरा कहना यह है कि ग्रामसभा के रेजोल्यूशन को राजनैतिक द्ृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए और उस पर सही मायने में अमल करना चाहिए। हर राज्य में ऐसा होता है। अभी महाराष्ट्र में शिवसेना पार्टी को बहुत परेशानी है, क्योंकि वहां दूसरी पार्टी की सरकार है। राज्य में सारा पैसा केन्द्र की तरफ से जाता है, जैसे डी.आर.डी.ए. का पैसा है, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का पैसा है, स्वजलधारा योजना का पूरा पैसा है…( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर):मुम्बई से यहां कितना पैसा आता है?
श्री सुरेश रामराव जाधव: मैं राजनैतिक बात नहीं कह रहा हूं, मैं किसी के ऊपर टीका-टिप्पणी करने के लिए नहीं खड़ा हूं, बल्कि जो वास्तविकता है, जो सच्चाई है, उसे मैं बयान कर रहा हूं। हर योजना में पालक मंत्री का जो रवैया रहता है, उसमें बदलाव लाने की जरूरत है और ग्रामसभा के ठहराव को अमल में लाने के लिए कुछ न कुछ कारगर उपाय करने की जरूरत है।
सभापति महोदया : जाधव जी, आपकी पार्टी का टाइम खत्म हो गया है, अब आप जल्दी खत्म करिये।
श्री सुरेश रामराव जाधव: मैं १-२ मिनट में खत्म करता हूं। हम गांव की ग्राम पंचायत को कैसे सुद्ृढ़ कर सकते हैं, उसे कैसे सशक्त बना सकते हैं। अगर सशक्त पंचायती राज पर अमल इस देश में होगा तो हमारे देश की तरक्की होगी, हमारे देश का डवलपमेंट होगा। पंचायत के जो वित्तीय अधिकार हैं, जो साधन हैं, जो संसाधन हैं, पैसा जुटाने के साधनों की उनके पास बहुत कमी है। इसके लिए मुझे काशी राम राणा जी पर पूरा भरोसा है, वे पंचायती राज को सुद्ृढ़ बनाने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे, जैसे वे खुद सुद्ृढ़ हैं, वैसे ही वे पंचायती राजय को भी सुद्ृढ़ करेंगे।
सभापति महोदया : अब समय हो गया, प्लीज खत्म करिये। और भी स्पीकर हैं, बहुत से लोगों को बोलना है, आपकी पार्टी का टाइम भी बिल्कुल खत्म हो गया है।
श्री सुरेश रामराव जाधव: हमने ग्राम पंचायत को अधिकार तो दे दिये, लेकिन अभी तक जो नौकरशाही है, उसके पंजे में, उसके कब्जे में हमारा पंचायती राज चल रहा है। गांव का जो ग्रामसेवक बोलते हैं, बिहार में पता नहीं, क्या बोलते हैं, अभी दो साल पहले वहां इलैक्शन हुए थे, मुझे तो बस इतना ही पता है कि बहुत साल के बाद वहां इलैक्शन हो गये। लेकिन महाराष्ट्र में ग्राम पंचायत के ऊपर ग्रामसेवक का शासन है। पंचायत का जो कारोबार है, वह वहां उसके कब्जे में है। अगर सही मायने में आपको डवलपमेंट करना है तो कुछ न कुछ वित्तीय अधिकार सरपंच को भी देने चाहिए। जो गांव की लोकल बॉडीज हैं, उन्हें भी कुछ वित्तीय अधिकार देने की जरूरत है। जब तक हम गांव की पंचायत के मुखिया या सरपंच और लोकल बॉडीज के सदस्यों को हम वित्तीय अधिकार नहीं देंगे, तब तक गांव के सरपंच या लोकल बॉडीज गांव के विकास के लिए कुछ नहीं करने वाले।
मैं दोबारा काशीराम राणा जी का आभार व्यक्त करता हूं, उन्हें अपनी पार्टी की तरफ से धन्यवाद देता हूं, उन्होंने जो प्रस्ताव यहां रखा है, उससे इस देश की आत्मा, इस देश का लोकतंत्र और पंचायती राज सुद्ृढ़ होंगे और आज की यह चर्चा कारगर होगी और इसका उपयोग भविष्य में होगा। आपने जो मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री बालकृष्ण चौहान (घोसी): माननीय सभापति महोदया, आज संविधान के भाग ९ और ९-क के कार्यान्वयन पर चर्चा में भाग लेने के लिए आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूं। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में लिखा है कि शासन को स्वशासन के रूप में ग्राम स्तर तक पहुंचाया जाये। उसका मूल रूप से कार्यान्वयन संविधान संशोधन जो १९९२ में पेश किया गया था, उसके द्वारा किया गया। उसे १० वर्ष हो गये हैं। शासन की जो त्रिस्तरीय प्रणाली है.--ग्राम पंचायत, ब्लाक पंचायत और जिला पंचायत यानी व्यक्ति के जीवन के जो मूल विषय हैं, उनके निदान और कार्यान्वयन को एनेक्श्चर ११ में चिन्हित किया गया है।
१६.३१ hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) पंचायती राज संस्थाओं को राज्य सूची में रखा गया है। राज्य उनके चुनावों और वित्तीय व्यवस्थाओं का कार्यान्वयन करे लेकिन इसको किसी भी रूप में और केन्द्रीयकृत नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान में संशोधन करके यह अधिकार दिये गये थे। अगर संशोधन करना है तो उसमें एक चीज का संशोधन किया जा सकता है। अनुच्छेद २४३(घ) में अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण का प्रावधान है। उसी में क्लाज छ: में दिया हुआ है कि यह राज्यों के विवेक में है कि वह पिछड़ी जातियों को आरक्षण दे या न दे। इसलिए उसका संविधान संशोधन करना आवश्यक है कि हर राज्य जिला पंचायत, ब्लाक पंचायत और ग्राम पंचायत में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण देने के लिए बाध्य हो। कई राज्यों की उच्च न्यायालयों ने यह निर्णय दे दिया कि जिला पंचायत के पद या ब्लाक प्रमुख के पद एकल हैं इसलिए उनको आरक्षित नहीं किया जा सकता।…( व्यवधान)हमें इसको इस दायरे से बाहर लाना चाहिए क्योंकि संविधान संशोधन में यही है कि निर्वाचन को चैलेंज नहीं किया जा सकता। पांच साल में तो निर्वाचन होने ही हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह विषय न्यायपालिका से बाहर होना चाहिए कि अगर आरक्षण की प्रणाली राज्य लागू करे तो उसे कहीं चैलेंज न किया जा सके। निर्वाचक मंडल वही हमारे हैं जो ग्राम पंचायत के अध्यक्ष, प्रधान या मुखिया को चुनते हैं। बी.डी.सी. को वही चुनते हैं जो ब्लाक प्रमुख को चुनते हैं। वही जिला पंचायत के सदस्य को चुनते हैं, जो जिला पंचायत के अध्यक्ष को चुनते हैं। समस्या इनकी है, निदान गांव में होना है । लेकिन गांव तक केन्द्र सरकार के बजट हैं, राज्य सरकार के बजट हैं, वे क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं ? योजना का कार्यान्वयन क्यों नहीं हो रहा है। इसको पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने भी स्वीकार किया था।
केन्द्र द्वारा भेजी गई योजनाओं के बजट में रखे गए १०० रुपये में से ८५ रुपये यहीं रह जाते हैं और १५ रुपये ही गांव तक पहुंचते हैं। मैं आज की स्थिति बताना चाहूंगा कि आज १५ रुपये भी गांव तक नहीं पहुंच रहे हैं। मैं उदाहरण देकर बताऊंगा। मैं जिले तथा अन्य मीटिंग में व्यंग में कहता रहता हूं कि कम से कम १५ रुपये ही खर्च कर दें लेकिन ऐसा भी नहीं होता। ऐसा क्यों नहीं होता? निर्वाचक मंडल जिला परिषद के अध्यक्ष को नहीं चुनते, ब्लॉक प्रमुख को नहीं चुनते। उन्हें दस-बीस सदस्य चुनते हैं इसलिये ये लोग जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते और बजट लेकर मनमाना काम करते हैं। इसलिए केन्द्र या राज्य सरकार जो पैसा दे, वह सीधे ग्राम पंचायत को जाना चाहिए।
अभी हमारे साथी सुमन जी ने कहा कि जिला पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव सीधे होना चाहिए। ऐसा करने में अच्छा लगेगा लेकिन इससे लोक सभा की गरिमा का सवाल खड़ा हो जाएगा। एक जिले में न्यूनतम एक सांसद और अधिकतम तीन-तीन सांसद होते हैं। एक जिले से एक जिला पंचायत चुनी जाएगी तो वोटों की संख्या करीब ५०-६० लाख हो जाएगी। इसलिए यह स्थिति किसी भी कीमत पर नहीं लाई जा सकती।
आप संसाधन सीधे डीआरडीए को भेज रहे हैं और वह डैवलपमैंट अथॉरिटी न रहकर बैनिंग अथॉरिटी हो गया है। मैंने ग्रामीण विकास मंत्री जी से प्रश्न किया था। हमारे डिस्टि्रक्ट मऊ में केन्द्र से जो पैसा गया - पोखरा खुदाई में लाखों का घोटाला, मजदूरों के चावल की बंदर बांट, मऊ में काम के बदले अनाज योजना में करोड़ों रुपये का घोटाला, सूखा राहत की २२१ परियोजनाओं को लगा ग्रहण। डीआरडीए में दस करोड़ रुपया गया और दस चम्मच मिट्टी भी नहीं फेंकी गई। वहां के जिलाधिकारी, ट्रकों में अनाज जा रहा था और जब उनको पकड़ा गया तो उन्होंने कहा कि यह अनाज गांव में जा रहा है लेकिन वह अनाज सीधे ब्लैक कर दिया गया। जिला सांसद और विधायक को बुलाकर जनप्रतनधियों के सामने एक महीने बाद दिखावा किया गया और कहा गया कि आप अपने फंड से २५ प्रतिशत दें तो काम होगा। हमने २५ प्रतिशत के लिए लिखकर दिया लेकिन उसके एक महीने पहले ही अनाज कहीं चला गया। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि डीआरडीए को बीच से समाप्त कर देना चाहिए। जिला पंचायतों के जिम्मे कुछ काम चिन्हित कर दिया जाना चाहिए। मंत्री जी ने प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के बारे में लैटर भेजा है जिसकी हैडिंग है - सांसदों द्वारा प्रस्तावित प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के संबंध में। मंत्री जी ने बार-बार कहा कि सांसदों के प्रस्ताव को प्राथमिकता दी जाएगी। जिला पंचायत कहती है कि हमारे इसमें प्रस्ताव नहीं है तो हम हम क्यों ऐप्रूव करें। काट-छांटकर, सांसदों के प्रस्ताव को निकालकर, वे मनमाने रूप से फंड ले जाते हैं। इसमें पारदर्शिता नहीं है, वे कर कुछ और रहे हैं और कह कुछ और रहे हैं। मेरा मंत्री जी से निवेदन है कि वे इसका संज्ञान लें।
साथ ही यह भी स्पष्ट करें कि जिला पंचायतों के लिए जो डीआरडीए के अंतर्गत रुपया जा रहा है, फंड जा रहा है, उसमें से ६०-७० प्रतिशत जिला पंचायत को और बाकी ब्लॉक पंचायत को जा रहा है - इन लोगों को काम कहां करना है- ग्राम पंचायत में। आम व्यक्ति ग्राम पंचायत में है, ग्राम सभा में है। वहां ये लोग पहुंचेंगे नहीं, और क्यों काम करेंगे?ये लोग जवाबदेह नहीं हैं। इसलिए इनके हाथ से फंड को निकालकर सीधे ग्राम पंचायत और ग्राम सभा में समाहित किया जाना चाहिए।
SHRIMATI MARGARET ALVA (CANARA): Mr. Chairman, Sir, Panchayati Raj has a political and an emotional commitment for the Congress Party. Mahatma Gandhi had, right through the freedom movement, spoken about Poorna Swaraj becoming a reality only when Gram Swaraj was achieved and when villages become self-administered. Experiments were made at various levels, but none of them really took root. But then came Rajiv Gandhi with the enthusiasm and idealism of youth determined to change things. "I too have a dream", he declared and set about to make it a reality.
I stand here today to pay my tributes to this man of vision who helped to change the life of millions of people, particularly in the rural side. ‘Power to the people’ was his talisman; ‘voice to the voiceless’ was his objective; ‘decentralised decision-making’ was his directive; and ‘inclusive democracy’ was his mission. I had the privilege, as a Minister in his Government, to work during those years in mobilising, women and youth in particular, to accept these new ideas for Panchayati Raj and in working on support for them. Conventions, regional and national, were organised and people were encouraged to speak and give their inputs. Rajiv Gandhi listened patiently interacting with all sections -- women, youth, dalits, tribals, officials, district magistrates, political leaders, opinion makers, intellectuals, MLAs and MPs, common people of every shade of opinion -- to mobilise support and get their inputs.
Then came the Bills to Parliament. It is history of course that while it went through the Lok Sabha, a united Opposition determinedly defeated the Bills in the Upper House. It was a tragic evening in 1989, but as Rajiv Gandhi said, ‘It is a set-back but we shall overcome’. I think we proved it, though when the Bills were actually passed in Parliament, he was no longer with us. That was 1992. We are today here to discuss the achievements of Panchayati Raj over the last ten years. There have been many achievements. All sections have been ensured a say in decision-making at the village level through the Gram Sabhas. Women, Schduled Castes and Scheduled Tribes, OBCs, minorities, have all been ensured representation in the local power structure. Regular elections have become compulsory. Local development planning has taken shape. It has ensured greater transparency and involvement of people in the implementation of programmes. It has given voice to the voiceless, as has been said, with three million representatives of the people elected, one-third of them being women. It has, to some extent, freed rural society from the clutches of dominant and exploitative upper castes and provided space for the weaker sections in the local power structure.
Yes, ten years of Panchayati Raj has brought in many many changes at the grass root level. I would say it is a revolution unheard of and unseen before through the ballot box.
But there are problems. There are aberrations. There is resistance. There is a strong and violent reaction in some parts of the country. At times, I must say that there are callous and absolutely ineffective responses from the State administrations and the local law and order machinery. Many States have not yet amended their State Acts according to the provisions of the Panchayat (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996, thus denying a large sections of the tribal population their right to participate in these institutions.
The dalits and the weaker sections are sought to be excluded by unlawful means. They are not being allowed to file nomination papers at times. We have recently had the example in Karnataka of a Scheduled Caste woman. The reservation, in rotation, came to a Scheduled Caste woman. But there was no one willing to sign the nomination papers and the election could not take place. The High Court then intervened on her appeal and ordered that she be declared elected even though there had been no nomination.
Instances of stripping of women on Independence Day are there. In 1998, in one State, when a woman went to hoist the flag on Independence Day, there was violence. There are instances of refusal of chairs to elected woman sarpanches to sit on, when they come because the men think that it is an insult to have the women sit in the chair while they have to sit in the benches around. Various instances of resistance get reported. But despite that, I think the Panchayat Raj institution has come of age and it has come to stay. Even the gram sabhas - though in some places they are only in name - have begun to become instruments of opinion-making in the villages, in the rural side. But I must say that the BPL lists, which are supposed to be produced by the gram sabhas, are all defective even today. The poor and the downtrodden are left out of the BPL lists which are drawn, which are supposed to be confirmed by the gram sabhas because they dare not speak. The powerful ones, who are not supposed to be in the list, have their names included. Even when the lists are published, nobody in the gram sabhas dares to challenge or to have them changed. When houses are to be distributed to the poor, the lists are drawn up in the gram sabhas. Most often, it is those who do not deserve them that actually get the houses allotted.
Next, there are financial constraints. Everyone has spoken about that aspect. The allotments are insufficient for the gram panchayat. For instance, there are different villages, different sections to be helped. Therefore, the money is sought to be distributed among different villages or the sections with the result that nothing concrete is possible with the limited money that is available. Maybe, if all the money had gone to one gram panchayat for the year, then something could have happened. But there are so many villages and so many are fighting for it that there is really no concrete work possible with the limited money that comes, which has to be distributed. So, if I may say so, we find that real sustainable infrastructural results are not seen.
Again, there is the question of domination of party interest, of castes, of religious groups which make coordination and smooth functioning in many parts of the country very difficult. One cannot generalise. In the South, it is different. But I know that there are areas where these caste and religious differences create a lot of tension within the localpanchayats. The dalits and the tribal women very often get targeted at the time of elections and even afterwards. There have been four gram panchayats in Tamil Nadu where the upper caste people have not allowed elections to be held simply because of reserved seats there for the dalits and the weaker sections. This is there, across the States. There are conflicts all over the country which arise out of other factors also making the Panchayati Raj system’s functioning very difficult.
Training and empowerment of elected representatives must receive special attention. I have been looking at the budgets. There is hardly anything allotted for training in a systematic way. There are supposed to be institutes for training. I have tried to draw upon them for my area. They say, officers have been trained but by the time we look for them in the rural areas, they have been transferred to some other department and they are not available for actual ground level training programmes. We do not know where the trained personnel are. I must say that particularly women, dalits, weaker sections have to be trained and empowered by making them understand their own role, their duties and the powers that they enjoy as Chairmen and as Gram Pradhans, as Vice-Chairmen or whatever it is. They are not aware of it. That is why the CEO thinks that he is the dictator.वह जो बोलता है, वह सब ने करना है। The CEOs are never sensitised to their new role as people who have to work with elected representatives at the local levels. They still dictate terms and most of the elected representatives, particularly the weaker sections, find it very difficult to deal with them.
Sir, there is also the question of decentralised decision-making. We are all for it. There has to be planning at the local level. But I must admit from my own experience of seeing this functioning that there is no expertise at the local level. There are programmes pertaining to forest, agriculture, land improvement, mining, irrigation, fisheries, forestry, rural industry, drinking water, health, sanitation and various programmes which are supposed to be planned and implemented at the local level. The senior officers sit at the Capital in the Secretariat and very junior officers are in the field. The CEOs have no expertise and the elected representatives are really not trained to plan and implement such development schemes overnight with the result that there are huge leakages, wastage, corruption and I must say that a lot of work is being literally handed out, as they say, to the elected representatives who have become the contractors or the contractors have become the elected representatives. But the nexus is very strong. I recently found out in one case that when there was a Rural Development Programme with contributory provision, the local people had to contribute 20 per cent and 80 per cent was coming from the State and the Central Governments.
Sir, the local people, particularly in the poorer villages do not have the money. They are not able to contribute and I have been fighting and saying that these contributory schemes are only increasing the gap between the developed and under-developed villages because those who have money corner all the schemes and the poorer, Scheduled Castes and Scheduled Tribes dominated villages are left out. But now in order to catch up with what is happening, they get the contractors, they provide 20 per cent and when the work comes, they say: "You give it to us." So, it is again becoming a nexus between the contractors and the local people because they are not able to raise the money. Therefore, we do need to look at both the expertise and the management of the schemes and the programmes where such Central Government schemes are given to the local people. There is also the question which, again, has been talked about regarding poor auditing and improper accounting system and overlapping between the local bodies, the State programmes and others. We have received a number of programmes from the Central Government. साल भर आप नाम बदलते हैं। नए-नए प्रोग्राम एनाउन्स करते हैं। इम्पलीमेंट करने के पहले नए प्रोग्राम एनाउन्स कर देते हैं। Nobody knows what is what. You have merged DWACRA with something, it is called Janmabhoomi somewhere and something else at some other place. Each State adds to it, multiplies it, and in the confusion the local bodies do not know how to go about it.
Sir, then there is the problem of Vote of No-Confidence. I am seeing from my experience that the first targets are women or Dalit Chairmen or tribal Chairmen. If they do not toe the line of the upper caste people or if they do not do what they are dictated to or sign blankly, or if they want to look at the file, people say: "Oh! they are becoming too smart and becoming too independent". So, they bring a Vote of No-Confidence against them, remove them from power and bring in their own people. This is what is happening. Recently, in our own State we have had series of Votes of No-Confidence. In Maharashtra, in order to overcome this, they have made three-fourth majority as a requirement to unseat women because everybody was trying to unseat women who have been elected to chair local bodies. So, I think the Government needs to look at this and find some way to see that the elected members are protected for their terms.
The other question is that of allowances. The Daily Allowance and Travelling Allowance that are paid to them to go to meetings are so meagre that they are not even a day’s wage which those women lose when they go to attend these meetings, either of the Gram Sabha or of the Mahila Mandal. Even the Chairmen of the Gram Panchayats and other bodies are paid less than the minimum wage that is paid anywhere in the country. Their status needs to be raised. So, something has to be done to see that they are properly paid.
Finally, the challenge before us is, how to make this three-tier administration, which has come to stay, more meaningful and more responsive, how to strengthen the panchayats to make them instruments of grassroot development, of good governance, of responsive decision-making, of transparent administrative functioning and, most of all, instruments of social justice. Unless and until these changes come to the society at the grassroot level, no matter how much money we give and no matter how much of effort we make, there will not be any impact. I believe that theGram Panchayats and Gram Sabhas have to be really empowered to make them instruments of change and social justice because that was Rajivji’s dream and that, I think, ultimately is going to change rural India.
श्री महेश्वर सिंह (मंडी): सभापति महोदय, आपने जिस अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया, उसके लिए सर्वप्रथम मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। पंचायती राज और नगर पंचायतों को और सुद्ृढ़ और सशक्त बनाने की द्ृष्टि से जो ७३ वां और ७४ वां संविधान संशोधन किया गया, जिसे सदन ने पारित किया, उसके दस वर्ष पूरे हो गए हैं। इसकी समीक्षा करने के लिए माननीय ग्रामीण विकास मंत्री महोदय ने आज जो प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत किया है, मैं उसके लिए उन्हें बधाई देना चाहूंगा। उन्होंने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा माननीय सदन में उठायी है ताकि हमारे सांसद अपने-अपने विचार अनुभवों के आधार पर रख सकें और सुझाव दे सकें कि पंचायती राज संस्थाओं को किस प्रकार और सुद्ृढ़ किया जाए। समय का अभाव है। मैं ज्यादा समय न लेते हुए कुछ बिन्दुओं की ओर मंत्री महोदय का ध्यान आकर्षत करना चाहता हूं।
आज जो प्रावधान किया गया है कि पंचायतों के प्रधान और उपप्रधान का सीधा चुनाव होगा, मैं उसके बारे में कुछ बातें कहना चाहूंगा। रामजीलाल सुमन जी यहां तक कह गए कि ब्लॉक समति और जिला परिषद के अध्यक्षों का सीधा चुनाव होना चाहिए लेकिन मैं उनसे भिन्न मत रखता हूं।
जैसा आप जानते हैं कि देश में पंचों को पंच परमेश्वर कहा गया है और वह प्रजातंत्र की प्राथमिक इकाई हैं। ऐसे अधिकार से उन्हें वंचित करना कि वह अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष न चुन सकें यह कहां तक न्यायसंगत है। जिस पंच को पंच परमेश्वर कहा जाता है, वह आज अकेला और अलग-थलग पड़ा है। उसे कहीं भी विकास संबंधी कार्य में विश्वास में नहीं लिया जाता है। वे हमें कई बार आकर कहते हैं कि मैं कैसा पंच हूं, मैं खडपंच हूं, मुझे किसी कार्य में कोई पूछता नहीं है। जिस बात को माननीय सदस्या आल्वा जी कह रही थी कि आज इस प्रकार की स्थिति है 17.00 hrs. कि जो पंच चुना हुआ है, उसे कोई पूछता नही और प्रधान ही सब कुछ कर देता है। मैं यहां तक कहूंगा कि जो अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात की गई है, उसे एक-दो साल तक कोई नहीं ला सकता, यह प्रजातंत्र पर कुठाराघात है क्योंकि सरपंच मनमाने ढंग से काम कर रहे हैं। मैं सभी सरपंचों के बारे में नहीं कहता लेकिन इस प्रकार के उदाहरण हैं जहां सरपंच न तो उप-सरपंच को और न पंच को पूछता है। इसलिये इस प्रकार का प्रावधान होना चाहिये कि पंचों को अपना अध्यक्ष या मुखिया या प्रेधान चुनने का अधिकार होना चाहिये ताकि वह सब को विश्वास में लेकर चले। आज ऐसी अनेकों शिकायतें हैं जहां पंच को कोई पूछता नहीं। इसलिये इस बात पर विचार किया जाना चाहिये कि पंच का मान-सम्मान कैसे हो। वह प्रजातंत्र की प्रमुख इकाई है।
मैं अब पंचायती राज संस्थाओं, नगर पंचायतों और नगर परिषदों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति व महिलाओं के लिये आरक्षण तथा रोटेशन की बात पर आता हूं। मैं आरक्षण का विरोध नहीं करता हूं। जब तक आरक्षण नही होगा, कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलेगा। इसमें रोटेशन शब्द जोड़ा गया है। जिस दिन कोई व्यक्ति चुना जायेगा, उसे मालूम हो जायेगा कि अगली बार वह उस जगह से नहीं चुना जायेगा क्योंकि या तो वह सीट ओपन हो जायेगी या वह सीट रिजर्व हो जायेगी। फिर ग्रामीण जनता की क्या जवाबदेही रहेगी?…( व्यवधान)
श्री शिवराज वि.पाटील (लातूर) : सभापति महोदय, इस विषय पर बहुत से सदस्य बोलना चाहते हैं, इधर से भी और उधर से भी क्योंकि यह विषय ऐसा है सब की बोलने की इच्छा है। अगर सरकार की तरफ से मदद हो जाये तो इस विषय पर सभी सदस्य आज बोल लें और मंत्री जी का उत्तर कल हो जाये।
श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) : सभापति महोदय, सदन ८ बजे तक बढ़ा दिया जाये।
सभापति महोदय : अभी सदन की कार्यावधि एक घंटा बाकी है। ६ बजे इस पर विचार करेंगे कि कितना चलाना है और क्या करना है?
श्री शिवराज वि.पाटील: मैं यह इसलिये कह रहा हूं कि हमें अपने सदस्यों को एडजस्ट करना है।
सभापति महोदय : जिन सदस्यों की बोलने में रुचि है, उन्हे अकौमोडेट किया जाये।
श्री महेश्वर सिंह : सभापति महोदय, मैं कह रहा था कि यदि आज एक सासंद को पता चल जाये कि …( व्यवधान)
श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): सभापति जी, आप हमारी भावनायें समझें, यदि अभी कुछ कर दें तो अच्छा रहेगा। आप क्यों टाल रहे हैं? इसमें कोई कानूनी व्यवधान नहीं है, अगर सरकार सहमत हो जाये।
सभापति महोदय : जो सदस्य रुचि रखने वाले हैं, उन सब को बोलने दिया जायेगा।
श्री मुलायम सिंह यादव : सभापति जी, आप सब को इतना टाइम कहां तक देंगे, सब को नहीं दे सकते हैं।
श्री शिवराज वि.पाटील: सभापति महोदय, मैं समझता हूं कि सभी सदस्यों को बोलने दिया जाये और मनिस्टर साहब की इसमें मदद हो सकती है क्योंकि वे अच्छे ढंग से अपना रिप्लाई दे सकते हैं। वे सभी सदस्यों की बात का निष्कर्ष निकाल सकते हैं। वरना बात हवा में न रह जाये और ऐसा छोड़ दिया जाये, ऐसा नहीं होना चाहिये।
श्री काशीराम राणा : सभापति महोदय, मैं भी चाहता हूं कि सभी सदस्य बोलें और जितना समय सदन बैठना चाहे, बैठे। सदस्य अपने-अपने विचार रखें, यह ठीक होगा। मैं आज ही रिप्लाई कर दूंगा।
सभापति महोदय : बी.ए.सी. ने इस विषय को आज ही निपटाने के लिये तय किया हुआ है, फिर भी सदन की जो राय होगी, वैसा किया जाये।
श्री शिवराज वि.पाटील: सभापति जी, बी.ए.सी. ने तय किया मगर स्पीकर साहब बैठे हुये थे, उस समय यह बात निकली थी कि सदन में हम सब लोग बोल रहे हैं, जितने सदस्य आज बोलना चाहते हैं, बोलें लेकिन मनिस्टर साहब का उत्तर कल हो, उसमें क्या दिक्कत है? उसमें आधे-पौने घंटे के समय का मामला है, वह टाइम उन्हें मिल सकता है।
श्री काशी राम राणा : सभापति जी, श्री शिवराज जी जैसा कहते हैं, आज ७-८ बजे तक सदस्य बोल सकते हैं, उसके बाद मैं रिप्लाई कर दूंगा।
श्री शिवराज वि.पाटील: क्या रिप्लाई आज ही कर देंगे?
श्री मुलायम सिंह यादव : सभापति जी, माननीय मंत्री अपने विभाग में रुचि लेने वाले हैं, यह तो गज़ब हो गया कि खुद कहते हैं कि आज ही रिप्लाई कर देंगे। कल शुक्रवार है।
कल सरकारी काम कोई नहीं होना था - वाह मंत्री जी।…( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल: सर, रेलवे पर सारी रात बैठते हैं, यह उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि रेलवेज पर बहस साल में दो बार होे जाती है।…( व्यवधान)
श्री शिवराज वि.पाटील: आप इस पर रूलिंग दे दीजिए। हाउस का सैन्स यही है कि मंत्री जी कल जवाब दे दें और जो मैम्बर्स बोलें, वह उनका भी जवाब दे दें। कल जवाब देने में उन्हें क्या दिक्कत हो सकती है। वह अपने अधिकारियों और साथियों के साथ बात भी कर सकते हैं और कंक्रीट जवाब दे सकते हैं।
श्री पवन कुमार बंसल: आज पूरी रात बहस होने दीजिए।…( व्यवधान)
श्री काशीराम राणा : वैसे बिजनेस एडवायजरी कमेटी में आज का ही दिन तय हुआ था।
SHRI SHIVRAJ V. PATIL : The BAC cannot overrule what we are saying on the floor of the House. If you want to take the sense of the House, you take the sense of the House. The hon. Members would say that we would have the reply tomorrow.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): If the House wants, we can change the decision of the BAC.
SHRI PAWAN KUMAR BANSAL : Does the hon. Minister want to reduce the level of this debate to ‘Zero Hour’. इन्हें किस चीज की जल्दी है।
श्री मुलायम सिंह यादव : क्या आप इसे औपचारिकता मात्र के लिए लाये थे। इस पर इतनी गंभीर चर्चा हो रही है। आप पर हम कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं, आपकी नीयत समझ में नहीं आ रही है। आपको सुझाव दे रहे हैं।…( व्यवधान)
सभापति महोदय : इस पर बहस चल रही है, इस पर कहां कोई विवाद है।
श्री श्रीप्रकाश जायसवाल (कानपुर) : सभी माननीय सदस्यों की राय लेने के बाद, चिंतन करने के बाद अगर माननीय मंत्री जी कल उत्तर देंगे तो मैं समझता हूं कि जवाब ज्यादा परफैक्ट रहेगा। तुरंत सुनेंगे और तुरंत जवाब देंगे तो क्या चिंतन करेंगे और क्या जवाब देंगे, केवल फॉरमेलिटीज पूरी करेंगे।
श्री शिवराज वि.पाटील: Generally, the Ministers ask for this kind of facility. वे पूछते है कि आज आप बोलिये, हम कल जवाब दे देंगे। आप बोल रहे हैं, आप बोलते जाएं, हमारे मन में है, हम आपके प्रश्नों के जवाब दे देंगे।…( व्यवधान)
श्री काशीराम राणा : ऐसा नहीं है, आप बोलते जायेंगे और हम ऐसे ही जवाब दे देंगे। हम भी इस इश्यू पर बहुत गंभीर हैं।
SHRI SHIVRAJ V. PATIL : Let it be put to the House.
श्री पवन कुमार बंसल: जितने नाम हैं उन सभी को बोलने दीजिए…( व्यवधान)
सभापति महोदय : ठीक है, अलोटिड टाइम पर उसे तय किया है।
श्री महेश्वर सिंह : सभापति महोदय, मैं कह रहा था कि अगर किसी चुने हुए प्रतनधि को चाहे वह कोई सासंद हो या कोई दूसरा हो, अगर यह मालूम हो कि उसे एक ही टर्म मिलने वाला है तो जनता के प्रति उसकी क्या जवाबदारी होगी। इसलिए आवश्यक है कि अगर यह आरक्षण रखना है और उसे रखना आवश्यक भी है तो यह रोटेशन कम से कम दूसरी टर्म के बाद होना चाहिए, क्योंकि जनता को यह अधिकार है कि जिस प्रतनधि को उन्होंने चुना है, अगर उसने अच्छा काम किया है तो उसे पुरस्कार के रूप में लोग मतदान देकर फिर से चुनते हैं और अगर गलत काम किया है तो उसे सजा देते हैं, लोग उसे हरा देते हैं। प्रजातंत्र में जनता का यह जो अधिकार है, उसे इसके माध्यम से छीना जा रहा है, क्योंकि यह रोटेशन है, जिस दिन आदमी चुना जाता है, उसी दिन उसे मालूम है कि मैं काम करूं या न करूं, दूसरी दफा मुझे टर्म नहीं मिलनी है, इसलिए इसे रोकने की आवश्यकता है।
श्रीमती मार्गेट अल्वा जी ने एक बात कही कि चुने हुए नये प्रतनधियों को समय रहते ट्रेनिंग देने का प्रावधान होना चाहिए। कहीं-कहीं ऐसे हालात देखने को मिलते हैं और लोग आम तौर पर कहते हैं, कई दफा समाचार पत्रों में भी पढ़ने को मिलता है कि देश में अनेकों दुर्गम स्थानों में पति प्रधान प्रथा चल पड़ी है। जो प्रधान है, उसका पति उसके पीछे बैठकर सारी कार्यवाही चलाता है और वह महिला बेचारी चुपचाप बैठी रहती है। इसे रोकने की भी कहीं न कहीं आवश्यकता है, क्योंकि उसमें भी विश्वास पैदा होना चाहिए। जो महिला चुनकर आती है वह एक प्रधान के रूप में काम करे औऱ जो प्रधान पति प्रथा है, इसे रोकने की आवश्यकता है। अगर यह रोटेशन कम से कम दो टर्म के बाद हो तो ज्यादा अच्छा रहेगा, ताकि उस महिला को दोबारा चुनने का और ट्रेनिंग लेने के बाद काम करने का अवसर मिले। इस पर भी विचार होना चाहिए।
सभापति महोदय, मैं तीसरा बिन्दु उठाना चाहूंगा कि जो विकासात्मक कार्य पंचायतों के माध्यम से करवाने की बात कही गई, श्रीमती अल्वा जी ने बिल्कुल ठीक कहा कि कई जगह ठेकेदारी प्रथा चली है और यहां तक है चूंकि प्रधान का डायरेक्ट इलैक्शन हो, वह उप-प्रधान को भी कई जगह नहीं पूछते और सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर जाकर बी.डी.ओ. के दफ्तर में खुद एग्रीमैन्ट बनाते हैं और सारा का सारा काम ठेके पर लेते हैं।
इसलिए उसे रोकना चाहिए। मैं पंचायती संस्था के विरोध में नहीं हूं, लेकिन पंचायत का अर्थ केवल प्रधान नहीं होता। विधान सभा का अर्थ केवल वहां के विधायक दल का नेता नहीं होता, पूरी विधान सभा होती है। इसी प्रकार पंचायत जब चुनी गई है तो पंचों को विश्वास में लेकर प्रस्ताव पारित होने चाहिए। पहले एक परंपरा थी कि विकास खंड से जब पैसा आता था तो उसके लिए अलग से पंचायत के नाम से अकाउंट निकलता था और वहां जमा होता था। मस्टर रोल कैसे पंच को दिये जाएं, इसके लिए प्रस्ताव पारित होते थे और अगर पैसा किसी ने अपने पास रखा तो वह एम्बैज़लमैन्ट कहलाता था। लेकिन अब क्या हो रहा है। प्रधान सीधा ५० प्रतिशत पैसा हर काम का लेता है। जो पूरा करना है करे, नहीं करना है तो नहीं करता। इसलिए इस पर भी कहीं न कहीं रोक लगाने की आवश्यकता है कि पंचायतों में जो पैसा जाता है, वह पंचों के प्रस्ताव के माध्यम से, बहुमत के हिसाब से जाना चाहिए और पंचों की भी उसमें भागीदारी होनी चाहिए। कभी कभी मन में आता है कि क्या इस थ्री टायर सिस्टम का कोई अर्थ है? ब्लाक समति और जिला परिषद् की कहीं भी विकासात्मक कार्यों में भागीदारी नहीं है क्योंकि पंचायत वाले कहते हैं कि तुम हमारे सदस्य नहीं हो, यहां मत आओ। आखिर ब्लाक समति के सदस्यों को चुना गया है तो किसलिए चुना है और जिला परिषद् के सदस्यों को चुना गया है तो किसलिए चुना है, इस पर भी विचार करना चाहिए।
जैसा इन्होंने कहा कि चाहे वह विकास कार्यों में जनसहयोग कहिये, कुछ प्रांतों में है कि ३० प्रतिशत लोग भागीदारी करेंगे और ७० प्रतिशत सरकार देती है। इसी प्रकार से यहां स्वजलधारा योजना की बात आती है जिसमें १० प्रतिशत ये बौडीज़ देती हैं और ९० प्रतिशत भारत सरकार देती है। १० प्रतिशत वाले ठेकेदार जगह-जगह घूम रहे हैं जो लोगों से कह रहे हैं कि शेयर हम भर देंगे, काम हमें दे दो। अगर ठेकेदारी प्रथा ही चलनी है तो पंचायत का क्या काम है? जिस ग्राम सभा की बात हम कर रहे हैं क्या सही मायने में ग्राम सभा को वह अधिकार मिलता है? क्या ग्राम सभा से कोई पूछता है? ग्राम सभा किस प्रकार से आकर्षक बने इस पर भी विचार होना चाहिए। बीपीएल परिवारों की सूची भी अंदर बैठकर बनती है। मैं आभारी हूँ कि केन्द्रीय मंत्री महोदय और सरकार ने एक निर्णय लिया है कि अब यह सर्वेक्षण पंचायतें नहीं करेंगी बल्कि इंडीपैन्डैन्ट व्यक्ति जाकर कर रहे हैं और उसके बाद पंचायतों के सामने उस सूची को रखा जाएगा, ग्राम सभा के सामने रखा जाएगा और सही मायने में जो सबसे कम अंक प्राप्त करेगा वही परिवार बीपीएल कहलाएगा, ऐसी व्यवस्था जो इन्होंने की है, इसके लिए भी मैं इन्हें बधाई देना चाहूँगा।
महोदय, इसके बाद मैं एक और बिन्दु पर चर्चा करना चाहूंगा कि जो संपूर्ण ग्रामीण रोज़गार योजना है, इसमें समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। यहां भी इस बात का उल्लेख किया गया। क्यों उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं आ रहे हैं - क्योंकि पंचायतों का काम बढ़ा है। एक तरफ संपूर्ण ग्रामीण रोज़गार योजना है। सरकार के निर्णयानुसार ५० प्रतिशत पैसा सारे पैसे में से सीधा पंचायत को जाता है, ३० प्रतिशत अगर मैं गलत नहीं हूं तो ब्लाक समति को जाता है और केवल २० प्रतिशत जिला परिषद को जाता है। लेकिन क्या पंचायतों के पास इतना इनफ्रास्ट्रक्चर है कि वे काम करवा लें। जैसा इन्होंने ठीक कहा कि आज एक जेई है, कल दूसरा आ जाता है, परसों तीसरा आ जाता है। आज इस ग्रामीण विकास मंत्रालय का अपना कोई कैडर नहीं है। इनको सारे रिजैक्टेड लोग लोक निर्माण विभाग से जेई मिलते हैं। इस बात पर विचार होना चाहिए कि अगर ग्रामीण विकास को और सुद्ृढ़ बनाना है तो उनके इनफ्रास्ट्रक्चर को सुद्ृढ़ करना होगा। आज पंचायत प्रधान के पास न केवल यह पैसा संपूर्ण ग्रामीण रोज़गार योजना का जाता है, इसके अलावा कई जगह विधायक नधि हैं, कई जगह सांसद नधि पंचायतों को दी जाती हैं, लेकिन उस प्रधान के पास कौन सी तकनीकी शिक्षा है या कौन सा टैकनीशियन बैठा है जो काम करवाएगा। मशीनरी का अभाव है। पहाड़ी प्रांतों में सारे विकास खंडों में केवल दो या तीन जेई बैठे हैं जहां सैकड़ों मील पैदल चलना पड़ता है। उसको भी अगर काम का निरीक्षण करना होगा तो कभी कभी गांव वालों को टैक्सी करके ले जानी पड़ती है। वह कहता है कि मुझे वहां पहुँचाओ, फिर निरीक्षण करेंगे। जब वह निरीक्षण करता है तो एक बार कच्ची सड़कें धुलकर चली जाती हैं, उसके बाद वह निरीक्षण करने, असैसमैंट करने आता है।
हम ग्रामीण विकास में पैसा क्यों देते हैं? यह सच है कि उनके मापदंड और क्राइटीरिया ऐसा है कि शायद पीडब्लूडी से काम सस्ता पड़ेगा। लेकिन अगर जेई पीडब्लूडी से ट्रांसफर होकर आना है, एसडीओ पीडब्लूडी से ट्रांसफर होकर आना है और वह सेवानिवृत्त वाला आना पसंद करता है या वह आना पसंद करता है जिसकी शिकायतें ज्यादा हों तो फिर ग्रामीण विकास कार्य का काम कैसे चलेगा? इसलिए आवश्यकता है कि इसके लिए अलग से कैडर खड़ा किया जाए और वह ग्रामीण विकास मंत्रालय का कैडर कहलाए। वहां जेई हों और उनको ट्रेनिंग दी जाए ताकि तुलनात्मक द्ृष्टि से जो सोच है कि अगर हम विकास खंड के माध्यम से या पंचायतों के माध्यम से काम करें तो सस्ता होगा। यह तभी सार्थके होगा अगर इस प्रकार की व्यवस्था की जाए।
सभापति महोदय, जहां तक केन्द्र सरकार की ओर से संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना जिसके अन्तर्गत ई.जी.एस. और जे.आर.वाई को इकट्ठा किया गया, उसके अन्तर्गत निश्चितरूप से आज पंचायतों को ज्यादा पैसा जा रहा है, लेकिन जो पैसा ब्लॉक समति को जाता है, ब्लॉक समति का अध्यक्ष उसे अपनी ऐच्छिक नधि समझता है। होना तो यह चाहिए की जिला परिषद् के सदस्य सारे धन के २० प्रतिशत का बंटवारा करें, लेकिन ऐसा न कर के जिला परिषद् के अध्यक्ष गाड़ी लेकर घोषणा करते फिरते हैं कि जैसे यह धन उनकी अपनी ऐच्छिक नधि का हो। वस्तुत: यह पैसा वह है जो कि जिला परिषद् सदस्य के कहने पर उसके क्षेत्र या वॉर्ड में विकास कार्य पर व्यय होना है। इसलिए इस व्यवस्था को सुद्ृढ़ करने की आवश्यकता है।
सभापति महोदय, एक बहुत अच्छा निर्णय पूर्व केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री महोदय ने लिया था जिसके अन्तर्गत जितनी भी केन्द्रीय सरकार की परियोजनाएं प्रदेशों में चल रही हैं उनकी वजिलेंस और मानिटरिंग हेतु कमेटी बनेगी और उसकी अध्यक्षता स्थानीय सांसद करेंगे। इसमें पार्टीबाजी या गुटबाजी का कोई सवाल नहीं था। जिस पार्टी का जो भी सांसद जहां से होगा, वह अपने क्षेत्र की कमेटी का अध्यक्ष होगा। ग्रामीण मंत्रालय के निर्देश पर कई जगहों पर ये कमेटियां बन गईं। हमारी अनुशंसाओं पर कई जगह सदस्य भी मनोनीत कर दिए गए। उदाहरण के लिए मैं हिमाचल प्रदेश का जिक्र करना चाहता हूं। यहां हमारे विद्वान एवं वरिष्ठ सांसद श्री मणिशंकर अय्यर जी भी बैठे हैं और मेरी बात को बहुत ध्यान पूर्वक सुन रहे हैं, मैं उनका ध्यान हिमाचल प्रदेश की ओर आकर्षित करते हुए सदन को बताना चाहता हूं कि वहां हाल ही में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी और यह खेद का विषय है कि वह सत्ता में आते ही इन समतियों की बैठकों को ही नहीं होने दे रही है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने तो एक सर्कुलर निकाला है जिसके अनुसार इन वजिलेंस कमेटियों का गठन करने पर रोक लगा दी गई है और जहां इन कमेटियों का गठन हो चुका है, वहां इनकी बैठकें नहीं किए जाने के आदेश प्रशासन को दे दिए गए हैं ताकि सांसद इन समतियों की अध्यक्षता न कर सकें। यदि आप कहेंगे, तो सोमवार को मैं वह सर्कुलर सदन के पटल पर प्रस्तुत कर दूंगा।
महोदय, उस समय यह बात भी आई थी कि प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में सांसद का संपूर्ण सहयोग लिया जाएगा और उसकी अनुशंसा और सुझाव के अनुसार काम किया जाएगा। इसलिए इंटेलिजेंस और मानिटरिंग कमेटियों की अध्यक्षता यदि सांसद करेंगे, तो वे अपनी बात कह सकेंगे और यदि कहीं कोई गड़बड़ी हो रही होगी, तो उसे तत्काल रोका जा सकेगा, अन्यथा सांसद के लिए अपनी बात कहने और मनवाने के लिए कोई फोरम नहीं है। वह अपनी रिक्मेंडेशन कहां दे। हम भारत सरकार के प्रतनधि हैं, लेकिन हमारे लिए अपनी बात कहने और मनवाने का कौन सा फोरम है जहां हम अपनी बात कह सकें या मनवा सकें। जब प्रदेश में प्लानिंग कमीशन की बैठक होती है, तो वहां हमारा कोई स्थान नहीं होता, वहां विधायक बैठता है। जब हम यहां मंत्री जी से कहते हैं, तो वे कहते हैं कि जब तक राज्य सरकार से अनुशंसा नहीं आएगी, तब तक मैं कुछ नहीं कर सकता। इसलिए राज्य सरकार से रिक्मेंडेशन करा के भेजिए, जब हम राज्य सरकार से निवेदन करते हैं, तो वह हमारी अनुशंसा को नहीं मानती। आप हमारे प्रस्तावों को नीचे के स्तर के अधिकारियों को भेज देते हैं, वे सांसद की अनुशंसा के अनुसार कोई काम नहीं करते, तो फिर बताइए हमारे लिए कौन सा स्थान है, हम कहां बैठकर इस प्रकार की अनुशंसा करें ?
महोदय, मैं एक और बात कहना चाहता हूं, यद्यपि वह विषय से हटकर है, तथापि बहुत महत्वपूर्ण है और वह है हमें परिवार नियोजन की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता। हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार से पहले की सरकार, यानी हमारी सरकार ने निर्णय लिया था कि जिस व्यक्ति के दो से अधिक बच्चे हो जाएंगे, वह पंचायतीराज संस्था का यदि चुना हुआ व्यक्ति भी है, तो उसे इस्तीफा देना पड़ेगा। यह कई स्थानों पर क्रियान्वित भी हुआ और इस नियम के कारण पंचायतीराज संस्था के कई चुने हुए प्रतनधियों को इस्तीफे देने पड़े। इस प्रकार का कानून सांसदों और विधायकों के लिए भी बनना चाहिए। उस कानून का अनुसरण यहां भी करना चाहिए और केवल पंचायतीराज संस्थाओं के लोगों पर ही वह लागू हो, ऐसा नहीं होना चाहिए। हम सांसद लोग बच्चे पैदा करते जाएं और हमारे लिए कोई कानून न हो, लेकिन ग्राम पंचायत के प्रधान के लिए कानून हो, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्या हम बच्चे पैदा कर के देश की जनसंख्या वृद्धि नहीं करते?
महोदय, कहने को तो बहुत है, लेकिन मैं देख रहा हूं कि आपका हाथ घंटी की ओर बढ़ रहा है। आप घंटी बजाएं, उससे पूर्व ही मैं एक बात कहकर अपना स्थान ग्रहण करूंगा। जहां तक पंचायतीराज संस्थाओं को आत्मनिर्भर बनाने की बात कही गई है, यह परमावश्यक है। आज जितने भी खनिज पदार्थ निकलते हैं, वे अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में निकलते हैं, कहीं स्लेट की खदानें हैं, कहीं पत्थर की खदानें हैं, कहीं क्रशर लगते हैं कहीं हीरे-जवाहरात की खदानें हैं, इन सबसे खनन के बदले पंचायतों को कुछ न कुछ रायल्टी लेने का अधिकार होना चाहिए।
अगर पंचायतों को आय नहीं होगी तो आपकी जो भी स्वजल धारा या दूसरी योजनाएं हैं, आप इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर देंगे, नल लगा देंगे लेकिन पंचायतों की हालत यह है कि अगर नल टूट जाएं तो उसे बदलने के लिए भी पैसा नहीं है। यहां ठीक कहा गया कि अगर स्ट्रीट लाइट का बल्ब फ्यूज हो जाए तो उसे खरीदने के लिए भी पैसा नहीं है। इसलिए अगर पंचायतों को आत्मनिर्भर और स्वावलम्बी बनाना है तो उनकी आय के रुाोत के बारे में भी सोचना होगा कि पंचायतों के पास भी आय के कुछ न कुछ रुाोत हों। आज जो प्रथा चली है कि प्रधान ही सर्वोसर्वा हो, इसे समाप्त करना होगा। सारी पंचायत का कोरम बैठे, ग्रामसभा ज्यादा आकर्षित बने और लोग ग्रामसभा में हिस्सा लें। ग्रामसभा के अपने अधिकार है। यहां ठीक कहा गया कि आप अगर सांसद हैं, कोई प्रधान मंत्री है, मुख्य मंत्री है, सर्वप्रथम अगर हम गांव से आते हैं तो हम उस ग्रामसभा के सदस्य हैं, पंचायत के नहीं और ग्रामसभा के सदस्य होने के नाते हमें भी वहां हिस्सा लेना चाहिए तथा बैठना चाहिए।
महोदय, मैं दावे से कह सकता हूं क्योंकि मैं ग्रामसभा में अनेकों स्थानों पर गया हूं और उसमें हिस्सा भी लिया है, उसे ज्यादा आकर्षित बनाने की जरूरत है ताकि जो अति गरीब व्यक्ति हैं, बीपीएल रेखा से नीचे रहने वाले हैं, उनका भी चयन हो। वहां भाई-भतीजावाद न चले, ऐसी व्यवस्था करना भी आवश्यक है।
महोदय, अंत में मैं मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि सांसदों का जो अपना सम्मान है, उसे भी कायम करिए, क्योंकि हम आपके प्रतनधि हैं। अगर आपके प्रतनधि हैं तो हमें, जो वजिलेंस मोनिटरिंग कमेटी बनी है, उसकी अध्यक्षता करने का अधिकार भी है। आप मुख्यमंत्रियों को लखिए, वे देखें कि यहां से जो पैसा जाता है, जो इसे नहीं मानते, उस सरकार के साथ क्या करना चाहिए, यह आपके हाथ में है, न कि किसी अन्य के हाथ में है। मैं उसका खुलासा नहीं करना चाहता। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, सब ने मेरी बात को ध्यान पूर्वक सुना, सब का धन्यवाद करते हुए मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं।
श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): सभापति महोदय, बहुत-बहुत धन्यवाद। हमें भाषण नहीं देना है, क्योंकि कई माननीय सदस्यों ने महत्वपूर्ण सुझाव रख दिए हैं। हमें केवल एक ही सुझाव देना है और हमें विश्वास है कि आप भी हमारे सुझाव से सहमत होंगे। जहां तक पंचायती राज का सवाल है, हम माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देते हैं कि आपने दस साल की समीक्षा करने के लिए सदन में बहस कराने का अवसर दिया, हम उस पर ज्यादा नहीं जाना चाहते। पंचायती राज का जो लक्ष्य रहा, वह आज से नहीं, बल्कि बहुत सालों से है। आप इतिहास पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि यह चार-पांच हजार सालों से है। हर ग्राम में पंचायत होती थी और इतनी मजबूत पंचायत ग्रामवासियों की थी, जो संविधान में नहीं है। वहां हर फैसला पांच पंच करते थे और वे जो फैसला करते थे, वही होता था। यह अवधारणा, मंशा और मकसद शुरू से ही पंचायती राज का रहा है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण प्रथम ईकाई ग्राम पंचायत ही है और उसका मजबूत होना, लोकतांत्रिक तरीके से चलाना सबसे ज्यादा आवश्यक है, अगर लोकतंत्र मजबूत चाहते हैं। वहीं पर प्रश्न-चिन्ह है। जहां तक प्रधान को अधिकार देने की बात है, आपको पता होगा कि एसडीएम, डिप्टी कलेक्टर जब चाहे उसे मुअत्तिल कर दें, उसके कागज ले जाए। अगर ग्रामसभा की जमीन है, जब कि उसके प्रस्तावों के बिना हस्तांतरित नहीं हो सकती, किसी को नहीं दे सकते हैं तो भी एसडीएम कागज ले जाता है और अपने लेखपाल को बैठा कर, जिसे चाहे उसे पट्टा दे देता है।…( व्यवधान)वह ले जाता है, हमारे निर्वाचन क्षेत्र से ले गया है और जिसके नाम चाहे पट्टा कर देता है, जिससे गावों में विवाद खड़ा हो जाता है। इसलिए इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और संविधान में संशोधन करने की आवश्यकता है। आपने जब उसे लागू किया था तो सबसे पहले आप मुझ से मिलने आए थे। मैं सरकार में था तो मैंने आपत्ति की थी कि आपने प्रावधान बनाया बहुत अच्छा है लेकिन इससे बुराइयां बहुत पैदा होंगी। वह आपका मकसद एवं लक्ष्य बहुत अच्छा था और आपकी भावना बहुत अच्छी थी, सब की थी, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसके जो परिणाम आए हैं वे बहुत खतरनाक हैं। उसमें आपको तीन काम करने चाहिए। हमने प्रधानमंत्री जी को पत्र में लिखा है और प्रधानमंत्री जी भी उससे सहमत थे। हमें गुजरात के बारे में नहीं पता है, लेकिन आज उत्तर प्रदेश और बिहार और एकाध सूबे की मैं अलग से कह सकता हूं कि जिसके पास पैसा है, जो गुंडा है, माफिया है, वह जहां चाहेगा, पंचायत का चुनाव जीत जायेगा, हम और आप उसे नहीं रोक सकते। अभी २०-२५ दिन पहले ब्लाक प्रमुख का चुनाव हुआ था, माननीय सदस्यों को जानकर ताज्जुब होगा कि उसने पता लगा लिया कि चुनाव कब होना है। अभी चुनाव की घोषणा नहीं हुई थी और बी.डी.सी. के ६४ मैम्बर थे। उन ६४ मैम्बरों में से ४८ को पकड़कर लेकर चला गया और उसके तीन दिन बाद चुनाव की घोषणा हुई कि फलां तारीख को नोमीनेशन होगा। तीन लोग बचे, उन तीन लोगों ने कहा कि हम पर्चा दाखिल करेंगे तो पर्चा दाखिल करने के लिए गये। वह जबरदस्त माफिया था, उसे पकड़कर ले गया और उसकी छाती से रायफल और रिवाल्वर दोनों तरफ से लगा दिया कि अगर पर्चा दाखिल किया तो तुम्हें यहीं मार देंगे। इसीलिए हम चाहते हैं कि पंचायती राज का इस आधार पर आने वाले दिनों में चुनाव होंगे तो पंचायती राज का कोई महत्व नहीं रहने वाला। आज उत्तर प्रदेश और बिहार की यह हालत हो गई है, यह मैं कह सकता हूं। अब इसका क्या होना चाहिए?गंगवार साहब को अच्छी तरह से पता है, जिला परिषद का अध्यक्ष जो चाहेगा, पंचायत का अध्यक्ष जो चाहेगा, वह हो जायेगा, जिसके पास बन्दूक है, जो गुंडा है और जिसके पास पैसा है। ऐसे ही लोग जिला पंचायत के अध्यक्ष हो गये, जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी कि जिला पंचायत के अध्यक्ष होंगे, जिन्हें राजनीति का ए, बी, सी, डी पता नहीं है, जिन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, लेकिन केवल रुपये के बल पर ऐसा हुआ है।
बी.डी.सी. का मैम्बर मौहल्ले की पंचायत से चुनकर आता है, वह पहले ही १०-२० हजार रुपये का सौदा कर लेगा और इसलिए कर लेगा क्योंकि जब एम.एल.ए. एम.पी. बिकेंगे, चाहे वे सांसद नधि के नाम पर बिकें या सरकार बनाने के नाम पर बिकें तो उसका असर पंचायत पर भी पड़ रहा है। हम लोग आदर्श बने बैठे हैं, वे हमारे आचरण का अनुकरण करेंगे। जितनी भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं, यह रोग तो वहीं से फैला है। लेकिन पंचायत में जिस तरह से ब्लाक समति का चुनाव और जिला पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव और नगरपालिका के जो चुनाव हो रहे हैं, वे अब किसी राजनैतिक सिद्धान्त के आधार पर नहीं हो रहे हैं कि जिसने मेहनत की, जनता की सेवा की, वह अब पंचायत का प्रधान नहीं हो सकता है, यह बात सही है। इसीलिए हम चाहते हैं कि ब्लाक प्रमुख का चुनाव जनता द्वारा हो और जिला पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव जनता के द्वारा हो, तब तो यह पंचायती राज चल पायेगा, नहीं तो पंचायती राजनैतिक या जो अच्छी जनसेवा की भावना वाले लोग हैं, कभी-कभी जो गरीब मजदूर या मामूली ईमानदार कोई खड़ा हो जाता था तो उसके सामने अच्छे-अच्छे धराशायी हो जाते थे, वह पहले पंचायतों में होता था, लेकिन अब वह वातावरण नहीं है। अब वातावरण इतनी तेजी के साथ बदला है, इसलिए अगर आपने यहां पर समीक्षा के लिए बहस करवाई है तो मैं समझता हूं कि इसकी उपयोगिता, इसका महत्व तभी होगा, जब आप संविधान के अन्दर संशोधन करेंगे।
मेरे और भी सुझाव हैं, मैंने आपकी बात नहीं सुनी, लेकिन आपने क्या-क्या बोला है, मैंने पता लगा लिया। अन्य साथी भी बहुत अच्छा बोले हैं। हम तो केवल एक ही सुझाव देना चाहते हैं कि ब्लाक प्रमुख का चुनाव और जिला पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव अब सीधे जनता द्वारा होना चाहिए। अब चूंकि छोटे-छोटे जिले बनते चले जा रहे हैं, कानपुर जिला इतना बड़ा है कि उसमें २१-२२ मैम्बर हैं, उसके अब तीन जिले बन गये हैं। तीन जिले बनाकर आपने देख लिया है कि क्या रेट था, एक जिला पंचायत के मैम्बर का पांच-पांच लाख रुपये तक रेट पहुंचा था, पांच लाख रुपये तो मामूली रेट था, यह हमने और आपने देख लिया। हमारा केंडीडेट भी जीता है, लेकिन कैसे जीता है, वह गरीब आदमी था, कैसे लोगों ने चन्दा किया, कैसे जिला पंचायत खरीदी है, अब यह हालत हो गई है कि उन चुनावों में से एम.एल.ए. एम.पी. हटा दिये, मैंने अय्यर साहब से यही आपत्ति की थी कि जब एम.एल.ए. एम.पी. रहता था तो जिला परिषद की गरिमा रहती थी। हमने वह दिन भी देखे हैं कि जब जिला परिषद कहलाती थी और जिला परिषद की मीटिंग होती थी तो उसकी कचहरी में चर्चा होती थी, क्योंकि सारे एम.एल.ए. और एम.पी. इकट्ठे होते थे और मीटिंग में जाते थे, उन्हें आपने हटा दिया। पहलेब्लाक की मीटिंग में एम.एल.ए. मैम्बर होता था, एम.पी. पदेन मैम्बर होता था। उनको भी हटा दिया। अब ब्लाक प्रमुख का कोई महत्व ही नहीं रहा। उस समय एम.एल.ए. उसमें इसलिए रूचि लेता था कि जनता मिलेगी। लोक सभा का सदस्य भी इसलिए रूचि लेता था कि वह वहां जाकर जनता से मिलेगा। हमारी पार्टी छोटी है लेकिन मैं जानता हूं और मैंने देखा है कि ब्लाक प्रमुख का किस तरह से महत्व होता था, किस तरह से गरिमा होती थी। किस तरह से जिला पंचायत के अध्यक्ष का महत्व होता था। जब एम.एल.ए., एम.पी. उसके सदस्य होते थे तब वह उसकी अध्यक्षता करते थे। एम.एल.ए., एम.पी. अध्यक्ष से अनुमति मांगकर बोलते थे। उसका यहां तक महत्व था कि एम.एल.ए., एम.पी. बनना स्वीकार नहीं करते थे। वे जिला पंचायत का प्रमुख बनना स्वीकार करते थे। मैंने ऐसे बहुत से व्यक्ति कांग्रेस के टाइम में देखे हैं। उस समय ऐसे ईमानदार लोग थे जिनका आज भी नाम लिया जाता है। हमारे जनपद इटावा में एक ऐसा ही आदर्श स्थापित किया था ठाकुर अकबर सिंह ने जो कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह बहुत गरीब घर के थे। आज भी उनकी संतान वहां रहती है। आप उनका मकान देखेंगे तो कहेंगे कि क्या यह जिला पंचायत के अध्यक्ष का घर है ? वह जब तक जिंदा रहे तब तक लगातार जिला पंचायत के प्रमुख रहे। वे कभी भी एम.एल.ए. या एम.पी.की टिकट नहीं मांगते थे। वे जिला पंचायत में ही रहना पसंद करते थे। इसी तरह हमारी बगल में एक एम.पी. जिनका नाम चौधरी सूरज सिंह है, वह भी जिला पंचायत में ही रहना पसंद करते थे। उन्होंने भी कभी टिकट नहीं मांगी। उस समय यह उसका महत्व था।
१७.३२ ण्द्ध ( ग्द्ध. च्द्रड्ढठ्ठड्ढद्ध त्दण्ड्ढ ण्ठ्ठत्द्ध) हम इस आधार पर खुशी मना सकते हैं कि इससे कमजोर लोगों को पंचायत में आने का मौका मिलेगा। महिलाओं को भी इसमें आने का मौका मिला। यह बहुत अच्छी बात है लेकिन आगे आने वाले दिनों में अब कोई पद ऐसा नहीं बचेगा, कोई जिला पंचायत का अध्यक्ष ऐसा नहीं होगा जिसके पास पैसा और हथियार नहीं होगा। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि यह बहस सार्थक हो तो हम प्रार्थना करेंगे कि मंत्री जी इस पर गंभीरता से विचार करें। हम आपकी मदद के लिए प्रधान मंत्री जी से भी मिलेंगे। वह बातों-बातों में सहमत थे लेकिन पता नहीं अब वह हाउस में क्या कहें। मैं जानता हूं कि इस हाउस के बहुत से सांसद भी इस बात के लिए तैयार हो जायेंगे कि जिला पंचायत और ब्लाक प्रमुख का चुनाव जनता द्वारा सीधे हो। अगर अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होगा तो कोई भी गरीब और कमजोर आदमी नहीं आ सकेगा। लोकतंत्रीय व्यवस्था में पंचायती राज का जो मकसद था, जो लक्ष्य था, जो भावना थी, जो उद्देश्य था, वह कामयाब नहीं हो सकता। इसलिए मैं एक ही सुझाव देना चाहता हूं कि आप यह एक काम कर दीजिए। आप संसाधन कितने देंगे, यह बाद की बात है। मैं आज कहना चाहता हूं कि अगर ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता द्वारा कर दिया जाये तो आपका पंचायती राज सार्थक हो जायेगा। यह मेरी राय है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI M. MASTER MATHAN (NILGIRIS): Sir, all the clocks in the House are not showing the correct timings. They should be repaired immediately. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: Yes. Now, Shri A. Krishnaswamy will speak.
Before I call him, I want to make it clear to the House that today all the Members, who have given their names, will speak on the present Motion, and the reply by the hon. Minister to the Motion will be tomorrow. So, at 2 o’ clock tomorrow, the hon. Minister will reply to the debate. So, I request the Members to be brief, to speak for five minutes so that we can conclude the debate today.
SHRI A. KRISHNASWAMY (SRIPERUMBUDUR): Mr. Speaker Sir, I thank you very much for giving me an opportunity to participate in the discussion on Panchayati Raj Institutions.
It is one of the good systems in India. It has given powers to the villages. Women and dalits have been given powers to execute and develop their villages. It is our experience that villages have been developed through these institutions.
In 1996 when the DMK was in Government, we conducted a fair election. We have given chances to 33 per cent of women and dalits. In this way, we have given good governance in 1996.
But most of the women who have been elected as Village Presidents and other councillors without any experience, faced many difficulties. In the same way, The Dalits who were elected have been dominated by the people of upper castes. Therefore, without building up any type of courage among the Dalits and without any training to the women, they are not able to execute and discharge their powers. I would, therefore, request this august House that there should be some training programme to be given for the women in the local body authorities and some help to be given to the Dalits for building up courage.
When hon. Member Shrimati Margaret Alva spoke, she noted that in four villages of Tamil Nadu, election was not conducted or election was not allowed to be held. I would like to mention that in two villages, Paparapatti and Keeripatti, the Dalits were not allowed by the upper caste people even to file the nominations and even if it was allowed to be filed, the nominations were withdrawn. Once the Dalits were elected, they resigned because of the threats given by the upper caste people. I want to know from the Ministry as to what steps they are going to take in this regard and what law they are going to make to prevent such types of threats from the upper caste people to the Dalits.
This Panchayat Raj institution is a three-tier system and because of this three-tier system our experience has been that there was huge confusion in the villages. When the Member of Parliament makes allotment of some money for a village, particularly for a community centre, the village President is not able to inaugurate the community centre. The Chairman of that Block dominates and he is not permitting the village President to inaugurate the community centre. The village President is very much interested in inviting the Member of Parliament or the MLA. But the Councillors and the Chairman are not permitting the village President to inaugurate the community centre. My request to the hon. Minister is that the village Presidents should be given more powers to inaugurate any buildings in that local area. Then only it will be easier. The benefits of the community centres go to the villages. But the Chairman and the Councillors, as they belong to other Parties, are not giving permission to the village President to inaugurate the buildings. This may be noted down and action taken.
I want to mention about the SGRY scheme. In all the villages, the village Presidents are not able to do the selection of work for ‘food-for-work’ scheme. This selection is done by the Block Development Officer and the Block’s Union Chairman. In this process the village Presidents suffer a lot. They are not given powers to select the works. Their requests are denied. In this connection, my request to the hon. Minister is that in regard to selection of works for the schemes under SGRY the village President should be given equal powers. Also, in regard to the Nagarpalikas or the municipalities, the Councillors are also to be given equal powers because today the Chairmen dominate the Councillors. The Chairman does what he thinks and he is not hearing the views and requests of the Councillors.
I submit that because of this three-tier system, the administration is not good in the villages. I, therefore, request the hon. Minister to kindly make an amendment to it as a two-tier system with the village President and the Union Chairman. The Union Chairman should be directly elected by the people or by the village Presidents. That will be enough. Having these district Chairmen and Union Councillors is not necessary as they do not have any work and they are just wasting the money and time of the Government and creating confusion. The village President and the Union Chairman are enough to execute the work properly and to spend the money of the Government. I would also request the Union Government to send money directly to the village President and not through State or district administration. They should also have a special and separate agency to distribute money to village President. That is my request.
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : अध्यक्ष महोदय, जो पंचायती राज का सिस्टम है, इस सिस्टम को राजीव गांधी जी जब प्रधान मंत्री थे, तब वह लेकर आए और उन्होंने यह स्टडी की थी कि भारत जैसे देश में अगर गांव मजबूत रहेंगे तो देश मजबूत रहेगा और गांवों की पंचायतों को और नगर पालिकाओं को ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए। इसीलिए हम लोगों ने पंचायती राज सिस्टम को स्वीकार कर लिया लेकिन इतने सालों का अनुभव है और उसे देखते हुए मैं यह भी कहूंगा कि राजीव गांधी जी ने यह भी बताया था कि जो पैसा मंजूर करते हैं, वह गांवों तक नहीं जाता है और गांवों का विकास नहीं होगा तो देश का विकास भी नहीं होगा, इसलिए पंचायत को ज्यादा अधिकार देने चाहिए। लेकिन खाली अधिकार देने से और पैसा नहीं देने से गांव का भला नहीं होने वाला है। गांवों को ज्यादा से ज्यादा पैसा किस तरह से मिल सकता है, इसके बारे में भी सरकार को विचार करने की आवश्यकता है। सर्व श्री काशीराम राणा जी जो मंत्री हैं, उनसे भी हमारा निवेदन है और अटल जी से भी निवेदन है कि गांव की अगर प्रगति करनी है तो गांवों में कैबिनेट बनाने की आवश्यकता है। जिस तरह से स्टेट का चीफ मनिस्टर होता है, उसी तरह से गांवों का चीफ मनिस्टर होना चाहिए और उनका भी कैबिनेट ६-७ लोगों का होना चाहिए ताकि हर विभाग का पैसा उसी मंत्री के पास ही जाएगा और गांव में अगर मंत्रिमंडल हो जाता है तो उनको राज करने का अनुभव हो जाता है।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : एक स्पीकर भी होना चाहिए।
…( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले : स्पीकर साहब का जो सुझाव है, यह कैबिनेट काम करने के लिए होगा लेकिन जब मीटिंग होगी तो स्पीकर की आवश्यकता होगी। इसलिए गांव का राज चलाना है तो अध्यक्ष की आवश्यकता है। इसी तरह दूसरे सिस्टम के बारे में भी विचार करने की आवश्यकता है।
गांव की जो दलित बस्ती होती है, उसकी हालत बहुत बुरी है। अपने देश में बिजली का निर्माण हम कर रहे हैं लेकिन सभी गांवों तक बिजली नहीं पहुंच पा रही है। गांवों में बिजली है लेकिन २-३ दिन तक बिजली नहीं होती है और दलित बस्ती की हालत ऐसी होती है कि वहां बिजली के पोल तो होते हैं लेकिन बिजली नहीं होती है। हमने देखा है कि मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता, मद्रास, हैदराबाद, बैंगलोर, लखनऊ और बनारस जैसे जो शहर हैं, वहां जो स्लम्स होती हैं, उनमें गैर-कानूनी लोग रहते हैं और इसी मुद्दे पर उनको लाइट नहीं दी जाती तथा वे अंधेरे में रहते हैं। गांव-गांव में यह स्थिति है। इसीलिए हमारा कहना है कि गांवों का विकास होना चाहिए।
गांवों में महिलाओं की स्थिति भी बड़ी दयनीय है। महिलाओं के लिए अभी तक शौचालयों की व्यवस्था भी हम नहीं कर सके हैं। महिलाओं के लिए शौचालयों की व्यवस्था भी होनी चाहिए। गांवों में पीने के पानी की भी समस्या है। गांवों में पाइपलाइन की योजना है लेकिन पानी नहीं आता है। वहां पाइपलाइन है लेकिन पानी नहीं है। वहां पीने के पानी की आज भी बड़ी भारी समस्या है। मैं गर्व से कहना चाहता हूं कि चन्द्रगुप्त कार्यकाल में भारत देश इतना बड़ा था कि यहां सोने का धुंआ निकलता था। पर-कैपिटा-इन्कम पूरी दुनिया से ज्यादा थी।
चाहे अमेरिका हो, इंग्लैंड हो, पुर्तगाल हो या डच हो, यह सब लोग हमारे देश में व्यापार करने आए, क्योंकि यहां सोना था और खनिज था। लेकिन आज हम दुनिया में बहुत पीछे हो गए हैं। इसका क्या कारण है, इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। देश में गरीबी बढ़ती जा रही है, असमानता बढ़ती जा रही है। इसको खत्म करने के लिए हम सब लोगों को प्रयत्न करने की आवश्यकता है। हम सरकार से जानना चाहते हैं कि गांव के लोगों को कब पानी मिलेगा,अटल जी की सरकार जाएगी, क्या तब मिलेगा। लोगों को पानी देने के लिए सरकार को प्रयत्न करना चाहिए। मैं इस प्रस्ताव का समर्थन करता हूं और उम्मीद करता हूं कि गांव के लोगों को न्याय दिलाने के लिए उनके लिए सरकार योजना बनाकर उस पर अमल करेगी। अगर आप ठीक से काम करेंगे तो आप आगे भी टिक सकेंगे। अगर नहीं करेंगे तो हमें आगे आना होगा। इसलिए करोड़ों लोगों को न्याय देने की आवश्यकता है। आज आप उधर हैं और हम इधर हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा आ सकता है कि हम उधर हों और आप इधर हों। इसलिए अच्छा काम आप करेंगे तो हम आपका समर्थन करेंगे। अगर नहीं करेंगे तो हम आपका विरोध करेंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Mr. Speaker Sir, thank you very much for giving me this opportunity to place my views on behalf of my party, All India Anna DMK and also on behalf of my leader the hon. Chief Minister of Tamil Nadu.
Sir, I congratulate the hon. Minister for bringing in this very important Motion. Of course, it is very late to discuss; debate; and evaluate as to what we have achieved in the last 10 years. Sir, my suggestion would be that evaluation should have been done, if not every year, at least, in the middle of the term or at least it should have been audited once in five years, and according to the achievement, the financial assistance should have been given.
Sir, the 11th Finance Commission recommended Rs. 1,600 crore per annum for the local bodies, out of which the total grant of Rs. 197.06 crore was earmarked for the development of database on the finance of the Panchayat. It also included an amount of Rs. 98.61 crore for maintenance of accounts of Panchayats as the first charge on this grant.
Sir, what I would like to know from the hon. Minister is this. How much cost benefit ratio we have achieved after having allocated so much money; after having spent so much money only for database collection; for preparing the papers; and for maintaining the account, leave alone the achievement at the grassroots’ level?
Secondly, the Commission recommended that audit of accounts of the local bodies should be entrusted to the Comptroller and Auditor General (C&AG). Was it done? Is the Audit Report being placed on the Table of the House? If it was not done before, at least, now after 10 years will the hon. Minister come out with a White Paper on the achievement ofPanchayati Raj institution? What does the Audit Report say; and what is the achievement? How can we improve the Panchayat Raj institution? We should try and understand as to where we are going wrong, so that we will be able to correct it, at least from now onwards. This should be done in order to see that the fruits of the Panchayati Raj institution reach at least everyone.
Sir, we are proud to say that there are 30 lakh elected representatives as a result of the Panchayati Raj (Seventy-third and Seventy-fourth) Amendments. Of course, ten lakhs of them are women. I have no hesitation in saying that there is social, political and economic empowerment of about 20 lakh women, especially in my State. Through the self-help groups and along with the elected lady representatives, we have created awareness.
Apart from the funds allocated for the training programme by the Government of India, the State Government had taken special interest to train the elected representatives, especially the lady representatives, to create awareness and also to understand the schemes of the Government of India as well as of the State Government so that they will be able to understand the schemes, that is, how soon they can get the schemes, how the benefits can reach the people at the grass-root level, how it can be audited and how it can be brought to the notice of the higher authorities.
I would like to bring to the notice of the hon. Minister that the funds allocated for the training programme are very meagre. We should understand the lacunae. Before we implement a scheme, we should give wide publicity about the scheme. Before doing the budget allocation, we have to see as to how the fruits of the particular scheme will be reaching the people at the grass-root level.
According to the Constitution, the Panchayats will be given powers and authority to function as an institution of self-government. The powers and the responsibilities to be delegated to the Panchayats at the appropriate level are as follows: Preparation of plan for economic development and social justice; Implementation of the schemes for economic development and social justice in relation to 29 subjects mentioned in the Eleventh Schedule of the Constitution of India; and To levy, collect, appropriate taxes, dues, and toll fees.Did we ever have the intention on the above subjects? Have we got any paper that can be placed on the floor of the House so that we, as Members of Parliament, are able to contribute our experiences and share our ideas so that the fruits of the Panchayati Raj reach the people? We, the Members of Parliament, would request the hon. Minister, at least, from now onwards, to place before the House a paper on this. Ten years have passed, but we have not taken stock of what we are doing and whether what we have done is satisfying the needs of the people. We are yet to assess this.
Under the Panchayats Act, 1996 there is a provision that extends Panchayats to tribal areas of Andhra Pradesh, Chhattisgarh, Gujarat, Himachal Pradesh, Jharkhand, Maharashtra, Madhya Pradesh, Orissa and Rajasthan. It was implemented on 24th of December, 1996. All the States have passed laws to give effect to the provision contained in this Act. It is now more than five years. You can, at least, concentrate on these tribal areas. They will form the basis to find out whether we can contribute more so that the tribal people will get the benefit. Now, five years have passed. Maybe, in all the States, the next elections are due. Before the next elections, especially in the tribal areas, we should have an idea as to whether the tribal people need more training, more budget allotment and so on and so forth.
We had a conference on the 5th and 6th of April, 2002 of the elective representatives of all Panchayati Raj institutions in the country. What was the declaration that was made in that conference? Was that declaration fulfilled? That declaration says:
"… unanimously resolve to urge the Government of India to quickly initiate the process of bringing an appropriate amendment to the Constitution to bring about speedy and effective devolution of financial and administrative powers to the PRI."
More than one and a half years have passed since that declaration was passed in that Conference. Has the Government of India moved in that direction at all? I would like to have a concrete reply to this question from the hon. Minister.
A critical evaluation of the budget and the elected representatives of the Punchayati Raj institutions of all stages is necessary. Funds are being released to them. Has the Government ever audited the works they are selecting, the cost benefit ratio, etc? If these things have not been audited so far, at least from now onwards we have to have a proper system of auditing. There are lacunae in the monitoring system. I would say that auditing should be done through independent agencies. They should be under the direct control of the State and Central Governments. I would even welcome the idea of bringing Panchayati Raj system into the Concurrent List.
With these words, I conclude.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): Mr. Speaker, Sir, at the outset I must congratulate the Minister for having taken the initiative of moving this motion. It is a good step.
After the passing of 74th and 75th Constitution Amendments, Panchayati Raj institution has become a reality. Personally speaking, I am very much connected with Panchayati Raj. I was elected as Panchayat President in July, 1953 - exactly half a century ago - when I was only 26 or 27 years old. Throughout my life extending over half a century, I worked for decentralisation of power, bringing power to the man in the street. As a legislator and Member of Parliament, throughout my life my attempt has been to bring power to the common man who is in the street. He must realise the day to day administration. For that purpose, many things have been done in my home State.
In the last administration by the LDF Government, they have gone a step further in this direction. It was during that regime that we adopted the people’s plan. It was criticised. The People’s Campaign is the most important thing which I would like to focus on before this House. It has been written in the editorial of The Hindu of yesterday, 23rd July, 2003, as follows:
"… But considering the scale of transformation in the governance that was attempted, these shortcomings were no more than part of a learning process. They must not be exploited to do the Panchayati Raj in. Perhaps the biggest irony is that earlier this month even as a relentless attack was launched on the People’s Campaign, decentralisation in the State received international notice. In 2003, in the Human Development Report of the United Nations Development Programme, the Kerala experiment was praised for its involvement of citizens and for its contribution to a city."
This is the certificate given by the United Nations Development Programme.
18.00 hrs. They have applauded the Kerala model. They have said that the common man’s involvement in the people’s plan has become a reality in Kerala. I have made this reference for the simple reason that some allegation is made against them.
Now, about the Kerala plan, I will explain in a few words, as to what is being attempted. Thirty-five per cent of the total amount will be distributed among the Panchayats directly for implementation. The process of implementation is through Gram Sabha. The entire village community will be assembled. They will discuss as to what developmental works would be executed and in what manner they would be implemented. All these things would be discussed threadbare in the Gram Sabha. Priority is fixed. The amount is given to them. The beneficiaries have selected the Gram Sabha, and the people’s involvement has become a reality. That is why the United Nations has also applauded the scheme. No other State in India could do it. I am proud of my State.
But, Sir, unfortunately, the present Government mistook the idea. The UDF Government is there. Yet, there are some political forces in Kerala opposed to devolution of powers to the local bodies and they are ready to use any stick to beat the Panchayati Raj. The ruling Democratic Front has always been less than enthusiastic about its support for the people’s plan. It is less than forthcoming in defence of decentralisation.
Sir, there were some allegations that a foreign agency is involved in this process, and so, the Panchayat Minister had to reply in the Assembly that there was no foreign agency involvement, that there was no foreign investment made in the implementation of the people’s plan. The Panchayat Minister of Kerala, day before yesterday, had to admit on the floor of the Assembly that there was no foreign agency involved in the implementation of the plan. So, all these allegations, all these propaganda had gone to the wind. Now, the people’s plan is highlighted throughout the world through the agencies of the United Nations.
In this respect, Sir, I would like to mention one or two points. We have decentralised the departmental process. About the primary schools and high schools, the administration is given to the local bodies.
MR. SPEAKER: Your time is over now. Please conclude.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Sir, I am just concluding.
In the case of primary health centres and taluk headquarters hospitals also, their administrative control is given to the local bodies.
SHRI K. YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Radhakrishnanji, in one sentence you can say that Kerala Panchayat Raj system is applauded everywhere. That would be sufficient…(Interruptions)
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Sir, in the social reforms also decentralisation has taken place. But unfortunately, it is the bureaucracy that curtails it. They have taken away all these things. Thirty-five per cent of the money that was allotted to the Panchayats was given at the last hour, that is, in the month of March only. Now, they say that they want to recover the amount as it has not been spent. If the money had been allotted in March only, how could it be spent? But they have taken a stand that ‘you did not spend the money, and so, we are taking it back.’ So, there is a peculiar situation in Kerala.
Sir, I would like to remind my friends on that side with due respect that I always respect Rajiv Gandhi for taking the initiative on Panchayati Raj system. But the persons who are claiming to be the followers of Rajiv Gandhi are doing just the opposite things. … (Interruptions) If Rajiv Gandhi was alive, these people would not have been in the Congress… (Interruptions) They are doing just the opposite to the stand taken by the late Rajiv Gandhi, whom I respect in all these matters. I pay respect to him but unfortunately, the people who are governing Kerala have forgotten about Rajiv Gandhi and they are thinking about many other things. To them, decentralisation is not material.
They want a bureaucratic form of Government. Until and unless the power is decentralised, and the poor man in the street feels that he has a part to play in the governance of the country, we cannot claim to be a democratic country. So, I strongly plead with the Minister for bringing in a legislation to make it imperative that the powers be decentralised.
MR. SPEAKER: Shri Varkala Radhakrishnan, please sit down, your time is over.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Power should be decentralised in the administration of almost all the departments, that is, Public Health, Education, Social Developmental Plans, the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. The issue of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes has also been taken away. All these social reforms should be left over to thePanchayats. Let the people decide. There must be transparency in the administration.
MR. SPEAKER: Please sit down. Your time is over.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : That is why I say that the new legislation would lead to transparency in the entire country. All these delays will be avoided; corruption will be avoided.
With these words, I support the Bill. I thank you for giving me this opportunity for speaking about the people of Kerala.
… (Interruptions)
SHRI SONTOSH MOHAN DEV (SILCHAR): What is the time now, Sir? The clocks have stopped.
MR. SPEAKER: I am getting the time corrected. The exact time is 6.05 p.m. I am extending the time of discussion.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: I am extending the time by two hours. The debate has to be completed by 8 o’clock.
… (Interruptions)
अध्यक्ष महोदय : आपका चुनाव चिन्ह घड़ी था, इसीलिये ऐसा हो रहा है। यह घड़ी, जिनका चुनाव चिन्ह था, वे एक भूमिका पर कायम नहीं रह सकते, बदलते रहते हैं।
श्री मधुसूदन मिस्त्री : अध्यक्ष जी, यह घड़ी आने वाले टाइम की सूचक है॥ श्री मधुसूदन मिस्त्री (साबरकांठा): अध्यक्ष जी, मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि मुझे आपने अपने व्युज़ रखने का मौका दिया। माननीय मंत्री जी पंचायती राज के बारे में जो मोशन लेकर आये हैं, उसके प्रति मैं अपनी शुभकामनायें व्यक्त करता हूं।
अध्यक्ष जी, सब से पहले स्व. राजीव जी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं क्योंकि पंचायती राज के अंदर जो चुने हुये लोग काम करते हैं, उनके लिये मैंने न जाने कितने ट्रेनिंग प्रोग्राम किये हैं। जब भी मैं पंचायतों के अंदर चुनी हुई महिलाओं को देखता हूं तो मुझे गर्व होता है। इससे पहले पंचायतों में कभी हजारों की संख्या में महिलायें नहीं चुनी जाती थीं। हालांकि वे कई गलतियां करती हैं लेकिन जैसे-जैसे उन्हें मौका मिलेगा, वैसे वैसे पंचायती राज में और सुधार होता जायेगा। दूसरा डिसीजन मेकिंग प्रोसैस में आज लाखों लोगों को इनवाल्व करना इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
इसके साथ मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मैंने हमेशा देखा है कि पंचायती राज के बारे में हम कितनी अच्छी राय व्यक्त करें, जिस प्रकार से उन्हें चलना चाहिये, वैसा नहीं चल रहा हैं। मैंने अपने राज्य गुजरात में विशेषकर देखा है कि यदि राज्य में एक पार्टी की सरकार है और पंचायतों में दूसरी पार्टी पावर में है, वहां पंचायत के अध्यक्षों और सदस्यों के प्रति अलग टैक्नीक अपनायी जाती है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उन्हें पैसा कम देते हैं, देर से जाता है या कम दिया जाता है और कितनी जगहों पर दिया ही नहीं जाता है। इतना ही नहीं, परिस्थिति किस हद तक पहुंच जाती है। हमारे यहां प्रभारी मंत्री के रूप में एक सिस्टम अपनाया गया है ।यानी हर जिले में एक कैबिनेट मनिस्टर है।The Cabinet Minister is put in charge of a district. I do not know under what law it is being done. उन्हें इंचार्ज बनाया जाता है। He presides over the District Planning Board. इसकी वजह से क्या होता है कि प्रधान के रहते हुए सब निर्णय वह खुद करता है, प्रधान एक तरफ बैठा रहता है और इसका सीधा रिफ्लैक्शऩ जब एनुअल प्लान पर होता है, डिस्टि्रक्ट प्लानिंग बोर्ड अपने आपमें योजनाएं जब तय करने बैठता है तो राज्यों की जो योजनाएं हैं, उनमें कितना पैसा दिया गया, उसकी एक लिस्ट उसे भेजी जाती है। प्रभारी मंत्री उसके साथ में आता है और जो डिस्टि्रक्ट प्लानिंग बोर्ड में चुने हुए मैम्बर्स होते हैं, उन्हें सिर्फ स्टाम्प मारकर वापिस देना पड़ता है यानी वास्तव में डिस्टि्रक्ट प्लानिंग बोर्ड का डिस्टि्रक्ट में या तहसील में जो रोल होना चाहिए, वह नहीं होता, जिसकी वजह से एनुअल प्लान के मुताबिक राज्य सरकार उसे डायरेक्ट करके वहां से भेजती है और उसके ऊपर उन्हें सिर्फ स्टाम्प मारनी होती है।…( व्यवधान) You may disagree. … (Interruptions) Sir, I am not yielding. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: He is not yielding. Please sit down.
… (Interruptions)
SHRI MADHUSUDAN MISTRY : All the district panchayats are being ruled by the Congress and at the State level, we have the BJP Government, which is trying to make each district panchayat ineffective in one way or the other. The best examples are the purchases; that is, purchases which should be done by the district panchayats are being done by the State officials. What they do is simply this. सिम्पली पंचायत में पैसे का खर्च उसमें डाला जाता है, पंचायत के प्रेसीडेन्ट उसे बॉडी में रखते हैं और खर्च पर सिगनेचर करते हैं। सारी खरीददारी स्टेट के ऑफिसर्स की ओर से की जाती है। मंत्री जी मैं आपको सुझाव दे रहा हूं कि ज्यादातर सभी पंचायतों में पैसे की बहुत तकलीफ होती है। कितने राज्यों ने स्टेट फाइनैन्स कमीशन अपाइंट किये थे। कितने राज्यों मे स्टेट फाइनैन्स कमीशऩ की रिपोर्ट भी आई हुई है। लेकिन मुझे मालूम नहीं है कि किसी सरकार ने उसे स्वीकार किया है या नहीं। It is an irony that the State is fighting with the Union Finance Commission for devolving more resources to them; and the situation is the other way round in their own cases – they are not ready to devolve more resources to district panchayats. स्टेट फाइनैन्स कमीशन ने सभी जगह हमारे यहां गुजरात में भी कहा है कि जैसे एंटरटेनमैन्ट टैक्स, केबल टैक्स, लैन्ड रेवेन्यू टैक्स, टैक्सेज ऑफ स्टाम्प एंड रजिस्ट्रेशन आदि के पैसे डिस्टि्रक्ट में जाने चाहिए और डिस्टि्रक्ट में उसका हिस्सा होना चाहिए, लेकिन कोई स्टेट इन टैक्सेज को डिवोल्व नहीं करना चाहती। इतना ही नहीं जो म्युनसिपल कार्पोरेशंस हैं, पंचायते हैं, उन्हें पहले ऑक्ट्रॉय की इन्कम थी, उस ऑक्ट्रॉय की इन्कम को भी स्टेट ने अबॉलिश कर दिया है। स्टेट की तरफ से जो पैसा पंचायतों को…( व्यवधान)मैं कोई लैक्चर नहीं दे रहा हूं, मैं मंत्री को सुझाव दे रहा हूं। मैं कहना चाहता हूं कि इस आय को सुद्ृढ़ बनाना चाहिए और जो ऑक्ट्रॉय को अबालिश किया गया है, उसके बजाय राज्य को हर साल रेगुलर पैसा पंचायतों और म्युनसिपल कार्पोरेशंस को मिलता जाए, ऐसा प्रावधान करना चाहिए। स्टेट फाइनैन्स कमीशन के लिए यूनियन के जो डिसीजंस है वे मैनडेटरी हैं और केन्द्र सरकार को पैसा राज्यों को देना पड़ता है। इसी तरह से स्टेट फाइनैन्स कमीशऩ की रिपोर्ट जो भी कहे, अगर वह उसके मुताबिक है तो डिस्टि्रक्ट को पैसा देना चाहिए। Not only that, but also certain taxes should be transferred to the districts through which they can raise money. उनका खुद का ओन फंड है, उसे खर्च करने के लिए भी स्टेट की मंजूरी चाहिए। ऐसा जो प्रावधान है, वह प्रावधान उसमें रद्द कर देना चाहिए।
मेरा एक सुझाव यह है कि इसके साथ-साथ उसे जो काम दिये गये हैं, उन कामों के खर्च का पैसा उन्हें पहले मिलना चाहिए, जैसे हर तीन-चार महीने के बाद उसकी इंस्टालमैन्ट मिलनी चाहिए। लेकिन वह पैसा पंचायतों को नहीं जाता है, साल के आखिर में वह पैसा उसके पास जाता है।
प्रभारी मंत्री उसमें से निकाल देना चाहिए। पंचायतों में एक चीज़ देखी गई है कि पंचायतों को ऑटोनॉमस यूनिट की तरह से नहीं देखा जाता। हम खुद देखते हैं कि पंचायतें खुद उनके कॉमन प्रापर्टी रिसोर्स किस तरह से यूज़ करती है। सिंचाई का पानी, हर गांव में पीने के पानी की व्यवस्था, पर्यावरण की व्यवस्था जो होनी चाहिए, उनकी जो पोज़ीशन खुद की पॉलिसी और प्लानिंग होनी चाहिए, वह देखी नहीं गई है और प्लानिंग बोर्ड में प्लानिंग की पूरी प्रक्रिया जो अभी चल रही है, खासकर गुजरात के बारे में मैं कह सकता हूँ कि प्लानिंग की पूरी प्रोसेस में जिलों से प्लानिंग बाहर आनी चाहिए और उसके मुताबिक राज्य सरकारों द्वारा उनको रिसोर्सेज़ एलोकेट करने चाहिए। इस प्रकार का विज़न डैवलप होता दिखाई नहीं दिया। इलैक्टेड रिप्रेजेन्टेटिव्स में जो ज्यादा से ज्यादा चीज देहातों में देखने में आई है, वह यह है कि पंचायत के खुद की पावर्स और कानून के मुताबिक खुद की ट्रेनिंग होनी चाहिए।I do not know why the Ministry of Rural Development has not taken up a massive programme for training the elected representatives. उनको पंचायतें किस तरह से चलानी चाहिए और पंचायतों के खुद के क्या क्या अधिकार हैं, ये सब बातें बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाते हुए, पूरे देश में करनी चाहिए।
मेरा तीसरा सुझाव यह है कि जिला पंचायतें, तालुका पंचायतें तथा ग्राम पंचायतों के जो अधिकारी हैं, They should not have powers over the elected representatives.आज स्थिति यह है कि डीडीओ तहसील के प्रेजीडेन्ट के पास न जाए उसकी बात न माने, उसके पास सबसे ज्यादा पावर्स हैं। डीआरडीए के गवर्निंग बोर्ड में चेयरमैन डीडीओ हो और एम.पी. और अन्य लोग उसके सदस्य हों और वही उसमें निर्णय लेता हो तो इस व्यवस्था में सुधार लाना चाहिए और पंचायत को खासकर वित्तीय मामले में और अधिकार देने चाहिए।
अंतिम बात मैं म्युनसिपल कार्पोरेशन्स के बारे में कहना चाहता हूँ। मैंने तीन-चार म्युनसिपल कार्पोरेशन्स के फाइनेन्स और अकाउंट्स की स्टडी की है। उसमें देखा है कि हमारे यहां डिस्टि्रक्ट पंचायत को सीएजी ने जो कोडिंग सिस्टम दिया है, यानी हर सैक्टर को अलग अलग कोड दिये हैं, सब मेजर हैड हैं, माइनर हैड नहीं है और उसके बाद डीटेल्ड हैड्ज़ हैं और उसी के हिसाब से अकाउंट तैयार किया जाता है। डिस्टि्रक्ट पंचायत में भी उसी अकाउंटिंग सिस्टम से पैसा जाता है। लेकिन होता यह है कि स्टेट से जो ग्रांट डिस्टि्रक्ट में जाती है, वह एक लंप-सम अमाउंट में उनके पास आती है, डिस्टि्रक्ट में उसका डीटेल्ड हैड नहीं होता है कि सैलेरीज़ में और दूसरी एक्टिविटीज़ में कितना पैसा खर्च हुआ, ये सब चीजें डिस्टि्रक्ट में नहीं मिलती हैं और वह पब्लिश भी नहीं होती हैं। इसलिए अकाउंटिंग सिस्टम में फर्क आना चाहिए और उसको इंप्लीमेंट करवाना चाहिए।
हमारे यहां हर पंचायतों में यूनिफाइड अकाउंटिंग सिस्टम होता है। उस तरह की व्यवस्था मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई म्युनसिपल कार्पोरेशन्स के लिए नहीं है। फाइनल सुझाव यह है कि अकाउंटिंग सिस्टम में लोगों को पता नहीं चलता है कि किस पंचायत ने कितने पैसे औरतों पर खर्च किये, कितने पैसे बच्चों पर खर्च किये। दलितों और ट्राइबल्स के लिए यह information स्टेट में मिलता है लेकिन पंचायत में नहीं मिलता है। इसके लिए ग्रामीण विकास मंत्री से मैं कहूँगा कि आप अपने विभाग की ओर से सीएजी को दर्खास्त करें कि जो कौमन हैड्ज हैं जैसे ७९४ ट्राइबल्स के लिए और ७९३ स्पेशल कंपोनेन्ट प्लान में दलितों के लिए है, उसी प्रकार से देश में जितना पैसा औरतों के लिए खर्च होता है, उसके लिए स्पेशल हैड बनाया जाए जिससे सब पैसा उस हैड में अकाउंट हो और पता चले कि इस देश में कौन सी योजना में कितने पैसे औरतों और बच्चों पर खर्च होते हैं। ये थोड़े सुझाव हैं और मैं आशा करता हूँ कि पंचायती राज को और भी ज्यादा सुद्ृढ़ करने के लिए आप इन सब सुझावों को कंसिडर करेंगे और उन पर अमल करेंगे।
SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Sir, I support the motion moved by Shri Kashiram Rana, hon. Minister of Rural Development for considering the progress of implementation of Part IX and Part IX-A of the Constitution (dealing with Panchayats and Municipalities as institutions of self-government) during the last ten years.
18.20 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singhin the Chair) Once the late Rajiv Gandhi had said that out of every one rupee which I give to the rural areas only 19 paise reaches them. From this you can evolve how much corruption was there in the system then.
SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): Sir, it is very important. Let me make one clarification. Shri Rajiv Gandhi did not say that 81 per cent goes in corruption. He said that 81 per cent is spent by the administration on itself. That is why, they are not getting the funds.
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : He said that out of one rupee allocated to the Panchayati Raj institution in rural India, only 19 paise used to reach them. That was the quote of the Prime Minister in those days. We were in the Opposition at that time. We used to fight for this. We were arrested during the Emergency. We know about it. Therefore, I would like to ask here why certain States in the country are reluctant to transfer those 29 subjects to the three-tier Panchayati Raj Department till today. A Task Force was appointed. I have a list of States with me. I would not like to read them out. But certain States have not given powers to the Panchayati Raj institutions.
As has rightly been pointed out by Shri Mani Shankar Aiyar, during the last 10 to 15 years, there has been a heavy migration from the rural areas to the urban areas. There has been heavy urbanisation. It is because the rural areas do not have the basic amenities and basic structure till now. Today when we are discussing about ten years progress, I would suggest that the Government should be very sincere in implementation of various rural development schemes which would uplift the 70 per cent people including poor people and farmers who are living in rural areas.
In article 243(G) of the Constitution, the powers of the States have been clearly mentioned for devolution as far as these 29 subjects are concerned. Article 243(H) vests the power to collect taxes and revenue. Article 243(I) clearly indicates that the State Finance Commission will be created and whatever revenue is collected by the State from rural areas will again be spent there. But this has not been happening since three-tier Panchayati Raj system was introduced through 73rd and 74th Amendments. Nothing is being implemented in letter and spirit. If you see the extent of utilisation of the Panchayat Raj funds which is being channelised through DRDAs, only 40 per cent is being utilised.
For example, in our State of Orissa when the PMGSY was sanctioned, we could only utilise 40 per cent of the allocated money. Panchayati Raj system should be given more autonomous status to make it more effective and efficient. The revenue generation which accrues from the Panchayati Raj institution should be honestly sent back there.
To cite an example, in the State of Orissa we have taken some progressive steps in regard to the Panchayati Raj Institutions. Like, we have given the job of minor forest collection and environment management to the Panchayati Raj Institutions. We have also reserved one-third of the seats for women in the Panchayati Raj Institutions. In fact, we have introduced this system of giving reservation to OBC candidates for the first time when the Panchayat elections were held. So, we have been progressing well with these Institutions in the State of Orissa. Therefore, I would like to request the hon. Minister and this Government that while allocating funds for the Panchayati Raj Institutions and to the backward districts of Orissa, they should be considerate and very liberal, otherwise neither development of Panchayati Raj Institutions would be possible nor would the dream of Gandhiji ever materialise.
Sir, the three-tier system has remained only in name. In certain States the Ministers of the State Governments have been given charge of certain districts and the Chairmen of the Zila Parishads have been virtually rendered a titular head. They cannot act on their own. They have to act in accordance with the wishes of the Ministers. There is no autonomy. I think, this system of Ministers being given charge of one district is being practised in the State of Madhya Pradesh. In such an event, how could one expect the Chairmen of Zila Parishads and the Panchayati Raj Institutions to function with full autonomy? Instructions, like building a wall in a place or stopping the progress of some work, are given by them and consequently the independent nature of the Panchayati Raj Institutions gets diluted.
Sir, if you look at chapter I, where there is a mention about the Gram Sabhas, you would see that the Gram Sabhas in the backward districts are virtually treated like cattle. The are not allowed to voice anything. It is the gun that rules such areas. The musclemen are all powerful. To strengthen the Gram Sabhas there should be some type of a machinery that would protect the interests of these Gram Sabhas. They should be given enough powers in order that they can assert their rights. The Gram Sabhas are to meet three days in a year, namely, on the birthday of Mahatma Gandhi, on the Labour Day and on 15th of August.
SHRI MANI SHANKAR AIYAR : It has to meet also on the Republic Day.
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : Yes, it has to meet on Republic Day as well. Thank you for the information. These are the four days when the Gram Sabhas should be held. But is it being followed? Are there any proper instructions to the District Collectors to look into this aspect? But this is not being done.
Sir, only roads and nallahs are being built with the grants that are given but the actual social commitments of the Government, like health, education, land reforms, are being neglected. Only construction of roads and repair of roads is what is being done with the grant. So, there should be proper orientation of the elected representatives right from the ward level to the Zila Parishad level. There should be orientation programmes for these elected representatives, like the ones that are held for MPs and MLAs in the respective States and in Delhi.
Secondly, as has been rightly suggested by the Task Force, an Ombudsman should be appointed at the Panchayati Raj level in order to ensure transparency and accountability, which is not there presently.
SHRI SUNIL KHAN (DURGAPUR): This can only happen if you enforce the land reforms system.
SHRI BIKRAM KESHARI DEO : The State of West Bengal has done well in this regard. The State has been commended by the World Bank for their achievement in the field of land reforms.
Orissa is also doing well. Therefore, I hope that thismanthan which is being done now, that is, the stocktaking debate which is being held now, would result in further strengthening of the Panchayati Raj system, so that true democracy is kept alive and springing in our country.
With these few words, I thank you for giving me this opportunity.
श्रीमती कान्ति सिंह (बिक्रमगंज): माननीय सभापति जी, माननीय मंत्री जी ने संविधान के ७३वें और ७४वें संशोधन पर जो समीक्षा का प्रस्ताव लाये हैं, उसके लिए मैं इन्हें धन्यवाद देना चाहती हूं। १० वर्षों के अन्तराल के बाद आज पंचायती राज किस तरह से कार्यान्वित हो रहा है, इसकी समीक्षा सदन में की जा रही है।
पंचायती राज की परिकल्पना महात्मा गांधी ने की थी और ग्राम स्वराज का सपना देखा था। उसके बाद लोहिया जी ने चौखम्भा राज की परिकल्पना की और अन्त में स्वर्गीय राजीव गांधी जी के सफल प्रयासों से ही पंचायती राज व्यवस्था स्थापित हुई। बिहार में ७३वां और ७४वां संविधान संशोधन होने के २२ वर्ष के बाद पंचायतों के चुनाव हुए। इन चुनावों के मातहत करीब १.४० लाख जनप्रतनधि जनता के बीच में से चुनकर आये, जिनमें से ४५ हजार महिलाएं वार्ड से लेकर पंचायत की मुखिया और जिला परिषद के तहत चुनकर आईं। उनमें से १० हजार महिलाएं अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से आईं। बिहार में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण पंचायतों के चुनाव में दिया गया, जिसके तहत ४५ हजार महिलाएं चुनकर आईं। उन ४५ हजार महिलाओं में से १०,०४५ महिलाएं अनुसूचित जाति, जनजाति की महिलाएं हैं।
जिस महिला सशक्तीकरण की बात आज हम कर रहे हैं, यह बड़े गर्व की बात है कि बिहार में वार्ड स्तर से उठकर जिला परिषद तक महिलाएं चुनकर आईं। बिहार पंचायती राज अधनियम, १९९३ में जैसे ग्राम पंचायत की मुखिया, पंचायत समति की प्रमुख तथा जिला परिषद के अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में वर्ष २००१ के पंचायत चुनाव में इन पदों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं किया जा सका। इसके बावजूद नौ महिलाएं जिला परिषद अध्यक्ष, ११ महिलाएं उपाध्यक्ष, ५१ महिलाएं पंचायत समति प्रमुख तथा १२१ महिलाएं उप-प्रमुख बनीं और ८६ महिलाएं ग्राम पंचायत की मुखिया के रूप में अपने दम पर जीतकर आईं। यह महिलाओं में बढ़ती हुई जागरुकता और उनके प्रति समाज के बदले हुए द्ृष्टिकोण का ही परिणाम है। हम लोग तो यहां चुनकर आई ही हैं। अभी संसद और विधानपरिषदों में ३३ प्रतिशत सीटों पर महिलाओं को आरक्षण देने की बातें हो रही हैं, लेकिन यह कब होगा, यह नहीं कहा जा सकता, अभी यह सिर्फ कहा ही जा रहा है। इसके साथ ही स्थानीय निकायों में जब चुनाव हुए तो महिलाएं जिला परिषद की अध्यक्ष भी बनीं, लेकिन अब यह कहा जा रहा है कि जिला परिषद के अध्यक्ष के चुनाव में बहुत गड़बड़ी होती है।
ऐसे हालात में इसमें पैसे का बोलबाला थोड़ा ज्यादा हो जाता है। इसमें जो बलशाली होता है यानी जो पैसे के आधार पर बलशाली होता है, वही जिला परिषद का अध्यक्ष बन जाता है। वह विकास के कार्य को अपने बलबूते पर करना चाहता है। वार्ड से जो योजनाओं का चयन होता है, उन योजनाओं का चयन होकर वार्ड के मुखिया के तहत हमारे यहां ब्लाक में आता है। ब्लाक से पास होने के बाद जिला परिषद में जाता है। इतनी दूरी तय करने में हमारे जो नव-निर्वाचित लोग हैं, पंचायती राज की जो कल्पना की गयी थी कि गांव तक विकास से जुड़े लोग, गांव से विकास तक जोड़ने के लिए जो चुनाव हुए, उससे लोगों की आकांक्षाएं और ज्यादा बढ़ गयीं। हर जन प्रतनधि यह चाहने लगा कि पहले हमारा विकास हो जाये। इस खींचतान में विकास की गति में अवरुद्ध पैदा हो जाता है। इससे हमें लाभ तो जरूर पहुंच रहा है लेकिन कुछ हानियां भी हो रही हैं। पंचायतों और वार्ड सदस्यों में जो भाईचारा और आपसी प्रेम बना हुआ था, उसमें कहीं न कहीं त्रुटियां आती जा रही हैं। उसकी कुछ खामियां हम लोगों को भुगतनी पड़ रही हैं।
माननीय मंत्री जी ने पंचायतों को उनको अपने आंतरिक संसाधन जुटाने की बात कही। चाहे नगर निकाय का चुनाव हो या पंचायतों का चुनाव हो, उनको आंतरिक संसाधन जुटाने की बात कही। जो पैसा दिया जाता है, उसी से विकास के कार्य होते हैं। मैं मंत्री जी से कहना चाहती हूं कि ग्रामीण स्तर पर जो चुनाव हुए हैं, जो जन प्रतनधि चुनकर आये हैं, उनके सामने यह बहुत बड़ी समस्या पैदा हो रही है क्योंकि वे गरीब तबके के लोग होते हैं। वे गरीब तबके के होने के कारण उन आंतरिक संसाधन को जुटाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। इस कारण वहां विकास कार्य अवरूद्ध हो जाते हैं। उनके दिमाग में एक चीज रहती है कि हम आज चुनकर आये हैं, क्या हम हर चीज के लिए अपने लोगों के ऊपर टैक्स बांध दें ? लोगों के मन में भी दूसरे तरह के विचार आते हैं कि इनको हमने चुनकर भेजा है और ये हमसे ही संसाधन जुटाने की बात कर रहे हैं। इससे भी हमारा विकास का कार्य अवरूद्ध हो जाता है।
जहां तक नगर निकायों में आंतरिक संसाधन जुटाने की बात कही जाती है, वह ठीक है। वह शहरी इलाका है और वहां पर वभिन्न तरह के व्यवसाय भी होते हैं। अगर उस तरह का टैक्स लगाया जाता है तो वहां आंतरिक संसाधन जुट सकते हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में आंतरिक संसाधन नहीं जुट सकते।
हम आज चर्चा कर रहे हैं कि कैसे नगर निकायों को सुद्ृढ़ करें। हमारी बिहार सरकार ने पंचायतों को वे सारी सुविधायें दे रखी हैं, उनकी जरूरतें की सारी चीजें दी गयी हैं जो संविधान के तहत दी जानी चाहिए। हमने प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों का निरीक्षण एवं परीक्षण, शिक्षकों को नियमित एवं समय-समय पर उपस्थिति सुनिश्चित कराने एवं विद्यालय भवनों के निर्माण के अधिकार, शिक्षकों की नियुक्ति के अधिकार, छात्रवृत्ति का वितरण आदि ये सब काम ग्राम पंचायतों के माध्यम से कराये जा रहे हैं। आंगनवाड़ी सेविकाओं का चयन भी ग्राम पंचायतों के माध्यम से किया जा रहा है। चापाकलों का स्थल चयन, मरम्मत एवं निर्माण की जिम्मेदारी पंचायतों को दी गयी है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण द्वारा इस हेतु गैर योजना मद की राशि पंचायतों को उपलब्ध कराई जा रही है। स्वास्थ्य, खाद्य पूर्ति सहाय और पुनर्वास, पर्यावरण और वन इत्यादि से संबंधित कई महत्वपूर्ण दायित्व भी पंचायतों को दिये गये हैं।
मैं यह भी कहना चाहूंगा कि फिफ्थ पे कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद अधिकांश राज्यों की वित्तीय स्थिति चरमरा गयी है। ऐसे हालात में राज्य सरकारों की जो वित्तीय स्थिति है, जो ग्रामीण इलाके हैं, जैसे श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा जी ने कहा कि ७० और ३० प्रतिशत की प्रतिशतता आंकी गयी है, इससे राज्य सरकारों के पास पैसे का अभाव हो जाता है जिसकी वजह से पंचायतों का विकास नहीं हो पाता। साथ ही केन्द्र से जो राशि जाती है, मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगी और अनेक बार इस सदन में बहस हुई है कि हमारे बिहार की इतनी बड़ी आबादी है, उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है, लेकिन जब वहां पैसा देने की बात होती है तो उसमें भेदभाव होता है। नवम या दशम वित्त आयोग के माध्यम से यहां से जो राशि मंजूर की गई थी, उसमें से हमें पैसा नहीं दिया गया और कहा गया कि पहले पंचायतों का चुनाव कराया जाए। जब पंचायतों के चुनाव करवा दिये और उसके बाद कहा कि हमारी राशि हमें दे दी जाए तो कहा गया कि वह पैसा लैप्स कर गया है। अभी भी १९९७-९८, १९९८-९९ और १९९९-२००० की ४०० करोड़ रुपये की हमारी राशि केन्द्र सरकार के पास लंबित है। मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगी, अगर आप समीक्षा कर रहे हैं तो इसका भी ध्यान रखें कि बिहार सरकार की राशि, जिसे आपने रोक कर रखा है, तुरंत देने का काम किया जाए, तभी हम उसे सुद्ृढ़ कर सकते हैं, और गांधी जी के ग्राम स्वराज की कल्पना को साकार कर सकते हैं तथा लोगों को लाभ दे सकते हैं। यदि ऐसा नहीं होगा तो लाख कोशिश करने पर भी हमारा विकास नहीं हो सकता क्योंकि अर्थ के अभाव में विकास के कार्य नहीं हो सकते। यही वजह है कि खींचतान ज्यादा होने से विकास के कार्य अवरुद्ध हो जाते हैं।
पंचायत की बैठकों में निर्वाचित सदस्यों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ गया है। भ्रष्टाचार कहां से आ गया है। निर्वाचित सदस्यों के पास पैसे की काफी कमी होती है। उनको इतनी कम राशि दी जाती है कि वे अपने परिवार की परवरिश भी ठीक से नहीं कर सकते। एक राज्य की बात है, वहां एक महिला जो मुखिया या जिला पार्षद थी, उनके पास पैसे की काफी तंगी हो गई, उन्होंने तंग आकर अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और ४,००० रुपये की नौकरी करना मंजूर कर लिया। ऐसे हालात सामने दिखाई देते हैं। मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगी कि जैसे अन्य लोगों के लिए कुछ न कुछ राशि फिक्स की जाती है, वैसे नगर निकाय के निर्वाचित सदस्यों को भी कुछ ऐसी राशि दी जाए जिससे उनको मुश्किल न हो, यह महसूस न हो कि उनको अपने कार्य का मुआवजा नहीं मिल रहा है, कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है, वे अपने परिवार की परवरिश नहीं कर पा रहे हैं। उनके प्रति भी आपकी जवाबदेही बनती है। हमारे राज्य का जो पैसा आपके यहां लंबित है, उसे शीघ्र ही यहां से देने का कार्य करें।
इन्हीं शब्दों को कहते हुए मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।
श्री अरुण कुमार (जहानाबाद): सभापति महोदय, आज माननीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री काशी राम राणा जो मोशन लाए हैं, यह अति महत्वपूर्ण विषय है।
१८.४४ hrs.(Shri K. Yerranaidu in the Chair) आज हम लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत इकाई के संबंध में यहां चर्चा कर रहे हैं। कई माननीय सदस्यों ने अपनी राय दी है। गांधी जी से लेकर आज तक भारत के निर्माण में अपनी चिंतनधारा से बंधे लोगों ने जिस प्रकार देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की प्रक्रिया चलाई है, आज का यह प्रस्ताव भी उसी प्रक्रिया की एक कड़ी है। गांधी जी ने १९४६ में कहा था कि आजादी का मतलब तब पूरा होगा जब हम ग्राम स्वराज की कल्पना करेंगे। भारत के संदर्भ में यह और महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि हमारे देश की ८० प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है।
हम इस सरकार के प्रति आभार व्यक्त करते हैं कि आजादी के एक लम्बे काल के बाद इसने जितनी संवेदनशीलता इन विषयों के प्रति दिखलाई है, निश्चित तौर से यह राष्ट्र के निर्माण में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगी।
भ्रष्टाचार एक अलग सवाल है। यह व्यवस्था पर निर्भर नहीं करता है, वह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि संस्थागत प्रमुख के रूप में कौन व्यक्ति कहां बैठा है लेकिन भ्रष्टाचार के कारण हम इस व्यवस्था को समाप्त कर दें, ऐसा हम उचित नहीं समझते। समय का अभाव है, इसलिए हम कुछ ठोस सुझाव सरकार के पास रखना चाहते हैं जिसमें चुनाव प्रक्रिया जो हमारे सामने है और अभी माननीय सदस्या श्रीमती कान्ति सिंह जी ने भी कहा कि बड़ी जद्दोजहद के बाद बिहार में चुनाव हुआ। २२ वर्षों के बाद चुनाव हुआ और २२ वर्षों के बाद जब चुनाव हुआ तो आज सरकार इतनी तिकड़म कर रही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं हो। जिस तरह का आलम है, जो भारत सरकार पैसा दे रही है, उसका कैसा उपयोग है, हम उस पर विस्तार से चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन खुद इसकी जानकारी उनको है। इसलिए हम कहना चाहते हैं कि चाहे सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना हो या फिर प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना हो, केन्द्र प्रायोजित जितनी भी योजनाएं हैं, इस योजना में जिस तरह की लूट है और राज्य सरकार की जो आपने कमेटी बनाई, उसमें पूरा असहयोग है। वह नहीं चाहती कि इन चीजों का मूल्यांकन हो, परीक्षण हो और उसका असली चेहरा सामने आए। इसलिए हम निवेदन करना चाहेंगे कि निश्चित तौर से मणि शंकर अय््यर जी ने भी जो कहा कि केन्द्र सरकार की भी भूमिका इसमें है और जब हम इसके इतिहास में जाते हैं तो गुलजारी लाल नंदा से लेकर, लाल सिंह त्यागी से लेकर कई ऐसे सामाजिक क्षेत्र के उच्चतम लोगों ने पंचायती राज को अमलीजामा पहनाने में योगदान दिया है और जब हमने इस संस्था को मजबूत करने के लिए इच्छा-शक्ति रखी है तो निश्चित तौर से हमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि यह समवर्ती सूची में आए। जब तक समवर्ती सूची में नहीं आएगी, निश्चित तौर से भारत सरकार का कंट्रोल उस पर नहीं रहेगा।
MR. CHAIRMAN : Please conclude now. Many hon. Members are there to speak.
श्री अरुण कुमार : महोदय, मैं अपनी बात अभी समाप्त करता हूं। इसलिए हम कहना चाहते हैं कि निश्चित तौर से एक मोनीटरिंग सैल होना चाहिए और यह इफैक्टिव कैसे बने, उसके लिए माननीय मंत्री जी को प्रावधान करना चाहिए। यदि ऐसा प्रावधान नहीं हुआ तो आपका जो संकल्प है, वह पूरा नहीं होगा। चुनाव की जो प्रक्रिया हमारे सामने है, जो अभी हमने राज्यों में देखी, हमारा सुझाव है कि जिस तरह से पंचायत के मुखिया का चुनाव होता है, उसी तरह से प्रखंड प्रधान का चुनाव भी होना चाहिए और जिला अध्यक्ष का चुनाव भी होना चाहिए।
अन्यथा जो प्रकिया अख्तियार की गई है, नो कांफीडेंस मोशन लाने की और जिस तरीके से पैसे का उपयोग होता है, राज सत्ता का उपयोग होता है, कार्य नहीं करने दिया जाता है, अगर ये प्रकियाएं चलती हैं तो अल्टीमेटली हमारा यह संकल्प अधूरा रहेगा। इसलिए प्रखंड प्रमुख का और जिला अध्यक्ष का चुनाव भी उसी तरीके से होना चाहिए, जैसे पंचायत के मुखिया का होता है यानी डायरेक्ट वोटिंग के द्वारा होना चाहिए। तब जो खरीद-फरोख्त की और अविश्वास की संगीन हमारे ऊपर लटकती रहती है, वह दूर होगी।
मणि शंकर अय्यर जी ने कई बातें अपने भाषण में कहीं। उनमें से कुछ बातों से मैं डैफर करता हूं। उन्होंने ब्यूरोक्रेसी के बारे में भी कहा, जहां से खुद वह आए हैं। मैं ब्यूरोक्रेट नहीं हूं, लेकिन मैंने महसूस किया है कि व्यक्ति चाहे लेजिस्लेटिव का हो या नौकरशाही का हो या ज्युडिशरी का हो, लेजिस्लेटिव जहां कमजोर होती है या दुरुपयोग करना चाहती है, तो वह ब्यूरोक्रेसी से यह कराती है। हमने कई ऐसे ब्यूरोक्रेट्स को देखा है जो जनप्रतनधियों से कहीं ज्यादा जनता के प्रति जवाबदेह हैं। ऐसा कहना कि सभी नौकरशाह भ्रष्ट हैं या सारे लोग ईमानदार हैं, मैं उसे नहीं मानता। इसलिए इस व्यवस्था को यदि हम एक सिस्टम में जिंदा रखना चाहते हैं तो लेजिस्लेटर्स को भी अपने दायित्व को समझना होगा।
श्री पवन कुमार बंसल: उन्होंने सारे नहीं कहा था।
श्री अरुण कुमार : उन्होंने कहा कि हम जानवर की व्यवस्था से निकल कर आए हैं। वह व्यवस्था ऐसी नहीं है, जहां जानवर होते हैं। उन्होंने सियार और बाघ की कहानी सुनाई। हो सकता है यह उनका अपना तर्क हो।
मैं बिहार के संदर्भ में कहना चाहता हूं कि वहां जाति का प्रमाण पत्र राज्य सरकार को देना चाहिए। लेकिन यह जिला प्रमुख या ग्राम पंचायत को न देकर नौकरशाही के हाथ में अधिकार दे दिया है। उसके लिए वह जिम्मेदार नहीं है। जिस पंचायत में व्यक्ति रहता है, वहीं उसे जाति का या उम्र का प्रमाण पत्र चाहिए। जबकि ऐसा नहीं होने से वह जिला मुख्यालय का चक्कर लगाता रहता है। इसलिए उसको समवर्ती सूची में लाया जाए। इससे हम अपने इस संकल्प को मजबूत कर सकते हैं। मानिटरिंग सिस्टम को कैसे प्रभावी बनाएं, राज्य सरकारों से वार्ता करके, संविधान में संशोधन करना पड़े तो उसका भी प्रावधान करें, ताकि केन्द्र और राज्यों में एक कोआर्डिनेशन हो। भारत सरकार से जो राशि राज्यों को जाती है, उस पर केन्द्र सरकार का पूरा अंकुश हो, उसका आडिट भी हो, ताकि जनता के धन का दुरूपयोग न होने पाए।
SHRI N. JANARDHANA REDDY (NARASARAOPET): Thank you, Sir. I saw the Motion by the hon. Minister Shri Kashi Ram Rana, the wording of which is to consider the progress of implementation of Part IX and Part IX A of the Constitution. This is a very important aspect, which we are reviewing after ten years. This country was ruled by eminent people like Panditji, Indiraji, Rajivji, Morarji Desaiji, Lal Bahadur Shastriji. But when we look into the approach of Shri Rajiv Gandhi, to the problems he had a scientific approach. He used a scientific method. When he wanted to look into the educational policy, he approached the teachers in the schools; when he wanted to do something about the agricultural policy, he divided the country into 27 agro-climatic zones. Similarly, he wanted to look into the grassroot- level democratic institution ‘Panchayat’.
He wanted to build it up. He studied about it for one year. He found that there was no role in the local bodies for the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes, women and youth in the villages. He also found many defects like financial embezzlement etc. It is for this reason that he had gone to various parts of the country to see the situation for himself. Shri Mani Shankar Aiyar was one of the lieutenants who was with him at that time. Shri P. Chidambaram was another lieutenant with him. As one of our Members was telling, Rajivji went round the country to know about the things and finally he came up with amendments to the Constitution and created a constitutional position for the panchayats.
Sir, panchayat is an age-old institution in our country. People say that this system existed right from the age of Vedas and even no king could interfere with panchayats in those days, but later on, the situation has changed drastically. Then, many Committees were constituted to study the whole system of panchayats and they were headed by people like Shri S.K. Dey, Shri Ashok Mehta, Shri Vengal Rao, Shri Balwant Rai Mehta, etc. After studying the reports of all these Committees, Rajivji chose the best method and brought amendments to the Constitution. Nobody had opposed it except my friends from the TDP in the Rajya Sabha who voted against it. But now they themselves have accepted that it is one of the best way of Panchayat System in our country.
Sir, I do not want to repeat the points made by hon. Members and particularly the points made by our Panchayati Raj Pandit, Shri Mani Shankar Aiyar. As rightly said by Shri Manda Jagannath, when Shri Venkaiah Naidu was the Minister of Rural Development, they wanted to bring an amendment. As a matter of fact, we also fought for it along with Shri Mani Shankar Aiyar. The very purpose of having the five-tier system is to involve more number of people in the Panchayati Raj system to be involved.
Sir, as Shri Mani Shankar Aiyar was mentioning, 10 lakh women are involved in the Panchayati Raj institutions in our country. The demand to reserve 33 per cent of seats for women in the legislative bodies of our country is made repeatedly in this House. But Rajivji had the vision to give 33 per cent reservation to women in Panchayati Raj institutions in our country longback. Almost all the States have conducted elections twice to local bodies now. As a matter of fact, I can say from my experience that for the first time when we had chosen women for the local bodies from the villages, their husbands also used to come along with them, sit behind them and help them, but it is not happening now. The situation has changed and women are able to perform their role in the local bodies on their own. This is the kind of progress we have made.
19.00 hrs. Sir, people say Brahma has created universe. Vishwamitra has created another universe - Pratha srishti. The whole country has got panchayati raj system of Rajivji. Some States have got lapses, some plus or minus points. But my State has got ‘Chandra Babu Naidu panchayati raj system’. This is unfortunate. He has conducted the elections. A Sarpanch is got elected as per the Panchayati Raj Act. But various institutions have been created to make that Sarpanch a ‘zero’. This Sarpanch has no control over the school. There is Vidya Committee. There is no control from him over the village tank. There is Irrigation Committee. There is no control over ‘Anganwadi’. There is Mothers’ Committee. Finally, there is a Secretary appointed in the village. The Village Secretary is controlled by Govt. and Sarpanch has been made a ‘zero’.
The next step is in our State ‘Mandal’. A Mandal has got funds and programmes but no role to Mandal President. It is managed byJanmabhoomi. A ‘Janmabhoomi’ is controlled by a nodal officer appointed by the District Collector. He is subordinate to the Collector but not to the Mandal. As a result, the Collector is controlled by the Chief Minister or the Chief Secretary. The panchayati raj institution is at the second level and has become a zero. I am still unable to understand what ‘janambhoomi’ is. My janambhoomi is Vakadu. For others, the janmabhoomi will be their ‘janmasthalam’’ – native place. After all, what is janmabhoomi? I am going on requesting the Chief Minister to explain its concept.
MR. CHAIRMAN : I will explain it later on. If I have an opportunity, I will explain it from there.
SHRI N. JANARDHANA REDDY : I was really waiting for him to be here to know from him about the concept of janmabhoomi. Anyway, I am not raising an accusing finger. I want to know what janmabhoomi is. As far as I know, you know and everybody else knows, a janmabhoomi is the ‘birthplace’. He named it as a programme. There are: Mahila Janmabhoomi, Old Age Janambhoomi, Children’s Janambhoomi, etc. Recently, there was another Janambhoomi: Koti Varalu Janambhoomi, that is, one crore gifts. As a result, the people have gone and given the applications. In the district of our friend, Shri Yerrannaidu, the papers were torn out. … (Interruptions) People used to come and give their representations, and it is named as ‘Janambhoomi’. Anyway, it is there as programme.
Finally, there is the Zila Parishad. A Zila Parishad is the District Planning Body. According to the Act, the Chairman of the Zila Parishad is the Chairman of the District Planning Body. In Andhra Pradesh, the Chief Minister has created District Development Review Committees where a Minister of the Cabinet is the Chairman of the D.D.R.C. That Chairman of the Zila Parishad is only a Member. Not only that, all the MLAs of the District are the Members of the Zila Parishad with voting rights. The MPs are Members of the Zila Parishad with voting rights. The MPs can vote here. They can vote for Zila Parishad and Mandal also. As a result, Zila Parishad has also become ‘zero’. So, from Sarpanch to Mandal and Zila Parishad, all have become zero.
This is the progress. My dear hon. Minister may kindly note down.
Sir, his predecessor, Shri Venkaiah Naidu, told us in the same House that he had spoken to the Chief Minister, A.P. and that the devolution of powers would be done by March 2003, if I remember correctly, it is there in the record. So far, not more than 19 subjects were transferred and those 19 subjects are being controlled by a nodal officer. The first Minister for Rural Development was from Andhra Pradesh. He was Shri Venkataswamy. The hon. Minister can kindly note down the progress and speak to the Chief Minister of Andhra Pradesh about this.
I do not know whether the hon. Minister is going to take any action or not. Some gentleman has studied the Andhra situation and said what can the Central Government do. No one can stir Shri Chandrababu Naidu. If the Centre wants to stir Shri Chandrababu Naidu, he will stir the Central Government. He remarked something like that, if the Centre wants to handle firmly Shri Chandrababu Naidu, he will handle the Centre. I do not know whether they are in a helpless situation or we are in a helpless situation. But the situation is such and the Panchayati Raj System is not functioning properly. I do not want to speak more on this.
श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) :सभापति महोदय, मैं इस प्रस्ताव के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं माननीय मंत्री महोदय को इस बात के लिए बधाई देना चाहूंगा कि वह इस प्रकार का प्रस्ताव इस महान सदन में लाए। किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र में अपनी योजनाओं की समीक्षा करना राष्ट्र हित में होता है। आज हम इस महान सदन में पंचायती राज के पिछले दस वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा कर रहे हैं और यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि इन इन्स्टीटयूशन्स के माध्यम से हमने पिछले दस साल में क्या खोया है और क्या पाया है? जिस प्रकार का ग्रामीण उत्थान का सपना महात्मा गांधी जी ने देखा था, पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी ने देखा, विनोबा भावे जी ने देखा था, उसे पूरा करने के लिए आज भी नाना जी देशमुख जैसे व्यक्ति इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। पंचायती राज का जो ७३वां और ७४वां संशोधन आया, वह भारत के पंचायती राज इन्स्टीटयूशन में एक माइल स्टोन का काम कर रहा है। इसके माध्यम से आज देश की २ लाख ३२ हजार २७८ पंचायतें, ६०२२ ब्लॉक्स तथा लगभग ५३५ जिला परिषदें काम कर रही हैं। इनमें आज २० लाख से ऊपर चुने हुए प्रतनधि काम कर रहे हैं। इसी प्रकार से नगरों में ३६५६ म्युनसिपल कमेटियां चुने हुए प्रतनधियों के माध्यम से काम कर रही हैं। महिलाओं, अनुसूचित जाति के लोगों और ट्राइबल एरियाज में इस एक्ट का फायदा पहुंचाने के लिए एक और एक्ट ९६ के अन्तर्गत लाया गया। उससे भी इन वर्गों के लोगों को बहुत फायदा पहुंचा है।
सभापति जी, मैं माननीय प्रधानमंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने ३ दिसम्बर, २००२ को अखिल भारतीय स्तर पर पंचायती राज सम्मेलन बुलाकर एन.डी.ए. सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर की कि भारत गावों का देश है और हम पं. दीन दयाल उपाध्याय के सिद्धांतों पर चलते हुये गांव में रहने वाले उस अंतिम व्यक्ति को फायदा पहुंचाये जिसकी पांव की बिवाई फटी पड़ी हुई है। जब तक हम उसे फायदा नहीं पहुंचायेंगे, हम चैन से नहीं बैठेंगे। इस कड़ी के अंदर जिस प्रकार श्री काशी राम राणा जी इस विभाग के अंतर्गत विकास योजनायें चला रहे हैं, श्री वैंकैया नायडु के कार्यकाल में ग्रामीण क्षेत्रों में इतना जबरदस्त काम हुआ, उसके प्रति केवल भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों ने भी इसमें अपनी आस्था प्रकट की है। जापान जैसे देश के अम्बैसडर स्वयं श्री वैंकैया नायडु से मिलने आये और उन्होंने भारत की पंचायती राज संस्थाओं को पूरा सहयोग देने की बात कही।
सभापति महोदय, ११वें वित्त आयोग ने इन संस्थाओं के लिये १६ हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की है जिसके कारण आज अनेक ग्रामीण विकास कार्य हो रहे हैं। आज जहां पंचायती राज के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों की काया-कल्प हुई है, वहीं दूसरी ओर हमारे कई साथियों ने उनकी कमियों की ओर भी ध्यान इंगित किया है। जैसे महिलाओं को एम्पावरमेंट करने के लिये ३३ प्रतिशत स्थान आरक्षित करने का प्रावधान स्थानीय स्तर पर किया गया है। हमारे साथियो ने कहा कि जब कोई महिला जिला परिषद् ब्लाक या नगर परिषद् की चेयरमैन चुनी गई, उपहास के तौर पर महिला के पति का नाम एस.पी. रख दिया जाता है यानी सरपंच पति। वह सरपंच का कार्य देखेगा। यदि जिला स्तर पर महिला सरपंच को कार मिल गई, मुझे कहते हुये दुख होता है कि महिला सरपंच का पति उसे कार में कभी बैठने नहीं देता। यदि महिला सरपंच तीन-चार साल तक रही तो उसका पति अपनी राजनीति अपने हिसाब से करता है। यदि महिला कार में बैठने का प्रयत्न भी करती है तो उसे धक्का मार कर उतार दिया जाता है और कहा जाता है कि जाओ, चूल्हा चौका करो। आज इस ओर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
सभापति महोदय, इस सदन में बार-बार माननीय सदस्यों की यह आवाज आती रही है कि राज्य के अंदर जो कार्य होते हैं, वे एम.एल.ए. की रिकमैंडेशन््स पर या जो पार्टी पावर में होती है, सब कुछ उसके हिसाब से होता है। केन्द्र सरकार की ओर से जो योजनायें चलाई जाती हैं, डिस्टि्रक्ट मजिस्ट्रेट सांसद की कोई परवाह नहीं करते हैं। इस बात को मद्देनजर रखते हुये, ग्रामीण क्षेत्रों में वजिलेंस कमेटीज बनाई गई। लेकिन मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि जिन राज्यों में जिस पार्टी की सरकार है, वहां वजिलेंस कमेटी का चेयरमैन एम.पी. को नहीं बनाया जाता और यदि बन भी गया तो उन्हें कार्यरत नहीं होने दिया जाता क्योंकि उन्हें इस बात की आशंका है कि अगर एम.पी. चेयरमैन बन गया तो एडमनिस्ट्रेशन में थोड़ी-बहुत सुनवाई होने लगेगी। इसलिये मैं माननीय मंत्री जी से प्रार्थना करुंगा कि चुनाव होने में डेढ़ साल बाकी रह गया है, यह निर्देश तमाम वजिलेंस कमेटीज में लागू करवाया जाये।
मैं कहना चाहूंगा कि आज आप ग्रामीण विकास मंत्रालय का काम देख रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में आज लगभग ३६५६ नगरपालिकाएं काम कर रही हैं। लेकिन शहरों में धनाभाव के कारण डेमोक्रेटिक प्राइमरी इंस्टीटयूशंस दम तोड़ते जा रहे हैं, क्योंकि म्युनसिपल कमेटीज को पहले चुंगी आदि से जो इंकम होती थी, जो छोटे-मोटे टैक्सेज लगाये जाते थे, राज्य सरकार ने इन स्थानीय निकायों के कई सोर्स ऑफ इंकम पर कब्जा कर लिया है। जिसके परिणामस्वरूप जो स्थानीय निकाय, म्युनसिपैलिटीज आदि सब हैन्डीकैप हो गई हैं। आज वक्त का तकाजा है कि इन स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने के लिए और धन प्रदान किया जाए, ताकि ये संस्थाएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। जब स्थानीय संस्थाओं को राज्य सरकार से मदद नहीं मिलती है तो स्थानीय संस्थाएं उधार लेती हैं और बड़े-बड़े शहरों में कई दूसरी संस्थाओं से भी एम.ओ.यू. साइन किये जाते हैं।
१९.१६ hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) सभापति महोदय, श्री अनन्त कुमार जी की अध्यक्षता में १२ नवम्बर, २००२ को एक मेयर कांफ्रैन्स हुई थी जिसमें आदरणीय प्रधान मंत्री जी के नेतृत्व में कुछ डिक्लेरेशंस की गई थीं कि शहरों के विकास के लिए इस प्रकार की एक ढांचागत योजना बनाई जाए, जिसके अंतर्गत इन संस्थाओं का विकास हो सके।
मैं आदरणीय मंत्री जी से यह भी कहना चाहूंगा कि जो प्रधान मंत्री सड़क योजना बनी है, उसमें एम.पीज. की रिकमैंडेशन की बात कही गई है। जहां तक हमारे हरियाणा प्रदेश का संबंध है, उसमें हमारी रिकमेंडेशंन पर कोई भी सड़क नहीं बनी। बल्कि चीफ इंजीनियर हमारे पास आया और उसने कहा कि चूंकि हरियाणा में सारी सड़कें पहले ही से बनी हुई हैं, इसलिए कुछ रोड्स डबल करनी है, उनके लिए आप दस्तखत कर दें। हरियाणा में जैसे-तैसे हमारा अलायंस चल रहा है। अलायंस पार्टनर होने के नाते हमें उस पर दस्तखत करने पड़े और हमारी रिकमैन्डेशन पर एक भी सड़क वहां नहीं बनी।
सभापति महोदय : जब उसी पर दस्तखत कर दिये तो अब बोलने की क्या जरूरत है। पहले दस्तखत कर दिये और अब बोल रहे हैं।
श्री रतन लाल कटारिया: क्या करें, यह अलायंस की मजबूरी है, इसलिए धर्म भी निभाना पड़ता है। मैं कहना चाहता हूं कि हमें इसमें कुछ मदद जरूर मिलनी चाहिए।
सभापति महोदय, कापार्ट के माध्यम से ग्रामीण विकास के बहुत से कार्य हो रहे हैं। मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि इस पंचायती राज को और मजबूत बनाने के लिए महिलाओं को पूरे अधिकार दिये जाएं। इसी तरह से जो समाज के पीड़ित वर्ग, शोषित वर्ग और ट्राइबल एरियाज हैं, उनके माध्यम से जो प्रतनधि चुनकर आये हैं, उन्हें मात्र एक रबड़ स्टाम्प न बनने दिया जाए, बल्कि उनके इम्पॉवरमैन्ट के लिए सरकार जितने भी कदम उठा सकती है, सरकार को वे कदम उठाने चाहिए। सरकार ने जो कदम उठाया है कि ९० कदम सरकार चलेगी और १० कदम ग्राम पंचायतें चलें - इसमें कई बार देखने में आया है कि हम घोषणा करते हैं कि गांव में टयूबवैल लगायेंगे, आप एक लाख रुपये एकत्र कीजिए, लेकिन कोई ग्राम पंचायत यह कार्य नहीं कर सकती। मैं आदरणीय मंत्री महोदय से विनती करना चाहूंगा कि इस प्रकार का प्रावधान बना दिया जाए कि हम एम.पीज. को जो दो करोड़ रुपये का फंड मिलता है, अगर एम.पी. इस फंड में से एक लाख रुपये देना चाहे, यानी अगर टयूबवैल दस लाख रुपये में लगना है तो एम.पी. फंड से एक लाख रुपये देने का प्रावधान कर दिया जाए, ताकि गांव में पीने के पानी की व्यवस्था हो जाए।
इसी तरह से गांवों में पी.डी.एस. है। भारत सरकार ९० प्रतिशत लोगों की पी.डी.एस. के माध्यम से सेवा कर रही है। आज भारतवर्ष के अंदर इस पृथ्वी का सबसे बड़ा पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम चल रहा है।
उस सिस्टम को कामयाब बनाने के लिए भी जो ग्रामीण पंचायतें हैं, उनका बहुत बड़ा रोल हो सकता है। इसी तरह से नगरों में भी इसका बहुत बड़ा रोल हो सकता है। आज पचास प्रतिशत जनता को ही पीने का पानी उपलब्ध है। हम चाहेंगे कि ग्रामीण विकास मंत्रालय ज्यादा से ज्यादा पीने के पानी की योजनाएं बनाए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों का विकास हो सके।
आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद करता हूँ।
डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल (बेतिया) : महोदय, एक पॉइंट ऑफ इनफॉर्मेशन है। सदन में चार घड़ियां हैं और चारों अलग अलग समय बता रही हैं।
सभापति महोदय : जानकारी दे दी गई है। घड़ियां त्रुटिपूर्ण हैं। अपने हाथ की घड़ी से ही काम चलाएं। अपने हाथ में घड़ी न हो तो बगल के साथी से काम चलाएं।
SHRI K. YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): I thank you very much for giving this opportunity. Our hon. Minister of Rural Development is here. The former Chief Minister of our State and a senior Member had taken the name of our Chief Minister. He called it Chandrababu Naidu’s Panchayat Raj system. Regarding this Janmabhoomi, it is not a programme at all. Janmabhoomi is a concept. It is the concept of our motherland. We are rousing the people to develop our own motherland. So far, from 1997 to till date, we have conducted 19 Janmabhoomi programmes. If the Congress people have love for foreign land, I cannot do anything, but in Andhra Pradesh, Janmabhoomi is a motherland concept. .… (Interruptions) Why are you against this motherland concept? We love our motherland. That is why, everybody is appreciating this Janmabhoomi concept. Even people from Madhya Pradesh, Orissa, Rajasthan and some other States also came to Andhra Pradesh and they had studied about all these programmes. According to this Janmabhoomi programme, every six months, the elected representatives, the officials in that particular Mandal and everybody will go to the villages under the chairmanship of the village PanchayatPresident. We are giving full honour. The Chairperson is convening the meeting. All the officials at the Mandal level will be present in the meeting. So, that is the concept. … (Interruptions) I have to clarify this. The Minister should know it.
When I was an MLA, he was the Chief Minister. The District Planning Committee was not formed by Shri Chandrababu Naidu. The then Chief Minister also continued the system. Even when Shri Janardhana Reddy was the Chief Minister, I was an MLA in the State Legislative Assembly. I used to attend the District Planning Board meetings for some other purpose. There are different powers. The Zilla Parishad local bodies are different. The District Planning Boards are different.… (Interruptions) So, this system is not created by Shri Chandrababu Naidu. The then Chief Minister had created that system. So I want to clarify the position to the hon. Minister of Rural Development.
SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Mr. Chairman, Sir, at the very outset, I must thank the Minister as he has brought this Motion here. But I must say that it is a Motion brought in a casual manner and it is late. Of course, it is better late than never. A little over a decade ago, the 73rd and 74th Amendments to the Constitution were passed, but the dream of Panchayat Raj is standing sound. A few States like West Bengal and Madhya Pradesh were able to register notable examples in this field. Several hon. Members of this House had rightly said about the great contribution of the former Prime Minister, Shri Rajiv Gandhi. But I would like to say that before the enactment of this Panchayat Raj system at the Centre, West Bengal had introduced the Panchayat Raj system more than a decade before.
In the year 1978, the three-tier panchayati raj system was successfully introduced in West Bengal inducting women and also inducting Scheduled Castes. The voting right at the age of eighteen was first introduced in West Bengal. So, we have gathered experience of not only a decade but we have gathered experience of 25 years in panchayati raj system in West Bengal but what is the position in major parts of our country and how is the system being introduced in other States? The States should delegate powers to the panchayati raj institutions because panchayati raj institutions constitute local self-government. May I know from the hon. Minister how many States have passed legislation for devolution of powers to the panchayati raj institutions? I think, most of the States have not done it so far. So, what is the achievement if most of the States have not enacted a law for devolution of powers to the panchayati raj institutions?
Some vital aspects of democratic functioning of the local bodies have to be looked at closely. There should be regular elections. There should be adequate representation of the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes, women, etc. In West Bengal, we have recently finished our three-tierpanchayat elections. I am pleased to say here that not just 33 per cent but more than 42 per cent women have occupied seats in panchayats. I am very glad to inform this august House that in my constituency and in my district, two gram panchayats are completely controlled and run by women. … (Interruptions)
When we are talking about local self-government, we say that local self-government should have adequate legislative powers, executive powers and judicial powers. So, we should introduce the system of nyay panchayats at the grass-root level. Nothing has been done so far about this. This should be looked into.
Some hon. Members have raised the point of direct elections for the post of pradhans and pramukhs. I oppose that idea. No direct election should be there for the district heads or to the heads of blocks. The other point is regarding reservation for the posts of pradhans,pramukhs or district heads or panchayat samiti heads. This should be thought over and should be changed. This idea should be dropped. If we talk about reservation for the posts of pradhans and pramukhs at the district level, why can that system not be introduced at the level of the Prime Minister and Chief Ministers? Reservation of seats is all right but reservation should not be there for the post of head of institution. So, this should be reviewed.
Shri Mani Shankar Aiyar has raised the point that Panchayat is in the State List and we should think over to bring it in the Concurrent List. I oppose to that idea. We should think of strengthening the local system. … (Interruptions)
SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): Mr. Chairman Sir, I am sorry. I must clarify. I did not say that we should think about transferring it. I said that if they have the courage, they can think about it. I did not say that we should transfer it. That is all I want to say. … (Interruptions)
SHRI PRABODH PANDA : It is very kind of you.
The most important point about the Panchayati Raj System is the participation of the people. We are talking about democracy. Democracy means the participatory democracy where the people are involved in the panchayat system. This should be the main thing.
In the State of West Bengal, the commitment for decentralisation of power is already in progress. So, keeping this thing in mind, they have passed the legislation. They are also emphasising for strengthening the local administration, the local self-government. … (Interruptions) I know what you are trying to say. But your leader has already said that panchayat is irrelevant to her. She does not think about the panchayat system. She made a public statement like that.
Sir, I would like to request the hon. Minister, through you, to see how far the panchayat system is running all over the country. The hon. Minister should take an initiative to have a meeting of all the State Ministers to assess and to monitor everything for the better performance of Panchayati Raj System.
Last but not least, without land reforms, the Panchayati Raj System will not be meaningful. So, that should be taken as a priority.
MR. CHAIRMAN : Dr. Nitish Sengupta.
अभी करीब १८ माननीय सदस्यों के नाम सूची में बचे हुए हैं। उसे ध्यान में रखते हुए कम-कम बोलने से ठीक होगा।
DR. NITISH SENGUPTA (CONTAI): Mr. Chairman Sir, I thank you very much for giving me this opportunity. I also thank the hon. Minister, Shri Kashiram Rana for taking the initiative for a discussion on this topic.
Sir, automatically my mind goes back to a fond recollection of the then Prime Minister, Shri Rajiv Gandhi, whose bold vision and whose willingness to take any unpopular steps -- in larger interests-- led to this Constitutional Amendment. But we still remember him. Now, what was his vision and how has it been translated into the ground reality? To my mind, I am sorry to say that there is a lot of difference. I would have said exactly like what my friend, Shri Prabodh Panda said, if I had to speak here on this subject five or six years ago because I did not have the benefit to go to the rural West Bengal and have direct interface with the way the panchayat system is working.
I mentioned about Dr. Bidhan Chandra Roy, who was the first person to introduce panchayat legislation in West Bengal. But his idea was never to politicise it. His idea was that elections should take place to Zila Parishad and Panchayat Samiti and others on a non-political basis. To my mind, the present rulers in West Bengal should not have gone into turning the panchayat institutions into a political battlefield. That has been a very wrong step. Then, panchayats have become just institutionalised local corruption in many cases.
I know of many cases where women have come to power. If there was one idea of the late Shri Rajiv Gandhi of empowering the women, certainly Panchayati Raj Institutions have, to a large extent, done that. But after that this politicisation has been a very bad thing. One of the other things they did was to make the Collector of the district the Chief Executive Officer. Well, I have been a Collector and I have dealt with the Panchayat Zila Parishad as Sabhapati and all those bodies. But for the Collector to be turned into a Chief Executive Officer has been a very suicidal step, as it happened. That means there is no supervision and nobody at the local level is even remotely concerned with the mass-scale corruption that is going on and the Collector cannot discharge his duties properly.
Also he cannot do justice to his duties as the chief person for maintenance of law and order or as Collector of the district and collection of revenue and all that kind of things.
In the elections that took place in the Panchayats very recently, I know and I have seen that in about 20,000 seats the Left Front candidates won them uncontested. … (Interruptions)
SHRI RUPCHAND PAL (HOOGLY): No, it is totally wrong. … (Interruptions)
SHRI PRABODH PANDA : No, it was only in about 6,000 seats. … (Interruptions)
SHRI RUPCHAND PAL : In the Zila Panchayats, there were contests. Please do not tell wrong things here. The elected Presidents were there in 17 districts. … (Interruptions) Elections were held. … (Interruptions) Sir, we cannot provide them with candidates.
DR. NITISH SENGUPTA : Sir, it is only a euphemism. They say that we cannot find candidates because none of our supporters is there. It is only a euphemism. The whole point is and we know that, at least in my own area there is one pocket called Khejuri where the armed gangs went to the houses of the people and threatened the womenfolk. … (Interruptions)
SHRI PRABODH PANDA : It is all wrong. … (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA : They said : ‘If your husbands file the nominations, you will be a widow.’ … (Interruptions)
SHRI RUPCHAND PAL : Sir, he is spreading all canons of untruths. The people have refused all these things. … (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA : No, I have seen it. I have been told by the people. … (Interruptions)
SHRI RUPCHAND PAL : You are seeing the things with coloured glasses. … (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA : No, it is not like that. I have seen it. Women told me that they were threatened with the words : ‘If you have to live the life of a widow, let your husband file his nomination tomorrow; but then, you will have to be ready to live the life of a widow’. This is the kind of thing which happened. This is the kind of Panchayat which is there, which is certainly not the desire of Shri Rajiv Gandhi or Dr. Bidhan Chandra Roy or Shri Balwant Rai Mehta or Panditji or Gandhiji. So, politicisation has not been a correct thing.
Secondly, I will say that the Collector should not have been made the Chief Executive Officer. In fact, I was there in the Government of West Bengal when that was being done and I had discussed with the then Chief Minister who appreciated my point of view. But he said that unless the Collector is involved, nobody will give respect to the institution. Well, he had some point in that.
Today, at the end of it, I feel that that was a wrong step and they should try to reverse their step by making a separate officer equivalent to Collector as incharge of it, as something which happened in Maharashtra. … (Interruptions)
SHRI HANNAN MOLLAH (ULUBERIA): In such a case the development would be zero. … (Interruptions)
SHRI CHANDRAKANT KHAIRE (AURANGABAD, MAHARASHTRA): In Maharashtra the CEO is there. … (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA: Then, talking about corruption and politicisation, because of the in-built inefficiency, every year crores of rupees which go from the Centre are returned unutilised because they do not have the system to really spend the money. That is why I am saying that corruption has taken deep roots.
On politicisation, just yesterday I got a letter regarding the Pradhan Mantri Grameen Sadak Yojana. I was shocked to see that – they have given the figures – not one of my proposals has been accepted by the Zila Parishad. They went on saying no. In the case of my good friend, the M.P. from the neighbouring area, who is from CPI(M), there was ‘yes’ all through for his proposals. All his proposals have been accepted and all my proposals have been turned down by simply saying ‘no’, on the ground that it does not conform to whatever they call as core reality or core plan or something like that. The point is that if that is the decision, they should have told me. This is another example, as I was telling you, of what is happening.
Then comes the question of auditing. I do not know whether those Panchayat Samitis and Zila Parishads are at all audited. If they are audited, why are not the reports published or brought out? I had tried in vein to get the audit reports of a number of Panchayat Samitis. I had written to the BDOs, SDOs, DMs, etc. They are just not able to give it. There is something very seriously wrong with that system. I see that the Comptroller and Auditor General was requested to give some guidelines and some guidelines were given. But then, I do not know what happened thereafter.
About the State Election Commission, the less said the better it is. There was a meeting at Khejuri, the same place that I was talking about where not one person from the Gram Panchayat could file his nomination. Then, when the all-Party meeting held by the BDO took place, the representative of the CPI(M) walked out because he wanted a particular school as the venue which is situated at the heart of the troubled, disturbed, terror-struck area.
That was to be the way. All others suggested some other places and I suggested some other places. The DM said that he was convinced and he would do that, but he said that the Election Commission turned it down. I had also spoken to the officials in the Election Commission. Normally, I do not interfere in these things. They said, ‘Sir, would you please write something or send a fax?’ I did that. Still, the Election Commission intervened to select that particular school which was at the heart of the terror struck area, where nobody from outside would go, as venue for the counting. So, this is the kind of rural democracy that we are living in.
I agree about land reforms. As I said, in fact, if I had to speak on the subject six years ago, I would have said exactly what I have said now, but I am afraid that my exposure to the ground reality … (Interruptions) has given me a new perspective.
SHRI RUPCHAND PAL : Now, he has his political compulsion. … (Interruptions)
DR. NITISH SENGUPTA : No, I have no political compulsion. I have seen that.
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़): आदरणीय सभापति महोदय, देश में सबसे पहले जो पंचायत लगी थी, वह महात्मा गौतम बुद्ध के समय में लगी थी। उसी का अनुसरण करते हुए तथा महात्मा गांधी के सपनों को साकार करते हुए स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी ने पंचायत राज की चर्चा देश भर में छेड़ी और कांग्रेस ने ७३ वां संविधान संशोधन करके पंचायत राज देश में स्थापित किया।
भारतवर्ष आज अन्न उत्पादन में पूरी तरह से आत्मनिर्भर है। हम औद्योगिक विकास के मामले में विश्व में दसवें स्थान पर हैं। जो अंतरिक्ष कार्यक्रम जन हित और देश हित में चलाये जा रहे हैं, उसमें हमारा विश्व में छठा स्थान है। आज समय है जब भारत वर्ष जो कि विश्व की सबसे बड़ी प्रजातांत्रिक शक्ति है, उसकी पंचायत व्यवस्था, उसकी नगर पालिका व्यवस्था को रोजगारोन्मुखी और मजबूत बनाया जाये।
सभापति महोदय, देश में २ लाख ३२ हजार २७८ ग्रामीण स्तर की पंचायतें है,। ६ हजार २२ नगर पंचायते हैं और ५३५ जिला पंचायतें हैं। इन सबको चलाने के लिए २९.२ लाख पंचायतों के प्रतनधि हैं जो इस व्यवस्था को चलाने के लिए बाध्य हैं। इन दस सालों में हमने पंचायती राज लागू करके क्या खोया है और क्या पाया है, उसका आंकलन करने के लिए आज हम इस सदन में चर्चा हेतु इकट्ठे हुए हैं। १०-११ सालों के कार्यकाल में हमारा केन्द्र सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय बहुत से रोजगारोन्मुखी कार्यक्रम अन्य मंत्रालयों के सहारे चला रहा है। मेरा सुझाव है कि इसका समावेश अगर एक मंत्रालय में कर दें, ग्रामीण मंत्रालय को अगर हम पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय कहें तो मेरे ख्याल से ज्यादा उचित होगा । इसके अलावा जितनी रोजगारोन्मुखी योजनायें अन्य मंत्रालयों के माध्यम से चल रही हैं, उनको हम इसमें शामिल कर लें तो एक अच्छा कदम होगा। आर्टिकल २४० (जी) का भी अगर आप अनुसरण करेंगे तो उसके जरिये केन्द्र अथवा राज्य सरकारों में एक समन्वय होगा और पंचायती राज मजबूत होगा।
जो आपका रिसर्च एवं डेवलपमैंट का कार्य है, उसके लिए आपने रिसर्च एडवाइजरी कमेटी का गठन किया है। मुझे कहते हुए दुख होता है कि उस रिसर्च एडवाइजरी कमेटी को गंभीरता से नहीं लिया गया है। उसका अध्यक्ष आपके रूरल डेवलपमैंट का सैक्रेट्री है। आप मुझे बताइये कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के दफ्तर में बैठकर एक अधिकारी क्या देश की सारी पंचायतों पर रिसर्च कर सकता है ? इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। आप विपक्ष के लोगों को विश्वास में लीजिए। हम लोगों ने पंचायती राज का अभियान चलाया था। जिन लोगों ने चलाया, उनमें मणि शंकर अय्यर समेत और भी लोग थे। आप उन लोगों को विश्वास में लें और उनकी राय लेकर काम करेंगे तो उसमें मजबूती मिलेगी।
सभापति महोदय, आर्टिकल २४० (एच) के अन्तर्गत पंचायतों को यह अधिकार दिया गया है कि वह टैक्स वसूल कर सकती है, करों का निर्धारण कर सकती है लेकिन बहुत सारी पंचायतों को यह अधिकार अभी तक नहीं दिया गया।
आर्टिकल२४३ (i) के अंतर्गत राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे राज्य वित्त आयोग का गठन करें। बहुत सी राज्य सरकारों ने इसका गठन किया है लेकिन कई सरकारों ने नहीं किया है। इसलिए आवश्यक है कि आप राज्य सरकारों को आदेश दें कि वे इसका गठन करें। बहुत सी राज्य सरकारें ऐसी भी हैं जहां स्टेट फाइनैंस कमीशन एक बार बन गया, लेकिन दूसरी बार नहीं बना। उनको भी आदेश दें कि वे इसका गठन करें।
आपने जो इंडीपैंडैंट ऑडीटर्स नियुक्त किए हैं, मुझे कहते हुए खेद है कि वे अपना कार्य ठीक से नहीं कर रहे हैं। जैसे अभी एक सांसद भाई कह रहे थे कि पंचायतों में ऑडिटिंग का काम सुचारू रूप से नहीं चल पा रहा है। अशोक मेहता कमेटी को लागू करने की आवश्यकता है। उसमें सुझाव दिया गया है कि पंचायतों में इंटरनल ऑडिटर्स कम फाइनैंशल ऐडवाइज़र की नियुक्ती की जाए जिससे पंचायतों का वित्तीय प्रबंधन मजबूत हो जाए। कई राज्य सरकारों में जिला पंचायत के सीओ को बहुत सारे अधिकार हैं, सरपंच शिकायत करते हैं कि वह किसी की नहीं सुनता, जिस तरह चाहता है, कार्य करता है। यदि ऐसी व्यवस्था रहेगी तो पंचायत राज को नुकसान होगा।
सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि चीफ सैक्रेटरी एक राज्य के मुख्य मंत्री की नहीं माने लेकिन विधान सभा के प्रति जवाबदार हो। उसी तरह जो जिले का सीओ होता है, वह पंचायती राज के प्रति जवाबदार है. लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष के प्रति जवाबदार न हो। यह व्यवस्था ठीक नहीं है, इसे सुधारना आवश्यक है। मध्य प्रदेश जो पंचायती राज लागू करने वाला पहला राज्य रहा है, वहां हम प्रयास कर रहे हैं कि जिला पंचायत अधिकारी की सीआर जिला पंचायत के सदस्य लिखें जिससे वहां उन पर हम अंकुश लगा सकें।
समय के अभाव में दो-तीन बातें ही और कहूंगा। जैंडर इक्विलिटी की बात बहुत से साथियों ने कही। महिला सरपंच, महिला सदस्यों को उनके अधिकार बराबर नहीं दिए जाते, कोशिश की जाती है कि वे मीटिंग में न जाएं। अभी एक सांसद कह रहे थे कि सरपंच पति भी साथ जाते हैं। इस तरह की बातों पर ध्यान देकर महिला सशक्तीकरण की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है।
एक बहुत बड़ा तबका ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन करके रोजगापर ढूंढने शहरों में जाता है जिससे माइग्रेशन हो रहा है। वह इसलिए हो रहा है कि पंचायतों को हम रोजगारोन्मुखी नहीं बना पाए हैं। इसलिए आवश्यक है कि पंचायतों में रोजगारोन्मुखी काम करें।
अभी जापान सरकार ने एक बहुत अच्छा ऑफर भारत सरकार को दिया है। उसका लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने पहल की है, मुझे पता नहीं कि वह किस स्टेज में है, आपने मंजूर किया है या नहीं लेकिन उन्होंने कहा है कि महिला सशक्तीकरण हेतु वे आपको पैसा देने के लिए तैयार हैं, पंचायतों में हार्टीकल्चर को बढ़ाने के लिए पैसा देने को तैयार हैं, पंचायतों में फूड प्रोसैसिंग का काम बढ़ाने के लिए पैसा देने को तैयार हैं। अगर आप सही मायने में पंचायतों को मजबूत करने के बारे में गंभीर हैं तो आगे बढि़ए, इसका फायदा उठाइए और जापान सरकार से मदद लीजिए। विश्व बैंक ने भी यही कहा है।
शहरों की जो हालत है, नगरपालिकाओं की जो हालत है, वे धीरे-धीरे स्लम्स में परिवर्तित होते जा रहे हैं क्योंकि रोजगार ढूंढने वाले लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं। वहां पीने के पानी की समस्या है, ड्रेनेज चोक्ड हो गई हैं, पानी भर जाता है। अधिकांश शहरों में यही हालत है। नगर पालिकाओं को वित्तीय अधिकार दें, नगर पालिकाओं को टैक्स लगाने का अधिकार दिया हुआ है लेकिन वह इम्प्लीमैंट नहीं होता। उनके सुद्ृढ़ीकरण की आवश्यकता है।
अंत में यही कहूंगा कि आप विपक्ष को विश्वास में लीजिए और ऐसे अधिकारी नियुक्त कीजिए, ऐसे लोगों को शामिल कीजिए, बहुत सारे अच्छे एनजीओज़ हैं, बहुत सारे वर्कर्स ऐसे हैं जो आपसे कुछ नहीं चाहते हैं लेकिन पंचायतों में गांवों मे रहकर काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों का गठन कीजिए। ऐसे लोगों को मुख्यधारा में शामिल करके अगर पंचायतों को चलाएंगे तो बहुत मजबूती मिलेगी।
श्रीमती आभा महतो (जमशेदपुर) :सभापति महोदय, आज जिस विषय पर चर्चा कर रहे हैं, मैं अपनी सरकार को और मंत्री जी को धन्यवाद कहूंगी कि दस वर्ष की समीक्षा करने संबंधी हम यह प्रस्ताव लाए हैं। मैं उस स्टेट से आती हूं जहां बीस वर्षो से पंचायत का चुनाव नहीं हुआ है और वह झारखंड राज्य है। हमारा देश प्रजातंत्र देश है और प्रजातांत्रिक देश में सत्ता का विकेन्द्रीकरण होना चाहिए तभी जाकर हम अंतिम व्यक्ति तक विकास कर पाएंगे और उसी के तहत पंचायती राज आता है जिसके माध्यम से गांवों का और अंतिम व्यक्ति का विकास कर पाएंगे। मैं जिस राज्य से आती हूं, वहां अभी पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। हमारे मंत्री महोदय ने बताया कि पांडिचेरी और झारखंड में पंचायत के चुनाव नहीं हुए हैं। मैं चाहूंगी कि वहां भी पंचायत चुनाव हो। सत्ता अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे लेकिन कुछ ऐसे प्वाइंट्स हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है और मैं मंत्री महोदय के ध्यान में ये बातें लाना चाहती हूं।
हमारे झारखंड में शैडयूल एरिया है और उसमें यह प्रावधान है कि पचास प्रतिशत जहां हमारी आदिवासी पोपुलेशन है, वहां रिजर्वेशन का प्रावधान है। लेकिन हमारे सांसद प्रदीप यादव जी हमारी सरकार की तरफ से बोले थे। उन्होंने भी यह बात आपकी जानकारी में लाई है कि हमारे झारखंड राज्य में शैडयूल एरिया में वहां यह प्रावधान किया गया है कि वहां अगर एक घर भी आदिवासी का हो तो उस पंचायत को रिजर्व किया गया है। हमारे संसदीय क्षेत्र में भी वाघवेड़ा में किया गया है जिसमें एक आदिवासी घर है और बाकी लोग जनरल हैं, एससी और एसटी के लोग भी हैं तो उसमें कुछ संशोधन हो और जिस तरीके से आरक्षण लागू है, जहां पचास प्रतिशत की आबादी एसटी की है, वहां यह सुविधा दी जाए। इससे सामाजिक समीकरण भी बना रहेगा और गांवों में लोग जिस प्रेम भाव और भाईचारे से रहते आये हैं, उनमें अव्यवस्था भी न हो। ये प्वाइंट्स जरूरी हैं। वहीं मेरे शहर जमशेदपुर में नगर पालिका की सेवा कम है और टाटा स्टील ‘टेलको’ ाम्पनी है, वे लोग मैनेज करते हैं। टाटा कम्पनी और टेलको का जो एरिया है, जो उनके द्वारा मेनटेन किया जाता है, वहां व्यवस्था बहुत अच्छी है लेकिन उनसे हटकर जो बस्ती है, उसमें बहुत समस्या है क्योंकि मेन्टेन करने के लिए वहां न नगर पालिका है और न टाटा के द्वारा मेनटेन होता है। इसलिए मैं चाहती हं कि वैसे एरिया में भी नगर पालिका की व्यवस्था की जाए और नगर पालिका का चुनाव हो जिससे वहां की व्यवस्था को हम लोग और सुद्ृढ़ कर सकें।
अभी जैसे बहुत सारे सदस्य बोल रहे थे कि सुविधा कैसे दी जाए। मणि शंकर अय््यर जी ने भी अच्छी तरह से अपनी बात रखी जिससे मुझे लगा कि उनको कहीं न कहीं दर्द है। वह अधिकारी के ऊपर बहुत जोर दे रहे थे। उन्होंने अधिकारी को यह भी कहा कि वे गुलाम हैं सैकेंड लैवल के लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि अधिकारी गुलाम नहीं हैं और उनसे हमको क्या दुश्मनी है। वे हमारे तंत्र हैं जिनके माध्यम से हमें काम करना है। वे हमारे सहयोग के लिए यहां हैं, चाहे ब्लॉक के बीडीओ हों या सी ओ हों - उनके प्रति गुलाम और मालिक और राजा और प्रजा वाली बात नहीं है। वे सहयोगी के तौर पर हैं। उनका जो आदेश है कि यह कार्य करना चाहिए, वे करते हैं। प्रखंड विकास पदाधिकारी उनका नाम है। विकास करना उनका ही काम है।
चाहती हूं कि अधिकारी गुलाम नहीं हैं और उनसे हमको क्या परेशानी है। वे हमारे तंत्र हैं जिनके माध्यम से हमें काम करना है। वे हमारे सहयोग के लिए यहां हैं, चाहे ब्लॉक के बीडीओ हों या सी ओ हों - उनके प्रति गुलाम और मालिक और राजा और प्रजा वाली बात नहीं है। वे सहयोगी के तौर पर हैं। उनका जो आदेश है कि यह कार्य करना चाहिए, वे करते हैं। प्रखंड विकास पदाधिकारी उनका नाम है। विकास करना उनका ही काम है। उनके काम में हमें सहयोग करना चाहिए और उनको भी सहयोग की भावना से कार्य करना चाहिए। फिर हमें लगता है कि मणि शंकर जी जैसे और सदस्य भी दुखी नहीं होंगे।
जहां तक महिलाओं की भागीदारी की बात है, मैं मानती हूं कि महिलाओं को पंचायत के माध्यम से भागीदारी मिली है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए मैं सरकार को धन्यवाद देना चाहती हूं। मैं यह भी चाहती हूं कि हम लोग गांव से जुड़े हुए हैं, गांव में भी महिलाएं पंचायत में चुनकर आई हैं। झारखंड में तो अभी चुनाव नहीं हुए, लेकिन बिहार में महिलाएं पंचायत के चुनाव में जीतकर आई हैं। बिहार में जैसी स्थिति सुनी कि अपना हक लेने के लिए कोर्ट में जाना पड़ा। मैं नहीं जानती कि वह महिला है या पुरूष। लेकिन ऐसी परिस्थिति नहीं आनी चाहिए। उनको हक मिलना चाहिए। महिलाओं के कार्य करने की प्रवृत्ति जो है, जो अधिकार हैं, उसके माध्यम से कार्य होना चाहिए। बहुत सारी महिलाएं आज गांवों से जुड़ गई हैं। जो पूरी तरह से पहले घर से नहीं निकलती थी, आज वे पंचायत के दफ्तर में जाकर बैठती हैं और कार्य करती हैं। इस सम्बन्ध में मेरा निवेदन है कि उनको जिला स्तर पर ट्रेनिंग देने का काम भी होना चाहिए। चाहे महिला हो या पुरूष, उनको ट्रेनिंग दी जाए और बताया जाए कि ऐसे फंड अवेलेबल होगा और ऐसे आप काम कर पाएंगे। इस तरह की ट्रेनिंग जिलों में छ: माह में या एक साल में एक बार अवश्य हो तो ज्यादा उपयोगी काम वे लोग कर पाएंगी।
जहां तक फंड की बात है, एम.पी. लैड में सांसद ने कितना काम किया है, यह बात वह लोगों को बता सकता है और कामों के नाम गिना सकता है। जिलों में बहुत ज्यादा फंड आता है, उस लिहाज से एम.पी. लैड कम है। लेकिन इसी तरह की व्यवस्था पंचायत में भी की जाए और पंचायत प्रमुख को फंड मुहैया कराया जाए, जिससे वह अपने यहां कार्य करा सके और उस पैसे का उपयोग कर सके।
मैं धन्यवाद देना चाहती हूं कि हम आज इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। उम्मीद है कि मंत्री जी मेरी बातों पर ध्यान देंगे।
SHRI KHAGEN DAS (TRIPURA WEST): Mr. Chairman, Sir, thank you for giving me this opportunity to speak on this important motion.
With the passage of the Constitution (Seventy-Third) Amendment Act and the Constitution (Seventy-Fourth) Amendment Act in 1992, the Panchayati Raj Institutions were given Constitutional status and the three-tier Panchayati Raj system was formed to ensure people’s participation in rural development. PRIs may be the bedrock of India’s rural development but, has this new area in our federal democratic system delivered the results expected from it? Unfortunately, PRIs are not equally effective everywhere in the country. Lack of political will and class interests stand in their way. It is a crude reality.
Political indifference on the part of the Central Government as well as several State Governments has delayed matters and created difficulties. It may be pointed out that PRIs are forced to accept funds under Centrally-sponsored schemes under the financial clout of the Central Government. It is certainly a deplorable situation. I would like to speak about the weaknesses of the PRIs which have been identified through several mechanisms over the years but have not yet been removed. I will not go in to the lacunae due to paucity of time.
The National Commission to review the working of the Constitution has suggested an amendment to the Constitution to devolve financial powers to Panchayats.
20.00 hrs. The objective stated to be is to develop them as institutions of self-governance.
Sir, two conferences of the Panchayati Raj Ministers have been held by the Central Government -- one in July, 2001 and the other in April, 2002. These conferences had rightly identified many lacunae. All these are on record. I would request the hon. Minister to go through the minutes of these Panchayati Raj Ministers’ Conferences. It was also decided in the meetings that an Amendment to the Constitution shall be brought about to ensure speedy and effective devolution of financial and administrative powers to Panchayats. This was followed by several statements by the Union Ministers in support of the Amendment to the Constitution. It was also stated that the meetings shall be held with all the Chief Ministers followed by a meeting with all the political parties under the chairmanship of the hon. Prime Minister to evolve necessary consensus in this regard.
So, Sir, I would request the hon. Minister to ponder over it. What has happened after that? All these things have remained as mere talks. There is a feeling that the Central Government is not really serious about the strengthening of the Panchayati Raj Institutions. I would strongly urge upon the Government to get out of the lethargy and actively initiate discussions to evolve a consensus for strengthening the PRIs.
Sir, coming to the functioning of different Panchayati Raj Instittutions, I would proudly say that Tripura is the second State in the country to hold elections to the Panchayati Raj for all the three tiers. In fact, even prior to the Constitutional Amendment, Tripura has been holding Panchayat elections regularly from 1978 onwards after the Left Front Government came to power in Tripura, and these bodies were effectively involved in all the decision-making. I can proudly tell this hon. House that the Tripura Government has taken every step to implement all the schemes, decisions as per Seventy-third Amendment of the Constitution, except one. What is that? That is the constitution of District Planning Committees.
Sir, in Tripura, substantial parts of State are covered under the Sixth Schedule Areas where provisions of Article 243 (ZD) could not be found feasible to be extended for constituting these District Planning Committees. The matter has been brought to the knowledge of the Central Government but the decision of the Government is still awaited. Till today, there is no decision. I would again submit to the House that in Tripura no decision or project can be implemented without the full involvement and participation of the PRIs.
Sir, with regard to the utilisation of funds, I would proudly say that Tripura is one of the best States in the country. Over the years, the PRI system has become strong and vibrant in Tripura, and all these facts have been appreciated by the Government of India.
Now, I come to the Panchayat elections which were very recently held in West Bengal. The sixth Panchayat election in West Bengal marked a resounding victory of CPI(M) and the Left Front as a whole, in view of the all-out heinous campaign and false allegations of violence against the Left Front, CPI(M), as well as the formation of joint alliance by opposition parties. It is also a significant and positive response to the glorious success of the Panchayati Raj system in West Bengal. Massive victory has been achieved because of the Left Front’s firm stand to defend the interest of the people and to safeguard and strengthen the democracy at the grass root level. Today, no decision or project can be implemented in rural West Bengal without full involvement and participation of PRIs. Operation Barga has created a social and economic miracle for the weaker sections in West Bengal. Panchayat elections in West Bengal drew a close attention from the people and the Media all over the country because of the fact that it has put into practice the most democratic and centralised systems so far.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Thank you Chairman, Sir. I stand here to support the Motion moved by the hon. Minister. Practically, today, the motion is mainly dealing with the progress of the implementation of Part IX and Part IX(A) of the Constitution during the last 10 years. Practically, we are discussing about a Progress Report. We are discussing as to what we have done within the last 126 months. With the introduction of three-tier Panchayati Raj system to enlist people’s participation in rural reconstruction, the Panchayati Raj institutions have a great role to play. According to the Constitution, Panchayats shall be given powers and authority to function as institutions of self-governance. That is the basic idea on which the amendment was done. The powers and responsibilities delegated to these institutions are basically three.
One is the preparation of a plan for economic development and social justice.
The second is the implementation of schemes for economic development and social justice in relation to 29 subjects given in the Eleventh Schedule of the Constitution.
The third is to levy, collect and appropriate taxes, duties, tolls and fees.
At this juncture, according to the 73rd Amendment, two things have been demonstrated within the last 126 months.
One is that elections have been ensured.
The second is that Gram Sabhas have been effected.
Earlier, though elections were there, after IndependencePanchayats have come into force. After Balwantrai Mehta’s Report, in early 60’s or late 50’s, these institutions came in a big way. Earlier Mr. S.K. Dey came in with the idea of community development. I am reminded of certain names, because they are mentioned here. In the mid-50’s, Bhagini Nivedita was totally opposed to the community development project, that was launched by Pandit Nehru. She categorically had stated;
"The community development does not go in tune with Gandhiji’s Gram swaraj. "
She had stated that. She was a true Gandhian. She had said that in mid- 50’s. Now, we have taken a lot of time. Already five decades have passed. Practically, now we are discussing about Panchayatiraj. I have been hearing for the last four or five hours. What I have been hearing is as to how to give more power to the Panchayati Raj institutions to make them self-reliant. Gandhiji’s idea during freedom struggle was to attain Swadheenta , as we used to say it. Firstly, you have to be aware about your Swadhikar.
Then you become swabalambi. Swabalamban was the word used for self-reliance. Then, you can attain independence or Swadheenta;and then swaraj will come. These are the four stages which he used to say in his speech.
I would confine my speech to basically two aspects with which the Resolution is concerned. Many good things have been said aboutgram sabha. I have a different viewpoint totally. Of course, some hon. Members have mentioned how the gram sabha was functioning. My experience has been that gram sabha is a sham, a hoax. I need not explain that. It is said that gram sabha would exercise such powers and perform such functions at the village level as the legislature of a State. This is not happening. No power has been given to the gram sabha in that respect.
Secondly, it is also said that all the villagers above the age of 18 years would have an inherent right to determine their own destiny. They do not determine which project is going to be implemented, where and who is going to do the job. Are they going to determine their own destiny by deciding this programme?
Thirdly, it is also mentioned that gram sabha is the forum where marginalised poor can influence decisions affecting their lives. Is it happening anywhere at all? Let us ask ourselves. Is it happening anywhere? I would like to ask this House as to how the system has worked during the last 126 months. Let us truthfully analyse our experience in this regard. My experience is no less than others. Let us not fool ourselves. It is of course an utopian idea to expect the people to prepare their own plan of development. Nobody is against it nor am I. But the moment fund is allotted for a specific job and gram sabha is called, the village is divided into two groups, if not three; and no decision is taken.
Finally, it is the observer or the employee from the Block level or the panchayat samiti who is deputed to oversee the meeting, decides whether a job is to be done or not done. Then, how can we say that the marginalised poor influence the decisions that are affecting his life? Rather it is the authority which decides. So, why do we do all these things under the garb or in the name of the people?
As I have mentioned earlier, there are three stages to make the gram sabha successful. Firstly, gram sabha would exercise powers and perform such functions as the legislature. Let those powers be given first and it should be allowed to function as such. Secondly, it should be in a position to generate its own resources. Funds being provided by the Centre or the State do not create responsibilities. Nowadays, panchayats are just a mechanism to utilise funds. this mechanism does not create responsibilities; rather, it is only a delivery point. Thirdly, during the last 57 years, one thing that we have learnt fully and truthfully is that we have became aware about our rights. We seldom remember about our duties and responsibilities.Panchayati raj as conceived by Gandhiji was something else. It is not the panchayati raj of today. Gandhiji had said about swabalamban, self-reliance or self-sustenance, which would make us non-dependent on others. But today, we talk of Japan and we talk of World Bank, etc. What is happening today?
Panchayats are dependent on the State machinery. Unless money comes from the Centre or the State, there is very little work for them to do. Today, the Executive is expected to do all sorts of rural development through Panchayats. In many districts, by-passing the district administration, gram sabha is being pampered. But as far as I understand, the moot point of gram sabha is to make the functioning of the administration more transparent.
That is what has been mentioned here. Gram Sabha has a key role in bringing about transparency in the functioning of the Gram Panchayats. I would request the hon. Minister through you that we should give more stress on making the functioning of the Panchayats more transparent through Gram Sabhas. I would come to that point a little later.
People should know what the programme is, how it is being implemented and at what cost. But the moment you allow Gram Sabha to prioritise the development projects or works, all hell is let loose.
Selection of beneficiaries of various schemes of the Central Government undertaken for rural development is also done in a hush-hush manner. My humble request to this august House is that Gram Sabhas should be a mechanism to make administration transparent and not the decision making body.
The Eleventh Finance Commission has recommended Rs.1600 crore per annum for rural local bodies of this country. As has been mentioned earlier, at present there are about 2,32,278 Gram Panchayats, 6022Panchayat Samitis and 535 Zila Parishads. These panchayats are being manned by about 33 lakh elected representatives. If we calculate about one-third of this to be reserved for women, one can understand the number of women who have been elected. But the problem not lies with the election but with the dummies, as has been mentioned here.
Today with the three-tier system, the members who are elected jointly either to Panchayat Samitis, or as in Andhra Pradesh, for Zila Parishads, the nominees have a little role to play in the functioning of Panchayati Raj System throughout the country. We have one system in Andhra Pradesh and another in Bihar, Orissa or Maharashtra. Why can we not have a uniform elected body throughout the country irrespective of the States?
I would now come to the second aspect of my discussion. Though elections are being held regularly with ample participation of the people, there is only minimum administrative and fiscal decentralisation, which is still under the control of the State Governments. I would suggest that the recommendations of the State Finance Commissions be accepted fully by the Government. Powers be given to the State Election Commissions to deal with all matters relating to Panchayat elections, namely, delimitation of constituencies, rotation of reserved seats in Panchayats, finalisation of electoral rolls, etc. Thirdly, Gram Sabhas should be the nodal agency to make the functioning of the panchayats transparent.
Lastly, there is a need for audit. The officials and non-officials in the Panchayati Raj bodies who handle public money will have to satisfy the taxpayers about the proper utilisation of the amounts placed at their disposal. This necessitates the audit of accounts of all such bodies by an agency not subordinate to the expending authorities. It is with this object in view that an independent Auditor is required on behalf of the taxpayer. The Auditor has to certify the amounts advanced to the Panchayati Raj bodies as grant-in-aid. He has to ensure regularity and propriety of expenditure of public money and its proper accounting. Further, the account is an instrument of detecting cases of wastage, misappropriation and mis-application of funds and leakage of revenues. Therefore, Gram Sabha as the primary body can act as a very significant and interesting dimension so far as accountability of these bodies is concerned.
The annual accounts including the audit report be submitted to the Gram Sabha for review and approval of the people’s body.
सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए। आप माननीय मंत्री जी को अपने सुझाव लखित में विस्तार से भेज दीजिएगा।
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : Sir, I just need another two minutes. The aspect of accountability is most central for the success of the system because of the fact that massive funding is being made available to the local bodies both by the Centre as well as by the States. If we take 22 December, 1992, which was the landmark day of passing 73rd Amendment as the basis, more than a decade has passed. Gandhiji’s vision of making every village a self-reliant unit is yet to be translated into reality. But the 73rd Amendment is the bedrock of India’s rural development and poverty alleviation efforts. It has the potential of building a progressive India in harmony with the felt needs and aspirations of the people. The time has come that we should go for second generation Panchayati Raj reforms now.
SHRI K.P. SINGH DEO (DHENKANAL): Sir, first and foremost, I would like to compliment the hon. Minister for Rural Development, Shri Kashiram Rana and his Ministry for bringing this very comprehensive paper, the background note, and the motion that this House do consider the progress of implementation of Part IX and Part IX-A of the Constitution (dealing with Panchayats and Municipalities as institutions of self-government) during the last ten years. I also compliment him for his patience as he has been cheerfully bearing with us all the points. These two comprehensive papers have shown that the progress, whether it is elections, reservation, constitution of State Finance Commissions -- which should be mandatory -- State Election Commissions as well as the progress in the implementation of the discretionary provisions of the 73rd Amendment Act, preparation of plans for economic development, social justice and implementation of schemes as may be entrusted to them including those in relation to matters referred to in the Eleventh Schedule, is very slow and disappointing.
Sir, I would like to take this opportunity also to pay my humble tribute to the conviction, courage, determination, ethos, and vision of our late Prime Minister Shri Rajiv Gandhi who introduced the two – 72nd and 73rd Amendment Bills which later became 73rd and 74th Amendment Bills where I was also associated with one of the Joint Committees as Chairman. He did not live to see the day but he gave us the courage and inspiration. I appreciate Shri P.V. Narasimha Rao also. Although he was carrying on a minority Government, yet he could get the combined wisdom of the House to support the Bill.
Here I would like to compliment my colleague, Shri Mani Shankar Aiyar. It had been a mission with him since the day he has come to Parliament and today power to the people and decentralisation of democracy is a reality.
There are many things which are unsatisfactory. One gets some indication from these two background notes. One is the functions and the functionaries. Therefore, I compliment the Department, including your former Ministers Shri Shanta Kumar as well as Shri Venkaiah Naidu, for setting up a Task Force on the devolution of powers and funds, which had made social audit of untied funds mandatory. It has also given importance to Gram Sabhas. The Standing Committee on Urban and Rural Employment has also given recommendations on 22 September, 2002. The Ministry of Finance has realised it and it has made provisions to raise extra budgetary resources.
The Tenth and the Eleventh Finance Commissions and the C&AG had to give the Government guidelines since the fiscal discipline and accounting was not satisfactory. The Ministry of Rural Development had to give further instructions. The Government had two meetings with the Ministers of Rural Development of the States. I am complimenting the Government for this initiative because in the last ten years the implementation has been tardy. It has not been as per the spirit of either the 73rd or the 74th amendments. It has not been implemented in letter and spirit. It has either been by violation or the State Governments have been recalcitrant or reluctant to implement it, as is indicative from the two papers that the Government has given. So, I compliment the Ministry for this initiative. But we should not be helpless. I would come to that a little later.
Sir, the same thing is there in the other background note for IX-A as well. But here the audit and accounts of the municipalities has been left totally to the discretion and wisdom of the State Governments, unlike the ones for the Panchayati Raj Institutions and C&AG. Here it is delightfully vague. The Committee for District Planning and Metropolitan Planning still has not seen the light of the day. This was in the 74th amendment.
Sir, amendment to article 280 of the Constitution now makes it mandatory for the Central Finance Commission to give devolution. The Tenth Finance Commission gave rupees one thousand crore to the municipalities, as has been mentioned by the hon. Minister. I am not talking of the Panchayati Raj institutions. That was about rupees four thousand odd crore and this time it is Rs. 8,000 crore. The Eleventh Finance Commission has given Rs. 2,000 crore to the municipalities. But what about the State Finance Commissions? It is not mandatory. It is only recommendatory in nature. So, the municipalities and panchayats have been left to the whims, fancies and patronage of the State Governments and others. They still have to go with a begging bowl because their finances are in a precarious condition. Therefore, what is required is a time-bound action plan for Panchayati Raj and the municipalities, specially at a time when Panchayati Raj institutions and the municipalities, that is the local self-government, have become irreversible and have made some way towards institutionally making India not only the world’s largest democracy but also the most representative democracy of achieving a very high significance.
Sir, today we have 30 lakh representatives. This was the vision that the late Rajiv Gandhi had. Ten to twelve lakhs people vote for one Member of Parliament whom they may see once in five years or even may not see. One and a half lakhs people vote for an MLA, whom they may not see for more than a dozen or two dozen times in that period. But here is someone who will be nearer their homes, who will be known to them intimately and who they will see daily. Today we have ten lakhs women who are representing us and this is a great step towards participatory democracy.
Sir, what we lack today is empowering these elected bodies to function as institutions of local self-government and it is at best disappointing as the two background notes have brought out. I compliment the Government for giving us this objective note. What is required is a draft road map for five years. In the Sports Ministry you have a long term development plan for four years coinciding with the Olympics or the Asian Games. But here on a subject that touches the heart and soul of everyone – the Panchayats -- we do not have a road map. There is no effective devolution. What is required today is subsidiarity, that is, small things that they can do and for bigger things that are beyond them, the Centre or the State Government can help. What is required is not discretion but a mandatory, statutory legislation to make it absolutely permanent. What is required is clearly demarcated subject-wise areas, which is known as activity mapping, and what is also required is a symbiotic process – not discretionary but with a discussion.
The Eleventh Finance Commission has started giving awards. Let me take a little pride and privilege of having been associated with this Joint Committee. What we require is that we must preclude diversion of the Finance Commission awards temporarily or permanently. We have seen that even the Defence Ministry funds approved by Parliament are diverted towards drought. Last year Rs.9300 crore could not be spent. Therefore, we must ensure that there is no diversion, there is no centralisation in the name of decentralisation and that the Centre as well as the State Finance Commission grants should be mandatorily and strictly monitored and social audit done, which is not so as far as the State is concerned.
As far as the functionaries are concerned, it should be subordination of the bureaucracy to the elected representatives. I am sorry, I cannot agree here with my very eminent friend, Dr. Nitish Sengupta because I also come from a State where we see how these officers are being used or misused by the threat of carrot and stick policy. Therefore, there should be a legislation and the DRDA should be totally merged with the Zila Parishad. We should not have two parallel bodies or dichotomy like the Government of India Act of 1935 so that authority and discipline are ensured and the municipalities as well as the Zila Parishads should have the freedom to decide what should be the number and the size of the bureaucracy or the technical persons on their role. We should free them from the excess staff burden as is prevalent. There should be a review system not by the bureaucrats or the elected representatives, but it should be replaced by a peer group like we have in Parliament and in the State Assemblies.
Then I come to the question of planning. The District Planning Committees, as the background note indicates, is only a pious intention. But it is not being implemented so far except in two or three States. Therefore, the planning for economic development and social justice should be indicative rather than coercive from above. This has been the sense of the House for the last fifty years. We are getting an opportunity of discussing this after ten years. So, this must be ensured by legislation because discretion has not worked in the last ten years.
Since we are living in an age of information technology, since the Panchayats and Zila Parishads and the municipalities may not be having as gigantic an expert body like the Planning Commission, we could share through information technology the data and information which is reliable, independent and timely at our disposal because that is the essence of all planning. So, the attitude of the Planning Commission must change. It must recognise that Panchayati Raj and municipalities have a crucial role to play as far as the grassroots planning and grassroots economic democracy is concerned and power to the people is concerned.
As for the implementation that is going on, the paper indicates what the Zila Parishad and municipalities are doing. They are not elements of local self-governments. They are only implementing the orders of the Central and the State Governments. This must change. There is nexus between bureaucrats and the vested interests or the elected persons. That is why corruption is decentralised and therefore it invites a participatory role for all elected representatives. There should be more participation. This is where effective participation can come and people’s parliament can come. The Gram Sabhas should be given statutory recognition. Today it is a sham. Today Gram Sabhas are meeting in contractors’ homes with gunmen going around. So, they are forced into agreeing. They do not give their own opinion.
It is happening not in Bihar but in Orissa. Sir, I am sorry that we are competing with your State as to who will be better. There must be total transparency as far as selection of beneficiaries is concerned. So, Gram Sabha must be empowered. Only then, we will know as to who is under BPL or APL and who is not. It cannot be done from an air-conditioned room from the district headquarters.
Sir, about 50 per cent of our people are women. Shri Rajiv Gandhi, a young man, was barely 40 years old when he became the Prime Minister of our country. He had the vision to involve the Scheduled Castes and Scheduled Tribes and women in the process. Today, India is the oldest civilisation which is 5000 years old and is also the youngest nation in the world. Nearly 40 per cent of our population consists of youths. Therefore, they must be totally involved in the process, which is not happening today. The reservation of Scheduled Castes and Scheduled Tribes is in an anomalous situation. There is a lot of anomaly because, as Shri Bhartruhari Mahtab was saying, there is no uniformity in approach. As far as the Scheduled Tribes are concerned, the less said the better because, in the most insensitive and non-humanitarian way, the Forest Conservation Act is being clamped on them. They have been uprooted from their places. For centuries, they have been staying there before the Forest Conservation Act came in 1980.
MR. CHAIRMAN : Please conclude now.
SHRI K.P. SINGH DEO : Sir, I am concluding after giving a few suggestions. What is required today is the entire review of the whole thing and it should be continuously reviewed. What is required is, restructuring of the rethinking process as well as the apparatus which has been there for the past ten years which has not served us fully and effectively. What is necessary is to legislate and empower them. What is necessary is effective monitoring, responsibility and accountability. What we require is a smart Government.
Before I conclude, I would like to speak on one point which is about the Members of Parliament and MLAs. I would like to speak about the MPs. The distinguished predecessor of the hon. Minster, Shri Shanta Kumar, very kindly responded when the hon. Members raised the issue here. You know that Shri Ram Vilas Paswan had stated that not a single penny was being spent in his constituency in this regard. I am sorry that it is your State. Shri Dasmunsi raised the point that he was humiliated by the district administration in Raiganj. Shri Shanta Kumar wrote a letter to me in February. I had written to him in December. Two successive Finance Ministers, Shri Yashwant Sinha and Shri Jaswant Singh, and he himself had given a solemn assurance on the floor of the Parliament that this is a centrally sponsored scheme and therefore, the hon. Members of Parliament will be associated right from the conceptual stage, that is, when the RD programmes are going on and that they will be associated when the foundation stone will be laid as well as during inauguration. It is implemented by not following any of the assurances. I do not wish to bring the matter under privilege but Members of Parliament are being humiliated everywhere. Sir, why do they humiliate us? You may take us out of the purview. We are spending Rs. 1 crore everyday. We are sitting here in Parliament till 9 p.m. But please do not humiliate us. You have appointed us as the Chairmen of the Vigilance Commissions. Shri Bhartruhari Mahtab is the Chairman in one district and I am the Chairman in both the districts. We are not consulted and not even treated properly. Is there nothing that you can do ? You will take some plea or the other as Shri Arun Shourie does when we raise the question of MPLADS. May I suggest to invoke article 256 of the Constitution where you have the residuary right to direct the State Governments and take it along with article 365, if the State Governments are not listening to you and the Parliament.
सभापति महोदय : श्री नचियप्पन अपना लखित भाषण सभापटल पर रखेंगे। बाकी सदस्य जो लखित भाषण देना चाहते हैं, दे सकते हैं।
*SHRI E.M. SUDARSANA NATCHIAPPAN (SIVAGANGA) : Respected Chairman, the motion moved by the Government has asserted that 3-tier system of Governance accepted as part and parcel of the Constitution of India by effort of Shri Rajiv Gandhi. The youngest Prime Minister of Indian Republic had a dream of the Superpower – India in 21st century.
Mahatma Gandhiji had succeeded in Freedom Fight by telling the people of India and throughout the world "Rama Rajya is Gram Rajya". Pandit Jawaharlal Nehru implemented the slogan of Mahatma Gandhi by giving powers to Panchayat. Smt. Indira Gandhi followed by pumping the Central fund to the Panchayat through the State Government having slogan of "eradicate the poverty – Garibi Hatao".
Shri Rajiv Gandhi made a direct funding to Panchayat from Government of India by sending D.D. to the Presidents of Panchayat. That is the best showed the roadmap for the Constitutional Amendment creating three tires of Governance. The 73rd and 74th Amendment to the Constitution of India has been implemented by different Governments of States. But the real implementation in certain States such as West Bengal, Madhya Pradesh and Maharashtra had given different lessons. The rural poverty is tackled when 29 powers were vested to the Panchayat.
The State such as Tamil Nadu has utterly failed in this aspect as they never devolved the 29 powers to Panchayat as per the Constitutional Amendment. The elected representatives in Tamil Nadu are powerless. The development of the rural areas, towns and cities are at the lowest level due to this situation. Hence, the Government of India should bring amendment to Article 243 G by placing the word ‘shall’ in place of ‘may’.
Then the system of election should have the reform so that political parties should participate in general election by which ward member of Panchayat to Member for Assembly and Member of Parliament in one ballot paper, just like U.S.A. This type of election will bring the same party from Panchayat, State and Nation so that within five-year period, they can discharge the duty with all accountability.
That day will be the day for real democracy in India.
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*Speech was laid on the Table.
प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर): मान्यवर सभापति महोदय, संविधान के भाग ‘9क’और ‘९ख’के सन्दर्भ में पिछले १० वर्षों के अन्दर पंचायती राज में कितनी प्रगति हुई है। देश के अन्दर कैसी क्रियान्विति हुई और क्या-क्या बाधाएं उपस्थित हुई हैं, इसके बारे में समीक्षा करने के लिए मैं भारत सरकार को बधाई देना चाहूंगा।
इस प्रस्ताव का मैं पुरजोर समर्थन करता हूं। जैसा हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४० में उल्लिखित है कि राज्य ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए और स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए सभी शक्तियां एवं अधिकार सौंपने के लिए कदम उठायेंगे। इसी संदर्भ में श्री बलवंत राय मेहता की समति बैठी। उसके बाद श्री अशोक मेहता की समति बैठी। उन सभी की सिफारिशें प्राप्त होने के बाद और पंचायत राज लागू होने के बाद भी कई बुराइयां इसे प्रभावित करती रही हैं। खासकर पंचायत के चुनावों में पर्याप्त विलंब होता रहा, पंचायती निकायों के चुनाव में बार-बार स्थगन होता रहा। कार्यालय और वित्तीय स्वायत्तता के बारे में उनको अधिकार नहीं थे। सीमांत एवं कमजोर वर्गों का पर्याप्त प्रतनधित्व होता था परन्तु सरकारी अनुदान नहीं मिलता था। इन सब बातों के कारण ७३ वां संविधान संशोधन १९९२ में आया और वर्ष १९९३ में वह लागू हो गया। इसके लागू होने के बाद, पिछले १० वर्षों से यह पंचायती राज व्यवस्था चली आ रही है। मैं राजस्थान की वस्तुस्थिति के बारे में कहना चाहूंगा। जैसे आपने एक बार इस सदन के अंदर कहा था कि "तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता अंखियन की देखी।" लोग कागज में लिखी हुई बात कहते हैं लेकिन मैं प्रत्यक्ष बात कहना चाहता हूं।
त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था तो बन गयी लेकिन यहां ग्राम सभा, ग्राम सभा बार-बार कहा जा रहा है, वस्तुस्थिति यह है कि में मेरे गांव के अंदर जब सरपंच ग्राम सभा को बुलाता है तो बहुत कम लोग इकट्ठे होते हैं। उनमें कोई जागरूकता नहीं होती कि हमारे ग्राम के बारे में निर्णय लेने के लिए कौन सा काम पहले लेना है और कौन सा काम नहीं लेना है। कौन सी योजना पर पैसा कैसे खर्च करना है, उसके बारे में विचार-विमर्श करने के लिए इकट्ठा होना है या नहीं। वहां बहुत कम लोग इकट्ठे होते हैं। कई बार सरपंच भी चालाकी करता है। वह समय कुछ और दे देता है और लोग इकट्ठा बाद में होते हैं। फिर रजिस्टर पर सभी लोगों के हस्ताक्षर ले लिये जाते हैं। प्रस्ताव वगैरह बाद में घर पर लिख लिये जाते हैं। इस प्रकार की ग्राम सभा की जो स्थिति है, जब मूल में ही इस प्रकार की स्थिति है, तो हम अनुभव कर सकते हैं कि आगे विकास कैसे होगा। इसकी हम कल्पना कर सकते हैं। यह मैंने वास्तविकता का नमूना मैंने आपके सामने प्रस्तुत किया है।
हालांकि इस पथ का उद्देश्य नहीं है शांत भवन में टिक जाना, परन्तु पहुंचना उस मंजिल तक जिसके आगे राह नहीं।
लेकिन वस्तुस्थिति मुझे यह कहने के लिये विवश करती है कि --
ज्ञानरूढ़ कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की, एक दूसरे से न मिल सकें, यही विडंबना है जीवन की।
पंचायती राज का आदर्श बहुत अच्छा है। महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने के लिए भारत माता ग्रामवासिनी यानी भारत माता ग्रामों में रहने वाली है, हमारे ग्राम उन्नति करेंगे, देश उन्नति करेगा, स्वराज स्वालम्बन गांव का व्यक्ति महसूस करे--हमारा शासन हमारा भाग्य विधाता। हम पंचायतों को सारे अधिकार दे दिये लेकिन उन अधिकारों के बारे में ग्रामवासियों में जागरूकता लाने के लिए, उऩमें जागृति लाने के लिए, ग्राम सभा में उपस्थित होने के लिए, समुचित फैसले लेने के लिए, दलगत बातों से ऊपर उठकर ग्राम के हित को सर्वोपरि समझकर आगे बढ़ने के लिए कौन हममें जागरूकता पैदा करेगा ? क्या सरकार ने इस तरफ भी ध्यान दिया है कि पंचायतों की शक्तियां, पंचायतों के अधिकार, पंचों के कर्त्तव्य, पंचों के दायित्व, पंचों की जिम्मेदारी चाहे जिला परिषद के सदस्य हों, पंचायत समति के सदस्य हों, उन सबके बारे में आम जनता जो साक्षरता के नाम पर शक्षित होने लगी है उनमें कौन जागृति पैदा करेगा, कौन चेतना पैदा करेगा। उसे करने की आवश्यकता है तब जाकर समझेंगे, तब जाकर लोग इक्ट्ठे होंगे। अन्यथा वह समझते हैं कि वह होता होगा सरपंच हमें क्या लेना-देना है। दलीय राजनीति जब से ग्राम पंचायतों में आयी है, दो गुट तो वैसे ही हो जाते हैं। एक सरपंच का गुट और दूसरा सरपंच विरोधी गुट। वे एक दूसरे के खिलाफ टांग खिंचाई करते हैं। परिणामस्वरूप ग्राम का विकास एक प्रकार से अवरूद्ध हो जाता है।
मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि इस बात पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है कि क्या ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच और वार्ड पंच के स्तर पर दलीय आधार पर चुनाव लड़ा जाये या निर्दलीय आधार पर चुनाव लड़ा जाये। पंचायत समति के सदस्य, पहले तो सारे सरपंच मिलकर ग्राम प्रधान को चुना करते थे लेकिन अब सारे पंचायत समति के सदस्य द्वारा प्रधान को चुनने के बाद पंचायत समति के सदस्यों की कोई जिम्मेदारी नहीं,उनके कोई अधिकार नहीं। जब वे बार-बार सरपंच की पंचायत में जाकर बैठते हैं तो ग्राम पंचायत वाले कहते हैं कि आपकी पंचायत समति को यहां बैठने का क्या काम है ? आप क्यों आये हैं। जैसे तैसे करके कहते हैं कि अच्छा बैठ जाइये। यही लोग जब पंचायत समति की मीटिंग में जाते हैं तो उनके सारे सुझाव लिये जाते हैं।
इसके अलावा उनका कोई दायित्व नहीं है। अजमेर जिले में ३१ जिला परिषद के सदस्य हैं। तीन महीने में एक बार मीटिंग होती है। जिला प्रमुख चुन लिया, वह स्वयं बिना सांसद को पूछे, बिना और किसी को पूछे मीटिंग बुलाकर उसमें पुष्टि करवा लेगा। जिला परिषद के सदस्यों को इसके अलावा और कोई काम नहीं होता। दस वर्षों बाद आज चिंतन करने की आवश्यकता है कि जिन भावनाओं को लेकर, जिन आदर्शों को लेकर, जिस पंचायती राज की कल्पना ग्रामों को स्वावलंबी बनाने के लिए, स्वशासी बनाने के लिए और गांवों में अपनी सरकार, ग्राम राज, ग्राम स्वराज, इसके सपने को साकार करने के लिए की गई थी, क्या वह सपना सही अर्थों में साकार हो रहा है। यदि नहीं हो रहा है तो क्यों?Man is the major factor, मानव ही सबसे बड़ा कारण है। ग्रामों में लोगों को संस्कारित करना चाहिए। ग्रामों में व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए तथा वह सेवा और भावना उनके अंदर पैदा होनी चाहिए। उसे पैदा करने का प्रयास नहीं किया गया जिसके फलस्वरूप भ्रष्टाचार पनप रहा है। एक तरफ स्कूल के कमरे बन रहे हैं और दूसरी तरफ सरपंच का मकान बन रहा है। सारा पैसा इधर से उधर, आधा पैसा इधर, आधा पैसा उधर, इसको खिलाया, उसको दिया, मेजरमैंट करवा दिया, जेई से पास करवा दिया और काम खत्म हो गया। परिणामस्वरूप यही होता है जो प्रधान मंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कहा था कि यहां से अगर हम एक रुपया भेजते हैं तो नीचे के स्तर पर पन्द्रह पैसे पहुंचते हैं।…( व्यवधान)मैं आपका संरक्षण चाहूंगा। लोकतंत्र का विकेन्द्रीकरण पंचायतों के माध्यम से हुआ लेकिन भ्रष्टाचार का भी विकेन्द्रीकरण हो गया। इसे रोके जाने की आवश्यकता है। इसके लिए उन व्यक्तियों के अंदर जागरूकता पैदा करनी होगी कि आपका पैसा, आपका गांव, आपका काम, आपका विकास, आपका दाम और आपका नाम, जब तक यह स्थिति पैदा नहीं होगी, तब तक वे लोग समझेंगे कि सरकार का पैसा है, खर्च करो, राज्य का पैसा है, स्वयं ही आए, स्वयं ही जाए, राज्य का पैसा ऐसे ही आएगा और ऐसे ही जाएगा, इस प्रकार की बात कह देते हैं। उनमें जागरूकता पैदा करनी होगी कि हमारे द्वारा दिया हुआ टैक्स हमारे ऊपर खर्च हो रहा है, हमारे विकास के लिए खर्च हो रहा है तो हमारे काम आना चाहिए। मारवाड़ राजस्थान के गावों में एक कहावत है कि" ग्राम है जहां राम है वहां" जहां ग्राम है वहां ईश्वर का निवास है. गांवों में लोगों में भाईचारा हो, परस्पर आत्मीयता हो, लोगों में एक-दूसरे के सुख-दुख में सरहभागी बनने की भावना हो। जब दलीय राजनीति को कम से कम पंचायत के स्तर पर गांव से बाहर निकाला जाएगा, तब वास्तव में गांवों का कल्याण होगा।
एक बात और कहना चाहूंगा और वह अभी तक किसी ने नहीं कही है। जो पंचायतें निर्विरोध, सर्वसम्मति से अपने सरपंच और वार्ड पंचों का चुनाव करती हैं, उनके लिए प्रावधान था कि उन्हें कई लाख रुपये की अनुदान राशि प्रदान की जाती है। वह पहले के वर्षों में देते थे लेकिन पिछले कई वर्षों से जब नए सिरे से, त्रिस्तरीय चुनाव होने लगे हैं तो अनुदान की वह राशि उन पंचायतों को, जिन्होंने सर्वसम्मति से सारी पंचायत को चुना है, उनको नहीं मिल रही है। परिणामस्वरूप वे कैसे निर्दलीय आधार पर दलगत राजनीति को छोड़कर सर्वसम्मति से, जहां फूट पैदा नहीं हो, वैमनस्य नहीं हो, सामंजस्यता की भावना रहे, बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर - ऐसा वातावरण रहे तो उसके लिए विशेष अनुदान की व्यवस्था की जानी चाहिए।
पंचायतों में एक ग्रुप सचिव होता है। चार-चार पंचायतों पर एक-एक सचिव होता है। पंचायतों के माध्यम से कितना काम आता है, सीधा पैसा सरपंच के पास, केन्द्र सरकार का पैसा, जिला परिषद से आने वाला पैसा, एमपी., एमएलए, वह भी पंचायत के माध्यम से खर्च होता है। एक ग्रुप सचिव और तीन-चार पंचायतें, वहां स्टाफ की कमी है। परिणामस्वरूप वह हिसाब-किताब पूरा नहीं रख पाता। इस तरह हम कैसे इसकी सहज कल्पना कर सकते हैं। हर पंचायत में ग्रुप सचिव अनिवार्य रूप से हो और साथ में पंचायत समति में जेई की व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, नहीं तो काम हो गया, मेजरमैंट नहीं हुआ और फिर टेम्परेरी, दो महीने के लिए आदमी लगा दिया जाता है कि काम ज्यादा है, कई अलग-अलग योजनाओं में काम चल रहे हैं, वह कैसे हिसाब करेगा और कैसे बिलों को पास करवाएगा, कैसे एमबी भरेगा और उसके बाद सरपंच के कितने चक्कर लगाने पड़ेंगे, तब फाइनल पेमैंट होगी, इसके बारे में भी आप कल्पना कर सकते हैं।
इनके ऑडिट की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान, जो हैदराबाद में है और जो इन पंचायतों के बारे में रिसर्च करता है, पत्र-पत्रिका निकालता है, प्रशिक्षण प्रदान करता है तो पंचायत में जितने भी चुने हुए प्रतनधि हैं, उनको नियमित रूप से सारी योजनाओं के आधार पर या वैसे भी जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण नियमित रूप से आयोजित किया जाए और उनको समझाया जाए कि कौन सी योजना के लिए क्या चाहिए और कैसे उनको सक्षम बनाया जा सकता है तथा कौन से साधन अपनाए जा सकते हैं। राज्यों में वित्त आयोग तो बन गये लेकिन वित्त आयोग के साधन सीमित हैं। इनका पैसा चला जाता है लेकिन इसके बाद वहां राज्यों की तरफ से कोई सहायता नहीं मिलती है और आबादी के आधार पर जो अनुदान मिलता है तो उस अनुदान को बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। महंगाई बढ़ गई लेकिन पैसे की कीमत घट गई। चाहे नगर पालिका हो, नगर परिषद हो और ग्राम पंचायत हो, उनके अनुदान को बढ़ाया जाना चाहिए। उनके रेवेन्यू की आमदनी का स्थायी रुाोत क्या हो, इसके बारे में सरकार को निश्चय करना चाहिए नहीं तो हमारी ग्राम पंचायतें, नगर पालिकाएं सरकार मुखापेक्षी हो गई हैं कि सरकार कुछ देगी तो हम करेंगे नहीं देगी तो हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहेंगे। यह स्थिति दूर होनी चाहिए। वे आत्म-निर्भर बने। What will be the source of revenue?
इस तरह की सारी व्यवस्था होनी चाहिए। ग्राम पंचायतें लोक तंत्र का आधार स्तम्भ हैं। अगर आधार स्तम्भ मजूबत होगा तो लोक तंत्र मजबूत होगा। इसलिए इसको मजबूत करने के लिए पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करना होगा और पंचायतों में व्याप्त दलीय राजनीति के दुर्गुणों को दूर करना होगा। इसी के साथ ही मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI BIR SINGH MAHATO (PURULIA): Thank you, Chairman, Sir. Before coming to this highest Panchayat of India, I had the opportunity to be a member of the Zila Parishad for fifteen years and I was also the Vice-Chairman of a particular Zila Parishad. Now, the Gram Panchayat office has become the office of the Gram Panchayat Government, the Panchayat level Government. Panchayat Samitis have become the offices of the Governments of the block level and the Zila Parishad and Nagar Palikas have become the Governments of the districts. Now, it is seen that some of the State Governments are not generous to the Panchayat institution but the Finance Commission is going to play a major role in making the Panchayat financially stable and viable. So, the funds recommended by the Finance Commission, as suggested by Shri Mani Shankar Aiyar should go directly to the Panchayat and the Centrally-sponsored schemes and the State recommended schemes should go directly to the Panchayat bodies.
Another item that needs attention is generation of resources by the Panchayats themselves. The Panchayats should not shy away from the tax collectors. They are not interested because of the fear of erosion of their votes. Panchayat should not escape from this responsibility. Government should give some incentive for those Panchayats who generate some resources for their own. There is also another problem related to the relationship between the Panchayat and bureaucracy which has already been mentioned by Shri Mani Shankar Aiyar. Now, in most of the States the DM is not given the control of the Zila Parishad. BDOs are also not under the control of the Panchayat Samiti. So, there is a clash between the bureaucracy and the Panchayat. Some bureaucrats should be educated and trained as to how to function in the Panchayats. So, one of the major reasons of the decline of the Panchayat institution is the lack of people’s participation. In most of the Gram Sabha when meetings are held, attendance is very poor and there is need to create awareness and educate the rural masses for attending the Panchayat meeting.
Sir, panchayats should not be projected as mere instruments for implementation of developmental programmes or schemes, but they should be projected as a people’s movement for rural reconstruction. The election to panchayats has become very expensive these days. Therefore, a ceiling on the panchayat election expenses should also be fixed by the Government.
Then, legal reforms will also not bear fruit until and unless there is a real will to enforce and implement the reforms and the political leadership is committed for decentralisation of powers. We have the experience of West Bengal before us. The Government of West Bengal has the political will and, therefore, panchayat elections are regularly there. In West Bengal the DMs are under the control of the Zila Parishads and the DDOs are under the control of the Panchayat Samitis. I do not agree with Dr. Nitish Sengupta’s view that the DM should not be the Executive Officer of the Zila Parishad. I differ with him on this point, because wherever the DMs are the Executive Officers of Zila Parishads, there is no problem whatsoever and the Chairman of the Zila Parishad is given the status of a Minister of State in West Bengal.
Sir, I agree with the proposal made by Shrimati Abha Mahto who has suggested that panchayat members should also be given some discretionary funds for carrying out developmental works like MPs and MLAs who are given such funds. So, if the panchayat members are also given some funds, they can also do some developmental work for the people of their area.
श्री रामजीवन सिंह (बलिया, बिहार) : सभापति जी, मैं मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं। वह संविधान के नौवें भाग के कार्यान्वयन के सम्बन्ध में हुई प्रगति पर विचार करने के लिए और उसमें कुछ सुझावों के साथ यह प्रस्ताव लाए हैं। मैं इसका समर्थन करता हूं। इस पर बहुत से मित्रों ने चर्चा की, उसमें हकीकत भी है। गांधी जी के सपनों की बहुत सारी बातों के बारे में यहां चर्चा हुई। मैं यह मानता हूं कि गांधी जी के सपनों की सबसे बड़ी उपेक्षा सबसे पहले तब हुई, जिस समय भारत के संविधान का निर्माण हो रहा था। हमारी जो संविधान निर्मात्री समति थी, उसने गांधी जी के सपनों के अनुकूल भारत के संविधान का निर्माण नहीं किया। अगर वैसा संविधान बना दिया होता तो जो चर्चा की जाती है कि १९९२ में ७३वें संविधान संशोधन के द्वारा अधिकार देकर राज्यों में पंचायत चुनाव हुए, जिस समय संविधान के अनुसार १९५२ में लोक सभा के चुनाव हुए थे, उस समय ही पंचायतों के भी चुनाव होते और उनका गठन होता।
मैं श्री राम कृष्ण हेगड़े साहब को धन्यवाद देना चाहता हूं। १९८३ में कर्नाटक राज्य के मुख्य मंत्री रहते हुए उन्होंने वहां पंचायती राज के चुनाव कराए। उसके बाद बंगाल और अन्य प्रदेशों में चुनाव हुए। आज कई कामों की चर्चा की जाती है। मैं बड़े गौर से मणि शंकर जी का भाषण सुन रहा था। मैं धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से अपनी बात को रखा। ठीक ही कहा जाता है कि वे पंचायती पद्धति के पंडित हैं। मैं भी उनको यह उपाधि देता हूं। बीच-बीच में भी जिन माननीय सदस्यों ने सुझाव दिए, उनको मैं दोहराना नहीं चाहता। मेहताब जी ने अपनी बात कही और एक माननीय सदस्य ने अंत में कबीर की बात कहकर अपनी बात समाप्त की यानि बचा खुचा सब कबीरा कह गये।
प्रो. साहब चर्चा कर रहे थे कि ग्राम सभा में बैठक नहीं होती है। उसका स्वरूप ठीक नहीं है। निश्चित तौर पर मेरा भी अनुभव है कि संविधान में तो इसका प्रावधान है । कई राज्यों में प्रधान को मुखिया कहते हैं, जैसे बिहार में पंचायत का मुखिया कहा जाता है, कुछ राज्यों में सरपंच कहा जाता है और कहीं पर पंचायत का प्रधान कहा जाता है।
21.00 hrs. जो भी हो, प्रधान हो चाहे, मुखिया हो, कहा यह जाता है कि जितनी भी योजनाएं हों, काम हों, ग्राम सभा की बैठक से पास कराकर ही हों। लेकिन ग्राम-सभा की बैठक होती नहीं है। लाउड-स्पीकर या ढोल बजाकर प्रचार जरूर करा दिया जाता है। कहा यह जाता है कि एक बार ग्राम-सभा की बैठक बुलाओ, बैठक न हो पाए तो दुबारा बुलाने की जरूरत नहीं होती है। वास्तव में यह एक बीमारी है, इसको दूर कैसे करें, इसका भी उपाय खोजना होगा। आम सभा की चर्चा इसमें भी आई है। लेकिन, देखा गया है कि आम-सभा का कोरम पूरा कभी नहीं होता है। इसलिए ग्राम-सभा का गठन इस रूप में करें कि प्रत्येक १०० लोगों की आबादी पर एक व्यक्ति का चुनाव कर लें और वही ग्राम सभा का सदस्य हो। इस तरह से ५००० की आबादी पर ५० लोग, ६००० की आबादी पर ६० लोग और ७००० की आबादी पर ७० लोग सदस्य हो जाएंगे। जैसे राज्यों में विधायिका का गठन वहां की आबादी के हिसाब से होता है उसी तरह से पंचायतों के सदस्यों की संख्या १०० की आबादी पर एक के हिसाब से हो जाए। पांच हजार की आबादी पर ५० व्यक्ति चुने जाएं और उन्हीं ५० आदमियों की ग्राम-सभा हो जाएगी। उनकी बैठक वर्ष में एक-दो बार हो और वही योजनाएं बनाएं, जिससे ग्राम-सभा का एक स्वरूप सामने आये। अगर ऐसा नहीं होता है तो क्यों ग्राम-सभा को ग्राम-सभा कहा जाता है, क्यों यह लोक सभा बैठाए हुए हो। इसलिए मेरा सुझाव है कि ग्राम-सभा का गठन इसी तरह से हो।
कई माननीय सदस्यों ने कहा कि पंचायतों को पहले भी अधिकार मिले हुए थे। सन् १९४९-१९५० के बाद जब पंचायतों का गठन होता था तो सरपंच या मुखिया को अधिकार था। उसको श्रम-कर, सम्पत्ति-कर लगाने का अधिकार था। सन् १९६० से सन् १९६७ तक मैं भी पंचायत का मुखिया रहा हूं। मुझे मालूम है कि यह अधिकार तो था लेकिन कोई इस कर को लगाता नहीं था क्योंकि उसे डर था कि उसे कोई वोट नहीं देगा। डायरेक्ट चुनाव कराएंगे तो वह वोट के डर से कुछ नहीं कर पाएगा। ग्राम-सभा का गठन कर देंगे तो उसके द्रारा जब मुखिया का चुनाव होगा तो वह अपने अधिकार का कार्यान्वयन कर सकेगा। इसलिए मैं कहता हूं कि मुखिया का चुनाव डायरेक्ट न हो बल्कि जो ग्राम-सभा सदस्य हों वे चुनाव करें।
यह भी चर्चा की जाती है कि इसमें काफी अपराधी किस्म के लोग आ जाते हैं, धन वाले, पैसे वाले लोग चले आते हैं । यह बात सही है। इसके लिए मेरा सुझाव है कि आप इसका दलीय आधार पर चुनाव कराएं। जयप्रकाश जी पार्टी-लेस डैमोक्रेसी की बात करते थे लेकिन जिस देश में दलीय व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती है, उस देश में दल-विहीन डैमोक्रेसी चलाना संभव नहीं हो सकता है। आचार्य नरेन्द्र देव जी जब क्लॉस लेते थे तो राष्ट्रीयता की बात कहते थे जबकि कुछ वामपंथी पार्टियां अंतर्राष्ट्रीयता की बात करती थीं। वे कहते थे कि जब तक राष्ट्रीयता की भावना मजबूत नहीं होगी तब तक अंतर्राष्ट्रीयता की भावना मजबूत नहीं हो सकती है। जिस देश में दलीय पद्धति मजबूत होगी, उसी देश में दल-विहीन प्रक्रिया को मजबूत किया जा सकता है क्योंकि यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। एक दिन में मानव-समाज खत्म होने वाला नहीं है । कोई न कोई पद्धति उसके लिए हमें बनानी ही है।
इसलिए मेरा सुझाव है कि निश्चित तौर पर दलीय आधार पर चुनाव व्यवस्था होनी चाहिए। आप दिल्ली और राज्यों में दलीय आधार पर इसे चलाएंगे लेकिन पंचायतों में कहेंगे कि निर्दलीय हों, यह व्यावहारिक नहीं है चाहे दिल्ली वाले हों या राज्य वाले हों या पटना, लखनऊ वाले हों, सभी का चुनाव ग्राम से होता है और वहां राजनीतिक पार्टियीं रहती है। पार्टियां अपराधियों को टिकट न दें, धनबलियों को टिकट न दें। तो अच्छे लोग आएंगे जिससे धीरे-धीरे अपराधी कम होते जांएगें । क्या लोक सभा में बाहुबली और धनबली नहीं आ रहे हैं? हां, इनकी संख्या जरूर कम है। ऐसे लोग पंचायतों में भी आएंगे चाहे आप डायरैक्ट चुनाव करा दें। इसकी सम्भावना होगी । लेकिन, ऐसी सम्भावना को जितना कम कर सकते हैं, मीनिमाइज कर सकते हैं, करें । निर्मूल कोई चीज नहीं होती है । लेकिन, इस दिशा सेें उसे मीनिमाइज कर सकते हैं ।
तीसरी बात यह है कि उपराष्ट्रपति जी ने इस संबंध में अच्छा सुझाव दिया। आप भी चाहते हैं कि इनमें बाहुबली और धनबली न आवें तो । आप लोक सभा, विधान सभा और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराएं। सभापति महोदय, आपको बिहार का अनुभव है। अब अन्य राज्यों में भी बूथ कैपचरिंग की बीमारी फैल गई है। यदि पंचायतों के चुनाव भी लोक सभा और विधान सभा के चुनाव के साथ होंगे तो बूथ कैपचरिंग की बात नहीं होगी। दलीय आधार पर नीचे से ऊपर चलेंगे तो विकास होगा। आप किसी दल से नफरत मत करो। डाक्टर लोहिया कहते थे कि राजनीति का मतलब बुराई से लड़ना होता है और धर्म का मतलब अच्छाई करना है। बदकिस्मती से राजनीति अकेले लड़ते-लड़ते बुराई के दलदल में फंस गई है और नीचे से ऊपर तक बुराई हावी हो गई है। राजनीति को शुद्ध रखा जाए। यह उस समय होगा जब दलीय आधार मजबूत रहेगा। कार्यक्रमों के आधार पर इस काम को करेंगे तो ये सारी चीजें ठीक होंगी।
पंचायतों में आरक्षण होना चाहिए। बहुत से सदस्यों ने यहां कहा कि महिला सदस्या की कार हमेशा पति चलाता है और अपनी पत्नी को चलाने नहीं देता है। यह व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है। यदि निर्वाचित महिला का व्यक्तित्व बड़ा है तो पति उसके पीछे चलता है। आप जानते हैं कि बिहार में क्या कहावत है? देश तबाह है नेता से और बाप तबाह है बेटा से। यदि बाप एमपी हो गया लेकिन बेटा ज्यादा अच्छा निकल गया तो वह बाप पर नियंत्रण करता है। व्यक्ति व्यक्ति पर हावी हो सकता है। व्यक्ति की त्रुटि को नियम के साथ नहीं जोड़ सकते हैं।
दलित महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए और इसे मजबूत करना चाहिए। त्रुटियों को दूर करना चाहिए लेकिन सिस्टम नहीं बदलना चाहिए वरना देश का नुकसान होगा। पंचायतों के अधिकारों के साथ निश्चित तौर पर कंजूसी नहीं करनी चाहिए। आपने पंचायतों के चुनाव करा दिए लेकिन अभी भी उन्हें पूरे अधिकार नही मिले हैं । अकेले कर्नाटक ऐसा राज्य है जहां ११वीं अनुसूची में जो २९ ये सब सूचीबद्ध विषय हैं, और सभी चीजें लागू हो गईं। बाद में बंगाल और केरल ने किया। अधिकांश राज्यों ने पंचायतों के चुनाव करा दिए। पंचायती राज चल रहा है लेकिन आप उन्हें पूरे अधिकार नहीं दे रहे हैं। यह समझते हैं कि पंचायतों के यह लायक नहीं है, यह अंग्रेजों की भाषा थी। अंग्रेजों के जमाने में जब आजादी की लड़ाई होती थी तो अंग्रेज कहते थे कि भारत आजादी के लायक नहीं है। जो कहते हैं कि यह पंचायत का प्रधान हो, सरपंच हो या मुखिया हो, वह इसके लायक नहीं है। मैं समझता हूं कि यह युक्तिसंगत नहीं है। उन्हें सारे अधिकार देने चाहिए। प्रयोग के तौर पर उन्हें वे अधिकार दिए जाएं। एक बार में कोई बड़ा नहीं होता है। बच्चा खड़ा होता है जब ८-१० महीने के बाद, तो वह गिर कर खड़ा होना सीखता है। जीवन में दो बार आदमी गिरता और चलता है। एक बार बचपन में और दूसरा बूढ़ापे में । बच्चा जब गिरता है तो आगे बढ़ने के लिए । चलता है, गिरता है, उठता है और फिर आगे बढ़ता है। बूढ़ा जब गिरता है तो शमशान घाट जाता है। बच्चे के गिरने पर कह दें कि बच्चा गिरेगा तो चोट लगेगी तो वह बच्चा जीवन में विकलांग रह जाएगा। वह कभी चल नहीं सकता है । पंचायतों में जो त्रुटियां हैं उन्हें दूर करें लेकिन पंचायती राज को मजबूत करें और उन्हें सारे अधिकार दें।
अगर लोकशाही को चलाना चाहते हो तो जैसा मैंने शुरु में कहा कि दिल्ली और राजधानियों में लोकशाही तभी चलेगी जब आप पंचायतों में लोकशाही चलायेंगे। जब तक जड़ मजबूत नहीं होगी, शिखर कितना ही मजबूत हो जाये, अगर जड़ कमजोर है तो आंधी के सामने शिखर का दरख्त गिर जायेगा। यदि आप लोकशाही चलाना चाहते हों तो हमें पंचायतों में लोकशाही मजबूत करनी होगी। आप त्रुटियां दूर करो लेकिन आप उसके अधिकार को कम मत करो।
सभापति महोदय, जहां तक वित्तीय भार की बात है, मैं इस बात से सहमत हूं कि पंचायतों को अपने संसाधन इकट्ठे करने का प्रयास करना चाहिये। जिसकी पीड़ा, उसका प्रयास। पहली पंचवर्षीय योजना के लिये २००० करोड़ रुपया रखा गया था जो आज बढ़ते-बढ़ते चार लाख करोड़ पर पहुंच गया है। योजना का आकार इतना बढा लेकिन वे विफल हो गयी हैं, क्यों? इसलिये कि जो हमारा निर्धारित लक्ष्य था, जो हमारी अपेक्षायें थीं, उसके अनुकूल हम सफलता नहीं पा सके। इसका कारण यह है कि योजनाओं का आकार बढ़ता रहा लेकिन पब्लिक का सरोकार धीरे-धीरे घटता चला गया। पब्लिक समझ नहीं पाई कि यह चीज उसके लिये है। जिसके प्रति अपनत्व नहीं, उसके प्रति ममत्व पैदा नहीं होता है। इसलिये राष्ट्रकवि श्री दिनकर जी ने कहा था कि रेल का स्लीपर कहा उठाये जाते हो, तो कहा गया कि यह सरकारी माल है। जब तक सरकारी योजना होगी तो उसके प्रति आम जनता की श्रद्धा पैदा नहीं होगी, कोई अपनत्व या ममत्व पैदा नहीं होगा, वह सफल नहीं हो सकती। योजनायें तभी सफल होती हैं जब पब्लिक का सरोकार होता है। इन सब बातों के लिये उसे पंचायत से जोड़ने के अलावा और कोई बड़ा काम नहीं हो सकता है। कयोंकि जो हमारी योजनायें योजना भवन में तैयार होती हैं, सदन उन्हें पास करता है लेकिन कार्यान्वयन तो पंचायतों के अंदर ही होता है।
सभापति महोदय, माननीय सदस्यों ने कई बातें कहीं जिन्हे मैं दोहराना नहीं चाहता, खाली सपोर्ट करता हूं। पंचायतों को निश्चित तौर पर उनका अंश मिलना चाहिये। जो साक्षरता या परिवार कल्याण की योजनायें चलाते हैं, उन्हें सीधे पंचायत से जोड़ दें। जीवन का मुझे लम्बा अनुभव है, इसलिये कई बातों के लिये मैं माननीय सदस्यों से सहमत नहीं हूं। गांधी जी ने कहा था कि एन.जी.ओज. उनका सपना है लेकिन यह अनुभव खराब रहा। सब का ऑडिट होने के बाद प्रतिवेदन आते रहते हैं जिनमें कहा गया कि ९० प्रतिशत एन.जी.ओज़ की हालत खराब है। पैसे की लूट हो रही है। इसलिये इन एन.जी.ओज़ को बंद कर देना चाहिये। उनको दी जाने वाली राशि सीधे पंचायतों के दे दीजिये, जिला परिषद् को दे दीजिये। जब जनता की अपनी संस्थायें बन गई हैं तो एन.जी.ओज. को पैसा क्यों दिया जाये?
सभापति महोदय, मैं इस बात से सहमत हूं कि वर्तमान में पंचायत में जो सचिव होता है, वह मैटि्रक पास होता है। निश्चित तौर पर पंचायत के सचिव का चयन वित्त विभाग को करना चाहिये। उसकी ट्रेनिंग हो, वह कम से कम ग्रेजुएट होना चाहिये ताकि वह ठीक से लेखा-जोखा रख सके। भले ही मुखिया पंचायत का प्रधान हो, लेकिन सचिव को वित्त का अधिकार रहना चाहिये ताकि वह उस पर नियंत्रण रख सके।
अंत में, जिला स्तर पर जब जिला परिषद् का गठन हो गया है तो २०-सूत्री कार्यकम के या दूसरी समतियों के सारे अधिकार उसे दे दें। मैं इस बात से सहमत हूं कि लोकशाही को चलाने के लिये नौकरशाही की ताकत कम करनी होगी अन्यथा कुछ नहीं हो सकता है।
सभापति महोदय, मैं अंतिम बात कहता हूं कि मैं उस बात से सहमत हूं जिसे कई माननीय सदयों ने कहा कि बिहार की बड़ी उपेक्षा होती है। मैं श्रीमती कान्ति सिंह जी से सहमत हूं। वह कह रही थीं कि जब हमारे यहां पंचायत के चुनाव हुए तो हमारा नौवें वित्त आयोग का जो हिस्सा था, वह देना चाहिए था। लेकिन किस तरह से बिहार की उपेक्षा होती है, मैं कुछ फिगर्स देकर अपनी बात समाप्त करता हूं। मेरे हाथ में यह पेपर है - State-wise allocation of Local Bodies Grants by the Tenth Finance Commission - इसमें दसवें वित्त आयोग ने सम्पूर्ण देश के लिए एक हजार करोड़ रुपये का आबंटन किया था जिसमें बिहार के लिए ६७.०९ करोड़ रुपये रखे गये थे। उसके बाद ११वें वित्त आयोग का दो हजार करोड़ रुपये का आबंटन आया है। लेकिन बिहार के साथ क्या हुआ। उसका ६७ करोड़ रुपया पहले था और अब ११वें वित्त आयोग में भी ६७ करोड़ रुपया ही है।
सभापति महोदय, आप दूसरे प्रदेशों में देखें - आंध्रा प्रदेश में दसवें वित्त आयोग ने ७३.९४ करोड़ रुपये आबंटित किये थे, लेकिन अब १६४ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। गुजरात को पहले ६७.४७ करोड़ आबंटित किये गये थे, लेकिन अब १३२ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। कर्नाटक को ७०.१९ करोड़ रुपये पहले आबंटित किये गये थे, लेकिन अब १२४ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। केरल को पहले २५.४३ करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, लेकिन अब ७५ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। मध्य प्रदेश को पहले ६१.७४ करोड़ आबंटित किये गये थे, लेकिन अब १२७ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। महाराष्ट्र को पहले १३२.९५ करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, लेकिन अब ३१६ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। उड़ीसा को पहले १९.११ करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, लेकिन अब ३९ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। तमिलनाडु को पहले ११५.५२ करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, लेकिन अब १९३ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। उत्तर प्रदेश को पहले १२१.१८ करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, लेकिन अब २२७ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। वैस्ट बंगाल को पहले १२०.३२ करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, लेकिन अब १९७ करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। मेरा कहने का मतलब यह है कि लगभग सभी प्रदेशों का आबंटन पहले से दोगुना किया गया है। लेकिन बिहार का आबंटन दसवे वित्त आयोग में ६७ करोड़ रुपये था और इसमें भी ६७ करोड़ रुपये है। मेरी समझ में नहीं आता है कि आपके सरकार के साथ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बिहार की जनता ने आपका क्या बिगाड़ा है। इसलिए इस पर विचार जरूर करना चाहिए। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री पवन कुमार बंसल (चंडीगढ़) : सभापति महोदय, पंचायत राज की प्रथा भारत की प्राचीन परम्पराओं पर आधारित है। लेकिन इसे संवैधानिक दर्जा देने का श्रेय सिर्फ श्री राजीव गांधी जी को ही जाता है। उन्होंने महसूस किया था कि अगर राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर जम्हूरियत को सफल बनाना है और मजबूत करना है तो इसके लिए अनिवार्य है कि हम अनुभव करें कि स्थानीय स्तर पर जम्हूरियत के संस्थान किस ढंग से चलते हैं और वहां इन्हें मजबूत करना होगा। तभी आगे जाकर इनमें कामयाबी हो सकती है। उन्हीं की दूरंदेशी और संकल्प के कारण आज देश में तीस लाख लोग, जिनमें से दस लाख महिलाएं और तकरीबन छ: लाख लोग दलित तथा पिछड़े वर्गों से संबंधित हैं, लोगों को नुमाइंदगी कर रहे हैं। मुझे जो कागजात मिले हैं, इनमें इसका जिक्र है कि प्रांतों में यह प्रावधान कैसे इस्तेमाल हुआ है, वहां प्रगति कैसे हुई है और शायद यह इस कारण से है क्योंकि यह विषय सातवीं अनुसूची में राज्य सूची में ही दर्ज है।
सभापति महोदय, मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लेना चाहता। लेकिन मैं एक बात का जिक्र जरूर करना चाहूंगा कि जो संघ राज्य क्षेत्र हैं, उनके प्रशासन का सीधा काम, उनकी जिम्मेदारी, उनका दायित्व केन्द्र सरकार के अधीन है।
महोदय, इसलिए मुझे इस बात से थोड़ा अफसोस जरूर हुआ कि किसी संघ राज्य का इसमें जिक्र नहीं है। जब हम स्वशासन के इंतजाम को मजबूत करना चाहते हैं, तो कम से कम मैं केन्द्र सरकार से यह तवक्को और उम्मीद करता हूं कि जो काम उसके अपने हाथ में है, उसके लिए तो केन्द्र सरकार को एक आदर्श बनकर सामने आना चाहिए, लेकिन अफसोस की बात है कि आज तक ऐसा नहीं हुआ और शायद अब तक इस बात पर गौर ही नहीं किया गया कि यूनियन टैरीटरीज को जो २९ विषय पंचायतों और १८ नगरपालिकाओं के लिए हैं, उनके अधिकार दिए गए हैं या नहीं। बार-बार, अलग-अलग समय पर हम लोग इस बात की आवाज उठाने की कोशिश करते रहे हैं, हमें विश्वास भी दिलाया गया, लेकिन अभी तक कोई ठोस काम इस दिशा में नहीं हुआ और इसे करने हेतु कोई ठोस पग नहीं उठाए गए। चूंकि मैं चंडीगढ़ से आता हूं, इसलिए चंडीगढ़ का उदाहरण देना चाहता हूं। चंडीगढ़ ही नहीं बल्कि देश की सभी यूनियन टैरीटरीज की यही हालत होगी।
माननीय मंत्री जी यह जानते होंगे कि जहां तक पंचायतों का सवाल है, पिछले १० वर्षों से अब तक पंचायतों को वे अधिकार नहीं दिए गए और कोई न कोई बहाना बनाकर अभी तक उनको वंचित रखा गया है। पंचायत समति और जिला परिषद अब बन गई हैं, लेकिन वे नाम मात्र की हैं। उनके पास कोई अधिकार नहीं हैं, उनके पास संसाधन नहीं हैं, उनके पास धन नहीं है, जिससे वे अपना एक छोटा सा भी कार्य कर सकें।
महोदय, इसी संबंध में, मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूं कि जो धनराशि उनके लिए निर्धारित की गई है, वह प्रदेश अथवा जिलाधीश के माध्यम से न दी जाकर सीधे उसके एकाउंट में जमा हो और ये अधिकार उनके पास हों कि वह इस धनराशि का इस्तेमाल कर सके। यह बात ठीक कही गई कि केन्द्र सरकार के वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह फैसला नहीं किया जा सकता कि किस गांव में, किस मोहल्ले में, किस चीज की जरूरत है। ये तो उस गांव या मोहल्ले का नाम भी नहीं जानते होंगे, फिर वे उसकी जरूरत को कैसे समझ सकते हैं कि कहां कुए के निर्माण की आवश्यकता है और कहां स्कूल की दीवार बनानी है या कोई और छोटा काम करना है। इसको वहां के लोग समझते हैं। इसके साथ-साथ इस बात की जरूरत है कि संविधान या कानून में चूंकि प्रावधान किया गया है, लेकिन जो जिला योजना समतियां बनानी हैं, वे अभी तक नहीं बनी हैं। १० वर्षों के बाद आज आप इस बात की समीक्षा कर रहे हैं कि इस बारे में हमारी क्या प्रगति हुई है। क्या आपको अब तक इस बारे में सूचना नहीं मिली है कि ये जिला योजना समतियां अभी तक नहीं बनी हैं ?
महोदय, वित्त आयोग बना है। वित्त आयोग का काम क्या है? जो कर है, जो शुल्क है, जैसे कोई फीस प्रान्तीय सरकार के पास है, उसका वितरण कैसे होना चाहिए, उसका आबंटन कैसे होना चाहिए, उसके लिए वित्त आयोग का प्रावधान है। वित्त आयोग बना दिए गए, लेकिन चूंकि पंचायतों की नगरपालिकाओं की आवाज कहीं बुलन्द नहीं हो सकती, कहीं उनकी आवाज नहीं सुनी जाती, इसलिए उनकी बात पर गौर नहीं किया जाता है।
महोदय, इस बारे में, मैं फिर चंडीगढ़ का उदाहरण देना चाहूंगा। रोड टैक्स का उदाहरण देना चाहता हूं। यह प्रशासन ले रहा है, ज्यादा काम सडकों को संभालने और देखरेख का काम नगर परिषद् के पास आ जाता है, लेकिन उसका कोई वाजिब हिस्सा उसको नहीं मिलता है। हमारे बार-बार कहने और पूरा जोर डालने के बाद, केन्द्र शासित प्रदेश, जितनी वसूली करेगा उसका उसे १७ फीसदी पैसा परिषद को मिलेगा, यह देना तय किया गया, जबकि वित्त आयोग ने सिफारिश दी कि जो वसूली चंडीगढ़ प्रशासन करेगा, यानी जो शुद्ध आय होगी, उसका २३ प्रतिशत म्युनसिपल कार्पोरेशन को मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।
महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि सर्वप्रथम तो वित्त आयोग की जो सिफारिश है, वही पर्याप्त नहीं है, लेकिन इसके बावजूद यदि उसकी सिफारिश को मान भी लिया जाए, तो उसने जो सिफारिश की है, उसके अनुसार उसे धन नहीं मिल रहा है। जबकि प्रशासन के पास इतना पैसा है कि वह उसे फिजूलखर्ची में व्यय कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ एक प्रान्त में म्युनसिपैलिटीज को, कार्पोरेशन्स को कर लगाना होगा, इसलिए उन पर दबाव डाला जा रहा है कि आप नया टैक्स लगाइए। क्या उनका अधिकार नहीं बनता है कि उस शहर में या जो उनका एरिया आता है, उसमें जो कर वसूल किए जाते हैं, शुल्क वसूल किए जाते हैं यानी प्रान्तीय सरकार या केन्द्र प्रशासित क्षेत्र को उसके द्वारा वसूल किए गए धन का क्या वाजिब हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?
मैं यही बात फिर दोहराना चाहता हूं कि ऐसे मसले, जिनके कारण लोगों को तकलीफ है और जो काम वहां हो सकते हैं वे नहीं हो रहे, उसके लिए जरूरत है कि आप कम से कम यहां आज यह ऐलान कीजिए कि जितनी यूनियन टेरिटरीज़ हैं, उनके लिए आप समय-समय पर, एक समयबद्ध तरीके से उनकी समीक्षा करते रहेंगे। उनकी मीटिंग बुला कर उनके लिए आप फैसला करेंगे और यहां से हिदायत देंगे कि जो उनका वाज़िब हिस्सा, उनका अधिकार बनता है, वह पैसा उन्हें मिल जाए ताकि वे लोग वहां काम कर पाएं। मुझे यहां बार-बार सुनने में आता है - रिफाम्र्स होना चाहिए, मालूम नहीं कि कैसा शब्द यहां इस्तेमाल हो रहा है और जगह-जगह, एक-एक चीज पर हो रहा हैं। अव्वल रिफाम्र्स के लिए कहते हैं और उन पर यह बात इतने जोर से थोपी जाती है कि अगर आप ये टैक्स नहीं लगाएंगे, ये काम नहीं करेंगे, उतनी देर तक कंडीशनेलिटी होती है कि आपको जो पैसा केन्द्र से मिल सकता है वह नहीं दिया जाएगा। क्या जमहूरियत में यह बात वाज़िब है, वह पैसा वहां के लोग चाहे किसी भी शक्ल में देते हों, चंडीगढ़ का जो सर्किल है, मैं लुधियाना के बारे में सुनता हूं, जिसे मानचेस्टर ऑफ इंडिया कहते हैं, उससे भी ज्यादा पैसा चंडीगढ़ सर्किल आय कर के रूप में देता है। क्या वही पैसा चंडीगढ़ के लोग नहीं देते और उसके बाद उन्हें कहा जाए कि बीसियों तरह के और टैक्स आपको देने होंगे, क्योंकि कार्पोरेशन यहां है। लोगों के मन में एक ऐसी भावना बनाई जाती है, क्योंकि आपने यह कार्पोरेशन की मांग की और आपको कार्पोरेशन दे दी गई, इसलिए आपको ये नये-नये कर भी देने होंगे। पहले जो पैसा वसूला जाता है, क्या वह वहां की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। मैं यही सवाल आपके सामने रखना चाहता हूं। यही बात दोहराते हुए कि आज के दिन यह जरूरत है कि जब आप प्रांतों से तवक्को करते हैं, उनसे उम्मीद करते हैं कि पूरे के पूरे जो अधिकार हैं, जो आपके संस्थान हैं उन्हें अधिकार ट्रांसफर कर दिए जाएं। उसके लिए जरूरी है कि पहले आप यूनियन टेरिटरीज़ का अच्छी तरह प्रशासन संभालें। वहां आप खुद गौर कीजिए। उन्हें एक आदर्श के रूप में बना कर आप सामने लाइए तभी आगे कुछ हो सकता है।
इन्हीं शब्दों के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं।
श्री खारबेल स्वाइं (बालासोर): सभापति महोदय, मैं मंत्री जी का आभार प्रकट करता हूं कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर बहस करने का अवसर दिया। मैं अपने भाषण को लम्बा न करते हुए सिर्फ कुछ सुझावों तक सीमित रखूंगा। पहला, जो संविधान की धारा २४३-डी में व्यवस्था है, उसमें राज्य निर्वाचन कमीशन के गठन की बात है। अभी उड़ीसा जैसे अनेक प्रदेशों में ऐसा है कि पंचायतों का पुनर्सीमन, आरक्षण और आरक्षण का जो रोटेशन है, इन सब दायित्वों को राज्य प्रशासन को दिया गया है, इस बहाने से राज्य प्रशासन अनेक बार चुनाव को टालता जाता है। इसलिए मेरा कहना है कि यह दायित्व, संविधान में जैसा है कि राज्य का निर्वाचन कमीशन को दे दिया जाना चाहिए। मैं जिस आरक्षण की बात कह रहा हूं, उस पर मेरे से पहले एक-दो वक्ता बोल चुके हैं। मान लीजिए कि आदिवासियों के लिए आरक्षण है, ऐसी अनेक जगहों पर आदिवासियों के लिए आरक्षण होता है, जहां कोई आदिवासी नहीं है। इसलिए चुनाव बंद हो जाता है और बंद हो जाने के बाद फिर कुछ महीनों के बाद डि-रिजर्व करके फिर चुनाव किया जाता है - ऐसा करने की क्या जरूरत है, जहां कोई आदिवासी नहीं है। मेरे अपने गांव की पंचायत में ऐसा आरक्षण आदिवासियों के लिए हो गया। देखा गया कि उधर कोई आदिवासी नहीं है, वोटर लिस्ट देखी गई तो उसमें पाया गया कि एक साल पहले जब वोटर लिस्ट तैयार हुई थी, उसमें कुछ सपेरों के नाम थे, अब वे वहां नहीं थे, वहां से चले गए थे। उन्हे जाकर कटक से २०० किलोमीटर दूर से नोमिनेशन भरने के लिए हमें लाना पड़ा।…( व्यवधान)
श्री मणि शंकर अय्यर : जो धारा २४३-डी संविधान में है।
उसे आप गौर से पढ़ें तो उसमें गलती यह हो रही है कि जहां संविधान में लिखा है कि उस पंचायत के अन्दर, मतलब ग्राम पंचायत कहें तो स इलाके में या जो मध्य स्तर की पंचायत है, उस इलाके में जो आबादी है, उसके आधार पर आरक्षण किया जाना चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है कि राज्यों में राज्य की जितनी भी आबादी है, उस आधार पर किया जा रहा है, इसलिए आप इसे देखिये और इसे दोहरायें तो मुझे लगता है कि यह खामख्वाह की समस्या का हल निकाला जा सकता है।
श्री खारबेल स्वाइं : धन्यवाद। आप जो बोल रहे हैं, सही बोल रहे हैं।
दूसरी बात यह है कि जो हमारी वोटर लिस्ट है, वह लोक सभा के लिए अलग बनाई जाती है, विधान सभा के लिए अलग बनाई जाती है और पंचायत चुनाव के लिए तीसरी वोटर लिस्ट बनाई जाती है। खर्च को कम करने के मेरा सुझाव यह है कि विधान सभा और लोक सभा के लिए जो वोटर लिस्ट बनाई जाती है, उसी को पंचायत चुनाव के लिए मान लिया जाना चाहिए।
जिला परिषद का जो अध्यक्ष है, वह जनता के द्वारा डायरैक्टली इलैक्टिड नहीं होता, जो पंचायत समति का अध्यक्ष है, वह भी जनता के द्वारा निर्वाचित नहीं होता, लेकिन जो पंचायत का सरपंच होता है, वह सीधे जनता के द्वारा निर्वाचित होता है। यह क्यों होता है? पंचायत का सरपंच डायरैक्टली इलैक्टिड होता है, लेकिन जब उसे निकाले जाने की बात आती है तो उसे पंच निकालते हैं। मैं इसे नहीं समझ पाता हूं। अगर लोगों ने उसे चुना है तो पंच उसे कैसे निकाल सकते हैं। मेरा इसमें सुझाव यह है कि उसे भी डायरैक्टली इलैक्ट न होने दें, जैसे कि जिला परिषद का अध्यक्ष है, जैसे कि पंचायत समति का अध्यक्ष है, इसी तरह सरपंच, मुखिया या प्रधान कुछ भी बोलें, वह भी इनडायरैक्टली इलैक्टिड हो, यह मेरा सुझाव है।
माननीय रासा सिंह जी बोल रहे थे कि पंचायत समति का जो सदस्य होता है, वह भी सरपंच के साथ जनता के द्वारा चुनकर जाता है, लेकिन उनके पास कोई क्षमता नहीं होती है। सिर्फ एक बार पंचायत समति के अध्यक्ष के लिए वोट दे देने के बाद वह रोता है कि मेरे पास कोई पावर नहीं है, लोग मेरे पास आते हैं, इसलिए मैं क्या करूं। मंत्री जी, मेरा निवेदन है कि इसके बारे में थोड़ा सोचें और उन्हें थोड़ी क्षमता कैसे दे दी जाये, उसके बारे में सोचें। पंचायत चुनाव के लिए जो बजट में पैसा आता है, वह चार्टड होना चाहिए, वह वोटिड नहीं होना चाहिए।
मेरा तीसरा पाइंट ग्रामसभा के लिए है। अभी क्या होता है कि उड़ीसा जैसे प्रदेश में ग्रामसभा को ठेकेदार बुलाता है, इसलिए कि उड़ीसा जैसे प्रदेश में ग्रामसभा में कोई डवलपमेंट का एजेण्डा नहीं होता। पंचायत को जो काम आता है, उसकी ठेकेदारी कौन करेगा, सिर्फ इसी के ऊपर ग्रामसभा में चर्चा होती है, इसलिए लोग उसमें नहीं आते। इसके लिए ठेकेदार लोगों को बुला बुलाकर लाता है कि तुम आकर मीटिंग में बोलो कि इस काम की ठेकेदारी मैं लूंगा। ग्रामसभा में यही होता है। मेरा निवेदन यह है कि अधिकांश समय में लोग नहीं आते तो मेरा सुझाव है, मणिशंकर अय्यर जी ने जैसा कहा, अभी मैंने पहली बार सुना कि रिपब्लिक डे पर, १५ अगस्त को और गांधी जयन्ती के दिवस पर ग्रामसभा की मीटिंग होनी चाहिए, इससे पहले मैंने यह नहीं सुना था। गांव में ऐसा कभी नहीं होता कि उस दिन सभा बैठती है। जब कोई आफिसर आता है या ठेकेदार बुलाता है, उसी समय वह बैठती है। ग्रामसभा तो होती नहीं, इसलिए गांव में घर में जाकर सरपंच बोलते हैं कि तुम इसमें सही कर दो, तुम्हें एक इन्दिरा आवास दे दिया जायेगा, अगर तुम सही करोगे। यही होता है, इसलिए मेरा निवेदन यह है कि जो ग्रामसभा का समय, तथि और स्थान पहले से निर्धारित होना चाहिए और सब को नोटीफाई कर देना चाहिए, जिससे कि लोग आयें और उसमें कोरम होना चाहिए।
महिलाओं के लिए एक दूसरा कोरम होना चाहिए। अगर उस कोरम के तहत लोग न आयें तो उस मीटिंग को कैसिंल कर दिया जाये और उसे दूसरी मीटिंग पर टाल दिया जाये। अगर दूसरी मीटिंग में भी लोग न आयें तो कुछ दिन के लिए उस पंचायत को पैसे न दिये जायें जिससे लोग बाद में उस मीटिंग में आ जायें। मेरा कहने का मतलब यह है कि ग्राम सभा में विकास के कार्यान्वयन की चिंता इधर नहीं हो सकती। यह पंचायत बैठक में हो सकती है। सोशल आडिट करने के लिए कि काम ठीक हुआ या नहीं, इसके लिए ग्राम सभा को बुलाया जाए इसमें कुछ और नहीं हो सकेगा। वास्तविक रूप में इससे कुछ नहीं हो सकेगा।
मैं एक दो बातें कहकर अपना भाषण समाप्त करूंगा। राज्य का जो स्टेट फाइनेंस कमीशन है, वह अधिकांश राज्यों में नहीं है। हमारे प्रदेश के एम.पी. श्री त्रिलोचन कानूनगो यहां बैठे थे। वह इस फाईनेंस कमीशन के अध्यक्ष हैं । एक महीने पहले उडीसा में यह बनाया गया था। आज उसकी चिट्ठी आई है कि आपका जो सुझाव है, उसे भेजिये। तीन महीने के भीतर वह रिपोर्ट दे देंगे। उसके बाद कमीशन का कार्यकाल खत्म हो जायेगा। मेरा निवेदन है कि आयोग जो रिकमंड करता है, उसकी छ: महीने के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट ले ली जाये।
अंत में मै आपसे यह चाहूंगा कि ग्राम पंचायतों का जो आकार है, उसे समान किया जाये। कुछ ग्रामों में एक हजार लोग हैं और कुछ ग्राम में १० हजार लोग हैं। ऐसे कैसे हो सकता है। मान लीजिए कि तीन या पांच हजार लोगों पर एक पंचायत होनी चाहिए तो वह सारे देश में एक जैसी होनी चाहिए। लेकिन राज्य सरकार को जैसी सुविधा होती है. उसी तरीके से वह उसे बनाते हैं जिससे कि उनकी पार्टी का आदमी वहां से जीत सके।
श्री मणि शंकर अय्यर जी ने जो पहले बोला, मैं उससे सहमत हूं। डी.आर.डी.ए. को तोड़ कर जिला परिषद में मिला दिया जाये। जहां जिला परिषद है, वहां डी.आर.डी.ए. की क्या जरूरत है? जिला परिषद में बहुत झमेला होता है जिसके डर से मैं कभी-कभी वहां नहीं जाता हूं। मेरा कहना है कि जिला परिषद को एमपावर करना चाहिए, उनको क्षमता दी जानी चाहिए।
अंत में मेरा कहना है कि सरपंच और उनके रिश्तेदारों को ठेकेदारी नहीं दी जानी चाहिए। यह प्लानिंग कमीशन की रिपोर्ट में है क्योंकि जितने सरपंच हैं, वे सारे ठेकेदार बन गये हैं। कोई भाई के नाम पर ठेके लेते हैं, कोई अपनी औरत के नाम पर लेता है या अपने बाप के नाम पर लेता है। इसे बंद करना चाहिए। इसके कारण हम लोग मारे जाते हैं। हमारे पास आकर हमारे कार्यकर्ता दिन-रात बोलते हैं कि आप हमें काम दो। ऐसा इसलिए होता है क्योकि सरपंच ऐसा काम करता है। मेरा निवेदन यह है कि इन सब बातों को आप देखिये। पंचायत का जो सचिव है, मैं सिंह साहब के साथ सहमत हूं कि उसकी कुछ क्वालीफिकेशन होनी चाहिए। कम से कम उन्हें बी.ए. होना चाहिए। इसके साथ-साथ उनकी तन्ख्वाह ठीक करना और बदली कौन करेगा, यह सब अधिकार सरकार के पास होने चाहिए। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि एम.एल.ए. लोग सोचते हैं, अगर जिला परिषद, पंचायत समति के पास हमारा कोई अधिकार चला गया तो हम क्या करेंगे । इसीलिए यह आधिकार वहां नहीं जाता है। स्टेट गवर्नमैंट इसलिए पावर नहीं देती है। लेकिन हमारे संविधान में जैसे व्यवस्था है, एम.पी. के पास, एम.एल.ए. के पास क्षमता हो या न हो, जो संविधान में व्यवस्था की गयी है, उसके अनुसार पंचायत राज इंस्टीटयूशन के पास यह क्षमता जानी चाहिए। आपने मुझे समय दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्री राम टहल चौधरी (रांची) : सभापति महोदय, ७३वें ७४ वें संविधान संशोधन विधेयक पर माननीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री काशी राम राणा जो प्रस्ताव लेकर आये हैं, मैं उसका समर्थन करता हूं। इस प्रस्ताव के लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूं।
यहां दस वर्षों के अनुभव के आधार पर विचार-विमर्श हो रहा है । इससे पूर्व श्री मणि शंकर अय्यर ने अपने अनुभव के आधार पर बहुत सुंदर ढंग से अपनी बात रखी। मैं अपनी बात संक्षेप में कहना चाहूंगा। मैं ऐसे राज्य से आता हूं जहां पंचायतों के चुनाव ही नहीं हुए। वह राज्य बिहार के साथ था, बिहार में २२ वर्षों में चुनाव हुए लेकिन झारखंड में अभी तक चुनाव नहीं हुए। मैं कहना चाहूंगा कि झारखंड में चुनाव नहीं होने का एक ही कारण है कि १४ जिलों में अनुसूचित जनजाति, आदिवासियों के लिए, मुखिया प्रमुख, अध्यक्ष सब पदों को आरक्षित कर दिया गया है। इससे लोगों में काफी आक्रोश है। ५० प्रतिशत रिजर्वेशन से किसी का विरोध नहीं है लेकिन जहां ५० प्रतिशत से अधिक जनसंख्या है, उस पंचायत को आधार मानकर आरक्षण होना चाहिए। ऐसा नहीं करने की वजह से वहां चुनाव नहीं हो पाया है। झारखंड में पिछड़े, दलित, मुस्लिम आदि सभी वर्गों के लोग हैं। हम समझते हैं कि जब तक पंचायत में हर वर्ग का प्रतनधित्व नहीं होगा, तब तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्वराज और स्वावलंबन के सपने को मूर्तरूप नहीं मिल पाएगा। इसलिए जहां ५० प्रतिशत से कम संख्या है, वहां पंचायत आरक्षित न की जाए ताकि जनता को अन्य सभी वर्गों के लोगों को चुनने का अवसर मिले तभी सही मायने में विकास हो सकता है। इस कारण आदिवासी भाई, अच्छे विचारों के लोग भी नाखुश हैं कि जहां वे एक जगह बैठते थे, एक जगह खाते थे, आज ऐसी सरकार की तरफ से व्यवस्था हो गई है कि एक-दूसरे से बात नहीं कर रहे हैं। आपस में भाईचारा पैसे से नहीं खरीदा जा सकता, यह सबसे ज्यादा दुख की बात है। इसे सुधारने के लिए जहां ५० प्रतिशत से अधिक संख्या है, उसे आरक्षित करें और बाकी सीटों में अन्य वर्ग के लोग जैसे पिछड़े, दलित आदि को लड़ने के लिए अवसर मिले। हमारे यहां वैसे ही अधिकतर सीटें रिजर्व हैं। दूसरे वर्ग के लोग समझते हैं कि हम मुखिया नहीं बन पाएंगे। इसलिए इस बारे में केन्द्र या राज्य सरकार से बात करें और सुधार करें तथा तुरंत पंचायतों के चुनाव हों। जहां पंचायत के चुनाव हुए हैं, वहां के लोगों को जो फायदा मिल रहा है, वह फायदा झारखंड के लोगों को भी मिले। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो वहां स्थिति और बिगड़ जाएगी और सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि आपस का भाईचारा खत्म हो जाएगा और एक तरह से गृह युद्ध वाली बात हो जाएगी। इसलिए इसे बहुत गंभीरता से लेने की बात है।
हमारे यहां चुनाव भले ही न हुए हों लेकिन विकास का काम काफी ढंग से हुआ है। हम अपने जिले की बात करेंगे। ग्राम पंचायत में किस चीज को प्राथमिकता दें, आम सभा करके उसे चयनित किया जाता है। सम्पूर्ण रोजगार योजना हो, डीआरडीए हो या वृहत पैंशन की बात हो, विधायक बैठक करते हैं और उनकी अनुशंसा के आधार पर ही वहां काम हो रहा है। जहां तक गड़बड़ी की बात है, हर वर्ग और सैक्शन में अच्छे-बुरे लोग होते हैं, उन पर निर्भर करता है कि योजना को किस ढंग से हम लागू करें और कैसे काम करें। इसलिए ऐसा अनुभव है कि जहां भी जिस जिले में अधिकारी अच्छे रहे हैं, वहां अधिकतर प्रखंड के अधिकारी या कर्मचारी ठीक रहते हैं। कहीं-कहीं बेईमान या भ्रष्ट अधिकारी रहते हैं, वहां पर काम में गड़बड़ी होती है लेकिन जहां अच्छे अधिकारी रहते हैं, वहां कोई गड़बड़ी नहीं होती है और वहां कार्य की गुणवत्ता भी ठीक रहती है। व्यक्ति पर निर्भर करता है। हर व्यक्ति हर क्षेत्र में बुरा या अच्छा नहीं हो सकता है, ऐसा है। अभी हमारे यहां जो बताया गया कि जहां चुनाव हुआ है, उसमें काफी महिलाएं और जो समाज के निम्न वर्ग के लोगों की संख्या काफी है और हमारे यहां झारखंड में भले ही पंचायत का चुनाव नहीं हुआ हो लेकिन कुछ स्वयंसेवी संगठन हैं और कुछ सरकार की तरफ से संगठन हैं, उनके माध्यम से महिलाओं को काफी जागरूक किया गया है। इससे महिलाओं में जागृति भी आई है और फिर उनके माध्यम से विकास का काम हुआ है और महिलाएं स्वावलम्बी बनें, उस संबंध में वे काफी जागरूक हुई हैं। इसलिए महिलाओं को जो स्थान दिया गया है, उससे हम समझते हैं कि महिलाओं के लिए काफी लाभदायक होगा। जहां पैसे देने की बात कही गई है, अभी भी पहले कई वर्ष पहले चूंकि हम भी मुखिया से लेकर प्रमुख और जिला परिषद से जुड़े रहे हैं तो सीधे पैसा पंचायतों को मिले और अभी भी जवाहर रोजगार योजना के नाम पर जो पैसा जाता है, हम दूसरी जगह की बात नहीं करते हैं,…( व्यवधान)
सभापति महोदय : अभी आपके यहां पंचायत ही नहीं है। अभी पंचायत आपके यहां कहां है ?
…( व्यवधान)
श्री राम टहल चौधरी: पंचायत नहीं है लेकिन पंचायत के नाम पर जाता है, उसी पंचायत में खर्च होता है, दूसरी पंचायत में नहीं जाता है लेकिन त्रासदी वही है कि दस रुपया बोरा सीमेंट पहले मिलता था और अभी १५० रुपया बोरा सीमेंट मिलता है, मजदूरी भी बढ़ी है तो उस हिसाब से राशि भी बढ़नी चाहिए, यह मेरा आग्रह है। इससे पहले भी लोगों ने सुझाव दिया है कि उस हिसाब से राशि जानी चाहिए ताकि उस पंचायत में कुछ विकास का काम हो सके और राशि भी बढ़नी चाहिए।
जहां तक चुनाव का संबंध है, हमारे यहां मुखिया, सरपंच, प्रमुख और अध्यक्ष पद का नाम रहता है। इशलिए जिस तरह से मुखिया का सीधे चुनाव होता है, पहले भी लोगों ने सुझाव दिया है कि हमारे यहां प्रमुख और अध्यक्ष का चुनाव भी डाइरेक्ट हो क्योंकि सीमित मैम्बर्स रहते हैं तो खरीद-बिक्री का ज्यादा चांस रहता है। हालांकि झारखंड में धन-बल या बाहु-बल नहीं है, अभी ग्रामीण-क्षेत्र में नहीं है।
सभापति महोदय : अभी कानून बनाना राज्य सरकार का काम है।
श्री राम टहल चौधरी: जो भी हो, हम आपके माध्यम से राज्य सरकार को सलाह दे रहे हैं कि उस हिसाब से करें तो इसमें गलत लोगों को आने का अवसर नहीं मिलेगा और नगर निगम के चुनाव नहीं होने से शहर में जो दिक्कत हो रही है कि शहर का विकास नहीं हो रहा है, सड़क का विकास नहीं हो रहा है, सफाई वगैरह का काम नहीं हो रहा है तो इसलिए वहां का चुनाव होना बहुत ही आवश्यक है। इस तरह से लोगों को पंचायतों का अधिकार आप देने जा रहे हैं और सभी लोगों ने पिछड़े, दलित और कमजोर वर्ग को जोड़ने का प्रयास किया है। उस संबंध में राजीव गांधी जी का नाम लिया गया और उनका सम्मेलन हुआ तो उसमें मुझे जाने का और उनके विचार जानने का अवसर मिला था। उन्होंने पंचायतों को अधिकार देने और उनको मजबूत करने का काफी प्रयास किया। अभी हमारी सरकार में भी यही हुआ कि हमारे प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने बार-बार घोषणा की है कि हम गांवों को बिल्कुल प्रखंडों से जोड़ना चाहते हैं या जो भी हो जिससे वहां विकास का काम हो सके, पुल-पुलिया निर्माण का कुछ काम हो सके।
इस तरह ग्रामीण विकास के लिए प्रधान मंत्री जी ने काफी राशि दी है और उससे काफी काम हो रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं हैं। मैं प्रधान मंत्री जी को इसके लिए धन्यवाद दूंगा। इसके अलावा ग्रामीण विकास मंत्रालय में जो भी पहले मंत्री रहे हैं, चाहे वैंकेया जी हो या शांता कुमार जी हों या वर्तमान में काशीराम राणा जी हों, इन सभी ने बड़ा अच्छा काम किया है और मैं उम्मीद करता हूं कि मंत्री जी ग्रामीण विकास के लिए और ज्यादा राशि देंगे।
सभापति महोदय : श्री हरीभाऊ शंकर म्हाले अपनी स्पीच ले करेंगे।
*श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव): महोदय, सदन में ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने के बारे जो प्रस्ताव लाया गया है, उसके लिए मैं माननीय मंत्री, राणा साहब को धन्यवाद देता हूं। जब वह केन्द्र में कपड़ा मंत्री थी, उन्होंने कपड़ा मंत्रालय का कार्य भी अच्छी तरह सम्भाला था। उस समय यद्यपि तत्कालीन अर्थ मंत्री जसवंत सिंह जी ने पावरलूम के मामले में भारी संकट पैदा कर दिया था, लेकिन राणा साहब ने मध्यस्थता करके उस संकट को टाल दिया था।
सहकारी संस्थाएं ग्राम की आर्थिक व्यवस्था सुधारने में मदद करती हैं। ग्राम की पंचायतें गांवों की हालत सुधारने का काम करती हैं। इसीलिए महात्मा गांधी, डा. राम मनोहर लोहिया और स्वर्गीय राजीव गांधी आदि नेताओं ने ग्राम पंचायतों को मजबूत बनाने पर अपना ज्यादा ध्यान केन्द्रित किया। स्वर्गीय राजीव गांधी ने ग्राम पंचायतों को डायरेक्ट धन उनके विकास के लिए उपलब्ध कराया।
महाराष्ट्र राज्य में स्वर्गीय यशवंतराव चव्हाण ने १९६२ में पंचायती राज को शुरू किया था। उसके बाद पूरे भारत में एक आदर्श काम यह हुआ कि लगभग ६ वर्ष पहले जिला परिषद के अध्यक्षों को मंत्रियों के समान दर्जा दिया गया और आदिमजाति का अध्यक्ष हमारे यहां बना। चालू वर्ष में अनेकों महिलाएं ग्राम पंचायतों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पदों पर हैं। जिस तरह द्वितीया का चांद दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है और पन्द्रह दिन के बाद पूर्णिमा होती है, वैसे ही महाराष्ट्र में हुआ है।
महोदय, भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री वी.पी. सिंह और अर्थ मंत्री श्री मधु दंडवते ने देश की तिजोरी से पचास प्रतिशत रकम ग्राम पंचायतों के विकास के लिए चिन्हित की थी, जिसके कारण ग्रामों में स्कूल और मकान बनाने जैसे अनेक काम चले।
महोदय, हमने संविधान में संशोधन करके ग्राम पंचायतों को भारी अधिकारी दिए हैं जिनका जिक्र यहां हमेशा होता है लेकिन वास्तव में आज उनका हाल यह है कि उनके पास विकास के काम करने के लिए पैसा नहीं है। ग्रामों में बिजली के लिए, पीने के पानी की व्यवस्था करने के लिए या अन्य सुधार के कामों के लिए केन्द्र सरकार की ओर से आर्थिक व्यवस्था करना जरूरी है। पंथप्रधान ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत आदिम जातियों के उद्धार के लिए, नियमों को ढीला करके, ज्यादा से ज्यादा प्रावधान करना चाहिए ताकि उनके क्षेत्र में सड़कें बन सकें। इसी तरह स्वच्छ जल उपलब्ध कराने पर भी ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए। मेरा सुझाव है कि जिस प्रकार पानी के चापाकल लगाने की योजना हेतु दस प्रतिशत भाग उस क्षेत्र के लोगों को देना पड़ता है, ट्राइबल इलाकों में यह कार्य शत-प्रतिशत सरकारी खर्चे पर किया जाना चाहिए।
जवाहर योजना के अंतर्गत सरकार की ओर से जो पैसा मिलता था, उससे स्कूल भवनों के निर्माण जैसे कई काम हो जाते थे, लेकिन चालू वर्ष में केन्द्र सरकार ने इस राशि का उपयोग जलधारा योजना हेतु खर्च करने के आदेश दिए हैं जिसके कारण वहां अन्य साधारण काम बंद हो गए हैं। मेरी भारत सरकार से विनती है कि उसने जवाहर योजना के तहत जो आदेश जारी किया है, उसे तत्काल वापस लेकर, उसकी राशि को पूर्ववत खर्च करने की अनुमति दे।
कुछ समय पहले तक बिजली की सप्लाई का बिल जिला परिषद ग्राम पंचायतों को देती थी लेकिन अभी अभी उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। मेरा निवेदन है कि पूरानी व्यवस्था को फिर से चालू करना जरूरी है।
महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
*speech was laid on the Table.
डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया (दमोह) : सभापति जी, पंचायत की जो धारणा है वह प्राचीन समय से है और राजा बैन की कथा है कि उन्होंने जब सारे देश में आतंक और मनमानी का राज फैलाया, तो उसे खत्म करने के लिए तमाम बुद्धिजीवियों और जनता ने मिलकर उन्हें पद से हटा दिया और जनता के बीच से पृथु को राजा बना दिया। तब से यहां पंचायती राज की अवधारणा बनी। समय-समय पर इसमें सुधार आता गया। राजीव गांधी ने भी चुनाव समय पर हों, पंचायतों को और अधिकार मिलें, इसमें अपना योगदान दिया। हमारे सामने जो परिस्थिति है पंचायत और नगरपालिकाओं की, इनको ज्यादा अधिकार दिए जाने की व्यावहारिक रूप से आवश्यकता है। छोटी नगरपालिकाओं और नगरपंचायतों के सामने वित्त की बड़ी अड़चन है। जहां से मैं आता हूं, दमोह लोक सभा क्षेत्र, उसकी शहरी आबादी दो लाख की है। वहां और पन्ना में पेयजल की समस्या है। पेयजल की समस्या के लिए वित्तीय अनुदान बढ़ाना चाहिए। नगरपालिकाओं को अनुदान बहुत कम मिलता है। नगरपरिषदों को करीब ३० प्रतिशत मिलता है। पंचायत और शहरी विकास में जो गंदी बस्तियां रुकावट हैं, उनको ठीक करने के लिए अनुदान ज्यादा दिया जाना चाहिए।
पंचायतों को ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए। मध्य प्रदेश में मेरे ख्याल से राजीव गांधी की जो मंशा रही हो, लेकिन उसकी वहां धज्जियां उड़ा दी गई हैं। वहां जिला सरकार बनी। उसने सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए।
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़): धज्जियां उड़ाने के बाद भी हमारी सरकार वहां बनी और अब फिर बनेगी।
डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया: इसका पता लग जाएगा। वहां जो जिला सरकार बनी हैं, गांवों में जो सुराज की बात कर रहे हैं, एक अलग कोषाध्यक्ष बनाया गया, जिससे गांवों में अराजकता फैल गई। मैं अपने एक रिश्तेदार को देखने अस्पताल गया तो वहां देखा कि एक गांव का सरपंच भी प्लास्टर बांधे पड़ा था। मैंने पूछा कि यह क्या हुआ तो उसने कहा कि यह दिग्विजय सिंह का सुराज है। हमारे यहां हथपुरिया गांव में अराजकता फैल गई है। आपने कहा था कि गावं जहां राम वहां। जहां राम होगा, वहां सुख होगा, शांति होगी। लेकिन इन्होंने अराजकता फैला दी। जिला सरकार के नाम पर पंचायतों के अधिकार अपने हाथ में ले लिए। जो गांव और जिला पंचायत अधिकारियों की सूची बनाते हैं, ट्रांसफर जिला सरकार करती है।
जिला सरकार में प्रभारी मंत्री और कलैक्टर को ये अधिकार दिये गये हैं। इस प्रकार से पंचायतों के अधिकारों का हनन किया गया है। हमारी प्रार्थना यह है कि राज्य सरकारों के ऊपर भी ऐसा कोई बंधन हो जिससे पंचायतों के अधिकारों का हनन न हो। माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जो प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना चलाई और स्वजलधारा योजना चलाई उससे गांव-गांव में पेय-जल की सुविधा हो गयी है और सड़कों के विकास के कारण वहां रोजगार भी बढ़ा है। अब गांव की महिलाओं को चार-पांच किलोमीटर दूर पानी लेने के लिए नहीं जाना पड़ता और सड़क बन जाने से बीमार आदमी को भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए अस्पताल ले जाने में भी सुविधा हो गयी है। कुछ वर्ष पहले ऐसा था कि जिस गांव में सड़क नहीं होती थी वहां के युवकों की शादी तक नहीं होती थी। लेकिन प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क बन जाने के बाद इस वर्ष पहली बार हमें शादी के इतने कार्ड मिले कि सब में जाना संभव नहीं हुआ। मैं माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को धन्यवाद दूंगा कि उनकी योजना के कारण गांव की हैसियत बढ़ी है, लोगों की नजरों में गांव का सम्मान बढ़ा है। सड़क बन जाने के कारण गांव के खाद्यान्न की कीमतें बढ़ी हैं और लोग गांव में बसने और धंधा लगाने की सोचने लगे हैं। इस प्रकार के जो लोग हैं उन्हें गांव में बसने और काम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा अधिकार और राशि दी जाए। जब गांव की ताकत, गांव की हैसियत और गांव का सम्मान बढ़ेगा, तभी देश की ताकत और सम्मान बढ़ेगा।
डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल (बेतिया): सभापति महोदय, मैं आपका आभार प्रकट करता हूं कि आपने मुझे अंत में बोलने का मौका दिया है। मैं माननीय मंत्री महोदय को बधाई देना चाहता हूं कि सरकार पंचायती राज के संबंध में प्रस्ताव लाई है और उसके समर्थन में मैं बोलने के लिए लिए खड़ा हुआ हूं। माननीय मणिशंकर अय्यर जी ने हिंदी में इस पर बोलने की शुरूआत की। मैं उनको हिंदी में बोलने के लिए धन्यवाद देता हूं। मणिशंकर जी अच्छी अंग्रेजी जानते हुए भी उतनी ही अच्छी हिंदी में बोले हैं उनको सुनकर लगा कि उन्होंने मेरी आत्मा की आवाज सुन ली। माननीय खारबेल स्वाइं भी हिंदी में बोले हैं जबकि वे अक्सर अंग्रेजी में बोलते हैं, उन्हें भी मैं धन्यवाद देता हूं।
मैं लोक सभा में सीधा नहीं आया हूं। मैं पहले नगरपालिका का चेयरमैन बना, फिर विधायक बना और अब तीन बार से लोक सभा का सदस्य हूं। मैं जब नगर पालिका का अध्यक्ष था तो पांच साल खत्म होने को आये तो किसी ने पूछा कि आप फिर चुनाव लड़ेंगे। तब मैंने कहा था कि यह नगरपालिका नहीं नर्क-पालिका है और मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। मुझे बहुत पीड़ा होती थी। मैं जानता हूं कि जो नगरपालिका के कर्मचारी होते थे उनको वेतन भी हम नहीं दे पाते थे। कई बार मेरे घर का घेराव होता था और एक डाक्टर होने का बावजूद भी मुझे उस प्रताड़ना को सहना पड़ता था। उस समय हमारी मंत्री सुमित्रा देवी जी हुआ करती थीं। एक बार उन्होंने नगरपालिका के अध्यक्षों का सम्मेलन किया। मैंने उनसे कहा कि नगरपालिका के कर्मचारियों का वेतन देने के लिए भी आप हमें अनुदान देती हैं और साथ में हमें कर्ज भी देती हैं जो हम कभी चुका नहीं पाते और हम आपके कर्ज को अनुदान मानकर चलते हैं। उस समय नगरपालिका की यह हालत थी। सन् १९७७ में न तो सांसदों को और न ही विधायकों को रुपया मिलता था। मेरी प्रार्थना है कि पंचायती राज में जो ग्यारहवीं अनुसूची में २९वें विभाग में जो अधिकार दिये गये हैं उनको पंचायतों को सौंपना चाहिए।
22.00 hrs. इसके लिए भारत सरकार को कोई नियमन लाना हो या कोई संशोधन करना हो या राज्यों के अधिकारों को छीनना पड़े तो वह काम करना चाहिए। हमारे यहां तीन तरह की सरकारें हैं - एक केन्द्र की सरकार है, दूसरी प्रदेश की सरकार है तीसरी लोकल सैल्फ गवर्नमैंट है। नीचे की सरकारों का पूरा सशक्तिकरण होना चाहिए। अंग्रेजों के जमाने में जो जिला बोर्ड बनते थे, वे अधिकार भी आज उनके पास नहीं हैं। अय्यर जी ने ठीक कहा कि डीआरडीओ को हटा दीजिए। उन्हों सरकारी कर्मचारियों के बारे में जो बात कही, मुझे लगा कि वह मेरे दिल की भावना व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने ठीक कहा कि जब तक सीआर लिखने का अधिकार जन प्रतनधियों को नहीं मिलेगा तब तक सही मायने में कोई विकास का काम नहीं होगा। जहां कुछ काम हो रहा है वहां केवल आपस में लड़ाई करायी जा रही है। जिला परिषद में जाइए वहां गुट बने हैं और लड़ाई करवायी जा रही है। यह पदाधिकारियों द्वारा करवाया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि आपस में दुराव है। कहा जाता है कि अगर यह काम कर देंगे तो इतने पैसे की व्यवस्था करके क्षेत्र का काम करवा दूंगा। सरकारी कर्मचारियों द्वारा जिला परिषद और पंचायत समति के लोग जिस तरह प्रताड़ित हो रहे हैं, उसके लिए मैं कहूंगा कि जरूर कोई व्यवस्था होनी चाहिए। आप डीआरडीओ को हटाइए, उनको अधिकार दीजिए। पहले जब मैं घर जाता था कि मेरे घर में २०० लोग खड़े रहते थे। मैं पूछता था कि क्यों आए हो तो लोग कहते थे कि इन्दिरा आवास के लिए आए हैं, कोई कहता था कि लाल कार्ड दिलवा दीजिए, कोई कहता था कि हमें अन्त्योदय के प्रोग्राम के अन्तर्गत अन्न दिलवा दीजिए। मैं कहता था कि क्या यह सांसद का काम है? दो वर्षों से जब से मेरे प्रदेश में पंचायतों के चुनाव हुए, ईमानदारी के साथ कह रहा हूं कि सुबह कार्यालय में उतरते समय मुश्किल से १० या १५ लोग मिलते हैं जिन को मेरे से काम होता है। जिन लोगों को सांसद कोष से कोई काम करवाना है या बात करनी है, केवल उतने लोग मिलते हैं। मैंने सब से कह दिया है कि दूसरे कामों को लेकर पंचायतों में जाओ और वहां काम करवाओ। कहने का अर्थ यह है कि हम लोगों का बोझ बहुत कम हुआ है। मैं इसके लिए सरकार को विशेष तौर पर बधाई देना चाहूंगा। मणिशंकर जी ने जो कुछ कहा मैं उन सारी बातों का समर्थन करता हूं।
पंचायतें गांव की व्यवस्था है। सारे देश में कृषि बाजार समतियां हैं। एग्रीकल्चर प्रोडयूस पर एक परसैंट टैक्स लिया जाता है। वह कहां पैदा होता है? वह गांव में पैदा होता है। वह शहरों में पैदा नहीं होता है। कृषि बाजार समति की आमदनी का २५ परसैंट इन पंचायतों को दे दिया जाए तो उनकी व्यवस्था सुद्ृढ़ हो जाएगी और उन्हें कहीं से पैसा मांगने की जरूर नहीं पड़ेगी। भारत सरकार को भी चाहिए कि जो राशि यहां से जा रही है, वह सीधे वहां भेजी जाए। मैं बिहार के लिए विशेष कर राम जीवन सिंह जी के प्रति आभार व्यक्त करता हूं। प्रदेश में सरकार किसी पार्टी की हो सकती है। हमारे यहां फैडरल गवर्नमैंट है। हमारा सरकार से विरोध हो सकता है लेकिन जनता से हमारा विरोध नहीं होना चाहिए। १०वें और ११ वें वित्त आयोग ने बिहार के साथ अन्याय किया। मेरा अनुरोध है कि आप इस अन्याय को दूर कर सुधार करें। आप बिहार के साथ अन्याय न करें। हमारे यहां कोई इंडस्ट्री नहीं है। हमारे यहां कृषि संबंधित चीजें ही होती हैं। किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपके प्रति और पूरे सदन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
सभापति महोदय : अब वक्ताओं की सूची समाप्त हो गई है।
श्री मणि शंकर अय्यर: यहां सभी सदस्य बोले हैं लेकिन जब तक शहरी और ग्रामीण विकास संबंधी समति के चेयरमैन श्री चन्द्रकान्त खेरे जी की बात न सुनी जाए तब तक यह चर्चा कैसे समाप्त होगी? उन्होंने इस रिपोर्ट को तैयार किया है। हम इस बारे में दो शब्द उनके मुंह से सुनना चाहते हैं।
श्री काशीराम राणा : बहुत समय हो गया है।
सभापति महोदय: मेरा नाम छोड़ कर वक्ताओं की सूची समाप्त हुई। अब, सभा काल पूर्वाद्न ग्यारह बजे तक के लिए स्थगित होती है।
२२. ०५ hrs. तत्पश्चात् लोक सभा शुक्रवार २५ जुलाई, २००३/3 श्रावण, १९२५ (शक) को ग्यारह बजे तक के लिए स्थगित हुई।
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