Lok Sabha Debates
Consideration Of The National Commission For Safai Karamcharis (Amendment) ... on 23 November, 2001
Title: Consideration of the National Commission for Safai Karamcharis (Amendment) Bill, 2001.
14.37 hrs. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (डॉ.सत्यनारायण जटिया) : सभापति महोदय, मैं प्रस्ताव ** करता हूं :
"कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधनियम, १९९३ में और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए ।"
सभापति महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधनियम १९९३ का संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए । राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का गठन १२ अगस्त, १९९४ को राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधनियम १९९३ के अधीन तीन वर्ष के लिए किया गया था । प्रारम्भ में यह अधनियम ३१ मार्च १९९७ तक के लिए था, जिसका विस्तार राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग संशोधन अधनियम, १९९७ द्वारा ३१ मार्च २००२ तक किया गया । वर्तमान आयोग फरवरी २००१ में पुनर्गठित किया गया और उसकी अवधि अधनियम की धारा - एक की उपधारा-४ के अनुसार ३१ मार्च २००२ तक है । वर्तमान आयोग की अवधि दो वर्ष से कम समय के लिए होगी । यह आयोग के उद्देश्य की प्राप्ति और समुचित कार्य करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी । अत: अधनियम की धारा -१ की उपधारा-(४) का संशोधन करके आयोग का कार्यकाल २९ फरवरी, २००२ तक बढ़ाकर तीन वर्ष करने का प्रस्ताव है ।
सभापति महोदय, मैं यह सदन के विचारार्थ प्रस्तुत करता हूं और निवेदन करता हूं कि इसे पारित किया जाए ।
MR. CHAIRMAN : Motion moved:
"That the Bill further to amend the National Commission for Safai Karamcharis Act, 1993, be taken into consideration."
* Published in the Gazettee of India, Extraordinary, Part-II. Section-2, dated 23.11.2001 ** Moved with the recommendation of the President.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदय, यह विधेयक असली अंत्योदय है। जो लोग गंदा काम करते हैं, वे बड़े लोग कहलाते हैं और जो सफाई करते हैं उन्हें सबसे छोटा कहा जाता है, नीचा माना जाता है । देश भर में उनकी आबादी करीब आठ करोड है । जिसमें लगभग सवा छ: लाख कर्मचारी हैं, जो म्युनसिपैलिटी एरिया आदि में झाड़ने, बुहारने और सफाई का काम करते हैं । लेकिन उनकी स्थिति बहुत खराब है । अब उस दिन नियम ७२ के अधीन भी २० तारीख को हमने प्रोटैस्ट किया था । लेकिन हमारे सुझाव और कोई बात ये मानने वाले नहीं हैं । ये लोग दलितों के दुश्मनों वाली बात करते हैं, ये लोग दलितों के खिलाफ काम करते हैं । २१ तारीख को माननीय श्री बूटा सिंह जी ने रामलीला मैदान में सफाई कर्मचारियों का एक बहुत बड़ा सम्मेलन बुलाया था, यह बीती २१ तारीख की ही बात है ।
बड़ा संयोग है कि २० तारीख को यह प्रोटैस्ट हुआ, २१ तारीख को इनका सम्मेलन हुआ और आज २३ तारीख को यह विधेयक आ गया। मैं कहना चाहता हूँ कि क्यों पीसमील में इसे बढ़ाते हैं? एक बार १९९४ में इसकी अवधि १९९७ तक बढ़ायी, फिर १९९७ से २००१ तक के लिए बढ़ायी, फिर २००२ तक के लिए बढ़ायी और अब कहते हैं कि २००४ तक बढ़ाएंगे। क्या आप मानते हैं कि तीन-चार वर्षों में आयोग की वजह से इनकी हालत में सुधार आ जाएगा? इसलिए हम मांग करते हैं कि जैसे सब आयोग हैं, उसी तरह का एक स्थायी आयोग इनके लिए बनना चाहिए क्योंकि यह समाज के पिछड़े आदमी का सवाल है जिसको महात्मा गांधी जी ने अंतिम आदमी का नाम दिया था। वह समाज का महत्वपूर्ण व्यक्ति है जो सफाई करने का काम करता है। आप देखिये कि उसकी हालत क्या है, उनका कितना शोषण हो रहा है। यह सवाल छ: लाख क करीब छह लाख लोगों का रिकार्ड में है लेकिन अभी भी गरीब आदमी से झाड़ू वगैरह लगाने का काम लिया जाता है और उनको कहीं २५० रुपये दिये जाते हैं तो कहीं ५०० रुपये दिये जाते हैं। उन पर अत्याचार हो रहा है। जबर्दस्ती उनसे काम कराया जाता है। इसलिए हम माँग करते हैं कि इस आयोग को अन्य आयोगों की भांति स्थायी बनाया जाए जिससे जो सफाई कर्मचारी सफाई का काम करते हैं उनके साथ न्याय हो सके। उनकी सबसे खराब हालत हिन्दुस्तान में है और दलितों में भी जो सफाई कर्मचारी हैं, उनको कई दलित लोग भी अछूत मानते हैं। इसलिए अगर समाज का यह वर्ग शोषण से मुक्त होगा और तरक्की करेगा, तब हिन्दुस्तान दुनिया के अन्य मुल्कों के साथ खड़ा होकर दावा कर सकता है कि हम भी सभ्य और विकसित मुल्क हैं जहां शोषण नहीं है, जहां दलितों का जो उत्पीड़न हजारों वर्षों से हुआ है, अन्याय हुआ है, वह नहीं है और इसी का नाम सामाजिक न्याय है। लेकिन इनको सामाजिक न्याय का पता नहीं चलता है। इनको आग लगाने वाले काम आते हैं, उपद्रव फैलाने वाले काम आते हैं और कभी-कभी ये प्रतिबंधित स्थलों में भी चले जाते हैं। उल्टे-सीधे काम करेंगे लेकिन हिन्दुस्तान आगे बढ़े, तरक्की करे, मेहनतकश आदमी जो पसीना बहाता है, वह आगे बढ़े, उसके लिए इनके पास कोई योजना नहीं है।
इन्होंने कानून बना रखे हैं, लेकिन इतनी कंजूसी से ये आयोग का समय बढ़ाते हैं कि पता नहीं चलता है। क्या यह कम महत्वपूर्ण समुदाय है? इसलिए मैं चाहता हूँ कि इसके लिए भी स्थायी आयोग बनाना चाहिए। पहले के भी कई कानून हैं। सभापति जी हमेशा मजदूरों के लिए लड़ते रहे हैं, आप जानते होंगे कि कॉनट्रैक्ट एक्ट में लिखा है कि इनको कॉनट्रैक्ट पर नहीं रखा जाएगा और ये लोग विधान बना रहे हैं कि क़ॉनट्रैक्ट एक्ट में रखा जाए और ठेकेदारों के द्वारा उनका शोषण हो और सफाई कर्मचारी लेबर सप्लाई में जाए। हम इसके खिलाफ हैं और सरकार को सावधान करना चाहते हैं कि ये बिल लाए हैं और पास कराना चाहते हैं, लेकिन ये एश्योर करें कि इसे अन्य आयोगों की तरह स्थायी आयोग बनाएंगे। जो कर्मचारी बंधुआ मजदूरों की तरह खट रहे हैं, उनको शोषण से मुक्ति मिलनी चाहिए। उनके बाल-बच्चों की, उनकी पढ़ाई-लिखाई की, रहन-सहन की, दवा-दारू की उचित व्यवस्था हो, समाज में उनकी इज्ज़त हो और महत्वपूर्ण समुदाय उनको माना जाए, यही आग्रह हम सरकार से करना चाहते हैं। अगर सरकार यह करती है तो ठीक है अन्यथा हम इस बिल के खिलाफ हैं। मंत्री जी भले आदमी हैं लेकिन भाजपा ने पहले इनको लेबर मनिस्टर बनाया, फिर वहां से धक्का देकर यहां ले आए। अब इसमें जो दलित और शोषित समुदाय है, उसके लिए बहादुरी से काम करिये, नहीं तो भाजपा वाले यहां भी आपको नहीं छोड़ेंगे, ऐसी हमें आशंका है। भाजपा में किनकी चलती है यह भी हमें मालूम है। इसलिए दलित समुदाय के लिए आप निडर होकर काम करें, हालांकि आपको कठिनाई होगी, उसमें बड़े लोग आपके खिलाफ भी होंगे।
सभापति महोदय, ये दकियानूसी लोग हैं, जो अभी तक छुआछूत को खत्म नहीं करना चाहते हैं। ऐसे लोग ही उस पार्टी में हावी हैं। इसलिए मंत्री जी आपको बहुत कठिनाई हो रही है। इस बात को हम समझते हैं। अत: यह आवश्यक है कि हमको मुस्तैद रहना चाहिए, नहीं तो काम नहीं चलेगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
डॉ.(श्रीमती) अनीता आर्य (करोल बाग) : सभापति महोदय, मैं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (संशोधन) विधेयक, २००१ का समर्थन करने के लिए खड़ी हुई हूं। सर्वप्रथम मैं माननीय प्रधान मंत्री और माननीय मंत्री जी का धन्यवाद करना चाहती हूं जिन्होंने समाज के सबसे निम्न वर्ग, यानी सफाई कर्मचारियों के हित के लिए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग बनाया और आज उसमें संशोधन करने हेतु विधेयक सदन में प्रस्तुत किया है।
सभापति महोदय, आज भी देश के कई प्रान्तों में इतनी प्रगति होने के बावजूद मल तथा कूड़ा हाथ से उठाने की प्रथा मौजूद है। केन्द्र और राज्य सरकारें इस बात से अत्यन्त चिन्तित हैं और सफाई कर्मचारियों के उत्थान और उनके कल्याण के लिए केन्द्र सरकार ने दो प्रमुख योजनाएं चलाई हैं। प्रथम योजना राष्ट्रीय सफाई एवं उनके आश्रितों की मुक्ति एवं पुनर्वास हेतु राष्ट्रीय योजना और दूसरी योजना केन्द्र सरकार ने अस्वच्छ व्यवसाय में लगे लोगों के बच्चों के लिए मैटि्रक पूर्व तक पढ़ाने की योजना और छात्रवृत्ति की योजना प्रारंभ की है। सफाई कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार बहुत चिन्तित है।
सभापति महोदय, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार सफाई कर्मचारियों की संख्या के जो आंक़ड़े हैं वे लगभग ५,७७,२२८ हैं। उनमें से ३,५०,०५९ सफाई कर्मचारियों को पुनर्वासित किया गया है और १,३६,६८१ सफाई कर्मचारियों को सरकार द्वारा प्रशक्षित किया गया है। सफाई कर्मचारियों की संख्या आज भी विवादास्पद है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सफाई कर्मचारियों की संख्या ६ लाख के लगभग है। वर्तमान आयोग दिनांक १६-०२-२००१ को बना। आयोग ने केन्द्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या वर्तमान आंकड़े सही हैं, यदि हां, तो वैसा बताया जाए और यदि सही नहीं हैं, तो आयोग को सही आंकड़े उपलब्ध कराए जाएं, लेकिन केन्द्र सरकार अभी तक आयोग को सफाई कर्मचारियों की संख्या के बारे में सही स्थिति से अवगत नहीं करा सकी है।
महोदय, मैं प्रार्थना करना चाहती हूं कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग को सविल न्यायालय की तरह शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए। इस आयोग का कार्यकाल बढ़ाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि सफाई कर्मचारी समाज का सबसे संवेदनशील वर्ग है जिसका उत्थान और कल्याण बहुत आवश्यक है। इसलिए इसका कार्यकाल बढ़ाया जाना जरूरी है। यह आयोग, प्रदेश सरकारों द्वारा सफाई कर्मचारियों के लिए जो स्कीमें चलाई जा रही हैं उनकी मानिटरिंग करता है। इसके साथ-साथ पूरे देश का दौरा कर के निरीक्षण करता है तथा उसकी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत करता है।
सभापति महोदय, मैं केन्द्र सरकार को बधाई देना चाहूंगा जिन्होंने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारियों के हित एवं अधिकारों की चिन्ता की और इस आयोग का कार्यकाल बढ़ाने हेतु विधेयक प्रस्तुत किया गया है। हाल ही में १५ अगस्त, २००१ को वर्तमान प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने मलिन बस्ती बाल्मीकि आवास योजना के तहत उन्हें आवासीय सुविधाएं प्रदान करने की घोषणा की थी।
मैं उनका धन्यवाद करना चाहूंगी, साथ ही माननीय मंत्री जी से कहना चाहूंगी कि इस आयोग के कार्यकाल को स्थाई रूप से बढ़ाया जाए क्योंकि अभी सफाई कर्मचारियों के उत्थान के लिए बहुत काम करना बाकी है। उनके कल्याण और उन्हें इस हीन भावना से मुक्ति दिलाने के लिए कि वे समाज के सबसे निम्न वर्ग हैं, राष्ट्रीय कर्मचारी आयोग का कार्यकाल स्थाई किया जाए। इन्हीं शब्दों के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद।
सरदार बूटा सिंह (जालौर): सभापति महोदय, मैं सर्वप्रथम अपने माननीय सहयोगी, बहुत पुराने साथी, दलितों में उच्च कोटि के महान् विद्वान, हमारे वर्तमान मंत्री डा. सत्यनारायण जटिया जी को इस बात के लिए बधाई देता हूं। मैं समझता हूं कि यह विभाग उनकी इच्छा के मुताबिक उनके हाथ में आया है। मैं उनकी भावनाओं को जानता हूं। वे समर्पित हैं और अब उम्मीद हुई है कि जितने भी दलित, खासकर सफाई वर्ग के जितने भी लोग हैं, उनको सरकार की ओर से कुछ न्याय की तवक्को हो सकती है। अफसोस इस बात का रहा कि सफाई कर्मचारी आयोग, जिसकी नवनियुक्त अध्यक्षा चेयरमैन डा. अनिता आर्य अभी-अभी बोल कर हटी हैं, मैं उम्मीद करता था कि वे कुछ अथॉरिटी के साथ सदन को बताएंगी कि इस वक्त रआयोग की अंदरूनी हालत क्या है। मगर जिस ढंग से उन्होंने आयोग के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं, ऐसा लग रहा था कि डा. अनिता आर्य अभी तक आयोग को पूरी तरह समझ भी नहीं पाई हैं। आज हालत यह है कि डा. आर्य अध्यक्षा तो बन गई हैं मगर उनका स्टाफ पूरी तरह से नहीं लगा, जो स्टाफ नियुक्त हो चुका है। डा. जटिया जी, उनके कर्मचारियों को पिछले आठ महीने से तनख्वाह नहीं मिली। क्या यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि चेयरपर्सन महोदया हमको अवगत करवातीं कि मेरे आयोग की यह हालत है? पहले दफ्तर नहीं मिला, कोई गाड़ी नहीं मिली, बैठने के लिए कोई जगह नहीं मिली।…( व्यवधान)
डॉ.(श्रीमती) अनीता आर्य : गाड़ी सबको मिली है, स्टाफ नहीं रखा गया है तो तनख्वाह कैसे देंगे।
सरदार बूटा सिंह: सदस्यों के साथ जो उनके असिस्टैंट, उनके पी.ए. काम कर रहे हैं।…( व्यवधान)
डॉ.(श्रीमती) अनीता आर्य : व्ो प्राइवेट लगे हुए हैं। अभी उनको लगाया नहीं है।
सरदार बूटा सिंह: यहीं से देख लीजिए, क्या मजाक है, आठ महीने से स्टाफ नहीं है। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि अध्यक्ष महोदया के दफ्तर में आठ महीने से स्टाफ काम कर रहे हैं और श्रीमती जी कह रही हैं कि स्टाफ रखा नहीं है। वे आठ महीने से कैसे काम कर रही हैं? वे सफाई कर्मचारी हैं जो आपका दफ्तर साफ करके चले जाते हैं। डा. जटिया जी, इससे पता चलता है कि सरकार की तरफ से आयोग के साथ किस किस्म का व्यवहार हो रहा है। मैं सफाई कर्मचारियों की बात बाद में करूंगा। मुझे खेद है कि हमारी आदरणीय चेयरपर्सन, जिन्होंने इतना परिचय दिया है कि उनको आयोग के बारे में कुछ भी पता नहीं है, इस बात को सिद्ध करता है कि नैशनल कमीशन फार सफाई कर्मचारी बिल, १९९३ यह मांग करता है कि इसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष वे होने चाहिए जिनका सफाई कर्मचारी धंधे के साथ कुछ परिचय हो, जिन्होंने उनके लिए और उनके साथ कभी काम किया हो। आज साबित हो गया है कि डा. आर्य को सफाई कर्मचारी के धंधे और उनकी कार्य पद्धति के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। इसलिए कानूनी तौर पर १९९३ के एक्ट के मुताबिक वे अनक्वालीफाइड हैं, उनको अख्तियार नहीं है कि वे कमीशन की चेयरपर्सन बनी रहें। अच्छा हो यदि वे ईमानदारी से इस पद को छोड़ दें और डा. जटिया किसी ऐसे व्यक्ति को यह पद दें जिसे यह अनुभव हो ।जो जानता हो कि सफाई कर्मचारियों का धन्धा, उनका पेशा कैसा है, जो जानता हो कि उनकी जीवन-पद्धति कैसी है। यह मैं नहीं कहता हूं, यह कानून कहता है। कानून की धारा चार में लिखा हुआ है: "The Chairperson and Vice-Chairperson should be among persons of eminence connected with the socio-economic development of the Safai Karamcharis."यह एक्ट में लिखा हुआ है। उनको कोई नोलिज भी नहीं है, उन्होंने तो कभी सफाई कर्मचारियों के साथ काम भी नहीं किया, किसी संगठन में काम नहीं किया। आज मैं समझ सकता हूं कि जिस ढंग का उन्होंने परिचय दियाहै, वे यह पोस्ट होल्ड करने के योग्य नहीं हैं और डॉ. जटिया साहब, आप कृपया किसी ऐसे व्यक्ति को लगाइये, हम पार्टी की बात नहीं कर रहे है, जो सफाई कर्मचारियों के बारे में जानता हो। आगे चलते हुए मैं कहूंगा कि यह सफाई कर्मचारी आयोग १२ अगस्त, १९९३ को इसी पार्लियामेंट के अन्दर बना और एक साल तक यह कानून धूल चाटता रहा, इसके मैम्बरों की नियुक्ति नहीं हुई। कानून पास हो गया और उस बात को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ा, मैं किसी पार्टी की बात नहीं कर रहा हूं, उस वक्त कांग्रेस का राज था। तीन फरवरी, १९९६ को कांग्रेस के प्रधानमंत्री देश के मंत्रियों के सामने बोले थे, मैं उनके शब्द दोहराना चाहूंगा। श्री पी.वी. नरसिंहराव ने यह कहा, जहां तक सफाई कर्मचारियों का प्रश्न है, यद्यपि उनके लिए एक आयोग की स्थापना की गई है, लेकिन कभी-कभी यह सोचकर मैं परेशान हो जाता हूं कि इस आयोग को स्थापित करने के लिए मुझे एक डेढ़ साल तक काफी संघर्ष करना पड़ा। देश की नौकरशाही की यह मनोवृत्ति है कि डेढ़ साल तक प्रधानमंत्री जूझता रहा, लड़ता रहा और आयोग की नियुक्ति नहीं हुई और जब नियुक्ति हो भी गई तो मुझे ज्ञात हुआ है कि आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यगण एक लम्बे अर्से तक कार्यालय भवन और निवास जैसी सुविधा से वंचित हैं। एक साल तक तो उनको भी नहीं मिला था, आपके कर्मचारियों को तो अभी आठ महीने की तनख्वाह नहीं मिली। इसलिए मैं आपकी व्यक्तिगत बात नहीं कर रहा हूं। यह उपेक्षा, यह उदासीनता सफाई कर्मचारी आयोग की शुरू से हुई, जब से इस आयोग का जन्म हुआ था, तब से हो रही है। इस दरम्यान एक ऐसा समय भी आया, इस आयोग की अवधि २००२ तक थी और उस वक्त की मंत्री महोदया मेनका गांधी जी ने दो साल पहले ही इसका गला घोंट दिया और अखबार वालों को कह दिया कि हमें यह आयोग चाहिए ही नहीं। सफाई कर्मचारियों के आयोग की कोई जरूरत ही नहीं है और फिर इस सदन के सभी दलतों के सदस्यों ने स्पीकर साहब सहित प्रधानमंत्री जी को लिखा, मिलकर कहा तो प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी इस बात के लिए परेशान हुए कि ऐसा कैसे हो सकता है कि कानून के मुताबिक अवधि बाकी हो तो यह समाप्त कैसे हो सकता है। जब हमने लिखकर दिया तो उन्होंने कृपापूर्वक जो वर्तमान आयोग है, इसकी नियुक्ति की। इस आयोग के बारे में बोलते हुए नरसिंह राव जी फिर कहते हैं कि मैं आपको अपनी वेदना में सहयोगी बनना चाहता हूं, क्योंकि इस आयोग को स्थापित करने में मुझे जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उतनी कठिनाइयां किसी आयोग को स्थापित कने में नहीं आईं।
१४.५९ hrs. ( Shri P.H. Pandian in the Chair) जटिया जी, इस पृष्ठभूमि में हम आपसे उम्मीद करेंगे, मेनका जी ने इस आयोग को इसकी अवधि से दो साल पहले खत्म कर दिया, इसका दफ्तर बन्द कर दिया, स्टाफ सारा भेज दिया, जबकि दो साल के लिए उनके पास स्वीकृति थी। गाड़ियां वापस कर दीं, स्टाफ वापस कर दिया, दफ्तर बन्द कर दिया और फिर अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस आयोग की नियुक्ति की, जो आज चल रहा है। उस आयोग के सदस्य अकेले-अकेले केवल चेयर पर्सन ही नहीं, सभी सदस्य मुझे कहकर गये कि आपकी हिम्मत से, आपके संघर्ष से, सभी मान्यवर सदस्यों के संघर्ष से इस आयोग को दोबारा जान मिल गई, यह फिर से एग्जिस्टेंस में आ गया। लेकिन इस आयोग का न तो कोई कार्यालय है, न इसके पास स्टाफ है।
15.00 hrs. न जाने कैसे-कैसे यत्न करके स्टाफ जुटाया गया, आज वह स्टाफ बिना वेतन के काम कर रहा है। मैं सैद्धांतिक रूप में आज पेश हुए विधेयक का समर्थन करता हूं, क्योंकि इसमें एक उम्मीद दिखाई दे रही है। जटिया साहब आपके व्यक्तित्व से हमें लगता है कि इसके जरिए कम से कम २००४ तक आप इस ढांचे में फिर से जान डालेंगे और यह सफाई कर्मचारियों के लिए कुछ काम कर सकेगा।
आपको मालूम हो कि जब देश ने आजादी जीत ली, केन्द्र में सरकार बन गई। राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति महोदय विराजमान हो गए। साउथ ब्लाक में प्रधान मंत्री जी बैठ गए तो देश के महान व्यक्ति राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्थान कहां हुआ। वे पचकुइंया स्थित वाल्मीकि मंदिर में चले गए। जब प्रैस वालों ने पूछा कि बापू यह आप कहां बैठ गए। आपके द्वारा तो राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री तक नियुक्त होते हैं, आप सफाई कर्मचारियों की बस्ती में यहां आकर क्यों बैठ गए हैं। इस पर उन्होंने जो जवाब दिया, वह ऐतिहासिक जवाब था। उन्होंने कहा कि देश ने आजादी हासिल कर ली, मुझे इसकी खुशी है। लेकिन अभी भी जो देश के पराधीन वर्ग हैं, उनमें भी सबसे पराधीन मेरे भाई-बहन सफाई का काम करते हैं, गंदगी उठाते हैं। जब पूरा देश सोया रहता है, तो मेरे ये बच्चे सड़कों पर नालियां साफ करने के लिए निकल जाते हैं, ये अभी भी पराधीन हैं। उनकी मुक्ति के मैं यहां से दूसरा अभियान शुरू करूंगा, वाल्मीकि के चरणों से शुरू करूंगा। महात्मा गांधी की विल के बारे में सभी जानते हैं। उन्होंने उसमें लिखा था कि मुझे पुनर्जन्म में विश्वास नहीं है, मगर यदि ईश्वर की इच्छा हुई और मुझे फिर यहां भेजा तो मैं कहूंगा कि मुझे अतिशूद्र के घर में जन्म देना, ताकि मैं उनके परिवार में रहकर इस बात का अनुभव कर सकूं कि किस प्रकार का अमानवीय जीवन, जानवरों की तरह जीते हुए, गंदी नालियों के किनारे पर बिना पानी, स्वास्थ्य सुविधा और बिजली के कैसे ये लोग अपना जीवन व्यतीत करते है और अपने उस स्वप्न को पूरा कर सकूं, जो आज नहीं कर पाया।
हम आज उस समाज की भलाई के लिए, उस आयोग की अवधि बढ़ाने जा रहे हैं और यह काम जटिया जी आपके हाथों होने जा रहा है। हमें खुशी है कि प्रधान मंत्री जी ने दलितों की दुश्मन और सफाई कर्मचारियों की घोर विरोधी मेनका गांधी से हमें छुटकारा दिलाया और एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में इसकी बागडोर थमाई जो इन लोगों की समस्या को जानता है।
१९९३ के एक्ट में सेक्शन १० में जो लिखा गया है, वह सफाई कर्मचारियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
"The Central Government shall consult the Commission on all major policy matters affecting the Safai Karamcharis. "
इसका मतलब यह हुआ कि जब भी सफाई कर्मचारियों की, मजदूर नीति का परिवर्तन करना होगा, उस वक्त आप इस कमीशन के सदस्यों को बुलाकर उनकी राय से करेंगे। मगर खेद है कि हमारे वित्त मंत्री जी ने जो घोषणा कर रखी है लेबर एक्ट के अंदर संशोधन की, उसमें इस बात का उल्लेख तक नहीं है। आपकी सरकार ने या आपके प्रधान मंत्री ने कभी एक पत्र लिख कर उस आयोग से या इन लोगों की राष्ट्रीय यूनियन से यह नहीं पूछा कि आपकी क्या राय है। सुना है प्रधान मंत्री जी ने एक नेशनल कौंसिल कायम किया था। उसमें बड़े-बड़े लोग थे, जिन्होंने प्रधान मंत्री जी को यह परामर्श दिया है कि देश के लेबर ला में संशोधन किया जाए। इन लोगों में श्री रतन टाटा, श्री नुस्ली वाडिया, श्री पी.के. मित्तल और श्री कुमारमंगलम् बिड़ला थे। इनकी कौंसिल बनाई गई और यह पूछा गया कि मजदूर कानून में कैसे संशोधन किया जाए।
मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि पूंजीपतियों और उद्योगपतियों को मजदूरों के बारे में क्या मालूम हो सकता है? यदि प्रधान मंत्री जी किसी एक ट्रेड यूनियन के नेता, किसी मजदूरों के, एससी कमीशन के, बैकवर्ड क्लासेज के या हयूमन राइट्स कमीशन के चेयरमैन को जोड़ देते या सफाई कर्मचारी कमीशन के चेयरमैन को जोड़ देते तो हम समझते क्योंकि ये सारे जितने कमीशन्स हैं, ये बैकवर्ड क्लासेज के, माइनॉरिटीज के, एससी और सफाई कर्ममचारियों के हैं तो हम समझते कि सही मायनों में सरकार की इच्छा है कि पूरी ईमानदारी के साथ देश के लिए ऐसे संशोधन का काम किया जाये जिससे समूचे देश का भला हो, सामाजिक कल्याण हो, आर्थिक प्रगति भी हो लेकिन मुझे अफसोस है कि इस कमेटी के कहने पर कांट्रैक्ट लेबर एक्ट की धारा १० का संशोधन भारत सरकार ने कर दिया। इसके अन्तर्गत जहां कहीं भी स्थायी तौर पर काम चल रहे हैं जिनको प्रीमियर वक्र्स कहा जाता है, वर्तमान कांट्रैक्ट लेबर एक्ट के मुताबिक जो काम पैरीनियल होते हैं, उसमें कांट्रैक्ट नहीं आ सकता। जो सीजनल होते हैं, टैम्परेरी होते हैं, कैजुअल होते हैं, आप तो हमारे देश के बहुत बड़े मजदूर नेता हैं, आपको पता है लेकिन इस एक्ट के तहत जो सबसे बड़ा कुठाराघात हुआ है, वह सफाई कर्मचारियों के ऊपर हुआ है। सफाई का काम पैरीनियल है, सफाई का काम २४ घंटे, तीस दिन और बारह मास चलता है, इसलिए वर्तमान कांट्रैक्ट के अन्तर्गत इसमें कांट्रैक्ट का काम नहीं हो सकता। एक प्रावधान है कि कांट्रैक्ट एक्ट में यदि किसी को पैरीनियल काम को कांट्रैक्टर को देना हो, स्टेट गवर्नमेंट कुछ समय के लिए उस सेवा को एमर्जेंसी सर्विस डिक्लेअर करके मैक्सिमम ५ साल के लिए उस काम को दिया जा सकता है लेकिन अफसोस है कि तमिलनाडु में चेन्नई कॉरपोरेशन, आपकी कॉरपोरेशन ने, डीएमके सरकार ने सफाई का काम जो परमानेंट काम था, उसके ऊपर एमर्जेंसी लगा दी और वह काम सिंगापुर की एक कंपनी सीजीईए…( व्यवधान)
SHRI S.S. PALANIMANICKAM (THANJAVUR): Sir, he is misleading the House. We are giving some opportunity to the Scavenger community… (Interruptions)
SARDAR BUTA SINGH : Let me complete first. He has the right to reply… (Interruptions) Sir, you have to know who is the owner of the firm and what relations he has got with one of the Central Cabinet Ministers of India… (Interruptions) पांच साल के लिए चेन्नई कॉरपोरेशन जो कैटेगरी, ए सिटीजन इंडिया के हैं, सिंगापुर की एक फर्म को बुलाकर सफाई का काम दे दिया क्योंकि हमारे मद्रासी भाइयों की गंदगी में खुशबू होती है, वह सिंगापुर से आकर उठाएंगे, उसमें बदबू नहीं होती मगर अफसोस…( व्यवधान)
SHRI S.S. PALANIMANICKAM : Sir, he is misleading the House… (Interruptions)
SARDAR BUTA SINGH : I am not yielding.
MR. CHAIRMAN :Let him finish it. When you get a chance, you can reply then.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: He is expressing his view. You can speak when you get your chance.
SARDAR BUTA SINGH : I am saying something, which is before the Supreme court of India. उस फर्म ने कह दिया कि हम तो नहीं कर सकते। अभी उसकी जगह फ्रांस से सुंदर-सुंदर लोग चेन्नई की गलियों में सफाई करने के लिए आएंगे। नहीं वहां से नहीं आएंगे, वही सफाई कर्मचारी जो आज इत्तफाक से ५००० रुपये तनख्वाह लेते हैं, जिस वक्त फ्रांस की कांट्रैक्टर यहां आ गई तो वही सफाई कर्मचारी, वही हाथ में झाड़ू और बाल्टी लिये जो आज ५००० रुपये लेते हैं कल से १२०० रुपया लेंगे और जिसको छुट्टी भत्ता, मैडिकल एलाउंसेज, हाउसिंग एलाउंसेज, क्लीनिंग एलाउंसेज मिलता है, उसी को बंधुआ बनाकर विदेश की कंपनी जब जी चाहे, उसकी पीठ पर डंडा मारकर निकाल सकती है।
सभापति महोदय, चेन्नई कार्पोरेशन ने एक पत्रिका में एक एफिडेविट दिया है कि सफाई कर्मचारी बड़े ही बददिमाग है, इसलिए उनको सूची से बाहर निकाल दिया जाए। उनको प्रिवैंशन आफ एट्रासिटीज, १९८८ से छुटकारा दिया जा रहा है, ताकि कल कान्ट्रैक्टर उनको मारना चाहे, पीटना चाहे, धक्का देकर निकालना चाहे, तो ये गरीब लोग थाने मे जाकर अनटचेबलिटी का मुकद्दमा भी न कर सकें। कान्ट्रैक्ट एक्ट की सुविधा मुम्बई में, मैंग्लौर में, चेन्नई में है और दिल्ली में जैसा रघुवंश प्रसाद जी ने बताया, रामलीला मैदान में जो रैली हुई है, वह केवल सफाई कर्मचारियों की नहीं थी, उसमें इन्डस्टि्रयल डिसप्युट एक्ट के खिलाफ और कान्ट्रैक्ट लेबर एक्ट के खिलाफ आहवान किया गया था।
MR. CHAIRMAN : Please conclude. We have to pass it by 3.30 p.m. There are more Members to speak on this Bill.
SARDAR BUTA SINGH : I know that. I will conclude my speech quickly. What I am saying is relevant and it is not detrimental to crores and crores of people. Thirty-five crore working class of India are going to be penalised by these amendments which have been moved by this Government. Therefore, the matter is very serious. It is of national importance. Of course, the main target is the Safai Karamcharis.
Sir, I would like to make a humble submission to Dr. Satyanarayan Jatiya. I will send you a detailed report. I have already sent a report to the hon. Prime Minister. I will submit a copy to you. You become the Messiah of the working classes and save the Safai Karamcharis from the draconian amendments that are being introduced in the Parliament. एक नया रूप निकाल लिया है। जो काम संसद का था, जो कानून संसद में पास होना चाहिए था, उसके पहले ही एक एनजीओ ने पीआईएल के तहत सुप्रीम कोर्ट से आर्डर ले लिया और सरकार कहती है कि हम क्या कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिया है। हमारे रिजर्वेशन का गला घोंटा गया है। सुप्रीम कोर्ट के आर्डर से अमेंडमेंट इस सदन में इन्ट्रोडयुस नहीं की गई है। हम इस बात से माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के आभारी हैं कि उन्होंने संविधान में अमेंडमेंट करने का प्रयास किया और यह भी प्रयास किया कि जो रिजर्वेशन छीनी गई थी, उसको दोबारा वापिस किया जाए। लेकिन वह अभी तक नहीं हुआ है। मजदूरों के साथ घोर अन्याय हो रहा है। अन्य माननीय सदस्यों ने कहा है कि इस आयोग को स्थायी किया जाए। यह बात पहली बार नहीं हुई है, १९९७ में, २००० में एक्सटैंशन हुई थी। उस समय के मंत्री श्री रामूवालिया जी ने इसी सदन में आश्वासन दिया था कि हम इस आयोग को स्थायी बनायेंगे। हम कहते हैं, मेनका गांधी जी ने जो काम किया, उसको तो हमने झेल लिया, लेकिन जो काम रामूवालिया जी नहीं कर पाए, उसके लिए हम डा. सत्यनारायण जटिया जी से आशा करते हैं कि वे पूरा करें। आयोग से हमारा लेना-देना कुछ नहीं है, लेकिन डा.अनिता आर्या जी पहले काम करें और २४ घन्टे सफाई कर्मचारियों के लिए काम करें। तब हम कहेंगे कि इस आयोग को पूरी शक्ति दी जाए और इनके सदस्यों को पूरा आदर दिया जाए। इस आयोग को दूसरे आयोगों के बराबर रखा जाए। जो कोर्ट की पावर्स हैं, जो सबको मिली हुई है, जो हयुमन राइट्स आयोग को मिली हुई हैं, वह इस आयोग को भी मिलनी चाहिए, ताकि वे काम कर सकें।
इन शब्दों के साथ मैं विधेयक का समर्थन करता हूं और आशा करता हूं डा. सत्यनारायण जटिया जी यहां उठाए गए मुद्दों पर उचित कार्रवाई करेंगे।
*SHRI RUP CHAND MURMU (JHARGRAM): Hon’ble Mr Chairman Sir, I support the Bill. The National Commission for Safai Karmacharis was constituted on the 12th of August 1994 as a body at the national level. I am sorry to say that the Safai Karmacharis are the most hated people, poorest of the poor and most oppressed in the society. People hate them. So, to constitute a Commission for them is indeed the most important historical incident. Sir, I feel the people who have motivated them, have made them aware of their rights, have inspired them to fight for their rights, have provided leadership in their agitation to achieve their rights deserve congratulations and admiration. After going through the report of the Commission I came to know that there was a dharna for 43 days at Boat Club in Delhi. Lakhs of Safai Karmacharis from all over India attended that dharna. It was a successful dharna. The ultimate result of the dharna was the Constitution of the Commission. But almost seven years have passed after the Commission was set up. Of course reports like the 1st Report, the 2nd Report have been submitted but so far nothing has been achieved for the benefit of these people. The Government have failed to do something, something to change their miserable condition. There is a controversy about the definition of Safai Karmacharis. But I feel the purpose of constituting the Commission was to look after the grievances of the Safai Karmacharis – people who are engaged in doing the filthy work of carrying night soils and garbage. The purpose was to empower the Commission to investigate the matters relating to implementation of the programmes and schemes for their welfare. The aim of setting up the Commission was to liberate these people and their families from the inhuman work of carrying human excreta even in this so called civilized age. These people are calledJamadars and Meshon in Bengali and they are looked down upon in the society. But we forget that they do __________________________________________________________________ *English Translation of the speech originally delivered in Bengali.
the noble job in the society. They clean the area, clean latrines, dustbins and carry them on their head and thus keep the area clean. But what do they get in return of their noble deeds? They get only hatred, oppression and have been labeled as achhut or untouchables. They are hated repulsed even by adivasi Scheduled Castes who are themselves suppressed by upper castes. But they have the Safai Karmacharis for the work they do.
I would like to request the Government to think seriously about the condition of these people and take some welfare measures to ameliorate their condition. The place they inhabit lack the basic facilities like electricity, drinking water or cleanliness. It is a paradox that those who are engaged in cleaning the city live in such conditions. If people visit their areas, they will feel that they have come to hell itself. They do not have medical facility. Their children have no access to education. Are not they human beings? Even after 54 years of independence, they have to face these hurdles. How long they have to continue like this? Today I will put this question before the House. I ask this august House as to how long these people should have to continue to carry the night soil on their heads. All of us must think over it. This is the age of high technology. Science has progressed very much. Can’t we think of some other means so that these people don’t have to do the dirty work manually? Why they have to touch and carry human excreta? If this can be done by some simple machine why we make them do this dirty work. Why can’t we provide them some other occupation? They must be given some other job so that they can live with honour and dignity. I do not know if there has been any survey about the number of Safai Karmacharis in the whole country. I feel that there should be a survey to know the exact number of the people who are engaged in this profession. There should be a time bound programme so that we can bring some change in their lives, in their occupation.
I would also request the Government to look into the contract system prevailing in their job. They are employed by the contractors and the contractors misuse their power and derive benefit out of it. These people do not get their due share. Some upper caste people also misuse them by giving them less money and take the major share. I request the Government to take appropriate measures so as to stop this kind of manipulation. We have to act in an organized way so that we can give the benefits to these people who have been suffering since long due to injustice. I remember Swami Vivekananda’s famous speech at Chicago in the Conference of Religions. He said, "Illiterate Indians, poor Indians and chandal Indians are my blood and brothers."
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): सभापति जी, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का कार्यकाल तीन वर्ष और बढ़े, इसका मैं समर्थन करता हूं और साथ ही यह भी चाहता हूं कि इस कमीशन को स्थाई किया जाए, जैसा कि अभी माननीय बूटासिंह जी ने कहा है और यह सभी सम्माननीय सदस्यों की भी इच्छा है। माननीय जटिया साहब से मैं एक विनम्र निवेदन करना चाहूंगा कि कमीशन का कार्यकाल कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि कमीशन के पास शक्तियां क्या हैं? कमीशन जिन वर्गों के लिए बना है उनके साथ इंसाफ कर रहा है या नहीं कर रहा है, कमीशन समर्थ है या नहीं है, कमीशन की सफाई कर्मचारियों के लिए उपयोगिता है या नहीं है। कमीशन चाहे एक दिन का हो या एक महीने का हो या दस साल का हो, जिस मकसद के लिए कमीशन बना है वह उसमें कामयाब होता है या नहीं होता है, यह महत्वपूर्ण है, नहीं तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। यही विनम्र निवेदन मैं आपसे करना चाहता हूं। इसलिए मेरा आग्रह है कि मेहरबानी करके कमीशन को अधिकार दीजिए और इसको सार्थक बनाइये।
सभापति जी, मुझे माफ करें। एक समय था जब राज्य सभा और विधान परिषद में ऐसे लोग भेजे जाते थे जिनकी किसी विशेष क्षेत्र में योग्यता होती थी। जिनको कला, संस्कृति आदि विशेष क्षेत्रों का ज्ञान होता था, ऐसे लोगों को राज्य सभा और विधान परिषद में भेजने का काम होता था। लेकिन आज हमारी पूरी राजनीति का जो ताना-बाना है उसमें ऐसा लगता है कि जो लोग चुनाव में रह जाते हैं और किसी पार्टी को उन्हें समायोजित करना होता है तो उन्हें राज्य सभा या विधान परिषद में भेजने की बात आती है। इसी तरह से कमीशनों में हो रहा है। व्यक्ति योग्य है या नहीं है वह कम महत्वपूर्ण हो गया है। महत्वपूर्ण यह हो गया है कि हमारी पार्टी का वफादार आदमी है चाहे वह कमीशन के तौर-तरीकों को जाने या नहीं जाने, योग्य हो या न हो। इसलिए अगर कमीशन में उस वर्ग के योग्य व्यक्ति नहीं होंगे तो कमीशन सशक्त रूप से नहीं काम कर सकता। डा. अनीता आर्य को माफी है। वह आगरा की रहने वाली हैं तथा उनके पिता कुंदनलाल जी से मेरे पुराने संबंध थे। इनको चेयरमैन बनने की क्या जरूरत थी, बनती तो किसी और जगह बन जाती। इसलिए जब तक कमीशन को आप अधिकार नहीं देंगे तब तक कोई बड़ा काम होने वाला नहीं है। लगता यही है कि कमीशन भी राजनीति की बलिबेदी का शिकार हो रहे हैं।
दूसरा निवेदन मैं यह करना चाहता हूं कि जो कानून आपने बना दिया कि मैला ढोना अपराध है तो माननीय जटिया साहब, घोषणाएं कुछ भी हों, आंकड़े कुछ भी हों, लेकिन सच्चाई कुछ और है। अभी माननीय मांगे लाल आर्य जी, जो पहले सफाई कर्मचारी, कर्मचारी कमीशन के अध्यक्ष थे। उनका बयान छपा है और उसमें उन्होंने कहा है कि ये जो बातें कही जा रही हैं उनमें कोई दम नहीं है और सफाई कर्मचारी कमीशन का काम प्रभावी ढंग से नहीं हुआ है। जहां तक सिर पर मैला ढोने की प्रथा का सवाल है तो कुछ शुष्क शौचालय होते हैं और उनमें लोगों को मैला सिर पर भी उठाना होता है।
स्वच्छकार विमुक्ति पुनर्वास योजना की बात यहां कही गई है। उसमें २० हजार रुपए से काम धंधा देने की बात कही है, लेकिन यह बिल्कुल अर्थहीन है। सही मायने में अगर उनको पैरों पर खड़ा करना है उनको आत्मनिर्भर बनाना है तो इन्हें एसटीडी के बूथ. पैट्रोल पंप, गैस एजेंसी, स्टॉल्स. ठेले, कार पार्किंग के कॉन्ट्रैक्ट्स देने होंगे। जब तक उनको इसमें प्राथमिकता नहीं देंगे तब तक वे अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकेंगे। सफाई कर्मचारियों की हालत बहुत खराब है। वे ग्रामीण अंचल में किस परिस्थिति में काम करते हैं उनकी इस वेदना को आप समझ नहीं पाएंगे। खास तौर पर मैं उत्तर प्रदेश की बात कर रहा हूं। इनको तनख्वाह निकाय देता है लेकिन उन्हें ४०-४२ महीने तक तनख्वाह ही नहीं मिलती है। इससे उनका बुरा हाल हो जाता है। स्थानीय निकायों के आय का जरिया वहां के लोकल टैक्स हैं लेकिन इससे उनका काम नहीं बनता है। जब तक राज्य सरकारों की भूमिका सुनिश्चित नहीं होगी और वे वेतन का भुगतान नहीं करेंगे तब तक उनकी दूर्दशा ऐसे ही बनी रहेगी। मेहरेबानी करके आप इस आयोग को प्रभावी बनाइए। जटिया साहब, इसमें आप लोगों की बहुत जिम्मेदारी है। राम का भक्त होने का ठेका आप लोगों ने ले रखा है इसलिए वहां पहुंच गए लेकिन आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाने का काम अगर किसी ने किया था तो बाल्मिकी जी ने किया था। यदि वह रामायण नहीं लिखते तो भगवान राम कभी मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं हो सकते थे। आपकी विशेष जिम्मेदारी है। आप इन सफाई कर्मचारियों के कल्याण का सतत प्रयास करिए।
डॉ.सत्यनारायण जटिया : सभापति महोदय, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग संशोधन विधेयक के माध्यम से माननीय सदस्यों ने दलित वर्गों के प्रति और विशेषत: सफाई कर्मचारियों के प्रति अपनी चिंता को व्यक्त किया है। इस चर्चा में डा. रघुवंश प्रसाद सिंह, डाक्टर अनिता आर्य, श्री बूटा सिंह, श्री रूपचन्द मुर्मू और डा. रामजी लाल सुमन ने अपने विचार प्रकट किए। समय-समय पर सदन के अन्दर दलितों के प्रति विशेषत: सफाई कर्मचारियों के प्रति विचार प्रकट किए जाते रहे हैं। सरकार का दायित्व है कि वह इस दिशा में काम करे। चूंकि सामाजिक न्याय का मतलब यह है कि लोगों के बीच दूरी नहीं होनी चाहिए। मानव मानव में भेद नहीं, कर्म धर्म महान है और सामाजिक समता मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार है। सामाजिक समता और सामाजिक न्याय की स्थापना करने के लिए जो विचार यहां प्रकट किए गए, उसमें एक बात यह थी कि किस तरह इस आयोग को प्रभावशाली बनाना चाहिए, किस प्रकार अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उनको साधन सम्पन्न बनाना चाहिए। इन सारी बातों की ताईद करते हुए हम कोशिश करेंगे कि सरकार ऐसे उपाय करे जिससे समाज में इनको प्रतिष्ठा मिल सके। वास्तव में किसी भी काम को अप्रतिष्ठित नहीं समझा जाना चाहिए।
आजादी के बाद हमने अनुच्छेद १७ में कहा था कि अस्पृश्यता को किसी भी रूप में मान्य न किया जाए। इन सफाई कर्मचारियों के प्रति आदर और सम्मान का भाव स्थापित हो सके, इसके लिए सरकार ने जो योजना बनाई, उसके माध्यम से उन्हें पूरा लाभ देने का प्रयत्न करेगी। जिन माननीय सदस्यों ने यहां महत्वपूर्ण सुझाव दिए, मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। वे जब भी चाहें, समय-समय पर उनके साथ इस संबंध में विचार-विमर्श करने के लिए मैं उनका स्वागत करूंगा। हम किस तरह समाज के इस वर्ग को सम्मान, प्रतिष्ठा दे सकें जिस उपाय से भी होगा, हम करेंगे। इसके माध्यम से मैं निवेदन करना चाहता हूं कि यह प्रस्ताव पारित किया जाए।
MR. CHAIRMAN :The question is :
"That the Bill further to amend the National Commission for Safai Karmacharis Act, 1993, be taken into consideration." The motion was adopted. MR. CHAIRMAN : The House will now take up clause by clause consideration. The question is :
"That clauses 2 and 3 stand part of the Bill."
The motion was adopted.
Clauses 2 and 3 were added to the Bill.
Clause 1, the Enacting Formula and the Long Title were added to the Bill.
डॉ.सत्यनारायण जटिया : सभापति महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं :
"कि विधेयक पारित किया जाये।"
MR. CHAIRMAN : The question is :
"That the Bill be passed. "
The motion was adopted. --------
MR. CHAIRMAN : The House will now take up Private Members’ business.