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Lok Sabha Debates

Motion For Consideration Of The Juvenile Justice (Care And Protection Of ... on 24 March, 2021

Seventeenth Loksabha > Title: Motion for consideration of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021 (Motion adopted and bill passed).

 

THE MINISTER OF WOMEN AND CHILD DEVELOPMENT AND MINISTER OF TEXTILES (SHRIMATI SMRITI ZUBIN IRANI): Sir, I beg to move:

“That the Bill to amend the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 be taken into consideration.” महोदय, एक मानवीय संकल्प के साथ मैं आपके माध्यम से सभा में उपस्थित सभी सम्मानित सांसदों का आभार व्यक्त करना चाहती हूं कि जेजे एक्ट के इस अमेंडमेंट की परिचर्चा में आज सभी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है । वर्ष 2015 में यही संसद गवाह रही है कि जब बच्चों के संरक्षण की दृष्टि से संसद ने जेजे एक्ट के अमेंडमेंट में कुछ रिफॉर्म्स करने का प्रयास किया । चाहे वह ऑर्फन्ड, अबैन्डन्ड और सरेंडर्ड बच्चों की परिभाषा हो,चाहे वह अडॉप्शन को लेकर कुछ नए निर्णय हों, चाहे वह हीनियस ऑफेंसेज़ की कैटेगरी या पैटी और सीरियस ऑफेंसेज़ की कैटेगरी को सम्मिलित करने का प्रयास हो या फिर संसद की ओर से पारित लेजिस्लेटिव लक्ष्य के आधार पर देश भर में यह मेनडेट किया जाए कि जितने भी चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन्स हैं, अब वे कानून के तहत अपने आपको रजिस्टर कराएं ।
   
15.08 hrs             (Dr. (Prof.)  Kirit Premjibhai  Solanki  in the Chair)        महोदय, मैं आपके माध्यम से सदन को बतलाना चाहती हूं कि संसद के उस प्रयास को फलीभूत करने के लिए नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने देश के सभी राज्य सरकारों के साथ समन्वय कर बाल संरक्षण की दृष्टि से न सिर्फ एक्ट और रूल्स को मोडिफाई किया, बल्कि साथ ही बार-बार संसद में इस विषय पर चर्चा होना कि should passage of legislation suffice? Should we also not endure and ensure that implementation of law is equally successful? उसी संकल्प के साथ नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने मंत्रालय द्वारा दिए गए क्वेश्चनेयर के माध्यम से   देश भर के 7 हजार से ज्यादा चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस का मुआयना किया,ऑडिट किया । मैं आपके माध्यम से सदन को बताना चाहती हूं कि देश में लगभग 90 प्रतिशत चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस एनजीओज़ द्वारा चलाए जाते हैं । इन चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस में वे बच्चे रखे जाते हैं, जो कानून का संरक्षण मांगते हैं । वे बच्चे भी आश्रय पाते हैं और हमारी यह अपेक्षा होती है कि जो कॉन्फ्लिक्ट्स विद लॉ वाले बच्चे हैं, उनको भी रेस्टीट्यूशन,रीहैबिलिटेशन की दृष्टि से भी एक वातावरण प्राप्त हो ।

चाहे वह बच्चा ऑर्फन हो, चाहे व‍ह बच्चा चाइल्ड लेबर से रेस्क्यू किया गया हो, ऐसे सभी बच्चों के संरक्षण के संकल्प के साथ भारत सरकार और प्रदेश की सरकारें चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस की तरफ बच्चों के संरक्षण की दृष्टि से देखती हैं । उस ऑडिट में कुछ गम्भीर चीजें पायी गयीं । 29 प्रतिशत ऐसे इंस्टीट्यूशंस थे जो जेजे एक्ट के अंतर्गत रजिस्टर ही नहीं थे । कानून का अनुपालन उन्हें स्वीकार ही नहीं था । यह जानते हुए कि संसद ने ऐसा कानून पारित किया है । भारत की सरकार और प्रदेश की सरकारें इस कानून को इम्प्लीमेंट करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तब भी वर्ष 2015 के पैसेज के बाद भी संस्थाओं ने अपने आपको रजिस्टर नहीं किया । इस ऑडिट में पाया गया कि देश भर में ऐसे कई राज्य हैं,जहां 20 परसेंट से कम मात्रा में लड़कियों के लिए विशेष व्यवस्था की गयी है । इन सात हजार संस्थाओं में, 26 परसेंट संस्थाओं में तो चाइल्ड वेलफेयर ऑफिसर ही नहीं था । एक चौथाई में बच्चों के नहाने के लिए एरिया,बाथिंग एरिया ही नहीं था । 3/5th had no toilets for these children; 1/10th had no provision for drinking water; we had 15 per cent Child Care Homes, which had absolutely no provision for a separate bed for a child; and 1/10th did not even want to adhere to a diet plan for a child who had been rescued and who needed help. चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के संदर्भ में राष्ट्र भर में बहुत चर्चा रही है । एक चौथाई ने तो यह कहा कि चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने कभी भी हमारा इंसपैक्शन ही नहीं किया ।

       महोदय, कई बार जिले में बच्चों के शोषण की गम्भीर रिपोर्ट आने के बाद जिला प्रशासन सतर्क होकर एक्शन लेता है । आज जो अमेंडमेंट मैं भारत सरकार की ओर से प्रस्तुत कर रही हूं, उस अमेंडमेंट के अंतर्गत हमारा ध्येय यह है: “We do not wait for a child to become a victim.” हम सतर्क हों ताकि प्रशासनिक ढांचे के माध्यम से हम अपने बच्चों का संरक्षण कर सकें, चाहे वह जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड हो, चाहे वह चाइल्ड वेलफेयर कमेटी हो, कहीं न कहीं एक सुपरविजन की जरूरत है । इसीलिए बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण को केन्द्र बिंदु बनाते हुए जिला प्रशासन डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को इस अमेंडमेंट के माध्यम से सशक्त करने का प्रयास है ।

       महोदय, जब बच्चा सिस्टम में कहीं छूट जाता है तो उसकी हालत क्या होती है?मैं मात्र दो केस आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगी और फिर सभी सांसदों से आग्रह करूंगी कि वे अपने सुझाव,वक्तव्य अथवा अपनी चिंताओं को व्यक्त करें । एक केस एनसीपीसीआर,नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स,स्वराज भवन,प्रयागराज के पास आया । चार साल की बच्ची का बलात्कार होता है । चाइल्ड वेलफेयर कमेटी का कर्तव्य था कि न सिर्फ बच्ची को रीहेब्लिटेट किया जाए, बल्कि अगर बच्ची अडॉप्शन के लिए फ्री है तो उसको प्रस्तुत किया जाए । उस बच्ची को वहीं छोड़ा जाता है । वह 12 साल की होती है तब प्रशासन में किसी के ध्यान में आता है कि एक भवन में चार की उम्र में लायी गयी वह बच्ची 12 साल की उम्र तक अपने प्रति इंसाफ होने का इंतजार कर रही थी । यह विषय भी तब उठता है जब कोई नागरिक नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स को इससे अवगत कराता है कि यहां पर इस भवन में एक बच्ची है, इसको मदद की दरकार है ।

कई लोग कहते हैं कि कम्प्लेंट बॉक्स तो है ही, जाकर कम्प्लेंट बॉक्स में क्यों नहीं बता दिया जाता कि इस संस्थान में क्या गतिविधि चल रही है । एक बॉयज़ चिल्ड्रेन होम भागलपुर में था । इसे चलाने वाला संस्थान था – रूपम प्रगति समाज समिति । उस पूरे होम में एक ही स्टाफ मेम्बर ऐसा था, जिसे पता था कि उस होम में किस प्रकार से बच्चों का शोषण होता है । मैनेजमेंट कमेटी खुलासा नहीं चाहती थी । आप उस होम में बच्चों का दर्द समझिए । वे उस भावना के साथ कि कोई कम्प्लेंट बॉक्स से हमारे इन पत्रों को पढ़ेगा,हर दिन कोई बच्चा जाकर उस कम्प्लेंट बॉक्स में अपने दर्द को, अपने आक्रोश को या अपनी इच्छा को कि ‘Rescue us’, इसे वह उस बॉक्स में डालता है,लेकिन उस बॉक्स के ताले की चाबी मैनेजमेंट अपने पास रखता है । अगर कोई स्टाफ मेम्बर कुछ बोलता है तो उस मेम्बर को हटा दिया जाता है । वहां पर भी जब जिला प्रशासन के पास यह समाचार आया और जब वह बॉक्स तोड़ा गया, खोला गया तो वह खचाखच भरा था, with cries for help for children who wanted to be rescued from a rescue home. इसलिए आज यह अमेंडमेंट हम लेकर आए हैं ।

महोदय, भारत सरकार के बारे में जब रिफॉर्म्स की चर्चा होती है, तब इस सदन में फाइनैंशियल रिफॉर्म्स, एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स के बारे में हम लोग कई बार चर्चाएं सुनते हैं । Children do not vote; for them, they feel that sometimes they do not count. पर, आज का जो रिफॉर्म है, वह एक मानवीय संकल्प है, न सिर्फ इस सरकार का, बल्कि इस सदन का भी । Politics can possibly divide us, enrage us, make us debate and deliberate but for us, what is sacrosanct is the protection of our children.

       महोदय, इसमें अमेंडमेंट्स की दृष्टि से, एडॉप्शंस के संदर्भ में भी,जिला मजिस्ट्रेट के पास हम पूर्ण रूप से पॉवर्स दे रहे हैं । वर्ष 2015 में एडॉप्शन की दृष्टि से एक निर्णय लिया गया कि कोर्ट्स को तवज्जो दी जाए । लेकिन, यह भी कहना सही होगा कि आज की तारीख में, मार्च, 2021 में देश में 900 ऐसे केसेज हैं,जो वर्षों से लम्बित हैं क्योंकि उन्हें समय पर एडॉप्शन प्रोसेसेज कम्प्लीट करने में, our courts are so burdened that they are not getting the help that they constitutionally deserve to adopt these children who need protection and care.

महोदय, इस अमेंडमेंट में हम एक ‘लाइन ऑफ डिस्टिंक्ट रिस्पॉन्सिब्लिटी’ड्रॉ कर रहे हैं । चाइल्ड वेलफेयर कमेटी एक क्वाज़ी ज्युडिशियल बॉडी है, लेकिन उस चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की सिटिंग्स कितनी बार होगी?अगर आप उसकी सिटिंग्स में न आए तो क्या आपकी कहीं कोई जिम्मेदारी नहीं बनती, कोई रिपोर्टाज नहीं बनती है?अगर आप उस कमेटी के मेम्बरान बनते हैं तो क्या आपकी क्वालिफिकेशन को लेकर कोई विशेष प्रावधान है? Our intentions are to define those qualifications for the child welfare committee so that it becomes a distinct privilege to serve our children through those committees.

       महोदय, कानून में यह भी उपलब्ध है कि चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को इंस्पेक्शन करना है, डी.एम. के सामने इंस्पेक्शन की रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है, लेकिन कई किस्सों में,कई स्टेट्स से यह ध्यान में आता है कि कहीं न कहीं डी.एम. के कामकाज में रिपोर्टाज की दृष्टि से वे बिन्दु कई बार छूट जाते हैं । अब डी.एम.की प्रायॉरिटी एडमिनिस्ट्रेटिव लिस्ट में देश के बच्चे भी आएंगे । देश के हमारे 70 सालों के इतिहास में पहली बार, we are prioritising our children in administration, hon. Chairperson. That is why I seek the support and blessings of this august House.

       Today, I am grateful. I know that in the Parliamentary proceedings and, for that matter, in the Bills that needed to pass in this august House, there are many such issues that took priority. I am grateful to the hon. Prime Minister for giving us the impetus to work in detail on these issues. My gratitude to the hon. Parliamentary Affairs Minister who prioritised children as much as he did the Finance Bill. He has my gratitude and of my fellow colleagues, and I look forward to the interventions. I will keep my remarks limited so that I can respond to whatever questions that come my way after the interaction.

HON. CHAIRPERSON : Motion moved:-

“That the Bill to amend the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 be taken into consideration.”   SHRIMATI PRENEET KAUR (PATIALA): I stand to share a few thoughts on these amendments proposed by the Government in the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021, on behalf of my Party.
       Let me begin by seeking to place the present amendments in a proper perspective. The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Act enacted in 2015 replaced the earlier Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Act, 2000. This legislation replaced the old the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 1986. So, we have had a series of legislations in the past three decades on this very important subject. I do thank the hon. Minister for bringing this up. As the hon. Minister said, we are all thankful that our children are being considered on a priority with the other important issues that have been taken up in this Session.
       The 2015 legislation brought by the NDA Government had the following aims and objectives. I quote: “An Act to consolidate and amend the law relating to children alleged and found to be in conflict with law and children in need of care and protection by catering to their basic needs through proper care, protection, development, treatment, social re-integration, by adopting a child friendly approach in adjudication and disposal of matters for the best interest of children and for their rehabilitation through processes provided, and institutions and bodies established, hereunder and for matters connected therewith or incidental thereto.”        The present Bill introduced by the hon. Minister, Shrimati Smriti Irani ji seems to make certain amendments in the existing legislation of 2015. While we all support such a Bill, let me say that we must all as representatives of the people in this august House consider carefully the proposals before taking any decision. What is at stake is how the society in criminal justice system deals with juveniles in conflict with law and what institutional mechanisms we are proposing. Our guiding principle must be to ensure that these delinquents should be handled sensitively, reformed, and prevented from lapsing into the world of crime later as young adults.
       I would like to draw the attention of the House to some very key amendments and the import of the proposed changes. First and foremost, the proposed amendments put the entire onus of the child’s welfare on the District Magistrates ignoring the fact that the DMs have already been overburdened. They are overburdened authorities with the charge of the entire district on their shoulders. As Members of Parliament, we all know the life of a District Magistrate with his or her multifarious responsibilities. Under the proposed amendment, DMs will be the overarching authority for exercising all functions related to the adoption including the issuance of adoption orders without the requirement of court sanctions. Here, the hon. Minister has put forward her observations which seem very relevant.
They will also be responsible for the functioning and regular monitoring of all child welfare agencies such as the Child Welfare Committees, the Juvenile Justice Boards, the District Child Protection Units, and the Special Juvenile Protection Units. Centralising all powers and responsibilities with respect to a child's rehabilitation and re-integration into society in one authority may lead to serious delays and can have wider repercussions for the child's welfare. I urge the hon. Minister to consider this aspect carefully.
While it needs little saying that District Magistrates are the fulcrum of the district administration across India, we should be equally cognisant whether loading an already over-burdened system will produce the desired results. This amendment has been introduced with the intent to further empower DMs to act more decisively in the case of juvenile justice and child protection. However, what it really does in effect is it gives them disproportionate powers and, even more so, puts responsibilities on the extremely sensitive issues on the DMs. However, if we collectively feel that these responsibilities need to be devolved upon DMs, then the Ministry should also consider providing them suitable assistance to ensure that this important issue of juvenile justice does not get side-tracked in the rigmarole of day-to-day work.
Secondly, grievance redressal and conflict resolution powers have also been taken away from the judiciary and given to the executive. This is against the principle of separation of powers and takes away the role of the judges who are specialised authorities when dealing with matters of the law. We need to ask ourselves whether the proposed amendments will truly bring in the desired changes.
Thirdly, the categorisation and distinction of 'serious crimes' under proposed amendment from the category of heinous crimes under the current law was necessary. Under the prevailing law, juveniles aged 16 to 18 years could be brought out of the protection of the juvenile justice system and tried as adults if they have committed a heinous offence. The latest amendment essentially limits the ambit and circumstances under which this could take place, thereby protecting the rights of juveniles, and only bringing those juveniles into the adult criminal justice system who have committed crimes and offences where punishment for the offence exceeds seven years.
The new category of ‘serious offences’ is also in compliance with the Supreme Court judgment in Shilpa Mittal vs State of NCT of Delhi and Another (2020) wherein it was held by the two-judge bench that treating children as adults is an exception to the rule and when two views are possible then the view in favour of the children must be taken. This amendment is, therefore, a step in the right direction since it brings back focus on rehabilitation of juvenile delinquents instead of retribution.
The Minister mentioned that the criteria for Child Welfare Committees under Section 9 of the Bill seeks to introduce the new criteria. I think it is very welcome that the Minister specified what the guidelines should be for selecting the Committee and they should be held responsible. I think that this is a very welcome step. Thank you very much. There was one thing in this, hon. Minister, that I would like to say through the Chairperson, that when you spoke in February, 2021, you mentioned that there is no provision under law to check whether a person has been charged with girl child abuse. I think we must address this critical loophole in the legal framework.
       The other thing was the Budget cuts and the superficial changes that have been made. I know that in 2020-21, you had an allocation of above Rs. 1500 crore which was then downsized to Rs. 800 crore and I think this year it has come up to around Rs. 900 crore. As you yourself said, the Committee reports have shown that there has been gross negligence in a lot of homes where there are no special toilets; where there is no place; where they cannot have a change; where there is no separation for the sexes; where there are no beds, and there a lot of other things. To make sure that all this is properly dealt with, I think the Budget allocation should have been a little bit more.
       Hon. Chairman Sir, now that I have highlighted some of the key changes and their implications, I would like to place only one point for consideration of this House. Social legislations such as the one for which we are sitting here today to discuss and debate, need to be considered very carefully. They are meant not only to provide a legal framework on any particular subject but also the intent to mitigate certain social evils and improve social conditions with the aim of bringing about social reform. As they say, the taste of the pudding lies in eating. Therefore, we must carefully consider both the intended and the unintended consequences of any legislation we seek to enact and also whether the existing legislations achieve their desired outcomes better than the proposed amendments.
With these words, I thank you for giving me time and I hope that the Minister will take the few suggestions and implement them and I do compliment her for bringing this very special Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill to this House. I hope that we can serve and look after our children better. Thank you.
 
SHRIMATI APARAJITA SARANGI (BHUBANESWAR): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity. It is indeed a privilege for me. As I stand in this august House to speak in favour of Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill 2021, I am reminded of the wonderful words of Nelson Mandela. He had said, “There can be no keener revelation of a society’s soul than the way in which it treats its children.” समाज अपने बच्चों के प्रति किस तरह का व्यवहार करता है, इससे उस समाज की आत्मा की प्रकृति झलकती है । The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act 2015 came into existence with effect from 15th of January 2016 by repealing the Juvenile Justice Act 2000 with comprehensive provisions for two categories of children. The first category was children in conflict with law and the second category was children in need of care and protection. We are aware of the fact that the Juvenile Justice Act has been formulated in pursuance of the Constitution of India which mandates equal rights for children and calls upon all the State Governments to take appropriate measures for ensuring care, protection, safety, and security of children. If we go by the Bill that has been placed before all of us today, we would find that this particular Bill focuses on three major heads which have been clearly told to us by the hon. Minister of Women and Child Development. First, definition of serious offences; second, adoption; and third, functioning of child welfare committees.
       I offer my heart-felt compliments to the hon. Prime Minister Modi, the Minister of Women and Child Development, her Department and her team for responding sensitively to the needs on the ground which had emerged during the course of implementation of the JJ Act, 2015.  मैं तहे दिल से आदरणीय प्रधान मंत्री जी, आदरणीय मंत्री जी और उनकी टीम को धन्यवाद देना चाहती हूं । मैं उनकी सकारात्मक सोच के लिए आंतरिकता के साथ धन्यवाद देना चाहती हूं । जमीनी जरूरतों का अनुसंधान करना और फिर एक-एक शब्द को पढ़कर सही प्रस्ताव सदन में लाना काबिले तारीफ है ।
The question is this.  The particular Act repeals the JJ Act, 2000.  What was the need after six years to bring this here?  In fact, I was listening very carefully to the hon. Minister.  She was quite candid when she mentioned the reasons.  At the cost of being repetitive, I would be informing the house regarding the course of events.  This is a highly meticulous work of the Ministry.  They deserve all compliments for whatever hard work that the Minister and her entire team has put in.  As per Section 109 of the JJ Act, the National Commission for Protection of Child Rights is mandated to monitor the implementation of the Act. 
There was a case in the Supreme Court in 2007 in the matter regarding exploitation of children in the orphanages of Tamil Nadu.  Unfortunately, this particular case dragged for 10 years and on 5th of May, 2017 the final orders of the Supreme Court came. As per the directions of the Supreme Court, the NCPCR had to conduct social audits in all these 7900-odd child care institutions in the country.  I am extremely happy to inform the House, which I think is a repetition of what hon. Minister said, around 7163 child care institutions underwent this social audit business.  Unfortunately, I would like to inform the house, not one child care institution was found to be hundred per cent compliant with the JJ Act, 2015 provisions. All these child care institutions are supposed to have written child care policies.  Hardly any of the child care institution had this kind of a written child care policy.  Social audit is a great tool.  Social audit is a great eye-opener.  This is one reason, actually the Government, under the leadership of Prime Minister Modi, thought of correcting the things which were not correct on the ground, in the interest of the children of our country. 
Let me come to the second point.  In 2016, the Ministry of Women and Child Development, Government of India set up a Committee to look exhaustively into the way these child care institutions were working.  In 2017, the Committee submitted its report.  Unfortunately, it was a damaging report; very disturbing revelations again came. 
I would reiterate the fact that the Ministry of Women and Child Development, under the leadership of the Prime Minister, was extremely meticulous for the right reason.  We are talking about our children.  There are so many cases in front of us.  In fact, I would like to mention here the case of Jalpaiguri child care institution in West Bengal.  It was a centre of child trafficking for years together.  The State Commission for Protection of Child Rights would not listen. There was a case in the Supreme Court for that matter. The NCPCR would be writing to the State Commission for Protection of Child Rights in West Bengal.  They did not pay a heed.
Ultimately, the Ministry had to intervene.  The Supreme Court also passed very strict orders.  Things were set right after the intervention of the Ministry. This is what is happening in many of the Child Care Institutions.
       The third point in this line is the rationale or the justification behind this Bill.  The States and the UTs have sent a report to the Ministry.  I am sure the Ministry must have asked for the Reports. I have the date of the Report with me and I have gone through the Report in detail.  It was sent on 18th of September, 2018.  We are talking of Supreme Court case from 2007 to 2017, and the Committee Report in 2017.  The Committee had been set up by the Ministry in 2016.  Again, we are talking of a report from all the States and Union Territories that were received by the Ministry on 18th of September, 2018. Amazing things came to light.  In fact, the revelations were so disturbing that the Women and child Development Ministry had to shut down 539 Child Care Institutions.  It is because they were flouting the laws.  They were not conforming to the provisions of the JJ Act, 2015.  All kinds of things that did not have to happen, did happen in those Child Care institutions and that is why the Ministry sprang into action.
       I now come to the third portion of my deliberation.  I would request all the esteemed colleagues of mine to very carefully listen to whatever I have to say.  I am extremely delighted to hear, Madam Preneet Kaur.  While she is sitting on the right, she supported the intervention of the Government.   This is how the Members should react.  विकास कोई दल न देखे,बल्कि दल, मत, निर्विशेष हमें विकास के बारे में बातचीत करनी है और देश का विकास करना है ।
       As far as the proposed changes are concerned, the first one is definition of serious offences.  There are three kinds of offences that the JJ Act talks of; petty offences, serious offences, and heinous crime, as we all are aware of. We should all agree to the fact that our children should be corrected, reformed, and should not be punished. Punishment does not correct the system. We want the children to be safe, sound, corrected, and reformed, and that is why there was the need to change the definition of serious offences.  Serious offences are those offences for which the punishment, as prescribed by the IPC or any law in force, is maximum imprisonment between three and seven years.
       Secondly, the serious offences, as of now, are cognizable in nature.  It means that a child can be arrested without a warrant.  There was a need to change this definition.  The definition of serious offences, as proposed today, has been to include crimes for which the punishment is maximum imprisonment for more than seven years; however, minimum imprisonment has not been specified.  It says maximum imprisonment beyond seven years but minimum imprisonment is between three and seven years.  This has been included in the definition.  This is also the definition of serious offences. It is very important.  All the serious offences have become non-cognizable. A child cannot be arrested now without a warrant.  This is the proposal today before the House.
       As I have mentioned, and the hon. Minister has just said, I reiterate that we need to increase, rather to widen the ambit of serious offences.  We need to bring down or rather narrow the ambit of heinous crimes.  Our children need not be treated as adults.  When they go to the heinous crime category, they will be treated as adults.  We should bring them to the other side.  We need to widen the ambit of Juvenile Justice System so that our children stay within that. This is the reason why this has been done and this is one of the best measures that the Ministry would have taken.
       The second thing is this. I draw the attention of the House to clauses 58 and 59 regarding adoption. I will not take much of the time of the House. I am trying to be as concise and as focussed as possible, but I will definitely like to have time to elaborately tell you about what is good about this proposal.
       The Act lays down the procedure for adoption by parents, both in India and abroad. Now, currently, there is a Specialised Adoption Agency which actually prepares a report. It is called a home study report of the prospective parents. Then, on behalf of the parents, it goes to the civil court and seeks the adoption order from the civil court. Now, here, a tremendous delay was taking place. We know how things are on the ground. We are all people’s representatives from different parts of the country. We know how things are. This situation on the ground was studied by the Government and by the Ministry. Now the proposal is that the adoption order will be certified and issued by the District Magistrate and this District Magistrate will include the Additional District Magistrate. I have lots of regards for Madam Preneet Kaur. In such kind words, she supported the intervention of this Government. However, I would say she has some apprehensions regarding the DM not being able to give time to this aspect of work because he or she is burdened. I fully appreciate that. I would say with all humility that I was serving in a couple of districts in Odisha in my Cadre. But at the same time, let me tell you with all humility that the DM is the only person who is the chief coordinating centre in a district. When these things are done, lots of coordination is required among various agencies and among various stakeholders. Implementing a particular scheme or a project requires a leader. In a district, only a Collector can be a leader. A Collector or a DM is the one who can actually collaborate and coordinate with everybody. That is why, it is very important to give importance or rather the responsibility to the District Magistrate, which includes the Additional District Magistrate as per the Bill, which has been submitted before us.
       Now, the third and very important thing is with regard to functioning of the Child Welfare Committee. Hon. Chairperson, Sir, I draw your attention to section 27, clause 8, section 40, section 2, clause 26 of the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021. What is the situation right now? The District Magistrate is supposed to review the working of CWC on quarterly basis. There is a District Child Protection Unit (DCPU), which will be the focal point to ensure the implementation of the Act. This is what it is as of now. But this is all nebulous. This never happens. Some kind of force, emphasis, and clarity are required. We need candidness and clarity when we have to deal with such sensitive issues as the care and protection of children. Now, it has been proposed in the Bill that the CWCs shall submit a report on quarterly basis to the District Magistrate. It will also submit a report on quarterly basis to the State Government concerned and the District Collector about the deceased, restored, and run-away children. This is path-breaking. This was not there earlier and this has been brought in. It is extremely important that the District Child Protection Unit (DCPU) would be headed by the Collector. It would work under the direct supervision of the District Collector. So, I think, much of the nuisance will go away. I will reiterate what I have said earlier and I can say with all conviction at my command that the District Collector is the chief force in the district. He or she is the coordinating point and he or she can be the focal point. This is a very good decision on the part of the Government.
       Now, I come to the last proposed change. My learned and esteemed colleagues here in the Lok Sabha must have gone through a book titled ‘Good to Great’ by Jim Collins. This is one of the best management books. I think, many of us have read it. In this book, one of the management techniques which Jim Collins talks of is to put the right people on the bus. Unless and until we have the right people on the bus, we will not be able to achieve the goal.
       So, it is very important to have the right people as Members of the Child Welfare Committee. A Child Welfare Committee has a Chairperson and four Members.  Now, Sir, there are certain things which cannot be compromised.  Come what may, we cannot compromise with the quality of the people that we induct in here.  So, Sir, educational qualification is fine.  Seven years experience is also fine. But here, we are saying that there should be educational qualification plus seven years experience in the field of dealing with children’s issues and one more thing which has been added is specially-abled children or rather we call them differently-abled children. The member should be having or rather one of the criteria is he or she should be having some kind of qualification pertaining to the handling of differently-abled children. This has been added.  This is extremely important.
       Now, Sir, what attracted me to this disqualification criteria which has been added is this. Anybody who has drafted this must be complemented.
       Sir, the Bill considers the following qualities as disqualifying criteria. This was never there.  We always said this is the qualification criteria.  Take this person or take that person. But here, we are also talking of disqualifying criteria.  There is absolutely no compromise because children are involved.
       Sir, what are the disqualifying criteria? One, if there is past record of human rights violation or child rights violation, the person will be thrown out.
       Two, conviction in an offence involving moral turpitude which has not been overturned by a subsequent judgement, history of being removed or dismissed from any service of the Government – whether it is Central Government or State Government, involvement in child abuse or child labour; last, a person who is currently a part of the management of a child care institution in a district. So, these are the disqualifying criteria which have been added to the Bill.
       Now, we are very proud of the fact that we have a plethora of laws, schemes, rules, and regulations.  But I think the important thing is whether we are able to implement them to the satisfaction of all and we are able to achieve the expected outcome. Now, if we are able to bring in all these amendments, if we are able to implement this particular Juvenile Justice Act with amendments today which has been brought in very carefully, with all sincerity, with due diligence, and with a good heart and good mind, I think we would be able to achieve the expected outcome.
       Sir, I would like to conclude with three lines. Please allow me.  Good, better, best, never let it rest, till your good is better and your better best. Prime Minister Modi and his team have been trying very hard to move from good to better and better to best. Now, this is an opportunity we need to move from better to best.  From 2015 to 2021, we are trying to move to the best and I request each one of my esteemed colleagues present here to wholeheartedly support the Bill which has been brought today.  It is just because it is in the interest of our children. Thank you so much Sir.
*SHRIMATI VANGA GEETHA VISWANATH (KAKINADA):  Thank you Chairman Sir. The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021 is here for amendments.   This bill was first enacted in 2000, amended in 2015 and now again we are making necessary amendments in 2021.  I would like to congratulate Hon. Minister Smt. Smriti Irani for this.  She is one of my favorite Ministers as well, as she takes bold and timely decisions.  Let it be POCSO act or acts relating to women and child welfare or Anganwadi issues.  We do receive intimations of various programmes. 
On behalf of women and child welfare, we are asked to participate in programmes related to women or children at ground level.  We do receive many letters in this regard.  We should welcome amendments to this law.  When we think about care and protection of our children, it is necessary to bring required amendments.  Discussing issues of children is like discussing our own issues. Regular criminals are different from juveniles.  When it comes to juveniles, it’s heart wrenching reality.  They are small kids, who are indulging in crimes. What are the reasons?  One reason many would cite is ‘urbanisation’.
 
 But urbanization is not a new phenomenon.  It is age old concept.  Now-a-days electronic media, availability of drugs even to young children are influencing them.  As a result these children are not acting like adults but like demons, and they are indulging in various heinous crimes.  Not just as mothers or women but as human beings it is painful to acknowledge this unpleasant reality.  It is very painful to see young children as rape victims.  This is not a matter concerned to a home, school or a mother; this is a matter of serious concern for whole country.  It is sad state of affairs.  We have laws, we have Juvenile Homes, we took so many actions and we made many arrangements, but still attitude of children could not be corrected. There are many reasons - like disintegration of families, absence of joint families, large number of divorce cases, more number of orphans and lack of healthy environment for children. There are so many bad influences like movies.  Good movies are not being watched.  Good lessons are not attractive. But bad influences many.  We need to take more steps to protect our children.  There are many good provisions under this law.  It has been stated that around 40,000 cases have been registered.  There are 701 Juvenile Homes throughout the country, and we have 13 Juvenile Homes in Andhra Pradesh. When it comes to our State Andhra Pradesh, our young and dynamic Chief Minister takes special interest in programmes related to women and children.
 
Recently there was an unfortunate incident, to which our Chief Minister responded swiftly and as a brother and responsible person brought DISHA act which was sent to Central Government for approval.  It is pending with Central Government for approval.  Once we get approval, that law will be enacted.  When it comes to children, they should get good education.  To ensure good education to children, our CM is providing Rs. 15,000 per annum to mothers of children upto class 12. Also, to ensure mental health of children, classes are being conducted.  For better health of children, eye checkups, dental checkups are being held and free spectacles are being provided wherever necessary. By taking up such programmes we can improve care and protection of children to some extent. 
              When it comes to Juvenile Homes, other Hon. Members have also mentioned that children are being ill treated in these Juvenile Homes and it is not confined to any particular region, this is the situation throughout the country. Especially, in orphanage homes, children are humiliated.  Those who manage these homes look down upon children.  Therefore, I request Hon. Minister in this regard and I will suggest few points.  I am also a member of committee on women and child welfare.  I request Hon. Minister even if my points cannot come in form of law, they may be implemented by the Government.  When a woman becomes pregnant, she informs Anganwadi center first to ensure health of both woman and child.  I request Hon. Minister to provide psychologists, at either Anganwadi centers, clusters or at Mandal level.  They should be provided with good counseling by psychologists.  Only then, we can ensure physical and mental health of a child.  Also, in schools especially in orphanages and hostels, there should be counseling every month for the children.  If we provide proper counseling and teach good lessons, we can get good results. We should first implement these suggestions in Government hostels.  If required, adequate number of psychologists may be appointed.  In every district, District Magistrate should ensure at least one class in moral values and psychology every month in every hostel. Now we have digital resources, we can make use of them, by showing good moral stories.  They are young, they have energy, they have clean mind.  We should create an environment for their betterment. I request Hon. Minister to create conducive environment for children 16.00 hrs Also, we should not mix Juveniles with ordinary children, it may create some problems. Instead they should be kept in separate barracks. Even when these Juveniles are tried, they should be tried separately.  Because though they are Juveniles, they are expected to reform after punishment and join main stream.  They are our future citizens.  Though they are Juveniles, they should be groomed well and treated well, so that their inner capabilities and potential can be tapped.  As per Justice Verma’s recommendations, these should be reformative and not retributive. 

       We should reform Juveniles.  We should focus on two steps.  One is how to stop children from indulging in Criminal Acts. Second is, how to take them out of criminal past and groom as good citizens.  I am hopeful that the Minister will take necessary measures in this direction.

       Around 40 years back, Telugu movie by the name ‘Sudigundaalu’ (Maelstrom).  In that movie, child psychology was portrayed very effectively.  How they behave at home?  How they behave outside? has been depicted.  What is desperation? What is revenge?  All these shades were shown in that movie.

       Once again, I request Hon. Minister to consider my suggestions.  We all should protect our future generations and groom them well.

       Thank you, Sir.

   

श्री अरविंद सावंत (मुम्बई दक्षिण) : माननीय चेयरमैन सर,आज बच्चों के लिए नया बिल हमारी बहन जी यहांचर्चा के लिए लेकर आई हैं ।यह जुवेनाइल जस्टिस के बारेमें है । जो कुछ नए सुधार लाए हैं,मैं उनके भाषण में सुन रहा था । बच्चों के लिए वोटिंग नहीं है,लेकिनइस सरकार ने उनकोएक अलग ढंग से देखाहै कि बच्चों को किस तरह से पढ़ाना है, सिखाना है,सुरक्षित करना है,इसके ऊपर ध्यान आकर्षित करके सरकार यह कानून लाई है । मैं इसका स्वागत करता हूं ।

       मैं खासकर दो-तीन चीजें बताना चाहता हूं । इसमें जितने भी सुधार लाए गए हैं,अगर उन सुधारों में,मैं बच्चों को देखता हूं तो मुझे मेरा बचपन याद आता है,हम जुवेनाइल कोर्ट की बात करते हैं,यह बात बाद में आएगी । बच्चे बिगड़ते क्यों हैं,इस मूल में जाने की आवश्यकता है । एक बच्चा चोरीकरता है । वह चोरी क्यों करता है?हम गरीब बस्ती से आए हैं और हमनेवहां देखा है कि जो चीज उसके घर में नहीं है,वह दूसरे के घर में है । कार्ल मार्क्स का जन्महुआ था । वह रोज देखते थे कि इस शोकेस में कुछ अच्छे परिधान के मॉडलरखे हुए हैं । मैं इन कपड़ों को पहन सकता हूं,वह उनको रोजाना देखते थे । जब एक दिन यह लगा कि मैं इनको खरीद नहीं सकता हूं तो उन्होंने सोचा कि मैं पत्थर उठाता हूं और कांचपर मार देता हूं ।

आजादी प्यार से नहीं मिलती है, छिन कर लेनी पड़ती है । वह सोचता है कि मुझे यह चोरी से मिल सकता है, मैं इसके लिए कुछ नहीं कर सकता हूं । इस बिल के साथ ह्यूमन साइकोलॉजी,उनकी ग्रोथ,वे किस परिवार से आते हैं, वे किस एरिया से आते हैं, वे किस सोच से आते हैं, वे किस परिस्थिति में आते हैं, जुड़ी हुई हैं । आप निर्भया का केस देख लीजिए । आज कल बहुत गंदा वातावरण हो गया है । वंदनीय हिन्दू हृदय बाला साहेब ठाकरे जी के पिता जी प्रबोधनकार ठाकरे जी कहते थे कि जो पढ़ेंगे,वे बचेंगे । मराठी में यह कहा जाता है -  वाचेल तो बाचेल, लेकिन हम पढ़ते नहीं है । हमारा सारा समय मोबाइल पर जाता है या उसके प्रोविजन्स पर जाता है, व्हाट्स एप पर जाता है ।

बच्चे कहां से बिगड़ते हैं? मीडिया,आप न्यूज देखिए । मैंने एक-दो बार चैनल को फोन किया कि आप एक चीज को बार-बार नहीं बताइए । यह ठीक है कि आप बोल दीजिए कि ऐसी दुर्घटना हुई है । उसे बार-बार देखने से बहुत इम्पैक्ट होता है । हम देखते हैं कि बड़े भी झूठ बोल देते हैं, पढ़े-लिखे लोग झूठ बोलते हैं । वह आप भी अनुभव करते हैं । क्या पढ़े-लिखे लोग क्रिमिनल्स नहीं हैं, जितने क्रिमिनल्स पकड़े गए हैं, क्या वे पढ़े-लिखे नहीं हैं, वे भी पढ़े-लिखे हैं । हमें मूल पर जाना है । I want to go to the root of it. Why is the child adopting such methods? Why is he living through these means? Why is he doing all this? वे चोरी क्यों करते हैं, मारा-मारी क्यों करते हैं, वे कोई चीज छिन कर क्यों लेते हैं, वे चाकू क्यों चलाते हैं? आज मैंने यहां आने से पहले देखा कि एक लड़की ने मां को मारा,उसने मां की हत्या कर दी । उसका किसी के साथ प्यार था, तो मां की हत्या कर दी । ये संस्कार कहां से आए हैं? उनके संस्कार गिर रहे हैं । मुझे याद है कि वर्ष 1995 में हमारी गठबंधन की सरकार आई थी,तो मनोहर जोशी जी हमारे मुख्यमंत्री थे । उन्होंने स्कूल के पहले क्लास को संस्कार के लिए रखा था । यह धर्म की बात नहीं है । हमें बच्चों को अच्छे संस्कार देने की आवश्यकता है ।

       हम ने अन्न सुरक्षा कर दी है, राइट टू एजुकेशन कर दिया है, उसे मैनडेटरी नहीं किया है । जब हम रास्ते में जाते हैं और सिंगनल पर गाड़ी रूकती है, तो बच्चे वहां आकर भीख मांगते हैं । यह देख कर हमें दर्द होता है । जिस उम्र में उनको खेलना चाहिए,उस उम्र में वे दरवाजे पर आकर भीख मांगते हैं या कभी अच्छा हुआ तो वे किताब या फूल बेचते हैं । जब उन्हें खेलना,कूदना और सीखना चाहिए, उस समय वे ये सारी चीजें करते हैं, तो प्रोटेक्शन कहां है? उनको पहले इस प्रोटेक्शन की आवश्यकता है । अगर आप उनको वहां प्रोटेक्शन दे देंगे, तो वे आगे चल कर नहीं बिगड़ेंगे । अमी बिगड़लो, तुमी बिगड़ा न, हम बिगड़ गए, तुम भी बिगड़ जाओ,मतलब है कि हम अच्छे हो गए, तुम भी अच्छे हो जाओ । हमें बिगड़ना नहीं है ।  हम ने अच्छी राह पकड़ ली है,आप भी अच्छी राह पकड़ लो । आज ऐसा नहीं होता है । हमें आज इस बात का बुरा लगता है कि हमें उस पर ध्यान नहीं है । हम ने अन्न सुरक्षा कानून बनाया है ।

मैं स्मृति जी से अपेक्षा करता हूं, मुझे मालूम है कि आप अच्छी मराठी जानती हैं, आप बहुत-सारी भाषाएं जानती हैं । संस्कार के लिए क्या हो रहा है, हमारे संस्कार बिगड़ गए हैं, हमारा नजरिया बिगड़ गया है, हमारी आदतें बिगड़ गई हैं ।…(व्यवधान) अच्छों को बुरा साबित करना, दुनिया की पुरानी आदत है । वह चलता रहता है ।…(व्यवधान)ये बोल रहे हैं कि अच्छी राह पर आ गए ।…(व्यवधान)

       सर, मंत्री जी कानूनन बहुत अच्छी चीजें लाई है । Even categorisation of the petty, serious, heinous और इसके बाद चौथी कैटेगरी लाई हैं, सात साल से भी ज्यादा सजा देने वाला कानून । स्मृति जी, आप सिंधुताई सतपाल को जानती हैं,आप महाराष्ट्र से हैं । आप यह नाम जानती हैं । मुझे लगता है कि इनको पद्मश्री पुरस्कार दिया गया होगा । आपने इसमें क्लॉज डाल दिया है, आपने इसके लिए एक कमेटी बनाई है, यह अच्छा काम किया है । उस कमेटी में क्वालिफाइड लोग होने चाहिए,साइकोलॉजी आनी चाहिए, यह आना चाहिए, मैं सब कुछ मानता हूं । सिंधुताई सतपाल चौथी कक्षा तक पढ़ी होंगी, लेकिन आप उनकी ज़बान सुनेंगे तो एक क्षण में पिघल जाएंगे । जो बच्चे पकड़े जाते हैं, उनके लिए हमें मां चाहिए,मां का प्यार चाहिए, अनकंडिशनल प्यार चाहिए ।  आप उनमें यह नहीं देखिए कि वे मर्डर करके आए हैं ।

       वह प्यार का भूखा है । क्या यह साइकेट्रिस्ट देंगी, डॉक्टर देंगे या पढ़े हुए लोग देंगे? पढ़ा हुआ बच्चा क्रिमिनल क्यों हुआ, एक्टिविस्ट क्यों हुआ, आतंकवादी क्यों हुआ? वह पढ़ा-लिखा है,   क्या उसे अच्छे-बुरे की समझ नहीं है?स्मृति जी,मैं आपसे विनती करता हूं, आप इस क्लॉज़ को ध्यान में रखना । There are women, who are running the organisation. There are not only women, there are men also. आप बताइए, क्या उस ऑर्फेनेज़ के बच्चों में से कोई बच्चा बदमाश हुआ? वह क्यों नहीं हुआ, क्योंकि उसे मां का प्यार मिला, उसे बहन का प्यार मिला,वह गरीब था,रास्ते पर था । वह ऑर्फन था,ऑर्फन था या नहीं, यह पता नहीं है । यह ऑर्फन क्या होता है?उसके मां-बाप तो होंगे ही, किसी ने उसे छोड़ दिया । A child who is abandoned is an orphan. उसे डिफाइन करेंगे,मां-बाप के साथ था या परिवार ने छोड़ दिया । मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि इस क्लॉज़ में जो एजुकेशन का क्लॉज़ है । The clause is not important. What is important is work.

 It says:

 “(4) No person shall be appointed as a member of the Committee unless he has a degree in child psychology”        इस डिग्री का क्या करना है?मां के पास साइकोलॉजी की कोई डिग्री नहीं थी, मेरी मां 7वीं तक पढ़ी थी और बच्चों को पढ़ा दिया । प्यार,करुणा, दिशा और संस्कार की आवश्यकता है । इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि इस बिल का स्वागत करते समय आपने यह अच्छा किया कि डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट को मैनडेट कर दिया और राज्य सरकार को भी मैनडेट कर दिया है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है । केन्द्र देखेगा,यह नहीं चलेगा ।
       Then, periodicity has to be maintained there. Every fortnight, they must visit that place and see what exactly is happening and how they will have a direct communication with the children? क्या बच्चे की कोई कंप्लेन कर सकेगा, उसकी हिम्मत है? मुम्बई के डोंगरी में एक जेल है,वहां पर बाल सुधार गृह है । वहां पर श्री वीर सावरकर जी,टेरेक जी को जेल में रखा था । मैं वहां गया,तो वहां लड़के और लड़कियों दोनों को देखा । मुझे बहुत बुरा लगा । वहां पर बिहार,उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश के बच्चे हैं । किसी ने 12वीं कक्षा में मर्डर किया, कोई घर छोड़कर आ गया है । उनमें पोटेंशियल है, उनके पोटेंशियल को खोजना पड़ेगा । उन्हें किस चीज की जरूरत है, किस काम में उनकी रूचि है, यह देखना पड़ेगा । मैं दीवाली के फेस्टिवल में गया और उन्हें मिठाइयां बांटी, मैंने देखा कि एक बच्चा बहुत ही अच्छी रंगोली बना रहा था, कुछ बच्चे कंडील बना रहे थे । मुझे लगा कि यह तो एक अच्छा आर्टिस्ट है । इसे आगे बढ़ाना चाहिए । वहां से कुछ बच्चे ग्रेजुएट भी हुए हैं । आपने यह जो कदम उठाया है, वह अच्छा है । इसे मानवता का दृष्टिकोण देना चाहिए, सिर्फ अकेडमिक नहीं होना चाहिए । आप अकेडमी के बाहर जाकर देखेंगे,तो जिस दिन बच्चा रास्ते पर भीख नहीं मांगेगा और चोरी नहीं करेगा,मैं उस दिन समझूंगा कि सही मायने में बच्चे सुरक्षित हैं ।
 
श्री चन्देश्वर प्रसाद (जहानाबाद): माननीय सभापति जी,मैं आज किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण)संशोधन बिल पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं । मैंने एक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में कई सालों तक बाल अधिकार एवं उनके सशक्तिकरण के लिए काम किया है । मैं बिहार राज्य बाल एवं श्रमिक आयोग के उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष पद पर भी रह चुकाहूं । वहां के बाल श्रमिकों की स्थिति या ऐसे सभी बच्चे जो प्लेटफॉर्म और सड़कों पर रहने को मजबूर हैं, हमने इन सभी की स्थिति का आकलनकिया है ।
       यह जो बिल लाया गया है,वह बहुत ही सराहनीय है । इस बिल के लिए मेरे कुछ सुझाव भी हैं ।आज भी जो बच्चे चाइल्ड लेबरके रूप में या भीख मांगते हुए,जहां भी दिखाई देते हैं,उन्हें रोकने के लिए कारगर उपाय करने की आवश्यकता है । मैं जब बिहार राज्य बाल एवं श्रमिक आयोग का अध्यक्ष था,उस समय भी भारतसरकार को इस संबंध में पत्र लिखकर एक प्रस्ताव दिया था ।
जब वैसे बच्चों का जिलों में संग्रह किया जाता है, कहीं से पकड़कर लाया जाता है, उनको जमा किया जाता है, फिर उनको उनके घर वापस भेज दिया जाता है । इसके कारण उन बच्चों का जो समुचित विकास होना चाहिए,वह नहीं हो पाता है और वे बच्चे पुन: उन्हीं कामों से जुड़ जाते हैं । इसलिए मैंने आग्रह किया था कि कम से कम हर कमिश्नरी में एक ऐसा संस्थान खोला जाए, जिसमें उन बच्चों के रहने की व्यवस्था हो,उनको तकनीक पर आधारित शिक्षा दी जाए और उनके माता-पिता को,सबसे बड़ी समस्या उनके पैरेंट्स के साथ है, जो गरीब हैं, असहाय हैं, वे ही अपने बच्चों को दोबारा काम करने के लिए भेजते हैं । उनको जागरुक किया जाए । इसके लिए बहुत-सी संस्थाएं काम कर रही हैं,लेकिन हमने यह भी देखा है कि जो संस्थाएं काम करती हैं, वे जिलों के हेडक्वार्टर्स या अनुमंडलों के हेडक्वार्टर्स तक सीमित रह जाती हैं । उनको वहाँ जाना चाहिए, जहाँ से चाइल्ड लेबर्स निकलते हैं, जहाँ से श्रमिक बच्चे निकलते हैं । उनके पैरेंट्स से सम्पर्क करके उनको जागरुक करने की आवश्यकता है । उनसे कहना चाहिए कि जब आपके बच्चे कहीं काम करने के लिए जाते हैं,तो उनके साथ क्या व्यवहार होता है, वे किस तरह से प्रताड़ित होते हैं, किस तरह से उनका दोहन होता है, जब इन बातों की जानकारी उनके पैरेंट्स को मिलेगी,तो निश्चित रूप से वे अपने बच्चों को रोकेंगे । सरकार की जो योजनाएं चल रही हैं, वे उनसे भी जुड़ेंगे और उनका लाभ लेकर अपना शैक्षणिक या आर्थिक जीवन आगे बढ़ा सकेंगे ।
       हमने पहले भी आग्रह किया था और आज फिर मैं मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूँ कि इस पर ध्यान देने की जरूरत है ।
       यह बिल बहुत ही कारगर है । बहुत-से कानून हैं । पहले के कानून में जिस अपराध के लिए तीन साल से सात वर्ष तक जेल की सजा है,वह संज्ञेय और गैर-जमानती होगा । परन्तु अब इस विधेयक में संशोधन किया गया है और यह प्रावधान किया गया है कि ऐसे अपराध गैर-संज्ञेय होंगे । अभी तक इस कानून में यह प्रावधान था कि देख-रेख एवं संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों के हित के लिए राज्य के हर जिले में एक या एक से अधिक बाल कल्याण समितियाँ बनाई जाएंगी । इसमें सीडब्ल्यूसी के सदस्यों को नियुक्त करने के लिए कुछ मानदंड भी बनाए गए हैं । यह बहुत ही सराहनीय कदम है । मानदंड बनाना बहुत ही जरूरी है ।
       यह विधेयक बाल कल्याण समिति के सदस्यों की नियुक्ति के लिए अतिरिक्त मानदंडों को निर्दिष्ट करता है, जिसमें यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति बाल कल्याण कमेटी का सदस्य बनने का पात्र नहीं होगा । उसके लिए इसमें कई कंडिशंस दिए गए हैं, उनका पालन करना बहुत ही आवश्यक है । इस विधेयक में बच्चों के मामलों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करने तथा जवाबदेही बढ़ाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट तथा अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को सशक्त बनाया गया है ।
       महोदय,कई सदस्यों ने इस पर सवाल उठाए हैं । हम भी यह कहना चाहते हैं कि जिला मजिस्ट्रेट के पास जिले का इतना काम रहता है कि सिर्फ उस पर निर्भर हो जाने से काम नहीं होगा क्योंकि यह बहुत ही कठिन समस्या है, यह बच्चों का बहुत ही संवेदनशील मामला है । इसमें और कोई व्यवस्था करने की आवश्यकता है, जिससे कि त्वरित गति से इसका निष्पादन हो सके ।
       महोदय, इसके माध्यम से बाल कल्याण समितियों को ज्यादा ताकत दी जा रही है, यह अच्छी बात है । इसके तहत जिलाधिकारी को कानून के तहत निर्वाह का अनुपालन सुनिश्चित करने और कठिनाई में पड़े बच्चों के लिए सुसंगत प्रयास करने का अधिकार सम्पन्न किया गया है । यह भी सराहनीय कार्य है । कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि यह बिल बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए कारगर साबित होगा । लेकिन इसके लिए सभी को संवेदनशील होने की जरूरत है । अगर हम लोग संवेदनशील नहीं होंगे, तो निश्चित रूप से आदरणीय प्रधानमंत्री जी और आदरणीय मंत्री जी या अन्य साथियों का यह कदम पूरा नहीं होगा ।
       मैं इस बिल का समर्थन करते हुए और मंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हुए, अपनी बात समाप्त करता हूँ ।
       अंत में,     मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि हमारे प्रदेश में आदरणीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने इस क्षेत्र में बहुत-से सराहनीय कार्य शुरू कर दिये हैं । मेरे पास उसकी लिस्ट है, जिसे मैं सब्मिट कर दूँगा । लेकिन मुझे लगता है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर सभी को जागृत होकर, सजग होकर,इस पर अमल करने की जरूरत है ।
 
SHRIMATI SUPRIYA SADANAND SULE (BARAMATI): Thank you, Sir, for giving me this opportunity. I stand here to speak on the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021. I take this opportunity to congratulate Shrimati Smriti Zubin Irani, the Minister of Women and Child Development and the Minister of Textiles, Government of India, for coming up with this very encouraging and reassuring Bill in the larger interest of the children of this nation.
       As she talked about rescue homes and shelters, I think, what she said is absolutely true, and I appreciate her being so transparent and honest about the situation in India. I think, more accountability and closer working with States is going to be very critical for you. I would like to bring to your knowledge that we have a Citizens Alliance Group which talks about malnutrition. हर पार्टी के सांसद उसमें हैं । अभी उनमें से दो-तीन सांसद हाउस में नहीं हैं । सचिन पायलट जी उस ओरिजनल ग्रुप में थे । बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन जी थे, पांडा जी, जो बीजेपी के असम इंचार्ज हैं । हम सब सांसद उसमें थे । उस ग्रुप में हर पार्टी से एक मेंबर था और हम सबने एक सिटिज़न एलायंस ग्रुप बनाया था । हम हर राज्य में जाते थे, लेकिन किसी के खिलाफ नहीं बोलते थे ।
हम कुपोषण पर अच्छी चर्चा करते थे । हम मुख्य मंत्री, चीफ सेक्रेट्री,वहां के जो मंत्री थे, उनसे मिलकर हम यह चर्चा करते थे कि इस विषय पर सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट मिलकर क्या कर सकती हैं । ऐसी हमारी कोशिश रही है । हम यह करते आ रहे हैं, लेकिन आगे-पीछे चलता रहता है, सबको एक साथ टाइम नहीं मिलता है । हमारी इस दिशा में कोशिश रहती है । हम 10-12वर्षों से यह काम करते जा रहे हैं । So, I would like to ask the hon. Minister whether she would like us, in an informal way, to form a group to assist her in seeing how much more we can do as Members of Parliament in our own States, in our Constituencies. We come from an ideologically different State. My State has a different Government today. But I commit to you that Shrimati Yashomati Thakur, who is the Minister in Maharashtra Government is totally assuring and committing, on behalf of Maharashtra Government, to make sure that this is implemented flawlessly. Please tell us what more we can do to help you strengthen this law to save every child of ours.
       Another very important issue is about adoption and fostering. I would like to bring to the notice of the hon. Minister a story. महाराष्ट्र में दो गायनोक्लॉजिस्ट डॉक्टर्स हैं,उनका एक छोटा सा क्लिनिक है । वहां एक यंग महिला आई थी, जिसका वहां बच्चा हो गया । वह महिला एक दिन बाद वहां से भाग गई । उन डॉक्टर्स को समझ नहीं आया कि उस बच्चे का क्या करें । उनकी दो बेटियां थीं,जिन्होंने कहा कि क्यों न हम इस बच्चे को अपने घर ले जाएं । They did not know what the laws were. उन्होंने सोचा कि किसी का बच्चा है, जिसे वे छोड़कर चले गए हैं । उनके बच्चों को लगा कि वह बच्चा प्यारा है, इसलिए वे मां-बाप, जो एजुकेटिड डॉक्टर्स हैं,वे उस बच्चे को घर लेकर चले गए । एक हफ्ते बाद वहां पुलिस और एनजीओज़ पहुंच गए । उन्होंने डॉक्टर्स से कहा कि आप फॉस्टरिंग कर रहे हैं, एडॉप्शन कर रहे हैं, जो कि एक गुनाह है । इसलिए,आपको जेल जाना पड़ेगा या आप इस बच्चे को किसी संस्था को दे दीजिए । उन्होंने उस बच्चे को वापस कर दिया, लेकिन उन्होंने उस बच्चे को एडॉप्ट करने के लिए काफी चक्कर मारे । वे छ: महीने तक लगातार कोशिश करते रहे,लेकिन उनकी दो बच्चियां हैं,जिस कारण वे उस बच्चे को एडॉप्ट नहीं कर पाए ।
       चेयरमैन सर,आप सोचिए कि वह अच्छा और एजुकेटिड घर था । इस बच्चे को अच्छा घर मिल जाता और अरविंद सावंत जी, जिन अच्छे संस्कारों के बारे में कह रहे थे, वे संस्कार भी उस बच्चे को इस घर में मिलते । मैं निवेदन करूंगी कि इस विषय पर स्मृति जी कुछ बोलें । What can be the long-term solution, on a very serious note, about fostering? The same case has happened in Mumbai. As a matter of fact, Smritiji has worked in Mumbai extensively. There is a Director whom we had a lot of issues with, in Bollywood. He was very kind enough to foster a child who had lost his hand. He tried to foster the Child but they had to step in and take the child away because fostering rules are very different. So, until the child got adopted, he could not keep the child. He had to return the child to an infrastructure which was not half as good as that. I understand that there is a lot of misuse and abuse of children but at the same time, what more can we do in the right context of making sure that the people who are in good homes, in qualified homes, adopt children?
       Preneetji and some other hon. Members talked about the situation of DMs. I think, there were two contrasting views. I would like to add to this that when Smritijibrought this to our notice, we had a discussion in Maharashtra. We even spoke to our Collectors and District Magistrates and asked them whether they were open to working. They were absolutely open. I do not think they are feeling that this is going to be highly taxing for any Administration. The cause is so good that I am sure, our District Administration would be very proud.
       I do appreciate your point, Preneet Ji. I do not mean to demean it but I understand they are over-worked but this cause is so noble that I am very sure that the Administration would be more than happy to help. I think, if this comes under the District Administration, we, as Members of Parliament in our DISHA Committees, can review this, assist them and help them. I think the Child Welfare Committees need strengthening. So, I would request the hon. Minister that she could write, like in the Citizens Alliance, to all the Women and Child Welfare Ministers. This has nothing to do with which side we are sitting on in Parliament. I think if we are all supporting this Bill -- I am sure she has done it in the past –to reiterate this point and this new change, she could write to all the Women and Child Welfare Ministers or Chief Ministers and put it completely high on the agenda. It is like polio. हमारे देश में पोलियो हुआ करता था । It is because somebody in Delhi was working. I remember Harsh Vardhan Ji was an integral part of eradication of polio in India. So, if everybody puts their minds and decides, इस देश का हर बच्चा पोलियो से मुक्त होगा ।
We have managed and achieved such success stories. So, why not make adoption and child care as a top priority of the nation? If Smriti Irani Ji writes, I am sure all the Mantralayas will definitely assist her. I reiterate that if we, as Members of Parliament, if there is anything more we can do to assist you, we will do it. I would not get into the details because I think it is a very, very well-drafted Bill. This is one of the few Bills, I think, from this Government, which is well-drafted and well-thought of. So, I would compliment her for doing such a good job.
       Lastly, there is one small point. There is an NGO called ‘Pratham’ in Maharashtra. With the help of the Home Ministry of the Government of Maharashtra– at that time the Home Minister was Shri R.R. Patil -- they had done wonderful works. So, we could take that as a good success story to improve our shelters with their help. So, I would like to share it with you that Pratham has done an exceptionally good programme.
I think the begging issue that Arvind Sawant Ji raised, is very painful. We still see our children beg when we have right to education for them. It is really a shame and it reflects the reality.  I take ownership that we have obviously failed our children somewhere that our children have to beg today. So, I think if some programmes like this can be added to the Mantralaya, we would like to work closer with the Women and Child Welfare Ministry.
       I compliment her again from the bottom of my heart, and reassure that in whatever good projects like this, Maharashtra will excel, support you, assist you and work 100 per cent with you, if not 500 per cent. Thank you.   
 
श्री मलूकनागर (बिजनौर) : सभापति जी, आज बहुत महत्वपूर्ण बिल पर चर्चा हो रही है और असलियत   में   देश   के    भविष्य   को  कैसे   सुधारा    जाए,  इसकी शुरूआत इस बिल से हो रही है ।…( व्यवधान)
HON. CHAIRPERSON : Please address the Chair.
श्री मलूकनागर : सभापति जी, मुझसे पहले सुप्रिया जी ने अपनी बात सदन में रखी,जबकि पहले मेरा नम्बर था । उनका कहीं एपॉइंटमेंट था,इसलिएउन्हें मुझसे पहलेबोलने का मौका मिला और मुझेइंतजार करनापड़ा ।…(व्यवधान)मैं बहुत महत्वपूर्ण बात कहने जा रहा हूं । मेरी बहन सुप्रिया जी ने बताया कि जब बच्चे को एडॉप्ट करने के लिए जाते हैं,तो बच्चा उन्हें देख लेता है कि ये मेरे माँ-बाप बनेंगे और माँ-बाप देख लेते हैं कि ये हमारा बच्चा बनेगा । छह महीने तक वह प्रोसीजर चलता है और पता चलता है कि उन्हें बच्चे को एडॉप्ट करने के लिए रिजेक्ट कर दिया जाता है और उन्हें बच्चे को छोड़ना पड़ जाता है । मेरा कहना है कि मैं दस मिनट का इंतजार नहीं कर सका और छह महीना बच्चा और माता-पिता आपस में मिलने का इंतजार करते हैं और बाद में उनका केस रिजेक्ट हो जाए, तो आप सोच कर देखिए कि उन दोनों की क्या हालत होती होगी । मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि ऐसा तरीका खोजा जाए, जिससे दो-तीन दिन में फैसला हो जाए कि यह एडॉप्शन पूरी तरह से लीगल है और वे बच्चे को एडॉप्ट कर सकते हैं या इसे पेंडिंग रखा जाए ।
सर, मैं श्री भूपेंद्र यादव जी के नेतृत्व में लॉ एंड जस्टिस कमेटी (पर्सनेल,पब्लिक ग्रीव्यांसेज)का सदस्य हूं । यह एक शक्तिशाली कमेटी है । हमने इस सब्जेक्ट पर काफी रिसर्च की है । मुझे यह जानकर झटका लगा कि इस देश में वन नेशन,वन टैक्स यानी जीएसटी है, वन नेशन, वन टाइम वोटिंग सिस्टम है, लेकिन अडॉप्शन के लिए तीन कानून हैं । सारी चीजों के लिए देश एक है,लेकिन इसके लिए तीन कानून हैं । यह हिंदुओं के लिए अगल और मुस्लिमों के लिए अलग है । सबसे ज्यादा झटका लगने वाली बात यह है कि बाबा साहेब अम्बेडकर,जिन्होंने इस देश का संविधान लिखा है, उनके वंशजों के लिए कानून ही नहीं है । पहले अप्लाई करना पड़ेगा, फिर परमिशन आएगी,उसके बाद एडॉप्शन के प्रोसीजर की शुरुआत होगी । इसके लिए आज की तारीख में कोई सेट कानून नहीं है । सरकार इसको जरूर गंभीरता से ले और इस प्रक्रिया को सरल कराए । 
दूसरा,  अभी हमारे शिवसेना पार्टी के माननीय सदस्य बोल रहे थे, उस पर मैं कुछ कहना चाहूंगा । आप उम्र को घटाएं,यह बहुत अच्छी बात है और सरकार जो संशोधन कर रही है, उसकी जरूरत है और हम सब लोगों को आगे बढ़कर पॉजिटिव एटीट्यूड के साथ उसका समर्थन भी करना चाहिए । फिर भी सोचने वाली एक बात यह है कि जो बाल गृह में रहते हैं, जिनको प्यार देने की और सही मार्गदर्शन देने की बात की जा रही थी, अगर उनमें से किसी के साथ बचपन में कोई ट्रॉमेटिकल घटना हुई है, जिसकी वजह से वह डिस्ऑर्डर का शिकार हुआ है,तो उस समय उसको प्यार के अलावा किसी मनोचिकित्सक डॉक्टर और साइकोलॉजिस्ट की भी जरूरत है,ताकि सही तरह से उसका प्रॉपर इलाज किया जा सके । इससे जमानत के बाद ऐसे बच्चे कोई दूसरा अपराध नहीं करेंगे,जो उनके लिए नुकसानदायक हो,प्रदेश के लिए नुकसानदायक हो,देश के लिए नुकसानदायक हो या फिर आने वाले समय में सबके लिए नुकसानदायक हो । इस पर बहुत गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है ।
महोदय, बच्चों को प्यार कैसे दें, इसकी काफी डिटेल में परिभाषा दी गई है, जो कि बहुत अच्छी बात है । आजकल कोरोना-रूपी बीमारी के बाद हममें से 90 परसेंट लोगों को यह पता ही नहीं चला कि हमें कोरोना हुआ या नहीं हुआ । कोरोना होने से शरीर और इस बीमारी के बीच में लड़ाई होती है, तो खून गाढ़ा हो जाता है, जिस प्रकार से कार को तेज गति से चलाने पर उसका मोबिल ऑयल न बदले जाने पर गाढ़ा हो जाता है । इतनी तगड़ी लड़ाई लड़ने के बाद जब खून गाढ़ा हो जाता है, उससे ब्लड प्रेशर जल्दी बढ़ता है,साथ ही बच्चों और बड़ों का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है । इसके अलावा घर, जहां प्यार मिलना चाहिए,वहां प्यार की बजाए कई बार डांट मिलती है, कई बार छोटी-मोटी टचिंग भी हो जाती है । आज कानून में जो अमेंडमेंट हो रहा है, वह बहुत दिन से पार्लियामेंट्री कमेटी, स्टैंडिंग कमेटी और सरकार द्वारा लोगों की दिक्कतों को देखते हुए काफी रिसर्च के बाद किया जा रहा है । इसके साथ ही कोरोना भी चल रहा है ।
माननीय सभापति महोदय, अत:इसको ध्यान में रखते हुए कि हमारे देश की 90 प्रतिशत जनता का स्वभाव,जो चिड़चिड़ा हो गया है, जिससे बच्चे अकारण नाराज हो रहे हैं, बड़े बिना मतलब के लड़ रहे हैं,इसको कैसे कंट्रोल किया जाए, इस पर भी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है, जिससे वे भी खुश रहें, बच्चे भी खुश रहें और बच्चे ट्रॉमेटिकल प्रॉब्लम्स व डिस्‍ऑर्डर से बचने के साथ ही अपराध करने से भी बचें । धन्यवाद ।
SHRI MANNE SRINIVAS REDDY (MAHBUBNAGAR): Hon. Chairperson, Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021.
       The overall aim of this Bill must be to take steps and measures for the overall welfare and for strengthening the protection of juveniles as there are certain loopholes which need to be plugged at least now so that they may not be misused.
       In the proposed Bill, there must be provisions related to ensuring Fundamental Rights of children in conflict with law and children in need of care and protection.
       In our daily life, we may come across many instances where juveniles are found working in contravention of labour laws, begging and living on the streets. They do not have parents and no one is willing to take care of them. We may also find children whose parents have abandoned or surrendered them. So, they are found vulnerable and inducted into drug abuse, human trafficking or some other abuse. We need to protect such juveniles from all angles.
       There is a need to review serious offences committed by the juveniles through the Juvenile Justice Boards and these Boards should have more powers to deal with such cases.
       It is also stated that the District Magistrates may be given more powers primarily to decide all the juvenile cases before they go to any court, and designated courts may be set up to solve the cases speedily.
       There is a need to set up more Child Welfare Committees in the States as well as in the districts so as to save time and solve the cases in a time-bound manner. They may also be empowered with more special powers.
       All the decisions regarding a child may be taken on the primary consideration that they would be in the best interest of the child only and it would help the child to develop his full potential. We must concentrate on this point only and measures may be taken to ensure that the child is safe from all angles and is not subjected to any harm, abuse or maltreatment at any level or at any stage.
       The Government must ensure that there should be no discrimination against a child at any point of time on any ground, including sex, caste, ethnicity, place of birth or disability. Every child should be ensured equality of access, opportunity and treatment by maintaining, wherever there is a need, his right to privacy and confidentiality throughout the judicial process.
       It is also requested that steps may be taken for providing reformative services, including the provision of education, skill development, counselling, behaviour modification therapy and psychiatric support during the period of their stay in the special homes.
The special homes, which are running at present, are in a very poor condition and need to be improved for better functioning to get the desired results.
       It is also a fact that the institutional setup required under the Juvenile Justice Act has not been built completely so far. The district level institutions generally lack infrastructure and staff to adequately execute their objectives. This is really hampering the work of the rehabilitative and reformative programmes for ensuring juvenile justice to children.
       Thank you.
 
SHRI HASNAIN MASOODI (ANANTNAG): Hon. Chairperson, Sir, I thank you for giving me this opportunity to speak.
       Sir, rights of children are close to our hearts in Jammu and Kashmir. The Constitution of Jammu and Kashmir was the first such document in the entire South-Asia, maybe in the entire Asia, to recognise the right to happy childhood. हमारे आइन ने राइट टू हैप्पी चाइल्डहुड को रेकग्नाइज्ड किया, जब उसका कोई अनुभव नहीं था । मेरा यह मानना है कि हमारे जम्मू-कश्मीर का जो आइन है, जो कान्स्टिट्यूट असेंबली ऑफ इंडिया के आशीर्वाद से बना है, वह अभी मौजूद है । इस हाउस की यह पावर नहीं है, यह इख्तियार नहीं है कि वह उसको ऐब्रोगेट करे,इन केस, वह ऐकडेमिक वाला दूसरा सवाल है ।
I am sorry that I may have some kinds of reservation about the Bill under consideration. जो पहले प्रयास हुआ और मैंने कहा था कि hon. Minister deserves all the laurels, शायद वह मैं आज रिपीट न कर पाऊँ । 
सर, हमारे मुल्क में 45 करोड़ के करीब बच्चे हैं । One-third of the population is juvenile. इन 45करोड़ में दो कैटेगरीज़ हैं । One is, children in need of care and protection. उनकी बड़ी तादाद है । Second is, children in conflict with law. जहां तक children in need of care and protection की बात है, हमारी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी डिस्ट्रिक्ट लेवल पर की-एक्टर है, उनका जो हित है,उनके जो राइट्स हैं, उनको देखती है । जहां तक चिल्ड्रन कॉन्फ्लिक्ट्स विद लॉ है, वह ऐसे हैं, जिनके खिलाफ अपराध का इल्जाम होता है । जेजे बोर्ड उसका ख्याल करता है । अब बात यह है कि हर जिले में एक डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट बना हुआ है, जिसके हैड एक्सपेक्ट किए जाते हैं कि एक डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर होंगे । मेरी पहली बात यह है कि जो रिजर्वेशन है, जो मुजवज़ा बिल लाया गया है, you are concentrating all the powers in District Magistrate. I do not dispute that. सारंगी जी ने पहले कहा कि नई डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट इक्वली कम्पीटेंट है । I have no reservation against it. I have nothing to say on that. उनके हाथ पहले ही भरे हुए हैं । Their hands are full. मैं बिल्कुल सहमत हूं,जैसा मैडम ने कहा कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का भी अध्यक्ष है और भी कई काम ऐसे हैं, जो उसको सुपरवाइज करने पड़ते हैं । जो 45 करोड़ के करीब बच्चे हैं और जिनमें पांच परसेंट या दस परसेंट अगर ऐसे हों, जो in need of care and protection है,तो उसका मतलब है कि सीधे-सीधे साढ़े चार करोड़ बच्चे । इनको एक जिले, सतह पर एक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के हवाले करना, जिसके और भी कई काम हैं, आपने खुद देखा होगा,आपके पास अनुभव है, तर्जुबा है, सारे हाउस ने देखा होगा,यह नहीं कि वह कम्पीटेंट नहीं है, लेकिन कर नहीं पाएंगे । उनके पास सौ काम हैं । मंत्री आ गया तो मंत्री के पीछे-पीछे चलना है । अब वीसी का सिलसिला शुरू हो गया है । कभी-कभी प्राइम मिनिस्टर डायरेक्ट एड्रेस करते हैं । So, I think this is a step in the backward direction. वह यह नहीं कर पाएंगे और दूसरी बात यह कहना कि एडॉप्शन का पाथ एडवर्सियल नहीं होता है,बिल्कुल गलत है । आप यह देखिए कि कानून ने कल्पना की है कि हमारे डिस्ट्रिक्ट जज है, वह गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट के तहत उस कोर्ट के सरबराह हैं । वही अंडर लॉ गार्जियन है । अगर किसी बच्चे का कोई गार्जियन अपॉइंट न किया गया हो तो कानून के अनुसार डिस्ट्रिक्ट जज ही गार्जियन माना जाता है । एक बेनिफिट है कि जो जज है, वह अवेलेबल है all the time in court hours in the court. जो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बारे में है, वह नहीं कहा जा रहा है । आपने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को केन्द्रित किया है, उसमें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को सब पावर्स दे दी हैं, वह बिल्कुल ही उनके हित में नहीं होगा, जो हमारे चिल्ड्रन्स हैं in need of care and protection. कानून जो कल्पना करता है, कानून जो प्रोविजन बनाता है कि उनको कोई रिलीफ होना चाहिए,वह नहीं होता । मुझे नहीं मालूम कि मंत्री जी को यह पता है कि इस मुल्क में कितने बच्चे इन इंस्टीट्यूशंस में हैं, जिनको हम चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन कहते हैं, ऑर्फनेज भी कहते हैं, चिल्ड्रन होम्स भी कहते हैं । कितने बच्चे होंगे,जो सारे मुल्क में हैं और कितने की इनके पास सूचना है? कितने हैं जो रजिस्डर्ड हो गए? कानून की यह मंशा थी कि रजिस्ट्रेशन हो जाए ताकि हम उन पर नजर रखें,निगरानी रखें कि बच्चों के साथ वह वही इंसाफ करें ।
जनाब, एक ग्राउंड सिचुएशन पर मेरा एक तजुर्बा रहा है । I do not claim to be an expert but I have been associated with this as Chairperson of the State Juvenile Justice Panel in Jammu & Kashmir after I laid down robes. You just see what is the condition of children who are in institutional care. कितनी बुरी हालत है और माननीय मंत्री जी बताएंगी कि अभी तक कितने परसेंटेज में रजिस्ट्रेशन हुई है और उनकी क्या संख्या है?दूसरी बात है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास कहां वक्त मिलेगा कि वह जाकर देखें? एक जिले में 100 या 200 चाइल्ड केयर इंडस्टीट्यूशंस होते हैं ।…(व्यवधान) अगर मुझे अपनी बात नहीं करने देंगे तो इंसाफ नहीं होगा । दूसरी बात यह है कि आपने चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की बात की । Child Welfare Committee is the key actor under the Act as regards the children in need of care and protection. आप मुझे बताइये कि आपने उनके लिए बड़ी अच्छी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन की और होनी भी चाहिए । That is good. लेकिन हम देते क्या है उनको? What kind of emoluments do they get? Their honorarium is less than a daily wager, less than an orderly. With this qualification who will prefer to come and work as member of the CWS? ठीक है,अपनी जगह पर होना चाहिए । चाइल्ड साइकोलॉजी में एक्सपर्ट होना चाहिए, लेकिन आप उसको क्या दे रहे हैं?
       I have this experience. If a child is in difficulty and if we have to get him from the village, no transport is available to get that child from the village.शेल्टर होम की तो बात ही छोड़ दीजिए । आप इसको अगर केंद्रित कर रहे हैं और जो लक्ष्य बना रहे हैं डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट के हाथ में अडॉप्शन देकर, मैं आपको कॉश्न करना चाहता हूं कि आप उसको पूरा नहीं कर पाएंगे । बल्कि यह मामले को और ज्यादा लम्बा कर देगा । The other thing is, we do not see any shift from institutional care to non-institutional care. I mean, now, the world-over alternate care is the theme, not the institutional care. इंस्टीट्युशनल केयर में वे अपनी रूट से, अपनी बिरादरी से और अपने बैकग्राउण्ड से कट जाते हैं । So, your shift should be and your focus should be from institutional care to non-institutional care. जो माने हुए हैं, तो उस बारे में क्या किया जा रहा है?
HON. CHAIRPERSON : Kindly conclude.
श्री हसनैन मसूदी : आपने सुपरविज़न की बात कही है । आप कैसेसुपरवाइज़ करेंगे?I will again acknowledge that it is not a comment on their capabilities. I am saying this just to show how busy they are. उनके हाथ में डिस्ट्रिक्ट प्लान और पब्लिक सेफ्टी भी है ।
HON. CHAIRPERSON: Sorry to interrupt. We have 15 more Members to speak. Kindly conclude.
श्री हसनैन मसूदी : मेरा सजैशन होगाकि आप डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट को स्ट्रैंथन कीजिए और डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्टशन ऑफिसर लगाइए जो कैडरऑफिसर हो । वह अपना सारा समय उन बच्चों को डिवोट करेगा,जिनकोकेयर की जरूरत है । You just strengthen the DCPUs. आपके पास डिस्ट्रिक्ट में स्पेशल पुलिस यूनिट भी है ।
HON. CHAIRPERSON: Kindly sum up your points and conclude.
श्री हसनैन मसूदी : आपकी जो नेक-नियति है,मैं उस पर कोई विवाद नहीं करना चाहता हूं लेकिन यह स्टैप, जो बैकवर्ड डायरेक्शन में है,यह कुछ हज़म नहीं होगा और इससेमैं डिफर करता हूं ।
 
श्री जसबीरसिंह गिल (खडूर साहिब):थैंक्यू चेयरमैन सर, आपने मुझे जेजे बिल पर बोलने का मौका दिया । हमारी मंत्री श्रीमती इरानी जी बहुत पैशन के साथ बोल रही थीं और जो बच्चों का दर्द है, वह इनके चेहरे से झलक रहा था । मैं समझता हूं कि मेरे से पहले जितने भी सांसद बोले हैं, वे किसी भी पार्टी से हों,उन्होंने चाइल्ड वेलफेयर पर जो यूनैनिमिटी दिखाई,मैं इसके लिए मंत्री जी और पूरे हाउस को बधाई देना चाहता हूं ।
       सर, मंत्री जी ने अपने भाषण में बताया कि 26 परसेंट जगहों पर वेलफेयर ऑफिसर्स नहीं हैं, 25 परसेंट जगहों पर वॉशरूम्स नहीं हैं, 10 परसेंट जगहों पर ड्रिंकिंग वॉटर उपलब्ध नहीं है, 10 परसेंट के यहां डाइट प्लान नहीं है । मैं तो मंत्री जी से इसके लिए गुजारिश करना चाहता हूं कि इसमें किसी की भी,  चाहे वह गवर्नमेंट के ऑफिशियल या किसी स्टेट ऑफिशियल की गलती है, यह माफी योग्य नहीं है । कैसे आप अपने बच्चों को बिना पानी के रख सकते हैं? कैसे आप बच्चों को हाइजैनिक कंडिशन में नहीं रखते हैं? इन पर स्ट्रिक्ट होना पड़ेगा ताकि हमारे बच्चे, जो हमारा भविष्य हैं और हम जो पैदा करते हैं, हम जो बोते हैं, वही फल हमें आगे जाकर मिलता है । State and District Child Welfare Committees have to be pro-active. इनको चुस्त-दुरुस्त करना पड़ेगा । इतना ही नहीं हमें और भी आगे जाना पड़ेगा । कुछ केसेज़ में बच्चे ऑर्फ़न हो जाते हैं, उनके माता-पिता नहीं रहते हैं, कुछ माता-पिता अपने बच्चे को अच्छी तरह फीड भी नहीं कर सकते, उनका पालन-पोषण ठीक से नहीं कर सकते और कुछ जगह पर बच्चे माता-पिता के न होने से अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हैं । वे रिश्तेदार भी कुछ देर के लिए रखते हैं । किसी के पास उसके पैरेंट्स की पेंशन आती होगी,कहीं कुछ प्रॉपर्टी की इंकम आती होगी,मगर उन बच्चों से काम करवाया जाता है, उनको अच्छी शिक्षा नहीं दी जाती है, उनका पालन-पोषण अच्छा नहीं किया जाता है ।
We should make it mandatory कि चाहे हमारे चाइल्ड वेलफेयर ऑफिसर हों या डी.एम., जो भी नामजद हों, वे इन बच्चों को उनके रेलेटिव्स के घर पर जाकर रेगुलर्ली मॉनीटर करें,मिलें, देखें कि उनकी जो परवरिश है, क्या वह सही ढंग से हो रही है ।
       चाइल्ड केयर हाउसेज में जो बच्चे रहते हैं या वहां के जो एम्प्लॉइज़ रहते हैं, उनके बैकग्राउण्ड चेक्स पुलिस से मैनडेटैरिली करवाए जाएं और रेगुलर बेसिस पर करवाए जाएं । इन लोगों की मेन्टल हेल्थ ऑडिट भी करवानी जरूरी है क्योंकि बच्चों का पालन बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम है । जैसे आपने हर गांव में आंगनबाड़ी हेल्पर्स या वर्कर्स लगाए हैं । एक स्टडी के मुताबिक बच्चे का विकास तीन से छ: साल के बीच मैक्सिमम होता है । हमारे आंगनबाड़ी जो वर्कर्स हैं,वे इसी एज-ग्रुप के बच्चों का ख्याल रखते हैं । उनको सहूलियतें दीजिए । उन्हें रेगुलर कीजिए । उन्हें ऑनरेरियम की जगह वेतन दीजिए । मगर, इतना जरूर ख्याल रखें कि अगर हम ऐसे आंगनबाड़ी वर्कर्स को चाइल्ड केयर होम्स में भी प्वायंट कर देंगे तो वे सरकार के आँख और कान बन जाएंगे, सरकार को बढ़िया रिपोर्टिंग देंगे और बच्चों का ख्याल रखेंगे ।
       बहुत बड़े इंस्टांसेज हुए हैं जहां गवर्नमेंट ऑथोरिटीज़ ने चाइल्ड बॉन्डेड लेबरर्स को रेस्क्यू किया है । कई बार फैक्ट्रीज से, कई बार घरों से, कई बार ईंट भट्टों से उन्हें रेस्क्यू किया गया है । उन बच्चों को भी इन चाइल्ड केयर होम्स में लाकर रखना चाहिए ।
       हमारे पी.एम. साहब ‘स्किल इंडिया’के बहुत स्ट्रॉन्ग वोटरी हैं । Kindly tie up with Skill Development Ministry. ये जो बच्चे इन चाइल्ड वेलफेयर होम्स में रहते हैं,इनको शुरू से ही स्किल की ट्रेनिंग इम्पार्ट की जाए,एजुकेशन इम्पार्ट की जाए । जब वे बड़े हों तो उनको किसी के रहम पर   न रहना पड़े । वे किसी भी एक काम में महारत हासिल कर लें और अपनी जिन्दगी इज्जत से गुजारें ।
       सर, सबसे बड़ी जरूरी बात यह है कि अगर हमारी फैमिली कहीं गई हो और हम कहीं किसी के घर पर रह जाएं तो शाम तक हमारा बुरा हाल हो जाता है । ये बच्चे, जो अकेले रहते हैं, किसी के साथ इमोशनल अटैचमेंट में नहीं रहते हैं तो इन्हें काउन्सलिंग की जरूरत है, इन्हें साइकैटरिस्ट हेल्प की जरूरत है, इन्हें डॉक्टर्स की जरूरत है । यह मैनडेटरी करें कि काउन्सलर्स,डॉक्टर्स और साइकैटरिस्ट्स उन्हें देखें ।
       सर, बस मैं अपनी बात खत्म ही कर रहा हूं । यहां पर सभी मेम्बर्स ने कहा कि डी.एम. ओवरवर्क्ड हैं । मैं आपको दो डी.एम्स.का उदाहरण देता हूं । अमृतसर का डी.एम. है । अगर कोई वी.आई.पी. एयरपोर्ट से आ रहा है, कोई बॉर्डर से जा रहा है, कोई गोल्डेन टेम्पल जा रहा है । दूसरा डी.एम. तरनतारण का है । उस डी.एम. के पास कोई काम नहीं,कोई और देखता है । इससे बेहतर कि एक तो अपने एम.पीज़. को किसी न किसी रूप से इन कमेटीज के साथ इंवॉल्व कीजिए ।
   
डॉ. वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़):सभापति महोदय, आपने मुझे किशोर न्याय (संशोधन) विधेयक, 2021 पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए धन्यवाद । मैं देश के प्रधान मंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी का आभार प्रकट करना चाहता हूं । मैं हमारी महिला एवं बाल विकास मंत्री माननीय स्मृति इरानी जी का आभार प्रकट करना चाहता हूं । उन्होंने जब अपनी बात प्रारम्भ की थी तो बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ उन बच्चों की मनोदशा को प्रकट किया था ।
       सभापति महोदय,मैं दिल्ली के एक दृष्टांत से अपनी बात प्रारंभ करूँगा । दिल्ली की एक बालगृह में जब मैं गया तो वहाँ देखा कि एक बच्चा बुखार से बहुत तप रहा था और बाकी सारे बच्चे कार्यक्रम कर रहे थे । मैंने उसके पास जाकर पूछा तो पता चला कि उसको तीन दिन से बुखार आ रहा था । वहाँ पर मुझे एक सुखद अनुभूति देखने को मिली कि उस बच्चे के पास उसी बालगृह के चार और बच्चे बैठे हुए थे । सामान्य रूप से देखने में यह आता है कि घर में जब कोई बच्चा अस्वस्थ होता है तो उसको सबसे ज्यादा आवश्यकता माँ की होती है । अगर माँ बच्चे के पास बैठी रहती है तो बच्चे को किसी बात का भय नहीं होता है । उसको यह लगता है कि माँ मेरे पास है और मैं ठीक हो जाऊँगा । हमारे समाज में जो ऐसे बच्चे हैं, उनके प्रति देश के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी के मन में पीड़ा थी । हमारी महिला बाल विकास मंत्री माननीय स्मृति इरानी जी ने उनकी पीड़ा को अनुभव किया । उसी के आधार पर इस संशोधन विधेयक को यहाँ पर लाया गया है ।
16.56 hrs                     (Shri Rajendra Agrawal in the Chair)        समाज में होने वाले परिवर्तन और भविष्य में होने वाले परिवर्तनों को पहले से भाँप कर सरकार नीति निर्धारण का कार्य करती है । किसी कानून में होने वाले बदलाव के संबंध में, उसमें शीघ्र परिवर्तन करना एक कुशल नेतृत्व का प्रतीक होता है । उसी को भाँप कर सरकार इस विधेयक के माध्यम से बच्चों के हित की दिशा में कदम उठाने जा रही है । माननीय प्रधानमंत्री जी के कुशल नेतृत्व में सरकार बच्चों के हितों को सुरक्षित करना चाहती है । बाल संगठन की व्यवस्था को और अधिक प्रभावी और कारगर बनाने के लिए यह किशोर न्याय संशोधन विधेयक लाया गया है । यह वास्तव में बहुत सराहनीय है । वर्ष 2016 का जो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट था,वह न सिर्फ संविधान में दिए गए बाल संरक्षण और किशोर न्याय के मूल सिद्धांतों तथा प्रावधानों के अनुरूप था,बल्कि यह कानून यूनाइटेड नेशंस के चार्टर के भी अनुकूल था । जब किसी देश में कानून बनाने की प्रक्रिया स्थिर हो जाती है तो वह देश भी स्थिर हो जाता है । हमारे यहाँ कहा जाता है कि रूके हुए पानी में बदबू आने लगती है और बहता हुआ पानी पवित्र तथा निर्मल होता है । इसी कारण हमारी सरकार इस जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में सुधार लाई है,जिससे इस कानून को और अधिक प्रभावी और समय के अनुरूप बनाया जा सके ।

भारत विश्व की सर्वाधिक बच्चों की संख्या वाला देश है । भारतीय संविधान भी बच्चों के लिए मौलिक अधिकार का प्रावधान करता है- जैसे शिक्षा का अधिकार,भोजन का अधिकार,बाल श्रम तथा शोषण से मुक्ति का अधिकार, स्वस्थ तरीके से विकसित होने का अधिकार, सुविधाओं का अधिकार । राष्ट्रीय बाल नीति भी बच्चों के विभिन्न क्षेत्रों में स्वाभाविक और अलग-अलग माध्यम से संपूर्ण विकास व संरक्षण को महत्वपूर्ण मानती है । भारत का प्रत्येक बच्चा अपने-आप में अनेक संभावना लिए हुआ अनूठा व्यक्तित्व है और वह राष्ट्र की धरोहर है । राष्ट्रीय बाल नीति के अनुसार प्रत्येक बच्चे को पारिवारिक माहौल में प्रेम, खुशी और समझ के माहौल का अधिकार है । जिनको यह सौभाग्य प्राप्त होता है,वह अपने घरों में अपने माँ-बाप के साथ खुशी से रहते हैं । जब उनका परिवार होता है तो उस परिवार में दादा-दादी होते हैं, परिवार में ताई भी होती है, परिवार में बुआ भी होती है, परिवार में चाचा भी होते हैं और बड़े भाई भी होते हैं । इस प्रकार से समूल परिवार में वह बच्चा रहता है । इससे उसको धीरे-धीरे एक तरफ संस्कार मिलते हैं और दूसरी तरफ परिवार में एक साथ रहने से आगे बढ़ने का हौसला भी मिलता है ।

सभापति महोदय, इस दिशा में किशोर न्याय अधिनियम की जो धारा-56 है, उसकी उप-धारा 1 यह प्रावधान करती है कि अनाथ,छोड़े गए या छोड़ दिए गए बच्चों के परिवारों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए दत्तक लॉ का उपाय किया जाएगा और इस बिल में उसका प्रावधान किया गया है । मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों ने भी माना है कि यदि बचपन में किसी बच्चे में कोई कमी होती है तो व्यक्ति आगे चलकर कुंठित हो जाता है । ये सब अधिकार सिर्फ ऐसे बच्चों के लिए नहीं हैं,जिनके पास परिवार है, माता-पिता है, संरक्षण के लिए देखभाल करने वाले है,बल्कि उन बच्चों के लिए हैं, जिनके पास ऐसी स्थिति नहीं है । उनको यह अधिकार दिलाने की जिम्मेवारी सरकार की होती है, इसलिए सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है ।

भारत यूएनओ की बाल अधिकार कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता देश है । उसके प्रावधानों को हम सरकार की नीतियों में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं । किशोर न्याय अधिनियम 2015 में सबसे महत्वपूर्ण दो प्रकार के बच्चों की श्रेणियों में विभाजित किया गया है । पहले प्रकार के ऐसे बच्चे हैं,जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता है । दूसरे प्रकार के ऐसे बच्चे हैं,जो कानून के उल्लंघन के दोषी हैं । सरकार को ऐसी व्यवस्था बनाने का दायित्व है,जिसमें बच्चों के सभी हितों का संरक्षण हो सके । इसके लिए चाहे वह चाइल्ड हेल्पलाइन हो, चाहे संस्थागत या गैर संस्थागत देखभाल की आवश्यकता हो अथवा अन्य सेवा प्रदान करने वाले माध्यमों को बनाना हो, यह सब राज्य की जिम्मेवारी होती है कि वह इसे चलाए ।

17.00 hrs सरकार ने समय-समय पर इस कानून में बदलाव किए हैं । वर्ष 2018 में कुछ बदलाव किए गए थे, जो समय की मांग के अनुरूप थे । यह संशोधन विधेयक आज लाया गया है,जिसमें इस अधिनियम को और अधिक शक्तिशाली एवं मजबूत बनाने के प्रावधान किए गए हैं । इस संशोधन विधयेक में जो दत्तककरण की प्रकिया है, उसको बहुत आसान किया गया है और बहुत अधिक प्रभावी बनाया गया है । वर्तमान में, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 63 में बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया में कोर्ट को ही अधिकार था । कोर्ट में इतनी ज्यादा पेंडेंसी रहती है कि सालों निकल जाते हैं,अगर किसी बच्चे को गोद लेने के लिए किसी दम्पत्ति ने आवेदन किया और वह बच्चा 6 महीने या 8 महीने का है,लेकिन जब कोर्ट में वह प्रक्रिया चलती है तो वह बच्चा 3 साल या 4 साल का हो जाता है । वह फिर अपने मां-बाप के पास जिनके संरक्षण में जा रहा है, वह उनसे उतनी अच्छी तरह से मिक्स अप नहीं हो पाता है । इसके लिए आवश्यक था कि प्रक्रिया को आसान बनाया जाए । इसी दिशा में सरकार आगे कदम बढ़ा रही है । कहीं-कहीं इतनी ज्यादा पेंडेंसी है,उसको देखते हुए लगता है कि हम कहीं अनजाने में अनाथ बच्चों के प्रति अन्याय तो नहीं कर रहे थे, जिससे न तो उनको नया परिवार मिल सकता था और न ही जीने का कोई सहारा ही मिल पाता था ।

       मैं माननीय मंत्री जी को धन्यवाद करना चाहता हूं कि सरकार ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है और व्यावहारिक संशोधन करते हुए अब सारी की सारी शक्तियां जिला मजिस्ट्रेट और उसके साथ ही साथ अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को देने का इसमें प्रावधान किया गया है । यह एक स्वागत योग्य कदम है । हम सब जानते हैं कि जिला मजिस्ट्रेट के ऊपर इतना वर्कलोड होता है, इतना ज्यादा काम होता है कि ये काम पिछड़ जाते हैं । बच्चे इंतजार में रहते हैं कि कोई मां-बाप आयेंगे और हम उनके साथ जायेंगे । वे जब दूसरे बच्चों को देखते हैं कि वह बच्चा गोद लिया गया था और वहां पर अपने घर जाने के बाद जब वह बीच-बीच में मिलने के लिए वहां आता है तो जो अनाथगृह में बच्चे रहते हैं, तो उनके मन में भी यही रहता है कि हम भी किसी परिवार के द्वारा गोद लिए जाएंगे,हमको भी ऐसे ही अच्छे कपड़े पहनने को मिलेंगे,हम भी ऐसे ही गाड़ी में घूमकर आएंगे ।

 

संशोधन विधेयक में जो अधिकार दिए गए हैं, इसमें डीएम और एडीएम के बीच में यह काम बंट जाने से अब काम करना ज्यादा आसान हो जाएगा और दत्तक प्रक्रिया अब बहुत कारगर हो जाएगी । जिला मजिस्ट्रेट यह देखते हैं कि जो दम्पत्ति बच्चा गोद लेने के लिए आ रहा है, उसका परिवार कैसा है,उसकी सोच कैसी है, उसकी पारिवारिक स्थिति कैसी है?वह इस जिम्मेदारी को ठीक ढंग से उठा पाएगा या नहीं उठा पाएगा । इन सारे बिंदुओं पर पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद ही बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया का काम किया जाएगा । यह जो व्यवस्था की गई है, यह काफी सराहनीय है ।

       महोदय, इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह होगा कि एडॉप्शन संबंधी जितने भी कार्य हैं, वे सब अब फास्ट मोड में होने लगेंगे । हमारे देश के अनाथ बच्चों को एक नया जीवन, नया परिवार और नया घर प्राप्त हो सकेगा । अप्रैल, 2019 से मार्च, 2020 तक के आंकड़ों को अगर हम देखें,तो  कुल 3,531 बच्चों को गोद लिया गया,जिसमें 2,061 लड़कियां थीं और 1,470 लड़के थे । यह समाज की बदलती मानसिकता है । यह माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान जैसे कार्यक्रमों की सफलता को बताता है । आज भारत में लगभग 8,677 बच्चे गोद लेने के लिए उपलब्ध हैं । इनकी तुलना में जो दम्पत्ति गोद लेना चाहते हैं, वह संख्या बहुत ज्यादा है । जटिल कानूनी प्रक्रिया के चलते यह पेंडेंसी बनी हुई थी । इस पेंडेंसी को दूर करने के लिए दत्तक और गोद लेने की प्रक्रिया का सरलीकरण किया गया है ।

मैं एक बात कहना चाहता हूं कि जो संतानहीन दम्पत्ति होते हैं, जब वे इस तरह के किसी बालगृह या अनाथाश्रम में जाते हैं, तो हर दम्पत्ति की यह कोशिश होती है कि वे बच्चे को ही गोद लें,बेटी को गोद न लें, लेकिन अब उसमें परिवर्तन आ रहा है । वे छोटे बच्चे को ही गोद लेना चाहते हैं,बड़े बच्चे को गोद नहीं लेना चाहते हैं । समाज की इस मानसिकता में परिवर्तन लाना पड़ेगा । उन बच्चों के मन में भी यह आता है कि हमें भी मां की ममता का आँचल मिलना चाहिए, पिता की उंगली पकड़कर हम भी घूमने के लिए जाएं । लंबी प्रक्रिया के चलते जो बच्चे थोड़े बड़े हो जाते हैं,वे बेचारे अनाथाश्रम में रहकर ही अपना समय निकालते हैं । इस संशोधन विधयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट तीन प्रकार के अपराध का संज्ञान ले सकता था, पहला - छोटे अपराध,दूसरा - घोर अपराध और तीसरा - जघन्य अपराध । जुवेनाइल जस्टिस अपराध एक्ट चौथी श्रेणी के अपराध को शामिल नहीं करता । जहां अपराध के लिए अधिकतम दंड सात साल से अधिक के कारावास का प्रावधान तो है, पर न्यूनतम दंड नहीं बताया गया और उसे अधिनियम के अधीन जघन्य अपराध समझा गया । इस स्थिति के समाधान के लिए सरकार ने संबंधित क्लॉज में बदलाव का प्रस्ताव रखा,जिससे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में इस विसंगति को दूर किया जा सके । इस विधेयक में मूल अधिनियम की धारा 18 की उपधारा 1 में 16 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे, जिनको जघन्य अपराध में जोड़ा गया है, 16 साल से कम आयु का बच्चा भी यदि शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व है, तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड कोर्ट में उस केस को रेफर कर सकता है । भारत ही नहीं, पूरे विश्व में दिख रहा है कि बाल अपराधों की संख्या काफी बढ़ रही है । 

दस साल का बच्चा मर्डर करने लगा है, दस साल का बच्चा रेप करने लगा है, यह समाज में बदलाव देखने में आ रहा है । इसका बहुत बड़ा कारण टीवी कल्चर है । व्हाट्सैप,फेसबुक, बच्चों द्वारा पबजी खेलना,ब्लू व्हेल खेलना आदि । ये खेल हिंसात्मक दिशा में आगे बढ़ाते हैं । हम देश के आदरणीय प्रधानमंत्री जी का धन्यवाद करना चाहते हैं कि उन्होंने इस तरह के खेलों को सख्ती से बंद करने के लिए कदम उठाया,बच्चे इस तरह के खेलों में इन्वॉल्व न हो पाएं और स्वाभाविक रूप से बच्चों की ग्रोथ हो सके ।

       बाल कल्याण समिति को शैक्षणिक योग्यता के प्रावधान से जोड़ा गया है और बाल कल्याण समिति में मनोवैज्ञानिक,अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता को शामिल किया गया है । दिव्यांग बालकों के लिए काम करने के लिए जिनका इस क्षेत्र में विशेष अनुभव है, ऐसे लोगों को चिन्हित करके बाल कल्याण समिति में रखा जाएगा तो हमारी व्यवस्था बहुत अच्छी हो सकेंगी ।

       माननीय सभापति जी, मैं आपका इशारा समझ रहा हूं, लेकिन कुछ चीजें कोट करना बहुत जरूरी है । मैं कोरोना काल में कानपुर के एक बालिका गृह का उल्लेख करना चाहता हूं । कोरोना काल में 27 बेटियां कोरोना से संक्रमित हो गईं, इस समाचार को मीडिया ने खूब उछाला । लेकिन उसी बाल गृह में दो बेटियां यूपी बोर्ड की परीक्षा में क्रमश: 71 और 73 अंक लेकर पास हुई । यह इस बात को बताता है कि विपरीत परिस्थितियों और संसाधनों के अभाव में भी जिनके अंदर आगे बढ़ने की क्षमता है,उन बेटियों ने अच्छा रिजल्ट लाकर बताया कि प्रतिभा कहीं भी अपना स्थान बना सकती है । ऐसे बच्चों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है ।

मैंने एक समाचार पत्र पढ़ा, मुंबई के संरक्षण गृह में रहने वाली बच्चियां आज इंजीनियरिंग कर रही हैं, एमबीए कर रही है और डिप्लोमा करके बहुत अच्छी-अच्छी कंपनियों में काम करने के लिए जा रही हैं । एक बालगृह का उदाहरण यहीं का है, वह बहुत अच्छी पेन्टिंग बनाता था, वह बड़ा होकर बाहर चला गया, लेकिन वह बच्चा अभी भी बालगृह में आता है । वह वहां के छोटे बच्चों को पेन्टिंग करना सिखाता है । ऐसे ही एक व्यक्ति बालगृह से निकला था, वह अभी भी आता है और बच्चों के बीच में आकर बैठता है, वह उनको नाटक सिखाता है, वह नाट्य मंडलियों में काम करने के लिए चला गया, लेकिन बालगृह से अपना रिश्ता नहीं छोड़ा ।

       सभापति जी, मैं आपकी बात समझ रहा हूं, मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर रहा हूं । मैं टीकमगढ़ का उदाहरण देना चाहता हूं । टीकमगढ़ में एक आंटी जी शिवकली रुसिया जी हैं । वह संतानहीन हैं, लेकिन उन्होंने इसे अपनी मजबूती का आधार बनाया । वह छोटे अनाथ बच्चों को धर्मार्थ शिशु गृह में रखती हैं और एडॉप्शन की प्रक्रिया से संतुष्ट होने के बाद ही बच्चों को भेजा जाता है ।

 

       सागर में एक संजीवनी बाल आश्रम है,सत्यभामा आचार्य जी उस आश्रम का संचालन करती थी,अभी हाल ही में उनका निधन हो गया है । वह बच्चों के भोजन और शिक्षण की व्यवस्था अच्छी तरह से करती थीं और बेटियों की शादी इस तरह से करती थीं कि वह उनकी सगी बेटी हो । जब लोगों ने देखा तो शहर के बहुत बड़ी संख्या में समाजसेवी उस व्यवस्था से जुड़ गए । आज संजीवनी बाल गृह में बेटियों की शादी बहुत अच्छी तरह से होने लगी है ।

       मैंने अपने बच्चे का जन्मदिन का कार्यक्रम अपने घर पर कभी नहीं किया । जब मेरे बच्चे छोटे थे तो उसी संजीवनी बाल आश्रम में जाकर अनाथ आश्रम के बीच बैठकर जन्मदिन मनाया । आज मेरी बेटी डॉक्टर निवेदिता रत्नाकर उस परंपरा को आगे बढ़ा रही है क्योंकि मेरा संसदीय क्षेत्र बदल गया और मैं टीकमगढ़ आ गया । मेरी बेटी को संजीवनी बाल आश्रम के लिए घर से खाना और मीठा बनाकर ले जाती है और उन बच्चों के बीच बैठकर अपनी बेटी का जन्म दिन मनाती है ।

केवल अनाथ आश्रम निराश्रित बच्चों की समस्या का समाधान नहीं है । हमें उन आश्रमों के साथ जागरूक नागरिकों को जोड़ना पड़ेगा, समाज को जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी । जब समाज अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह करने के लिए आगे आएगा तो बाल गृह की व्यवस्थाएं भी सुधरेंगी और वहां से शिक्षित और संस्कारित बच्चे निकलेंगे ताकि वह समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपना योगदान दे सकेंगे ।

       एक आखिरी उदाहरण देना चाहता हूं । मैं कोलकाता में एक बालिका गृह में गया था । मैंने देखा कि उस बालिका गृह में एक बच्ची बहुत अलग तरह की है,वह बहुत अच्छी बच्ची थी । कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब मैंने उस बच्ची से पूछा तो बताया कि उसके पिता का निधन हो गया है,उसके पिता सर्विस में थे । उसकी माँ जम्मू से अपने बच्चों को लेकर कोलकाता आई थी,वह महिला जिस होटल में ठहरी थी, उसके पैसे सारे खत्म हो गए तो होटल मालिक ने माँ को जेल भिजवा दिया, बच्ची को बालिका गृह में भेज दिया और बेटे को बाल गृह में भेज दिया । जब हमें इसकी जानकारी हुई तो हमने वहां के संबंधित अधिकारियों से बात की, कोर्ट में उस महिला की जमानत होने की प्रक्रिया में हम लोग क्यों पीछे रह गए, फिर उसकी जमानत हुई और उसे छोड़ा गया, इस तरह की घटनाएं अंदर तक झकझोर देती है । एक चीज और देखने में आई कि दूसरे राज्य के बच्चों को मछली खाने के लिए प्रेरित किया जाता था । 

अगर जम्मू-कश्मीर,उत्तर प्रदेश या राजस्थान का कोई बच्चा भटककर वहां पहुंच जाता है तो उस तरह का खानपान नहीं ले पाता है । मैं माननीय मंत्री जी से अनुरोध करना चाहता हूं कि बालगृहों में जो बच्चे दूरस्थ राज्यों के हैं,उनकी सही पहचान करके उनको अपने-अपने राज्य में भेजा जाए । उसी बालगृह में दस बच्चे बांग्लादेश के भी थे । अगर बाहर से बच्चे हमारे देश में आ गए हैं तो उनको वापस भेजने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए ।

       अंत में, मैं अपनी वाणी को इन्हीं शब्दों के साथ विराम देता हूं कि माननीय मंत्री जी द्वारा बहुत ही अच्छा बिल लाया गया है । यह बिल स्वागत योग्य है । मैं इसका समर्थन करता हूं । …(व्यवधान)

       सभापति जी, मुझे आखिरी वाक्य कह लेने दीजिए । हमारे देश के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी बच्चों के बारे में क्या सोचते हैं? वह सोचते हैं कि मैं बड़ी ही सावधानी से अपना कदम उठाना चाहता हूं, क्योंकि मेरे पीछे बच्चा आ रहा है और वह बच्चा कहता है कि मैं तेरे जैसा ही बनना चाहता हूं । ठिठुरती ठंड में, तपती धूप में, बरसते बादलों में, बर्फ के बीच,मैं उस बच्चे के भविष्य को बनाना चाहता हूं, जो बच्चा मेरे पीछे आ रहा है । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।

माननीय सभापति : मेरा सभी माननीय सदस्यों से अनुरोध है, अभी 12 वक्ता शेष हैं,शून्य प्रहर भी लेना है और यह बिल भी पास करना है । आप समय का थोड़ा ध्यान रखें और तीन-चार मिनट में बात पूरी करने का प्रयास करें । धन्यवाद ।

…( व्यवधान)

श्री अनुभवमोहंती (केन्द्रपाड़ा):माननीय सभापति जी, मैं अपनी पार्टी से अकेला वक्ता हूं ।यह बहुत जरूरी विषय है और यह मंत्रालय भी बहुतमहत्वपूर्ण है । आप मुझेअधिक समय बोलने की अनुमति दें, तीन मिनट में नहीं हो पाएगा ।

       मैं आपका और सदन का आभारी हूं कि आपनेमुझे किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)संशोधन विधेयक,2021पर बोलने का मौकादिया ।मैं सब वक्ताओं की बात सुन रहा था,बहुत ही अच्छा लगा कि माननीय मंत्री जी, जो एक महिला हैं, जो बच्चों के बारेमें इतने अच्छे से जानती हैं, समझती हैं और उनकेबारे में सोचती हैं,बहुत ही खूबसूरत बिल पेश किया है । I am really obliged, and I congratulate the hon. Minister.

Sir, the amendment intends to empower District Magistrates and Additional District Magistrates to authorise orders of adoption, proposes that appeals on the orders of adoption may be referred to the Divisional Commissioner, and to strengthen Child Welfare Committees by incorporating provisions relating to educational qualifications for the members and for stipulating eligibility conditions for section of the Committee.

Sir, as per the Cabinet decision, in every district the District Magistrate and the Additional District Magistrate will get the power to monitor functions of agencies responsible for the implementation of the Act. The District Child Protection Unit will also function under the District Magistrate.

 

Sir, the Bill makes the District Magistrate the grievance redressal authority for the Child Welfare Committees and anyone connected with the child may file a petition before the official who shall consider and pass appropriate orders. इससे पहले कोर्ट के ऑर्डर का इंतजार किया जाता था,इसलिए तब बहुत लंबा वक्त लग जाता था । जब डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के हाथ में पावर आ जाती है तो हम उम्मीद करते हैं कि बहुत जल्दी समाधान होगा,कोई ऑर्डर निकले चाहे वह एडॉप्शन को लेकर हो या कोई भी इश्यू हो ।

मेरा आपसे अनुरोध है कि इसे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के लिए प्रायोरिटाइज किया जाए ताकि हर केस के एक्सपीडिशियस डिस्पोजल पर ध्यान दिया जाए । It should also reflect on their CCRs.तभी जाकर इस पर और ध्यान देकर इस पर काम करेंगे । मेरी समझ है कि आप इस पर गौर करें ताकि आपका जो नीट और क्लीन उद्देश्य है, वह क्लियर हो जाए ।

On the Child Welfare Committee, the Bill mentions that no person shall be appointed as a member unless they have been actively involved in health, education, or welfare activities pertaining to children for at least seven years, or is a practising professional with a degree in child psychology or psychiatry or law or social work or sociology or human development. इसमें थोड़ी सी डिटेल्ड क्लेरिफिकेशन आनी चाहिए । जैसे हम इसमें लिख रहे हैं, सोशल वर्क या सोशियोलॉजी या ह्यूमेन डेवलपमेंट । इसमें डिटेल्ड क्लेरिटी चाहिए क्योंकि आज की तारीख में कोई भी अपने नाम के नीचे सोशल वर्कर लिख देता है ।

 

कोई भी हो, वह कोई भी काम कर रहा हो,अचानक से किसी को सोशल मीडिया माइलेज लेने का मन करता है, तो केवल सोशल वर्कर या सोशल एक्टिविस्ट लिख देना सही नहीं होगा या पूरा नहीं होगा । We should not have any legal case filed against any person, him or her, who will be involved in this Committee. चाइल्ड वेलफेयर कमेटी में जो भी आएंगे, किसी के खिलाफ कोई भी केस नहीं होना चाहिए । यदि किसी के ऊपर केस हो,तो वह चलेगा,लेकिन, यदि कोर्ट ने उनको एक्यूज्ड प्रूव कर दिया है, तो वह नहीं होना चाहिए ।

There are a few things where this Bill fails to target some key issues in the principal legislation. अगर, आपको लगे कि मैं सही बोल रहा हूं, तो you can please reply. The primary area of examination in the Act is that of the children in conflict with law. The lowering of age from 18 years to 16 years for juveniles committing heinous crimes has been heavily criticized, both by child rights activists as well as by the Parliamentary Standing Committee in its 64th report on the Juvenile Justice Act 2015. This clause has been introduced to act as a deterrent against child offenders. However, the impact and the scientific backing of the move is quite ambiguous.

Earlier, all children below the age of 18 years were treated equally. Now, the Act also permits a juvenile between 16 and 18 years to be tried as an adult for serious offences if caught by investigative agencies after turning 21-year-old. This is a significant departure from the principles of due process as laid out in the infamous case which I do not want to name here. But there have been evidences before this which prove this and which stand correct for these kinds of things. Justice J.S. Verma Committee’s report also found itself against the move of reducing the age for juveniles from 18 years to 16 years in case of heinous crimes. The report cited the Convention of Rights of Child which mandates that life sentence should not be given to those below 18 years of age. The age of 16 to 18 years is a critical one where many sensitive and hormonal changes take place and children require greater protection. Therefore, there is no need to subject juveniles to adult judicial system as it also goes against Articles 14 and 15. Maybe I have failed in understanding, but this is what I have understood from the Bill and I am raising my issues. The hon. Minister can correct me in her reply. The reduction of age should have been overturned in the current Bill.

I would come to the issue of the capacity to commit crime. Another blatant violation of the principle of natural justice is found in section 15 of the Act. This section prescribes the Juvenile Justice Board to conduct an assessment into the capacity of the juvenile to commit a crime. It is essential to understand that the language of this section presumes the child to be guilty from the beginning regardless of whether he or she actually committed the crime or not. This appears to be a case of sentencing before guilt and is against the test of procedural fairness. This provision stands unchanged in the current Bill. बच्चे जब तक प्रूव नहीं हो जाते हैं कि वे गिल्टी हैं, तभी से हम उनके दिमाग में यह डालने की कोशिश करते हैं,हो सकता है,वह गलत हो, तो उनके माइंड में लाइफ लांग स्टिग्मा रह जाता है । अभी थोड़ी देर पहले जब माननीय डॉ.वीरेन्द्र कुमार जी बोल रहे थे, तो उन्होंने बताया कि आजकल के दौर में ज्वाइंट फैमिली का कितना महत्व है । आप इस बिल में, जो अमेंडमेंट लेकर आई हैं, उसकी मैं बहुत सराहना करना चाहूंगा । आपने कहा कि केवल राइट टू चाइल्ड वेलफेयर या जे.जे.बोर्ड को न दिया जाए, and you have also asked for a doctor or a psychiatrist to be involved in that. This is a very welcome step and I really appreciate that.

मैं ज्वाइंट फैमिली के बारे में बता रहा था । Parental alienation is psychological manipulation of children by acts of tutoring and brainwashing a child to reject their other parent and immediate family members like grandparents, cousins, uncles, aunts, and anyone else in a family.

       It is causing psychological harm.  It is the worst form of emotional, social and psychological abuse.  Parental alienation is a child protection issue under Section 75 of the JJ Act. Family courts need to act suo motu.  Shared parenting must be honoured and it should be made mandatory.  It is because having and getting love from both father and mother is every child’s right.  We should not deprive them of this right.

       मैडम, मैं आपको एक छोटी-सी घटना के बारे में बताना चाहूंगा,आपकी नज़र के सामने लाना चाहूंगा । मैं आपसे रिक्वेस्ट करूंगा कि अगर आपसे और आपके मंत्रालय से हो सके, तो इस पर गौर फरमाया जाए । मेरे पास सोशल मीडिया के माध्यम से एक केस आया है । मुझे बताया गया है कि एक बच्चा था, वह इस माह की 22 तारीख को चार साल का हो जाता,लेकिन बदकिस्मती से वह बच्चा अब जीवित नहीं है । पता नहीं,उसको क्या हुआ,कैसे हुआ? यह बिहार के औरंगाबाद जिले का केस है । There is some difference between his parents.  But that is a separate issue.  Let the courts decide.  The child has lost his life. उस बच्चे को किसने मारा है या जो कुछ भी हुआ है, उसकी अभी तक सही तरह से छानबीन नहीं हुई है । कोई इन्वेस्टीगेशन भी नहीं हो पाई है । उस बच्चे का नाम धैर्य है । मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि इस पर फोकस किया जाए । वह व्यक्ति कोई भी हो, भले ही वह उसके पिता पक्ष का हो या उसके माता पक्ष का हो या कोई और भी हो,इसके लिए जो कोई भी दोषी है,उसको दंड मिलना चाहिए । It is a sincere request to you through the hon. Chairperson.  मैं बस इतना ही कहूंगा ।  I once again appreciate this Bill.  Thank you so much, Sir.  Vande Mataram.                                  

SHRI E.T. MOHAMMED BASHEER (PONNANI): Sir, thank you very much for allowing me to make my observations on this very important Bill, that is the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021.

       Sir, there are positive and negative sides in this Bill.  Coming to the positive side first, in the parent Act also, there was criteria for appointment of members to Child Welfare Committee.  In this amendment Bill, you have added additional criteria for the appointment of CWC members. That is very good.  Let us have a very good Committee, a Committee of qualified hands, dedicated persons, dignified persons, and things like that.  We must have such competent persons in a Committee like this.

       Coming to my second point, in the parent Act, there was no provision for appeal on the order made by the Child Welfare Committee finding that a person is not a child in need for care and protection. This Bill removes this provision. This paves way for ensuring justice.  That also is a positive kind of approach the Government has taken.

       Similarly, I now come to the negative points.  Till now, district courts were empowered to give adoption. Now, this Act takes away the power from the district courts in the matter of adoption and entrusts it with the District Magistrate.  I strongly object to it.  That is not fair.  Some of my friends were saying that a District Magistrate is overloaded and he cannot take this power.  That is not my reason.  A judicial decision has its own significance.  But if we take away the judicial power and handover that to the District Magistrate, I respectfully differ with your views on this. 

       Similarly, in this Bill, clauses 17, 18, 19, 20, 21, 22, 23 and 24 are taking away the powers of the district courts and empowering the District Magistrate regarding similar issues.  Those clauses may be deleted.

       That is the negative point of the Bill, which I wanted to stress.  Why I am saying it as the negative point is, because I believe that judiciary is the best independent functioning authority rather than the executive.

       In sub-clause 6 of Clause 2, the words used are, “who does not have parents”.  I wish it to read as, “who does not have parents or other relations”.  So, this may be added.

       I would like to say one more thing.  We work meticulously while making legislation. We analyse and discuss the issue threadbare and then make a legislation.  Even though we make very good landmark legislation like the Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, what is the ground reality?  We are proud enough to say that we have made such legislation but when it comes to the implementation part, I would like to say that it is done in a dead slow manner.  While travelling on Indian roads you could see children of school going age carrying heavy weights and things like that.  People misuse them for works like car washing.  All kind of exploitation is taking place.  When we are making a law like this, I would like to remind the hon. Minister and the Government, that we are not making a law just for the sake of law. It has to be implemented also. The Government should keep this in mind. I hope the Government will realise it. With these words, I conclude.

       Thank you, Sir.

                                                                          

श्री हनुमान बेनीवाल  (नागौर):सभापति महोदय, मैं आपको सर्वप्रथम धन्यवाद देना चाहूंगा कि आपनेमुझे सदन में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)संशोधन विधेयक, 2021पर बोलने का अवसरदिया ।मेरे पूर्व भी पक्षऔर विपक्ष के कई विद्वान सांसदों ने अपनीबात इस बिल पर रखी है । मैं माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि इन्होंने देश के बच्चों के प्रति बहुत बड़ी चिंता जताई है । जैसा की इस विधेयक के बारेमे बताया गया है कि इसका उद्देश्य प्रत्येक जिले में बच्चों की बेहतर तरीके से रक्षा करना है । किशोर न्याय अधिनियम भारत के संविधान के अनुसरण मे बनाया गया है,जो बालको के लिए समान अधिकारों का अधिदेश करताहै और राष्ट्र को अन्यबातों के साथ बालको के संरक्षण के लिए उपयुक्त उपाय करने के निर्देश भी देताहै । यह बात आपने विधेयक के उद्देश्यों और कारणों में भी कही है ।

सभापति महोदय,आपने विधेयक मे बताया है कि यह बिल जिला मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को और अधिक सशक्त करेगा,साथ ही जिला स्तर पर बाल संरक्षण की प्रकिया सुचारू हो जाएगी, जिसकी बहुत समय से आवश्यकता थी । मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदया से यह जानना चाहूँगा कि जिलास्तर पर जो बाल कल्याण समिति होती है,वह एक न्यायपीठ की तरह काम करती है और ऐसे में किसी बालक या बालिका को दस्तयाब करना होता है तो क्या बाल कल्याण समिति पुलिस को निर्देश दे सकतीहै या नहीं दे सकतीहै, क्योंकि पहले दे सकतीथी । अभी मार्च माह में मेरे संसदीय क्षेत्र नागौर में कार्यरत एक महिला पुलिस अधीक्षक ने सार्वजनिक रूप से प्रेस के सामने यह कहा था कि बाल कल्याण समिति पुलिस को निर्देश नही दे सकतीहै । एक तरह से यह बाल कल्याण समिति की अवमानना है । ऐसे मामलों में आपको संज्ञान लेने की आवश्यकता है । ऐसे में पुलिस और इस संस्था मे टकराव आता है । कहीं न कहींहम जिस उद्देश्य से कानून लातेहैं, उस पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । कानून के रक्षक इस प्रकार की समितियों को लेकरसार्वजनिक तौर पर टिप्पणी करेंगे तो यह संस्थाएं मजबूत कैसे होंगी । इस विधेयक के माध्यम से गोद लेने की प्रक्रिया को जिलास्तर पर ही पूराकरने का उद्देश्य बताया है,जो अच्छा कदम है,क्योंकि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 56 की उपधारा (1) यहउपबंध करती है कि उक्त अधिनियम और उसकेअधीन बनाए गए नियमों तथा विनियमों के उपबंधो के अनुसार अनाथ,परित्यक्त आदि बालको के लिए कुटुम्ब के अधिकार को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दत्तक ग्रहण का उपाय अंगीकृत किया गया है । उक्त अधिनियम की धारा 63 यह उपबंध करती है कि दत्तक ग्रहण के सम्बन्ध में न्यायालय द्वारा किया गया दत्तक ग्रहण आदेश ही अंतिम मानाजाता है,परन्तु न्यायालय मे ऐसे मामलो को निपटाने में लंबा समय लग जाताहै । इसलिए आप जिलामजिस्ट्रेट स्तर पर ही इस प्रक्रिया को पूराकरने का प्रस्ताव इस विधेयक के माध्यम से लाए हैं ।

यह अच्छी बात है । यह अधिनियम किशारों पर व्यस्कों की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति देता है, यह एक बहुत बड़ी आवश्यकता थी । आज बड़े गंभीर अपराध करके लोग केवल इसलिए छूट जाते हैं कि उनकी आयु 17 साल 11 महीने और 29 दिन होती है । अगर कोई अपराधी 18 साल से कम आयु का हो तो उसे तीन साल से ज्यादा की सजा नहीं हो सकती है । राजस्थान के अंदर और देश के अंदर कई ऐसे अपराध हुए । ऐसे कई बड़े गिरोह हैं, जो सोची-समझी चाल के तहत क्राइम कराने के लिए बच्चों का दुरुपयोग करते हैं । आपने जो जघन्य अपराधों के मामले में सजा के लिए 16 साल तक की आयु को शामिल किया है, वह स्वागत योग्य कदम है और बड़े अर्से से इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही थी । आज जब देश के अंदर छोटी बालिकाओं के साथ रेप की घटनाएं बढ़ीं तो निश्चित रूप से देश की सरकार ने इसकी चिन्ता की और यह बहुत ही आवश्यक था कि आपने इस आयु को घटाकर 16 वर्ष किया । बाल अपराध की दर दिन-प्रतिदिन बढ़ने और ऐसे अपराधों की प्रकृति भी जटिल होने की वजह से, आज के बिल का विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि देश में बाल अपराधों, बच्चों के साथ घटित होने वाले अमानवीय कृत्यों और यौन शोषण के बढ़ते मामलों पर भी सदन में चिंतन करने का अवसर मिला । वर्ष 2019 तक एनसीआरबी ने शोषण, यौन शोषण और बच्चों के खिलाफ अपराधों के जो आंकड़े जारी किए थे, वे चिन्ताजनक हैं । वर्ष  2017 में इस श्रेणी के 1 लाख29 हजार 32 मामले दर्ज हुए । वर्ष 2018 में यह आंकड़ा 1 लाख 41 हजार764 हो गया और वर्ष 2019 की सूची में यह आंकड़ा बढ़कर 1 लाख 48 हजार185 हो गया । इसी प्रकार मेरे राजस्थान में वर्ष 2017 में 5,180 मामले दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2019 में बढ़कर 7,385 हो गए ।…(व्यवधान) सभापति जी, मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा ।

       सभापति जी, मंत्री महोदया ने चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट का जिक्र किया, आपने जिस बात की चिंता व्यक्त की, मैं उसी पर आपका पुन: ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं कि जो सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाएं हैं, सरकार से या अन्य माध्यमों से बच्चों के संरक्षण के लिए बजट तो जुटा लेती हैं, मगर उसको सही रूप में खर्च नहीं करती हैं । कहीं पर खाना सही नहीं है तो कहीं पर अन्य प्रकार की अव्यवस्था पाई जाती है । इसको लेकर आप क्या करेंगे? …(व्यवधान)

माननीय सभापति : कभी-कभी तीन मिनट में भी अपनी बात पूरी करनी चाहिए ।

श्री हनुमान बेनीवाल : सर, फिर सारी बातें नहीं आ पाएंगी ।

       इन अव्यवस्थाओं को लेकर आप क्या करेंगे, इस बारे में जरूर बताएं? मैं माननीय मंत्री जी का ध्यान एक गंभीर मुद्दे की तरफ दिलाना चाहूंगा कि देश में बच्चों की गुमशुदगी के बढ़ते मामले और गुमशुदगी का मामला दर्ज होने के बाद उन्हें ढूंढने में जो ढिलाई बरती जाती है, वह चिन्ताजनक है । बाल तस्करी के बढ़ते मामले भी चिन्ताजनक है । मेरा सुझाव है कि बाल भिक्षावृत्ति को रोकने पर भी सदन को गंभीर रूप से विचार करने की जरूरत है । …(व्यवधान)

माननीय सभापति : मेरे ख्याल से सभी विषय आ गए हैं ।

श्री हनुमान बेनीवाल : सर, कई स्थानों पर संगठित ‍गिरोह गरीब, असहाय बच्चों व तस्करी करके लाए गए बच्चों से भीख मंगवाते हैं । ऐसी जानकारी स्थानीय प्रशासन के पास होने के बावजूद कोई कठोर कार्रवाई नहीं होती है । …(व्यवधान)

माननीय सभापति : अब आप समाप्त कीजिए ।

प्रो. रीता बहुगुणा जोशी  ।

श्री हनुमान बेनीवाल : सभापति महोदय, मैं आधे मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा ।

       महोदय, ऐसी जानकारी स्थानीय प्रशासन के पास होने के बावजूद कोई कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होती है, इसलिए बच्चों के संरक्षण के लिए हमें इस मुद्दे पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए । मैं न्यायपालिका के निर्णय को चुनौती नहीं दे रहा हूं, मगर जनवरी, 2021में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक जजमेंट दिया है । उस जजमेंट में माननीय उच्च न्यायालय के जो शब्द सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए, उनकी तरफ मैं इस सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि कोर्ट ने कहा कि किसी घटना को यौन हमले की श्रेणी में तभी स्वीकार किया जाएगा, जब स्किन टू स्‍किन सम्पर्क हुआ हो । अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाओं में केवल जबरन छूना ही यौन हमला नहीं माना जाएगा । ऐसे जज को हटाया जरूर गया है, लेकिन हाई कोर्ट के ऐसे जज को बर्खास्त किया जाना चाहिए । यह मेरी सरकार से मांग है । सभापति महोदय, मैं आधे मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा । …(व्यवधान)

माननीय सभापति: प्लीज, आप बैठिए ।

              प्रो. रीता बहुगुणा जोशी  ।

प्रो. रीता बहुगुणा जोशी (इलाहाबाद): मान्यवर, मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करती हूं कि आपने मुझे किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021 पर बोलने का अवसर दिया है । मैं इस संशोधन विधेयक के पक्ष में अपने कुछ विचार प्रस्तुत करूंगी ।

       मान्यवर,बहुत से माननीय सदस्यों ने इस पर अपने विचार व्यक्त किए हैं । सबसे ज्यादा प्रसन्नता की बात यह है कि आलोचना नहीं हुई, सुझाव आए और प्रशंसा आई । इसलिए मैं देश के प्रधानमंत्री जी और महिला एवं बाल कल्याण मंत्री जी को हार्दिक बधाई देना चाहती हूं कि उनके परिश्रम ने वास्तव में इस पूरे सदन को एक करके, बच्चों के पक्ष में खड़े होने के लिए प्रेरित किया है ।

       महोदय,हमारा राष्ट्र सबसे युवा राष्ट्र माना जाता है । अगर हम वर्ष 2011 की जनगणना को देखें,  उसके अनुसार 45 करोड़ लोग या नागरिक 18 साल की आयु से नीचे हैं । यह बहुत बड़ी संख्या है । अगर हम यूनिसेफ के आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट है कि तीन करोड़ से ज्यादा बच्चे इस देश में ऐसे हैं जो अपराध के कारण कहीं न कहीं सुविधाओं से वंचित हैं,अपने घरों से अलग हैं या वे परित्याग कर दिए गए हैं,छोड़ दिए गए हैं,अनाथ हो गए हैं और विभिन्न कारणों से वे अनाथ होकर विभिन्न जगहों पर रह रहे हैं ।

यह जो हमारी इंस्टीट्यूशनेलाइज्ड व्यवस्था है, जो संस्थागत व्यवस्था है,जिसको हम अलग-अलग स्तरों पर बाल संरक्षण गृह के नाम से बुलाते हैं, उसमें अभी तक केवल और कुल साढ़े चार लाख बच्चे ही हैं । ज्यादातर गैर इंस्टीट्यूशनेलाइज्ड में हैं या सड़कों पर हैं या फिर इधर-उधर भटक रहे हैं । इस देश के छह करोड़ से ज्यादा बच्चे बाल श्रम में पाए गए हैं । यह बहुत बड़ा विषय है और इस विषय के समाधान के लिए हमारी सरकार बहुत ही कटिबद्ध है और मेहनत भी बहुत की की जा रही है । अगर हम जेजे एक्ट की बात करें तो आप जेजे एक्ट को देखिए, उसमें वर्ष 1985 से वर्ष 1993, वर्ष 1993 से वर्ष 2000, वर्ष 2006, वर्ष 2015, वर्ष 2016, वर्ष 2017, वर्ष 2018 और अब वर्ष 2021, लगातार इसमें संशोधन किए जा रहे हैं । बहुत से सदस्यों ने कहा है कि संशोधन से क्या होगा?यहां कानून बनते हैं, लेकिन क्रियान्वित नहीं होते हैं ।

मैं कहना चाहती हूं कि अगर कोई भी व्यवस्था कानूनी नहीं होगी तो उसका इंप्लीमेंटेशन कैसे होगा? मैं बधाई देना चाहती हूं कि हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने बच्चों को बराबर का नागरिक अधिकार दिया है । मैं अपनी सरकारों को बधाई देना चाहती हूं,जिन्होंने लगातार जो अंतर्राष्ट्रीय समझौते हुए, उनके साथ स्वयं को संबद्ध किया । संयुक्त राष्ट्र की विश्व की ऐसी कोई संस्था नहीं है, जिससे हम संबद्ध नहीं हुए हैं । इनमें United Nations Convention on the Rights of a Child, United Nations Standard Minimum Rules for the Administration of Juvenile Justice, The Hague Convention है । हमने इनके अलावा, Ratification of the UNCRC in 1992 पर भी हस्ताक्षर किए । हमने सिर्फ हस्ताक्षर ही नहीं किए, बल्कि काम भी किया है ।

मुझे प्रसन्नता है कि हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने सर्वांगीण विकास के लिए राष्ट्रीय बाल नीति की घोषणा की । पहले बच्चे की जान बचाइए, उसकी जान बचाने के बाद,उसका स्वास्थ्य,उसकी शिक्षा,उसका सर्वांगीण विकास, उसका पोषण हर पक्ष का ध्यान रखा जाए । इसीलिए उन्होंने कितनी सारी योजनाएं लागू कीं । उनमें चाहे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ हो,चाहे ‘फिट इण्डिया’ हो,चाहे ‘खेलो इंडिया’ हो,चाहे कौशल विकास की व्यवस्था हो,चाहे हमारी नई शिक्षा नीति हो,उनमें हर एक बच्चे का ध्यान रखकर, उसको फोकल पॉइंट बनाकर योजनाएं बनाई जा रही हैं ।

इसी प्रकार से ‘सबका साथ, सबका विकास’में इन तीन करोड़ बच्चों को कैसे छोड़ देते । मैं प्रधानमंत्री जी को बधाई दूंगी कि उन्होंने इस प्रकार का बिल चर्चा के लिए पेश करवाया है । अभी अपराजिता जी ने कहा था कि एक विद्वान ने कहा था कि put the right person in the bus. इस देश के लोगों ने इस देश की स्टीयरिंग एक अत्यंत योग्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के हाथ में दी है । मैं नरेंद्र मोदी जी को बधाई देती हूं कि उन्होंने अपना कंडक्टर सही चुना है । हमारी स्मृति ईरानी जी वास्तव में बाल कल्याण की बस को बहुत तेजी से ले जा रही हैं । जो हमारे विचार हैं,  जिनको हम प्राप्त करना चाहते हैं, हम उनको प्राप्त करेंगे ।

 महोदय,सभी ने इस बिल के सारे पहलुओं पर बिंदुवार चर्चा की है । यह सत्य है कि जो जेजे एक्ट है, वह दो तरह की चीजों से संबंधित है और उनको एड्रेस करता है । पहला है कि जो कानून का उल्लंघन करके और कहीं न कहीं जेजे एक्ट के अंतर्गत संप्रेक्षण गृह में आए हैं या अदालतों में जिन पर केसेज़ चल रहे हैं । उन्होंने किसी भी तरह के क्राइम्स किए हों,चाहे छोटा क्राइम हो, चाहे जघन्य अपराध हो, चाहे वह गम्भीर अपराध हो, इन सब अपराधों को श्रेणीबद्ध करने की आवश्यकता थी । वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया और उसने यह सुझाव दिया कि इसमें क्या-क्या अपराध आते हैं । इसमें अपराध हैं कि षड्यंत्र में शामिल थे,अपराध में उकसाया या राष्ट्र के विरुद्ध किसी कार्य में भाग लिया अथवा होमीसाइड, हत्या हुई, हत्या करने की उसकी इंटेंशन नहीं थी, लेकिन गलती से हत्या हुई, ये सारे जो इश्यूज हैं,इस तरह के अपराधों को श्रेणीबद्ध किया गया है । इनको श्रेणियों में बांटकर इन अपराधों पर इनको क्या सजा मिलेगी, क्या दंड मिलेगा उसका कैटिगराइजेशन नहीं हुआ था, जो अब किया गया है । मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि अब हम लोगों में क्लेरिटी है कि इन बच्चों का कैसे और क्या होगा? …(व्यवधान) चेयरमैन सर,बोलने के लिए तीन मिनट तो बहुत कम होते हैं । लोग तो 30-30 मिनट बोलते हैं ।

माननीय सभापति  : छ:मिनट हो चुके हैं । आप बोलिए,आपको सावधान किया गया है । आप जल्दी कन्क्लूड कीजिए ।

 

प्रो.रीता बहुगुणाजोशी : कन्क्लूड नहीं बिल्ड कर लीजिए । जब मैं उत्तर प्रदेश में मंत्री थी तो मैंने देखा कि जो कोर्ट में केसेज़ हैं, वे बहुत दिनों तक लंबित रहते हैं । उनमें चाहे जेजे कोर्ट के केसेज़ हों,चाहे अदालतों के केसेज़ हों । जो केसेज दो महीने में निपट जाने चाहिए थे, वे दो साल, चार साल और पांच-पांच साल से लंबित हैं ।      हमने मुख्य न्यायाधीश,इलाहाबाद से संपर्क किया । उन्होंने एक बैठक बुलाई और यह तय हुआ कि जजेज का सेन्सिटाइजेशन किया जाएगा । आप यकीन मानिए कि उन्होंने एक बड़ी कांफ्रेंस बुला कर सभी को सेन्सिटाइज्ड किया कि आप यह जल्दी करें । इसलिए जो लाया गया है, वह आवश्यक था ।

एडॉप्शन जे. जे.एक्ट का महत्वपूर्ण अंग है । आप खुद देखिए कि भारत में बांझपन की क्या स्थिति है । ऐसे कपल्स लगभग साढ़े तीन करोड़ हैं, जो बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन वे बच्चों  को गोद नहीं लेना चाहते हैं,क्योंकि सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि उनके बांझपन पर लोग हसेंगे । जो बच्चों को गोद लेना चाहते हैं, उनको आसानी से बच्चे नहीं मिलते हैं । आप देखिए कि एक वक्त में कभी भी 20 हजार से ज्यादा लोग लाइन में नहीं हैं, उनको भी वह नहीं मिल पाता है । मैं कहती हूं कि इसको सरल बनाया जाए । ‘कारा’आया बहुत अच्छा आया, अब सारा गया, बहुत अच्छा आया, क्योंकि हमारे यहां एडॉप्शन इंस्टीटूशनाइज होना चाहिए और यह बिना संस्थागत नहीं होना चाहिए,यह कानून के दायरे में होना चाहिए । इस कानून को बहुत बड़ा बना दिया गया है । पहले आप ऑनलाइन पंजीकरण कीजिए, उसके बाद आपकी इनक्वायरी होगी, उसके बाद लीगली फ्री माना जाएगा, फिर एडॉप्शन आएगा, मेल-जोल होगा, फिर कोर्ट में जाएगा । दो साल से लेकर सात साल तक, ज्यादातर समय एडॉप्शन में बीत जाता था, लेकिन अब जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी को यह अधिकार दिया जाएगा कि वे एडॉप्शन पर निर्णय ले सकें,तो निश्चित रूप से एडॉप्शन जल्दी होगा । यह चिंता है कि उनको घर का वातावरण, परिवार का वातावरण कैसे मिले, वह वातावरण बच्चों को मिलेगा ।

मैं संप्रेषण घरों के बारे में कहना चाहती हूं । मैं सरकार को एक सुझाव देना चाहती हूं । मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, जिसे मैं शेयर करना चाहती हूं । संप्रेषण घरों में दो तरह के बच्चे होते हैं । एक, जो जे.जे. एक्ट के तहत अपराध से संबंधित बच्चे आते हैं, दूसरी तरह के वे बच्चे हैं, जो अनाथ हैं, खो गए हैं या एबनडन चिल्ड्रेन हैं । इनके लिए एक ही जगह व्यवस्थाएं हो जाती हैं । एक तरह से जेल की स्थिति बना कर एक फ्लोर,दो फ्लोर पर उनको बंद कर दिया जाता है । वे बाहर नहीं निकल सकते हैं, वे खेल नहीं सकते हैं । उनके लिए वहां व्यवस्था होती है, लेकिन जहां 40 बच्चे होने चाहिए, वहां डेढ़-दो सौ बच्चे बंद होते हैं । वहां बड़े बच्चे छोटे बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं । क्या यह किया जा सकता है कि जैसे जेल रिफॉर्म्स में खुले जेल बनाए जाते हैं, क्या संप्रेषण घरों में ऐसे बच्चों को खुले वातावरण में रहने की व्यवस्था दे सकते हैं? हमें इस पर विचार करना चाहिए । मैं यही कहूंगी कि इस एक्ट में अच्छे संशोधन हुए हैं । स्मृति ईरानी जी निश्चित रूप से इसको जमीन पर लाएंगी । कानून बनता है और अब कानून के क्रियान्वयन के लिए जो विधि बनाई गई है, यह वास्तव में बहुत ही प्रशंसनीय है । इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूं । बहुत-बहुत धन्यवाद ।

 

श्रीमती नवनित रवि राणा (अमरावती):सभापति महोदय,  सदन में the Juvenile Justice (Care and protection of children) Amendment Bill, 2021 पर चर्चा हो रही है । अभी मंत्री महोदया,स्मृति ईरानी जी लॉबी से क्रॉस कर रही थीं तो एक महिला को यह बता रही थीं कि इन्होंने जो अमेंडमेंट बिल, 2015 में इंट्रोड्यूस किया था, उसके ऊपर इतने सालों से काम करते-करते, we have not missed a single point in this Bill कि जिससे लोगों को हार्म पहुंचे,और बल्कि इससे लोगों को अब सुविधा मिलेगी । मैं इनको दिल से धन्यवाद करती हूं । ज्यूवेनाइल अमेंडमेंट बिल, 2015 में लाया गया था । बच्चा या कोई भी व्यक्ति जो 16 वर्ष से 18 वर्ष के बीच में है, वह अगर हीनियस क्राइम करता है,उस पर एडल्ट क्राइम का एक्ट ट्रीट किया जाए,यह एक बहुत अच्छा डिसिजन हमारी मंत्री महोदया द्वारा लिया गया है । अगर कोई बच्चा या व्यक्ति 17 साल, 11 महीने, 29 दिन का होता है, तो उसे हीनियस क्राइम करने के बाद भी, एक दिन के एक्सक्यूज के कारण उसे वही सजा मिलती है, जो माइनर को मिलती है और वह तीन सालों में रिहा हो जाता है । आप बिल में यह प्रावधान लायी हैं,  उससे 16 वर्ष से 18 वर्ष के बच्चों ने जो क्राइम किया है, उनको सजा मिलेगी । आज कल आप देखेंगे तो पाएंगे कि 16 साल के किड्स,छात्र बड़े लोगों के साथ डिबेट कर रहे हैं, कि you are wrong and I am right. जब सोलह साल का बच्चा इस पर डिसकशन कर सकता है, डिबेट कर सकता है, तो उसे इस चीज का अनुभव है कि वह जो क्राइम कर रहे है, वह किस होश में कर रहा है और किस तरीके से कर रहे है ।

       उसे उसी तरीके से ट्रीट किया जाना चाहिए, जैसे किसी एडल्ट को ट्रीट किया जाता है और क्राइम की सजा दी जाती है । हमारे पास ऐसा ही एक उदाहरण है, निर्भया केस में जब दिल्ली में गैंपरेप होता है, उसमें शामिल एक व्यक्ति 18 साल से सिर्फ कुछ दिन कम होता है, उसे सिर्फ 3 साल की सजा होती है और वह छूटकर अपने घर चला जाता है । बाकी लोगों को सजा होती है,वह 18 वर्ष की आयु से सिर्फ कुछ दिन छोटा होता है । इसलिए इस बिल में जो नया प्रावधान लाया गया है, उससे पता चलेगा कि आज बच्चों की समझदारी की क्या स्थिति है । हम 25 साल पहले नहीं खड़े हैं । पहले 20 और 25 साल के लोग जितने मैच्योर्ड होते थे, आजकल के बच्चे 16-17 साल में मैच्योर्ड हो जाते हैं । हम टेक्निकली, इंटरनेट, सोशल मीडिया,फेसबुक, इंस्टाग्राम में इतने एक्सपर्ट हो गए हैं कि we know every single thing कि देश में क्या हो रहा है और हम कितने मैच्योर हैं? हम अपने पेरेंट्स को बताते हैं कि you are wrong और हम इस चीज में सही हैं, क्योंकि हम सोशल नेटवर्किंग में आपसे आगे हैं ।

 इसी के दौरान कई चीजें हैं, जैसे आर्टिकल 15, 21, 21A, 23, 24, 39E, 39F के तहत भारत के संविधान में किशोरियों के अधिकारों को अधिकृत और सुनिश्चित करते हैं कि उनकी रक्षा की जाती है, उनकी देखभाल की जाती है और उन्हें हर संभव सहायता प्रदान की जाती है । मुझे लगता है कि श्री लक्ष्मीकांत पांडे जी का एक बड़ा एग्जाम्पल है, जो भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने देखा है कि हर किशोरी को उचित देखभाल और हरसंभव सहायता और स्नेहोचित सभी फैसिलिटी देनी चाहिए, ऐसी उनकी लड़ाई में दिखाई दिया । एक अच्छे परिवार और वातावरण में उन्हें रहना चाहिए । इसे सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है । इन किशोरियों को सरकारों के द्वारा सर्वसंभव देखभाल और सहायता प्रदान की जाए । अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने के लिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन किशोरियों के चेहरों को उन भविष्य के विकास के लिए उपभोक्ता बनाया जाए और वे न्यायतंत्र की शिकार न बने ।

 यह एक रिकॉर्ड की बात है कि इन किशोरियों को कठोर और क्रूर परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, चाहे उनके रहन-सहन की स्थिति हो या उनको मिलने वाली भोजन और शिक्षा की परिस्थिति हो,उन्हें जिन स्थितियों में रहना पड़ रहा है, वह उनकी परवरिश के लिए उचित नहीं है । यह सुनिश्चित करने का एक उच्च तरीका है । उन्हें रहने की स्थिति प्रदान की जाए । ये सुनिश्चित करना है कि वे जल्द से जल्द परिवारों को प्यार से अपनाएं । किशोरियों के न्याय अधिनियम,वातावरण प्रावधान व किशोरियों को तेजी से गोद लिए जाने के लिए सुनिश्चित करने के काम हैं ।

जैसे जिलाधिकारी के स्तर पर गोद लिए जाने की प्रक्रिया को समाप्त करने से गोद लेने की प्रक्रिया में भारी गिरावट आएगी, इससे जिला मैजिस्ट्रेट और अन्य अधिकारी किशोरियों की जरूरतों को समझने और पूर्ण करने की बेहतर स्थिति में होंगे । इससे किशोरियों का पुनर्वास समाज में पुन: करने की उच्च सुविधा करने में वे सक्षम होंगे । बाल कल्याण समिति में ये सुनिश्चित करने के लिए सुधार किए जाएं कि समिति के सदस्य पेशावर हों, जो यह सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा,योग्यता रखते हों कि निर्णय किशोरियों के सर्वहित में हो । माननीय मंत्री जी, मैं आपसे अनुरोध करना चाहती हूं कि जो बच्चे सिग्नल पर भीख मांगते हैं, आप भी क्रॉस करती हैं, हम भी क्रॉस करते हैं, this is not related to this bill, लेकिन आज आप सामने हैं और जो फीलिंग्स हैं, मुझे ऐसा लगता है कि हम जिन बच्चों को भीख मांगते हुए देखते हैं, उनके लिए एजुकेशन के राइट्स आने वाले समय में हम किस तरह ला सकें,हमें उस पर भी ध्यान देना चाहिए ।

 

श्रीमती अन्नपुर्णा देवी (कोडरमा): माननीय सभापति जी, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण बिल पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।

       सबसे पहले मैं आदरणीय प्रधानमंत्री जी के प्रति आभार व्यक्त करती हूं कि जिस तरह से एक अभिभावक अपने पूरे परिवार का ख्याल रखता है, छोटी-छोटी चीजों का भी वे ध्यान रखते हैं, ठीक उसी तरह आदरणीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा देश के हरेक लोगों के लिए ध्यान रखा जाता है । ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’,यह केवल हमारा नारा नहीं है,बल्कि इसे चरितार्थ करने का काम आदरणीय मंत्री जी ने किया । छोटे-से-छोटे मसले पर भी उन्होंने बहुत ही संजीदगी और गम्भीरता के साथ इसे देश में प्रस्तुत करने का काम किया ।

       मैं आदरणीय मंत्री महोदया के प्रति भी आभार व्यक्त करती हूं । मैं समझ रही हूं कि समय की बाध्यता है । आज जो यह संशोधन लाया गया है, इसके लिए मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूं । चूंकि वे भी एक माँ हैं, एक बहन हैं और निश्चित रूप से संवेदनशीलता के साथ, एक माँ के रूप में, एक बहन के रूप में स्त्रियों को जो स्वत: एक गुण मिला हुआ है, उसे दृष्टिगत करते हुए, आज यह विधेयक लाया गया है ।

       इस विधेयक में मुख्य रूप से तीन संशोधन लाए गए हैं । एक तो गोद लेने की जो प्रक्रिया है, हम सब अपने क्षेत्र में और अन्य स्थानों पर भी देखते आए हैं,अभी हाल में हमारे क्षेत्र की ही एक घटना थी कि एक नवजात नदी के किनारे एक दम्पत्ति को पड़ा हुआ मिला । उनका कोई बच्चा नहीं था । उस दम्पत्ति ने डेढ़ महीने तक उस बच्चे को अपने पास रखा । किसी ने इस बात की सूचना दी, चूंकि विधिवत रूप से एडॉप्शन नहीं हुआ था, जिसके कारण उस बच्चे को बाल-गृह में देना पड़ा । आज तीन-चार महीने बीत गए हैं, लेकिन अभी तक उस दम्पत्ति को वह बच्चा नहीं मिला है ।

       चाहे कोई बच्चा अपना हो या पराया हो, जब कोई बच्चा किसी दम्पत्ति को मिल जाता है,तो माँ की ममता जागती है । आप इस बात को महसूस करते होंगे कि उस दम्पत्ति के साथ क्या बीतती होगी । इसलिए यह बहुत ही अच्छा हुआ कि जो प्रक्रिया जटिल थी, उस जटिल प्रक्रिया को खत्म करने का प्रयास इनके द्वारा किया गया है और मुझे लगता है कि अब गोद लेने की प्रक्रिया बिल्कुल सरल होगी । कम समय में जो भी अभिभावक बच्चा गोद लेना चाहते हैं, वे ले सकेंगे ।

       हम सब जानते हैं कि किशोर बच्चों के लिए यह जो संशोधन विधेयक- ज्युवेनाइल जस्टिस एक्ट है,चूंकि हम सभी देख रहे हैं कि निर्भया कांड के बाद से जो स्थितियाँ हो रही हैं, कमोबेश हरेक राज्य में ऐसी स्थिति है, लगातार घटनाएं घटती जा रही हैं और जिसे हम लोग छोटे बच्चे कहते हैं, जैसा कि नवनित राणा जी ने भी कहा कि 16 से 18 साल के बच्चे सही मायने में आज छोटे नहीं रह गए हैं । आज वे सोशल मीडिया के माध्यम से इतने जागरुक हो जाते हैं कि इतने हीनियस क्राइम कर बैठते हैं, जिस तरह से गलत तरह की घटनाएं दिन-प्रतिदिन हो रही हैं, उससे हर कोई हिल जाता है । ऐसी घटनाओं को देखने के बाद लोगों को लगता है कि ये छोटे-छोटे बच्चे जरूर हैं, लेकिन इस तरह की घटनाएं करते हैं, तो इसमें जो सजा का प्रावधान किया गया है कि 16 से 18 साल के बच्चों को सजा दी जाए । इसलिए यह एक बहुत ही अच्छा डिसिजन है । इससे उस तरह की घटनाओं में संलिप्त होने वाले बच्चों को अब इसका भय होगा ।

       इसमें कहीं-न-कहीं एकल परिवार का भी दोष है । इस तरह की जो घटनाएं हैं, जिसे आज बच्चे घटित कर रहे हैं,वह एकल परिवार के कारण भी हो रहा है । अगर बच्चे संयुक्त परिवार में रहते हैं,तो उन्हें चाचा-मामा-ताई के साथ भी बात करने का अवसर मिलता है । ऐसी स्थिति में, बच्चों के अकेले रहने के बाद वे सोशल मीडिया के माध्यम से किसी-न-किसी गलत रास्ते पर चले जाते हैं ।

       मैं अपनी बातें एक-दो सुझावों के साथ समाप्त करना चाहती हूँ । बाल कल्याण समिति में सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता के बारे में माननीय मंत्री जी ने इस एक्ट में प्रावधान किया है, वह बहुत ही अच्छा है ।

       आज हम देखते हैं कि जो बच्चे सम्प्रेषण गृह में होते हैं,चाहे वे क्राइम करने वाले बच्चे हों या जिन बच्चों ने क्राइम नहीं किया है, जो अनाथ हैं, वैसे बच्चे भी वहां रहते हैं । ऐसी स्थिति में एक जगह रहने के बाद उन बच्चों की मनोस्थिति बिगड़ती है । हमें लगता है कि यह बहुत ही आवश्यक है कि मनोचिकित्सक समय-समय पर वहां जाकर बच्चों की काउंसलिंग करें, ताकि बच्चों के मन में क्या चल रहा है,यह जानना भी बहुत ही जरूरी है ।

       इसके साथ ही संवेदनशीलता का विषय भी है । अगर बच्चे संवेदनशील होंगे, तो न ही क्रूरता करेंगे और न ही किसी को क्रूरता करने की इजाजत या छूट देंगे । …(व्यवधान)मैं सिर्फ एक मिनट लेते हुए अपनी बात खत्म करना चाहती हूं । इसके साथ ही मैं अपने यहां के बाल श्रमिकों की बात करना चाहूंगी । बाल श्रमिक चिन्हित होते हैं, बहुत समय तक उन्हें सम्प्रेषण गृह में रखा जाता है और फिर उनके माता-पिता को सौंप दिया जाता है । यह विषय इस बिल से थोड़ा हटकर है,लेकिन मैं आग्रह करना चाहूंगी कि ऐसे बच्चों को अगर हम रखते हैं,तो उनके लिए कौशल विकास – स्किल डेवलपमेंट के लिए हम विचार करें । हम इसे भी प्राथमिकता दें,ताकि उन बच्चों की अच्छे से देखरेख हो सके और वे अच्छे से कोई कार्य कर सकें, ताकि वे बच्चे दोबारा उस रास्ते पर न जाएं ।

 

श्रीमती संगीता आजाद (लालगंज):माननीय सभापति महोदय, धन्यवाद । आपने मुझे The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021 पर बोलने का मौका दिया है । मैं अपनी बहुजन समाज पार्टी की तरफ से माननीय मंत्री महोदया को धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने हमें एक बहुत ही अच्छा बिल दिया है । मैं अपनी पार्टी की तरफ से कुछ सुझाव आपको देना चाहूंगी ।

       आपने हीनियस-क्राइम में एज को 16 वर्ष से 18 वर्ष किया है,लेकिन इसी एज में बच्चों के हार्मोनल डिस्बैलेंस भी होते हैं और जो बच्चे मानसिक रोगों से ग्रसित हैं, जो ऐसे क्राइम्स करते हैं, उनके लिए इस बिल में क्या प्रावधान हैं?मैं माननीय मंत्री जी से इस विषय पर उनके सुझाव जानना चाहूंगी । दूसरी बात यह है कि इस बिल के सेक्शन-26के द्वारा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को सारी जिम्मेदारियां दी गई हैं । देश के प्रत्येक जिले चाइल्ड डेवलपमेंट प्रोटेक्शन ऑफिसर (सीडीपीओ) जैसे पदों पर नियुक्तियां राज्य सरकारों के अधीन होती हैं, जो पीसीएस के द्वारा होती है । इनकी जिम्मेदारी चाइल्ड एंड वूमेन डेवलपमेंट से संबंधित होती है । जब जिले में सीडीपीओ की नियुक्ति बच्चों और महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए ही होती है, तो उन परिस्थितियों में जिले के जिला अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाना उचित नहीं है । यहां पर वह डीएम के अधीन ही रहता है और सारी प्रक्रिया को डीएम को रिपोर्ट भी करता है । इन परिस्थितियों में सीडीपीओ की जिम्मेदारियों की वृद्धि करना ज्यादा सुसंगत होगा ।

       सभापति महोदय,इस बिल में एडॉप्शन का जो प्रावधान है, इसको सरल किया गया है, लेकिन इस प्रोसेस को और भी सरल करते हुए छ: महीने या बल्कि दो महीनों में जल्द से जल्द पूरा किया जाए,ताकि एडॉप्शन की प्रोसेस सिंपल हो सके और इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके । मेरा अनुरोध है कि इस विषय पर जिस कमेटी का प्रावधान किया गया है, इस संदर्भ में मैं निवेदन करना चाहूंगी कि बच्चों के विकास और अधिकार व उनकी प्रकृति के बारे में जितना एक महिला जानेगी,उतना एक पुरुष,ग्रैजुएट्स या जितने पढ़े-लिखे मेंबर्स को आपने इस कमेटी में एड किया है और इसीलिए मैं चाहूंगी कि इस कमेटी में 50 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं को दी जाए ।

       इस कमेटी में जनप्रतिनिधियों को भी सदस्यता दी जाए, जिससे सांसद और विधायकों को भी इस कमेटी में अपनी भागीदारी मिले और वे उस कमेटी को संचालित करने में मदद कर सकें । …(व्यवधान)

माननीय सभापति : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए ।

…( व्यवधान)

श्रीमती संगीता आजाद : सर, मेरा आखिरी पॉइंट है । मैं सरकार का ध्यान बाल सुधार केन्द्रों की तरफ भी ले जाना चाहूंगी,जहां की दशा बहुत ही दयनीय है । वहां खान-पान रख-रखाव आदि की स्थिति बहुत ही दयनीय है । मैं माननीय मंत्री जी से चाहूंगी कि बाल सुधार केन्द्रों में खान-पान और रख-रखाव की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उनके जो उपाय हैं, वे उनको और सुसज्जित करें । मैं इन्हीं चंद पॉइंट्स के साथ माननीय मंत्री महोदया से कहना चाहूंगी कि मेरी पार्टी की तरफ से जो सुझाव दिए गए हैं, वे उन्हें अमेंडमेंट्स के रूप में इस बिल में शामिल करें । धन्यवाद ।

माननीय सभापति:माननीय सदस्यगण,छ: बज गए हैं ।अभी पांच वक्ता और रह गए हैं । माननीय मंत्री महोदया को भी जवाब देना है,जिसकेबाद हमें बिल पास करना है । इसके बाद शून्य-प्रहर भी है । यदि आप सबकीसहमति हो,तो हम सदन का समय साढ़े सात बजे तक के लिए बढ़ाते हैं ।

अनेक माननीयसदस्य:जी, हां ।

माननीय सभापति:डॉ. संघमित्रा मौर्य ।

 

18.00 hrs डॉ.संघमित्रा मौर्य (बदायूं):सभापति जी, आज मुझे एक ऐसे विधेयक पर अपनीबात रखने का मौकामिला है,जिसकीशुरूआत मैं इस लाइन से करनाचाहूंगी – जैसे सूखी डाली के टूटेबिखरे पत्ते होते हैं,ऐसे होते हैं मासूम,अनाथ, मजबूर बच्चे । जो बच्चे भविष्य की धरोहर हैं, लेकिन सामाजिक कमजोरियों और पूर्व की सरकार के ढुलमुल रवैये के चलते हमारी यह धरोहर लगातार पतन के रास्ते आगे बढ़ती जा रही थी,जो हमारे समाज के माथेपर एक कलंक है । कहते हैं कि बच्चे का दर्द एक माँ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता है । आज किशोर न्याय संशोधन विधेयक,2021को लेकर आने वाली मातृ शक्ति महिला एवं बाल कल्याण मंत्री माननीय स्मृति ईरानी जी को मैं इस बिल को लाने के लिए हार्दिक धन्यवाद देते हुए इस देश के यशस्वी प्रधान मंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी,जो मातृ शक्ति को और भविष्य की धरोहर को मजबूत करने के लिए लगातार ऐसे कार्यों को कर के हम सभी को मजबूत करने का काम कर रहे हैं । उनके इस कार्य करनेकी क्षमता को देखकर स्वर्गीय अटल बिहारी जी की एक लाइन याद आती है ‘मैं हमेशा से ही वायदे लेकर नहीं आया,इरादेलेकर आया हूं’और यह वही मजबूत इरादें हैं,जो आज इस देश को आगे बढ़ाने के लिए हर क्षेत्र में लगातार कार्य कर रहे हैं । निश्चित तौर पर किशोर न्याय संशोधन विधेयक,2021 जो 15 मार्च,2021को माननीय मंत्री द्वारा लोक सभा में पेश किया गया है,इस विधेयक का आशय किशोर न्याय संशोधन अधिनियम,2015में बालकों को गोद लेने की प्रक्रिया में संशोधन करना है । किशोर न्याय अधिनियम,2015 के कानून का उल्लंघन करने वाले और देखरेख तथा सुरक्षा की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्राथमिक कानून है । यह संस्थागत और गैर संस्थागत संस्थानों में कमजोर बच्चों के लिए सुरक्षा जाल का काम करता है । यह बच्चों के सर्वोत्तम हित में न्याय और मामलों के निपटान हेतु अनुकूल दृष्टिकोण को स्पष्ट करताहै । इस अधिनियम को 16वीं लोक सभा में भी संशोधित करने का प्रस्ताव किया गया था,जिसमें ‘न्यायालय’शब्द की जगह ‘जिला मैजिस्ट्रेट’या ‘जिला कलेक्ट्रेट’करना था,लेकिनचर्चा न होने की वजह से यह बिल 16वीं लोक सभा के कार्यकाल खत्म होते ही रुक गया था । आज इस बिल को लायागया है । मैं माननीय मंत्री जी को बधाई देना चाहूंगी और बधाईदेते हुए उन बच्चों की पीड़ा को भी बताना चाहूंगी –               “वाह रे ऊपर वाले,तूने भी क्या कमाल किया               किसी को सब कुछ दिया और               मेरे हिस्से से माँ-बाप को ही छीन लिया               क्या सच में आसमां से टपकाया है हमें               जो हमसे जीने का सहारा ही छीन लिया ।”      मैं कहना चाहती हूं कि माननीय मंत्री जी धन्य हैं, जो ऐसे बच्चों को समय पर सहारा देने के लिए, उनके पालन-पोषण के लिए कार्य कर रही हैं और इतना अच्छा बिल लेकर आई हैं । जहां चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को पता ही नहीं होता था कि उनके अंडर में क्या आता है, जिसकी चर्चा माननीय मंत्री जी ने इलाहाबाद की चार साल की बच्ची को लेकर की थी,जिसके साथ जघन्य अपराध हुआ था । चाहे इलाहाबाद हो, भागलपुर हो या तमाम ऐसी जगहें हैं, जहां हादसे हुए हैं और उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पाता था और आज उन्हें न्याय दिलाने के लिए माननीय मंत्री जी जो कदम उठा रही हैं और जिला स्तर पर उन्हें सशक्त करके न्याय दिलाने का काम कर रही हैं,निश्चित तौर पर यह काम सराहनीय है । गलती किसी से भी हो सकती है चाहे वह अमीर का बच्चा हो या गरीब का । इस बिल में सभी को एक समान रखा गया है । यह हमारी सरकार की पहचान है कि चाहे कोई अमीर हो या गरीब हो, माननीय प्रधान मंत्री जी तो अंतिम पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति को लेकर चलने वाले हैं, इसलिए इस बिल में निश्चित तौर पर इस चीज को ध्यान में रखा गया है । यह विधेयक स्वागत योग्य है । यदि हम इतिहास में भी जाना चाहें तो कबीरदास जी एक जीता जागता उदाहरण हैं । जिस तरह से बच्चों का पालन-पोषण और संरक्षण होगा,निश्चित तौर पर आने वाले समय में हमें संत कबीरदास मिल सकते हैं,स्वामी परमहंस मिल सकते हैं,प्रधान मंत्री मिल सकते हैं और तमाम ऊंचे-ऊंचे पदों पर विराजमान हो सकते हैं । ‘जिला न्यायालय’की जगह ‘जिला मैजिस्ट्रेट’  लाया जा रहा है, निश्चित तौर पर यह भी सराहनीय है, क्योंकि उन्हें प्रशासनिक कार्य करने का बहुत अच्छा अनुभव होता है और वे सामाजिक कार्यों को भी करने में सक्षम होंगे और साथ ही साथ अभी तक जो 900 केसेज पेंडिंग पड़े हुए हैं, इस तरह के केसेज पेंडिंग नहीं होंगे और समय पर न्याय मिल सकेगा ।

मुझे लगता है कि बाल अपराध मुख्यत: दो कारणों से होता है । या तो यह पर्सनल फैक्टर होता है या सिचुएशनल फैक्टर होता है । दोनों ही फैक्टर्स में शिक्षा महत्वपूर्ण होती है । हम कानून बना रहे हैं और हमारी सरकार लगातार शिक्षा पर जोर दे रही है और आवश्यक कार्य भी कर रही है, लेकिन हमें पैरेंट्स को भी इस चीज के लिए जागरूक करना होगा, ताकि वे शिक्षित हों । मैं माननीय मंत्री जी से एक अनुरोध करना चाहती हूं । वह महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं, इसलिए मैं उनसे कहना चाहती हूं कि आज संस्कृति,सभ्यता बदलती जा रही है । जहां परिवार के लोग बच्चियों को सुरक्षित रखने का काम करते थे …(व्यवधान)

माननीय सभापति :कृपया आप अपनी बात जल्दी समाप्त करें ।

डॉ.संघमित्रा मौर्य : आज हम लोग आपसी द्वेष के कारणबच्चियों को थाने-चौकियों में लाकर खड़ा करते हैं । उन बच्चियों ने कोई भी अपराध नहीं किया होता है,फिर भी उन पर लांछन लगाकर उनके मनोबल को तोड़ने काम किया जाता है । अत:मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से चाहूंगी कि इस पर विचार कर एक ऐसा विधेयक बनाया जाए,ताकि हमारी बच्चियों के ऊपर गलत लांछन न लगाया जा सके । धन्यवाद ।

माननीय सभापति: श्री संगम लाल गुप्ता जी, कृपया समय का ध्यान रखिएगा ।

 

श्री संगमलाल गुप्ता (प्रतापगढ़):धन्यवाद सभापति महोदय जी, आपने मुझे आज किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)संशोधन विधेयक 2021 पर बोलने का अवसर प्रदान किया । मैं एक शेर के साथ अपनी बात की शुरुआत करता हूँ-

“मंजिल पर न पहुंचे उसे रास्ता नहीं कहते, दो चार कदम चलने को चलना नहीं कहते, फूल से मासूम बच्चे जवां हो जाएंगे, मिट भी जाएंगे तो हम एक दास्तां हो जाएंगे ।” माननीय सभापति जी, सर्वप्रथम मैं संशोधन विधेयक को सदन में लाने के लिए माननीय  बाल विकास मंत्री, भारत सरकार एवं माननीय प्रधानमंत्री जी को धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूं । पूरी दुनिया जब सुधारों के दौर से गुजर रही है, ऐसे में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बालकों के अधिकार संरक्षण में अब तक बनाए गए कानूनों में कहीं न कहीं कमियां दिखाई दे रही थीं,जिसे दूर किया जाना नितांत आवश्यक था  । पूरे देश में कानून के जानकारों,सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं,सामाजिक सरोकार रखने वाले व्यक्तियों द्वारा बराबर इस बात की मांग की जा रही थी कि बालकों के अधिकार संरक्षण में जो वर्तमान कानून प्रचलित है, उसमें कहीं न कहीं संशोधन की आवश्यकता थी,इसलिए आज सदन में जो संशोधन माननीय मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत किया गया है, वह एक सराहनीय कदम है जिसकी मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूं ।

 

माननीय सभापति जी, विधेयक को पुनः स्थापित करते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री जी द्वारा नए प्रावधान में प्रत्येक जिले में बेहतर तरीके से बालकों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को जो शक्तियां प्रदान की जा रही हैं, वह निश्चित रूप से एक व्यावहारिक प्रावधान है,क्योंकि अब तक जो कानूनी रूप से दत्तक ग्रहण प्रक्रिया थी वह कहीं न कहीं जटिल होने के कारण बालकों को समय से न्याय दिलाये जाने में कठिनाइयों का कारण बन रही थी । अब अपर जिला मजिस्ट्रेट और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इन मामलों की सुनवाई की जाएगी,तो निश्चित रूप से निर्धारित समयावधि में जो सरकार और जन मानस की मंशा है, उसके अनुरूप हम बालकों को न्याय दिलाने में सक्षम न्यायिक प्रणाली देने में कामयाब होंगे ।

माननीय सभापति जी, निश्चित रूप से माननीय मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत संशोधनों में अधिनियम का जो मूलभूत उद्देश्य है, बालकों से संबंधित विभिन्न मुद्दों, जिसमें प्रमुख रुप से दत्तक ग्रहण भी है, के लिए जिला प्रशासन की समन्वित और प्रभावी प्रतिक्रिया का जो प्रावधान वर्तमान में किया जा रहा है, उससे हम बालकों को निश्चित रूप से सस्ता सुलभ और त्वरित न्याय दिलाने में कामयाब होंगे ।

 माननीय सभापति जी, हम लोग जनता के बीच में काम करते हैं और इस न्यायिक प्रणाली में मुझे स्वयं इस बात का कई बार आभास हुआ कि चाहते हुए भी हम समय से बालकों को न्याय नहीं दिला पा रहे है । मेरे अपने लोकसभा क्षेत्र, जनपद-प्रतापगढ़ में एक लावारिस नवजात शिशु मिला । उसका पालन पोषण कुछ दिनों तक एक परिवार ने किया और उसके पश्चात उसे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वापस ले लिया गया । उस परिवार के लोग मेरे सामने आए । नवजात शिशु की जो दशा मैंने देखी तो मैं बहुत आहत हुआ, लेकिन जो जटिल प्रक्रिया थी, उसके आगे मैं भी विवश था और चाह कर भी समय से मैं उस परिवार को या उस बालक को न्याय नहीं दिला सका  । ममता की भावनाओं से ओतप्रोत जो किसी बच्चे की सेवा करना चाहता था उसे अपने परिवार के रूप में पालना चाहता था, लेकिन कानूनी रूप से विवश होने के कारण उसे समय से न्याय नहीं मिल सका और दुर्भाग्य की बात है कि बाल संरक्षण केंद्र चलाने वाली एक सोसाइटी में उस बालक को रखा गया, जहां उसने ममता के अभाव में दम तोड़ दिया । अत: मैं आज हृदय की अंतरिम गहराइयों से माननीय मंत्री जी, प्रधानमंत्री जी और हमारी सरकार के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता हूं ।

       महोदय, दत्तक ग्रहण में होने वाले विलंब के मुद्दों का समाधान करने के लिए अपर जिलाधिकारी, जिलाधिकारी को दत्तक ग्रहण के आदेश को प्राधिकृत करने की शक्तियाँ प्रदान करना और यह प्रस्ताव करना कि दत्तक ग्रहण के आदेश संबंधी अपील आयुक्त को की जा सकेगी । उसके साथ ही साथ बाल कल्याण समितियों को और प्रभावी बनाए जाने के लिए जो प्रस्ताव इस वर्तमान संशोधन अधिनियम में किया गया है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है । मैं सर्वसम्मति से इस सुधार अधिनियम को लोक सभा से पारित किए जाने की माँग करता हूँ । बहुत-बहुत धन्यवाद ।

 

DR. BHARATI PRAVIN PAWAR (DINDORI): Sir, I sincerely appreciate the opportunity that you have given me to speak on this Bill.

The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act has been in existence since 2015. My Government has now proposed amendment to this Act in order to smoothen out and facilitate certain issues that needed to be addressed.

I want to thank our hon. Prime Minister Modi Ji that under his guidance, the hon. Minister, Smriti Ji has always been working sincerely for the welfare of the children and their protection. This Bill is empowering the District Magistrates, including the Additional District Magistrates to coordinate and implement the functioning of all the agencies involved with the Juvenile Justice Act. They will also be able to authorise order of adoption which will greatly reduce the duration of the adoption process and streamline it. It will also strengthen the Child Welfare Committee by stipulating the eligibility criteria, especially the educational qualifications required for the Members of the Committee under section 27, sub-section 4(iv)(a).

It will help in categorising the offences in relation to the quantum of sentences of imprisonment in case of serious offences. It will also help in removing the difficulties faced in the interpretation of the Juvenile Justice Act.

Hon. Chairperson, Sir, our children are our future and hence, it is our responsibility, to not just nurture them but to protect them from the societal evils as well as from the opportunistic predators.

सर, यह बिल मानवता की दृष्टि से एक संकल्प करता है कि हम बच्चों के संरक्षण की दृष्टि से प्रतिबद्ध हैं । I offer my sincere thanks and gratitude for giving me this opportunity and, give my support to this Bill. Thank you.

                   

श्रीमती जसकौरमीना (दौसा):महोदय, आपने मुझे किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)संशोधन विधेयक पर दो शब्द कहने का मौकादिया है,इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।

       जिस तरह से बिल की प्रस्तावना में माननीय मंत्री जी ने बहुत विस्तार से और बड़ी भावनाओं से अपनीअभिव्यक्ति दी थी, मैं सोचती हूँ कि उसकेबाद बहुत सुझाव बाकी नहीं रहते हैं,लेकिनफिर भी मन के अंदर एक भावना है और उस भावना से मैं स्वयं आहत हूँ,क्योंकि मैं इस बिल की ब्रीफिंग में भी मौजूद थी । उस समय यह बात आई थी कि जो 16 वर्ष की उम्रके हमारे बेटे और बेटियाँ हैं,उनके अंदर किस तरह से हम अपराधों का बाइफरकेशन करें,श्रमिक का बाइफरकेशन करें और किस तरह से हम उनको अपराधों से बाहरनिकालें,कैसे उन्हें संस्कारी जीवन में लाएं,यह सब हम कैसेकर सकते हैं?

महोदय,सबसे पहले तो मैं आपके माध्यम से मंत्री जी के सामने एक ही बात रखना चाहूँगी कि बाल श्रमिक की भी परिभाषा हो । आज गाँवों के 80प्रतिशत लोग, जहाँ खेती है,जहाँ खलिहानी हैं,छोटे-छोटे धंधे हैं,पशुपालन है, बालक,बालिकाओं की देखरेख,छोटे बहन-भाइयों की देखरेख है, उसमें भी हमारे किशोर उम्रके बालक,बालिकाएं काम कर रहे हैं । मैं सोचती हूँ कि आत्मनिर्भर भारत का सपनाभी, जो हमारा परम्परागत श्रमिक है,जो हमारे परम्परागत घरेलू काम हैं,उन कामों से बालकको हम दूर न करें, उस बालक का समुचित विकास करतेहुए, उसे शिक्षा देते हुए,उसकी गुणवत्ता और उसकीक्वालिटी को इम्प्रूव करते हुए,इन सारे कामों के साथ उसे जोड़ते हुए हम इन बाल श्रमिकों के,इस बालक के श्रमिक की व्याख्या करें । साथ ही मैं यह भी कहूँकि यदि हम अपनेदेश के समाज को चार भागों में बाँटते हैं तो उनमें एक उच्च वर्ग है,एक मध्यम वर्ग है,एक निम्न वर्ग है और एक मजदूर वर्ग है ।

यदि हम इन चारों वर्गों को देखते हैं तो सबसे ज्यादा अपराध मैं सोचती हूं कि निम्न वर्ग और निराश्रित वर्ग में होते हैं । निराश्रित में भीख मांगने वाले हैं । आज दिल्ली के अंदर हर चौराहे के ऊपर बालक भीख मांग रहे हैं, लेकिन हम उनका कोई इलाज नहीं कर सके । ठीक इसी प्रकार खेतों में काम करने वाला किसान है, मैं खुद आपको बताना चाहती हूं कि मैंने छह वर्ष की उम्र से खेती के काम किए, पशुपालन का काम किया,लेकिन उस परम्परागत काम को सीखते हुए शिक्षा प्राप्त करके मैं आगे बढ़ गई । उसी का परिणाम है कि एक सम्पूर्ण जीवन मैं अपने आपका मानती हूं । ठीक उसी प्रकार मैं आपको कहना चाहूंगी कि निर्भया कांड में इतने वर्ष लगे और तब लगे, जब उसकी मां और पिताजी ने इतना संघर्ष किया । उस समय न कानून ने, न समाज ने, न सरकार ने उनको लाभ देने का कोई भी प्रयास किया । हमारे वकील जिस तरह के कानून की पेचीदगियों में गुजरते हुए वर्षों तक न्याय नहीं दिला सकते,उसके लिए मैं सोचती हूं कि राजनीतिक प्रभाव भी कहीं न कहीं उसमें बाधक होता है । अपराधी को बचाने के लिए जब राजनीतिक प्रभाव आ जाता है, उस समय ऐसे कठोर कानून बनाने बहुत जरूरी हैं । मैं यह भी कहना चाहूंगी कि बाल आश्रय देने वाली संस्थाओं के प्रति भी सतर्क होना पड़ेगा । उनके लिए भी कठोर से कठोर कर्त्तव्य निर्धारित करने पड़ेंगे । आज जो भी आता है, वह समाज सेवी बनकर,समाज सेवा के नाम से बहुत सारे प्रोजेक्ट्स ले लेता है । उन प्रोजेक्ट्स के माध्यम से जिस तरह का शोषण उन बालक-बालिकाओं के साथ होता है,वह बहुत गम्भीर है । बेटियों के प्रति सोच को बदलना पड़ेगा । बेटियों के प्रति सोच को बदलने के लिए मैं एक ही बात कहूंगी कि आज हर समाज,हर परिवार बेटी के लिए कहते हैं कि-

खुशबू है यह बाप की, माँ की है पहचान, जिस घर में बिटिया नहीं,वह घर है सुनसान ।

जब हम इतना बड़ा मानते हैं तो हम क्यों नहीं सोचते हैं कि बेटियों का सामाजिक, भावनात्मक,मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए हम उनको सुरक्षित करें । सुरक्षित करने के लिए जो आश्रय दिए जाते हैं, आज हम सोच रहे हैं कि डीएम कमेटी का मैम्बर होगा और वह बाल सुरक्षा में पूरी-पूरी मदद करेगा,लेकिन डीएम के पास बहुत काम है । दूसरी बात यह है कि एडीएम को आपने लिया है,लेकिन दोनों ही जगहों पर यदि पुरुष भाई हैं,तो मैं सोचती हूं कि उनमें से किसी न किसी जगह पर एक महिला प्रशासक को जरूर लेना चाहिए ।

दूसरी बात यह भी है कि आप एनजीओ को भी उसके साथ जो‍ड़िए, क्योंकि आज 90 प्रतिशत एनजीओ इस तरह के कामों में लगे हुए हैं । लेकिन उनके कान भी बंद है और आंख भी बंद है । उस स्थिति में हमको यह सोचना होगा कि हम किस तरह से यह काम करें ।

महोदय, मैं एक बात कहूंगी कि घरों के अंदर सेवक हैं और दोनों पति-पत्नी कामकाजी हैं । वह घर से बाहर चले जाते हैं,ऐसी स्थिति में आप यह देखिए कि सेवक शठ नृप कृपन कुनारी, हमारे जो न्याय करने वाला राजा है,वह भी कृपण है । कपटी मित्र सूल सम चारी । यदि हम इन चारों पर ध्यान देते हुए पारिवारिक संरचना में इनकी भूमिका को तय करे,तो निश्चित है कि हमारे किशोर बालक-बालिकाओं को न्याय मिलेगा । धन्यवाद ।

     

कुंवर दानिशअली (अमरोहा): महोदय,मैं इस बिल के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं । यह बहुत अच्छा बिल है । हम इस सदन में जो कानून बनाते हैं, बिल बनाते हैं, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी को कहना चाहता हूं कि खास तौर से बच्चों से जुड़े हुए जितने कानून हैं, उनका इम्प्लिमेंटेशन धरातल पर नहीं हो पा रहा है । जब यह सरकार आई तो दो करोड़ रोजगार देने की बात की थी और उसी से जुड़ा हुआ है कि अगर वह रोजगार मिले,तो जाहिर सी बात है कि जो बेरोजगारों के बच्चे भीख मांगने के लिए सड़क पर निकलते हैं, उसमें भी कमी आती । मेरा आपके माध्यम से सिर्फ यही कहना है कि इसके इम्प्लिमेंटेशन पर ज्यादा ध्यान दिया जाए । माननीय मंत्री जी आप मुख्य मंत्रियों को,स्टेट के मिनिस्टर्स को लिखिए ।…(व्यवधान)

کنور دانش علی (امروہہ): محترمچیرمین صاحب، میں اس بِل کی تائید میں بولنے کے لئے کھڑا ہوا ہوں۔ یہ بہت اچھا بِل ہے۔ ہم اس ایوان میں جو قانون بناتے ہیں، بِل بناتے ہیں، میں آپ کے ذریعہ سے منتری جی سے کہنا چاہتا ہوں کہ خاص طور سے بچوں سے جُڑے ہوئے جتنے بھی قانون ہیں ان کو زمینی طور پر عملی جامہ نہیں پہنایا جا رہا ہے۔ جب یہ سرکار آئی تھی تو 2 کروڑ روزگار دینے کی بات کہی تھی اور اُسی سے جُڑا ہوا ہے کہ اگر وہ روزگار ملے، تو ظاہر سی بات ہے جو جو بےروزگاروں کے بچے بھیک مانگنے کے لئے سڑک پر نکلتے ہیں، اس میں بھی کمی آتی۔ میرا آپ کے ذریعہ صرف یہی کہنا ہے کہ اس کے اِمپلیمینٹیشن پر زیادہ دھیان دیا جائے۔ معزّز منتری جی آپ تمام وزیرِ اعلیٰ کو ریاستوں کے منسٹرس کو لکھئیے۔۔ (مداخلت)۔۔۔۔ डॉ.सत्यपाल सिंह (बागपत): महोदय,आपका बहुत-बहुत आभार । आप जो The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill लाए हैं,मैं उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं ।

अगर हम लोग भगवान की सबसे बड़ी या सर्वश्रेष्ठ कृति आदमी को मानते हैं तो किसी भी समाज या परिवार के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट, सबसे बड़ी भेंट भगवान की अगर है तो उसको हम बच्चा कहते हैं । हमारे बच्चे अच्छे कैसे बनें?उनमें आपराधिक प्रवृत्ति न आए,वे अपराधी न बने  और देश के विकास की जब हम बात करते हैं, तो जिसको हम मानव संपदा कहते हैं, उसका निर्माण ठीक से कैसे हो, यह पहली बार इस देश के अंदर हो रहा है और इसके लिए मैं देश के यशस्वी प्रधानमंत्री जी का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं । जिस प्रकार से इस बिल की प्रस्तावना में और जिस संवेदनशीलता के साथ, जिस स्पष्टता के साथ,जिस भव्यता के साथ माननीय मंत्री जी ने इसको रखा है, मैं इसके लिए उनका अभिनंदन करता हूं और उनको हार्दिक बधाई देता हूं ।

       सभापति महोदय, आजादी के बाद इस बात को महसूस किया गया कि हमारे बच्चे धीरे-धीरे आपराधिक प्रवृत्ति की तरफ जा रहे हैं । उस समय के हमारे प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद जी थे । उनके जमाने में,अक्टूबर, 1950 में, उनके सेक्रेटरी हुमांयु कबीर जी थे । उन्होंने प्रत्येक राज्य के चीफ सेक्रेटरी को चिट्ठी लिखी और उस चिट्ठी में यह लिखा कि अगर इस देश का भविष्य बनाना है, बच्चों का भविष्य बनाना है तो बच्चों को संस्कार देने होंगे और बच्चों को संस्कार देने की बात पर प्रोफेसर हुमांयु कबीर ने लिखा कि संस्कृत में एक शब्द है, जिसे हम धर्म कहते हैं । प्रत्येक स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रमों में यह बात आनी चाहिए । लेकिन दशकों बीत गए और यह नहीं हुआ । वर्ष 1966 में जब पहली शिक्षा नीति आयी तो प्रोफेसर डी.एस. कोठारी जी ने लिखा - Gravity of the intellectuals of India is inclined towards west. वह अपने देश के लिए नहीं है । इस बात को सबसे पहले वर्ष 2020 में भारत के तपस्वी प्रधानमंत्री जी जब नयी शिक्षा नीति लेकर आए तो उसमें यह बात रखी कि हमारी जो भारतीय संस्कृति है,जिसको हम इंडियन नॉलेज सिस्टम बोलते हैं, जब तक उसको हमारे पाठ्यक्रम में नहीं लाया जाएगा, तब तक बच्चों का सही निर्माण नहीं हो सकता है । यह बहुत जरूरी है । चूंकि समय बहुत कम है,मैं केवल दो-चार बातें आपके सामने रखना चाहता हूं । हमारे यहां कपड़े धोने का साबुन मिलता है, डिटर्जेंट मिलता है, लेकिन मन को धोने का कोई डिटर्जेंट बाजार में नही मिलता । आदमी जब अपराध करता है तो वह मन से शुरू होता है । पहले उसमें प्रवृत्ति पैदा होती है और प्रवृत्ति के बाद आदमी अपराध में आता है । इस मन को हम इम्पैक्ट कैसे करें? हम अपने बच्चों के मन को कैसे इम्पैक्ट करें? इसके लिए उनको अच्छे संस्कार देने होंगे और ये संस्कार केवल मात्र स्कूल खोलने से या बाल गृह या सुधार गृह बनाने से आने वाले नहीं हैं । उसके लिए हमें बहुत कुछ करने की जरूरत है । हमारी शिक्षा कैसी हो? उसके अंदर संस्कार हों और ये संस्कार जब तक नहीं दिए जाएंगे, संस्कार के लिए मैं प्रोफेसर हुमांयु कबीर जी और मौलाना अब्दुल कलाम की बात याद करता हूं कि उनको धर्म सिखाया जाए । मंदिर या मस्जिद जाना धर्म नहीं है । धर्म की सबसे बड़ी परिभाषा यह है कि जैसा व्यवहार हम अपने साथ चाहते हैं, वैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ शुरू कर दें । जब तक अपने बच्चों को इस तरह का व्यवहार नहीं सिखाया जाएगा …(व्यवधान) महोदय, मैं खत्म ही कर रहा हूं । मैं लास्ट वक्ता हूं । मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारी मंत्री जी ने बाल सुधार गृहों में इस बात का सर्वे करवाया है कि किस प्रकार की उनकी दुर्दशा थी । ज्यादातर जो गृह हैं, मैं ज्यादातर इसलिए कह रहा हूं कि कुछ गृह अच्छा काम भी कर रहे हैं,लेकिन ज्यादातर या तो पैसा बनाने के धंधे में हैं या धर्म परिवर्तन करवाने के धंधे में हैं । इस तरह के लोग ज्यादातर हैं । उनकी जिम्मेदारी भी फिक्स की जाए । उनकी जिम्मेदारी यह है कि जिनके सुधार गृह में बच्चे नहीं सुधरते हैं, उनकी ग्रांट,जो लगभग 50 लाख रुपये है,उसमें कमी की जाए । अमेरिका के न्यूयार्क में आप लोगों ने देखा होगा कि दो दशक पहले सबसे ज्यादा क्राइम होता था । उस समय जुलियानी नाम के मेयर आए और उन्होंने “ब्रोकन विण्डो”नाम का कंसैप्ट दिया । ब्रोकन विण्डो का कंसैप्ट यह था कि जिनके बच्चे पत्थर मारते हुए या किसी की बेइज्जती करते हुए पकड़े गए, उनके मां-बाप की भी उसकी जिम्मेदारी होगी । जबसे यह बात लागू की गई, आप देखेंगे कि न्यूयार्क का जो अपराध था, वह 60 प्रतिशत कम हो गया । मैं यह चाहता हूं कि हमारे यहां भी इनके ऊपर एक जिम्मेदारी दी जाए ।

       सभापति महोदय,मैं एक और बात कहना चाहता हूं,यह सबको अच्छी लगेगी । रामायण के अन्दर एक प्रसंग आता है । जब सीता जी का हरण हो जाता है और उसके बाद सीता जी के जेवरात मिले । उस समय राम जी की जो मनोदशा थी, वह ठीक नहीं थी । वे लक्ष्मण से पूछते हैं कि भाई, यह बताओ कि ये उनके जेवरात हैं या किसी और के हैं । लक्ष्मण कहते हैं -

नाहं जानामि केभुरे, नाहं जानामि कुण्डले ।

नूपुरे त्वभि जानामि, नित्यं पादाभि वन्दनात् ।

       अरे भाई राम!वे कान में क्या पहनती थीं, यह नहीं पहचानता । वे गले में क्या पहनती थीं, मैं नहीं पहचानता । मैं तो रोज उनका अभिवादन करते हुए उनको नमस्ते करता था । वे अपने पैरों में नूपुर पहनती थीं, वही मैं पहचानता हूं । रामायणकार कहता है कि भगवान राम को इस बात का विश्वास नहीं हुआ । यह क्यों विश्वास नहीं हुआ,क्योंकि सीता जी लक्ष्मण की भाभी भी लगती थीं और लक्ष्मण की साली भी लगती थीं । सीता और उर्मिला दोनों सगी बहनें थीं । राम ने प्रश्न किया । यह सुनने लायक प्रश्न है । राम ने प्रश्न किया – फलं दृष्टवा पुष्पं दृष्टवा, दृष्टवा च नवयौवनम्  ।

एकान्ते काञचनं दृष्टवा, कस्य न विचलेन मन: ॥ हे लक्ष्मण, मुझको यह बताओ कि पके हुए फल को देख कर किसका मन नहीं करता कि मैं तोड़ कर खा लूं, खिले हुए पुष्प को देख कर किसका मन नहीं करता कि मैं तोड़ कर सूंघ लूं, किसका मन नहीं करता, जब खिले हुए यौवन के लड़के-लड़की एक-दूसरे के सामने हों तो कौन एक-दूसरे के प्रति आकर्षित नहीं होता । अगर एकान्त में किसी को सोना मिल जाए, धन मिल जाए तो किसका मन विचलित नहीं होता । हे लक्ष्मण, मैं तुम पर विश्वास नहीं करता हूं कि तुमने 13 वर्ष तक सीता का मुँह नहीं देखा । लक्ष्मण ने जो जवाब दिया, वह आजकल की समस्याओं का हल है । लक्ष्मण ने कहा – माता यस्य याज्ञिका: पिता भस्म च धार्मिक:  ।

एकान्ते काञचनं दृष्टवा तस्य न विचलेन मन: ॥        जिनके मां-बाप अच्छे धर्म पर चलने वाले होंगे, अच्छे रास्ते पर चलने वाले होंगे, उनके बच्चों का मन कभी भी विचलित नहीं होगा । हमें आज ऐसी ही शिक्षा चाहिए ।

       महोदय, मैं इसलिए कहना चाहता हूं कि हमें यह देखना चाहिए । महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा । अगर बच्चों को अच्छा बनाना है कि वे अपराधी न बनें तो आप सत्यार्थ प्रकाश पढ़िए । उनका समुल्लास-2 और समुल्लास-3 पढ़िए ।

       महोदय, मैं अंतिम बात कहना चाहता हूं । जैसा मैंने कहा है कि बच्चों को योग सिखाइए । हमारी माननीय मंत्री महोदया ने उनके लिए योग को कम्पलसरी भी किया है । उम्र के बारे में मैं एक जरूर निवेदन करना चाहता हूं । दुनिया में जिस प्रकार से घटनाएं घट रही हैं । अभी हमारे पास आँकड़े हैं । आँकड़ों में दिखाया गया है कि जो ज्युविनाइल बच्चे हैं, हर चार घंटे में एक रेप केस में बच्चा इंवॉल्वड है । हर पाँच के अन्दर वह महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने में इंवॉल्व है । इस तरह, बच्चों में आपराधिक प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है, हमें इस बात को भी सोचना चाहिए । यूरोप के कई देशों में और कनाडा में, यू.के. में, अमेरिका में ज्युविनाइल की एज कम कर दी गई है, लेकिन हमारे यहां 16 वर्ष है, इसके बारे में भी हमें फिर से री-लुक करने की जरूरत है । इतना कहकर मैं अपनी बात को समाप्त कर लूं ।

       आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।…(व्यवधान)

माननीय सभापति : दानिश अली जी, कुछ रिकॉर्ड में नहीं जा रहा है ।

माननीय मंत्री जी ।

 

श्रीमती स्मृतिज़ूबिनइरानी :सर, सर्वप्रथम,आज सभी माननीय सांसद, जिन्होंने बच्चों के संरक्षण की दृष्टि से अपने विचार इस सभा में प्रस्तुत किए हैं,उनके प्रति मैं आभार व्यक्त करती हूं ।

       My colleague Aparajita Ji quoted famously Nelson Mandela. He had once opined, “The safety and security – children or society for that matter – just does not happen”. They are a result of collective consensus and public investment. Today, Sir, this House was witness to consensus politically on a piece of legislation that seeks to better protect our children, and for that consensus, I would like to extend my grateful thanks to every Member who spoke. But as I quoted Nelson Mandela, I speak of public investment.

       सर, आज परनीत कौर जी ने अपने उद्बोधन में इस चिंता को व्यक्त किया कि क्या बजटरी एलोकेशन बच्चों की संरक्षण की दृष्टि से, नरेन्द्र मोदी सरकार का जो संकल्प है, उस संकल्प को धरातल पर फलीभूत करने के लिए क्या पर्याप्त है?मैं आपके माध्यम से आदरणीय परनीत जी को अवगत कराना चाहती हूँ कि चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम की दृष्टि से अगर वित्तीय आवंटन में उल्लेख करूँ तो साल 2009-10 में पूरे देश के लिए 60 करोड़ रुपये था, साल 2011-12 में 270 करोड़ रुपये था, साल 2013-14 में 300 करोड़ था और मोदी सरकार में साल 2020-21 में 1500 करोड़ रुपये है । मैं मोदी सरकार के संकल्प को पुनर्स्थापित करना चाहूँगी कि कोई भी प्रदेश की सरकार बाल संरक्षण की दृष्टि से जो भी सहयोग और सहायता अपेक्षित करती है, हर प्रदेश की सरकार को वह सहयोग देने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं ।

 

       सर, आज एक प्रिज़म्पशन है, एक संदेह है, जो कई माननीय सांसदों ने व्यक्त किया । संदेह यह है कि जिला प्रशासन में डीएम के पास पहले ही बहुत सारी चुनौतियों का सामना करने का सामर्थ्य है, लेकिन चुनौतियाँ निश्चित रूप से हैं । It is said that they are overloaded, and hence protection of children cannot become the priority of any DM. I, as humbly as I can, disagree with it, and invoke statements made by Shrimati Supriya Sule ji who represented the State of Maharashtra and the conversation she had with DMs in her State who are more than happy to share this burden.

वर्तमान परिस्थिति में ऑलरेडी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास यह जिम्मेदारी है कि वह चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी के काम को रिव्यू करें । जिला मजिस्ट्रेट के पास यह दायित्व है कि जे.जे.बी.का जो काम है,उसको वह रिव्यू करे । आज का जो अमेंडमेंट है, वह रिव्यूइंग की पद्धति से आगे बढ़कर प्रशासनिक सिनर्जी पर जोर देने का काम करने वाला है । ऐसा नहीं है कि चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी का काम बंद हो जाएगा, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का काम बंद हो जाएगा और सारे काम का भार डीएम पर आने वाला है, ऐसा नहीं है । The District Magistrate becomes not only the reviewing and supervising officer but also the synergising officer for all needs of protection of children. Why was the need felt for it?

       महोदय, जैसाकि मैंने कहा कि ऑलरेडी सीसीआई या सीडब्ल्यूसी के रिव्यू के संदर्भ में प्रावधान है । दिक्कत कहाँ आती है, जब एडॉप्शन प्रोसेस का एक एनालिसिस हुआ तो उसमें यह पाया गया कि जो होम स्टडी रिपोर्ट बनती है,जिसमें सोशल वर्कर जाकर कौन-सा परिवार बच्चे को एडॉप्ट करना चाहता है, उस पूरी प्रक्रिया के संदर्भ में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाला होता है । उसका स्टिप्यूलेटेड टाइमलाइन 30 दिन का है । वर्तमान में सिर्फ एक रिपोर्ट बनाने में 78 दिन लिए जाते हैं । अगर एक चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी को 0-2 ईयर्स तक बच्चे को एडॉप्शन के लिए सिर्फ क्लियर करना है तो इस काम को पूरा करने लिए स्टिप्यूलेटेड टाइम 60 दिन का है, लेकिन वर्तमान में वे 150 दिन लेते हैं । अगर 2 साल के ऊपर के बच्चे का क्लियरेंस करना हो, पेपरवर्क करना हो तो चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी के पास क्लियरेंस के लिए स्टिप्यूलेटेड टाइम 120 दिन का है, लेकिन वह 265 दिन लेते हैं । सिस्टम में जो बच्चे सरेंडर होते हैं, चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी के पास स्टिप्यूलेटेड टाइम है कि उसको 60 दिन में पेपरवर्क का काम पूर्ण करें,लेकिन वर्तमान में वह 130 दिन लेते हैं ।

एडॉप्शन की फाइलिंग के लिए जो पेपर वर्क है, उसका स्टिपुलेटेड टाइम 10 दिन है, इसमें लगभग 60 दिन लिये जाते हैं । एडॉप्शन आर्डर को रिसीव करने का स्टिपुलेटेड टाइम 60 दिन है और 107 दिन से ज्यादा इसमें समय लिया जाता है । संगम लाल जी शायद सदन में मौजूद नहीं हैं । गुप्ता जी प्रतापगढ़ के एक केस के बारे में बोल रहे थे । कई सांसदों ने आज चर्चा की कि हम कोशिश करते हैं,तो भी समय लगता है । जैसा कि दानिश साहब ने कहा कि इम्प्लीमेंटेशन पर तवज्जो दें,ध्यान दें,जड़ यहां हैं । एक बार डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की प्रायोरिटाइजेशन लिस्ट में यह आ जाए, that they are now hereby legally ordained  to not only review, but to ensure  implementation, तब स्टिपुलेटेड टाइमलाइंस को मीट करने में सहयोग होगा ।

एक सांसद ने आज पूछा कि किस प्रकार से आप रिव्यू कर रहे हैं, किस प्रकार से चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस चल रहे हैं? मैं एक बार फिर से परनीत जी का आभार व्यक्त करती हूं जिन्होंने फोर्थ कैटेगरी ऑफ क्राइम्स के संदर्भ में अपना समर्थन व्यक्त किया । उन्होंने कहा, that the assurance by this House should also be to mitigate social evils. How do you mitigate social evils? गीता विश्वनाथ जी ने अपने उद्बोधन में उल्लेख किया कि there is a need to ensure psychological support and many hon. Members have spoken about the need.

 कानून में यह व्यवस्था,यह अपेक्षा है कि साइकोलॉजिकल सपोर्ट या मेंटल हेल्थ सपोर्ट दी जाएगी अथवा ईवैल्युएशन में मदद की जाएगी,लेकिन कभी भी सुदृढ़ व्यवस्था को लाने में केंद्र और राज्य के बीच समन्वय की दृष्टि से काम नहीं हो पाया । यह एक गैप रहा । इसीलिए आज अपने आप में, मेरे लिए हर्ष का विषय है कि जब यह सदन इस विषय पर चर्चा कर रहा है, देश भर से एनसीपीसीआर, नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स के साथ-साथ स्टेट कमीशंस देश की राजधानी में आज ही इसके ऊपर चर्चा कर रहे हैं ।

हमने निमहंस के साथ समन्वय किया । संवाद नाम का एक सेल निमहंस में स्थापित किया । जब देश कोरोना की महामारी से साल 2020 में जूझ रहा था, हमने विशेषत:निमहंस से यह आग्रह किया कि आप देश भर में जितनी संस्थायें और संस्थाओं में काम करने वाले लोग बच्चों से संबंधित हैं,मेंटल हेल्थ,साइकोलॉजिकल सपोर्ट की दृष्टि से उन सभी संस्थाओं में ट्रेनिंग की व्यवस्था करवायें । मुझे आपके माध्यम से सदन को अवगत कराने में इस बात का संतोष है कि लॉकडाउन के बावजूद भी निमहंस ने इस काम को त्वरित रूप से किया और गत 6 महीने में देश भर में 28 राज्यों में मेंटल हेल्थ की दृष्टि से निमहंस ने भारत सरकार के साथ सहयोग से काम किया ।

गीता जी का एक सुझाव था कि क्या हम देख सकते हैं कि मेंटल हेल्थ सपोर्ट को आंगनवाड़ी स्तर तक लेकर जा सकें? Sir, through you, I would like to tell the hon. Member that I accept her suggestion and will ensure that not only do we work in collaboration with NIMHANS and all Anganwadis, but I would also like to inform her that we have already engaged with the Ministry of Panchayati Raj to ensure that across all Panchayats, NIMHANS engages with all public representatives and all stakeholders for mental health and wellbeing of our children.

एडीशनली, जसबीर जी सदन में उपस्थित हैं । इन्होंने भी उल्लेख किया था कि साइकोलॉजिकल काउंसलिंग और सपोर्ट की जरूरत है । हमारा उद्देश्य है कि हर चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन के साथ, निमहंस के साथ समन्वय करके मेंटल हेल्थ और वेलबीइंग के संदर्भ में इंटरवेंशन चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस में हम करें, यह भी हमारे यहां पर विचारणीय है । हमारी निमहंस के साथ प्रथम श्रृंखला में इसकी चर्चा पूर्ण हो चुकी है । विशेषत: एस्पिेरेशनल जिलों में और जहां पर ट्राइबल पॉपुलेशन है, वहां लैंगुएज की भी चुनौती है ।             

हाल ही में हमने जिलाधिकारियों के साथ एक विशेष मीटिंग की, न सिर्फ अस्पिरेशनल जिले की, बल्कि वे जिले जहां महिलाओं व बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा क्राइम्स होते हैं, हमने उनको भी आमंत्रित किया । उस परिचर्चा में ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च डेवलपमेंट के ऑफिसर थे, नाल्सा के ऑफिसर थे, निमहंस के ऑफिसर थे । ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट पुलिस को कैसे सैन्सेटाइज करें,पुलिस की कैसी ट्रेनिंग हो,न सिर्फ बच्चों बल्कि महिलाओं के लिए भी हमने इस पर काम शुरू किया है । नाल्सा के साथ समन्वय में विक्टम कम्पेनसेशन फंड की जब हम बात करते हैं तो न सिर्फ महिलाओं बल्कि पॉक्सो में विक्टम कम्पनसेशन फंड को कैसे लागू किया जाए, इस पर भी काम हो रहा है । नाल्सा, सभी स्टेट्स और नेशनल कमीशन से हमारी चर्चा हो चुकी है कि आप हमें जिलेवार वकीलों का नाम और नम्बर दें,जिसे हम सार्वजनिक रूप से प्रेषित कर सकें कि अगर आपको लीगल एड की जरूरत है तो आप किससे संपर्क कर सकते हैं, इसकी जानकारी हमने नाल्सा के साथ शेयर की है ।

       आज अपराजिता जी ने बिल को अलग अंदाज में प्रस्तुत किया कि क्वालिफिकेशन का क्राइटीरिया तो रखा है, डिस्क्वालिफिकेशन का भी क्राइटीरिया रखा है । व‍ह क्राइटीरिया क्या है? देश की आजादी के बाद पहली बार संसद लेजिस्लेट कर रहा है, अगर आप चाइल्ड केयर इन्सटीट्यूशन में काम करते हैं तो आपका बैकग्राउंड चेक होगा, अगर आपने चाइल्‍ड एब्यूज किया है या ह्यूमन   राइट्स का उल्लंघन किया है तो आपको काम करने की आजादी नहीं मिलेगी ।

       इसे सरकार ने पॉक्सो रूल्स के तहत ऑलरेडी नोटिफाई किया है कि जहां-जहां बच्चे हैं,यानी शैक्षणिक संस्थान में काम करने वाले लोगों का बैकग्राउंड अनिवार्य रूप से चेक करना पड़ेगा । मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स ने सेक्स ऑफेंडर्स का एक डाटा बेस बनाया है । हम बार-बार सभी से आग्रह कर रहे हैं कि अगर अपने जिले में किसी को काम पर रख रहे हैं तो कृपया पुलिस वेरिफिकेशन करवाएं । अगर उसका डाटा बेस में उल्लेख है, अगर उसके खिलाफ सेक्सुअल असॉल्ट, ह्यूमन राइट्स, चाइल्ड राइट्स एब्यूज के केसेज पेन्डिंग है तो ऐसे व्यक्ति को नौकरी पर नहीं रखा जाए ।

       मेरा सभी माननीय सांसदों से आग्रह है कि आप भी ‘दिशा’ की मीटिंग में जब स्टेकहॉल्डर्स से चर्चा करें तो इस लेजिस्लेटिव प्रावधान का उल्लेख निश्चित रूप से करें । दानिश साहब ने कहा कि हम विशेष रूप से लिख कर दें,मैं उस सुझाव को भी स्वीकार करती हूं । मैं प्रत्येक सांसद को ही नहीं, बल्कि प्रत्येक सरपंच और विधायक को भी लिख कर देने को तैयार हूं कि शैक्षिक संस्थानों और चाइल्ड केयर इस्टीट्यूशन में कृपया पुलिस वेरिफिकेशन सुनिश्चित कराएं ।

       आज अरविन्द सावंत जी ने अपने उद्बोधन में उल्लेख किया कि  impact of media and technology on children किस प्रकार से  periodicity of visit needs to be maintained.

       महोदय, कहना उचित होगा कि जब हम प्रदेश सरकारों से चर्चा कर रहे थे तो प्रदेश की सरकारों ने कहा कि किस एनजीओ ने कहां घर खोला,कब घर खोलकर वहां कितने बच्चे को रखा, बाद में कोई घटना    घटती है तो जिला प्रशासन को पता चलता है । इस बार हमने मैनडेट किया है कि अगर आपको चाइल्ड केयर इस्टीट्यूशन खोलना है तो सबसे पहले कम से कम आपके बैकग्राउंड की चेकिंग की जाए ।

अरविन्द जी ने सिंधु ताई का उल्लेख किया कि सिर्फ संस्थान की स्थापना में बैकग्राउंड चेक क्राइम की दृष्टि से निश्चित रूप से होगा । एफसीआरए के जितने भी रेग्युलेशन्स पास हुए हैं, उन रेग्युलेशन्स का उल्लंघन न हो,इसको भी जिला प्रशासन सुनिश्चित करके प्रदेश प्रशासन को बताएगी फिर ऐसे संस्थान स्थापित होंगे । यह भी एक कड़वा सत्य है,जिसे हमें स्वीकार करना पड़ेगा । आज मैंने प्रयागराज की संस्था का उल्लेख किया, बच्चों को संस्थान में इसलिए रख रहे हैं कि बच्चे के नाम से डोनेशन आ रही है, कोविड के दौरान हमने देखा ।  

बार-बार कानून का मानना है कि बच्चे को रिहेबिलिटेट करो, जरूरी नहीं है कि घर में बांध कर रख दो । रिहेबिलिटेशन में बहुत कम लोगों की रुचि रही, लेकिन जैसे ही कोरोना की महामारी आई, एनसीपीसीआर के सामने आंकड़ा आया, कई राज्यों में 1,40,000 बच्चे अचानक घर भेज दिए गए, जबकि राज्य सरकार के पास आंकड़ा है कि इंस्टीट्यूशन्स में 70,000 के आसपास थे । आप सोचिए,राज्य सरकारें मिलकर केंद्र सरकार को बताती हैं कि संस्थाओं में लगभग 70,000-75,000 बच्चे हैं,लेकिन अचानक कोविड महामारी में 1,40,00 बच्चे घर लौटते हैं । यह इसीलिए अनिवार्य है । डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास जब यह जिम्मेदारी पूर्णत: सुपरविजन की दृष्टि से आएगी तो रिपोर्टिंग भी जिला और राज्य स्तर पर हम लोग सुनिश्चित कर पाएंगे ।

       मैं आपको एक और उदाहरण देती हूं । ट्रैक द चाइल्ड पोर्टल है, मिसिंग बच्चों को इसमें इंगित करने की दरकार है, लेकिन सभी चाइल्ड वैलफेयर कमेटीज़ और जेजे बोर्ड नहीं करते हैं । 40,000 से ज्यादा बच्चे इस पोर्टल पर मिसिंग बताए जा रहे हैं । आज भी कई बच्चे रजिस्टर्ड नहीं होते हैं । आप जिस कानून का समर्थन कर रहे हैं, पहली बार इसके माध्यम से सैक्शन 32(2) में अगर जिले में कोई भी बच्चा डिस्ट्रैस में हो, अबेंडेंट हो, ऑर्फन्ड हो, बांडेड लेबर का विक्टिम हो, हम उसकी जानकारी एक स्पेसिफाइड सैंट्रलाइज पोर्टल में देना अनिवार्य करने वाले हैं । पहली बार किसी जिले में अगर कोई बच्चा मृत पाया गया, भाग गया या मिसिंग है,यह जानकारी एक छत के नीचे एक जिले में, एक राज्य में प्राप्त हो पाएगी । इस प्रावधान का आज आप लोगों ने समर्थन किया है, मैं इसके लिए आपका आभार व्यक्त करती हूं ।

       अरविंद जी ने उल्लेख किया कि मीडिया पर, अगर कोई ऐसा संशय पैदा करने वाले बच्चे से रिलेटिड प्रोग्रामिंग है तो उसमें क्या कार्रवाई हो सकती है? आईएंडबी की कमेटी में एनसीपीसीआर मैम्बर है, इसने खुद आईएंडबी को गाइडलाइन दी है कि अगर कोई बच्चा टीवी शो में काम करता है तो किस गाइडलाइन के अंतर्गत काम कर सकता है । अगर कोई सैल्फ रैगुलेशन की बात करता है तो बीसीसी,इंडस्ट्री का ही एक ग्रुप है,जिसमें एनसीपीसीआर और एनसीडब्ल्यू मैम्बर हैं । अरविंद जी ने कहा कि क्यों सीडब्ल्यूसी में क्वालिफिकेशन रख रहे हैं?  संगीता जी यहां नहीं हैं,उन्होंने कहा कि एमपीज़ को मैम्बर बना दो । यह ज्यूडिशियल बॉडी है, इसमें एमपी मैम्बर नहीं हो सकते हैं । सीडब्ल्यूसी क्योंकि फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट का काम कर रहे हैं,इसलिए क्वालिफिकेशन को इंगित करना बहुत जरूरी है ।

       अरविंद जी ने उल्लेख किया कि मीडिया के साथ-साथ ऑनलाइन इसी हाउस में पोक्सो और चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर बहुत कड़ा कानून पारित किया । मैं आपके माध्यम से सदन को अवगत कराना चाहती हूं, मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स ने उस पासेज के बाद,अब तक हमारे पास जो जानकारी है, लगभग देश में 160 लोगों को चाइल्ड पोर्नोग्राफी के लिए अरैस्ट किया है । इसके साथ चार्जशीट भी 119 केस में की है । आज सुप्रिया जी ने कहा कि हम कैसे एज़ एमपी और सिटिजन सिस्टम को हैल्प कर सकते हैं? मुझे लगता है, जब हम बात करते हैं कि जिला मजिस्ट्रेट के अंतर्गत सब काम होने हैं, तो निश्चित रूप से दिशा मीटिंग में एमपीज़ इस विषय को उठा सकते हैं,चाहे चाइल्ड वैलफेयर कमेटी का काम हो, चाहे जेजे बोर्ड का काम हो, जिला मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी है और उस संदर्भ में आप निश्चित रूप से पूछ सकते हैं । आप चाइल्ड प्रोटेक्शन की कमीशन्स के साथ आग्रह करके अपने जिले में इंस्पेक्शन करवाएं ।

यह मेरा आपसे आग्रह रहेगा । अगर,ऐसी कोई भी कुनीति आपके ध्यान में आती है, जिसके बारे में आपको लगता है कि उसका त्वरित रूप से समाधान नहीं मिल रहा है, मैं मंत्रालय नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स,निश्चित रूप से आपके जितने भी केसेज हैं या जितनी भी चिंताएं हैं, उनके संदर्भ में जिला और प्रदेश के साथ समन्वय करेंगे ।

       सुप्रिया जी ने एडॉप्शन ऑफ फोस्टरिंग के एक विशेष केस के बारे में उल्लेख किया है । मैं आपके माध्यम से सदन को बताना चाहूंगी कि मेरी प्रस्तुतीकरण में जब मैंने एक रिपोर्ट में एनसीपीसीआर के ऑडिट का उल्लेख किया था, तो उसमें मैंने एक बात का उल्लेख नहीं किया था । यह अपेक्षित है कि चाइल्ड केयर इंस्टिट्यूशन्स का जो डिस्ट्रिक्ट स्पांसरशिप ऑफ फोस्टर केयर अप्रूवल कमेटी है, उसके साथ समन्वय हो,ताकि, अगर,बच्चा सिस्टम में आता है, तो बच्चा फोस्टर केयर में जा सके या अगर कोई परिवार वहीं पर उनको स्पांसर करना चाहे, समर्थन करना चाहे तो करे । दिक्कत यह है कि मात्र एक-तिहाई सीसीआईज का ही लिंकेज था । इसका मतलब, आज हम जो लेजिस्लेशन पारित करेंगे,उसके अंतर्गत अब जिले के मजिस्ट्रेट के पास पूर्णत:लिंकेजेज एस्टैब्लिश करने का पूरा मौका होगा ।

       मैं सुप्रिया जी को बताना चाहूंगी कि एक्ट का जो सेक्शन-44है, उसके अंतर्गत फोस्टर केयर की जो गाइडलाइन्स हैं, हम प्रदेश की सरकारों के साथ चर्चा करके,अगर, उसमें कोई सुधार लाना है या उसको फिर से नये तरीके से स्थापित करना है,तो हम उसके लिए भी प्रयास करेंगे,ताकि आपने जो चिंता व्यक्त की है, उसका समाधान हो सके ।

       मलूक नागर जी ने आज उल्लेख किया कि ऐसा कोई कानून ही नहीं है कि लोग बच्चे एडॉप्ट कर सकें । लेकिन,मैं उनकी अनुपस्थिति में रिकॉर्ड के लिए उन्हें बताना चाहूंगी कि सेक्शन-68में जो ‘कारा’है, वह रेगुलेशन एडॉप्शन को प्रतिस्थापित करने के लिए मेंडेटिड है ।

       मैं श्रीनिवास रेड्डी जी का अभार व्यक्त करती हूं, who spoke about the need to ensure that the privacy of the children is maintained and that there is no discrimination in how the Government applies solutions to the children.

       लेकिन, हसनैन साहब ने आज कहा कि जम्मू-कश्मीर में धारा-370 हटने से पहले बच्चों के लिए हालात बहुत ही उम्दा थे । ऐसा नहीं है । …(व्यवधान)मैं दोबारा विनम्रता से कहना चाहूंगी, I do not know how the children could be happy when the J.J. Act was not applicable there. I do not know how the children could be happy when there was no legal option for adoption. …(Interruptions) I do not know how the children could have been happy when the Child Marriage Act was not applicable. I do not know how the children could be happy when the full force of the POCSO Act was not applicable in Jammu & Kashmir while Article 370 was very much in existence. …(Interruptions)  Today, in fact, I am proud that this House will pass a legislation that will be applicable in Jammu & Kashmir and for the children of Ladakh. In fact, Sir, धारा-370हटने के बाद एनसीपीसीआर वहां पर एक डेडिकेटेड सेल बच्चों के लिए और कमीशन के लिए स्थापित कर पाई है । धारा-370हटने के बाद नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स बच्चों के संरक्षण के लिए 14 मंत्रालयों के साथ समन्वय कर पाई है । धारा-370हटने के बाद नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स वहां पर चाइल्ड वेलफेयर कमेटीज और डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट के लिए आरिएंटेशन वर्कशॉप कर पाई । मैं कहना चाहूंगी कि जब धारा-370 थी, तब कोई भी मॉनिटरिंग मैकेनिज्म चाइल्ड केयर इंस्टिट्यूशन्स के लिए एप्लिकेबल ही नहीं था । एनसीपीसीआर ने जम्मू-कश्मीर में विशेष बच्चों के लिए अपना जो योगदान दिया है,आज हाउस की अनुमति से एनसीपीसीआर को उसके लिए मैं आभार व्यक्त करना चाहूंगी ।

हसनैन साहब ने यह भी कहा है कि पैसे कम मिलते हैं । अब सीडब्ल्यूसी के मेंबर को प्रति मीटिंग के लिए 1,500 रुपये दिए जाते हैं और एक महीने में 20 मीटिंग्स अपेक्षित हैं । मैं थोड़ा यह स्पष्ट कर देना चाहती हूं ।

       जसबीर सिंह जी ने अपने उद्बोधन में उल्लेख किया है कि असर्टेन अकाउंटेबिलिटी कि जिन लोगों ने होम्स में बच्चों को टॉयलेट और पानी की सुविधा से वंचित रखा है, उनकी अकाउंटेबिलिटी सुनिश्चित कीजिए । जसबीर जी, आज आपने जिस लेजिस्लेशन का समर्थन किया है, that is to ascertain accountability so that those who break the law will be taken to task by the law.

       इसी संदर्भ में हनुमान बेनीवाल जी ने कहा है कि…(व्यवधान)उनके जिले में सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ पुलिस ने चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के डॉयरेक्शन को मानने से मना कर दिया था । मैं सप्रेम भेंट आपके जिले में यह भेज देती हूं । यह रूल्स की कापी है, जिसकी पेज संख्या 25 सब सेक्शन 16 को आपके जिले में भेज देती हूं । मैं आपको दे देती हूं और आप उनको दे दीजिएगा कि “In case of a complaint of abuse of a child in any childcare institution, the Committee shall conduct an inquiry and give directions to the police or the Child Protection Unit or Labour Department or Childline Services as the case may be.” कानून में प्रावधान है, लेकिन आज आप जो लेजिस्लेशन पारित कर रहे हैं,उसके अंतर्गत अब इस प्रकार की चुनौतियां हैं,अगर सुपीरियर ऑफिसर के अभाव में कोई डॉयरेक्शन को नहीं सुनता है, तो डीएम को इस प्रकार से और सशक्त करने की वजह से, मुझे लगता है कि जूनियर ऑफिसर्स को ये कठिनाइयां फेस करनी पड़ रही हैं,कहीं न कहीं हम लोग उन कठिनाइयों को समाधान में बदलने में सक्षम होंगे ।

       Hasnain sahab said, “Why not strengthen the DCPUs?” The issue is, Sir, only seven States have said that they will put a permanent officer in the position of DCPU. The challenge is that when it comes to a DCPU, as Hanuman Beniwal ji has spoken about the challenge in his District, there are many a District where senior officers do not want to listen to a contractual employee. That is why it is incumbent upon us to ensure that we strengthen the administrative structure to ensure that protection of children becomes priority administratively.

अनुभव मोहंती जी ने इस बात और इस चिंता को व्यक्त किया है कि पैरेन्टल एलाइनेशन के विषय पर काम करें, कोर्ट में हस्तक्षेप करें । अब फैमिली कोर्ट में तो इस विषय के संदर्भ में लॉ प्रतिस्थापित है, लेकिन एक मीडिएशन सेल विशेषतया नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने बनाया है, ताकि अगर कहीं पर इस प्रकार की चुनौतियां आती हैं, तो कमीशन के माध्यम से उन चुनौतियां का भी समाधान हो सके ।

       सभापति महोदय,लोगों ने ज्यूडिशियरी के रोल के संदर्भ में एक चिंता व्यक्त की है कि ज्यूडिशियरी का रोल नहीं है । यह उचित स्टेटमेंट नहीं है । अगर आप अपील करना चाहते हैं, तो वह सिर्फ डिविज़नल कमिश्नर तक सीमित नहीं है ।

Courts are available for any citizen in this country to go in appeal. There is no restriction that this amendment imposes upon any citizen. However, as Rita Bahuguna Joshi ji has also highlighted, the Government of India had in conjunction with the offices of the Chief Justice of India made attempts to ensure that the judiciary is well sensitized about the delays in the adoption processes. तो ऐसा नहीं है कि हमने हमारी ओर से इस प्रकार का कोई प्रयास नहीं किया है । मैं यह भी बताना चाहूंगी,क्योंकि अनुभव मोहंती जी ने थोड़ा क्लैरिफिकेशन मांगा था ।

19.00 hrs        Since Shri Anubhav Mohanty had sought clarification, I must also state here that there is absolutely no change in processes when it comes to heinous crimes. As Shrimati Preneet Kaur had mentioned, only a fourth category of offences find mention in the amendment as per the direction and the suggestion of the hon. Supreme Court. सर, मैं वीरेन्द्र कुमार जी का आभार व्यक्त करती हूँ,उन्होंने उन चाइल्ड केयर संस्थानों का उल्लेख किया है, जिन्होंने अच्छा काम किया है । यह भी जरूरी है कि जिन्होंने अच्छा काम किया है, उनका कहीं न कहीं आभार व्यक्त किया जाए । आज मैं इतना ही कहना चाहूंगी और जैसा दानिश जी ने भी कहा है, where is the emphasis on implementation?  हमने इंप्लीमेंटेशन पर जोर दिया है, इसीलिए अगस्त से लेकर अब तक हमने प्रदेश सरकारों के माध्यम से 436 नॉन-रजिस्टर्ड चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन बंद करवाएं । आज 7 हजार 275 इंस्टीट्यूशन रजिस्टर्ड हैं । हमने इंसिस्ट किया कि हमारे देश में न सिर्फ चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन हों, बल्कि यह भी हो कि बच्चों को न्याय कैसे मिले । उसके लिए भी हम अपनी ओर से जद्दोजहद करें । देश में निर्भया फंड के अंतर्गत 1023 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए हैं जिनके अन्तर्गत 330 कोर्ट्स एक्सक्लूसिवली बच्चों के पोक्सो रिलेटेड केसेज से संबंधित हैं,जो 25 राज्यों में स्थापित हुए हैं । इन कोर्ट्स ने अब तक 40 हजार केसेज को डिस्पॉज किया है । यह जनवरी तक का आँकड़ा है ।

 

       सर, जैसा कि मैंने कहा कि आज का हमारा यह इंटरवेंशन, it is to ensure that protection of children becomes priority and for prioritizing children the august House and its esteemed Members have my gratitude. As Swami Vivekanand had said, “Do you think you can even teach your child? You cannot. The child teaches himself. Your duty is to afford opportunities and to remove obstacles.” Today, this House has fulfilled its duty in removing obstacles. For that, on behalf of the children of India, thank you.                                                               

… (Interruptions)

माननीय सभापति: नहीं, काफी डिटेल्ड आंसर हो गया है ।

…( व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: The question is:

“That the Bill to amend the Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 be taken into consideration.” The motion was adopted.
HON. CHAIRPERSON: The House shall now take up clause by clause consideration of the Bill.
 The question is:
              “That clauses 2 to 8 stand part of the Bill.”   The motion was adopted.
Clauses 2 to 8 were added to the Bill. Clause 9 HON. CHAIRPERSON: Shri Ritesh Pandey to move amendment No. 1 to clause 9 – not present.
 The question is:
              “That clause 9 stand part of the Bill.” The motion was adopted.
Clause 9 was added to the Bill. Clauses 10 to 29 were added to the Bill. Clause 1, the Enacting Formula, and the Long Title were added to the Bill.   SHRIMATI SMRITI ZUBIN IRANI: I beg to move:               “That the Bill be passed.” HON. CHAIRPERSON: The question is:               “That the Bill be passed.” The motion was adopted.