Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Consideration Of The Compulsory Voting Bill Moved By ... on 18 December, 2015
Sixteenth Loksabha pan> Title: Further discussion on the consideration of the Compulsory Voting Bill moved by Shri Janardan Singh 'Sigriwal' on the 13th March, 2015.
HON. DEPUTY SPEAKER: Now we take up Item No. 120 - Further consideration of the following motion moved by Shri Janardan Singh ‘Sigriwal’ on the 13th March, 2015, namely:-
“That the Bill to provide for compulsory voting by the electorate in the country and for matters connected therewith, be taken into consideration.” Shri Ninong Ering - Not present श्री दद्दन मिश्रा (श्रावस्ती) : महोदय, मैं माननीय सदस्य जनार्दन सिंह सीग्रीवाल द्वारा लाए गए प्राइवेट मेम्बर बिल "अनिवार्य मतदान" के ऊपर हो रही चर्चा में भाग लेने के लिए खड़ा हुआ हूं।
16.12 hours (Shri Raman Deka in the Chair) महोदय, विगत सत्र से ही इस बिल पर चर्चा हो रही है। हमारे तमाम विद्वान सदस्यों ने इस संबंध में अपना मत व्यक्त किया है। ज्यादातर सदस्य अनिवार्य मतदान के पक्ष में अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं। पिछले शुक्रवार को हमारे वरिष्ठ सदस्य बड़े भाई निशिकांत दुबे जी द्वारा बहुत विस्तार से इस संबंध में चर्चा की गई और अनिवार्य मतदान के विरोध में अपना विचार प्रस्तुत किया। हालांकि उनके विचारों से लगा कि वे भी अनिवार्य मतदान के विरोध में नहीं हैं लेकिन भारतीय परिवेश में ऐसा होना संभव नहीं है, ऐसा उन्होंने बहुत ही तथ्यपरक आंकड़ों के साथ विचार प्रस्तुत किए। तमाम देशों ने जहां पर अनिवार्य मतदान लागू है वहां क्या-क्या दिक्कतें आ रही हैं, इसके ऊपर भी उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला। हमारा मानना है कि कोई भी चीज असंभव नहीं है। अगर सोच अच्छी हो, इरादे नेक हों, दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो कोई भी चीज असंभव नहीं है और यही चीज हमारे भारतीय परिवेश में भी लागू होती है। हमारे देश में कुष्ठ रोग एक बड़ी समस्या थी, एक महामारी का रूप ले चुकी थी। क्या कभी किसी ने सोचा था कि हमारे देश से कुष्ठ रोग का उन्मूलन होगा, लेकिन सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति से निश्चित रूप से इस बीमारी का उन्मूलन करने में हम सफल रहे। इसी तरह से छह रोग हमारे देश में महामारी का रूप ले चुके थे। इन बीमारियों के प्रति हमारी सरकार ने जनता में जागरुकता फैलाई, जिसकी वजह से इन बीमारियों पर हम नियंत्रण पा सके। इसी तरह से अगर हम पोलियो की बात करें तो इस बीमारी का भी हमने जन-जागरण के माध्यम से अपने देश से उन्मूलन किया। हमारा मानना है कि कोई भी चीज असंभव नहीं है। जिन देशों में अनिवार्य मतदान लागू किया गया है, उनकी जिन विसंगतियों के बारे में माननीय सदस्य निशिकांत दुबे जी ने चर्चा की थी, मेरा मानना है कि वे बहुत छोटे-छोटे लोकतंत्र हैं, बहुत छोटे-छोटे देश हैं, हमें उनकी तरफ न देख कर बल्कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, हमें अपना आदर्श दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहिए।
माननीय अधिष्ठाता महोदय, किसी भी लोकतंत्र में मतदान सबसे बड़ा अधिकार है, एक दायित्व है, हथियार है। अधिकार है अपने एक प्रतिनिधि को चुनने का, अहम दायित्व है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को और मजबूत करने का। यह मतदान की ही महिमा है कि व्यस्क होने के बाद हर कोई पहली बार मतदान की अधीरता से प्रतीक्षा करता है। चन्द यादगार घटनाओं में उसे जगह देता है। मीडिया क्रांति के इस युग में पिछले कुछ एक वर्षों में वोटिंग के बाद सेल्फी शेयर करना एक जुनून बन गया है। मतदान का मर्म उनसे पूछना चाहिए जहाँ ऐसी कोई व्यवस्था का प्रावधान नहीं है। कोई भी फैसला या शासक उन पर थोप दिया जाता है। उनकी राय या सोच घुट कर वहीं अन्दर ही रह जाती है।
स्वस्थ लोकतंत्र की पहली निशानी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपने मत के अधिकार या कर्तव्य का इस्तेमाल करें। भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपनी छवि और निखारने के लिए यह बेहद जरूरी है। हालांकि पिछले कई वर्षों में लोगों की सोच बदली है। लोग बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा ले रहे हैं। लेकिन बढ़ती सोच-समझ और साधन के बावजूद छः दशक में मतदान प्रतिशत में अपेक्षित बढ़ोत्तरी न होना चिन्ता का भी विषय है। पहली लोक सभा के चुनाव में जितने प्रतिशत लोगों ने मतदान किया था, वर्ष 2014 में पिछले लोक सभा चुनाव में उससे कम लोग ही मतदान केन्द्र पहुंच कर ईवीएम मशीन का बटन दबा सके हैं, यह चिन्ता का विषय है। इसके साथ ही अपेक्षाकृत जागरुक और समझदार शहरी तबका, खासकर महानगरीय आबादी की उदासीनता किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में अनिवार्य मतदान की मांग किया जाना समय की मांग जान पड़ती है।
दुनिया के कई समृद्ध लोकतंत्रों में लागू अनिवार्य मतदान की व्यवस्था में काफी खूबियां हैं और कुछ कमियाँ भी हैं, जैसा हर व्यवस्था के साथ होता है। मतदान के प्रति जागरुकता बढ़ाने को लेकर किये जा रहे तमाम प्रयासों के साथ मतदान को अनिवार्य बनाने के लिए भी सोचना जरूरी है। कानून बनने के बाद किसी भी नागरिक को किसी भी कारण से मतदान से रोका नहीं जा सकेगा। सभी के मत डलवाना सरकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी होगी।
देश में अनिवार्य मतदान भारतीय लोकतंत्र में नई जान फूंक सकता है। दुनिया के 32 से अधिक देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू है। यह व्यवस्था अगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लागू हो गयी तो उसकी बात ही कुछ और होगी। यदि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतदान करना अनिवार्य हो गया तो अमरीका और ब्रिटेन जैसे पुराने और सशक्त लोकतंत्रों को भी भारत का अनुसरण करना पड़ सकता है। हालांकि, भारत और उनकी समस्या एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत है। भारत में अमीर लोग वोट नहीं डालते और इन देशों में गरीब लोग वोट नहीं डालते। भारत इस तथ्य पर गर्व कर सकता है कि जितने मतदाता भारत में हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं और लगभग हर साल भारत में कोई न कोई ऐसा चुनाव अवश्य होता है, जिसमें करोड़ों लोग वोट डालते हैं। देश के प्रत्येक व्यस्क को बाध्य किया जाना चाहिए कि वह देशहित में मतदान करे। बाध्यता का अर्थ यह नहीं है कि वह इस या उस उम्मीदवार को ही वोट दे। अगर वह सारे उम्मीदवारों को अयोग्य समझता है तो किसी को वोट न दे। नोटा का प्रयोग करे, एब्स्टेन करे जैसा कि यहाँ हम संसद सदस्य और संयुक्त राष्ट्र संघ में सदस्य-राष्ट्र करते हैं। दूसरे शब्दों में यह वोट देने की बाध्यता नहीं है, बल्कि मतदान केन्द्र पर जाकर अपनी हाजिरी लगाने की बाध्यता होगी। यह बताने की बाध्यता है कि इस भारत के मालिक आप हैं और आप जागे हुए हैं, आप सो नहीं रहे हैं, आप धोखा नहीं खा रहे है, आप यह नहीं कह रहे हैं कि “को नृप होई, हमें का हानि।” यदि आप वोट देने नहीं जाते हैं, तो माना जाएगा कि आप यही कह रहे हैं और ऐसा कहना लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाना नहीं तो क्या है?
यदि भारत में मतदान अनिवार्य हो जाए तो चुनावी भ्रष्टाचार बहुत घट जाएगा। वोटरों को मतदान-केन्द्र तक ठेलने में अरबों रुपया खर्च होता है, शराब की नदियां बहायी जाती हैं, जात और मजहब की ओट ली जाती है तथा अनेक अवैध हथकंडे अपनाए जाते हैं। इन सबसे मुक्ति मिलेगी। लोगों में जागरुकता बढ़ेगी। वोट-बैंक की राजनीति भी थोड़ी पतली पड़ेगी। जो लोग अपने मतदान-केन्द्र से काफी दूर होंगे, वे डाक या इंटरनेट या मोबाइल फोन से वोट कर सकते हैं। जो लोग बीमारी, दुर्घटना या किसी अन्य अपरिहार्य कारण से वोट नहीं डाल पाएंगे, उन्हें कानूनी सुविधा अवश्य मिलेगी। जिस दिन भारत के 90 प्रतिशत से अधिक नागरिक वोट डालने लगेंगे, जागरुकता इतनी बढ़ जाएगी कि लोग जनमत-संग्रह, जन-प्रतिनिधियों की वापसी और सुनिश्चित अवधि की विधायिका और कार्यपालिका की मांग भी मनवा कर रहेंगे।
हालांकि मतदान को अनिवार्य बनाने के पहले बहुत सारे ऐसे चुनावी सुधार हैं, जिनकों लागू कर हम अपने जनतंत्र को अधिक सशक्त, समर्थ और सार्थक बना सकते हैं। चुनावों में कालेधन का असर हो या बाहुबल का कुप्रभाव, इनकी रोकथाम के लिए जो कानून फिलहाल दण्ड संहिता में हैं, उनका सख्ती से पालन ही जनतंत्र की जड़ों को मजबूत बना सकता है। कई औसत निरीह मतदाता मतदान के लिए घर से नहीं निकलता क्योंकि उसके मन में चुनाव के पहले और बाद में हिंसा की संभावना या पास-पड़ोस में बैर-भाव बढ़ने की आशंका ही जिम्मेदार होती है। यदि एक बार यह भय मन से निकल जाए तो मतदाता सहर्ष और उत्साह के साथ मतदान के लिए तत्पर होंगे, ऐसा मेरा मानना है। जब से नौजवान मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है, तब से मतदान का प्रतिशत निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।
दुनिया के जिन देशों में मतदान अनिवार्य है उनमें अर्जेन्टीना, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, सिंगापुर और पेरू प्रमुख हैं। इन देशों में 18 साल से लेकर 70 साल की उम्र के हर नागरिक के लिए मतदान अनिवार्य है। इनके अलावा लक्जमबर्ग, नाउरू, कांगो का जनतांत्रिक गणराज्य तथा इक्वेडोर और उरुग्वे भी इस सूची में शामिल है। इनमें सिर्फ ऑस्ट्रेलिया ही एक अकेला ऐसा देश है जिसे व्यस्क जनतंत्र कहा जा सकता है। बाकी सब तो अत्यंत सूक्ष्म राज्य हैं। वे औपनिवेशिक दौर से आज तक क्रांतिकारी फौजी तानाशाहों के द्वारा शासित होते रहे हैं। सिंगापुर एक अनूठा देश है, जो प्राचीन यूनानी नगर राज्यों की याद दिलाता है और जिसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। इन देशों के अलावा कुछ और दशों ने अनिवार्य मतदान को कानूनन लागू तो किया है पर इस कानून का पालन न करने वालों को सजा नहीं दी जाती। बेल्जियम, ग्रीस, थाइलैण्ड और तुर्की इस सूची में शामिल हैं। स्पेन, वेनेजुएला और चिली ने अपने यहां यह कानून बनाने के बाद उसे वापस भी ले लिया है।
मेरा व्यक्तिगत मानना है कि इस विषय में उतावलेपन की जरूरत नहीं है, धैर्य की आवश्यकता है। प्रयोग के तौर पर इसको स्थानीय स्तर पर लागू किया जा सकता है। इसके असर के आधार पर ही कोई ठोस निर्णय लिया जाए, तभी सभी संवैधानिक संस्थाओं के बीच आम सहमति और व्यापक बहस के बाद इसे लेना ज्यादा बेहतर रहेगा।
इसके साथ मैं पुनः अपनी बात पर बल देते हुए कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमें इस दिशा में सोच-समझकर, राय-मशविरा करके एक बहुत ही प्रभावी तंत्र के माध्यम से अनिवार्य मतदान की तरफ हमें बढ़ना चाहिए और दुनिया के लिए मिसाल कायम हो। इसी के साथ मैं अपनी बात पर पुनः बल देते हुए कि हमारे देश में अनिवार्य मतदान के विचार पर बहस शुरू हो गई है और इस दिशा में काम शुरू हो जाना चाहिए। अनिवार्य मतदान लोकतंत्र की बहुत बड़ी पूंजी होगी, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
डॉ. उदित राज (उत्तर-पश्चिम दिल्ली) : महोदय, मुझे आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी बात सदन में रखने का मौका दिया है, इसके लिए आपका आभारी हूं। जहां तक अनिवार्य मतदान की बात है, भारत एक ऐसा देश है जो विभिन्नताओं से भरा हुआ है और शिक्षा का लेवल भी अलग है। जाति को ध्यान में रखा जाता है, पैसे को ध्यान में रखा जाता है। ऐसे में लोगो को बीच का रास्ता निकालना उचित होगा। मतदान को अनिवार्य तो नहीं बनाया जा सकता है लेकिन जो वोट न दें उनके सर्टीफिकेट में या एनुअल... अप्रेजल्स या कुछ दूसरे इंसेंटिव्स होते हैं, उन पर मार्क किया जा सकता है लेकिन मतदान अनिवार्य नहीं किया जा सकता है। भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। India is one of the largest democracies in the world. We cannot force upon the people this policy. Of course, we can pursue it. But first, they need to be educated. एजुकेशन की आवश्यकता है। शिक्षा प्राप्त करके लोग अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे कि हाँ वोट करना उनके लिए जरूरी है न कि उनके ऊपर प्रभाव बनाकर अनिवार्य मतदान कराया जा सकता है। अनिवार्य मतदान से यह जरूरी नहीं है कि हमारे सिस्टम में इप्रूवमेंट आए। चूंकि जब चुनाव होता है तो मतदाता के माइंड की स्थिति कुछ और होती है। चुनाव के पहले और चुनाव के बाद मतदाता की मनोस्थिति कुछ और होती है। जब चुनाव नहीं होता है तो उसकी नज़र में बेसिक सुविधाएं चाहे बिजली हो, पानी हो, रोजगार हो या स्वास्थ्य की हो, ये सभी सुविधाएं वह सोचता है कि उसे जरूर मिलनी चाहिए। इन्हीं सुविधाओं की चिंता मतदाताओं को होती है। जब चुनाव का समय आता है तो कहीं आइडोलोजी के आधार पर, जाति के आधार पर, पैसा दे कर भी लोग वोट देते हैं और काफी हद तक वोट खरीदे भी जाते हैं और दबाव डालकर भी वोट लिए जाते हैं। लोगों में दो तरह की मानसिकता बन जाती है - वोट डालने से पहले की मानसिकता और वोट डालने के बाद की मानसिकता। अगर इस मानसिकता के दौर में अगर मतदान अनिवार्य बनाया जाएगा तो it would not be a true reflection of the will of the people in the Parliament. मैं इस बात को सपोर्ट नहीं करता हूं कि मतदान अनिवार्य होना चाहिए बल्कि कुछ न कुछ पैरामीटर्स तय किए जाने चाहिए।...(व्यवधान)
श्री भर्तृहरि महताब (कटक) : कम्पलसरी वोटिंग इस देश में इमप्रैक्टिकल है।
DR. UDIT RAJ : Even the smaller countries are facing problems in this case and they want to revert their decisions. They are looking back. जैसे अमेरिका में भी नहीं हुआ है, ये काफी पढ़े-लिखे हैं। इंग्लैंड में है, फ्रांस में है, यूरोपियन कंट्रीज में नहीं है। भारत में इतना सम्भव नहीं हो सकता, लेकिन वेस्टेड इंटेरेस्ट वाले लोग इसका एडवांटेज उठा लेंगे। लेकिन डेमोक्रेटिक सेटअप में इसका कोई फायदा नहीं होगा। To promote the values for good governance, मुझे नहीं लगता कि इससे गुड गवर्नेंस लाई जा सकती है। डेमोक्रेसी का पर्स्यूएशन टेनेट्स से होता है। Persuasion and consensus are the basic elements for exercising the franchise. जब फ्रेंचाइज को ही एक्सरसाइज करता है तो अपनी कंसेंस से करता है, फिर उसका कंसेंस खत्म हो जाएगा। They will be forced upon to cast vote. That is not possible. Of course, even if it is made, कुछ जगहों पर लोकल बॉडीज़ में किया भी गया है। I am getting the feedbacks. The feedbacks are not good. लोकल बॉडीज में ऑफकोर्स हो भी सकता है।At the lower level and at the village level, it may be possible. Of course, I cannot say it also, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर या बड़े पैमाने पर, लोक सभा या विधान सभा के स्तर पर यह सम्भव नहीं लगता है। इसलिए कंसेंस को छोड़ा जाना चाहिए।
यह जरूर है कि चुनाव आयोग को और हम सबको कुछ न कुछ इस बारे में करना चाहिए। जैसे मिडल क्लास है, वे सिर्फ क्रिटीसिज़म ही करते हैं, वे सबको रिजेक्ट करेंगे, सबको क्रिटीसाइज करेंगे कि यह भी गलत है, वह भी गलत है, एक्जीक्यूटिव भी गलत है, पालिटिशियन गलत है। पालिटिशियन को इतना बुरा पेश करेंगे, इंडियन सिनेमा से लेकर और मिडल क्लास जो डिसकशन या डिबेट करता है चाय के ऊपर या अपने घरों में। लेकिन उनसे पूछा जाए की चुनाव के दौरान क्या वह एक घंटा भी नहीं निकाल सकते कि जाकर वोट करें। इसलिए यह मौका तो जरूर मिलता है कि the middle-class people are just for criticism. जो कि हम लोगों के लिए एस्पर्शन पास करते रहते हैं। यह मिडल क्लास फिनोमिना ज्यादा है। मैंने देखा है कि जो गरीब हैं, जो क्लस्टर्स में रहते हैं, झुग्गी-झोंपड़ियों में रहते हैं, वे मजदूरी न करें तो शाम को उनका चूल्हा नहीं जलता है, रोटी का इंतजाम नहीं होता है, फिर भी वे वोट डालने आते हैं। परंतु जो बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते हैं, अपर क्लास है, अपर मिडल क्लास है, क्या डेमोक्रेसी के डीमेरिट्स को ही गिनाने के लिए हैं? उनके ऊपर जरूर कुछ कुछ अंकुश लगाया जाना चाहिए।We must hammer on them that they, in fact, failed to discharge their basic citizenship duty. जहां हाइली एजुकेटेड कालोनीज हैं, पॉश कालोनीज हैं, वहां से वोटर कम निकलता है। उनका एक और भी लॉजिक होता है कि वोट देने से क्या फायदा, सभी तो चोर हैं, करप्ट हैं। इसका मतलब तो यही है कि उन्हें फिर देश छोड़कर चले जाना चाहिए। अगर इस देश का वे हिस्सा हैं, लोकतंत्र का फायदा वे ले रहे हैं, I have seen that the voter percentage is down more in South Delhi as compared to other places. उसी सरकार को क्रिटीसाइज करते हैं, जबकिthey are getting all benefits from the Government. They are using the roads of the Government, basic facilities and governance provided by the Government. To that Government they say: “I do not want to take part in the Government”. जो व्यक्ति वोट नहीं देता, इन अवे वह सरकार का हिस्सा नहीं बनता। अगर यहां पर चर्चा की जाए, किसी मंत्री से पूछा जाए, डॉ. हर्षवर्धन जी बैठे हैं, उनसे पूछा जाए और अगर कोई पालिसी मैटर होगा तो डॉक्टर साहब कहेंगे कि हम सरकार से बात करेंगे, प्रधान मंत्री जी भी कहेंगे कि हम सरकार से बात करेंगे। आखिरकार खोजते-खोजते सरकार कहां मिलती है, सरकार जनता में मिलती है, वोटर में मिलती है। जब वे हिस्सा ही नहीं बनते हैं, वोट डालने नहीं जाते। What more locus standi they have to criticise? So, they must be told.
इस चर्चा के माध्यम से हमें मौका मिलता है कि to convey a message to those who are very passive and to those who are coming forward in front in criticising. तो क्रिटीसिज्म के लिए या इसकी जो एब्रेशंस हैं, डेमोक्रेसी के एब्रेशंस पूरे विश्व में हैं। हमारे यहां भी अबरेशन्स हैं। I am not saying that aberrations are not there. Aberrations are all over in the world. पॉलीटिक्स के प्रति नेगेटिवज्म बहुत हो गया है। उनसे यह पूछा जाए कि क्या वे फ्यूडल स्टेज में जाना चाहेंगे? क्या वे राजतंत्र को बर्दाश्त करेंगे? तभी उन्हें पता चलेगा कि कितना अत्याचार उस समय जब जमींदारों का राज हुआ करता था, राजाओं का राज हुआ करता था या सामंतवाद हुआ करता था या जो भी गनर्वेंस के सिस्टम्स पास्ट में रहे हैं, उस समय आम जनता की क्या स्थिति है।
HON. CHAIRPERSON : Hon. Members, for discussion of this Bill, eight hours was allotted. Now, those eight hours have been complete. As there are six more Members to take part in the discussion on the Bill, the House has to extend the time for further discussion on the Bill. If the House agrees, time for discussion of the Bill may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes Sir.
HON. CHAIRPERSON: The time is extended by one hour for discussion for this Bill.
SHRI N.K. PREMACHANDRAN (KOLLAM): Sir, I have an objection. Already eight hours have elapsed. There is another important Bill that is Transgender Bill is pending. In the last session also, it was pending and in this session also, it is pending.
HON. CHAIRPERSON: The House has extended for discussion for only one hour. Please continue Udit Raj Ji.
DR. UDIT RAJ : Mr. Premachandran, I think you will get an opportunity to have the discussion on that thing. We will not take long time. मैं यह कहना चाहूंगा कि कुछ न कुछ मैज़र्स सरकार द्वारा अवश्य लिए जाने चाहिए। इलेक्शन कमीशन को कुछ न कुछ पैरामीटर्स और नार्म्स बनाने चाहिए। सरकार के स्तर पर भी होना चाहिए। स्कूल के पाठय़क्रम में भी इसको इनक्लूड किया जाना चाहिए Why voting is necessary? Those who are critic of the Government or critic of the whole political system and of course, in one voice, they dismiss everyone. They must be reminded of their duty or their conscience. कुछ न कुछ जरूर किया जाना चाहिए।The voting percentage should increase.
A large number of voters must be brought up in the net of franchise or in casting the vote. That is necessary. I am not in favour of compulsory voting. But definitely, there must be some reformative measures. At the end, I say that so much of negativism about the democracy, so much of negativism about electoral politics has to be curbed. This is a very dangerous trend to the country. Even the younger generation thinks that the politics is not for the good people. इस तरह का जो सेंटीमेंट्स और भावनाएं पैदा हो रही हैं, वह देश के लिए हेल्दी साइन नहीं है। इसलिए करीकुला के माध्यम से, डिबेट के माध्यम से these things should be taken care of.
श्री रवीन्द्र कुमार राय (कोडरमा) : सभापति महोदय, आज आवश्यक मतदान पर चल रही चर्चा पर आपने भाग लेने का अवसर दिया है, मैं उसके लिए आपका आभारी हूं।
महोदय, इस देश के स्वभाव में लोकतंत्र है और लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं है। आज जिस विषय पर चर्चा हो रही है, उसके बारे में हम यह कह सकते हैं कि यह ऐसे क्रांतिकारी कदम के बारे में चर्चा है जिसके बारे में शायद कल्पना करने में भी कठिनाई हो रही है। मैं समझता हूं कि आज से पांच सौ साल पहले इस देश के लोगों में प्रजातंत्र के बारे में चर्चा होती तो लोग कहते कि ये बेफिज़ूल की बातें कर रहे हैं, मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं। क्योंकि आज से दो सौ या पांच सौ साल पहले लोकतंत्र की कल्पना करना भी संभव नहीं था। लोकतांत्रिक भावना का आदर करना राजतंत्र में दिखाई जरूर देता था, लेकिन लोकतंत्र के आधार पर शासन तंत्र चलेगा और उसमें सभी लोगों के हितों और मतों की चिंता होगी, इस प्रकार की कल्पना शायद आज से पांच सौ साल पहले नहीं रही होगी। लेकिन आज हम यह बात कह सकते हैं कि सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी देश में लोकतंत्र का विकल्प प्रस्तुत करने का दम किसी में नहीं बचा है। लोकतंत्र का कोई विकल्प हो सकता है, इसकी चर्चा करने में भी डर लगता है। अर्थात लोकतंत्र का मतलब ही होता है कि हर एक लोक के बारे में हम विचार करें। हम कहते हैं कि शिक्षा का अधिकार सबको मिलना चाहिए। जिस व्यक्ति ने भी जन्म लिया है, वह चाहे पहाड़ों के बीच में रहता हो, दूरदराज जंगलों में रहता हो या शहर की झुग्गी-झोंपड़ियों में रहता हो, जब तक सबको शिक्षा का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक शायद हम शासन का और संविधान की भावना का सम्मान नहीं कर पायेंगे। यह किसी भी शासन तंत्र का दायित्व बनता है कि हर व्यक्ति को शिक्षित करे और मुझे फLा है कि माननीय अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के समय में एक सर्वशिक्षा अभियान चला था, जिसमें यह कहा गया था कि हर कस्बे में जहां 30 बच्चे मिलें, 50 बच्चे मिलें, वहां भी आप स्कूल खोलो। आखिर इसके पीछे क्या भावना है। हम यदि हर बच्चे को शिक्षित करने की बात कह सकते हैं, हम यह कह सकते हैं कि चाहे अकाल पड़े या कोई बहुत बड़ी वीभत्स प्राकृतिक आपदा आ जाए तो भी किसी व्यक्ति के भूखे मरने की नौबत नहीं आनी चाहिए, हर आदमी को रोटी मिलनी चाहिए। किसी शासन में यदि कोई व्यक्ति भूखा मर जाए तो यह माना जाता है कि वह शासन असफल हो गया। हर व्यक्ति को रोटी का अधिकार है, हर व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है, हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। संविधान कहता है कि जिसका कोई अता-पता नहीं, जिसकी कोई जानकारी नहीं है, यदि किसी का घर नहीं है, दरवाजा नहीं है, लावारिस है, उस व्यक्ति की भी हत्या नहीं हो सकती, उसे भी जीने का पूर्ण अधिकार है। यदि एक-एक व्यक्ति को जीने का अधिकार है, चाहे उसके पास धन हो या न हो, जमीन हो या न हो, घर हो या न हो, जिसने जन्म लिया है, उसे जीने का अधिकार है। माता-पिता जन्म देते हैं, जन्म देने का अधिकार माता-पिता को जरूर होता है, लेकिन कोई माता-पिता यह कहे कि जिसे मैंने जन्म दिया है, उसे हम जिंदा नहीं रहने देंगे तो उस पर धारा 302 लग जायेगी। जीने का अधिकार है, रोटी का अधिकार है, शिक्षा का अधिकार मिल सकता है और यदि उसे मतदान का अधिकार मिला है और वह उसका उपयोग नहीं कर पा रहा है तो यह जिम्मेदारी कौन पूरी करेगा। यह सवाल लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर में और सबसे बड़ी पंचायत में स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय बना हुआ है। इसीलिए मैं श्री जनार्दन सीग्रीवाल जी का आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे को सदन के सामने रखा है।
सभापति जी, आज सरकारें बनती हैं, किस प्रकार की बहुमत की सरकार है। 52 प्रतिशत, 45 प्रतिशत मतदान होता है और उसमें 24 परसैन्ट 32 परसैन्ट वोट लाकर हम सरकार बनाते हैं और कहते हैं कि बहुमत की सरकार है। क्या इसे बहुमत माना जाए या जनता के मत को बहुमत माना जाए। लोकतंत्र में जो प्रतिनिधि जीतकर आते हैं, हम उसी को बहुमत मान लेते हैं। लेकिन लोकतंत्र में जिताने वाले मतदाताओं के बहुमत को हमने बहुमत नहीं माना है। क्या यह एक सवाल नहीं है कि सौ में पचास प्रतिशत, साठ प्रतिशत मतदान होता है और उसमें मात्र 30-32 परसैन्ट वोट लाकर कोई पार्टी, कोई व्यक्ति चुनाव जीत जाता है। हम यह कहते हैं कि बहुमत से जीतकर आया है। दुनिया के कई देशों में इस प्रकार के प्रावधान हैं कि जहां यह कहा जाता है कि 51 परसैन्ट से अधिक मतदान जो लायेगा, वही जीता हुआ माना जायेगा।
हम लोकतंत्र में काम चला रहे हैं। किसी तरह से हम लोकतंत्र को घसीट रहे हैं। मुझे लगता है कि जब हम यह कहते हैं कि यह व्यवहारिक नहीं है, व्यवहारिकता और क्रांतिकारिता में अंतर होता है। व्यवहारिकता में जो परंपरा चल रही है, उसमें से थोड़ा बहुत आगे बढ़ा कर, आज मेरे झारखण्ड में पंचायत का चुनाव हुआ, लोक सभा का चुनाव हुआ था, विधान सभा का चुनाव हुआ, पिछले सभी चुनावों से धीरे-धीरे चुनाव का प्रतिशत बढ़ रहा है। लेकिन जिन नक्सली क्षेत्रों में जहां लोग मतदान का बहिष्कार करते हैं, जो लोग कहते हैं कि वोट देना बेकार है, सभापति महोदय, हमारे हमारे झारखण्ड में चतरा जिले में एक ऐसा भी प्रखण्ड था, लावालोंग, जहां पर नकस्ली ये कहते थे, कुछ लोग ये कहते थे कि मतदान में भाग नहीं लेना है। कभी मतदान में भाग लेने वाले लोगों को दण्डित किया गया। उन्होंने खुद किसी विरोधी को खड़ा नहीं होने दिया और अकेले नॉमिनेशन किया और सभी पदों पर निर्विरोध जी गए। तीसरी बार, इस बार मतदान हुआ, 80 प्रतिशत वोट पड़े, जनता के अंदर वोट देने की कैसी तमन्ना है, कैसी उसकी जिज्ञासा है, इसका अंदाज़ा हम लगा सकते हैं। मैं कई बार सोचता हूँ अव्यवहारिक बातों पर चर्चा क्यों की जाए। लेकिन जिस प्रकार से राजतंत्र के बाद लोकतंत्र आना अपने आप में एक क्रांतिकारिता थी, क्रांतिकारी परिवर्तन समाज में हुआ, संविधान का निर्माण हुआ, लिखित संविधान का निर्माण हुआ, परंपराओं से आगे बढ़ कर के लिखी हुई बातें हमारे जीवन को प्रभावित करने लगी, उसी प्रकार से यदि यह देश के लोगों को हम तैयार करें, तो अनिवार्य मतदान एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम हो सकता है। जो शायद दुनिया के अंदर, और मैं कहना चाहता हूँ कि हिंदुस्तान ने दुनिया को कई बार मार्गदर्शन दिया है, कई बार रास्ता दिखाया है, क्या इस प्रकार की लोक तांत्रिक भावनाओं का सम्मान करते हुए, हम इस प्रकार का एक क्रांतिकारी निर्णय नहीं ले सकते हैं। कल यदि इस प्रकार का निर्णय लिया जाए तो हमारे कुछ मित्र ये कहते हैं कि व्यवहारिक नहीं है।
आज मैं एक बात कहना चाहता हूँ जो गरीब है, झुग्गी झोपड़ियों में रहता है, जंगलों में रहता है, साल भर उसकी कोई सुध नहीं लेता है। लेकिन जब चुनाव आता है, तो विधायक बनने वाले, एमपी बनने वाले, मंत्री बनने वाले, प्रधान मंत्री बनने वाले, मुखिया बनने वाले उसके दरवाजे पर जाते हैं और उनको कहते हैं कि आपके हाथ में मतदान है, उसके सामने आरजू और विनती करते हैं। जिस बूढ़ी का मुखड़ा देखना, जिस बुज़ुर्ग का चेहरा देखना भी वे जरूरी नहीं समझते हैं, उसका पैर छूते हैं। उससे आरजू विनती करते हैं कि माता तुम वोट जरूर देना पांच साल में एक बार ही सही महोदय कम से कम कोई तो जा कर झोंपड़ी में रहने वाली हमारी माता को, भाइयों को आग्रह करता है कि तुम्हारे वोट से हमारी किस्मत बनने वातली है। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि क्या चुनाव लड़ने वाले के लिए एक प्रकार से आवश्यकता नहीं हो जाएगी कि वह हर वैसे मतदाता के घर जाए, कहीं खुद जाएगा, कहीं उसका कार्यकर्ता जाएगा, कहीं उसका फॉलोवर जाएगा और हरेक मतदाता के अधिकार को जागृत कर के उसकी भावना को आगे बढ़ा कर और उससे मतदान कराने का प्रयास करेगा। शायद मतदाताओं के लिए मतदान आवश्यक करेंगे, तो वह कितना महत्वपूर्ण होगा, मुझे मालूम नहीं, लेकिन उसका प्रभाव उसके मन पर कितना पड़ेगा, इसका मैं आज अनुमान नहीं लग सकता हूँ। लेकिन मैं यह अनुमान जरूर लगा सकता हूँ कि जब एक-एक मतदाता के यहां चुनाव लड़ने वाले लोग घर-घर पहुंचेगे, ये नहीं सोचेंगे कि विधान सभा का चुनाव जीतना है, सौ बूथ हमने मैनेज कर दिया, जीतना निश्चित हो गया। शायद शतप्रतिशत मतदान करेंगे तो बूथ कैप्चरिंग, वोट बैंक बनाने का काम, बाकी इस प्रकार के लोकतांत्रिक पद्धति को जो कलंकित कर रहा है, उन सारी व्यवस्थाओं पर एक गंभीर चोट होगी। और यह चोट करनी चाहिए। इसे कौन करेगा?
कई बार लोग कहते हैं कि पिछड़े क्षेत्रों में, जंगलों में रहने वाले लोग वोट नहीं करते हैं। मेरा तो अनुभव यह है कि वे तो वोट डालने चले जाते हैं। कभी-कभी लोग कहते हैं कि हम वोट बहिष्कार करेंगे तो हम कहते हैं कि वोट बहिष्कार करेंगे तो हम आपके पास क्यों आएंगे, आपकी समस्या का समाधान क्यों करेंगे? जब आप वोट ही नहीं देंगे तो हम आपके पास नहीं आएंगे। राजनीतिक दलों के लोग जब इस प्रकार की बात करते हैं तो लोग कहते हैं कि वोट डालने जाएंगे। मुझे आश्चर्य तब होता है जब पढ़े-लिखे लोग, ज्यादा पढ़े लिखे लोग, रिटायर्ड आईएएस, रिटायर्ड मिलिट्री मैन, हमारे अधिवक्ता, प्रोफेसर्स, डॉक्टर्स, वकील, इंजीनियर्स आदि लोग, शायद उन अनपढ़ लोगों से ज्यादा मिन्नत इन लोगों के सामने करनी पड़ती है कि आप वोट डालने जाइए। इन लोगों की कालोनीज में वोट प्रतिशत बहुत कम रहता है। सामान्य जनता का वोट जब 70-75 प्रतिशत पड़ता है तो ऐसे समझे हुए लोग, पढ़े-लिखे लोग, समझदार लोग, जो अपने आपको विद्वान कहते हैं, उनका मतदान 18 परसेंट, 20 परसेंट या 22 परसेंट होता है। आखिर उनको जिम्मेदारी का अहसास कौन कराएगा? सारी सुख-सुविधाओं का उपभोग वे करेंगे, नौकरी से रिटायर होने के बाद भी, बड़े बिजनेस मैन भी वोट डालने नहीं जाते हैं। सारी सुविधाएं उनको समाज से मिली हुई हैं, सुरक्षा मिलती है, इज्जत मिलती है, सम्मान मिलता है, लेकिन वोट डालना उनके लिए जरूरी नहीं होता। लोग कहते हैं कि प्रजातंत्र में गलत लोग चुने जाते हैं, अच्छे लोग आएंगे कैसे, अच्छे लोगों के आने का मापदंड कैसे तय होगा, यदि कुछ ही लोग वोट को कैप्चर करके, लोकतंत्र को कैप्चर करके अपना मतदान करेंगे।
HON. CHAIRPERSON: Dr. Banshilal Mahato.
श्री रवीन्द्र कुमार राय : महोदय, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा थी, इसलिए मैंने अपनी बात आपके सामने रखने की कोशिश की है। मैं कुछ बिन्दु और आपके सामने रखना चाहता हूँ। आज इस देश में चुनाव के लिए समीकरण बन रहे हैं, चुनाव के लिए समरसता नहीं हो रही है। समीकरण बनाकर हम चुनाव जीत जाते हैं। पिछले दिनों के चुनाव इस बात के गवाह हैं कि हम समाज को वर्गों में बाँटकर के चुनाव जीतने की योजना तो बना लेते हैं और यह तय कर लेते हैं कि हम इस प्रकार से जीतेंगे, लेकिन उसी जगह पर सच्चाई हार जाती है, ईमानदारी हार जाती है। मेरी आपसे प्रार्थना होगी, हम चाहेंगे कि इस बहस में कहीं न कहीं इस संसद से इस प्रकार की भावना निकलकर के सामने आए, इस देश में गरीबों का एक बहुत बड़ा वर्ग है, इस देश में अमीरों का भी बहुत बड़ा वर्ग है और लोकतांत्रिक भावना की रक्षा करने में एक की नीयत कमजोर है, दूसरे की आवश्यकता कम है, लेकिन कहीं न कहीं हम एक बहुत बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी, राष्ट्रीय जिम्मेदारी का निर्वहन हम इस पद्धति को आगे बढ़ाकर कर सकते हैं और इस देश के एक-एक व्यक्ति का, एक-एक भारतवासी के बहुत बड़े सपने को हम साकार कर सकते हैं, उसकी सेवा करने का रास्ता खोल सकते हैं। राजनीति के संस्कार और राजनीति के दायरे को बढ़ा सकते हैं। मुझे लगता है कि इस पर जरूर विचार करना चाहिए। बहुत-बहुत धन्यवाद।
डॉ. बंशीलाल महतो (कोरबा) : महोदय, आज जिस विषय पर मैं बोल रहा हूँ।...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN : Hon. Chairman, Sir, I am on a point of order.
HON. CHAIRPERSON: Under what rule?
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Sir, it is under Rule 362 coupled with Rule 376. Rule 362(1) says:
“At any time after a motion has been made, any member may move: ‘That the question be now put’, and unless it appears to the Speaker that the motion is an abuse of these rules or an infringement of the right of reasonable debate, the Speaker shall then put the motion ‘That the question be now put’. ” Sir, my point is that eight hours have elapsed since debate on this Bill was started. … (Interruptions)
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): महोदय, बहुत से माननीय सदस्य इस पर बोलना चाहते हैं।...(व्यवधान)
श्री जनार्दन सिंह सीग्रीवाल (महाराजगंज) : बहुत से लोग इस पर बोलना चाहते हैं।...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: I am on a point of order. Let me submit. … (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Members want to speak on this Bill.
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: I am on a point of order. … (Interruptions) Let the Chair rule. … (Interruptions) Why should you interrupt? Sir, let me complete. … (Interruptions) Chairman, Sir, I am seeking a ruling from you. … (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON : We have taken the sense of the House, and Members want to speak on this Bill.
… (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: I have taken the sense of the House.
… (Interruptions)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN : I am not making any dispute. I am only seeking a ruling. Suppose, the debate is protracted and suppose a healthy debate is going on, but every Member has a right to seek for this motion to be put to vote. Hence, I am saying under Rule 362. … (Interruptions) Let me submit. … (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: No, I have taken the sense of the House.
… (Interruptions)
SHRI ARJUN RAM MEGHWAL: I want to say something on this issue. … (Interruptions)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN : Mr. Meghwal, let me submit. … (Interruptions) My reasonable apprehension is that this debate is being protracted so as to sabotage the Transgender Bill. I reasonably had that apprehension last week also. It is because two hours was allotted for the discussion on this Bill on Compulsory Voting. Today also, I had discussions with the Government and informally an assurance was given that this Bill will be taken up for consideration.
It is the democratic right of a private Member to move that Bill before this House. My democratic right to move the Bill before the House is being unduly delayed so as to sabotage this Bill. So, under Rule 362, I demand that this motion be put to vote.
श्री अर्जुन राम मेघवाल : सभापति जी, हम कोई डिले नहीं कर रहे हैं। प्रेमचन्द्रन जी ने अपनी बात रखी है। यह प्राइवेट मैम्बर्स बिज़नैस का समय है। इसमें जो मैम्बर्स बोलना चाहें, हम उनको कैसे रोक सकते हैं? जब इस बिल का समय समाप्त होगा तो इनकी भी बारी आ जाएगी। हम इनके बिल के लिए कोई मना नहीं कर रहे हैं। लेकिन अगर कंपलसरी वोटिंग पर सदस्य बोलना चाहते हैं तो हम उनको रोक नहीं सकते। उनका भी अधिकार है। आप सैन्स ऑफ द हाउस देखें। ...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN : Why are you fixing time for it? … (Interruptions) My question is this. Why are you fixing time of two hours for it? … (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Yes, hon. Member, please continue.
… (Interruptions)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Sir, I want a ruling from the Chair. … (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: I have taken the sense of the House. The Members wants to speak, and that is why Members will speak.
… (Interruptions)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Sir, this House runs according to rules and procedures. … (Interruptions) This is totally unfair. … (Interruptions)
डॉ. बंशीलाल महतो : सम्माननीय सभापति महोदय, आज मैं एक महत्वपूर्ण विषय पर अपनी बात रख रहा हूँ। जो बिल सीग्रीवाल जी लाए हैं, वह इस देश के हित में है और मैं इसके पक्ष में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूँ। हमारे देश में बहुत वर्षों तक गुलामी भी थी, बहुत वर्षों तक राजा-महाराजाओं का राज था। रानी के पेट से पहले राजा का जन्म होता था, लेकिन आज प्रजातंत्र का ज़माना है और बैलट पेपर के आधार पर राजा का जन्म होता है, या प्रतिनिधि का जन्म होता है। हमारे प्रजातंत्र में जिन लोगों ने आज़ादी के लिए आंदोलन किया था और उस समय फाँसी के फंदे पर चढ़े थे, उनकी यही इच्छा थी कि इस देश में फिर से लोकतंत्र कायम हो और बढ़िया लोकतंत्र बने। सौभाग्य से 2014 का जो लोकतंत्र है, यह बहुत ही अच्छा है और लोकतंत्र के इस मंदिर में हम अपनी बात कहना चाहते हैं।
महोदय, वास्तव में कंपलसरी मतदान होना ही चाहिए। दुर्भाग्य है कि पहले मसल पावर और मनी पावर के आधार पर चुनाव हुआ करता था। आज भी कुछ हिस्सों में ऐसा हो रहा है। हम लोग चाहते हैं कि इस पर प्रतिबंध लगे। कंपलसरी मतदान होगा तो मनी पावर और मसल पावर का कोई स्थान नहीं रह जाएगा। ऐसे ही पूर्वोत्तर प्रदेश में 20 प्रतिशत मतदान में भी कुछ सरकारें बनी थीं। यह इस देश के लिए दुर्भाग्य की बात है। हम चाहते हैं कि 50 प्रतिशत से ऊपर मतदान की बात जहाँ तक होती है एक व्यक्ति के लिए, वह अलग है। कंपलसरी मतदान होने से निश्चित रूप से अच्छे लोग चुनकर आएँगे। देखा गया है कि वही लोग मतदान नहीं करते जो लोग सरकार से सारे फायदे उठाते हैं। गरीब ज़रूर निश्चित रूप से मतदान करता है। इसलिए मैं इस बात के पक्ष में हूँ कि कंपलसरी मतदान होना चाहिए। देश इससे आगे बढ़ेगा और प्रजातंत्र मज़बूत होगा। भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश है इसलिए यहाँ क्लियर कट मतदान होना चाहिए। सब के सब मतदान करें और किसी भी प्रकार से मनी पावर और मसल पावर बंद होना चाहिए। बुलेट का प्रयोग नहीं होना चाहिए और बैलट पेपर के आधार पर या ई.वी.एम. मशीन में हमारा मतदान दर्ज होना चाहिए।
मेरा एक निवेदन और है कि चुनावों में बहुत सारे इंडीपैंडैंट कैंडीडेट्स खड़े होते हैं। उससे भले ही मतदान का प्रतिशत ज्यादा होता है, लेकिन 51 प्रतिशत मतदान किसी एक व्यक्ति के पक्ष में नहीं हो पाता और वह कम हो जाता है। इसलिए उस पर भी एक लिमिटेशन होनी चाहिए। बहुत सारे राजनीतिक दलों का प्रतिशत कम हो जाता है, इसलिए उनका भी रजिस्ट्रेशन समाप्त कर देना चाहिए। अंत में कंपलसरी मतदान का समर्थन करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ। धन्यवाद।
श्री कामाख्या प्रसाद तासा (जोरहाट) : माननीय सभापति जी, जनार्दन सीग्रीवाल जी जो बिल लेकर आये हैं, उसको सपोर्ट करने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं।
हम लोग जिस क्षेत्र से आते हैं, उस क्षेत्र में वोट का परसेंटेज बहुत कम होता है। फिर भी हम लारजैस्ट डैमोक्रेसी हैं, यह बात पूरी दुनिया में बोल रहे हैं। मैंने देखा कि नोर्थ ईस्टर्न स्टेट्स में वोट का परसेंटेज बहुत कम है, यह बात बहुत से लोगों ने बोली है। इसका कारण है कि वहां एक्सट्रीमिस्ट्स का दबाव भी है और इसमें दूसरे बहुत से कारक हैं। बड़े-बड़े लोग अभी बोले हैं, रविन्द्र जी भी बोले हैं, उदित जी भी बोले हैं, जो वोट डालने वाला आदमी है, उसमें जो हाई क्लास वोटर्स हैं, जो एरिस्टोक्रेट वोटर हैं, वे कभी वोट नहीं डालते। मैं जब इलैक्शन जीता तो मुझे पूछा गया कि आप कौन से वोट से जीते तो मैंने बोला कि मैं लगान टीम से जीता हूं। लगान टीम में जिस टीम ने क्रिकेट जीता था, उसी टीम में जो गरीब लोग हैं, जो काम करने वाले आदमी हैं, उन लोगों के वोट से हम जीते थे। लेकिन जब हम जीतकर आये तो उसके बाद देखा कि उनका पार्टीसिपेशन नहीं था, जिसका पार्टीसिपेशन नहीं था, वे लोग ज्यादा हम लोगों के पास आ रहे हैं। वे लोग आकर यह बात बोल रहे हैं कि उनको कोई कांट्रैक्ट चाहिए, कोई ट्रांसफर चाहिए, कुछ पोस्टिंग चाहिए, इसमें ज्यादातर रिटायर्ड आई.ए.एस. ऑफिसर्स, डी.सी., एस.पी. ऐसे आदमी ज्यादा हैं। गरीब लोग जो वोट डालने के लिए गये, उन लोगों का उसके बाद महत्व नहीं रहता है। जैसा मुझे लगा, जैसा माननीय सदस्यों ने बोला है, कम्पलसरी वोटिंग के लिए किसी-किसी ने बोला है कि यह पोसिबल नहीं है। इसमें सेम मकेनिज्म यूज़ होगा, जैसे हर बूथ पर ऑफिसर जायेगा, पोलिंग ऑफिसर जायेगा, पोलिंग एजेण्ट जायेगा, प्रीज़ाइडिंग ऑफिसर जायेगा, ऐसे ही एक सिस्टम तो बना ही हुआ है, पूरे देश में जितने बूथ हैं, सारे बूथों में अगर सिस्टम जाता है, इलैक्शन कमीशन उनको वहां पर डिस्प्यूट करता है तो मुझे लगता है कि इसमें कुछ नई चीज़ जोड़ने की जरूरत नहीं है। यह जोड़ने की जरूरत है कि लोग वहां जायें, हर इलैक्शन में हम देखते हैं कि इलैक्शन के दिन तो बन्द रहता है तो मजदूरी का सवाल भी नहीं होता है और मजदूरी करने वाला जो आदमी है, वे लोग पहले ही बूथ सैण्टर में पहुंचते हैं। जिनको पैसे की जरूरत नहीं है, वे लोग तो वहां आते नहीं हैं।
कम्पलसरी वोटिंग हम लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर लारजैस्ट डैमोक्रेसी बोलते हैं तो उसमें लोगों का लारजैस्ट पार्टीसिपेशन भी होना चाहिए। लारजैस्ट पार्टीसिपेशन अगर नहीं होगा, 100 परसेंट पार्टीसिपेशन अगर नहीं होगा तो हम लोग इसे 100 परसेंट डैमोक्रेसी कैसे बोल सकते हैं। 30-60 परसेंट वोटिंग होती है, उसमें हम लोग जो जीतकर आते हैं, वहां पर 36-37 परसेंट हम लोगों को वोट मिलते हैं। ऐसे में देखा गया है, मुझे लगता है कि कम्पलसरी वोटिंग करने में इंडिया जैसे लारजैस्ट कंट्री को कोई प्रोब्लम नहीं है। हम लोग मैक्सीमम टाइम भारत की बात बोलते हैं, लेकिन इस मामले में हम लोग मैक्सीमम टाइम अमेरिका, फ्रांस, जापान का उदाहरण देते हैं, लेकिन उसमें तो आता है, बाकी कुछ में नहीं आता है। खाली बोलने में फ्रांस, अमेरिका, जापान की बात यहां पर हमारे सदस्य भी बोल रहे हैं, वहां नहीं हो रहा है तो यहां कैसे हो सकता है। खेती-बाड़ी में, कृषि क्षेत्र में जापान, फ्रांस और चाइना की बात बोल रहे हैं। जब डैमोक्रेसी की बात आएगी तो भी बोल रहे हैं, लेकिन मेरा कहना है कि हम लोगों को उनको क्यों फॉलो करना चाहिए। डैमोक्रेसी इंडिया में जो लागू है, यह डैमोक्रेसी दूसरों को फॉलो करने की कोई जरूरत नहीं है।
मैंने बिल में भी देखा, कोई-कोई बोला है, निशिकान्त जी भी उस समय में बोले थे, मेरी यह बात है कि किसी कंट्री में, विश्व के दूसरे देश में अगर सक्सेसफुल नहीं है, वह यहां पर सक्सेसफुल हो सकता है? माननीय नरेन्द्र मोदी जी ने एक बार एक इण्टरव्यू में बोला था, मैंने देखा जब 24 इण्टू 7 वे पावर लगाएंगे तो लोग हंसते थे, लेकिन अभी गुजरात में तो 100 परसेंट, 24 इण्टू 7 बिजली दे रहे हैं। मुझे लगता है कि डैमोक्रेसी जब सक्सेसफुल होनी चाहिए तो पार्टीसिपेशन भी 100 परसेंट होना चाहिए। जब मैं छोटा था तो असम में 1983 में एक एजीटेशन के टाइम में एक सरकार बनी थी, वह कांग्रेस की सरकार थी, उस समय में सभापति महोदय, आप भी जानते हैं, आप भी वहां थे, वहां पर देखा कि वहां पर पुलिस ने वोट डाले थे, वहां पर ऐसा था कि 2-3 आदमियों ने वोट डालकर, 10 आदमियों ने वोट डालकर गवर्नमेंट बनाई थी। वह गवर्नमेंट तीन साल चली, उसके बाद जब एजीटेशन हुआ और एग्रीमेंट हुआ तो उसको तोड़ दिया गया। मुझे लगता है, रविन्द्र जी ने एक बात ठीक बोली है, जैसा उन्होंने अपने वक्तव्य में बोला, जब हम लोग केंडीडेट चुनते हैं, बहुत से लोग हैं, जो किसी के घर में नहीं जाते, वे भी इलैक्शन के टाइम में एटलीस्ट उन लोगों के घरों में जाते हैं, उन लोगों की समस्या की बात बोलते हैं और उनको रिप्रेजेण्ट करने के लिए जो उन लोगों को चाहिए, वह बोलकर आते हैं। मुझे लगता है कि हम लोग जितने पोस्टर छापते हैं, उतने वोट भी हम लोगों को नहीं मिलते। जितना वॉल राइटिंग होता है, उतने वोट नहीं मिलते हैं तो how it is a good democracy. डैमोक्रेसी सक्सेसफुल होनी चाहिए, इसको गवर्नमेंट को सीरियसली लेना चाहिए।
यहां बहुत सारे मंत्री बैठे हुए हैं, 3-4 मंत्री हैं, मैं देख रहा हूं, हर्षवर्धन जी हैं, जोएल जी भी हैं और थावरचन्द जी भी हैं, इनको गवर्नमेंट को बोलना चाहिए कि प्राइवेट मैम्बर्स बिल यह भले ही हो सकता है, लेकिन सरकार को इसे सीरियसली लेना चाहिए। यहां लॉ मिनिस्टर भी हैं, लेकिन लॉ मिनिस्टर हम लोगों की बात सुनते हैं कि नहीं, मुझे नहीं पता, लेकिन लॉ मिनिस्टिर को भी सुनना चाहिए।
17.00 hours महोदय, आप कम्प्लसरी वोटिंग कीजिए। अगर आप अमीर आदमी को फैसिलिटी देना चाहते हैं, तो यह बात अलग है। लेकिन, गरीब आदमी जब लाइन में खड़े होकर वोट कर सकता है, तो अमीर आदमी को भी उस लाइन में खड़ा होना चाहिए। चाहे वह आई.ए.एस. अफसर हो या आई.एफ.एस. अफसर हो, कम से कम एक दिन तो उन्हें वोट के दिन लाइन में खड़ा होना चाहिए।
महोदय, हमारे गृह राज्य मंत्री जिस राज्य से आते हैं, वहां वोटिंग सेन्टर्स बहुत दूर-दराज में हैं। अभी यहां हमारी पार्टी के मणिपुर के इंचार्जप्रहलाद सिंह पटेल जी बैठे हुए हैं। उन्होंने भी यह कहा है। मणिपुर में आज जैसा एक्स्ट्रीमिज्म है, यह क्यों है? आज वहां के युवक हताश क्यों हैं, क्योंकि अब तक उन्हें डेमोक्रेसी के साथ जोड़ा नहीं गया है। उन्हें केवल पोस्टर लगाने में और प्रोसेसन में यूज किया जा रहा है, लेकिन डेमोक्रेटिक सिस्टम में उनका जो पार्टीसिपेशन होना चाहिए, वह नहीं है। इस पार्टीसिपेशन के मामले में हम लोग किसी दूसरे देश का एग्ज़ाम्पल न लें। जापान में आज जितना पॉपुलेशन है, हमारे उत्तर प्रदेश में शायद उससे ज्यादा पॉपुलेशन है। मुझे तो यह लगता है कि बहुत-सी कंट्रीज का पॉपुलेशन हमारे किसी-किसी स्टेट के पॉपुलेशन से भी कम है। अगर हमारे यहां कोई स्टेट किसी चीज़ को लागू नहीं कर पाया, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम लोग पूरे इंडिया में नहीं कर सकते। हमारे यहां इतना बड़ा इलेक्शन कमीशन है। हम लोग इतना बड़ा सिस्टम चला रहे हैं। अगर हम लोग इलेक्शन में मात्र दो लोगों की वोटिंग के लिए 100 आदमी को पैसा दे रहे हैं, तो 100औ वोटिंग में भी कोई प्रॉब्लम नहीं हो सकती। जो लोग वोट डालने नहीं जाएंगे, उनके लिए भी कुछ प्रबंध होना चाहिए। सीग्रीवाल जी ने जो इस बिल में प्रबंध किया है, उतना भी नहीं, लेकिन इसे थोड़ा रिव्यू करके ऐसा करना चाहिए कि ऐसे लोगों के लिए नौकरी में, इलेक्ट्रिसिटी फैसिलिटी में, बैंकिंग फैसिलिटी में कुछ-न-कुछ रोक लगे।
महोदय, हुक्मदेव नारायण यादव जी यहां बैठे हैं। वे कृषि और फार्मर्स की बात करते हैं। हम सोचते हैं कि वे बोल तो रहे हैं, पर इसे मंजूर करने वाले कौन आदमी हैं, जो इसे देख रहे हैं? हमने देखा है कि ऐसे मैक्सिमम आदमी, जो इलेक्शन सिस्टम में पार्टीसिपेट नहीं करते हैं, वे लोग डेमोक्रेटिक सिस्टम में ज्यादातर बाधा डालते हैं। यहां प्रत्येक इश्यू में कोई कंस्टीटय़ुशन की धाराएं निकालते हैं, कोई एग्रीमेंट निकालते हैं, लेकिन आम आदमी के पास जो सुविधा पहुंचनी चाहिए, वह नहीं पहुंच रही है, क्योंकि उनके पास इसके लिए कोई धारणा नहीं है। वे इस सिस्टम के बारे में कुछ जानते नहीं हैं। एक्चुअली, गांव के आदमी को क्या चाहिए, यह नियम बनाने वाले आदमी को पता नहीं है। इसलिए हम लोग जिस नॉर्थ-ईस्ट से आते हैं, तो मैक्सिमम एक्स्ट्रीमिस्ट ऑरगेनाइजेशंस नॉर्थ-ईस्ट में हैं। यह नॉर्थ-ईस्ट का रेस-टू-रेस एक्स्ट्रीमिज्म इसलिए हुआ है, क्योंकि उन लोगों को डेमोक्रेटिक सिस्टम से बहुत दूर रखा गया। वे लोग बहुत दूर-दूर रहते हैं। वे वोट डालने भी नहीं जा रहे हैं। हम लोग मैक्सिमम टाइम देखते हैं कि नॉर्थ-ईस्ट और जम्मू-कश्मीर में लोग वोट बायकॉट इत्यादि करते हैं। वोट बायकॉट कर के वे लोग यह कहना चाहते हैं कि अगर आप लोग हम लोगों का काम नहीं करते हैं, तो हम लोग इसका बायकॉट करेंगे। इसका मतलब यह है कि वे लोग डेमोक्रेटिक सिस्टम में पार्टीसिपेट करने नहीं जा रहे हैं। उन्हें इस सिस्टम में लाने के लिए सीग्रीवाल जी जो बिल लाए हैं, इस पर सरकार विचार करे। इस बिल में ऐसे लोग, जो वोट नहीं डालते हैं, उनके ऊपर कुछ रोक लगानी चाहिए। इसकी मॉनिटरिंग करने में कोई प्रॉब्लम नहीं है, क्योंकि हमारे स्टेट में अभी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजेनशिप रिव्यू हो रहा है। इसे देखते हुए हमें एक बात याद आयी कि अगर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजेनशिप घर-घर में पहुंच रहा है, तो यह सिस्टम बाकी इलेक्शन सिस्टम में होना चाहिए। नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजेनशिप में हम लोग इसे देख रहे हैं कि कौन बांग्लादेशी हैं, कौन नहीं हैं। अगर इस सिस्टम को इलेक्शन सिस्टम में लागू किया जाए, तो वह भी चलेगा। माइनॉरिटी रहते हुए मेजॉरिटी पर शासन करने का हमारे पॉलिटीशियंस का जो यह इरादा है, उन्हें यह छोड़ना चाहिए। हम लोगों पर जो मार पड़ रही है, उसे आप लोग देख रहे हैं। लोग सोचते हैं कि पॉलिटीशियन लोग दलाली करते हैं, बदमाशी करते हैं। ऐसा लोगों के मन में है।
अभी मैक्सिमम कांग्रेस के लोग आदिवासी-आदिवासी कह कर हल्ला करते हैं। लेकिन, आदिवासी क्षेत्रों में हालत यह है कि ये लोग उन्हें वोट के दिन कम्बल बांटते हैं। वे उनका दूसरा कोई काम नहीं करते हैं। मेरे चाय बागान क्षेत्र में ज्यादातर कांग्रेस के लोग लोगों को प्रलोभन देते हैं। वे डेमोक्रेसी का नाम लेते हैं, पर वे इन-डेमोक्रेटिक काम करते हैं।
चेयरमैन सर, मेरा यह अर्नेस्ट रिक्वेस्ट है कि सीग्रीवाल जी जिस बिल को लाए हैं, उसे सभी लोगों ने सपोर्ट किया है। गवर्नमेंट इसे प्राइवेट बिल न समझ कर बाद में इसे एडॉप्ट करे। कांस्टीटय़ूशनमें इसको रिव्यू करने के लिए जो व्यवस्था है, वह व्यवस्था की जाए। लोगों का जो 100औ पार्टिसिपेशन है, इसकी व्यवस्था करने का रिक्वेस्ट करते हुए मैं यही कहूंगा कि आपने मुझे जो बोलने का मौका दिया है, तो मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मेरी हिंदी बहुत अच्छी नहीं है, क्योंकि नार्थ-ईस्ट की हिंदी बहुत खराब है और हम लोग मेन स्ट्रीम से थोड़ा कट-आफ हैं। ...(व्यवधान)चेयरमैन साहब तो बहुत सीनियर हैं। He is a very senior person. वह पूरे इंडिया के नेशनल सेक्रेटरी भी हैं, वे बोल सकते हैं, लेकिन हम लोगों की हिंदी के बीच में थोड़ा असमिया घुस जाती है, इसलिए थोड़ा प्रॉब्लम है।
हम अर्जुन मेघवाल जी का बहुत आभार व्यक्त करते हैं, उन्होंने हमारा नाम इस बिल पर बोलने के लिए डाला। सीग्रीवाल जी को धन्यवाद देते हैं कि वे ऐसा सीरियस बिल लाए। बाकी जितने बिल हैं, उनसे यह बिल ज्यादा महत्वपूर्ण है। Hundred percent participation is hundred percent successful democracy. यह बोलकर मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं।
श्री जुगल किशोर (जम्मू) : महोदय, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। अनिवार्य मतदान बिल पर आज यहां चर्चा हो रही है, जिसे हमारे सहयोगी सीग्रीवाल जी यहां लाए हैं, मैं उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।
17.06 hours (Shri Hukmdeo Narayan Yadav in the Chair) इस बिल को लेकर मैं कहना चाहता हूं कि आज इस सदन में जो चर्चा हो रही है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण चर्चा है। यह जरूरी है और होनी भी चाहिए। मतदान अनिवार्य होना बहुत ही जरूरी है। यह देश और समाज के लिए बहुत जरूरी है। हर एक मतदान कर सके, इसकी व्यवस्था हम करें, यह भी जरूरी है। कई बार कुछ ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं, जो देश हित में होते हैं, समाज हित में होते हैं। कई बार अच्छे काम के लिए भी समाज के लोग सामने नहीं आते, आगे नहीं आते, लेकिन कुछ कानून ऐसे अगर बना दिए जाएं कि वह जरूरी हो तो आहिस्ता-आहिस्ता आदत पड़ जाती है। जब तक इस लोकतंत्र में यह आदत नहीं डलती है, तब तक हमें ऐसे कानून बनाने की जरूरत है।
मैं कहना चाहता हूं कि आम आदमी और गरीब आदमी ही ज्यादा वोट डालने जाता है, चाहे वह जमींदार हो, किसान हो, मजदूर हो, चाहे कोई भी छोटा-मोटा काम करता हो, उस दिन छुट्टी भी रखता है, प्राइवेट काम करता होगा, लेकिन वह मतदान करने जरूर जाएगा। जो बड़े-बड़े लोग हैं, इंडस्ट्रियलिस्ट्स हैं और एयरकंडीशनर में रहने वाले लोग हैं, बड़ी-बड़ी कोठियों में रहने वाले लोग हैं, गर्मी को न सहन करने वाले जो लोग हैं, वे मतदान करने नहीं जाते हैं। उससे देश को बहुत बड़ा नुकसान होता है। उनकी राय क्या है, वह सामने नहीं आती है। मेरी प्रार्थना है कि यह बिल पास करके यह जरूरी कर दिया जाए कि देश का जो एक-एक व्यक्ति है, वह अपना मतदान करे, अपनी राय व्यक्त करे और उसको अपनी राय व्यक्त करने का मौका मिलना चाहिए।
मैं जम्मू-कश्मीर प्रदेश का रहने वाला हूं। मैं जम्मू-कश्मीरवासियों का आभार प्रकट करना चाहता हूं, चाहे पिछला विधान सभा का चुनाव हो या लोक सभा का चुनाव हो, उन्होंने भारी मतदान करके अपनी लोकप्रिय सरकार जम्मू-कश्मीर में चुनी और देश में भी चुनी। इसके साथ-साथ मैं कहना चाहता हूं कि यह प्रतिशत और भी बढ़ सकता था। आप सब जानते ही हैं कि वहां मिलिटेंसी का दौर रहता है और आतंकवादियों की हमेशा धमकियां रहती हैं कि लोग मतदान करने न निकलें, न जाएं। मेरी आपसे प्रार्थना है कि यह बिल पास करने के बाद कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि लोग घरों में भी मतदान कर सकें। अगर आतंकवादियों के डर से बाहर न निकल सकें, या तो ऐसी व्यवस्था हो कि वे बाहर जाएं, नहीं तो वे घर पर ही वोट डाल सकें, ऐसी भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
मैं यह भी कहना चाहता हूं कि देश का जो सबसे बड़ा मंदिर है, जहां सबको इंसाफ मिलता है, वहां हम अनिवार्य मतदान की चर्चा कर रहे हैं लेकिन मैं बहुत दुःख के साथ कहना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर में 65 वर्षों से कुछ ऐसे लोग रह रहे हैं, जिनको आज भी मतदान का अधिकार ही नहीं है। हम जहां चर्चा कर रहे हैं कि मतदान अनिवार्य करना चाहिए और दूसरी तरफ वे लड़ाई लड़ रहे हैं कि उनको मतदान करने का अधिकार मिलना चाहिए। मैं वेस्ट पाकिस्तान के रिफ्यूजी की बात कर रहा हूं, वे वेस्ट पाकिस्तान के रिफ्यूजी नहीं हैं, लेकिन उनको वेस्ट पाकिस्तान के रिफ्यूजियों के तौर पर बुलाया जाता है। क्योंकि जब देश का बंटवारा हुआ तो जो हिस्सा पाकिस्तान में गया, वहां से वे आये थे। आज भी उनको विधान सभा में मतदान करने का अधिकार नहीं है। क्या लोकतंत्र में ऐसा हो सकता है? मुझे नहीं लगता है कि ऐसा हो सकता है लेकिन ऐसा हो रहा है। जम्मू-कश्मीर में लोग पार्लियामेंट के इलेक्शन में वोट डाल सकते हैं, लेकिन उन्हें विधान सभा में वोट डालने का अधिकार नहीं है। वे पंचायत के चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं, वे अपना एक सरपंच भी नहीं चुन सकते हैं। जो लोग पंचायत का चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, जो विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, मुझे आप बताइए कि उन्हें कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई पीढ़िया गुजर जाने के बाद भी उनके बच्चे दर-ब-दर ठोकरें खाने के लिए मजबूर हैं। मैं सदन से इसके लिए प्रार्थना करूंगा, हम लोग चर्चा कर रहे हैं कि मतदान का अधिकार जरूरी होना चाहिए। आज देश में ऐसे लोग हैं जिनको मतदान का अधिकार नहीं है, उनको भी मतदान का अधिकार मिले, उनके लिए हमें विचार करना चाहिए।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सदन को यह बताना चाहता हूं कि जो लोग बॉर्डर पर डटे रहते हैं, जो भारत-पाक सीमा पर खड़े हैं, वहीं वे जीते हैं, वहीं वे मरते हैं। पाकिस्तान द्वारा की जा रही गोलियों और गोलों का सामना करते हैं। गोलाबारी में उनके पशु मारे जाते हैं, उनके जान का नुकसान होता है, उनकी पढ़ाई नहीं हो पाती है, उनकी फसल तबाह हो जाती है, लेकिन वे बॉर्डर को नहीं छोड़ते हैं, अन्यथा वे भारत-पाक सीमा को छोड़ कर भारत के किसी और भाग में बस सकते हैं। लेकिन भारत माता की जय कहते हुए, वे बॉर्डर पर ही डटे रहते हैं, इसलिए मेरी सदन से प्रार्थना है कि उनके प्रति सहानुभूति दिखाते हुए, उनको मतदान का अधिकार मिले, ऐसा हमें जतन जरूर करना चाहिए।
अगर मौका मिले तो भारत-पाक सीमा पर जो रहते हैं, उनकी बात सुनने के लिए, हमारी कई कमेटियां वहां गयी भी हैं और आगे भी वहां जायेंगी, उनसे जो अधिकार छिना गया हैं, हम उस अधिकार को उन्हें दिलायें, ताकि वे नौकरी कर सकें, अपने बच्चों को पढ़ा सकें, फसल उगा सकें और देश के नागिरक होने का गर्व भी महसूस कर सकें। हमारे सहयोगी श्री जनार्दन सिंह सीग्रीवाल जी सदन में जो बिल लाये हैं, मैं उसके समर्थन में हूं। हरेक के लिए यह जरूरी होना चाहिए कि वह अपना वोट डाले और अपनी राय व्यक्त करे। इस बड़े लोकतंत्र में सरकार बनाने में उनका योगदान होना चाहिए। उनको मतदान के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। आपने मुझे बोलने की अनुमति दी, इसके लिए आपके प्रति आभार प्रकट करते हुए इस बिल का समर्थन करता हूं।
श्री भोला सिंह (बुलंदशहर) : सभापति महोदय, मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे मतदान अनिवार्यता के विषय पर बोलने का मौका दिया है। हमारे देश में लोकतंत्र का बड़ा महत्व है। हमारे देशवासियों को मतदान के द्वारा सरकार चुनने का मौका मिलता है, जनप्रतिनिधि चुनने का मौका मिलता है, एक अच्छे जनप्रतिनिधि चुनने का मौका मिलता है। मतदान के प्रतिशत को बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग के द्वारा बहुत सारे अभियान चलाये जाते हैं, मतदाताओं को जागरूक किया जाता है, लेकिन उसके बावजूद भी प्रसेन्टेज में मतदान नहीं हो पाता है। हमारे लोकतंत्र में प्रधानी से लेकर जिला पंचायत, विधान सभा और लोक सभा के चुनाव होते हैं। हमें देखने को यह मिलता है कि जो छोटे चुनाव होते हैं, उन चुनावों का मतदान प्रतिशत अच्छा होता है और यह प्रतिशत बड़े चुनावों में कम हो जाता है, इसकी क्या समस्या है? चुनाव आयोग का जो जागरूक अभियान है, उसमें इसे भी देखना चाहिए कि क्या कारण है कि छोटे चुनाव में मतदाता ज्यादा वोट डालते हैं और प्रतिशत अच्छा होता है, लेकिन अगर लोक सभा का चुनाव हुआ तो मतदान प्रतिशत कम हो जाता है। इसके लिए उनको सोचना चाहिए, विचार करना चाहिए।
मैं आपके माध्यम से सदन को अवगत कराना चाहता हूं, कुछ सुझाव रखना चाहता हूं और जो इस बिल को लेकर आये हैं, उनको धन्यवाद करना चाहता हूं, क्योंकि यह हमारे लिए बहुत अनिवार्य है। मतदान अनिवार्यता के माध्यम से यह निर्भर करता है कि हमें अपने देश को किस तरह की सरकार देनी है। अभी लोक सभा के चुनाव हुए। मतदान का प्रतिशत अच्छा रहा और देश को एक अच्छी, विकास करने वाली सरकार मिली। आदरणीय मोदी जी प्रधान मंत्री बने। उनके नेतृत्व में चुनाव हुआ। मतदान का ज्यादा प्रतिशत होने का यह उदाहरण है। हर चुनाव में ऐसा होना चाहिए। अगर हमें अच्छे प्रतिनिधि चाहिए, अच्छी सरकारें चाहिए, देश का विकास चाहिए तो मतदान करना होगा। हम अपने देश को जिन बड़े-बड़े देशों की तरह डैवलप करना चाहते हैं, उनकी तरह विकास चाहिए तो इसे महत्व देना बहुत अनिवार्य है।
मैं आपके सामने कुछ सुझाव रखना चाहूंगा। चुनाव में देखा जाता है कि चुनाव आयोग द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए कई अभियान चलाए जाते हैं। यह भी देखा जाता है कि कुछ बाहुबली, पैसे वाले लोगों का चुनाव में ज्यादा महत्व रहता है। इससे ऐसे लोग चुनकर आ जाते हैं जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होते। बाहुबली, पैसे वाले लोगों को रोकने के लिए यह जरूरी है कि अच्छे प्रतिनिधि आएं। इसके लिए भी जागरुक अभियान चलाना चाहिए।
मैं गांव के क्षेत्र से आता हूं। मैंने देखा है कि छोटे चुनावों में मतदान ज्यादा होता है। चुनाव आयोग जो बूथ बनाता है, प्रधानी के चुनाव में छोटी-छोटी जगह बूथ बन जाते हैं और लोक सभा, विधान सभा चुनाव में बूथ की दूरी ज्यादा होती है। कभी धूप होती है, कभी ठंड का समय होता है, इसलिए गांव के काफी लोग मतदान नहीं कर पाते। हमारी माताएं, बहनें इसलिए घर से नहीं निकल पातीं क्योंकि बूथ दूर होता है। चुनाव आयोग को यह भी देखना चाहिए कि मतदान केन्द्र लोगों की सुविधानुसार उनके घर के नजदीक हो। ऐसे नहीं हो कि कोई व्यक्ति एक किलोमीटर तक चलकर जाएगा। साथ ही कुछ लोग ऐसे होते हैं जो घरों से निकलना नहीं चाहते। जैसे हमारे बार्डर में फौजी भाई, जिनकी इच्छा वोट करने की होती है, वे टैंडर वोट करते हैं, वहीं से अपना वोट भेज देते हैं। इसी तरह जो लोग बूथ तक नहीं जाना चाहते, लाइन में नहीं लगना चाहते, उनके लिए ऐसा रूल बना देना चाहिए जिससे या तो वे अपना टैंडर वोट कर दें या आनलाइन वोट सिस्टम हो जाए ताकि वे घर बैठे अपना वोट डाल सकें।
हर छोटे-बड़े व्यक्ति को मतदान का महत्व समझना चाहिए। वोट का जितना अधिकार छोटे व्यक्ति का है उतना ही बड़े का होना चाहिए। लोग अपना पासपोर्ट लेते हैं, ड्राइविंग लाइसैंस बनवाते हैं, राशन कार्ड बनवाते हैं। यह कराते समय उनसे यह भी जानकारी लें कि आपने मतदान किया है या नहीं। ऐसी व्यवस्था बनाई जाए ताकि लोगों को लगे कि वोट कम्पलसरी है। जो लोग वोट नहीं डालते, उनके लिए कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे उन्हें लगे कि हमें वोट नहीं डालने की वजह से यह नुकसान हुआ है।
आपने बोलने का मौका दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद श्री कौशलेन्द्र कुमार (नालंदा) : सभापति महोदय, आपने मुझे अनिवार्य मतदान विधेयक, 2014 पर बोलने का मौका दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं सबसे पहले इस बिल का विरोध करता हूं। यह एक विवादास्पद विषय है क्योंकि यह हमारी संसदीय परिपाटी और परम्पराओं को बदलने वाला विधेयक है। संसदीय लोकतंत्र में प्रत्येक मतदाता के लिए कानून के जरिए मतदान में हिस्सा लेने की स्वतंत्रता है। उसे बाध्यता में बदला जा रहा है। किसी को हैरानी होगी कि मेरा मानना है कि इस तरह का विधेयक लाकर, श्री जनार्दन सीग्रीवाल जी हमारे बिहार से आते हैं, मैं समझता हूं कि इस विधेयक को लाने से पूरे देश में एक चर्चा हो गई है। इस विधेयक को आरएसएस की तरफ से लाया गया है। इतिहास में जाकर देखा जा सकता है कि कभी भी इनको इस संसदीय परंपरा में विश्वास नहीं रहा, वह हमेशा से उसे अपने हिसाब से बदलने की कोशिश करते रहे हैं। संविधान में मतदान हर व्यस्क नागरिक का स्वतः अधिकार माना जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिकार शब्द को नकारात्मक पक्ष दे दें। अपने अधिकार का प्रयोग करना या न करना हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता है, उसे किसी कानून से बांधना संभव नहीं है।
दरअसल इस विवादास्पद विधेयक का जन्म गुजरात से हुआ है। गुजरात सरकार द्वारा अनिवार्य मतदान का कानून बनाया गया है जिसे निकाय चुनाव में लागू करने की व्यवस्था है। इसकी परिकल्पना माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा की गई है। माननीय प्रधानमंत्री जब मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत थे तब वर्ष 2009 इसकी तैयारी की गई थी लेकिन उस समय वे इसे कानूनी रूप देने में सफल् नहीं हुए। आज सरकार इसे कानूनी रूप देना चाहती है। चुनाव आयोग भी इस कानून के विरुद्ध है। आयोग ने चिंता जताई है कि अगर इस कानून के खिलाफ कोई कोर्ट चला गया तो चुनाव रद्द भी हो सकता है। चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में इस तरह के कानून बहुत ही शर्मनाक हो सकते हैं। संविधान में नागरिकों को मतदान के लिए अनिवार्यतया लगाने का कोई प्रावधान नहीं है। ये लोग दूसरे देशों की बात करते हैं, क्या उन देशों का संविधान भारत के संविधान जैसा है? भारत लोकतंत्र का सबसे बड़ा देश है। मैं दो-तीन बातों पर कुछ कहना चाहूंगा, जिस तरह आज भी पंचायती चुनाव में मतदान ज्यादा होता है उसका क्या कारण है, क्योंकि वहां पर लोकल लोग चुनाव लड़ते हैं, उसका प्रचार-प्रसार होता है। जो लोग गांव से बाहर रहते हैं वे उन्हें भी लाने का प्रयास करते हैं। जब लोक सभा या विधान सभा का चुनाव होता है तब वोट प्रतिशत घट जाता है। निर्वाचन आयोग की यह जिम्मेवारी है कि किस तरह से जन अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करके वोट दिलवाने का काम करें। कुछ साथियों ने बूथ के बारे में कहा। निश्चित रूप से जो गरीब है, नःसहाय है, दलित हैं उनके पास में स्कूल नहीं है, जहां सरकारी भवन नहीं है, उनको वोटिंग करने के लिए दूर जाना पड़ता है और पंचातयी चुनाव में हर राज्य सरकार ने व्यवस्था की है कि जहां पर 500 की आबादी हो वहां भी वोटिंग होती है लेकिन लोक सभा और विधान चुनाव में इसका पालन नहीं होता है। मेरा अनुरोध है कि इसके लिए जनजागरण अभियान चलाया जाए कि कैसे ज्यादा से ज्यादा वोट प्रतिशत हो, इसके लिए प्रयास होना चाहिए नही तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या होगा? अनिवार्य क्या होता है? हमने लोकतंत्र में जन्म लिया है। यदि वोट नहीं देते हैं तो हम अपराधी हो जाएंगे। इस तरह का बिल लाना दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं इस बिल का विरोध करता हूं।
SHRI RAMEN DEKA (MANGALDAI): Sir, I thank you for giving me a chance to participate in this important discussion. This is a very important Bill. We are the citizens of the largest democracy and all the citizens should participate in the elections so that it reflects the mindset of the electorate.
One of our hon. friends said that it is impractical. But it is not impractical. The electorates of India are very intelligent. They had taken a right position after Emergency. They took right position after the Bofors scandal. They took right position after the successive failures of the two UPA led Governments at the Centre. The electorate is intelligent. But they do not like to come to vote. So, it needs awareness and it needs a law that they should come and vote. We always talk of rights that we must get free education, we must have facilities of health, but when it comes to voting, they are not exercising their voting rights. The electorate should exercise this right of voting because it reflects their mind, their thinking and also ensures their participation in the democratic process.
Sir, we have inherited the concept of democracy from times immemorial. Basoya in Andhra Pradesh, centuries ago, practised democracy. In our State, a philosopher started democracy. He was not only a philosopher but also an artist and he was an institution by himself. He started the process of democracy in our State. So, people should be educated in order that they cast their vote so that their thinking is reflected and also it offers them an opportunity to judge the performance of a Government. If a Government does not perform well, they have the right to reject that Government after five years. Our electorate have demonstrated this after Independence.
Sir, as we come from a North-Eastern State, namely, Assam, people are not coming to vote. There are so many difficulties. One of such difficulties is that many of our booths are located in the booths and people have to walk miles after miles to come and cast their votes. So, they are not coming to vote. Proper facilities should be provided for voting and people should also be properly educated so that they can come and vote. It requires political will to pass this Bill. I would like to request our hon. Law Minister to pass this Bill with some modifications that people should come forward for voting and they should participate in the democratic process. Democracy survives only when people cast their votes.
Thank you.
· श्री देवेन्द्र सिंह भोले (अकबरपुर): अधिष्ठाता महोदय, आपने मुझे अनिवार्य मतदान के पक्ष में बोलने का अवसर दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। जब यह देश परतंत्र था, तब राजाओं का राज हुआ करता था। 15 अगस्त, 1947 को जब हम आजाद हुए, तो लोकतांत्रिक पद्धति का गठन हुआ। लोकतांत्रिक पद्धति के द्वारा जब हमारी प्रजातांत्रिक प्रणाली तय हुई, तो हमें मत देने का अधिकार मिला। सबसे पहले जब गांवों में पंचायत के चुनाव करवाने का फैसला हुआ, तो गांव में लोगों ने हाथ उठाकर उसका समर्थन किया। हम धीरे-धीरे मतदान में सुधार करने की प्रक्रिया में आगे बढ़े। आज एक ऐसा अवसर आया है, जब हम गुप्त मतदान के तरीके से गांव पंचायत, जिला पंचायत, विधान सभा से लेकर लोक सभा तक इस भारत के संविधान को, जहां लोक सभा बनाती है, प्रदेश के संविधान की रक्षा जहां विधान सभा करती है, बनाने का काम जनता-जनार्दन ने किया। लेकिन आज भी मतदान करने के लिए हमें जनता को जागरूक करने की आवश्यकता है। आज भी कुछ मुट्ठी भर लोग इस देश पर राज करना चाहते हैं, जिन्होंने लगातार इस देश पर 60 सालों तक राज किया, उन्होंने लोकतंत्र की हत्या करने के लिए सबसे पहले 25 जून, 1975 को इस देश में इमर्जैंसी लगाने का काम किया और उन लोगों को जो चुनकर आये थे, उनके और जनता के अधिकारों का हनन करने का काम किया। लेकिन भारत एक ऐसा देश है, जिसका संविधान बहुत बड़ा है। इस देश के संविधान को बनाने वाले लोग आज हमारे बीच में नहीं हैं, उन्होंने आजादी की लड़ाई में अपनी कुर्बानी दी है, लेकिन देश की खातिर उन्होंने सदा लोकतंत्र को बचाने का काम किया।तब एक ऐसा अवसर आया था, तब मैं छोटा सा बालक था, मैंने जनता की जागरुकता को देखा था। तब जनता सड़क पर उतरकर लोकतंत्र को बचाना चाहती थी और जिस सरकार ने लोकतंत्र का खात्मा किया था, जनता ने उसे हटाने का काम किया था। इस देश के नौजवानों और आम नागरिकों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर माननीय नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में वर्ष 2014 के मतदान में भाग लिया। लेकिन आज भी मतदान में तमाम खामियां हैं, कठिनाइयां हैं। यही कारण है कि चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर तमाम परिवर्तन किए गए। आज भी मतदान में भ्रष्टाचार, जातिवाद, भाई भतीजावाद, धर्म को रोकने की आवश्यकता है। हम सबको मिलकर कोशिश करनी चाहिए ताकि निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान हो, अनिवार्य मतदान हो। कमजोर तबके के लोग मतदान दें....
माननीय सभापति : माननीय सदस्यगण, इस विधेयक पर विचार करने के लिए आबंटित समय समाप्त हो रहा है और बोलने वाले काफी सदस्य हैं। एक घंटे का समय पूरा हो चुका है, इसलिए एक घंटे का समय बढ़ाया जाता है।
कुछ माननीय सदस्य: जी हां, समय बढ़ाया जाए।
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Sir, I have a strong objection to this. I would like to raise the objection under Rule 362. This discussion is slated for two hours. Now while discussing the Compulsory Voting Bill, nine hours have lapsed. What is the message going to the country? It is just to sabotage the Rights of Transgender Persons Bill, this discussion is being prolonged. This is the black day in the history of Indian Parliament. Regarding the Private Members’ Resolutions and Bills, this is totally unfair. For the transgender community in the country, a Bill has been unanimously passed by the Rajya Sabha but this House is not able to take up the Bill for discussion. It means it is quite unfair and my right is being curtailed. … (Interruptions)
Sir, I am seeking protection from the Chair because for a Bill for which two hours are allotted, nine hours of discussion have been completed and again it is being protracted. Rule 362 is specific. I have the right to ask that the motion may be put to the vote of the House. I want a ruling on this matter because the message going to the country is not good. If we are not ready to take up the Bill regarding the rights of transgender, a bad message will be going to the country. I have strong objection.… (Interruptions)
माननीय सभापति : सभा की सहमति से समय बढ़ाया गया है।
…( व्यवधान)
श्री निशिकान्त दुबे (गोड्डा) : माननीय सभापति जी, माननीय सदस्य ने 362 कोट किया है, 363 कहता है - Rule 363 says:
“Whenever the debate on any motion in connection with a Bill or any motion becomes unduly protracted, the Speaker may, after taking the sense of the House, fix a time limit for the conclusion of discussion on any stage or all stages of the Bill.” सेंस आफ द हाउस लिया गया है, सभी माननीय सदस्य इसका समय बढ़ाना चाहते हैं तो 363 एप्लाई होता है। इस कारण कोई टाइम लिमिटेशन नहीं हो सकता है। अल्टीमेटली यह सेंस आफ द हाउस है।...(व्यवधान)
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): माननीय सभापति जी, पहले भी सेंस आफ द हाउस लिखा हुआ था। सदस्य बोलना चाहते हैं। यह प्राइवेट मैम्बर बिजनेस का समय है। हम कैसे किसी को मजबूर कर सकते हैं कि मत बोलिए। जब माननीय सदस्य बोलना चाहते हैं तो आप इनका राइट कैसे संरक्षित नहीं करेंगे? आपको इनका राइट भी संरक्षित करना पड़ेगा।...(व्यवधान)
माननीय सभापति : देवेन्द्र जी, आप अपनी बात जारी रखें।
…( व्यवधान)
श्री देवेन्द्र सिंह भोले (अकबरपुर):माननीय सभापति जी, हमारे सामने बैठे जो लोग हैं, ये राजतंत्र में जीना चाहते हैं। उन्हें नहीं मालूम है कि 15 अगस्त 1947 के बाद जब लोकतांत्रिक प्रणाली का गठन हुआ तो कोई रानी के पेट से राजा पैदा नहीं हुआ।...(व्यवधान) अब अगर कोई राजा पैदा हुआ है तो मत पेटी से पैदा हुआ है। जनता जनार्दन है। जनता जो फैसला करती है, उसे स्वीकार करना चाहिए। ...(व्यवधान)लगातार पूरे सत्र में व्यवधान डाला है।...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Sir, there is no quorum in the House. This is totally unfair. As a mark of protest, I demand quorum in the House. Sir, I am on a point of order. There is no quorum in the House.
माननीय सभापति : अब कोरम बैल बज रही है। इस समय कुछ भी रिकार्ड में नहीं जाएगा।
… (Interruptions)* माननीय सभापति : माननीय सदस्यगण, सदन में गणपूर्ति नहीं है। अतः सदन की कार्यवाही सोमवार, दिनांक 21 दिसम्बर, 2015 को 11 बजे तक स्थगित की जाती है।
17.42 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, 21st December, 2015/Agrahayana 30, 1937 (Saka) * ण्ड्ढ म्श्र्द अ र्ठ्ठद्धत्ड्ढड्ड ठ्ठडदृध्ड्ढ ण्ड्ढ दठ्ठर्ड्ढ दृढ ठ्ठ ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्ध त्दड्डत्हठ्ठय्ड्ढद्म् ण्ठ्ठद्य् ण्ड्ढ र्द्वड्ढद्य्त्दृद र्ठ्ठद्म् ठ्ठहय्द्वठ्ठथ्न्र् ठ्ठत्ड्ढड्ड दृद ण्ड्ढ ढथ्दृदृद्ध दृढ ण्ड्ढ Hदृद्वम्ड्ढ डन्र् ण्ठ्ठद्य् ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्ध.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* Eदर्थ्त्द्म्ण् य्द्धठ्ठदथ्ठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ च्द्रड्ढड्ढहण् दृद्धश्र्त्दठ्ठथ्न्र् ड्डड्ढथ्त्ध्ड्ढद्धड्ढड्ड त्द र्ठ्ठर्त्थ्.
* Eदर्थ्त्द्म्ण् य्द्धठ्ठदथ्ठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ च्द्रड्ढड्ढहण् दृद्धश्र्त्दठ्ठथ्न्र् ड्डड्ढथ्त्ध्ड्ढद्धड्ढड्ड त्द र्ठ्ठर्त्थ्.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* Eदर्थ्त्द्म्ण् य्द्धठ्ठदथ्ठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ च्द्रड्ढड्ढहण् दृद्धश्र्त्दठ्ठथ्न्र् ड्डड्ढथ्त्ध्ड्ढद्धड्ढड्ड त्द व्ड्ढदर्ठ्ठथ्त्.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* Eदर्थ्त्द्म्ण् य्द्धठ्ठदथ्ठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ च्द्रड्ढड्ढहण् दृद्धश्र्त्दठ्ठथ्न्र् ड्डड्ढथ्त्ध्ड्ढद्धड्ढड्ड त्द र्ठ्ठर्त्थ्.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.
* घ्द्वडथ्द्म्ण्ड्ढड्ड त्द ण्ड्ढ ख्ठ्ठन्ड्ढय्ड्ढ दृढ ख्र्दड्डत्ठ्ठ, Eय्द्धठ्ठदृद्धड्डत्दठ्ठद्धन्र्, घ्ठ्ठद्धद्य्-ख्र्, च्ड्ढहय्त्दृद-2 ड्डठ्ठय्ड्ढड्ड 18.12.2015.
* घ्द्वडथ्द्म्ण्ड्ढड्ड त्द ण्ड्ढ ख्ठ्ठन्ड्ढय्ड्ढ दृढ ख्र्दड्डत्ठ्ठ, Eय्द्धठ्ठदृद्धड्डत्दठ्ठद्धन्र्, घ्ठ्ठद्धद्य्-ख्र्, च्ड्ढहय्त्दृद-2 ड्डठ्ठय्ड्ढड्ड 18.12.2015.
* ज्दृय्ड्ढड्ड ण्द्धदृद्वश्र्ण् म्थ्त्द्र.
* ज्दृय्ड्ढड्ड ण्द्धदृद्वश्र्ण् म्थ्त्द्र.
* ज्दृय्ड्ढड्ड ण्द्धदृद्वश्र्ण् म्थ्त्द्र.
* ज्दृय्ड्ढड्ड ण्द्धदृद्वश्र्ण् म्थ्त्द्र.
* ण्ड्ढ ढदृथ्थ्दृर्त्दश्र् ग्ड्ढथ्र्डड्ढद्धद्म् ठ्ठद्म्दृ द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड ण्ड्ढत्द्ध ध्दृय्ड्ढद्म् ण्द्धदृद्वश्र्ण् म्थ्त्द्रद्म्.
एर्ड्ढद्म् ः 024 अ च्/ण्द्धत् ङठ्ठर्ड्ढद्म्ण् ङठ्ठदर्ठ्ठद, ए.घ्. ख्द्य्ण्ड्ढदड्डड्ढद्ध ङड्ढड्डड्डन्र्, ण्द्धर्ठ्ठद्य्त् ङड्ढदद्वत्ठ्ठ च्त्दण्ठ्ठ उ 027 ग़्दृड्ढद्म् ः 071 अ Dद्ध. च्ठ्ठदर्ठ्ठन्र् ख्ठ्ठद्ध्र्ठ्ठथ्, च्/ण्द्धत् ङठ्ठण्ठ्ठध् Lठ्ठण्ठ्ठदद्रठ्ठथ्, ए.च्र्. ग्ठ़्ठदठ्ठ घ्ठ्ठय्त्थ्, Lठ्ठथ्र्त् ग्ठ़्ठद्धठ्ठर्ठ्ठद ञ्ठ्ठड्डठ्ठध् उ 075 एडय्ठ्ठत्द ः 001 * घ्द्वडथ्द्म्ण्ड्ढड्ड त्द ण्ड्ढ ख्ठ्ठन्ड्ढय्ड्ढ दृढ ख्र्दड्डत्ठ्ठ, Eय्द्धठ्ठदृद्धड्डत्दठ्ठद्धन्र्, घ्ठ्ठद्धद्य्-ख्र्, च्ड्ढहय्त्दृद-2 ड्डठ्ठय्ड्ढड्ड 18.12.2015.
* घ्द्वडथ्द्म्ण्ड्ढड्ड त्द ण्ड्ढ ख्ठ्ठन्ड्ढय्ड्ढ दृढ ख्र्दड्डत्ठ्ठ, Eय्द्धठ्ठदृद्धड्डत्दठ्ठद्धन्र्, घ्ठ्ठद्धद्य्-ख्र्, च्ड्ढहय्त्दृद-2 ड्डठ्ठय्ड्ढड्ड 18.12.2015.
।। ख्र्दय्द्धदृड्डद्वहड्ढड्ड र्द्य्ण् ण्ड्ढ द्धड्ढहदृर्ड्ढदड्डठ्ठय्त्दृद दृढ ण्ड्ढ घ्द्धड्ढत्ड्डड्ढदद्य्.
* ग़्दृद्य् द्धड्ढहदृद्धड्डड्ढड्ड.