Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Resolution Regarding Welfare Measures For Anganwadi ... on 10 December, 2021

Seventeenth Loksabha > Title: Further discussion on the Resolution regarding welfare measures for anganwadi workers and anganwadi helpers moved by Sh. Ritesh Pandey on 20th March 2020 - continued.

 

HON. CHAIRPERSON: Now, we take up Private Members’ Business. Item no. 16: Welfare Measures for Anganwadi Workers And Anganwadi Helpers.

… (Interruptions)

 

माननीय सभापति: टेक्निकल इश्यू के कारण निशिकांत जी बोल नहीं पाए थे । पहले इनका कंटिन्यू था, लेकिन बोल नहीं पाए थे इसलिए आप बोलिए ।

          श्री निशिकांत दुबे जी ।

 

डॉ. निशिकांत दुबे (गोड्डा):सर, दिनांक 20 मार्च को यह बिल शुरू हुआ था और मैं ऑन लैग्स था । मुझे मार्च महीने में इस पर बोलना था, लेकिन उस समय किसी अपरिहार्य कारणवश मैं सदन में नहीं आ पाया था तो मेरा आपसे आग्रह है कि मुझे जगदम्बिका पाल जी के बाद इसको कंटिन्यू करने की इजाजत दें ।

माननीय सभापति: ठीक है, श्री जगदम्बिका पाल जी ।

16.01 hrs                          (Shri Kodikunnil Suresh in the Chair.) श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): सभापति महोदय, मैं आपका अत्यन्त आभारी हूँ कि आपने मुझे एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर बोलने की इजाजत दी, जिसकी विगत सत्र से इस सत्र में भी चर्चा हो रही है ।

यह स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थिति में चर्चा हो रही है, जब कोविड पेंडेमिक अपने देश में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के सामने एक चुनौती बनकर आया है । सन् 1975 में ग्रामीण क्षेत्र की उन महिलाओं के लिए, चाहे गर्भवती महिलाएं हों या बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने की बात हो, ऐसी ग्रामीण महिलाओं और बच्चों को कैसे न्यूट्रिशन फूड मिले और वे कैसे स्वस्थ रह सकें, उसके लिए इसका निर्माण हुआ था और पूरे देश की 130 करोड़ पॉपुलेशन में करीब एक लाख आंगनवाड़ी वर्कर्स सेन्टर्स के माध्यम से कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक साढ़े 13 लाख आंगनवाड़ी सहायिकाएं काम कर रही हैं । आखिर इस आंगनवाड़ी का तात्पर्य क्या था? हम आंगन का तात्पर्य क्या लेते हैं? हम आज भी अपने घर में कहते हैं कि आंगन है । आंगन घर का सबसे हृदय स्थल होता है । जब लोग घर में आते हैं तो सबसे पहले अपने आंगन में आते हैं । हमने उस आंगन को आश्रय माना है । भारत के ग्रामीण परिवेश के उस आंगन आश्रय की अवधारणा पर आज आंगनवाडी को शुरू किया है, जो भारत में ग्रामीण माँ और बच्चों की देखभाल का केन्द्र बना है ।

भारत सरकार द्वारा बच्चों की भूख और कुपोषण से निपटने के लिए एकीकृत बाल विकास सेवा कार्यक्रम सन् 1975 से लगातार शुरू किया गया । इस आंगनवाडी केन्द्र की प्राथमिकता भारत के गांवों में बुनियादी सुविधाओं और बच्चों या माँ की स्वास्थ्य की देखभाल करनी थी । आज आंगनवाड़ी भारत की जीवनशैली में भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य की देखभाल करने की एक प्रणाली का हिस्सा बन गई है । यह लोगों के स्वास्थ्य के बुनियाद से जुड़ी हुई चीज है । मूल स्वास्थ्य की देखभाल की गतिविधियों में उन महिलाओं को परामर्श देना, चाहे गर्भ निरोधक की बात हो, पोषण की बात हो या उसकी शिक्षा की बात हो, ये सब चीजें आंगनवाड़ी की गतिविधियों में होती हैं । चाहे न्यूट्रिशन्स की बात हो या उनके अन्दर प्रोटीन की बात हो, विटामिन्स की बात हो, रीहाइड्रेशन साल्ट्स की बात हो या कोई और दवाइयों की बात हो, इन सारी चीजों की जानकारी उस आंगनवाड़ी वर्कर्स के केन्द्र पर मिलती है । अगर हम31 जनवरी, 2013 तक की रिपोर्ट देखते हैं तो उस समय कम से कम एक लाख आंगनवाड़ी और मिनी आंगनवाड़ी केन्द्रों पर इनकी स्वीकृतियां थीं और ये केन्द्र एक तरह से पूरक पोषण प्रदान करने का काम करते थे ।

 

आज यह जो प्रतिरक्षा का काम है, चाहे स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई वायरस हो या कोई डिजीज हो, लोगों के स्वास्थ्य की जांच करने के लिए या रेफरल सेवाओं के लिए आंगनवाडी की कार्यकताओं और सहायिकाओं का एक दायित्व है । नि:संदेह जो कोविड की वैश्विक चुनौती आई, आज भारत उस कोविड की वैश्विक चुनौती से निपटने में एक अच्छे और सक्षम ढंग से कामयाब हुआ । आपने देखा कि दुनिया का स्वास्थ्य के मामले में एक सबसे बड़ा संगठन है – विश्व स्वास्थ्य संगठन  । डब्ल्यू.एच.ओ. ने भी कहा कि इस वैश्विक कोविड पैंडेमिक में बड़े विकसित देशों - यूरोपियन देशों और अमेरिका की तुलना में, भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने जिस तरह से लोगों के जीवन की रक्षा के लिए और उनके जहान की रक्षा के लिए आने वाली चुनौतियों से निपटने का काम किया है, उसकी सराहना आज पूरी दुनिया में हुई है । यह डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट है । निश्चित तौर से, आज भारत में चाहे वह कोविड की चुनौती हो, अन्य कोई चुनौती हो या कोविड वैक्सीन का सवाल हो, उसमें जिस तरह से हमारे वैज्ञानिकों ने काम किया है, वह सराहनीय है । बुनियादी तौर से हमारी आंगनवाडी के कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का एक मूल उद्देश्य या दायित्व था, उनके सामने केवल एक लक्ष्य था कि आंगनवाड़ी केन्द्र पर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना, उनके बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति उन्हें सुझाव देना, उनके बच्चों के पालन-पोषण में किस तरीके से और कितनी कैलोरी ऊर्जा चाहिए, उनको खाने में क्या चीजें दी जा सकती हैं, लेकिन आज कोविड की चुनौती के बाद, जिस तरह से आंगनवाड़ी की महिलाओं ने काम किया है, उनका दायित्व बदला है । जहां उन्होंने अपने आंगनवाड़ी के कार्यों को सम्पादित करने के साथ-साथ, जब प्रधानमंत्री जी ने आह्वान किया, चाहे देश के डॉक्टर्स हों, देश की ‘आशा’ बहनें हों, ए.एन.एम. हों या पैरामेडिकल से जुड़े हुए लोग हों, उनको  कोरोना फाइटर्स के रूप में संज्ञा दी गई और इस तरह से पूरे भारत ने उनका सम्मान किया । आंगनवाड़ी प्रत्यक्ष रूप से उनसे जुड़ा हुआ नहीं था, आंगनवाड़ी स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ नहीं है, यह आईसीडीएस से जुड़ा है । आज उसकी मंत्री हमारी स्मृति इरानी बहन हैं । हमारी सरकार आने के बाद एक पोषण अभियान आज सारे देश में शुरू किया गया है । उस पोषण अभियान के भी जो परिणाम सामने आ रहे हैं, मैं निश्चित रूप से उसका उल्लेख आपके बीच करूंगा । उस पोषण अभियान से प्रत्यक्ष रूप से हमारी आंगनवाडी की कार्यकर्ताएं और सहायिकाएं जुड़ी हुई हैं । इस कोविड पैंडेमिक में इन आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों एवं सहायिकाओं ने केवल उस पोषण अभियान तक या ग्रामीण मां और बच्चों के पोषण तक के अपने दायित्व या जिम्मेदारियों को ही नहीं निभाया, बल्कि उससे आगे बढ़कर उन्होंने काम किया है । जब देश के तमाम बड़े और मेट्रो शहरों से, मुंबई, सूरत, दिल्ली, कोलकाता आदि से प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, ओडिशा आदि राज्यों में वापस लौट रहे थे, उस लॉकडाउन में जिस तरह से मजदूरों का पलायन हुआ और वे लोग वापस अपने गांवों में गए, यह कितनी बड़ी चुनौती थी कि अगर वे अपने गांवों में जाएंगे और अगर वे कोविड के कैरियर बनकर गए या कोरोना वायरस को लेकर गए तो जिस तरह से बीमारी का स्प्रेड हो रहा था, वह कहीं न कहीं पूरे गांव को प्रभावित करती । देश की जो135 करोड़ आबादी है, पूरी दुनिया इस बात पर चिन्तित थी । लोगों के सामने यह प्रश्न भी था कि भारत की इतनी बड़ी आबादी है और उसमें उत्तर प्रदेश की 24 करोड़ आबादी है ।

          इसमें चाइना के वुहान से निकला हुआ वायरस, चाहे वह लेबोरेट्री से निकला हो, चाहे फिश मार्केट से निकला हो, वह एक बहस का विषय हो सकता है । लेकिन जिस तरह से कोविड का वायरस दुनिया के तमाम देशों की सीमाओं को पार करता हुआ, उसने दुनिया के सभी देशों, चाहे उसमें यूरोपीयन देश हों, यूएस हो, साउथ ईस्ट एशिया हो या मिडिल ईस्ट हो, सारे देशों को अपने आगोश में ले लिया । इससे पूरे विश्व में ठहराव आ गया । इसके चलते चलती हुई रेलगाड़ियां बंद हो गईं, उड़ते हुए जहाज ग्राउण्डेड हो गए, लोग घरों में कैद हो गए, दिहाड़ी मजदूर अपने घरों में कैद हो गए और लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया । उस रोजी-रोटी के संकट में, पूरे देश में कोविड की वैश्विक चुनौती में लोगों को बचाने का काम हमारी सरकार कर रही थी । वहीं यह भी तय किया गया कि हम इस देश के एक भी व्यक्ति को अन्न की कमी या भूख से मरने नहीं देंगे ।

 

          आदरणीय मोदी जी और हमारी सरकार दो साल से आज तक 80 करोड़ लोगों को खाद्यान और मुफ्त अन्न देने का काम कर रही है । शायद यह पूरे विश्व के लिए अपने आप में एक नज़ीर है । इस तरह से कुछ जिम्मेदारियों में हमारी आंगनवाड़ी की बहनों ने अपने दायित्व के साथ-साथ, जो प्रवासी मजदूर या लोग अपने गांव में आ रहे थे, उनका सर्वे करने का काम भी किया । उन्होंने घर-घर जाकर कहा कि जो लोग बाहर से आए हैं, वे अपने आपको आइसोलेट और क्वारंटाइन करें । अगर वे कोविड के वायरस से अफेक्टेड हैं और उससे पॉजिटिव हैं तो स्वाभाविक है कि वे अपने घर में भी स्प्रैड कर सकते हैं और वह एक महामारी का रूप ले सकता है ।

          महोदय, ऐसी परिस्थितियों और इस कोविड की चुनौती में इन्होंने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । जब उनके पास आंगनवाड़ी का काम, पुष्टाहार का काम और पोषण अभियान का काम था, फिर भी उन्होंने कोविड की महामारी में एक-एक गांव के आंगनवाड़ी केन्द्रों पर ही नहीं, बल्कि लोगों के घरों में जा-जाकर जागरुक करने का काम किया है । मैं सदन के माध्यम से उन आंगनवाड़ी बहनों, उन कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को बधाई देना चाहता हूं । उन्होंने घरों में जाकर डोर-टू-डोर इस कोविड-19 को लेकर लोगों को जागरुक करने का काम किया है । उन्होंने उनको कहा कि अगर कोविड से बचना है तो कोविड के लिए उपाय अपनाने होंगे । उसके लिए हेल्थ प्रोटोकॉल था और हमारी मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ भी कह रही थी कि जब भी हम घर से निकलें तो मास्क लगाकर निकलें और हम सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन करें । इसके लिए कम से कम दो गज की दूरी जरूरी है । इसके साथ-साथ अपने हाथों को साफ करते रहें और सेनिटाइजर लगाएं । कोविड से बचाने के लिए ये तीन चीजें हैं ।

प्रधान मंत्री जी ने पूरे देश में आह्वान किया, स्वास्थ्य मंत्री जी ने आह्वान किया, तमाम राज्य सरकारों ने प्रयास किया, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर ले जाकर गांव-गांव के लोगों को जागरुक करने का काम आंगनवाड़ी बहनों ने किया था । छ: लाख गांव से बसे हुए इस विशाल हृदय के देश में गांव-गांव तक जाकर जागरुक करने का काम और इस हेल्थ के कोरोना प्रोटोकॉल के बारे में अगर किसी ने जागरुक करने का काम किया है तो वह हमारी आंगनवाड़ी की बहनों ने किया है, हमारी आंगनवाड़ी कायकर्ताओं तथा सहायिकाओं ने किया है । उन्होंने निश्चित तौर से एक बड़ी जिम्मेदारी निभाई है कि अगर लोग बाहर से आए हैं तो अपने आपको 21 दिन के लिए क्वारंटाइन करें । वह प्रोटोकॉल बाद में 15 दिन के लिए हो गया ।

          आपने देखा होगा कि आंगनवाड़ी वर्कर्स के लिए क्या था? आंगनवाड़ी केन्द्रों पर गर्भवती महिलाएं आएंगी और पोषण अभियान में उनको न्यूट्रीशन फूड देने की बात होगी, वह काम इस कोविड की चुनौती के कारण भी आंगनवाड़ी बहनों और सहायिकाओं ने किया । उस समय लॉकडाउन था, उसके बावजूद अपनी जान की परवाह न करते हुए, अपनी जान को जोखिम में डालकर आंगनवाड़ी बहनों और सहायिकाओं ने काम किया । उन्होंने टेक होम राशन का काम शुरू किया । उन्होंने घर-घर जाकर यह काम भी ट्रैक किया कि गर्भवती महिलाएं और हमारी लैक्टेक्टिंग मदर्स या दो वर्ष के बच्चे सेंटर पर आएं, इसके बजाय उनको टेक होम राशन या इम्यूनाइजेशन का काम करने का काम किया । पहली बार आपने देखा होगा कि चाहे उत्तराखण्ड की पहाड़िया हों, चाहे हिमाचल की वादियां हों, चाहे जम्मू कश्मीर हो, वहां आंगनवाड़ी की महिलाओं ने कई-कई किलोमीटर तक पहाड़ों और नार्थ-ईस्ट के गांवों में हेल्थ पैरा मेडिकल के साथ जाते हुए या डॉक्टर के साथ जाकर इम्यूनाइजेशन में सहयोग देने का काम किया है, यह अपने आप में एक नजीर है ।

सभापति महोदय, लॉकडाउन के शुरू में ऐसा लगता था कि इम्यूनाइजेशन हो पाएगा या नहीं, क्योंकि पूरे देश में लॉकडाउन लगा था, इस कोविड का न कोई उपाय था, न हमारे पास कोई वैक्सीन थी, न ही वर्ल्ड का कोई मेडिकल, हेल्थ प्रोटोकॉल था । स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थितियों में यह तय किया गया कि अगर हम सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन करेंगे, हम अपने-आप को सुरक्षित रखने के लिए सैनेटाइजर का उपयोग करेंगे और मास्क लगाएंगे, तभी हम इसका उपाय कर सकते हैं । Anganwadi workers visited people’s houses to note the weight of pregnant women and malnourished stunted children because our Primary Health Centres are very small and they were advised to not have a large gathering there. अगर मिनिस्ट्री से एक एडवाइस गई, हम पीएसी पर हों या आंगनवाड़ी केन्द्र पर हों, उस समय कोविड प्रोटोकॉल के नाते किसी जगह भीड़ इकट्ठी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कोविड के स्प्रेड होने का डर था । वहां पर आंगनवाड़ी की हमारी बहनें, सहायिकाएं गईं । इन्होंने केवल यह काम नहीं किया बल्कि there was coordination among anganwadi workers, ASHAs and ANMs since the beginning.  स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी हुई जो हमारी आशा बहनें हैं, एएनएम हैं, मैं इस मंत्रालय को बधाई दूंगा कि आंगनवाड़ी के वर्कर्स ने भी एक को-ऑर्डिनेशन स्थापित किया और वह को-ऑर्डिनेशन केवल बातचीत से नहीं हुआ, बल्कि वह को-ऑर्डिनेशन whatsapp के माध्यम हुआ, whatsapp के माध्यम से एक ग्रुप बना । हर हाउस होल्ड के लिए, चाहे वह सर्वे करने का काम हो या उन केसेज से संबंधित हों, सभी में समन्वय स्थापित करके, हमारे आंगनवाड़ी के सहायिकाओं एवं वर्कर्स ने काम करना शुरू किया है । इसके बावजूद वे गांव के हर घर के दरवाजे पर जा रही थीं, उस समय लोग किस हालत में थे? उस समय ऐसी परिस्थिति थी कि अगर किसी के घर में किसी को कोरोना हो गया, तो लोग उसके कमरे में नहीं जाते थे । वह एक अछूत-सा हो जाता था और वह किसी तरह से आइसोलेशन में रहता था । लोग उसको दूर से खाना देते थे, लोग उसके कमरे में नहीं जाते थे । ऐसी परिस्थितियों में  आदमी अपने परिवार की देखभाल नहीं कर रहा था । कहीं कोई कोविड से संक्रमित व्यक्ति है, तो परिवार का कोई व्यक्ति इस बात की हिम्मत नहीं जुटा पाता था कि हम कैसे इसकी सेवा करें, इसके स्वास्थ्य की देखभाल करें । ऐसी परिस्थिति में हमारी आंगनवाड़ी की सहायिका और कार्यकर्ताओं ने अपने जान को जोखिम में डाल कर दूसरों की जिंदगी को बचाया । इस संबंध में वे अपने कैम्पस में  मीटिंग करती थीं । वे सरकार की सभी गाइडलाइन्स को पालन करने के लिए लोगों से कहती थीं । इसलिए यह स्वाभाविक है कि जिस तरह से इन्होंने ऐसी परिस्थिति में काम किया है, उसके लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूं । किस तरह से आंगनवाड़ी सेंटर्स को अपग्रेड किया जा सके? देश के आंगनवाड़ी सेंटर्स में पानी की व्यवस्था नहीं थी, पीने का पानी नहीं था, टॉयलेट्स की सुविधा नहीं थी । हमारी बहनें आंगनवाड़ी से जुड़ी हुई हैं । आंगनवाड़ी की जो कार्यकर्ता या सहायिकाएं हैं, वे सभी हमारी बहनें हैं । वे ऐसी परिस्थितियों में भी काम करती रहीं । आंगनवाड़ी को इक्विप्ड करने के लिए भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं ।

          इन महत्वपूर्ण कदमों से कम से कम उन आंगनवाड़ी केन्द्रों को अपग्रेड करने का काम हुआ और यहां से, मंत्रालय के द्वारा गाइडलाइंस बनकर गईं । Ministries of Women and Child Development, Rural Development, and Panchayati Raj से गाइडलाइंस बनकर गईं कि हम चार लाख नए आंगनवाड़ी सेंटर्स स्थापित करेंगे । उन चार लाख आंगनवाड़ी सेंटर्स के लिए पूरे देश भर में बिल्डिंग्स बनाने के लिए हमने मनरेगा में इसका प्रोविजन किया । आपने देखा होगा कि कोविड के दौरान करीब 37 हजार करोड़ रुपये का एलोकेशन इसी सदन में एनुअल बजट से दिया गया था । लेकिन जब कोविड की चुनौती आई और लोगों को लगा कि शायद इस लॉकडाउन के कारण हम शहरों में मजदूरी के लिए न जा सकें, काम के लिए न जा सकें, इसलिए गांव में लोगों के पास काम हो, लोगों के सामने काम के अभाव में खाद्यान का संकट न हो, लोगों के सामने अपने परिवार की जीविका चलाने की चुनौती न हो या लोगों के घरों में रोजी-रोटी का संकट न हो । इसके लिए 40 हजार करोड़ रुपये भारत के प्रधान मंत्री जी ने मनरेगा में और एलोकेट किए, जिससे किसी  गांव में कोई संकट न आए और वहां कम से कम काम शुरू हो जाए और लोगों को काम मिले । इसी के अंतर्गत चार लाख आंगनवाड़ी सेंटर्स बिल्डिंग्स पूरे देश में बनाने की बात हुई । इसके साथ कन्वर्जेंस हुआ । आंगनवाड़ी सर्विसेज़ की जो आईसीडीएस स्कीम है, उसके तहत revised joint guidelines were issued by Ministries of Women and Child Development, Rural Development, and Panchayati Raj for construction of four lakh anganwadi centre buildings across the country under the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme in convergence with the anganwadi services.

 

          यह बहुत बड़ा फैसला हुआ । हमने स्वच्छता एक्शन प्लान भी बनाया । Under Swachhta Action Plan, Rs. 10,000 per anganwadi centre is provided for only drinking water facilities. हमने अपने भाषण में इसकी चिंता की थी । माननीय मंत्री जी ने इसको नोट किया था कि देश में आंगनवाड़ी सेंटर्स हैं, जहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी बहनें काम करती हैं, उन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए जो बुनियादी सुविधाएं चाहिएं, टॉयलेट्स और ड्रिंकिंग वॉटर की जो बेसिक सुविधाएं उनको चाहिएं, वे वहां नहीं हैं । इस बात का सरकार ने संज्ञान लिया । Government of India has decided this. Under Swachhta Action Plan, Rs. 10,000 per anganwadi centre is provided for only drinking water facilities and Rs. 12,000 per anganwadi centre for toilet facilities.

          आज पूरे देश में जितने भी आंगनवाड़ी सेंटर्स हैं, वहां हमारी सरकार ने उनके पीने के लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था सुनिश्चित की है और उन बहनों के लिए टॉयलेट्स की व्यवस्था भी सुनिश्चित की है । हम एक अभियान चलाकर उनसे न केवल कोविड की चुनौती में काम ले रहे थे, बल्कि उनकी जो भी बुनियादी आवश्यकताएं थीं, उन बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमने काम किया है । On the same lines, grants are sanctioned for purchase of water filter, furniture, equipment, etc. इससे आप हमारी सरकार की संवेदनशीलता समझ सकते हैं । पूरे देश में हमारी 13 लाख 30 हजार आंगनवाड़ी बहनें हैं, जो कि अब 15 लाख हो गई हैं । वे आज देश भर में छोटे-छोटे बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए या उन गांवों की ग्रामीण महिलाओं को, जिनको शायद यह नहीं मालूम कि कौन सा टीकाकरण कब होना चाहिए, कब पोलियो का टीका लगना चाहिए, कब डिप्थीरिया का टीका लगना चाहिए, कब कौन सा इम्युनाइज़ेशन होना है, इन सारी चीजों की जानकारी देने का काम हमारी ये आंगनवाड़ी बहनें कर रही हैं । उनके लिए इस तरह की व्यवस्था की गई ।

 

          सिर्फ यही नहीं, क्या कभी सोचा है कि एक सरकार देश की लाखों महिलाओं को, जो महिलाएं गांव से जुड़ी हुई हैं, इतनी सुविधाएं दे रही है? ऐसी परिस्थितियों में, जब उन्हें गांव से जिले तक यदि कोई सूचना देनी है, तो पहले तो शायद यह होता था कि उन्हें गांव से शहर जाकर या मुख्यालय में अधिकारियों, सुपर्वाइज़र्स या एडीपीओ के पास जाना पड़ता था ।

          माननीय सभापति जी, आज हमारी सरकार ने पूरे देश में फैसला लिया कि आंगनवाड़ी में जो महिलाएं कार्य करती हैं, उन्हें स्मार्ट फोन दिया जाएगा । इससे वे अपने द्वारा किए गए काम को अपने ऊपर के अधिकारियों तक तुरंत पहुंचा सकती हैं । फोन के माध्यम से वे पीएससी, सीएससी को जरूरी सूचना दे सकती हैं, इमरजेंसी में 108, 102 पर बात कर सकती हैं । इनका बड़ा दायित्व है चाहे गर्भवती महिलाओं का चैकअप कराना हो, अस्पताल भेजना हो, किसी मेडिकल कालेज में रेफर करना हो, तो वे सारे काम एकदम कर सकती हैं । ये कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि इन्हें कभी स्मार्ट फोन मिलेगा । सरकार ने यह महसूस किया कि आंगनवाड़ी वर्कर अपना काम एफिशिएंसी से कर सकें, इसलिए उन्हें स्मार्ट फोन उपलब्ध कराना आवश्यक है ।

          महोदय, इसी तरह से 13 जनवरी, 2021 को गाइडलाइन्स चाहे क्वालिटी एश्योरेंस हो, चाहे रोल्स एंड रिस्पोंसिबिलिटीज ऑफ दि ड्यूटी होल्डर्स हो, प्रोसिजर ऑफ प्रोक्योरमेंट हो, के विषय में जारी की गई । अब तक हम एलोपैथी पर डिपेंड थे, लेकिन प्रधान मंत्री जी ने जिस प्रकार पुरानी पद्धतियां जैसे आयुर्वेद, होम्योपैथी की पद्धति रही हो, हमने सभी को आयुष पद्धति से जोड़ा और यह तय किया कि इसमें डेटा मैनेजमेंट हो । आखिर यदि हम पोषण अभियाण चला रहे हैं तो पोषण ट्रेकर जरूरी है । जब तक डेटा नहीं हो, तब तक पोषण ट्रेकर कैसे कर सकते हैं? जब तक पोषण ट्रेकर नहीं होगा, तब तक ट्रांसपेरेंसी कैसे होगी? आज हमारी सरकार ने अभियान चलाकर उसके लाभ को सुनिश्चित किया कि महिलाओं, छोटे बच्चे जो भारत का भविष्य हैं, दुनिया के देशों में भारत को विश्व गुरु बनाने का उनके अंदर ऊर्जा और एक्सीलेंस है, उनके लिए इस तरीके से व्यवस्था की गई । उस ट्रांसपेरेंसी के लिए, एफिशिएंसी के लिए और एकाउंटेबिलिटी के लिए कि कम से कम हम जो सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन दे रहे हैं, उसे हम सुनिश्चित करें कि लोगों को उसका लाभ मिले और वे कुपोषित न हों । वे सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन पोषण ट्रेकर के माध्यम से और उसका डेटा मैनेजमेंट हो, उसकी मोनिटरिंग और ट्रांसपेरेंसी हो, एफिशिएंसी और एकाउंटेबिलिटी हो । 

          महोदय, इन आंगनवाड़ी सर्विसेज स्कीम्स में, इनके प्रोग्राम्स को अचीव करने के लिए, इसे प्रभावी बनाने के लिए फ्रंट लाइन वर्कर्स की सर्विस को कैसे इम्प्रूव कर सकें, इसके लिए ट्रेनिंग देने की बात भी कही गई है । इस ट्रेनिंग के माध्यम से निश्चित तौर पर इनमें सैल्फ कांफिडेंस आएगा और इनका एक्सपोजर भी होगा क्योंकि स्वाभाविक है कि ग्रामीण क्षेत्र में हमारी जो आंगनवाड़ी की कार्यकर्ता हैं, उन सभी के लिए इस तरह की कई स्कीम्स बनाई गई हैं और यह रेग्यूलर बेसिस पर हुआ है । बच्चों में कई तरह की समस्याएं आ सकती हैं चाहे चाइल्ड हंगर हो या कुपोषित हों ।

          गांवों में बेसिक हेल्थ केयर के लिए हमने यह कार्यक्रम शुरू किया और उस कार्यक्रम को आज कितने अच्छे तरीके से हम आगे बढ़ा रहे हैं । आज हम यह केवल एक क्षेत्र में ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश में, जहां योगी आदित्यनाथ जी की सरकार है, वहां उन्होंने ‘बचपन बाल शिक्षा’ के लिए ईसीसी योजना शुरू की है । आज उत्तर प्रदेश ऐसा पहला राज्य है, जिसने भारत सरकार के …..… (व्यवधान)

सर, मुझे लगता है कि मेरे पास बोलने के लिए अभी कुछ समय है । I think that I should be allowed to speak.

HON. CHAIRPERSON: You have already spoken for half-an-hour.

श्री जगदम्बिका पाल: महोदय, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ जी की सरकार ने प्रारंभिक ‘बचपन बाल शिक्षा’ ईसीसी योजना को शुरू किया है । इसको सुचारू रूप से क्रियान्वित करने के लिए 1 लाख 70 हजार 896 आंगनबाड़ी केंद्रों पर हमने इसे लागू किया है । I think that you will be definitely happy to know that the UP Government has taken the initiative. सरकार उन सभी केंद्रों को प्री स्कूल किट से लैस कर रही है । आज हम अपने उन बच्चों को केवल एक स्वस्थ बच्चा नहीं बनाना चाहते हैं, बल्कि हम उनको स्वस्थ, शिक्षित बच्चा और भारत का एक अच्छा भविष्य बनाना चाहते हैं, जो दुनिया की प्रतिस्पर्धा में अच्छे से मुकाबला कर सके । अत: उनको प्री स्कूल किट से लैस करने का निर्णय लिया गया है । उनको बुकलेट देने का निर्णय लिया गया है । इसके अलावा उन केंद्रों पर बच्चों के लिए मूल्यांकन कार्ड भी होगा । आखिर कितनी निष्ठा के साथ हमारी केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा उन बच्चों का समय-समय पर इवैलुएशन करने का काम किया जा रहा है । इससे इन बच्चों की कितनी ग्रोथ हो रही है । यह जो पोषण अभियान चल रहा है,……..… (व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: Hon. Members, I am to inform that the allotted time of two hours on this Resolution has already been taken, thus almost exhausting the time allotted for its discussion. There are still six Members to speak on the Resolution. If the House agrees, then we may extend the time for discussion on this Resolution by two more hours.

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अर्जुन राम मेघवाल): सभापति महोदय, सदन में काफी महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है, अत: समय अवश्य बढ़ाया जाना चाहिए ।

HON. CHAIRPERSON: Okay, the time for this Resolution has been extended by another two hours.

SHRI JAGDAMBIKA PAL: Thank you very much, Sir. जैसा कि मैं आपसे कह रहा था कि हमारी नई शिक्षा नीति भी आई । जो नई एजुकेशन पॉलिसी-2020 आई है, उसे आखिर क्यों लाया गया है? आज उसी लार्ड मैकाले की शिक्षा इस देश में चल रही थी । हम कहते थे कि लॉर्ड मैकाले की शिक्षा केवल बाबुओं को पैदा करती है । आज ओवरऑल बच्चों में जो एक्सिलेंस है, हुनर है, प्रतिभा है, क्षमता है, काबिलियत है, योग्यता है और विद्वता है, इसे अगर कोई संवार और निखार सकता है, तो वह केवल हमारी नई शिक्षा नीति कर सकती है । मैं उस नई शिक्षा नीति के अन्य प्रावधानों की तरफ नहीं जा रहा हूं, लेकिन जो हमारे गांव की महिलाओं के साथ, बच्चों के साथ जुड़ा हुआ है, कम से कम वह जरूर होना चाहिए । जैसा कि मैंने अभी कहा कि यूपी में लगभगग 1 लाख 70 हजार 896 आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं, उसी तरीके से एकीकृत बाल विकास सेवा, आईसीडीएस   के द्वारा एक ‘पहल’ नामक स्कीम शुरू हुई है और वह पहल ईसीसी मैनुअल है । वह मैनुअल हमने स्टेट काउंसलिंग ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग एस.सी.ई.आर.टी. द्वारा द्वारा विकसित पाठ्यक्रम के अनुसार तैयार किया है और इसे कर रहे हैं ।

          महोदय, इसी तरह से हमारी जो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं, उनको 26 कार्य दिवसों की ट्रेनिंग दी जाती है । आज बदलते हुए परिवेश में उनका दायित्व बढ़ रहा है । आज आंगनबाड़ी बहनें आईसीडीएस से जुड़ी हुई योजनाओं को और हमारे मंत्रालय के पोषण अभियान को लागू कर रही हैं । वहीं, इस कोविड की चुनौती में डोर-टू-डोर जाकर सर्वे करने का काम, अवेयरनेस पैदा करने का काम कर रही हैं । अगर कोई पल्स पोलियो अभियान चलता है तो उसमें भी वे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । अगर कोई जनगणना होती है तो उसमें भी वे काम करती हैं । जिस तरीके से आज तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहे हैं, उन सभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भी वे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम करती हैं । आज एक तरह से उनके पास विविधताएं हो गई हैं । आज वे तमाम तरह की जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं । जो प्रशिक्षण है, ऐसा प्रशिक्षण हमारी आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दिया जाता है, महिलाओं और बच्चों से संबंधित जितने भी कार्यक्रम हैं, वे उन कार्यक्रमों को अपने जो आँगनबाड़ी के केन्द्र हैं, उनके माध्यम से या उनके घर पर जाकर कि किस तरीके से बचपन की देखभाल की जाती है, किस तरह से बच्चों को शिक्षा की गतिविधियों के साथ जोड़ने का काम हो सकता है, किस तरीके से बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण की देखभाल का ज्ञान हो, समझ हो, कौशल हो । ये तीनों चीजें जो बहुत जरूरी हैं, उनसे भी जागरूक करने का काम करती हैं । इन आँगनबाड़ी केन्द्रों पर जहाँ काम करने के लिए पर्यवेक्षित अभ्यास है, उसके माध्यम से भी एक कम्युनिटी असेम्बली होती है तो एक तरह से सामुदायिक रूप से लोग जुड़ते हैं, लोगों को जागरूक करते हैं, वकालत करते हैं, आईईसी के माध्यम से और आँगनबाड़ी का प्रबंधन और व्यावहारिक अनुभव भी विकसित किया जाता है । आज आँगनबाड़ी केन्द्र केवल एक आश्रय स्थल नहीं रह गया है । आज हमारी यह भी कोशिश है कि जो हमारे गवर्नमेंट के बेसिक सरकारी स्कूल्स हैं या अपर प्राइमरी स्कूल्स हैं, उसी कैम्पस में आँगनबाड़ी केन्द्र उन्हें दिया जाए । इस तरह वे आपस में इंटरलिंक्ड हो जाएंगे । जहाँ स्कूल हैं, वहाँ बच्चे और बच्चियाँ आती हैं, वहाँ वे अपनी पढ़ाई करेंगे और वहीं उनको आँगनबाड़ी के केन्द्रों का भी फायदा मिलेगा । यह हमारा लगातार प्रयास है । Now that you are extending the time for this discussion, kindly allow me to speak.

HON. CHAIRPERSON: Other Members are also going to participate in this debate.

SHRI JAGDAMBIKA PAL: I will take only half an hour, I will only take another 20 minutes.

महोदय, मैं आपका बहुत आभारी हूँ । आप मेरे प्रति बहुत दयालु हैं । आपने हमें बहुत महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया है । आज आईसीटी के माध्यम से पूरे देश में एक प्लेटफॉर्म बना है । उस प्लेटफॉर्म पर अपनी इन आँगनबाड़ी सेवाओं के क्रियान्वयन के लिए इन केन्द्रों पर, उसकी निगरानी के लिए, एक रियल टाइम डेटा प्राप्त करने के लिए एक डिजाइन तैयार‍ किया गया है । जिसमें हम कहते हैं कि पोषण ट्रैकर प्रबंधन एप्लीकेशंस आँगनबाड़ी केन्द्र पर है । जिसको हमने 360 डिग्री पर लिया है । आज आप देखते होंगे 360 डिग्री होती है कि दो ऊपर, दो नीचे मतलब पूरी पारदर्शिता हम कर रहे हैं । इसीलिए आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की जो सेवाएं हैं, उससे पूरा-पूरा लाभ उन ग्रामीण क्षेत्रों को मिल रहा है । आज मैं कहता हूँ कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत भी अपने इन सामान्य सेवा केन्द्रों पर जो सीएसई है, एसपीबी है या राज्य के या केन्द्र शासित प्रदेशों की जो तकनीकी सहायता प्रदान करने वाले नए पोषण ट्रैकर ऐप को डाउनलोड करने का काम और कामकाज के साथ-साथ फील्ड कर्मियों को, जो हमारे फील्ड में वर्कर्स हैं, उनको इनपुट आधारित प्रशिक्षण दिया जाता है ।

 

          महोदय, मैं बहुत महत्वपूर्ण बातें कह रहा हूँ । मैं विषय से संबंधित बातें कह रहा हूँ, क्योंकि मैं आँगनबाड़ी के साथ जुड़ा हुआ हूँ । मैं लगातार उनके दायित्व को देखता हूँ, मैं उनके साथ निश्चित तौर से लगातार जुड़ा हूँ । मैंने लगातार उनके मानदेय की बात की । इस सदन में मैंने पहले भी उनका मुद्दा बहुत बार उठाया है । प्रदेश में भी मैंने इस विषय को उठाया है । निश्चित तौर से लगातार आजादी के बाद से इनके बारे में बात होती थी, लेकिन अगर पहली बार इनके मानदेय में बढ़ोतरी हुई है और एक अच्छी बढ़ोतरी हुई है, जहाँ तीन हजार रुपया मिलता था, अब 4,500 रुपये मिलते हैं, वह भी मोदी सरकार ने दिया है । देश की हमारी आँगनबाड़ी की हमारी उन कार्यकर्ताओं और बहनों को मोदी सरकार ने यह मानदेय बढ़ाकर दिया है । जो हमारी सहायिकाएं थीं, जिन्हें 2,250 रुपये मिलते थे, उन्हें एकमुश्त 3,350 रुपये मिलेंगे । जो 1,500 रुपये पाती थीं, उन्हें 2,250 रुपया दिया गया है । इस तरह से स्वाभाविक है कि मानदेय में भी एक बढ़ोतरी की गई है ।

पूरे देश में जो आंगनबाड़ी की कार्यकर्ताएं या सहायिकाएं हैं, किन्हीं-किन्हीं राज्यों में कठिनाई आई होगी, माननीय मंत्री जी के भी संज्ञान में आया है कि एक तरफ वे लगातार अपने कार्य को संपादित कर रही थीं, लगातार अपने दायित्व का निर्वहन कर रही थीं और उसके बावजूद कहीं-कहीं उनको मानदेय की दिक्कत हुई । लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कि उन्हें मानदेय मिल रहा है या नहीं मिल रहा है । इसके बावजूद भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को अत्यंत महत्वपूर्ण समझा और वे यह समझती हैं कि वे एक जनरेशन के लिए काम नहीं कर रही हैं, वे उन ग्रामीण महिलाओं के लिए काम कर रही हैं, जिनके घर में बच्चा है । वे एक तरह से दो जनरेशन के लिए काम कर रही हैं । वे इतनी जिम्मेदार हैं, इतनी गम्भीर हैं कि गर्भवती महिलाओं की देखभाल के लिए, उनके घर में सासु मां इतनी शिक्षित नहीं है, इतनी पढ़ी-लिखी नहीं है, उनको जागरूक करके उनके घर में पल रहे बच्चों को वह अच्छे ढंग से देख सके । उनको पीएचसी लेकर जाना, सीएससी लेकर जाना, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपनी इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभा रही थी । उसके बाद नवजात शिशु की देखभाल करने का काम आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता, बहनें और सहायिकाएं करती हैं । यह केवल पैदा होने तक नहीं है, बल्कि छ: वर्ष तक की उम्र के बच्चों को कई तरह के टीके लगने होते हैं, जिसमें यह सुनिश्चित हो सके कि इन बच्चों का टीकाकरण हुआ कि नहीं हुआ, वह टीकाकरण कराने का काम भी आंगनबाड़ी की बहनें, कार्यकर्ता करती हैं । छ: वर्ष से कम आयु के जो बच्चे हैं, उनके लिए भी पूरक पोषण का काम करती है । … (व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: Please conclude. The other hon. Members also want to speak.

श्री जगदम्बिका पाल: हमारी कुछ महत्वपूर्ण बातें रह गई हैं, अगर आप इजाजत दें तो मैं कहना चाहता हूं ।… (व्यवधान) छ: वर्ष से कम आयु के बच्चे भी हैं, उनके एडिशनल न्यूट्रिशन के लिए क्या करना है? उसमें भी उन महिलाओं के साथ या बच्चों के साथ नियमित रूप से उनके स्वास्थ्‍य की जाँच करना, निगरानी करना आदि उनकी मुख्य जिम्मेदारी है । उस मुख्य जिम्मेदारी को वह एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाती है, जैसे एक शिक्षक की भूमिका होती है, एक टीचर की भूमिका होती है, वह एक तरह से एक टीचर के रूप में अपनी भूमिका निभाती है । तीन से पाँच साल के बच्चों को, चाहे वह स्कूल से पूर्व की शिक्षा हो, उनके घर में शिक्षा हो, वह इस तरीके से काम करती है । सबसे महत्वपूर्ण काम क्या है? हमारे देश में जो शिशु मृत्यु दर थी, यूनिसेफ ने भी माना है कि भारत ने जिस तरीके से शिशु मृत्यु दर को कम किया है और माताओं के देखभाल का जो लक्ष्य प्राप्त किया है, वह आंगनबाड़ी केन्द्र के प्रोत्साहन और सहयोग से हुआ है । हमारी जो आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता या आंगनबाड़ी की सहायिकाएं हैं, आपने देखा होगा कि एक अंगुल जिला है, जहां आंगनबाड़ी केन्द्र में दो बच्चों की घटनाएं हुईं, मैं उसकी डिटेल में नहीं जाना चाहता हूं । इसी तरीके से आंगनबाड़ी की और बहुत सी चीजें हुई हैं… (व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: Thank You, Jagdambika ji. For the rest of the time, our other hon. Members want to speak. You have already taken 45 minutes.

SHRI JAGDAMBIKA PAL: Sir, I am taking time today only. I need fifteen more minutes if you permit me. I can conclude also. I am standing on my legs.

HON. CHAIRPERSON: Now, please conclude.

श्री जगदम्बिका पाल: जब आप बार-बार कनक्लूड करने के लिए कह ही रहे हैं तो फिर मैं अपनी बात कनक्लूड कर दूंगा । मैं इन आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों के लिए कह रहा हॅूं । जहां6.44 लाख आंगनवाड़ी कार्यकत्रियां जुड़ी हुई हैं । मैं माननीय मंत्री महोदया जी से भी कहूंगा कि वे खुद एक माँ हैं,   खुद एक महिला हैं, और इन आंगनवाड़ी वर्कर्स और सहायिकाओं को बहुत नज़दीक से देखा है । लगातार हमारा स्वास्थ्य मंत्रालय या अन्य मंत्रालयों ने जिस तरह से जिम्मेदारियां ली हैं, चाहे पोषण अभियान की हो, या स्वास्थ से जुड़ी हुई जिम्मेदारियां हों, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को निभाया है । मैं आज इनके संबंध में और किसी एलोकेशंस की बात करूं या उनकी सर्विसेज़ की बात करूं, अगर मुझे और समय दे दें तो मैं थोड़ा सा और बोल देता हॅूं । अगर आप कनक्लूड करने के लिए कह रहे हैं तो … (व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: Thank you.

I do appreciate your interest on the subject of Anganwadi workers and helpers. At the same time, there is a time constraint.

 

THE MINISTER OF WOMEN AND CHILD DEVELOPMENT (SHRIMATI SMRITI ZUBIN IRANI): Mr. Chairman, can you give me just a minute? I will respond at the end of the entire discussion.

Sir, I have had the privilege of listening to Jagdambika Pal ji over a long period of time. He has spoken on the issue with much passion. इन्होंने यहां पर आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं का जो महिमामंडन विस्तार से किया है । इतिहास, वर्तमान परिस्थिति और भविष्य की चुनौतियों के बारे में सदन को अवगत कराया है । मैं आज मंत्री ही नहीं, बल्कि इस सदन की सदस्य होने के नाते भी कहना चाहती हॅूं कि he is a senior Member and he stood on his legs for hours to speak on this subject. I just would like to extend my compliments to him and I think the House can join me in extending our compliments.

HON. CHAIRPERSON: Yes, hon. Minister, the Chair has already complimented him on this. He spoke continuously for 45 minutes on the issue of Anganwadi workers and helpers. He made a very good speech. I once again compliment Shri Jagdambika Pal ji.                                                        

ADV. DEAN KURIAKOSE (IDUKKI): Sir, I fully support the entire content included in the Private Member’s Resolution moved by hon. Member Ritesh Pandey regarding welfare measures for Anganwadi workers and helpers. At the outset, I would like to express solidarity with the community of Anganwadi workers and helpers spread all over the country.

          Sir, the Integrated Child Development Scheme was introduced by late Prime Minister Shrimati Indira Gandhi in 1975. Now it became the backbone of rural India as everything is connected with Anganwadi. Sir, I am not going into all the details now as hon. Member, varishtha neta, Jagdambika Pal ji made a great speech on the subject in detail.

          Sir, the Comprehensive Nutrition Programme is being implemented through the Anganwadis. They are preparing the growth chart for our children. They are providing nutritional education. They are doing the pre-schooling. Pradhan Mantri Matri Vandana Yojana is being implemented through Anganwadis. Distribution of several welfare and pension schemes is under the control of Anganwadi workers. They are also working as the COVID-19 warriors in our villages. So, we have to salute the Anganwadi worker and helper community for their greatest contribution, their hard work, their commitment to our nation. However, Sir, as we can see, the honorarium they get is highly insufficient. To my knowledge, an amount of only Rs.4,500 is going to them from the Central Government and the rest of the amount is paid by the State Governments.

          In Kerala, they are getting Rs.12,000 as honorarium.  In addition, they are getting Rs. 500 only as performance linked incentive.  The Anganwadi helpers are getting only Rs.2,150 as honorarium from the Central Government’s share.  The balance amount is being added by the State Government.  The performance linked incentive is only Rs.250.  We have to give the highest priority to development of Anganwadis and we have also to give the highest priority to addressing the concerns of the Anganwadi Worker and Helper community. 

          My suggestion, through you, to the hon. Minister is this.  We have to increase the Central Government’s share to Rs.10,000 for Anganwadi Workers. The performance linked incentive should be increased to minimum Rs.2000.  Also, we have to increase the honorarium for Helpers from Rs.2,150 to Rs.5000.  At present, they are getting Rs.250 as performance linked incentive.  That has to be increased to Rs.1000.

          We all know that they are taking care of our children as mothers.  Also, they are the first teachers.  So, once again, I would like to express our solidarity with the Anganwadi Worker and Helper community by taking care of their welfare measures all over the country.

          As already discussed, there are 13.77 lakh Anganwadi centres in our country.  Nearly one-fourth of the operational Anganwadi centres lack drinking water facilities and 36 per cent do not have toilets. In 2015, the NITI Aayog recommended for better sanitation and drinking water facilities, improved power supply and basic medicines for the Anganwadi centres. It also suggested that these centres be provided with the required number of workers, whose skills should be upgraded through regular training.

Also, ICDS beneficiaries do register for services but because the Anganwadis lack adequate facilities, they turn to paid options. Privately-run centres come at a price, hitting low-income families the hardest.

We have to also consider that our centres, due to lack of facilities, clearly do not seem to provide the environment that encourages parents to leave children at these centres. Only a limited number of Anganwadi centres have facilities like crèche, and good quality recreational and learning facilities for pre-school education. Research has shown the significance of the playing-based learning approach in the cognitive development of children. An approach that combines an effective supplementary nutrition programme with learning techniques that makes learning interesting is the need of the hour. The success of ICDS depends upon the combined efforts of the Anganwadi Workers, ASHAs and ANMs I would like to make a few suggestions. Firstly, while infrastructure development and capacity building of the anganwadi centres remains the key to improving the programme, the standards of all its services need to be upscaled.

Secondly, the States have much to learn from each other’s experiences.

 Thirdly, the Anganwadi centres must cater to the needs of the community and the programme’s workers.

Also, we have to think about their further development by giving them the greatest priority.  We should think about smart Anganwadis.  Nowadays, we are living in a situation where we are trying to develop everything and become hi-tech.  That is why, for Anganwadis also, that kind of a development is needed. So, ‘smart Anganwadis’ should be the programme for development of Anganwadis.  We should think about smart Anganwadis.

With these words, I would once again like to support the entire content relating to the Private Member’s resolution.

Thank you, Sir.

SHRI HASNAIN MASOODI (ANANTNAG): Thank you, Sir.  First of all, I congratulate the hon. Member who has moved and initiated this Resolution.  Secondly, I do salute the resolve of the hon. Minister who is pursuing with passion the welfare schemes for children.

          We have 400 million children in our country.  There are different schemes to improve their lot, and to bring some kind of relief to those who belong to the disempowered section of the society.

          After Shri Jagdambika Pal has made an elaborate speech, I do not think there is any need to highlight the role played by the Anganwadi workers at the grassroots level.  These centres in real sense have become the nerve centres of rural development, in a sense the role they play in every facet of rural development.

          I would like to emphasise that there should be hand holding programmes at the initial stage and then we should take up capacity building.  The roles they successfully play need some kind of capacity building and convergence also.  There should be convergence between different verticals or different actors at the rural level.  The facilities at these centres need to be enhanced so that they can play the role envisioned by the Ministry under various ICDS Schemes.

          The next point is regarding remuneration.  When we gave ourselves the Constitution, we made a pledge.  We made a promise to ourselves that we will ensure and strive for social justice at all dimensions.  Social justice is one of the pledges that we made.  At the entry level when at least Rs.17,000 to Rs.20,000 emoluments are given to Class-IV employees, it is shameful that these workers end up receiving Rs.4,500 per month.  It is too meagre and deserves to be given a serious second look.  They are the key actors who play a role in making people realise the principles or objectives of social justice.  It is painful to realise that we are not able to do some kind of social justice to this segment of the society.  My request would be, whatever resources are available, at the Central level and at State level, they should be pooled in so that we can at least give them a decent honorarium.  Hon. Minister, and hon. Members will agree that Rs.4,500 is no emolument at all.

          I would say that there should be convergence.  If this programme is a successful programme, why not make best use of it at the rural level. We expect that this Resolution will give some kind of a relief to these Anganwadi workers.  Let us not forget the role they have played in this battle against COVID-19 pandemic.  We should also not forget the role played by our health workers and ASHA workers.  It would be appropriate to give some kind of relief and respite to that segment of the society which has played a vital role in the battle against COVID-19 and helped us to first set the goals and then achieve those goals.  That is my request.  Please, let this Resolution bring some kind of relief and the sentiments of the Members may be given importance.  The way we congratulated them for the role they have played, and the overall role played by the hon. Minister, let them get some kind of a relief. Let this not merely be a rhetoric without any practical benefits for the Anganwadi workers, helpers, including ASHA workers, and other workers at the lowest rung, who are engaged in health care system.  Thank you.

डॉ. निशिकांत दुबे (गोड्डा): धन्यवाद सभापति महोदय, मैं रितेश पाण्डेय जी द्वारा लाए गए रिजॉल्यूशन के संबंध में बात करने के लिए खड़ा हुआ हूं । इस कोरोना काल में देश के प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी के नेतृत्व में आंगनवाड़ी और आंगनवाड़ी वर्कर्स ने कंधे से कंधा मिलाकर जो कार्य किया है, उसके लिए मैं उनको बधाई देना चाहता हूं और मैं इस सदन के सभी मेम्बर्स की तरफ से  भी  चाहता हूं कि उनको बधाई दी जाए कि आपने इस देश के लिए एक बड़ा काम किया है ।

          दूसरा, माननीय प्रधान मंत्री जी ने जिस तरह से बहन स्मृति इरानी जी को ये जिम्मेवारी दी है और जिस पैशन से हसनैन मसूदी जी और जगदम्बिका पाल जी बोल रहे थे, उससे स्वयं को संबद्ध करते हुए यह बता सकता हूं कि स्मृति इरानी जी को एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है । उन्होंने वर्ष 2019 से और खासकर इस कोरोना काल में जिस तरह का अद्‌भूत कार्य किया है, सदन की तरफ से मैं उनको ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं देना चाहता हूं कि आप इसी तरह से काम करते रहिए ।

          मृत्यु दर की बात होती है, शिशु मृत्यु दर की बात होती है, महिलाओं को आगे बढ़ाने की बात होती है और बात होती है कि जो आईसीडीएस है, वह किस आधार पर बढ़ा । स्वर्गीय श्रीमती गांधी जी के प्रति इस सदन का विश्वास है और मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूं कि वे वर्ष 1975 में इस तरह का प्रोग्राम लाईं  । लेकिन, हमारी जो संस्कृति रही है, वह बहुत ही सिम्पल संस्कृति रही है । हम लोग बचपन से पढ़ते आ रहे हैं, जैसे कबीर ने कहा कि-

साँई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय ।

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय । ।

   

इसका मतलब यह है कि हम एक डिस्ट्रिब्यूशन की संस्कृति में हमेशा से विश्वास करते हैं । हम यह विश्वास करते हैं कि हमारे पास उतनी ही धन, उतनी ही सम्पत्ति और उतना ही अख्तियार होना चाहिए, जिसमें हम सबों को भोजन करा पाएं । हम इक्वलिटी की बात करते हैं । राइट ऑफ इक्वलिटी, जिसके बारे में संविधान में हम लगातार आर्टिकल-14 और आर्टिकल-21 की बात करते हैं, आर्टिकल-14 और आर्टिकल-21 पढ़ने की बहुत आवश्यकता नहीं है । मैं यह कहना चाहता हूं कि जो कबीर ने कहा, जो रहीम ने कहा, उसके पहले जो भारत के वेद ने कहा, पुराण ने कहा, सभ्यता और संस्कृति ने कहा, सबने एक ही बात की । लेकिन, कई चीजें आजादी के पहले और आजादी के बाद इस देश में एक वोट बैंक की स्थिति बन गईं । यदि किसान की बात कीजिए तो किसान को कैसे फायदा पहुंचाना है, उसके बारे में कोई बात नहीं करेगा । किसान को वोट बैंक की राजनीति में कैसे ले जाना है, उसकी बात करेगा । यदि धर्म की बात करें तो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में यह साबित हुआ कि आजादी के 60-70 साल बाद भी, 60-70 साल तक भारतीय जनता पार्टी  ने शासन नहीं किया है, यह शासन कांग्रेस पार्टी ने किया है, कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व ने किया है । मैं यह नहीं कहता कि उन्होंने कुछ नहीं किया है, उन्होंने बहुत कुछ करने की कोशिश की । लेकिन, सच्चर कमेटी की रिर्पोर्ट जो कांग्रेस के शासन में ही बनी थी, यदि उस रिपोर्ट को देखेंगे तो पता लगेगा कि मुसलमानों को जो उसका हक मिलना चाहिए था, उसकी शिक्षा का विकास, उसकी पढ़ाई का विकास, उसकी नौकरी का विकास और उद्योग-धंधे में जो मुसलमान का प्रतिनिधित्व होना चाहिए था, वह नहीं के बराबर है । यदि मुसलमान की बात करें तो आपको वोट बैंक की राजनीति नजर आएगी कि मुसलमान से कैसे वोट की राजनीति करें । लेकिन, वह कैसे शिक्षा में आगे बढ़े, कैसे नौकरी में आगे बढ़े, उसके बारे में कोई बात नहीं होती है । उसी तरह से जब महिलाओं की बात होगी, महिलाओं के अधिकार की बात होगी तो महिलाओं का विकास होना चाहिए, महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए, नौकरी होनी चाहिए, पढ़ाई होनी चाहिए, बच्चे का समुचित विकास होना चाहिए, ये सब केवल कागजों में है । यह उसी तरह से है, जैसे प्रत्येक गांव में बिजली लगना है, जब मैं वर्ष 2009 में सांसद बना तो कहा गया कि जब मैं किसी गांव में जाता था तो कहते थे कि अब यहां बिजली नहीं आ सकती है क्योंकि ‘राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना’ में जिस तरह से ट्रांसफॉर्मर्स लगाए गएं, एक फेज़ की लाइन लगाई गई, जिस तरह से बीपीएल कार्ड धारकों को बिजली देने की बात हुई, जिस तरह से 9 केवीए, 16 केवीए और 25 केवीए के ट्रांसफॉर्मर्स लगाए गएं कि गरीब लोग उस बिजली का इस्तेमाल करेंगे और अमीर लोग उसका इस्तेमाल नहीं करेंगे । लेकिन अमीर आदमी ने खुद्दन लगाकर उस बिजली को लगा लिया । इसका फल यह हुआ कि सारे के सारे ट्रांसफॉर्मर्स या तो चोरी हो गए या फिर जल गए । उसी तरह से जब मैं अपना भाषण आगे बढ़ाऊंगा, तब मैं यह बताऊंगा कि इसमें भी इजैक्ट क्या हुआ ।

          सभापति महोदय, आज़ादी के ठीक पहले सन् 1946 में एक भोर कमेटी बनी थी । भोर कमेटी ने यह कहा, क्योंकि आज़ादी का मुहूर्त आने वाला था, लोगों को यह लग रहा था कि आज नहीं तो कल आज़ादी आ जाएगी, तो उस भोर कमेटी ने यह कहा कि आज़ादी के बाद सबसे ज्यादा यदि कहीं पर ध्यान देना है, तो वह बच्चों और महिलाओं पर देना है । भोर कमेटी की रेकमेंडेशन के बाद, जब सन् 1947 में देश में हमारी सरकार बनी और स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू जी देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने एक छोटा-मोटा प्रोग्राम स्टार्ट किया ।

जब 10 साल में कुछ नहीं हुआ, तो सन् 1959-61 में एक मुदलियार कमेटी बनी । उस कमेटी ने यह कहा कि पिछले 10-12 या 15 सालों का जो अध्ययन है, हम उस अध्ययन के बाद यह कह सकते हैं कि पिछले 13-14 सालों में जिस आधार पर बच्चों के विकास के लिए, बच्चों के माल न्यूट्रिशन के लिए, बच्चों के मानसिक विकास के लिए, महिलाओं की एनीमिया की बीमारी को खत्म करने के लिए, इस देश से कुपोषण और भूख को मिटाने के लिए जो कार्य होने चाहिए थे, वे कार्य नहीं हुए हैं । रिपोर्टें आती हैं और चली जाती हैं । सन् 1946 में भोर कमेटी की रिपोर्ट आई, सन् 1959-60 में मुदलियार कमेटी की रिपोर्ट आई, लेकिन जब रिपोर्ट आती है, तो जैसे ही वह कार्य बंद हो जाता है, वैसे ही वह रिपोर्ट भी बंद हो गई ।

 

          सरकार को अचानक होश आता है और सन् 1975 में श्रीमती गांधी जी, क्योंकि वह कई एक फॉर रीचिंग लेजिस्लेशन लेकर आईं । कई लेजिस्लेशन तो ऐसे आएं, जो कि उन्होंने कहा कि हम ये काम करेंगे । जैसे बैंकों का राष्ट्रीयकरण है । जब सन् 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो रहा था, तो उन्होंने इसी सदन में भाषण दिया था कि ईस्टर्न इंडिया में जो क्रेडिट डिपॉजिट (सीडी) रेशियो है, वह बढ़ नहीं पा रहा है । वह 30-32 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण हमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना है ।

उन्होंने सन् 1971 में नारा दिया कि हमें गरीबी हटानी है, लेकिन हमने इन दोनों का हश्र देखा है, जो नारा है, वह नारा यह है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भी वर्ष 1969 से लेकर वर्ष 2014 तक, मैं जिस राज्य से आता हूं, झारखंड से, बिहार से, यदि पश्चिम बंगाल की बात करें, यदि ओडिशा की बात करें, यदि छत्तीसगढ़ की बात करें, तो आज वह सीडी रेशियो 35 प्रतिशत पर आ गया है, लेकिन वर्ष 2014 में जब माननीय मोदी जी ने प्रधानमंत्री का पद संभाला था, तो वह सीडी रेशियो केवल और केवल 30 प्रतिशत ही था । वर्ष 1969 से लेकर वर्ष 2014 तक इस देश का यही हाल था ।

उसी तरह से यदि हम गरीबी हटाओ की बात करें, तो जो गरीबी हटाओ का नारा था, यदि वर्ष 2014 तक उस नारे को देखें, तो जो लोग इस सदन में लगातार जीतकर आए हैं । खासकर अभी कई लोग बैठे हुए हैं, हम लोग वर्ष 2009 में एक साथ ही सांसद बनकर आए थे । जैसे यहां पर पार्लियामेन्ट्री अफेयर्स मेघवाल साहब जी बैठे हुए हैं, राजेन्द्र अग्रवाल जी भी बैठे हुए हैं । सभापति महोदय, आप तो हम लोगों से सीनियर हैं । आप तो पहले ही जीतकर आए हैं । यहां पर जितने भी लोग बैठे हैं, उसमें सबसे सीनियर आप ही हैं ।

          जब मैं वर्ष 2009 में चुनाव लड़ रहा था, तब एक ही नारा था कि आप हमारा लाल कार्ड बना दीजिएगा, बीपीएल कार्ड बना दीजिएगा । प्रत्येक गांव की महिलाएं और पुरुष, वोट की राजनीति उसी आधार पर चलती थी और गरीबी नहीं हटी । वर्ष 2014 के बाद जिस तरह से सरकार ने अपना मापदंड बदला, जिस तरह से उसने जोड़ा कि किस तरह से बिजली मिलेगी, किस तरह से फूड सिक्योरिटी एक्ट में लोगों को खाद्यान्न मिलेगा, किस तरह से लोगों को नौकरी मिलेगी, किस तरह से उनका विकास होगा, उसके आधार पर मैं आज एक सांसद होने के नाते यह गर्व के साथ कह सकता हूं कि इसके लिए माननीय प्रधानमंत्री जी बधाई के पात्र हैं कि कम से कम उन्होंने हमारे जैसे लोगों को एकमुक्त कर दिया और अमीरी और गरीबी की जो खाई है, बैकवर्ड और फॉरवर्ड की जो खाई बढ़ रही थी, उसको खत्म करने में उन्होंने बड़ा योगदान दिया और धीरे-धीरे गरीबी भी कम हो गई ।    

          इस सरकार को डिस्टेबलाइज करने के लिए फॉरेन की फार्सेस लगी रहती हैं, वे तरह-तरह की बातें करती हैं । मैं आपको बताता हूँ कि देश-दुनिया के इंटेलेक्चुअल और खासकर मीडिया के लोग दो चीजों पर हमें लगातार घेरने की कोशिश करते हैं । एक तो अभी नया-नया हंगर इंडेक्स आया है और दूसरा जी.डी.पी. आया है ।

          सभापति महोदय, मैं एक दिन इस पार्लियामेंट में बोल रहा था और मैंने कहा कि जीडीपी को देश के विकास को मापने का क्राइटेरिया नहीं माना जा सकता है और जीडीपी में जो समस्या है, उस समस्या के बारे में अब यह समय आ गया है कि यह देश भी निर्णय ले । मैंने कई लोगों को कोट किया है, लेकिन मीडिया में कहा गया कि यह जीडीपी का ज्ञाता आ गया, यह कैसा बकवास बोलता है, यह बुद्धिहीन है, इस तरह की भारतीय जनता पार्टी है । मैंने कौन सी रिपोर्ट कोट की थी? वर्ष 2008 में फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी थे । उन्होंने यह देखा कि फ्रांस के लोगों का जीवन स्तर ज्यादा अच्छा है । उन्होंने देखा कि हम ज्यादा अच्छे ढंग से उनको खाना खिला पा रहे हैं, उनको नौकरी दे पा रहे हैं, हमारे यहां महिलाओं की स्थिति अच्छी है, हमारे यहां बच्चों की स्थिति अच्छी है । उन्होंने देखा कि हमारे यहां गरीबी रेखा के नीचे के लोग कम हैं, अमेरिका में गरीबी रेखा से नीचे के लोग ज्यादा हैं, लेकिन अमेरिका की जीडीपी ज्यादा आगे दिखती है और हमारी कम दिखती है । उन्होंने सोचा कि इसके पीछे रीजन क्या है? जीडीपी कोई बाइबिल नहीं है ।

 

मैं आपके माध्यम से सदन में बोलना चाहता हूँ कि सन् 1935-36 में जीडीपी आई थी तो क्या बिना जीडीपी के दुनिया नहीं चल रही थी? उन्होंने वर्ष 2008 में नोबेल प्राइज विनर अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज के नाम से एक कमेटी बनाई । स्टिगलिट्ज कमेटी में इस देश के एक बहुत ही सम्मानित व्यक्ति प्रोफेसर अमृत्य सेन साहब थे, जिनको अपॉजिशन के सभी लोग कोट करते हैं और हम भी अर्थशास्त्री होने के नाते उनकी रिस्पेक्ट करते हैं । वे भी नोबेल प्राइज विनर थे और इस कमेटी के सदस्य थे । उनकी कमेटी की रिपोर्ट है कि जीडीपी किसी भी आधार पर पैमाना नहीं होना चाहिए और अब वह समय आ गया है कि हमें दूसरे इंडेक्स के सहारे के आधार पर किसी और देश के विकास को देखना चाहिए । मैंने स्टिगलिट्ज कमेटी की रिपोर्ट को कोट किया । अर्थशास्त्री स्टिगलिट्ज को अर्थशास्त्र नहीं आता, उस पर चर्चा नहीं होगी । अमृत्य सेन जी की रिपोर्ट गलत है, उस पर चर्चा नहीं होगी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के सदस्य निशिकांत दुबे ने यह चर्चा कर दी तो वह मूर्ख है, भारतीय जनता पार्टी मूर्ख है, भारतीय जनता पार्टी में टैलेंट क्रंच है, इस तरह की बातें होने लगीं । उसी तरह का यह हंगर इंडेक्स है ।

          सभापति जी, मैं उस दिन सदन में चर्चा सुन रहा था कि जब वर्ष 1918-19 में स्पेनिश ट्रू यहां पर आया था तो इस देश में उस समय जो सबसे बड़ी समस्या हुई, वह यह हुई थी कि बहुत से लोग भूख से मर गए थे और भूख से मरने के स्वाभाविक कारण थे, क्योंकि हम उतने अनाज का उत्पादन नहीं कर सकते थे, ट्रांसपोर्टेशन के उतने साधन नहीं थे । अंग्रेज लोग वर्ल्ड वार में इतने फंसे हुए थे कि वे यहां से सारी संपत्ति ले जाकर दुनिया से लड़ाई करने के लिए परेशान थे । इस कारण यहां के बहुत सारे लोग भूख से मर गए थे ।

          सभापति जी, आप भी इतने दिन से राजनीति में है तो क्या आप यह कह सकते हैं कि किसी देश ने अपने लोगों की जान बचाने के लिए माननीय मोदी जी के नेतृत्व में ढाई लाख करोड़ रुपये का खर्चा किया और आज 80 करोड़ लोगों को लगातार मार्च तक पांच किलो अनाज दिया जा रहा है । क्या इसके लिए हमें मोदी जी को बधाई नहीं देनी चाहिए? अनाज आंगनवाड़ी केन्द्रों पर कैसे सही समय पर पहुंचे, बच्चे भूख से नहीं मरे, महिलाएं कुपोषण की शिकार नहीं हों, महिलाओं में एनिमिया नहीं फैले, इसके लिए क्या हम और आप इसके गवाह नहीं है कि जुनूनी तरीके से एक काबिल मंत्री के नाते स्मृति ईरानी जी लगातार, चाहे सांसद हों, विधायक हों, सारे अधिकारी हों या चीफ सेक्रेटरीज़ हों, उनके साथ लगातार टच में नहीं हैं?

कोरोना के इस टाइम में अगर मुझसे ही उनकी पांच या सात बार बातचीत हुई होगी तो उन्होंने हमेशा कहा होगा कि निशिकांत क्या तुमने मीटिंग की, तुम्हारे यहां माल-न्यूट्रिशन की क्या स्थिति है? हम यह जो पोषण पखवाड़ा मना रहे हैं, पोषण पखवाड़े में तुमने कहां भाग लिया? क्या हमें इसके लिए उनको बधाई नहीं देनी चाहिए? क्या हमें पार्टीलाइन से ऊपर उठकर उन्हें बधाई नहीं देनी चाहिए कि इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं? मेरा यह कहना है कि इस तरह का जो वैक्यूम है, इस तरह का जो डिस्कशन है, पार्लियामेंट में हमें इससे बचना चाहिए ।

महोदय, मैं तीन-चार चीजें सदन को बताना चाहता हूं, जो मैंने अपने शुरुआती भाषण में कहा है कि जो आई.सी.डी.एस. थी, इसको आप समझिए कि फेल करने के लिए या एक नारे के तौर पर हमने लिया । मैं आपके सामने सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजमेंट्स कोट करना चाहता हूं कि क्या किया गया । कांग्रेस ने आई.सी.डी.एस. चलाया, वे बधाई के पात्र हैं, लेकिन उसमें महिलाओं और बच्चों की क्या स्थिति हुई, उसके बारे में मैं सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2009 का एक जजमेंट कोट करना चाहता हूं । जस्टिस अरिजीत पसायत जी ने कहा :

“The grievance is made by the petitioner about the non-implementation of the direction given by this court to the Central Government and the State Government relating to the Integrated Child Development Scheme. The Scheme is meant for children of the age group of 0-6, pregnant women, lactating mothers and adolescent girls.  Undisputedly, funds are released by the Central Governments to the State Governments which are required to implement the Scheme. They are not implementing it and Central Government is not taking care.”   यह वर्ष 2009 का जजमेंट है । यह जजमेंट इसलिए आया क्योंकि वर्ष 2004 और 2006 में भी उसी कोर्ट ने लगातार दो ऑब्जर्वेशन किए थे कि तुम यह जो स्कीम लागू कर रहे हो, इस स्कीम में तुम एक भी काम ऐसा नहीं कर रहे हो, हम जिस चीज के लिए इस स्कीम को लेकर आए थे, जिसके लिए लगातार वर्ष 2001, 2004 और 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑब्जवेशन्स दिए हैं और उन ऑब्जर्वेशन्स को तुम पूरा नहीं कर रहे हो । क्या इसी तरह की आई.सी.डी.एस. के साथ हमें बढ़ना चाहिए? जिस तरह से रितेश पाण्डेय साहब इसे लेकर आए हैं, क्या आपने कभी आंगनवाड़ी वर्कर की स्थिति को देखा है, कभी किसी सहायिका की स्थिति को देखने का किसी ने प्रयास किया? मॉनिटरिंग कमेटी कैसी होनी चाहिए? सभी लोग बात करते हैं ।
          अभी हमारे सीनियर मेम्बर जगदम्बिका पाल जी बोल रहे थे, बहुत अच्छा बोलते हैं और आंगनवाड़ी के साथ वे लगे हुए हैं । जो भी लोक सभा का चुनाव लड़ता है, बच्चों के कारण, महिलाओं के कारण, माल-न्यूट्रिशन के कारण एनीमिया के कारण, चाहे इसे आप वोट बैंक की राजनीति कह लीजिए या आप समझिए कि समाज में कुछ काम करने गया है तो काम करने के कारण उसका एक फोकस आंगनवाड़ी केन्द्र पर होता है । लेकिन आंगनवाड़ी केन्द्र में सहायिका का सेलेक्शन कैसे होता है - बिहार में कैसे होता है, झारखण्ड में कैसे होता है या उत्तर प्रदेश में कैसे होता है, इसको हमें पार्टी एंगल से ऊपर उठकर सोचना चाहिए । यदि हम पंचायतों को यह अधिकार देने की बात करते हैं कि पंचायत में मुखिया इन चीजों को कोऑर्डिनेट करेगा तो क्या आपने कभी देखा है कि मुखिया क्या काम करता है? बी.पी.एल. सूची में जो सबसे बड़ी समस्या आई कि नाम काटने और नाम जोड़ने का अधिकार हमने ग्राम पंचायत को दे दिया, मुखिया को दे दिया  कि जो अमीर हो गया, उसका नाम आप काट दो और जो गरीब हो गया, उसका नाम जोड़ दो । क्या आपको लगता है कि वोट बैंक की राजनीति के कारण कोई एडिशन या डिलीशन, कोई जोड़ या घटाव मुखिया कर पाता है? उसी तरह से कहां से सप्लाई होगी, कौन आदमी फूड सप्लाई करेगा, यह भी राज्य सरकार अपने-अपने हिसाब से तय करती है । मैंने जितने जजमेंट्स को कोट किया, चाहे वह सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2001 का जजमेंट हो, 2004 का जजमेंट हो, 2006 का जजमेंट हो या 2009 का जजमेंट हो, हम यहां लगातार सुप्रीम कोर्ट की बात करते हैं ।
          सभी जजमेंट्स में एक ही बात सबसे प्रमुख है, जो कॉमन बात है । वह कॉमन बात यह है कि कोई भी मास सप्लाई नहीं होगा । कोई भी बड़ी कंपनी इस तरह की चीजों की सप्लाई नहीं करेगी और न्यूट्रीशनल फूड की सप्लाई नहीं करेगी । राज्य में क्या हो रहा है? उनमें चाहे कोई भी राज्य सरकार हो, मैं यह कहता हूं और मेरा आपके माध्यम से मंत्री जी से आग्रह भी है कि एकदम स्प्रिट में जजमेंट को लागू करें । आप यह कर भी सकती हैं, क्योंकि आप बहुत काम कर रही हैं । मंत्री जी, मैं आपकी पीड़ा को समझ सकता हूं । मैं कई बार आपसे बात करता हूं और आप भी हमेशा बताती रहती हैं । कई बार व्यक्तिगत बातचीत में स्मृति ईरानी जी कहती हैं कि यदि एनिमिया को खत्म करना है तो उसे खत्म करने की सबसे बढ़िया जो सब्जी है, सबसे बढ़िया इलाज है या सबसे बढ़िया चीज है, वह सहजन है, जिसको ड्रमस्टिक कहते हैं ।
हमारे यहां बिहार और झारखण्ड में उसको सहजन या सोजीना कहते हैं । वह हमारे घर में लगी हुई है और हमने दिल्ली में भी लगाई हुई है । यदि वह खिलाई जाए तो हम महिलाओं का एनिमिया बहुत हद तक कंट्रोल कर सकते हैं । लेकिन क्या राज्य सरकार लोकल प्रोडक्ट के नाते, डिस्ट्रिक्ट प्रोडक्ट के नाते, पंचायत प्रोडक्ट के नाते या आंगनवाड़ी केन्द्र, जिसके बारे में हम बात करते हैं कि उसका अपना भवन या घर होना चाहिए, क्या किसी आंगनवाड़ी केन्द्र में हम सहजन का पेड़ लगाते हैं? यह पूरे देश के लिए अच्छी बात है, लेकिन क्या है कि हमको इससे पैसा कमाना है, हमको इससे करप्शन करना है । इस तरह की एक्टिविटीज को रोकने के लिए, जब हम प्रयास नहीं करते हैं तो ये समस्याएं डेवलप होती हैं ।
 
          सभापति महोदय, कई ऐसी चीजें हैं कि हमें लगा कि वर्ष 2014 में कांग्रेस पार्टी ने यह तय कर लिया कि उसको नहीं आना है । वर्ष 2011-12 से चाहे 2जी का मामला हो, सीडब्ल्यूजी का मामला हो, उसमें से कई चीजें कोर्ट में हैं और कई सदस्य यहां हैं, मैं उनके ऊपर कमेंट नहीं करना चाहता हूं । उन्होंने धीरे-धीरे इस तरह की पॉलिसी बनाना स्टार्ट की, जिसमें लगा कि आगे आने वाली जो सरकार है, उसमें मान लीजिए कि पांच साल हम सरकार में नहीं आएंगे, वर्ष 2014 की सरकार में नहीं आएंगे, लेकिन वर्ष 2014 के जाने से पहले हम कुछ ऐसा काम करके चले जाएंगे कि जो आने वाले प्रधान मंत्री हैं, वे उन चीजों को इम्प्लीमेंट नहीं कर पाएंगे । जब वह इम्प्लीमेंट नहीं कर पाएंगे तो देश में इतना रिएक्शन होगा कि उस रिएक्शन से फाइनली भारत सरकार को हार का सामना करना पड़ेगा ।
सर, उसमें दो एक्ट हैं । उनमें एक तो लैण्ड एक्विज़िशन एक्ट है । उसमें ऐसा हो गया कि यदि आपको लैण्ड एक्वायर करनी है और इसमें किसी को पैसा देने में समस्या नहीं है, किसानों को पैसा मिले, उसमें चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या कोई भी अन्य सरकारें हों, अगर वे किसानों के नाम पर राजनीति करती हैं तो उन किसानों को पैसा देने में समस्या नहीं है । लेकिन उसका जो एसेसमेंट है, रिव्यू, लैण्ड एक्विजिशन का प्रोसेस है, उसको इतना डिले कर दिया कि साल, दो साल और तीन साल से पहले कोई लैण्ड एक्वायर नहीं होगी । आप जब वर्ष 2014 में सत्ता में आएंगे तो 2018-19 तक आपका कोई काम ग्राउण्ड पर दिखाई नहीं देगा, उसके बाद आप बोरिया-बिस्तर बांधकर चले जाएंगे ।
          सर, इसमें दूसरा फूड सिक्योरिटी एक्ट है । ये दो ऐसे फार रीचिंग लेजिस्लेशन हैं, जिनके बारे में कहा है । ये केवल वोट बैंक की राजनीति थी । इस वोट बैंक की राजनीति में जो आने वाली सरकार थी, उसको बदनाम करने की एक बहुत बड़ी साज़िश थी, लेकिन उनको यह नहीं पता था कि उनका मुकाबला मोदी जी से है । महोदय, एक गोरखपुरी शायरी है ।
“ये माना कि जिन्दगी है चार दिन की, बहुत होते हैं यार चार दिन भी ।”             मोदी जी, इसी विश्वास के साथ चले । हमारे लिए ये पांच साल भी काफी हैं, जो करना है, करो । यदि दबे, पिछड़े, कुचले, महिला, शोषित, वंचित को न्याय देना है और उनका विकास करना है तो हमको जो करना होगा, हम करेंगे ।
          इस फूड सिक्योरिटी एक्ट के बाद क्या हुआ? मैं केवल दो चीजें कोट करना चाहूंगा । एक चिट्ठी 30 मार्च, 2020 की है । …(व्यवधान) सर, ज्यादा से ज्यादा 15-20 मिनट का समय और लगेगा । जब स्मृति ईरानी जी मंत्री बनी तो इन्होंने इंस्ट्रक्‍शन दिया,  as per the National Food Security Act, 2013, उसके सेक्शन 4, 5, 6 और 8 के आधार पर सप्लीमेंट्री फूड देने का फैसला किया है । इन्होंने बजट को एनहांस करने का फैसला लिया । जिन लोगों को लगा कि हम यह काम नहीं कर सकते हैं, उनके लिए एक बड़ा धक्का था कि उन्होंने यह काम भी कर दिया । इसके अलावा आंगनवाड़ी का ऐडमिनिस्ट्रेशन कैसा होगा, यूटी कैसा होगा, चीफ सेक्रेट्री का रोल कैसा होगा, ये सब माननीय मंत्री जी ने यहां से । मैंने कहा कि माननीय मंत्री जी जुनूनी हैं । यदि अमेठी के लोगों ने इनको वर्ष 2014 में कम वोट से यहां आने का मौका नहीं दिया, तो इन्होंने पांच सालों तक अमेठी में इतनी मेहनत की, कि फाइनली यह अमेठी जीत कर आईं और अमेठी के …* यह इनके जुनून का परिणाम है । 13 जनवरी, 2012 को, रितेश पांडे जी जो रेज्योल्यूशन लाए हैं, इसके कई जवाब हैं, आंगनवाड़ी की सहायिकाओं का पैसा बढ़ना चाहिए, आज की आर्थिक स्थिति में केन्द्र और राज्य के बीच में जो बंटवारा है, पूरा राज्य उस पर ही निर्भर करता है । यदि केन्द्र राज्य को पैसा न दे, उनको सपोर्ट न करे, ओवर ड्राफ्ट न लें, तो कई ऐसी राज्य सरकारें हैं, खास कर हम और आप जिस तरह के राज्य से आते हैं, वहां बहुत इंडस्ट्रीज नहीं है, उसमें बहुत समस्या है । इसलिए जगदम्बिका पाल जी ने जो कहा है, मैं उसे दोहराना नहीं चाहता हूं कि वह अभी कैसे साढ़े तीन हजार हो गया है, साढ़े चार हजार हो गया है, उसके बारे में माननीय मंत्री जी निश्चित तौर पर बोलेंगी । मैं इनको बधाई देना चाहता हूं कि आपके लिए जो नारा था, कांग्रेस के लिए जो नारा था कि गरीबी हटाओ, फूड सिक्योरिटी एक्ट, बच्चों का विकास, महिलाओं का शोषण खत्म, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे को आगे बढ़ाते इस आईसीडीएस के लिए जो काम किया, वह उल्लेखनीय है । इनके 13 जनवरी का ऑर्डर क्या कहता है? यह हमारे लिए नारा नहीं है । बच्चों का विकास मोदी गवनर्मेंट के लिए नारा नहीं है । यह स्मृति ईरानी जी के लिए नारा नहीं है । यह इनके लिए इमोशनल विषय है । यह एक ऐसा विषय है, जिसको हमें आगे बढ़ाना है । बच्चे आगे बढ़ाए जाएंगे, बच्चे स्वस्थ होंगे, महिलाएं स्वस्थ होंगी तभी यह देश आगे बढ़ेगा । उसमें पहला क्वालिटी एश्यारेंस था, जिसके बारे में मैंने कहा है कि आंगनवाड़ी केन्द्र में उस तरह का भोजन होना चाहिए, जो भोजन हम और आप सामान्य तरीके से खाते हैं । सबसे बड़ी समस्या यह आती है कि यदि दाल है, तो उसमें केवल पानी है, यदि चावल है, तो हो सकता है कि कीड़े पड़े हुए चावल हों, उनको हरी सब्जी दी जा रही है या नहीं, इसको भी कोई देखने वाला नहीं था । सबसे पहला आदेश बहुत ही महत्वपूर्ण है । रितेश पांडे जी, मैं आपके रेज्योल्यूशन लाने के एक साल बाद पढ़ रहा हूं कि इसमें क्वालिटी एश्योरेंस होना चाहिए । माननीय मंत्री जी ने जोड़ा है कि टेक होम राशन एफएसएसएआई का एम्पैनल्ड या एनएबीएल के एक्रीडेटेड लेबोरेट्री से उसकी जांच हो । आज तक किसी ने यह सोचा । आज तक किसी ने गरीब आदमी के बारे में सोचा । हम  रहीम का दोहा पढ़ते हैं :
रहिमन वे नर मर चुके, जे कहूं मांगन जाहिं उन ते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं ।
          आप गरीब, गांव महिलाओं और बच्चों की बात करते हैं, लेकिन उनको कैसे अच्छा खाना मिलेगा, आपने इसके बारे में कभी नहीं सोचा । आपने तो यह ठेकेदार के हाथ में दे दिया ।
          सबसे पहले, 13 जनवरी, 2021 को यही आदेश आया कि उसका क्वालिटी एश्‍योरेंस कैसे होगा और उसमें कौन सी लेबोरट्री होगी और कौन सा सर्टिफिकेशन होगा, यह भी माननीय मंत्री जी ने तय किया है । ऐसा पहली बार हुआ है । मैं आपसे यह कह सकता हूं कि वर्ष 1975 के बाद से, लगभग 46 वर्षों के बाद, तकरीबन 50 साल होने को हैं, 50 सालों के बाद माननीय मोदी जी के नेतृत्व में यह काम बहन स्मृति इरानी जी ने किया । मैं उनको आपके माध्यम से इस सदन में बधाई देना चाहता हूं ।
          दूसरा विषय सप्लाई चेन मैनेजमेंट का है । स्टेट्स की सप्लाई चेन ट्रांसपेरेंट नहीं है, जैसा कि मैंने आपसे कहा । सबसे ज्यादा यदि चोरी है, तो कई एक लोगों ने झूठा, सही, किसी भी तरह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैक्ट्री बना ली है । लोगों ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में फैक्ट्री बना ली है । वे क्या सप्लाई करते हैं? मैं आप लोगों को बताता हूं कि झारखंड, बिहार, गुजरात, कर्नाटक और नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के खाने का स्वाद एक कैसे हो सकता है? इसके लिए उन्होंने व्यवस्था की कि सप्लाई चेन मैनेजमेंट प्रॉपर होना चाहिए और वहां के लोकल लोगों का, लोकल महिलाओं और बच्चों का ध्यान रखते हुए होना चाहिए ।
          डिस्ट्रिक्ट लेवल पर डिस्ट्रिक्ट मॉनिटरिंग कमेटी डीएम के नेतृत्व में बननी चाहिए और उसकी मीटिंग लगातार होनी चाहिए । वह क्या मॉनिटर करेगा, कब-कब मॉनिटर करेगा, जैसे पिरीयॉडिकली मॉनिटर करेगा, नेसिसरी स्टॉक की डिलीवरी को मॉनिटर करेगा, सब मीटिंग्स में पार्टिसिपेट करेगा, उसका क्या काम होगा, यह भी तय किया गया है । इसके बाद स्टेट लेवल पर काम हुआ है । सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई चीज़ें डीसेंट्रलाइज़्ड नहीं हैं । आईसीडीएस स्कीम में डीसेंट्रलाइज़्ड सिस्टम नहीं है । स्टेट ही तय करता है कि स्टेट की तरफ से कौन होगा । स्टेट की तरफ से सेक्रेट्री का उतना अधिकार नहीं है, वह आज है, कल चला जाएगा । सेक्रेट्री किसी मंत्री के अधीन काम करता है, इसलिए इन्होंने स्टेट लेवल मॉनिटरिंग कमेटी में पहली बार मुख्य सचिव, चीफ सेक्रेट्री के नेतृत्व में स्टेट लेवल की मॉनिटरिंग कमेटी बनाई ।
          इसके बाद विलेज लेवल पर इन्होंने आंगनवाड़ी सेंटर्स की मैनेजमेंट लेवल कमेटी बनाई, जिसमें मदर ग्रुप, पंचायत राज इंस्टिट्यूशन्स, पोषण पंचायत है । इनमें से किसका मालिकाना हक होगा, लोकल लेवल पर कौन उसको ओन करेगा? सभी को आंगनवाड़ी सेंटर्स के बारे में यह लगता था कि या तो उसे सीडीपीओ मैनेज करेगा या मुखिया सरपंच को काम दे दिया जाएगा । इसकी मॉनिटरिंग के लिए इन्होंने एक भरी-पूरी कमेटी बना दी । कई बार हम लोग जब दौरा करते हैं, तो यह देखने को मिलता है कि वह आंगनवाड़ी केंद्र बंद है । वह किस कारण से बंद है, इसका हमें अंदाजा नहीं लगता है । इसके लिए इन्होंने वहीं की एक लोकल कमेटी बना दी । यदि चार-पांच आदमी किसी घर के मालिक होंगे, तो वे निश्चित तौर पर गलत नहीं होने देंगे ।
          इसके बाद श्री जगदम्बिका पाल जी ने बार-बार पोषण ट्रैकर के बारे में कहा । मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि जब वे जवाब दें, तो पोषण ट्रैकर ने कितने गलत लोगों को हटाया, यह भी बताएं । इसमें सबसे बड़ी समस्या मिड डे मील स्कीम है । आंगनवाड़ी में जो दिक्कत है और मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि इसको भी सुधारने का प्रयास किया जाए, यह दिशा कमेटी में  भी बार-बार उठता है । आप जिन बच्चों का एडमिशन ले रही हैं, वे चार साल से ऊपर के बच्चे हैं । स्कूल में एडमिशन लेने पर वे बच्चे स्वाभाविक तौर पर मिड डे मील स्कीम के अंतर्गत आ जाते हैं । इसमें आपने 0-6 का ग्रुप दिया है । यह जो दो साल का गैप है, इसके कारण कई बच्चे आंगनवाड़ी केन्द्रों में भी रजिस्टर होते हैं और स्कूलों में मिड डे मील में भी रजिस्टर होते हैं । इससे यहां का भी पैसा जाता है और वहां का भी पैसा जाता है । जो बिचौलिए हैं, वे इस तरह से डबल एंट्री करवाकर एजुकेशन से भी पैसा लेते हैं और आईसीडीएस से भी पैसा लेते हैं ।
          अत: जिस पोषण ट्रैकर के बारे में बताया गया है, इससे हमें कितना फायदा हुआ और इस कंट्री को कितना बेनिफिट हुआ, यह भी बताना चाहिए और कहां-कहां करप्शन था, यह भी इन्होंने बताया । इसके बाद प्रोक्योरमेंट का विषय आता है, जो कि सबसे बड़ा विषय है । किस तरह से खरीददारी होगी, लोग किस तरह से खरीदेंगे, यह सारी बातें भी उस ऑर्डर में आईं, जो इन्होंने सारे चीफ सेक्रेट्रीज़ को भेजीं और जिसे यह मंत्रालय फॉलो कर रहा है, यह भी इन्होंने दिया । इसके बाद कन्वर्जेंस का विषय है ।
          सभापति जी, कई जगह ऐसा था कि बिल्डिंग नहीं है । 18 विभाग ऐसे हैं, जिन्हें मंत्री जी ने कंवर्ज किया । यह हमारे लिए केवल नारा नहीं था, हमारे लिए इमोशन था कि यदि आंगनवाड़ी बनेगा, तो मनरेगा से कैसे बनेगा । यदि पानी देना है, तो जल शक्ति मंत्रालय उसमें क्या रोल करेगा । यदि स्वच्छता मिशन से जाना है, यहां हरदीप पुरी जी बैठे हैं, इनका मंत्रालय शहर में क्या काम करेगा और गांव में क्या काम करेगा, इसे देखेगा । इसी तरह दूसरे मंत्रालयों का कंवर्जन सरकार ने किया और क्या इसके लिए मंत्री जी को बधाई नहीं देनी चाहिए कि किसी ने उस समस्या के बारे में सोचने का प्रयास किया । यह सारा काम हमारी सरकार ने किया है । मैं आखिर में यही कह सकता हूं कि शायर फ़िराक़ ने जो बात कही वह मैं माननीय नरेन्द्र मोदी जी और स्मृति ईरानी जी के लिए कहना चाहता हूं :
“यही जगत की रीत है, यही जगत की नीत है मन के हारे हार है, मन के जीते जीत है ।”           आज जो कुछ भी आमूलचूल परिवर्तन सरकार ने किया है, मैं इसके लिए माननीय प्रधान मंत्री जी और स्मृति ईरानी जी को बधाई देते हुए सदन में अपनी बात समाप्त करता हूं ।
 
श्री रामशिरोमणि वर्मा (श्रावस्ती):सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।
          महोदय, भारत सरकार द्वारा संचालित योजना के अंतर्गत प्रत्येक गांव में आंगनवाड़ी केंद्र पर कार्यकर्ता की सहायता हेतु एक सहायिका होती है । सहायिका का कार्य केंद्र की सफाई करना, बच्चों को घर से बुलाकर पोषाहार बंटवाना, टीकाकरण के कार्य में मदद करना, खाना बनाना आदि सात-आठ घंटे का कार्य करना पड़ता है । प्रतिमाह उनको 2750 रुपये मानदेय मिलते हैं, जो एक दिन के हिसाब से 100 रुपये से भी कम है । जो भारत सरकार की न्यूनतम मजदूरी से भी बहुत कम है । सरकार द्वारा कभी कभी उन्हें निकालकर बाहर भी कर दिया जाता है । कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 62 वर्ष से अधिक सहायिकाओं को भी निकाल दिया गया था, जिनकी संख्या लगभग 35 हजार थी । निकालने के बाद इन्हें कोई भी धनराशि नहीं दी जाती है । जानकारी में आया है कि कुछ राज्य सहयोग के तौर पर कुछ धनराशि प्रतिमाह देते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में कुछ नहीं दिया जा रहा है । इन्हें कोई भी छुट्टी नहीं मिलती है । छुट्टी के कार्य दिवसों में भी इनसे टीकाकरण आदि कार्य कराए जाते हैं । इनको अलग से मानदेय नहीं दिया जाता है । बीमार हो जाने या आवश्यक कार्य से न आने पर मानदेय काट लिया जाता है । इन्हें मेडिकल की कोई भी सुविधा नहीं है तथा हर साल के बाद रिटायर मानकर बाहर करने पर पेंशन आदि भी नहीं मिलती है ।
महोदय, मेरी सरकार से मांग है कि आंगनाबड़ी कार्यकत्री एवं सहायिका को भी सरकारी कर्मचारी का स्थायी रूप से दर्जा मिलना चाहिए और आंगनाबड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय कम से कम 3 हजार और सहायिकाओं का मानदेय कम से कम 10 हजार होना चाहिए । इसके साथ ही सरकार से मेरी मांग है कि इन सभी को स्वास्थ्य सुविधा सेवा सुनिश्चित की जानी चाहिए, क्योंकि अभी हाल ही में कोविड-19 हेतु टीकाकरण और बीमार लोगों की सेवा में लगाया जाता रहा है ।
अंत में मैं सरकार से यह मांग करता हूं कि इन कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की कार्यसेवा जब समाप्त हो जाती है, तो उनकी मृत्यु के उपरांत सरकार कम से उनको 5 लाख रुपये देने का काम करे । धन्यवाद ।
 
SHRI THOMAS CHAZHIKADAN (KOTTAYAM): Sir, thank you very much for giving me an opportunity to speak on the Resolution moved by Shri Ritesh Pandey Ji, Member of Parliament, seeking to provide various welfare measures to the Anganwadi Workers and Anganwadi Helpers.
This is the first move in India to empower women and children. As we all know, it was introduced on 2nd October, 1975 to improve the conditions of women and children in the rural areas. The Anganwadi Workers are doing an exemplary service. They are acting as mothers to the children from the age of 3-6. They act as teachers to the children. They serve the mothers and the adolescent girls to provide them with better food so that they maintain good health. They are called upon to do a lot of services. They provide services to the lactating mothers, pregnant women, adolescent girls and then again, as I told earlier, to the children from the age of 3-6.
They are also called upon to provide more services in various Departments. The surveys are asked to be conducted by the Anganwadi teachers by most of the Departments. But they are not properly compensated. They serve the humanity and the society with all will and pleasure but they are not compensated properly.
Their salary, as we all know, is very meagre. It is not even called as salary. It is called only as honorarium. The Central Government provides Rs.4,500 to the Anganwadi Workers and only Rs.2,900 to the Anganwadi Helpers. In Kerala, the Government of Kerala provides an additional amount of Rs.7,500 so that their monthly income comes to Rs.12,000. In the case of Anganwadi Helpers, it is only Rs.8,000. It is not even Rs.500 per day. So, it is a humanitarian consideration to provide them a better salary and it should be called as a salary.
My humble suggestion is that they should be given a minimum scale of a last grade employee of the Central Government so that they will get at least Rs.20,000 to Rs.22,000 per month to manage their families.
Secondly, the Anganwadis are not having sufficient infrastructural facilities. Many of the Anganwadis are working in rented buildings and, I can even say, in dilapidated buildings. That condition should be changed because the children are coming from the rural areas. They are at the tender age of 3-6.
          These teachers and helpers take care of them. The Government should ensure that the buildings in which these anganwadi centres function should be safe enough. The rent is provided by the Central Government. To my knowledge, an amount of Rs.1000 is provided as rent in rural areas.
HON. CHAIRPERSON: So far as anganwadi infrastructure and buildings are concerned, our State of Kerala is far better.
SHRI THOMAS CHAZHIKADAN : Of course, it is better.
          Sir, as an MLA, I myself had provided some amount from my MLA fund for construction of anganwadi buildings. Even the Government of Kerala is also availing certain facilities for construction of anganwadi buildings provided they have at least three cents of land donated by someone. I would request the Central Government to provide better facilities in these anganwadi centres to turn them into high tech centres, as was just mentioned by the hon. Chairperson. Post COVID-19 pandemic, we have realized that it is the need of the hour.
          The parents in poor families want their children to have better facilities in these anganwadi centres. Other children, who go to public primary schools, get very good facilities. It is justifiable that the Government should provide equivalent good facilities to these anganwadi centres and improve their infrastructure.
          Sir, I would like to add one more point with regard to the rent of these anganwadi centres. Many teachers and poor anganwadi workers are sharing part of the rent from their honorarium. That should be avoided. The Government should revise the rate of rent that is being provided for these buildings. In certain cases, the rent has not been paid for some time. So, the arrears in these cases should also be paid as early as possible.  
          Sir, there are 33,115 anganwadi centres with more than 66,000 workers and helpers. These anganwadi centres do not have sufficient infrastructure including drinking water and sanitation facilities. I would urge the Government to provide better sanitation facilities in these centres.
          Sir, in addition to providing services equivalent to the lower grade Government employees, these anganwadi workers should also be eligible for ESI and other facilities which are available to other Government employees.
 
          I would also request the Government to properly recognize the services rendered by the anganwadi teachers. During COVID-19 pandemic, most of these teachers were attending to the COVID-19 patients. Their services should not only be recognized but also be compensated properly. With these words, I conclude. Thank you, Sir. 
 
श्री राजेन्द्र अग्रवाल (मेरठ): महोदय, आपने मुझे माननीय सांसद रितेश पाण्डेय जी द्वारा लाए गए प्रस्ताव आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी सहायिकाओं हेतु कल्याणकारी उपाय पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपका धन्यवाद । अनेक वक्ता इस पर बोल चुके हैं ।
आदरणीय सभापति जी, मुझे यह लगता है, जब भी मैं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को देखता हूं या उसी स्तर पर आशा बहनों को देखता हूं तो मेरे मन में एक ख्याल तुरंत ही आता है कि केन्द्र के स्तर के ऊपर, राज्य के स्तर के ऊपर आप कितनी भी अच्छी योजनाएँ बनाएं, लेकिन यदि उसको अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है तो उसके लिए आवश्यक तंत्र बनाए बगैर और उनको सहभागी बनाए बगैर, आप उन योजनाओं का लाभ सामान्यजन तक, जिस व्यक्ति तक उसको पहुंचाना है, उस तक पहुंचा नहीं सकते हैं । हमारी जो आंगनबाड़ी कार्यकत्री हैं, उस दृष्टि से मैं उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं । जैसे सिंचाई के क्षेत्र के अंदर एक शब्द बहुत चलता है कि पानी टेल तक पहुंचना चाहिए । कोई नहर है या कोई पानी का अन्य स्रोत है, कोई ट्यूबवैल है, जहां से खेत की सिंचाई होनी है, तो खेत के प्रत्येक स्थान तक और आखिरी स्थान तक पानी पहुंचे, इसके लिए कुछ व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं । उन व्यवस्थाओं को करने के पश्चात् ही वह पानी खेत के प्रत्येक स्थान तक पहुंच पाता है और किसान को फसल को ठीक से उगाने में मदद मिलती है । इसी प्रकार से लास्ट मैन तक की जो डिलीवरी है, लास्ट पॉइंट तक की जो डिलीवरी है, उसमें आंगनबाड़ी बहनों का बहुत बड़ा योगदान है । यह बात ठीक है कि इस योजना की शुरुआत वर्ष 1975 में की गई और काम भी होता रहा । समग्रता की दृष्टि के साथ इसको एक बड़ा अवसर मानते हुए, बड़ी चुनौती मानते हुए, जो काम प्राय: बड़े असम्भव लगते थे, कठिन लगते थे और जो होते हुए भी नहीं दिखते थे, तो सभी इस बात को स्वीकार करेंगे, इस बात का अनुभव है कि हमारी माननीया मंत्री आदरणीय स्मृति ईरानी जी के नेतृत्व में, माननीय प्रधान मंत्री जी के मार्गदर्शन में जिस प्रकार से व्यवस्थाएं खड़ी की गईं, उसका परिणाम आज यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का जो मेनडेट है, जो उनसे अपेक्षा है, उसको उन्होंने बहुत बेहतर ढंग से पिछले दिनों के अंदर पूरा किया है । कोरोना काल के अंदर तो उनका जो परिश्रम है, वह तपस्या जैसा रहा है । हमको बहुत बार ध्यान में नहीं आता, शहर तक हमारी दृष्टि जाती है, शहर के अंदर घटनाएं होती हैं, वह हमारी निगाह में रहती हैं । बड़े शहरों में होती है तो समाचार पत्र भी उसका संज्ञान लेते हैं, मीडिया भी संज्ञान लेता है । राजधानी में होती है तो वह एक बड़ी खबर बनती है । दूरस्थ गांवों के अंदर जो छोटे-छोटे परिवार हैं, जो आर्थिक दृष्टि से बहुत निचले स्तर पर भी हैं, जिनके पास अन्यथा कोई सुविधा नहीं है, जिनके पास ठीक प्रकार की जो रहने की स्थितियां हैं, वह भी नहीं हैं । लेकिन उनके बीच में जाकर काम करना, उनको सरकारी योजनाओं की जानकारी देना, उन व्यवस्थाओं में उनको सहभागी बनाना और कुल मिलाकर इतने बड़े संक्रमण के काल के अंदर उनको सुरक्षित रखना, मां को सुरक्षित रखना, बच्चे को सुरक्षित रखना, जबकि आप जानते हैं कि कोरोना का काल तो ऐसा था कि परिवार के सदस्य भी परस्पर मिलने में संकोच करते थे, भयाक्रांत रहते थे कि कहीं संक्रमण हुआ तो उनको भी न हो जाए । ऐसी परिस्थितियों में संपूर्ण देश में, मैं मेरठ से आता हूं, मेरठ उत्तर प्रदेश का जनपद है, मैंने देखा है कि जो कुछ भी उत्तर प्रदेश के अंदर सफलता माननीय मुख्य मंत्री जी के प्रयासों के कारण से कोरोना संक्रमण के काल के अंदर मिली, उसके अनेक पहलू हैं । लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के अंदर अंतिम व्यक्ति तक उन सुविधाओं को पहुंचा कर कोरोना के संक्रमण से, कोरोना के द्वारा जनित जो समस्याएं थीं, उनसे निपटने में हमारी आंगनबाड़ी बहनों का जो सहयोग रहा है, जो उनका कर्तृत्व रहा है, वह वास्तव में बहुत विशेष है, बहुत अभिनंदनीय है ।
मैं यहां पर भी उन बहनों का हृदय से अभिनंदन करता हॅूं । … (व्यवधान) मैं एक-दो छोटे-छोटे आंकड़े देता हॅूं, कोई ज्यादा बड़े आंकड़े नहीं दूंगा, चूंकि मुझे लगता है कि आप मुझे पूरा समय प्रदान नहीं करेंगे । … (व्यवधान) मैं खड़ा रहूंगा, अगली बार बोलूंगा । जो बैनिफीशरीज़ की संख्या है, आप देखिए कि कितनी बड़ी यह संख्या है, वह जो डिलीवरी सिस्टम के सुधर जाने के परिणाम स्वरूप होती है । आज छह महीने से ले कर छह वर्ष तक के जो छोटे बच्चे हैं, जो आंगनवाड़ी या आईसीडीएस की जो अम्ब्रेला स्कीम है, जो माननीय मंत्री जी द्वारा वर्ष 2017 से माननीय प्रधान मंत्री जी के मार्गदर्शन में प्रारंभ हुई थी । उसमें बेनिफिशरीज़ की संख्या में से बच्चों की संख्या 7 करोड़ 36 लाख 91,025 है, यानी लगभग साढ़े सात करोड़ की संख्या है । इसी प्रकार से जो हमारी गर्भवती महिलाएं हैं या जो दुग्धपान कराने वाली हैं, जिनके छोटे बच्चे हैं, गोद वाले शिशुओं की जो माएं हैं, उनकी संख्या 1 करोड़ 69 लाख 25,928 है । यदि इन दोनों संख्याओं को जोड़ दें तो यह नौ करोड़ से भी अधिक की संख्या बैठती है । आप यह देखिए कि इसका परिणाम क्या होता है । इसका परिणाम यह हुआ है कि जहां बच्चे कुपोषण से मुक्त हुए हैं । जन्म के समय जो कुपोषण बच्चे   के शरीर के अंदर घर कर जाता है, उसको बाद में भी उससे निकालना बड़ा मुश्किल होता है । जन्म के समय जो सावधानी बरत ली जाती है, तो वह बच्चे की जैसे एक फाउंडेशन है, उसको ठीक कर के चलती है और बाद में बच्चे को कठिनाई कम आती है । तो जो संभावित कुपोषण है, उसे वे बच्चे मुक्त रहते हैं । जो माएं हैं, उनको भी इस कुपोषण से मुक्ति के अभियान के अंदर सहभागी बना कर, उनको भी एक बेहतर न्यूट्रीशन प्रदान कर के एक अच्छे परिवार की शुरूआत की जाती है । यानी इतने लाभार्थी इस योजना के द्वारा हुए हैं । निश्चित रूप से जो इस योजना के उद्देश्य हैं । उन उद्देश्यों की प्राप्ति की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है, जिसका मैंने उल्लेख किया है । अभी तो जो नई शिक्षा नीति आई है, उसके अंदर खास तौर से आंगनवाड़ी का बड़ा भारी महत्व हो गया है । हम यह जानते हैं कि बहुत बार गांवों के अंदर जो हमारी बहनें हैं, उनके छोटे बच्चे रहते हैं, उनको ठीक प्रकार से शिक्षा की सुविधा नहीं प्राप्त हो पाती है । स्कूलिंग है, सब बाते हैं, लेकिन वे कामकाजी महिलाएं भी होती हैं तो आंगनवाड़ी के अंदर उन बच्चों की शुरू से चिंता करनी है । शहरी क्षेत्रों के अंदर तो प्ले स्कूल हैं । जिनके पास धन है, वे प्ले स्कूलों में बच्चों को एडमिट करा देते हैं, वहां पर वह बच्चा खेलता रहता है, सीखता रहता है । उनके पास साधन हैं, उनका वे उपयोग करते हैं । लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के अंदर, जिनके पास इस प्रकार के साधन नहीं हैं, उनके लिए आंगनवाड़ी की व्यवस्था एनईपी के अंदर भी की गई है, उसका प्रावधान किया गया है । यह जो जिम्मेदारी है, एक प्रीसाइज़ व्यवस्था के साथ उनको दी गई है, और उसका भी लाभ है । धीरे-धीरे, जैसे-जैसे एनईपी  की योजना का विस्तार होगा, उनकी भूमिका और भी बढ़ती चली जाएगी ।
 

17.59 hrs                       (Hon. Speaker in the Chair )   जिस प्रकार से आंगनवाड़ी की जो हमारी कार्यकत्रियां हैं, ये मिल कर के चाहे स्वास्थ्य का विषय हो, पोषण का विषय हो, जननी सुरक्षा का विषय हो, सुरक्षा का विषय हो, उसके अंदर उनकी बड़ी भारी भूमिका है, जिसका वे निरंतर पालन करती रही हैं । बहुत बड़ी भूमिका, मैं प्रारंभ में जिस बात को कह रहा था कि तेल तक पानी पहुंचाना, यानी डिलीवरी सिस्टम को ठीक करते हुए, क्योंकि कोई भी योजना यदि हमको नीचे तक पहुंचानी है, जैसा हम लोग अंत्योदय की बात, हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी कहते हैं कि जो व्यक्ति विकास की दृष्टि से अंत में खड़ा है, उस तक सुविधा पहुंचे, यह हमारी सरकार का लक्ष्य है । जब माननीय प्रधान मंत्री जी ने वर्ष 2014 में शपथ ग्रहण की तो उसके साथ ही उन्होंने इस बात को कहा कि मेरी सरकार गरीबों को समर्पित होगी, मेरी सरकार गांवों को समर्पित होगी, मेरी सरकार महिलाओं को समर्पित होगी और किसानों को समर्पित होगी । इस प्रकार का एक संकल्प माननीय प्रधान मंत्री जी ने स्पष्ट रूप से घोषित किया ।

18.00 hrs           पिछले साढ़े सात साल के अंदर देश के प्रधान सेवक होने के नाते निरंतर परिश्रम करते हुए, इन वर्गों को राहत पहुँचा रहे हैं । उस क्रम में आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की जो भूमिका है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है ।

     

माननीय अध्यक्ष : आप अगली बार कंटीन्यू कीजिएगा ।

सभा की कार्यवाही सोमवार, दिनांक 13 दिसम्बर, 2021 को प्रात: 11 बजे तक के लिए स्थगित की जाती है ।

18.01 hrs The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the clock on Monday, December 13, 2021/Agrahayana 22, 1943 (Saka)                     INTERNET            The Original Version of Lok Sabha proceedings is available on Parliament of India Website and Lok Sabha Website at the following addresses:

           http://www.parliamentofindia.nic.in            http://www.loksabha.nic.in LIVE TELECAST OF PROCEEDINGS OF LOK SABHA          Lok Sabha proceedings are being telecast live on Sansad T.V. Channel. Live telecast begins at 11 A.M. everyday the Lok Sabha sits, till the adjournment of the House.
                   
________________________________________________________________________________ Published under Rules 379 and 382 of the Rules of Procedure and Conduct of Business  in Lok Sabha (Sixteenth Edition) ________________________________________________________________________________     * The sign + marked above the name of a Member indicates that the Question was actually asked on the floor of the House by that Member.
           
* Available in Master copy of Debate, placed in Library.
* Available in Master copy of the Debate, placed in Library.
* Not recorded.
* Not recorded.
* Not recorded.
* Not recorded.
* Not recorded.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* English translation of the speech originally delivered in Tamil.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* English translation of the speech originally delivered in Tamil.
* English translation of the speech originally delivered in Tamil. 
* Speech was laid on the Table.
* Not recorded.
* Speech was laid on the Table.
* Not recorded * Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Not recorded * Speech was laid on the Table.
* Speech was laid on the Table.
* Not recorded.