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Lok Sabha Debates

Discussion On Indo-China Relations With Special Reference To Recent ... on 9 December, 2009

> Title : Discussion on Indo-China relations with special reference to recent occurrences.

 

MR. CHAIRMAN: Now the House will take up item 17: Dr. Murli Manohar Joshi.

डॉ. मुरली मनोहर जोशी (वाराणसी):सभापति महोदय, भारत और चीन के संबंधों के बारे में और उसके साथ-साथ जो समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं, उनके बारे में चर्चा करने का आपने मुझे अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं। आम तौर से अभी तक हमारे देश में विदेश नीति के मामले में मोटी-मोटी आम सहमति रही है, कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता रहा है। लेकिन फिर भी कुछ मामलों में हममें और श्री बासुदेव आचार्य जी में शायद इसी मामले में कुछ फर्क होगा। हो सकता है कि हममें और आपमें भी कुछ फर्क हो। लेकिन कुल मिलाकर इस समय जो अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति हमारे चारों तरफ पैदा हुई है, उसे ध्यान में रखकर मैं थोड़ा सा इस वर्तमान चीन-भारत संबंध के बारे में कुछ सुझाव और विचार रखना चाहूंगा।

          महोदय, भारत और चीन में पुराने जमाने से सांस्कृतिक और वाणिज्यिक संबंध रहे हैं। विचारों का आदान-प्रदान होता रहा है, लोगों और विद्वानों का आदान-प्रदान होता रहा है। बौद्ध सन्यासी यहां से गये और उन्होंने वहां शांति, अहिंसा और सबके साथ प्रेम के आध्यात्मिक विचार फैलाये। कहने की जरूरत नहीं है कि कई सदियों तक चीन के ऊपर उन विचारों का प्रभाव रहा। चीन की उस समय की जीवन शैली और भारत की जीवन शैली में बहुत साम्य था। जैसे हमारे यहां लोग चोटी रखते थे, वैसे ही चीन में भी रखते थे। इतिहास के ग्रंथों को पढ़ने से उठने-बैठने, खाने-पीने का ढंग और जो शिष्टाचार भारत में था, वैसा ही हमें चीन में मिलता है। चीनी छात्र यहां नालंदा और विक्रमशिला में पढ़ने के लिए आते थे। यहां से बौद्ध दर्शन और अर्थशास्त्र के विद्वान चीन जाते थे। ...( व्यवधान)

रसायन और उर्वरक मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री श्रीकांत जेना): उसे बिहार विश्वविद्यालय कहते हैं।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी (वाराणसी):हां, मैं कह रहा हूं। नालंदा और विक्रमशिला का जिक्र कर रहा हूं। यह होता रहा है और इस तरह से दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध था। व्यापार भी था, सिल्कन रूट, जिसे सिल्क का मार्ग कहते हैं, वह आज तक प्रसिद्ध है। मैं उन आंकड़ों और उन चीजों में नहीं जाना चाहता, जो उस समय होती थीं। लेकिन कुल मिलाकर हमारे सांस्कृतिक, दार्शनिक और वाणिज्यिक संबंध थे। वे संबंध काफी मधुर थे। चीन के इतिहास में भी बहुत उलट-फेर होती रही है। उसके तिब्बत से क्या संबंध रहे, मंगोलिया से क्या संबंध रहे। हमारे विदेश मंत्री जी के सहायक बैठे हैं, वह बहुत बड़े विद्वान हैं, वह इस पर बोल सकते हैं, बता सकते हैं कि हमारे कितने संबंध रहे और चीन के अंदर कब और क्या उथल-पुथल हुई, किस डायनेस्टी का राज कब रहा। तिब्बत ने चीन का कौन सा हिस्सा अपने कब्जे में रखा, तिब्बत की चीन से कितनी संधियां हुईं, ये सब बातें इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक हैं, जो मैं उल्लेख करना चाहता हूं। मैं बहुत पुरानी बातों को नहीं कहूंगा। लेकिन जब चीन एक उपनिवेश बना और अपने आपको आजाद करने का वहां संघर्ष हुआ, वहां अनेक प्रकार के संघर्ष हुए थे। वहां कम्युनिस्ट क्रंति भी हुई। लेकिन हम स्वयं उपनिवेश रहते हुए उस समय भी चीन की जो सहायता कर सकते थे, वह सहायता की। डा.कोटनिस जैसे लोग वहां गये। यह इस बात का सबूत है कि भारत में चीन के प्रति हमेशा सहृदयता की, सहानुभूति की और वह आगे आये, इसके लिए हमेशा सदिच्छा थी।  

          सभापति जी, जब 1949 में चीन मुक्त हुआ, क्रान्ति उनके वहां सफल हुई तो हमारे मित्र के दल की तरफ से काफी प्रशंसा की गई। चीन में कोई डैमोक्रेटिक रिवोल्यूशन नहीं हुई थी फिर भी भारत ने सब से पहले चीन देश को  मान्यता दी। वहां पर कम्युनिस्ट क्रान्ति हुई थी। दुनिया के बहुत से देश चीन की तरफ शंका से  देखते थे लेकिन भारत के लोगों ने  सब से पहले पुराने रिश्तों को ध्यान में रखते हुये मान्यता दे दी। अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर चीन आगे आये, उसका सदस्य बने, भारत ने इस बात के लिये बहुत पैरवी की। सत्ता पक्ष के पूर्ववर्त्ती लोगों ने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर की हैं, थरूर साहब उन मंचों पर रहे हैं, उनकी सस्थाओं में रहे हैं, इसलिये मैं कह रहा हूं। हमने बिना इस बात का ध्यान किये अपने पुराने रिश्तों के देखते हुये अपने संबध कायम किये और इस बात का ध्यान नहीं किया कि चीन आगे क्या प्रतिदान करेगा, इसकी हमने इच्छा नहीं की। हमने अपनी सद्भावना के साथ उसके साथ रिश्ते कायम किये। उस समय हमारे प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की नीति थी, वह बहुत ही भावुकतापूर्ण और आशावादी थी और जैसा उनका स्वभाव था, वह सदाशयता के व्यक्ति थे, उसी सदाशयता के साथ उन्होंने चीन के साथ सद्भावना रखी और उनके इतिहास के प्रति पुराने रिश्ते की बात रखी लेकिन चीन ने प्रतिदान में हमें कभी कुछ नहीं दिया और न आज दे रहा है। हमने पहली गलती उस समय की  जब तिब्बत के मामले में हमने बहुत ढील बरती और तिब्बत चीन के पास दे दिया। मुझे याद है और मैं नहीं भूल सकता हूं कि सरदार पटेल ने उस समय इस नीति का विरोध किया था। उनके समग्र वक्तव्यों में से एक पत्र 7 नवम्बर, 1950 का है जिसमें उन्होंने इस नीति के त्रुटिपूर्ण होने और उसके खतरों से देश को सावधान किया था। उन्होंने लिखा था कि यह नीति गलत है और इनके परिणाम आगे अच्छे नहीं होंगे। ऐसा भी कहा जाता है कि उस समय जो हमारे राजदूत चीन गये थे, वे शायद भावुकता और आदर्शवाद में बह गये थे या उन्हें कूट राजनैतिक चक्र में फंसा दिया गया। उन्होंने सोजरैंटी  शब्द का प्रयोग न करके सौवरेंटी शब्द का प्रयोग किया और तिब्बत में चीन को सोजरेंटी के स्थान पर सोवरेंटी प्रदान करने की बात की । क्यों और कैसे की गई, उस,पर चर्चा करने का समय नहीं है, आवश्यकता नहीं है लेकिन यह गलती की गई। हम भूल गये कि चीन का सोचने का अपना तरीका है। चीन वैश्विक दृष्टि सदियों की रखता है कि आगे के 5-10-20 सालों में क्या होगा, 200 सालों में क्या होगा, उसके लिये लम्बा समय लेकर चलता है जबकि हमारे देश में पांच वर्षीय योजना चलती है, फिर अगले पांच सालों के लिये कुछ होता है और हमारे देश में यही बात होती रहती है। चीन के व्यवहार को समझने के लिये हमें देखना पड़ेगा और उसके साथ व्यवहार करते समय यह भी ध्यान रखना पड़ेगा।

          सभापति जी, 1959 में दलाईलामा के तिब्बत से आने के बाद हालात और बिगड़ गये। हमने दलाईलामा को शरण दी, ठीक किया। यह हमारा धर्म था। मैं समझता हूं कि भारत का यह ऐतिहासिक धर्म रहा है कि जब भी किसी देश से इस प्रकार का उत्पीड़ित व्यक्ति निकलकर आता हो या उसे आने के लिये मजबूर किया गया हो तो हमने उसे शरण दी है। अगर  यहूदी भाई आया हो या पारसी भाई आया हो या दलाईलामा आये तो हमने यह धर्म निभाया है। यह भारत का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुराना इतिहास रहा है कि हमने किसी को निराश नहीं किया है लेकिन हम समझते थे कि चीन इस बात  को इसी तरह  महसूस करेगा। हमने अपना ऐतिहासिक दायित्व निभाया है। जिस प्रकार से हमने चीन की उस समय सहायता की थी  जब वह मुसीबत में था। आज अगर चीन ने गलती की है तो उनको निर्वासित होने पर मजबूर होना पड़ा है तो फिर  आज हम उसी आधार पर, उसी सिद्धान्त के आधार पर  दलाईलामा को अपने यहां रखे हुये हैं।

          लेकिन हमने चीन की प्रवृति पर ध्यान नहीं दिया। उस समय हमारे जो गणमान्य नेता थे, उनका ध्यान सिर्फ पाकिस्तान की तरफ था। चीन उनकी नजर में उस समय इस देश के लिए कोई ज्यादा संकट की बात नहीं था। वर्ष 1962 तक हमारी नजर सिर्फ पाकिस्तान पर थी। यूएनओ में जितने भाषण हुए, स्वर्गीय कृष्ण मेनन जी ने बड़े ऐतिहासिक भाषण किये, उन सबका उद्देश्य पाकिस्तान को ध्यान में रखकर बोलना था । वर्ष 1962 में चीन ने हम पर हमला किया। हम गफलत में थे, हम समझ नहीं पा रहे थे कि जिस देश के साथ हमने इतने अच्छे संबंध रखे, उसने ऐसा क्यों किया? हमने तो चीन के साथ कोई अपराध नहीं किया था, कोई आक्रमण नहीं किया था, चीन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, लेकिन चीन ने हम पर यह हमला क्यों किया? इस पर गहराई से विचार होना चाहिए। चीन के मंतव्यों को समझने के लिए इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि माओ ने इस देश पर आक्रमण क्यो किया? पहली बात तो यह थी कि उसे यह बहुत खराब लगता था कि चीन को भारत के साथ जोड़ा जा रहा है, इंडिया एंड चाइना। चीन इस बात को कभी भूल नहीं पाया कि भारत ने एक बार उसे सुशिक्षित किया था, उसे दर्शन और धर्म दिया था, चीन की ऐतिहासिक सहायता की थी। वह यह समझता था कि इस भारत को सबक सिखाना है। यह अपने आप को हमसे आगे ले जाना चाहता है, हम इसे आगे नहीं जाने देंगे और इसलिए भारत को सबक सिखाना चाहिए। मैं कह रहा हूं कि चीन के परिप्रेक्ष्य को देखिए, उसे लगा कि अगर भारत इसी तरह से आगे बढ़ता रहा और लोगों ने कहा, इंडिया एंड चाइना, इंडिया एंड चाइना, तो हम भारत के पिछलग्गू होंगे और एशिया के समग्र क्षेत्र में भारत हमसे आगे रहेगा। India is moving with its tails up; let us bring it down. इन्हें थोड़ा सबक सिखायें और बताएं कि बच्चू तुम्हारी औकात क्या है? दूसरा यह कि आप वर्ष 1947 में आजाद हुए, हम वर्ष 1949 में, लेकिन आप कहां हैं और हम कहां हैं? आपका जो यह डेमोक्रेटिक मॉडल है, यह ठीक नहीं है। हमारा जो कम्युनिस्ट मॉडल है, वह ज्यादा बेहतर है, वह ज्यादा ताकतवर है, वह आपको पीट सकता है। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए, वरना और कोई ऐसा स्पष्ट सामने आने वाला कारण दिखाई नहीं देता कि चीन ने हमला किया और वह वापस चला गया। वह क्यों वापस चला गया? सिर्फ यह दिखाने के लिए कि मै, तुमसे आगे हूं। वर्ष 1962 के युद्ध के बाद हमें अपनी गलती महसूस हुई या नहीं हुई, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि उसका पंडित जवाहर लाल नेहरू जी पर बहुत गहरा असर हुआ और उसका असर भुवनेश्वर कांग्रेस में दिखाई दिया। वर्ष 1962 से 1976 तक हम चीन के साथ ठंडे रहे, कोई ज्यादा सम्पर्क नहीं, बल्कि एक तरह से वैमनस्य रहा, उपेक्षा रही, तटस्थता रही। वर्ष 1979 में जब जनता पार्टी की सरकार आयी थी, तब विदेश मंत्री के नाते श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी सबसे पहले चीन गये। इससे पहले कि संबंधों में कुछ गर्माहट आती या सुधार आता, चीन ने वियतनाम पर हमला कर दिया और वाजपेयी जी को लौटकर आना पड़ा। उसके बाद 5, 6, 7 साल ऐसी ही परिस्थिति रही। वर्ष 1988 में स्वर्गीय राजीव गांधी वहां गये, उससे एक नया रास्ता खुलने की बात आयी, संबंधों में कुछ नरमाहट आनी शुरू हुई। इसके बाद वर्ष 2003 में वाजपेयी जी की यात्रा हुई, जिसमें सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग माना गया। यह मैंने वर्ष 2003 तक के संबंधों का संक्षेप में ब्यौरा दिया, लेकिन इस बीच में जो चीन की आर्थिक और सामरिक प्रगति हुई और अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जो कुछ हुआ, उसकी तरफ भी हमें ध्यान देना चाहिए। अमेरिका ने चीन के साथ संबंध बढ़ाये और उसमें पाकिस्तान की मदद ली। किसिंजर साहब की नीति थी और उन्होंने अमेरिका को चीन के नजदीक लाने के लिए पाकिस्तान की सहायता ली और एक नया इकवेशन अमेरिका-पाकिस्तान और चीन का अंदरखाने बना। हम यह समझते रहे कि अमेरिका, पाकिस्तान के मामले में हमारे साथ है। वर्ष 1962 में तो आखिर अमेरिका ने हमारी मदद की थी तो यह आगे उसी रास्ते पर चलेगा। इनके सिस्टम्स अलग हैं, इसलिए शायद ये साथ नहीं आएंगे।

वे अंदरखाने साथ आ गए, क्योंकि अमेरिका और चीन किसी पोलिटीकल सिस्टम से बंधे हुए नहीं हैं, ये अर्थव्यवस्थाओं से बंधे हुए हैं। इनके इकोनोमिक, जियोपोलिटीकल इंटरस्ट हैं। अमेरिका और रूस के बीच में जो तनाव थे, जिसे उस जमाने में कोल्ड वार कहते थे। रूस को कंटेन करना उनकी एक नीति थी, इसलिए एक नया समीकरण यहां बनाया जाए, यह अमेरिका की तरफ से बात आई। ठीक है, अमेरिका के इंटरस्ट हैं, वे करेंगे, कोई रोक नहीं सकता, हर देश अपने-अपने इंटरस्ट को देखता है। लेकिन हमने इस बीच में क्या किया, हमने इस तरफ बिलकुल कोई ध्यान ही नहीं दिया कि ये क्या हो रहा है। नतीजा यह हुआ कि हम चीन के बारे में कोई कारगर, प्रभावकारी और लम्बे समय की नीति नहीं बना सके।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार को बताना चाहता हूं कि इस बीच में क्या-क्या हुआ। मैं लम्बी बातों की तरफ नहीं जाऊंगा, कुछ तथ्यों की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा, जो उधर हाल ही में हुआ है। पिछले दो-तीन साल से यह बात बराबर आ रही है कि चीन फिर से एग्रेसिव हो गया है। सन् 1962 में उसका जिस तरह का आक्रामक रवैया था, आज फिर से चीन ने वही रवैया अख्तियार किया है, क्यों? चीन ने सबसे पहले तो अभी एनएसजी ग्रुप में हमारा विरोध किया और यह कोशिश की कि हमारा वह समझौता सफल न होने पाए। हम अपनी परमाणु ऊर्जा और परमाणु ईंधन की पूर्ति न कर सकें। फिर उसने एडीबी और वर्ल्ड बैंक से हमें जो धनराशि मिलनी है, उसके बारे में अड़ंगा लगाया, क्यों? ये सवाल उठते हैं कि जिस चीन की हम हमेशा मदद करते रहे हैं, हमने उसकी किसी बात में अड़ंगा नहीं लगाया, लेकिन उन्होंने ये क्यों किया? क्या वे फिर से यह दिखाना चाहते हैं कि चीन भारत से आगे है, भारत को चीन के समकक्ष बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस सारे इलाके में एशिया के क्षेत्र में चीन ही एकमात्र शक्ति रहेगा, भारत उससे अपने आपको तुलना करने की कोशिश न करे। मुझे इसलिए भी संदेह होता है, पहले जिस तरह से किसिंजर ने चीन के साथ समझौते करवाए, अभी जब ओबामा चीन गए तो उनका जो वक्तव्य था, वह भी काबिले ग़ौर है। उन्होंने चीन को दक्षिण-एशिया के मामलों में भी एक भूमिका अदा करने की बात कही है, लेकिन बाद में वे पलट गए। वे कहने लगे कि ये भारत की कॉस्ट पर नहीं होगी । हम लोग ये कूटनीति अच्छी तरह जानते हैं, आपको चीन में जाकर कहने की क्या जरूरत थी।

          सभापति महोदय, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह वही चीन है, जिसने पाकिस्तान को परमाणु शस्त्रों से सुसज्जित किया, पैसा दिया और टैक्नोलॉजी दी। उसकी वजह से नॉर्थ-कोरिया के साथ भी एक नया समीकरण बना। उस वक्त अमेरिका आंख बंद किए बैठा रहा। अमेरिका और चीन दोनों ही नोन-प्रोलिफ्रेशन ट्रीटी के बड़े भारी पैरोकार रहे हैं, लेकिन उनकी यह बात कहां गई? भारत के लिए तो बार-बार कहा जाता है, कि एनपीटी पर हस्ताक्षर करो लेकिन जब चीन यह कर रहा था और पाकिस्तान अपनी परमाणु शक्ति बढ़ा रहा था तब अमेरिका क्या कर रहा था? इससे भी यह जाहिर होता है कि जहां तक हमारा संबंध है, उसमें अमेरिका भी काबिले इत्तमिनान साबित नहीं हुआ। वह हमारे साथ स्ट्रेटिजिक दोस्ती की बात तो करता है, लेकिन वह अपनी स्ट्रेटजी, जो उसके राष्ट्रीय हितों के लिए है, उसके साथ चल रहा है। आज परिस्थिति बदल गई है, आज अर्थव्यवस्थाओं के सिद्धांत हमारे सामने हैं, ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड है। चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था बहुत जुड़ी हुई है। इसलिए एक मंदी से ग्रस्त, नौकरियों से त्रस्त अभावग्रस्त अमेरिका चीन को नाराज नहीं कर सकता। इसलिए अब यह न समझा जाए कि सन् 62 की तरह अमेरिका हमारी मदद के लिए फिर तैयार रहेगा।   

          सभापति महोदय, पाकिस्तान और भारत की लड़ाई के समय, चीन ने आंखें बन्द कर ली थीं। भगवान न करे, अगर चीन से कोई संघर्ष हो, तो मुझे इस बात का संदेह और आशंका है और मैं चाहूंगा सरकार से कि उसकी इस बारे में क्या दृष्टि है, वे क्या समझते हैं, क्या उस समय अमेरिका आंख बन्द नहीं कर लेगा?  उससे उसे क्या फर्क पड़ता है कि थोड़ा सा हिस्सा भारत का इधर गया या ऊधर गया। कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर उसके सैकड़ों बिलियन डॉलर्स की अर्थव्यवस्था कायम रहती है। इस बात को भी देखने की जरूरत है कि आज जो नई-नई परिस्थितियां आ गई हैं, इनमें भारत और चीन के संबंधों में और हमारी चीन के बारे में जो दृष्टि है, उसमें कोई गुणात्मक परिवर्तन होना चाहिए या नहीं होना चाहिए या हम उसी तरह से गाफिल बने रहेंगे? ये वही परिस्थितियां हैं, जो 1962 के समय थीं। हमारे कुछ मित्र तो कहते हैं कि चीन कुछ कर ही नहीं सकता। 1962 में भी जब उसने हमला किया था, तो हमारे मित्र, इसी सदन के सदस्य हैं, उन्होंने कहा था कि चीन तो कभी हमलावर हो ही नहीं सकता, लेकिन हमलावर हुआ।

          सभापति महोदय, अब क्यों इतने इन्कर्शन्स हो रहे हैं? वर्ष 2008 में 200 से अधिक इन्कर्शन हुए हैं। अब आप सरकार की तरफ से कह देते हैं कि नहीं-नहीं, यह तो रोजाना की बातें हैं, ये तो होती ही रहती हैं। आप देश को क्यों गुमराह कर रहे हैं? 1962 में भी आप यही कहा करते थे कि ऐसी बातें थोड़ी-बहुत होती ही रहती है, कोई बात नहीं है। आज आप फिर वही बात कह रहे हैं कि चिन्ता मत करिए, यह तो मीडिया-हाइप है। आपके फौज वाले कह रहे हैं कि इन्कर्शन्स हो रहे हैं। लद्दाख के लोग कह रहे हैं कि हमने रिपोर्ट दे दी है कि यहां चीनी आए थे। वे टैंट वगैरह उखाड़कर ले गए। धमका कर चले गए। लिख कर चले गए कि यहां चायना है और आप कह रहे हैं कि कुछ हुआ ही नहीं। यह तो होता ही रहता है। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या आप कहीं चीन में घुसे थे? अगर ऐसा होता ही रहता है और उधर से चीन द्वारा भारत में घुसने के प्रयास 208 बार हुए, तो क्या आपने आठ बार या 10 बार भी ऐसा प्रयास किया? कभी आपका कोई मंत्री कह देता है, कभी विदेश मंत्री जी कह देते हैं और कभी कोई और मंत्री कह देता है कि यह तो मामूली बात है, ऐसी बातें होती रहती हैं, इनकी फिक्र मत कीजिए। आप देश को गफलत में क्यों रखना चाहते हैं? देश इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि चीन रोजमर्रा की छोटी-मोटी बातें कर रहा है, जी नहीं।    

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आप जरा गौर कीजिए कि चीन दलाई लामा के तवांग जाने पर आपत्ति कर रहा है। प्रधान मंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह जी की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर आपत्ति कर रहा है। चीन, कश्मीर के लोगों को पेपर वीजा देता है। ऐसा चीन क्यों कर रहा है? इसका अर्थ है कि चीन अरुणाचल प्रदेश को भारत का अंग नहीं मानता है। इसे मैं अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से भी देखता हूं कि जो गूगल की वैबसाइट का सर्च इंजन है, जब वह चीन में नक्शा छापता है, तो अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा दिखाता है, जब वह भारत में छापता है, तो अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा दिखाता है और बाकी दुनिया के देशों में अरुणाचल प्रदेश को डिस्प्यूटेड दिखाता है। आप इस बारे में क्या कर रहे हैं? आपने इसे क्यों नहीं रोका, आप क्यो डर रहे हैं, आप क्यों दब रहे हैं, आपको चिन्ता किस बात की है या तो स्पष्ट कहिए कि हमारी तैयारी नहीं है? मैं इस बात को मान सकता हूं। तैयारी होनी चाहिए। बिना तैयारी के कुछ करिए, मेरे यह कहने का नितान्त उद्देश्य नहीं है। मैं यह बताना चाहता हूं कि जैसे सन् 1962 में हम बिना तैयारी के रह गए, मुझे इस बात का संदेह और आशंका है कि हम आज वर्ष 2009 में भी उसी तरह से गफलत में हैं।

          सभापति महोदय, हम इस सारे मामले में समझते हैं कि हम बातचीत के जरिए इन सभी बातों को हल करेंगे और हम बातचीत कर रहे हैं, लेकिन चीन उधर से इन्कर्शन्स और एग्रैशन्स, जो कहिए, वह कर रहा है। वह कहता है कि ठीक है, आप बातचीत करते रहो, मैं तो आगे बढ़ रहा हूं। मैं नई ग्राउंड रियलिटी बना रहा हूं। भारत ने जब चीन को तिब्बत का अधिकार दे दिया, तो चीन कहता है कि अरुणाचल सदर्न तिब्बत है, फिर आप उसे अपना अंग कैसे बना रहे हैं? चीन अक्साई चिन में घुसा हुआ है। चीन, नेपाल के अंदर आ रहा है। नेपाल की सरकार कह रही है कि जो लेह की सड़क है, उसे आप काठमांडू तक ले आइए। चीन म्यांमार में घुसा हुआ है। उस रास्ते से वह अभी तक अपने हथियार आपके इन्सर्जेंट्स को दे रहा था अब वह समुद्री मार्ग से दे रहा है। चीन पाकिस्तान के रास्ते समुद्र में जा रहा है। चीन श्रीलंका में घुसा हुआ है। चीन सारे दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है और साथ ही साथ वह पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।

          ये सब लोग चीन के नाम से कांप रहे हैं। उनको किसी समय में लगता था कि चीन की शक्ति का संतुलन भारत करेगा, एक बेलैंस ऑफ पावर होगा। इस दक्षिणी एशियाई क्षेत्र में और दक्षिण पूर्वी एशियाई क्षेत्र में भारत एक शक्ति के रूप में होगा। हम एक एशियाई शक्ति के रूप में उभरना चाहते थे। आज इस सारी नीति ने हमें एक रीजनल पावर के तौर पर सीमित कर दिया है। देश सिकुड़ रहा है, देश का राजनैतिक प्रभाव घट रहा है। क्यों?

          चीन के बारे में हमारी क्या नीति है? चीन के साथ हम क्या करना चाहते हैं? हम क्या पंचवर्षीय योजनाओं में रहना चाहते हैं या चीन के लिए हमारा कोई लाँग टर्म व्यू है? मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि जो भारत 1947 तक चीन का मार्गदर्शक था, 1949 तक जो चीन का मार्गदर्शक था, आज 2009 में 60 साल के बाद भारत चीन के पीछे है, भारत डर रहा है। भारत चीनी एग्रेशंस को, इनकर्शंस को भी छोटी-मोटी बातें कहकर उड़ा रहा है, क्यों? आश्चर्य की बात यह कि चीन 2010 में कम्युनिष्ट पार्टी के पावर में आने की वर्षगांठ मना रहा है। भारत 2010 को चीन का वर्ष मना रहा है। आप क्या करना चाहते हैं? यह क्या हो रहा है? आप किस तरफ जा रहे हैं? आप अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने को कितना सिकोड़ रहे हैं। दुनिया में कौन आपका मित्र है? 1962 में सिर्फ हम और चीन थे, पाकिस्तान नहीं था। अमेरिका ने आपकी मदद कर दी। 1965 में आप और पाकिस्तान थे, चीन चुप था। 1971-72 में भी यही हुआ। अब आप अकेले हैं, चीन आपके साथ नहीं है, चीन और पाकिस्तान मिलकर आपके साथ समस्याएं पैदा कर रहे हैं। वे कितनी दूर तक जाएंगे, यह समझना मुश्किल नहीं है। अगर आप इसी तरह से अपनी तैयारियों में विफल रहे तो निश्चित रूप से यह बहुत अधिक दूर तक जायेगा। इसलिए भी संदेह होता है कि चीन के पत्रों में, जो उनके लगभग अर्धसरकारी पत्र हैं, जिनमें सरकार की नीतियां प्रतिबिम्बित होती हैं। उसमें वे कहते हैं, उनके लेखक लिखते हैं कि चीन को चाहिए कि भारत को 20-30 टुकड़ों में बांट दें, जो माओ कहा करते थे, वही अब फिर से कहा जा रहा है कि भारत को 20-30 टुकड़ों में बांट दिया जाये और आप चुप हैं।

          चीन आपकी सीमाओं पर पूरी तैयारी के साथ आ रहा है, लॉजिस्टिकली आपसे आगे हो गया है। आप कहां हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जो देश की सुरक्षा से, देश के भविष्य से सम्बन्धित हैं। क्या आप भारत को चीन का पिछलग्गू और दुनिया में एक तृतीय श्रेणी का देश बनाकर रखना चाहते हैं, थर्ड रेट पावर या आप भारत को आप फर्स्ट रेट पावर बनाना चाहते हैं? कम से कम चीन और पाकिस्तान के मामले में जो आपकी नीतियां हैं, उससे तो हमें यह विश्वास नहीं होता कि आप भारत को विश्व की महाशक्ति बनाना चाहते हैं।

          अब आप जो बात चीन पर करते हैं, जरा उसको भी देखिये। आपकी 1993 और 1996 में जो संधियां हुई हैं, हाई लेविल एग्रीमेंट्स हुए हैं, उनमें आप कहते हैं कि कोई सामरिक एक्टिविटी नहीं होगी, एल.ए.सी. के 10 किलोमीटर इधर या उधर। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल है तो चीन किसको एल.ए.सी. मानता है? एल.ए.सी. है क्या? अगर एल.ए.सी. है तो उसके 10 किलोमीटर इधर या उधर कहां होंगे? हमारी तरफ भी होगी या उसी की तरफ होगी। हम अगर जरा सा करें तो कहता है कि आपकी फारवर्ड मार्च की पालिसी है। हमारी तो कोई फारवर्ड मार्च की पालिसी नहीं है। अभी तक कहीं यह बात सामने नहीं आई कि हमने ट्रंसग्रेशन किया हो। भूल-चूक से कोई एकाध बार चला गया हो तो मैं नहीं कह सकता, वह हो जाता है, लेकिन कहीं कोई योजनाबद्ध तरीके से कहीं किसी इलाके पर अपना कब्जा करने की हमने कोशिश की हो। चीन ने तो सिक्किम में फिंगर नाम के उस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया और वह उसे लेना चाहता है, क्योंकि वहां से वह सीधे आपके चिकन्स नैक के ऊपर, जो असम से सारे भारत को जोड़ती है, उस पर एक झपट्टा मारकर जा सकता है। आप उसमें क्या कर रहे हैं? आपने दुनिया में कौन से मित्र बनाये हैं? अमेरिका इसमें चुप है। न बर्मा आपके साथ आयेगा, न श्रीलंका आयेगा, क्योंकि सब पर चीन का प्रभाव है।

          साउथ-ईस्ट एशिया का कोई देश बोलने वाला नहीं है। कौन बोलेगा? क्या आप कोई मित्र तैयार कर रहे हैं?  यह बुनियादी सवाल इसमें उठ रहे हैं।  आप देखिए कि सन् 2005 में आपकी जो भारत और चीन के साथ बाउंड्री ईश्यू पर बात हो रही थी, उसमें आर्टिकल 4,5 और 7 को देखने की जरूरत है।

Article 4 says, “The two sides will give due considerations to each other’s strategic and reasonable interests, and the principle of mutual and equal security.”   Article 5 says, “The two sides will take into account inter alia historical evidence, national sentiments, practical difficulties and reasonable sensitivities of both sides and the actual state of border areas.”   Article 7 says, “In reaching a boundary settlement, the two sides shall safeguard due interests of the settled population on the border areas.”             चाइनीज इंटरप्रिटेशन यह है कि आप जो कर रहे हैं, वह तो घुसपैठ है, वह आप हमारे यहां घुस रहे हैं और हम जो कर रहे हैं, वह तो हिस्टोरिकल डेमोग्राफिक कारणों से कर रहे हैं।  मैं जानता हूं कि तवांग और उसके आसपास चीनियों ने किस तरह वर्ष 1962 के बाद चीनी जनसंख्या को बसाया और अब वे यह कहते हैं कि ये चीनी भाषाभाषी हैं, ये हमारे लोग हैं।  किस तरह से वह लद्दाख में, उस इलाके में टैक्स वसूल कर रहे हैं और लोगों को टैक्स का पट्टा दे रहे हैं।  यह रिपोर्ट भी सरकार के पास है।  सरकार पता नहीं इसमें क्या कर रही है?

MR. CHAIRMAN (SHRI FRANCISCO COSME SARDINHA): Hon. Member, please wind up.

डॉ. मुरली मनोहर जोशी (वाराणसी):मैं समझता हूं कि आप यह भी देखें कि चीन आपके ऊपर आर्थिक आक्रमण भी कर रहा है।  चीन ने आपके बाजार में ऐसी तमाम चीजें भेजी हैं, जो हमारे बाजार के लिए हानिकारक हैं।  आपने बहुत सी चीजों पर प्रतिबंध लगाया है, लगाना चाहिए।  चीन को हम क्यों अनुमति देते हैं?  इस बारे में भी शंकायें प्रकट की जा रही हैं कि जो बहुत सी जाली करेंसी हमारे यहां आती है, उसमें भी चीन का हाथ है।  यह है या नहीं, इसकी जांच करके आप बतायें।  लेकिन आज लोगों में ये आशंकायें हैं कि जाली करेंसी में उसका भी हाथ है।  जो फिर से नेपाल के अंदर उपद्रव हो रहा है और जो असम के अंदर उपद्रव हो रहा है और अब ये भी खबरें आ रही हैं कि उल्फा के जो लोग हैं, अब वे भागकर चीन चले गए हैं।  चीन आपके देश की इन सारी विरोधी गतिविधियों का समर्थन कर रहा है, आप क्या कर रहे हैं?

          महोदय, एक बात मैं कहता हूं कि अगर चीन अरूणाचल की बात करता है, तो हमें तिब्बत ऑटोनोमस रीजन की बात उठानी चाहिए।  हम इसे क्यों नहीं उठाते हैं, हम क्यों डर रहे हैं?  हमारे कब्जे में हमारा देश है। ऐतिहासिक कारणों से हमारे देश का हिस्सा है।  याद रखिए, चीन हमारा स्वाभाविक, नैसर्गिक पड़ोसी नहीं है।  हमारे और चीन के बीच में इधर हिमालय और उसके आगे तिब्बत था।  आपने तिब्बत दे दिया, तो हिमालय तक हमारा बार्डर आ गया और आज हिमालय की भी फुटहिल्स पर आ रहा है।  कभी वह अरूणाचल मांगता है, कभी नेपाल में घुसा हुआ है, कभी पाकिस्तान से आता है।  आप अपने देश की सीमाओं को क्यों सिकोड़ रहे हैं?  क्यों आप भारत सिकोड़ना चाहते हैं?  विदेश मंत्री जी, ये गहरे सवाल हैं, जिन पर पूरे देश को आपसे जवाब चाहिए।  यह भारत सुरक्षित रहेगा या नहीं रहेगा?  पहले कभी यह अंग्रेजों की दासता में रहा, अब कभी चीन की दासता में आ जाएगा, कभी अमेरिका की दासता में आ जाएगा।  इस देश को हम किधर ले जाना चाहते हैं?  इस देश का स्वाभिमान रहेगा या नहीं रहेगा, आजादी रहेगी या नहीं रहेगी, इसकी एक अर्थव्यवस्था रहेगी या नहीं रहेगी, यहां डेमोक्रेटिक सिस्टम रहेगा या नहीं रहेगा, भारत अखण्ड रहेगा या नहीं रहेगा या आप चीन को इसे टुकड़ों में बांटने की इजाजत देंगे?  दुनिया में भारत का कोई दोस्त रहेगा या नहीं रहेगा या भारत आइसोलेटेड बन जाएगा।  नये समीकरण बन रहे हैं।  इस बात की संभावनाओं से मुझे इन्कार नहीं है कि कल चीन और अमेरिका के बीच में सारी दुनिया को आपस में बांट लेने की संधि न हो जाए।  यह पहले भी इतिहास में होता रहा है।  कभी वह स्टैलिन और हिटलर में हुआ था, फिर से किसी से किसी न किसी रूप में हो सकता है।  ये महाशक्तियां जब बनती हैं और उनको धन और सामरिक शक्ति का अहंकार आता है, तो ये दुनिया को तोड़ने और अपना साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश करती हैं।  इतिहास इस बात का गवाह है।  क्या आप इस मामले में सोचेंगे कि वे कौन से देश हो सकते हैं जो इसमें हमारी मदद करें?  क्या एक वैकल्पिक नीति सोचेंगे या सिर्फ आप अमेरिका के साथ स्ट्रेटजिक संबंध बनाकर रखेंगे?

          चीन के पास परमाणु शस्त्र हैं, पाकिस्तान के पास परमाणु शस्त्र हैं।  एशिया के रीजन में सिर्फ दो देश ऐसे हैं, आस्ट्रेलिया और जापान, जिनके पास परमाणु शस्त्र नहीं हैं, लेकिन उन्हें परमाणु आच्छादन है, न्यूक्लियर कवर है।  इसलिए चीन उन पर हमला नहीं कर सकता है। चीन के परमाणु आयुध उनके विरूद्ध नहीं लग सकते हैं, अमेरिका के विरूद्ध भी नहीं लगेंगे, किसके विरूद्ध लगेंगे? पाकिस्तान यदि हम पर आक्रमण करेगा, चीन उसकी सहायता करेगा, तो आप क्या करेंगे? ये सवाल हैं जो चीन और भारत के संबंधों से पैदा होते हैं। मैं आज सिक्योरिटी सिस्टम की खामियों की चर्चा नहीं करूंगा क्योंकि वह भयावह है। जिस तरह से आज हमारा सिक्योरिटी सिस्टम है, एंटनी साहब यहां नहीं बैठे हैं, मैं उनसे कहना चाहता था कि आज क्या हो रहा है इस देश में। आप एक बंदूक नहीं खरीद सकते हैं। वर्षों लग जाते हैं आपको अपने हथियार खरीदने में। दस-दस वर्ष तक तय नहीं कर पाते हैं कि कौन सी तोप आएगी या कौन सा जहाज आएगा, क्यों? देश इस तरह से नहीं संभाले जाते।  The borders of the country are not to be discussed, they are to be defended. देश  की सीमाओं के बारे में बहस नहीं होती है, आप अपना पांव रखते हैं कि यह मेरी सीमा है, and I am here to defend it. देश की सीमाएं वहीं तक होती हैं, जहां तक आप उनकी रक्षा कर सकते हैं, जहां तक उनको डिफेंड कर सकते हैं। मैं यह बहुत सुन रहा हूं कि हमारी सेना की तादाद तो कम है, लेकिन क्वालिटी बहुत अच्छी है। क्वालिटी बहुत अच्छी है, लेकिन उसके साथ-साथ तादाद भी होनी चाहिए।

MR. CHAIRMAN : Please wind up. There are three speakers from your Party.

डॉ. मुरली मनोहर जोशी : मेरा निवेदन है कि भारत और चीन के संबंधों पर आपको बहुत गहराई से विचार करना चाहिए, सदन को गहराई से विचार करना चाहिए, देश को गहराई से विचार करना चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, इसको दुर्लक्ष्य नहीं किया जा सकता है। इसके लिए साफ नजरिया चाहिए और नजरिया सारे सदन को, सारी पार्टियों को स्वीकार्य होना चाहिए।

   

श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली): महोदय, मैं स्वागत करता हूं जोशी जी का जो हिन्दुस्तान और चीन के संबंधों के बारे में चर्चा सदन के सामने लाए हैं। वैसे तो अपनी बात पहले रखनी चाहिए, लेकिन जोशी जी ने दो-तीन बातें कही हैं, तो पहले मैं उनकी एक-दो बातों पर कहते हुए अपनी बात प्रारम्भ करूंगा। ठीक है कि चीन के साथ एक इतिहास रहा है, कुछ दोनों देशों की अपनी आजादी के पहले का रहा है, कुछ वर्ष 1962-65 का रहा है और कुछ आजकल, पिछले 15-20 साल के समय में, जब दुनिया एक नए रूप में आगे बढ़ रही है, रहा है। जोशी जी और मेरी उम्र में बहुत अंतर है, वह बहुत वरिष्ठ नेता हैं। कभी-कभी इसे जेनरेशन गैप भी कहते हैं। हो सकता है कि हमारी सोच में जो अंतर है, उसे आप जेनरेशन गैप कह सकतें हैं या उनकी मेच्योरिटी और मेरी इममेच्योरिटी की बात कह सकते हैं, जैसा कहना चाहें कहें, लेकिन कम से कम वह जिस रूप से इस देश को देखते हैं, चीन के साथ हमारे संबंधों को देखते हैं, मुझे यह बात नहीं समझ में आती है कि उनकी वाणी में भय क्यों नजर आता है। अगर उनको लगता है कि ऐसी बात नहीं है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है, मैं अपने शब्द वापस ले लूंगा। लेकिन मैं कम से कम जिस भारत में जन्मा हूं और आज जिस भारत के विकास को देख रहा हूं, अपनी अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति को देख रहा हूं, चीन से ही नहीं, बाकी देशों से अपने देश के संबंधों को देख रहा हूं और वह समय भी देखा है अपने बचपन में, अपने कॉलेज के समय में जब दुनिया की नजर में हम एक गरीब, असहाय और कमजोर देश के रूप में देखे जाते थे और जिस तरह से अन्य देशों को हिन्दुस्तान को देखते देख रहा हूं, मुझे नहीं लग रहा है, यह बात मैं किसी पार्टी की तरफ से नहीं कह रहा हूं, केवल हिन्दुस्तान के एक नागरिक की तरफ से कह रहा हूं जिसका भविष्य, जिसके परिवार का भविष्य इस देश पर निर्भर करता है, वह सशक्त, प्रगतिशील, अपनी संस्कृति और धर्मों से ली हुई इंसपिरेशन्स पर आधारित एक देश है। ठीक है कि चीन के साथ कुछ दिक्कतें होंगी, हर पड़ोसी के साथ होती हैं, आज क्या परिस्थिति बन रही है, उस पर मैं बाद में बात करूंगा। आज हिन्दुस्तान अपनी अन्तर्राष्ट्रीय नीति, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढते हुए व्यापार, अन्य देशों से कहीं बैलेंस ऑफ ट्रेड पॉजिटिव हो सकता है, कहीं निगेटिव हो सकता है, यह प्रक्रिया चलती रहती है, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हम क्या सोचें, किस रूप में अपने राष्ट्रहित को आगे बढ़ाएं, क्या कुछ पड़ोसी राष्ट्रों के राजनीतिक दांव-पेंच से डर कर निर्णय करें या अपने राष्ट्रहित को देखते हुए अपने स्वाभिमान के साथ, कांफिडेंस के साथ आगे बढ़ें, इस पर मेरा जोशी जी से भिन्न मत है। मैं चाहता हूं कि यह बात मैं अवश्य सभी के सामने रखूं।

 

 चीन के साथ एक इतिहास रहा है। माननीय जोशी जी ने बहुत बढ़िया तरीके से कहा कि आज भी हम समझ नहीं पाये कि 1962 में क्यों चीन ने हम पर आक्रमण किय्न? बहुत से विशेषज्ञ हैं जो कारण गिनाएंगे, लेकिन एक भारतीय के मन में यह बात शायद न समा पाए कि जिस देश से हम दोस्ती के संबंध रखना चाहते थे, उसी ने उस दोस्ती को दरकिनार करके हम पर हमला क्यों किया? बहुत से विश्लेषण हमारे नेतृत्व के बारे में किये जाते हैं और उस पर बहुत तीखी टिप्पणियां भी की जाती हैं, लेकिन वह एक अलग परिप्रेक्ष्य था। आज के परिप्रेक्ष्य में चीन और हमारे संबंध कैसे बन रहे हैं और हमारे उनके बीच में कई मुद्दों पर जो अंतर हैं, उस पर यह सरकार क्या कर रही है तथा आने वाले समय में हम उन संबंधों को कहां बढ़ते देखते हैं, इस पर चर्चा करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना पुराने इतिहास को आगे लाकर, उससे सतर् रहने की बात है।

          सबसे पहली बात यह है कि चीन और हमारा 3000 किलोमीटर का बार्डर है। चीन की सोच में, चीन के इतिहास और संस्कृति में हमने देखा कि वह जिसे अंग्रेजी में   “ चाइना सेंट्रिक”  देश कहते हैं, ऐसा देश रहा है, जिसने अपने अंदर अपने आपको देखा है। उनको लोग अपनी संस्कृति में समझाते हैं कि चीन को वे दुनिया का केन्द्र मानकर बाकी देशों से उसी हिसाब से बातचीत करते हैं। हमने इस दुनिया को दूसरे नजरिये से देखा है। हमारा नजरिया हमेशा खुलेपन का रहा है। हमारा नजरिया ऐसा रहा है जिसमें हमने दुनिया की हर चीज को अपने अंदर समाया भी है और दुनिया को अपनी बातों से प्रभावित भी किया है। मैं तो आज भी कहूंगा कि मैं ऐसी ही संस्कृति और संस्कार में पैदा होना चाहूंगा, जहां मैं अपने को कूप-मंडूक की तरह न देखूं वरन् दुनिया की हर संस्कृति और संस्कार से अच्छी बातें लेने की क्षमता रखूं।  आज ऐसे ही हिंदुस्तान की आवश्यकता है। चीन जैसे अपने अंदर देखने वाले देश की संस्कृति के रूप में हमें आवश्यकता नहीं है। मैं चाहूंगा कि एक खुलापन हो, जिसमें हम दुनिया के हर राष्ट्र को उनके स्वाभिमान के रूप में देखें, उनको हम अधिकार और इज्जत दें। इस रूप में नहीं कि हम किसके साथ पावरफुल हैं, किसके साथ नहीं। उस सोच से कोई भारतवासी कभी न बड़ा हुआ है, ना ही हमारे देश की संस्कृति और संस्कार वैसे रहे हैं।

          चीन के साथ हमारे बार्डर के इश्यू काफी समय तक रहे हैं। आदरणीय जोशी जी ने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की बात कही, वह इसलिए क्योंकि और देशों की तुलना में जब हम लोगों ने संधियां तय की या बार्डर तय किए थे, तो कई राष्ट्रों के साथ वह सीधी लकीर, जिसके एक तरफ हमारा देश होता है और दूसरी तरफ दूसरा देश होता है, चीन के साथ कई जगहों पर, पिछले 60 सालों में, अभी तक तय नहीं हो पाई है, जिसमें कई वर्ष तक इनकी सरकारें भी रही हैं।

          माननीय अटल जी एक समय विदेश मंत्री रहे हैं, उसके बाद 6 साल प्रधान मंत्री भी रहे हैं, लेकिन वे लाइनें तय नहीं हो पाई हैं। अलग-अलग सरकारों ने उस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। मैं मानता हूं कि 1962 और 1976-1977 के बीच में इस दिशा में ज्यादा प्रगति नहीं हुई, लेकिन उसके बाद माननीय वाजपेयी जी चीन गये थे। लेकिन जो ऐतिहासिक कदम चीन की ओर बढ़ाए गये थे वे माननीय राजीव गांधी जी की वह विजिट थी जिसमें उन्होंने चीन के प्रीमियर से हाथ मिलाए थे। वह चित्र आज भी हिंदुस्तान के बढ़ते हुए संबंधों में एक कारगर माइल-स्टोन है। लाइन ऑफ एक्चुएल कंट्रोल के कारण कुछ दिक्कतें होती हैं। वह बाउंड्री जैसा आपने बताया कि 5-6 किलोमीटर आगे पीछे कहां है? जब कभी भी कोई चीज पूरी तरह से निश्चित नहीं होती है, उस पर लोग आगे-पीछे आते-जाते हैं, लेकिन क्या यह संकेत है कि चीन हिंदुस्तान में आगे बढ़ने या किसी तरह से हमारी जमीन पर अपनी फौजों को भेजकर, अपना आधिपत्य जमाने की रणनीति तय कर रहा है या ये संकेत उसकी तरफ के संकेत नहीं है - यह महत्वपूर्ण बात है।  

          माननीय जोशी जी ने कहा कि वह नहीं जानते कि हिंदुस्तान के लोग भी कभी वहां गये होंगे, तो क्या वे लोग भूलचूक से चले गये? यह बात तो मैं भी जानता हूं लेकिन मेरे पास आंकड़ें मौजूद नहीं हैं, लेकिन चीनी सरकार की तरफ से भी कई बार प्रतिक्रियाएं आती हैं कि हिंदुस्तान की फौजें भी चीन के इलाकों में चली गयी हैं। जो उन्होंने टेंट छोड़ने की, खाना छोड़ने की या पेंट करने की बात कही, तो यह एक अमूमन रणनीति मानी जाती है कि जब उनकी फौजें हमारे यहां आती हैं तो वह इसी तरीके से मार्क करके चली जाती हैं और जब हमारी फौजें वहां जाती हैं तो वे भी इसी तरह से मार्क करके चली आती हैं। सरकार की तरफ से, पिछले 5-6 सालों में हमारे पास जो आंकड़ें आये हैं, उसमें यह बात कहीं भी सिद्ध नहीं होती है कि   “Chinese incursion into supposed Indian territory or  Indian incursion into supposed Chinese territory ” में कोई ज्यादा इजाफा हुआ है। ...( व्यवधान)

श्रीमती विजया चक्रवर्ती (गुवाहटी):  आप किसको सपोर्ट कर रहे हैं?

श्री सन्दीप दीक्षित :  मैं माननीय विदेश मंत्री जी से आग्रह करुंगा कि यह बात बताएं। मैं यह बात नहीं कह रहा हूं कि किसी का हमारे यहां आना गलत है, मैं यह कह रहा हूं कि क्या यह भय के संकेत हैं या जो पहले कई सालों से चलता आ रहा है, वह ही चला आ रहा है, इस बात को हमें ध्यान से देखना है। चाइना से हम चाहते हैं कि मित्रता बनें, लेकिन हम यह नहीं चाहते हैं कि देश को कहीं संसद की तरफ से संकेत जाए कि हमारे लोग गलत चीजों पर डरें।

जिस तरह से भय को नहीं मारना गलत होता है, उसी तरह विदेशी संबंधों में बिना कारण भय को लाना सही नहीं है।...( व्यवधान) मैं उस देश का नागरिक हूं, जिस पर मुझे पूरा गर्व है।...( व्यवधान) आपको नहीं होगा।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Hon. Member, please address the Chair.

          Nothing will go on record, except the hon. Member’s speech.

(Interruptions)* श्री सन्दीप दीक्षित : हमें किसी बात से चिंता नहीं है। मैं सदन के तमाम सदस्यों को कहना चाहता हूं कि अपने मन से चीन के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी देश का भय कि कोई आकर हमारी सीमाओं पर अपना आधिपत्य जमा सकेगा या कोई भी देश आज हिंदुस्तान की एक इंच भी जमीन ले सकेगा, मैं इस बात को स्वीकार नहीं करता हूं। मुझे अपनी सरकार और अपनी फौजों पर पूरा विश्वास है। चीन और हमारे बीच में जो बढ़ते आर्थिक संबंध हैं, उन्हें भी हमें अपने सामने रखना पड़ेगा, क्योंकि दुनिया का परिप्रेक्ष्य बदला है। चीन के साथ जब 1962 में लड़ाई हुई थी,...( व्यवधान) आपको चीन से डर लगता होगा, हमें चीन से डर नहीं लगता है। जब से हमारी सरकार आई है, हमें डरने की कोई जरूरत नहीं है। अगर आप यहां होते, तो भले ही हमें डरने की जरूरत थी।...( व्यवधान) आप उस कमजोर बैकग्राउंड से आए हैं, जहां आपने कमजोर एनडीए सरकार देखी है। हम उस बैकग्राउंड से आए हैं, जहां हमने एक सशक्त यूपीए सरकार देखी है। हमें डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, आपको डरने की आवश्यकता हो सकती है। आप उस भय के कारण बोल रहे हैं, जिसकी वजह से आपने देश को कमजोर किया था, हम उस शक्ति के कारण बोल रहे हैं, जिससे हमने देश को सशक्त किया है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Shrimati Meena Singh, please do not disturb him. If you want to speak, you may give your name. Please do not disturb the Member.

          Now, you may continue.

श्री सन्दीप दीक्षित : महोदय, अब मैं चीन के साथ आर्थिक संबंधों के बारे में कहना चाहूंगा। आज से 40-50 साल पहले या 60 साल पहले हमारे और चीन के बीच में व्यापारिक संबंध थे, मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, लेकिन कुछ मिलियन डालर्स में रहते होंगे। आज शायद 40 या 50 बिलियन डालर्स के करीब हमारे व्यापारिक संबंध हैं। आज ट्रेड के हिसाब से चीन और हमारे बीच के संबंध बहुत अलग-अलग हो गए हैं। आज दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ, अलग-अलग  आर्थिक  क्षेत्रों पर,  अलग-अलग फाइनेंशियल *Not recorded.

एरियाज़ में अंतर है। हम भी कोशिश कर रहे हैं कि अलग-अलग देशों में अपनी आर्थिक शक्ति को बढ़ाएं और चाइना भी यही कोशिश कर रहा है। आने वाले वर्षों में चीन और हमारे बीच में जो संबंध बनेंगे और दुनिया के दूसरे देशों और हमारे बीच जो संबंध बनेंगे, वे संबंध इसी आर्थिक शक्ति के आधार पर बनेंगे। आज अगर चाइना के साथ हमारी ट्रेड है और हमारे जो संबंध बढ़ रहे हैं, वह किसी के कारण नहीं हो रहा है, बल्कि यह हिंदुस्तान की अपनी शक्ति की वजह से है कि हमने चीन से भी अपने संबंध अच्छे किए हैं और दुनिया के दूसरे देशों से भी अपने संबंध अच्छे बनाए हैं।...( व्यवधान) मैं सड़कों के बारे में भी बात करूंगा। आप सड़कों की बात एनआरईजीए में कर रहे हैं, वह छह किलोमीटर की सड़क जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार बना रही थी। वह उस एरिया में आ रहा था, जो एलओसी के अंतर्गत कंट्रोवर्शियल थी, इसलिए उस पर रोक लगी थी। मैं आदरणीय विदेश मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि इस बारे में भी वे खुलासा करें। हर छोटी सी चीज को अगर परिप्रेक्ष्य में पढ़ेंगे, तो अपने आप आपको हमारे और चीन की विदेश नीति में क्या संबंध बन रहे हैं, समझ आ जाएगा।

          मैं एक बात और कहना चाहता हूं। चीन और हमारे बीच में बार्डर से संबंधित जितने भी विषय पिछले कई वर्षों से चलते थे, उसमें सिर्फ बातचीत ही चलती रहती थी। यह तो यूपीए की सरकार है, मैं हमारे प्रधानमंत्री जी को धन्यवाद दूंगा कि जब वे चीन के प्रधानमंत्री जी से मिले, तब हमारे और चीन के बीच में संबंध बने। हम दोनों ने तय किया कि नए तौर तरीके से, जिसे हम कहते हैं कि -  ‘political parameters and guiding principles for the settlement of India-China boundary question’, इस पर हस्ताक्षर किए गए और पहली बार एक रूपरेखा बनी, जिसके अंतर्गत हिंदुस्तान और चीन के बीच में जब भी बार्डर को लेकर मतभेद हुए, वे सभी सैटल हो सकेंगे। क्यों नहीं किसी दूसरी सरकार ने ऐसा किया? क्यों नहीं किसी दूसरी सरकार ने कहा कि जहां भी हम दोनों देशों के बीच बार्डर को लेकर मतभेद हैं, हम कोई मापदंड बनाते हैं, जिससे उस समस्या का हल निकाला जा सके। जैसा जोशी जी ने अपने वक्तव्य में आर्टिकल 4, 5 और 7 का जिक्र किया है। पहले भी ये बन सकते थे          । आज दोनों देशों के बीच में स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स की एक पालिसी बनाई गई है कि जब भी दिक्कत होती है, तो वे इस बात को डिस्कस करते हैं। आज जब भी चीन का इंकर्शन हिंदुस्तान में होता है या हमारा उनके यहां होता है, तो हमारे यहां फौजों के बीच में डिस्कशन होता है।

अभी बल्कि आज से 10 या 15 दिन पहले चीन का फौजी डेलीगेशन हिन्दुस्तान आया था और अब सुना है कि 5-7 दिन में और आने वाले हैं। हमारे जनरल और हमारे लोग बाहर डिसकशन करने जा रहे हैं। 1962 का एक अलग इतिहास था। ...( व्यवधान) आज हम 1962 का हिन्दुस्तान नहीं हैं। आज 2009 का हिन्दुस्तान हैं। आप लोगों को डर लगता होगा, हमें डर नहीं लगता है। इस देश की रक्षा करने के लिए हम लोग हैं, यहां की सीमाओं की रक्षा करने के लिए हम लोग हैं। यह भय आप फैलाइए। अगर आप इस देश को खबर देना चाहते हैं कि हम कोई कमजोर देश हैं, हमारी फौजें कमजोर हैं तो आपका स्वागत है। मैं आज भी कहना चाहता हूं कि हमारा देश कमज़ोर नहीं है। कोई भी देश अगर हिन्दुस्तान पर आंखें उठाकर देखेगा तो उसको वो जवाब मिलेगा कि उसको पता चलेगा कि देश को डा.मनमोहन सिंह जी का नेतृत्व मिला हुआ है। देश को यूपीए सरकार का नेतृत्व मिला हुआ है। यह कोई एनडीए की सरकार नहीं है जो कमजोर तरीके से इस देश की रक्षा करेगी। आप चीन से डरते हैं, हम नहीं डरते हैं। इसीलिए इस देश की जनता ने हमें यहां उसकी रक्षा करने के लिए बैठाया है, उनको नहीं बिठाया है जिनको चीन से डर लगता है।...( व्यवधान) सभापति जी, माफ करिएगा, इस डिबेट को मैं नहीं चाहता था कि यह राजनीतिक हो लेकिन उन लोगों से जो हमारे पड़ौसी से डरते हैं, उनके बीच में हम लोग विदेश नीति की क्या चर्चा करेंगे? चर्चा तो उनके बीच में होनी चाहिए जिनको अपने देश पर स्वाभिमान हो, जिनको अपने देश की फौजों पर, अपने जनरल्स पर भरोसा हो, जिनको अपने प्रधान मंत्री पर भरोसा हो। उन पर नहीं जो चार फौजियों के आने से अपने देश के बारे में घबरा जाते हैं। माफ करिएगा, सभापति जी, मुझे तो  लगता था कि विपक्ष में देश के प्रति कम से कम स्वाभिमान है। यह शर्म की बात है कि वह स्वाभिमान भी हमारी भारतीय जनता पार्टी के मैम्बर्स नहीं रखते।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Shri Radhe Mohan Singh, please do not disturb the House.  Please sit down.  If you want to speak, you can speak later on.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Nothing should go on record.

(Interruptions)* MR. CHAIRMAN: Hon. Members, if you want to speak, you can speak later on.  Please do not disturb him.

… (Interruptions)

*Not recorded.

 

MR. CHAIRMAN: You can refute it later.

          Shri Dikshit, please continue and address the Chair.

श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली): सभापति जी, मैं आपके संरक्षण का स्वागत करता हूं लेकिन उसकी आवश्यकता नहीं है। ये लोग जो बोलना चाहते हैं, उनको बोलने दीजिए। मैं जानता हूं, जब परमाणु नीति हुई थी तब भी इन्होंने भयावह स्थिति इस देश के सामने प्रस्तुत की थी। हम इस पर डिग जाएंगे, हम उस पर डिग जाएंगे। हमें अमरीका दास बना लेगा, ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज के हिन्दुस्तान की आवाज को अब ये नहीं सुन पा रहे हैं। अब हम लोग ही नयी दुनिया की आवाज को सुन पा रहे हैं। दुनिया में जो नयी परिस्थितियां बन रही हैं, उनको यूपीए समझ पा रही हैं, हमारी सहयोगी पार्टीज समझ पा रही हैं। वे लोग समझ पा रही हैं जो इनकी तरफ से बायीं तरफ को बैठी हुई हैं क्योंकि एक बिल्कुल दूसरे हिन्दुस्तान का  नजरिया और सोच-समझ हम सामने लेकर चलते हैं।

          यह ठीक है कि चीन के साथ हमारे कुछ न कुछ मतभेद रहते हैं। मैंने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की बात आपको बताई है। अरुणाचल प्रदेश के बारे में मैं आपको एक बात बताना  चाहता हूं। वे मानते हैं कि वे बार बार कहते हैं कि अरुणाचल प्रदेश उनका हिस्सा होगा, वे सोचते होंगे। उनके सोचने से क्या होता है? हम भी बहुत सी चीजें सोचते हैं। लेकिन पिछले एक साल में हमारे प्रधान मंत्री का वहां जाना, हमारे यूपीए की चेयरपर्सन का वहां जाना, और उनके विरोध के बावजूद, और वे विरोध करने वाले कौन होते हैं, दलाईलामा, हमारे अरुणाचल गये। जितने दिन वे वहा रहना चाहते थे, उतने दिन वे वहां रहे। जो वह कहना चाहते थे, वह बात उन्होंने कही। जितने कार्यक्रम वे करना चाहते थे, वे कार्यक्रम उन्होंने किये। मैं एक छोटी सी बात का उदाहरण दूंगा। किसी दूसरे देश से हम अपनी तुलना नहीं करते। लेकिन जब राष्ट्रपति ओबामा को बीजिंग जाना था और वह चाहते थे कि उसके पहले वाशिंगटन में सम्मानित दलाईलामा साहब से मिलें और चीन ने आगाह किया कि अगर आप दलाईलामा साहब से मिलेंगे तो बीजिंग में शायद आपका वैसा स्वागत नहीं होगा, तो ओबामा ने,उनके सामने उन्होंने दलाईलामा को मना कर दिया लेकिन हिन्दुस्तान ने दलाईलामा जाने से मना नहीं किया।

          आज मैं चीन के संबंध में बताता हूं कि हम अगर हैं तो चाइना के खिलाफ हम शायद ज्यादा मजबूती से अपने देश के स्वाभिमान की रक्षा करते है, शायद और देश करते हों या न करते हों। अन्य किसी देश का चीन से क्या संबंध है, उससे हमें कोई लेना-देना नहीं है। मैं यही चाहता था। यह तो बड़े दुर्भाग्य की बात है कि इस तरीके से बात हो रही है। इस समय चीन हमारे हिसाब से कहां बैठता है, शायद ही आपस में कोई अंतर होना चाहिए। ठीक है, आगाह करने की बात अलग होती है। हम सब सरकार को आगाह करते हैं कि हर देश के सामने अपनी बात को संभल कर रखें। एक इतिहास रहा है। मैंने भी 1962 की लड़ाई की बात कही है। मुझे आज भी समझ में नहीं आता है कि क्यों 1962 में चीन ने हम पर हमला किया?  लेकिन क्या 1962 का हिन्दुस्तान और आज का हिन्दुस्तान एक है? क्या वह चीन और आज का चीन एक है? क्या वे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियां और आज की अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियां एक हैं? बार-बार जोशी साहब ने कहा कि किस तरीके से पिछली लड़ाइयों में किसी दूसरे देश के कारण हम लोग अपने आप को संभाल पाए।

          1971 में बांग्लादेश बनाया था लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि किस देश के कारण बांग्लादेश बना था? क्या हमारी फौजें में दम नहीं था? उस व्यक्ति को, जिसे खुद अटल जी ने कहा था - यह इंदिरा नहीं दुर्गा हैं, क्या उस दुर्गा ने बांग्ला देश को नहीं बनाया था? क्या किसी दूसरे देश की मदद से बांग्ला देश बन पाया था? बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज छोटी-मोटी राजनीति के कारण जिस देश ने सबसे बड़ी शक्ति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई थी, उसे एक वाक्य में यह कहते हुए नकार दिया कि और देशों के कारण इस देश ने अपनी रक्षा की थी। 1971 की लड़ाई हिन्दुस्तान ने लड़ी थी, हिन्दुस्तान की फौजों ने लड़ी थी। हर उस पार्टी ने लड़ी थी जो इस देश की राजनीति को संभालती है। उस समय प्रधानमंत्री माननीय इंदिरा जी थी तो क्या हुआ? हमें जिस देश की आवश्यकता है, क्या हम पूरे देश की बात को एक लाइन में नकार जाएं कि किसी और देश के कारण हमने बांग्ला देश बनाया था या पाकिस्तान को परास्त किया था? इतने दुर्भाग्य की बात कह दी? यह कहते हुए पूरे देश की, फौज की हिम्मत को, शहीदों के नाम को दरकिनार कर दिया कि किसी दूसरे देश की मदद के कारण हम किसी देश के सामने खड़े हो सकते हैं। एक वाक्य में कह दिया कि हमारी फौजें बेकार हैं। एक वाक्य में कह दिया कि लाखों करोड़ों लोग, हमारे भाई-बहन जो फौज में जाते हैं, किसी दूसरे देश के सामने डट कर खड़े नहीं हो सकते हैं। मैं इसलिए कहता हूं कि इनकी और मेरी सोच में अंतर है। मुझे मालूम है कि इनकी पार्टी में बहुत लोग हैं जो मेरी बात को मानते हैं। हो सकता है इस सदन में आज वे इस बात को न मानते हों। आज के हिन्दुस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  कोई नजर उठाएगा तो मैं जानता हूं, इस सदन में चाहे कोई भी पार्टी उसका लड़कर मुकाबला करेगी। आज चीन हमारे लिए खतरा नहीं है। हां, चीन और हमारे बीच कुछ चीजों के बारे में मतभेद है और कुछ कम्पीटिशन भी हो सकते हैं, होंगे। हर देश से होंगे। क्या बांग्ला देश से नहीं हैं? क्या नेपाल से नहीं हैं? मैं कहता हूं कि आज बॉर्डर डिस्पयूट को सुलझाने का मैकेनिज्म बनाया है तो यूपीए सरकार ने बॉर्डर डिस्पयूट को सुलझाया है। पिछले साल और इस साल भी हमारे माननीय प्रधानमंत्री और चीन के प्रधानमंत्री मिलते हैं, सौहार्दपूर्ण तरीकों से आपस के अंतरों की चर्चा करते हैं, यह केवल यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री के दायित्व के पहल के कारण हो रहा है। मैं सदन का बहुत ज्यादा समय नहीं लूंगा। मैं कहना चाहता हूं कि आने वाले समय में हमें इस बात से तो आगे रहना ही है। अपने राष्ट्रीय हित के कारण चीन चाहे कुछ भी कहे, चाहे अरुणाचल के बारे में कुछ कहे, चाहे किसी बॉर्डर के बारे में कुछ कहे लेकिन हमारे साथ कुछ आउटस्टैंडिंग इश्यूज हैं। आज भी अक्साई चीन का इश्यू है, जिसके बारे में सरकार को अपना मत हमारे सामने स्पष्ट करना चाहिए कि आज नहीं कल अगर पाकिस्तान से हमारा कश्मीर का मसला हल होता है, तो अक्साई चीन के बारे में हमारी क्या पॉलिसी रहेगी। मैं प्राइवेट सैक्टर का आह्वान करूंगा कि जिस तरह से चीन अपने इकनॉमिक इंटरस्ट को बढ़ा रहा है। मैं हाल ही में डेलीगेशन में अफ्रीका गया था, मैंने देखा अफ्रीका के पूरे देश हिन्दुस्तान की तरफ देख रहे हैं कि आप निवेश कीजिए। वे चीन की तरफ नहीं देख रहे हैं। हम उन अपॉरच्युनिटीज़ और मौकों का इस्तेमाल करें। अभी मैं कांग्रेस पार्टी के डेलीगेशन में ग्रीस गया था और हाल ही में इथोपिया भी गया था, मैं आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि हर देश एक शब्द पूछ रहा था कि हमारे यहां नैनो कब आएगी? उन्होंने चीन की गाड़ी की बात नहीं की क्योंकि वे चाहते हैं कि हिन्दुस्तान की चाहे टाटा की नैनो हो या और गाड़ियां हों, उनके देश में जाकर निवेश करे। आज एक मौका बना है और सम्पूर्ण दुनिया के लोग चाहते हैं कि हिन्दुस्तान की कंपनियां उनके यहां निवेश करें। हमें इस मौके का फायदा उठाना चाहिए।

          महोदय, आज की परिस्थिति में हम मानते हैं कि चीन से कुछ मैन्युफेक्चरिंग चीजें हिन्दुस्तान आती हैं। चीन कुछ चीजों में बेहतर होगा लेकिन यह कम्पीटिशन बॉर्डर पर बैरियर लगाने से दुनिया में नहीं आएगा। डब्ल्यूटीओ के बाद आपस में इम्पोर्ट और एक्पोर्ट के संबंध बनते हैं, अब नए तौर-तरीके में बन रहे हैं। मैं मैन्युफेक्चरिंग सैक्टर का आह्वान करता हूं और अगर हमें लगता है कि हम चीन से किसी चीज में कमजोर हैं तो हम अपने आपको सशक्त करें। हम उस इकनॉमी और स्केल से प्रोडय़ूज करें, उन तरीकों से प्रोडय़ूज करें ताकि हमारा निर्यात चीन जा सके। यहां फाइनेंस मिनिस्टर नहीं हैं, मैं एक आग्रह जरूर करूंगा कि अगर कई जगह लगता है कि डय़ूटी या किसी और हिसाब से अपनी मैन्युफेक्चरिंग की मदद करनी चाहिए ताकि हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन ही नहीं और देशों के प्रोडक्ट से कम्पीट कर सकें तो इस बात पर भी कदम आगे बढ़ाएं।...( व्यवधान) यह घटिया नहीं है। आपको घटिया लगती होगी। ऐसा नहीं है।

          महोदय, मैं फिर से इस बात को दोहराना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान को चीन के साथ भय रखने या डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर बॉर्डर से चीन के साथ इन्कर्जन होता है तो इसके बारे में नजर रखे। प्रेस में बात आई थी कि ब्रह्मपुत्र पर एक डैम बन रहा है। जब हमने सैटेलाइट इमेजिनरी देखी तो पता चला कि कोई डैम नहीं बन रहा है। हमारी सरकार को चीन सरकार से इस बारे में बार-बार वार्ता करते रहना चाहिए, चाहे ब्रह्मपुत्र के पानी की बात हो, चाहे लैंड ऑफ एक्चयुल कंट्रोल की बात हो। जैसा जोशी जी ने कहा कि हमें हमेशा आगाह तो रहना चाहिए लेकिन भय या डर से आपस में इस संबध को नहीं बनाना चाहिए।

15.00 hrs.           मैं विदेश मंत्री जी से इतना कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा कि विदेश मंत्री जी जो भी संदेह हिंदुस्तान और चीन के रिश्तों के बीच में हैं, चाहे वे प्रैस के माध्यम से, चाहे जोशी जी ने अपने वक्तव्य में जो बात की, उसके माध्यम से हो, अगर इस देश के किसी भी नागिरक के मन में कुछ ऐसी शंकाएं हैं तो अपने वक्तव्य में उन शंकाओं को दूर करने की जरूर कोशिश करें।

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे भारत और चीन संबंधों पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। अभी आदरणीय जोशी जी और उनके बाद भाई संदीप दीक्षित जी ने अपने-अपने विचार यहां रखे। उन्हें सुनकर मुझे ऐसा लग रहा था कि इस भाषण में शायद प्रतियोगिता हो रही है और जो अच्छा बोलेगा, उसे पुरस्कार मिलेगा। लेकिन जहां तक भारत और चीन के संबंध का सवाल है, यह बात सत्य है कि हिंदुस्तान को, हमको और इस सरकार को सोचना पड़ेगा कि आजादी के पहले भारत और चीन के क्या संबंध थे, आजादी के बाद हमारे संबंध क्या हुए और वर्तमान समय में जो भ्रांतियां और शंकाएं हैं, हमें उन पर भी विचार करना पड़ेगा, मूल्यांकन करना पड़ेगा और इसके बारे में हमें गंभीरता से सोचना पड़ेगा। चाहे वह अरूणाचल प्रदेश का सवाल हो, चाहे दलाई लामा की तवांग, अरूणाचल प्रदेश की यात्रा हो या इस सदन में जो चर्चा में आया है कि ब्रह्मपुत्र पर चाइना द्वारा बांध बनाये जाने की बात हो या गुलाम कश्मीर पर कोई सवाल हो।

          सभापति महोदय, हमें याद है, हम लोग उस वक्त छोटे थे। 1962 की जब लड़ाई हुई थी, 1960 की मेरी पैदाइश है। लेकिन 1962 में जब भारत और चीन का वार हुआ था। उसके बाद या उसके पहले हम लोगों ने नारा सुना था - हिन्दी-चीनी भाई-भाई। लेकिन क्या कारण है कि अभी हाल में हम लोगों ने टी.वी. पर देखा और समाचार पत्रों में भी हम लोगों ने पढ़ा कि पिछले वर्ष से अब तक 223 बार चाइना की घुसपैठ हिंदुस्तान की सरजमीं पर हुई है, सीमा के अंदर हुई है। इस बारे में भी हमें बहुत गंभीरता से सोचना और देखना पड़ेगा। अभी आदरणीय जोशी जी ने बड़े विस्तार से इस बात को रखा। वह अपनी बात केवल इसलिए रख रहे थे कि जहां-जहां हमारी कमजोरियां और खामियां हैं, उनका हमें मूल्यांकन करना चाहिए और यदि कहीं हमारी कमजोरी या खामी है तो उसे हमें गंभीरता से लेना चाहिए। यह जोशी जी का मंतव्य था। उन्होंने आजादी के पहले से लेकर अब तक की बात बड़े विस्तार से कही। हमें उसे आलोचनात्मक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। जैसा श्री संदीप दीक्षित ने कहा कि हमें हतोत्साहित किया, हमें नर्वस किया, सेना को कमजोर बताया, ऐसी तमाम तरह की बातें उन्होंने कहीं। जबकि उनका नजरिया ठीक है, वह यूपीए की तरफ से बोल रहे थे। लेकिन मैं बड़े गंभीरता से आदरणीय जोशी जी को सुन रहा था। मैं भी इलाहाबाद का हूं और जोशी जी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं। वह अच्छे और एक वरिष्ठ नेता हैं। उन्होंने बड़े विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने सरकार की आलोचना की बात नहीं रखी। मैं उनका भाषण बहुत गंभीरता से सुन रहा था। लेकिन कहीं न कहीं विदेश मंत्री जी हमें आसियान शिखर सम्मेलन में भारत और चीन के प्रधान मंत्रियों के बीच क्या वार्ताएं हुई हैं और अभी जो समस्याएं हैं, उन पर क्या वार्ता हुई है। इसे भी आपको इस सदन मे विस्तार से बताना पड़ेगा।

          महोदय, जहां तक असम का सवाल है। असम में भी दिक्कतें थीं। वहां के मुख्य मंत्री, श्री तरुण गोगोई साहब ने प्रधान मंत्री जी से बड़े विस्तार से वार्ता की। अरूणाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री, श्री दोरजी खांडू साहब ने बड़े विस्तार के साथ प्रधान मंत्री जी को जानकारियां दी हैं।

          यह जानकारी आपको भी होगी, अगर वहां के स्थानीय मुख्यमंत्रियों ने चीन के बारे में कोई बात कही है या प्रधानमंत्री जी से बात की है। जहां तक ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की बात है, भारत में इसे ब्रह्मपुत्र नदी कहते हैं जब कि चीन में ह्वांगहो नदी कहते हैं जो तिब्बत में है। यह नदी तिब्बत में हिमालय की चोटियों से निकलकर बह रही है। यह नदी यू टर्न लेकर असम की तरफ जाती है। हमने टी.वी. पर देखा है, समाचार-पत्रों में पढ़ा है कि वहां बांध बन रहा है जबकि चीन दूसरी तरफ कह रहा है  कि इस प्रकार की कोई बात नहीं है। हमारा मानना है कि कहीं न कहीं कोई बात जरूर है। हमने पार्लियामेंट की लाइब्रेरी से भी मैटिरियल मंगाया है जिसपर मार्क करके बताया गया है जो रिमोट सैंसिंग एजैंसी की तरफ से तस्वीर आयी है, उस पर हमें गम्भीरता से सोचना पड़ेगा। अगर यह बात सत्य है कि वहां पर बांध बन रहा है तो हमें पानी नहीं मिलेगा। जब सूखे की स्थिति होगी तो चीन के सामने हाथ फैलायेंगे या फिर जब बांध खुलेगा तो थोड़ा बहुत पानी मिलेगा। दूसरी तरफ जब बाढ़ आयेगी, जब पानी ज्यादा हो जाता है तो उसे खोल दिया जाता है उससे हमारे जितने पूर्वोत्तर के राज्य हैं वे बाढ़ में डूबने की स्थिति में आ जायेंगे। अगर बांध टूटने की स्थिति में होगा तो पूर्वोत्तर राज्यों में तबाही आ जायेगी। इस पर हमें गम्भीरता से विचार करना होगा।

          सभापति जी, जहां ह्वांगहो नदी या ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की बात आ रही है, वहीं दूसरी तरफ उस पर  इलैक्ट्रो-हाईडिल प्रोजैक्ट लगाये जाने की बात भी आ रही है कि चीन इस पर 38 मिलियन येन खर्च कर 40मेगावाट बिजली पैदा करने की बात कर रहा है। मैं चाहूंगा कि माननीय विदेश मंत्री जी इस पर विस्तार से बतायें कि लगता है कि कहीं न कहीं कोई बात जरूर है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने जा रहा है या इलैक्ट्रो-हाइडिल प्रोजैक्ट बनाने जा रहा है।

          सभापति जी, जहां तक ऐसे तमाम सवालों को उठाया गया है कि चीन का कौन सा ऐसा खौफ है जिस वजह से वह ब्रह्मपुत्र पर बांध बना रहा है, घुसपैठ कर रहा है, अरुणाचल प्रदेश में दलाईलामा की यात्रा की बात है उन पर चीन को आपत्ति हुई है। इन सब प्रश्नों का विस्तार से सरकार को उत्तर देना होगा, तभी हिन्दुस्तान के लोगों का सीना गर्व से ऊंचा होगा, हमारी सेनाओं का सिर ऊपर उठेगा ।

          सभापति जी, 21 जून से लेकर अगस्त माह तक चीनी सेनाओं द्वारा दमचौक में सीमा उल्लंघन, जम्मू कश्मीर की सीमा लेह-लद्दाख से सीमा उल्लंघन की बराबर शिकायतें आती रही हैं। इन खबरों को हमने टी.वी. पर देखा और समाचार-पत्रों में पढ़ा भी है। चीन ने वहां की बंजर जमीन पर बद डिब्बों में भोजन बांटने का काम किया है। हमारे हिन्दुस्तान के लोगों को चाहे एक वक्त की रोटी मिले, वह खाता है लेकिन भूखे नहीं हैं। क्या चीन द्वारा इस प्रकार का कृत्य उचित है? हमें इस बात को संज्ञान में लेना पड़ेगा और इस पर गम्भीरता से विचार करना होगा।

          हमने समाचारपत्रों में भी आपका बयान देखा कि जो सीमा विवाद है, चाहे वह भारत-पाकिस्तान सीमा की बात हो, चाहे भारत-बांग्लादेश सीमा की बात हो, चाहे भारत-चाइना सीमा की बात हो, आपने बयान दिया कि सीमा विवाद के मामले में हमें समय लगेगा, इसे निबटाने में हमें थोड़ा समय लगेगा। अब तक तो हमें अपनी सीमा बांध लेनी चाहिए थी। यही बात जोशी जी कह रहे थे कि ये जो देश की सीमाएं हैं, उन्हें हमें बांध लेना चाहिए। हमें निर्धारित करना पड़ेगा और वहां सीमाओं पर अपनी फौज को रखकर वहां एक लाइन ऑफ एक्शन बनाना पड़ेगा और वहां अपनी फौज को चौकस रखना होगा। जहां तक दलाई लामा जी की यात्रा की बात है, वह हमारे अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक धर्म गुरू हैं। हमने पहले भी उन्हें संरक्षण दिया, उनका सम्मान किया, वे हमारे मेहमान थे। अमेरिका ने भी कहा कि दलाई लामा जी को कहीं भी जाने का पूरा अधिकार है। इस पर चाइना को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस पर बड़े जोरदार तरीके से आपको चाइना के सामने अपनी बात रखनी चाहिए। जहां अभी धर्म गुरू दलाई लामा जी की बात कही गयी, अगर हिन्दुस्तान के अंदर देखा जाए तो हमारे कई बौद्ध सर्किट हैं, चाहे वह बौद्धगया हो, सारनाथ हो, कौशाम्बी हो, लुम्बनी हो, श्रावस्ती हो, ये हमारे बौद्ध सर्किट हैं। यहां पर चाइना और इंडोनेशिया के तमाम धार्मिक लोग बराबर आते-जाते हैं। जैसा अभी जोशी जी ने कहा कि चाइना और हमारा पुराना संबंध था। उन्होंने भौतिक रूप से, आध्यात्मिक रूप से हर तरीके से बताया कि हमारा संबंध था। उनकी यात्रा के बारे में भी हमें बहुत जोरदार तरीके से कहना चाहिए। चीन को जो हमें बराबर धमकी मिल रही है, हमें वर्ष 1962 की बात को भी नहीं भूलना चाहिए। अगर कहीं सदन में यह बात आती है तो इस बात को हमें गंभीरता से लेना पड़ेगा। अभी तमाम सम्मानित सदस्यों के विचार यहां आएंगे। मैं विदेश मंत्री जी से चाहूंगा कि हमने जो बात कही, पाकिस्तान के बारे में, चाइना के संबंध के बारे में बात कही गयी। जुल्फिकार अली भुट्टो के समय में चाइना और पाकिस्तान का गुप्त परमाणु समझौता हुआ था। उस समय भी अमेरिका चुप था, अमेरिका कुछ नहीं बोला और आज भी हमें देखना पड़ेगा। यह ठीक है कि अमेरिका से हम संबंध बनायें। चाइना और अमेरिका, यही दो शक्तियां हैं, लेकिन कहीं न कहीं अपने देश के अस्तित्व का, अपने देश के गौरव, मान को बढ़ाने के लिए हमें जोरदार तरीके से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात रखनी पड़ेगी ताकि अन्य देश भी यह सोचें कि भारतवर्ष अपने पैरों पर खड़ा है और वह किसी से कमजोर नहीं है। मैं ज्यादा कुछ न कहते हुए अपनी बात समाप्त करूंगा। जब यह हरकत हुई है तो आपने चाइना की सीमा पर 20 चौकियां बनाने की बात कही है। चाहे वह लेह-लद्दाख की बात हो या अरूणाचल प्रदेश की बात हो, 20 नयी चौकियां स्थापित करने की बात कही गयी है। अगर कही कोई शक-सुबहा न होता तो 20 नयी चौकियां बनाने की बात आपकी तरफ से नहीं आनी चाहिए थी। कहीं न कहीं तो कोई बात है और आपको इस बात को सदन में रखना पड़ेगा। चाइना के तमाम इलेक्ट्रानिक सामान, खिलौनो आदि पर पाबंदी लगाने के बारे में हमने बड़े विस्तार से अपनी बात रखी थी। यह सामान कहीं न कहीं स्वास्थ्य की दृष्टि से, मैडिकली अगर उसे देखा जाए तो बच्चों के लिए वे खिलौने नुकसानदायक हैं, वह एक तरह से पॉयजनिस है। इन पर हमें बहुत कड़ाई से रोक लगानी पड़ेगी। इन्हीं बातों  के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

                           

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर): महोदय, आपने हमें बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं पहले इसकी हिस्टोरिकल बैक ग्राउंड में जाना चाहता हूं। जब भी कोई समस्या आती है ते उसके सिमटर्म्स को इग्नोर न किया जाए। मैं राजनीतिक विज्ञान का विद्यार्थी था।

          वर्ष 1957 में जब चाऊ इन लाई प्राइम मिनिस्टर थे, वे कहते थे कि हमारी सीमा निर्धारित कर दी जाए। किताबों में लिखा है और मैंने पढ़ा भी है कि उनकी तरफ से आया था कि मैकमोहन लाइन को ही मान लिया जाए। जो हिमालय रेंजर से व्हाइट लाइन आती है, उसे मानने के लिए वे तैयार थे। उस समय हमारे यहां जो नेतृत्व था, वह इन सब चीजों को इग्नोर कर रहा था। मैं बहुत श्रृद्धा से कहना चाहता हूं कि उस समय माननीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी थे। उन्हें चाइना और इंडिया बॉर्डर की चिंता नहीं थी, वे वर्ल्ड के शांतिदूत टीटो, ईजिप्ट के नासिर बनकर उस पर बात हुई, पंचशील और भाई-भाई कहते रहे, उनकी बात नहीं मानी। वर्ष 1962 में उन्होंने हम लोगों पर अचानक हमला कर दिया। उस समय तैयारी क्या थी, 1930 वाली थ्री-जीरो-थ्री की रायफल, जो 50 बुलेट लेकर अगर कोई पहाड़ पर, जाड़े में जाता था, तो वह चल नहीं पाती थी, जाम हो जाती थी। हमारे लायक दोस्ट दीक्षित जी इस समय अपनी बात कहकर चले गये, लगता है कि उन्हें जवाब सुनने का कॉफीडेंस नहीं था। माननीय जोशी जी ने यह नहीं कहा कि हमारी सेना कमजोर है। मैं आपको इतिहास याद दिलाना चाहता हूं कि जब हिन्दुस्तान आजाद नहीं था, द्वितीय विश्व युद्ध में ईजिप्ट में जो लड़ाई हुई, सबसे अच्छी लड़ाई इंडियन एलाइड फोर्सेज के साथ लड़ी और विक्टोरिया क्रास यहां आया। पाकिस्तान से लड़ाई हुई। हमारी जो गड़बड़ी है, नेतृत्व की गड़बड़ी है, सरकार की गड़बड़ी है, सरकार हारती है, भारत की सेना कभी नहीं हार सकती। आपने कैसे यह बात कह दी? वर्ल्ड में यह है कि इंडियन आर्मी की टक्कर की कोई आर्मी ही नहीं है। हम हारते सरकार से हैं। मैं फॉरेन कमेटी में भी मेंबर हूं और विदेश मंत्री जी का मैंने भाषण सुना है। आप कहते हैं कि रिलेशन बड़े कॉर्डियल हैं, बड़े अच्छे रिलेशन हैं, वे आपके प्रधानमंत्री के दौरे के लिए वीजा कहते हैं, कश्मीर वालों के लिए वीजा कहते हैं, हर चीज में नो और आप कहते हैं कि रिलेशन कॉर्डियल हैं। यह मैं समझ नहीं पाया हूं, हालांकि मैं पेशे से हाईकोर्ट का वकील हूं और बहुत ही काम्प्लीकेटिड समस्याओं को मैं समझ जाता हूं, लेकिन इसे मैं नहीं समझ पाया कि रिलेशन कॉर्डियल हैं, लेकिन वे आपकी मुसीबत किए हुए हैं। कॉर्डियल की परिभाषा क्या है? हमें याद है जब हिन्दुस्तान में ब्रिटिश राज था तो आजमगढ़ के एक वकील साहब ने एक जुमला लिख दिया, उस समय जर्मनी जीत रहा था और ब्रिटिश फोर्सेज हार रही थीं, कि कदम जर्मन के बढ़ते हैं और फतह ब्रितानिया की होती है और हमारी ब्रिटिश सरकार की बोल गयी कूकडूकू। मतलब कि उसमें जर्मन जीत रहे थे और चर्चिल साहब भाषण दे रहे थे कि हम लीड कर रहे हैं। हमारा कहना यह है कि, मैं नम्र निवेदन करता हूं, खासकर यह सौभाग्य है कि हमारी जो विदेश सचिव मैडम निरूपमा राय हैं, वे चाइना में बहुत दिन रही हैं, लोग कहते हैं, उस दिन हमने भी सुना कि उनका चाइना सब्जेक्ट है। पहले आप अपने देश को कॉफीडेंस में लीजिए, डर का भूत मत पालो। पूरे हिन्दुस्तान को मैं एज ए मेंबर ऑफ पार्लियामेंट बता रहा हूं, कि हम चाइनीज इश्यू को एवाइड कर रहे हैं। मैं आपने बता दूं फॉरेन रिलेशंस में, पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्ला देश, श्रीलंका, इनकी कोई परवाह नहीं है, ये बहुत छोटे-छोटे देश हैं। इन पर कोई ज्यादा फोकस करने की बात नहीं है, ये तो दाहिने और बांये हाथ के हमलों का काम है। अगर आपको कोई भी समस्या और खतरा है तो वह चाइना से है। आप कर क्या रहे हैं? जैसे हमारे विदेश राज्य मंत्री जी बहुत ही डैमोट्राइज ड्रेस में थे, वे चले गये, उन्होंने कह दिया कि सब बकवास है। फाइन अंग्रेजी बोलने से और बड़े मैनेरिज्म से काम नहीं चलेगा। उत्तर प्रदेश का बॉर्डर चाइना और नेपाल के बॉर्डर से मिल रहा है। मैं पूछना चाहता हूं कि भारत सरकार ने क्या सड़कों का जाल बिछाया है। बॉर्डर रोड कॉरपोरेशन में कहां तक उसकी तैयारी है? हमारी सेंट्रल एयर कमांड जो इलाहाबाद में है, उसकी क्या तैयारी है? 30 साल पहले जिस तरह के उखड़े-उखड़े हवाई जहाज, उखड़ी-उखड़ी हवाई पट्टी, वह अभी भी चल रही हैं। जैसे वे बोल रहे हैं कि हम बहुत बहादुर हैं, यह कहने से, पार्लियामेंट में शोर मचाने से हमारी बहादुरी की बात नहीं आ रही है। जैसे हमारे भाई शैलेन्द्र जी ने कहा कि आप उनका सामान क्यों आने देते हैं? आप देखिए कि दीपावली पर बाजार में 99 परसेंट सामान चाइना का आ रहा है।  

          हमारा दूसरा निवेदन यह है कि यह क्या बात है, जैसे बांध की बात आती है, सब अखबार कह रहे हैं कि पकड़ा गया चीन का झूठ। आज नेशनल डेली कह रहा है, उसमें लिखा है - “सेटेलाइट की तस्वीर खींचने से सफलता हासिल हुई, कि निर्माण बन रहा है।” पूरे नेशनल डेली में आया है, इसमें भारत सरकार का कोई खंडन नहीं आया है। जैसे मलेरिया बुखार आने के पहले जाड़ा लग रहा है और डाक्टर बता नहीं रहा है। आप बताइए कि प्रोबलम क्या है? जब हम लोग बता रहे हैं तो कहते हैं कि आप बिलकुल सही हैं। जब हम अस्पताल में आईसीयू में भर्ती हो जाएंगे तब क्या बताएंगे?

          सभापति महोदय, हमारे विदेश सचिव की बहुत बेहतरीन फोटो के साथ एक अखबार में निकला है। ये फोटो बहुत बढ़िया है, ये होशियार भी हैं। विदेश सचिव निरुपमा राव ने इस मामले में बुद्धवार को एक बार फिर से चीन को उसका भरोसा याद दिलाया। उन्होने कहा कि यह मामला चीन के साथ एक बार नहीं, बल्कि कई बार उठाया जा चुका है। थाईलैंड में प्रधान मंत्री, मनमोहन सिंह जी पिछले माह चीनी समकक्ष वान जियाबाओ से मुलाकात में ब्रह्मपुत्र पर बांध का मसला उठाया था। आप बांध के मसले की बात ही नहीं कर रहे हैं। जब पंडित जवाहरलाल नेहर जी प्रधान मंत्री थे तो नेपाल गवर्नमेंट ने कहा था कि कोसी में अपना बांध बनवा दीजिए और हमें बिजली दे दीजिए, लेकिन किसी ने उनकी बात को नहीं सुना, क्योंकि किसी ने सैक्रेटेरिएट में कह दिया कि इकोनोमिकल वायबल नहीं है। जब कोसी बांध टूट गया तो आधा पटना डूबने लगा। ये उस समय की गलतियां हैं।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि इसकी एक पुख्ता नीति बनाई जाए और उसमें देश एवं पार्लियामेंट को काँफिडेंस में लिया जाए। इग्नौर करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अगर आप उनकी बातों को इग्नौर करेंगे तो चाइनीज़ का क्या इरादा है, यह आप क्लियर नहीं समझ पाएंगे। चाइना का अमेरिकन मैगज़ीन इकनोमिक्स में लिखा हुआ है कि चाइना का एजेंडा बिलकुल इकोनोमिक है। वे समझते हैं कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजी बहुत अच्छी है। यहां का सोफ्टवेयर में वर्ल्ड में बिलियंस एंड बिलियंस डालर आता है। चीन चाहता है कि अगर हिन्दुस्तान को किसी तरह से अव्यवस्थित कर दिया जाए ताकि वह अपना इकोनोमिक झंडा लहरा सके। वह टेरेटरी नहीं चाहता। इसे आप समझ नहीं रहे और अगर समझ रहे हैं तो हमें बता नहीं रहे, या आप घबरा रहे हैं। हमारे विदेश मंत्री जी बड़े स्मार्ट हैं, वे बहुत चमकते हैं। मैं चाहता हूं कि वे हम लोगों को भी कॉफीडेंस में लेकर ये बात बताएं और एक दूरगामी नीति बताएं। ये फायर ब्रिगेड वाली टैक्नोलॉजी न बताएं कि जब आग लगी तो घंटा बजा कर दौड़ गए और तब चाइना एवं अमेरिका से बात की। हमें बड़ा अच्छा लगा, अभी जब मनमोहन सिंह जी, हमारे प्रधान मंत्री यूएसएसआर गए और वहां उन्होंने जो एग्रीमेंट्स किए। आप देख लीजिए कि अब चाइना की पाकिस्तान से न्यूक्लियर में सौ प्रतिशत सांठ-गांठ हो गई। ये सब सिमटम्स हैं। सभापति महोदय, मैं आपकी इजाज़त से रिपीट कर रहा हैं कि यह उसी तरह है, जैसे मलेरिया बुखार आने से पहले जाड़ा लगता है तो जाड़ा लग रहा है, लेकिन ये समझ नहीं रहे हैं। ...( व्यवधान)

          सभापति महोदय, संदीप दीक्षित जी दिल्ली से सांसद हैं, उन्हें चाइना से क्या मतलब है। वे मुख्य मंत्री के लड़के हैं और उनकी बगल में दूसरे मुख्य मंत्री के लड़के हैं। ये अभी जो प्रोटेक्टेड नयी क्लास पोलिटिक्स में आई है, उनसे काम चलने वाला नहीं है। चाइनीज़ पॉलिसी में एक पोजिटिव पॉलिसी, प्रेगमेटिक पॉलिसी ली जाए और उस पॉलिसी में देशभर में जो सब लोग घबरा रहे हैं, देश में यह इप्रेशन है कि चाइना से हम डर रहे हैं, साफ-साफ बात नहीं कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारे विदेश मंत्री हाउस को काँफीडेंस में लें।...( व्यवधान)

श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा (रोहतक):ये जिस तरह की टिप्पणी कर रहे हैं,...( व्यवधान)

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर):हम आपकी तारीफ कर रहे हैं।...( व्यवधान)

श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा : जिस प्रकार की टिप्पणी की गई है, ...( व्यवधान) चाइना और हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा फर्क यह है कि हिन्दुस्तान में ज्यादा युवा हैं।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN (SHRI FRANCISCO COSME SARDINHA): Shri  Deepender Singh Hooda, please sit down.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Shri Vijay Bahadur Singh, you please continue.

श्री विजय बहादुर सिंह :  मैं आपको बता दूं कि अगर आपने लिट्रेचर पढ़ा हो,...( व्यवधान)

 वर्ड्स वर्थ ने कहा MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please do not try to manage. In fact, you are disturbing the House.

श्री विजय बहादुर सिंह :  माननीय सदस्य को मैं बता दूं कि वर्ड्स वर्थ ने कहा - “The child is father of the man.”  अगर मेरा लड़का इसी तरह चमके तो मैं बहुत खुश होऊंगा।

          सभापति जी, इसमें कोई बात नहीं है। यह तो गर्व की बात है और सिविलिएशन तभी एडवांस होगा, जब लड़का अपने फादर से एक्सैल करे। मैं यह कहना चाहता हूं ...( व्यवधान) ये जो समझें। I can only give wordings, but not understanding. I can give my words, but understanding is yours.

          सभापति जी, मैं आपके माध्यम से सिर्फ एक मिनट में अपनी बात कहकर कन्क्लूड करना चाहता हूं कि भारत सरकार और विदेश मंत्री पार्लियामेंट को कॉन्फीडेंस में लें और ठोस पोजीशन रखें, नहीं तो चायना की तरफ से खतरे की घंटी बज रही है और यह उसी तरह बज रही है, जैसी सन् 1957 में बजी थी और तब चाऊ-एन-लाई, वर्ष 1962 में आ गए और पं. जवाहर लाल नेहरू दो साल बाद चले गए। उस समय रक्षा मंत्री, श्री कृष्णा मेनन जी थे। मेरे कहने का मतलब यह है कि चीन के संबंध में पॉजीटिव एंड सॉलिड स्टेंड लिया जाए। इन्हीं शब्दों के साथ, एक बार मैं पुनः आपको समय देने के लिए धन्यवाद देता हूं।

                                                                                                     

श्री जगदीश शर्मा (जहानाबाद):सभापति महोदय, भारत-चीन संबंधों के बारे में चर्चा पर आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। यह विषय अति संवेदनशील, अहम् और बड़े ही महत्व का है। आज देश की सबसे बड़ी पंचायत में, हम इस विषय पर बहस कर रहे हैं। आज यह विषय सदन में किसी पक्ष या विपक्ष का विषय नहीं, बल्कि यह विषय देश की एकता, अखंडता और सप्रभुता से संबंध रखता है। हम, देश में अनेक धर्म, विचार, जाति और सप्रदायों से आते हैं, लेकिन इस विषय पर, पूरा देश, सभी वर्ग, सभी धर्मों के लोग एकजुट हैं कि देश की एकता, अखंडता और सप्रभुता पर किसी प्रकार से आंच नहीं आने देंगे।

          महोदय, आज हम चाहे विपक्ष में हों या सरकार में, हमें इस बात को ध्यान रखना पड़ेगा कि भारत दुनिया में अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। हमारी सांस्कृतिक विरासत, विश्वमैत्री और आपसी भाईचारे की है। हमारा नारा वसुधैव कुटुम्बकम का है। हम पूरे विश्व को अपना कुटुम्ब मानते हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर हमारी विदेश नीति के अनुसार बौद्धों के सबसे बड़े गुरू दलाई लामा को भारत में राजनीतिक संरक्षण दिया गया।

          महोदय, जब धर्म गुरू, दलाई लामा, हमारे देश के तवांग हिस्से में जाते हैं, तो चीन की तरफ से आपत्ति जताई जाती है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हम देश में कहीं मूमेंट करें या कहीं जाएं उसमें चीन को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग और अभिन्न प्रदेश है। इस पर किसी को भी कुछ बोलने का अधिकार नहीं है। हम तनाव नहीं चाहते हैं, हम युद्ध नहीं चाहते हैं। भारत शांति के साथ रहना चाहता है। पं. जवाहर लाल नेहरू ने उस समय हिन्दी चीनी भाई-भाई का नारा दिया। मैं उसे गलत नहीं मानता। नेहरू जी बहुत बड़े विचारक थे।    

          वे पूरी दुनिया को एक भाई की तरह समझ रहे थे और उन्होंने उसी की कल्पना की थी, लेकिन हमारे साथ 1962 में धोखा हुआ। भारत पर आक्रमण हुआ। मैं आपके माध्यम से सदन को बताना चाहता हूं कि आज दुनिया में दो देश, चीन और भारत सामरिक क्षेत्र और आर्थिक क्षेत्र में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

          आज हम आपको एक उदाहरण देना चाहते हैं कि जो म्यांमार है, बर्मा है या दूसरे पड़ोसी देश हैं, वहां से आज भारत में बहुत बड़े पैमाने पर नशीली दवाओं की खेप आ रही है और हमारी जो आने वाली पीढ़ी है, छात्र और युवक-युवतियां हैं, आज नशीले पदार्थों के जाल में उनको फंसाया जा रहा है। हम सदन के माध्यम से सरकार को आगाह करना चाहते हैं कि आप बोर्डर को सील करिये और इस तरह की जो गलत गतिविधियां हैं, उन गतिविधियों को रोकने में आप मदद करिये।

          जो चीन की अर्थव्यवस्था है, आज उस अर्थव्यवस्था में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। चीन का जो सकल घरेलू उत्पाद है, उसमें खेती की भागीदारी मात्र 11 परसेंट की है, सेवा क्षेत्र की भागीदारी 40 परसेंट है और उद्योग क्षेत्र की भागीदारी 49 परसेंट है। इससे जाहिर होता है कि जो चीन का विकास हो रहा है, वह औद्योगिक क्षेत्र में विकास के कारण हो रहा है। भारत में जो उनका सामान आ रहा है, वह तीन गुना आ रहा है और चीन में जो हमारा निर्यात है, वह एक गुना है, यानि अधिक माल चाइनीज़ माल भारत में आ रहा है। जो उनका औद्योगिक उत्पादन वहां बढ़ रहा है, उसमें पूंजी हमारी है, रुपया हमारे यहां से चीन में जा रहा है और उनका उद्योग बढ़ रहा है, जिसके चलते उनकी अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। भारत से जो उनको निर्यात का प्रतिशत है, भारत का जो माल चीन जा रहा है, वह केवल एक प्रतिशत है। हम सरकार को कहना चाहते हैं, आपके माध्यम से निवेदन करना चाहते हैं, विदेश मंत्री जी होशियार आदमी हैं, जानकार आदमी हैं, इनको चीन को बताना चाहिए कि आप सीमा विवाद जल्दी सुलझाइये। आपकी आपकी आर्थिक तरक्की की कुंजी हिन्दुस्तान के पास है। अगर आप यह नहीं करियेगा तो हिन्दुस्तान आपको इसमें मदद नहीं करेगा।

          हम बताना चाहते हैं कि चीनी व्यापारी जो भारत में आ रहे हैं, वर्ष 2004 में इनकी संख्या 15,979 थी, जो व्यापार करने के लिए चीनी भारत में आ रहे हैं।  2008 में यह संख्या बढ़कर 58,658 हो गई, यानि व्यापार के क्षेत्र में चीनी कब्जा हिन्दुस्तान में हो रहा है। यह बता रहा है कि चार साल में चार गुना व्यापारियों की वृद्धि हुई। हम बताना चाहते हैं कि जो हमारा सीमा क्षेत्र है, उसमें जो अतिक्रमण की स्थिति है, जो बार-बार बात आ रही है, हम विदेश मंत्री जी को बधाई देना चाहते हैं, उनको कहना चाहते हैं कि उन्होंने एक रिपोर्ट दी कि नहीं, सीमा पर शान्ति है। यह उन्होंने ठीक कहा। इनका प्रैस में बयान आया कि सीमा पर शान्ति है। यह इनको कहना चाहिए, ताकि देश उत्तेजना में नहीं आये। इनका यह बयान ठीक है, लेकिन जो सच्चाई है, उस सच्चाई से हमको विमुख भी नहीं होना चाहिए। जो सच्चाई है, उस सच्चाई का हमको बिल्कुल पूरी हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए। मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि 1962 में चीन ने भारत की 38,059  स्क्वायर किलोमीटर भूमि पर कब्जा किया।

          जम्मू-कश्मीर में, वर्ष 1947-48 में जमीन हड़पी गयी पाक अधिकृत कश्मीर में - 5120 स्कवायर किलोमीटर, जिसे पाकिस्तान ने हथियाया था। वर्ष 1963 में पाकिस्तान और चीन के बीच एक समझौता हुआ और यह जमीन चीन को हस्तांतरित कर दी गयी। यह भारत की भूमि है। यह देश मजबूत देश है। हम किसी  भी दल में हों, किसी विचार के हों, यह लोकतांत्रिक देश है, अनेक दल हैं, अनेक विचार के लोग हैं, लेकिन देश की एकता के नाम पर सारी पार्टियां एक हैं, हमारा देश एक रहेगा, अखण्ड रहेगा और उसकी सप्रभुता पर कोई आंच नहीं आए, इसके लिए हर दल के लोग सरकार के साथ हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि सरकार एक बुलंदी के साथ, मजबूती के साथ अपनी बात रखें। अखबारों में रिपोर्ट आई प्रधानमंत्री जी की, उसमें कहा गया कि सीमा विवाद हल करने में समय लगेगा। ठीक है, समय लगना है, लेकिन अनंतकाल तक सीमा विवाद को हम छोड़ नहीं सकते हैं। हमारे देश को तरक्की करनी है। मैं कहना चाहता  हूं कि हिन्दुस्तान के सभी दल आपके साथ हैं, आप मजबूती के साथ बढ़ें। चूंकि चाइना की आर्थिक कुंजी आपके पास है, आप इस बात को पूरे दबाव को साथ रखिए, हमारी जो भूमि हड़पी गयी है, उसे वापस दिलवाइए और सीमा विवाद को हल कीजिए।

 

SHRI KHAGEN DAS (TRIPURA WEST): Mr. Chairman, Sir, while participating in the discussion on the Indo-China relations, at the outset, I would like to say that I am happy to share my views regarding Indo-China relationship and the way forward.  As the world moves into the 21st century, a few other relationships hold greater significance for the future of mankind than the relationship between our country and China.  We are growing economically, militarily and technologically.  We are both populous countries with many poor people struggling to eke out a living.  We have both suffered in the past from savagery rule.  India shares a long border with China.  We have many common family values.  As we are poised today, we have the opportunity to grow together in harmony with each other, or become mired in mutual suspicion to the detriment of both.  We owe it to our people to address this issue delicately and with full understanding of where we are heading. If we succeed in steering ourselves to the right way, we will have prosperity for long time to last.  If we fail in managing our relationship, well, we will leave our future generations a legacy of anxiety and uncertainty.  I believe that the current policy of China, of Government of India is in the right direction.  The Panchsheel policy is relevant for our future. 

          We must grow peacefully with mutual respect and tolerance towards each other. We have our boundary problems. We must resolve to address these problems peacefully, sensitive to the concern of each other. All along it is our stand that the border problem should be resolved amicably across the table.… (Interruptions) I am taking our political stand.

MR. CHAIRMAN : Please address the Chair.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: He has got every right to speak. Hon. Members, do not disrupt him.

          You have every right to speak. Please continue.

SHRI KHAGEN DAS : I would also like to mention that Arunachal Pradesh and Sikkim are an integral part of India. Regarding Tibet, we are in the same stand with the Government of India that Tibet is a part of China. It is clear.

          Having said this, I must admit my concern that many forces are working in the world today, trying to steer India-China relationship away from our mind with mutual suspicion. In doing so, these countries are guarding their own self-interest.  We have to be careful that we must not be misled to abandon our policy on false beliefs and propaganda. The world is changing and many in the world are not keen for these changes to occur. They will try in their powers to limit the change. We must guard against this.

          There are three reasons I wish to emphasise today on why we should strengthen our relationship with China. First is that we have a long history of positive mutual exchange with China. Second is that we have much to share with each other that will benefit citizens of both the countries. And third is that our relationship can have significant effect on political stability of the world as a whole.

          The historical exchanges between our two countries were peaceful. Fahien and Huen Tsang were early Chinese scholars who visited India in the fourth and seventh century AD respectively.

          The post-colonial experiences between the two countries were strained culminating in the border dispute of 1962.  However, it goes to the credit of political leadership of both the countries that we have managed our relationship with sensitivity and the border dispute has not exacerbated nor difficult differences limited our economic growth. Politically, we have traversed different paths. It is true but both have succeeded in improving the lots of their citizens. Today, the world recognizes the economic might of both the countries—a testimony to the fact that we have respected the space for each to grow.

          China and India have also much to share and learn from each other. Firstly, we are both growing in intellectual and technological capabilities. Secondly, we are hungry for new knowledge. Thirdly, we are modernising and adopting new values. Fourthly, we believe in a world of diversity, of fundamental human rights and the rule of law. In essence, we two countries are passing through close to each other. 

          In the late  ’90s, the former External Affairs Minister, Mr. Vajpayee Ji, late Rajiv Gandhi, the then Prime Minister visited China and Mr. Manmohan Singh, our Prime Minister met Chinese Prime Minister and had bilateral discussion beneficial to both the countries.

As we have seen in recent decades mutual economic cooperation such as EU and ASEANS creates a win-win situation for all partners. We should have courage to visualise such relationship with China. The economy of the world could undergo a titanic shift if trade relationship between India and China is scaled up to its full potential.

Our relationship also holds the key to political stability of the world. Together with the Soviet Union, India and China can constitute a powerful stabilising force for the world. The three countries account for two out of every five persons in the world and one square inch of land out of every five. The current unipolar world with all its attendant problems will be better off with a multipolar one. Asia will again rise to dominance and just like we have done in the past, contribute to growth and development through peaceful contributions.

It should not be difficult to understand why existing political powers in the world may not be very keen for India and China to join hands. China and India relationship be seen as an opportunity and not a threat. Yes, history has provided us with a rear window of opportunity to play out our role in the new world order. We can secure happiness and prosperity of our future generations by this simple choice and India should do everything in its power to strengthen ties with China. Thank you… (Interruptions)

 

What Shri Atal Behari Vajpayeeji once said you may please recollect. Do not interrupt. 

MR. CHAIRMAN : No more. Please sit down.

          Hon. Member, B. Mahtab.

 

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, I stand here to participate in the debate on the India-China relations.

MR. CHAIRMAN: Shri Mahtab, you will get eight minutes. Please try to restrict within that time.

SHRI B. MAHTAB : I would not like to participate, Sir. There is no point.

MR. CHAIRMAN: Eight minutes you are getting.

SHRI B. MAHTAB : I would like to put it on record. I gave a notice since the beginning of this Session.

MR. CHAIRMAN: You did not follow. The time is divided among Parties.          We will have to conclude.

SHRI B. MAHTAB : I know that we have to conclude by 5.30 p.m. and there is an important Memorial Lecture. But please give time. Otherwise, there is no point.

SHRI BISHNU PADA RAY (ANDAMAN & NICOBAR ISLANDS): This is an important debate. Please continue tomorrow also.

MR. CHAIRMAN: Please do not waste his time. Shri Mahtab, you may start, please.

SHRI B. MAHTAB : Rhetorical statements and ground realities indicate growing tensions between these two countries, two Asian giants. We have deployed Sukhois in the northeast. We are building roads to strategic positions - as far I remember, around twenty. And we are aware that more than 270 border incursions have taken place by Chinese army.

We have stopped persons traveling from China on business visa because they were manipulating it. They were skilled labourers and working here. In retaliation to that or not, I do not know, Chinese Government are now sticking a paper to the citizens of this country who hail from Jammu and Kashmir to which our Government has objected and are not allowing them to travel to China, specially the students. We understand that people who hail from Arunachal Pradesh are citizens of this country. In that respect the Chinese Government or China had its view and it is a very old view.

The attempt that has been made or is being made is by denying the regular visa on Indian passport to Indian citizens. I am yet to understand what steps the Government is taking to mitigate that problem. When a slip is being provided to an Indian citizen, our customs people are not allowing them to travel. That is all. But, is this the answer? I would like to get a categorical answer from the Government. How has this come? I would congratulate the media, specially the print media who first brought it to the knowledge of this nation. It was not a reaction of the Government. It was the media who brought it to the knowledge of all of us. What was the immediate reaction? I would like the Government to recollect. I need not delve more on this.

          I would say – there are three-four major issues which need to be discussed. The first major issue is the border problem. History tells us that since Alexander’s time wars have been fought because of borders. We had fought a war with China because of border dispute. But was it not in 1951 when Chinese Army went into Tibet and for three years the then Prime Minister who was in charge of the Ministry of Foreign Affairs and his advisers confabulated or interacted with the Chinese Government? Subsequently, in 1954, we made an agreement and accepted Tibet as an integral part of China. China was not our neighbour in 1947 when we got Independence. China went into Tibet in 1951. On what condition did we accept Tibet as an integral part of China in 1954? This Parliament was not allowed to share that information.

          A number of books have come out, research papers are out and it is in public domain. I am not saying something new. Perhaps, the Government of India was given to understand that the line that was drawn after the first World War, which is normally called the McMahon Line, will be accepted by China. I am reminded, I think many people who have interest about India-China relationship will remember. It is not Indo-China; it is India-China relationship. We remember the Press Conference which the then Premier of China had made around midnight in Delhi in 1960. He came out with a statement, with a suggestion, here in the heart of Delhi in 1960 saying China will accept North-Eastern Frontier Agency as an integral part of India provided we give away or we will not claim our position on Aksai Chin.

          There are different views on this that, perhaps, the then Premier of China ventured into this type of Press Conference because of Pandit Jawaharlal Nehru’s suggestion.

          I do not want to go into that debate, but the pressure that was built up in our country – within the Ministry and in this Parliament – dissuaded the then Government and the Prime Minister not to adhere to that type of suggestion, and what happened? After two years, we faced the Chinese troops. We were humiliated. Aksai Chin was gone. Even today in 2009, Arunachal Pradesh is being treated as a disputed territory. In the fifties, China did not have that much of interest relating to Pakistan because Pakistan was a member of SEATO and was totally controlled by the western powers.

          Mr. Chairman, you will ask me that I belong to a regional party and still why I am delving into the foreign affairs. I am a citizen of this country and I have an interest because I belong to a State which is on the coast.

          I was talking about Pakistan. Since 1950 and after 1962, things have changed. The neutrality of the USA in 1962 war encouraged China to put in more importance to Pakistan. The world knows today that the Godfather of Pakistan’s nuclear ammunition is China. The annexation of Aksai Chin is a way to help China reach the Arabian Sea.

          Today in the changed circumstances when Afghanistan is being impounded and in certain western parts of Pakistan or at the Pakistan-Afghanistan border America is going in a very big military way, China has again started playing mischief. We should be conscious of it. In that respect, I would say that when for the last three or four years Pakistan was not interested to take up Kashmir issue in the international fora, now China has ventured in. I would like to get a categorical answer from the Government. I am sure, the Minister and the Government are aware of this.

          These are certain diplomatic things which need not be spelt out openly. I am reminded of a friend who once asked me : “How can you distinguish an Indian from a Chinese? All Chinese look alike, but Indians do not.” Persons from various parts of the country - Jammu and Kashmir, Kashmir Valley, Leh, Arunachal Pradesh, Tamil Nadu or Andaman and Nicobar Islands – are all different. We speak a number of languages and we belong to different religions. That is not the case with China. China is a totalitarian regime and we have a democratic system. We should also be aware that China not only indulges into the domestic affairs of India but also influences many other countries’ domestic affairs.

I would say, yet the United States has a greater role to play. But there is a change of stand today. We should remember what had happened in 2005, what had happened in 2007 and what is happening in 2009 – the three strategic years. George W. Bush had come to India. We have developed a strategic partnership with the USA. The axis or the allies that George W. Bush wanted to develop was between India, Japan and the US. Another axis was Australia with Japan, India and the United States. It means a quadruplet, triplet and another triplet.

16.00 hrs.                        (Shri Basu Deb Acharia in the Chair)           But what is happening today? What message did we get after President Obama’s visit? It was that friendship with India will not be at the expense of China. This message is very clear. Nobody will have friendship with us if we always demonstrate our weaknesses. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Hon. Member, please conclude now.

SHRI B. MAHTAB : India is growing economically and strategically. India has a greater role to play in the Indian Ocean.

          I am reminded about the “string of pearls” that the Pentagon had mentioned in 2004. It was the string of pearls around India, the country of ours. To this, our Naval Chief in the beginning of this year had very categorically mentioned that all these strings led to China. What do you mean by this? … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please wind up your speech now.

… (Interruptions)

SHRI B. MAHTAB : What do you mean by this? Admiral Suresh Mehta said that : “Each pearl in the string is a link in a chain of the Chinese maritime presence.” What are we doing about it?

          We have always inculcated good neighbourly relationships with all our neighbours including Myanmar. We want to safeguard our maritime areas, especially, with African and Arab countries, and even in the South East. We are also trying to make our presence felt. I would not go into the strategic steps that have been taken here, but I would say … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please conclude now. There are 13 more speakers who wish to speak on this issue, and the debate also has to be concluded by 1730 hours.

… (Interruptions)

SHRI B. MAHTAB : I look at the problems or look at the issues in this respect even as India and China seek to progress. There will be greater competition for resources, markets and influence; cooperation will remain an ideal, and both would want to avoid confrontation or worse conflict; let us not forget that China has endeavoured to restrict India’s influence to its borders; China has repeatedly reminded our neighbours that India has hegemonistic tendencies; and China has godfathered Pakistan’s India-specific nuclear and missile capabilities.

          We are aware what China is today. It is best to accept the India-China reality, and we should fashion our responses accordingly. The Chinese are never tired of proclaiming the new century as the century of Asia. Can the century of Asia prosper and grow if India and China are at loggerheads? … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Mr. Mahtab, please take your seat. You have already spoken for more than 16 minutes. Please conclude now.

… (Interruptions)

SHRI B. MAHTAB : I would conclude by saying this. There are two or three issues before us today.

Both India and China have common stakes and common interests in maintaining peace in Asia to achieve economic growth with social equality. Therefore, a new phraseology has been coined and that is called ‘Cold Peace’. I hope the Minister understands it. It is not ‘Cold War’ anymore; it is ‘Cold Peace’. It means ‘Cold War’ is gone; in ‘Cold Peace’, conflicts exist, but the mechanism of a dialogue is accepted by both the countries for resolving the bilateral disputes. On this aspect, Sino-India visa controversy and J&K is to be looked into. On the discussion that we are having today, the recent occurrences that were supposed to be mentioned today, we would like to get a categorical answer from the Minister on this aspect.

                                                                                                   

(Interruptions)* MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record, except the speech of Shri Anant Gangaram Geete.

          Those hon. Members who want to lay their written speeches can do so.

       

*Not recorded.

 

श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़):  सभापति जी, नियम 193 के अन्तर्गत भारत-चीन संबंधों के बारे में हम लोग चर्चा कर रहे हैं। जब भी हम चर्चा करते हैं तो सब से पहले विदेश नीति पर चर्चा होती है। यह सरकार की हमेशा से नीति रही है कि जो भी हमारे पड़ोसी देश हैं, उनके साथ दोस्ताना संबंध रहें। आज दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे जितने पड़ोसी देश हैं, चाहे वह चीन है, पाकिस्तान है, बांगला देश है या श्रीलंका है, हमारे रिश्ते इन देशों साथ अच्छे नहीं हैं। इसलिये मुझे यह कहने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है कि अगर हमें किसी से खतरा है तो वह पड़ोसी देशों से है। तब सवाल उठता है कि जिस तरह की विदेश नीति हम सालों से निभाते आ रहे हैं, उस पर हमें एक बार फिर से विचार करना पड़ेगा कि हमारी विदेश नीति में हम कितने सफल अथवा असफल रहे हैं?

          सभापति जी, जब इस देश की सुरक्षा का सवाल आता है तो भले ही हम अलग अलग दलों से हों, अलग अलग विचारधारा वाले दल हों लेकिन जब राष्ट्र की सुरक्षा का मामला आता है तो हम अपने राजनैतिक मतभेदों को भुलाकर देश की सुरक्षा के लिए, राष्ट्र के हित में एक हो जाते हैं । यही हमारा इतिहास रहा है, भविष्य में भी यही रहेगा, इसमें कोई दो राय नहीं हैं । जब डा. मुरली मनोहर जोशी के बाद सत्ता पक्ष से श्री संदीप दीक्षित बोलने के लिये खड़े हुये तो वह जिस ढंग से बोल रहे थे, हमें लग रहा था कि कहीं वह चीन की वकालत तो नहीं कर रहे हैं ? तब उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि इस देश को किसी से खतरा नहीं है, तब हम सोच रहे थे कि जब तक इस देश में संदीप जी हैं, हमारे देश को कोई खतरा नहीं होगा ।

          महोदय, जब हमने इस बात को यहां रखा है कि राष्ट्र के हित में हम सब एक हैं। चाहे हमारे राजनीतिक मतभेद कितने भी हों, लेकिन राष्ट्र के हित में हम सब एक हैं। उसके कई उदाहरण हैं। चाहे वर्ष 1962 का हमला हो, जब चीन ने हम पर आक्रमण किया।

          महोदय, जब भी इस देश पर आक्रमण हुआ है, सारा भारतवर्ष एक रहा है। इस सदन में भी हमने एकता से हर आक्रमण का मुकाबला किया है। सदन के बाहर देश की तमाम जनता ने एकता से पूरे देश पर हुए सारे आक्रमणों का मुकाबला किया है, चाहे वह हमला चीन से हो, चाहे वह हमला पाकिस्तान से हो। जो भी आक्रमण इस देश पर हुए हैं, उन सबका सामना हमने मिलकर किया है। उसका आखिरी उदाहरण कारगिल युद्ध है। जब कारगिल युद्ध हुआ, उस समय एनडीए सत्ता में थी और यूपीए विपक्ष में यहां पर थी। सरकार के द्वारा जो निर्णय किये गये, उस समय सारे मतभेदों को अलग रखते हुए, सारा देश उस कारगिल के युद्ध में भी एक रहा।

          महोदय, कई दिनों से जो खबरें आ रही हैं, वे खबरें हमारी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। जब हमने इस खबर को अखबार में पढ़ा कि हम लद्दाख में सड़क बना रहे हैं, जिसे रोकने का काम चीन ने किया। सड़क हम अपने देश में, अपनी धरती पर बना रहे हैं, लेकिन चाइना हमें सड़क नहीं बनाने दे रहा है। चाइना की ओर से बार-बार यह कहा जाता है कि अरूणाचल प्रदेश हमारा है। इस सदन में इस बात को प्रधानमंत्री जी ने भी कहा है कि अरूणाचल इस देश का एक अविभाज्य अंग है। मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि अरूणाचल सीमावर्ती प्रदेश है। एक हजार किलोमीटर की सीमा चाइना से लगी है और सबसे अधिक खतरा इस देश को वहीं से दिखाई देता है। अरूणाचल प्रदेश की सीमा की ओर, सुरक्षा की दृष्टि से अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। उस प्रदेश की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। सौभाग्य है कि अरूणाचल प्रदेश के जो लोग हैं, जो हमारे भारतीय हैं, जितने हम अपने आपको भारतीय मानते हैं, उतने ही वे भी अपने आप को भारतीय मानते हैं। इसलिए वह प्रदेश आज हमें सुरक्षित लगता है, लेकिन भविष्य में निश्चित रूप से खतरा चाइना की ओर से इस देश को है। हमें इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

          महोदय, जब वर्ष 1962 में हम पर चीन ने आक्रमण किया था, हम छोटे थे और हमारी उम्र 11-12 वर्ष के करीब थी। तब हमारे देश में टीवी नहीं था, दूरदर्शन नहीं था, लेकिन अखबारों में खबरें आती थीं। उस समय के हमारे पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और उस समय के चाइना के राष्ट्राध्यक्ष चाऊ एन लाई की मित्रता के कई फोटो हमने उस समय अखबारों में देखे थे, उनके बारे में अखबारों में पढ़ा था। हिन्दी-चीनी, भाई-भाई का नारा दिया था। 

          सभापति जी, मैं प्रादेशिक पार्टी का सदस्य हूं और ये राष्ट्रीय पार्टी के सदस्य हैं, लेकिन इनसे ज्यादा चिन्ता हमें अपने राष्ट्र की और राष्ट्र की सुरक्षा की है। सबसे अधिक चिन्ता महाराष्ट्र को है। महाराष्ट्र ने जितना योगदान राष्ट्र की आजादी में दिया है, आप जो बोल रहे हैं, आप अपने गरिबान में झांक कर देखें कि आपका उसमें कितना योगदान है।...( व्यवधान)

          सन् 1962 में हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे लगाए गए और चार दिन के बाद हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा कहां गायब हुआ, मालूम नहीं। हमारे देश पर आक्रमण हुआ, आज भी हजारों किलोमीटर हमारा प्रदेश चीन के कब्जे में है। यहां विदेश मंत्री जी उपस्थित हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि हमें मित्रता रखनी चाहिए, दोस्ती होनी चाहिए, पड़ौसी से अच्छा रिश्ता होना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पड़ौसी हमें कमजोर समझे, हमें असहाय मानें। हमें पड़ौसियों को यह दिखाने की आवश्यकता है, भले ही आज तक हिन्दुस्तान में...( व्यवधान)

सभापति महोदय : गीते जी, आपका समय समाप्त हो गया है, अब आप एक मिनट में अपना भाषण समाप्त करिए।

श्री अनंत गंगाराम गीते : सभापति जी, मैं अपना भाषण समाप्त कर रहा हूं। ...( व्यवधान) मेरा आधा समय तो टोका-टोकी में गया।

          सभापति महोदय, इस भारत पर आज तक कई आक्रमण हुए हैं, लेकिन हिन्दुस्तान ने किसी पर भी आज तक आक्रमण नहीं किया। जो भी हुए, हम पर आक्रमण किए, हमने बचाव का काम किया है। हमने डिफेंस का काम किया है, आक्रमण नहीं किया है। हमारी भलाई और अच्छेपन को दुर्भाग्य से कमजोरी माना जाता है, इसलिए यदि चीन अरुणाचल पर अपना हक जताना चाहता है तो हमें सरकार की ओर से चीन को इशारा देना चाहिए, जो हजारों किलोमीटर की जमीन पर चीन ने कब्जा किया हुआ है, वह हमें वापस मिलनी चाहिए, यह हमारी मांग है।

          सभापति महोदय, आज दुर्भाग्य से अमेरिका भी चीन से डरने लगा है। जो अपने आपको महासत्ता मानती है, वह महासत्ता भी आज चीन से डर रही है। पिछले दिनों ओबामा ने जो बयान दिए हैं, वे कह रहे हैं कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। इसके बाद उनका एक बयान और आया, उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का जो विवाद है, इसके अंदर अगर किसी को मध्यस्थता करनी है तो सबसे अच्छी मध्यस्थता चीन कर सकता है। ये जो खतरे की घंटी है,...( व्यवधान)

सभापति महोदय: गीते जी, अब आप बैठ जाइए।

श्री अनंत गंगाराम गीते : सभापति महोदय, यह हमारे देश के सामने खतरे की घंटी है और इसलिए हमारा जो मित्रता का नाता और मित्रता के संबंध हैं, वह संबंध कमजोरी का नहीं, बराबरी का होना चाहिए और वही हमारी विदेश नीति में महसूस होना चाहिए। धन्यवाद।...( व्यवधान)

                                                                                                     

*श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): महोदय, भारत-चीन संबंधों पर चर्चा के संबंध में निम्नांकित वक्तव्य ले करना चाहता हूं।

1.       चीन के आर्थिक आक्रमण का मुकाबला करने के लिए भारत की आयात निर्यात नीति की समीक्षा         निरंतर करने रहना चाहिये।

2.       चीन का घुसपैठ भारत की सीमा पर बढ़ा है, इसका मुकाबला दृढ़ नजरिये से करना चाहिये।          लचीला नजरिया देश को कमजोर कर सकता है।

3.       जम्मू-कश्मीर के लिए पृथक से वीजा (पेपर वीजा) देने की चीन की नीति का पुरजोर शब्दों में निंदा करनी चाहिये।

4.       चीन की विस्तारवादी नीति से सजग रहने की जरूरत है। चीन-तिब्बत, चीन-हांगकांग, चीन-जापान    नीति से सबक लेने की जरूरत है।

5.       चीन की माओवादी नीति की समय-समय पर समीक्षा हो। यह समय की मांग है।

6.       चीन की भारत की सीमा पर आधारभूत संख्या का अवलोकन करना चाहिये। भारत को भी इसी     तरह की आधारभूत संरचना विकसित करनी चाहिये।

7.       भारत के प्रधान मंत्री की अरूणाचल प्रदेश की यात्रा पर चीन द्वारा की गई टिप्पणी की घोर निंदा           होनी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय मंचों का भी सहयोग इस हेतु लिया जा सकता है।

8.       सेना, बीएसएफ, बीआरओ आदि की चौकियां / ठिकाने सुदृढ़ करने चाहये। एच आर डी   विकसित  हो। वैकेंसीज भरी जानी चाहिये। इनकी सेवाओं की सुविधाओं में भी वृद्धि की जानी चाहिये।

9.       भारत-चीन सीमा पर बसने वाले नागरिकों के लिए विशेष पैकेज हो ताकि सीमा पर रहने वाली        जनता का मनोबल मजबूत बना रहे।

         

* Speech was laid on the Table .

 

ओश्रीमती जयश्रीबेन पटेल (महेसाणा):महोदय,           भारत सन् 1947 में स्वतंत्र हुआ । लोकतंत्र देश के रूप में उभ्रा । चीन 1950 में आजाद हो कर कम्यूनिस्ट राज्य के रूप में उभरा । संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र और सबसे बड़ा साम्यवादी तंत्र वहीं से ही विचारधारा की लड़ाई हो रही है ।

          1950 नवम्बर में मान्य सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री नेहरू जी को तिब्बत के बारे में जिनकी हरकतों के लिए चेतावनी वाली चिट्ठी लिखी थी । लेकिन नेहरू जी बड़े उदारवादी आदर्शवादी थे । 1954 में पंचशील सिद्धांत का समझौता हुआ और हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा गूंजने लगा । भारत आदर्शों में सोता रहा और चीन अपनी तैयारियां करता रहा । 1960 में भी नेहरू जी की सरकार को चीनी सरहदों की हरकतों के बारे में "श्वेत पत्र " घोषित करना पड़ा था । 1962 में चीन ने भारत पर एक तरफा हमला किया और हमारी मवालवादी, आदर्शवादी विदेशनीति का पर्दाफाश हो गया ।

          1803 में जब वैष्विक सत्ता और प्रभाव का गुरूत्व केन्द्र यूरोप था तब नैपोलियन ने चीन के बारे में जो कहा था वो आज भी सच साबित हो रहा है । उसने कहा था कि "चीन सोता हुआ जाइंट राक्षस है, वो भले ही सोता रहे क्योंकि वो जागेगा तो समग्र विश्व में हाहाकार मचाएगा । "

          चीन ने अपना 60वां जन्मदिन मनाया । पहले महासत्ताओं के रूप में अमरीका और सोवियत यूनियन का नाम लिया जाता था । अब अमरीका के साथ हमला करने वाली महासत्ता के रूप में चीन का नाम लिया जाता है ।
          चीन भारत का उत्तर दिशा स्थित पड़ोसी देश है । व अरुणाचल को भारत का हिस्सा नहीं मानता है । समय-समय पर वह भारत को याद दिलाता रहता है कि अरुणाचल भारत का हिस्सा नहीं है और हर बार अपने नक्शे में अरुणाचल का समावेश करता रहता है । ऐसे चीन के साथ किस तरह निपटा जाए वो हमारे लिए बड़ा प्रश्न चिन्ह है ।
          हाल ही में चीन की घुसपैठ की नीति के कारण भारत के माध्यमों में चीन विरोधी "हिस्टिरीया " खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है । लेकिन हमारा अग्र वर्ग "सब सलामत " की घंटी बजा रहे हैं ।
 
* Speech was laid on the Table.
     
          पिछले 20 साल से भारत की जिनके प्रति हमारी नीति मुख्यतः तीन नींव पर खड़ी है ।
.         भारत चीन के बीच वाली दोस्ती के बारे में सार्वजनिक रूप में ठंडी ठंडी बातें करना । दोनों भव्यतम प्राचीन सभ्यताएं हैं । दोनों के बीच सांस्कृतिक संबंधों की दीर्घकालीन परम्पराएं हैं ।
          इससे देशों की एकता पर हम जोर देते रहे हैं । इससे हमें दो ही बड़ी महासत्ताएं भारत और चीन वैष्विक समस्याएं जैसे कि जलवायु परिवर्तन आर्थिक मंदी के बारे में एक समान रवैया अपनाया जाए और पश्चिमी देशों का मुकाबला किया जाए ।
          चीन से जाग्रत रहना, उसका बहुत विश्वास नहीं करना, उनके प्रति गुप्त रूपसे फरियादें उठाए करते रहना ।
          अरुणाचल प्रदेश भारत का ही एक आंतरिक भाग है । ये हमने चीन को सुना दिया है । यह एक प्रकार की हमारे राज्य के नेताओं की मानसिक आत्मवंचना ही है । तात्पर्य यह है कि चीन के प्रति एक समतुल्य नीति हमने आज तक अपनाई नहीं हैं । जिनके प्रति हमारी नई सोच कोई ठोस नींव पर रखी जानी चाहिए । पर उनके साथ दीर्घ दृष्टि से सोची समझी एन्गलमेंट नीति अपनानी चाहिए ।
          1990 के प्रारंभ में चीन के चेयरमैन डेंग हेशिवो विंग ने चीनी नेताओं को जो थोड़ी सी सीख दी थी वो भारत के लिए जरूरी टिप्स बन सकती है । चीन की विदेश नीति के 7 मार्ग दर्शक सिद्धांत इस तरह हैं:
          आपके आस-पास जो कुछ बन रहा है उसका निरीक्षण करते रहो और शांति से बिना हरकत में आये उन्हीं का आकलन करो ।
          जो परिवर्तन हो रहा है उनके साथ शांति और विश्वासपूर्वक कार्य को निपटाओ । मतलब कि परिवर्तन के प्रति शडमृग नीति मत अपनाओ ।
          अपनी स्थिति को ऐसी मजबूत करो की समय की कसौटी पर खरी उतरे ।
.         अपनी जो क्षमता या शक्ति हैं उनको बार-बार प्रकट मत करो । लाइम लाइट में रहने की वृत्ति पर लगाम कसो ।
          हमेशा लो प्रोफाइल रखो । हम शक्तिशाली बन गये हैं ऐसा दिखावा मत करो । ऐसा करने में उनके उल्टे परिणाम आते हैं ।
          हम बहुत बड़े नेता, बड़े सुपर पावर बन गये हैं दिखाने का प्रयास मत करो ।
.         देश के हित में कुछ करते रहे । देश के विकास में किसी भी नीति से कोई न कोई शक्ति क्षमतानुसार प्रदान करते रहे ।
          चीनी नेताओं को चेयरमैन देंग ने जो सलाह मशविरा दिया था उसके बिल्कुल विपरीत अपने राजकीय नेतागण व्रूवहार कर रहे हैं ।
          चीन ने अपने सीमा पर जो निर्माण किया है ऐसा हमने अपनी सीमा पर नहीं किया है । 1990 के दशक में चीन ने "चलो पश्चिम " की जो कूट नीति अपनाई उनके तहत उसने सीमा पे निर्माण कार्य जारी रखा । तिब्बत में मुख्य भूमि से जुड़ी हुई रेल लाइन का निर्माण जो चीन कर सकता है तो अरुणाचल प्रदेश में भारत को रेल लाइन बिछाने में कौन रोक सकता है ।
          पड़ोसी देशों के साथ जिनके बढ़ रहे सम्पर्क जैसे यातायात हमारे लिए भी खतरा बना हुआ है । इस कूटनीति के कारण चीन भारत को चारों ओर से भिडंत में लेने का प्रयास कर रहा है । खासकर के हिन्द महासागर में सरहदी-तटवर्ती देशों के साथ मजबूत संबंध रखने चाहिए और चीन को इससे दूर रखने की कूटनीति अपनानी चाहिए । उन्हें देशों के साथ आर्थिक सांस्कृतिक विदेश नीति का निर्माण करके चीन का आकर्षण इन देशों में घटाने के लिए हमें कूटनैतिक प्रयास करने चाहिए ।
          पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कूटनैतिक संदेश में कहा था । "मित्र बदले जाते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं बदले जाते " इसको मद्देनजर रखकर हमारी विदेश नीति में नई सोच लानी चाहिए ।
  चीन-भारत सम्बन्ध             हाल ही में हुई घटनाओं के संदर्भ में जाने से पहले चीन की भारत-विरोधी गतिविधियों का जानना आवश्यक है           सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया व तिब्बत को हथिया लिया ।
.         सन् 1976 में माओ त्स तुंग और भुट्टो के बीच गुप्त परमाणु करार हुआ ।
          सन् 1982 चीन ने अपने से किट डू इट वोर सेल्फ किट के साथ पाकिस्तान को दो परमाणु बनाने लायक यूरेनियम मुहैया कराया ।
          चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर एक बड़ा बांध बनाने जा रहा है, जिसके बनने पर भारत को 3 प्रकार का नुकसान होगा ।
          (क)     बांध बनने के बाद हमें सूखे के समय ब्रह्मपुत्र का पानी हासिल करने में चीन पर निर्भर होना पड़ेगा ।
          (ख)     मानसून के महीने में चीन ने पानी छोड़ा तो बाढ़ जैसी तबाही हो सकती है ।   

          (ग)     अगर प्राकृतिक आपदा के चलते यह बांध टूटा तो अरुणाचल व उत्तर-पूर्व के काफी इलाकों में बांध का पानी तबाही मचा सकता है ।   

.         चीन का अरुणाचल प्रदेश पर दावा एवं घुसपैठ भारत के लिए सरदर्द बना हुआ है ।   

.         चीन की नेपाल तक की सड़क योजना भारत के लिए खतरे की घंटी है ।   

          चीन ने गुलाम कश्मीर में प्रोजेक्ट शुरू किये हैं ।   

          चीन ने जम्मु-कश्मीर के लोगों को अलग विजा देने की प्रथा शुरू की है ।   

.         दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा पर सख्त विरोध किया था और अन्तर्राष्ट्रीय बवाल खड़ा किया था ।    

          चीन के विरोध के कारण लेह में "नरेगा" मार्ग का काम रूक गया है । शांतिवार्ता, मंत्रियों का मिलन, शिष्टमंडलों का मिलना और तो और पंचशील करार (का उल्लंघन) कोई कारगर नजर नहीं आये । चीन अपने हरकतों से कभी भी बाज नहीं आया । भारत सरकार ने दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश यात्रा पर जो निर्णय लिया था उचित एवं सार्थक था । मैं सरकार को इसके लिए धन्यवाद देती हूँ कि चीन की हरकतें देखते हुए अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करे और चीन को "जैसे को तैसा " नीतिनुसार करारा जवाब दे । माओवाद के माध्यम से चीन भारत को 30 (तीस) टुकड़ों में बाँटनें की मंशा है । इसे हमें चकनाचुर करना है ।
                           
ओश्री राधा मोहन सिंह (पूर्वी चम्पारण): महोदय, भारत चीन संबंधों पर यह चर्चा सामयिक है क्योंकि पिछले काफी दिनों से चीन की गतिविधियाँ और उनकी भाषा प्रत्येक हिन्दुस्तानी के मन में संदेह पैदा कर रहा है । कई मुद्दों पर भारत सरकार की कमजोर एवं रक्षात्मक प्रतिक्रिया उस संदेह को अधिक मजबूत करता हे । सरकार की प्रतिक्रिया से ऐसा लगता है कि हमने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया है । क्या हमारे सरकार यह भूल कर रही है कि अपनी आजादी के बाद से ही जब चीन ने अपनी सामरिक शक्ति विकिसत की तो उसने भारत को अपना निशाना बनाया । सबसे पहले उसने अपने माओवादी गुर्गे भारत के निकटतम राज्य तिब्बत में फैलाये और बाद में उनके कंधों पर सवार होकर वह वहां पर पहुंचा । तिब्बत को निगलने के बाद चीन ने सन् 1962 में पंचशील के सिद्धांतों को ताक पर रखकर भारत पर सीधा हमला किया और बहुत बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया ।
          उसने पश्चिम बंगाल में मौजूद माओवादियों को भड़काया और 1967 में पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा में मारवाड़ी और हरियाणा के उद्योगपतियों और व्यापारियों को लूटन और मार भगाने की मुहिम चलवाई जिसके चलते इन दोनों राज्यों से लाखों व्यापारी अपनी जान बचाकर भागे ।
          चीन आये दिन भारत के सीमांत राज्यों को अपने क्षेत्र में दिखाकर यह दिखाने की चेष्टा कर रहा है कि वह कभी भी भारत की सीमाओं पर सैनिक कार्यवाही कर सकता है । अपने ही राज्य अरुणाचल में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की यात्रा को विवादित करने की चेष्टा उसी योजना का अंग है ।
          स्वाभाविक है कि भारत सरकार उससे निबटने के लिए सीमा पर सेनाओं को सतर्क कर रही है लेकिन हकीकत यह है कि चीनी ड्रेगन भारत में घुस कर लगभग आधे भारत को अपनी पूंछ में लपेट चुका है । आज चीन द्वारा पोषित और माओवाद द्वारा पल्लवित नक्सलवाद भारत के लगभग एक चौथाई हिस्से को अपने कब्जे में ले चुका है । पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक के जंगलों में उनका साम्राज्य स्थापित हो चुका हे । इन क्षेत्रों में उनकी समानांतर सरकार चल रही है । वे अपनी अदालत लगातेक हैं और खुद ही फैसला सुना कर सजा भी दे देते हैं । इसके पास हमारी पुलिस से ज्यादा आधुनिक हथियार हैं । अभी तक इन लोगों से जितनेक हथियार पकड़े गए हैं या बरामद हुए हैं वह चीन का ही बना हुआ है । जिससे यह साबित होता है कि भारत में नक्सलवाद फैलाने के लिए इन्हें चीन से ही हथियार मिलते हैं ।
  
* Speech was Laid on the Table.
   
          महोदय, अब यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि चीन नेपाल की तरह ही भारत को भी यहां की निवासियों की मदद से अपने कब्जे में लेना चाहता है । एक तरफ चीन ने अपने सस्ते सामन से भारत के बाजार भर दिये हैं तो दूसरी तरफ सशस्त्र माओवादियों की सेना भारत में तैयार कर रहा है । खिलौनों से लेकर हर तरह का इलेक्ट्रोनिक चीनी सामान भारत के बाजारों में भरा पड़ा है ।
          महोदय, इस बात की भी खबर मिल रही है कि भारत में बड़ी तादाद में नकली नोट चीन से ही आ रहे हैं । इस दीवाली पर भारत में सबसे अधिक चीन में बनी बिजली की झालरें और पटाखें बिके हैं । सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद भारत के बाजारों में चीनी उत्पाद धड़ल्ले से बिक रहे हैं । इस तरह चीन एक तरफ तो भारत की अर्थव्यवस्था बिगाड़ कर भारतीय बाजार पर अपना कब्जा जमा रहा है दूसरी तरफ नक्सलवाद और माओवाद के नाम पर भारत से लड़ने के लिए भारत में ही सशस्त्र सेना तैयार कर रहा है ।
          महोदय, ऐसी परिस्थिति में मैं भारत सरकार से निवेदन करना चाहता हूँ इसे अप्रत्यक्ष आक्रमण समझकर जवाबी कार्रवाई की रचना की जाए ।
 
डॉ. राजन सुशान्त (कांगड़ा):माननीय सभापति महोदय, आज बड़े संवेदनशील मुद्दे के ऊपर चर्चा हो रही है। मैं समझता हूं कि जब इतने गंभीर मुद्दे पर चर्चा हो रही हो तो इस सदन में बैठे हुए माननीय सांसदों को बहुत गंभीरता के साथ ही सुनना चाहिए और सुझाव भी देने चाहिए, क्योंकि यह देश की अस्मिता, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है।  
      सभापति महोदय, जब डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी का भाषण खत्म हुआ, तो हमारे काबिल दोस्त श्री संदीप दीक्षित जी ने कहा कि डॉ. जोशी के भाषण को सुनकर ऐसा लगा कि उनकी वाणी में भय है। उन्होंने पूछा कि भय क्यों है? मैं बताना चाहता हूं कि डॉ. जोशी जी की भाषा में कोई भय नहीं था। आज देश में जो परिस्थितियां हैं, जिन परिस्थितियों से देश अरुणाचल, लद्दाख, सिक्किम, अंडमान-निकोबार और अन्य प्रदेशों के अंदर जूझ रहा है, निश्चित तौर पर उन परिस्थितियों का हवाला डॉ. जोशी जी ने दिया था। मेरे कहने अथवा किसी अन्य माननीय सदस्य के कहने से कुछ नहीं हो सकता है। जो परिस्थितियां आज हैं, उनसे सारा देश चिन्तित है। सेना और विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों ने सारे देश की नजर में तथ्य लाए हैं। मैं दीक्षित जी से एक ही बात कहना चाहता हूं कि वे याद करें 26 जनवरी, 1992 का दिन, तब पाकिस्तान के उग्रवादियों ने ललकारा था कि हिन्दुस्तान में अगर कोई माई का लाल है, तो वह कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा लहराकर दिखाए। मैं आज कहना चाहता हूं कि ये वही डॉ. मुरली मनोहर जोशी हैं, जो उस समय हमारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, जिन्होंने कश्मीर से कन्या कुमारी तक यात्रा की थी,...( व्यवधान)
सभापति महोदय :  चौधरी लाल सिंह, बैठिए। वे यील्ड नहीं कर रहे हैं।
…( व्यवधान)
डॉ. राजन सुशान्त :इन्हीं डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी ने पाकिस्तान को ललकारा था और वहां जाकर लाल चौक पर तिरंगा फहराया था। अगर पाकिस्तान भारत को यह धमकी देता है कि कोई माई का लाल कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहराकर दिखाए और यह चेतावनी देता है कि कश्मीर के बिना पाकिस्तान अधूरा है, तो वे डॉ. जोशी जी ही थे, मैं भी उस समय उनके साथ गया था। हमने वहां जाकर पाकिस्तान को कहा था कि हम यहां आए हैं और लाल चौक पर तिरंगा फहरा रहे हैं। अगर आप कहते हैं कि कश्मीर के बिना पाकिस्तान अधूरा है, तो हम भी हिन्दुस्तान की ओर से कहने आए हैं कि पाकिस्तान के बिना हिन्दुस्तान भी अधूर है। आज डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी, जैसे वीर पुरुष को यह कहा जाए कि उनकी वाणी में भय क्यों है, यह ठीक नहीं है।
          सभापति जी, मैं अपने दोस्तों को याद दिलाना चाहता हूं कि वे 1998 का वह समय याद करें जब पोखरन का विस्फोट हुआ। उस समय अमेरिका से कौन लोग डरते थे, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता हूं। अमेरिका के एक इशारे पर विस्फोट करने से डर जाते थे और घबरा जाते थे। इस भारत मां के लाल, श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कोई परवाह नहीं की और पोखरन में परमाणु विस्फोट किया। वे हमारा संगठन हैं, वे हमारे नेता हैं और वे हमारी शक्ति हैं।
          मित्रो, मैं एक बात कहना चाहता हूं, आप कहते हैं कि भय क्यों है, भय हमें सचमुच है, क्योंकि चीन की कथनी और करनी में बहुत अन्तर है। चीन की नीति और नीयत में बहुत अन्तर है। हमने चीन से बार-बार धोखा खाया है। हमारे देश के प्रथम प्रधान मंत्री, स्वतंत्रता सेनानी, पं. जवाहर लाल नेहरू जी की, मैं बहुत इज्जत और मान करता हूं। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर, शांति व्यवस्था लाने का प्रयास किया, तो इसी चीन ने ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया था। उस समय पं. नेहरू जी कहा करते थे कि चीन कभी हिन्दुस्तान पर हमला नहीं कर सकता है। आप लोग भी यही कहा करते थे कि चीन कभी हिन्दुस्तान पर हमला नहीं कर सकता है, जैसे आज मेरे भाई संदीप दीक्षित जी कह रहे थे, लेकिन इतिहास गवाह है, उसी चीन ने सन् 1962 में हमारे नेहरू जी की आत्मा की पीठ में छुरा घोंपा और हमला किया और हमारे फौजी भाइयों को भारत-चीन सीमा पर बिना हथियारों के मरने पर मजबूर कर दिया था। जब ऐसा हुआ, तो नेहरू जी बर्दाश्त नहीं कर सके। चीन के इस धोखे के कारण, हिन्दुस्तान को, नेहरू जी जैसे नेता से भी जुदा होना पड़ा था। हिन्दुस्तान ने उसे भुगता।
          सभापति जी, आज मैं कहना चाहता हूं कि हमें चीन से खतरा क्यों नहीं है, आज अरुणाचल में क्या हो रहा है, लद्दाख में क्या हो रहा है और सिक्किम में क्या हो रहा है? आज चीन की प्रैस कहती है कि दलाई लामा अरुणाचल में क्यों जा रहे हैं, चीन का प्रैस कहता है कि हमारे प्रधान मंत्री अरुणाचल प्रदेश में क्यों जा रहे हैं और हमारी सरकार चुपचाप इन भभकियों को सहन करती है। चीन कौन होता है हिन्दुस्तान के बारे में फैसला करने वाला? अरुणाचल प्रदेश में कौन जाएगा या नहीं जाएगा, इस बारे में चीन को फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है। अरुणाचल प्रदेश, हिन्दुस्तान का हिस्सा था, आज है और भविष्य में भी रहेगा।
   
          मैं आज कहना चाहता हूं कि आज डरकर काम नहीं चलेगा। बाकी जोशी जी ने ठीक कहा कि हमारी योजनाएं पांच साल की, 10 साल की होती हैं, लेकिन हमको गम्भीरता से चीन की नीयत को समझना पड़ेगा कि उनकी योजनाएं 100 साल की, 200 साल की होती हैं। मैं माओवाद के बारे में उदाहरण देना चाहता हूं कि आज हिन्दुस्तान के अन्दर नक्सलवाद की स्थिति क्या हो गई है। आज बिहार के अन्दर, झारखण्ड के अन्दर, छत्तीसगढ़ में, मध्य प्रदेश में, विदर्भ में, तमिलनाडू में, सारी जगह चीन के द्वारा पोषित और माओ द्वारा पल्लवित नक्सलवाद ने भारत के एक चौथाई हिस्से पर एक किस्म से कब्जा कर रखा है।
          आप कहते हैं कि चीन से कोई खतरा नहीं है। आज हमको धमकियां मिल रही हैं। आज सब जगह पर खतरे पैदा हो रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि माओत्से तुंग ने 1950 में एक बात कही थी कि चीन कहता है कि तिब्बत चीन की कटी हुई अंगुली है, जो अब जुड़ गई है, परन्तु उसने कहा कि पांच अंगुलियां अभी और जोड़नी हैं। आज से कई साल पहले माओत्से तुंग ने वे कौन सी अंगुलियां कही थीं, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख, सिक्किम, भूटान और नेपाल को कहा कि यह अंगूठा है। यह चीन की आज की नीति नहीं है, यह बहुत पुरानी नीति है। चौधरी लाल सिंह जी, आज आप कहते हैं, मेरा भाई बहुत योग्य है, क्रान्तिकारी है। जम्मू-कश्मीर में चीन ने पिछले दिनों में क्या किया, कश्मीर वालों के लिए अलग वीज़ा का सिस्टम घोषित कर दिया।...( व्यवधान)
सभापति महोदय : अब समाप्त कीजिए, आपका समय समाप्त हो गया।
डॉ. राजन सुशान्त :आज मैं आपसे कहना चाहता हूं कि चीन ने भारत की भूमि पर कब्जा कर रखा है।...( व्यवधान) मैं 2-3 बातें और आपके ध्यान में लाना चाहता हूं।
सभापति महोदय : 2-3 नहीं, एक बात कहकर अपनी बात समाप्त कीजिए। आप बैठिये, समय नहीं है। आप बाकी भाषण ले कर दीजिए।
डॉ. राजन सुशान्त :मैं कन्क्लूड कर रहा हूं। सीमा पर ब्रिजेज़ बनाये जायें और लेह-लद्दाख सीमा के लिए रोहतांग टनल बनाई जाये। इसी तरह से उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश में भी यह काम किया जाये। साथ-साथ हमारी सुरक्षा को मजबूत किया जाये। सेना में भर्ती चीन के अनुपात में बढ़ाई जाये, हथियार भी उसी तरह से लिए जायें। मैं कहना चाहता हूं कि हमको डरना नहीं चाहिए। अन्त में मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि हमारे राजनैतिक मतभेद चाहे जितने मर्जी हों, लेकिन अगर विदेश की ओर से कभी हम पर हमला होगा तो हम सारे लोग राजनैतिक मतभेदों को भुलाकर इकट्ठे हो जाएंगे और कोई भी बड़ी से बड़ी कुरबानी देने के लिए तैयार रहेंगे।                                              
 (Interruptions)* MR. CHAIRMAN : Only Shri Sanjoy Takam’s speech will go on record. 
… (Interruptions)
                                       
*Not recorded.
 
SHRI SANJOY TAKAM (ARUNACHAL WEST): Mr. Chairman, Sir, thank you for giving me the opportunity to raise on the floor of this House to share and also to spell out the confusions that is outside the House, the confusion that are reigning within this House regarding stand of people of Arunachal Pradesh.  The Members who have raised the India-China issue on the floor of Parliament, from the Opposition camp, have two confusions, it seems.  One confusion they say, Government of India seems not assertive. The other confusion, if I am not mistaken, they are confused as to what people of Arunachal feel. 
I want to go straight way to the points.  It was in 1967 that the grass root democracy started in the then NEFA – the Panchayati Raj Government. In 1972, the Union Territory status was given to Arunachal Pradesh.  For your kind information, all these two legislations were legislated on the floor of this Parliament, the Indian Parliament. It was a historically a  Statehood without throwing a single stone or as these used to be agitations;  there used to be demonstrations; there used to be hunger strikes; as it used to be happening today to get statehood. But it was so fortunate that Rajiv Gandhi, a person who used to have vision for India, demonstrated his skill and his support to the people of Arunachal Pradesh by bringing in 1986 a bill for full-fledged statehood was granted to the State of Arunachal Pradesh. If we go back to the constitutional and political history of Arunachal Pradesh, if anything has been done, I want to be a little bit selfish by virtue of being a Member of Parliament from the Ruling Congress, it has all been done by the subsequent Congress Governments, that have done fantastic job in having historical legislations for the people of Arunachal Pradesh.
          Prior to 1947, for your kind information, and after 1947, I want to be very assertive, not even a single soul in the womb of a mother, or even a single soul who is already born in the land of Arunachal Pradesh, cry in favour of China. Never! It is not going to happen. This is the wisdom of the people of my State. If I am here standing and addressing, it is because of Indian Parliament, it is because of Indian Constitution and it is because of various amendments brought forward for the people of Arunachal Pradesh by the forefathers of our Constitution, right from Pandit Nehru to Dr. Manmohan Singh.
          What I am going to say is a little bit political – I was a Minister in the State of Arunachal Pradesh, in the year 2001-02. It used to be said; there was an artificial dam built over Tsang Pho River. Historically we have never seen or heard in our mythology, nor in our history, about the way it swept the entire valley of East Siang. Where it killed thousands of animals and dozens of people were killed; properties worth more than Rs.10,000 crore were damaged. Very interestingly, there was the NDA Government; we cried for help; we opened up our hands for support; not even a single pie came. When I used to hear on the floor of this Parliament about 1962, I would say, history is important, but incident on certain history cannot always be called a mistake or a blunder. We must be able to learn from what has happened.
          Many Prime Ministers and Presidents of India have visited Arunachal Pradesh, no hue & cry mounted by China. There was one non-Congress Government in India; I personally agree in with the personality and greatness of Vajpayee Ji. Unfortunately, he was one of the Prime Ministers in India, who has never landed and visited in Arunachal Pradesh. That was one of the darkest periods. We suffered economically. Our interest was not taken care of. There was a proposal that the Arunachal University would be converted into a Central University. … (Interruptions) It was the UPA Government that came back, under Shrimati Sonia Gandhi and the Prime Minister, Dr. Manmohan Singh, which converted the Arunachal Pradesh University into a Central University. 
MR. CHAIRMAN : Please conclude now.
SHRI SANJOY TAKAM : Sir, I was the Education Minister in the State at that time.  The NDA Government said that there was no provision, there was no clauses in the Constitution, to convert a State university into a Central university but the UPA Government has done it.  I do not want to play politics but I, as a citizen, once again assert you and to the House that our people are peaceful.  I would like to quote a local poetry which goes like this defining our ownership on land, forest rivers and mountains;
“Ngake lakung Ngake ladung Ngake dicho Ngake dichi Ngake kera Ngake dadii Ngake Hamchiing NgakeGengbe Ngake Takte Ngake Lengne Ngake Bambil Ngake Siile”                 It means that right from the highest peak of Himalayas to the bottom of Brahmaputra, the highest range to the lowest lands and the tallest rock to smallest pebbles belong to my forefathers and us, that is the “India”. This is the definition of our land and our geography.  There is no dispute as per our mythology.    Although we migrated from Tibet in time immemorial. Not even a single inch of our land belongs to any country nor it belongs to Tibet or China. This history has to be ascertained.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please conclude now.
चौधरी लाल सिंह (उधमपुर):  सभापति जी, हमारा समय इन्हें दे दो।
सभापति महोदय :  लालसिंह जी, ज्यादा समय नहीं है, हमें 5.30 बजे तक समाप्त करना है।
SHRI SANJOY TAKAM :   I would like to give a few important noting for my Government. What is important today is not to be offensive but be defensive in our defence strategical arrangements.  We cannot talk about 1962.  It should be a testimony which should allow us to learn. Dr. Manomhan Singh has taken an initiative in this regard.  He went to China and within two to three days of his landing in Delhi he landed in Itanagar and announced a historical package of Rs.24,000 crore.… (Interruptions)वे चाइना जाकर वापस आये, उसके बाद ईटानगर गये। इसी प्रधान मंत्री जी ने हमें पैकेज दिया है, तो इसी प्रधान मंत्री जी को ही तो हमें जयहिंद बोलना पड़ेगा।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please take your seat now. You will have to conclude.
SHRI SANJOY TAKAM : I will conclude in three minutes. Sir Hon’ble Prime Minister, Hon’ble UPA Chairperson and Rahulji visited Arunachal recently……(Interruptions)
श्रीमती विजया चक्रवर्ती (गुवाहटी):  पांच हजार करोड़ रुपये के पैकेज की बैंत क्या है, आप इस सब्जैक्ट पर आधे घंटे का डिस्कशन रखें।...( व्यवधान)
SHRI SANJOY TAKAM : The most important step that the Government has to take is the construction of road along the 1,080 kms. Periphery of India China border.  As a ruling Member I strongly feel that in addition to the package which our hon. Prime Minister – I believe the hon. Prime Minister, hon. UPA Chairperson… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please take your seat now. You have spoken for more than ten minutes.  I will call the next speaker, Shri Jagdanand Singh.
SHRI SANJOY TAKAM : I believe that the Government will give another package for the construction of road along the India-China Border… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please take your seat.  We will have to conclude this debate by SHRI SANJOY TAKAM : I will conclude in another two minutes.  There must be a correlated networking between the Ministries of Home, Defence and External Affairs.  Internal and external security will have to be given the utmost concern and importance… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Nothing, except Shri Jagdanand Singh, will go on record.
(Interruptions)* *Not recorded.
SHRI SANJOY TAKAM : Please allow me to speak the last sentence.  The Himalayas being the only instrument to block any aggression should no more be a strategic defence concept.  We should be prepared to face any eventuality, any threat be it from China, any other country or be it from within our country.  We should be prepared for any eventuality.   Jai Hind. Jai Arunachal.
                                                                                         
खी जगदानंद सिंह (बक्सर):महोदय, अभी हमारे अरुणाचल प्रदेश के प्रतिनिधि ने चर्चा की कि कांग्रेस के सिवा अरुणाचल के ा।लए किसी ने कुछ नहीं किया। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि डॉ. राम मनोहर लोहिया अरुणाचल प्रदेश को, जो आज हमारा अंग है, इसे उर्वशियम कहा करते थे। मैं सदन में यह भी बताना चाहता हूं कि इसी आजाद भारत के भीतर हमें परमिट ले कर जाना पड़ता था, जिसे हम इंटरनल परमिट कहते हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इसका विरोध ही नहीं किया था, बल्कि अपनी गिरपड्डतारी भी दी थी। यह प्रदेश आजाद भारत का हिस्सा है। यहां किसी को परमिट लेकर जाना मंजूर नहीं। जब हमें आजादी है कि हम भारत में कहीं भी जा सकते हैं, तो फिर उस इलाके में इस परमिट की कोई आवश्यकता नहीं थी। डॉ. ा़ाोहिया ने जो नींव डाली थी, आज वही नेफा अरुणाचल प्रदेश के रूप में इस भारत का एक प्रदेश है। अरुणाचल प्रदेश के रूप में यह जो हमारा राजनीतिक ढांचा है, अगर डॉ. ा़ाोहिया ने इसकी अगुवाई नहीं की होती, गोवा की स्वतंत्रता के आंदोलन की तरह, तो शायद चीन की और दावेदारी इस पर बनती। मैं कहना चाहता हूं कि आखिर यह चीन दावेदारी क्यों कर रहा है? कभी भी किसी देश की विदेश नीति नहीं बदलती है। हमारी आंतरिक राजनीति जो भी हो, लेकिन भूगोल किसी देश की विदेश नीति को तय करता है। भूगोल पड़ोसियों के साथ संबंध तय करता है और भूगोल तय करता है कि कौन उसका पड़ोसी है। चीन हमारा पड़ोसी नहीं था। ा।तब्बत की स्वायत्ता ख़्त्म होने के कारण चीन हमारा पड़ोसी है। अफसोस की बैंत है कि धीरे-धीरे हमारे नजदीक ऐंता गया। वर्ष 1962 के बारे में एक किवदंती है। आज कांग्रेस कह रही है कि हमारी तैयारी है और हम मजबúत राष्ट्र हैं। हम विश्वास करते हैं और राष्ट्र की सौ करोड़ ज़्नता भी विश्वास करती है कि भारत एक मजबúत राष्ट्र है। लेकिन शंका तब होती है, जब यह देखा जाए कि सरकार भी मजबúत है या नहीं है। 1962 की लड़ाई के पहले हमें बराबर यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि भारत की तरफ कोई आंख नहीं दिखा सकता है। माउख्र्से तुंग और नेहरू में कौन बड़ा नेता है, यह प्रतियोगिता थी और एक ठोकर से भारत का सपना चकनाचूर हो गया था कि नेहरू निर्गुट राष्ट्रों के ा।लए पंचशील के सिद्धांत को गढ़ने वाले इस राष्ट्र के महत्वपूर्ण नेता चीन के माउख्र्से तुंग के सामने एक कमजोर व्यक्ति साबित हुए। नेहरू जी हमारे राष्ट्र के नायक थे। हमें गर्व है अपने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पर, जिसने लोकतंत्र को भारत में स्थापित किया, लेकिन लोकतंत्र की स्थापना के बाद राष्ट्र को यह भी भरोसा होना चाहिए कि दुनिया का कोई भी आदमी हमारे राष्ट्र के भूगोल को नहीं बदल सकता है। जब-जब शंकाएं होती हैं, राष्ट्र को चिंता होती है। मुरली मनोहर जोशी साहब हमारे सम्मानीय नेता किसी के सामने यह पक्ष नहीं रखना चाहते हैं कि भारत भयभीत है, लेकिन उन्हें एक शंका है कि इस मजबúत राष्ट्र की सरकार क्या इस राष्ट्र को भय से मुक्त कर सकती है या नहीं। यही सवाल हमारी विदेश नीति का सवाल आज उठा है, यही अहम सवाल आज चर्चा का विषय है। वर्ष 1962 में हम युद्ध नहीं हारे थे, हम 1962 के युद्ध के ा।लए तैयार नहीं थे। जब युद्ध ख़्त्म हुआ था, तब डॉ. ा़ाोहिया ने इसी सदन में अपनी बैंत कही थी। हम प्रतिदिन 60 किलोमीटर की रपड्डतार से पहाड़ों पर चल ही नहीं सकते हैं।       हम दौड़ भी नहीं सकते, हम 60 कि.मी. प्रतिदिन भारत के इस हिस्से को हारे कैसे? उनके कथन का एक ही मकसद था। इस युद्ध के ा।लए भारत देश तैयार नहीं था और भारत राष्ट्र पर यदि युद्ध थोपा गया था, इसलिए नहीं कि भारत राष्ट्र कमजोर था। इसलिए कि भारत राष्ट्र की सरकार उस समय कमज़ोर साबित हुई थी। प्रश्न यही आज है कि क्या इस भारत को बचाने की ताकत आज की सरकार में है कि नहीं है?
सभापति महोदय : ठीक है, अब समाप्त कीजिए। एक मिनट के अंदर अपनी बैंत समाप्त कीजिए।
श्री जगदानंद सिंह :डा. राम मनोहर लोहिया वे थे जिन्होंने मार्क्सवादी से लेकर भाजपा तक के लोगों को एक सूत्र में राष्ट्र के राजनैतिक परिवेश को बदलने के ा।लए पिरोया था। इसलिए जब आप यहां पर हैं तो मुझे आशा है कि एक-दो बैंत मुझे कहने देंगे।
          मैं अंतिम बैंत कहना चाहता हूं।  राष्ट्र की जल संपदा का 30 फीसदी हिस्सा ब्रहमपुत्र के पानी का है। हमारे वैज्ञानिकों का कथन है कि 99000 मेगावॉट हाइड्रो पॉवर का जनरेशन इससे हो सकता है। 1100 कि.मी. दूर हमारी सीमा से भले ही वह चीन बांध बना रहा हो, मैंने यहीं पर प्रश्न किया था और विदेश मंत्रालय से जवाब आया था कि चीन ऐसा कुछ नहीं कर रहा है और हम बराबर ख्याल रख़्ते है कि चीन ऐसा कुछ नहीं कर पाए। लेकिन सैटेलाइट से फोटो आ चुकी है कि वहां बांध बन रहे हैं। बांध बनाने की जो भी स्टेज हो, लोगों का कथन है कि इसमें तेजी और आएगी जब चीन सड़क बना लेगा। ख्याल कर लीजिएगा, दृनिया में तीसरा विश्व युद्ध किसलिए होगा? ख्रीसरा विश्व युद्ध इसलिए होगा कि पानी पर अधिकार किसका होगा? व़्मारा 30 फीसदी पानी जिस ब्रहमपुत्र से मिल रहा है, हमारे उस कैचमेंट के बारे में भारत की सरकार नहीं बता रही है कि कितना हमारा कैचमेंट उस जलाशय के भीतर ले लेगा। मैं यही कहना चाहता हूं कि हमारी सीमाओं की हिफाजत करो, हमारी जलसंपदा की हिफाजत करो। यह राष्ट्र मजबúत है लेकिन मजबúत राष्ट्र को एक कमज़ोर सरकार के द्वारा भयभीत न होने दिया जाए, यही मैं भारत की सरकार से मांग करता हूं।
                                                                                         
MR. CHAIRMAN : Nothing, except the speech of Shri Prabodh Panda, will go on record.
(Interruptions)  *   SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Mr. Chairman, Sir, thank you very much for giving me this opportunity to participate in this discussion.
          At the very outset I would like to thank Dr. Murli Manohar Joshi for having initiated this discussion. But on listening to his speech I got an impression that he was initiating a discussion on this issue sitting in the period of the 1960s. But I would like to remind him that this is not 1960 or 1962. We are discussing this issue in the year 2009 when the diplomatic relations between the two countries of Peoples’ Republic of China and the Republic of India are at a different level. These two most populous countries of the world are, in the recent years, emerging economies and there is a great deal of significance in the bilateral relations of these two countries. The two countries, despite having belligerent mutual histories in recent years successfully have attempted to strengthen diplomatic and economic ties and consequently the relations between these two countries have become closer. This is the present situation. However, there are differences and disputes in certain areas. The two countries follow two systems. It cannot be presumed that all the friendly countries or neighbourhood countries would follow the same system. 
So, we should have mutual respect for each other.  Sir, differences and disputes are handed down by history in respect to boundaries and in respect of areas which are already known to us.
*Not recorded.
 
There is a dispute already posed by China with regard to Arunachal Pradesh.   It goes without saying that Arunachal Pradesh is an integral part of our country.  Differences might be there.  But the point is, we have disputes and differences not only with China. We have many differences with other neighbouring countries.  So, what would be our attitude?  I want to know whether we will go in for widening the gaps in our differences or we will try to minimise the differences and resolve the matter through negotiations. But certain forces are trying to utilise the differences in order to mark up tension.  This should not be done at this juncture. 
          Indo-China relations has a long history which has seen both ups and downs during the last six decades.  Even after 1962, the two countries restored ambassadorial relations since 1976.  In this backdrop, it is essential to know the various to and fro visits of the Premiers and other high level dignitaries from the two countries.  Both the countries agreed to settle disputes through negotiations and also agreed to solve them based on certain political principles. 
          The two countries are also committed to developing relations on the basis of Panchsheel, the five principles of mutual respect for sovereignty, territorial integrity, mutual non-aggression, non-interference into each other’s internal affairs, equality and mutual benefit and peaceful co-existence.
          It is desired that both the countries will respect the Panchsheel formula.  It is a positive trend that for various reasons India and China play a very major role in international affairs.  Today, there is no issue, be it economic or political, financial or commercial, environmental or climate change, that can be settled without active involvement of the two great countries.
          In this context, we appreciate the strategic importance of groupings such as the BRIC, namely, Brazil, Russia, India and China which support India’s application for membership into the United Nations Security Council.  It is appreciated that India is a part of Shanghai Cooperation Organisation. India, Russia and China constitute the highest land mass with about half of the world’s population.  This is not military alliance. 
So, India and China together have a glorious role to play in international affairs.  The political centre of gravity of the world is moving towards the East.  Earlier it was towards Europe and then it shifted to America.  Now the situation is changing day by day.  The political centre of gravity of the world is now moving towards the East.  In this context, India and China can play a very important role.  I think, those who are trying to utilise the differences to mark up tension will learn from the emerging situation. 
With these words, I conclude my speech.
                                                                                         
DR. MIRZA MEHBOOB BEG (ANANTNAG): Sir, I must express my gratitude to an experienced leader of the House, hon. Member, Dr. Murli Manohar Joshi and to Shri Jagdish Sharma, who raised this very important and very sensitive issue in the Parliament. 
          When apprehensions are expressed by no less a leader than Dr. Joshi, it has to be taken in the right spirit across the board and it has to be addressed very seriously.  We have a definite foreign policy towards all our neighbours, be it Pakistan, be it Sri Lanka, be it Bangladesh, be it Bhutan or be it any other country.  But the real test of our External Affairs Ministry will be how do we manage our relationship with another growing Asian giant, which is China.  Alarming things have happened.  It is not that the Government of India does not have a policy.  It must be having a policy.  But the perception is, the growing perception, is that we are wavering and we are tentative so far as our relationship with China is concerned. They are not mere apprehensions. See, what is happening.  It is not an isolated incident. 
It is not only the question of Arunachal Pradesh and it is not only the issue of whether we allow Dalai Lama to go to Arunachal Pradesh or not. Incidents after incidents are happening.  There is no end to it. What has happened in Jammu and Kashmir? Jammu and Kashmir is already on boil.  We, the people of Jammu and Kashmir, suffered for quite long. 
Some hon. Member said that it was Dr. Murli Manohar Joshi who hoisted the national flag there.  The leader of my Party, the tallest and the undisputed leader of Kashmir, Sheikh Abdullah, who hooted out Jinnah from Kashmir, said, “We will go and join hands with tolerant and democratic India.”  He said it way back in 1947 when the entire sub-continent was taken over by the religious sentiments and emotions.  It was Sheikh Abdullah who said it and we are proud of it.  But what is happening now?
We were constructing a road in Ladakh.  On construction of road, apprehensions were expressed. Naturally, apprehensions will be raised.  Unless they are removed and unless they are addressed, we will have genuine apprehensions about what China is going to do with us.  We were constructing a road in our part, that is in Ladakh.  It was stopped.  It is not in place right now because China said that we have to stop.  Our young and dynamic Chief Minister had to run to Delhi.  I think, he took it up with the Ministry of External Affairs and he took it up with the Government of India. Look at it, we cannot even construct a road in our own territory! But we say that everything is all right.  We say that we are enjoying a cordial relationship with China.  It has never happened.  It is the first instance in the whole history.  China says that it will allow the residents of Jammu and Kashmir, which is part of India, to visit China without a visa.  It says that the residents of China do not need any visa to travel to China.  To travel to China, all that they need is a visa on paper, a stapled visa, but we did not react.  I want to draw the attention of the Government towards this.  This is dangerous. We have to have a positive, comprehensive and a dynamic foreign policy in place.  We cannot wish away these things.  Only recently we were proud that Prof. Amitabh Mattoo, Vice-Chancellor of Jammu University, was given a proper visa to travel to China.  We were celebrating and we were very happy about it.  So, it has been left to China to decide which way they want to go and which way they want to put us to. So, this is very serious issue which needs to be addressed. It has to be addressed right on time before it is too late.
 
17.00 hrs.   It is because we were late in 1962 and we were caught napping in 1962. It does not matter, but it will matter if we do not learn from the mistakes which we have committed over a period of time.

          Our markets are flooded with Chinese goods. We have to be competitive.  We cannot stop it.  But the question is - if they are producing or if they are exporting some toys which are dangerous and hazardous to the health of our children, that has to be stopped.  … (Interruptions) Sir, I will conclude within one minute. It cannot be left to China that they will decide our relationship and they will decide our foreign policy and foreign issues. 

          So, I would very humbly request the Government of India that they should come out with a definite foreign policy towards China. Their foreign policy will be tested only in so far as our relationship with China is concerned.

           

SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM): Mr. Chairman, Sir thank you very much for giving me this opportunity to participate in this debate.

          Sir, some of my friends from Arunachal Pradesh and Jammu and Kashmir have already spoken in this debate.  I represent Sikkim which is perhaps one of the most peaceful States in this country.

          It was in the year 1975 when the people of Sikkim, through a unique referendum, became a part of integral India.  Therefore, from that time onwards, under Article 371(f) the people of Sikkim are enjoying the status of being as an integral part of India.  So, in no way, we can accept any part of Sikkim being disputed. 

          It was on 6th July, 2006 when the border trade with China began. This was a small border trade, but a very important milestone when after 44 years the border was opened to trade.  I would like to have an answer from the hon. Minister of External Affairs whether this border trade would now be upgraded to full trade because with that, the people of Sikkim would be in a position to go and the people of India would be able to visit Tibet and Lhasa in a way so that the relations between Tibet, Sikkim and India can improve. Therefore, it is with this thing in view that the National Highways No. 31A, I always said, is a very strategic Highway.  

Sir, in 1967, there were skirmishes. Today, there are reports that there are incursions in some of the border areas in Sikkim.  There have also been some reports in the media which says that these incursions are being more frequent, but when I actually took up this matter with the Defence authorities in Sikkim, I was given to understand that there is all preparedness.  I have no reason to doubt the preparedness of our military stationed out there.

I would just like to make two other points before I conclude.  One, that some of the so-called views and I think some of the alarming views need to be tempered in this august House.  I think in the context of our country, there is political power, there is military power and there is economic power.  Now, whether we compare it with China as saying it is bigger, better or more important, I think that is not the question.  The question is whether the sovereignty of our country, the sovereignty of our nation can be held together and whether our political power and our political space to work in areas like in Africa and in other places where China is moving with great speed, do we have that capability, are we prepared and do we have a strategic plan?  I think the Ministry of External Affairs may like to answer this point. 

It is a fact that we are a democracy.     

I am sure, today, this Discussion must be relayed all over because through the Lok Sabha Television, it is telecast live everywhere. It is so transparent that the discussion is being watched by one and all.

          With these words, I would like to end my speech. Thank you very much.

                                                                                                                 

* SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT):  Hon. Chairman, Sir, I take the floor to participate in the discussion under Rule 193. You know that our neighbouring countries are trying to solve the border issues through mutual dialogue.  The policy of the Government of India is to undertake dialogue and discussion and avoid war as long as possible.  Both China and India gained independence almost simultaneously.  At that point of time, India was plagued by hunger and starvation. When China got independence they also went through sad days; river Hwang Ho was witness to that. Now, after 63 long years what do we see?  We see that on one hand, China is developing and on the other India is also developing.  Former Prime Minister of India, late Pt. Jawaharlal Nehru had a dream – he had imagined that if the two countries could work in tandem with each other then one day they could become major super powers in the world. This is exactly what is happening today.  I believe that this is the age of global economy and technological advancement.  Economic might is extremely important in today’s world. So both India and China have to take up the responsibility of fighting the imperialist world and face the challenge head on.

          In order to protect the independence and sovereignty of the country, India needs economic development, academic development, military advancement and holistic upgradation.  Thus no other country will dare to encroach upon our borders and India will also not sneak into other’s territory.  This is enshrined in the foreign policy of our country. 

     

* English translation of speech originally delivered in Bengali.

          We also see that our markets are flooded with numerous Chinese goods. Their manufacturing sector is growing by leaps and bounds.  Their military organisation too is being modernized at a fast pace.  We need to tap all the potential and bring together countries like Russia and China to stand by us and work for a better future. If that is made possible, then we would be able to do away with poverty, pain and sufferings of the teeming millions. Therefore, I believe that the policy of dialogue and peacekeeping, which has been adopted by India, will certainly help in maintaining cordial relationship with our neighbouring States. I support this policy and appreciate the ideology of working together for a peaceful future.

          I am thankful to you for allowing me to speak on this subject and conclude my speech.

               

SHRIMATI BIJOYA CHAKRAVARTY (GUWAHATI):  Mr. Chairman, Sir, at the very outset, I would like to say that although the hon. Minister is reluctant enough to admit, yet it is a fact that the Chinese made many attempts and many quick forays into the Indian soil and on the Indian airspace. They are also adacious enough that they have painted the stones inside the Indian territory. They stopped the construction of roads in Ladak. They also snatched away the rations meant for the Armed Forces guarding the borders.

          मिस्टर दीक्षित ने जैसा अपनी स्पीच में कहा था, लेकिन उन्हें जानकारी नहीं है। मैं असम से हूं और हमें उस समय क्या कष्ट हुआ था, वह उन्हें समझ में नहीं आएगा। लोग 10 दिन से रास्ते पर थे। वर्ष 1962 में जितना पैसा ट्रेजरी में था, सारा पैसा पानी में फेंक दिया ताकि चाइनीज जाकर उसे ला न सकें। चाइनीज लोग घने जंगल में भाग गये थे।

          In 1962, Pandit Jawaharlal Nehru, the then Prime Minister of India, declared: “I am sorry for the people of Assam.”  पंडित जी ने असम को, उस समय असम सैवन स्टेट्स में शामिल नहीं हुआ था, एआईटी स्टेट था, विदायी दी थी।  He further declared: “We will try to recover Assam from the clutches of China when the time comes.” The then Prime Minister   Shri Lal Bahadur Shastry  also informed over the Radio: “We are preparing land for the people of Assam in Bihar, Rajasthan and Madhya Pradesh. If they want to come here and take refuge, then, land is enough for them.”  This is happening there.  महोदय, ईमानदार लोग एक बार गलती करते हैं, लेकिन जो जानते नहीं हैं, वे बार-बार गलती करते हैं। वर्ष 1962 का अनुभव हम लोगों के सामने है।

          ये भी कहते हैं कि जिस एरिया में चाइनीज़ बार-बार आते हैं, उधर सिम्पल ग्रास भी नहीं होती है। लेकिन किसी आदमी के माथे में सिकुड़न नहीं है। If a person is bald, can you behead him? That is why, I would like to say that we want good relation with our neighbouring countries. But India has always become a target of our belligerent neighbours, be it Pakistan, be it Bangladesh, be it China.

Unwanted incursions by Chinese troops both in land and in air definitely polluted the atmosphere and brought sense of distrust and disbelief among the people. According to a report that appeared in different newspapers, PLA helicopters intruded Indian air space many times in the month of June and Chinese patrol parties entered Indian territory 26 times during the month of August.

Sir, the hon. Minister of External Affairs is present here. He claimed that there is peace along more than 3,000 kms. of border with China. But till now, 38,000 kms. of territory is held by China. So, will the hon. Minister inform the House as to whether it will remain with China or it will be recovered in due course of time?

          Sir, Tibet means tri-stupa, meaning pillow, that is pillow of India. Tibet was a pilgrimage centre for centuries together. It is not in our control now. Our Rishis and Munis went to Tibet on pilgrimage. But now we cannot go there and if we want to go there, we have to take permission because Tibet is no more our pillow.

          We know that we want to strengthen our border by deploying forces and constructing air strips. We know that the Government has done all these things, but this is not sufficient. What is the present Government doing to thwart terrorist activities emanating from the soil of Pakistan, Bangladesh and China. In respect of China, in the eyes of the world, the Government presented a weak position to the utter disbelief of the people of this country. How has China become bold now? Their troops walked into the Indian territory many times as per their sweet will. Probably, the hon. Minister is aware of the fact that they have constructed roads, air strips and created all modern amenities. I would like to know whether the Government is aware that China has already built massive infrastructure in Tibet.

MR. CHAIRMAN : Please conclude now. You can lay the rest of your speech on the Table of the House.

SHRIMATI BIJOYA CHAKRAVARTY (GUWAHATI): Sir, kindly give me two more minutes.

MR. CHAIRMAN: I will give you only one minute.

SHRIMATI BIJOYA CHAKRAVARTY : Sir, I want to ask a question to the Government.

          Why are we so much worried? We are worried because we want that our border should be properly protected so that no foreigner can enter into our country at his own sweet will. We want a strong Government who can govern well and protect our border properly.

          I would like to quote from a news report that has appeared in The Asian Age on 31st August, 2009. It says:

“Earlier this month, India’s Chairman of the Chief of Staff Committee and Navy Chief Admiral Sureesh Mehta had stated that ‘it would be foolhardy to compare India and China as equals’ and that ‘in military terms, both conventional and non-conventional, we have neither the capability nor the intention to match China, force for force’”             This is not my comment. This is the comment made by the then Chief of Indian Navy. So, I want the hon. Minister to answer to all these points.
श्री विष्णु पद राय (अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह): सभापति महोदय, मैंने लिखित में नोटिस दिया है।...( व्यवधान) अंडेमान-निकोबार बहुत खतरे में हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदय: वहां कोई खतरे में नहीं है।
…( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record except the submission by Dr. Tarun Mandal.
(Interruptions)*   *Not recorded.
     
डॉ. तरुण मंडल (जयनगर):  सभापति महोदय, जिस मुद्दे पर सदन में इस समय चर्चा हो रही है, उस संबंध में मैं आज से 70 साल पहले की घटना की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : श्री विष्णुपद राय जी, आप बैठिए। आप कल जीरे ऑवर में बोलिए।
डॉ. तरुण मंडल : सभापति महोदय, आज बहुत महत्वपूर्ण दिन है। देश का एक गौरवशाली व्यक्ति, डॉ. द्वारका नाथ कोटनीस, शोलापुर के, महाराष्ट्र सदन के, चायना गए थे और उधर ही उनका देहान्त हो गया था। डॉ. कोटनीस को किसने भेजा था। इंडियन मैडीकल मिशन, आज से 70 साल पहले ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Mr. Ray, please take your seat.
… (Interruptions)
डॉ. तरुण मंडल : चायना एंड कमेटी की तरफ से उन्हें चायना भेजा गया था और उस चायना कमेटी के प्रमुख पं. जवाहर लाल नेहरू थे। उस समय कांग्रेस के प्रैसीडेंट नेता जी सुभाष चन्द्र बोस थे। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : श्री विष्णु पद राय जी, आप क्यों बोल रहे हैं? आपका कुछ भी रिकॉर्ड पर नहीं जा रहा है।
डॉ. तरुण मंडल : सभापति जी, उस समय दुनिया में China जाति और साम्राज्यवादियों की लड़ाई चल रही थी। माओ-त्से-तुंग के नेतृत्व में ...( व्यवधान) पराधीन भारत की ओर से रॉक मेडिकल मिशन भेजा गया था। हमारे देश की महत्वपूर्ण संतान, कोटनीस को आज इस सदन की तरफ से सलाम पहुंचना चाहिए। He has shown to the nation the dedication, internationalism and international brotherhood. ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please do not disturb.  The hon. Member is speaking.
… (Interruptions)
डॉ. तरुण मंडल : सभापति महोदय, हमारा देश और चीन, प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का आधार हैं। इन दोनों देशों की जनता में कोई विरोध नहीं है। जो नीति आज चायना में चल रही है, उस नीति का भी हम लोग समर्थन नहीं करते हैं। वह भी आज दुनिया की पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताकत बनकर चायना की जनता का बहुत शोषण कर रहा है। हमारे देश के अंदर भी देशी और विदेशी, पूंजीपति और साम्राज्यवादी लोग देश की जनता का शोषण और उनके ऊपर जुल्म कर रहे हैं, जो मैं समर्थन नहीं कर सकता ।
          सभापति महोदय, जब भी कोई बॉर्डर डिस्प्यूट होता है, तो देश के अंदर की समस्याओं को दृष्टि दूर ले जाने का काम किया जाता है, जैसे करगिल हुआ था और जैसे आज चायना और हमारे देश की बॉर्डर की स्थिति हो रही है। हमारी सरकार ने कहा कि हमारे बॉर्डर की कोई समस्या ही नहीं है, बल्कि हमारे देश की महत्वपूर्ण समस्या हमारी बेरोजगारी और महंगाई है। आज हमारे देश में खाने की, पेय जल की और अन्य समस्याएं हैं, वैसे ही चायना की जनता की भी समस्याएं हैं।  Let the rulers of the world fight.  We are ruled.  We are exploited.  We must be united. इस संबंध में, मैं यही कहना चाहता हूं कि हमारे और चायना के आम आदमियों के मनों में कोई भेद नहीं है, कोई फर्क नहीं है। एक देश के अंदर, दूसरे देश की जनता के प्रति घृणा पैदा नहीं करनी चाहिए। हम लोग अमरीका के शासक को विरोध कर सकते हैं और पाकिस्तान के शासक को विरोध कर सकते हैं, लेकिन उन देशों की आम जनता का विरोध कभी नहीं कर सकते हैं।
                                                                                                   
… (Interruptions)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Sir, the hon. Member will speak about Andman & Nicobar Islands only and nothing else… (Interruptions)
SHRI BISHNU PADA RAY (ANDAMAN & NICOBAR ISLANDS): If Andaman & Nicobar Islands are not protected you will not be safe… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record except the speech of the hon. Minister.
 
THE MINISTER OF EXTERNAL AFFAIRS (SHRI S.M. KRISHNA): Mr. Chairman, Sir, I am grateful to the hon. Members who have participated in this very important debate which was initiated by one of our senior leaders, Dr. Murli Manohar Joshi; and a number of friends have added to the content of this debate.  It has shed light on a number of issues and it has pointed out to the areas of our strength and to the areas of our weaknesses.  The Government will certainly take note – and I say particular note – of where we have shortcomings.  In the course of the coming months, we will be in a position to address ourselves to these concerns which, I would say, are rather compelling.
          Dr. Joshi did provide a historical peep into the relation between these two countries.  These are two countries which have had civilizational links.  We have had our trade links and we have had our spiritual links.  The cumulative impact of these links will point out to only one course and that is that we should strive for deepening of our cordial relations, our trade relations.
          Economists have been predicting that the 21st century will certainly belong to these two Asian giants.  China and India will emerge in the next 25 years, if not earlier, as the economic superpowers of the world.  We also can make our useful contributions for stabler global conditions between the two countries: India and China.  I think we have shown to the rest of the world how even though there is a global slowdown in the economy, but it has not impacted China and it has not impacted much in India. 
Let me make a distinction here that China has been able to continue their trajectory of seven to eight per cent growth whereas India has not been able to match that.  But we are lingering around six-and-a-half per cent hoping that we will be reaching seven per cent next year. 
          This is only to prove the point that these emerging Asian economies are going to dictate the pace of the global economic growth in the coming years.
          Sir, this is no mean compliment to our own achievement. We have done exceedingly well and we should be happy about it. This should give us the necessary self-confidence for the country to surge forward in the years to come. 
          India and China have had good relations and at times we have had strained relationship. Many of my friends did draw our attention to the developments of the 1960s and to the developments of the 1980s. 
          Sir, I for one feel that history has something to convey to us.  If it has something to convey to us we should humbly take note of that fact and then try to learn from whatever shortcomings or mistakes.  You might call them as mistakes and I might say that they were shortcomings.  Nonetheless, as a matured country we should take due note of whatever had happened in the last five decades and more. 
          Sir, in the next year we are celebrating the Sixtieth year of the starting of the diplomatic relationship with China.  We would like to celebrate it in a befitting manner because these two Asian giants have got to celebrate this.  The way we are looking forward to celebrating this is that in the whole year we will be celebrating India’s year in China and the China’s year in India.  These are reciprocal symbolic gestures which we make to our neighbours.
          We value China’s friendship, association and we would like to further take it to certain strategic levels.  I am sure that China is willing to reciprocate. There have been a number of high level meetings which have taken place in the recent past.  Our relations with China get very high priority in our strategic thinking.  We would like to develop this cooperative partnership based on equality in which each side should be sensitive enough to the concerns, aspirations and sentiments of the other nation.
As part of our practice of maintaining regular high level political exchanges, the Prime Minister has met the Chinese Premier very recently in Thailand. 
I had the pleasure of having a meeting with the Chinese Foreign Minister in Bangalore in the month of October.  We had very frank and constructive exchanges with the Chinese Foreign Minister.  Adding to this, the hon. President of India is scheduled to visit China next year. I have also been also invited to visit China for bilateral talks; and  I intend to go to China next year.
          Leadership in both the countries agree on the importance of strengthening cooperation and maintaining  forward looking approach to bilateral relations.  This can be done only when an atmosphere of trust, an atmosphere of mutual respect and understanding of each other’s positions on various issues can take place.
          We are also continuing with our Defence cooperation with China. Our Defence exchanges are also increasing. The Deputy Chief of General Staff of the Chinese Army visited Delhi in the first week of December. We will be holding the Third Defence Dialogue with China next month.  This will build better understanding between our Armed Forces.
Most importantly, the bilateral trade between our two countries has touched a new high of 52 billion US dollars this year, and we have jointly set a target to take it to 60 billion US dollars by next year.  Even though the trade deficit has been growing, and this obviously is a matter of concern to India, the Prime Minister himself has flagged this issue with the Premier during his meeting in Thailand and I have taken it up with the Foreign Minister of China in Bangalore.  We are pressing them for greater market access for Indian goods and services.  The Chinese side has promised to take measures to address our concerns.
There are other areas where the two countries  can gainfully, for mutual benefit, work together including in the field of energy, tourism, education, culture, science and technology, civil aviation, water resources, etc.  We are diversifying our exchanges and cooperation.
Well, this is the plus side of our relationship.
          But there are outstanding issues of which the boundary question is an important area where we have not been able to come to an amicable understanding between ourselves. Well, this is being discussed by a mechanism which has been created between the two countries by mutual acceptance that the Special Representatives, who are addressed, to sort out these boundary differences. I am sure the hon. House, more particularly, a seasoned Parliamentarian like Dr. Murli Manohar Joshi will appreciate the fact that this is a very complex issue and this is also time consuming issue because of the fact that the boundary has not been demarcated. We have only a Line of Actual Control between the two countries. Our perception and their perception may not find convergence, and in those areas we will have to argue with them and then try to find an acceptable solution to those issues.
          We have had 13 meetings at the level of Special Representatives, and I am sure more meetings are in the pipeline. Both the Prime Minister and myself have conveyed to the Chinese leadership that our differences over the boundary question should not be allowed to affect our functional cooperation in other areas. The importance of both sides maintaining peace and tranquillity in our border areas has also been underscored. It goes without saying that we will remain vigilant on our borders. Our Armed Forces are regularly patrolling all areas along the border with China.
          A mention was made about the infrastructure development all along the borders between India and China. Well, without trying to sound alarmistic, I would like to submit to this House with all humility that within the constraints of our resource that we have been trying to develop our infrastructure over the border line of India and China, and in the months to come, it is bound to increase. The momentum is going to be much higher than what I and you have been seeing of late. After going through very carefully our boundary issues and the concerns of the people, we will have to keep reporting to you because we are a democracy.  We are answerable to the people of this country, and this Government is answerable to this hon. Parliament.    Hence, we will have to keep reporting to you as whatever steps we take to strengthen our borders, to strengthen our infrastructure in our border areas. I think I would like to give an assurance to this House that we will continue to do so with all the might that is at our command.
          Now, having made these general points, I would like to go through some of the observations that the hon. Members have made. Due to the paucity of time, I will not be able to dwell at length some of the points which have been made, though important. I will have to be brief in my attempt to meet those concerns.
Dr. Murli Manohar Joshi himself made the point that there were 200 incursions or more. Yes, there were incursions. It is in the public domain that we have said it in answer to a number of questions that there have been incursions. But there is also a mechanism. Whenever such incursions take place on our boundary between China and India; between India and China, there is a mechanism which we have created that it gets sorted out there itself. Because it is not a demarcated boundary line and it is only a line of control, their perceptions and our perceptions can certainly differ. As a result of that, we have brought in a mechanism where we try to settle these issues at the local level, at the boundary level, and at the field level itself.
DR. MURLI MANOHAR JOSHI : I agree that you say that there is a mechanism. But what we find is that this mechanism has been violated more by China. That is, when you say that between this range of the line of actual control on our side and their side there will be no such activity, they have violated even that area and they have come to us. We have not gone to them. The whole point is that if there is a 10 km. or 5 km. or 8 km. border where there should be no such activity, neither we will go nor they will come. But they are coming within this area. I would like to know whether they recognize their actual line of control or not.
SHRI S.M. KRISHNA: I do not think that there could be such selective solutions to the boundary problem. I think whatever China does or whatever India does, it has to be on a basis which is acceptable to both India and China. So, if there are some incursions either by China or by India, then certainly we have to deal with it. The short point that I am trying to make is, Mr. Chairman, that we have tried to defuse these incursions, defuse these differences, so that it does not get enlarged into some kind of a major difference between these two big countries. It is the approach and hope of the Government of India that we will be able to contain these boundary incursions.
          I would like to commend the speech made by Shri Sandeep Dikshit. He was able to pin-point the strength of our country. He conveyed to this House that let us not be diffident. Well, 1960 was something, but 2009 is totally different. There is a sea-change which has come about. India has become strong in every sense of the term and we cannot be brow-beaten by anybody. So, when we have that kind of a confidence within ourselves, then I think we will be in a position to face regardless of who or how powerful the adversary is. But, this is not a bravado because I for one believe after talking to the Foreign Minister of China on a very serious note that China is willing to reciprocate.
          In fact, I was very pleasantly surprised when the Chinese Foreign Minister himself reminded me – I did not but he reminded me – about the five principles, Mrs. Chakravarty, of peaceful co-existence. … (Interruptions)
SHRIMATI BIJOYA CHAKRAVARTY  : But they never practice what they say. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Please take your seat.
… (Interruptions)
SHRI S.M. KRISHNA : Sir, I was surprised and I was impressed also. I had forgotten about the five principles of co-existence. But my counterpart in China reminded me of that and he assured me that China will adhere to those principles of co-existence. If that is done, then most of our problems which have been aired by certain Members of this hon. House will get automatically resolved and then, perhaps, we can happily live thereafter, each growing in his own right.
          Shri Vijay Bahadur Singh, hon. Member and Shri Shailendra Kumar, another hon. Member wanted to evaluate our shortcomings. Shri Vijay Bahadur Singh talked about a crisis of confidence. I think we do not have a crisis of confidence from our side. We are fully secure and we feel quite confident in what we are saying and how we are dealing with China and we know that China would understand our concerns and China will respect those concerns of ours.
          Shri Vijay Bahadur Singh also mentioned about stapled visa. Well, this is something which has come up very recently. I think we have reacted to it, the only way that a strong India can react to that. We have said – anything which is not stamped on the Indian passport will not be treated as a valid visa either to go out or to come into this country. So, how can you say that our policy towards China is weakening? How can you say that our policy towards China is soft? Well, we have not been hard; but we have been very correct. China must understand this and they will have to respect the way we are dealing with our visas in the last sixty years. Suddenly, they cannot introduce a new system where they would staple on a white paper and then attach it to our passports. We certainly are not going to compromise with the visa policy which has been laid down by the Ministry of External Affairs.
          Shri Jagdish Sharma drew our attention to the menace of duplicate drugs which are making their way into Indian territory. Well, duplicate currency and duplicate medicines – all these are menaces and we are keeping a close eye on how these come and where to checkmate it and where to prevent it. … (Interruptions) I think Shri Mahtab also did refer to the visa problem and the border problem. Shri Anant Geete mentioned that we are becoming a soft State.
          Well, I would reject that kind of a contention with the contempt that it deserves. We are not a soft State; we are a State which has earned the respect of the entire world today. You should just go out of India to understand how you are looked upon. I did study in the USA and I have seen how I was treated some 40 years ago and today, even when we go as an ordinary citizen, we are looked with awe, we are looked with admiration and we are looked with, shall I say, some subterranean jealousies also.  That is the kind of the new found stature that our country has acquired today. It is largely because of the efforts of a billion people – it is their effort - it is largely because of our intellectuals and it is largely because of the service sector of our industry that today we have been able to succeed.
          Now Shri Sanjoy Takam coming from Itanagar of Arunachal Pradesh, which has figured very much in this debate, also participated. Where were we weak-kneed? We were told that His Holiness Dalai Lama should not go to Arunachal Pradesh. We were told that our Prime Minister should not go to Arunachal Pradesh. Did the Prime Minister not go to Arunachal Pradesh? Did His Holiness Dalai Lama not go to Arunachal Pradesh? Did my predecessor, Shri Pranab Mukherjee not go to Arunachal Pradesh? Let me reiterate the resolve of this country, the resolve of the people, that Arunachal Pradesh is part and parcel of this great country of ours. … (Interruptions)
SHRI VIJAY BAHADUR SINGH (HAMIRPUR): Why are they objecting?
SHRI V. NARAYANASAMY: If they are objecting, you have to ask China. Why are you asking the hon. Minister? … (Interruptions)
SHRI S.M. KRISHNA: One point made by one hon. Member from Kashmir is why construction of a road in Jammu and Kashmir was stopped. Let me convey to this House that Government of India had no role to play either in the starting of that road project or in the halting of that road project. It was purely a decision which the State Government of Jammu and Kashmir has taken, with which the Government of India was neither consulted nor was it brought to our notice. Only we came to know through the media reports about that road. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : No question, no clarification now. There is a function at 6 o’clock in the Central Hall.
… (Interruptions)
SHRI S.M. KRISHNA: With reference to other Members who have raised certain issues, I will seek the indulgence of the Chair that I will be able to communicate to them as to what the Government of India’s feeling is.  But before concluding, Mr. Chairman, … (Interruptions) Let me conclude, then you can ask. … (Interruptions)
          We are fully cognizant of the need to protect and safeguard our borders and ensure that there is no erosion of our sovereignty. 
The situation in the India-China border areas is being constantly monitored. As I submitted earlier, we are strengthening the infrastructure in the border areas, and our defence system is well established and highly efficient. There is also excellent coordination between the various Departments.
          One point was made by a solitary Member that there is no coordination between the Ministry of Home and the Ministry of External Affairs and various other things. But let me assure that there has been perfect coordination between our Ministries in this regard.
          The resolution of differences on the border with China must be and can only be resolved peacefully. The history of the last 60 years of our relations with China cannot be simply brushed aside. We must learn from the experience, which has taught us that conflict is not a solution, and dialogue and negotiation provide the best way forward. Thank you very much, Mr. Chairman, Sir.
DR. MURLI MANOHAR JOSHI : I have given a small note. … (Interruptions)
SHRI BISHNU PADA RAY : I have to ask only two points from the hon. Minister. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Dr. Joshi, there is no time today. We will have to adjourn.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: There is a function at 6 o’clock. Please cooperate with the Chair.
… (Interruptions)
       
MR. CHAIRMAN: The House stands adjourned to meet tomorrow the 10th December 2009 at 11 a.m.   17.58 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Thursday, December 10, 2009 / Agrahayana 19, 1931(Saka).
   

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