Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Resolution Regarding Creation Of A New Union Ministry For The Development Of ... on 11 July, 2014

Sixteenth Loksabha an> Title: Resolution regarding creation of a new Union Ministry for the development of Himalayan States.

 

HON. CHAIRPERSON: Hon. Members, before I call Dr. Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’ to move his Private Members’ Resolution regarding creation of a new Union Ministry for the Development of Himalayan States, the time for discussion on this Resolution has to be allotted by the House. If the House agrees, two hours may be allowed for discussion on the Resolution.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

HON. CHAIRPERSON: Now Dr. Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’ to speak.

 

डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक (हरिद्वार): मैं प्रस्ताव करता हूं -

 “कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि हिमालयी राज्यों की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति तथा अवस्थान, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक वर्ष भूस्खलन, बादल फटने, भूकंप,   ओलावृष्टि और अन्य प्राकृतिक आपदाएं घटित होती हैं जिनके फलस्वरूप जान और माल का भारी नुकसान होता है, पर विचार करते हुए तथा इन राज्यों, विशेष  रूप से उत्तराखंड राज्य के सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए यह सभा केन्द्रीय सरकार से हिमालयी राज्यों के लिए एक स्वतंत्र केन्द्रीय मंत्रालय गठित करने का आग्रह करती है, जो इन राज्यों के समग्र और त्वरित विकास के लिए उत्तरदायी होगा और विशेष  रूप से निम्मनलिखित कृत्यों का निर्वहन करेगा---

 

(एक)  हिमालयी राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों की पहचान कराना एवं उनका सम्पूर्ण संरक्षण एवं समग्र                       विकास करना;

          (दो)    पिछड़े क्षेत्रों, विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष वित्तीय पैकेज                   उपलब्ध   कराना;

          (तीन)   विशेष रूप से उत्तराखंड राज्य में सीमा पार से हो रही घुसपैठ को नियंत्रित करने के लिए         प्रभावी उपाय करना; और           (चार)   नई रेलवे लाइनें बिछाने, जल विद्युत परियोजनाओं की स्थापना करने, सड़कों का निर्माण                   करने तथा अन्य अवसरंचनात्मक विकास परियोजनाओं के लिए संबंधित केन्द्रीय मंत्रालयों                            को अनुशंसा करना तथा हिमालयी संपदा पर आधारित उद्योगों की स्थापना कर आर्थिक                           मजबूती देकर पलायन रोकना।”             महोदया,हिमालय का जो पूरा क्षेत्र है,इसमें 11 राज्य हैं -उत्तराखंड,हिमाचल,असम,जम्मू कश्मीर,मणिपुर,मिजोरम,अरुणाचल,मेघालय,मणिपुर,नागालैंड और त्रिपुरा। इसका पूरा क्षेत्रफल 5 लाख 93 हजार वर्ग किलोमीटर है। कहीं घनघोर जंगल हैं,कहीं गगनचुम्बी पर्वत श्रृंखलाएं हैं,कहीं ताल पुग्यालय हैं तो कहीं घाट गदेरे हैं। बहुत ही विषम परिस्थितियों से जुड़ा है। यदि इसकी जनसंख्या को देखा जाए तो 2011 की जनगणना में 7 करोड़ 51 लाख 13 हजार 58 जनसंख्या होती है। 52 जिलों वाला हिमालय का क्षेत्र 40 लोक सभाओं का प्रतिनिधित्व करता है।

          महोदया,हिमालय राज्य का एक अलग से केन्द्रीय मंत्रालय बनाने की बात कोई नई नहीं है। यह समय-समय पर होती रही है। पहले भी 17 मार्च, 1992 को योजना आयोग ने विशेषज्ञों का दल गठित किया था। डा. जे.एस. कासिम उसके अध्यक्ष थे। इस दल ने पूरे हिमालय का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला था कि अति संवेदनशील होने के कारण यहां हिमालय विकास प्राधिकरण बनना चाहिए। प्राधिकरण का खाका भी तैयार कर लिया गया था। प्रधान मंत्री जी इसके अध्यक्ष होंगे और हिमालय का एक अलग मंत्रालय बनेगा। उसमें तीन मंत्री स्थापित होंगे। मैं कहना चाहता हूं कि यह हिमालय सालाना 10 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी एशिया महाद्वीप के सभी देशों को देता है और उत्तरी भारत की नदियों में हर साल 650 घन मीटर पानी हिमालय से ही आता है। यह हिमालय का क्षेत्र एशिया का वाटर टावर कहलाता है। यदि कहा जाए तो पानी की कुल जरूरत का 60 फीसदी हिमालय से ही मिलता है। हिमालय को एशिया का वाटर टावर इसलिए भी कहा जाता है कि इससे जो सैंकड़ों नदियां निकलती हैं,उन नदियों से जो पानी जाता है,वह भारत के तमाम राज्यों की 50 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या को आच्छादित करता है,प्यास बुझाता है और अन्न पैदा करता है। भारत में हिमालय का क्षेत्र 2,500 किलोमीटर है और इसकी चौड़ाई लगभग 400 किलोमीटर है। जल,जंगल,जमीन के अतिरिक्त इस हिमालय के दो बड़े पहलू हैं -मौसम और मानसून। यह उत्तरी एशिया से आने वाली बर्फानी हवाओं को रोककर हमें बर्फीली सर्दियों से बचाता है,मानसूनी हवाओं को रोककर भारत में बारिश बरसाता है।

16.00 hrs. दरअसल दक्षिण-पश्चिम से आने वाली सभी हवाएं भारत समेत पूरे उपमहाद्वीप में फैलती हैं। यदि हिमालय न होता,तो इन्हें रोकने के लिए कोई बाधा न मिलती और हवाएं मध्य एशिया की तरफ जातीं। हिमालय इन हवाओं के सामने एक दीवार खड़ी कर देता है और इन्हें भारतीय मैदानों में बरसने के लिए मजबूर करता है।    हिमालय के कारण उत्तर प्रदेश,पंजाब,हरियाणा,बिहार जैसे बहुत सारे राज्य उपजाऊ मैदान को तैयार करते है। ये इलाके देश को खाद्यान्न का भंडार देते हैं। हिमालय के कारण इन इलाकों में तेज गति से नदियां भी बहती हैं।

          महोदया,यह हिमालय 7 करोड़ वर्ष पुराना युवा पर्वत है। यह सबसे पुराना है लेकिन युवा है। यह पुराना इसलिए है कि इसने बहुत कुछ दिया है। बहुत सारी मानव सभ्यताएं,संस्कृतियां,नदियां,ऋतुचक्र,मौसम,मानसून आदि दिये हैं। इतना ही नहीं,बहुत कुछ दिया है।

  16.01 hrs. (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair)           महोदय, यदि देखा जाये तो हिमालय पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। इसकी जो भौगोलिक परिस्थितियां हैं,वे कभी भूस्खलन,कभी भूकंप,कभी बाढ़ से प्रभावित होती हैं। मैं बताना चाहता हूं कि चाहे मालपा का प्रकरण हो,जिसमें 14 राज्यों के तमाम लोग हताहत हुए थे,चाहे ओखीमठ का प्रकरण हो,चाहे उत्तरकाशी का भूकंप प्रकरण हो या वर्तमान में आयी केदारनाथ की त्रासदी हो,जिसमें 24 राज्यों के 20 हजार से भी अधिक लोग हताहत हुए। इसकी विषम भौगोलिक परिस्थितियां और अपने प्रकार की जटिल समस्याएं हैं। इन समस्याओं को देखते हुए बार-बार यह बात उठती रही है कि हर हालत में हिमालय राज्यों का एक अलग मंत्रालय हो,जो उसकी अलग नीतियां बनाये। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी कोई नीति इस स्तर पर नहीं बनती है। यदि प्राकृतिक आपदा और भौगोलिक स्थिति से अलग हटकर देखा जाये,तो सामरिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह कई अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं जैसे चीन,पाकिस्तान,बंगलादेश,म्यंमार आदि से जुड़ता है। इन सीमाओं की सुरक्षा भी बहुत जरूरी है। जहां कहीं माओवाद की गतिविधियां फैलती हैं वहीं अरुणाचल में म्यंमार की ओर से घुसपैठ होती है।

          श्रीमन्,हम उत्तराखंड की बात करें,तो लगभग 250 किलोमीटर नेपाल की सीमा और लगभग 325 किलोमीटर खुली चीन की सीमाओं से यह क्षेत्र जुड़ा है। पिछले दिनों माओवाद की गतिविधियां सारे देश के सामने आयी थीं,जब माओवादियों का एरिया कमांडर को गिरफ्तार किया गया था,उनके कैम्पों को ध्वस्त किया गया था जो भारत की सीमाओं पर थीं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि देश की एकता,अखंडता और देश की सामरिकता की दृष्टि से भी बहुत जरूरी है कि एक ऐसा केन्द्रीय मंत्रालय गठित हो,जो इन सबकी चिन्ता करे। लिपुलेख और काली नदी से लेकर मेलाघाट और चाहे बाड़ाहोती,बद्रीनाथ के आगे की सीमा बाड़ाहोती में जब तब चीन के सैनिक घुस आते हैं। यह नितांत सामरिक दृष्टि से संवेदनशील है। इसलिए देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने की दिशा में भी यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए बार-बार ये बातें उठती रही हैं। जैसे मैंने अभी कहा कि हिमालय वाटर का एक पुंज है। इसकी जो नदियां हैं,चाहे जम्मू-कश्मीर की चिनाब और सतलुज हो,चाहे हिमांचल की रावी,सतलुज,व्यास,यमुना हो चाहे उत्तराखंड की गंगा,यमुना,शारदा,काली गंगा हो चाहे सिक्किम की ताप्ती नदी,लोहन और लाछु नदी हो,चाहे मेघालय की दुधनायी और कृष्णनायी,चिनारी और दीदक इत्यादि नदियां हों।  चाहे त्रिपुरा की गोमती,मनु,ढलाई और ख्वाही नदी हो या मिजोरम की दिवांग,तुरैल,तुवाल,कोडाट सहित तमाम नदियाँ हों चाहे मणिपुर की वराक हो चाहे नागालैंड की धनसारी,दोयांग,दिफु सहित बहुत सारी नदियाँ हैं। अरूणाचल की कामिंग,सुवानसिरी,लोहित सहित असम की तमाम नदियों को यदि देखा जाए तो ये हिमालय पूरे एशिया का वाटर टावर है। इसकी सुरक्षा बहुत जरूरी है क्योंकि ग्लेशियर पीछे जा रहे हैं,इससे नदियों का पानी कम होगा। पूरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में संकट होगा। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि उस हिमालय का संरक्षण और संवर्धन उसी ताकत के साथ किया जाए। श्रीमन,यदि देखा जाए तो ये जो हिमालय का क्षेत्र है,ये पूरे देश और दुनिया को जवानी भी देता है,पानी भी देता है और प्राणवायु भी देता है।

           देश की सीमाओं से लगे,यदि मैं उत्तराखंड की बात करूं तो यहाँ के औसतन एक परिवार से एक व्यक्ति सेना में भरती होकर पहली पंक्ति में राष्ट्र की सीमाओं पर कुर्बानी देता है। दूसरी पंक्ति में उसकी माँ-बहनें दो-दो विदेशी सीमा पर सेनानी की तरह देशभक्ति का अनन्य प्रमाण देती हैं। वर्ष 1962 का चीन का युद्ध इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड की महिलाओं ने सेनानियों की तरह चीन की सीमाओं को रोका था। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि यह देश की आजादी से पहले हो या देश की आजादी के बाद,ये हिमालय के इन सपूतों ने देश की आजादी से पहले,यदि देखा जाए तो देश की रक्षा में तमाम लोगों ने वीरता के पदक प्राप्त किये। देश की आजादी से पूर्व लगभग 365 वीरता-पदक इस हिमालय के लोगों ने प्राप्त किया है। देश की आजादी के बाद चाहे परमवीर चक्र हो,अशोक चक्र हो,महावीर चक्र हो,कीर्ति चक्र हो,शौर्य चक्र हो,वीर चक्र हो लगभग 1034 पदक तो अकेले उत्तराखंड के हैं। 1034 पदकों में से परमवीर चक्र है,पाँच लोगों को अशोक चक्र मिला है,महावीर चक्र ग्यारह लोगों को मिला है, 24 लोगों को कीर्ति चक्र मिला है,वीर चक्र 95 लोगों को मिला,शौर्य चक्र 140 लोगों को मिला। यदि इनकी संख्या देखी जाए तो 1034 केवल और केवल उत्तराखंड की वीरभूमि से हैं,जिन्होंने देश का माथा ऊँचा किया है। पहली पंक्ति में देश की सेवा के लिए अपने को कुर्बान किया है। इसलिए श्रीमन,मैं यह कहना चाहता हूं कि जो क्षेत्र जवानी भी देता हो,देश को पानी भी देता हो और प्राणवायु भी देता हो,यह भारत सरकार की वन-नीति है कि 60 प्रतिशत से अधिक यह हिमालय का क्षेत्र वन उपज देता है,वनों से आच्छादित है। 60 प्रतिशत से भी अधिक वन क्षेत्र हिमालय की श्रृंखला इस बात को साबित करता है कि हम आक्सीजन देते हैं। ये 60 प्रतिशत जो वहां की वन उपज है,उस पर ये हिमालय के लोग हाथ भी नहीं लगाते हैं। वहाँ पर जो तमाम वन की उपज है,उसकी रक्षा करते हैं। श्रीमन्,एक छोटा-सा उदाहरण दूंगा,शायद वह दुनिया का बहुत बड़ा उदाहरण होगा,अकेले उत्तराखंड में 12500 वन पंचायतें हैं। इन वन पंचायतों में यदि 20-21 लोग भी हों तो ढ़ाई लाख से पाँच लाख लोग अपने प्राणों को हथेली पर रखकर उन वनों की रक्षा करते हैं। जब वनों में आग लगती है,तो परिवार के परिवार कूद जाते हैं। इसमें तमाम लोग हताहत हुए हैं। दर्जनों-दर्जनों और सैंकड़ों लोग,यदि पहले से देखा जाए,तो ये वन क्षेत्र को अपने बच्चों की तरह पालते हैं,लेकिन स्थिति क्या है?स्थिति यह है कि उनको हक़-हक़ूक नहीं मिलते। उनको हल लगाना पड़ता है। उनको एक छोटी-सी लकड़ी नहीं मिलती। वे एक सूखी लकड़ी भी नहीं उठा सकते हैं। ये चारा-पत्ती भी नहीं उठा सकते हैं। वन अधिनियम, 1980 इतना कड़क है कि उसने वहाँ के लोगों को पलायन करने के लिए मज़बूर कर दिया है। लोग बच्चों की तरह अपने जंगलों को पालते थे,आज वे दुश्मन की तरह खड़े हो गये हैं। इसलिए जो भारत सरकार की नीति है,यह नीति ठीक नहीं है। जो मित्र थे,उनको शत्रु बनाने की नीति थी। इस प्रकार बनाकर लोगों को खड़ा कर दिया। इसलिए जो वन सम्पदा है,इसका भी उपयोग हिमालय के लोग नहीं कर पाते हैं। इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि ऐसी जो परिस्थितियाँ हैं,जो लोगों को हक़-हक़ूक मिलता था,वे लोगों को मिलने बंद हो गये थे। अपने खेत में उपजे पेड़ को भी वह काट नहीं सकता,उसके लिए कानून है। अपने खेत में उगे पेड़ को काटने के लिए भी उसे दर-दर भटकना पड़ेगा,अनुमति लेनी पड़ेगी। हमने वनों को मित्र बनाने की जगह लोगों को उसका दुश्मन बना दिया है। इसलिए यह बात बार-बार आती है कि हिमालय के लिए एक अलग नीति होनी चाहिए,एक अलग मंत्रालय होना चाहिए,यह तथ्य उस बात को और पुख्ता करता है।

          श्रीमन्,मैं कहना चाहता हूं कि हिमालय का यह क्षेत्र कई मायने में बहुत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पूरी दुनिया की अध्यात्म की राजधानी है,देश की संस्कृति का प्राण है। यह वही क्षेत्र है जहां वेद,पुराण और उपनिषदों का जन्म हुआ है। यह वही हिमालय क्षेत्र है जहां आयुषो वेदः -आयुर्वेद की बात हुई है। स्वस्थ से स्वास्थ्य-रक्षणम् की बात हुई है। आज सारी दुनिया योग पर आकर ख़डी हो गयी है। सारी दुनिया थकहार करके आयुर्वेद पर खड़ी हो गयी है। यह हमारी शाश्वत चिकित्सा है,इस शाश्वत चिकित्सा का जन्म भी हिमालय की इस धरती उत्तराखण्ड में ही हुआ है। चरक ऋषि का डांडा आज भी वहां पर है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि आयुर्वेद,जो जड़ी-बूटियां हैं,जो हमारी संजीवनी जड़ी-बूटियां हैं,ये हिमालय के क्षेत्र में ही हैं। ये पूरी दुनिया के तन को ठीक करने का माद्दा रखती हैं और इसलिए आयुर्वेद का विकास करना,उस क्षेत्र में जड़ी-बूटियों का उत्पादन करना,इससे दोनों काम होंगे। जहां वन हमारे पर्यावरण को संशोधित करते हैं,यदि यहां के किसानों द्वारा इन जड़ी-बूटियों का उत्पादन एवं दोहन करने की एक नीति होती,तो आज यह सारा हिमालय का क्षेत्र बहुत सरसब्ज होता,वहां से पलायन नहीं होता। पलायन वहां का बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। मैंने जैसे अभी आंकड़े दिए हैं,जिस दिन हिमालय क्षेत्र का नौजवान पलायन करेगा,गांव खाली होंगे,देश की सुरक्षा को खतरा होगा,देश को ऐसे नौजवान नहीं मिलेंगे,पुरुषार्थी वीर नौजवानों का सेना में भर्ती होने के लिए अभाव पैदा होगा,जो अपनी जान को हथेली पर रखकर देश के लिए किसी सीमा तक कुर्बानी देते हैं। इसलिए यह उत्तराखण्ड,जो आयुर्वेद का जन्मदाता है,मैं समझता हूं कि सारी दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आपको याद होगा कि जब लक्ष्मण मूर्छित हुए थे श्रीलंका में,तब हनुमान जी यहीं उत्तराखण्ड से,द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी लेकर गए थे उनकी मूर्छा को ठीक करने के लिए। यह वही क्षेत्र है। यह द्रोणागिरी पर्वत आज भी हमारे पास है। यह जोशीमठ से आगे दस किलोमीटर क्षेत्र में है। आज भी वहां के लोग हनुमान जी की पूजा नहीं करते हैं क्योंकि द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा टूट हुआ है। वे लोग उस पर्वत की पूजा करते थे। वे लोग हनुमान जी से आज भी बहुत नाराज हैं कि हमारे पर्वत को हनुमान जी उखाड़कर ले गए। मैं संदर्भवश इस बात को इसलिए कह रहा हूं कि जब हमारे पास आज भी जड़ी-बूटियां हैं,जब हमारे पास पूरी दुनिया के तन को ठीक करने का माद्दा है,तो क्यों न भारत सरकार के स्तर पर ऐसी नीति बनाई जाए जो न केवल देश की व्याधियों को दूर करने का माद्दा रखे,बल्कि दुनिया भी आश्वस्त हो भारत के प्रति,कि हिन्दुस्तान में जो आयुर्वेद की शाश्वत चिकित्सा है,उससे वे जिन्दा रह सकते हैं। इसलिए मैं बड़े पुजरोज तरीके से इस बात को भी कहना चाहता हूं। अभी राम देव जी ने योग और आयुर्वेद को पूरी दुनिया में लहलहाया है,वे उसी उत्तराखण्ड की धरती से आते हैं। आज हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में गौरव से सिर ऊंचा करके योग और आयुर्वेद की बात करता है।

          श्रीमन्,अध्यात्म के क्षेत्र में,जैसा मैंने कहा है,यदि यह हिमालय का क्षेत्र पूरी दुनिया के तन को ठीक करने का माद्दा रखता है,तो यह हिमालय का क्षेत्र मन को भी ठीक रखने का माद्दा रखता है। जब भी दुनिया का आदमी हताश,निराश होता है,हताशा,निराशा और कुहासा से होकर गुजरता है,तब-तब वह हिमालय के क्षेत्र में आकर एक नए जीवन को लेकर जाता है। यह ऋषि-मुनियों की तपस्थली है। यहां वेद,पुराण और उपनिषद पैदा हुए हैं और इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह भारत की संस्कृति का प्राण है। यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। याद दिलाना चाहता हूं विवेकानन्द मायावती आश्रम से जब शिकागो के लिए गए थे,उस समय यह स्थान अल्मोड़ा जिले में था,अब चम्पावत जिले में आ गया है,वहां उन्होंने पहली बार पूरे देश का पहला प्रेस मायावती आश्रम में लगाया था। विवेकानंद जी मायावती से हिमालय की प्रेरणा को लेकर शिकागो गए थे। जब वह शिकागो से लौटे तो सबसे पहले उसी भूमि को उन्होंने प्रणाम किया था। जो अध्यात्म की ताकत थी,वह हिमालय से लेकर गए थे,जिसे उन्होंने सारी दुनिया में फैलाया था।

          यहीं पर दुनिया के चार धाम बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री और यमुनोत्री हैं। इसके अलावा हेमकुण्ड साहब,रीटा साहिब भी यहीं पर हैं और इतना ही नहीं यहीं पर शक्तिपुंज भी हैं। हर कदम पर वहां शांति और शक्ति के केन्द्र हैं,पुंज हैं। यह धरती ऋषि-मुनियों की धरती है इसलिए मैं समझता हूं कि यह केवल देश के लिए ही नहीं,बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

          श्रीमन्,मैं यह भी कहना चाहता हूं कि शिक्षा का बड़ा केन्द्र भी यह क्षेत्र रहा है। दुनिया का पहला विश्वविद्यालय उत्तराखंड की धरती पर था,जिसका नाम बद्रीश विश्वविद्यालय था और स्वयं वेद व्यास इसके कुलाधिपति थे। यह वही धरती है जहां संस्कृत का जन्म हुआ। संस्कृत से ही सारी दुनिया की भाषाएं पैदा हुई हैं। इसलिए यह भूमि संस्कृत की जन्मदात्री है। मुझे गौरव होता है इस बात का कि कालिदास जी की भी जन्मस्थली वही उत्तराखंड और हिमालय है।

          श्रीमन्,जिस महापुरुष के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा,उस भरत की भी जन्मस्थली उत्तराखंड है। कोटद्वार के पास कर्ण आश्रम है,जहां भरत का जन्म हुआ था और आज उस महापुरुष के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा है। इसलिए यह जो उत्तराखंड है,जो हिमालय का क्षेत्र है,जो 11 राज्य हैं,वे हिन्दुस्तान के लिए प्रेरणा के पुंज हैं। शिक्षा के केन्द्र के बारे में चाहे ऋषि-मुनियों की तपस्थली हो,चाहे गुरुकुल हो,वर्तमान में भी अगर देखा जाए तो नैनीताल,मसूरी,देहरादून तीन ऐसे स्थान हैं,जहां दुनिया के आधे से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। दुनिया का सर्वाधिक बच्चा अगर कहीं पढ़ता है तो वह हिमालय की इस कंधरा में पढ़ता है। आज यह क्षेत्र शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र है। आप देखें कि आईएएस अकादमी,आईएफएस अकादमी,सैन्य अकादमी,आईआईएम,आईआईटी ये तमाम ऐसे महत्वपूर्ण संस्थान हिमालय के केन्द्र में हैं,जो निश्चित रूप से शैक्षणिक वातावरण को पूरी दुनिया के लिए तैयार करते हैं।

          श्रीमन्,ज्योतिष का भी यहीं जन्म हुआ है। जिसके सामने विज्ञान भी बौना पड़ता है। ज्योतिष जो लाखों वर्ष पहले और लाखों वर्ष आगे की गणना करने की ताकत रखता है,ऐसे ज्योतिष विज्ञान का भी यहीं जन्म हुआ है। लेकिन नीति के अभाव में आज वह ज्योतिष विज्ञान दम तोड़ रहा है। इसीलिए बार-बार इस बात को कहने के लिए हिमालयवासी खड़े होते रहे हैं कि यह जो देश की आत्मा है,वह मर रही है,भटक रही है। यह देश की संस्कृति का प्राण है,लेकिन वह मुरझा रहा है,इसे बचाने की जरूरत है। इसलिए ज्योतिष केन्द्र जो देवप्रयाग में इतना बड़ा था,सारी दुनिया के लोग यहां आते थे।

          मैं यह भी कहना चाहता हूं कि वेद-पुराण,उपनिषदों का जन्मदाता भी यह हिमालय है। मैं पिछले दिनों जब यूरोपीय देशों की यात्रा पर गया था,तो मुझे बर्लिन में बताया गया कि यहां पर वेद भवन है। मुझे बर्लिन में यह कहा गया कि वेद का जन्म इधर ही होता है। यदि हम अपनी इन थातियों को सम्भाल कर नहीं रखेंगे,तो वही स्थिति होगी जैसी हमारी जड़ी-बूटियों की हो रही है। आज चीन हमारी कई जड़ी-बूटियों को पेटेंट करा रहा है। किड़ा जैसी जड़ी जो एक किलोग्राम दस लाख रुपए की बिकती है,उसका भी यही हश्र हो रहा है। इस तरह की बहुत सी ऐसी जड़ी-बूटियां हैं,जो सारी दुनिया में नहीं मिलतीं,लेकिन हमारे हिमालय में मिलती हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन की जरूरत है। भारत सरकार को चाहिए था कि इस शक्ति पुंज को संरक्षित और सुरक्षित रखती। लेकिन ऐसा नहीं होने पर वहां के लोगों द्वारा बार-बार यह मांग   उठती है कि उस क्षेत्रवासियों को ही इनकी जरूरत नहीं है,बल्कि देश को भी जरूरत है। वह सारा क्षेत्र तो देश के लिए कुर्बान है,देश के लिए समर्पित है इसलिए देश एक ऐसा मंत्रालय होना चाहिए जो उसकी नीतियों को सुनिश्चित करे और देश की समृद्धि और संवर्धता के लिए वह क्षेत्र महत्वपूर्ण साबित हो सके।

          श्रीमन्,जहां तक संस्कृति की बात है,ऐसी परम्पराएं हैं,सांस्कृतिक परम्पराएं हैं,धरोहर हैं कि जो देश की एकता और अखण्डता को और देश के मन को बढ़ाती हैं। ऐसी उस संस्कृति के संरक्षण की भी जरूरत है। मैं एक छोटा सा उदाहरण यहां देना चाहूंगा। नंदराज हिमालय का महाकुम्भ एक नंदराज स्थान की यात्रा होती है। जो पूरी दुनिया में सबसे बड़ी ऊंचाई पर होने वाली, 280 किलोमीटर,यात्रा है,जो 20 दिन में पूरी होती है। वह एकता का,सौहार्दता का,साहस का,पराक्रम का प्रतीक है।  जो जूरागली को पार होकर जाते हैं,मौत को भी मात देते हैं। श्रीमन्,उसमें जाति-पांती नहीं,सारे लोग एक साथ रहते हैं। वहां के लोग अपने घरों को इन अतिथियों के लिए खाली कर देते हैं,उनको यह मतलब नहीं होता है कि ये कहां से आये हैं,कौन जाति के हैं,अच्छे हैं या खराब हैं। सारे अतिथि लोग आते हैं और लोग अपने गांवों में उन्हें ठहराते हैं। वे मानते हैं कि “यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता” । नारी का सम्मान करना हिमालय की संस्कृति में है और उसके सामने दुनिया कहीं खड़ी नहीं होती है। इसलिए हिमालय के इस महाकुंभ को नंदा राजा ने दिया था जो पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा का स्रोत रहा है। ये परम्पराएं देश को ताकत देती हैं,जीवन को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती हैं। इसलिए यह चाहे सांस्कृतिक दृष्टि से हो या आर्थिक दृष्टि से हो,इसका बहुत महत्व है।

          गंगा स्वर्ग से उतरकर हिमालय की धरती उत्तराखंड में सारे विश्व के कल्याण के लिए आई। गंगा सामान्य नदी नहीं है। मुझे अफसोस होता है कि आजादी के बाद गंगा को वह स्थान नहीं मिला जो उसे मिलना चाहिए था। गंगा को अभी राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया है। हम गंगा को नदी नहीं कह सकते हैं,गंगा तो हमारी मां है,इसलिए वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय धरोहर है। वर्ष 2010 का जो महाकुंभ हुआ उसे मैंने मुख्यमंत्री के नाते आयोजित किया था। करीब 150 देशों के लोग और करीब साढ़े आठ करोड़ लोगों ने गंगा का स्पृश किया। पूरी दुनिया गंगा को स्पृश करने के लिए लालायित थी। इसलिए पूरी दुनिया में गंगा के लिए केवल श्रद्धा का ही भाव नहीं है बल्कि मां का भी भाव है।

          मैंने कहीं पढ़ा था कि जब अकबर ने अपने नौ-रत्नों को पूछा कि इस देश की सबसे पवित्र नदी कौन सी है तो सबने कहा कि गंगा है,लेकिन बीरबल ने कहा कि सबसे पवित्र नदी यमुना है,सब लोग ठहाके मारकर हंसे। जब अकबर ने कहा कि बीरबल तुम्हें इतना भी पता नहीं कि इस देश की सबसे पवित्र नदी गंगा है तो उन्होंने कहा कि पवित्र नदी गंगा नहीं है,नदी पवित्र तो यमुना है,गंगा तो हमारी मां है,वह नदी नहीं है। श्रीमन्,गंगा का जल अमृत है और मैं नहीं समझ पाया कि देश में गंगा के संवर्धन ओर संरक्षण के लिए नीति क्यों नहीं बनी,क्योंकि गंगा की एक बूंद हजारों बीमारियों से लड़ने की क्षमता रखती है। जीते-जी तो लोग गंगा का जल पीते ही थे मरने के बाद भी उसके मुंह में गंगा की एक बूंद डालते थे और यह परम्परा आज भी जारी है।

          गंगा का जल वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो पूरी दुनिया में यही जल है जो सड़ता नहीं है। सच में वह अमृत-जल है जो नया जीवन देता है। मैं माननीय प्रधान मंत्री जी का अभिनंदन करना चाहता हूं कि उन्होंने गंगा पर एक अलग मंत्रालय बनाया है। उन्होंने यह भी कहा है कि गंगा ने मुझे पुकारा है,गंगा ने मुझे बुलाया है। मेरा भरोसा है कि भगीरथी नदी की तरह तमाम थपेड़े खाने के बाद भी जो गंगा रुकी नहीं है जो तमाम गंदगी को भी अपने में समाने के बाद भी पवित्र है,अविरल है और जिसने अपनी पवित्रता को नहीं खोया है,ऐसी गंगा की तरह हमारे प्रधान मंत्री जी भी इस देश को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे,ऐसा मेरा पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा है कि गंगा ने मुझे बुलाया है। उन्होंने गंगा पुत्र होने के नाते कहा है और सच में गंगा ने उन्हें बुलाया है। मुझे इस बात की खुशी है कि जब मैं मुख्यमंत्री था,तब स्पर्श गंगा बोर्ड बनाया था गंगा और उससे संबंधित जल धाराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए। यह इस देश की जरूरत है और दुनिया की भी जरूरत है। यह केवल एक क्षेत्र की जरूरत नहीं है। जब हम हिमालय की बात करते हैं,तो केवल इन 11 राज्यों की बात नहीं करते हैं,हम इस देश की बात करते हैं,बल्कि दुनिया की बात करते हैं क्योंकि यह वह क्षेत्र है जो पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। गंगा का पानी अमृत है। मैं वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने नमामि गंगे अभियान चलाया है,योजना बनाई है। मुझे भरोसा है कि जो अभी तक छटपटाहट थी,जो काम नहीं हो पा रहा था वह काम होगा और जिस काम के लिए गंगा धरती पर अवतरित हुई है,वह मकसद पूरा होगा।

          श्रीमन्,हिमालय क्षेत्र को धरती का स्वर्ग भी कहते हैं। यहां सैकड़ों स्विटजरलैंड बसे हुए हैं। यदि मैं जम्मू-कश्मीर से ले कर हिमाचल के कुल्लू-मनाली,श्रीनगर के पहलगांव,अमरनाथ,गंगटोक,गौहाटी आदि जगहों की चर्चा करूं तो सैकड़ों स्थान ऐसे हैं,जहां जा कर लोग अपने मन को शांत करते हैं। यहां प्रकृति ने बेशुमार सौंदर्य बिखेरा है जिसे देखने के लिए पूरा देश ही नहीं बल्कि दुनिया भी तरसती है। इस धरती के स्वर्ग को और संजोने की आवश्यकता है। हम कहां चूक कर रहे हैं,यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है। निश्चित रूप से चूक हो रही है इसलिए मैं आज विनम्रता से इस संकल्प को ले कर आया हूं। यह राजनीति से ऊपर उठ कर है। यह एक क्षेत्र को राजनीतिक दृष्टि से कोई सम्मान देने की बात नहीं है,बल्कि देश के गौरव की बात है। यह विश्व के कल्याण की बात है। मैं कहना चाहता हूं कि चाहे वह नैनीताल हो,मसूरी हो,हर की दून हो,चौखटा हो,इन्हें देखने के लिए दुनिया तरस रही है। यह जो धरती का स्वर्ग है,जिसमें ताल है,बुग्याल है,दयारा बुग्याल,कांठी बुग्याल जहां एक बार आदमी जाता है तो वहां से वापिस जाने का मन नहीं करता है,श्रीमन्,आप वहां गए होंगे,अगर नहीं गए हैं तो मैं आपने निमंत्रण देता हूं। मैं समझता हूं कि जिस तरीके के ये पर्यटक स्थल हैं,धरती का बेशुमार सौंदर्य उत्तराखंड सहित तमाम 11 राज्यों में बिखरा हुआ है,इसे संजोने की जरूरत है। हमारे डॉक्टर साहब तो आगे बैठे हैं,वे सौंदर्य को दिखाते भी हैं। बुग्याल सहित तमाम ऐसे सुंदर स्थान हैं।

          महोदय,हिम क्रीडा,जल क्रीडा के भी सबसे बड़े स्थान हैं। हमारे वित्त मंत्री जी ने भी अपने भाषण में कहा था और बजट में भी प्रस्तावित किया कि दक्षिण एशियाई देशों के लिए जो खेलों की प्रतिस्पर्धा होगी उसमें हम अपने बच्चों को तैयार करेंगे और इसके लिए उत्तराखंड को एक बड़ा केंद्र माना,हिमालय क्षेत्र को केंद्र माना। यदि हम हिम क्रीडा में जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड को देखेंगे,हमारा सौभाग्य है कि हमने दक्षिण एशियाई हिम क्रीडा है सबसे पहले उत्तराखंड औली में की थी। आज भी बहुत समृद्धता है। पूरी दुनिया हिम क्रीडा के प्रति आकर्षित है और हम हिम क्रीडा के दुनिया में सबसे बड़े केंद्र हैं इसलिए चाहे औली है,कश्मीर की उन वादियों को व्यवस्थित करने की जरूरत है। जल क्रीडा में हम सबसे आगे हैं। हिमालय का जो क्षेत्र है चाहे गोडियाला है,टिहरी की झील 165 वर्ग किलोमीटर की है और यह दुनिया का जल क्रीडा का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है। चाहे साहसी पर्यटन की बात हो,साहरी क्रीडा हो,हिम क्रीडा हो,जल क्रीडा हो,हम इनके बड़े केंद्र हैं। उत्तरकाशी का नेहरू पर्वतारोहण है,चाहे बिछेन्द्रीपाल जो पहली महिला एवरेस्ट विजेता है,चाहे आईटीबीपी के जवान श्री पोखरियाल हों। दर्जनों-दर्जनों लोग चाहे हर्षवंती बिष्ट हों,चाहे चन्द्र लेखा जी हों,साहस करके एवरेस्ट पर पताका फहराई है।

          सेब चाहे वह जम्मू कश्मीर हो या उत्तराखंड हो,चाहे वह हिमांचल हो,दुनिया में इन जगहों से अच्छा सेब कहीं नहीं मिलता है। ये पूरी घाटी सेब की है। जो अदरक,माल्टा और लीची है,अगर देखा जाए तो यह पूरा हिमालय अद्भुत है। इसलिए हमें बार बार दुख होता है क्योंकि इस हिमालय की धरती पर कई तरह के बीज उपस्थित होते हैं लेकिन उनकी ठीक व्यवस्था नहीं है। उत्तराखंड और हिमालय की धरती पर ऐसे फूल होते हैं जो 6-6 महीने तक जिंदा रहते हैं और यदि धरती पर कहीं ऐसे फूल जो 6-6 महीने तक जिंदा रहते हैं तो वे इस हिमालय की श्रृंखला में पैदा होते हैं,जैसे ब्रहमकमल भी है।

          बुरास एक फूल है। यह हृदय रोग का अचूक वाण है। सौगत राय जी, मैं आपको विशेष रूप से कहना चाहता हूं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि यदि हृदय रोग किसी को हो तो बुरास के पत्ते का जूस पीने से सारे हृदय के रोग एक साथ खत्म हो जाते हैं।...(व्यवधान)

          जो ब्रहमकमल है और भी कई ऐसे पुष्पकमल हैं जो सुगंधित होते हैं। यह इत्र यहीं से तैयार होता है जो सुगंध को बिखेरता है चाहे सौंदर्य प्रसाधन का हो या खाद्य पदार्थ का हो और चाहे दवाइयों का हो। यहां की जो जड़ी-बूटियां हैं,जो पुष्प हैं,यदि इस पुष्प को थोड़ा सा भी तोड़ा जाए तो यह पूरा का पूरा महकने लगेगा। ऐसे पुष्प हमारे यहां हैं। हम तो खुशबू देते हैं। हम फूलों की खुशियां और खुशबू देते हैं। हमारे यहां 16-16 कि.मी. तक फूलों की घाटी है। कभी किसी को भरोसा नहीं होता और 700-800 किस्म के फूल यहां होते हैं। ऐसी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि देश के अंदर ऐसी भी घाटियां हैं। यह हमारे उत्तराखंड में हैं। हमारे हिमालय की बर्फ में हैं। हमारे आसन से लेकर मणिपुर,मिजोरम और कश्मीर से लेकर तमाम घाटियों में हैं। जिस घाटी में भी जाएंगे,वहां ऐसी ही फूलों की घाटियां दिखाई देंगी। हमारे यहां शैम्पू और तेल भी होता है। यह भी उन्हीं से निकलता है।

          कृषि के क्षेत्र में भी उत्तराखंड का बहुत योगदान है। अगली बार इत्र लेकर आऊंगा। ...(व्यवधान)

1962 की जो हरित क्रांति हुई थी,उसका जनक पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय है। यह पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय उसी धरती पर है और उस जमाने से लेकर हमारी जो जमीन है और जो उसमें उपज होती है,वह चाहे बासमती चावल हो,आज भी हमारे क्षेत्र में सैकड़ों राइस की मिलें हैं। आज भी गन्ने का उत्पादन होता है। लेकिन उचित नियोजन न होने के कारण और केन्द्र की सही नीति न होने के कारण हमारे किसान वहां दम तोड़ रहे हैं। अभी हरिद्वार में हमारे गन्ना किसानों का दो-दो साल से उनकी उपज का भुगतान नहीं हुआ। जो किसान अपनी उपज को पैदा करता है,वह सरकारों के सामने भिखारियों की तरह अपने पैसे के लिए गिड़गिड़ाता है जब उसकी बेटी या बेटे की शादी होती है तथा वह कर्ज भी लेता है। वह बैंकों के चक्कर काटता है और जब उसका मूल्य उसको मिलता है तो वह बैंकों के ब्याज में ही चला जाता है।

          उचित नीति न होने के कारण यह परिस्थितियां पैदा हुई हैं। हिमालय अपने में बहुत समृद्ध है। मैं सोचता हूं चाहे चायपत्ती के बागान हों,चाहे बासमती के चावल की खेती हो,चाहे गन्ने की खेती हो,चाहे अदरक,फूल या फल की खेती हो,हिमालय तो हर दृष्टि से शक्ति का पुंज है। हम बार-बार महसूस करते हैं कि क्यों हिमालय की ओर देखा नहीं जाता है?हिमालय को टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता,टुकड़ों में व्यवस्था नहीं की जा सकती,टुकड़ों में नीति नहीं बनाई जा सकती। हिमालय आरपार 2500 किलोमीटर के परिक्षेत्र में बसा है। इसकी सांस्कृतिक,आर्थिक,भौगोलिक सभी प्रकार की सम परिस्थितियां हैं इसलिए एक ही नीति बननी बहुत जरूरी है।

         श्रीमन्,खनिज सम्पदाएं बहुत हैं। आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि हिमालय क्षेत्र में सोने,तांबे,अभ्रक,चूने की खानें हैं। यहां ऐसे पत्थर हैं जो दुनिया में कहीं दिखते भी नहीं होंगे। यहां ऐसी बहुत महत्वपूर्ण खानें हैं। मुझे याद आता है कि अंग्रेजों ने 1914 में चमौली जिले में एक सुरंग खोदी थी और सोने की खान में कण मिले थे लेकिन यह काम आधा अधूरा पड़ा है। इसके बाद खनन की कोई नीति नहीं बनी और सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। सम्पदाएं और इतनी बड़ी खानें दम तोड़ रही हैं। यहां पत्थर,अभ्रक,तांबा, गंधक,मैग्नीशियम की खानें हैं। इतना ही नहीं यहां थोरियम की खानें भी हैं। तोप और गोले के प्रयोग में जो मैटीरियल यूज होता है,यहां उसकी भी खानें हैं लेकिन आज तक इसके बारे में चर्चा तक नहीं हुई है। हिमालय का क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। आज चीन हमारे सिर के ऊपर आ गया है। 1962 में हमारी स्थिति खराब हुई थी क्योंकि सड़कें वहां तक नहीं थी। चीन हमारे ऊपर आ गया है और हम अभी तक वहां नहीं पहुंचे हैं। यह नीति सीमाओं से संबंधित है इसलिए यह बहुत जरूरी है।

       जब मौसम परिवर्तन की बात होती है तो पूरी दुनिया चिंतित हो जाती है। एयरकंडीशन बंगलों में बैठकर बड़ी चर्चाएं होती हैं,सेमिनार होते हैं। मौसम परिवर्तन और असुंतलन के कारण धरती की उष्णता बढ़ी है,यदि हिमालय को बचाया नहीं गया तो धरती आग का गोला बन जाएगी। यह बात दुनिया की समझ में आनी चाहिए क्योंकि जो लोग हमें पर्यावरण की शिक्षा देते हैं कि हम एक पेड़ भी न काट सकें,हिमालयवासियों को एक पेयजल योजना के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और अनुमति नहीं मिलती है। वनों का हस्तांतरण बहुत मुश्किल से होता है तब जाकर एक मकान बनता है या सड़क बनती है। आज भी 80 किलोमीटर दूर सड़क नहीं है,रास्ता नहीं है,लोग भटकने के लिए मजबूर होते हैं। पर्यावरण की रक्षा के बारे में दुनिया के देश बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन सबसे ज्यादा वे ही पर्यावरण को दूषित करते हैं। मेरा अनुरोध है कि यदि हिमालय की टोटल नीति बनेगी,यह नीति न केवल इस देश बल्कि दुनिया तक को प्रभावित करेगी। आजकल बार-बार ग्लोबल वार्मंग की बात होती है,ये सब इसी का ही नतीजा है।

           मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहता हूं कि वर्ष 2004 में ट्रांस हिमालय विकास प्राधिकरण के गठन की बात हुई थी। मैंने कहा कि वर्ष 1992 में माननीय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बात हुई थी और उसके बाद 2004 में हुई थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि अब यह कहां रुक रही है। 2004 में ट्रांस हिमालय प्राधिकरण बनाने की बात हुई लेकिन यह जहां की तहां है। मैं समझता हूं कि अगर हिमालय खतरे में रहेगा तो पूरी दुनिया को खतरा रहेगा। हिमालय की सुरक्षा,सुंदरता और यहां के लोग देश को समर्पित हैं। यहां सड़कों की समस्या है,बेरोजगारी की समस्या है। यदि गांव खाली होंगे तो सुरक्षा की समस्या होगी। इसलिए श्रीमन्,हिमालय के बारे में जो तीन-चार चीजें बहुत महत्वपूर्ण थीं,वह मैंने सदन के समक्ष रखी हैं।

          महोदय,यदि आपकी अनुमति हो तो मैं पहाड़ के बारे में ‘मैं पहाड़ हूं’शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहता हूं कि पहाड़ की पीड़ा क्या है -

          “मैं पहाड़ हूं, मैं इसलिए चुप नहीं कि मैं इतना शांत हूं,  तुम नहीं जानते कि मैं कितना आक्रान्त हूं।

 मौन हूं तो सिर्फ इसलिए कि कहीं मेरे शांतिवन में अशांति न आये,  कहीं मंद पवन मलय समीर स्वयं तूफान बनकर न छाये।

 फिर मुझे हिमालय का अनुपम धैर्य नहीं खोना है,  विश्व शांति का ध्वज लिए यहां मेरा हर एक कोना है।

 मुझे तो देश की एकता और अखंडता के लिए जीना है,  मुझे गंगा-यमुना सरसाकर जहर घूंट भी पीना है।

 मुझे विष-वमन करते विषैले नाग मिटाने हैं,  मुझे तो जन-जन के हृदय पटल पर समता के बीज उगाने हैं।

 वैसे तो मेरी एक छोटी सी चीख भी प्रलय ला सकती है।

 दिग-दिगन्त तो क्या ब्रह्मांड हिला सकती है।

 लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा,  मैं प्रेम-सौहार्द-एकता का पुंज लिए विश्वशांति नहीं खोने दूंगा।

           मैं विषम परिस्थितियों में भी दृढ़ता का संकल्प लिए अडिग खड़ा हूं,            मैं देश के सौन्दर्य की अऩुपम बहार हूं।

           कठोर होते हुए भी विनम्र भाव से कह रहा हूं कि मैं पहाड़ हूं, मैं पहाड़ हूं।”             महोदय,हिमालय के लोगों की कब तक परीक्षा होती रहेगी। देश की सीमाओं पर जब भी युद्ध होता है तो पूरा हिमालय कांपता है। हिमालय का सपूत पहली पंक्ति में खड़े होकर देश की सीमा पर अपनी कुर्बानी देता है। इन विषैले नागों को कुचलने के लिए हमेशा खड़ा रहता है। मुझे भरोसा है कि इस तरीके के पहाड़ जो हमेशा मानवता के प्रति समर्पित रहे हैं,जो देश के प्रति समर्पित रहे हैं,देश का तन और मन दोनों को ठीक कर सकते हैं। जो शक्ति का पुंज है,चाहे वह आस्था का केन्द्र हो,चाहे वह प्राण वायु देने का केन्द्र हो और चाहे वह पर्यावरण की दुनिया की पहली पाठशाला हो। यह हमारे देश की पर्यावरण की पहली पाठशाला है। इसलिए मैं जोर देकर फिर कहना चाहता हूं कि इस समय देश के लिए आवश्यकता है कि देश के इन 11 खूबसूरत राज्यों का एक मंत्रालय बनाया जाए,जो इन सारी नीतियों का निर्धारण करे,वहां के विकास को बढ़ाये,देश को ताकत दे,वहां की जो मनःस्थिति है,जो वहां की परिस्थितियां हैं,जो वहां का पर्यावरण है,जो वहां की व्यवस्थाएं हैं,जो वहां की थाती है,उसे सुरक्षित रख सके।

          महोदय,आपने मुझे बोलने का मौका दिया,इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं अपनी बात को पूरी ताकत से जोर देकर हिमालयी राज्यों के लिए अलग मंत्रालय के गठन की प्रार्थना करना चाहता हूं।

 

 HON. CHAIRPERSON :  Motion moved:

“Having regard to the strategic geographical condition as well as location of the Himalayan States, which causes landslides, cloudburst, earthquakes, hailstorms and other natural calamities every year resulting in huge loss of lives and property and taking into account the socio-economic backwardness of these States, particularly the State of Uttarakhand, this House urges upon the Government to form an independent Union Ministry for Himalayan States, which shall be responsible for the overall and speedy development of these States and in particular perform the following functions—
(i)          to identify backward areas of Himalayan States and ensure their overall development and conservation;
(ii)        to provide special financial package for development of backward areas particularly, border areas;
(iii)       to take effective measures to check cross border infiltration, particularly in the State of Uttarakhand; and
(iv)       to recommend to the Union Ministries concerned for laying of new Railway lines, establishment of hydro power projects, construction of roads and other infrastructural development projects and to strengthen economy by setting up of industries based on natural resources available in the Himalayan States to prevent migration.” प्रो. सौगत राय (दमदम) : सभापति महोदय,डा.रमेश पोखरियाल निशंक ने जो संकल्प सभा के पटल पर रखा है कि हिमालय प्रांतों के लिए अलग से एक मिनिस्ट्री बनाई जाए,इस संकल्प का मैं उसूलों के आधार पर समर्थन करता हूं। लेकिन मुझे पता नहीं है कि श्री नरेन्द्र मोदी जी इसका कितना समर्थन करेंगे। क्योंकि यदि आप मंत्रिमंडल को देखें तो उत्तराखंड से बीजेपी के पांच एम.पीज. चुने गये हैं,उसमें तीन भूतपूर्व मुख्य मंत्री हैं -श्री निशंक जी,खंडूडी जी और श्री कोश्यारी जी और हिमाचल से बीजेपी के चार सदस्य चुने गये हैं। इन नौ सदस्यों में से एक को भी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया तो श्री नरेन्द्र मोदी जी हिमालय को कितना प्यार करते हैं,मुझे यह देखकर पता नहीं चलता,शायद वह बता सकते हैं।

           अगर हिमालयन स्टेट पर एक मिनिस्ट्री बने तो शायद निशंक जी को वहां पर जगह मिले,इसके लिए उन्होंने यह बिल प्रस्तुत किया है। मैं इसका समर्थन करता हूँ। मैं इसमें थोड़ा चेंज करना चाहता हूँ। एक तो उन्होंने कहा है कि हिमालयन स्टेट्स,मैं कहना चाहता हूँ कि हिमालयन एरियाज़ होने से अच्छा होता। क्योंकि हमारे पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग डिस्ट्रिक्ट हिमालय से जुड़ा हुआ है। परंतु दार्जिलिंग पूरे पश्चिम बंगाल का अंग है। अगर हिमालयन मिनिस्ट्री बनेगी तो दार्जिलिंग डिस्ट्रिक्ट को भी उसमें शामिल किया जाएगा। English मैं अमेंडमेंट देना चाहता था,परंतु पता चला कि एक दिन पहले ही देना चाहिए था,इसलिए नहीं कर पाए तो मेरे ख्याल में निशंक जी इसको मान लीजिए। दूसरा,अंग्रेजी में जो आया है,हम तो हिंदी उतनी अच्छी नहीं जानते हैं,  Having regard to strategic geographical condition, what he has actually meant is geological condition, not the geographical condition. क्योंकि उन्होंने जो डिस्क्राइब किया है,आप जानते हैं कि उन्होंने बताया है कि Himalayan is a young mountain. सर, आप जानते होंगे कि माउंटेंसे की जमीन के नीचे टेक्टॉनिक प्लेट्स होते हैं और जब इन टेक्टॉनिक प्लेट्स का शिफ्ट होता है,तब अर्थक्वेक्स आते हैं। Himalayan mountains are found on tectonic plates. So, they are prone to earthquakes, landslides, etc. as they are relatively new mountains.

          Now, let me speak a few words about Himalayas. Himalayas are one of the longest mountain ranges in the world, though not the longest. Andes mountains are the longest, almost 4,000 miles in Latin America. Rocky mountains are much longer -  starting from top to bottom of North America. Himalayas are roughly 1500 miles long. If you start from West of Kashmir, it exists right up to Arunachal Pradesh – around 1500 miles. What are the States falling in the Himalayan ranges? We have Jammu and Kashmir, Himachal Pradesh, Uttarakhand -  then, as you come, you find China - Darjeeling areas of West Bengal; then, Arunachal Pradesh, and of course, Sikkim. These are the six States which are directly connected to the Himalayan ranges. He has mentioned about Mizoram, Manipur, Nagaland which do not have any Himalayan ranges. There are small hills which are not connected to the Himalayas; these are connected to the main body of the Himalayas.

On the North-West, we have the Gilgit areas, which are Indian territories, occupied by Pakistan. Gilgit is known as northern areas. Chinese have built  Karakoram highways through Gilgit, and the northern areas. Then, we have got Ladakh, which is part of Himalayas. Ladakh borders on Aksai Chin and China. Then, Uttarakhand has border with Tibet, that is, China.  Himachal Pradesh, in the Kinnaur district,  has border with China. West Bengal’s hill areas have border with Nepal, Bhutan and Sikkim. Sikkim at Nathula has border with China; and Arunachal Pradesh has border with China. So, strategically this is, as Shri Nishank has correctly pointed out, very important. China has already occupied territory in the Himalayan areas and Pakistan in Pakistan Occupied Kashmir have already given away some areas to China. So, strategically it is very important to develop the Himalayas, to ensure our safety. But I didn’t like Nishankji’s approach, that is, the BJP approach.         He was trying to equate development of the Himalayas with Hindutva by making of symbolic slogans like गंगा हमारी मां है। ये सब बोलकर हम गंगा की कोई उन्नति नहीं कर सकते हैं। You have to take a very scientific view. केवल मां बोलने से नहीं होता है। What have you done to the Ganga? In Uttarakhand, Nishankji, you were Chief Minister. What happened there? Why was so much of bad floods there in the Ganga? When the cloud burst took place above Kedarnath, the dam of the lake broke. Then, on the rivers, hundreds of houses were swept away. Why? It was because you have built houses on the flood plaques of the rivers, namely Alaknanda, Mandakini and Ganga. Rivers must be allowed to expand geologically. You have got flood plains there and because of our greed and callousness of governments, we have allowed building of houses on the flood plaques of the Ganga. That is why there was so much devastation caused in the Uttarakhand floods last year. Thousands of people were killed and properties worth crores of rupees were lost. Now it is time to take care of the Himalayas instead of calling Ganga Maa, Hindutva, Ayurveda and all that. We have to take a scientific approach. मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि read D.N. Wadia’s book. D.N. Wadia was a geologist based in Dehradun and he was a world famous expert on Himalayan Geology. Himalayan Geology is a very deep branch of Geology which one has to understand to follow what is the way to save the Himalayas.

          Sir, he has mentioned that the Himalayas in Uttarakhand gave birth to many rivers. He mentioned Ganga and Yamuna. We have got Gangotri and Yamuna not only from Uttarakhand, but Indus, which is also called Sindhu emanating from Ladakh. Strangely enough you never mentioned Sindhu even once. But Advaniji, since he is from Sindh, started Sindhu Darshan in Ladakh. आपकी बात में एक बार भी सिन्धु नहीं आया। All rivers are great. No river is holy. Rivers are lifelines of the nation. They provide irrigation, they provide transportation and they are lifelines of our economy. The great Nazrul Islam – he was a Muslim, not a follower of Hindutva – said:

“Ganga Sindhu Narmada Kaveri Jamuna oi Bohia cholechhe aager mato Koi re aager manush Koi.”   So, all these are great rivers. In Nazrul’s poem, for the sake of rhyming he left out Godavari. He said: ‘Ganga Sindhu Narmada Kaveri Jamuna…’. Therefore, all the rivers are very important and Ganga is special in the sense that it is a perennial river. आप सिन्धु के बारे में बोलना चाहते हैं।
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक : मैंने सभी नदियों को समाहित किया,क्योंकि वक्त होता तो मैं सारी नदियों का नाम कहता,लेकिन मैंने कहा कि सैकड़ों नदियां हैं,दर्जनों नहीं,सैंकड़ों नदिया हैं।
          दूसरी बात,महोदय,मैं कहना चाहूंगा कि जब केदारनाथ की त्रासदी आयी तब मैं मुख्यमंत्री नहीं था। मैं आपको ये दोनों बातें स्पष्ट करना चाहता हूं।
PROF. SAUGATA ROY : Sir, what I wanted to say is that a fresh study of the whole Himalayan areas of the flood plains and the position of tectonic plates should be undertaken and how much of construction should be allowed in the hill areas should be freshly determined because in the present state, the Himalayas will be in danger and we are waiting for a disaster to happen in the Himalayas.
          The other thing that has happened, Nishank ji will note, is massive deforestation.  The trees have been cut mercilessly throughout the Himalayas, particularly in Uttarakhand.  He has mentioned Ramdev.  Baba Ramdev has done nothing to preserve environment.  He has started selling Ayurvedic drugs from his Haridwar ashram.  I know it is a profitable business.  There is some controversy; I do not want to go into it.  He should have mentioned Sunderlal Bahuguna, the man who dared and started the Chipko movement.  He said, when contractors come to cut the trees, hold them tight.  He did more to raise consciousness about the Himalayas than anybody else did. Nishank ji’s  Hindutva-oriented speech left out Sunderlal Bahuguna, the environmental part of it, the scientific part of it.  वे जड़ी बूटियाँ हैं। Jari bootiyan can be used only when you use them as phytochemicals in a modern way. पहले हमारे ऋषियों को जो ज्ञान था,उससे आज की दवाइयाँ नहीं बनेंगी। उसके लिए ज़रूरत है कि वहाँ जो जड़ी-बूटियाँ मिलती हैं,उऩ पर साइंटिफिक रिसर्च करें और फिर उनसे ठीक से दवाइयाँ बनें। सारी दुनिया ऐसा कर रही है। हम लोग अभी पुरानी जड़ी-बूटियों की बात कर रहे हैं,बाबा रामदेव यह सब कर रहे हैं,इस प्रकार हिमालय को बचाया नहीं जा सकता। मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि हिमालय केवल हिन्दुओं का नहीं है।  I was born a Hindu. … (Interruptions)
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक : एक मिनट प्रोफेसर साहब, अगर सभापति जी की अनुमति हो। मुझे लगता है कि आपकी सारी प्रतिक्रिया गंगा और हिन्दू पर आकर खड़ी हो गई है। सभापति जी, मैंने अपनी बातों में इस बात का भी संदर्भ दिया था कि जब कुम्भ 2010 हुआ था, तो इंडोनेशिया जो मुसलमानों का सबसे बड़ा देश है, वहाँ इंडोनेशिया के राजदूत से लेकर तमाम लोग, 150 देशों के लोग, वे सारे हिन्दूवादी देश नहीं थे। इसलिए गंगा को इससे जोड़ना मैं कम से कम उचित नहीं समझता। मैंने कहा था श्रद्धा है, हमारी धरोहर है और सारी दुनिया की उस पर आस्था है। तो आपको क्यों नहीं होगी? आप बार-बार इस बात को कह रहे हैं कि गंगा को हिन्दू से मत जोड़िये। मुझे अफसोस हो रहा है इस बात को कहते हुए कि जहाँ सारी दुनिया के देशों के लोग प्राणों को हथेली पर रखकर उसका स्पर्श करने के लिए लालायित हैं, वहाँ हिन्दुस्तान के अंदर कोई व्यक्ति यह बोले कि गंगा को क्यों जोड़ रहे हैं, यह ठीक नहीं है। मैंने यह भी कहा था कि साइंटिफिक तरीके से सिद्ध है कि गंगा का जो जल है, वह अमृत जल है, सड़ता नहीं है। उसकी एक बूँद पानी हज़ारों व्याधियों से लड़ने की ताकत रखती है। इसलिए मैं बहुत विनम्रता से यह कहना चाहता हूँ कि कुछ सुझाव आप भी ऐसा दीजिए। आज हिमालय राज्य इसीलिए तो मांग कर रहे हैं और जो आपने कहा कि यह हो रहा है, वह हो रहा है, इसीलिए हमने कहा है कि यदि इसके लिए मंत्रालय बन जाएगा, एक नीति बनेगी तो बहुत अच्छा होगा।
प्रो. सौगत राय : अच्छी बात है। मैं खुश हूँ कि भूतपूर्व मुख्य मंत्री जी को मेरे भाषण में से कुछ बोलने का मौका मिला। मैं यह कह रहा हूँ कि हिमालय के किनारे केवल हिन्दू नहीं रहते हैं। मैं तो हिन्दू हूँ। लेकिन लद्दाख पूरा बुद्धिस्ट है,सिक्किम पूरा बुद्धिस्ट है। ये हमारे विनसेंट पाला जी मेघालय से क्रिश्चियन हैं। इसलिए गंगा या हिमालय से हिन्दुत्व का कोई योग नहीं है। आप जो कह रहे हैं कि गंगा को बचाएँगे,अरे भाई,यह सब लोगों की है। आप वाराणसी को बचाना चाहते हैं। वाराणसी में जितने हिन्दू रहते हैं,उतने मुसलमान भी रहते हैं। वे दोनों ही हमारी परंपरा के भाग हैं। आप क्यों मुल्क को बाँट रहे हैं?
HON. CHAIRPERSON : Hon. Member, you should address the Chair.
PROF. SAUGATA ROY: Sorry, Sir.  That is why, I want to say that let a Ministry for Himalayan Affairs be formed, not a Ministry for Himalayan States.  That Ministry for Himalayan Affairs will take into account everything: its geological needs, its environmental needs, its water needs and its power needs.  Make a holistic plan for the Himalayas. We have such a wealth in the Himalayas.
         

17.00 hrs.  But the Himalaya is not only for poets.  We used to read Kumarsambhav written by Kalidas where he has described about the Himalaya.   It is translated in Bangla and I am reading a few lines from it.

 

Sudur urdhe oi surodham, sporshi tahare Himalaya naam, Raje giriraj mohamhigarh, byapi uttarakhandey   That is a poet’s imagination.  Tagore has written any number of poems on it.  His father Debendranath Tagore used to spend a lot of time in the Himalayas.  Swami Vivekananda, when he was touring around the country, went to Almora and sat there in meditation.  Then he went into Mayavati, right into forest, and he opened Advaita Ashrama.

We have a famous writer called Prabodh Sanyal.  He wrote two books namely Mahaprasthaner Pathe and Debotamta Himalay.  There was a writer, Sir Ashutosh’s son, Umaprasad Mukherjee. He is known all over the Himalayans even in a small cheti people used to know him. He has written a book called Himalaya Pathe Pathe. Almost a hundred years ago, one Bengali writer Jaladhar Sen, wrote a book called Himalaya. So, the Himalaya has a great fascination for Bengalis.

          Even last month, one Bengali lady, Chhanda Gayen, climbed the Kangchenjunga. She wanted to get up on the Associated Peak. Then, she lost and we have not found her body yet. That is the magic the Himalayas still hold for us.  So, let us take a larger plan for the Himalayas. The unfortunate thing, if you go up to the Himalayas, you see is that it is so beautiful but people there are so poor. There is no road. When you go to a village, there is no road. There are enormous natural resources. We have not exploited them yet at all.

          The Himalaya can be a source of the biggest hydroelectric power in the world. We have one dam called Tehri. We have one dam in Himachal Pradesh. But, hundreds of such mini hydle projects can be built on the Himalayas and the Himalayas would be ideal for modern industries like computers, electronic goods, for watches.

          Look at what Switzerland has achieved. Last year or the year before the last, I went to Switzerland. The Alps is only 15000 feet high. How they have exploited the Alps! First, you see the Rhein Falls in Switzerland. When you go up to 14,000 feet – you know what I discovered there itself – everything is written in Hindi there. It is because every year our Mumbai people are going to Switzerland to shoot films. They do not go to the Himalayas because there is no infrastructure and other facilities. In Alps, when you are going up the mountains, you see hundreds of people doing skiing. There is a place called Laguna, which is known for winter sports. In Gulmarg, we have also some. But, this can be developed in a big way. 

          Sir, what is needed, is forward thinking.  Unfortunately, all our politicians are concerned only about small things in the Himalayan areas.  There has been no big tank thinking about the Himalayas.  In Darjeeling areas of West Bengal, our State Government is doing a great job.  It is the only place where a demand for a separate State has been subdued because of the development carried out by the Government led by Mamata Banerjee.  We have been able to subdue totally divisive secessionist movements.   

          In Sikkim, they have done great work. The Prime Minister mentioned the other day that Sikkim is the first organic State in the country and no inorganic fertilizer is used there. So, that is a great achievement.

इन सब को एक जगह करना है। निशंक जी,यह बहुत अच्छा बिल है। आप मंत्री तो नहीं बने,पर अपनी जगह के प्रति फेथफुल रहे और यहां आते ही आप ने हिमालय की बात सामने लायी।

          In this House we discussed the Uttarakhand flood.  Dr. Nishank, you were not here in the 15th Lok Sabha.  We discussed how human greed destroyed the Uttarakhand plains.  Army and Air Force people and the Border Roads Organization had rescued many people.  We are proud of them.  If they had not been there, we do not know how many thousands of people would have been killed during the flood.  That is a question to be asked.

          I was in the Defence Consultative Committee. I constantly asked these Army people, “What are you doing about roads up to the Chinese border?”  Sir, would you believe that the Chienese built a railway line from Beijing to Lhasa, and from Lhasa right up to the Arunachal Pradesh border?  Bomdila would be 30 miles from there.  Tawang would be only 30 miles from there.  Here is our friend from Arunachal Pradesh.  We have not been able to construct a railway line.

सर,यह सब अर्जेन्ट है। इसलिए मैं फिर से उनके प्रस्ताव का समर्थन करता हूं। मुझे यही कहना है कि हिमालय को डेवलप कीजिए। इसमें से हिन्दुत्व निकाल दीजिए,रामदेव वाली बात निकाल दीजिए। आइए,हिन्दू,मुसलमान,बौद्ध,क्रिश्चियन आदि सब लोग मिलकर हम लोग एक देवतात्मा हिमालय सेल बनाएं।

          यही बोल कर मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं।

 

SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM): Hon. Chairperson, Sir, I would like to thank you for giving me this opportunity to participate in a very important Resolution that my colleague, Dr. Nishank, has brought before Parliament. 

          It is something very close to my heart. Shri Mahtab ji is just carrying an article of mine which I have written very recently on the specific need for a Ministry which looks into the Himalayan affairs expanding the whole scope of the Ministry as it were.

          The Resolution, obviously, in many ways, is limited to bringing out many of the issues faced by Uttarakhand but I am sure, Dr. Nishank ji will not mind if we expand the scope of the Resolution on many fronts as previously mentioned by my friend from Trinamool Congress, Prof. Saugata Roy.

          Now, Sir, let me state the first and foremost thing that the Himalayas is a geographical formation.  It is proven that it is because of this geographical formation that the entire water security of the largest part of India is sustained.  We know of the El Nino phenomenon which may impede or not allow for the clouds which come but once the clouds come, then you have a barrier in which it is not allowed to move on but then it is allowed and it cools it sufficiently so that we have the monsoons.  Now, it is so remarkable that in 2009 when I first entered Parliament that we had a similar kind of a situation, a very drought-like situation. 

There again, everybody started talking about the Himalayas and water towers:  why are the dams within various States running low? Why is it that we have water issues and all these kinds of issues that came up due to the drought like situation?  I would argue that if this is such an important formation and it has, over the centuries, attained the kind of mystique that we have, I think, it is important that the nation, specially the Government now, wake up to this fact and with one voice all of us, across the party line, say that we definitely need to look after the Himalayas, be it the environmental issue, be it the development or be it the other kinds of conservation issues that may come up.

          Therefore, I think, it is not too late. I completely agree that we need a Ministry to look into this so that there is focussed attention. Now, why is the focussed attention required?  It is  required  because there are a large number of issues related to the Himalayas.  It is only when we have a flood like situation, as it happened in Uttrakhand, Kedar Nath Valley or we have a situation like in Sikkim on 8th September, 2011 when there was a catastrophic earthquake or when there are issues related to dams that suddenly people wake up. It is true that population-wise, all the Himalayan States will never be able to compete.  We cannot compete with Uttar Pradesh or Bihar.  But certainly, when it comes to being the   sentries in the forefront of the border areas, being the border States and keeping the peace there, I think, we stand shoulder to shoulder with the rest of the country.

          Therefore, Mr. Chairman, Sir, I would like to buttress my arguments by stating that there are many institutions but they are too few. I can just name them. One was already mentioned by Prof. Saugata Roy about the Wadia Institute. That is one institution, which does some stellar work. There is another institution for all the mountain countries surrounding the area called EC Mode.  This is located in Kathmandu.  It looks after all the knowledge gatherings of the mountain areas of China, India, Afghanistan, Myanmar, Nepal, Bhutan and Sri Lanka.  There are lots of universities also, which have come up. There   is our famous G. B Pant Institute for Himalayan and Environmental Development.

          If you actually start looking at some of the outputs of these institutions, all that they are saying is, ‘livelihoods in these regions matter, the women matter.’ There is far too much of out-migration from these places because of the hardships. So, all these issues, which are social and economical, need to be addressed.  But in the Ministry or even for that matter in the Planning Commission, thus far we do not have a mechanism whereby all these issues are factored in into our planning processes.

          I would just give you one example.  We have, what is known as now, an  Indian Mountain Initiative. This is something, which was done within the last three-four years.  With the Indian Mountain Initiative, we started looking at all the mountain States. We started looking at all the issues around the 11 mountain States and some of the districts, which cover mountain areas.

          This is very interesting that this particular institution, along with other Members of Parliament from the Himalayan region, was able to get the Planning Commission organise a working group on mountain and mountain issues for the Twelfth Plan. Therefore, systemically, we have managed to, at least, bring this particular issue to the forefront. However, the difficulty with all this is that if there is a Ministry and if that Ministry becomes the focal point of all this knowledge harvesting and if it becomes the focal point for development and devolution of all the schemes, then I am sure that we will be able to do something.

          Finally, there are two more important things that I would like to say here. One is that the mountain railways are a must. The last mountain railway was built by the British and it was left at that. So, today if we talk of mountain railways, there is one which links up to Shimla; there is one which links up to Darjeeling; and there is one in the Nilgiris; and that is it, whilst the Chinese have been able to bring the most sophisticated railway system across the mountains, right up to Lhasa from Beijing. If this is the possibility in terms of harnessing of their engineering skills, their knowledge and science, then why is it that we are lagging behind? I would like to use this forum to impress upon the Railway Minister that a Task Force needs to be built. I had actually given a letter to Madam Mamata Banerjee way back when she was the Railway Minister requesting her to create a Task Force. It needs focussed attention. If we can take the railways right up to Nathu La, right up to the border areas, then it will be one big achievement and you can actually have a trans-Himalayan railway line.

          I would also like to flag the issue of eco tourism. Today if there is one area or one sector of economic activity which can change or revolutionize the economic development in the mountains, it is eco tourism. And, if we do it in a soft and sustained manner, taking into consideration the environmental conditions, then eco tourism is the way.

          Sir, with these words I thank you for giving me time to bring to this House some of the most important issues that relate to the Himalayan environment, to the Himalayan affairs and to the Himalayan States.

I support this Resolution wholeheartedly.

                                                                                     

श्री निनोंग इरिंग (अरुणाचल पूर्व) : सभापति महोदय,जैसा सौगत राय साहब ने कहा,मैं बहुत दिल से इच्छा कर रहा था कि अगर हमारे डॉ. रमेश पोखरियाल जी निशंक एक मंत्री के रूप में एक सरकारी बिल की तरह इस बिल को हमारे बीच में लाते तो उस से हमारे जो हिमालय के निवासी हैं,जो वहां रहते हैं,उन के लिए यह एक बहुत बड़ा डैवलपमेंट होता।

  17.19 hrs. (Shri Hukum Singh in the Chair)             चूंकि आप इसे सदस्यों के एक निजी संकल्प के रूप में लाये हैं,हम इसका बहुत ही स्वागत करते हैं। हमारे वहां पूर्वोत्तर राज्यों का एक मंत्रालय है,जिसके द्वारा हमारे वहां विकास की जितनी भी योजनाएं हैं,उनको पूरी तरह हम नहीं निभा सकते हैं। हिमालय,जिसको हम कहते हैं कि हमारे देश का ताज है,हमारा मुकुट है,अगर हमारा ताज ही नहीं रहता तो हमारा जो मेन लैंड इंडिया है,उसका विकास जितना भी करो,उसमें हमारी इज्जत नहीं होती। इन्होंने लिखा है कि आपातकालीन स्थितियों में जो बाढ़ आती है,भूकंप आता है,जो क्लाइमेट चेंज के कारण,ग्लोबल वार्मिंग के कारण लैंड स्लाइड्स होती है,ग्लेशियर मेल्टिंग होती है,इन सब कारणों पर भी हमें विशेष ध्यान देना चाहिए। वहां के रहने वाले लोगों का हमारी सरकार के ऊपर विश्वास है कि हम एक मंत्रालय का गठन करने के लिए कदम उठाएंगे। चाहे जम्मू-कश्मीर से लेकर,लेह के रीजन को लेते हुए,हिमाचल को लेते हुए,वेस्ट बंगाल के दार्जिलिंग को लेते हुए,सिक्किम को लेते हुए,अरूणाचल प्रदेश को लेते हुए,अन्य जो हमारे पूर्वोत्तर राज्य हैं,जैसे असम है,नागालैंड है,मेघालय है,त्रिपुरा है,मणिपुर और मिजोरम है,लेकिन विशेषकर अरूणाचल प्रदेश और सिक्किम,जो बर्फीला इलाका है और वहां पर बहुत सारी योजनाएं शुरू करने की आवश्यकता है। वहां सबसे पहला मुद्दा जिसको हमने पहले भी लिया है,वह यातायात का है। वहां सड़क यातायात बहुत खराब है। अभी हमारे सौगत राय जी ने चीन के साथ एक तुलना की किस प्रकार से वहां रास्ता है,फोर लेन रोड जो नाथुला में आती है या हमारे यहां तवांग में आती है और वहां पहले जो एक रणनीति वर्ष 1962 में बनायी थी कि अगर हम वहां रास्ता बनायेंगे तो वहां चीन बहुत आसानी से आ सकता है। यह जो मानसिकता है,जो सोच है,उसे हमें बदलना होगा।  This is the land of ICBMs; this is the time of Sukois.  इसलिए हमको सोचना पड़ेगा,उस सोच को हमको अभी भूलना पड़ेगा और हमें विशेष ध्यान इन हिमालयन इलाकों के लिए देना पड़ेगा। 

          पनबिजली के लिए अरूणाचल प्रदेश इटसेल्फ,उसमें कम से कम 55000 मेगावाट की क्षमता है। उसको हम क्यों टैप न करें? अगर उसको टैप करने जायें,चाहे वहां एनएचपीसी की हो,निपको की हो,एनटीपीसी की हो,रिलायंस की हो या अन्य जितने पावर डेवलेपर्स हैं,वे वहां नहीं जा सकते हैं क्योंकि वहां यातायात की सुविधा नहीं है। यह हमारे वहां एक बड़ी खामी है। इसके लिए हमको सोचना होगा। हमारे यहां पेट्रोलियम है,कोयला है,कोयले का उत्पादन होता है,लेकिन उसको वहां से निकालने के लिए भी बहुत कष्ट होता है। इसलिए हमको यातायात पर विशेष ध्यान देना होगा,चाहे रेल का हो,चाहे हवाई का हो या हमारा सड़क मार्ग हो।

          मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहूंगा,लेकिन मैं पयर्टन के विषय में जरूर बोलना चाहूंगा। हमारे जितने भी हिमालयन रेंजेज हैं,मैं हिन्दुत्व वाली बात नहीं कहूंगा,लेकिन मैं यह जरूर कहूंगा कि एक छोटी सी जगह अरूणाचल प्रदेश है। वहां मालिनीथान जैसी जगह है,वहां परशुराम कुंड जैसी जगह है,वहां पर तवांग का बहुत मशहूर मोनेस्ट्री है,बुद्धिस्ट लोगों के लिए गुम्पा है। वहां पर जीरो में एक 25 फीट का शिवलिंग है,जहां लोग उसके दर्शन करने के लिए जाते हैं। लेकिन वहां यातायात के साधन ही नहीं हैं,रास्ता ही नहीं है,इससे वहां पर्यटकों को बहुत असुविधा होती है। इफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट होना सबसे महत्वपूर्ण चीज है और इस पर तभी ध्यान दे सकते हैं,जब आपका अपना एक मंत्रालय हो। विशेषकर इस देश का जो ताज है,जो मुकुट है,उसका आप ध्यान रखें। परशुराम कुंड के बारे में मैं बताता हूं। हमने दो बार इस विषय को सदन में उठाया। रेल मंत्रालय में मैंने इसको दिया,रेल मंत्री को भी मैंने चिट्ठी लिखी। परशुराम कुंड वह जगह है,जहां भगवान परशुराम ने जितने भी पाप किए थे,आप कहानी तो जानते ही हैं,उन्हें वहीं पाप से छुटकारा मिला। वहां से ब्रह्मपुत्र नदी बहकर आती है जो एक तीर्थ स्थान है और जहां लोग जाकर अपने आपको पुण्य करते हैं।  ...(व्यवधान)

श्री एस.एस.अहलुवालिया (दार्जिलिंग): उन्होंने अपने पापों को नहीं,उन पर एक मातृहन्ता योग लग गया था,उससे मुक्ति पाने के लिए था। भगवान परशुराम को पापों से युक्त मत बताइए। उनके ऊपर मातृहन्ता योग लगा था,उससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने किया था।

श्री निनोंग इरिंग : सुधारने के लिए आपका बहुत धन्यवाद। मुझे बोलने में थोडी-सी गलती हो गई। पिछली बार जब आदरणीय प्रधामंत्री वहां गए थे तो उन्होंने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में सूरज उगता है और गुजरात में सूरज ढलता है। श्रीकृष्ण भगवान वहां जाकर,भीष्मा एक नगर है। राजा भीष्मा को एक बेटा और एक बेटी थी। जब रुक्मणी का स्वयंवर हुआ था तो रुक्मो के साथ झगड़ा हुआ था। वहां पर अभी भी बाल काटने का सिंबल है। लोग इसे भी मानते हैं। यह पर्यटकों के लिए एक विशेष जगह है। यहां पर अभी भी प्राकृतिक सुंदरता है। लोग नेचुरल सुन्दरता को देखने के लिए वहां पर जाते हैं। जैसे -शिमला और कश्मीर है,वैसे ही हमारा तवांग,मेचुका,अनीनी है। हमारा देश विशाल है। लोग कहते हैं कि हम बहुत जगह जाते हैं। मुझे बहुत दुःख होता है कि लोग अरुणाचल प्रदेश के बारे में नहीं जानते हैं। यह तभी हो सकता है जब इसके लिए एक विशेष मंत्रालय होगा। लोगों को जानकारी होगी कि पूर्वोत्तर राज्य क्या है?हिमालयन राज्य क्या हैं?हिमालयन एरिया में क्या तकलीफ होती है?जब आपातकालीन स्थिति उत्पन्न होती है तो हम उसको किस प्रकार काउंटर कर सकते हैं,हम उसको किस प्रकार रोक सकते हैं?हम वहां किस प्रकार विकास कर सकते हैं?मैं इन सब पर आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं।

          अंत में,हमारे जो फ्यूचर मंत्री साहब,रमेश निशंक जी हैं,उनको मैं धन्यवाद देना चाहता हूं और इस प्रस्ताव का भी समर्थन करता हूं।

 

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज):  अधिष्ठाता महोदय, मैं आपका अत्यंत आभारी हूं कि आपने मुझे एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया है। सत्ता पक्ष के सदस्य हों, प्रतिपक्ष के सदस्य हों या किसी भी दल के सदस्य हों, सभी सदस्यों के द्वारा इस विषय के महत्व को रेखांकित किया गया है। मैं रमेश पोखरियाल निशंक जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि वे इस सत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय ले कर आए हैं।

          अधिष्ठाता महोदय, आपको याद होगा कि जब उत्तर प्रदेश की विधान सभा में आप माननीय सदस्य थे, सौभाग्य से डा. रमेश पोखरियाल निशंक जी माननीय सदस्य थे और मैं भी सदस्य था। उस समय उत्तराखंड या उत्तराचंल सौभाग्य से उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। उस समय जब यह प्रस्ताव आया था कि उत्तराखंड की स्थिति को देखते हुए, वहां की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए, वहां की जनता के द्वारा एक अलग राज्य की मांग लगातार उठ रही थी। इसके लिए आंदोलन भी चल रहा था। उस समय भी जो प्रस्ताव आए थे कि अलग से उत्तराखंड राज्य का गठन किया जाए। उस प्रस्ताव पर भी मैंने इस बात का समर्थन किया था कि उत्तराखंड को अलग से एक राज्य का दर्जा दिया जाए। सौभाग्य से एक प्रस्ताव सदन के समक्ष आया है कि जो हिमालयन स्टेट्स हैं उन राज्यों की परिस्थितियों को देखते हुए, केन्द्र में अलग से एक स्वतंत्र मंत्री और मंत्रालय का गठन किया जाए। चर्चा अत्यंत महत्वपूर्ण है, गंभीर है। हम से पहले जो सदस्य बोल रहे थे उन्होंने कहा है कि डा. रमेश पोखरियाल निशंक जी इसका दायरा बढ़ा दें। उन्होंने प्रारंभ में केवल उत्तराखंड की बात नहीं कही थी। उन्होंने हिन्दुस्तान के उस हिमालयन स्टेट्स के अंदर आने वाले जो 11 राज्य हैं, उन्होंने उन 11 राज्यों की चर्चा की है। 11 राज्यों का क्षेत्रफल 5,93,00 किलोमीटर है, वहां की आबादी लगभग 7 करोड़ है, इनका भी उन्होंने उल्लेख किया है। उनकी मंशा स्पष्ट है।...(व्यवधान)हमारे 11 राज्य हैं -असम जम्मू-कश्मीर,उत्तराखंड,हिमाचल प्रदेश,त्रिपुरा,मेघालय,मणिपुर,नागालैंड,अरुणाचल प्रदेश,मिजोरम और सिक्किम।

           हमारे प्रोफैसर साहब ने इस बात पर बहुत जोर दिया कि हम समर्थन करते हैं। लेकिन उसमें हिदुत्व और हिन्दू को निकाल दें,वे प्रस्ताव का समर्थन करते हैं,आज रमेश जी ने खुद इस बात का समर्थन किया कि केवल इस देश के लोग नहीं,पूरी दुनिया के साढ़े आठ करोड़ लोगों ने उस कुंभ में,जब उन्होंने तत्कालीन मुख्य मंत्री के रूप में कार्य किया। इस देश में गंगा के बिना और हिंदुत्व और हिन्दू के बिना कोई कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए मैं समझता हूं कि निकालने की बात मुनासिब भी नहीं है। वे जो संकल्प लेकर आए हैं,उसमें उनका साफ मकसद है कि उस एरिया में जो लगातार कठिनाई आती है,मैं आज शायद इस विषय पर नहीं बोलता,लेकिन केदारनाथ की जो त्रासदी हुई,उसमें उत्तर प्रदेश के भी बहुत लोग हताहत हुए,हम लोगों के परिवार से जुड़े हुए लोग उसमें नहीं रहे। इसलिए उन परिस्थितियों को देखते हुए कि जब भूस्खलन हुआ,यह मेरे सामने बैठे हुए हैं,यह उस परिस्थिति के स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हैं। आप उस त्रासदी में थे। इन 11 राज्यों में जो भूस्खलन होता है या केदारनाथ में जो हुआ या अक्सर आप सुनते हैं कि उत्तराखंड,हिमाचल में बादल फट जाते हैं,भूकम्प आता है,ओला वृष्टि होती है,इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं,देश के दूसरे राज्यों में ऐसी परिस्थितियां निर्मित नहीं होतीं,इनसे हजारों लोगों की जान-माल की क्षति होती है। वहां जिस तरह की परिस्थितियां हैं,उनके कारण अगर यह मांग उठी है तो इसके पीछे एक स्पष्ट मकसद है। मैं समझता हूं कि इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हो सकते हैं कि एक अलग से मंत्रालय का गठन क्यों?हिमालय क्षेत्र में जो 11 राज्य आते हैं,उनके चौमुखी और तीव्र विकास के लिए कोआर्डिनेशन हो,इसके लिए अलग से मंत्रालय होना चाहिए। इन राज्यों में विद्यमान केन्द्रीय योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की मौनीटरिंग के लिए अलग से केन्द्रीय मंत्रालय होना चाहिए और उक्त क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने के उपाय सुझाने के लिए भी अलग मंत्रालय होना चाहिए।

          कौन इस बात से सहमत नहीं है कि जब केदारनाथ में त्रासदी आई तो 72 घंटे केवल टेलीविजन से,केवल ऋषिकेश के सीन बार-बार दिखाए जा रहे थे। मैं समझता हूं कि वहां की सरकार भी पंगु थी,उसे कुछ नहीं पता लग रहा था कि कितने लोगों की जान जा रही है,कितना नुकसान हुआ है,कोई कोआर्डिनेशन नहीं था। बाद में रिपोर्ट आई। आपने भी पढ़ा होगा कि वहां की सरकार की डिजास्टर मैनेजमैंट कमेटी की कोई बैठक ही नहीं हुई थी।...(व्यवधान)अगर केन्द्र का मंत्रालय होता तो कम से कम पहले ही पत्र लिखता। जब यात्रा चलती है,चार जगह ऐसी हैं,मैं समझता हूं कि प्रो. सौगत राय इस बात से इत्तफाक करते होंगे कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी किसी को रोका नहीं जा सकता क्योंकि बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री,यमुनोत्री,जो बुजुर्ग लोगों की श्रद्धा और आस्था का केन्द्र है, 70-75 साल के लोग भी वहां जाते हैं चाहे पोनी के माध्यम से जाएं या खच्चरों के माध्यम से जाएं। उसके बाद भी कोई बैठक नहीं हुई। आपने देखा कि राज्य में 72 घंटे तक चीजों का समन्वय नहीं हो पाया। फिर केन्द्र सरकार ने हैलीकॉप्टर दिए,फोर्स के लोगों को भेजा,आर्मी ने मार्च किया क्योंकि सब रास्ते टूट गए थे। आपने देखा होगा कि महीनों तक किस तरह डैड बॉडीज पड़ी रहीं।...(व्यवधान)उन परिस्थितियों को देखते हुए 11 राज्यों को मिलाकर अलग मंत्रालय बनाना चाहिए।

          ग्लोबल वार्मिंग की बात उठी। आज ग्लोबल वार्मिंग कितनी चिन्ता का विषय है। अनुराग जी बैठे हुए हैं। आप जानते हैं हिमाचल में ऊना जैसे इलाके में बहुत गर्मी पड़ती है,लाहौल स्पीति,किन्नौर में बर्फ पड़ी रहती है। इन राज्यों में ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां केवल चार महीने सामान्य जनजीवन रहता है। पूरे साल लोग बर्फ में रहते हैं। इस तरह की कठिन परिस्थितियों में वे रहते हैं। उस ग्लोबल वार्मिंग के बारे में क्या हम इस सदन में बैठकर चिन्ता न करें?उस ग्लोबल वार्मिंग की चिन्ता इससे पहले लंदन में हो,बर्किंघम विश्वविद्यालय में हो,मैं उसका उल्लेख करना चाहूंगा। 21 जुलाई, 2003 को बर्किंघम विश्वविद्यालय में एक कांफ्रेंस हुई,जो अंतर्राष्ट्रीय बैठक थी। उसमें कहा गया कि जो वैश्विक तापन है,उसके कारण हिमालियन ग्लेशियर्स 40 वर्षों के भीतर लुप्त हो सकते हैं। उससे भारत जैसे देश में सूखे और अकाल का खतरा हो सकता है।

          मान्यवर,यह वहां के प्रमुख अखबार टाइम्स ऑफ लंदन में छपा या जो हिमालियन मिसकन्सैपशन एंड डिस्टार्शन--what are the facts, इसमें किताब छपी है। इसमें कई लोगों की रिपोर्ट आयी है। सेरहजबेन की रिपोर्ट आयी थी जो उस क्षेत्र के ग्लेशियर के मध्य हिमालय हैं,वे वर्ष 2035 तक लुप्त हो सकते हैं। श्री बैरी जो उस कांफ्रेंस में भाग ले रहे होंगे,उन्होंने कहा कि मुक्त वातावरण लगभग 6 डिग्री प्रति किलोमीटर की दर से ऊंचाई के साथ औसतन तापमान घटता जा रहा है,जिसके कारण जो डीएएलआर है,वह 9.8 डिग्री प्रति किलोमीटर की ओर है। माना जा रहा है कि मध्य हिमालय में एक सामांतर रेखा बर्फ के साथ चल रही है और लगभग 5 हजार एमएएएल सभी ग्लेशियरों के समाप्त होने के लिए 7 हजार मीटर वृद्धि की आवश्यकता होगी। इतना बड़ा खतरा है,तो इस रिपोर्ट पर भी हमें सदन में चिन्ता करनी चाहिए। विकास ऐसा न हो कि ग्लोबल वार्मिंग में चाहे उत्तराखंड हो,हिमाचल हो और जिस बात को कहा गया,मैं प्रो. सौगत राय की बात से सहमत हूं कि जो टेक्टोनिक प्लेट्स हैं,वे जिस तरह से आपस मे रगड़ खा रही हैं,उसी के कारण भूकंप भी आता है,बादल भी फटता है,लेकिन उसी के साथ जल स्रोत भी सूख रहा है। मैं उसमें बहुत विस्तार से नहीं जाना चाहता हूं।

          महोदय,इस पर पहले भी वीरेन्द्र कश्यप जी एक प्रस्ताव लेकर आये थे।  3 जुलाई और 10 जुलाई, 2009 को,जब हम पन्द्रहवीं लोक सभा में थे,उस समय भी हम लोगों ने इस पर चर्चा की थी। उन्होंने उस समय एक बोर्ड के गठन की बात की थी। उस डिबेट में अनुराग जी ने भी भाग लिया था। मैं समझता हूं कि पचासवीं राष्ट्रीय विकास परिषद् की बैठक जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री होते हैं,उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री प्रेम कुमार धूमल जी ने कहा था जिसे आज हम डिसकस कर रहे हैं। यहां पर हम उस संकल्प पर चर्चा कर चुके हैं। आज नार्थ ईस्ट में एक अलग से मंत्रालय बनाया गया है,उस काम को भी अटल जी ने किया था। मुझे लगता है कि हिमालियन रेंज का जो मंत्रालय बनेगा,वह काम भी हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी करेंगे और यह निश्चित तौर से जायेगा। ...(व्यवधान)

प्रो. सौगत राय : क्या आप उस समय अटल जी की प्रशंसा करते थे? ...(व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल :  हम हमेशा करते थे। मैं अटल जी की आलोचना भी नहीं करता था। ...(व्यवधान)प्रो. साहब मैं आपकी बात करता हूं। ...(व्यवधान)लेकिन मैं समझता हूं कि जब हम प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना की बात करते थे,स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की बात करते थे,तो उनकी चर्चा विस्तार से होती थी। कोई ऐसा नहीं था,जो उनकी बात न करे। ...(व्यवधान)इसलिए मैं समझता हूं कि आज जो इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा आयी,उस प्राकृतिक आपदा के बाद एक महत्वपूर्ण विषय आया है। उस महत्वपूर्ण विषय के बारे में मैं आपसे कहना चाहूंगा कि हमारे जो 11 राज्य हैं,उनके लिए निश्चित तौर से वहां की जियोग्राफिकल बाँउड्रीज बनायी जाये,जबकि आप दूसरी बात कह रहे हैं। उन दोनों में एक को-आर्डिनेशन होना चाहिए और एक केन्द्रीय मंत्रालय होना चाहिए।   जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है और उत्तराखंड को भी हम 90  प्रतिशत विशेष अनुदान देते हैं। इस तरह से उन योजनाओं का भी लाभ होगा,क्योंकि जो फॉरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट आ चुका है। इस बात से आप भी अवगत हैं कि आज कई क्षेत्रों का विकास भी रुक गया है। वहां अगर एक किलोमीटर सड़क बनानी हो,तो आज जो मैदानी इलाके की सड़क की कीमत है,उससे कहीं गुना ज्यादा वहां पर सड़क बनाने की कास्ट आती है क्योंकि सामग्री सब नीचे से जाती है। इसलिए वहां की परिस्थितियां अलग हैं। हम विकास की बात करते हैं। केदारनाथ की घटना हुए एक वर्ष से ऊपर हो गया,लेकिन अभी तक हम सड़क नहीं बना पाये,पुल नहीं बना पाये। आखिर जो उन गांवों में लोग रहते हैं,वे वहां बहुत विषम परिस्थितियों में रहकर काम कर रहे हैं।

 आज जो जिले हैं,उन जिलों के बारे में पहले 17 मार्च को योजना आयोग ने कहा था कि हम इस पर गठन करेंगे। आज वर्ष 2004 का भी श्री रमेश पोखरियाल निशंक जी ने उल्लेख किया,फिर दादा कहेंगे कि आप अटल जी की बात कर रहे हैं,उस समय एक इन्टर-मिनिस्ट्रियल टास्क फोर्स का गठन हुआ था,जिसकी बैठक भी हुई थी। लेकिन उसके बाद ट्रांस-हिमालयन विकास प्राधिकरण के गठन की बात हुई थी,लेकिन उसका गठन नहीं हो पाया,मैं उसके विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं। लेकिन यदि कोई चीज पीछे नहीं हो पाई,तो मैं उसी चर्चा में रहूं,तो मैं समझता हूं कि शायद यह 16वीं लोक सभा का श्रेय रहा होगा,केदारनाथ की त्रासदी के बाद इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को कोई रोक नहीं सकता है,लेकिन उसको कम किया जा सकता है। यदि वहाँ पर अध्ययन होता रहे तो निश्चित तौर से बादल फटने या भूकम्प आने को रोका जा सकता है। यदि उस पर कोई मंत्रालय बन जाएगा,तो उस पर स्टडीज भी होगी,उस पर जानकारी भी मिलेगी कि किस क्षेत्र में क्या परिवर्तन हो रहा है। आप देखते हैं कि ग्लेशियर खिसक रहे हैं। वे बातें ऐसी हैं जिन पर हम फोकस करें। लेकिन आज तो स्थिति यह है कि इस तरह की घटनाओं की कभी कल्पना थी नहीं,इसलिए कभी इस तरह की तैयारियाँ नहीं हुईं। आज भी हम इस तरह की बड़ी घटनाओं को केवल एक राज्य पर छोड़ दें,तो मैं समझता हूं,केवल यही परिस्थितियाँ नहीं हैं,आज नेपाल उससे मिला हुआ है,जिस तरह से माओवाद से खतरा है,जिस तरह से चाईना की सिक्किम के ऊपर निगाह है,आज अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर कई राज्य हैं और उन अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर जिस तरह से आतंकवाद का खतरा है,तो मैं समझता हूं कि केवल एक राज्य ही उन समस्याओं से निपटने में सक्षम नहीं हो सकता और न उन चुनौतियों का सामना कर सकता है। उसके लिए भी कम से कम केन्द्र और राज्य का समन्वय होना चाहिए। हमारे संघीय ढ़ांचे में समन्वय है। बार-बार हमारे प्रधानमंत्री इस सदन को आश्वस्त कर रहे हैं,देश को आश्वस्त कर रहे हैं कि हम विकास तभी कर सकते हैं जब राज्य और केन्द्र का समन्वय हो। उसमें जब केन्द्र लगातार सहयोग देने की बात कर रही है,तो ये बात बिल्कुल सही है कि जो उन राज्यों की परिस्थितियाँ हैं,उन्हें देखते हुए हम इस तरह के मंत्रालय का गठन करें। आज वहां के लिए वाटर रिसोर्सेज़ की बात कही कि देश में सबसे ज्यादा क्यूबिक पानी हम दे रहे हैं। आखिर वहाँ से कितनी हिमालयन नदियाँ निकली हैं!चिनाव,रावी,व्यास,झेलम,ब्रहृमपुत्र,गंगा आदि नदियाँ हैं। सिर्फ गंगा की बात नहीं है,आखिर ये सारी नदियाँ तो हिमालय की हैं। तो इन नदियों पर भी आज किस तरह की डिमांड बढ़ रही है,आज भी देश में कितने बिजली की आवश्यकता है,आज सबसे ज्यादा पोटेंशियल तो हाइड्रो है,हम लोग शायद एनर्जी कमेटी में भी रहे हैं और थर्मल का रिसोर्स जो कोयला है,वह कभी न कभी खत्म होगा,वह विषय नहीं है।

माननीय सभापति :  माननीय जगदम्बिका जी, कृपया अब समाप्त करें।

श्री जगदम्बिका पाल : मैं काफी बातें कहना चाहता था। एक लाख मेगावाट पोटेंशियल है हाइड्रो का। उस एक लाख मेगावाट को भी स्कैटर्ड करने के लिए जिस तरीके का काम होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। पिछले दो वर्षों से, यह बात इस समय कहने की नहीं है, लेकिन यदि एन.एच.पी.सी. में कोई फुल टाइम नहीं है, तो मैं समझता हूं कि आज इन राज्यों से पूरे देश को हम बिजली दे सकते हैं। इसके बावजूद भी सरप्लस बिजली हो सकती है। एक तरफ यहाँ हम बिजली पैदा कर सकते हैं, यहां के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग पूरे देश की जनता के हित में हो सकता है, तीसरा प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए उपाय कर सकते हैं और केन्द्र की सूचना मंत्रालय के सहयोग से हम वहां का विकास बहुत तेजी से कर सकते हैं। आपस की एकता को देखते हुए, जब इन ग्यारह राज्यों का एक मंत्रालय होगा, तो एक साथ उन मुख्यमंत्रियों की बैठक जो हमारे देश की सीमाओं से जुड़े हुए हैं, निश्चित तौर से एक बहुत ही सार्थक, बहुत ही उपयोगी और इसकी एक बड़ी उपादेयता है। जिस संकल्प को ये लेकर आए हैं, मैं उस पर बल देता हूं, उसका समर्थन करता हूँ और मैं उम्मीद करता हूं कि सदन इसे पारित करेगी।

                                                                                     

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Thank you, Mr. Chairman. I would have spoken just after Prof. Saugata Roy but Mr. P.D. Rai, my friend, wanted to speak as he has some other work to do. This is the last day of this week and I thought that I will give my space to him but I found that subsequently two other Members also have spoken who have wider knowledge about the Himalayan region.

          Dr. Ramesh Pokhriyal Nishank of course has moved this Resolution today and it deals with two major aspects – speedy development and conservation. These are the two aspects on which we should be deliberating upon instead of wasting our time upon the purity of the water of the Ganges, the Hindutva and whether other religions have any significance relating to the Himalayas.

The four priorities set out by the hon. Member in the Resolution are as follows. First is to identify backward areas of Himalayan States and ensure their overall development and conservation. The second priority is to provide special financial packages for development of backward areas particularly, border areas. As far as I understand, all the States that are on the foothills or on the Himalayas are getting special category status, and what better financial packages would there be I think the Minister will be mentioning while replying to the debate. 

The third priority is to take effective measures to check cross border infiltration. I have not heard anyone who has spoken on this aspect.

PROF. SAUGATA ROY : BJP should.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : Cross border infiltration is related not just to Bangladesh, it is related to China border, it is related to Nepal border. This Resolution is not relating to Bangladesh, Prof. Roy, you need not worry.

          Cross border infiltration is occurring from Nepal and that is also a great problem for India as a whole, and that is also affecting Kashmir valley. In that respect this needs deliberation.

          The fourth priority is to recommend to the Union Ministries concerned for laying of new Railway lines, establishment of hydro power projects, construction of roads and other infrastructural development projects and to strengthen economy by setting up of industries based on natural resources available in the Himalayan States. These are the major points which the hon. Member moved in his Resolution.

          I would start with saying this. The name ‘Himalaya’ has been derived from two Sanskrit words. One is hima and the other is alaya.That is how the name Himalaya has come into use. It means the Abode of Snow. In English language we have a number of words relating to snow, ice and other forms and other than Sanskrit, in our traditional languages we do not find so many words describing the various stages of ice, snow or other aspects.

          Here when we talk about Himalayas we have to also understand the massive Himalayan arc that extends over 2500 km between Nanga Parbat in west and Namcha Barwa in the east. Here I would say, Mr. Chairman, the higher regions of the Himalayas are snow bound throughout the year and in spite of their proximity to the tropics, the perpetual snow level seldom falls below 5,500 metres. The Himalayan ranges encompass numerous glaciers. Notable amongst them is the Siachen which is the largest glacier in the world outside the polar region. 

          The Himalayan glaciers are the source for several large perennial rivers which in turn further define and shape the mountain configuration and the rain into major river system of the continent. The Himalayan region is dotted with hundreds of small and big crystal clear lakes. It is not only glaciers, it has many crystal clear lakes many of which are considered sacrosanct by the followers of various religions, not only Hindus. Here I would say there are several religious places or sanctum sanctorums in the Himalayan region.

          Buddhism has Tawang and Rumtek monasteries, Dharamshala Buddhist temple and Mono Bukur; in Hinduism, there are Kamakhya, Badrinath, Kedarnath, Gangotri, Yamunotri, Vaishnodevi and Sri Amarnath temples; in Sikhism, we have Nishan Sahib, Nanak Sahib, Hemkund Sahib, Ponta Sahib, Manikaran Sahib and Pather Sahib; in Islam, there are Hazratbal and Charar-e-sharief shrines and Piran Kaliyar; in Christianty, there is the Catholic Cathedral at Kohima and Baptist Church in Mizoram.  So, it is not only one religion. Of course, we Hindus treat the Himalayas as an abode of God but there are other religions also who treat this Himalayan range equally.

          I would say, the Himalayan ranges have a profound effect on the climate of the Indian sub-continent and the Tibetan plateau. They prevent the frigid and dry Arctic winds from flowing south into the sub-continent, keeping South Asia much warmer when compared to the regions located between corresponding latitudes throughout the globe. They are a barrier for the moisture laden monsoon winds preventing them from travelling further northwards and thus facilitating timely and heavy precipitation in the entire northern India.

          I would say, during winters, the Himalayan ranges pose a barrier to storms coming from the west and as a consequence receive precipitation in the form of snow at higher ranges and rainfall in lower elevations and the adjacent plains of north India. Thus, there are two distinct periods of precipitation in IHR – first, the moderate amounts brought by western disturbances during winter; and secondly, the heavier precipitation during summer due to southerly monsoon winds.  The winter precipitation is more pronounced in the western Himalayas in comparison to the eastern Himalayan region while the reverse is true for the summer monsoon.

          Despite being a general barrier to the cold northerly winter winds, the Brahmaputra valley receives part of the frigid winds causing substantial lowering of temperature in North-East India, helping north-east monsoon to occur during that season.

          We have river systems, where the western rivers flow into the Indus valley basin.  The other Himalayan rivers drain into the Ganga-Brahmaputra region.  As the only exception, the eastern most glacial river feeds the Irrawady river basin which originates in eastern Tibet, flows south through Myanmar and finally drains into the Andaman Sea. So, when we are talking about the river basins of the Himalayas, we have to keep these three in consideration.

          With such a profound influence on the regional climate and due to great variations in altitude and latitude, the Himalayan region nurtures a staggering bio-diversity of flora and fauna.  The Indian Himalayan Region accounts for around 70 per cent of the Himalayan bio-diversity hotspots.  Recognition of the Himalayas as one of the 34 global bio-diversity hotspots aptly reflects its wide ranging ecological significance.

          In the religious traditions of India, the Himalayas as an entity has been personified as Himavan, the father of Lord Shiva’s consort Parvathi.  Multiple ethnic compositions are a striking feature of this region.  More than 170 of the total 701 Scheduled Tribes of India inhabit this region.  The Tribal Affairs Minister was here.  I would be happy if he takes cognisance of this information.

          There is a distinct social awareness on conservation and natural resource management as reflected by the origin of world famous environment movement Chipko and the existence of a number of traditional institutions. … (Interruptions)

 

HON. CHAIRPERSON : Shri Mahtab, just for a moment, will you take your seat?

I have to inform the hon. Members that two hours have already been taken on this Resolution, thus, almost exhausting the time allotted for this discussion. As there are six more hon. Members to take part in the discussion on this Resolution, the House has to extend time for further discussion on the Resolution. If the House agrees, the time for discussion on the Resolution may be extended by one hour.

SEVERAL HON. MEMBERS: Agreed. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON : At 6 o’clock, the House will take up ‘Zero Hour’.

… (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: Exactly at 6 o’clock, we will take up ‘Zero Hour’.

… (Interruptions)

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB: My suggestion would be that I will take another 5-7 minutes. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: The time for discussing this Resolution is extended by one hour, with the consensus of the House.

… (Interruptions)

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : Let me complete it and then you can take up ‘Zero Hour’. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: I have already informed that at 6 o’clock, we will take up ‘Zero Hour’, by which time, Shri Mahtab can conclude.

… (Interruptions)

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : In the initial years after Independence, especially up to the 5th Five Year Plan, that is, 1974-79, the approach to development of the Himalayan Region was no different from that of the rest of the country, as there was little appreciation of the unique problems and developmental needs of the Himalayan Region. In the 5th Five Year Plan, for the first time, the developmental issues of the Himalayan Region and the problems of the hill areas of the country were recognized. It was in consideration of this that a Special Hill Area Development Programme was initiated during the 5th Five Year Plan period. However, development programmes based on sectoral approach implemented during the 1970s made limited impact in the hill areas of the country. … (Interruptions) Mr. Singh, I have to say something about our Prime Minister. So, I would request you to kindly pay some attention.

          I am referring to the 5th Five Year Plan, when a change was made, but it had very little impact. So, in recent years, the need to integrate development with environmental concerns has taken the centre-stage, which was accepted and articulated in policy documents with greater regularity. … (Interruptions)

HON. CHAIRPERSON: Let him continue; kindly do not interrupt him.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : The hill areas of the country are faced with certain peculiar problems inhibiting the process of development. On account of the difficult terrain, variable agro-climatic conditions, distinct social and cultural features, the hill areas have remained backward.

          Today, the thinking for the plains continue – this is the problem in our planning – to dictate the resource-use of Himalayan Region. I need not go into the details, but here, I would say that you have to make the western Himalayan Region and the eastern Himalayan Region; severe soil erosion takes place in Jammu & Kashmir, Uttarakhand and Himachal Pradesh. Aluminum toxicity and soil acidity, soil erosion and floods, sifting cultivation, non-availability of electricity, poor road, poor input delivery system and communication infrastructure, etc. are prevalent in North Eastern States - in Assam and in Sikkim too. But in Jammu & Kashmir, Himachal Pradesh and Uttarakhand, we have severe soil erosion and we have degradation due to heavy rainfall.

HON. CHAIRPERSON: Sorry to interrupt you. It is already 6 o’clock.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : My only request to you is this. I will take hardly another 3-4 minutes. Let me conclude and after that, let the House take up the ‘Zero Hour’. It is up to you. 

18.00 hrs. HON. CHAIRPERSON : Is it possible to take it up next time?   Next time when we will take up this Resolution you can continue your speech.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : We will not be taking up the Resolution next Friday.  Next Friday we will be taking up Private Members’ Bill.  So, I could speak only after 15 days which will have very little impact.  As the House decides, I have nothing to say.

       

HON. CHAIRPERSON: If the House agrees, we may extend the time of the House till ‘Zero Hour’ is over.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes, Sir.