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Title: Discussion regarding issue of National security and rise of militancy in various parts of the country especially in North-East and Jammu & Kashmir, raised by Shri Vilas Muttemwar on the 14th December, 1999. (Cont.- Concluded)   MR. SPEAKER: Now, let us take up discussion under Rule 193. Shri L.K. Advani to reply.

ग्ृाह मंत्री ( श्री लाल कृष्ण आडवाणी): अध्यक्ष महोदय, मैं सबसे पहले श्री विलास मुत्तेमवार और श्री राजेश पायलट को इस बात के लिये धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा आरम्भ की है और सदन को यह अवसर दिया कि देश की आंतरिक सुरक्षा की स्िथति के लिये जो संकट देश के वभिन्न भागों में और विशेषकर जम्मू और कश्मीर तथा पूवर्ोत्तर राज्यों में पैदा हुआ है, उसके बारे में अपने विचार प्रकट करे सुझाव दे। मुझे इस बात की विशेष खुशी है कि इस बहस में २३ माननीय सदस्यों ने कुल मिलाकर भाग लिया। हालांकि बहस का समय दो घंटे निर्धारित हुआ था लेकिन यह साढ़े चार-पांच घंटे बहस चली। मैं पूरे तौर पर कह सकता हूं कि यह बहस रचनात्मक थी। उसमें किसी ने भी कोई प्वाइंट स्कोर करने का नहीं सोचा कि इस सरकार ने ऐसा किया, उस सरकार ने ऐसा किया या उस सरकार ने वैसा किया। सब माननीय सदस्यों के भाषणों में तीन चीजों लगभग समान थीं, पहली चीज कि संकट गंभीर है, उसे कम नहीं मानना चाहिए। दूसरी चीज उसमें एक सामूहिक संकल्प भी उभरता था कि हमें हर स्िथति में इस संकट का निवारण करना चाहिए, देश को इसके ऊपर उभरना चाहिए और तीसरी चीज यह भी बार-बार उभरती थी कि यह सवाल ऐसा नहीं है कि जिसे दलगत दृष्िट से सोचा जाए। हम मिलकर इस बारे में सोचें, मिलकर इसका निवारण करें। वैसे तो यह सारे देश की चर्चा है, लेकिन प्रस्ताव देने वालोंparticularly in Jammu and Kashmir and in the North-East इन दोनों हिस्सों से मैं अलग-अलग डील करूंगा। पहले मैं जम्मू-कश्मीर की चर्चा करूंगा उसके बाद मैं पूवर्ोत्तर क्षेत्र की चर्चा करूंगा। मैं मानता हूं कि इस शताब्दी के सातवे दशक तक आतंकवाद से हम परचित नहीं थे। देश में आतंकवाद नहीं था। कहीं-कहीं हिंसा थी। उत्तर-पूर्व के हिस्सों में कही-कहीं हमने इनसर्जेन्सी का मुकाबला किया है। लेकिन आतंकवाद जिसमें बेगुनाह लोगों की हत्या चाहे जब कर दो, बम विस्फोट कर दो, रास्ते चलते किसी की हत्या कर दो या चुन-चुन कर कुछ लोगों को मार दो। इस प्रकार की स्िथति सातवें दशक तक लगभग नहीं थी। मैं कभी-कभी अपने व्यकितगत अनुभव को याद करता हूं जब मैं पहली बार सरकार का हिस्सा बना, श्री मोरारजी भाई उस समय प्रधान मंत्री थे, मुझे पाकिस्तान जाने का अवसर मिला। मेरा जन्म-स्थान कराची है, मैं वहीं का निवासी रहा हूं। इसलिए जब मुझे उनका निमंत्रण मिला तो मैं वहां गया था। उस समय वहां सैनिक शासन था, जैसा कि आज है। कराची शहर में चारों ओर सेना की टुकड़ियां दिखाई देती थीं। जनरल जिया उस समय वहां के राष्ट्रपति थे। मैं वहां दो दिन था। स्वाभाविक रूप से मुझसे वहां के राजदूत पूछा कि आप कहां जाना चाहेंगे। मैंने कहा कि मैं अपने निवास-स्थान और अपने स्कूल जाना चाहूंगा। अपनी पुरानी स्म्ृातियां सजीव करने के लिए मैंने उनका उल्लेख कर दिया। मेरे साथ पाकिस्तान का अधिकारी था, जो मेरे साथ चलता था, जहां के लिए भी मैं कहता था वह साथ चलता था। जब मैं वहां सहज रूप से घूम रहा था तो कई लोगों ने उत्सुकतावश पूछा कि यह कौन हैं। उन्होंने बताया यह भारत सरकार के एक केन्द्रीय मंत्री हैं। उनको ताज्जुब होता था कि उनके यहां तो इतनी सेना, इतनी सुरक्षा होती है। यह १९७८ या अरली १९७९ की बात होगी। उन्हें आश्चर्य होता था कि भारत का केन्द्रीय मंत्री बिना सुरक्षा के यहां घूम रहा है और हमारे यहां जितने सांसद, विधायक और मंत्री हैं वे पूरा का पूरा पैराफर्नेलिया लेकर घूमते हैं। यह १९७७ की बात है और जब आज सोचता हूं तो अब कितना अंतर हो गया है। आज मेरे साथ ब्लैक कैट कमांडोज जाते हैं, सांसदों के साथ कई सुरक्षाकर्मी जाते हैं। कई-कई प्रदेशों में तो हर एक विधायक के साथ सुरक्षा लगाई गई है। ऐसी स्िथति है, जिसके कारण यह बात उभरकर आती है कि आंतरिक सुरक्षा के वातावरण मे पिछले दो दशकों में जमीन और आसमान का अंतर हो गया है। मैं समझता हूं कि वह शायद अजीत चौधरी थे, उनका अपने भाषण के आखिर में जो बयान था, वह मैं सुन रहा था। उन्होंने उल्लेख किया थाThe genesis of militancy in Jammu and Kashmir lies in the 1971 war ऐसा ही कुछ आपने कहा था। अध्यक्ष महोदय, उसमें मैं सचाई बताना चाहूंगा, जो कुछ उन्होंने कहा, वह एक प्रकार से सही विश्लेषण है। १९७१ में पाकिस्तान की जो भारी पराजय हुई, उसने पाकिस्तान को सोचने के लिए मजबूर किया कि रणभूमि में भारत की सेना के साथ मुकाबला करना सहज नहीं है और फिर उन्होंने अपने मलिट्री जनरलों के साथ बैठकर रणनीति बदली और रणनीति बदलते हुए, जो उनका विचार-विमर्ष हुआ, कहीं कुछ अखबारों में छपा है, जनरल जिला उल हक ने अपने मलिट्री कमांडरों से बात कर के कहा कि अब हमें एक स्ट्रैटेजी अपनानी पड़ेगी और उसके तहत एक "टौपेक" नाम से कार्रवाई करना नश्िचत किया गया। यह भाषण १९७३-७४ का भाषण है, लेकिन उसकी तैयारी करते-करते और उसे क़ियान्िवत करते-करते उनको समय लग गया। ८०वें दशक मेंIn the eighties, it was implemented or executed और योजनाबद्ध रूप से उन्होंने पंजाब से शुरू किया। श्री श्यामाचरण शुकल (महासमुन्द) : अध्यक्ष महोदय, मैं आडवाणी जी का ध्यान एक बात की ओर आकर्िषत करना चाहता हूं। वे इस बात से सहमत होंगे कि पाकिस्तान ने १९८५, १९८६ और १९८७ के आसपास से बेधड़क, निडर होकर के मिलीटेंसी को बढ़ाया, चाहे पंजाब हो या जम्मू-कश्मीर। श्री लाल कृष्ण आडवाणी; मैं, इसमें इसलिए नहीं जाना चाहता कयोंकि मेरा अपना विश्लेषण है कि यह शिमला एग्रीमेंट के बाद, पाकिस्तान ने हमसे जो कुछ कहा, उसके विपरीत काम करते हुए, न्यूकलीयर बम की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू किया।This was part of an overall strategy. शिमाल एग्रीमेंट के बाद कया हुआ-I do not want to score points today, I want to simply point out that. उसके बाद प्राकसी वार का जन्म हुआ। वह १९७१ के युद्ध में से हुआ और प्राकसी वार में जब पाकिस्तान को चोट लगनी शुरू हुई और उनको एक प्रकार से लगा कि पाकिस्तान प्रॉकसी वार में भी सफल नहीं हो रहा है, उसके ऊपर भी धीरे-धीरे भारत अपना अंकुश जमा रहा है। तब उसमें से कारगिल की उत्पत्ित हुई। कारगिल में से प्रॉकसी को वार तीव्र कर, आतंकवाद को आगे बढ़ा।So, all the steps of Pakistan result from failure and frustration, not from confidence and hope. जितनी प्रॉकसी वार पहले थी, १९७१ में जो पाकिस्तान को विफलता मिली, उसकी पराजय हुई और जब वे प्रॉकसी वार में भी सफल नहीं हुए, तो कारगिल का जन्म हुआ और जब कारगिल में विफल हुए, तो इन दिनों जो हिन्सा हम देख रहे हैं, वह उसमें जन्मी है। जो बादामी बाग और इधर-उधर घटनाएं हो रही हैं, ये उसी का परिणाम हैं। ये कभी बन्द नहीं हुई हैं। मैं आंकड़े भी देखता हूं, लेकिन मैं आंकड़ों के आधार पर कभी दावा नहीं करूंगा कि उनके आतंकवादियों की म्ृात्यु ज्यादा हो रही है और हमारे लोगों की कम, मैं यह नहीं कहूंगा। मैं मानता हूं कि युद्ध में भी हमारा इतना नुकसान नहीं हुआ जितना कि प्रॉकसी वार में हुआ। इसलिए मुत्तेमवार जी ने कहा कि हमारे जितने लोग प्रॉकसी वार में मारे गए उतने प्रत्यक्ष युद्ध में नहीं मरे। मेरे पास पिछले १० साल के आंकड़े हैं। उनके अनुसार निरीह नागरिक, सवलियन्स ७,९६० मरे हैं।I am simply counting the number of toll from 1988-89 onwards. मिलीटेंट को सिकयोरिटी वाले मारते रहे हैं।Ten thousand seven hundred and twenty seven militants had been killed during the same period though the cost that we have had to bear is the death of 2,039 securitymen. २०३९ सिकयोरिटी मैन हमारे मारे गये। उनका कोई सिकयोरिटी मैन नहीं मारा गया। अप्रत्यक्ष युद्ध, प्रॉकसी वार का जो सबसे बड़ा नुकसान है, वह यह है कIt is our securitymen, our Jawans, our Armymen, our paramilitary forces" men who are being killed and not one from the Pakistan side. On the other hand - युद्ध होता है तो उसमें हमारे ४०० लोग कारगिल में मारे गये तो उनके ६०० मारे गये और सब सिकयोरिटी मैन मारे गये। उनके भी सिकयोरिटी मैन मारे गये। उनके कोई मर्सीनरीज नहीं थे। ये सब प्रायः मर्सीनरीज थे। अच्छी बात अगर कोई है, राजेश जी ने उल्लेख किया कि एक बार राजीव जी ने कहीं कहा कि हम कहीं १९९० में वापिस तो नहीं पहुंच जायेंगे। मैं यह मानता हूं कि जम्मू कश्मीर में जो उग्रवाद हुआ है, उसमेंThe worst years were 1989, 1990 and 1991. These were the worst years. But that phase continued for a long time. यहां तक कि जम्मू कश्मीर और खासकर कश्मीर घाटी, उसमें आजीविका का प्रमुख आधार है, वह पर्यटन है, टूरिज्म है।Tourism has absolutely dried up. मेरे पास टूरिज्म के आंकड़े हैं, जो कि आश्चर्यकारक हैं। १९९५ में सारे भारतवर्ष से डोमेस्िटक टूरिस्ट ३२२ गये। १९९६ में ३७५, १९९७ में ७०२९, १९९८ में ९९,६३६ और १९९९ में १,९४,३२ टूरिस्ट गये हैं। मैंने १९९९ के जो आंकड़ें बताये उनमें मैं १,१०,३४५ अमरनाथ के यात्रियों को नहीं गिन रहा हूं। उनमें वैष्णो देवी जो ४ लाख यात्री गये हैं, उनको मैं नहीं गिन रहा हूं। मैं मानता हूं कि यह जो मापदंड है। वहां की स्िथति नार्मेसी की ओर बढ़ रही है या नहीं बढ़ रही है, इसको मापने काThis is a more correct barometre rather than the number of people killed. कितने लोग मारे गये, कितने लोग नहीं मारे गये, मैं उससे ज्यादा इसको पैरामीटर मानता हूं कयोंक सेंस ऑफ सिकयोरिटी जब होगा तभी लोग जायेंगे, नहीं तो नहीं जायेंगे। जैसे ३२२ लोग एक साल में गये हैं। ३७५ लोग एक साल में गये हैं , कोई जाने को तैयार नहीं है। यहां तक कि उन ईयर्स में मैंने देखा कि पहले विदेशी आते थे, देशी नहीं जाते थे। लेकिन जब से एक घटना हुई जिसमें अलग-अलग देशों से आये हुए पांच विदेशियों का अपहरण कर लिया गया और वे गायब हो गये, नहीं मिले। आज तक उनके रिश्तेदार आकर मुझे मिलते हैं। उनके ऐम्बेसेडर आकर मिलते हैं। हम उन्हें नहीं खोज पाये और हो सकता है कि वे बचे भी न हों, खत्म हो गये हों। लेकिन यह जो एक पैरामीटर है, उस पैरामीटर के आधार पर विश्वास होता है कि चाहे संकटपूर्ण स्िथति है, चाहे हिंसा आज भी है। हम हिंसा को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाये हैं लेकिन हम इसके ऊपर विजय अवश्य पायेंगे, यह एक विश्वास मन में है और वह विश्वास उस विश्वास का एक आधार है हमारा अपना पंजाब का अनुभव। एक समय था जब पंजाब में, मैं कई बार जाता था और लगता था कि यहां तो कुछ बदलेगा नहीं। यहां कुछ परिवर्तन आयेगा नहीं। यहां तो सालों साल तक ऐसे ही चलेगा। शाम को सड़के सुनसान हो जाती थी और घर से कोई नहीं निकलता था। लेकिन परिवर्तन आया। परिवर्तन आने के लिए मैं हमेशा कहता हूं और आज भी कहता हूं कि मैरे उत्तर पूर्व के भाई यहां बैठे हैं, जो हमेशा मुझसे आकर आग्रह करते हैं कि पैरामलिटरी फोर्सेस भेजो, सेना भेजो, यह भेजो आदि। मैं सबको कहता हूं कि पंजाब का अनुभव इस बात को बताता है कि उग्रवाद के ऊपर अगर विजय पानी है, तो यह सहायक होंगे। आर्मी सेना सहायक होगी, अर्दध सैनिक बल सहायक होंगे। मुख्यत: वहां की जनता, उस प्रदेश की सरकार, उस प्रदेश की पुलिस यह जो तीन तत्व हैं, उन तत्वों के आधार पर विजय प्राप्त होगी और इसका जम्मू कश्मीर से भी संबंध है। जितनी मात्रा में हम वहां की जनता, वहां की सरकार, वहां की स्थानीय पुलिस उसको इस बात के लिए तैयार कर सकते हैं कि हम इसका मुकाबला करेंगे, इसको समाप्त करेंगे, उतनी मात्रा में सफलता मिलेगी। इस सफलता में केन्द्र सरकार की सेना और पैरा-मलिट्री पुलिस सहायक होगी। लेकिन केवल केन्द्र सरकार की सेना और पैरा-मलिट्री फोर्स के आधार पर इस संकट का निवारण संभव नहीं है। मैं जम्मू कश्मीर की बात कहूं चाहे उत्तर पूर्व की बात कहूं, मैं मानता हूं कि इन दिनों में सबसे अच्छी स्िथति जो हुई है, वह यह है कि १९८९-९०-९१ के प्रारंभिक वषर्ों में जितने उग्रवादी थे, वे प्राय: वे थे जिनको पाकिस्तान, आई.एस.आई. के लोग जम्मू कश्मीर से ले जाकर, वहां प्रशिक्षण देकर वापिस भेजते थे। धीरे-धीरे जो लोकल जम्मू कश्मीर के लोगों को ले जाने की बात है, वह खत्म होती गई। विगत वषर्ों में जितने लोग गिरफतार होते हैं, मारे जाते हैं, प्राय: वे जम्मू कश्मीर के नहीं हैं, बहुत कम परसैंटेज है, अधिकांश परसैंटेज पाकिस्तान, अफगानिस्तान का है, और भी कई देशों का है। कभी-कभी मैंने किसी सवाल के उत्तर में बताया होगा कि कितने-कितने लोग किस-किस देश के थे जिनको मारा गया।But all of them are mercenaries recruited by Pakistan to be sent here as cannon fodder. भेजो उनको, मरवाओ उनको। इसलिए हमारी सेना के लोग भी कहते हैं कि इस लड़ाई में हमारे सिकयुरिटीमैन मरते हैं, उनके नहीं मरते। लेकिन अच्छा लक्षण यह है कि हमारे यहां से लोग नहीं जाते, कम जाते हैं। धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होती गई है। जितनी मात्रा में यह होगा उतनी मात्रा में हमको सफलता मिलेगी। यही चीज मैं उत्तर पूर्व के लिए भी कह सकता हूं। विगत वषर्ों में खासकर असम में ऐसी घटनाएं हुई हैं जहां पर नागरिकों ने उग्रवादियों का विरोध किया है और उग्रवादियों को पकड़कर लिंच किया है। सार्वजनिक रूप से विरोध तो किया ही है, हजारों की संख्या में इकट्ठे होकर उन्होंने प्रोटैस्ट किया है कि हम इसको बरदाश्त नहीं करेंगे। मेरे पास अनेक ऐसे उदाहरण आए हैं, सूचनाएं मिली हैं जिसमें कई जिलों में इस प्रकार की घटनाएं हुई हैं। ढुबरी डिस्टि्रकट में दो घटनाएं हुई, बरपेटा में दो घटनाएं हुईं, कामरुप में दो घटनाएं हुईं, नलबाड़ी में हुईं, उदयगिरी नाम के एक स्थान में हुईं। मेरे सामने इस प्रकार की आठ अलग-अलग घटनाएं आई हैं जहां पर आम जनता ने सार्वजनिक रूप से हिम्मत करके, साहस करके उल्फा के आतंकवादियों के प्रति अपना रोष प्रकट किया है, क्षोभ प्रकट किया है। हम यह स्िथति जितनी बढ़ा सकेंगे उतना इस मामले में सफल होंगे। राजेश जी ने एक बात कही, पता नहीं कयों कही। उन्होंने कहा कि हम पंजाब और जम्मू कश्मीर के बीच सिकयुरिटी रिलेटेड एकसपैंडीचर में अंतर कयों करते हैं। नहीं करते। हम सिकयुरिटी रिलेटेड एकसपैंडीचर जैसे पंजाब को देते थे वैसे आज जम्मू कश्मीर को भी देते हैं। कहीं-कहीं पर थोड़ा विवाद होता है कि सिकयुरिटी रिलेटेड एकसपैंडीचर किसको माना जा सकता है। वह विवाद हम तय कर लेते हैं। मैं कह सकता हूं कि हमने आज तक जम्मू कश्मीर राज्य को सिकयुरिटी रिलेटेड एकसपैंडीचर के नाम से लगभग १४९८ करोड़ रुपये दिए।... (व्यवधान)

SHRI L.K. ADVANI : I am not merely dealing with Nagaland here. I picked up the two points mentioned by you. I have noted that. If there is any separate question, then certainly I would answer that. हमारे असम के माननीय सदस्य, श्री बैसीमुथियारी, ने बहुत बार आग्रहपूर्वक एक अलग बोडोलैंड बनाने की बात कही है। वे इसका आग्रह करते आए हैं, लेकिन कल उन्होंने एक बात कही, जिसका मैं स्वागत करता हूं। वह बात यह है कि जो उग्रवादी भारत से अलग होने की बात करते हैं, वे उनका विरोध करते हैं और वे इस प्रकार की सिसैशन प्रव्ृात्ित के साथ कभी कोई समझौता नहीं करेंगे। इस बाते के लिए मैं उनका स्वागत करता हूं। अलग राज्य बोडोलैंड बनाने में अनके कठिनाइयां है और उन कठिनाइयों के वे स्वयं जानते हैं, कयोंकि उन्हीं कठिनाइयों के कारण १९९३ में एक समझौता हुआ, जिसको बोडो-एकार्ड कहते हैं। बोडो एकार्ड के इम्पलीमेंटेशन में कमियां हैं। इसकी चर्चा मुझे करते रहे हैं। उन कमियों को दूर करने का प्रयत्न करेंगे, लेकिन कुल मिलाकर बोडो की जनसंख्या जितनी है और जिस प्रकार से वह फैला हुआ और जिस भाग को वे बोडोलैंड बनाना चाहते हैं, वह अलग प्रदेश भी बन जाएगा, उसमें भी बोडो की संख्या शायद ३०-३५ प्रतिशत से ज्यादा नहीं बनती।SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Excuse me, Sir, but I strongly oppose this argument. This is not at all correct.

SHRI L.K. ADVANI: I agree with you. त्रिपुरा के बारे में हमारे समर चौधरी जी ने चिन्ता प्रकट की, उसमें मैं भी भागीदार हूं। वहां बहुत सारे निरीह नागरिकों की हत्याएं हुईं और बहुत सारे अपहरण हुए हैं। यह समर जी को मालूम है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के चार-पांच प्रमुख अधिकारी अगस्त से गायब हैं, उनका आज तक पता नहीं। केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार, इन दोनों ने मिल कर प्रयत्न किए हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है। मुझे पिछले दिनों त्रिपुरा के मुख्य मंत्री मिले थे और प्रधानमंत्री जी से भी मिले थे। अगर कहीं यह धारणा है कि उसमें केन्द्र सरकार की फोर्सेस की कमी के कारण है, ऐसा मुझे नहीं लगता है। मैं देख रहा था, ... (व्यवधान)SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): Sir, I had the opportunity to go there on a visit. After my visit, I submitted a report to the Prime Minister. I wrote to the Home Minister also. It is an open border of 895 kilometres which is not there even in Punjab. It is a very sparsely populated State because of its terrain. Near the border, they go to Bangladesh in no time and people are able to see it. People cannot go to Bangladesh, 30 camps are being run in Bangladesh. They are coming and going with great ease. There are plain areas also there and Bangladesh is just across the road.

SHRI L.K. ADVANI: Yes, there will be a political solution.

MR. SPEAKER: Shri Bwiswmuthiary, please take your seat.

... (Interruptions)

SHRI L.K. ADVANI: Even about their problems, there can be only political solutions and except that no other solution is there. But those political solutions should be brought about in a manner as not to put a premium on violence and the extremism. पिछले दिनों आई.एस.आई. की काफी चर्चा हुई। मैं साथ-साथ एकाउन्ट लेता गया कि एकचुअली कया होता है? मुझे यह कहते खुशी है कि पिछले डेढ़-दो वषर्ों में कुल मिला कर जिस को इंटैलजिएंस की भाषा में मॉडयूल्स कहते हैं, ऐसे ४५ आई.एस.आई बैकड मौडूयल्स डिटैकट किए और उनको स्मैश किया। इन्हें ४५ गिरोह कह सकते हैं। उन्हें अड्डा कहना ठीक नहीं होगा। अड्डे का संबंध स्थान से है। ४५ गिरोह जो आई.एस.आई. ने संगठित किए, उनकी खोज कर, समाप्त करने में हमें सफलता मिली है। इस सारे प्रोसैस में शायद ११६ लोग गिरफतार किए गए और ८ लोग ऑपरेशन में मारे गए। इसके आधार पर मन में विश्वास होता है जो राष्ट्रपति जी ने देश और संसद के सामने सार्वजनिक रूप से सरकार की नीति की घोषणा की। उन्होंने एक बहुत बड़ा एम्िबशियस डिकलरेशन किया।It is stated as follows in paragraph 34 of the Address of the President of India on October, 25th: -