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Lok Sabha Debates

Recent Incidents Of Violence In Assam And Some Other Parts Of The Country Due To ... on 15 December, 2003

>*t36 17.25 hrs. DISCUSSION UNDER RULE 193 RECENT INCIDENTS OF VIOLENCE IN ASSAM AND SOME OTHER PARTS OF THE COUNTRY DUE TO RECRUITMENT POLICY OF THE RAILWAYS – contd.

Title: Recent incidents of violence in Assam and some other parts of the country due to recruitment policy of the Railway, raised by Shri Basudeb Acharia on 5th December, 2003 ( Continued - Discussion concluded follwed by a resolution adopted by the House to protect the regional harmony, unity and integratiy of the country).

श्री राम विलास पासवान (हाजीपुर) : सभापति जी, आज हम लोग फिर असम में जो घटना घटी, उस पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें आधिकारिक रूप से तो ४०-५० लोगों के मरने का समाचार आया लेकिन अनधिकारिक रूप से हमें जो जानकारी मिली है, उसमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं। अभी भी वहां से लोग भाग रहे हैं। कल-परसों हम कोलकाता में थे। काफी लोग अभी भी कोलकाता में आकर शरण ले रहे हैं। लोगों में आतंक का वातावरण व्याप्त है और लोग भयभीत हैं। इस संबंध में माननीय सदस्यों ने अपनी चिन्ता ज़ाहिर की। अध्यक्ष महोदय ने भी रूलिंग दी कि संसद में ऐसी बातें नहीं होनी चाहिए जिससे वहां की स्थिति और बिगड़े. इसलिए मैं चाहूँगा कि जो चर्चा हो रही है, वह सौहार्दपूर्ण वातावरण में हो लेकिन जो लोगों का हाल है, जो वहां के लॉ मनिस्टर थे, उन्होंने सारी बातें जो वहां के संबंध में बताईं, उन सबको मैं यहां नहीं कहना चाहता हूँ।

महोदय, संविधान की धारा १९(डी) फंडामैन्टल राइट्स की धारा है। उसके मुताबिक इस देश में हर नागरिक को अधिकार है कि वह देश के किसी भी कोने में जाकर बसे और अपना कारोबार करे। भारत की संस्कृति भी ऐसी रही है कि लोग देश में एक कोने से दूसरे कोने में जाते रहे हैं और काम करते रहे हैं। बिहार में आप चले जाएं तो बिहार के हर शहर में काफी बड़ी संख्या में राजस्थान और खासकर मारवाड़ी जिनको कहते हैं, वह हर जगह अपना कारोबार कर रहे हैं। पंजाब के भी लोग हैं। लोक सभा का चुनाव जब होता है तो हम देखते हैं कि कहीं भी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता है। आचार्य कृपलानी से लेकर जार्ज फर्नान्डीज तक सब लोग बिहार में जाते हैं और रहते हैं। हम बंगाल के लोगों को भी धन्यवाद देना चाहते हैं कि वहां लाखों की संख्या में बिहार के लोग हैं और वहां के रोज़गार को भी बढ़ा रहे हैं और अपना जीवनयापन भी कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों से इस तरह की टैन्डैन्सीज़ देखने को मिल रही हैं कि क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्षेत्रवाद के नाम पर भले ही हो सकता है कि किसी राजनीतिक दल को फायदा हो जाए या कुछ संगठनों को फायदा हो जाए लेकिन अंततोगत्वा देश इससे कमज़ोर होगा। इसमें दो तरह के एलीमैन्ट होते हैं। एक वे लोग हैं जिनका प्रजातंत्र में विश्वास है और देश की मुख्यधारा को वे समझते हैं। दूसरे वे एन्टी सोशल एलीमैन्ट्स हैं जिनको हम उग्रवादी भी कह सकते हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि मच्छर कहां पैदा होता है - मच्छर हमेशा गंदे नाले में पैदा होता है। गंदे नाले की सफाई हो जाए तो मच्छर पैदा होना बंद हो जाता है।

हमारे देश में मूलभूत समस्या बेरोज़गारी की समस्या है और बेरोज़गारी की समस्या का गंभीरता से निदान होना चाहिए लेकिन हम राजनीतिक दल के लोग क्या करते हैं, यह इस पर भी निर्भर करता है। महाराष्ट्र के हमारे साथी रावले जी हमारे अच्छे मित्र हैं। दिल से वे साफ हैं, भले ही बोलने में लड़ते-झगड़ते हों, रेल मंत्री से भी झगड़ते हों, लेकिन इनके दिल में कुछ गलत नहीं है। ये सीधे आदमी हैं और सीधी बात करते हैं, लेबर लीडर भी हैं लेकिन कभी कभी पता नहीं चलता है। इनके जैसे लोग यहां बैठे हुए हैं। हमारा आपका जीवन बहुत है। पचास साल आपको राजनीति में और आगे बढ़ना है।

17.30 hrs. (Shri P.H. Pandian in the Chair) श्री राम विलास पासवान:महोदय, राजनीति में जब ५० साल आगे बढ़ना है, तो सिर्फ एक सैक्शन को लेकर तो आप आगे नहीं बढ़ सकते। इस बात को हम समझते हैं कि महाराष्ट्र में लोकल लोगों की एम्पलायमेंट की समस्या है। असम में अनएम्पलायमेंट की समस्या है। नॉर्थ ईस्ट में अनएम्पलायमेंट की समस्या है, लेकिन बेरोजगारी का मतलब यह नहीं है कि बिहार के लोग, उत्तर प्रदेश के लोग वहां जाएं, तो पौलीटिकल पार्टी के नेता की हैसियत से कहना शुरू कर दें कि यहां मराठी लोगों को ही रोजगार का अधिकार है। …( व्यवधान)

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) :सभापति महोदय, मेरे नाम का उल्लेख किया गया है। इसलिए मेरा बोलना आवश्यक है। मैं बताना चाहता हूं कि महाराष्ट्र में और मुम्बई में गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सभी राज्यों के लोग रहते हैं। रेलवे के नियमों में लिखा हुआ है। It has been written in the Railway manual that priority should be given to the local people. "सी" और "डी"ग्रुप का जहां तक सवाल है, हम उसके लिए लड़ रहे हैं। यह केवल हमारा कहना नहीं है, बल्कि यह रेलवे का कानून है और वर्ष १९५९ में यह कानून बना है। पासवान जी, आप तो हमारे बड़े भाई जैसे हैं। हम कोई पूरे देश में मांग नहीं कर रहे हैं, हम केवल मुम्बई और महाराष्ट्र में मांग कर रहे हैं कि नियम के अनुसार इन दोनों ग्रुपों के कर्मचारियों की भर्ती महाराष्ट्र और मुम्बई के लोकल लोगों से होनी चाहिए और इस कार्य में न केवल मुम्बई और महाराष्ट्र बल्कि प्रत्येक राज्य को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। श्री बसुदेव आचार्य जी ने यह बात शुरू की। उन्होंने बताया कि डी.आर.एम. लैवल तक जो भी भर्ती होती है, वह स्थानीय लैवल के अधिकारियों से होनी चाहिए।…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान:रावले जी, मैं रेल मंत्री रहा हूं। आपने भी हमारे साथ काम किया है। आपको सब मालूम है। मैं दूसरी बात कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि ठीक है, फोर्थ क्लास के कर्मचारियों के लिए यह कम्पलशन होनी चाहिए, लेकिन आप जो स्लोगन देते हैं, वह ठीक नहीं होता है। आप भी जानते हैं मुम्बई हमारी वाणिज्यिक राजधानी है। आप यह भी जानते हैं कि हर देश में दो प्रकार की राजधानियां होती हैं। एक राजधानी राजनीतिक होती है और दूसरी वाणिज्यिक होती है। जैसे अमरीका में न्यूयार्क बिजनैस कैपीटल है और वाशिंगटन पॉलीटिकल कैपीटल है। इसी प्रकार कनाडा में ओटावा पॉलीटिकल कैपीटल है और मांटि्रयल बिजनैस कैपीटल है। इसी प्रकार से भारत की दो राजधानियां हैं। एक नई दिल्ली है जो राजनीतिक राजधानी है और दूसरी मुम्बई है जो वाणिज्यिक राजधानी है, जिसे मिनी इंडिया भी कहा जाता है। यही उसकी खूबसूरती है। जिस दिन आपने उसकी यह खूबसूरती समाप्त कर दी, उस दिन मुम्बई खत्म हो जाएगी।

महोदय, महाराष्ट्र में इस प्रकार के कामों के कारण आज स्थिति यह हो गई है कि वहां कोई इंडस्ट्री नहीं लगाना चाहता है। फिल्म स्टार्स ने अपने स्टूडियो नौएडा में बनाने शुरू कर दिए हैं। वहां से लोग कर्नाटक भाग रहे हैं। इसलिए कि उन्हें मालूम है कि कर्नाटक शान्त है। वहां के वातावरण में शान्ति है। एक नैशनल इंटरैस्ट होता है, दूसरा पार्टी का इंटरैस्ट होता है और तीसरा व्यक्ति का इंटरैस्ट होता है। जब पार्टी और व्यक्ति का इंटरैस्ट नैशनल इंटरैस्ट से ऊपर चला जाता है, तो वह दिन देश के लिए, पार्टी के लिए और व्यक्ति के लिए दुर्दिन होता है। मैंने रावले जी, आपका नाम इसलिए लिया कि आप समझदार हैं, आप सैंसीबल हैं। जो लोग यहां नहीं हैं, उनका नाम लेने का क्या फायदा, वे यहां आकर जवाब नहीं दे सकते हैं। यह केवल महाराष्ट्र का मामला नहीं है।

महोदय, मैं कल धनबाद में था। वहां बी.जे.पी. की सरकार चल रही है। केन्द्र में एन.डी.ए. की सरकार हैडेड बाई बी.जे.पी. चल रही है। एक तरफ तो यह सरकार कहती है कि कश्मीर में धारा ३७० को खत्म किया जाए। कश्मीर में सभी को जगह खरीदने की इजाजत दी जाए, वहां बिजनैस का अधिकार सभी भारतीयों को हो, लेकिन चिन्मयानन्द स्वामी जी, मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि दूसरी तरफ झारखंड में धारा ३७० को लागू करना चाहते हैं। झारखंड १५ नवम्बर, २००० को अलग हो गया। अब वह बंटवारा कैसे हुए, क्यों हुआ, यह इतिहास की बात हो गई, लेकिन एक साधारण सा नियम है कि १५ नवम्बर, २००० के बाद, जब बिहार और झारखंड एक था, तब हम एक राज्य के नागरिक थे और जब हम १५ नवम्बर, २००० के बाद अलग हो गए, तो उसके बाद जो बिहार से वहां गए उन्हें झारखंड का मूल निवासी नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन कानून बना दिया ७२ साल पहले से जो वहां का निवासी होगा, वहीं मूल निवासी होगा। वर्ष १९३२ के पहले जो लोग झारखंड आए और उनमें से भी जिनका नाम रैवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज है, वही झारखंड के निवासी माने जाएंगे। वहां भले ही आपकी पार्टी न लड़ रही हो, लेकिन खुलकर वहां दो भागों में लोग बंटे हुए हैं और ट्रायबल और नॉन ट्रायबल का झगड़ा, तीरकमान वालों का झगड़ा चल रहा है कि बिहारियो हटो, यहां से जाओ, यह झगड़ा शुरू हो गया है। आदिवासी, गैर आदिवासी, झारखंडी, गैर झारखंडी, इसमें शुरू हो गया है। ये कौन सा नियम है? …( व्यवधान)उत्तरांचल में भी यही हो रहा है। इसलिए मैंने कहा कि ये जो सारी चीजें हैं, ये क्यों हो रही हैं? आप नेशनलिस्ट पार्टी हैं, एक नियम, कानून बना दीजिए कि जिस दिन राज्य अलग होगा उस दिन से ही, वहां की नागरिकता उस दिन तक, जो लोग वहां रहेंगे, वे वहां के नागरिक माने जाएंगे और जो नहीं रहेंगे, जो जहां चले गए वहां के नागरिक माने जाएंगे। इसमें मैंने कहा कि यह देश के लिए बहुत खतरनाक चीज है।

महोदय, मैंने रेलवे के संबंध में कहा, उसका मंत्री जी जवाब देंगे। पहले ऐसा नियम नहीं था, सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्शन के मुताबिक हो या किसी कारण से हो, उसके कारण यह कर दिया गया। मंत्री जी ने कहा कि हम इसे फिर से अमेंड करेंगे और उसके बाद लोकल लोगों को, जहां डीआरएम की बहाली है, मैं चाहूंगा कि वही होना चाहिए। यदि २०,००० की बहाली है तो हमेशा डीआरएम लेवल पर कितना जरूरी होता है। गैंगमैन का मामला है, इसमें आप समझ सकते हैं, जो हमारे साथी कहते हैं कि कुछ लोग इसे पोलिटीकली लेते हैं, लेकिन गैंगमैन में २०,००० की बहाली होती है और ७० लाख एप्लीकेंट होते हैं। ये देश में क्या है?ये किसी दिन देश को खाएगी, अनएम्प्लायमेंट की समस्या देश को खाएगी। यदि देश में प्रजातंत्र को खतरा होगा तो बेरोजगारी के कारण होगा। हम रोजगार का जो हल्ला कर रहे हैं, उस मामले में सब लोग शांत रहते हैं, क्योंकि कांग्रेस को डर लगता है कि कहीं बेरोजगारी का सवाल उठाएंगे तो लोग पूछेंगे कि हमारे राज में कितने लोगों को रोजगार मिला। बीजेपी वाले यह मुद्दा नहीं उठाते, क्योंकि फिर सेंटर में मामला उठेगा कि आपने एक करोड़ लोगों को रोजगार देने का वायदा किया था, उसका क्या हुआ, लेकिन असली समस्या बेरोजगारी की है और नतीजा यह हो रहा है कि जहां-कहीं भी रोजगार निकलता है तो उन्हें लगता है कि हमारे अधिकार के ऊपर हनन हो रहा है। इसलिए नीतीश कुमार जी ने कहा, मैं उनकी बात सुन रहा था कि जो पुराना रिक्रुटमेंट रूल है, हम उसे हम लागू करेंगे। मैं समझता हूं कि वह उपयुक्त है।

महोदय, एक डीआरएम और जोनल आफिस में कितनी बहाली होती है। वहां भी जो डीआरएम काम करते थे, उन्होंने भी अपने अंडर एक रिक्रुटमेंट बोर्ड बनाया हुआ था, उसके आधार पर उनकी जितनी जरूरत होती थी, गैंगमैन की कितनी जरूरत होती है, सिवाए जो क्लास थ्री का था। मैं यह कहना चाहता हूं कि यह जो एक टेंडेंसी हो गई है, अभी मेरे पास त्रिपुरा से टेलीग्राम आया हुआ है, वहां जो बिहारी लड़के हैं उनके होस्टल में जाकर उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है। उन्हें कहा जा रहा है कि यहां से भागो। सब जगह, पूरे देश के हर कोने में यह टेंडेंसी चल रही है। मैं समझता हूं कि यह जो टेंडेंसी है, यह बहुत ही खतरनाक है।…( व्यवधान)

SHRI ADHIR CHOWDHARY (BERHAMPORE, WEST BENGAL): Sir, पूरे देश में नहीं है।…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान:बंगाल को मैंने शाबाशी दी है।…( व्यवधान)मैंने वेस्ट बंगाल के संबंध में शुरू में ही कहा।…( व्यवधान)

SHRI ABDUL HAMID (DHUBRI): Why were the innocent passengers harassed at Jamalpur railway station? … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : He has not yielded. Kindly resume your seat. The hon. Member is speaking. If you want to refute, you will have a chance.

… (Interruptions)

SHRI ABDUL HAMID : असम में इतने बिहारी हैं, उनके साथ कोई दुश्मनी नहीं थी।…( व्यवधान)आप असली बात बोलें।

श्री राम विलास पासवान: हम उस पर भी आ रहे हैं।…( व्यवधान)

SHRI ABDUL HAMID (DHUBRI): The Union Minister Shrimati Bijoya Chakravarty went to the AASU office and personally instigated them to burn the railway office. … (Interruptions)

श्री राम विलास पासवान:महोदय, मैं यह मान कर चलूं कि बिहार के लोगों ने किया, जो कुछ हुआ, उसके लिए हमारे साथी सपोर्ट कर रहे हैं। आप इस तरह की बात क्यों बोलते हैं, आप एक तरफ कहते हैं कि किसी पोलिटीकल पार्टी का हाथ नहीं है और एक तरफ कहते हैं कि उल्फा और उग्रवादियों का हाथ है।…( व्यवधान)आप उसे इससे क्यों जोड़ रहे हैं।…( व्यवधान)उसे कौन सपोर्ट कर रहा है?…( व्यवधान)

श्री अब्दुल हमीद : हम सपोर्ट नहीं करते हैं।…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान:बिहार में जो घटना घटी है, हम उसकी निन्दा करते हैं।…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : महोदय, ये एक तरफ कहते हैं कि किसी पोलिटीकल पार्टी का हाथ नहीं है। असम के एक मंत्री का बयान है, बिहार के लोगों को निकाला। वहां मंत्री जी बैठे हुए हैं और वे कहते हैं कि यह सरकार का बयान है।…( व्यवधान)असम में एक सुनियोजित ढंग से इस तरह की घटना की गई है और कांग्रेस के लोग तथा कांग्रेसी सरकार ने यह करवाया है। महोदय, मेरे पास यह कागज है और इसमें मंत्री जी का बयान है।

SHRI ADHIR CHOWDHARY : The Assam Government has taken appropriate measure to prevent the untoward incident. … (Interruptions)

श्री राम विलास पासवान:मेरा कहना है कि यदि बिहार में इस तरह की कोई घटना घटी है या रेलवे में जो छेड़खानी की गई या बदतमीजी की गई, उसे कोई आदमी एप्रीसिएट नहीं कर सकता है, लेकिन उसकी आड़ में जाकर लोगों को जलाने का काम किया जाये, लोगों को मारने का काम किया जाये तो मैं समझता हूं कि जो बात प्रभुनाथ सिंह जी कह रहे हैं और पेपर का हवाला देकर कह रहे हैं कि यदि सरकार वहां सपोर्ट कर रही है, उसके मंत्री यदि इस प्रकार की बात करते हैं तो मैं समझता हूं कि इससे ज्यादा दुखद घटना कुछ नहीं हो सकती है।…( व्यवधान)

SHRI ADHIR CHOWDHARY : The Government of India appreciated the efforts of the Assam Government in containing the violence. … (Interruptions) It was appreciated by the Government of India. … (Interruptions)

SHRI ABDUL HAMID : Why the Bihar people attacked the Awadh Assam Express at Jamalpur Railway Station? … (Interruptions) Why the innocent passengers were being harassed? … (Interruptions)

श्री राम विलास पासवान:ठीक है। इसलिए मैं आपसे आग्रह करूंगा, मैं जानता हूं कि इसके पीछे गरीबी है, इसके पीछे बेरोजगारी है, लेकिन बेरोजगारी या गरीबी के कारण क्षेत्रवाद को फैलावा मिले, भाषा के नाम पर इस देश में दंगा हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक बात कुछ नहीं हो सकती है। इसलिए इस घटना को, जो भी घटना हुई है, मैं समझता हूं कि इस पर चेयर की तरफ से निन्दा होनी चाहिए। मैं आज भी इस बात को मानकर चलता हूं, भले ही हमारे साथी भावावेश में कुछ भी कहते हों, लेकिन एक आम आदमी इस तरह का कोई काम नहीं कर सकता है। देश का आम नागरिक ऐसा नहीं कर सकता है। कोई भी बिहार का आदमी यदि मजदूरी का काम करता है तो इससे उस स्टेट की भी इकोनोमिक ग्रोथ होती है। जिस समय पंजाब में उग्रवाद फैला हुआ था और कोई आदमी वहां घर से बाहर नहीं निकलता था तो बिहार का मजदूर था, जो पंजाब के हर खेत में जाकर जान जोखिम में डालकर वहां काम करता था। यहीं दिल्ली में एक दो नहीं, ४० लाख से ज्यादा गरीब लोग हैं, बिहार के मजदूर हैं। यह एक अलग सवाल है कि बिहार में क्या हो रहा है, बिहार में इतनी गरीबी क्यों है, बिहार में रोजगार का इतना ह्रस क्यों हो रहा है। यह एक दूसरी डिबेट है। उसके लिए हम सैण्ट्रल गवर्नमेंट को दोषी मान सकते हैं, उसके लिए हम स्टेट गवर्नमेंट को दोषी मान सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई एक राज्य का आदमी कमाने के लिए, रोजगार के लिए दूसरे राज्य में जाये और उसके खिलाफ बर्बर कार्रवाई हो और कोई पोलटिकल पार्टी के नेता डायरैक्टली या इनडायरैक्टली उसे सपोर्ट करने का काम करें। मैं समझताहूं कि यह देश के लिए सबसे खतरनाक दिन होगा और सबसे काला दिवस होगा।

मैं इसमें ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। बिहार के लोग ही नहीं, बल्कि जहां-जहां इस तरह की बात चलती है, वहां दूसरे राज्य के लोग भी सशंकित हो जाते हैं। जब इस तरह का नारा लगता है कि यह राज्य इस राज्य के लोगों के लिए है, यह राज्य इन लोगों के लिए हैं तो यह खतरनाक है। भारत एक मां है और भारत एक बगीचे के समान है। इस बगीचे में हर तरह के फूल हैं और हर जगह के फूल खिलते हैं। जो बगीचे का माली होता है, उसका फर्ज होता है कि बगीचे के हर फूल को देखे, हर फूल को मुस्कुराने का मौका दे, हर कली को खिलने का भी मौका दे। इस तरह राजनेता के द्वारा अगर इस तरह की कार्रवाई की जायेगी तो मैं समझता हूं कि यह बहुत ही निन्दनीय चीज है। इसमें प्रधानमंत्री जी ने इनीशिएटिव लिया है, होम मनिस्टर ने इनीशिएटिव लिया है, लेकिन हम चाहते हैं कि इस सम्बन्ध में एक बैठक बुलानी चाहिए, क्योंकि नेशनल इंटीग्रेशन का मामला इससे जुड़ा हुआ है, राष्ट्र की संप्रभुता का मामला इससे जुड़ा हुआ है, यह राष्ट्र की एकता से जुड़ा हुआ है। जब हम राष्ट्र की एकता और अखंडता का नारा लगाते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि भारत के प्रधानमंत्री को हर राज्य के चीफ मनिस्टर को बुलाना चाहिए और जरूरत पड़े तो जिन-जिन राज्यों में इस तरह की घटना होती है, वहां तमाम दल के नेताओं को भी बुलाकर एक सामाजिक समभाव और सौहार्दपूर्ण वातावरण देश में कायम कैसे किया जाये, इसके ऊपर गम्भीर चिन्तन करना चाहिए।

मैं एक बार फिर अपने महाराष्ट्र के साथियों से आग्रह करूंगा और असम के हमारे जो साथी हैं, उनसे भी आग्रह करूंगा कि जो दोनों स्टेट्स में इस तरह की घटना घटी है। महाराष्ट्र में तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर अभी भी चल रहा है, इस आरोप-प्रत्यारोप के दौर में जो लोग सम्बन्धित हैं, जो वहां किसी भी राज्य के निवासी हैं। उनको और जो महाराष्ट्र के लोग बाहर रहते हैं, आसाम के लोग जो बाहर रहते हैं. यहां के लोग जो वहां रहते हैं, उन सबके मन में एक भय का, आतंक का वातावरण पैदा होता है। इसलिए भारत सरकार को इसके ऊपर पहल करनी चाहिए और एक नैशनल इंटीग्रेशन के मुद्दे को लेकर एक व्यापक बैठक बुलाकर ताकि भविष्य में फिर इस तरह की घटना न हो, उसके लिए रास्ता निकालना चाहिए।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।

SHRI MADHAB RAJBANGSHI (MANGALDOI): Mr. Chairman, Sir, we would like to know the name of the paper which was shown by Shri Prabhunath Singh and also see it.

श्री अरुण कुमार (जहानाबाद):उस पेपर का नाम पूवार्ंचल प्रहरी है जो ६ अक्टूबर, २००३ का है। …( व्यवधान)

श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज):वह ६ अक्टूबर, २००३ का स्टेटमैंट है।…( व्यवधान)

श्री माधव राजवंशी:आप इस कागज को सभा पटल पर रखिये। । …( व्यवधान) We would like to see what is the news. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN (SHRI P.H. PANDIAN): You can lay it on the Table. Let the Member see it.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I have asked him to lay it on the Table. You can see it.

… (Interruptions)

Dr. M.V.V.S. MURTHI (VISAKHAPATNAM): Mr. Chairman, Sir, it is a very unfortunate incident that took place in Assam very recently. It speaks about the level of unemployment in our country. … (Interruptions)

SHRIMATI MARGARET ALVA (CANARA): Sir, he has to sign it and then lay it.

MR. CHAIRMAN: You sign it and then lay it on the Table. It is a normal practice that if you want to cite a newspaper or any document, it should first be shown to the Chair. Only after its approval, it can be laid on the Table of the House. Without seeing that paper, I have allowed you. You should mark it with your endorsement saying that it is true. Normally, you must show it to the Chair. Then only, you can raise it. It is the rule in respect of any paper or any document.

Dr. M.V.V.S. MURTHI : Mr. Chairman, Sir, it is a very unfortunate event that took place.

श्री प्रभुनाथ सिंह : सभापति महोदय, हम इस कागज को जमा करते हैं। इन्होंने मान लिया है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री ऐसा करते हैं।…( व्यवधान)हम इस पर दस्तखत करके दे रहे हैं। …( व्यवधान)

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा:हम इसी गलत काम को पकड़ना चाहते हैं। …( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : हम इस पर दस्तखत करके दे रहे हैं। आप इसकी जांच कराइये।…( व्यवधान)कांग्रेस की देख-रेख में आसाम में ऐसी घटना घट रही है। …( व्यवधान)

Dr. M.V.V.S. MURTHI : Mr. Chairman, Sir, these incidents ought not to have taken place. … (Interruptions)

श्री प्रभुनाथ सिंह : बिहार में अपने अपनों को मारते हैं जबकि बिहार वाले आसाम वाले को मारते हैं। …( व्यवधान)कांग्रेस की सरकार जान ले रही है। …( व्यवधान)

श्री माधव राजवंशी:जमालपुर स्टेशन पर किसने किसो मारा था ? …( व्यवधान)

वह क्यों मारा था ? …( व्यवधान)

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, Sir, a Member from Andhra Pradesh wants to make his point. Let him be allowed to speak. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I have allowed him to speak. They have not allowed him.

Dr. M.V.V.S. MURTHI : They should hear me at least so that the House also hears me. I also wanted to make a point about Railway Recruitment Policy. The recent incidents that took place in Assam are very unfortunate and are condemnable. They should be condemned because they are against the national integration policy. However, inherently there must be some defects. Otherwise, such a situation would not have occurred in this way. This situation is very inflammable and it reflects on the country’s policy of recruitment and unemployment. The youth here are unemployed. What do they do? They have to get some money. They have no jobs, and on the other side they all are poverty stricken. The value of the life is only a few hundred rupees now. Anybody can remove a person for a few hundred rupees because of poverty.

There is also unemployment. Recruitment in the Railways was taking place for the C & D category jobs at Headquarters. At least, these jobs should have been given to the people, who were living around that area and for the locals, but that is not happening. If this had been the policy, then the incidents would not have occurred. Besides, the people are not being recruited at the divisional level for the C & D category jobs. The recruitment policy at the Divisional level should be implemented. If those jobs were earmarked on a regional basis in every Division, then those who are residing nearby would come and take up that job. Why should it be done only at the headquarters?

Instead of discussing on that issue, we are harping that this happened because Biharis have entered some place or Assamese have entered into some other place or that Andhraites have entered into Orissa, etc. In the previous year also that there was some hue and cry -- which occurred in Bhubaneshwar -- that some Andhraites were driven away from Orissa when they went there for C & D category jobs.

So, there should be a change in the policy of recruitment. We should discuse about those here, instead of showing emotional feelings, bringing regional feelings, bhumiputra slogans, and all such things. It is not correct. We should change the policy and regionalise it. Wherever they are living, whatever may be the religion, whatever may be language, if one is living around, then he should get a job there. If a Bihari or an Andhraite who lives in Assam is driven away, then where will he get a job? He is already living on that ground. So, the House should think about it and solve the problem.

All our policies should be made in such a manner that the lower jobs are given to the people living in those areas. If this happens then many of the problems would be solved. Let the hon. Minister think about it he is a very enlightened Minister and take some steps so that at least in the future, the C & D category jobs are regionalised, and that they can be filled only at the Divisional level.

Yesterday I was in Vizag and some young boys came there to see me. Their recruitment was in the C & D category jobs, that is, menial jobs. They are living in Vizag. How can they go to Hyderabad for interview ? Even if they go there, they do not know where to stay, how to live, and what to do for smaller jobs in the bigger cities.

A Divisional headquarters is there at Visakhapatnam, and such jobs could be taken up at the Divisional headquarters level. Instead of all of them being driven away to that Board at Headquarters, small Boards could be given at the regional levels at the Divisional headquarters, so that this problem could be solved. By doing so, in the future at least we could see that these things do not occur.

       

SHRIMATI MARGARET ALVA (CANARA): Mr. Chairman Sir, I have been sitting here and listening to the earlier debates, as well as the one that is taking place today. I noticed that it was becoming a kind of a dual between the Assamese and the Bihari MPs in the House, where tempers were running high. Therefore, I gave my name because I believed that some of us who did not belong either to Bihar, West Bengal, or Assam should also put forth our point of view.

The question is not just about one incident that happened in a train in Bihar and the repercussions in Assam. I was at that time in the Northeast when these incidents occurred. I was in Mizoram, and when I heard about it I was very worried as to whether it would spread or what would happen. It is because immediately after the train incident in Bihar -- when it was flashed -- there was reaction from the Assam youth as also from others. I do want to say that I am not ruling out, of course, some political involvement here and there. After all, political cadres being what they are, they could get involved, but basically, it was an immediate reaction. Even in Mizoram, they kept saying, "We do not want the outsiders here. They must go back. We do not want outsiders coming and changing our population profile". It has happened in many border areas. It has happened in Arunachal and in various other places where because of population coming in, the local people feel threatened and they have a problem.

However, I do want to say that in this whole battle, nobody really spoke about the victims of these incidents. In the train, young girls and innocent women, who were travelling, were molested, pulled out and attacked. They had nothing to do with anything. They were students coming to Delhi; they were students coming out of Assam. I am just saying that innocent people were attacked.

I ask the hon. Minister, "Where was your Railway Protection Force? Where were your people, when the train had stopped on the platform, when they were being molested and when things were happening?"

श्री प्रकाश परांजपे : आप मंत्री जी को इंफॉर्म करेंगी तब वह जांच करेंगे। अपने आप जांच नहीं करेंगे।…( व्यवधान)
SHRIMATI MARGARET ALVA: I am not talking of this one incident. All I am saying is that it can happen anywhere. एक्सीडेंट्स की बात आप छोड़ दीजिए। You must have the Railway Protection Force or the CRPF or whatever railway authority is there on every platform. You must have the protection force in sensitive areas or whatever it is, so that there is immediate action.
I know the problem. The local police say that when the crime takes place in a train, they have no jurisdiction. The person must be arrested by the Railway Police and handed over to them after which only they can file an FIR. There are technicalities within technicalities. Even in the case of a theft, if the fellow is caught pulling my chain in the train, the local police have no authority. It has to be through your railway process. My chain may go or my life may go, but there will be nobody from the railways. These are the technicalities which you have to sort out, if you want to really make rail travel safe for the innocent citizens of this country. We do not feel safe and I can tell you this very honestly. There is nothing being done to ensure safety. स्टेशन पर खड़े-खड़े बोगीज को आग लगा रहे हैं, nobody knows how the fire occurred in the New Delhi Railway Station here where bogies were burnt. How were they burnt?इधर भी आईएसआई के आ गए या बंगलादेश के आ गए ? The other day, I was surprised to hear people saying that these incidents in Assam happened because of ISI and Bangladeshis. Everything that happens in the country is a fight either instigated by the ISI or Bangladeshis. If you know that ISI is doing so much, then, as a Government, why are you not stopping it? Can the ISI hold the Railways, the people, the Government and everything to ransom? Everything that happens in the North-East is either attributed to ISI or Bangladeshis, and this must stop. I think, you have to look at the deeper malady in the North-East. I do want to say that it is not just a question of lawlessness. As was pointed out by Shri Murthi just now, joblessness, the fear of unemployment, is stalking the youth in the country.
Now, you have a Minister for the North-East. I have also served on the Special Task Force for the North-East for development. No industrialist wants to come and invest there because of law and order problem and the fear of underground insurgents. Outsiders do not want to come and the local people do not have the capacity to either have industry or other things because they have no outlets. The only thing that happens is smuggling trade across the Burma border and, on that side, on the Chinese border. Everywhere, it is smuggling on which people are living. Where are the jobs being created in the North-East?
I went to the market the other day. Every single electronic item you want is available in the Mizoram Bazaar with Chinese instructions, and I asked the people there as to who will read it. Everything, including Burmese goods, is available in the market and people are happy. They say, "Well, we are getting it in Mizoram at a cheaper rate than it is elsewhere in India."

Therefore, what is the problem at the moment? The Railway Minister must understand that Railways are the largest recruitment agency today in the public sector. You are the lifeline of the nation, but you have to understand the problem.

MR. CHAIRMAN : If the House agrees, we can go on with the discussion.

SHRIMATI MARGARET ALVA : Yes, Sir, that is what was agreed.

MR. CHAIRMAN: We will sit till the debate is over. Is it okay?

SOME HON. MEMBERS: Yes.

18.00 hrs. MR. CHAIRMAN : All right. With the approval of the House, the sitting of the House is extended till the discussion is concluded.

SHRIMATI MARGARET ALVA : Therefore, there is a need to look at the problem. I also read about that incident in the papers where five youths were thrown out of a train, out of whom four died and one survived. Somewhere else there is an attack on outsiders who have come and settled down. There are problems. I must say that unemployment is creating law and order situations everywhere. When the Railways are recruiting, जैसा अभी कहा कि कहीं से लेकर कहीं और डाल देते हैं, वे जाते नहीं हैं, उधर काम नहीं करते हैं। There has to be some way in the recruitment policy of absorbing the local people at the lower levels.

I was also in the Ministry of Personnel. मैंने रिक्रूटमेंट में बहुत कुछ देखा है। There was one zone for recruitment of certain posts which had Andaman & Nicobar and Bengal tied up together. All the people from the mainland used to go to Andaman & Nicobar Islands, find an address and appear for competitive exams. Though the examination is conducted in Andaman & Nicobar Islands, which was supposed to be the zone, nobody from those islands used to get jobs. The same thing happens in other parts of the country.

In my State we had the challenge of urban and rural recruitment. Our State Government decided that since the youth in the rural areas do not have the same facilities as the urban youth, special marks be added to rural candidates who studied purely in rural schools. However, the Supreme Court has struck it down. As a result of that all the vacancies now go to the urban youth. When it comes to women’s reservation they say, बाल कटे वालों को मिलेगी, एलीट को मिलेगी। आपकी जॉब्स ऐसे लोगों को जा रही हैं।Those who come from the better areas of the country are getting jobs and those who are left behind are permanently left behind. Therefore, you have to review your recruitment policy.

I am not saying that India is not integrated or that everybody is not an equal citizen. Local sensitivity is very important if you are to avoid this kind of anger which is growing. All of us have seen the problems. When you recruit, if you have zones and local divisions in the Railways and recruit for C and D posts, as all of us are saying, from the local people, keep 70 per cent of the vacancies for the locals and 30 per cent to others who compete. If the local people are backward, the area is backward, and if people from outside come and take away their jobs, there is going to be anger and there is going to be violence. In the rural areas, tribal areas, there are no jobs, there is no development and there is no money coming. That is why the youth there are taking to the gun. What has happened in the North-East? It is all because there are no jobs, there is no absorption, there is no hope for the youth that they are taking to guns. Some of these boys met me and told me when I asked them why they take that path, that the day they join the underground movement, they get a uniform, they get a badge, they get a gun and they get a pay packet. They questioned as to what was India doing for them. मैं जब यूथ अफेयर मनिस्टर थी, मुझसे यूथ ने पूछा, So, I am saying please review your recruitment policy. Let the zones which you have created have 70 per cent local recruitment and let 30 per cent go to outsiders. In the other zones, let the local people have 70 per cent and 30 per cent for outsiders. Satisfy both the sections, but give weightage to the local people who are living there, who are looking for jobs. Those youths are as much in need of jobs as those who come from outside. How can you say नहीं दूसरी भाषा में एक्जाम करो। परसों किसी ने कहा कि पूरा एक्जाम हिन्दी में करो। I was shocked to hear that. हिन्दी में क्यों करेंगे।We come from different areas. I am not against Hindi. I speak perfect Hindi. But why should you say that boys in Tamil Nadu, Kerala, Andhra Pradesh must all compete in Hindi? It is all one way.

श्री प्रभुनाथ सिंह : हिन्दी राष्ट्रभाषा है।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: मैं समझती हूं। आप साउथ में आकर कोई एक भाषा सीखें। तीन शब्द भी हमारी भाषा के सीख लें, तो हम आपकी भाषा सीखेंगे।This imposition of Hindi by the Northern States on the non-Hindi States is going to be the ruin of this country, I am telling you. This is what is going to ruin the integrity and unity of India. आप लोग देश का विकास नहीं कर सकते। विश्व बैंक की रिपोर्ट में आपके राज्य बीमारू राज्य कहे जाते हैं।…( व्यवधान) चले हैं हमें हिन्दी सिखाने।…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : बीमारू राज्य बनाने में आप सहयोगी हैं।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:आपने बिहार और उत्तर प्रदेश को ४० साल में क्या दिया? ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: हमारे साथ भाषा की बात मत करो। मैंने किसी स्टेट का नाम नहीं लिया है। We know what is good for us.… (Interruptions)

श्री प्रभुनाथ सिंह : बिहार को आपने बीमारु बनाया है…( व्यवधान)नुकसान यही किया गया है।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: आपके स्टेट का मैंने नाम ही नहीं लिया है। मैंने किसी भी स्टेट का नाम नहीं लिया है।

MR. CHAIRMAN : Madam, please address the Chair.

… (Interruptions)

SHRIMATI MARGARET ALVA : I have not taken the name of any State. I said: "Do not try to impose Hindi on any one of us. It will not be acceptable."… (Interruptions) आप जो भी करिये, भाषा और धर्म को इम्पोज करने की कोशिश लोग एक्सैप्ट नहीं करेंगे।

श्री प्रभुनाथ सिंह : हिंदी थोपना कहना, यह राष्ट्र-द्रोह का मामला बनता है। आप इतनी सीनियर मैम्बर हैं और हिंदी के खिलाफ बोल रही हैं। क्षेत्रवाद को आप बढ़ावा मत दीजिए।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: हमने बहुत कुछ देखा है। There is no way that you can force the people of the non-Hindi States to conduct every examination in Hindi. It may be after 50 years; it may be after 100 years, but today, it is not going to work. I am telling you that the more you try to impose it, the more is going to be the reaction against it.

कुंवर अखिलेश सिंह:हिंदी नहीं थोपी जाएगी तो अंग्रेजी भी नहीं थोपी जाएगी। अंग्रेजी विदेशी भाषा है और उसे हम कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम असमी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, मलयाली आदि सभी भारतीय भाषाओं को स्वीकार करेंगे, लेकिन अंग्रेजी को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे। अंग्रेजी गुलामी का प्रतीक है।

SHRIMATI MARGARET ALVA: Sir, I want to tell you that the Constitution speaks about ‘many national languages’… (Interruptions)

Sir, the Constitution treats all the 18 languages equally. All of us have been given equal status in the Constitution. I do not worry, those who want to speak in Hindi, may speak Hindi but do not say that the youth everywhere must compete in Hindi only. That is what will create differences between one part of the country and the other. Neither in the North-East nor in the South nor in any other parts of the country is this going to work.

Sir, leave alone the language issue. I must point out that there must be a special zone created for the North-East. The North-East has special problems. But very little of the Railways. For recruitment, as far as they are concerned, please have a special zone for them and give them a certain number of jobs. If they are not filled up by them, then throw them open to the others. But let them have a sense of security that they can also compete and get jobs for themselves and not be overrun from outside.

Sir, finally, I do want to say that the backward areas have remained backward. They have remained backward not because of anybody’s deliberate plans but because of circumstances which have given the benefits of investment, jobs and infrastructure to certain parts of the country and left out the others for various local reasons. This has to be corrected.

Sir, somebody said: "यह तो बगीचा है जिसमें सब तरह के फूलों के लिए जगह है। ". I understand it. It is a beautiful garden. But when a creeper which climbs on a tree becomes larger and heavier than the tree can support or feed, then the tree is going to dry up and the creeper is also going to die. Therefore, I say that if outsiders have also to be accommodated, then there must be enough to share. Until that happens, there will be these kinds of incidents and clashes where some will say: "We are being deprived because of the others."

Therefore, I am appealing to you Mr. Minister to please review your recruitment policies so that justice is done to the local people and that all-India picture -- as far as the Railways are concerned -- is kept in mind. Please see that for Group C and Group D posts, the local people are given preferences whether it is my State or your State or anybody else’s State. Only then we will be able to solve this problem With these words, I conclude.

श्री नखिल कुमार चौधरी (कटिहार) : सभापति महोदय, मैं नियम १९३ के तहत असम में घटी बिहारी भाइयों पर घटना के विषय में हो रही चर्चा के विषय में भाग लेने के लिए खड़ा हुआ है। मैं सबसे पहले असम के अन्दर बिहार के भाई और उनके परिवार के जो लोग हिंसा में मारे गए हैं, उनकी जो सम्पत्ति का नुकसान हुआ है और इस वजह से वहां से जो पलायन हो रहा है और उससे पहले बिहार में जो एक छोटी अशोभनीय घटना घटी है, उस पर हम अपना दुख व्यक्त करते हैं तथा उसकी निन्दा करते हैं। इसके साथ ही असम के जो भाई घोर कठिनाई में है, जिनके परिवार के सदस्य मारे गए हैं, जिनकी संख्या छ: दर्जनों तक पहुंच गई है, जिनकी सम्पत्ति का भी नुकसान हुआ है, उनके प्रति भी हम अपनी गहरी संवेदना प्रकट करते हैं।

महोदय, देश के हर राज्य में शांति स्थापित होनी चाहिए। देश की एका बनी रहनी चाहिए । देश मजबूती के साथ आगे बढ़े, देश के अन्दर वभिन्न प्रान्तों में रहने वाले लोगों को जीने का अधिकार मिले, रोजी-रोटी करने का अधिकार मिले और देश ताकतवर बनकर उभरे - .यही राय सभी माननीय सदस्यों द्वारा व्यक्त की गई है। जब यह विचार व्यक्त किया गया है, तो फिर यह घटना क्यों घटी और इसको इस दिशा में मोड़ने का काम क्यों किया गया। हमारे असम के भाई सदन में बैठे हुए और अन्य सदस्य भी सदन में उपस्थित हैं, मैं पूछना चाहता हूं कि आखिर यह घटना क्यों घटी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षायें केवल असम में ही नहीं हो रही थीं, मेरे निर्वाचन क्षेत्र कटिहार में रेलवे बोर्ड के एग्जाम हो रहे थे। कटिहार में किसी को छुआ नहीं गया, वहां असम और बंगाल के विद्यार्थी भी आए थे और उनके साथ बदसलूकी नहीं हुई। इस समस्या को बेरोजगारी से जोड़ा जा रहा है। यह घटना ९ नवम्बर को घटी और यह परीक्षा तीन तारीखों - ९ नवम्बर, १६ नवम्बर और २३ नवम्बर - में होनी निश्चित हुई। ९ तारीख की परीक्षा में शामिल होने के लिए केवल बिहार से ही लोग नहीं आए थे, पश्चिम बंगाल के लोग भी थे, उत्तरांचल के लोग भी थे, उत्तर प्रदेश के लोग भी थे, क्योंकि वहीं एक रूट है, जिसके माध्यम से वहां पहुंचा जा सकता है. जो छात्र वहां पहुंचे, वे निश्चित रूप से बेरोजगार थे। बुद्धि की परीक्षा थी और ८ तारीख को ही कटिहारवासियों को मालूम पड़ना शुरु हो गया था, यह खबर आनी शुरु हो गई थी कि जो लोग वहां गए हैं, उनको स्टेशन पर पीटा जा रहा है, उनको खदेड़ा जा रहा है और कहीं पर ठहरने नहीं दिया जा रहा है। उनके सामान को भी छीन लिया गया है और उनके साथ बदसलूकी हुई है। जो लड़कियां वहा परीक्षा देने के लिए गईं, उनके साथ भी अपमानजनक व्यवहार हुआ है। इस बारे में हमें राजनीति से ऊपर उठकर बात करनी होगी। मैंने इस घटना को अपनी आंखों से देखा है। मुझे दर्द है, जो लोग एक पक्ष की बात कहते हैं और देश की एकता व अखण्डता की बात कहते हैं। देश में क्षेत्रवाद और भाषावाद की बातें कहकर देश को एक नहीं रखा जा सकता है। इसलिए ठण्डे दिल से इस समस्या पर विचार करना होगा, तभी देश की एकता और अखण्डता को बचाया जा सकता है। मैं कह सकता हूं, अगर हम केन्द्र की सरकार को दोष देते हैं, तो मैं पूछना चाहता हूं कि असम में किसकी सरकार है। मैं बिहार सरकार को भी दोष देता हूं लेकिन जहां जो दोषी है जिन के हाथ में कमान है, जो शांति और व्यवस्था मुकम्मल दे सकते हैं जिन के हाथ में जनता ने वे अधिकार दिए हैं उनसे लोग मांग करेंगे। जो घटना वहां घटी और ९ तारीख को जो छात्र वहां गए तो उनके पहचान पत्र फाड़ दिए गए। उनके सामान छीन लिए गए, उनको मारा-पीटा गया, वहां से लोग लहुलूहान होकर लौटे और आप कहते हैं कि वहां की सरकार का हाथ नहीं है। वहां की पुलिस तमाशबीन बन कर खड़ी रही, लोग सहायता के लिए पुकारते रहे और वहां की पुलिस ने उन्हें दुतकारा, उनको वहां से हटाया और वे लोग छुप कर ट्रेन से वहां आए। जब वे कटिहार आए और लोगों ने उनकी दशा देखी जो पहले से सूचना आ रही थी, उसके आधार पर लोगों के मन के अन्दर एक वेदना थी, एक कसक थी, एक पीड़ा थी, एक आक्रोश था और वहां की सरकार के खिलाफ आक्रोश था, वहां की व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश था फिर भी कटिहार में कोई घटना नहीं घटी। घटना घटनी चाहिए थी। जमालपुर की घटना का उल्लेख हो रहा था लेकिन कटिहार में कोई घटना नहीं घटी लेकिन अलबत्ता जब १० तारीख को लोग वहां पहुंचे, हम लोग स्टेशन पर गए थे. मैं डीआरएम और वहां के एडीआरएम को धन्यवाद देना चाहता हूं। उन्होंने भी इस बारे में पहल की थी। हम आरपीएफ के पदाधिकारियों को धन्यवाद देना चाहते हैं। हम लोगों ने सम्मिलित प्रयास करके यह कोशिश की और छात्रों से पूछा कि आपकी क्या मांगें हैं, आपको क्या चाहिए। उनके साथ जो अपमानजनक घटना घटी, छात्रों के कपड़े छीन लिए गए थे, वे नंगे हो गए थे, उनके पास पैसा नहीं था, सामान छूट गया था। किसी के पास अगर पहचान पत्र था तो दूसरा सामान नहीं था। वह खाने के लिए तरस रहे थे, लोग आक्रोश में थे, उनकी मांग थी कि हमें न्याय मिलना चाहिए। वहां काफी बड़ी संख्या में लोग थे। जब ऐसी घटना घटती है तो जनता उनके साथ हो जाती है। जनता साथ थी। मैं वहां का जन प्रतनधि हूं। मेरा स्वभाव आक्रोश थोड़ा कम करना और शांति बनाए रखना है तथा फायर ब्रिगेड बन कर आग को काबू में करना है। मैंने कहा कि अगर आपकी ये मांगें हैं कि ९ तारीख की परीक्षा दोबारा होनी चाहिए तो वह परीक्षा होगी। अगर आपकी यह मांग है कि फिर से असम की तरफ परीक्षा देने नहीं जाएंगे, हम डरे हैं, भयभीत हैं, पुन: वहां जाएंगे तो हमें मार दिया जाएगा, फिर आपकी परीक्षा असम में नहीं होगी। अगर आपकी तीसरी मांग यह है कि आने वाली परीक्षा से वंचित रहे हो तो उस परीक्षा को भी दिलवाने का काम हम करेंगे लेकिन मैं इस बारे में रेल मंत्री श्री नीतीश कुमार जी से बात करके इस मांग को पूरा करूंगा, मैं यह आश्वासन देना चाहता हूं और अगर ये बातें पूरी नहीं हुईं तो मैं राजनीति से सन्यास ले लूंगा। इस पर लोग शान्त हो गए और जो गाड़ियां सुबह से रुकी थी, वे तीन बजे से चलनी शुरु हो गईं। असम की तरफ जाने वाली अवध-असम एक्सप्रेस ट्रेन और महानन्दा ट्रेन जो दिल्ली की तरफ जाने वाली थी, वह तीन बजे खुल गईं। मुझे दुख है कि ११ तारीख से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपना कमाल शुरु कर दिया।

लालू जी बिहार के माननीय नेता हैं। मैं उनकी इज्जत करता हूं। बयान आने शुरु हो गए कि कटिहार का सांसद गलत कामों पर उतर आया, उसने लोगों को भड़काने का काम किया, वहांं आतंकवाद फैलाने का काम किया। मैं सोचने लगा कि अगर मैं असम जाऊं तो मेरा क्या होगा? एक भ्रांति पैदा करने की कोशिश की गई। यही स्थिति पप्पू यादव के साथ हुई। अभी वह यहां नहीं हैं। मुझे मालूम है कि उस दिन पप्पू यादव कटिहार आए थे। वह किसी काम से वहां आए थे। मुझे जब पता लगा कि वह अस्पताल गए हैं, वहां जो गोली चली उसमें कई लोग घायल हुए हैं, अलबत्ता रेलवे की प्रॉपर्टी को नुकसान हुआ, मैंने भी स्थिति का जायजा लिया। नॉर्थ ईस्ट के हमारे भाइयों को और असम के किसी भाई को कटिहार में छूने का काम नहीं किया गया और उनके साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई लेकिन जो घटना जमालपुर में हुई है उस घटना का कोई भी संवेदनशील नागरिक जो परिवार में बसता है जिसे अपनी मां-बहन से प्यार है, जिसे इन्सानियत से प्यार है, उस घटना की घोर निन्दा करता है। मैं भी उसके साथ शरीक हूं और आपके उस दुख में भी शरीक हूं लेकिन उसके बाद की घटना ह्ृदय को दहला देने वाली घटना है। जब कटिहार में घटना नहीं घट सकती तो असम में गुवाहाटी ,दिसपुर, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया में घटना घटने का क्या औचित्य है? अगर ये बेरोजगारी से जुड़े हुये प्रश्न थे तो यहां से डा.सी.पी.ठाकुर, नार्थ ईस्ट विकास मंत्री, श्री चिन्मयानन्द, गृह राज्य मंत्री और कई दूसरे मंत्री वहां गये थे। जो रिपोर्ट उन्होने दी है. रेल मंत्री जी उसका खुलासा करेंगे। लेकिन घटनायें होती रहीं। मैं असम के मुख्यमंत्री श्री तरुण गोगई से पूछना चाहता हूं कि वे उस समय क्या कर रहे थे। वे गुवाहाटी और दिसपुर में ९ दिन बैठे रहे लेकिन तिनसुकिया,डिब्रूगढ़ जाने की हिम्मत नहीं दिखा सके। हमारे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद जी गये। जो सवाल उठा रहे हैं, वे हल करने वाले हैं, इसलिये वे वहां गये।Sir, this is my maiden speech. वैसे तो बोलता खूब हूं लेकिन यहां बोलने का अवसर ही नहीं मिलता। मुझे १० मिनट का और समय दिया जाये।

MR. CHAIRMAN : This is your maiden speech for this Session. Is it not? You had been a Minister here. And you are still maiden! SHRI NIKHIL KUMAR CHOUDHARY : Yes, Sir. I know that. But with your permission, I would like to speak for ten more minutes. तो मैं आपसे कह रहा था कि श्री लालू प्रसाद वहां गये तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया में कहा गया कि जो घटनायें घटी हैं या घटनायें रही हैं, अगर असम के मुख्य मंत्री श्री गोगई कहते कि मैं क्षमा चाहता हूं कि जो दुखद घटना घटी है तो लोग कुछ नहीं कहते। मैं बिहार की जनता को धन्यवाद देना चाहता हूं कि एक तरफ उलफा द्वारा बिहारियो का कत्लेआम किया जा रहा तो दूसरी तरफ बिहारियों ने कोई प्रतक्रिया नहीं की। यह बिहार के बड़प्पन का द्योतक है, सौ ठोकर खाकर भी बिहार महादेव है, वह गरल पीना जानता है। बिहार ने विश्व को शान्ति का पाठ पढ़ाया। बिहार में ही भगवान बुद्ध, महावीर हुये हैं। सिक्ख हुये और जो यहां आये इस पवित्र भूमि में रम गये जिन्होंने ज्ञान देने का काम किया। विक्रमशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय हुये जिन्होंने न केवल हिन्दुस्तान अपितु विश्व के अन्य देशो में ज्ञान की आवाज पहुंचाई। यह ज्ञान जापान और चीन जैसे देशों को गया। लेकिन आज बिहार को कलंकित किया जा रहा है. बदनाम किया जा रहा है।

सभापति महोदय, मैं डा. रघुवंश प्रसाद सिंह से कहना चाहूंगा और वे मानेंगे कि मुझे यह कहते हुये दुख हो रहा है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया में कहा गया कि नखिल को पोटा में गिरफ्तार किया जाये। मैने ऐसा क्या कर दिया, मेरा क्या दोष है? किस प्रकार बिना तथ्यों के आधार पर यह बयान दिया गया। इस बयान ने तो वातावरण खराब करने का काम किया। मैं समझता हूं कि जब लालू जी डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी में एक सभा को संबोधित कर रहे थे, उस समय असम दौरे पर एक बिहारी संवाददाता भी गये थे। बेलतला पांचकूची में रहने वाले मनु लाल, दुकानदार जिसके घर पर १८ नवम्बर को हमला किया गया, टाइम्स ऑफ इंडिया प्रेस वाले के सामने असम के मंत्री श्री हेमन्त शर्मा ने मनु को हड़काया कि तुम प्रेस में शिकायत कर रहे हो? अगले दिन खबर छपेगी तो क्या तुम बच पाओगे? जिस सरकार का मंत्री पीड़ित बिहारी को सांत्वना देने के बजाय आतंकित करता हो, जिस सरकार का मंत्री इस तरह की बातें करता हो, वहीं लालू जी उस सरकार की प्रशंसा कर रहे थे, क्लीन चिट दे रहे थे कि तरुण गगोई सरकार ने कुछ नहीं किया। ६० लोग मारे गए लेकिन फिर भी तरुण गगोई सरकार ने कुछ नहीं किया इस घटना से मन में बड़ी ठेस पहुंची है और मैं कहना चाहता हूँ कि वहां जब पत्रकारों ने गोहाटी में उनसे पूछा कि लालू जी, आप गोहाटी आए, डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया कब जा रहे हैं? तो उन्होंने कहा कि डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया डिसटब्र्ड एरिया है, अभी नहीं जा रहे हैं। इस बात से दुख होता है। कैसे उन्होंने क्लीन चिट दे दी तरुण गगोई सरकार को? जबकि वे डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया नहीं जा सकते हैं जहां पांच दर्जन से अधिक लोग मारे गए, वहां नहीं जा सकते हैं और कहते हैं कि तरुण गगोई की सरकार ने बिहारियों का सम्मान किया है …( व्यवधान)सभापति जी, पांच मिनट दें, मैं समाप्त कर रहा हूँ।

MR. CHAIRMAN : There are fifteen more hon. Members to speak.

...( व्यवधान)

श्री नखिल कुमार चौधरी: मैं असम की सरकार से प्रश्न करना चाहता हूं और यह प्रश्न होना चाहिए कि अगर असम पुलिस का इरादा बिहारियों की जान-माल की रक्षा का था तो जिन मजदूर बस्तियों में लोगों को सामूहिक रूप से मारा गया, मैं एक गांव का उल्लेख कर रहा हूँ। बोंगई गांव में जहां मज़दूरों की २००० की बस्ती है, वहां १९ लोग मारे गए थे। केन्द्रीय सुरक्षा बल वहां तैनात नहीं किया गया था जबकि वहां तैनात किया जाना चाहिए था।

१८.२७ hrs. (Shri Basu Deb Acharia in the Chair) वहां होम गार्ड के पांच जवान थे और असम पुलिस का एक ए.एस.आई. भी तैनात था। जो होम गार्ड थे, उनके पास राइफल थी और ए.एस.आई. के पास कारबाइन थी। एक मोटरसाइकिल पर तीन लोग आते हैं और दनादन गोलियां चलाकर १९ लोगों को मौत के घाट उतार दिय जाता है। क्या वहां ये लोग बचाव का काम नहीं कर सकते थे? ये लोग भाग खड़े हुए। मैं कहना चाहता हूँ कि अगर इनका इरादा बचाने का था तो डिब्रूगढ़ के धुलिया गांव में जब दंगाइयों द्वारा मज़दूरों की झोंपड़ियां जलाई जा रही थीं तो वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने वहां पहले से मौजूद सीआरपीएफ को इन दंगाइयों से निपटने का निर्देश क्यों नहीं दिया जबकि सीआरपीएफ का कैम्प वहां है? जब बिहारियों के साथ वहां घटनाएं घट रही थीं तो उस समय असम में कितनी फोर्स थी? अगर तरुण गगोई जी कहते तो बात समझ में आती कि सुरक्षा बलों की कमी थी। चार प्रदेशों में चुनाव हो रहे थे, लेकिन जो सुरक्षा बल असम में मौजूद थे, उसका मैं ज़िक्र करना चाहता हूँ। उस वक्त असम में १२५ कंपनी सीआऱएफ थी, एक बटालियन असम राइफल थी, २३ बटालियन आर्मी वहां मौजूद थी। अगर जरूरत के मुताबिक उनका रीडिप्लॉयमैंट किया जाता तो यह घटना नहीं घटती और उनको बचाया जा सकता था और बिहारियों की जान-माल की रक्षा की जा सकती थी।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : नखिल जी, आप समाप्त कीजिए।

श्री माधव राजवंशी: ये गलत बोल रहे हैं। वहां इतनी फोर्सेज़ नहीं थीं। …( व्यवधान)

SHRI NIKHIL KUMAR CHOUDHARY : The hon. Minister in his reply will say as to what was the strength of the CRPF. … (Interruptions)

सभापति महोदय : नखिल जी, आप समाप्त कीजिए। एक मिनट में समाप्त कीजिए। आप बहुत बोल चुके हैं।

...( व्यवधान)

श्री नखिल कुमार चौधरी: मैं थोड़ा असम से हटकर बातें करना चाहता हूँ। क्या यह सच नहीं है कि बिहार के मुख्य मंत्री ने कहा कि हमारे बिहार के भाई असम में बोरा ढोने के लिए जाते हैं? मैं जानता हूँ बिहार के लोग मेहनती हैं, जीवट के लोग हैं, काम करना चाहते हैं, अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते हैं, हाथ पसारकर किसी से भीख नहीं मांगते। असम और बिहार का संबंध अच्छा रहा है।

श्री माधव राजवंशी: भी अच्छा हो गया है, पीसफुल हो गया है।

श्री नखिल कुमार चौधरी: और अच्छा कीजिए लेकिन जो लोग मारे गए हैं, उनके लिए सरकार ने वहां कुछ नहीं किया है। मैं कहना चाहता हूँ कि अभी भी बड़े पैमाने पर वहां से पलायन हो रहा है।

महोदय, लोग वहां से भाग रहे हैं। जिन्होंने असम के चाय बागानों के विकास में अपना योगदान दिया है, जिन्होंने वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम किया है, ऐसे लोगों को वहां से हटाना तर्कसंगत नहीं है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिए। आपकी बात हो गई। आप एक मिनट में समाप्त कीजिए।

श्री नखिल कुमार चौधरी: सभापति जी, मैं समाप्त कर रहा हूं। यह केवल असम की घटना नहीं है बल्कि असम के बाहर भी इस प्रकार की घटनाएं घट रही हैं। असम के अंदर कांग्रेस की सरकार है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की सरकार है। मैं कर्नाटक की एक घटना का उल्लेख करना चाहता हूं। बिहार के लोग जहां मजदूरी करने गए, वह चाहे कोई भी क्षेत्र हो, उस क्षेत्र ने उन्नति ही की है। चाहे फिर वे सूरत की मिल हों, अहमदाबाद और दिल्ली के कल-कारखाने हों या पंजाब की खेती हो, उन्हें सुधारने, उन्हें उन्नत करने और उन्हें चमकाने का काम बिहार के मजदूर भाइयों ने किया है। कर्नाटक राज्य में, …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप कृपया बैठिए।

श्री नखिल कुमार चौधरी: महोदय, कर्नाटक में एक जगह तूंकूर है। वहां कल्पतरू इंस्टीटयूट आफ टैक्नॉलोजी नाम का एक संस्थान है जिसमें बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के छात्र पढ़ते हैं। वहां एक बायज हास्टेल भी है। उसमें बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के छात्र भी रहते हैं। ४ दिसम्बर को वहां एक घटना घटी और एक हमला हुआ और यह कहा गया कि बिहारी छात्रो यहां से भागो। उस घटना में २७ छात्र घायल हुए। उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिए।

श्री नखिल कुमार चौधरी: महोदय, यह जो घटना घटी है, इसके पीछे कोई सुनिश्चित कारण है और इस प्रकार से बिहार को अपमानित करने और बिहार के लोगों को प्रताड़ित करने का जो काम किया जा रहा है, यह ठीक नहीं है। मैं चाहता हूं कि देश की एकता और अखंडता बनी रहे।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):सभापति महोदय, ये जो घटनाएं हो रही हैं, यहां लोग बोल-बोल कर जा रहे हैं, क्या यहां इस प्रकार की बातें कहने से इन घटनाओं में कोई कमी आएगी या बढ़ोत्तरी होगी, इस पर हमें ध्यान देना चाहिए। हमें क्या बोलना है और क्या नहीं, इसे सोचना चाहिए, इन घटनाओं में कमी आए, देश में शांति रहे, ऐसी बात हमें कहनी चाहिए और इस समस्या का कोई उचित समाधान ढूंढ़ना चाहिए।

सभापति महोदय, यह जो बहस चल रही है, यह इससे पहले शुक्रवार को प्रारम्भ हुई थी और उसके बाद बीच में १० दिन गुजर गए और आज ११वें दिन फिर यह बहस आगे बढ़ी है। बीच में यह बहस कहां चली गई, क्यों रोक ली गई और ऐसा क्यों किया गया, क्या नियमों के अनुसार ऐसा किया जा सकता है, मैं यह पता लगाने का प्रयास कर रहा हूं। …( व्यवधान)

श्री शिवाजी माने (हिंगोली):सभापति जी, यहां इतनी महत्वपूर्ण बहस चल रही है। कम से कम कैबीनेट मंत्री को यहां उपस्थित रहना चाहिए।

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया) : सभापति महोदय, माननीय गृह राज्य मंत्री श्री चिन्मयानन्द स्वामी जी सदन में उपस्थित हैं। कैबीनेट मंत्री महोदय, काफी देर तक यहां बैठे रहे। वे अभी हाल ही गए हैं। …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : मंत्री महोदया, अपने सारे साथियों से मंत्रियों का परिचय करा दीजिए।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति महोदय, रेल भर्ती और उससे उत्पन्न स्थिति पर जो बहस चल रही है कि नौ नवम्बर को लड़के परीक्षा देने गए और उनके साथ उपद्रव हुआ। मीडिया में छपने से बिहार में भी, आम जनता को उससे क्या मतलब था, जो कुछ पाकेटमार लोग स्टेशन पर रहते हैं तथा अन्य जो इस तरह के लोग वहां रहते हैं उन्होंने जहां-तहां उपद्रव किया।

महोदय, असम में जो नौ नवम्बर को घटना घटी, वह काफी निन्दनीय और नाजायज है। बिहार में जो कुछ सूचनाएं आ रही हैं, वे उससे भी ज्यादा नाजायज हैं, उसकी भी भारी निन्दा होनी चाहिए। उसके बाद फिर असम में जो हुआ, उसकी भी भारी निन्दा होनी चाहिए। वहां उससे भी खराब हो गया, लेकिन लोग असलियत को नहीं बोलते। वहां जो रेल भर्ती के लिए हुआ, उसमें सरकार को वहां तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए थी। वहां किसी ने परीक्षा नहीं देने दी। अभी भी लोग उन सब को मान रहे हैं, लोग बोल रहे हैं - लोकल-लोकल। बिहार में जो घटना घटी, वहां की राज्य सरकार ने हिदायत दी कि कलेक्टर, एसपी जिम्मेदार होंगे, अगर कहीं भी इस तरह की घटना घटेगी। उसके बाद भी जमालपुर में घटना घटी। वहां के कलेक्टर, एसपी को उसी दिन वहां से हटा दिया और २४ गिरफ्तारियां हुईं। अभी तक इस बारे में कोई नहीं बोला, इसलिए हमें बोलना पड़ रहा है। यह ठीक बात है कि उन्हें पहले से एप्रीहैंड कर लेना चाहिए था। वहां जो घटना घटी, उसकी अखबारों में बातें आईं। उन्हें पहले से सजग होना चाहिए था लेकिन वे सजग नहीं थे। जब घटना घटी तो तुरंत सख्त कार्यवाही हुई कि कलेक्टर, एसपी को हटाना चाहिए और कहा कि इन्हें सस्पैंड करें और कार्यवाही हुई तथा २४ गिरफ्तारियां हुईं। वहां सख्ती से खोज जारी है। वहां की सरकार ने कहा कि सीबीआई जांच करे तो कोई हर्ज नहीं है। असम में ऐसा नहीं है, जिसे लोग बिहारी बोलते हैं, उल्फा वाले ऑल इंडियन बोलते हैं और ये बोलते हैं कि बाहर वाले हैं। अखबार में ये बातें छपती हैं। उसे रोकने का काम किस का है। जो बैंड आर्गनाइजेशन है, उसका बयान प्रधानमंत्री जी के बयान से ज्यादा महत्वपूर्ण ढंग से छपता है, मीडिया और टीवी में भी प्रसारित होता है। वहां भी सरकार को एप्रीहैंड करना चाहिए था। उसकी प्रतक्रिया क्या होगी। उल्फा वाले लोग पहले से एक्सप्लायट करते हैं और मार-काट किए हुए हैं, लेकिन इस घटना के बाद उन्हें कुछ हवा एवं मौका मिल गया। जैसे हमारा कोई ऐसा भाई हो, उसे कोई मारने के लिए और अपमानित करने के लिए जाए तो कुछ समय के लिए हमारी उससे सिंपैथी हो जाएगी। उसी तरह उल्फा को वहां की जनता ने पसंद नहीं किया। वह आइसोलेशन में था, लेकिन इस मौके को पाकर उसे मौका मिल गया और उसने जरूर बड़े पैमाने पर मार-काट एवं जलाने का काम किया। डिब्रूगढ़, तिनसुकिया और अन्य कई जगह किया। गोहाटी में भी हुआ।

महोदय, बीजेपी वाले राज्य सरकार की आलोचना करते हैं कि यह नालायक सरकार है। नखिल चौधरी जी बिहार सरकार पर बिगड़ रहे हैं, उनकी लालू जी से नाराजगी है। उन्होंने कहा कि वे गोहाटी गए तो डिब्रूगढ़ क्यों नहीं गए।…( व्यवधान)आपको बोलने की जरूरत नहीं है, मैं बोल रहा हूं।…( व्यवधान)

गृहमंत्रालय में स्टेट मनिस्टर स्वामी चिन्मयानन्द जी ने साहस दिखाया अथवा अपने कर्तव्य का निर्वहन किया, लेकिन ये भी देर से गये, लेकिन क्या नेशनल इंटीग्रेशन का प्रधानमंत्री जी का दायित्व नहीं है? गृहमंत्री जो उपप्रधानमंत्री के रूप में अपनी पोस्ट बढ़वा रहे हैं और देश की अन्दरूनी व्यवस्था चौपट है, इससे उल्फा को मतलब है, उप प्रधानमंत्री जी को मतलब नहीं है? लेकिन उस समय वे चुनाव में लगे हुए थे, इससे मुझसे मत कहलवाइये।…( व्यवधान) आप किसलिए बोल रहे हैं, वहां तो सुरक्षा बल नहीं हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : नखिल जी, जब आप बोल रहे थे तो रघुवंश प्रसाद जी एक बार भी खड़े नहीं हुए तो आप क्यों खड़े हो जाते हैं। आप तो बोल चुके हैं, अभी आप सुनिये। रघुवंश जी बोलिये, चेयर को एड्रैस करिये।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : आप कहते हैं तो हम अभी बोल देंगे, लेकिन हम ठीक बात करना चाहते हैं। इसमें केन्द्र सरकार का क्या दायित्व है? जो भी घटनाएं हुई हैं, लोग इनको बेकारी से जोड़ रहे हैं। बेकारी, बेरोजगारी देश की समस्या है।…( व्यवधान) जब मुख्यमंत्री के हसबैंड ही चले गये तो मुख्यमंत्री क्या करतीं।…( व्यवधान) प्रधानमंत्री जी नहीं गये तो प्रधानमंत्री जी से तो मुख्यमंत्री नीचे हैं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : रघुवंश प्रसाद जी, इधर देखकर बोलिये।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, बेरोजगारी की समस्या बोल बताएंगे, यह ठीक बात है कि थर्ड ग्रेड और फोर्थ ग्रेड की खलासी की नौकरी पर इंजीनियर और एम.ए. पास लाखों लोगों की एप्लीकेशन मिली हैं, यह सभी की चिन्ता है और बेरोजगारी बहुत दुखद है। बिहार में खाली बेरोजगार बेरोजगारी के लिए बदनाम करते हैं, असम को बदनाम करते हैं कि असम में नौकरी की कमी हो गई, लेकिन महाराष्ट्र तो बहुत विकसित स्टेट है, वहां कौन सी नौकरी की कमी थी, जो वहां से भी खदेड़ दिया, वहां से भी भगा दिया, परीक्षा नहीं देने दी, बदमाशी की। इसलिए यह बात ठीक है कि बेरोजगारी की समस्या को हल किया जाना चाहिए, लेकिन यह ये सब जो घटनाएं घट रही हैं, सब कर्नाटक तक का जिक्र कर रहे हैं या आन्ध्रा प्रदेश का जिक्र कर रहे हैं या और भी जहां-तहां का जिक्र हुआ है। नेशनल इंटीग्रेशन कौंसिल किसलिए है, उसकी बैठक कब होगी, क्या इन सब घटनाओं से अलगाववादी तत्वों को मदद नहीं मिल रही है? इसके लिए मैं मांग करता हूं कि नेशनल इंटीग्रेशन कौंसिल की बैठक बुलायी जानी चाहिए। यदि प्रधानमंत्री जी बैठक नहीं बुलाते हैं तो हम मानेंगे कि वे भी इसे हवा देते हैं। देश की एकता को बचाने में केन्द्र सरकार अक्षम है, देश की एकता को बचाने की सबसे भारी जवाबदेही केन्द्र सरकार की है। सही में अब तक केन्द्र सरकार को क्या सूचना मिली है, कितने लोग मारे गये हैं?अखबारों में ८०-८५, ५०-६० सब वैरी कर रहे हैं तो असलियत में इन्होंने स्टेट गवर्नमेंट से नाम मंगाये होंगे, नहीं मंगाये हैं या क्या है, कितने लोग मारे गये, कितनी सम्पत्ति बर्बाद हुई, कितने जलाये गये, कितने वहां से भागे और भाग रहे हैं। अभी वहां क्या स्थिति है, लोग अभी भी दहशत में हैं, वहां आतंकवाद हो रहा है, अभी भी ट्रेन की ट्रेन में वहां से लोग बाग रहे हैं। जो मारे गये, उनके लिए केन्द्र सरकार ने क्या किया और जो जलाये गये, जिनकी सम्पत्ति बर्बाद हुई, उनके पुनर्वास के लिए, उनकी क्षतिपूर्ति के लिए कौन सी योजना है, उसके पैकेज के लिए क्या इन्तजाम इन्होंने किया? आगे इस तरह की घटना न घटे, इसके लिए कौन सी सावधानी बरती गई, इस सब मामले में हम यह केन्द्र सरकार से जानना चाहते हैं?

बेरोजगारी तो अलग विषय है, लेकिन बेरोजगारी को जानना चाहिए, लेकिन यह सब घटना रेल भर्ती नियमावली से घटी। रेलवे में पहले बहाली होती थी तो इस तरह का उपद्रव कभी नहीं हुआ, लेकिन अभी की बहाली में रेल भर्ती के नाम पर उपद्रव हो गया। इसमें रेल मंत्री बताएंगे कि पहले क्या था और अब क्या था और इसके लिए क्या करेंगे। इससे क्या कुछ असर होने वाला है, क्या नीति में कुछ बदल करेंगे, वे बताएंगे। हम इसमें अब सरकारों के बाद भारत सरकार के एक मंत्री ने अखबार में जो बयान दिया, वे अभी तक बर्खास्त क्यों नहीं हुए हैं। यदि प्रधानमंत्री जी देश को बचाना चाहते हैं, उनके कैबिनेट का मंत्री ऐसा बोला कि बिहारी पुलिस को यहां से भगाओ, यहां आग लगाओ। यह सब बयान जो अखबारों में आया है, उसका खंडन भी अभी तक किसी ने नहीं किया है।

मैं पूछना चाहता हूं कि वह मंत्री अभी तक बर्खास्त क्यों नहीं हुआ?देश की एकता-अखंडता तथा संविधान की रक्षा की ये लोग शपथ लेते हैं कि मैं न्याय करूंगा, मैं राज द्वेष से काम नहीं करूंगा। यह केवल मंत्र पढ़ते हैं या उसको समझते भी हैं। वे ऐसा बोलते हैं और अभी तक उस पद पर बरकरार हैं। उसी तरह से असम का कोई मंत्री ऐसा बोला है तो वहां के चीफ मनिस्टर और उनके पार्टी के लीडर को सोचना चाहिए। यदि कोई ऐसा बयान देगा तो वह मंत्रिमंडल में कैसे बकरार है ? संविधान के खिलाफ कैसे कोई बोल रहा है। यह तो उल्फा से कम नहीं हुआ जो यह बात बोल रहा है। उल्फा वालों का बयान आ रहा है, जो बंगलादेश में रहते हैं, भूटान के जंगल में रहते हैं। उनको मीडिया से प्रसारित किया जाता है। उस पर केन्द्र सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है ? उनका कोई बयान नहीं गया। ऐसा क्यों है ? क्या यह उनकी जवाबदेही नहीं बनती?

मैं पूछना चाहता हूं कि स्ट्रांग सैंटर की कल्पना क्यों की गयी ?यदि किसी राज्य में इस तरह का भेदभाव होगा तो उस पर कार्रवाई करने के लिए काम कौन करेगा ? मान लीजिए राज्य सरकार विफल हो या राज्य सरकार की नीयत ठीक न हो तो केन्द्र सरकार किसलिए है। संविधान और देश की एकता-अखंडता को बचाने के लिए कौन काम करेगा?

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा जी मंत्री रही हैं लेकिन वे भाषा पर कैसा जहर उगाल रही थीं ? हमारे पुरखों ने यूनिटी डायवर्सिटी, वभिन्नता में एकता आदि के बारे में तय किया। इस देश में वभिन्न वेशभूषा वाले, वभिन्न जातियों के वभिन्न धर्मों के मानने वाले लोग हैं। मैं कहना चाहता हूं कि देश के लिए साम्प्रदायवाद खतरा है। वह देश तोड़क है। इससे हमारा देश जूझ रहा है। हमें काफी नुकसान भी हुआ है। साम्प्रदायवाद के चलते देश बंटा, महात्मा गांधी की हत्या हुई आदि उपद्रव बराबर होते रहते हैं। इसमें बड़े निर्दोष लोग मारे जाते हैं। यह देश का नम्बर वन दुश्मन है।

हमें लगता है कि देश के दुश्मन नम्बर वन पर क्षेत्रवाद है। अब वह एक नम्बर पर होगा या दो पर होगा, इसके बारे में हमें पता नहीं। उग्रवाद, अवसरवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, स्वार्थवाद आदि ये सब देश के दुश्मन हैं। साम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, अवसरवाद, उग्रवाद आदि से कहीं कोई समझौता नहीं हो सकता। लेकिन केन्द्र सरकार के होने के बाद भी ये साम्प्रदायवादी तत्व फुफकार रहे हैं। ये देश तोड़क शक्तियां फुफ़कार रही हैं। यह क्षेत्रवाद फुफ़कार रहा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। स्थानीय तौर पर कहीं-कहीं ऐथेनिक लड़ाई हुई है। असम में करबी और कुकी में मार-काट हो रही है। वहां बोडो लोग आदिवासियों को छोड़ते नहीं हैं। ये सब छिटपुट घटनाएं घट रही हैं लेकिन केन्द्र सरकार की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है ? क्या बात है कि उनके राज्य में साम्प्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, उग्रवाद आदि सब बढ़ रहा है ? मेरा कहना है कि जब दो बीमारियां एक साथ बढ़ जायें यानी यहां क्षेत्रवाद और उग्रवाद दोनों एकजुट हो गयीं हैं। क्षेत्रवाद के चलते असम बिहार का झगड़ा हुआ तो उसमें उग्रवाद शामिल हो गया। जब शरीर में भी दो-तीन बीमारियां हो जायें तो शरीर में काम्प्लीकेशन हो जाता है। इसी तरह जब ऐसी दो-तीन बीमारियां शुरू हो जायें तो वह बहुत भारी बीमारी हो जाती है। इसमें केन्द्र सरकार की सबसे अधिक जिम्मेदारी है। उसके बाद राज्य सरकार भी है, पोलटिकल पार्टियां भी हैं, बुद्धिजीवी तथा देश में और समझदार लोग भी हैं। इसके बारे में आम जनता को समझना चाहिए। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं खत्म ही कर रहा हूं। अब यह कहा जा रहा है कि बिहार में बेरोजगारी है। मेरा कहना है कि कमोबेश बेरोजगारी सारे देश में है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बेरोजगारी के बारे में बोल चुके हैं।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हमने अभी भेद नहीं खोला है। सन् १८२४ में तीन जहाज मॉरीशियस से आये। एक मुम्बई में खुला, दूसरा चेन्नई में खुला और तीसरा कलकत्ता में खुला। दो जहाज भरे नहीं। उसमें बहुत थोड़े से लोग गये लेकिन कलकत्ता वाला जहाज सब भर गया। उसमें बिहार के लोग भर गये। वे गरीब आदमी थे। वे मॉरीशियस गये, फिजी गये, गुयाना गये, सूर्यनाम गये। हमारे यहां डेंसिटी ऑफ पापुलेशन में केरल नम्बर वन पर था ।नम्बर दो पर बंगाल था, नम्बर तीन पर बिहार था। लेकिन झारखंड के बंटवारे के बाद नम्बर दो पर बिहार डैनसिटी ऑफ पौपुलेशन सबसे अधिक हो गया है। उस समय लोग दुनियाभर में मजदूरी करने गए। उस समय हवाई जहाज नहीं था, पनिया जहाज था। लोग मुम्बई से पनिया जहाज से जाने लगे तो उनके वहां कारखाने विकसित हुए। कलकत्ता से भी लोग जाने लगे। हमारे यहां के मजदूरी करने वाले लोग इंडस्ट्री समझ कर वहां गए। अभी भी दुनिया में लोग जा रहे हैं। अब डब्ल्यूटीओ में हम कहते हैं कि दुनिया के लोग जाएं, सिर्फ सामान इधर से उधर हो रहा है। पासपोर्ट प्रथा खत्म हो, लोग जाएं तो देखें बिहार की क्या हालत हो जाती है।

बिहार के पिछड़ेपन का कारण नम्बर १ - देश में अन्य लोगों में रीजनलिज़्म रहा है। सत्ता में राजेन्द्र बाबू से लेकर जगजीवन राम तक बिहार के बहुत से कर्णधार लोग रहे हैं। उन सबके केन्द्र में रहते हुए भी हमारा बिहार पीछे चला गया क्योंकि बिहार में रीजनलिज़्म नहीं हुआ। हम भारतीय हैं। जब गिरावट में होते हैं तो बिहारी नहीं होते, जाति में बंट जाते हैं। अन्य जगहों में रीजनलिज़्म है। इसलिए हम पीछे चले गए। हम समझते हैं कि हम देश हैं, इसलिए हम बिहारी को गाली समझते हैं।…( व्यवधान)लोग अपने रीजन के नाम से पुकारे जाने पर गौरवान्वित होते हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप बैठिए।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : बिहार के लोग समझते हैं कि हम इंडियन्स हैं, बिहारी नहीं हैं। इसलिए बिहारी करके गाली दी जाती है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप एक मिनट बैठिए। मंत्री जी को ऐनाउंसमैंट करनी है।

श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया : अभी और मैम्बर्स बोलने वाले हैं, इसलिए भोजन की व्यवस्था की गई है। ७० नम्बर में माननीय सदस्यों के लिए और ७३ नम्बर में बाकी सब लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था है।

सभापति महोदय : अभी दस माननीय सदस्य और बोलने वाले हैं। अगर सब पांच-पांच मिनट लेंगे तो जल्दी खत्म हो जाएगा। रघुवंश बाबू, अब आप बैठिए।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम एक मिनट में समाप्त करेंगे।

सभापति महोदय : आप आधे मिनट में समाप्त कीजिए।

श्री सुरेश रामराव जाधव: सभापति महोदय, मैं रिक्वैस्ट करता हूं कि सबको समान न्याय मिलना चाहिए।

सभापति महोदय : अभी सबको पांच-पांच मिनट मिलेंगे।

...( व्यवधान)

सभापति महोदय : रघुवंश जी को बीस मिनट हो गए हैं। ये अकेले बोलने वाले हैं, कभी आधे घंटे से कम नहीं बोलते।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं केन्द्र सरकार को चेतावनी देना चाहता हूं कि देश में क्षेत्रीय विषमता बढ़ रही है। मैं यह भी जानना चाहता हूं कि रीजनल डिसपैरिटी खत्म करने के लिए इनके पास क्या नीति है, इन्होंने कौन सी कार्यवाही की है? क्या बिहार बदनाम करने के लिए है? बिहार के लोग प्रारंभ से ही देशभर में फैले हुए हैं और बिहार के बिना देश नहीं चल सकता।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिए।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : आईएएस और आईपीएस की परीक्षा अंग्रेजी में होती है।…( व्यवधान)

आप भाषा का सवाल उठाते हैं।…( व्यवधान)हमारे लड़के अंग्रेजी में भी फस्र्ट आ रहे हैं।…( व्यवधान)ब्रिटेन, अमेरिका में जाकर हमारे लड़के फस्र्ट आ रहे हैं।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Now, Shri Prabodh Panda.

Nothing will go on record except what Shri Prabodh Panda says.

(Interruptions)* SHRI PRABODH PANDA: Mr. Chairman, Sir, how can I speak? … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Dr. Raghuvansh Prasad Singh, please sit down.

Now, Shri Prabodh Panda.

...( व्यवधान)

सभापति महोदय : रघुवंश जी, श्री प्रबोध पांडा जी खड़े हुए हैं। आप बैठ जाइए।

...( व्यवधान)

* Not Recorded.

SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Sir, I am very much aware of the time constraint. So, I shall try to be brief.

Sir, on behalf of the Communist Party of India, I strongly condemn the violence that took place in Assam and in some parts of our country in regard to the RRB exams. I also strongly condemn the incidents of killing more than 60 persons, particularly at Tinsukia and in other parts of Assam and also the attack on several Guwahati-bound trains in Bihar. The RRB exams in Mumbai had been threatened. We came to know that the hon. Minister agreed to cancel the exams. What happened in Assam, in Mumbai and elsewhere are the grave reminder of the acute problem of unemployment. It is aggravated further as a result of the wrong Railway recruitment policy, particularly in case of Group-D, Group-C, Khalasi, Gangmen and so on.

The problem of unemployment has never been addressed properly by the Union Government. The declaration for one crore jobs to the unemployed has become a mockery. In these circumstances, the recruitment in the Railways should be done in a responsible manner so that it does not generate mass resentment and mass grievance.

The Government has failed on these two issues, namely, to adopt a proper Railway recruitment policy and to address the unemployment problem. The situation warrants that this policy has to be changed. The recruitment policy must have to change. This point has been addressed by several hon. Members in this august House the other day and even today itself. The situation is such that for 20,000 jobs, more than 70,00,000 people applied and they have been called to appear before the Interview Board. So, this is the situation. Such a horrible situation is the breeding ground for dissatisfaction and mass resentment. It is possible that the provincial chauvinist forces, terrorist outfits and even the fundamentalist forces are willing to take this opportunity to disintegrate our nation.

19.00 hrs. Our Government should be aware of that. The Railways is the biggest employer in the Government. They should be very careful and very responsible. They should be aware of the grave situation in our country. In this scenario, my appeal is that the Ministry of Railways should think over it.

So far as recruitment to Group ‘C’ and Group ‘D’ posts is concerned, the assignment should be given at the DRM level. They should be entrusted with the task of setting up the recruitment board. Slogans like ‘Jobs for sons of the soil’ are being raised. If we want to solve this problem, the local employment exchange should be asked to send the names of local candidates based on some ratio.

Today, the problem of language has been raised in this House. In this scenario, we should stick to the three-language formula of English, Hindi and the regional language. Any language that is acceptable to the candidates should be the medium of examination.

A point has also been raised about convening the National Integration Council. It should be immediately convened and the Government should come up with a proper procedure to be adopted in these matters.

We are talking about the law and order situation here. So far as the Assam situation is concerned, there is no denying of the fact that the State administration failed to take timely preventive measures, particularly in Tinsukia where a large number of Bihari people have settled for generations and have now become people of Assam but how can the Union Government escape from its responsibility in this regard? Were they not delaying the decision on despatch of paramilitary forces to Assam despite repeated requests by the State Government? The Central Government was very much aware of the grave situation in the North-East. So, how can the Central Government escape from that responsibility?

Finally, my appeal to the Union Government and the hon. Minister of Railways is that this should not be taken in a causal manner. The grave situation in our country, the acute unemployment problem of our country and the local situation in the States should be taken into consideration and a specific formula should be evolved to solve the problem.

With these words, I conclude my speech and take this opportunity to thank you once again.

श्री अरुण कुमार (जहानाबाद):सभापति महोदय, असम की समस्या और वहां जो स्थिति बनी, उस पर काफी तफसील से यहां चर्चा हो रही है। काफी संख्या में माननीय सदस्य अपने विचारों को यहां रख चुके हैं। मैं भी कुछ शब्दों में अपनी बात आपके सामने रखना चाहता हूं।

सभापति महोदय, देश को आजाद हुए ५६ वर्ष हो गए हैं। इस लम्बे अंतराल में हमारे फैडरल स्ट्रक्चर को मजबूत होना चाहिए था। देश ने जिन परिस्थितियों में आजादी को प्राप्त किया और जिन महापुरुषों ने राष्ट्र को एक करके देश को आजादी दिलाई, किसी ने भी प्रश्न नहीं किया कि ये बिहारी हैं, ये असमी हैं, ये उत्तर के लोग हैं, ये दक्षिण के लोग हैं। जिन महान विभुतियों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया, देश की आजादी को आगे बढ़ाया, उनकी पूजा पूरे राष्ट्र में एक तरफ से होती है। चाहे सरदार भगतसिंह हों, चाहे सुभाषचन्द्र बोस हों, चाहे महात्मा गांधी हों और चाहे बारदलोई हों। किसी ने कभी भी नहीं समझा कि यह असमी हैं, बिहारी हैं, मराठी हैं। आजादी के ५६ वर्षों में हमें इस भावना को बल देना चाहिए था, ताकत देनी चाहिए थी तथा इसे और मजबूत बनाया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हम एक बात कहना चाहते हैं और वह यह है कि चाहे क्षेत्रवाद हो, उग्रवाद हो या अवसरवाद हो, जिस पर चर्चा कई माननीय सदस्यों ने यहां की है, इसे राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। यही कारण है कि राष्ट्र कमजोर हो रहा है। रिक्रुटमेंट बोर्ड तो एक बहाना है। माननीय सदस्य नखिल चौधरी जी ने एक मंत्री का नाम लिया। उनका यह बयान आज इस रेलवे रिक्रुटमेंट बोर्ड की परिस्थितियों से नहीं है। आज वह बयान जिसको अथन्टिकेट करके टेबल पर ले किया गया है, उसको पढ़ा जाएगा। स्पष्ट है कि विधान सभा में चलते सत्र में उन्होंने बयान दिया है। असम गण परिषद् के एक माननीय सदस्य ने पूछा कि माननीय मंत्री सरकार की हैसियत से बयान दे रहे हैं या यह उनका व्यक्तिगत बयान है। वहां के संसदीय कार्य मंत्री मांझी ने कहा कि यह सरकार का बयान है। अब जब सरकार का बयान होगा कि बिहारियों को भगाना है। उस पत्र को हमने रखा है, हम नहीं कह रहे हैं कि उसकी जांच करेंगे। …( व्यवधान)

SHRI MADHAB RAJBANGSHI (MANGALDOI): The Minister is preparing to file a defamation case against this newspaper for publishing this news. … (Interruptions)

श्री अरुण कुमार : उसी मनिस्टर ने अभी एक घायल व्यक्त…( व्यवधान)अब न्यूज पर ही सारी बातें चल रही हैं। पांच अक्टूबर २००२ का यह बयान है। उसके बाद उसी मनिस्टर ने यह बयान दिया कि तुम मीडिया के सामने यह बात बोल रहे हो, कल तुम्हारे साथ कोई घटना होगी…( व्यवधान)धमकाया। जब ऐसा बयान किसी जिम्मेदार व्यक्ति के द्वारा होगा तो कैसी परिस्थितियां पैदा होंगी।

श्री माधव राजवंशी: यह न्यूज है।

श्री अरुण कुमार : यह दूसरी खबर है। किसी दूसरे व्यक्ति तरूण गोगई के बारे में यह नहीं कहा जा रहा है, उसी व्यक्ति के बारे में यह कहा जा रहा है। इसलिए माननीय सभापति जी, मेरा मानना है कि केन्द्र सरकार को इसको स्ट्रॉग तरीके से डील करना चाहिए।

सभापति महोदय : ठीक है, आप बैठ जाइये। आपको ७ मिनट बोलते हुए हो गये हैं।

श्री अरुण कुमार : सभी लोग तो २०-२५ मिनट बोल रहे थे। माननीय रघुवंश जी २० मिनट बोले हैं।

सभापति महोदय : एक स्पीकर और हैं इसलिए दो मिनट में आप समाप्त कीजिए।

श्री अरुण कुमार : सभापति महोदय, मेरा मानना है, जिन परिस्थितियों में यह चर्चा हो रही है, उससे रीजनल और ऐथनिक फोर्सेस को प्रोटैक्शन मिल रहा है। अभी माननीय सदस्या, श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा जी ने कहा कि हिन्दी थोपी जा रही है, लेकिन सरकार की पालिसी रीजनल लैग्वेजेज को प्रोटैक्ट करने की है। कहा गया कि हिन्दी थोपी जा रही है, मैं यह बात नहीं समझ पा रहा हूं कि क्या एकाएक ऐसी पालिसी बन गई है, जिससे हिन्दी थोपी जा रही है। वे सत्ता में काफी समय तक रही है और यही पालिसी पूर्व में भी रही है और एक सदस्य के रूप में उन्होंने गैर-जिम्मेदारी से बयान दिया है। …( व्यवधान)

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा:महोदय, चूंकि मेरा नाम लिया गयाहै, इसलिए मैं अपनी बात कहना चाहती हूं। कोई पालिसी की बात नहीं है…( व्यवधान)

श्री अरुण कुमार : आपने कहा कि हिन्दी थोपी जा रही है।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: मैं उसी बात को क्लैरिफाई कर रही हूं। You cannot impose a language on anybody.

SHRI ARUN KUMAR : Who is imposing?

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा:परसों मैंने बोला, यहां एक सदस्य ने भाषण में कहा है कि पूरे रेलवे बोर्ड के एग्जामिनेशन हिन्दी में होने चाहिए। मैंने कहा - ‘I object to this because there are parts in the country where Hindi is not the language and they will not be able to compete equally.’ …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:महोदय, हिन्दी राजभाषा है। अगर अपमान किया जाता है, तो यह घोर अपराध है।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: मैंने अपमान नहीं किया है।

कुंवर अखिलेश सिंह: इनकी कृपा से हिन्दा राजभाषा नहीं बनी है।…( व्यवधान)

SHRIMATI MARGARET ALVA : Sir, it has always been the policy that Hindi will not be imposed on any State. … (Interruptions) Sir, now that this issue has been raised, I stand up here and say that in my whole career of 30 years in Parliament, nobody has used such a world against me, but an hon. Member here used such a word against me for having objected the imposition of Hindi. It is still the expected language. … (Interruptions)

कुंवर अखिलेश सिंह:यह विदेश की भाषा है।

श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा: अगर यह विदेश की भाषा है, तो यहां क्यों भाषण कर रहे हैं। …( व्यवधान) For having said that we will not allow Hindi to be imposed on our States, I was called like that. मेरे तीस साल के संसदीय कार्यकाल में मेरे लिए किसी ने ऐसे शब्द का प्रयोग नहीं किया है।

Sir, I urge that it should be expunged from the record. I do not demean myself by asking for an apology from the Member. I do not want his apology because I do not care for his apology, but I want it to be expunged from the record. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : I will go through the record and if there is anything objectionable, I will expunge it.

श्री अरूण कुमार जी, आप अपना भाषण समाप्त कीजिए।

श्री अरुण कुमार : सभापति महोदय, इसीलिए मैं कहना चाहता हूं कि रीजनल और ऐथनिक फोर्सेस के सामने जिस व्यक्ति ने इस तरह की बयान दिया है, भारत सरकार के देश की एकता को ध्यान में रखकर कड़ा एक्शन लेना चाहिए। भारतीय रेल राष्ट्रीय एकता की प्रतीक है और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का बहुत बड़ा माध्यम है। आज उत्तर के लोग दक्षिण में और दक्षिण के लोग उत्तर में काम कर रहे हैं। इससे विचारों में आदान-प्रदान हो रहा है। रीजनल और ऐथनिक फोर्सेस के सामने भारत सरकार को घुटने नहीं टेकने चाहिए। राष्ट्रीय एकता का सवाल हमारे सामने महत्वपूर्ण सवाल है।

इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (पूर्णिया): महोदय, मैं सदन की जानकारी के लिए एक बात कहना चाहता हूं।

महोदय, जानकारी के अनुसार कल भी बिहारी और पूवार्ंचल के लोगों को विशाखापटनम में वहां के पुलिस पदाधिकारियों ने स्टेशन पर पीटा है। अभी तीन दिन पहले कर्नाटक में २७ विद्यार्थियों के सिर फोड़ दिए। इस बारे में जो फैक्स आया था, उसको में श्री राम विलास पासवान जी को दिया था।

सभापति महोदय : इस बात को श्री रामविलास पासवान ने अपनी चर्चा के दौरान उठाया था।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : महोदय, कर्नाटक में विद्यार्थियों को पीटा गया। उन पीटे गए लोगों में मेरे रिलेशन के लोग है, मेरे निर्वाचन क्षेत्र के लोग हैं। जिस तरह से बिहारी कहकर पीटा गया, क्या इस तरह से काम चलेगा। सदन में यह बहस चल रही है और विशाखापटनम तथा कर्नाटक में पुलिस ने मेरी कान्स्टीचुयेंसी के लोगों को पीटा गया। आज इस विषय पर बहस हो रही है। क्या कभी विशाखापट्टनम में और कभी कर्नाटक में पुलिस उन्हें पीटेगी? मेरे निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को पीटा गया। ऐसा कह कर कब तक बर्दाश्त किया जाएगा?

MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record except Kunwar Akhilesh Singh.

(Interruptions) * * Not Recorded कुंवर अखिलेश सिंह:सभापति महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने असम में रेल भर्ती के समय उत्पन्न हिंसा की स्थिति पर चर्चा में भाग लेने का अवसर प्रदान किया। …( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : गृह राज्य मंत्री बैठे हैं। कर्नाटक में लोगों को परसों पीटा गया लेकिन इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा है। विशाखापट्टनम में पीटा गया। मेरे पास इसकी कटिंग है।

सभापति महोदय : जब मंत्री जी इंटरवीन करेंगे, उस समय इस पर बोलेंगे।

कुंवर अखिलेश सिंह: महोदय, ५६ साल की आजादी के बाद असम, विशाखापट्टनम और कर्नाटक में अगर क्षेत्रीयता या भाषा के आधार पर झगड़े हो रहे हैं या हिंसा हो रही है तो निश्चित तौर पर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। देश की आजादी के बाद सामाजिक, आर्थिक और क्षेत्रीय विषमता रही है और वह इसका प्रमुख कारण रही है। ५६ साल की आजादी के बाद यदि हम सामाजिक, आर्थिक और क्षेत्रीय विषमताओं को दूर नहीं कर पाए हैं तो कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक, लोकतांत्रिक प्रणाली की विफलता है। हम सभी लोगों को इसे सही तरीके से स्वीकार करना चाहिए।

असम में रेल भर्ती के समय जो हिंसा उत्पन्न हुई, वह कहीं न कहीं अभाव को प्रदर्शित करती है। असम के लोगों में यह भावना पैदा हुई कि यहां जो भर्ती हो रही है उसमें बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के लोग बड़ी तादाद में ले लिए जाएंगे और हमें अवसर प्राप्त नहीं होगा। हम जब तक बेरोजगारी की समस्या का बुनियादी समाधान निकालने की दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे तब तक इस तरह की समस्याएं उत्पन्न होती रहेंगी।

५६ साल की आजादी में हमने क्या खोया और क्या पाया आज इस पर बहस करने का वक्त नहीं है। इसके मूल में जनसंख्या एक बहुत बड़ा कारण है। देश की आजादी के बाद जिस तरह जनसंख्या में वृद्धि हुई, आज चाहे सामाजिक सुरक्षा की बात कर लें, चाहे बेरोजगारी को दूर करने की बात कर लें कोई भी सरकार अगर इस बढ़ती हुई जनसंख्या को नियंत्रित नहीं करेगी, तो जितने बेरोजगारों की जो फौज है, इनको रोजगार नहीं दिया जा सकता और बेरोजगारी की समस्या को, बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या को …( व्यवधान)

श्री शिवाजी माने (हिंगोली):हम इसलिए कॉमन सविल कोड की बात करते हैं।

कुंवर अखिलेश सिंह: मैं इस संदर्भ में कहना चाहता हूं कि आप ऐसा कह कर अल्पसंख्यक वर्ग को इंगित करना चाहते हैं तो आप भारत सरकार में बैठे हैं। १९५२ की जनसंख्या के आंकड़े आपके पास मौजूद हैं और आज की भी सैंसस रिपोर्ट आपके पास है, आप देख लें कि किस की जनसंख्या में कितने प्रतिशत की वृद्धि हुई है? उसके मूल में शिक्षा कारण है। उसका मॉडल केरल है। केरल में तीनों धर्मों को मानने वालों की लगभग बराबर की आबादी है। केरल ने सभी को शक्षित करने का काम किया, साक्षर करने का काम किया और जो नई जनसंख्या की रिपोर्ट है उसमें देश की औसत जनसंख्या की तुलना में १३.२ प्रतिशत उनके यहां वृद्धि हुई और अन्य राज्यों में २०.६ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हम जब तक बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं करेंगे तब तक इस तरह की स्थितियों पर रोक नहीं लगा सकते। इनकी पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में वायदा किया था कि हम हर वर्ष एक करोड़ लोगों को रोजगार देंगे लेकिन इन को पांच साल से ऊपर सरकार चलाते हो गए लेकिन कहीं भी अपने वायदे पूरे करने की दिशा में कदम नहीं बढ़ाया।

आज बिहार, उत्तर प्रदेश के सवाल पर चर्चा हुई। मारग्रेट जी ने बिहार को बीमार राज्य की संज्ञा दी। उन्होंने भाषा के सवाल पर आपत्तियां जतायीं। उत्तर प्रदेश और बिहार का मात्र दोष यह रहा कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान ने देश की आजादी में एक शानदार इतिहास बनाने का काम किया था, पश्चिम बंगाल ने एक शानदार इतिहास बनाने का काम किया था, क्या इसका कुफल उत्तर प्रदेश और बिहार को भुगतना होगा? उत्तर प्रदेश ने भारत के प्रथम प्रधान मंत्री के रुप में पं. जवाहर लाल नेहरू को दिया और देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में डा. राजेन्द्र प्रसाद को बिहार ने दिया। जय प्रकाश नारायण ने इस देश के अंदर राजनैतिक परिवर्तन किया। अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ नौजवानों के अंदर क्रान्ति का बिगुल बजाया। न केवल गुजरात में बल्कि पूरे देश में आन्दोलन पैदा हुआ। क्या आन्दोलन की भूमि होने के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार को सजा मिलेगी? जो बिहार और लोग उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन की बात कहते हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि १९४७ से लेकर आज तक इस क्षेत्र की कितनी उपेक्षा की गई है, कितनी नाइन्साफी इनके साथ की गई है, इस पर खुलकर बहस करिये। देश की आजादी के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार में जनसंख्या के घनत्व के आधार पर आपने कितना नियोजन किया और अन्य राज्यों में कितना किया? अगर दोनों स्थितियों को सामने रखेंगे तो वास्तिवक चित्र आपके सामने आ जायेगा। उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ जिन लोगों ने हुकूमत में लगातार उनके साथ सौतेला व्यवहार किया, उनके कारण बिहार और उत्तर प्रदेश लगातार पिछड़ते चले गये।

सभापति महोदय, रेल देश को जोड़ने का काम कर रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी चले जाइये, निश्चित रूप से रेल ने यह काम किया है। हिन्दी सिनेमा ने भी देश को जोड़ने का काम किया है। आज यहां हिन्दी पर एक प्रश्न चिन्ह लगाया गया। श्रीमती मारग्रेट जी ने कहा कि हिन्दी हम पर थोपी जा रही है। मैं उनसे विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि हिन्दी को किसी पर थोपा नहीं जा रहा है। हिन्दी राज भाषा है।

श्री शिवराज वि.पाटील (लातूर) : उन्होंने एक्सप्लेन किया था।

कुंवर अखिलेश सिंह: उस समय आप सदन में नहीं थे। बाद में कहा होगा।

सभापति महोदय : उन्होंने एक्प्लेनेशन दे दी थी। उसके बाद इस बात को छोड़ दीजिये।

कुंवर अखिलेश सिंह: मैं आपसे कहना चाहता हूं कि हिन्दी राजभाषा है। अगर हिन्दी राजभाषा की कीमत पर अंग्रेजी थोपी जायेगी, कम से कम हम इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और बंगाली के पक्षधर हैं लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं का भी सम्मान करते हैं। निश्चित तौर पर वभिन्न राज्यों में जो वभिन्न भाषायें बोली जाती हैं, उनकी परीक्षायें उस भाषा में होनी चाहिये लेकिन हिन्दी की उपेक्षा की गई है जिसे हम किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। हिन्दी देश को जोड़ने का काम करती है।

सभापति महोदय, जो लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के बीमारुपन की बात करते हैं, मैं उनसे कहना चाहूंगा कि अगर पंजाब में बिहार के श्रमिक वर्ग नहीं गया होता तो पंजाब की स्थिति कुछ और होती। वहां उन लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है, उनसे १२-१४ घंटे और जानवरों की तरह काम लिया जा रहा है। कभी उनकी स्थिति की ओर आंख उठाकर देखा गया कि उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार हो रहा है? महाराष्ट्र में बिहार के लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जा रहा है? क्या उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जा रहा है, क्या उन्हें मनुष्य समझा जा रहा है? मैं रेल मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने बिहार से दिल्ली के लिये ट्रेन चला रखी है। मैने देखा है कि जब बिहार का आदमी उत्तर प्रदेश की सीमा में आता है तो उसे एक किनारे पर धकिया दिया जाता है और वह बेचारा जिस सीट पर बैठा रहता है, उसे वहां से हटा दिया जाता है। क्या इस तरह से उसके साथ अन्याय किया जाता रहेगा? अगर इस प्रकार अन्याय को बर्दाश्त करके देश की तरक्की में अपना अमूल्य योगदान दे सकता है? अगर इसी तरह चलता रहा तो हिंसा भड़ेगी जो पूरे देश के लिये खतरनाक होगी। इसलिये मैं कहना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुये राज्य हैं, उनकी आर्थिक विषमता को दूर करने के लिये भारत सरकार को आगे आना चाहिये। जब तक क्षेत्रीय विषमता दूर नहीं होगी, तब तक इस तरह की बुराइयों को आप रोक नहीं सकते हैं।

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, I stand here to participate in the discussion under Rule 193 which deals with basically two aspects: One is the incidence of violence in Assam and other parts of the country, and the second is the recruitment policy of the Railways. These are the two points which need to be elaborated. When this discussion was taken up on the other day, which I had minutely observed, I was under the impression that I would be speaking on that day and, therefore, I had prepared a note. However, due to my ill-luck, I do not have that note with me now; I am not carrying that note with me. Anyway, I will confine my speech to these two aspects of the discussion be done.

At the first, the incidents of violence both in Assam and Bihar and in other parts of the country which should be condemned by this House, or at least by the Chair. Attack on train passengers in Bihar has also to be condemned in equal terms. They are very unfortunate incidents. Anti-social elements take advantage of such situations. It has, to a certain extent, a political tinge to it. That has to be deduced, culprits should be apprehended and booked.

The second aspect is regarding the pressure on the youths of different regions. Discussion has been made about regional parochialism, regional uprising, about specific regional languages. If there is a discussion on that matter, it will take a lot of time. As the present discussion is only on these two aspects – the law and order situation in specific areas and the railway recruitment policy – I will devote more time to the railway recruitment policy.

Before I come to the recruitment policy, I would like to talk about the unemployment problem in the country. The minimum qualification prescribed for the post of a khalasi or a gangman is Class—(VIII) . By this, one can comprehend as to how vast is the problem of unemployment in our country.

I would like to draw the attention of this House to a very peculiar situation that has arisen in our country. The situation is of societal tension. There has been a mention of the census figures and the age groups of people. The people belonging to the age group which is dependent on the earnings of others in our society is bulging. We have a bulging dependent age group in our society. That is the main reason for social tension in our country. That has manifested in different aspects. Who are these dependants? Dependants are the people who are beyond sixty or sixty-five years of age who do not earn much for the family. Dependants are from the age group of five years till twenty-five years of age. After twenty-five, the society, no less the family, expects that a boy or a girl should either earn or make a family. When they do not, the problem starts. That is the main problem, which needs to be addressed.

I come to the railway recruitment policy now. Railways have been in existence in the country for 150 years. In our part of the country, Railways have been there for 100 years. Our Cuttack railway station is going to celebrate the centenary year very soon. More than 100 years have passed. However, the Railway Service Board is no less than around sixty years old. I think it was in 1942 that the first Railway Service Board was formed. Why was it formed? It was formed because the railway system during the British days also was not transparent. The main reason why the Railway Service Board was formed was to see that better men are recruited to handle the organisation.

Subsequently, in the last fifty-sixty years, the Railway Service Board has been converted into the Railway Recruitment Board. I think there are 19 regional Railway Recruitment Boards now in the country catering to different regions. I will confine my discussion to recruitment for Group-C and Group-D posts only. Recruitment to Group-C posts is being done through the Railway Recruitment Boards and recruitment to Group-D posts is being done by the Divisional Railway Managers. Here comes the problem. Nobody is complaining about recruitment to the officer rank posts, which should be done at the national level without any territorial boundaries..

There, Hindi, English and other languages also can be the mode of examination. Nobody is complaining there. The major complaint is, why recruitment should be done at a national level for the posts of Group D or Group C categories of a Division or Zone.

Here is the problem where I would like to draw the attention of the hon. Minister. The problem caters to my State’s Khurda Road Division. We have, as you know, another division at Sambalpur. In the East-coast zone, there is another division in Waltair. The fourth division which also caters to a part of Orissa is the Kharagpur Division. In Kharagpur, when an examination takes place for Group D posts, Bengali is the language; and Oriya is also the language because a part of Midnapur is under that Division and a part of Balasore district is also there under that Division. Similarly, in Sambalpur Division, Raipur area, a Hindi-speaking belt is also there. For Khurda Division, Telugu is also another language as the mode of examination as Palash comes under it.

19.31 hrs. (Mr. Speaker in the Chair) But in October, 1998, when the first notification came for this Group D examination, applications were sought for. I think, after six weeks, another notification came saying that the extension has been made. Then, third notification also came saying that this will be open for all throughout the country. That is where the problem arose. Lakhs and lakhs of applications came. Earlier, that was not being so. I was told by one of my senior friends that earlier for these gangmen, the most able bodied persons of that locality were being recruited by the Divisional Manager. He was not only earning his salary for his family, he was also protecting the property of the Railways. He knew, who were the culprits, who were the dakus and who are capable of destroying a number of Railway properties.

Now, when you open the invitation for application throughout the country, a person who will be employed -- no matter how he will be selected -- he will be having very little contact with the local people to protect the property of the Railways. That should not be the main criterion.

I have two things to suggest. Let the language be confined to the local language of that Division alone for filling up Group D posts. As has been suggested, I fully agree that the local employment exchanges should also be the medium to send the names for the interviews and selections.

My second point is that the applicants should be confined to that area alone through that local language. I think, by doing these two things, a lot of tension in the country, which unnecessarily creates a law and order problem throughout the country, can be solved.

In the Sambalpur Division, during the recruitment, already around 400 gangmen have been posted. They went through that old system with Oriya and Hindi as the mode of languages because Raipur area comes under that Division. So, in Sambalpur Division, recruitment has already been done. But in Khurda Road Division, it is still pending. I was told that more than 4 lakh applications came. After physical and written examinations, around 8,000 and odd persons had been selected and listed and the viva voce was supposed to be done. But now, it has been stopped.

MR. SPEAKER: Please conclude now.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : I am just concluding, Sir.

Now, out of these 8000 and odd listed applicants, only 1,200 will be posted. This is the problem. This is the vastness of the problem of unemployment which the Railways is going to tackle. Hundreds and hundreds of people are roaming around in the Khurda Road, Bhubaneswar and Cuttack to find out what their future is. They have been asking me, saying please talk to the Railway people. Let us find out what their future is.

 

It is necessary that steps are taken at the earliest in this regard.

I would like to conclude with one sentence more. I would like to just clarify a misconception which has arisen. The other day when this point was being discussed, it was raised from the other side that because of creation of a number of zones, these problems are cropping up in a greater manner. That is not so. Confining Zonal Headquarters in metropolish was a colonial mindset and we should get rid of that mindset.

Regional aspirations are there; we have to tackle that; local problem has to be tackled. Recruitment for Group-C should be done at the local recruitment level and recruitment for Group-D should be done at the divisional level. And adequate protection should be given to the Railways for recruitment of local people.

श्री सुबोध राय (भागलपुर):अध्यक्ष महोदय, जिस तरह हाल के दिनों में बिहारी या हिन्दी भाषी लोगों पर हमले हुए हैं, चाहे असम, महाराष्ट्र, आन्ध्रा या कर्नाटक हो या देश के किसी भी अन्य हिस्से में हो, वह बहुत ही घोर निन्दनीय और चिन्ता की बात है।

महोदय, कोई भी देशभक्त, देश की एकता और अखंडता का जो समर्थक है, वह इसकी चिन्ता किए बिना नहीं रह सकता है और इस शर्मनाक स्थिति से निपटने के लिए द्ृढ़ संकल्प के सिवा वह कुछ नहीं कर सकता। इसलिए मेरा निवेदन है कि इसे गहराई से देखने की जरूरत है कि आज क्यों भारत की आजादी के इतने लम्बे समय के बाद, जब कि देश के अंदर बहुत बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हुई हैं, अनेकों विकास की बातें हुई हैं। देश ने काफी तरक्की की है, लेकिन आज की स्थिति में जब देश में क्षेत्रतावादी, अलगाववादी और विघटनकारी ताकतें अगर सिर उठा रही हैं तो उसके पीछे क्या कारण है, इन चीजों को देखना हम सभी का कर्तव्य है। इससे एक बात स्पष्ट जाहिर हुई है कि एक तो नौजवानों में बहुत ज्यादा घोर हताशा की स्थिति व्याप्त है, इसलिए कि उनका भविष्य अंधकारपूर्ण है। उन्हें नौकरी की चिन्ता है, आगे क्या करेंगे, उनका जीवन कैसे व्यतीत होगा, वे कैसे अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगे, इसके लिए उन्हें बहुत भय है। यह स्थिति किस ने पैदा की है? एक धारणा है कि ये बिहारी और हिन्दीभाषी लोग, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश वगैरह के हैं, ये अनपढ़ और तिरस्कृत हैं। इस तरह की भावना जिन लोगों ने पैदा की है, जहां भी जिन लोगों ने इस उत्तेजना को फैलाने का काम किया है, चाहे बिहार में हो या उसके बाहर हो, जो ५०-६० निरीह और निर्दोष बिहारियों और हिन्दीभाषियों की हत्याएं हुई हैं, कत्लेआम हुआ है, जितनी भी घटनाएं हुई हैं, वे सब काफी चिन्ता का विषय है। जाहिर है कि इसमें बहुत बड़े क्रमिनल शामिल हैं। उन लोगों ने इसमें खुल कर काम किया है। प्रशासनिक विफलता भी दिखाई देती है। जिस राज्य में यह घटना घटती है, वहां की सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून-व्यवस्था की स्थिति को मुस्तैदी से देखें, लेकिन सवाल यह है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण क्या है कि आज यह समस्या क्यों पैदा हुई?

महोदय, मेरा स्पष्ट मानना है कि जिस तरह की भयानक स्थिति थी, लोग इंतजार कर रहे थे कि भारत सरकार कोई ऐसा काम करेगी, जिससे कि बेकार और हताशा नौजवानों को काम मिलेगा, उन्हें नई दिशा मिलेगी, इसलिए जब प्रधानमंत्री जी ने एक करोड़ लोगों को, नौजवानों को काम देने की घोषणा की थी तो देश के नौजवानों में बहुत बड़ी आशा जगी थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सिर्फ रेल विभाग ने बहुत बड़ा काम किया। हमारे नीतीश बाबू ने बहुत बड़ी हिम्मत करने का काम किया और २०-२५ हजार लोगों का ग्रुप डी में भर्ती करने का ऐलान किया, जिससे तमाम नौजवानों में आशा की उमंग जगने का काम हुआ था।

लेकिन कहां गलती हुई, कहां नीति में कमी है, उसकी जांच-पड़ताल करेंगे। अन्य सदस्यों ने जो बताया है, उस रोशनी में वे देखने का काम करेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि कोई और विभाग नहीं है, अन्य किसी तरह का उद्योग-धन्धा नहीं है, जहां नौजवानों को आज काम की कोई उम्मीद हो। इसलिए जिस तरह से भूमंडलीकरण की आड़ में, उदारीकरण की आड़ में निजीकरण की प्रक्रिया चलाई गई और बड़े पैमाने पर वनिवेश की प्रक्रिया चालू करके बड़े-बड़े कल-कारखानों को बन्द करने का काम किया गया, उससे आज लाखों लोग बेकार हुए हैं। आज जरूरत है कि बन्द कल-कारखानों को खोल दिया जाये, सिक कारखानों को खोल दिया जाये और बड़े पैमाने पर काम नौजवानों को, बेरोजगारों को और भूमिहीनों को मिलना चाहिए और बुनकरों की समस्या हल होनी चाहिए, इसके बारे में काम होना चाहिए।

इसलिए हम रेल मंत्री जी से यह जरूर कहेंगे कि आइन्दा जो भी भर्ती का कार्यक्रम हो या अन्य किसी भी विभाग में भर्ती का काम हो तो कामदिलाऊ या जो रोजगारदिलाऊ दफ्तर हैं, उन्हें पूरी तरह से निष्पक्ष बनाने की जरूरत है। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि बड़ी भारी परती जमीन रेलवे लाइन के किनारे-किनारे पड़ी हुई है, वह ठेकेदारों को नहीं मिलनी चाहिए। उस जमीन का बन्दोबस्त गांव के जो तमाम भूमिहीन हैं, जो दलित हैं, जो अति गरीब लोग हैं, उनके नाम से बन्दोबस्त होने से लोगों में काम की एक आशा और उम्मीद जगेगी। इसलिए तमाम बातों को देखते हुए देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए आज जरूरी है कि हम इस भावना से काम करें कि तमाम जो अलगाववादी, क्षेत्रीयतावादी, सम्प्रदायवादी और विषमता की जो बात है, जो क्षेत्रीय असमानता पैदा हुई है, उसमें आज बिहार की स्थिति सबसे बदतर हो गई है, इसलिए हमने जो पैकेज की मांग की है, भारत सरकार को तत्काल उसे पूरा करना चाहिए और बिहार की समस्या का निदान करना चाहिए।

श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) : अध्यक्ष जी, आपने बोलने का मौका दिया, मैं आपका इसके लिए आभारी हूं। १९३ की चर्चा इससे पिछले हफ्ते भी हुई और बहुत सारे वक्ता इस विषय पर बोल चुके हैं।

मैं अपनी तरफ से और अपनी पार्टी शिवसेना की तरफ से हमारे एक पूर्ववक्ता बोल चुके हैं। रेलवे भर्ती के बारे में यह जो घटना घटी, असम में जो बिहारी युवक थे, उनकी जो हत्या की गई, उनकी जान-माल को नुकसान पहुंचाया गया, उसकी मैं अपनी तरफ से और मेरी पार्टी की तरफ से निन्दा करता हूं।

ऐसा कोई पार्टी भी नहीं चाहती, ये जो बेरोजगार नवयुवक हैं, वे पहले ही नौकरी के लिए परेशान हैं। महाराष्ट्र की बात भी मैं बोलने वाला हूं। पहले हम इस घटना की निन्दा करते हैं।

अध्यक्ष महोदय : महाराष्ट्र पर ज्यादा मत बोलना, थोड़ा बोलना।

श्री सुरेश रामराव जाधव : असम में जो घटना घटी, उसमें नौकरी भर्ती के लिए किसी को किसी की जान-माल को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है। नौकरी भर्ती तो होती रहेगी, लेकिन शिवसेना पार्टी राष्ट्र का हित सर्वोपरि मानने वाली पार्टी है। राष्ट्र का हित हमें अच्छी तरह से मालूम है। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाली हमारी शिवसेना पार्टी है। हमें राष्ट्रहित किसी को दिखाने की जरूरत नहीं है, बल्कि हम स्ट्रांग नेशनेलिटी चाहते हैं। अगर सही मायने में हमारे हिन्दुस्तान को, हमारे भारतवर्ष को हमें आगे बढ़ाना है तो हर सिटीजन में स्ट्रांग नेशनेलिटी होनी चाहिए। असम या अन्य क्षेत्रों में जो हादसा हुआ, महाराष्ट्र के बारे में लोग बोल रहे हैं, खास तौर पर प्रबोध पांडा जी और रघुवंश बाबू बोले हैं।

यह केवल महाराष्ट्र के लोग ही नहीं चाहते बल्कि कर्नाटक, असम के लोग भी चाहते हैं कि भूमि पुत्रों को न्याय मिले, लोकल लोगों को न्याय मिले। इस देश में जितने प्रांत हैं, मैक्सिमम प्रांतों के लोग यही चाहते हैं कि वहां के लोकल लोगों को न्याय मिले। ग्रुप डी या गैंगमैन की जो भर्ती है, क्लास थ्री और क्लास फोर्थ क्लास के पद के लिए जो भर्ती है, उसमें भूमि पुत्रों को न्याय मिलना चाहिए। जैसे हरेक स्टेट की भूमिका है, उसी तरह शिवसेना की भी यही भूमिका है। इस देश की एकता और अखंडता बरकरार रहनी चाहिए यानी हमारा देश एकता के रूप में मजबूत होना चाहिए। अगर किसी प्रांत में नवयुवक बेरोजगार है, उसके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है, काम धंधे के लिए उसके पास पैसे नहीं है और वह बेरोजगारी से परेशान है तो उसमें आक्रोश स्वाभाविक है।

मैं आपके माध्यम से माननीय रेल मंत्री जी से रिक्वैस्ट करना चाहता हूं कि आपका जो नौकर भर्ती करने का सिस्टम है, उसकी आपको समीक्षा करनी चाहिए और उसमें कोई रास्ता निकालना चाहिए ताकि भूमि पुत्रों को, लोकल लोगों को न्याय मिले। हमारा कहना है कि ग्रुप डी और क्लास फोर्थ का जो एग्जाम हो, वह लोकल लेंग्वेज में होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो स्वाभाविक रूप से जो बेकारी है, बेरोजगारी है. जो हताश लोग हैं, जो गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोग हैं, उनमें आक्रोश पैदा होगा। । इसके लिए रेल मंत्री जी को इसमें थोड़ी समीक्षा करनी चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, महाराष्ट्र में मराठी लोग दो-तीन जोन में बंटे हुए हैं। हम आपके माध्यम से रेल मंत्री जी से इस बारे में प्रार्थना करना चाहते हैं। अभी हमारी पूर्ववक्ता श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि इसमें कुछ तय करना चाहिए, कुछ सॉल्यूशन निकालना चाहिए। आप डी ग्रुप की भर्ती के लिए कम से कम ६०, ७० या ८० फीसदी का रेशियो रखें। इसके लिए आपको कोई रास्ता निकालने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो स्वाभाविक है कि उनमें आक्रोश पैदा होगा।

मैं रेल मंत्री जी से रिक्वैस्ट करना चाहता हूं कि ग्रुप डी की भर्ती का जो सिस्टम है, उसकी समीक्षा होनी चाहिए और भूमि पुत्रों को, लोकल लोगों को न्याय मिलना चाहिए। इसके साथ-साथ रीजनल लेंग्वेज में परीक्षा होनी चाहिए। आपने मुझे समय दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

SHRI BIJOY HANDIQUE (JORHAT): Sir, at the outset, I appeal to the august House to condemn unequivocally the attack on the Biharis in Assam as well as the incidents in the Brahmaputra Mail in Bihar at Jamalpur Railway Station which triggered the Assam happenings. This will send the right message to the people of both the States and elsewhere.

What harm a wrong recruitment policy can cause to a peaceful society is nowhere better illustrated than the present Railway recruitment procedure for Grade III and Grade IV jobs in Assam and for that matter, in the entire North-East and elsewhere too.

Biharis have been living in Assam for over more than 100 years. They are integrated into Assamese society. There has always been a climate of amity and goodwill with the people of Assam. There is no sense of rivalry or competition because the local people are not even in the same trade or same type of activities too. It is very unfortunate that over a recruitment policy of the Railways, there has been a climate of violence and clashes leading to loss of life and property.

It is also true that there have been repeated demands at various fora, particularly at the informal Consultative Committee meetings attached to the N.F. Railway and a few other Divisions in respect of scrapping the present policy of recruitment for Grade III and IV categories of jobs. The Railway Minister, however, says that he is bound by the Supreme Court directive against reservation in railway jobs. I must, however, say that there is a wave of massive resentment in Assam and elsewhere. It was not against the Biharis that the interview was opposed. It is against the recruitment policy of the Railways. It is just an accident that the bulk of the candidates were from Bihar. Some of them were from Tripura also. Yet barring about 150 candidates, rest of the candidates in that particular batch participated in the interview in full security.

What surprises and hurts the local people is that no step has so far been taken by the Central Government in respect of their demand. They are least concerned to know whether Railway Ministry is competent to do it or not. What they want is that the Government should do it and the Government must do it. The Government also should bear in mind that it cannot preserve the national character of Railways or any other national institution by merely imposing an all-India pattern on various regions, rather they should allow it to grow from below towards fitting into the national pattern. The railway authorities’ claim that this policy is designed with the federal polity in mind is too tall to be credible and it has proved to be all bunkum. Sermonising unemployed youths at the grassroot level and denying them basic justice cannot build a national psyche.

The most crucial question now is what do we do now to prevent recurrence of such incidents. It transpired in the discussion in the informal Consultative Committee meeting a couple of days ago that region-wise reservation of Grade IV jobs can be done by amending the DoPT directive. If so, the ball is in the court of the Government. It is for the Government now to do it. If they are sincere, the issue can be resolved. I do hope that the Government will rise to the occasion and do the needful. It is not that once the railway jobs of certain grades at the lower level are reserved, everything will be over and all problems will be solved. I personally feel and I am afraid that somewhere our emotional integration and social harmony got derailed in spite of the historical process of assimilation of which Assamese society always boasts of. This is a society of multi-religion, multi-language, multi-community, multi-ethnicity and multi-culture groups. There may be some misunderstanding, some hitches or some missing links sometimes. We, the different groups of Assamese society must put our head and hands together to keep the process of integration alive.

MR. SPEAKER: Please conclude.

SHRI BIJOY HANDIQUE : Sir, I am from Assam. Let me speak a few lines more. I want to say something more in response. I am speaking out of anguish. This is our assurance to the august House. We need to evolve some mechanism at the village level, probably at the panchayat level to deal with these far flung areas, because most of the Biharis live in the far away forest areas. In fact, the existing Village Defence Organisation will now be remodelled and strengthened to do such work. The Government of Assam has already taken up the job to reorganise this Village Defence Organisation.

At the same time, it should be borne in mind that terrorist activities must be controlled and contained. We must not allow any law and order situation to break out for it is the terrorists who call the shots in such a situation. To maintain law and order and to control the terrorists, Assam, like any other State, has to depend upon the Central forces. Assam is however, driven into a tight corner due to inadequate Central forces. The Assam Chief Minister is on record having written 14 letters since 2002 without any results. I am afraid it is rather a sad commentary on the Centre-State relations.

Sir, when violence broke out, there were only 111 companies of Central para-military forces. So, it is the terrorists who took advantage of the situation. The terrorists took over and controlled the situation. Normally, para-military forces are deployed for counter-insurgency operations but they had to be deployed for law and order duty and terrorists were just waiting for this moment, to jump into the fray and create trouble. At last, when 25 companies of para-military forces did arrive in Assam, the situation was already under control. The question to be considered here is, because of the urgency of the situation, why were not the Central para-military forces airlifted? They could have been airlifted for speed is the essence of such a situation.

Before I conclude, I would like to say that instead of wasting time on blame-game and trying to take political leverage, instead of bickering and shouts and counter-shouts, let us have soul searching and think of addressing ourselves sincerely and honestly to find a permanent answer to this crisis of confidence which Assam as well as Bihar, at the moment, are passing through.

 

श्रीमती रेनु कुमारी (खगड़िया) :अध्यक्ष महोदय, इस चर्चा के द्वारा आपने मुझे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का मौका दिया। कई दिनों से चर्चा चल रही है। सारे सदस्य चिंतित हैं कि बिहारियों पर देश के कई प्रांतों में हमले हो रहे हैं। मैं आपसे कहना चाहूंगी कि यह वही बिहार है जिसने विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने का काम किया था। पूरे देश के, पूरे विश्व के बौद्ध, जैन, हिन्दू और सिख बिहार को पवित्र स्थल मानते हैं। सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह बिहार में पैदा हुए थे। समय कम है, इसलिए मैं संक्षेप में कहना चाहूंगी कि नालन्दा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय भी बिहार में ही हुए थे जिन्होंने पूरे देश को, दुनिया को रोशनी देने का काम किया था और यहां तक कि देश को आजाद कराने के लिए, उस अंग्रेज को भगाने के लिए जिसका सूरज इस विश्व में नहीं डूबता था, उस अंग्रेज को भगाने के लिए गांधी जी ने बिहार को ही कर्मस्थली बनाया था और बिहार के वंशजों ने ट्रीडी, फिजी और मौरीशस में वहां शासन में भी सत्ता संभालने का काम किया। लेकिन आज उन्हीं बिहारियों को चारों और हिकारत की नजर से देखा जा रहा है। क्या वे इसी के काबिल हैं या उनकी कड़ी मेहनत लोगों की आंखों में किरकिरी बनी हुई है? रेलवे के भर्ती बोर्ड की चर्चा हो रही है। इसके पहले क्या कोई जानते थे कि ग्रुप ‘डी’ और गैंगमैन में इतनी बहाली हुआ करती थी जब डीआरएम और जीएम के अंदर ये नौकरियां थी तो कितने गरीब गुरबों को नौकरी मिला करती थी?

20.00 hrs. कितने लोग जानते थे कि इसमें २०,००० की बहालियां पूरे देश के स्तर पर होने वाली हैं। आज जब रेल मंत्रालय ने निर्णय लिया है कि हम खुली परीक्षा लेंगे, रेलवे भर्ती बोर्ड के माध्यम से परीक्षा लेंगे, जिससे गरीब-गुरबा, सबका बेटा जो प्रतिभावान होगा, इसमें आएगा, उसको नौकरी मिलेगी और रोजगार मिलेगा। आज इस तरह की बात हो रही है कि भूमि पुत्र को नौकरी मिलनी चाहिए। मैं पूछना चाहती हूं कि क्या इससे क्षेत्रीयता की भावना नहीं आएगी?जब राष्ट्रीय स्तर पर नौकरियों की बात हुई है तो फिर भूमि पुत्र की बात कहां से आ गई, कहां से क्षेत्रीयता की बात आ गई और कहां से भाषा की बात आ गई।

इसके पहले जिसके सगे-सम्बन्धी होते थे, लोग उनको भर्ती करते थे। इसी तरह से विधान सभा और विधान परिषद में भी अध्यक्ष और सभापति के रिश्तेदारों से पद भरा करते थे। रेलवे बोर्ड जो भी निर्णय ले, लेकिन मैं कहना चाहूंगी कि क्या बिहारी भूमि पुत्र नहीं है ? क्या बिहारियों का पूरा देश नहीं है, अगर है तो फिर इस तरह की चर्चा क्यों हो रही है। अगर ऐसी चर्चा होगी तो मैं समझती हूं निसंदेह यह क्षेत्र और देश की एकता के लिए खतरनाक होगी।

यहां चर्चा में यह बात भी उठी कि रेलवे भर्ती बोर्ड के कारण असम में दंगा हुआ है। असम में इससे पहले भी कई बार दंगे हुए हैं। भारत विभाजन के समय १९५१ में असम में रहने वाले मुसलमानों को असम छोड़ने का अल्टीमेटम जारी हुआ था। १९६० में असम में रहने वाले बंगाली हिन्दुओं पर जानलेवा हमला हुआ था। १९६६ में मुसलमानों के खिलाफ व्यापक हिंसा की वारदातें हुई थीं। १९७२ में भाषा के नाम पर दंगा भड़का था। १९७९ में विदेशी भगाओ आंदोलन के नाम पर असम छोड़ने का फर्मान जारी हुआ था। १९८३ में आसू के चुनाव बहिष्कार की धमकी के बाद चुनाव में भाग लेने के कारण मुसलमानों पर कहर टूटा था। उसके बाद नेली कांड सरीखी घटना हुई, जिसमें १०० बेकसूर लोग मारे गए। यह हिंसा क्यों हुई, इसमें हमें जाना चाहिए। मैं कहना चाहूंगी इस हिंसा के मूल में अगर कोई कारण है तो वह है पेट की आग और बेरोजगारी। पेट की आग है जो आदमी में नैतिकता को खत्म कर देती है। पेट की आग है जो आदमी का विवेक समाप्त कर देती है। पेट की आग है जो लोगों को हथियार उठाने को विवश करती है। पेट की आग है जो महिलाओं को अपनी आबरू बेचने को विवश करती है। अगर इस पेट की आग को रोजगार के माध्यम से खत्म नहीं करेंगे, तब तक इस तरह की हिंसा देश भर में चलती रहेगी।

अध्यक्ष महोदय, एक बात यहां और चर्चा में आई। हमारे कई साथियों ने जिक्र किया कि बिहारियों पर ही दूसरे प्रदेशों में, महाराष्ट्र हो, कर्नाटक हो, झारखंड या असम हो, हमले क्यों हो रहे हैं। हमें भी यह समझना पड़ेगा कि ऐसा बिहारियों के साथ ही क्यों हो रहा है। क्या कोई कर्नाटक का व्यक्ति या महाराष्ट्र का व्यक्ति किसी अन्य प्रदेश में जाता है, तो उसके ऊपर हमला होता है, नहीं होता है, केवल बिहारियों पर ही होता है। इस बात को रघुवंश बाबू जैसे लोगों को भी समझना होगा, जो बिहार में सत्ता में हिस्सेदार हैं। हम सब बिहारियों को और सारे सदन को इस पर सोचना चाहिए। मैं कहना चाहूंगी कि बिहार हाई कोर्ट का बयान आया है, आपने भी पढ़ा होगा, उसमें कहा गया है कि बिहार में कोई भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं है। बिहार में कानून और व्यवस्था खत्म हो गई है। हाल की घटना में बिहार के डी.जी.पी., उसके पूर्व डी.जी.पी. आदि कई लोग जिस तरह से चर्चा में आए, यह सोचने की बात है। …( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह (आरा):यह इस विषय से सम्बन्धित नहीं है।…( व्यवधान)

श्रीमती रेनु कुमारी:इनकी नैतिकता खत्म हो गई है इसलिए यह डिस्टर्ब कर रहे हैं। इनका जमीर बिक गया है इसलिए ऐसा बोल रहे हैं। अध्यक्ष महोदय, मैं थोड़ा बिहार की पृष्ठभूमि में जाना चाहूंगी। आज बिहार में आदमी आदमी की तरह नहीं जी रहा, उसकी जिंदगी पशु से भी बदतर हो गई है।…( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह :व्अध्यक्ष महोदय, यह इस चर्चा से रिलेटिड नहीं है।

अध्यक्ष महोदय : आपकी बात सही है। जो विषय है, उस पर बोलना चाहिए।

श्रीमती रेनु कुमारी: बिहार में सर्व शिक्षा अभियान के तहत करोड़ों रुपए यहां से मिल रहे हैं। लेकिन उसका कोई फायदा बिहार के लोगों को नहीं मिल रहा है।…( व्यवधान) आप कृपा करके मेरी बात सुनें।

श्री राम प्रसाद सिंह : यह बिहार सरकार की आलोचना कर रही हैं, जिसका इस चर्चा से कोई सम्बन्ध नहीं है।

श्रीमती रेनु कुमारी: आप बिहार सरकार के लिए क्यों परेशान हो रहे हैं। आपके इसी व्यवहार के कारण बिहार आज गर्त में जा रहा है।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : इस विषय पर डिबेट नहीं होनी चाहिए। जो विषय चर्चा के लिए सामने है, उस पर बोलें। रेनु कुमारी जी, आप समाप्त करें, क्योंकि आपका समय समाप्त हो चुका है।

श्रीमती रेनु कुमारी: बिहार में सारे सरकारी विद्यालयों की हालत बहुत खराब है। सारे भवन टूटे हुए हैं, वहां कोई शिक्षक नहीं है। वहां पढ़ाई चौपट है, बिजली नहीं है, सड़कों की हालत ठीक नहीं है।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : आप बैठिए।

श्रीमती रेनु कुमारी: चीफ-सैक्रेट्री को जेल जाना पड़ा है और वहां रोजगार तो बिल्कुल खत्म हो गया है। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : आप बीच में मत बोलिये। माननीय सदस्या विषय पर ही बोल रही हैं आप बैठ जाइये। अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्रीमती रेनु कुमारी: माननीय अध्यक्ष जी, आप मेरी बातों को सुनें। झारखंड के बंटने के बाद।…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष जी, टीवी पर राम प्रसाद सिंह जी का चेहरा भी नहीं जा रहा है और लालू जी टीवी भी नहीं देख रहे होंगे, काहे बीच में बोल रहे हैं।

श्री राम प्रसाद सिंह : यहां भी तो चेहरा दिखना चाहिए। टीवी का मतलब नही होता है, हम तो अपनी भावना रख रहे हैं। …( व्यवधान)

श्रीमती रेनु कुमारी:अपहरण और हत्याएं वहां रोज की घटनाएं हो गयी हैं। कोई कारखाना वहां नहीं है। कच्चे माल की वहां कमी नहीं है। मक्का, जूट, ईख…( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह :इस विषय से इसका क्या संबंध है?

श्रीमती रेनु कुमारी: हमें बोलने दीजिए।

अध्यक्ष महोदय : केवल रेनु कुमारी का भाषण ही रिकार्ड पर जाएगा।

...( व्यवधान)...* श्रीमती रेनु कुमारी:रोजगार के अभाव में छात्र और मजदूर प्रदेश से पलायन कर रहे हैं। मजदूर रोजगार के अभाव में अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर हरियाणा और पंजाब में धान काटने का काम करने के लिए जाते हैं।

श्री चन्द्रकांत खैरे (औरंगाबाद, महाराष्ट्र) : एक मिनट मुझे भी बोलना है।

अध्यक्ष महोदय : आपने कोई प्रश्न पूछना है तो पूछिये। आपका भाषण तो हो गया है। आप बैठ जाइये।

श्रीमती रेनु कुमारी: बिहार में जो लाभ जनता को मिलना चाहिए वह अपराधियों को मिल रहा है। जनसंख्या पर कोई नियंत्रण नहीं है। मैं चाहूंगी कि राज्य सरकार केन्द्र पर और केन्द्र राज्य पर दोष न लगाकर कुटीर और लघु उद्योगों को वहां बढ़ावा दे। बिहार में उर्वरा भूमि है और १२ महीने बहने वाली नदियां हैं। वहां रोजगार की व्यवस्था होनी चाहिए।…( व्यवधान)

MR. SPEAKER: Let me conclude the debate now. Last one minute I have given to her.

… (Interruptions)

श्री राम प्रसाद सिंह :बिहार की सरकार ने इस सवाल को लिया है…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : अगर आप इस तरह से बोलेंगे तो मैं नहीं समझता कि उनका भाषण पूरा हो सकेगा। आप बैठ जाइये।

श्रीमती रेनु कुमारी: अध्यक्ष जी, असम में जो हिंसा हो रही है और केन्द्रीय बलों की प्रतीक्षा करते हुए गोगोई सरकार रह गयी और जो सरकार मूक दर्शक बनी रही, वह भी नैतिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। ऐसी निकम्मी गोगोई सरकार को गद्दी से उतारकर वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए।…( व्यवधान)अध्यक्ष महोदय, किसी कवि ने कहा है कि" भरा नहीं जो भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, ह्ृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"भारतवर्ष प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है और पूरे लोगों को रोजगार दे सकता है। अगर कहीं कमी है तो सरकार की इच्छा-शक्ति की कमी है, संकल्प की कमी है। इसलिए मैं कहना चाहूंगी कि बिहार में उद्योग-धंधे तो लगे ही लेकिन वहां की निकम्मी सरकार को हटाकर वहां राष्ट्रपति का शासन लगना चाहिए तभी बिहारी हमारे कहीं भी मारे नहीं जाएंगे।

* Not Recorded.

   

राज्य में पूंजी निवेश होगा, तभी राज्य का निर्माण हो सकेगा। …( व्यवधान)अगर ऐसा होगा, तो नए भारत का निर्माण हो सकेगा।

इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री चन्द्रकांत खैरे : अध्यक्ष महोदय, मुझे आपने बोलने के लिए अवसर दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूं।

अध्यक्ष महोदय : मैंने आपको बोलने का अवसर नहीं दिया है। आपका कोई प्रश्न है, तो पूछ लीजिए। आप पार्टी के नेता है, इसलिए आपको बोलने का मौका दिया है।

श्री चन्द्रकांत खैरे : महोदय, असम में जो कुछ हुआ, हम उसकी निन्दा करते हैं।…( व्यवधान)महराष्ट्र में वैसा कुछ नहीं हुआ, जैसा असम में हुआ है। महाराष्ट्र में तो सिर्फ प्रतक्रिया हुई है, बाकी कुछ नहीं हुआ है।

महोदय, रेल मंत्री जी सदन में हैं। रेलवे रिर्क्रुटमेंट द्वारा २० हजार नौकरियां निकाली गईं, जिनमें लाखों लोगों ने एप्लाई किया। इनमें बिहार से ही नहीं, देश के अन्य राज्य के लोगों ने भी एप्लाई किया। मैं मंत्री जी को बताना चाहता हूं कि महाराष्ट्र में शिक्षकों के पद के लिए परीक्षा एक ही दिन में की गई। एक जिले के लोग दूसरे जिले में नहीं गए। मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूं कि रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड सबसे पहले एम्पलायमेंट एक्सचेंज से व्यक्तियों को बुलाए और एग्जामिनेशन पूरे देश में एक ही दिन होना चाहिए, ताकि बिहार के लोग महाराष्ट्र में नहीं और महाराष्ट्र के असम में नहीं जायें। यह सारा झगड़ा भाषावार प्रान्त की रचना के कारण निर्मित हुआ है। मैं कहूंगा कि बिहार के नौजवान बच्चे, जो शक्षित बेरोजगार हैं, वे देश के अन्य राज्यों में इसलिए जाते हैं, क्योकि लालू प्रसाद यादव जी ने राज्य में नौकरियों के साधन निर्मित नहीं किए। अगर उन्होंने रोजोगार निर्मित किए होते, तो ये बच्चे देश के अन्य राज्यों में नहीं जाते। यह राज्य सरकार के फेल्योर होने के कारण ही समस्या पैदा हुई है। मैं कहना चाहता हूं कि रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड को परीक्षायें एक ही दिन करनी चाहिए।

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री स्वामी चिन्मयानन्द ): अध्यक्ष महोदय, यह चर्चा ५ दिसम्बर को प्रारम्भ हुई थी और इस चर्चा का जवाब तो रेल मंत्री जी को देना है, चूंकि वहां वधि-व्यवस्था का भी प्रश्न था, इसलिए मैं हस्तक्षेप कर रहा हूं।

महोदय, जैसा अभी माननीय सदस्या, श्रीमती रेणु कमारी जी, कह रही थीं, पूर्वोत्तर के राज्य हिंसा की द्ृष्टि से कोई नए राज्य नहीं है। सन् १९५१ से लेकर अब तक वहां हिंसा प्राय: होती रही है। एक जनजाति ने दूसरी जनजाति के विरुद्ध हिंसा करती रही है तथा अन्य तरह की हिंसायें भी होती रहती हैं। काश्मीर के बाद अगर कोई संवेदनशील स्थान पूरे देश में कहीं है, तो पूर्वोत्तर राज्य ही हैं। असम के साथ वहां सात अन्य राज्य भी हैं। जिन माननीय सदस्यों ने भावावेश में अपनी बातें कहीं, उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी बात पूरा देश सुनता है और उसे ही प्रामाणिक मानता है, उससे प्रेरणा लेता है और उसे प्रमाण के रूप में उद्धृत भी करता है। मैं आभारी हूं, उन माननीय सदस्यों का जिन्होंने एक बात कही है, जो एक अच्छी बात है, कि हमें भाषावाद से ऊपर उठकर पूरे देश को एक द्ृष्टि से देखना चाहिए। बिहारी, असमी, हिन्दी या अहिन्दी - इस तरह का कोई भेदभाव हमें स्वीकार नहीं करना चाहिए और यह राष्ट्र की एकता की द्ृष्टि से उचित भी नहीं है।

अध्यक्ष जी, केवल गुवाहटी में नहीं असम में करीब १२ स्थानों में भर्ती हो रही थी, गुवाहटी, बोगाईगांव, कोकराझार, तिनसुखिया, डिब्रूगढ़, शिबसागर, जोरहाट, नौगांव, नॉर्थ लखीमपुर, सोनिकपुर, कच्छार और करीमगंज। महोदय, सब जगह हिंसा नहीं हुई बल्कि शुरु में जो घटना हुई वह गुवाहटी में ही हुई थी। वह गुवाहटी के अलावा दूसरे स्थानों पर नहीं हुई थी।…( व्यवधान)मैं पहले दिन की बात कर रहा हूं जो बिहारियों के साथ हुआ। मैं जो बोल रहा हूं उसे सुनने के बाद बोलेंगे तो अच्छा होगा। मैं आपकी बात पूरी तरह सुन कर बोल रहा हूं।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, प्रेस दीर्घा में कोई नहीं है।

अध्यक्ष महोदय: आप उनकी बात सुनो। इसकी जरूरत नहीं है।

श्री स्वामी चिन्यमयानन्द:मैं आपको सुना रहा हूं। प्रेस को सुना भी नहीं रहा हूं।

अध्यक्ष महोदय, वह घटना इतनी सामान्य थी लेकिन एक बात समझ नहीं आती कि जब वहां इतनी बड़ी संख्या में बाहर से लोग जा रहे थे तो उनकी इस तादाद को देखते हुए कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए थी कि इस प्रकार की घटना हो तो उसे तत्काल रोका जा सके।

हमारे कुछ मित्रों ने बार-बार केन्द्रीय सुरक्षा बलों की बात कही है। मैं उनसे निवेदन करना चाहता हूं कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों की मांग सार्वनिक रूप से करते हैं, मैंने यह बात माननीय मुख्यमंत्री गोगोई साहब से और वहां के सभी पुलिस अधिकारियों, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक की उपस्थिति में की थी। सभी ने माना था कि यह सही है। जब कहीं घटना होती है तो हम केन्द्रीय सुरक्षा बलों की बात करते हैं तब कहीं न कहीं यह संदेश देते हैं कि प्रदेश में अगर शांति स्थापित हो सकती है तो केवल केन्द्रीय सुरक्षा बलों से हो सकती है, प्रदेश की पुलिस इसमें सक्षम नहीं है। यह संदेश बड़ा गलत जा रहा है। मैं माननीय सदस्यों से निवेदन करना चाहता हूं कि आपसी चर्चा में और अधिकारियों के साथ चर्चा में यह बात अवश्य करें लेकिन प्रेस और पब्लिक में यह बात बार-बार कहेंगे, जैसे कोई घटना होगी, हमारे पास केन्द्रीय सुरक्षा बल नहीं, इसलिए हम कुछ नहीं कर सके, तब आप एक बात और भी कह रहे हैं कि हमारे यहां पुलिस व्यवस्था इस लायक नहीं कि जिस पर भरोसा किया जा सके, आप इस पर क्या कहना चाहते हैं? यह घटना हुई। मैं जब बोगाईगांव गया जो एक औद्योगिक शहर है, वहां ओएनजीसी का बहुत बड़ा प्लांट है, रेलवे का बहुत बड़ा केन्द्र है, जहां कुली लोग रहते हैं, जब मैं वहां गया तो मेरे साथ प्रदेश के गृह राज्य मंत्री, प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और कई विधायक भी थे। उन सब की उपस्थिति में वहां के लोगों ने हाथ खड़े कर दिए कि हमें केन्द्रीय सुरक्षा बल पर भरोसा है, प्रदेश की पुलिस पर कोई भरोसा नहीं है। यह बड़ी गलत बात है। अगर इस तरह विश्वास बनेगा और लोगों में यह बात बैठ जाएगी, उसका एक कारण है, हमारे एक मित्र ने उसका जिक्र किया, शायद नखिल चौधरी जी ने उल्लेख किया, यह सच है कि वहां दो मलिटैंट्स मोटर साइकिल से गए थे, एक चला रहा था, इस प्रकार तीन थे, उनके पास एके-४७ था लेकिन वहां जो पुलिस तैनात थी, उनमें से ९ के पास राइफल्स और एक के पास कारबाइन थी, जरा सा भी प्रोटैस्ट नहीं किया और मौके से एस्केप कर गए और उन लोगों ने ६ लोगों को, जिन में से मारे जाने वालों में दो महिलाएं हैं, बच्चे हैं, मुस्लिम हैं, वे अचानक इस भर्ती के लिए नहीं गए थे, वे वहां बरसों से रह रहे थे और वह वही जगह है जहां सन् २००० में घटना घटी थी और उसमें १९ लोग मारे गए थे। वहां से केवल १० मिनट की दूरी पर केन्द्रीय सुरक्षा बल मौजूद था। जो यह कहा जा रहा है कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों के अभाव में ये घटनाएं घट रही थीं, अगर दस मिनट की दूरी पर केन्द्रीय सुरक्षा बल थे तो उस संवेदनशील जगह पर उन्हें लगाया जाना चाहिए था। केन्द्रीय सुरक्षा बल किसी स्थायी नियुक्ति के लिए नहीं जाते हैं। इनकी अस्थायी नियुक्तियां होती हैं और मोबाइल होते हैं। जहां जरूरत होती है वहां उनको भेज दिया जाता है। यह थाने से अटैच नहीं होते, वे कहीं भी भेजे जा सकते हैं। आश्चर्य इस बात पर है। जब वहां के लोगों ने यह बात बतायी तब वहां के होम सैक्रेटरी ने खड़े होकर कहा कि मैंने उन लोगों को, पुलिस कर्मियों को पकड़वा लिया है और उन्हें जेल में डाल दिया है। उन्होंने एक तरह स्वीकार किया कि ऐसा होता है।

मैं निवेदन कर रहा था कि केन्द्र सुरक्षा बलों के बारे में हमारे बहुत से मित्र बोल रहे थे। ऐसा कहने की जरूरत नहीं है। आंकड़ों के अनुसार १२३ कम्पनियां सीआरपीएफ की हैं जिनमें १० कम्पनीज स्थायी सेवा में थीं। इसके अलावा २३ बटालियन थल सेना की थीं। असम में आर्मी को बुलाने के लिये प्री-परमिशन की जरूरत नहीं है। जब चाहे, उन्हें बुलाया जा सकता है। एक बटालियन असम राइफल्स की थी। इसके अलावा भारत सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिये प्रदेश सरकारों को यह निर्देश दिया हुआ है कि वे सामान्य पुलिस से हटकर अपनी रिजर्व बटालियन (आरबीआई) बना सकती हैं। असम सरकार को ऐसी ६ बटालियनें बनाने की स्वीकृति प्रदान की गई जिसमें ४ बटालियन बन गई हैं जिसका खर्चा भारत सरकार वहन करेगी। अब सवाल उठता है कि ९ तारीख को एक घटना हुई, उसे देखते हुये जगह जगह बटालियन डैप्लाय करनी चाहिये थी लेकिन इसमें कहीं न कहीं भूल हुई है। हत्या की पहली घटना जब हुई…( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : भूल किसकी हुई?

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : अब आप समझ लीजिये की किसकी भूल हुई है। पुलिस बल की तैनाती का काम केन्द्र सरकार का नहीं होता। जब पहली घटना १७ तारीख को हुई जब तिनसुकिया की किटप्लाई कॉलोनी में एक बिहारी की मृत्यु हुई। रेलवे भर्ती का जो कार्यक्रम था, उसके तहत पहली घटना बिहार में ११-१२ तारीख को हुई। इस घटना को देखते हुये भी केन्द्रीय बलों को री-डैप्लाय करना चाहिये था लेकिन उसमें कमी रही। उसका परिणाम यह हुआ कि स्थिति नियंत्रण से बाहर चली गई तब जाकर राज्य सरकार सक्रिय हुई।

अध्यक्ष महोदय, मैं सब से पहले असम और बिहार के महामहिम राज्यपाल को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन दोनों ने १९ तारीख को शान्ति स्थापित करने के लिये पहल की। दोनों ने संयुक्त रूप से अखबारों के द्वारा अपील की कि अहिंसा को बचाइये और राष्ट्रीय एकता के लिये काम करें। इतना ही नहीं, असम की छात्र यूनिय़ऩassuऩे १७ तारीख को बंद का कॉल दिया जिसके कारण उत्तेजना पैदा हुई। उन्हें बुलाकर बंद वापस लेने के लिये कहा कि यह देश हित में नहीं है। छात्र यूनियन ने राज्यपाल महोदय का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। वे बंद और आन्दोलन से अलग हो गये। अगर उसी समय राज्यपाल महोदय ने अपील की थी, यदि राज्य सरकार भी अपील करती तो शायद अच्छा प्रभाव होता। मैंने जब वाराणसी में १९ तारीख को यह समाचार सुना…( व्यवधान)

SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): Do you mean to say that that was not done?

श्री स्वामी चिन्मयानन्द:मैं १९ तारीख की बात कर रहा था। यह बाद में मालूम हुआ, पहले नहीं हुआ। जब १९ को यह घटना होती है तब दोनों राज्यपालों की अपील होती है, वे असम यूनियन के छात्रों को बुलाकर बात करते हैं, स्थिति नियंत्रण में आ जाती है लेकिन अचानक तिनसुकिया में जहां बिहारी लोग ज्यादा से ज्यादा रहते हैं, वहां यह घटना हो जाती है। आश्चर्य की बात है कि जो लोग मारे गये, वे किसी के मुलाजिम नहीं हैं, सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, वे लोग ईंट भट्टे पर काम करने वाले मजदूर हैं। जो अस्थाई रूप से वहां जाते हैं और तीन-चार महीने अपना रोज़गार करके वापस आ जाते हैं। इसी तरह से ट्रक ड्राइवर मारे गए जो ट्रक लेकर वहां जाते हैं और वापस आ जाते हैं। इसी तरह से जो पटरी पर दुकान लगाने वाले लोग थे, वे लोग मारे गए, उनकी झोंपड़ियां जलाई गईं। अभी रघुवंश जी पूछ रहे थे कल कितने लोगों की जान-माल की क्षति हुई है।

अध्यक्ष महोदय : चिन्मयानन्द जी, आपको कितना समय लगेगा?

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : दस मिनट का समय मुझे चाहिए।

श्री प्रभुनाथ सिंह : एक दो बातों पर हमें भी जानकारी लेनी है माननीय गृह राज्य मंत्री जी से। …( व्यवधान)

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : जो सूचना हमें मिली है, उसके अनुसार ५३ लोगों की हत्या हुई है।

श्री प्रभुनाथ सिंह : वह तो रिकार्ड में है। वहां ३०० लोग मारे गए हैं।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : मैं वही जानकारी दूँगा जो असम सरकार ने हमें दी है।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : कितने लोग मारे गए, आपको जानकारी नहीं है, हमें जानकारी है। …( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : घायलों की संख्या कितनी है?

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : जो ९ तारीख को घटना हुई, उसके तत्काल बाद की संख्या मैं बता रहा हूँ। अब और पहले की बात छेड़ेंगे तो …( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : पहले की नहीं, ९ तारीख के बाद की बात कर रहा हूँ। …( व्यवधान)

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : जो सूचना हमने मंगाई है असम के अधिकारियों से तुरंत बात करके मंगाई है। यह लेटैस्ट जानकारी है।

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, आप केवल आसन को संबोधित करें।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : ५३ लोगों की हत्या हुई, २८५ लोग घायल हुए। जलाए गए क्षतिग्रस्त मकान ६१९ हैं। लूटे गए मकान १५९ हैं। कितनी क्षति हुई है, उसका आकलन करने के लिए मैंने प्रदेश सरकार से आग्रह किया है। अभी उन्होंने जानकारी नहीं दी है। इसके साथ वहां जो लोग उन परिस्थितियों में, जब वहां हिंसा का वातावरण था, असुरक्षित देखकर जो भट्टे पर काम कर रहे थे, फुटकर गांवों में रहते थे, उनको शविरों में बुला लिया गया और १५ राहत शविर लगाए गए जिसमें ४७४० लोग आए। मैं २२ तारीख को वहां गया था। १९ नवंबर को मेरी बात माननीय मुख्य मंत्री श्री तरुण गगोई से और महामहिम राज्यपाल श्री अजय सिंह से हुई। उन्होंने जो स्थिति बताई, उसको हिसाब में रखकर मैंने माननीय उप प्रधान मंत्री जी से निवेदन किया कि मुझे वहां जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जाइए। जब मैंने वहां के मुख्य सचिव और पुलिस अधिकारियों से अनुरोध किया कि मैं आना चाहता हूँ तो उन्होंने कहा कि अभी स्थिति सामान्य नहीं है और आपके यहां आने से सुरक्षा बलों को लगाने में दिक्कत होगी। फिर भी मैंने कहा कि दो-एक दिन के अंतर से आता हूँ। मैं २२ तारीख को वहां गया। मेरे साथ पूर्वोत्तर राज्यों के विकास मंत्री माननीय सी.पी.ठाकुर भी थे। मैं बोंगई गांव गया, डिब्रूगढ़ गया, तिनसुकिया गया, धुलियाजान गया। मैंने निवेदन किया कि जहां भी जाऊं, वहां के स्थानीय प्रतनधि यदि साथ में रहें तो अच्छा है। आदरणीय पवन सिंह घाटोवार जी हमारे साथ तिनसुकिया में रहे। पवन सिंह जी ने एक बात वहां तिनसुकिया में कही कि इसका माहौल तो महीनों पहले से बनाने की कोशिश थी और इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि उल्फा ऐसे मौके की तलाश में था क्योंकि वह आइसोलेट हो चुका था। पिछले तीन वर्षों में उनको कोई मौका नहीं मिला था कि कुछ कर पाएं और जन विश्वास उनसे अलग हो गया था। वे ऐसे मौके की तलाश में थे। मुझे लगता है कि उन्होंने इस मौका का फायदा उठाने की योजना बहुत पहले से बनाई। इसी समय वहां म्युनसिपल बोर्ड के चुनाव चल रहे थे। चुनावों के कारण भी एक टैन्शन था। पूरे प्रदेश में चुनाव चल रहे थे। चुनाव के चलते तनाव था चूंकि सरकारी मशीनरी चुनावों की तैयारी में लगी हुई थी और वहां की हिंसक गतवधियों को देखते हुए चुनाव भी एक चुनौती होती है, चुनाव शांतिपूर्ण कराना भी एक चुनौती होती है। इसमें सुरक्षा बल लगे हुए थे। इस मौके का फायदा उल्फा ने उठाया। जो हमें सूचना है, ५३ लोगों में से करीब ४० लोग उल्फाइयों द्वारा मारे गए थे। इसलिए यह कहना कि स्थानीय लोगों के विरोध के कारण ऐसा हुआ, मुझे ऐसा नहीं लगता कि स्थानीय लोग बिहारियों का विरोध कर रहे थे। वहां जितनी फैक्टि्रयां हैं, उनके मालिक आए थे। उन्होंने कहा कि हमें सुरक्षा चाहिए और सुरक्षा इसलिए चाहिए कि हमारे यहां २७ नवंबर को राकेट लांचर गिरे हैं। हमारे मैनेजर इस्तीफा दे रहे हैं और हम फैक्ट्री बंद करने जा रहे हैं। हिन्दुस्तान लीवर की फैक्ट्री में एक लाख लोग काम कर रहे हैं।

महोदय, अगर वे अपनी फैक्ट्री बन्द कर देंगे, तो एक लाख लोग बेरोजगार हो जाएंगे। मैं यह कहना चाहता हूं कि रेलवे के कानून का सवाल अलग है, लेकिन वहां के स्थानीय लोग अगर इस तरह की असुरक्षा का वातावरण बनाएंगे, तो नई नौकरियों को तो छोड़ दीजिए, जो एम्पलाइड हैं, वे भी अनएम्पलाइड हो जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि वहां सुरक्षा का वातावरण बनाया जाए।

महोदय, भारत सरकार ने पुलिस रिफॉम्र्स के लिए, पुलिस मॉडर्नाइजेशन के लिए पहल की है। यद्यपि यह प्रक्रिया १९७० से प्रारम्भ हुई, लेकिन तब से वर्ष १९९९ तक केवल ५३६ करोड़ रुपए सभी प्रदेशों को दिए हैं, परन्तु वर्ष १९९९ के बाद प्रति वर्ष सभी प्रदेशों को एक हजार करोड़ रुपए दिए जा रहे हैं। पुलिस का मॉजर्नाइजेशन हो, उनके पास अच्छे हथियार हों, अच्छे वाहन हों और कम्युनिकेशन का सिस्टम अच्छा होना चाहिए। क्राइम रिकॉर्ड कम्प्यूटर में होने चाहिए। इन सबमें सुधार हेतु यह धन व्यय किया जा रहा है।

महोदय, मैं इस बात को कहना नहीं चाहता था, लेकिन कहने के लिए विवश हूं। इस धन में से एक राज्य सरकार ने हमसे पूछा कि चूंकि हमारे यहां सड़कों का विकास नहीं हुआ है इसलिए हमें हैलीकॉप्टर खरीदने की मंजूरी दी जाए ताकि अपराधों पर नियंत्रण हैलीकॉप्टर से कर सकें। हम इंसर्जेंसी से निपटना चाहते हैं। …( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : सर, वह कौन सा प्रान्त है, वह बताइए। अगर आप नाम नहीं बताएंगे, तो हमें कैसे पता चलेगा?

श्री स्वामी चिन्मयानन्द:मेरी आदत नहीं है। मैं वह नहीं बताना चाहता हूं।

महोदय, असम और नॉर्थ ईस्ट अलग-अलग जनजातियों का प्रदेश है। उन जनजातियों के सम्मान की उपेक्षा हुई है। एक बहुत बड़ी घटना हुई है, लेकिन उसकी चर्चा किसी ने नहीं की। कोकराझार भी इस भर्ती की जगह थी। वहां २६२३ अपराधी उग्रवादियों ने इसी माह की ६ दिसम्बर को हथियार डाले हैं। उन हथियारों में एके ४७ और एके ५६ राइफलें और राकेट लांचर थे। भारत सरकार ने, असम सरकार ने उन सबसे वायदा किया है कि उन्हें सी.आर.पी.एफ. में, केन्द्र सरकार के अन्य संगठनों और पुलिस में भर्ती हेतु अवसर प्रदान किए जाएंगे। इसकी चर्चा होनी चाहिए थी। सभी समाचारपत्रों में उसका उल्लेख हुआ था, लेकिन यहां किसी ने उसकी चर्चा नहीं की।

महोदय, त्रिपुरा में भी करीब दो ग्रुपों ने सरेंडर किया है। हमने एक आहवान किया, माननीय उप प्रधान मंत्री जी ७ दिसम्बर, २००३ को कोकराझार में ही थे, उन्होंने आहवान किया है कि यदि हम बोड़ो जनजातियों को अधिकार दे सकते हैं, तो इन्हें क्यों नहीं दिए जा सकते। ये वे जातियां हैं, जो १९९३ से भटक रही थीं, १० साल से लड़ाई लड़ रही थीं, इन्हें अभी तक सुना नहीं गया। इन्हें अब सुना गया। उन्होंने आज समर्पण किया है, तो आज वहां भाव बन रहा है, विचार बन रहा है। प्रधान मंत्री जी ने नॉर्थ ईस्ट का एक अलग मंत्रालय बनाकर, विकास के जो कार्यक्रम शुरू किए हैं, उनके अनुसार प्रत्येक मंत्रालय से अनुरोध किया गया है कि वे अपने बजट का १० प्रतिशत भाग नॉर्थ ईस्ट पर खर्च करें। यदि वह पैसा खर्च नहीं होगा, तो वह लैप्स नहीं होगा। वह नॉन लैप्सेबल होगा और उस एकाउंट में जमा रहेगा। रोजगार क्रिएट करने की कोशिश की जा रही है। जनजातियों की अपनी पहचान, जनजातियों की अपनी आईडेंटिटी समाप्त न हो जाए, यह चिन्ता उनमें है। इसलिए मैं समझता हूं कि पूर्वोत्तर राज्यों में जो हिन्सा चल रही है, उसे केवल एक द्ृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।

महोदय, एक बात जिसका उल्लेख माननीय कुंवर अखिलेश सिंह जी ने किया था, पूर्वोत्तर राज्यों की जनसंख्या कुछ अजीब किस्म की है। वहां पड़ौसी देशों से भारी संख्या में लोग आ रहे हैं। एक बिल आई.एम.जी.टी. इस सदन के सामने है। यदि उसे बहाल कर दिया जाए, तो भारत में या असम में कहीं भी घुसपैठ कर के जो लोग आते हैं, उन्हें निकालने का रास्ता साफ हो जाएगा। वह बिल स्थाई संसदीय समति के पास विचारार्थ लंबित है। माननीय आचार्य जी बैठे हैं। ३ लाख ६५ हजार केसेस असम में विदेशियों के रजिस्टर्ड किए गए हैं, लेकिन वर्तमान एक्ट के मुताबिक काम करने के कारण केवल १५०१ लोगों को ही वापस भेजा जा सका है। यदि यह एक्ट पारित हो जाए, तो बंगाल से ४ लाख लोगों को वापस भेजा जाना सम्भव हो सकेगा, लेकिन वह तब जब आई.एम.डी.टी. लागू हो, अभी लागू नहीं होता है।

इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि अगर यह लागू हो जाता है तो जो बंगलादेश से आए हुए लोग हैं और वे हर रोजी एवं रोजगार पर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं, उन्हें रोका जा सकेगा। जब उनकी ७० लाख की आबादी देश से बाहर हो जाएगी तो असम के लोगों को अधिकार मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। इसलिए आईएमडीटी रिपील होनी चाहिए।

महोदय, अंत में मैं यह निवेदन कर रहा हूं कि असम की हिंसा को जातीय हिंसा की संज्ञा देकर हम बड़ी गलती कर रहे हैं। हमें यह मान कर चलना चाहिए कि कहीं न कहीं इसमें सुधार की आवश्यकता है और हम निश्चित ही जिस तरह आगे बढ़ रहे हैं, उसमें सुधार करने में कामयाब होंगे। आज असम में हिंसा का आलम नहीं है, हिंसा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। दहशत एवं डर है, लेकिन आर्मी के वापस चले जाने के बाद भी वहां हिंसा की कोई वारदात नहीं हो रही है। मैं इसके लिए असम सरकार और सुरक्षा बलों को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने बहुत कम समय में वहां पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है और असम को सफल बनाने में सफल हुए।

   

अध्यक्ष महोदय : हमारे रूल्स के मुताबिक मंत्री जी का उत्तर होने के बाद चर्चा समाप्त होती है, लेकिन अभी तक जो मेन उत्तर है वह यहां नहीं आया है। मैं नीतीश कुमार जी का उत्तर सुनूंगा।

…( व्यवधान)अध्यक्ष महोदय : डिबेट पूरी होने के बाद मैं एज़ एक्सेप्शन एक-दो सदस्यों को बोलने की इज़ाजत दूंगा।

…( व्यवधान)श्री राम विलास पासवान:महोदय, रेल मंत्री जी की बात से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : क्यों नहीं होगा, पूरा समाधान होगा।

...( व्यवधान)MR. SPEAKER: After the debate is over, I will allow you.

… (Interruptions)

SHRI BASU DEB ACHARIA : This discussion is regarding recent incidents of violence in Assam and some other parts of the country. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: Please sit down.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदय : मैं उस समय परमीशन दूंगा, अभी नहीं दूंगा। आप आखिर तक बैठिए, मैं आपको प्रश्न पूछने की इजाजत दूंगा। कृपया बैठ जाइए।

…( व्यवधान)श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, इन्होंने महाराष्ट्र और गुजरात के बारे में कुछ नहीं बोला है। महाराष्ट्र, आंध्रा और झारखंड पर इश्यु था, उसमें इन्होंने कुछ नहीं बोला है।…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान:महोदय, मंत्री जी ने कोई जवाब ही नहीं दिया। महाराष्ट्र की बात को छोड़ दीजिए, हम लोगों ने दो प्रश्न उठाए थे, हमने कहा था कि केन्द्र सरकार क्या सहायता दे रही है, जो लोग मारे गए हैं। दूसरा, हम लोगों ने कहा था कि आप प्रधानमंत्री जी से आग्रह करें कि नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल की बैठक बुलाएं। ये दो मुद्दे हैं। सिर्फ पोस्ट-मार्टम कर देने से समस्या का निदान नहीं होगा।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी आपके प्रश्नों का उत्तर देंगे, पहले आप नीतीश कुमार जी की बात को सुन लीजिए। कृपया अभी आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)अध्यक्ष महोदय : मुझे सदन की व्यवस्था देखने दें।

…( व्यवधान) श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष महोदय, हम भी मंत्री जी के जवाब के बाद प्रश्न पूछेंगे।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : आपको ब्रीफ में प्रश्न पूछना पड़ेगा, कोई बड़ा प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं।

श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, हम केवल एक सवाल पूछेंगे।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : मैं एक सवाल पूछने के लिए इजाजत दूंगा, क्योंकि ऐसे विषय पर ज्यादा प्रश्न नहीं पूछे जात हैं। सच कहूं तो प्रश्न की इजाजत भी नहीं होती है।

…( व्यवधान)श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : हम भी प्रश्न पूछेंगे।

अध्यक्ष महोदय : आप भी एक प्रश्न पूछ सकते हैं।

रेल मंत्री (श्री नीतीश कुमार) : अध्यक्ष महोदय, मैं सब माननीय सदस्यों को धन्यवाद देता हूं कि इन्होंने एक गंभीर विषय पर अपने विचार रखे हैं। मैं एक निवेदन भी करना चाहता हूं, मैंने सब माननीय सदस्यों के विचार ध्यानपूर्वक सुने हैं। जब रेलवे रिक्रुटमेंट पालिसी पर चर्चा हुई है, इस चर्चा को सार्थक बनाने के लिए, उसके संबंध में कुछ बातों को उजागर करना, स्पष्टता के साथ रखना आवश्यक होगा, इससे मन में जो कई प्रकार की गलतफहमियां हुई हैं, वे दूर हो जाएंगी, अगर ध्यानपूर्वक मेरी बातों को सुन लेंगे। अगर उसके बाद भी कोई विषय रह जाएगा, अध्यक्ष महोदय मुझे इजाजत देंगे तो मैं रेलवे रिक्रुटमेंट पालिसी के संबंध में उत्तर देने के लिए उपस्थित रहूंगा, उस समय बोलूंगा। अगर ध्यानपूर्वक सुन लेंगे। अगर कोई विषय उसके बाद भी अनुत्तरित रह जाये तो अध्यक्ष महोदय इजाजत देंगे तो रेलवे रिक्रूटमेंट पालिसी के सम्बन्ध में उत्तर देने के लिए मैं यहां उपस्थित रहूंगा। लेकिन रेलवे रिक्रूटमेंट पालिसी विषय यहां रखा गया। जो वायलेंस हुई है, रेलवे रिक्रूटमेंट पालिसी के चलते हुई है, मैं नहीं मानता हूं कि कोई रेलवे रिक्रूटमेंट पालिसी के चलते वायलेंस हुई है। गृह राज्यमंत्री जी ने वहां की वायलेंस के सम्बन्ध में, वहां की परिस्थिति के सम्बन्ध में कुछ बातें रखी हैं। बाद में भी शायद जब प्रश्नों के ऊत्तर में और खुलासा करेंगे।

मैं भी रेल मंत्री के नाते सबसे पहले तो जहां-कहीं भी हिंसा हुई, उसकी निन्दा करना चाहता हूं और अगर जाने-अनजाने रेलवे कहीं इसमें शामिल हो गई है तो आज उसके बारे में सफाई देना आवश्यक हो गया है। रेलवे रिक्रूटमेंट पालिसी के बारे में कई सदस्यों ने कुछ बातें रखी हैं। मैं संक्षेप में रेलवे में रिक्रूटमेंट होता कैसे है, उसके बारे में बता देना आवश्यक समझता हूं। रेलवे में ग्रुप ए है, ग्रुप बी है, ग्रुप सी है और ग्रुप डी है, चार प्रकार की नौकरियों के ग्रुप हैं। ग्रुप ए की नौकरी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के माध्यम से मिलती है। ग्रुप बी की नौकरी प्रोन्नति से मिलती है। ग्रुप सी की नौकरी रेलवे भर्ती बोर्ड के माध्यम से शुरू से होती रही है। ग्रुप डी की नौकरी हमने रेलवे भर्ती बोर्ड को सौंपी। अगर कोई पॉलिसी हमारे कार्यकाल में आई है तो उस पालिसी को आप कह सकते हैं कि ग्रुप डी की भर्ती रेलवे भर्ती बोर्डों को, उसके चयन की प्रक्रिया को सौंपा गया। अगर उस पालिसी के और आगे जाएंगे तो उसमें कुछ प्रक्रिया अपनाई गई। अगर कोई नई पालिसी है तो यही है। इसके अलावा जो कुछ भी है, वह पुराना है, उसमें कोई विवाद नहीं है, वह वर्षों से चली आ रही प्रक्रिया है। माननीय सदस्यों ने ग्रुप सी और ग्रुप डी को लिंक करके देखा है। हम उनसे आग्रह करेंगे कि दोनों को डीलिंक करिये, तब हम किसी नतीजे पर पहुंचेंगे।

ग्रुप सी की भर्ती पहले से ही रेलवे भर्ती बोर्ड के माध्यम से हो रही थी। ग्रुप डी की भर्ती किसी जमाने में हुआ करती थी, लोग कैजुअल लेबर के तौर पर टैम्पोरेरी तौर पर लोगों को रखते थे। शुरू में कैजुअल लेबर होते थे, कुछ दिन के बाद उनका टैम्पोरेरी स्टेटस होता था, बहुत बाद में उनका रैगुलराइजेशन होता था। यह प्रक्रिया चलती रही। कुछ लोगों को सीधी भर्ती में लोकल लेवल पर भर लिया जाता था या कम्पेंशनेट एपाइंटमेंट होते थे, शुरू से यही सिलसिला चल रहा था। बाद में कैजुअल लेबर जितनी थी, उसे सरकार ने रैगुलराइज कर दिया, शायद १९९६-९७ में, यहां उस समय के, तत्कालीन रेल मंत्री जी बैठे हुए हैं और सरकार ने एक निर्णय ले लिया कि अब हम कैजुअल लेबर बहाल नहीं करेंगे। यानी अब जो भी बहाली करेंगे, स्थायी तौर पर बहाली करेंगे, यह फैसला हो गया। इसके बाद कोई बड़े पैमाने पर एडवरटाइजमेंट निकालकर बहाली नहीं हो पा रही थी, यह परिस्थिति जान लें। कम्पेंशनेट ग्राउंड पर एपाइंटमेंट हो रहे थे। जनरल मैनेजर अपनी पावर से जैसा पायें, वैसा रख ले रहे थे, लेकिन उसकी कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही थी। जब कहा गया कि जोनल रेलवे भर्ती करती थी या जी.एम. को यह अधिकार था कि कोई जनरल मैनेजर एडवरटाइजमेंट निकालकर भर्ती नहीं कर पाता था। इस बीच सन १९९८ में डी.ओ.पी.टी. ने, जो इसके लिए नोडल मनिस्ट्री है कि भारत सरकार में नियुक्ति किस प्रकार से हो, उसके बारे में तय करने का अधिकार उसे है। उन्होंने एक सर्कुलर निकाला। मैं उसका उद्धरण देना चाहता हूं, क्योंकि बार-बार यह चर्चा आई है कि पहले एम्पलायमेंट एक्सचेंज में होता था, उसे बन्द कर दिया, मैंने कोई गुनाह कर दिया।I would like to cite an example of an Office Memorandum dated 18 May 1998 issued by the Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions, Department of Personnel and Training, New Delhi. Its subject was : "Recruitment of staff through employment exchange"

पहले पैराग्राफ में यह बताया गया है कि एम्पलायमेंट एक्सचेंज में क्या-क्या होता था। दूसरे पैराग्राफ को आज की परिस्थिति में मैं आपकी अनुमति से उद्धृत करना मुनासिब समझता हूं।
"The scheme of employment exchange procedure came under the judicial scrutiny of Supreme Court in the matter of Excise Superintendent, Malkapatnam, Krishna District, Andhra Pradesh Vs K. B. N. Vishveshwar Rao and others 1996 (6)/676…   The Supreme Court, inter alia, directed as follows:
"""""""""It should be mandatory for the requisitioning authority/establishment to intimate the Employment Exchange, and Employment Exchange should sponsor the names of the candidates to the requisitioning department by selection strictly according to seniority and reservation as per requisition. In addition, the appropriate department or undertaking or establishment, who call for the names by publication in newspapers having wider circulation and also displaying on their office notice boards or announce on radio, television and employment news bulletins and then consider cases of all candidates who have applied."""""""" "
 

 इम्प्लायमैंट एक्सचेंज से नाम लो, वाइडर पब्लिसिटी दो। जो भी नाम आये, उन सब पर एक साथ विचार करो। यह मई १९९८ का आफिस मेमोरेंडम है। जो सारे मंत्रालयों में गया है। स्वाभाविक है कि वह रेलवे में भी आया क्योंकि रेलवे भारत सरकार का एक विभाग है। भारत सरकार का मंत्रालय होने के नाते यहां केन्द्र सरकार की नौकरियां हैं। इसके ऊपर वही नियम लागू होते हैं, वही अनुदेश लागू होते हैं जो डीओपीटी निर्गत करता है। यह पूरी की पूरी परिस्थिति बदल गयी। प्री १९९८ इम्प्लायमैंट एक्सचेंज का यह प्रावधान था। इसके बाद हम अपनी प्रतक्रिया देंगे। आखिरकार हम लोग इम्प्लायमैंट एक्सचेंज की चर्चा कर रहे हैं। कितने नाम इम्प्लायमैंट एक्सचेंज से आये और वह कब आये ?इम्प्लायमैंट एक्सचेंज जो भेजता था, वह कोई सीक्रेट काऊ नहीं था कि वहां से जो नाम आया, वह बड़े अच्छे ढंग से आ गया। वभिन्न मंत्रालयों को हजार तरह की शिकायतें मिलती रही हैं। यह उसका विषय न होकर हमारा विषय है। मैं उस विवाद में नहीं पड़ना चाहता।

मई १९९८ की इस गाइडलाइन के बाद रेलवे ने ऐकॉर्डिंगली इंस्ट्रक्शन्स इश्यू किये। अब यह इर्रिस्पैक्टिव ऑफ पे स्केल है। यह आर्डर ऐसा है, जिस भी डिपार्टमैंट को, उपक्रम को बहाली करनी है, कहीं भी करनी है तो उनको हर हालत में बड़े पैमाने पर पब्लिसिटी देनी है। यह ऑल इंडिया रिक्रूटमैंट नहीं है। अगर डिवीजन से भी कोई नौकरी के लिए निकालेगा, अगर रंगिया डिवीजन की नौकरी के बारे में निकलेगा तो जो भी एजेंसी हम रिक्रूटमैंट की बनायेंगे, मैंने रेल भर्ती बोर्ड को बनाया, अगर आप रेल भर्ती बोर्ड को भूल जाइये, जोनल रेलवे की तरफ से कोई एडवरटाइजमैंट निकलेगा या डिवीजन की तरफ से, वह नयी प्रक्रिया है, लेकिन एक मिनट के लिए कल्पना कर लीजिए कि अगर डिवीजन को यह अधिकार दे दिया जाये और डिवीजन अगर नौकरी निकालेगा तो उसको इसका एडवरटाइजमैंट सब जगह देना पड़ेगा और सारी एप्लीकेशन्स पर एक साथ मैरिट पर विचार करना पड़ेगा। यह लॉ ऑफ दी लैंड है। इस बात की चर्चा मैंने अनेकों बार की है।

मैं रंगिया डिवीजन के उद्घाटन के अवसर पर असम गया था। मुझे मालूम हुआ, हमारी पार्टी के एक विधायक ने हमें बताया कि आपके बारे में असम की विधान सभा में क्या-क्या कहा गया। मैं उसका उल्लेख यहां नहीं करना चाहता क्योंकि वह अलग सदन है। मेरे बारे में बताया गया कि वहां के एक मनिस्टर ने हमारे ऊपर यह आरोप लगाया कि जब हम शिष्टमंडल के साथ उनसे मिलने गये तो रेल मंत्री जी ने मेरे साथ बदसलूकी की। मैंने जिंदगी में किसी के साथ बदसलूकी नहीं की। उसकी कोई आवश्यकता भी नही और करनी भी नहीं चाहिए। अपने घर पर कोई मिलने के लिए आये तो उसके साथ हम बदसलूकी करेंगे ? उस समय दर्जनों लोग थे, हर पार्टी के लोग थे। किसी ने बात छेड़ी तो मैंने यह पोजीशन एक्सप्लेन कर दी। अब आप इसको बदसलूकी कहते हैं तो मान लीजिए कि वह बदसलूकी है। जैसे ही मुझे मालूम हुआ, मैंने रंगिया डिवीजन और दूसरे फंक्शन्स में इसे एक्सप्लेन किया, प्रैस के सामने एक्सप्लेन कर दिया। मुख्यमंत्री जी को एक्सप्लेन कर दिया। इसके बाद भी बात चलती रहती है तो इसमें रेल मंत्री क्या करेगा?यह लॉ ऑफ दी लैंड है। रेल मंत्री ने गलत कर दिया, रेलवे की रिक्रूटमैंट पालिसी खराब है। अगर हमारी कोई पालिसी है तो हमारी पालिसी यही है कि हमने कहा कि ग्रुप डी की भर्ती रेलवे भर्ती बोर्ड से होगी।

अब हमने यह क्यों कहा, इसे भी आप देख लीजिए। हमने इसका ऐलान बजाफ्ता रेल बजट भाषण में किया। मैं इसमें ज्यादा समय नहीं लूंगा लेकिन जब मैंने रेल बजट १९९८-९९ का रखा तब भी हमने इसकी चर्चा की। रेल बजट १९९९-२००० का रखा तब भी हमने इसकी चर्चा की। बजाफ्ता १९९९-२००० में रेलों में ग्रुप डी की भर्ती मेरे भाषण का पैराग्राफ ट्वैल्व है। मैं उद्धृत कर सकता हूं लेकिन उसकी कोई आवश्यकता नहीं है, पढ़ लीजिए। हमने सन् २००२-०३ में रेल बजट का भाषण दिया। उसमें भी पैराग्राफ ५७ में हमने कहा। २००३-०४ में हमने भाषण दिया। उसके पैराग्राफ ६३ में इस विषय पर फिर चर्चा की। यह कोई अचानक नहीं हुआ, हम लगातार इसका उल्लेख कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं? अब देखा जाए। रेलों का यानी ज़ोनल रेलवे, जब हम रेलों बोलते हैं तो इसका मतलब ज़ोनल रेलवे से है। उनको अधिकार था कि नौकरियां निकालिए और भर्ती कीजिए। मेरे पास फिगर्स हैं। आगरा डिवीजन में १९९८-९९ में ग्रुप बी की वेकैन्सीज़ के बारे में, उसकी नियुक्ति के लिए नोटीफिकेशन जारी किया। पैनल २००३ में बना। एक डिवीजन को पैनल तैयार करने में पांच साल लगे।

Kharakpur Division – notification issued in 1998. Physical efficiency test held in June, 2003. Khurda Road – notification issued in 1998, panel not yet announced.

आप जो यहां कह रहे हैं कि डिवीजन को दे दीजिए, रेल को दे दीजिए, यह तो दिया ही हुआ था। पांच-पांच साल में नियुक्ति नहीं हो रही है। कहा गया कि सेफ्टी कैटेगरी की पोस्ट्स खाली हैं। हमने भी पता किया कि सेफ्टी कैटेगरी की कितनी पोस्ट्स खाली हैं। अंदाज के तौर पर निकाला तो पता चला कि २०,००० पोस्ट्स खाली हैं। हमने कहा कि इसे फिर से रेल भर्ती बोर्ड को दे दीजिए। हमने किया था, उसे बीच में रोक दिया गया था। फिर हमने कहा कि इसको जल्दी दे देना चाहिए क्योंकि रेल भर्ती बोर्ड ग्रुप सी की निरंतर भर्ती की कार्यवाही करता रहता है। उसी तरह से ग्रुप डी की करेगा। लाखों की संख्या में आवेदन आते हैं। ज़ोनल रेलवे सक्षम नहीं है। उसको लगता है कि इतने बड़े आवेदन पत्रों को हम कैसे हैंडल करें। हर स्तर पर आरोप लगते हैं। लोग बचना चाहते हैं। लोगों को तरक्की पानी रहती है। लोगों को लगता है कि वजिलैंस इन्क्वारी हो गई, फंस जाएंगे, मुसीबत हो जाएगी। लोग एक-दूसरे पर लगे रहते हैं। इससे अच्छा है कि कुछ मत करो। भर्ती नहीं दी, नतीजा जगह खाली रही। हमने संसद को बता कर कहा कि रेल भर्ती बोर्ड के माध्यम से ग्रुप डी की भर्ती होगी। जब हमने ग्रुप डी का किया तो पता लगाया कि क्या हम स्थानीय स्तर पर आरक्षण दे सकते हैं। अध्यक्ष महोदय, आप इजाजत देंगे तो मैं लीगल ऐडवाइज़र का ओपीनियन कोट कर सकता हूं। उन्होंने कहा कि आप कतई नहीं कर सकते। तब हमने कहा कि हम कैसे कर सकते हैं। तब हमने देखा कि यह केन्द्र सरकार की नौकरियां हैं। परीक्षाएं हिन्दी और अंग्रेजी में ली जा रही हैं। तब हमने फैसला किया कि संविधान की आठवीं अनुसूची में जो भाषाएं शामिल हैं, उन सबमें परीक्षाएं लें। हमारी नौकरी तो डिवीजन स्तर की है। ग्रुप सी और ग्रुप डी की बहाली डिवीजन के स्तर पर हो, वेकैन्सी उनकी है, उनको जिंदंगीभर वही नौकरी करनी होती है। अगर कोई गलत काम न करे तो बाहर ट्रांसफर नहीं की जाती। अगर वे स्वेच्छा से ट्रांसफर लेते हैं तो जाते हैं। किसी डिवीजन में जो भाषाएं बोली जाती हैं, उनमें भी परीक्षा होगी। हमने २००३-०४ के बजट भाषण में इसका ऐलान किया। अब तक रेलवे भर्ती बोर्ड द्वारा की जाने वाली ग्रुप डी की भर्ती के लिए लखित परीक्षा, औब्जैक्टिव टाइप के प्रश्न पत्र हिन्दी और अंग्रेजी में तैयार किए जाने का प्रावधान है। चूंकि ग्रुप डी में भर्ती रेलवे मंडलवार की जाती है, इसलिए अब यह निर्णय लिया गया है कि उस रेलवे मंडल, जिसके लिए भर्ती की जानी है, में संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं में से स्थानीय स्तर पर प्रयुक्त होने वाली भाषा में भी प्रश्न पत्र तैयार किए जाएंगे। इससे सिर्फ ऐसी स्थानीय भाषा जानने वालों को भी रेलवे में ग्रुप डी की नौकरी प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। जो स्थानीय भाषा जानते हैं, उनको फैसीलिटेट करने के लिए हमने २००३-०४ के रेल बजट भाषण में ऐलान किया। यहां भाषा पर बहुत बहस हो गई। यह तो हमने किया, पहले से नहीं था। यह किया तो इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भर्ती नीति गलत है। क्या भर्ती नीति गलत है, मुझे बात समझ में नहीं आती? पारदर्शिता के साथ तेजी से भर्ती हो जाए, अगर यह ख्याल करना गलत है तो मैं उसके बारे में कुछ नहीं कह सकता। रेल भर्ती बोर्ड का निर्णय क्यों लिया। रेल भर्ती बोर्ड चेन्नई ने ३२० पोस्ट्स के लिए सदर्न रेलवे में नोटीफिकेशन १९९९ में ईशू किया। पैनल २००० में बन कर तैयार हो गया। जब पहली बार १९९९-२००० में रेल भर्ती बोर्ड को सौंपा तो कितनी तेजी से सलैक्शन शुरू हो गया। आरआर त्रिवेन्द्रम ने दिसम्बर २००२ में इम्प्लॉयमैंट नोटिस ईशू किया और मई २००३ में पैनल दे दिया। यह रेल भर्ती बोर्ड में तेजी से रिक्रूटमैंट हो रही है। हमको तेजी से रिक्रूटमैंट करनी है।

रिक्रूटमेंट करने के लिए रिक्रूटमेंट भर्ती बोर्ड का माध्यम हमने चुना और बाकी जो नीतियां हैं, वे वहीं हैं। जो यह डीओपीटी का है, १९९८ के पहले जो दिया था, उस पर कोई एतराज की बात नहीं है। अब जब तक ये गाइडलाइन्स हैं, तब तक मेरे हाथ में क्या है, मैंने टाइम विदाउट नम्बर लोगों को एक्सप्लेन किया। रेलवे का कसूर नहीं है। अगर रेलवे का कसूर है तो सिर्फ इतना ही है कि खुले तौर पर हमने ऐलान किया कि हम भर्ती करने वाले हैं। जो रिक्तियां हैं, उनको भरने वाले हैं और २० हजार नहीं, अभी जो चल रहा है, परीक्षाएं जो चल रही हैं, वह १७३४८ पदों के लिए है, एप्लीकेशंस ७२ लाख आए हैं। एलीजिबल एप्लीकेंट्स ५४ लाख पाए गए लेकिन जो एवरेज देखा जाता है, वह ५०-६० प्रतिशत लोग परीक्षाओं में एपिअर होते हैं, लगभग ३० लाख लोग एपियर हुए होंगे। यह परिस्थिति है। रेलवे को धन्यवाद देना चाहिए कि हमने यह सार्वजनिक करके जो देश में अनएम्पलॉयमेंट की स्थिति है, वह आप सबके सामने आ गई। टैकल कीजिए। सब मिलकर टैकल कीजिए। रेलवे को गाली क्यों दे रहे हैं ? प्रधान मंत्री जी ने कहा कि एक करोड़ एम्पलॉयमेंट दो तो सागर में एक बूंद के समान हम एम्पलॉयमेंट ही तो दे रहे हैं और जब दे रहे हैं तो माफ करिए, न दें तो अच्छा है, रोक दिया जाए।

श्री बसुदेव आचार्य : कौन बोल रहा है कि रोक दिया जाए?…( व्यवधान)

श्री नीतीश कुमार : तो फिर क्यों बोल रहे हैं?सागर में एक बूंद के समान ही एम्पलॉयमेंट दिया जा रहा है तो फिर इस पर एतराज क्यों है ?…( व्यवधान)मैं जानना चाहता हूं कि कौन सी भर्ती की नीति हमारी खराब है? जो भर्ती नीति खराब है, उसे स्क्रैप कर दीजिए लेकिन मुझे बहुत पीडा है।…( व्यवधान)

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) :हम असम की हिंसा के बारे में बहस कर सकते हैं। मैं तीन साल से फाइट कर रहा हूं। जो सुप्रीम कोर्ट ने जजमेंट दिया, तीन बैंच ने जजमेंट दिया। इसके पहले भी कई जजमेंट आए हुए हैं। इसी के कारण यह प्रैक्टिकल क्यों नहीं हुआ, यह बात बताइए न।…( व्यवधान)

श्री नीतीश कुमार : सब लोगों ने अपनी बात कह दी है। मैंने आग्रह किया था कि एक बार सुन तो लें। तारतम्य टूटता है। पूरी बात आ जानी चाहिए। अगर बहस कराकर कोई रास्ता निकालना चाहते हैं तो…( व्यवधान)

श्री मोहन रावले : रास्ता निकल जाएगा।…( व्यवधान)लोकल एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज के थ्रू लेना चाहिए। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। दो बैंच के जज ने कहा है कि इसकी रिव्यू पैटीशन होनी चाहिए नहीं तो सर्विस कहां मिलेगी? आचार्य जी, आपने भी कहा था कि लोकल एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज के थ्रू लेना चाहिए नहीं तो नौकरी कहां मिलेगी? …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : देखिए, जब आपको सदन में बोलने का मौका दिया तो आपने भाषण दिए। अभी मंत्री जी का उत्तर शुरू है। मंत्री जी का उत्तर यहां आ जाएगा। इस उत्तर को सुनना हरेक का काम है। बीच में आप क्यों रोकते हैं ? आपको यदि मान्य नहीं है तो दूसरी डिवाइस देकर फिर चर्चा कर सकते हैं।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : नहीं, नहीं, मंत्री जी, आप बोलिए।

श्री नीतीश कुमार : हमने भी बैठकर आपकी बात सुनी है। हाउस को अध्यक्ष महोदय रेगुलेट कर रहे हैं। हम एक-एक बात सुन रहे हैं। सुनने का धैर्य भी आपमें होना चाहिए। लोक सभा में हम लोग सुनने सुनाने आए हैं और काहे के लिए यहां आए हैं ? …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : लोक सभा के लिए केवल यह एक विषय नहीं है, अनेक विषय चर्चा के लिए हैं।

श्री नीतीश कुमार : १०-१२ लाख लोगों की नुमाइंदगी करके एक-दूसरे को हम लोग सुनने-सुनाने के लिए यहां आए हैं। लेकिन जब हमने सुना है तो हमें सुनाने का अधिकार है। अध्यक्ष महोदय जब कहेंगे, हम अपना स्थान ग्रहण कर लेंगे। परिस्थिति को एक्सप्लेन करना मेरा फर्ज बनता है। अनावश्यक भ्रम के बादल खड़े किये जाते हैं। कुछ बातों की चर्चा करना मेरे लिए बहुत आवश्यक है। अब यह जो कुछ असम में हुआ, परीक्षाएं देश भर में चल रही हैं। कई रेल भर्ती बोर्डों के माध्यम से चल रही हैं। समस्या कहां आई है? समस्या असम औऱ महाराष्ट्र में आई है। बाकी जगहों पर परीक्षाएं चल रही हैं। देश बहुत बड़ा है। इस बात का ख्याल रखना चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, मैं बिहार में था और बिहार में अनऑफशियल वजिट पर था। मेरे संसदीय क्षेत्र के एक विधानसभाई निर्वाचन क्षेत्र में उप चुनाव हो रहा था और गैर-सरकारी यात्रा पर मैं चुनाव प्रचार में वहां पर था। इस बीच में मैं गांवों, देहातों में घूम रहा हूं। कुछ घटनाएं घट रही थीं। मैं उन जगहों पर था जहां पर कनैक्टिविटी उस ढंग की नहीं है कि जहां पर हमें कोई छन-छन बता दें और मोडल कोड के चलते कोई अधिकारी हमारे साथ में नहीं चलते हैं, कार्यकर्ता साथ में चलते हैं। वे वहां की समस्या से पीड़ित रहते हैं। उनको पता नहीं है कि कहां क्या हो रहा है। मैं जब पटना रात में आया तो कुछ पता चला। हमने जानकारी ली। अब ९ तारीख या उसके पहले जहां असम में कुछ हुआ कि परीक्षा में जाने से रोका गया, उसके चलते कटिहार और कुछ जगहों पर हंगामा शुरू हो गया। मेरे ध्यान में यह बात अचानक आ गई औऱ लोगों ने कहा कि लोग कह रहे हैं कि उसके लिए क्या होगा, लोग आंदोलित हैं। नखिल चौधरी जी का फोन हमारे पास आया। हमने उनको फोन लगाया।

21.00 hrs. हमने दिल्ली में रेलवे बोर्ड के अधिकारियों से बात की। वहां से जो कुछ जानकारी मिली वह यह थी कि यह पहले से तरीका तय है कि जहां कहीं भी लोगों की परीक्षा में व्यवधान आता है, वहां परीक्षार्थियों को दुबारा मौका दिया जाता है। हमने कहा कि ठीक है, आप ऐसा कर दीजिए। कटिहार के लोग नहीं मान रहे थे। वे कह रहे थे कि अलखित नहीं, लखित में दिया जाए। वहां के अधिकारी बता रहे थे कि यह हमारा रूल है कि जहां परीक्षा नहीं ली जा सकी, वहां दुबारा परीक्षा होगी। हमने भी कहा कि जो लोग परीक्षा नहीं दे पाए, उनके लिए दुबारा परीक्षा होगी। मेरे बारे में कहा गया, मैं नहीं जानता था, मैं देहात में था। १७ नवम्बर को पटना के हिन्दुस्तान टाइम्स के संस्करण में छपा-

   
"Nitish inflames passions"

उसको पढ़ कर मैं तो दंग रह गया।

"While some youths prevented Bihari candidates from taking tests for Group `D’ posts of North-East Frontier Railway in Guwahati a week ago, little did they know that that would snowball into a major conflict. Spiral of violence now threatens to engulf the entire North-East with militant groups targeting Hindi speaking residents in general and Biharis in particular."
 

 आखिर यह इनकी भूमिका है। इसको अखबार लिखता है-

"The candidates returned to Bihar and complained to the Railway authorities there. "

 कौन बिहार में लौट रहा है, किसको शिकायत की है, "Railway Minister, Shri Nitish Kumar told the Hindi newspaper that they should have fought back. "

 यह मेरे बारे में लिखा है।
"The newspaper reported the comments and the incident in detail sparking attacks against rail commuters from North-East. "

 अध्यक्ष महोदय, इससे ज्यादा गैर जवाबदेही की बात और असत्य बात कोई नहीं हो सकती। मैंने किसी को कुछ नहीं कहा। मैं कह भी नहीं सकता, लेकिन मेरे बारे में छापा गया कि उनको लड़ना चाहिए। किसको कहा, कब कहा, वाह रे वाह ! यह वहां के अखबार में छप रहा है। यह कौन सी जवाबदेही का परिचय दे रहे हैं, कौन सी बात हो रही है, किसने कंफर्म किया। हमने देखा कि पूरा संवेदनशील मसला है। रेल मंत्री के बारे में कहा गया है। इस बारे में हमने तत्काल प्रेस को बुलाकर सफाई दी कि कैसे यह छप रहा है, क्या टैक्स्ट छप रहा है। मैं ज्यादा कोट नहीं करना चाहूंगा। वहां का एक अखबार है, असम टि्रब्यून, वह छाप रहा है-

"Nitish Kumar denies role in violence, Guwahati, November 17 "

 १७ तारीख को पटना में मुझे जो भी प्रेस वाले मिल सके, मैंने उनको बुलाकर कहा कि यह सब असत्य है। उसके बाद मैंने असम के मुख्य मंत्री श्री तरूण गगोई को टेलीफोन पर कहा कि मेरे बारे में जो छापा गया है, वह सही नहीं है। मैं आपके माध्यम से असम की जनता से कहना चाहता हूं कि मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। यह बिल्कुल असत्य है। मैंने डिनाई किया और जो छप रहा है, "Union Railway Minister, Shri Nitish Kumar today denied instigating violence against the Railway passengers from North-Eastern region. The denial of the Railway Minister has been carried by a press release of NF Railway this evening. "

 हम पटना से पी.टी.आई., यू.एन.आई. सभी को रिलीज किया। एन.एफ. रेलवे से भी रिलीज किया गया। उसके आगे अखबार लिखता है-
"It may be mentioned that several quarters, including the Rashtriya Janata Dal Chief, Lalu Prasad Yadav have been alleging instigation by the Railway Minister and some other politicians of Bihar behind heinous attacks on the Railway passengers from NE region. "

 जब यह फैक्स मेरे पास आया, मैंने इसको देखा तो तत्काल मैंने राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादव को टेलीफोन किया। सामान्यत: मैं नहीं करता हूं, लेकिन मामला संवेदनशील था, उनके हवाले से खबर दी गई थी कि उन्होंने भी कहा है कि इसमें रेल मंत्री नीतीश कुमार का हाथ है, दूसरे राजनीतिज्ञ भी हैं। हमने उनको कहा कि यह जो अखबार में छपा है, आपने क्या ऐसा कहा था। इस पर उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल असत्य है। मैंने ठीक इसके उलट बात कही थी, जहां भी कहीं कही थी और यह कहा था कि रेल मंत्री ने भी बात की थी, उन्होंने भी कोशिश की। मैंने कहा कि यह असम के अखबारों में छपा है, तो उन्होंने कहा कि हम प्रेस को बुलाकर कंडेम्न करेंगे और उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन क्या यह तरीका है कि बगैर सोचे-समझे कि कहां इसकी क्या प्रतक्रिया होगी, यह खबरें छापी गईं। मैं गुवाहाटी में नहीं बैठता हूं। कौन क्या लिख रहा है, क्या छप रहा है, इसके बारे में पूरी खबर नहीं है। रेलवे विभाग द्वारा विज्ञप्ति पर विज्ञप्ति दी जा रही है कि रेलवे की भर्ती कैसे हो रही है, लेकिन अफवाहें हैं कि थमती नहीं और यह खबर छप जाती है। जब कोई अखबार संकल्प ले लेगा कि हम असत्य छापेंगे, मैं पूरे मीडिया की बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन सेक्शन आफ मीडिया का रोल नहीं कहा जा सकता कि वह गैर जिम्मेदारानापूर्ण रहा है, गैर जिम्मेदाराना व्यवहार रहा है। मेरे बारे में कहा जाएगा कि आपने खंडन नहीं दिया। मैं उपलब्ध कहां हूं, मैं गैर-सरकारी यात्रा पर हूं। मैं तो देहात में घूम रहा हूं जहां पर फोन नहीं है। जैसे ही मुझे अवसर मिला, हमने खंडन दिया। मुझे इन खबरों से ठेस पहुंची है। दूर-दूर तक जिन चीजों से मेरा कोई वास्ता नहीं है वे भी मेरे नाम पर लगाई जा रही हैं। मेरा कसूर यही है कि मैंने रेल बजट में ऐलान किया कि सीडी कैटेगरी की पोस्ट्स को भरा जाएगा। मेरा कसूर यही है कि हमने यह निर्णय लिया कि पारदर्शिता के साथ ये सारी नियुक्तियां भरी जाएंगी। मेरा कसूर यही है कि हमने केवल घोषणा न करके उस काम को कराना प्रारम्भ किया। अगर यह मेरा कसूर है तो मैं कसूरवार हूं।

अध्यक्ष महोदय, बात यहीं बंद नहीं होती है। ग्रुप (डी) की बहाली चल रही थी और ग्रुप (सी) की कब की बहाली हो चुकी है। पैनल बन गया है और लोग ट्रेनिंग ले रहे हैं। मैं तो असम के माननीय सदस्यों का शुक्रिया अदा करता हूं जो कुछ दिन पहले मुझसे एक डैलीगेशन के तौर पर मिले थे। उन्होंने मुझे बताया कि एक पैनल को लेकर दिखाया जा रहा है जिसमें कुमार, कुमार है और कहा जा रहा है कि यह सब रेल मंत्री द्वारा करवाया गया है। मैंने कहा कि कुमार कोई सरनेम नहीं है। यह न किसी क्षेत्र को और न किसी जात को सिग्निफाई करता है। सब जगह कुमार होता है। मैंने तत्काल रिपोर्ट मंगाई। रिपोर्ट मिली कि पहले का जो पैनल था उसने ट्रेनिंग भी ले ली और नौकरी पाने जा रहा है। मेरे बारे में छप रहा है और वहां के जोनल मैनेजर का नाम लेकर के कि मैनेजर एंड कंपनी ने कमाल कर दिया और मेरे बारे में कहा कि रेल मंत्री की सीक्रेट इंस्ट्रक्शन थीं। मैं चुनौती देता हूं कि कोई साबित करे कि मेरी इस प्रकार की कोई इंस्ट्रक्शन नियुक्ति के बारे में थी। रेल मंत्रालय और रेल मंत्री का पद बहुत छोटी चीज है, मैं राजनीति से निकलकर बाहर जाने के लिए तैयार हूं। यह क्या बात हुई? मैं असम से साथियों से अपील करुंगा कि मैं भी एक इंसान हूं और मैं राष्ट्रवादी हूं। इस प्रकार की बातें होंगी तो मेरे भी कलेजे पर चोट पहुंचती है, मेरा मन भी आहत होता है। जो मैंने किया नहीं, वे बातें वहां कही जा रही हैं। मैं ऐसी पार्टी का सदस्य नहीं हूं, जिसका वहां बहुत बड़ा काम है। केवल एक विधायक हमारी पार्टी का वहां है, इसलिए मेरे बारे में वहां कौन सफाई देगा। अगर इस प्रकार की बातें वहां अखबार में छपेंगी और जब हम कोई बयान देंगे तो इस तरह से तोड़-मरोड़कर उनको छापा जाएगा। माननीय लालू प्रसाद यादव जी से हमारा राजनैतिक मतभेद है लेकिन मैं जानता था कि इस प्रकार का आरोप वे नहीं लगा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने आरोप नहीं लगाया। राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं लेकिन इस कद्र झूठ नहीं चलता है। कौन कहता है कि राजनीति में रहने वाले एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि ये कीचड़ उछालने वाले कौन हैं? एक अखबार ने छाप दिया कि मेरा कोई दामाद बनकर वहां गया है। मेरा कोई दामाद नहीं है, मेरे बेटी नहीं है। दामाद बन गया - वाह रे वाह, अखबार छापने वाले, तेरा जवाब नहीं। प्रेस की स्वतंत्रता के लिए मैं एक महीने जेल में रहा हूं और मैं प्रेस की स्वतंत्रता की इज्जत करता हूं, लेकिन यह कौनसी स्वतंत्रता है? अगर आप लोग समय रहते नहीं चेतियेगा और इन बातों को नियंत्रित नहीं किया जाएगा तो मैं आपको कहना चाहता हूं कि रेल मंत्री आयेंगे-जाएंगे और आज बिहार से रेल मंत्री है तो बिहार टार्गेट है। अगर बिहार से रेल मंत्री नहीं होता तो दूसरा टार्गेट बनता क्योंकि यह नियुक्ति मसला नहीं है। नियुक्ति मसला हो भी नहीं सकता है। हम तो सारे देश में नियुक्ति दे रहे हैं। असम सरकार के अनुरोध पर हमने नियुक्ति को रोक दिया…( व्यवधान)महाराष्ट्र में कुछ घटनाएं घटीं, उसके आधार पर हमने उनको रोक दिया। फैसला बाद में हो जाएगा।…( व्यवधान)मैं आपका आभार प्रकट करता हूं और आपको धन्यवाद देता हूं।

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी ने सांसदों को दोष नहीं दिया है।

श्री नीतीश कुमार : अगर आप जैसे साथियों ने इन बातों का नोटिस लेकर मेरे जैसे निरीह व्यक्ति की रक्षा की है तो मैं आभारी हूं। इस सदन में बैठे आदरणीय शिवराज जी पाटिल देख रहे हैं कि हम भी पांचवीं बार संसद में आये हैं। कौन क्या बोलता है, कौन क्या करता है, ये बातें सभी को मालूम रहती हैं। ये काम हमारा नहीं है और अगर हम आये हैं तो पारदर्शी ढंग से काम करेंगे, नहीं तो चले जाएंगे। हम बदनामी अर्जित करने के लिए नहीं आये हैं। संसद सदस्य के रूप में हमने बहुत ख्याति अर्जित की है। मुझ बदनामी प्राप्त करने की इच्छा नहीं है। मुझपर बिहार में आरोप लगता है। राजनीतिक साथी आरोप लगाते हैं कि तुम कुछ नहीं करते। हम नहीं करते, करना नहीं चाहते, क्योंकि बेरोजगारी की समस्या भीषण है। मैरिट के आधार पर नौकरी मिल जाए, पैरवी क्यों कर रहे हैं। मैरिट के आधार पर किसी को नौकरी मिल जाए, हमारा रास्ता यही है और हम उसी रास्ते पर चल रहे हैं। लेकिन जो मैने नहीं किया, वह मेरे नाम पर डाल दिया गया। मेरे खाते में डाल दिया गया। यह मेरे साथ घोर अन्याय हुआ है। आज मैं इस सदन के माध्यम से कहना चाहता हूं कि नियुक्ति में पूरी तरह से पारदर्शिता बरती गई है। अगर रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड के द्वारा नौकरी नहीं देनी है, तो कैसे नौकरी देनी है, लोकल लोगों को अगर प्राथमिकता देनी है, तो निर्णय करना होगा। मेरे हाथ में था, मैंने रीजनल लैंग्वेज को शामिल किया। इसके बाद भी इसका रास्ता कैसे निकले, इस पर विचार करना है। ग्रुप-डी में कैसे रीजनल लोगों को अधिक से अधिक शामिल करें।

महोदय, मैं एक बात और कहना चाहता हूं। स्थानीय नौकरी के बारे में रेलवे के काम को भी समझना चाहिए। जब स्थानीय आदमी जाएगा, तो जहां से ट्रैक गुजरती है, वहां तक जाएगा। ऐसा पहले हुआ करता था। बड़ी अच्छी पद्धति थी, बगल के गांव से ट्रैकमैन बहाल कर लिया जाता था और उसकी रेलवे के प्रति निष्ठा होती थी। नीचे के स्तर पर अधिकारी बहाल कर लिया करते थे और कैज्युल लेबर के तौर पर रख लेते थे। वह धीरे-धीरे परमामेंट होता था और रेलवे में उसका कमिटमेंट रहता था। नई प्रक्रिया शुरु हुई, हमने वह नहीं की, लेकिन हर चीज का अनुभव हमारे सामने है। कैज्युल लेबर का भी अनुभव हमारे सामने है। कैज्युल लेबर का बन्द किया, उसका भी अनुभव है। खुली भर्ती से रखना था, वह भी नहीं ले पा रहे हैं और अब रेलवे रिक्रूटमेंट भर्ती का अनुभव है। इन सारे अनुभवों को देखते हुए, इससे क्या रास्ता निकले और इस बहस से जो रास्ता निकलेगा, हम उसका अनुसरण करेंगे।

अब मैं एक बात और कहना चाहता हूं, उसके बिना मेरी बात पूरी नहीं होगी। श्री बसुदेव आचार्य जी बहुत वरिष्ठ सदस्य हैं और बहुत काबिल सदस्य हैं। रेलवे के विषय में उनको गहन जानकारी है, इसमें दो राय नहीं है। जहां तक मुझे स्मरण हैं, वे रेलवे स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन भी रह चुके हैं। उन्होंने मुझसे एक सवाल किया कि भर्ती में भ्रष्टाचार ही है। रेलवे बोर्ड से करें या किसी से करें, भ्रष्टाचार है ही। रेलवे बोर्ड अब शुरु हो रहा है, आप भ्रष्टाचार के उदाहरण लाइए, कार्यवाही होगी। रेलवे के आगरा डिवीजन द्वारा भर्ती की जा रही थी, उन्होंने शिकायत की थी, लेकिन मैंने तब तक उस शिकायत की जांच के लिए आदेश दे दिया था। मैं रांची गया था, वहां लोगों ने मुझ से शिकायत की। मैंने तत्काल प्रक्रिया रोककर, पैनल आपरेशन रोककर जांच कराई और जनरल मैनेजर को जांच का आदेश दिया। जांच की रिपोर्ट आ गई और उस रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी नही पाई गई। संयोग से उसी दिन श्री बसुदेव आचार्य जी फिर मिलने आ गए। उन्होंने एक पत्र हमको दिया और कहां कि धांधली हुई है। पहले भी पत्र लिखा था। उन्होंने पत्र के साथ दो अन-साइन्ड लैटर दिए। मैंने उनको कहा कि अनसाइन्ड लैटर का क्या करेंगे, सीवीसी की गाइडलाइन्स हैं। बसुदेव आचार्य जी वरिष्ट सदस्य हैं और रेलवे वजिलेंस से रिपोर्ट आ गई, जिसमें पाया गया कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। इसके बावजूद भी चिट्ठी के आलोप में, अनसाइन्ड लैटर के आलोप में जांच की गई, लेकिन कुछ नहीं मिला। जो सरकारी पद्धति का तरीका है, मामला सीवीसी के पास जाता है और वहां से रिपोर्ट आने के बाद मामला क्लोज कर दिया जाता है। मैंने बसुदेव जी को जवाब दिया, लेकिन उनको तथ्य तो सामने रखने चाहिए थे। मैंने उनके कहने पर जांच शुरु कराई, लेकिन आपने कुछ नहीं कहा। आरोप लगाने से तो सजा नहीं मिलेगी। बने हुए रूल्स है, लेकिन जांच करने के बहुत सारे रास्ते हैं, नियम हैं, कानून हैं, उनके बाहर जाकर आप कुछ नहीं कर सकते हैं। आप हमसे ज्यादा जानते हैं, आप ज्यादा वरिष्ठ हैं, लेकिन इन्होंने उल्लेख नहीं किया। मैंने फिर ३० सितम्बर, २००३ को जो श्री बसुदेव आचार्य जी को जवाब दिया, वह मैं पढ़कर सुनाना चाहता हूं -

"Dear Shri Achariaji, Kindly refer to your letter dated 4th June, 2003 and 3rd July 2003 regarding alleged irregularities of favouritism in recruitment to the depots under Agra Division.
I have had a thorough and sustained investigation conducted into the allegation of irregularity in the selection. No irregularity in the conduct of selection has, however, been found in the course of investigation.
I hope you will kindly appreciate the position. "
 

 जो बात थी, वह मैने बता दी, मौखिक रूप से भी बता दी, लिखकर भी बता दी कि क्या हुआ है। अगर कोई भ्रष्टाचार हुआ है, तो उदाहरण लेकर आइए, जांच होगी। लेकिन हम तो जांच की एजेंसी नहीं बनेंगे। जिस दिन मनिस्टर जांच की एजेंसी बन जाएगा, तो बंटाधार हो जाएगा और तुरन्त आरोप लगेगा कि मैलाफाइडी है।

जांच की एजेंसी निर्धारित है। अगर वजिलैंस कुछ पाएगी, आउट साइड एजेंसी इनवॉल्वड है तो सीबीआई को इनवॉल्व किया जाता है। सीबीआई जांच करती है। अब मैं लाइटर वेन में एक बात कहता हूं। अगर आपको पता चला कि पक्का किसी ने दिया किसी ने लिया तो उसी समय शिकायत करनी चाहिए ताकि डिकॉय लगा कर पकड़ लिया जाए। बाद में उसका कोई प्रमाण नहीं है, लगातार जांच-पड़ताल की गई, कुछ निकला नहीं तो मैं क्या कर सकता हूं। कौन सा ऐसा अधिकार किसी मंत्री के पास प्राप्त है जो इनक्वायरी कराए और उसमें कुछ न निकले और उसके बाद भी उसे रगड़ें, हम तो नहीं समझते, अगर हम रगडेंगे तो शायद हम ही डॉक में खड़े होंगे, इतना कुछ होने के बाद कैसे रगड़ दिए। प्रक्रिया यही है और हमने इसके आधार पर करने की कोशिश की है। मैं इतना ही सदन को आश्वस्त कर सकता हूं कि जो भी आज की नीति है, उसके अन्तर्गत कहीं कोई फलॉ है तो हम उसे सुधारने के लिए तैयार हैं। अगर इससे बेहतर कोई प्रक्रिया बन सकती है तो हम उसे अपनाने के लिए तैयार हैं। जहां तक स्थानीय सवाल है जिस कारण से यह उत्पन्न हुआ है उसे दूर करने के लिए भी हम लोग इतनी चर्चा कर चुके हैं, इसका रास्ता निकालने के लिए जरूर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे क्योंकि मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं और एक बात की चर्चा कर रहा था, पहले अगल-बगल के लोगों को रख लिया जाता था, नौकरी में लोकल लोग चले जाते थे, अब क्या प्रक्रिया हो सकती है. इतने दिनों का इतिहास है, उसके अनुभवों के आधार पर जो सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया हो सकती है उसे अपनाने की हम कोशिश करेंगे। रेलवे में वही होगा जो भारत सरकार की नियुक्तियों के लिए लागू होगा। वैसे हमारी कोशिश होगी क्योंकि रेलवे का काम अलग किस्म का है, इसलिए इसमें लोकल लैवल पर लेने के लिए कुछ रास्ता निकल जाए चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े उसे करने की कोशिश हो जाए तो अच्छा होगा। उसके लिए जो बहस हुई है उसके आधार पर एक निचोड़ निकाल कर हम आगे बढ़ने की जरूर कोशिश करें, यही इसका निष्कर्ष निकलना चाहिए। इसके अलावा जो भी रेलवे भर्ती बोर्ड में तथाकथित त्रुटियों के चलते हुआ है, मैं उसे मानने से इन्कार करता हूं। रेलवे भर्ती बोर्ड या रेलवे भर्ती में कोई त्रुटि नहीं है। त्रुटि है तो गलतफहमी है और गलतफहमी भी ऐसी है जो दूर करने पर भी दूर नहीं होगी।

अध्यक्ष महोदय, हम सोए को जगाएं। जागे को नहीं जगा सकते। अगर किसी कारण से हमें मौके का लाभ उठाना है तो बात दूसरी है। उसके उपाय और दवा मेरे पास नहीं है। उसकी दवा अन्यत्र होगी। मैं इतना जरूर कहूंगा कि रीजनल एसपिरेशन का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन रीजनलिज्म की निन्दा होनी चाहिए। रीजनल एसपिरेशन्स होते हैं। हमारे देश में अनेक प्रदेश हैं, अनेक भाषाएं हैं, अनेक बोलियां है, अनेक वेश-भूषा है, खान-पान सब प्रकार की वविधताएं हैं और उनमें हमारी एकता उभर कर आती है। वैसा हमारा भारतवर्ष है। इसमें कहीं-कहीं स्थानीय एसपिरेशन्स है तो अच्छी बात है लेकिन स्थानीय एसपिरेशन्स का स्थान अगर ले लेगा जिसे कहते हैं रीजनल सॉवरनिज्म, उसका बड़ा बुरा असर पड़ेगा। मैं असम के साथियों को इतना ही बताना चाहूंगा कि हम लोकल बात जरूर करें लेकिन इस बात का ख्याल रखें कि रेलवे देश को जोड़ता है। रेलवे में आज १६ जोन हैं, एक भी जोन ऐसा नहीं है कि जो किसी एक राज्य में कनफाइन हो। हमारे पास १६ जोन के नीचे ६७ डविजन्स हैं। इनमें से केवल १८ डविजन्स ऐसे हैं जो किसी एक राज्य में है। बाकी ४९ डविजन्स रेलवे के ऐसे हैं जो एक से अधिक राज्य में हैं। आप अगर राज्य के हिसाब से क्षेत्रीय एसपिरेशन्स को उभारेंगे तो वह टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। यह रेल टुकड़े-टुकड़े था। देश को जब आजादी मिली तो देश के निर्माताओं ने सोच-समझ करके इसे जोड़ करके एक भारतीय रेल का गठन किया। हम ऐसा कुछ न करें कि एक बार टुकड़ों-टुकड़ों में बंटा रेल जो भारतीय रेल में परिणत हुआ है, फिर यह टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाए। रेलवे में स्थानीय एसपिरेशन्स का ख्याल रखा जाना चाहिए। हम रेलवे से ज्यादा स्थानीय एसपिरेशन्स का ख्याल नहीं करते। वह कला, संस्कृति, खेल-कूद सब को प्रोत्साहित करता है। रेल का एक डिब्बा है, आप उसमें बैठते हैं, राष्ट्रीय एकता परिलक्षित होती है। लोग एक साथ मिलते हैं, उस राष्ट्रीय एकता के इस जीवन्त स्वरूप को, जीवन्त उदाहरण को नष्ट मत करिए। इसे सब को मिल करके बचाने की कोशिश करनी चाहिए। भारतीय रेल पूरे देश का है। रेल मंत्री की गद्दी पर जो भी जितने दिन के लिए बैठेगा, वह पूरे देश का है। भगवान के लिए, कृपा करके रेल मंत्री अगर बिहार से आता है तो इसे बिहार-बिहार कह कर जलील मत करिए।

हमारे कई साथियों ने बिहार की बात कही। मैं भी बिहार के एक पिछड़े इलाके का प्रतनधित्व करके यहां आया हूं। आखिरकार सब देशवासी एक दूसरे की मदद करके आगे बढ़े। हमारे महाराष्ट्र के साथी हैं। इनकी पार्टी चलती है, उस आधार और नारे पर अपनी पार्टी चलाएं लेकिन हम इतना ही आग्रह करेंगे कि अपनी-अपनी बात कहते वक्त इस बात का ख्याल करिए कि हम लक्ष्मण रेखा को पार न करें।

अध्यक्ष महोदय, व्यक्तिगत रूप से कुछ कहने के लिये मुझे आप इजाजत दीजिये। मैं रेल मंत्री के नाते नहीं, एक सदस्य के रूप से श्री रावले जी से कहना चाहूंगा। माफ करिये श्री रावले जी, आप लक्ष्मण रेखा पार मत करिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो बिहार भी इसी देश का एक प्रदेश है, वहां भी इसी प्रकार का कोई आन्दोलन खड़ा हो सकता है। श्री राम विलास पासवान जी ने ठीक ही कहा कि मुम्बई बिजनैस कैपिटल है, यह फाइनैंशियल कैपिटल है। मुम्बई पर सिर्फ आपको ही नाज नहीं है, सारे हिन्दुस्तान को उस पर नाज है। इसलिये उसके स्वरूप को आप नष्ट मत कीजिये। इसलिये एक सांसद के नाते मुझे अपनी बात कहने दीजिये। हमें उस लक्ष्मण रेखा के अंदर रहकर ही देश चलाना है तो हमें रीजनल एसपायरेशन रखनी पड़ेगी। अगर रिकमैंडेशन्स में कुछ तबदीली की जाये तो सर्वसम्मति से स्वागत योग्य होगी।…( व्यवधान)मैं एक मंत्री के रूप में यह बात नहीं कह रहा हूं, एक मित्र के नाते कह रहा हूं। रावले जी, आपके बिना नाम लिये आपको बोलने से कोई रोक नहीं सकता। आपने कोट किया, आपने पहले की चीजों को कोट किया, मैंने उसे भी कह दिया। लेकिन उसमें से एक रास्ता निकालना चाहिये। देश में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न हो। क्या हिंसा से समाधान हुआ है? हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। आप हिंसा को त्याग दें तो बातचीत के जरिये सब समस्या हल हो सकती है।

अध्यक्ष महोदय, जहां तक रिकमेंडेशन्स की बात है, हम तो जॉब देना चाहते हैं, एक बेरोजगार को दाना देना चाहते हैं। उसके लिये भोजन का इंतजाम करना चाहिये। बूंद बूंद से घट भरता है। उस गरीब की माली हालत खराब है, उसका रोजगार रुक गया है। उनका काम कुछ दिन के लिये रुक गया है, उसका जवाबदेह कौन होगा? उसके घर खाने के लिये दाना जाने के लिये रोक दिया गया। हमें इस समस्या को तेजी से हल करना चाहिये। अभी तो १८ हजार के लिये किया गया है, और भी होना है। हम चाहते हैं कि इन नियुक्तियों के लिये नया रास्ता निकले। उनके लिये कारगर कदम उठायें।

इन्ही शब्दों के साथ मैं उन तमाम सदस्यों का धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने इस चर्चा में भाग लिया। यदि भावनावश या भावावेश में मुझसे कुछ चूक हो गई हो तो मुझे क्षमा करेंगे।

अध्यक्ष महोदय : अभी यह चर्चा पूरी होने वाली है। आप सभी बैठे रहिये। मैंने चर्चा के शुरु में एक निवेदन किया था कि यह विषय बहुत डैलीकेट है। इस विषय पर जो भी चर्चा होगी, वह अच्छे स्तर पर होनी चाहिये। मैं सभी सदस्यों को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस विषय पर अच्छे स्तर पर चर्चा की गई है। माननीय मंत्री जी ने जो चर्चा का उत्तर दिया है, वह अच्छे ढंग से दिया है। मैं इस चर्चा को और आगे नहीं बढ़ाना चाहता लेकिन मैंने यह कबूल किया था कि चर्चा के अंत में आप गृह राज्य मंत्री या रेल मंत्री से प्रश्न पूछ सकते हैं। मैं अपेक्षा करता हूं कि वह प्रश्न डिसैंट वे में पूछें तो उत्तर भी आयेगा। अब काफी समय हो गया है। आप सब बैठिये। एक-एक करके आपको चांस दूंगा। यह मैं तय करूंगा कि किस किस को चांस देना है। इसलिये केवल एके-एक प्रश्न पूछकर सदन के काम को समाप्त करना चाहता हूं। मैं उसके बाद सदस्यों की तरफ से एक रिजोल्यूशन सदन के सामने रखने वाला हूं। मुझे आशा है कि आप सभी माननीय सदस्य इस रिजोल्यूशन से सहमत होंगे। वविध पक्षों के पार्टी लीडर्स की तरफ से ऐसा रिजोल्यूशन लाने का तय किया गया था। यह रिजोल्यूशन चर्चा के अंत में होगा। मैं प्रश्न पूछने के लिये पहले श्री प्रभुनाथ सिंह जी को इजाजत दे रहा हूं। आपका प्रश्न शौर्ट हो ताकि उत्तर भी शौर्ट हो सके।

श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष महोदय, माननीय गृह राज्य मंत्री जी जब बोल रहे थे, उन्होंने एक-दो बातों का जिक्र किया था। उन्होंने बताया कि सीआरपीएफ के लोग खड़े हुये थे, जब मोटर साइकिल पर सवार अपराधी ने हमला किया। इस हमले में ६ लोग मारे गये। उन्होंने कहा कि वहां डयूटी लगानी चाहिये थी लेकिन कहीं न कहीं कोई भूल हुई है।

असम में ये घूमे भी हैं उन जिलों में जिस समय वहां तनाव था और अमन-चैन कायम करने के लिए ये प्रयासरत रहे हैं। हम जानना चाहिते हैं कि यह भूल किस स्तर पर मानते हैं? क्या वहां के पुलिस प्रशासन के लोगों की भूल थी? चूंकि अखबारों में आ रहा था कि घटना घट रही है, पुलिस मूकदर्शक बनी खड़ी है। इनके कहने से भी यह बात लगी कि वहां की पुलिस राइफल और कारबाइन लेकर खड़ी थी और हत्या सामने हुई लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। तो क्या यह माना जाए कि एक साजिश के तहत और पुलिस के मूकदर्शक रहते यह घटना रही और सारा प्रशासन तमाशा देखता रहा? अध्यक्ष महोदय, हमने एक अखबार दस्तख्वत कराकर आपके सामने रखा है। उसमें ६ अक्तूबर २००२ को वहां के एक राज्य मंत्री का बयान निकला था। उसमें उन्होंने कहा है कि अब हम बिहारियों को असम से निकालकर रहेंगे। वहां के जो संसदीय कार्य मंत्री थे, उन्होंने कहा कि ये जो बोल रहे हैं, ये सरकार का बयान है मुख्य मंत्री की मौजूदगी में। यह अखबार की कटिंग हमने आपके सामने रख दी है। हम जानना चाहते हैं कि क्या इस बात की जानकारी माननीय गृह राज्य मंत्री को है या नहीं? अगर है तो क्या यह घटना साजिश के तौर पर बिहारियों के साथ घटी या अचानक घटना घट गई? इसके साथ एक सुझाव देना चाहता हूँ कि गृह राज्य मंत्री जो २६०० लोगों की बहाली करेंगे सीआरपी और दूसरे विभागों में, उनको लोक सभा की सुरक्षा में मत लगाएं। उऩ लोगों को कहीं दूसरी जगह रखियेगा क्योंकि लोक सभा बड़ा पवित्र मंदिर है। उन २६०० लोगों को यहां कभी मत आने दीजिएगा।

इसके साथ ही अपनी बात समाप्त करते हुए मैं कहना चाहता हूँ कि राज्य में जब इस तरह की घटनाएं घटती हैं तो केन्द्रीय सरकार की कोई भूमिका होती है या नहीं? केन्द्रीय सरकार की भूमिका होती है तो…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : तीन-चार प्रश्न आप नहीं पूछ सकते।

...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, यहां की प्रथा है कि सबके प्रश्न आ जाएं फिर आप उत्तर दें। मोहन रावले।

श्री मोहन रावले : मैं मंत्री जी का स्वागत करना चाहता हूँ कि आपने कहा कि स्थानीय लोगों को वरीयता देने के बारे में कोई रास्ता निकालेंगे। एक त्रिभाषा सूत्र था। जो गजेन्द्र गडकर चीफ जस्टिस थे, उन्होंने एक रिपोर्ट में कहा था और सारे मुख्य मंत्रियों ने उसमें सहमति बताई कि स्थानीय लोगों को वरीयता मिलनी चाहिए। मैं आपके माध्यम से पूछना चाहता हूँ कि भारत सरकार ने नोटफिकेशन निकाला है। आपने पूछा था कि कहां है। "Similarly, through an order made by the hon. President of India under the Ministry of Home Affairs Notification No.2/8/60-01 dated 27th April, 1960, in para 7(b) directed that the recruitment methods be revised on regional basis. The Ministry of Railways has not revised such methods as yet."

जो १९५९ में कानून हुआ था, नोटफिकेशन निकाला था।

"In pursuance of the provisions contained in the said Act, it is mandatory for the establishment…"

अध्यक्ष महोदय : इसकी कापी आप बाद में मंत्री जी को दे दें। …( व्यवधान)

श्री नीतीश कुमार : मैं पुन: बता रहा हूँ कि यह १९९८ के एक सर्कुलर का जो बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या हैं। १९९८ के बाद यह परिस्थिति आई है। अब नए सिरे से क्या विचार करना है वह करेंगे। पुरानी बातें अपनी जगह हैं।

श्री मोहन रावले : सुप्रीम कोर्ट ने जो जजमैंट दिया है, उसकी एक कापी मेरे पास है। एक बात मैं आपकी अनुमति से क्वोट करना चाहता हूँ।

" It is common knowledge that many a candidate is unable to have the names sponsored, though their names are either registered or are waiting to be registered in the employment exchange, with the result that the choice of selection is restricted to only such of the candidates whose names come to be sponsored by the employment exchange. Better view appears to be that…"

वाइडर स्कोप के बारे में दो जजों ने कहा है। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : यहां चर्चा शुरू नहीं हुई है। केवल अपना मुद्दा कहिये। क्वोट करने की जरूरत नहीं है। मंत्री जी इस विषय में भी ध्यान दें। इसका उपयोग हो सकता है तो करें।

श्री मोहन रावले : मैं एक ही प्रश्न पूछना चाहता हूँ।

अध्यक्ष महोदय : नहीं, इस पर ज्यादा चर्चा नहीं होगी।

श्री मोहन रावले : क्या स्थानीय लोगों को वरीयता देने के बारे में विचार करेंगे?

अध्यक्ष महोदय : मैंने मंत्री जी को कहा। आप और मैं क्या अलग बात कर सकते हैं?

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : मेरा गृह राज्य मंत्री जी से प्रश्न है कि पूरे बिहार के छात्र नौजवानों पर चर्चा थी कि बिहार के बाहर कई राज्यों में यह घटनाएं हो रही हैं। क्या केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों से वार्ता करके बिहार में रह रहे, चाहे दिल्ली हो, महाराष्ट्र हो, आंध्रा प्रदेश हो या कर्नाटक हो या झारखंड हो, या असम हो, क्या राज्यों से बात करके इस तरह की घटनाएं जो हो रही हैं, उनको रोकने के लिए कोई कारगर कदम उठा रही है या निर्देश दिया है या नहीं?

महोदय, इस प्रकार की बातों की पुनरावृत्ति बिहारियों के साथ या किसी अन्य राज्य के नौजवानों के साथ नहीं हो। दूसरी बात मैं मंत्री जी से यह जानना चाहता हूं कि मंत्री जी ने जो जवाब दिया है, उस पर क्या कार्रवाई करने जा रहे हैं और माननीय रेल मंत्री महोदय से मैं यह जानना चाहता हूं कि आपने किस आधार पर कहा है कि हमने लोकल स्तर पर भाषा के आधार पर रोजगार देने का एक रास्ता निकाला है ? मैं जानना चाहता हूं कि जो कटिहार डिवीजन है, वह अंगिका यानी अंग देश में है, जो समस्तीपुर डिवीजन है वह मथिला में है और जो पटना तथा हाजीपुर डिवीजन है, वह मगध में है, तो क्या आपने वहां यह बात जानने की कोशिश की और क्या आपने वहां की भाषा में प्राथमिकता के आधार पर कोई एग्जामिनेशन हो, इसके लिए कोई कार्रवाई शुरू की है, यदि नहीं, तो क्या कारण हैं और यदि नहीं, तो कब तक करेंगे ?

श्री नीतीश कुमार : अध्यक्ष महोदय, मैंने अपने बजट भाषण में इसका उल्लेख किया है।…( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, मैं यह जानना चाहता हूं कि …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : नहीं, पप्पू यादव जी, आप बैठिए। मैंने आपको एक प्रश्न पूछने के लिए मौका दिया था, आपने पहले ही दो प्रश्न पूछ लिए। अब कृपया आप बैठिए।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, मैं रेल मंत्री महोदय से केवल एक ही बात पूछना चाहता हूं और उनसे सिर्फ एक ही आग्रह करना चाहता हूं कि बिहार के लड़के जहां जाएं, उन्हें सुरक्षा दी जाए, उन्हें प्रोटैक्शन देने का काम किया जाए।

श्री नीतीश कुमार : अध्यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्य को बताना चाहता हूं और उनसे पूछना चाहता हूं कि वे हमें बताएं कि हमारे पास ऐसा कौन सा साधन है जिसके तहत हम बिहार के लङके जहां भी जाएं, वहां उन्हें प्रोटैक्शन दें या सुरक्षा प्रदान करें ? ऐसा संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। हमारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है। अच्छा हो कि पप्पू यादव जी, उनके साथ जाएं। उनके साथ पप्पू यादव जी को भेज दिया जाए। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : फिर पप्पू यादव जी से उन्हें कौन सुरक्षा देगा। …( व्यवधान)

श्री शिवराज वि.पाटील:अध्यक्ष महोदय, मैं अपनी पार्टी तथा अपनी ओर से सदन में आश्वासन देना चाहता हूं कि बिहार के छात्र हों या किसी अन्य राज्य के छात्र, जिन राज्यों में हमारी सरकारें हैं, वहां जाएंगे, तो हमारी सरकारें उन्हें संरक्षण देंगी।

श्री राम विलास पासवान: अध्यक्ष महोदय, इतनी चर्चा होने के बाद, सब कुछ होने के बाद, जो लोग मारे गए, वे नौकरी लेने के लिए नहीं गए, लेकिन उसके बाद भी वे मारे गए, किसी का परिवार उजड़ गया, किसी के बच्चे अनाथ हो गए, किसी की बीवी मारी गई, क्या भारत सरकार ने उनके लिए कोई योजना बनाई है ? नैशनल कैलेमिटी हो जाती है, सरकार हजारों करोड़ रुपए खर्च कर देती है, लेकिन इस घटना में जो लोग मारे गए, जिन लोगों के घर उज़ड़ गए, जिनकी संपत्ति नष्ट हो गई, जो घर से बेघर हो गए, उन्हें बसाने के लिए, उनकी सहायता के लिए भारत सरकार की क्या योजना है ?

अध्यक्ष महोदय, मैंने दूसरा सवाल यह पूछा था कि इस तरह की घटनाएं नहीं घटें, उसके लिए सरकार क्या कर रही है ? मैं बताना चाहता हूं कि हमारे यहां आलरेडी एक नैशनल इंटीग्रेशन कौंसिल बनी हुई है। क्या भारत के प्रधान मंत्री उसकी बैटक बुलाकर जिसमें सभी राज्यों के मुख्य मंत्री या जो भी उसके सदस्य हैं, वे उपस्थित रहें, उनसे ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करेंगे, ताकि भविष्य में ऐसा घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो ?

श्री बसुदेव आचार्य : अध्यक्ष महोदय, रेल मंत्री जी यहां बैठे नहीं हैं।

अध्यक्ष महोदय : रेल मंत्री जी, अभी बैठे थे। वे पानी पीने चले गए हैं। अभी आ जाएंगे। आप अपनी बात पूछिए। आपकी बात रिकार्ड पर जा रही है।

श्री बसुदेव आचार्य : अध्यक्ष महोदय, जब मैंने चर्चा प्रारम्भ की थी, तब मैंने एक सुझाव दिया था कि एक तो जो अनएम्पलायमेंट की बात है,…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : बसुदेव आचार्य जी, आप भाषण मत कीजिए। सिर्फ एक मिनट में स्ट्रेट अपना प्रश्न पूछिए।

SHRI BASU DEB ACHARIA : He has also referred to DoPT’s Circular and also Supreme Court’s judgement of 1996. After 1996, DoPT issued a Circular to all the Departments and to all the PSUs. In that Circular, which he referred, it was mentioned that the names from the employment exchange along with wider publication should also be obtained. But, this is not being followed. This is my first point.

Secondly, I make one suggestion that already a number of people, maybe two thousand, three thousand, have received training in the Railways and they are all local people. Even in the year 2000, these boys were recruited in the Railways in different workshops.

If you recruit these boys who are skilled and trained, I think, there will be no problem and the local boys will get employment.

MR. SPEAKER: Mr. Minister, please.

… (Interruptions)

श्री नीतीश कुमार : आचार्य जी के प्रश्न का जवाब मैं दूंगा।

SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Sir, would you allow me to put a question? … (Interruptions)

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, बैसीमुथियारी जी एक प्रश्न पूछना चाहते हैं।

श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी (कोकराझार): अध्यक्ष महोदय, मैं आपकी मार्फत रेल मंत्री जी से एक सवाल पूछना चाहता हूं कि उत्तर-पूर्वी भारत के नौजवानों के लिए रेलवे डिपार्टमेंट के साथ-साथ, हिन्दुस्तान सरकार की जितनी संस्थाएं हैं, इन सारी संस्थाओं में नार्थ-ईस्ट के नौजवानों के लिए सौ प्रतिशत जॉब अपौरचुनिटी, रिजर्वेशन में जो कोटा मांगा गया, उसके बारे में आपका क्या रिएक्शन है? What is the response of the Government of India in regard to the demand being raised by the North Eastern people for 100 per cent reservation in jobs including the Railway Department? In 1978, the reserved quota for Scheduled Tribes was 18 per cent and it was reduced to 7.5 per cent. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: What is your question? आप केवल जो प्रश्न पूछेंगे, उतना ही रिकार्ड पर जाएगा।

…( व्यवधान)श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी:१९७८ में ट्राइबल लोगों के लिए १८ प्रतिशत रिजर्वेशन था। It was reduced to 7.5 per cent. Why has this sort of a thing been done?

SHRI MADHAB RAJBANGSHI : On 5th December, I mentioned about an accident in Rongia division in between Udalguri and Routa stations. I would like to know from the hon. Minister as to what action has been taken and also what financial assistance has been given to the injured persons from the Railway Ministry. … (Interruptions)

श्री नीतीश कुमार : अध्यक्ष महोदय, मुझ से तीन प्रश्न पूछे गए हैं। बसुदेव आचार्य जी ने पूछा है कि एम्प्लायमेंट एक्सचेंज को सूचना दी जा रही है, लेकिन आप जानते हैं कि इसके लिए एक फार्म भरना पड़ता है, इसलिए सिर्फ नाम भेजने से काम नहीं चलेगा। उन लड़कों को भी फार्म भरना पड़ता है, वे फार्म भरें और उसके लिए कुछ फीस भी होती है।…( व्यवधान)

MR. SPEAKER: No cross talk please. मंत्री जी, आप उत्तर दीजिए।

SHRI NITISH KUMAR: You asked a question and I am clarifying it.…( व्यवधान)आपके वक्तव्य के बाद मैंने जानकारी ली है, तभी मैं इस बात का उल्लेख कर रहा हूं। इसमें एक आवेदन-पत्र जमा करना होता है। एम्प्लायमेंट एक्सचेंज से जब नोटिस जाता है तो उन्हें आवेदन-पत्र देना होता है। उन्होंने लिस्ट दी है। उन्हें आवेदन-पत्र जमा करना है और जब रेल भर्ती बोर्ड परीक्षा आयोजित करता है, उस परीक्षा में उन्हें बैठना है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने नाम भेज दिया और उसके सलैक्शन पर विचार कर लिया। उसके पास एडमिट कार्ड भेजना होता है। उसका फोटोग्राफ चाहिए। चार लाईन लिखनी पड़ती है ताकि इम्पर्सोनेशन का केस न हो। ऐसी प्रक्रिया है, जिसके चलते यह होता है। दूसरी उन्होंने अप्रेंटिस की बात कही। आप जानते हैं कि जितनी भी वर्कशाप्स हैं, जहां कहीं भी काम होता है, रेलवे ने पब्लिक सैक्टर और प्राईवेट सैक्टर में भी लोगों को सिर्फ हुनर सिखाना है, उसके बाद उन्हें एबजॉर्ब नहीं करना है। ऐसा कोई प्रोविजन नहीं है कि उन्हें एबजार्ब भी करें। इसलिए रेलवे की एबजार्ब करने की बाध्यता नहीं है। ग्रुप डी की, गैंगमैन की जो बहाली है, इस बारे में हम कह चुके हैं कि उन्हें ले लीजिए। अगर किसी को लेना है तो कोई नियम, प्रक्रिया अपना कर लिया जा सकता है। इतने लोग वर्कशाप में ट्रेनिंग लेकर बैठे हुए हैं, उन्होंने ट्रेनिंग किस चीज की ली है -"पढ़े फारसी, बेचे तेल।"उसे गैंगमैन का काम करना है।…( व्यवधान)किसी के कंधे पर ५० किलो का वजन डाल देंगे,…( व्यवधान)अब कंक्रीट स्लीपर आ गया है।…( व्यवधान)

श्री बसुदेव आचार्य : जिस काम के लिए ट्रेनिंग हुई है, उसी काम के लिए दीजिए।…( व्यवधान)

श्री नीतीश कुमार : मैंने कहा कि इन पूरी परिस्थितियों में जब चर्चा करेंगे तो क्या रास्ता निकले, केजुअल वर्कर्स को हम शुरू कर दें, कैसे भरें, किस तरह नाम मांगे जाएं, सब को बुला कर एक खुली भर्ती की जाए या कोई अन्य रास्ता अख्तियार किया जाए। आज जो चर्चा हुई है, इसके बाद हमें बैठ कर इस पर विचार-विमर्श करना है। उसका कोई रास्ता निकलेगा। आपने कहा है तो उस प्रश्न का उत्तर तो हम लोग दे चुके हैं। एक बात मैं बता देना चाहता हूं, एन.एफ. रेलवे की वेकेन्सीज हैं, एन.एफ. रेलवे में पांच डिवीजन हैं, रंगिया का डिवीजन इस बार आपरेशनल हो गया। रंगिया के अलावा पहले से तिनसुकिया है, लमडिंग है, इधर आइये तो अलीपुरद्वार है, कटिहार है। कटिहार बिहार और पश्चिम बंगाल में है। अलीपुरद्वार पश्चिम बंगाल और असम में है। रंगिया असम में है, लमडिंग असम में है, तिनसुकिया असम में है, इस तरह से कई डिवीजन हैं। हमने जब लोकल लैंग्वेज इण्ट्रोडयूस किया था तो आपको जानकर खुशी होगी कि जो रीजनल लैंग्वेजेज हैं, उनमें उसे आप्ट करने वाले लोग लगभग ४६ परसेण्ट थे, जिन्होंने रीजनल लैंग्वेज में परीक्षा देना आप्ट किया। यह देखा गया कि वह प्रयोग अच्छा रहा।

एक सवाल आपने और उठाया था, अभी आपने नहीं पूछा कि त्रिपुरा में केन्द्र क्यों नहीं बनाया। त्रिपुरा में केन्द्र था, लेकिन उसकी जो परीक्षा की डेट थी, उसके पहले ही आर.आर.बी., गोहाटी की सारी परिक्षाएं स्थगित कर दी गईं। आपने एक लेवल क्रासिंग पर एक्सीडेंट की बात कही है, उस एक्सीडेंट के बारे में पता लगाकर उसकी जितनी जानकारी होगी, हम माननीय सदस्य को दे देंगे। लेकिन इस विषय से, रिक्रूटमेंट से इसका कोई सम्बन्ध नहीं था। इसकी जानकारी हमें मिली है, लेकिन उसे हम अभी पूरे तौर पर ऑथेण्टिक नहीं मानते, जब तक फाइल में कोई जानकारी मेरे पास नहीं आ जाये, उसका उल्लेख हम सदन में क्यों करें। क्योंकि हमें बताया गया कि जो गेटमैन था, उस पर जांच की जा रही है कि वह कहां चला गया था, गेटमैन कहां का रहने वाला था, इन सारी बातों की जांच की जा रही है, पता लगाया जा रहा है। उसके बारे में पूरी जो जानकारी होगी, आपने यह सवाल पहले से उठाया है, हम आपको इसका उत्तर भेज देंगे।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द: तीन प्रश्न मुझसे सम्बन्धित हैं। पहला प्रश्न माननीय प्रभुनाथ सिंह जी का बोंगईगांव में जो पुलिसकर्मी डयूटी से भाग गये थे, उससे सम्बन्धित है। असम सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की है और उन्हें कर्तव्य निर्वहन न कर पाने के कारण जेल में डाल दिया है और उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। मैं माननीय प्रभुनाथ सिंह जी से आग्रह करूंगा कि जिन बोड़ो जनजातियों के जिन बहादुर जवानों ने समर्पण किया है, उनके बारे में आपने जो टिप्पणी की है, उसे आप वापस ले लें, क्योंकि वे वही लोग हैं, जो कश्मीर में भी समर्पित किये थे और हमारी सेना की सहायता कर रहे हैं। उनके बारे में ऐसी टिप्पणी करने से…( व्यवधान) उन्हें यह टिप्पणी वापस लेनी चाहिए, मैं यह आग्रह कर रहा हूं। राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जी ने जो प्रश्न किया है, मैं निवेदन करना चाहूंगा कि कर्नाटक में जब घटना की सूचना मिली थी, मैंने तत्काल वहां के होम सैक्रेटरी और डी.जी. से बात की थी। उन्होंने मौके पर पहुंचकर स्थिति नियंत्रित कर ली। उन्होंने आश्वस्त किया है कि जहां-जहां बिहार के या दूसरे प्रदेशों के छात्र पढ़ रहे हैं, वहां हम विशेष सुरक्षा की व्यवस्था कर रहे हैं, इसलिए कोई चिन्ता की बात नहीं है। इसी तरह से आन्ध्रा प्रदेश में जो घटना घटी थी, उसमें नवोदय विद्यालय में कुछ बच्चे कुछ महीनों के लिए वहां भेजे जाते हैं। वे वहां जाकर अपने आप लौट आये। उनके साथ कोई इन्सीडेंट नहीं हुआ था, इसलिए वह घटना यह है।…( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : आप क्या बात कर रहे हैं, इंसीडेंट ऐसा हुआ है, हमने फोटो दिखाये हैं। हमने दिया है, उसकी पीठ पर मारा गया है। वह बच्चा मेरी कांस्टीट्वेंसी का है, मैंने आपको दिखाया है। उसे मारा गया है, उसमें कोई रिपोर्ट नहीं है, यह दूसरी बात है।…( व्यवधान)

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : अब उस पर बात करेंगे तो लम्बी बात हो जायेगी।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : हम प्रश्न रेज नहीं करेंगे क्या?

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी का उत्तर है। आप फिर प्रश्न रेज कर सकते हैं।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : आप काहे के लिए लड़ रहे हैं, जो रिपोर्ट हमको दी, वह हमने बता दी।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : तो आप भी रिपोर्ट पर ही जाएंगे। मैं उस बच्चे को स्पीकर साहब के पास लाता हूं।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : यादव जी, कोई रिपोर्ट गलत हो तो यह प्रश्न फिर उठाया जा सकता है।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द: हम इसमें क्या कर सकते हैं, राज्य सरकार ने जो रिपोर्ट दी, वह मैंने आपको बता दी।…( व्यवधान)

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : वह ठीक है, वह राज्य सरकार की बात है।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : बस वही बात है न। माननीय रामविलास पासवान जी ने जो सवाल किया है, वह मैं निवेदन करना चाहूंगा कि मृतकों के परिवारों के आश्रितों को एक-एक लाख रुपये, गम्भीर रूप से घायल लोगों को २५ हजार रुपये, साधारण घायलों को तीन हजार रुपये और जिनका मकान जल गया है या नष्ट कर दिया गया है, उनको २५ हजार रुपये की सहायता दी गई है और यह सहायता राशि पूरी की पूरी केन्द्र सरकार के द्वारा रीअम्बर्श की जाती है। १० करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति के लिए अभी दो दिन पहले माननीय मुख्यमंत्री जी आये थे। वे प्रधानमंत्री जी से मिले, दस करोड़ रुपये का उन्होंने एक क्षतिपूर्ति का आंकड़ा पेश किया है, उसकी हम जांच करके पैसा दे देंगे।

श्री राम विलास पासवान: राज्य सरकार के द्वारा क्या कुछ नहीं दिया गया है?

श्री चिन्मयानन्द स्वामी : यह पैसा राज्य सरकार देती है, रीअम्बर्समेंट केन्द्र सरकार करती है।

श्री राम विलास पासवान : मतलब पैसा आपका है और देती राज्य सरकार है?

श्री चिन्मयानन्द स्वामी :ऐसा ही होता है।

MR. SPEAKER: Now, I place the Resolution with the consent of the House.

… (Interruptions)

श्री स्वामी चिन्मयानन्द : मैं आपका संदेश प्रधानमंत्री जी को पहुंचा दूंगा, वह प्रधानमंत्री जी कह सकते हैं।

… (Interruptions)

… MR. SPEAKER: Please listen to the Resolution. The Resolution, which is being placed before the House today, reads like this.

" This House expresses its deep sense of anguish over the recent incidents of violence in Bihar, Assam, Maharashtra and some other parts of the country in the wake of Railway recruitment examinations in which many innocent lives have been lost and properties destroyed. Such incidents of parochialism should be countered unitedly and with determination.
This House unanimously appeals to all to promote harmony and the spirit of common brotherhood amongst all the people of India transcending religious, linguistic, regional or sectional diversities. All issues that have a potential for promoting divisive tendencies and regional discord can and should be resolved through discussion, dialogue and other democratic means, and not through violent means. Let us resolve to protect the regional harmony, unity and integrity of the country and rededicate ourselves to this cause."

I hope the House agrees.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

The Resolution was unanimously adopted.

MR. SPEAKER : The House now stands adjourned till 11.00 am tomorrow.

21.46 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Tuesday, December 16, 2003/Agrahayana 25, 1925 (Saka). -------------